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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Saturday, March 6, 2021

रहने लायक शहर : रोजगार की जगहों को सुंदर, सुविधाजनक बनाने की चुनौती ( नवभारत टाइम्स)

केंद्रीय आवास तथा शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा गुरुवार को जारी की गई शहरों की रैंकिंग कई लिहाज से महत्वपूर्ण है। साफ-सफाई और अन्य सुविधाओं के आधार पर शहरों की रैंकिंग पहले से होती आई है। इस बार ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स में इन शहरों की गुणवत्ता को वहां रहने वाले लोगों की नजर से कुछ खास पैमानों पर नापने की कोशिश की गई है। दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में बेंगलुरु, पुणे और अहमदाबाद तथा दस लाख से कम आबादी वाले शहरों में शिमला, भुवनेश्वर और सिलवासा को क्रमशः पहला, दूसरा और तीसरा स्थान मिला। दिलचस्प बात है कि बड़े शहरों में मोस्ट लिवेबल सिटी का ताज भले बेंगलुरु को मिला हो, पर क्वॉलिटी ऑफ लाइफ के आधार पर चेन्नै, कोयंबटूर और नवी मुंबई को क्रमशः पहला, दूसरा और तीसरा स्थान दिया गया।


क्वालिटी ऑफ लाइफ में सस्ते आवास, साफ पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं, सुरक्षा तथा मनोरंजन के साधनों की उपलब्धता जैसे कारक रखे गए थे। मगर किसी भी शहर की लिवेबिलिटी इस सवाल को परे रखकर अधूरी ही मानी जाएगी कि वह शहर रोजगार के कितने और किस तरह के अवसर उपलब्ध करा सकता है। साफ हवा, पानी, सुंदर दृश्य, सड़कों पर कम ट्रैफिक और घर के आसपास बाजार, हॉस्पिटल जैसे सुविधाएं किसी शहर को रहने लायक बनाती हैं, लेकिन वहां रहने वाले काम क्या करेंगे, उनकी आजीविका के साधन क्या होंगे इन सवालों से ही यह तय होता है कि वहां कौन लोग बसने आएंगे। आजीविका के अभाव में वहां पेंशन पर गुजारा करने वाले या किसी और की कमाई पर आश्रित लोग जरूर आएंगे, लेकिन कमाकर खाने वाली आबादी नहीं आ पाएगी। अगर ये सुविधाएं मिल गई तो इसका मतलब यह होगा कि वहां तरह-तरह के कारखाने लगेंगे। इससे एक तो काम की तलाश में आने वालों की संख्या बढ़ेगी, दूसरे प्रदूषण भी बढ़ेगा जिसका नतीजा यह हो सकता है कि कुछ समय में वे पहले की तरह ‘रहने लायक’ न रह जाएं। जैसा कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों के साथ हुआ या हो रहा है।


इसी बिंदु पर अर्बन प्लानिंग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हमारे सामने लंदन जैसे शहरों के उदाहरण हैं जो किसी जमाने में दुनिया के सबसे बड़े रोजगार केंद्रों में शुमार होते थे और सबसे गंदे शहरों में उनकी गिनती होती थी। पर समय के साथ वे बहुत सारे रोजगार देने के बावजूद सुंदर, साफ और बेहतरीन शहरों में शुमार हुए। ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स इस मायने में तो उपयोगी है ही कि यह शहरों में उपलब्ध सुविधाओं को वहां रहने वालों की नजर से समझने का मौका देता है, पर इसकी सबसे बड़ी सार्थकता इस बात में होगी कि देश की श्रमशील और उत्पादक आबादी को अपनी ओर खींचने वाले शहरों को अधिक से अधिक रहने लायक भी बनाया जा सके।



सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Thursday, March 4, 2021

रिजर्वेशन: स्थानीय बनाम बाहरी ( नवभारत टाइम्स)

हरियाणा सरकार ने राज्य में प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों में स्थानीय प्रत्याशियों के लिए 75 फीसदी आरक्षण का प्रावधान कर न केवल एक पुरानी बहस को नई जमीन दे दी है बल्कि देशवासियों के बीच एक नए प्रकार के टकराव की गुंजाइश भी बना दी है। राज्य विधानसभा तो पिछले साल ही यह बिल पास कर चुकी थी। राज्यपाल की मंजूरी के बाद अब इसके लागू होने का रास्ता साफ हो गया है।

स्थानीय प्रत्याशियों के लिए नौकरियों में आरक्षण की न तो मांग नई है, न ही इसे लेकर विभिन्न दलों के बीच चलने वाली राजनीतिक उठापटक में कोई नयापन है। महाराष्ट्र में स्थानीय निवासियों का रोजी-रोजगार सुनिश्चित करने के लिए बाहरी लोगों को इनसे दूर रखने का मुद्दा शिवसेना और फिर एमएनएस की राजनीति का मुख्य आधार रहा है। लेकिन उस राजनीति को अभी हाल तक नीति निर्माण से जुड़े हलकों में ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाता था, क्योंकि सत्ता में रहते हुए पार्टियां स्थानीय युवाओं को आरक्षण जैसे मुद्दों पर नरम पड़ जाती रही हैं। यह स्थिति पिछले कुछ वर्षों में बदल गई है। बीजेपी शासित राज्यों में न केवल चुनावी मुद्दे के रूप में इस मांग को तवज्जो दी गई है बल्कि सरकारें भी इसे लेकर काफी गंभीर दिखने लगी हैं।


इसी का नतीजा है कि हरियाणा में बहुत ऊंची नौकरियों को छोड़कर बाकी सबका तीन चौथाई हिस्सा स्थानीय आबादी के लिए आरक्षित करने की घोषणा हो गई है जबकि मध्य प्रदेश और कर्नाटक में बीजेपी की सरकारें ऐसा इरादा जता चुकी हैं। गौर से देखें तो हरियाणा सरकार का यह फैसला राष्ट्रीय विकास की उस प्रक्रिया को ही सवालों के घेरे में ला खड़ा करता है, जिसे आजादी के बाद और खासकर 1960 के दशक में अपनाया गया था और अंतर्निहित पक्षपात के बावजूद पूरे देश में जिसे लेकर अभी तक एक अघोषित सर्वसम्मति बनी रही है।


इसकी धुरी यह प्रस्थापना थी कि वित्तीय संसाधन पूरे देश से जुटाए जाएं लेकिन इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए पूंजी लगाते वक्त यह देखा जाए कि उसपर सबसे ज्यादा रिटर्न कहां से मिलने वाला है। इसीलिए चाहे भाखड़ा-नांगल परियोजना हो या बंदरगाह और परिवहन का जाल बिछाने का मामला, केंद्र की ओर से ढांचागत पूंजी निवेश पश्चिमी और दक्षिणी समुद्र तटीय राज्यों के अलावा पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में ही हुआ। इसकी बदौलत कुछ राज्यों में खेती और उद्योग-धंधे तेजी से विकसित हुए जबकि बाकी राज्यों की पहचान लेबर सप्लाई तक सिमटती गई।


हाल तक इन राज्यों के लोगों को इसमें कुछ अटपटा नहीं लगता था क्योंकि लुधियाना, गुड़गांव, मुंबई, अहमदाबाद और बेंगलुरु इन्हें अपने ही गांव-घर का विस्तार लगते थे। मगर धीरे-धीरे संकीर्ण राजनीति की एक धारा ऐसी उभरी जो पिछड़े राज्यों से आने वालों को बाहरी के रूप में चित्रित करने लगी। अब तक यह काम अपने पांव जमाने में जुटी क्षेत्रीय ताकतें ही करती थीं, लेकिन अभी देश की सबसे बड़ी पार्टी के इस दिशा में बढ़ जाने के बाद कई राज्यों की युवा पीढ़ी के पास खुद को दिलासा देने का कोई जरिया नहीं बचेगा।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Wednesday, March 3, 2021

चीनी हैकरः सायबर हमले का खतरा ( नवभारत टाइम्स)

पिछले अक्टूबर में मुंबई में हुए असाधारण पावर कट को लेकर अमेरिकी अखबार न्यू यॉर्क टाइम्स में हुआ खुलासा पहली नजर में चौंकाने वाला भले न लगे, पर इसके निहितार्थ बहुत गंभीर हैं। एकबारगी यह चौंकाता नहीं तो इसलिए क्योंकि हैकरों द्वारा विभिन्न देशों की संवेदनशील वेबसाइटों में घुसपैठ करने, उन्हें हैक करने या जाम कर देने की कोशिशों से जुड़ी खबरें अक्सर आती रहती हैं। जो बात मौजूदा खुलासे को खास बनाती है, वह है इसकी पृष्ठभूमि। मध्य जून में भारत-चीन सीमा पर गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं में हुई हिंसक भिड़ंत के बाद दोनों तरफ तनाव चरम पर था। न सिर्फ दोनों देशों के सैनिक बड़ी संख्या में आमने-सामने डटे हुए थे बल्कि एक-दूसरे की हर चाल पर चौकस निगाह भी रखे हुए थे। भारत का खास जोर इस बात पर था कि चीनी सेना मई से पहले की स्थिति में वापस जाए। इसी सबके बीच अक्टूबर में भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई में ऐसा बिजली संकट आता है कि न केवल लोकल ट्रेनें बैठ जाती हैं बल्कि शेयर मार्केट की गतिविधियां भी कई घंटे ठप रहती हैं और तमाम इमर्जेंसी सेवाएं प्रभावित होती हैं। जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।


मुंबई में बिजली गुल...क्‍या भारत को अंधेरे में डुबो सकता है चीन? ड्रैगन पर खुलासे से उठे गंभीर सवाल


अब यह रिपोर्ट बता रही है कि इसके पीछे चीन का हाथ था। चीनी हैकर ग्रुप रेड ईको ने इसे अंजाम दिया था। हालांकि भारत सरकार ने अभी आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की है, लेकिन महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि उसके द्वारा करवाई गई जांच भी इसी तरफ इशारा करती है। दरअसल हैकिंग ऐसी चीज है जिसमें अंतिम तौर पर कोई निष्कर्ष स्थापित होना और उसका सत्यापित होना खासा मुश्किल होता है। अगर चीनी हैकरों का हाथ साबित हो गया तो भी यह सिद्ध करने का काम रह जाता है कि वे चीनी सरकार के निर्देश पर उसके अंग के रूप में काम कर रहे थे। बहरहाल, उससे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। अगर यह माना जाए कि रिपोर्ट की सारी बातें सही हैं तो यह आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप का पहला ठोस उदाहरण है। अब तक हम एलएसी के विभिन्न हिस्सों में अपनी सेना के बरक्स चीनी सेना के प्लस-माइनस पर विचार करते थे। यह कभी किसी के ध्यान में ही नहीं आया कि दुश्मन देश सीमा से इतर हमारी वित्तीय राजधानी को तहस-नहस करने के लिए साइबर अटैक का सहारा ले सकता है। अगर इन रिपोर्टों की सचाई स्थापित नहीं होती है तब भी चीनी हैकरों का खतरा तो एक वास्तविकता है ही। ऐसे में रक्षा नीति के एक अहम हिस्से के रूप में सायबर सुरक्षा को शामिल करने और इस मोर्चे पर खुद को मजबूत करने के अजेंडे पर अमल का काम अब और नहीं टाला जा सकता। हमारे लिए यह और ज्यादा जरूरी इसलिए है क्योंकि आम तौर पर हम सुरक्षात्मक नजरिया अपना कर ही आगे बढ़ते हैं जबकि सायबर बुलीइंग या सायबर अटैक के मामले में जवाबी हमले का डर ही सबसे प्रभावी प्रतिरोध माना जाता है।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Monday, March 1, 2021

फर्क समझे सरकार ( नवभारत टाइम्स)

सोशल मीडिया को नियमित करने की बहुचर्चित और वास्तविक जरूरत पूरी करने के मकसद से केंद्र सरकार पिछले हफ्ते जो नए कानून लेकर आई है, वे हालात को बेहतर बनाने के बजाय और बिगाड़ने का काम करेंगे। सरकार के इस कदम के साथ सबसे बड़ी गड़बड़ यह है कि इसमें सोशल मीडिया, स्ट्रीमिंग एंटरटेनमेंट और डिजिटल न्यूज पोर्टल- तीनों को एक ही डंडे से हांकने की कोशिश की गईsoहै। यह सर्वविदित तथ्य है न्यूज कंटेंट के लिए पहले से ही बहुत से कानून हैं जिनका पालन न्यूज पोर्टलों को करना होता है। इसके अलावा यह भी सच है कि


न्यूज पोर्टल अखबारों और टीवी चैनलों की कसौटियों पर चलते हैं। किसी भी समाचार संस्थान में पत्रकारों और संपादकों की बहुस्तरीय व्यवस्था होती है और किसी समाचार को आम पाठकों या दर्शकों तक पहुंचने से पहले जांच-परख के इन अलग-अलग स्तरों से होकर गुजरना पड़ता है। यह सेल्फ रेग्युलेशन की एक ऐसी व्यवस्था है जिसका सोशल मीडिया में सर्वथा अभाव होता है। वहां तो आधी-अधूरी सूचनाएं ही नहीं विशुद्ध अफवाहें तक बिना किसी जांच-पड़ताल के लोगों के सामने परोस दी जाती हैं और उन सबके लिए किसी की कोई जिम्मेदारी भी नहीं होती। इन तमाम पहलुओं पर डिजिटल न्यूज के स्टेक होल्डरों से सलाह-मशविरा या विचार-विमर्श करने की जरूरत थी। मगर विचार-विमर्श किए बगैर सरकार ऐसे उपाय लेकर आई जो सोशल मीडिया को अनुशासित करने के लिए काफी नहीं हैं और मेनस्ट्रीम मीडिया की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।


एक ऐसे दौर में, जब पत्रकारों को पहले से ही बात-बेबात राजद्रोह जैसे मुकदमे झेलने पड़ रहे हैं, सरकारी निगरानी की एक और व्यवस्था नए तरह के दबाव लेकर आएगी। इस बात के प्रबल आसार हैं कि एक तरफ इस निगरानी तंत्र के जरिए सरकार की दखलंदाजी बढ़ेगी तो दूसरी तरफ ट्रोल भी चुनिंदा मीडिया समूहों के खिलाफ अपना अभियान तेज किए रहेंगे। बहरहाल, यह स्पष्ट होना चाहिए कि सोशल मीडिया पर विवेक का अंकुश लगाने के सरकार के इरादे में कुछ भी गलत नहीं है। फेक न्यूज फैलाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना बेशक जरूरी है। याद रखने की बात यह है कि मुख्यधारा के मीडिया ने ही विश्वसनीय खबरों का सिलसिला जारी रखते हुए फेक न्यूज के अभियान को कमजोर किया है। ताजा कानूनों के तहत शिकायत निपटारे की प्रस्तावित त्रिस्तरीय व्यवस्था इसका काम करना और कठिन बना देगी। ऐसे में अब सबसे अच्छा उपाय यही है कि सरकार इस कदम को वापस ले ले। इसके बदले डेटा प्रोटेक्शन के लिए कानून बनाने की जो प्रक्रिया चल रही है उसका समुचित इस्तेमाल करे। उसी कानून में कुछ अतिरिक्त प्रावधान जोड़कर सोशल मीडिया के कंटेंट को नियमित करने का मकसद पूरा किया जा सकता है। बस वहां भी इतना ध्यान रखना जरूरी है कि न्यूज प्लैटफॉर्म को सोशल मीडिया के साथ न जोड़ दिया जाए।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Friday, January 15, 2021

कमेटी से भी बात करें (नवभारत टाइम्स)

इस भावना के तहत ही उसने यह महत्वपूर्ण पहल की है, हालांकि किसानों का रुख इस मामले में अभी बहुत पॉजिटिव नहीं लगता। किसान संगठनों ने कहा है कि वे न तो इस समिति के सामने अपना पक्ष रखेंगे, न ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुरू की गई इस प्रक्रिया में शामिल होंगे।


दिल्ली बॉर्डर पर किसानों के धरने के 48वें दिन सुप्रीम कोर्ट ने अपनी एक बड़ी पहल से गतिरोध टूटने की कुछ उम्मीद जगाई है। इस बीच किसानों के प्रतिनिधि मंडल से सरकार की आठ दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन इससे कोई नतीजा नहीं निकला है। किसान इन तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं जबकि सरकार का कहना है कि वह इन कानूनों में संशोधन पर विचार जरूर कर सकती है, लेकिन ये कानून वापस नहीं लिए जा सकते। दोनों पक्षों के इस अड़ियल रुख के चलते बातचीत महज रस्म अदायगी का रूप लेती जा रही थी।

ऐसे में भारत के मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने थोड़ा और समय देने का सरकारी अनुरोध खारिज करते हुए तीनों कृषि कानूनों के अमल पर अगले आदेश तक के लिए रोक लगा दी। साथ ही अदालत ने चार विशेषज्ञों की एक समिति भी गठित की है जो सभी पक्षों से बातचीत कर अदालत को विवाद निपटारे के लिए सुझाव देगी। समिति की रिपोर्ट की रोशनी में ही अदालत अपना आगे का रुख तय करेगी। एक बात तय है कि किसानों की ओर से इन तीनों कानूनों की संवैधानिक वैधता पर कोई सवाल नहीं उठाया गया है, न ही इनके तकनीकी पहलुओं को लेकर कोई आपत्ति जताई गई है। ऐसे में स्वाभाविक यही था कि सरकार आंदोलनकारी किसानों की चिंता को संबोधित करते हुए उन्हें संतुष्ट करने का कोई रास्ता निकालती।


मगर सरकार के रुख को देखते हुए ऐसा लगने लगा था कि उसकी दिलचस्पी हल निकालने से ज्यादा आंदोलनकारी किसानों को अलग-थलग करने, उनके आंदोलन को कोई विवादित मोड़ देने या उसे सहनशीलता की आखिरी सीमा तक खींचते चले जाने में है। जन असंतोष के सभी रूपों को लेकर यह उसका आजमाया हुआ तरीका रहा है और इसमें उसे सफलता भी मिलती आई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से अलग रवैया अपनाकर स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक लोकतांत्रिक देश में महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों समेत एक बड़ी आबादी को कड़ाके की ठंड में यूं सड़क पर नहीं छोड़ा जा सकता।


इस भावना के तहत ही उसने यह महत्वपूर्ण पहल की है, हालांकि किसानों का रुख इस मामले में अभी बहुत पॉजिटिव नहीं लगता। किसान संगठनों ने कहा है कि वे न तो इस समिति के सामने अपना पक्ष रखेंगे, न ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुरू की गई इस प्रक्रिया में शामिल होंगे। जाहिर है, उनके इस रुख में अड़ियलपने का तत्व मौजूद है और इससे सहमति नहीं जताई जा सकती। अदालत ने उनसे अपना संघर्ष समाप्त करने को नहीं कहा है। कृषि कानूनों पर अमल रोकने का आदेश देकर अदालत ने जो सौहार्द का माहौल बनाया है, उसका फायदा उठाते हुए किसान अगर समिति के सामने पूरी मजबूती से अपना पक्ष रखें तो अदालत भी भविष्य को लेकर उनकी आशंकाओं से परिचित हो सकेगी और सरकार से बातचीत में आगे के लिए उनका पक्ष और मजबूत होगा।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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बड़े बेआबरू होकर... (नवभारत टाइम्स)

​​राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद से ही ट्रंप खुद को अमेरिकी लोकतंत्र के नियमों और संस्थाओं से ऊपर की चीज दर्शाते रहे हैं। पेरिस जलवायु समझौते से वे यह कहते हुए बाहर आ गए कि यह समझौता बराक ओबामा ने किया था, जैसे ओबामा उन्हीं की तरह एक निर्वाचित राष्ट्रपति न होकर धोखे से इस पद पर काबिज हो गए हों।

अमेरिका को फिर से महान बनाने का नारा देकर सत्ता में आए डोनाल्ड ट्रंप एक ही कार्यकाल में दो बार महाभियोग का सामना करने वाले एकमात्र अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में इतिहास में दर्ज हो रहे हैं। बुधवार को अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव 197 के मुकाबले 232 मतों से पारित कर दिया गया। खास बात यह कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के भी दस सांसदों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया।

इसी 20 जनवरी, यानी अगले बुधवार को ट्रंप का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। लेकिन उससे पहले 19 जनवरी को ही संसद के ऊपरी सदन सीनेट में इस प्रस्ताव पर वोटिंग होनी है। वहां डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत को देखते हुए प्रस्ताव का पास होना तय माना जा रहा है। पूछा जा सकता है कि सिर्फ एक दिन के लिए महाभियोग चलाने की इस कवायद का भला क्या मतलब है। इस सांकेतिक कार्रवाई से क्या हासिल होने वाला है? असल में ऐसी कार्रवाइयों को कम महत्वपूर्ण मानने का ही नतीजा हमें पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार करने वाले आल्ट-राइट (अति-दक्षिणपंथ) के उभार के रूप में देखने को मिल रहा है।


राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद से ही ट्रंप खुद को अमेरिकी लोकतंत्र के नियमों और संस्थाओं से ऊपर की चीज दर्शाते रहे हैं। पेरिस जलवायु समझौते से वे यह कहते हुए बाहर आ गए कि यह समझौता बराक ओबामा ने किया था, जैसे ओबामा उन्हीं की तरह एक निर्वाचित राष्ट्रपति न होकर धोखे से इस पद पर काबिज हो गए हों। हाल में राष्ट्रपति चुनाव हारने के बाद तो उन्होंने मतदाताओं के फैसले को मानने से ही इनकार कर दिया। हर उपलब्ध मंच पर उनका दावा खारिज हो गया, फिर भी वे चुनाव में धोखाधड़ी की बात पर अड़े रहे। और फिर जिस दिन चुनाव नतीजों पर संसद की मोहर लगनी थी, उसी दिन ट्रंप समर्थकों ने संसद में घुसकर जो उत्पात मचाया, वह अमेरिकी इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय बन गया है।


सबसे अहम सवाल अब यही है कि इस प्रकरण को लेकर अमेरिकी लोकतंत्र कितनी सख्ती बरतता है। दुनिया भर में लिबरल राजनीतिक धाराओं का चलन ऐसी प्रवृत्तियों से निपटने के मामले में ढीलापोली बरतने का ही रहा है। धुर दक्षिणपंथी ताकतों को हराकर सत्ता में आने के बाद झगड़े-टंटे से बचकर राज करना ही उनकी एकमात्र प्राथमिकता हो जाती है। यही वजह है कि हुल्लड़बाज ताकतों द्वारा जनतांत्रिक संविधान के साथ खिलवाड़ की कोशिशें पूरी दुनिया में तेज हुई हैं। अमेरिकी संसद ने महाभियोग का फैसला लेने के क्रम में दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर यह संदेश दिया है कि देश का संवैधानिक ढांचा कोई राजनीति करने की चीज नहीं है और अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसका मुकाम एक ऐसी लक्ष्मण रेखा का है, जिसे अगर राष्ट्रपति भी पार करता है तो उसे इसका दंड भुगतना होगा।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Thursday, January 14, 2021

कैसे कम हो तनाव (नवभारत टाइम्स)

पाकिस्तान के मामले में पिछले कुछ वर्षों का हमारा अनुभव देखा जाए तो उसकी घेरेबंदी करने में हम काफी हद तक सफल रहे हैं। लेकिन उसकी कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर उससे अपनी कोई बात नहीं मनवा पाए हैं।


आर्मी चीफ जनरल एमएम नरवणे ने मंगलवार को सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ-साफ कहा कि हमें एक साथ दो मोर्चों पर खतरे का सामना करने के लिए खुद को तैयार रखना होगा। वास्तव में हमारी सेना पिछले कुछ समय से दोहरी चुनौती का मुकाबला कर रही है। एक तरफ पाकिस्तान से लगी एलओसी पर गोलीबारी और आतंकी घुसपैठ की कोशिशें जारी हैं, दूसरी तरफ चीन से लगी एलएसी पर भी हालात सामान्य होने की कोई संभावना नहीं दिख रही। हालांकि सेना के जवान दोनों मोर्चों पर लगातार चुस्ती बनाए हुए हैं और इसके लिए निश्चित रूप से वे तारीफ के हकदार हैं, मगर सीमा पर, खासकर दो-दो सीमाओं पर एक साथ लंबे समय तक तनाव के हालात बने रहना कोई सामान्य बात नहीं है।


यह जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की है कि सीधी बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए सीमा पर शांति और न्यूनतम भरोसे की स्थिति बहाल करे। दुर्भाग्यवश चीन और पाकिस्तान, दोनों ही मामलों में फलदायी कूटनीतिक संवाद की कोई प्रक्रिया नजर नहीं आ रही। हालांकि भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी बात सशक्त ढंग से रखने में कोई कोताही नहीं बरती है। बीते मंगलवार को विदेश मंत्री जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक मंत्रिस्तरीय बैठक में आतंकवाद के सवाल पर चीन और पाकिस्तान दोनों को आईना दिखाया। अंतरराष्ट्रीय मंचों से ऐसी घेरेबंदी हमेशा उपयोगी होती है। लेकिन इसका असल फायदा तभी होता है जब इससे बनने वाले दबाव का इस्तेमाल द्विपक्षीय बातचीत में किया जा सके।


पाकिस्तान के मामले में पिछले कुछ वर्षों का हमारा अनुभव देखा जाए तो उसकी घेरेबंदी करने में हम काफी हद तक सफल रहे हैं। लेकिन उसकी कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर उससे अपनी कोई बात नहीं मनवा पाए हैं। चीन के मामले में अच्छी बात यह है कि न केवल उससे बातचीत के सारे चैनल खुले हैं बल्कि व्यापारिक गतिविधियां भी लगभग पहले जैसी ही चल रही हैं। मगर वहां भी इन प्रक्रियाओं का कोई उपयोग सीमा पर तनाव कम करने में नहीं हो पा रहा है। वैसे चीन के साथ तनाव का भारत समेत पूरी दुनिया को यह फायदा जरूर हुआ है कि ताकत के बल पर किसी को भी झुका ले जाने वाली चीन की दबंग छवि इससे मटियामेट हो गई है।


मगर भारतीय सेना की इस उपलब्धि के बाद आगे की भूमिका निभाने के लिए कूटनीति को ही सामने आना होगा। हमें इस पहलू पर भी विचार करना चाहिए कि इस तनाव का उपयोग पाकिस्तान ने चीन से अपनी सामरिक घनिष्ठता बढ़ाने में किया है, जबकि चीन सीमावर्ती क्षेत्रों में अपना रेलवे और डिफेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में जुटा है। उनके बरक्स हमें अपने संसाधन सिर्फ दोनों मोर्चों पर यथास्थिति बनाए रखने में खपाने पड़ रहे हैं। जाहिर है, भारत के लिए आगे की चुनौती यही है कि हम अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता किए बगैर सीमा पर तनाव कम करने की राह जल्द से जल्द खोज निकालें।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Monday, January 11, 2021

सबसे गर्म साल (नवभारत टाइम्स)

साल 2020 का 2016 के साथ संयुक्त रूप से ज्ञात इतिहास में दुनिया के सबसे गर्म साल के रूप में दर्ज होना एकबारगी चौंका देता है। पहली बात तो यह कि साल 2016 अल नीनो इफेक्ट के लिए चर्चा में रहा था जो वातावरण में गर्मी बढ़ाता है। इसके उलट साल 2020 में ला नीना इफेक्ट रहा जिसे अल नीनो के उलट दुनिया को ठंडी करने वाली परिघटना कहा जा सकता है। इससे भी बड़ी बात यह है कि 2020 में कोरोना वायरस ने ऐसा तहलका मचाया कि मानव समाज के सारे चक्के जैसे एकाएक थम गए।

लॉकडाउन के चलते तमाम लोग अपने घरों में बंद हो गए और हवाई जहाज, गाड़ी, मोटर आदि से लेकर फैक्ट्रियों की मशीनें तक जाम हो गईं। इसका नतीजा इस रूप में सामने आया कि आसमान साफ नजर आने लगा, हवा में प्रदूषण का स्तर नीचे चला गया, नदियों में गंदगी कम दर्ज की गई और मनुष्यों से इतर बाकी सारे जीव ज्यादा चैन और सुकून से घूमने लगे। यह स्थिति साल के तीन चौथाई हिस्से में व्याप्त रही, जिससे यह नतीजा निकालना स्वाभाविक था कि कार्बन उत्सर्जन में कमी के कारण कम से कम ग्लोबल वॉर्मिंग की दृष्टि से यह साल आदर्श माना जाएगा।

इन अनुमानों के विपरीत 2020 का सबसे गर्म साल साबित होना इस मायने में निराश करता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था ठप होने के बावजूद ग्लोबल वॉर्मिंग के मोर्चे पर हम कुछ हासिल नहीं कर पाए। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि ग्लोबल वॉर्मिंग की प्रक्रिया को यहां तक लाने में भले मनुष्य समाज का सीधा हाथ रहा हो, पर अब यह इतनी जटिल हो चुकी है कि हम चाहकर भी इसपर सीधा नियंत्रण नहीं बना सकते। ऐसी ग्रह-स्तरीय समस्याओं से निपटने के लिए इंसानी समाज के लिए जैसा आचरण जरूरी बताया जा रहा था, अनिच्छा से ही सही पर पिछले साल हमने उसे अपने ऊपर लागू किया। इसके बावजूद हालात बिगड़ते गए।

आर्कटिक के कुछ हिस्सों और उत्तरी साइबेरिया में इस साल तापमान में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया। पश्चिमी साइबेरिया क्षेत्र में भी ठंड और बसंत अस्वाभाविक रूप से गर्म रहे। सबसे बड़ी बात यह कि जंगलों की आग ने आर्कटिक क्षेत्र में इस साल कुछ ज्यादा ही सक्रियता दिखाई। आर्कटिक सर्कल और नॉर्थ पोल के बीच वाइल्डफायर की वजह से 2020 में 244 मेगाटन कार्बन डाइऑक्साइड निकली जो 2019 के मुकाबले 33 फीसदी ज्यादा है।

कुल मिलाकर इसका मतलब यह कि पर्यावरण विनाश की ओर बढ़ती मानव सभ्यता के कदमों पर ब्रेक लगाने की क्षमता भी अब हमारे पास नहीं बची है। साफ है कि सुधार के लिए अंतिम पलों का इंतजार आत्मघाती होगा। हमें ग्लोबल वॉर्मिंग की रफ्तार घटाने के हर संभव प्रयास अभी से और लगातार जारी रखने होंगे ताकि हमारे ग्रह का असंतुलित पर्यावरण इस सदी के बीतने से पहले अपना संतुलन वापस पा ले।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स। 

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Saturday, January 9, 2021

क्लासरूम वाली पढ़ाई (नवभारत टाइम्स)

महानगरों में रहनेवाले साधनसंपन्न परिवारों के बच्चों का एक छोटा तबका ही कायदे से ऑनलाइन क्लासेज का फायदा उठा पाया है। अव्वल तो सारे स्कूलों में यह सुविधा ही मौजूद नहीं है, और जहां है वहां भी लैपटॉप और मोबाइल तक सीमित पहुंच तथा बिजली और नेटवर्क जैसी बाधाओं के चलते ज्यादातर बच्चे क्लास की सारी बातें नहीं समझ पाए।

 

करीब दस महीनों से बंद पड़े स्कूल अब खुलने लगे हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान से लेकर कर्नाटक और केरल तक कई राज्यों की सरकारें कुछ नियमों और शर्तों के साथ स्कूल खोलने की इजाजत दे रही हैं। इतनी लंबी अवधि तक स्कूलों का बंद रहना सबके लिए नुकसानदेह साबित हुआ है। कहने को इस दौरान ऑनलाइन क्लासेज चलती रही हैं, लेकिन आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर अलग-अलग स्थिति वाले बच्चों के व्यक्तित्व विकास को ध्यान में रखें तो स्कूल जाकर क्लासरूम में पढ़ाई करने की कोई तुलना ऑनलाइन पढ़ाई से नहीं हो सकती। इसके अलावा यह भी मानना पड़ेगा कि ऑनलाइन कक्षाओं का चलन बच्चों में और भी दुखद श्रेणी विभाजन का कारण बना है।

महानगरों में रहनेवाले साधनसंपन्न परिवारों के बच्चों का एक छोटा तबका ही कायदे से ऑनलाइन क्लासेज का फायदा उठा पाया है। अव्वल तो सारे स्कूलों में यह सुविधा ही मौजूद नहीं है, और जहां है वहां भी लैपटॉप और मोबाइल तक सीमित पहुंच तथा बिजली और नेटवर्क जैसी बाधाओं के चलते ज्यादातर बच्चे क्लास की सारी बातें नहीं समझ पाए। एक ही क्लास में जानकारी के अलग-अलग स्तर वाले बच्चों को लेकर आगे बढ़ना शिक्षकों के लिए बड़ी चुनौती साबित होने वाला है। मगर बात इतनी ही नहीं है। दस महीने की इस बंदी ने शिक्षा का ढांचा ढह जाने का खतरा पैदा कर दिया है।


स्कूलों के वित्तपोषण से जुड़ी एक कंपनी आईएसएफसी द्वारा करवाए गए सर्वे के मुताबिक देश के 17.06 फीसदी स्कूल ऐसे रहे जहां इस साल फीस के नाम पर कुछ भी जमा नहीं हो पाया। 59.74 फीसदी स्कूलों में फीस कलेक्शन 40 प्रतिशत से भी कम रहा। स्वाभाविक रूप से इसका असर स्टाफ की सैलरी पर पड़ा। सर्वे के मुताबिक 26.49 फीसदी स्कूलों ने कर्मचारियों की छंटनी करने और 36.43 फीसदी ने वेतन में कटौती करने की बात स्वीकार की। जाहिर है, यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती। राज्य सरकारों द्वारा स्कूल खोलने की इजाजत देने का एक रिश्ता इस संकट से भी है।


रहा सवाल महामारी का तो रोजाना नए संक्रमणों की संख्या भारत में भले कम हो गई हो, लेकिन वायरस का खतरा कम नहीं हुआ है। खासकर ब्रिटेन से फैल रहे कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन ने स्कूलों के लिए मुश्किल और बढ़ा दी है। वहां हालात लगभग काबू में आ गए थे, मगर युवाओं और बच्चों के लिए ज्यादा खतरनाक इस नए स्ट्रेन का उत्पात देखकर पूरे देश में फिर से सख्त लॉकडाउन लागू करना पड़ा। वैक्सीनें अगर पूरी तरह प्रभावी साबित होती हैं तो भी व्यापक आबादी तक उनके पहुंचने में वक्त लगेगा। ऐसे में बचाव का सबसे कारगर तरीका आज भी अधिकतम सावधानी बरतने का ही है। सरकारों ने स्कूलों पर ऐसी कई पाबंदियां लगाई हैं, पर उनका पालन सुनिश्चित करने का काम अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन के ही जिम्मे है।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Friday, January 8, 2021

लोकतंत्र में ट्रंप (नवभारत टाइम्स)

निश्चित रूप से अमेरिकी लोकतंत्र का एक गहरा संकट ट्रंप के रूप में जाहिर हुआ है। कुछ महीने पहले अश्वेत असंतोष के विस्फोट में दुनिया ने अमेरिकी समाज की बेचैनी का एक पहलू देखा था। नए साल के पहले हफ्ते में इसी सिक्के का दूसरा पहलू श्वेत प्रतिक्रिया की शक्ल में नजर आया है।


अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के साफ नतीजों के बावजूद सत्ता हस्तांतरण होने तक इतना कुछ हो जाएगा, शायद ही किसी ने सोचा हो। चुनावों में धांधली के आरोप लगाते हुए नतीजों को हर संभव मंच पर चुनौती देने के बावजूद निवर्तमान राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप कहीं भी किसी गड़बड़ी का सबूत नहीं दे सके। आखिरकार हर जगह से नतीजों की पुष्टि होने के बाद 6 जनवरी को संसद के दोनों सदनों ने जो बाइडन और कमला हैरिस की जोड़ी को विजेता घोषित कर दिया। मगर इस औपचारिकता के बीच जिस तरह ट्रंप के समर्थक संसद में घुस आए और उत्पात की हदें पार करते हुए कई लोगों की मौत का सबब बन गए, वह अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास में एक शर्मनाक अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है।


इसके लिए खुद ट्रंप को जिम्मेदार बताना भी गलत नहीं है। जिस तरह उन्होंने संसद में हो रही चर्चा के दौरान रैली रखी, अपने समर्थकों से बड़ी संख्या में राजधानी पहुंचने की अपील की और रैली के दौरान मंच से उनको भड़काने की कोशिश की, वह सब असामान्य है। सबसे बड़ी बात यह कि अमेरिकी संसद की सुरक्षा 'ब्लैक लाइव्स मैटर' वाले प्रदर्शन की तरह सेना को सौंपने के बजाय पुलिस के हवाले छोड़ दी गई, जिसे उपद्रवियों ने चुटकियों में बिखेर दिया। बहरहाल, सदी की इस सबसे बड़ी लोकतंत्र विरोधी गतिविधि का जिम्मा सिर्फ एक व्यक्ति पर डालना काफी नहीं है। यह भी देखना होगा कि ट्रंप को यह सब कर गुजरने की ताकत कहां से हासिल हुई। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए उनके फैसलों की आलोचना होती रही और ऐन चुनावी साल में कोरोना ने अमेरिका में जो तबाही मचाई, उसे भी ट्रंप सरकार की नाकामी समझा गया।


इसके बावजूद राष्ट्रपति चुनाव का स्वरूप कांटे की टक्कर वाला रहा। यहां तक कि चुनाव नतीजे आने के बाद जब ट्रंप की विदाई तय हो गई, तब भी न केवल उनके कहने पर हजारों लोग राजधानी में कुछ भी कर गुजरने का मन बनाकर इकट्ठा हुए बल्कि इसके एक दिन पहले उनके समर्थकों ने जॉर्जिया के सीनेट इलेक्शन में आम चुनाव से ज्यादा वोट डाले। इस जन-सक्रियता को एक सनकी नेता की ऊलजलूल हरकतों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। निश्चित रूप से अमेरिकी लोकतंत्र का एक गहरा संकट ट्रंप के रूप में जाहिर हुआ है। कुछ महीने पहले अश्वेत असंतोष के विस्फोट में दुनिया ने अमेरिकी समाज की बेचैनी का एक पहलू देखा था। नए साल के पहले हफ्ते में इसी सिक्के का दूसरा पहलू श्वेत प्रतिक्रिया की शक्ल में नजर आया है। लेकिन अमेरिकी समाज की असुरक्षा का हल खोजने के लिए वहां की सत्ता को इन लक्षणों का नहीं, बीमारी का इलाज करना होगा। इतना तय है कि एक दशक के अंदर मंदी और महामारी के दोहरे संकट से गुजरे अमेरिकी लोकतंत्र की मुश्किलों का कोई न कोई तार दुनिया के हर सिस्टम से जुड़ा है। उसके सुलझने में सबकी दिलचस्पी स्वाभाविक है।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Thursday, January 7, 2021

गणतंत्र दिवस की गरिमा (नवभारत टाइम्स)

गौर से देखें तो इस बार के गणतंत्र दिवस समारोह का सबसे बड़ा संकट राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसानों के धरने से जुड़ा है। इस मामले में हालात जल्दी सामान्य नहीं बनाए गए तो कुछ ऐसे अप्रिय प्रसंग देखने को मिल सकते हैं, जो गणतंत्र दिवस की गरिमा के अनुरूप नहीं होंगे।

कोविड-19 से उपजी समस्याओं और दुश्चिंताओं के बीच देश 72वां गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी में है, लेकिन समारोह के मुख्य अतिथि ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने हाल में यह कहते हुए क्षमा मांग ली कि अपने देश में महामारी की गंभीर स्थिति को देखते हुए यह भूमिका वे नहीं निभा पाएंगे। ऐसे में शायद यह पहली बार ही होगा कि गणतंत्र दिवस समारोह में कोई विदेशी शासनाध्यक्ष अतिथि के रूप में मौजूद न हो। वैसे भी इस समारोह की पारंपरिक भव्यता इस बार देखने को नहीं मिलेगी। समारोह स्थल पर 25 हजार से ज्यादा दर्शकों की इजाजत न देने का फैसला पहले ही किया जा चुका है। परेड में शामिल फौजी दस्तों और झांकियों की संख्या कम होगी और परेड लाल किले तक जाने के बजाय नैशनल स्टेडियम पर, यानी लगभग आधी दूरी में ही समाप्त कर दी जाएगी।

मगर गणतंत्र दिवस समारोह की अहमियत वहां मौजूद दर्शकों और परेड की भव्यता से ज्यादा उस भाव से जुड़ी है जो हर देशवासी के मन में इस समारोह के प्रति बना रहता है। लिहाजा गौर से देखें तो इस बार के गणतंत्र दिवस समारोह का सबसे बड़ा संकट राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसानों के धरने से जुड़ा है। इस मामले में हालात जल्दी सामान्य नहीं बनाए गए तो कुछ ऐसे अप्रिय प्रसंग देखने को मिल सकते हैं, जो गणतंत्र दिवस की गरिमा के अनुरूप नहीं होंगे। विवादित कृषि कानूनों की वापसी की मांग को लेकर किसान पिछले डेढ़ महीने से राजधानी के आसपास खुले में मौसमों की मार झेल रहे हैं। सात दौर की बातचीत नाकाम होने के बाद उन्होंने बयान जारी किया है कि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में प्रवेश करके वे अपनी ट्रैक्टर परेड निकालेंगे। बेशक सरकार ताकत के बल पर उन्हें राजधानी के संवेदनशील इलाकों में घुसने से रोक सकती है, लेकिन राष्ट्रीय गौरव के इस अवसर पर बल प्रयोग की कोई भी घटना देश का सिर नीचा करेगी। वैसे भी इस आंदोलन को किसी हठधर्मिता के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।


यह बात जगजाहिर है कि तीनों कृषि कानूनों की ड्राफ्टिंग से लेकर उन्हें संसद में पारित कराने तक किसानों और जन प्रतिनिधियों से जैसा संवाद होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। कानून आने के तुरंत बाद पंजाब में किसान इसके खिलाफ आंदोलन पर उतर आए लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से उन्हें भरोसे में लेने की कोई पहल नहीं की जा सकी। आखिर एक दिन वे रेल पटरियों से उठे और हरियाणा तथा केंद्र सरकार के बैरिकेडों को एक तरफ करते हुए दिल्ली बॉर्डर तक आ पहुंचे। तब से अब तक उनका दायरा देशव्यापी हुआ है। सरकार ने उनसे कई दौरों की बातचीत की है लेकिन संवाद का स्तर सुधरने के बजाय बिगड़ा ही है। अविश्वास की एक गहरी खाई सरकार और किसानों के बीच खुद गई है। इसे जल्दी पाटा जाना चाहिए, ताकि दुनिया में हमारी छवि एक अशांत समाज जैसी न बने।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Tuesday, January 5, 2021

साख का सवाल ( नवभारत टाइम्स)

देश में कोरोना से बचाने वाले टीकों- कोविशील्ड और कोवैक्सीन के इमर्जेंसी इस्तेमाल की इजाजत देशवासियों के लिए जितनी बड़ी राहत की खबर बन सकती थी, उतनी नहीं बन पाई। वजह यह रही कि खबर आने के ठीक बाद विपक्ष के कई नेताओं ने इस मंजूरी पर सवाल खड़े कर दिए। उनका कहना था कि मंजूरी देने में जो हड़बड़ी दिखाई गई है, वह बेहद खतरनाक है। सरकार और सत्तारूढ़ दल की तरफ से इन आरोपों का जवाब चिर-परिचित अंदाज में विपक्षी नेताओं पर हमले की शक्ल में दिया गया। निश्चित रूप से विपक्ष के कुछ नेता अवसर की अपेक्षा के अनुरूप गंभीरता नहीं दिखा सके।

इन वैक्सीनों को बीजेपी का टीका करार देना और इन्हें नपुंसकता से जोड़ना न केवल गलत है बल्कि कठिन चुनौती के इस दौर में देशवासियों के बीच अविश्वास और संदेह का माहौल पैदा करता है। बावजूद इसके, विपक्षी नेताओं के उठाए सवालों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता। यह सच है कि किसी लोकतांत्रिक देश में राजनेताओं के बयानों की पहुंच ज्यादा होती है और इस वजह से इन बयानों की गूंज ज्यादा बड़ी हो गई है लेकिन सवाल सिर्फ राजनीतिक हलकों में नहीं, विशेषज्ञों और जानकारों की ओर से भी उठाए जा रहे हैं। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत बायोटेक द्वारा बनाए गए टीके कोवैक्सीन का फेज-3 ट्रायल अभी पूरा नहीं हुआ है।

ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि डीसीजीआई (ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया) ने आखिर किस आधार पर इस वैक्सीन को सुरक्षित मान लिया। मंजूरी की घोषणा के बाद स्वाभाविक ही अपेक्षा की जा रही थी कि इससे जुड़े सभी सवालों के जवाब दिए जाएंगे, लेकिन लिखित वक्तव्य पढ़ने के बाद बिना कोई सवाल लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म कर दी गई। ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क ने ठीक ही नियामक से अनुरोध किया है कि जिन आंकड़ों के आधार पर मंजूरी देने का फैसला लिया गया है, उन्हें सार्वजनिक किया जाए ताकि उनका स्वतंत्र परीक्षण किया जा सके। देश में टीकों को लेकर हिचक पैदा करने वाली कई घटनाएं हो चुकी हैं जिन पर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण अबतक नहीं आया है।

एक बहुचर्चित मामले में हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री टीका लेने के बाद कोरोना संक्रमित हो गए। यह कहना काफी नहीं कि उन्होंने एक ही डोज लिया था, इसलिए संक्रमित हो गए। इसका जांच आधारित स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए कि वह संक्रमण किसी रूप में टीके का ही दुष्परिणाम तो नहीं था। अमेरिका और ब्रिटेन में टीके के नतीजों को लेकर सवाल उठे तो ठहरकर उनके संतोषजनक जवाब दिए गए। कोई कारण नहीं कि भारतीय नियामक संस्थाएं लोगों को आश्वस्त करने की अपनी जवाबदेही से बचने का प्रयास करें। सवाल सिर्फ इस टीके का नहीं, देश के पूरे फार्मास्यूटिकल सेक्टर की साख का है।

सौजन्य -  नवभारत टाइम्स।

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विज्ञान सबके लिए, विज्ञान-प्रौद्योगिकी मंत्रालय की पहल ( नवभारत टाइम्स)

नई विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति के प्रारूप के मुताबिक सरकार का इरादा यह है कि दुनिया की बेहतरीन मानी जाने वाली तीन-चार हजार विज्ञान पत्रिकाओं का एकमुश्त सब्सक्रिप्शन ले ले और देशवासियों को उन्हें मुफ्त उपलब्ध कराए।


नए साल की शुरुआत में ही केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने खुली विज्ञान नीति के तहत वैज्ञानिक शोधों से जुड़ी तमाम जानकारियां और आंकड़े सबको सुलभ कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना बताया जा रहा है कि देश-विदेश में विज्ञान और तकनीक को लेकर जो भी गतिविधियां चल रही हैं और उनसे जो निष्कर्ष निकल कर सामने आ रहे हैं वे कुछ लोगों तक सीमित न रह जाएं, अपनी इच्छा और पसंद के आधार पर हर कोई उन तक पहुंच बना सके। अभी दिक्कत यह है कि दुनिया की सबसे अच्छी और प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिकाएं काफी महंगी हैं। सामान्य व्यक्तियों की बात तो दूर रही, बड़े संस्थानों को भी अक्सर इन पत्रिकाओं का सब्सक्रिप्शन लेने से पहले सोचना पड़ता है।

नई विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति के प्रारूप के मुताबिक सरकार का इरादा यह है कि दुनिया की बेहतरीन मानी जाने वाली तीन-चार हजार विज्ञान पत्रिकाओं का एकमुश्त सब्सक्रिप्शन ले ले और देशवासियों को उन्हें मुफ्त उपलब्ध कराए। इसके लिए सालाना दो-तीन हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे, लेकिन इसके फायदों को देखा जाए तो यह रकम कुछ भी नहीं है। यह खुली विज्ञान नीति देश के अंदर होने वाली रिसर्चों पर भी लागू होगी। प्रस्थापना यह है कि सरकारी फंडिंग से होने वाली तमाम रिसर्चों का भार वास्तव में देश के टैक्सपेयर्स ही उठाते हैं। इसलिए इनसे निकलने वाले नतीजों की जानकारी पाने के लिए उन्हें फिर से पैसा भरने के लिए कहना उचित नहीं। लिहाजा सरकारी सहायता से होने वाले सभी शोधों से जुड़ी रिपोर्टें लोगों को मुफ्त मुहैया कराई जाएंगी।

इस नई नीति का प्रारूप एक जनवरी को सार्वजनिक करके इस पर लोगों से सुझाव मांगे गए हैं। उम्मीद की जा रही है कि साल के मध्य तक जरूरी संशोधनों के साथ इस नीति को मंजूरी मिल जाएगी। ध्यान देने की बात है कि अब तक किसी भी देश ने इस तरह की कोई पहल नहीं की है। भारतीय समाज इस दिशा में पहले कदम बढ़ाकर अन्य विकासशील समाजों को भी इसके लिए प्रेरित कर सकता है। इस कदम से न केवल समाज के लोकतांत्रिक मिजाज को मजबूती मिलेगी बल्कि वैज्ञानिक सोच को लोगों के बीच प्रतिष्ठित करने का काम भी होगा। इससे यह समझ बनाने में मदद मिलेगी कि वैज्ञानिक दृष्टि सिर्फ लैब में बैठकर रिसर्च करने के लिए नहीं होती।

हर पल, हर चीज को जिज्ञासा और तर्क से जोड़कर देखना ही वैज्ञानिक विचार पद्धति को अपनाना है। आज के दौर में जब कई पीछे छूट चुकी बहसें नए सिरे से जिंदा हो रही हैं और दफन किए जा चुके अंधविश्वासों के भूत अलग-अलग तबकों में सिर उठाते दिख रहे हैं, तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की इस पहल की अहमियत और बढ़ जाती है। सरकार इस प्रारूप को जितनी जल्दी अपनी नीति का हिस्सा बना सके, उतना ही बेहतर रहेगा।


सौजन्य -  नवभारत टाइम्स।

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नया जज्बा, नई उम्मीद ( नवभारत टाइम्स)

जाहिर है, इस महामारी से तुरत-फुरत छुटकारा नहीं मिलने वाला, लेकिन इसका जो आतंक सबके दिलों में बैठ गया है, उससे मुक्ति मिल जाए तो यह भी कुछ कम बड़ी बात नहीं होगी। खौफ का यह साया हटने के बाद ही स्पष्ट होगा कि जो दूसरी चुनौतियां हमारा इंतजार कर रही हैं वे दरअसल कितनी गंभीर हैं।

साल 2020 जाते-जाते जो समस्याएं 2021 के हाथों में थमाता गया है, उनमें दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण उलझनें सुलझने की ओर जाती दिख रही हैं। पहला है किसान आंदोलन। साल खत्म होने के दो दिन पहले किसान नेतृत्व और सरकार के बीच बातचीत में कुछ सहमतियां हासिल कर ली गईं। उम्मीद है कि आगामी चार जनवरी को होने वाली मुलाकात में दोनों पक्ष ठोस नतीजे पर पहुंचेंगे और करीब डेढ़ महीने से दिल्ली के आसपास सड़कों पर बैठे किसान संतुष्ट होकर अपने खेतों की ओर लौट जाएंगे। दूसरी समस्या है कोरोना महामारी, जिसमें प्रतिदिन होने वाले नए संक्रमणों की संख्या साल के खत्म होते-होते काफी कम हो गई थी। इसके अलावा वैक्सीन बन जाने की खबरों ने भी लोगों में उम्मीद भरी है। लेकिन ये उम्मीदें पूरी करने के लिए नए साल को कुछ वक्त देना होगा। अभी तो टीके के असर और इसके साइड इफेक्ट्स वगैरह को लेकर भी स्थिति पूरी तरह साफ नहीं हुई है। वायरस का रूपांतरण एक अलग ही मसला है।

जाहिर है, इस महामारी से तुरत-फुरत छुटकारा नहीं मिलने वाला, लेकिन इसका जो आतंक सबके दिलों में बैठ गया है, उससे मुक्ति मिल जाए तो यह भी कुछ कम बड़ी बात नहीं होगी। खौफ का यह साया हटने के बाद ही स्पष्ट होगा कि जो दूसरी चुनौतियां हमारा इंतजार कर रही हैं वे दरअसल कितनी गंभीर हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग गांव चले जाने के कारण या फैक्ट्रियां-कोराबार बंद होने के कारण अभी खाली बैठे हैं, उनमें से कितने सचमुच बेरोजगार हो चुके हैं, यह तब पता चलेगा जब उनके कार्यस्थलों में दोबारा काम शुरू हो जाएगा और उनमें जितनों को खपना है वे खप जाएंगे। बाकी बचे लोगों के लिए कामकाज का इंतजाम करने के बारे में तभी सोचा जा सकेगा। यह नए साल की सबसे बड़ी चुनौती होगी क्योंकि लोगों का काम-धंधा शुरू होने से ही अर्थव्यवस्था में मांग पैदा होगी, जिससे विकास की बंद पड़ी गाड़ी को कुछ गति मिल पाएगी। साल 2020 अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद के शांतिपूर्ण हल के लिए भी याद किया जाएगा।

इस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो 2019 के आखिर में आ गया था, लेकिन उस फैसले के मुताबिक मंदिर और मस्जिद के निर्माण की प्रक्रिया 2020 में ही आगे बढ़ी। बहरहाल, मंदिर के लिए झंडा लेकर चंदा वसूली करने और उस क्रम में अशांति भड़कने की जो खबरें मध्य प्रदेश से पिछले दिनों आईं, वे परेशान करने वाली हैं। उनसे यह आशंका पनपती है कि क्या यह विवाद समाज में अशांति पैदा करने का जरिया आगे भी बना रहेगा? बेहतर होगा कि इस लंबे विवाद की सुखद परिणति के बाद इसे नए-नए बवाल काटने का सबब न बनाया जाए। बहरहाल, चिंता और सोच-विचार के और भी कई मुद्दे हैं, लेकिन नए साल के लिए सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि वह 2020 से मिली विरासत में ही उलझा रह जाता है या नई उपलब्धियों के बल पर अपनी स्वतंत्र पहचान कायम करता है।

सौजन्य -  नवभारत टाइम्स।

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UN: बड़ी पहल का मौका ( नवभारत टाइम्स)

भारत को इस बार 193 सदस्यीय महासभा में 184 वोट मिले थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत की सुरक्षा परिषद सदस्यता से दुनिया की कितनी उम्मीदें जुड़ी हैं। यह दौर है भी ऐसा जिसमें कोरोना महामारी और अर्थव्यवस्था की तबाही ने पूरी दुनिया को बेहाल कर रखा है।


साल 2021 की शुरुआत इस मायने में भी अहम है कि इसी 1 जनवरी से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के रूप में भारत का दो साल का कार्यकाल शुरू हो गया है। हालांकि यह इस तरह का कोई पहला मौका नहीं है। भारत इससे पहले भी सात बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुना जा चुका है। आजादी के ठीक बाद पचास के दशक से ही इसकी शुरुआत हो गई थी। पहली बार 1950-51 में दो वर्षीय कार्यकाल पूरा करने के बाद से प्राय: हर दशक में भारत को सुरक्षा परिषद की सदस्यता मिलती रही है। सत्तर के दशक में तो दो बार (72-73 और फिर 77-78) यह मौका आया। जाहिर है, सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता अपने आप में कोई निर्णायक बात नहीं है।

खास बात उन परिस्थितियों में है जिनमें भारत को इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संस्था के जरिये अपनी भूमिका निभाने का यह मौका मिल रहा है। ध्यान रहे, सुरक्षा परिषद की सदस्यता में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का भी ध्यान रखा जाता है, लेकिन उसके लिए बाकायदा चुनाव होता है और किसी भी देश के चुने जाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में दो तिहाई बहुमत जरूरी होता है। भारत को इस बार 193 सदस्यीय महासभा में 184 वोट मिले थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत की सुरक्षा परिषद सदस्यता से दुनिया की कितनी उम्मीदें जुड़ी हैं। यह दौर है भी ऐसा जिसमें कोरोना महामारी और अर्थव्यवस्था की तबाही ने पूरी दुनिया को बेहाल कर रखा है। इसके अलावा आतंकवाद जैसी पुरानी समस्या तो संयुक्त राष्ट्र का सिरदर्द बनी ही हुई है, हाल के दिनों में बढ़ती राष्ट्रवादी आक्रामकता भी अंतरराष्ट्रीयता की भावना के लिए खासी नुकसानदेह साबित हो रही है। अमेरिका समेत विभिन्न देशों के संकीर्ण रवैये से संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के लिए गुंजाइश लगातार कम हुई है। ऐसे में एक परिपक्व लोकतंत्र के नाते भारत सुरक्षा परिषद में अपनी सकारात्मक भूमिका के जरिए बहुपक्षीयता को बढ़ावा देते हुए संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता नए सिरे से स्थापित करने में मददगार हो सकता है।


भारत सुरक्षा परिषद का ऐसा एकमात्र सदस्य होगा जो इस समय खुद दो-दो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर फौजों के जमावड़े से घिरा है। यह जहां उसकी स्थिति की जटिलता को बढ़ाता है, वहीं विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विवादों को शांति और सामंजस्यपूर्ण बातचीत से सुलझाने की उसकी कोशिशों को ज्यादा जेनुइन भी बनाता है। ध्यान रहे, भारत इधर काफी समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का विस्तार करने की मांग के साथ उसके लिए अपनी दावेदारी जताता रहा है। कई अन्य देश उसका समर्थन भी करते रहे हैं। दो वर्षों का यह कार्यकाल इस लिहाज से अहम है कि इस दौरान अगर भारत सुरक्षा परिषद के जरिये प्रमुख प्रश्नों पर सार्थक पहलकदमी ले सका तो न केवल दुनिया को इस कठिन दौर से निकलने में आसानी होगी, बल्कि स्थायी सदस्यता का भारतीय दावा भी और पुख्ता होगा।


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विपक्ष बनकर दिखाएं, व्यर्थ है यूपीए के नेता पर बहस ( नवभारत टाइम्स)

 दिक्कत यह है कि राष्ट्रीय राजनीति को एनडीए और यूपीए के दो परस्पर विरोधी खेमों के रूप में समझने का दौर पीछे छूट चुका है। एसपी, बीएसपी, तृणमूल, बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआरसी जैसी बड़ी ताकतें दोनों गठबंधनों के बाहर हैं, और आगे भी इनमें जाने का उनमें कोई रुझान नहीं है।


लंबे अर्से बाद विपक्षी खेमे में एकजुटता को लेकर चर्चा सुनाई पड़ी है। बात अब तक अनौपचारिक थी, पर महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही शिवसेना ने यह कहकर इसे औपचारिक रूप दे दिया कि शरद पवार यूपीए चेयरपर्सन पद के ज्यादा काबिल हैं। अभी इस पद पर सोनिया गांधी हैं, जिनका स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा। कहा जा रहा है कि पवार यूपीए की कमान संभाल लें तो एनडीए से अलग हो चुकी, पर कांग्रेस के साथ असहज महसूस करने वाली अकाली दल जैसी पार्टियां भी यूपीए का हिस्सा बन सकती हैं। इससे सत्तारूढ़ एनडीए के सामने एक मजबूत यूपीए को खड़ा करना आसान होगा।


विपक्षी खेमे की यह सुगबुगाहट पहली नजर में उम्मीद जगाती है, क्योंकि इसकी चिंता चुनावी गठबंधन से ज्यादा दीर्घकालिक विपक्षी एकता जान पड़ती है। दिक्कत यह है कि राष्ट्रीय राजनीति को एनडीए और यूपीए के दो परस्पर विरोधी खेमों के रूप में समझने का दौर पीछे छूट चुका है। एसपी, बीएसपी, तृणमूल, बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआरसी जैसी बड़ी ताकतें दोनों गठबंधनों के बाहर हैं, और आगे भी इनमें जाने का उनमें कोई रुझान नहीं है। एनडीए की बात करें तो वह बीजेपी की ही कोशिशों से लुप्तप्राय हो रहा है। एजीपी, शिवसेना और अकाली दल जैसे इसके पुराने घटक दल इससे अलग हो चुके हैं।


जेडीयू न केवल बिहार में सिकुड़ कर आधा हो गया है, बल्कि अरुणाचल प्रदेश में सात में से छह विधायक बीजेपी द्वारा तोड़ लिए जाने का असर एनडीए से उसके रिश्तों पर कैसा पड़ता है, यह देखा जाना बाकी है। ऐसे में आज के एनडीए को बीजेपी का हल्का सा विस्तार भर मानना होगा। रही बात यूपीए की तो उसके घटकों की हालत और बुरी है। डीएमके के अलावा इनमें एक का भी बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व के खिलाफ कोई कड़ा बयान खोजना मुश्किल है। ध्यान रहे कि एनसीपी नेता शरद पवार को यूपीए चेयरपर्सन बनाकर विपक्षी एकता सुनिश्चित करने की चिंता सबसे ज्यादा शिवसेना की है, जो केवल मुख्यमंत्री पद को मुद्दा बनाकर विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनी है।


हिंदुत्व समेत तमाम बड़े मुद्दों पर उसके विचार बीजेपी जैसे ही हैं। अकाली दल का हाल तो और भी बुरा है, जिसे नए कृषि कानूनों का संसद में समर्थन करने के बाद जनदबाव में सरकार से अलग होना पड़ा। ऐसी पार्टियां मोदी सरकार की आलोचना करती हैं, तो इससे नीतियों का विरोध नहीं जाहिर होता। लोकतंत्र में विपक्ष की अहमियत उसकी भौकाल से नहीं, विकल्प देने की उसकी क्षमता से तय होती है। इसलिए बेहतर होगा कि तमाम नए-पुराने विपक्षी दल पहले जनता की आवाज बनें, और जमीन पर उसका भरोसा जीतने का प्रयास करें। रही बात उन्हें एकजुट रखने वाले ढांचे और नेता की, तो वह नया क्यों नहीं हो सकता? इसके उलट ऊपर से विपक्षी एकता को लेकर उठाई गई बहस से यह खतरा जुड़ा है कि विपक्ष की जो एक क्षीण सी धारा जब-तब सरकार के सामने खड़ी दिख जाती है, वह भी कहीं विलुप्त न हो जाए।

सौजन्य -  नवभारत टाइम्स।

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कमाल के सुपर रिच, संपत्ति में अप्रत्याशित इजाफा ( नवभारत टाइम्स)

कोरोना महामारी और लॉकडाउन ने अन्य देशों की ही तरह भारत की अर्थव्यवस्था का भी बुरा हाल कर रखा है। लेकिन देश के सुपर रिच क्लब पर इसका कोई विपरीत प्रभाव नजर नहीं आता है। पिछले साल दिसंबर की स्थिति देखें तो उस समय देश में डॉलर बिलिनियर्स (जिनके पास कम से कम एक अरब डॉलर की चल संपत्ति है) की संख्या 80 थी जो अभी बढ़ कर 90 हो गई है। यानी त्रासदियों से भरे इस साल में भी सुपर रिच क्लब फलता-फूलता रहा। न केवल इसके सदस्यों की संख्या बढ़ी बल्कि इसकी संपत्ति में भी भरपूर इजाफा हुआ है।


पिछले दिसंबर में इस क्लब के सदस्यों की कुल संपत्ति 364 अरब डॉलर थी जो अब 483 अरब डॉलर (लगभग 35.5 लाख करोड़ रुपये) हो गई है। यानी 33 फीसदी का इजाफा। यहां यह बताना जरूरी है कि यह बढ़त इस अर्थ में सांकेतिक है कि यह शेयर बाजार के चढ़ने के साथ चढ़ी है और इसके नीचे आने पर उतर भी सकती है। वैसे भी समाज के किसी हिस्से में अमीरी आती है और उसकी संपत्ति में बढ़ोतरी होती है तो यह खुद में कोई बुरी बात नहीं है। कुछ लोगों का अमीर होना कई बार अपने पीछे समृद्धि का सिलसिला लेकर आता है। इसलिए अगर समाज के किसी हिस्से में अनुपात से ज्यादा अमीरी आ रही हो और इसके लिए वह गैरकानूनी रास्ते न अपना रहा हो तो इसमें चिंता की कोई बात नहीं। लेकिन अभी की स्थितियां सामान्य नहीं हैं। यह देश और समाज के लिए अभूतपूर्व चुनौतियों का दौर है, जब सामान्य आर्थिक गतिविधियों के भी सहज रूप लेने के लाले पड़े हुए हैं।


देश की जीडीपी इस साल नेगेटिव में रहना तय है। छोटी-बड़ी तमाम कंपनियों में उत्पादन जो ठप हुआ, वह दोबारा अभी नाम को ही शुरू हो पाया है। अर्थव्यवस्था डिमांड की किल्लत से जूझ रही है। ऐसे में देश की संपदा अगर खिंचकर एक कोने में जा रही है तो यह देखना जरूरी हो जाता है कि मांग बढ़ाने में उसकी कोई भूमिका है या नहीं। मतलब यह कि उस पूंजी से कहीं कोई आर्थिक गतिविधि शुरू हो रही है या नहीं, कुछ लोगों को उससे रोजगार मिल सकता है या नहीं। और, यह कोई छोटी-मोटी राशि का मामला नहीं है। मौजूदा डॉलर भाव के मुताबिक मात्र 90 लोगों के इस सुपर रिच क्लब की कुल संपत्ति देश के जीडीपी का करीब 20 फीसदी बैठती है।


जाहिर है, यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे एं-वें मानकर छोड़ दिया जाए। इससे बाजार की राह रुक सकती है, जो बाकी अर्थव्यवस्था की तो बात ही छोड़िए, खुद इस सुपर रिच क्लब की भी मुश्किलें बढ़ा सकती है। सरकार की यह चिंता समझ में आती है कि घोर अंधेरे दौर में भी कुछ चमकदार सितारे जरूर होने चाहिए क्योंकि इससे लोगों में अंधेरों से निकलने की उम्मीद बनी रहती है। लेकिन अर्थव्यवस्था की नैया को इस तूफान के पार ले जाना है तो सुपर अमीरी के भंवर को नजरअंदाज करते जाने की नीति बदलनी होगी।

सौजन्य -  नवभारत टाइम्स।

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Thursday, December 24, 2020

जम्मू-कश्मीर में चुनाव, गुपकार गठबंधन सबसे आगे (नवभारत टाइम्स)

वैसे तो जम्मू-कश्मीर में होने वाला कोई भी चुनाव एक खास अहमियत हासिल कर लेता है, लेकिन हाल के जिला विकास परिषद (DDC) चुनावों पर विशेष रूप से सबकी नजरें लगी थीं। पिछले साल संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत हासिल विशेष दर्जा समाप्त किए जाने के बाद यह पहला मौका था जब इस राज्य के लोग अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए वोट देने निकले थे। चुनाव नतीजों के आंकड़े देखें तो वे कुछ खास चौंकाने वाले नहीं दिखते।

जम्मू संभाग में बीजेपी आगे रही और कश्मीर घाटी में गुपकार गठबंधन को बढ़त मिली। घाटी में तीन सीटें लेकर बीजेपी यह दावा करने की हालत में आ गई कि आखिर घाटी में भी वह कमल खिलाने में कामयाब रही। दूसरी ओर जम्मू क्षेत्र में 35 सीटें लेने वाला गुपकार गठबंधन भी यह कहने में नहीं हिचक रहा कि उसे घाटी तक सिमटा देने की साजिश नाकाम हो गई। बहरहाल, चुनाव नतीजों से जुड़े इन दावों और जवाबी दावों को सामान्य सियासी बोल-वचन मानकर नजरअंदाज कर दिया जाए तो सच यही है कि जम्मू-कश्मीर में सभी प्रमुख दलों ने कमोबेश अपनी-अपनी जमीन बचाए रखी। लेकिन यह चुनावी लड़ाई सिर्फ राजनीतिक दलों की पारंपरिक जमीन को लेकर होने वाली खींचतान तक सीमित नहीं थी। इसके पीछे के बड़े लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए विचार किया जाए तो जिन्हें पिछले एक साल से अलगाववादी, राष्ट्रविरोधी वगैरह करार दिया जा रहा था, हर सार्वजनिक मंच से जिन्हें ‘गुपकार गैंग’ कहकर संबोधित किया जा रहा था, उनके कथित चंगुल से राज्य को मुक्त करने में मोदी सरकार को कुछ खास कामयाबी नहीं मिली।


बेशक, ये चुनाव शांतिपूर्ण रहे और इनका मतदान प्रतिशत भी कई चुनावों से बेहतर रहा। इसका यह मतलब जरूर है कि अलगाववादी और आतंकवादी तत्वों की लाख कोशिशों के बावजूद जम्मू-कश्मीर के लोगों का शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक उपायों में यकीन बना हुआ है। लेकिन क्या इसका यह अर्थ भी निकाला जा सकता है कि अनुच्छेद 370 के तहत हासिल विशेष दर्जा छीन लिए जाने से लोग खुश हैं? इस दूसरे निष्कर्ष तक पहुंचना जल्दबाजी ही समझा जाएगा। कारण यह है कि विशेष दर्जा खत्म किए जाने के बाद की यह पूरी अवधि जम्मू-कश्मीर में हर कीमत पर शांति बनाए रखने के प्रयासों को ही समर्पित रही है। केंद्र सरकार संसद में अपनी पहलकदमी के चाहे जो भी फायदे बताती रही हो, उन्हें जमीन पर उतारने लायक माहौल वहां नहीं बन सका। दूसरी बात यह कि जिन दलों और नेताओं ने एक स्वर में इस फैसले का विरोध किया था, वे आज भी अपनी राय पर कायम हैं और जनता द्वारा उन्हें नकारा भी नहीं गया है। ऐसे में इन चुनावों से निकला एक महत्वपूर्ण सबक यह भी है कि देश के किसी भी हिस्से में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़े राजनीतिक नेतृत्व के लिए एक न्यूनतम सम्मान जरूर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। भारत जैसी वयस्क लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी इस जिम्मेदारी से कतरा नहीं सकती। इस सीमावर्ती राज्य में आगे का रास्ता केंद्र सरकार को ज्यादा एहतियात से तय करना चाहिए।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Tuesday, December 22, 2020

नेपाल में राजनीतिक अस्थिरताः बीच रास्ते संसद भंग ( नवभारत टाइम्स)

अपनी पार्टी के भीतर से तीव्र विरोध का सामना कर रहे नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने रविवार को अचानक संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा को बर्खास्त कर दिया। अपने पांच वर्षीय मौजूदा कार्यकाल का तीन साल भी उन्होंने अभी पूरा नहीं किया था, लेकिन पिछले कुछ समय से पार्टी के अंदर उनके इस्तीफे की मांग तेज होती जा रही थी जिसकी वे लगातार अनदेखी कर रहे थे।

आखिर सत्तारूढ़ नेपाली कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीएन) के 91 सांसदों ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया, जिसके बाद सरकार ने प्रतिनिधि सभा भंग करके अगले साल चुनाव कराने की घोषणा कर दी। इस फैसले को हालांकि सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, लेकिन वहां से फिलहाल कोई आदेश नहीं आया है। लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहे नेपाल के लिए किसी प्रधानमंत्री का कार्यकाल पूरा न कर पाना कोई नई बात नहीं है। 1990 से 2008 तक चले संवैधानिक राजतंत्र के दौर में भी हाल यही था और 2008 में राजशाही के खात्मे के बाद भी नेपाल में किसी प्रधानमंत्री ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया। हर साल दो साल पर प्रधानमंत्री बदल देना वहां आम बात समझी जाती रही है।

इस लिहाज से ओली सरकार का गिरना कोई बड़ी बात नहीं। बड़ी बात यह है कि उनकी पार्टी को प्रतिनिधि सभा में जबर्दस्त बहुमत हासिल था और सभा को भंग करने की सिफारिश किए जाते वक्त भी इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया था। संसद में बहुमत को लेकर कोई परेशानी नहीं थी तो प्रतिनिधि सभा की बैठक में ओली सरकार की जगह बड़ी आसानी से सीपीएन के ही किसी अन्य नेता की अगुआई में दूसरी सरकार बनाई जा सकती थी। इसके बावजूद संसद का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार ने उसे भंग कर देश पर समय से पहले चुनाव लादने का फैसला कर लिया, जो संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत है। ऐसा कदम उठाने वाले शीर्ष राजनेता को किसी भी लोकतंत्र में शायद ही गंभीरता से लिया जा सके।

दरअसल केपी शर्मा ओली के इस फैसले से भारत के इस पुराने आरोप की पुष्टि हुई है कि घरेलू राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए वे राष्ट्रवादी भावनाओं का उन्माद पैदा करने की कोशिश करते रहे हैं।

इस क्रम में उन्होंने न केवल भारत पर ऊलजलूल आरोप लगाए बल्कि नए-नए विवाद भी पैदा किए। इससे दोनों देशों के रिश्ते तो प्रभावित हो ही रहे हैं, नेपाल के राष्ट्रीय हितों का भी नुकसान हो रहा है। बहरहाल, आगे सुप्रीम कोर्ट से कोई अप्रत्याशित फैसला नहीं आता तो लगभग तय है कि आगामी चुनावों तक सरकार की कमान ओली के हाथों में ही रहेगी। कहना मुश्किल है कि इस दौरान चुनावी फायदे के लिहाज से वह कब किस तरह का विवाद खड़ा कर देंगे। जाहिर है, नेपाल के लोगों के लिए ही नहीं, भारत सरकार के लिए भी यह अतिरिक्त सतर्कता बरतने का समय है।


सौजन्य -  नवभारत टाइम्स ।

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Monday, December 21, 2020

इंजीनियरिंग की भाषा, हिंदी का ओवरडोज ठीक नहीं ( नवभारत टाइम्स)

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का हाल में लिया गया एक फैसला आजकल देश के प्रतिष्ठित तकनीकी शिक्षा संस्थानों की परेशानी का सबब बना हुआ है। फैसले के मुताबिक आईआईटी और एनआईटी संस्थानों में आगामी सत्र से ही स्टूडेंट्स को हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने का मौका दिया जाना है। फैसले का मकसद यह बताया जा रहा है कि स्टूडेंट्स को उस भाषा में उच्च तकनीकी शिक्षा हासिल करने का अवसर मिले, जिसमें उन्होंने स्कूली पढ़ाई की है। फैसला राष्ट्रीय शिक्षा नीति की प्रमुख सिफारिशों के अनुरूप है और माना जा रहा है कि इससे गैर अंग्रेजी भाषी स्टूडेंट्स को खास तौर पर फायदा होगा। मगर फैसले से जुड़ी व्यावहारिक दिक्कतें इसका अमल करीब-करीब नामुमकिन बना रही हैं।

देश के तमाम इंजीनियरिंग कॉलेजों में तकनीकी शिक्षा अंग्रेजी में ही दी जाती है। ऐसे में अचानक हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में इंजीनियरिंग की शिक्षा देने वाले टीचर्स कहां से आएंगे? आईआईटी संस्थानों के लिए अच्छे टीचर्स पाना पहले से ही एक चुनौती बनी हुई है। वे इंटरनैशनल फैकल्टी पाने की जद्दोजहद में लगे हैं ताकि अपनी वर्ल्ड रैंकिंग सुधार सकें। इस बीच हिंदी और अन्य भाषाओं के शिक्षक ढूंढने की कवायद उनका फोकस बिगाड़ सकती है। फिर कोर्स बुक्स भी अंग्रेजी में ही हैं।


यही नहीं, इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स को बहुत से रेफरेंस मटीरियल भी देखने होते हैं, जो अंग्रेजी में होते हैं। इन सबका ट्रांसलेशन कैसे उपलब्ध कराया जा सकेगा? सवाल यह भी है कि जैसे-तैसे नाम मात्र के लिए ये औपचारिकताएं कर भी ली गईं, तो इन स्टूडेंट्स का भविष्य क्या होगा? कौन सी मल्टीनैशनल कंपनी इन्हें नौकरी देगी? और, इंजीनियरिंग की पढ़ाई के नाम पर इस तरह का ढकोसला करने से आखिर क्या हासिल होने वाला है? राष्ट्रवादी भावनाओं के सहारे देसी भाषा में तकनीकी शिक्षा देने की वकालत करने वाले लोग अक्सर जर्मनी और चीन जैसे देशों का उदाहरण देते हैं। लेकिन सचाई यह है कि उन देशों में भी अब अंग्रेजी में तकनीकी शिक्षा पर जोर बढ़ रहा है। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया है और वे इस गलती को सुधारने में लगे हैं। ऐसे में हम उलटे बांस बरेली को चलें, इसका कोई तुक नहीं है।


यह समझना होगा कि विज्ञान और तकनीक देश के दायरे में बंधकर रहने वाली चीज नहीं है। हमारे सुशिक्षित, प्रशिक्षित इंजीनियरों को दुनिया में हो रही अकादमिक हलचलों से न केवल परिचित होना चाहिए, बल्कि उसमें उनका दखल भी होना चाहिए। यह काम सिर्फ अनुवाद के सहारे नहीं हो सकता। अंग्रेजी ही वह पुल है जो हमारे इंजीनियरों, डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और अन्य क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स को उनकी ग्लोबल बिरादरी से जोड़ता है। जानबूझकर हो या अनजाने में, इस पुल को ध्वस्त करने की कोई भी कोशिश घातक है। बेहतर होगा शिक्षा मंत्रालय समय रहते अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करते हुए इसे वापस ले ले।


सौजन्य -  नवभारत टाइम्स ।

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