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Monday, November 30, 2020

आस बंधाते आंकड़े, कम हुई जीडीपी की गिरावट (नवभारत टाइम्स)

Satyakam Abhishek 

ध्यान रहे, वित्त वर्ष की इस दूसरी तिमाही का एक बड़ा हिस्सा लॉकडाउन के प्रभाव में गुजरा था। तकनीकी तौर पर वह लॉकडाउन के खुलने का, यानी अनलॉक का दौर था, लेकिन आर्थिक गतिविधियां धीरे-धीरे ही शुरू हो पाईं। इस लिहाज से देखा जाए तो इसे काफी तेज रिकवरी कहा जाएगा।

 

मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के भी जीडीपी आंकड़े नेगेटिव में होने और इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था के मंदी से गुजरने की औपचारिक पुष्टि हो जाने के बावजूद सरकार और अर्थशास्त्रिों की प्रतिक्रिया चिंता के बजाय राहत की है। इसका कारण यही है कि जुलाई से सितंबर की तिमाही में हालात जितने बुरे होने संभावित थे, उससे कम बुरे निकले। अप्रैल से जून वाली तिमाही में 23.9 फीसदी की ऐतिहासिक गिरावट देखने के बाद इस बार के लिए विशेषज्ञ जीडीपी में 7.9 से लेकर 8.8 फीसदी तक की गिरावट के अनुमान लगा रहे थे। खुद रिजर्व बैंक का मानना था कि गिरावट 8.6 फीसदी रहेगी। ऐसे में जब शुक्रवार को जारी आंकड़ों से पता चला कि वास्तविक गिरावट महज 7.5 फीसदी दर्ज हुई है तो इस पर थोड़ी खुशी स्वाभाविक है।

 

ध्यान रहे, वित्त वर्ष की इस दूसरी तिमाही का एक बड़ा हिस्सा लॉकडाउन के प्रभाव में गुजरा था। तकनीकी तौर पर वह लॉकडाउन के खुलने का, यानी अनलॉक का दौर था, लेकिन आर्थिक गतिविधियां धीरे-धीरे ही शुरू हो पाईं। इस लिहाज से देखा जाए तो इसे काफी तेज रिकवरी कहा जाएगा। हां, इसके आधार पर अगर कोई अगली तिमाहियों में विकास दर के चौकड़ी भरने की उम्मीद पाल ले तो उसकी व्यावहारिकता संदिग्ध होगी। ब्यौरे में जाएं तो इस तिमाही में अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा मजबूती कृषि, वानिकी और मत्स्य उत्पादन के क्षेत्रों से ही मिली है। प्राइमरी सेक्टर में रखे जाने वाले इन उद्यमों ने पहली तिमाही की ही तरह इस बार भी 3.4 फीसदी बढ़ोतरी की स्थिर दर बरकरार रखी।


मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 0.6 फीसदी की बढ़ोतरी को उत्साहवर्धक कहा जाएगा, क्योंकि पहली तिमाही में इस क्षेत्र में 39.3 फीसदी की भीषण गिरावट आई थी। यह इस बात का संकेत है कि लॉकडाउन के लंबे गैप के बाद फैक्ट्रियों में थोड़ा-बहुत उत्पादन शुरू हुआ और उनसे जुड़े लाखों लोगों की रोजी-रोटी का इंतजाम हुआ। इनके अलावा लगभग सारे ही क्षेत्रों में पहली तिमाही के मुकाबले कम, लेकिन गिरावट ही दर्ज हुई। ऐसे में रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने बिल्कुल सही कहा कि इस मोड़ पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जो मांग पैदा हुई दिख रही है, वह टिकी रहेगी या नहीं।


इस बिंदु पर दो-तीन ऐसे कारक मिलते हैं जो भविष्य को लेकर ज्यादा खुश होने की गुंजाइश नहीं छोड़ते। एक तो यह कि पिछली तिमाही देश के त्योहारी सीजन से ठीक पहले की थी। उस दौरान विभिन्न उपभोक्ता सामानों का जो उत्पादन हुआ, उसके पीछे यह उम्मीद थी कि त्योहारों के दौरान वे बाजार में खप जाएंगे। यह कितना हो पाया, इसका हिसाब बाद में होगा लेकिन एक बात तय है कि तीसरी-चौथी तिमाहियों में फेस्टिव सीजन जितने बड़े पैमाने के उत्पादन का जोखिम कोई उद्यमी नहीं उठाता। सरकार ने दूसरी तिमाही में जितनी उदारता से उद्यमियों की मदद की, उसमें भी समय के साथ कटौती होना तय है। तीसरा और सबसे बड़ा कारक है कोरोना का असर। बीमारी की जिस नई लहर का खतरा देश के कई हिस्सों में दिख रहा है और विदेशों में जिसका असर भारतीय निर्यात को उठने नहीं दे रहा है, वह टीके की चर्चा पर भारी पड़ सकती है। बहरहाल, इन आशंकाओं के बीच अगर हमने अपनी फैक्ट्रियों पर दोबारा ताला पड़ने की नौबत न आने दी और नौकरी छूटने का जो डर लोगों के मन में बैठ गया है, उसे घटाने में कामयाब रहे तो धीरे-धीरे बेहतरी की ओर बढ़ा जा सकता है।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स। 

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Saturday, November 28, 2020

किसानों की सुने सरकार (नवभारत टाइम्स)

Naveen Kumar Pandey 

सरकार कहती है कि खरीद-बिक्री की मौजूदा व्यवस्था में किसी तरह के बदलाव की बात नया कानून नहीं करता। लेकिन कंपनियों की खरीदारी से अपना धंधा कम रह जाने के डर से कई जगहों पर आढ़तियों ने अपने हाथ खींचने शुरू कर दिए।

 

केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि संबंधी तीन महत्वपूर्ण कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों के दिल्ली कूच ने राजधानी के आसपास विकट स्थिति पैदा कर दी है। इस मामले में सरकार के रवैये पर शुरू से सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। पहले दिन से ही यह बात साफ थी कि किसानों में इन कानूनों को लेकर जबर्दस्त आशंका और विरोध है। ऐसे में कानून लाने से पहले व्यापक संवाद के जरिए उनकी आशंकाएं दूर करने की कोशिश की जानी चाहिए थी।


पता नहीं किस हड़बड़ी में सरकार ने कोरोना और लॉकडाउन की दोहरी चुनौतियों के बीच सारे विरोध की अनदेखी करते हुए ये कानून बनाकर लागू भी कर दिए। इससे इस धारणा को बल मिला कि कोरोना से बने हालात का फायदा उठाकर सरकार इन्हें किसानों पर लाद देना चाहती है। इस समझ का ही नतीजा है कि दिल्ली की ओर बढ़ते किसानों पर इस अपील का कोई असर नहीं हुआ कि कोरोना के कारण लागू धारा 144 के बीच राजधानी पहुंचने की जिद उन्हें नहीं करनी चाहिए। दूसरी बात यह कि सरकार कानून के शब्दों की अपनी व्याख्या के आधार पर ही सारी आशंकाओं को झुठलाने का प्रयास करती रही। इस मामले में शब्द और उसके व्यावहारिक अर्थ के बीच दिख रहे अंतर पर ध्यान देना उसे जरूरी नहीं लगा।


सरकार कहती है कि खरीद-बिक्री की मौजूदा व्यवस्था में किसी तरह के बदलाव की बात नया कानून नहीं करता। लेकिन कंपनियों की खरीदारी से अपना धंधा कम रह जाने के डर से कई जगहों पर आढ़तियों ने अपने हाथ खींचने शुरू कर दिए। इसके चलते कई सरकारी खरीद केंद्र ठप हो गए और कुछ जगहों पर कागज-पत्तर को लेकर सख्ती बढ़ जाने के चलते किसानों को अपना धान न्यूनतम समर्थन मूल्य की आधी कीमतों पर निजी व्यापारियों के हाथों बेचना पड़ा। जिस कानून का मकसद बाजार में कॉम्पिटिशन बढ़ाकर किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने वाले हालात पैदा करना बताया गया था, वह हकीकत में किसानों को बड़े व्यापारियों के हाथ का खिलौना बना रहा है। घनघोर जाड़े-गर्मी में भी अपने खेत में ही


मरता-खपता रहने वाला भारत का किसान राशन-पानी बांधकर देश की राजधानी में ही डेरा डालने की मनोदशा में पहुंच जाए, यह कोई मामूली बात नहीं है। ऐसे में किसानों को आंसू गैस के गोलों और बदबूदार ठंडे पानी की बौछारों से रोकने की कोशिश बचकानी और बेहद खतरनाक है। जरूरी है कि सरकार हर संभव स्तर पर किसान नेताओं से बातचीत शुरू करे, कम से कम अपने इरादे को लेकर उनका भरोसा हासिल करे और कृषि विशेषज्ञों के जरिये तीनों कानूनों के जमीनी असर का अध्ययन कराए। इस अध्ययन की अनुशंसाएं अगर किसानों को अपनी भलाई में जाती दिखें तो संसद के बजट सत्र में इसकी रिपोर्ट पेश करके आगे का रास्ता निकाला जा सकता है।

सौजन्य -नवभारत टाइम्स ।

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Friday, November 27, 2020

बैंकिंग की नई दिशा ( नवभारत टाइम्स )

Deepak Verma 

बैंकिंग सिस्टम का मूल आधार आम लोगों का भरोसा ही है। बैंकों में लोगों के इस विश्वास को हर कीमत पर बनाए रखने की कोशिश दुनिया की सभी सरकारें करती हैं। अपने देश में तो यह और भी जरूरी इसलिए हो जाता है कि यहां लोग अपनी बचत को सुरक्षित रखने का स्वाभाविक साधन बैंकों को ही मानते हैं।


रिजर्व बैंक के एक इंटर्नल वर्किंग ग्रुप की इस सिफारिश ने वित्तीय हलकों में हलचल मचा दी है कि देश के बड़े औद्योगिक घरानों को प्राइवेट बैंकों का प्रमोटर बनने की इजाजत दी जानी चाहिए। हालांकि वर्किंग ग्रुप ने इस इजाजत से पहले नियम-कानूनों और निगरानी की व्यवस्था में कई तरह के बदलावों की शर्त भी जोड़ी है, लेकिन इसके बावजूद इस सिफारिश की तीखी आलोचना की जा रही है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने एक संयुक्त लेख में इस सिफारिश की तुलना जिंदा बम से करते हुए कहा कि इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने भी इसे जोखिम भरा प्रस्ताव बताया है।


दिलचस्प यह है कि खुद इंटर्नल वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट ही यह खुलासा करती है कि इस संबंध में जितने भी विशेषज्ञों से बात की गई, उनमें एक को छोड़कर सबने इसके खिलाफ राय दी। अगर इस सबके बावजूद यह वर्किंग ग्रुप इस सिफारिश को आगे बढ़ा रहा है तो निश्चित रूप से इसके पीछे कोई ठोस कारण होगा। बैंकिंग सेक्टर की मौजूदा स्थिति, खासकर सरकारी बैंकों की सीमाओं को देखते हुए बैंकिंग सेक्टर में निजी पूंजी की जरूरत समझी जा सकती है। विकास की रफ्तार यथासंभव तेज करने को लेकर सरकार पर दबाव भी बहुत ज्यादा है। लेकिन यह नहीं भूला जा सकता कि बैंकिंग सिस्टम का मूल आधार आम लोगों का भरोसा ही है। बैंकों में लोगों के इस विश्वास को हर कीमत पर बनाए रखने की कोशिश दुनिया की सभी सरकारें करती हैं। अपने देश में तो यह और भी जरूरी इसलिए हो जाता है कि यहां लोग अपनी बचत को सुरक्षित रखने का स्वाभाविक साधन बैंकों को ही मानते हैं।


शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड और असेट मैनेजमेंट कंपनियां यहां आज भी बहुत छोटे दायरे को आकर्षित कर पाती हैं। यही वजह है कि अपने देश में बैंकिंग के नियम आज भी काफी सख्त बने हुए हैं। बावजूद इसके, पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होंने बैंकिंग व्यवस्था में आम लोगों के विश्वास को हिला दिया है। एक के बाद एक कई बैंकों का भट्ठा बैठने, खाताधारकों के पैसा निकालने पर बंदिशें लगने और बैंकों से हजारों करोड़ रुपये लेकर चंपत हो जाने की घटनाएं सबके जेहन में ताजा हैं। ऐसे में गैर बैंकिंग कारोबारों से जुड़े बड़े औद्योगिक घरानों को बैंक चलाने की इजाजत देना पूरे बैंकिंग सेक्टर की विश्वसनीयता को जोखिम के दायरे में लाने जैसा होगा। जिन्हें बैंकों से बड़ी मात्रा में लोन लेना है, उन्हीं के हाथों में बैंक सौंप दिए जाएं तो इससे न सिर्फ हितों के टकराव की स्थितियां बनेंगी, बल्कि लोगों में अपनी मेहनत की कमाई बैंकों के बजाय घर में ही रखने की प्रवृत्ति पैदा होने का खतरा भी बढ़ जाएगा।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स  ।

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इस लहर को कुंद करें ( नवभारत टाइम्स )

Ashish Kumar

 

जरूरत लोगों को यह समझाने की भी है कि वैक्सीन आ जाने की बात से उतावले न हों। प्रयोगशाला से निकलकर इसका मास प्रॉडक्शन शुरू हो जाए और व्यवहार में यह पर्याप्त प्रभावी साबित हो, तब भी पूरी आबादी तक इसे पहुंचाने में वक्त लगेगा


कोरोना के बढ़ते मामलों से चिंता

एक तरफ निकट भविष्य में वैक्सीन हासिल होने की उम्मीद ने सबको थोड़ी राहत दी है, दूसरी तरफ देश के कई राज्यों में कोरोना के बढ़ते मामलों ने चिंता की गहरी लकीरें भी खींच दी हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए चार राज्यों- दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र और असम की सरकारों से पूछा कि वे कोरोना पर काबू पाने के लिए क्या उपाय कर रही हैं। कोर्ट ने इन राज्यों से दो दिन में स्टेटस रिपोर्ट पेश करने को कहा और आगाह किया कि समय रहते सही कदम नहीं उठाए गए तो दिसंबर में हालात काफी बुरे हो सकते हैं।


मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित आठ राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ लंबी चर्चा की। दरअसल महामारी से जुड़े आंकड़ों में कुछ हद तक ठहराव आते ही देश के कई हिस्सों में आम लोगों के बीच एक तरह की बेफिक्री दिखने लगी है। लंबे लॉकडाउन के बाद अनलॉक के कई चरणों में कामकाज के कुछ दायरों को धीरे-धीरे खोलने और जनजीवन को जहां तक हो सके सामान्य बनाने की आवश्यक प्रक्रिया ने इस बेफिक्री को और बढ़ा दिया।


चाहे व्रत-त्योहार मनाने का उत्साह हो या बाजारों में खरीदारी करने की जरूरत, आम लोग मास्क पहनने और आपस में सुरक्षित दूरी बनाए रखने जैसी सावधानियों को लेकर अधिकाधिक लापरवाह होते दिखे हैं। इन सबका मिला-जुला नतीजा यह हुआ कि राजधानी दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में कोरोना के नए मामलों में अचानक ऐसी तेजी आई कि महामारी की दूसरी लहर शुरू होने की आशंका प्रबल हो गई। अमेरिका और यूरोप में ऐसा हो रहा है, भारत में भी हो सकता है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने आगाह किया कि कोरोना की यह दूसरी लहर सूनामी साबित हो सकती है।


यही वक्त है जब सरकारों को ज्यादा ठोस ढंग से लोगों में यह बात बिठा देनी चाहिए कि इस मोड़ पर उनकी जरा सी लापरवाही अब तक के सारे किए-कराए पर पानी फेर सकती है। यह बात पहले से कही जा रही है कि चूंकि यह वायरस जाड़ों में ही आया था इसलिए सर्दी का मौसम इसके ज्यादा अनुकूल साबित हो सकता है। भारत में अभी स्थितियां ऐसी हैं कि लोग अपनी आवाजाही कम करके खुद को सार्स कोव-2 के संपर्क में आने से बचा सकें। कम से कम जाड़े भर अपने परिवार को सहेज कर रखने का मन बनाएं। सामने खड़ी बीमारी की नई लहर को सामूहिक प्रयासों के जरिये कुंद किया जा सकता है।


जरूरत लोगों को यह समझाने की भी है कि वैक्सीन आ जाने की बात से उतावले न हों। प्रयोगशाला से निकलकर इसका मास प्रॉडक्शन शुरू हो जाए और व्यवहार में यह पर्याप्त प्रभावी साबित हो, तब भी पूरी आबादी तक इसे पहुंचाने में वक्त लगेगा और जब तक ऐसा नहीं होता तब तक कोरोना संक्रमण का खतरा खत्म नहीं होगा। इसलिए जीवन शैली में जो बदलाव पिछले आठ महीनों में आ चुके हैं, उन्हें बनाए रखें। साथ में महीने-दो महीने उस खौफ को दोबारा दिल में जगह दें, जो इधर अचानक निकल गया है।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स  ।

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Tuesday, November 17, 2020

Editorial : RCEP: सबसे बड़ा समझौता

भारत भले ही आरसीईपी समझौते का हिस्सा न हो, पर इन सभी देशों से उसके अच्छे व्यापारिक रिश्ते हैं। चूंकि यह समझौता विभिन्न देशों के लिए एक-दूसरे से कच्चा और अर्धनिर्मित माल खरीदना पहले से कहीं ज्यादा आसान बना देगा, लिहाजा इसका सीधा परिणाम यह होगा कि भारत अपनी तरफ से टैक्स में अतिरिक्त छूट न दे तो भी इनका माल भारत के बाजार में पहले से कम कीमत पर आने लगेगा।


आरसीईपी ट्रेड डील

दस आसियान देशों का चीन, जापान, साउथ कोरिया, न्यू जीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर किया गया आरसीईपी (रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप) समझौता दीर्घकालिक स्तर पर वैश्विक व्यापार के स्वरूप को प्रभावित करने वाली बेहद महत्वपूर्ण घटना है। इसकी अहमियत का अंदाजा इस बात से होता है कि समझौते में शामिल पंद्रहों देश मिलकर ग्लोबल जीडीपी के करीब 30 फीसदी हिस्से को कवर कर लेते हैं। समझौते को लेकर बातचीत हालांकि 2012 से ही चल रही थी और शुरुआती सालों में इसमें भारत भी शामिल था, लेकिन सात साल विभिन्न दौर की बातचीत चलने के बाद जब चीजें निर्णायक चरण में पहुंच कर ठोस शक्ल लेने लगीं तो भारत को अहसास हुआ कि लाख कोशिशों के बावजूद प्रस्तावित समझौते को एक हद से ज्यादा बदला नहीं जा सकता और अपने अंतिम रूप में यह भारतीय खेती तथा कृषि आधारित उद्योगों को बुरी तरह प्रभावित करेगा। लिहाजा पिछले साल इस समझौते से उसने खुद को बाहर कर लिया।



बावजूद इसके, दुनिया के इस सबसे बड़े मुक्त व्यापार समझौते के प्रभावों से खुद को अछूता रखना भारत के लिए संभव नहीं होगा। पूर्वी देशों के बाजार में संभावनाएं तलाशने का काम भारत अभी ठोस ढंग से शुरू भी नहीं कर पाया है, जो इस समझौते के लागू हो जाने के बाद और मुश्किल हो जाएगा। दूसरी और इससे भी बड़ी चुनौती इन देशों के सस्ते माल से विश्व बाजार में अपनी जगह सुरक्षित रखने की होगी। भारत भले ही आरसीईपी समझौते का हिस्सा न हो, पर इन सभी देशों से उसके अच्छे व्यापारिक रिश्ते हैं। चूंकि यह समझौता विभिन्न देशों के लिए एक-दूसरे से कच्चा और अर्धनिर्मित माल खरीदना पहले से कहीं ज्यादा आसान बना देगा, लिहाजा इसका सीधा परिणाम यह होगा कि भारत अपनी तरफ से टैक्स में अतिरिक्त छूट न दे तो भी इनका माल भारत के बाजार में पहले से कम कीमत पर आने लगेगा। स्वाभाविक रूप में इससे भारतीय कंपनियों की चुनौतियां बढ़ जाएंगी। यह स्थिति दुनिया के अन्य बाजारों में भी भारतीय कंपनियों के उत्पाद के लिए कॉम्पिटिशन में टिके रहना मुश्किल बना सकती है।


अच्छी बात यह है कि यह समझौता तत्काल लागू नहीं होने जा रहा। सभी संबंधित देशों को अपनी-अपनी संसदों से इसकी पुष्टि करानी होगी, जिसके लिए 2024 तक की समय सीमा रखी गई है। इस बीच आरसीईपी में भारत की वापसी के लिए भी दरवाजा खुला है। यानी भारत चाहे तो कुछ समय बाद भी समझौते का हिस्सा बन सकता है। इसका मतलब यह है कि भारत के पास आरसीईपी समझौते के संभावित प्रभावों पर बारीकी से विचार करते हुए इसके दुष्प्रभावों से बचने के उपाय तलाशने और जरूरी लगे तो आवश्यक सावधानियां बरतते हुए समझौते में शामिल होने का भी मौका बचा हुआ है। उम्मीद करें कि भारत इस मौके का सही उपयोग करते हुए वक्त रहते उपयुक्त कदम उठा लेगा।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Thursday, November 12, 2020

Editorial : EVM से निकला संदेश

बिहार विधानसभा चुनाव इस मायने में बहुत खास थे कि ये और साथ में कुछ अन्य राज्यों के उपचुनाव भी कोरोना काल में होने वाले देश का पहला बड़ा चुनाव थे। कोरोना की आपदा के बीच ही, लगभग समानांतर चले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों से तुलना करके देखें तो जहां राष्ट्रपति ट्रंप को महामारी से अच्छी तरह न निपट पाने की कीमत अपने एक कार्यकाल की बलि देकर चुकानी पड़ी, वहीं बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए चुनाव नतीजे आने के बाद भी चुनाव से ठीक पहले वाली सीटों पर ज्यों का त्यों डटा रहा। इसका श्रेय काफी हद तक बीजेपी को ही जाता है, जिसने अपनी सीटों की संख्या में अच्छा-खासा इजाफा करके उस कमी की भरपाई कर दी, जो नीतीश के जेडीयू की टैली में आई गिरावट से उपजी थी। हालांकि कोरोना बिहार में भी बहुत बड़ा मुद्दा था। प्रवासी मजदूर देश के अलग-अलग शहरों से जिन अमानवीय स्थितियों में तकलीफों के बवंडर से गुजरते हुए अपने गांव पहुंचे थे, उसका पूरा असर वोटिंग पर पड़ने की संभावना जताई जा रही थी। 

चुनाव प्रचार के दौरान आरजेडी नेता और महागठबंधन की तरफ से सीएम प्रत्याशी तेजस्वी यादव की रैलियों में जुट रही भीड़ इसकी पुष्टि करती जान पड़ती थी। लेकिन बीजेपी के पास न केवल मजबूत संगठन और समर्पित काडर है, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे कुशल चुनावी मशीनरी भी है। सही रणनीति के साथ इन संसाधनों के सटीक इस्तेमाल के जरिये चुनाव परिणाम को अपने पक्ष में झुकाकर बीजेपी ने यह साबित किया कि कोरोना से जुड़ी बदहाली को अपने फायदे में भुनाने की विपक्ष चाहे जितनी भी कोशिश करे, देश का जनमत अभी मोदी सरकार के साथ ही है। एक बड़ी परीक्षा एनडीए की एकजुटता की भी थी। शिवसेना और अकाली दल के बाहर निकल जाने के बाद गैर-बीजेपी एनडीए के नाम पर अब जेडीयू ही बचा हुआ है। बिहार के दूसरे एनडीए घटक एलजेपी ने जेडीयू के खिलाफ लेकिन बीजेपी के पक्ष में चुनाव लड़ा। बिहार में नीतीश कुमार की कथित अलोकप्रियता को देखते हुए यह सवाल उठ रहा था कि बीजेपी उन्हें अपने साथ रखेगी या नहीं। पर चुनाव के दौरान ही बीजेपी नेतृत्व ने साफ कर दिया कि सीटें जिसकी जितनी भी आएं, बिहार में एनडीए के नेता नीतीश कुमार ही होंगे।

इसका एक मतलब साफ है कि एनडीए को किनारे करके अकेले चलना फिलहाल बीजेपी के अजेंडे पर नहीं है। हां, इसका स्वरूप वह वैसा नहीं रखना चाहती जैसा यह अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में था, या जैसा मनमोहन सिंह के जमाने का यूपीए हुआ करता था। यही वजह है कि महाराष्ट्र में शिवसेना का कद छोटा करने का दांव उलटा पड़ जाने के बावजूद बिहार में जेडीयू को ‘कट टु साइज’ करने की कोशिशों से वह बाज नहीं आई और इस काम में वह कामयाब भी रही। बहरहाल, सबसे बड़ा संदेश इन चुनाव नतीजों का यह है कि विपक्ष पश्चिम बंगाल में या कहीं भी बिल्ली के भाग से छींका टूटने की उम्मीद नहीं कर सकता। कोरोना, मंदी, बेरोजगारी जैसे ढेरों मसलों के बावजूद सत्तारूढ़ गठबंधन चुनावी पिच पर जबर्दस्त फॉर्म में है और उसे आउट करने के लिए काफी पसीना बहाना होगा।

 सौजन्य - नवभारत टाइम्स।
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Monday, November 9, 2020

Editorial : कोरोना से आगे

Saroj Singh

 

डब्लूएचओ का इशारा सिर के बल खड़ी इस प्राथमिकता को वापस पैरों पर लाने का है। आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से वास्ता रखने वाली छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान करने वाली विश्वसनीय और कारगर स्वास्थ्य सेवा विकसित किए बगैर हम न तो आम लोगों का जीवन स्तर सुधार पाएंगे।


विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि सरकारों को अपना ध्यान आने वाली महामारियों की तैयारी पर लगाना चाहिए। उसके बयान का संदर्भ आज से शुरू हो रही वर्ल्ड हेल्थ असेंबली से जुड़ा है, जो हर साल जिनीवा में होती है। कोरोना की मजबूरियों के चलते इस बार यह बैठक ऑनलाइन हो रही है। बहरहाल, डब्ल्यूएचओ की यह हिदायत ऐसे समय आई है जब कई देशों में कोरोना की दूसरी लहर आने की खबर सुर्खियों में है। एक महामारी जब पहले से ही लोगों के सिर पर हो तो आगे की महामारियों पर चर्चा करना खुद में अटपटा जान पड़ता है। इसके बावजूद डब्लूएचओ सभी देशों की संबद्ध एजेंसियों को आगे की महामारियों को लेकर आगाह करना जरूरी मानता है। कारण यह कि इनसे निपटने की तैयारियों के लिए किसी को अलग से कोई वक्त नहीं मिलने वाला। यह काम तमाम दूसरी चुनौतियों से जूझते हुए ही करते चलना होगा।


कोरोना से निपटने का अनुभव इस लिहाज से खासा शिक्षाप्रद हो सकता है। यह वैश्विक महामारी थी, फिर भी कुछ देशों ने इसका फैलाव रोकने और बीमारी से होने वाली मौतों की संख्या काफी कम रखने में सफलता प्राप्त की। चीन ने इसे अपने एक शहर वूहान से बाहर इक्का-दुक्का अपवाद के तौर पर ही जाने दिया, जिसका श्रेय उसके स्वास्थ्य तंत्र से ज्यादा प्रशासनिक तंत्र को जाता है। लेकिन जर्मनी की विशेषता यह रही कि आसपास के तमाम देशों में कोरोना के प्रकोप और खुली अंतरराष्ट्रीय सीमा के बावजूद अपने यहां मृतकों की संख्या को उसने उल्लेखनीय ढंग से नियंत्रित रखा। वहां अब तक कोरोना के करीब साढ़े छह लाख मामले सामने आए हैं जिनमें 11 हजार से कुछ ज्यादा मौतें हुई हैं। इसके बरक्स लगभग समान आबादी और परिस्थितियों वाले पड़ोसी देश फ्रांस में साढ़े सोलह लाख मामले आए और मरने वालों की संख्या 40 हजार के पार जा चुकी है। डब्ल्यूएचओ ने रेखांकित किया है कि जिन देशों में हेल्थ इमर्जेंसी से निपटने के लिए बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और अच्छी तैयारियां थीं वहां कोरोना बहुत ज्यादा नुकसान नहीं कर सका।


हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर की पॉजिटिव भूमिका को स्वीकार करते हुए भी यह मानना होगा कि महामारी से निपटने की कोई फूलप्रूफ व्यवस्था किसी देश में पहले से नहीं हो सकती। मगर हेल्थकेयर के क्षेत्र में सबसे बड़ी कमी वैश्विक स्तर पर यह रही है कि खास बीमारियों के इलाज पर बढ़ते जोर ने आम बीमारियों को पहाड़ बना डाला है। कैंसर और किडनी, हार्ट, लिवर से जुड़ी बीमारियों के लिए सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल और इंश्योरेंस स्कीमें उपलब्ध हैं, लेकिन खांसी, जुकाम और पेचिश जैसी आम बीमारियों के लिए जनरल फिजिशन ढूंढना कठिन हो गया है। डब्लूएचओ का इशारा सिर के बल खड़ी इस प्राथमिकता को वापस पैरों पर लाने का है। आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से वास्ता रखने वाली छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान करने वाली विश्वसनीय और कारगर स्वास्थ्य सेवा विकसित किए बगैर हम न तो आम लोगों का जीवन स्तर सुधार पाएंगे, न ही भविष्य की संभावित महामारियों से निपटने में सक्षम हो सकेंगे।


सौजन्य -  नवभारत टाइम्स।

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Wednesday, November 4, 2020

Editorial :काबुल में आतंकी हमला

एक सप्ताह पहले काबुल में ही एक और शिक्षा संस्थान पर हमला हुआ था जिसमें 24 लोग मारे गए थे। दोनों हमलों की जिम्मेदारी आईएस ने ली है। लेकिन दिलचस्प है कि अफगानिस्तान सरकार ने ताजा हमले का दोष ‘तालिबान और उन जैसी सोच वाले उनके शैतानी सहयोगियों’ पर डाला है।

अफगानिस्तान में काबुल यूनिवर्सिटी कैंपस के अंदर सोमवार को हुआ भीषण आतंकी हमला बताता है कि हालिया शांति प्रयासों और अमेरिकी देखरेख में जारी शांति वार्ता के बावजूद देश में हिंसा का तांडव बदस्तूर जारी है। कैंपस के अंदर जिस तरह से पहले एक फिदायीन आतंकी ने खुद को बम से उड़ाया, उसके बाद दो बंदूकधारी छात्रों-शिक्षकों को निशाना बनाते हुए घूमते रहे और सुरक्षाकर्मियों को हालात काबू करने में घंटों लग गए, उससे स्पष्ट है कि इस हमले के पीछे एक व्यवस्थित योजना थी। एक सप्ताह पहले काबुल में ही एक और शिक्षा संस्थान पर हमला हुआ था जिसमें 24 लोग मारे गए थे। दोनों हमलों की जिम्मेदारी आईएस ने ली है। लेकिन दिलचस्प है कि अफगानिस्तान सरकार ने ताजा हमले का दोष ‘तालिबान और उन जैसी सोच वाले उनके शैतानी सहयोगियों’ पर डाला है। हालांकि तालिबान ने अपनी तरफ से बयान जारी कर कहा कि उसका इस हमले में कोई हाथ नहीं है। गौर करने लायक यह भी है कि सरकार इस घटना की निंदा करके या इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताकर ही नहीं रुकी। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने घोषणा की कि वे इसका बदला लेंगे। सरकारी अधिकारियों ने भी कहा कि इस घटना का जवाब दिया जाएगा।

अफगानिस्तान के इस घटनाक्रम का संदर्भ कतर में अमेरिकी कोशिशों के तहत चल रही उस शांति वार्ता से जुड़ता है जिसमें अफगान सरकार और तालिबान के प्रतिनिधि आमने-सामने बात कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि शांति वार्ता में ठोस प्रगति हुई है, जिसके बाद अमेरिकी प्रतिनिधि ने पाकिस्तान जाकर वहां के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से बातचीत की। स्वाभाविक रूप से तालिबान नहीं चाहता कि उसका नाम इस वक्त ऐसे किसी हमले में घसीटा जाए, लेकिन इन हमलों के पीछे जो ताकतें हैं वे नहीं चाहतीं कि शांति प्रक्रिया आगे बढ़े और तालिबान को सत्ता में भागीदारी मिल जाए। एक बड़ी आशंका यह है कि सत्ता का कोई बंटवारा हो भी गया तो उसमें शामिल सभी पक्षों की स्वाभाविक कोशिश पूरी सत्ता पर कब्जा जमाने की होगी, जो बेइंतिहा खून-खराबे के साथ ही परवान चढ़ेगी। शांति कायम करने के प्रयासों को इन तमाम संदेहों, आशंकाओं से उलझते हुए, इनसे निपटते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ाना होगा।


लेकिन फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसे आगे बढ़ाने वाली मुख्य ताकत अमेरिका की ही आगे इसमें कितनी दिलचस्पी रहेगी। 9/11 के आतंकी हमले के बाद जब अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में गई, उसके बाद से अमेरिका में ऐसा कोई राष्ट्रपति चुनाव नहीं हुआ जिसके ठीक पहले मामला सुलटाकर अमेरिकी फौज को वापस बुला लेने का माहौल न बना हो। हर सरकार चुनाव से पहले विभिन्न उपायों के जरिये यह दिखाने की कोशिश करती है कि वह फौज को वापस बुलाने का इंतजाम कर रही है, लेकिन चुनाव निपटते ही ये उपाय ठंडे बस्ते में चले जाते रहे हैं। बहरहाल, अमेरिका में ताजा राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट पड़ चुके हैं। उम्मीद करें कि आगे वहां जो भी सरकार बने वह ढर्रे से हटकर अफगानिस्तान में स्थायी शांति कायम करने की कोशिशों को तार्किक परिणति तक पहुंचाए।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Tuesday, November 3, 2020

Editorial : क्या चाहता है रूस

इस संदर्भ में ध्यान देने लायक बात यह है कि रूस और चीन के बीच सीमा संबंधी सारे विवाद सुलझाए जा चुके हैं। पूतिन ने अपने उसी बयान में यह स्पष्ट किया कि चीन की सैन्य क्षमता बढ़ाने में रूसी सहयोग की अहम भूमिका पहले से ही चली आ रही है। फिर भी अगर सैन्य गठबंधन को लेकर दोनों पक्ष सावधानी बरत रहे हैं तो उसकी वजह यह है कि ऐसे गठबंधन अक्सर व्यापारिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।


रूसी राष्ट्रपति पूतिन ने पिछले दिनों एक दिलचस्प बयान में कहा कि मास्को और पेइचिंग के बीच सैन्य गठबंधन की जरूरत दोनों में से किसी देश को नहीं है, फिर भी यह संभव है। हालांकि चीन ने इस बयान पर कोई खास उत्साह नहीं दिखाया और रूसी विशेषज्ञों ने भी मौजूदा हालात में सैन्य गठबंधन जैसी किसी संभावना को अपने तईं खारिज ही कर दिया। बावजूद इसके, पूतिन ने अगर इसे सैद्धांतिक तौर पर संभव कहा है तो इसके गहरे मायने हैं। दिनोंदिन यह साफ होता जा रहा है कि चीन और अमेरिका के संबंधों में आई गिरावट न तो किसी एक नेता की सनक का परिणाम है और न ही चुनावों के जरिए अमेरिकी नेतृत्व बदलने से इसमें कोई बड़ा बदलाव आने जा रहा है। ऐसे में रूसी राष्ट्रपति का यह बयान भविष्य के शक्ति संतुलन का एक सुचिंतित संकेत हो सकता है, जिसमें चीन से ज्यादा जरूरी संदेश अमेरिका के लिए मौजूद है।


इस संदर्भ में ध्यान देने लायक बात यह है कि रूस और चीन के बीच सीमा संबंधी सारे विवाद सुलझाए जा चुके हैं। पूतिन ने अपने उसी बयान में यह स्पष्ट किया कि चीन की सैन्य क्षमता बढ़ाने में रूसी सहयोग की अहम भूमिका पहले से ही चली आ रही है। फिर भी अगर सैन्य गठबंधन को लेकर दोनों पक्ष सावधानी बरत रहे हैं तो उसकी वजह यह है कि ऐसे गठबंधन अक्सर व्यापारिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। मसलन, रूस से फौजी गठबंधन होते ही चीन को यूरोपीय बाजार के बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ेगा। लेकिन अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती दूरी और एशिया प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की बढ़ती दिलचस्पी को रूस नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसी तरह भारत भी पूतिन के बयान में मौजूद संकेतों की अनदेखी नहीं कर सकता। चीन के साथ मौजूदा तनाव को देखते हुए विभिन्न देशों का सहयोग और समर्थन हासिल करना जरूरी है, लेकिन ऐसा करते हुए हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अमेरिका से हमारी नजदीकी रूस को हमसे दूर न लेती जाए।


भारत के बहुत अच्छे संबंध रूस के साथ बहुत पहले से रहे हैं। हथियारों की खरीद से लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी समिति में स्टैंड लेने तक यह दोस्ती दोनों देशों के लिए हितकर रही है। कोई कारण नहीं कि आगे इसमें कोई बाधा आने दी जाए। सभी संबंधित देशों को अपनी समझ साफ रखनी चाहिए कि दोस्ती हो या दुश्मनी, भारत अपना हर रिश्ता अपने दम पर ही निभाता आया है। इसके लिए किसी तीसरे देश की छत्रछाया की जरूरत न हमें पहले कभी पड़ी है, न आगे पड़ने वाली है। रूस का सैन्य गठबंधन चीन से बने या न बने, भारत और रूस के रिश्तों में बिगाड़ आने का कोई सूत्र इसमें न मौजूद हो, यह हमें सुनिश्चित करना होगा।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Editorial : नीस अटैकः धर्म और आतंकवाद

Saroj Singh

घृणित और निर्मम हत्याओं के संदर्भ में भी तुर्की और पाकिस्तान के शासनाध्यक्षों ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति के बयान को ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है। हालांकि फ्रांस ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखने की बात कही, लेकिन उसकी व्याख्या इस रूप में की जा रही है कि वह आतंकवाद की आड़ में इस्लाम को निशाना बना रहा है।

फ्रांस पिछले कुछ सालों से इस्लामी आतंकवादी तत्वों के निशाने पर है। क्लास में कथित तौर पर पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाने की वजह से एक स्टूडेंट द्वारा टीचर की हत्या किए जाने के कुछ ही समय बाद जिस तरह से चर्च में घुसकर एक बुजुर्ग महिला समेत तीन लोगों की चाकुओं से गोदकर हत्या की गई, वह पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। लेकिन इन दोनों घटनाओं के बाद भी जहां फ्रांस ने आतंकी तत्वों का मुकाबला करने और अपने उदार जीवन मूल्यों की हर हाल में रक्षा करने का संकल्प जताया, वहीं दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में फ्रांस के प्रति सहानुभूति के बजाय धार्मिक भावनाओं के आधार पर विभाजन दिखाई देने लगा। खासकर एशिया के मुस्लिम बहुल इलाकों में फ्रांस के खिलाफ प्रदर्शन हुए जिनमें फ्रांसीसी राष्ट्रपति के खिलाफ गुस्सा प्रकट किया गया। इस्लाम से जुड़े मसलों पर दुनिया भर में प्रदर्शन पहले भी होते रहे हैं, इस बार खास बात यह है कि इन कट्टर धार्मिक भावनाओं को कुछ राष्ट्राध्यक्षों और राजनेताओं का स्पष्ट समर्थन प्राप्त हुआ।


घृणित और निर्मम हत्याओं के संदर्भ में भी तुर्की और पाकिस्तान के शासनाध्यक्षों ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति के बयान को ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है। हालांकि फ्रांस ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखने की बात कही, लेकिन उसकी व्याख्या इस रूप में की जा रही है कि वह आतंकवाद की आड़ में इस्लाम को निशाना बना रहा है। इसी व्याख्या के सहारे मलयेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने यहां तक कह दिया कि मुसलमानों को यह अधिकार है कि वे फ्रांसीसियों को दंडित करें, उनकी हत्या करें। साफ है कि यह महज कुछ आम लोगों के भावावेश में आ जाने का मामला नहीं है। यह विभिन्न देशों के बीच बन रहे नए तरह के शक्ति संतुलन का संकेत है। जब से तुर्की ने इस्लामी दुनिया का नेतृत्व सऊदी अरब से छीन कर अपने हाथों में लेने का मन बनाया है, तभी से इस्लाम से जुड़े मसलों में उसकी प्रो-एक्टिव भूमिका दिखने लगी है। उसी भूमिका का एक रूप कश्मीर मामले में उसके अटपटे बयान भी हैं। ऐसे बयानों से तुर्की को अंततः कितना फायदा होगा और उसका कद बढ़ेगा या और घट जाएगा, यह अलग सवाल है।


फिलहाल गौर करने की बात यह है कि पहली बार इस्लामी आतंकवाद को किसी देश और राष्ट्राध्यक्ष का समर्थन मिलता दिख रहा है। अपने चरम उत्कर्ष के दौर में भी आतंकवाद नॉन स्टेट एक्टर्स के ही हाथों में रहा। कुछ देशों पर इसे समर्थन देने या इसके खिलाफ प्रभावी कदम न उठाने के आरोप भले लगते रहे हों, कोई राष्ट्राध्यक्ष खुलकर इनके पक्ष में नहीं आया था। अगर इस बार ऐसा होता दिख रहा है तो इन देशों की विवेकशील आवाजों को आगे आकर इन्हें संयत रखने का प्रयास करना चाहिए। वरना क्या पता, अपनी मौत मरने के लिए छोड़ दिए गए आतंकवाद का एक और दौर दुनिया को झेलना पड़ जाए।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Editorial : कोरोनाः पढ़ाई में पिछड़ते बच्चे

देश में 2018 के मुकाबले स्मार्टफोन धारकों की संख्या करीब-करीब दोगुनी हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब एक तिहाई बच्चे ऐसे हैं जिनकी स्मार्टफोन तक पहुंच होने के बावजूद लर्निंग मैटेरियल नहीं मिल सका। इस बीच सरकार ने तमाम सावधानियों के साथ स्कूल खोलने की इजाजत दे दी है, फिर भी ज्यादातर बच्चों ने स्कूल जाना शुरू नहीं किया है।


ऐनुअल स्टेट ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट यानी असर का ताजा सर्वे मौजूदा स्कूली शिक्षा की बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। यह सर्वे पिछले महीने यानी सितंबर में किया गया, जब कोरोना के चलते स्कूलों को बंद हुए छह महीने हो चुके थे। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले 20 फीसदी बच्चों के पास पाठ्यपुस्तकें ही नहीं हैं। यह राष्ट्रीय औसत है। अलग-अलग राज्यों का हाल देखना हो तो राजस्थान में पाठ्यपुस्तकों से वंचित बच्चों का प्रतिशत 40 है जबकि आंध्र प्रदेश में 65 से भी ज्यादा। जिस हफ्ते में यह सर्वे किया गया, तब तक की स्थिति यह थी कि एक तिहाई ग्रामीण बच्चों की कोई लर्निंग एक्टिविटी नहीं हुई थी जबकि दो तिहाई बच्चों को स्कूल से कोई लर्निंग मैटेरियल नहीं मिला था। लाइव ऑनलाइन कक्षाओं की बड़ी चर्चा है, लेकिन वहां तक पहुंच केवल दस फीसदी ग्रामीण बच्चों की ही दर्ज की जा सकी।


आम चलन के मुताबिक इसके पीछे टेक्नॉलजी की सीमित पहुंच को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा, लेकिन असर की यह रिपोर्ट जोर देकर कहती है कि मामला सिर्फ टेक्नॉलजी का नहीं है। हाल के दिनों में वैसे भी स्मार्टफोन का मार्केट बढ़ा है। देश में 2018 के मुकाबले स्मार्टफोन धारकों की संख्या करीब-करीब दोगुनी हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब एक तिहाई बच्चे ऐसे हैं जिनकी स्मार्टफोन तक पहुंच होने के बावजूद लर्निंग मैटेरियल नहीं मिल सका। इस बीच सरकार ने तमाम सावधानियों के साथ स्कूल खोलने की इजाजत दे दी है, फिर भी ज्यादातर बच्चों ने स्कूल जाना शुरू नहीं किया है। अभिभावकों के मन में बैठा डर उन्हें बच्चों को स्कूल भेजने से रोक रहा है। उन्हें पता है कि बच्चों को लाख ध्यान दिलाया जाए तो भी वे न तो मुंह पर मास्क लगाए रख पाएंगे, न ही दोस्तों से डिस्टेंस मेनटेन करेंगे। यह डर वास्तविक है और रातोंरात नहीं छंटने वाला। यानी देश के ज्यादातर बच्चों के कोरोना से पहले वाले स्तर की शिक्षा तक दोबारा पहुंचने में अभी वक्त लगेगा। और यह स्थिति उन बच्चों की है जो स्कूली शिक्षा व्यवस्था के दायरे में शामिल हैं। 

सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक देश में 6 से 10 साल की उम्र के 5.3 फीसदी ग्रामीण बच्चे ऐसे हैं जिनका किसी स्कूल में ऐडमिशन ही नहीं हुआ। आंकड़े की अहमियत तब समझ में आती है जब हम देखते हैं कि 2018 में ऐसे ग्रामीण बच्चों का प्रतिशत महज 1.8 था। संयोग कहिए कि इसी साल केंद्र सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी लेकर आई है जिसमें बच्चों को सिखाने के नए-नए तरीकों पर कई मौलिक सुझाव दिए गए हैं। मगर कोरोना से उपजी स्थितियों ने ग्रामीण बच्चों को जितना पीछे धकेल दिया है, वहां से इनको सामान्य स्तर तक लाने के लिए जल्द ही एक विशेष नीति की जरूरत पड़ेगी, राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर अमल कुछ समय बाद भी शुरू हो तो कोई हर्ज नहीं।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Tuesday, October 27, 2020

Opinion : स्वामित्व योजनाः किसानों को प्रॉपर्टी कार्ड

हाल ही में सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े कानून बनाए हैं। लेकिन अगर किसानों के पास अपनी जमीन के स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हुए तो वे किसी कंपनी या व्यक्ति से कॉन्ट्रैक्ट कैसे करेंगे? जाहिर है, कृषि सुधारों को जमीन पर उतारने के लिए भी यह आवश्यक है कि किसानों के पास भू-स्वामित्व के कानूनी तौर पर मान्य सबूत मौजूद हों। प्रॉपर्टी कार्ड इस जरूरत को अच्छी तरह पूरा कर सकते हैं।

 

ग्रामीण भारत के लिए स्वामित्व योजना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को ‘स्वामित्व’ योजना के तहत गांवों के लोगों को प्रॉपर्टी कार्ड बांटने की शुरुआत की। आरंभ में इसके तहत छह राज्यों में फैले 750 गांवों के एक लाख लोगों को प्रॉपर्टी कार्ड मिलने हैं, लेकिन सरकार कह रही है कि अगले चार साल में पूरे देश के छह लाख से ज्यादा गांवों में यह काम पूरा कर लिया जाएगा। साफ है कि इस महत्वाकांक्षी योजना से देश के ग्रामीण समाज में एक बड़ी उथल-पुथल आने वाली है। भारत की दो-तिहाई आबादी आज भी गांवों में रहती है और इसका ज्यादातर हिस्सा ऐसा है जिसके पास न केवल अपना घर है बल्कि थोड़ी-बहुत कृषि योग्य जमीन भी है। लेकिन इस संपत्ति का मालिकाना साबित करने वाले दस्तावेज बहुत कम परिवारों के पास हैं। ऐसे में ये परिवार चाह कर भी अपनी इस संपत्ति पर बैंकों से कोई लोन नहीं ले सकते। न ही कानूनी तौर पर किसी से इस संपत्ति के आधार पर कोई कॉन्ट्रैक्ट कर सकते हैं।

नतीजा यह कि देश की इस संपदा का पूंजीकरण नहीं हो पा रहा है। हाल ही में सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े कानून बनाए हैं। लेकिन अगर किसानों के पास अपनी जमीन के स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हुए तो वे किसी कंपनी या व्यक्ति से कॉन्ट्रैक्ट कैसे करेंगे? जाहिर है, कृषि सुधारों को जमीन पर उतारने के लिए भी यह आवश्यक है कि किसानों के पास भू-स्वामित्व के कानूनी तौर पर मान्य सबूत मौजूद हों। प्रॉपर्टी कार्ड इस जरूरत को अच्छी तरह पूरा कर सकते हैं। ध्यान में रखने वाली बात इस सिलसिले में यह है कि गांवों में मामला चाहे जमीन का हो या पुश्तैनी मकान का, इसके स्वामित्व का सवाल देश के सबसे उलझे सवालों में एक है। पुश्त दर पुश्त आपसी समझदारी से काम चलता रहता है। लेकिन बात अगर कानूनी अधिकार की आएगी तो कोई भी अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं होगा।

जो अभी शहर में नौकरी से गुजारा करते हैं और खेती से होने वाली उपज गांवों में रह रहे परिजनों के लिए छोड़े हुए हैं, वे भी मालिकाने के सवाल पर इंच-इंच नपा लेंगे। शादीशुदा बेटियां अपनी पैतृक संपत्ति में भले कोई दिलचस्पी न लेती हों, अपना कानूनी मालिकाना भला कैसे छोड़ देंगी? लब्बोलुआब यह कि इस ‘सर्वे ऑफ विलेजेज एंड मैपिंग विद इंप्रोवाइज्ड टेक्नॉलजी इन विलेज एरियाज’ यानी स्वामित्व मिशन के परिणामस्वरूप गांवों के हर घर में जबर्दस्त टकराव की स्थिति देखने को मिल सकती है। यह सही है कि आवश्यक सुधारों को संभावित झगड़ों और विवादों के डर से अनंत काल तक स्थगित नहीं रखा जा सकता, लेकिन इतना जरूर सुनिश्चित किया जा सकता है कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए धीरे-धीरे और सावधानी बरतते हुए आगे बढ़ा जाए।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Editorials : कितनों के लिए एमएसपी

कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का तगड़ा विरोध मुख्यतः दो राज्यों- पंजाब और हरियाणा- में ही केंद्रित क्यों रहा। इसकी वजह यही थी कि इन दो राज्यों के किसानों की मंडी व्यवस्था तक अच्छी पहुंच है और उन्हें इसका लाभ मिल रहा है।


कृषि सुधारों की टेढ़ी-मेढ़ी राह


पिछले दिनों नए कृषि कानूनों को लेकर जिस तरह किसान सड़कों पर आ गए और जिस तरह से कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी पार्टी की राज्य सरकारों से वैकल्पिक कानून बनाकर इन कानूनों को बेअसर करने को बोल दिया है, उसे देखते हुए हाल के कुछ कृषि आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। वर्ष 2018-19 में महज 12 फीसदी धान उत्पादक किसान ही एमएसपी पर सरकारी खरीद व्यवस्था का फायदा उठा पाए थे। साल 2018-19 के जो सरकारी आंकड़े उपलब्ध हैं, उनके मुताबिक देश के कुल 8 करोड़ धान उत्पादक किसानों में से मात्र 97 लाख किसानों के धान की सरकारी खरीद ही एमएसपी पर की जा सकी। इनमें भी अलग-अलग राज्यों के किसानों की भागीदारी में जबर्दस्त अंतर दिखता है। पंजाब के 95 फीसदी और हरियाणा के 70 फीसदी किसानों को इसका फायदा मिला लेकिन बाकी राज्यों के किसान बहुत पीछे नजर आते हैं। अन्य प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में उत्तर प्रदेश के मात्र 3.6 फीसदी, पश्चिम बंगाल के 7.3 फीसदी और बिहार के महज 1.7 फीसदी किसान ही इसका फायदा उठा सके।

ये आंकड़े बताते हैं कि एमएसपी पर फसलों की खरीद के लिए बनी मंडी व्यवस्था का देश के ज्यादातर किसानों के लिए कोई मायने नहीं है। इन आंकड़ों से इस सवाल का भी काफी हद तक जवाब मिल जाता है कि कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का तगड़ा विरोध मुख्यतः दो राज्यों- पंजाब और हरियाणा- में ही केंद्रित क्यों रहा। इसकी वजह यही थी कि इन दो राज्यों के किसानों की मंडी व्यवस्था तक अच्छी पहुंच है और उन्हें इसका लाभ मिल रहा है। सवाल उठता है कि आखिर बाकी राज्यों में यह व्यवस्था कारगर क्यों नहीं हो पा रही? जवाब कई बातों पर निर्भर करता है। जैसे, पंजाब और हरियाणा में जितनी सघनता से मंडियां बनाई गई हैं और चल रही हैं, क्या अन्य राज्यों में भी उसी तरह गांवों के आसपास मंडियां उपलब्ध हैं? क्या किसानों को मंडियों तक फसलें आसानी से पहुंचाने की सुविधा प्राप्त है? क्या एक दिन में बिक्री न होने पर मंडियों के आसपास अपनी उपज सुरक्षित रखवाने के लिए गोदाम की व्यवस्था मौजूद है? जाहिर है, ये सवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े हैं जो हर राज्य में समान स्तर का नहीं है।


इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए निवेश की जरूरत है, जिससे सरकारें लगातार कतरा रही हैं। इसका रास्ता खेती में निजी क्षेत्र के आने से ही निकल सकता है, जिसके लिए कृषि सुधार आवश्यक हैं। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में कृषि उपज के प्रकार, किसानों की जरूरतें, उनके हित और आशंकाएं भी अलग-अलग हैं। यही वजह है कि कुछ राज्यों के किसान कृषि सुधार संबंधी विधेयकों को लेकर मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं जबकि अन्य राज्यों के किसान इस विरोध से निरपेक्ष बने रहते हैं। देश में कृषि सुधारों की गाड़ी इन विविधताओं का ध्यान रखते हुए और हर राज्य के लिए अलग ढांचे की गुंजाइश बनाते हुए ही आगे बढ़ाई जा सकती है।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Sunday, September 6, 2020

संसद का कोरोनाकालीन सत्रः जरूरी है प्रश्नकाल



कोरोना महामारी के बीच 14 सितंबर से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र की अधिसूचना जारी होने के साथ ही एक विवाद शुरू हो गया। यह संक्षिप्त सत्र संकटकालीन परिस्थितियों में बुलाया जा रहा है और सभी सांसदों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए अत्यावश्यक कार्य निपटाकर जल्द से जल्द इसे संपन्न करने की भावना ही फिलहाल सर्वोपरि है। इसलिए इस बार संसद के टाइमटेबल में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिसमें प्रश्नकाल को समाप्त करने का प्रस्ताव भी शामिल है। इसके खिलाफ कई विपक्षी नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है।


सरकार की तरफ से कहा गया कि लोकसभा और राज्यसभा सचिवालयों द्वारा बुधवार को अधिसूचना जारी किए जाने से पहले सभी छोटे-बड़े दलों के नेताओं से राय-मशविरा कर लिया था और तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन को छोड़कर सबने इस पर सहमति जताई थी। बहरहाल, जब अधिसूचना जारी हुई तो विपक्षी सांसदों ने इस पर तीव्र आपत्ति की। यों भी संसद का प्रश्नकाल हरेक सांसद को सरकार के क्रिया-कलापों पर सवाल करने का ऐसा अधिकार देता है, जिसे कोई छोड़ना नहीं चाहेगा। प्रश्नकाल को संसदीय व्यवस्था की आत्मा कहा जा सकता है। संसद में ज्यादातर समय पार्टी लाइन पर बहस चलती है, लेकिन प्रश्नकाल में दृश्य अलग होता है। इस दौरान सांसद अपने तारांकित प्रश्नों में सरकारी तंत्र के कामकाज से जुड़े सवाल पूछते हैं, और सरकारी जवाब से संतुष्ट न होने पर दो पूरक प्रश्नों के जरिये सरकार को स्पष्ट जवाब देने के लिए मजबूर करते हैं।


इस दौरान अक्सर पार्टी लाइन भी धुंधली होती नजर आती है। जब-तब अपने पक्ष के ही सांसदों के सवालों से घिर जाने पर सरकार की बड़ी किरकिरी होती है। सरकार से सवाल करने और उसकी जिम्मेदारी तय करने की यह परंपरा संसदीय लोकतंत्र के उस दौर की नुमाइंदगी करती है, जब सांसद किसी पार्टी के टिकट पर नहीं बल्कि अपने दम पर चुनकर आते थे और संसद में पहुंच जाने के बाद अपना पक्ष तय करते थे। लोकतंत्र की लंबी यात्रा के दौरान राजनीतिक पार्टियां उभरीं और मजबूत होती गईं। उन्होंने लोकतांत्रिक चेतना और प्रक्रियाओं को कितना फायदा पहुंचाया है और किन-किन पहलुओं पर उसे कमजोर किया है, इस पर शोध होते रहते हैं, लेकिन आज की तारीख में हमारे लिए निर्दलीय लोकतंत्र की कल्पना करना भी कठिन है।


बहरहाल, प्रश्नकाल के रूप में पार्टी से ऊपर उठकर सरकार के कार्यों की पड़ताल करने के जो मौके अभी उपलब्ध हैं, उन्हें कम करने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। यह अच्छी बात है कि विपक्ष का रुख देखकर सरकार ने लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को मानसून सत्र में रोज आधे घंटे का प्रश्नकाल रखने और इसमें गैर-तारांकित यानी लिखित जवाबों वाले सवाल लेने का सुझाव दिया है। यह पर्याप्त नहीं, फिर भी इससे मानसून सत्र एक गहरा दाग झेलने से बच जाएगा।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Thursday, July 9, 2020

चीन: टकराव टलना बड़ी बात : Navbharat Times Editorial


पिछले महीने की 15 तारीख को हुई हिंसक झड़प के बाद से ही भारत-चीन सीमा पर कायम तनाव में कमी आने के ठोस संकेत पहली बार मिले हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच रविवार को फोन पर हुई बातचीत के दौरान दोनों पक्षों में इस बात पर सहमति बनी कि सीमा पर सैनिकों को अलग करने और तनातनी कम करने की प्रक्रिया जल्दी पूरी करना दोनों देशों के हित में है।

इसके बाद यह खबर आई कि दोनों देशों के सैनिक अपने-अपने स्थान से कुछ पीछे हटने शुरू हुए हैं। हालांकि इस प्रक्रिया के ब्यौरे अभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किए गए हैं। सूत्रों के हवाले से मीडिया में आई खबरों में एकसूत्रता का अभाव है। कहा जा रहा है कि दोनों पक्षों में सीमा पर 3 किलोमीटर का बफर जोन बनाने पर सहमति हुई है। यानी दोनों देशों की सेनाएं डेढ़-डेढ़ किलोमीटर पीछे हटेंगी और बीच के तीन किलोमीटर खाली इलाके में कोई हरकत करने से पहले उन्हें दूसरे पक्ष को इसकी जानकारी देनी होगी।

खबरों में यह स्पष्ट नहीं है कि डेढ़ किलोमीटर पीछे हटना वे कहां से शुरू करेंगी- दोनों सेनाओं की मौजूदा स्थिति से, या ताजा विवाद शुरू होने के पहले अप्रैल में दोनों सेनाओं की जो स्थिति थी, वहां से? यह भी समझना बाकी है कि यह विश्वास बहाली के मकसद से उठाया जा रहा एक तात्कालिक कदम भर है, या इसे देर तक कायम रखने का इरादा है। एक महत्वपूर्ण सवाल भारतीय सीमा के अंदर चल रहे निर्माण कार्यों का भी है। बफर जोन बनाने के लिए भारतीय सेना अपनी मौजूदा स्थिति से डेढ़ किलोमीटर पीछे हटती है, तो क्या उसकी जद में ये प्रॉजेक्ट भी आएंगे? जाहिर है इस इलाके में सड़कों और पुलों का निर्माण भारत के दूरगामी राष्ट्रीय हितों से जुड़ा है और इनका किसी वजह से अटकना देश के लिए रणनीतिक नुकसान साबित होगा।

बहरहाल, भारत-चीन सीमा पर शांति की जरूरत से किसी भी स्थिति में इनकार नहीं किया जा सकता। यह अच्छी बात है कि दोनों पक्षों ने इस बात को स्वीकार करते हुए शांति की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू किए हैं। सीमा पर न्यूनतम समझ कायम करने के बाद बातचीत के जरिए आपसी विवाद सुलझाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है। हिंसक झड़प की घटना के बाद तनावपूर्ण माहौल के बीच भी भारत ने अलग-अलग तरीकों से यह बात स्पष्ट कर दी है कि अपनी एक-एक इंच जमीन को लेकर वह पूरी तरह सजग है। इसलिए चीन को या किसी को भी इस मामले में कोई गफलत नहीं पालनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट है कि चाहे कुछ भी हो जाए, पर भारत और चीन हमेशा एक-दूसरे के पड़ोसी ही रहेंगे। लड़ाई दोनों को विकास की दौड़ में बहुत पीछे धकेल देगी, जबकि आपसी दोस्ती के जरिये वे अब भी इक्कीसवीं सदी को एशिया की सदी बना सकते हैं।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।
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Thursday, January 16, 2020

आखिर मिले हाथ

अमेरिका और चीन के बीच लगभग दो साल के ट्रेड वॉर के बाद हुए व्यापार समझौते की खबर से दुनिया ने राहत की सांस ली है। इसे समझौते का पहला चरण कहा जा रहा है, जिसके तहत चीन व्यापार शुल्क का एक हिस्सा हटाए जाने की एवज में अगले दो साल में अमेरिका से 200 अरब डॉलर की सालाना खरीदारी करेगा। इसमें 50 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद भी शामिल हैं, जो अमेरिकी चुनाव में भावनात्मक मुद्दे का रूप ले सकते हैं। इसके अलावा अमेरिकी बौद्धिक संपदा अधिकार का सम्मान करने और अपनी मुद्रा की विनिमय दरों में कृत्रिम बदलाव न करने की बात चीन बाकायदा लिखकर दे रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने मुद्रा के साथ छेड़छाड़ करने वाले देश का बिल्ला चीन से पहले ही हटा लिया था।

दुनिया की दोनों चोटी की अर्थव्यवस्थाओं में तनाव 22 जनवरी 2018 को शुरू हुआ, जब ट्रंप ने चीन में बने सौर पैनलों और वाशिंग मशीनों पर शुल्क लगाने की घोषणा कर दी। इसके बाद एक-दूसरे पर जवाबी शुल्क का हमला शुरू हो गया। इस व्यापार युद्ध में अमेरिका ने चीन से आने वाले 550 अरब डॉलर के उत्पादों पर शुल्क बढ़ा दिया, जबकि चीन ने ऐसी ही कार्रवाई अमेरिका से आने वाली 185 अरब डॉलर की वस्तुओं पर की। अमेरिका ने चीन पर टेक्नॉलजी चोरी करने और अपनी मुद्रा की कीमत नीचे रखने का आरोप भी लगाया। दरअसल, अमेरिका और ज्यादातर पश्चिमी देश तकनीक के मामले में चीन की रफ्तार से खासे परेशान हैं।

अमेरिका ने ट्रेड वॉर की आड़ लेकर उसकी तकनीकी प्रगति में अड़ंगा डालने की चाल चली लेकिन जल्द ही इसका खामियाजा खुद अमेरिका को ही भुगतना पड़ गया। पिछले कुछ समय से अर्थशास्त्रियों की यह गुहार अलग-अलग कोनों से सुनाई देने लगी है कि पूरे विश्व में स्लोडाउन आ रहा है, जिसकी कुछ जवाबदेही चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर पर भी आती है। इससे अमेरिकी वोटरों में संदेश यह जा रहा है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपनी जिद के चलते वर्ल्ड इकॉनमी को खतरे में डाल दिया है। चुनावी साल में ट्रंप यह कलंक अपने सिर नहीं लेना चाहते। कई सर्वेक्षणों से साबित हुआ है कि अमेरिकियों का एक बड़ा तबका ट्रेड वॉर को नापसंद करता है।

चीन भले ही अमेरिका से उतना न खरीदता हो जितना उसे बेचता है, लेकिन अमेरिका के कई उद्योगों और उनमें मौजूद नौकरियों का अस्तित्व चीन से आने वाले अधबने सामानों पर ही निर्भर करता है। यही नहीं, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेड के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि सामानों की बढ़ी कीमतों के चलते एक औसत अमेरिकी परिवार पर सालाना 6 हजार डॉलर का बोझ बढ़ गया है। इन बातों ने ट्रंप को अपने कदम वापस खींचने पर मजबूर किया है। बहरहाल, यह समझौते की शुरुआत है और देर-सबेर इसके दूसरे चरण के लिए भी बातचीत शुरू हो जाएगी। उम्मीद करें कि इससे विश्व व्यापार में जो सकारात्मक माहौल बनेगा, उसकी लहर ट्रेड वॉर को पूरी तरह खत्म कर देगी।

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Thursday, December 12, 2019

ब्रिटेन में क्या है आम चुनाव की प्रक्रिया और कैसे बनती है सरकार, जानें सबकुछ (नवभारत टाइम्स)


गुरुवार को ब्रिटेन में आम चुनाव कराए जा रहे हैं। यह चार साल के अंदर तीसरा चुनाव है। ब्रिटेन की दो बड़ी पार्टियां कंजरवेटिव और लेबर आमने सामने हैं। आइए समझते हैं कि ब्रिटेन में आम चुनाव की प्रक्रिया क्या है और वहां सरकार कैसे गठित होती है।

ब्रिटेन में आज यानी गुरुवार को आम चुनाव हो रहे हैं। ब्रिटेन की दो बड़ी पार्टियां कंजरवेटिव और लेबर आमने सामने हैं। इस बार माना जा रहा है कि सरकार बनाने में भारतीय मूल के निवासियों की अहम भूमिका रहेगी। इस लिहाज से पार्टियों ने भी भारतीयों को विशेष तौर पर हिंदुओं को रिझाने में कसर नहीं छोड़ी। आइए जानते हैं कि ब्रिटेन में आम चुनाव किस तरह से कराए जाते हैं।

हाउस ऑफ कॉमन्स
भारत में जिस तरह से लोकसभा सांसद का चुनाव होता है उसी तरह ब्रिटेन में लोग हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए अपने सांसद का चुनाव करते हैं। ब्रिटेन में कुल 650 संसदीय क्षेत्र हैं। इनमें से 533 क्षेत्र इंग्लैंड में, 59 स्कॉटलैंड में, 40 वेल्स में और18 नॉर्दर्न आयरलैंड में हैं।

कब होते हैं चुनाव
पार्ल्यामेंट ऐक्ट के मुताबिक ब्रिटेन में भी पांच साल के अंतर पर आम चुनाव होते हैं। इस हिसाब से अगला चुनाव 5 मई 2022 में होना था लेकिन ब्रेग्जिट को लेकर समीकरण कुछ इस तरह बने कि मध्यावधि चुनाव की घोषणा करनी पड़ी। पूर्व प्रधानमंत्री टरीजा में ने भी यूरोपीय संघ से अलग होने में कठोरता बनाने के लिए मध्यावधि चुनाव करवाए थे। टरीजा मे को चुनाव में बहुमत नहीं मिला और फिर बोरिस जॉनसन प्रधानमंत्री बने जुलाई में अल्पमत सरकार का कामकाज संभाला। लेबर पार्टी भी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी।


चार साल में तीसरा आम चुनाव
कंजरवेटिव पार्टी यूरोपीय यूनियन से अलग होने के पक्ष में है। टरीजा मे ने बहुमत के लिए चुनाव करवाए लेकिन वह असफल रहीं। अब जॉनसन चाहते हैं कि उन्हे चुनाव में बहुमत मिले और वह ब्रेग्जिट का फैसला मजबूती से कर पाएं। उन्होंने अपने घोषणा पत्र में ब्रेग्जिट का जिक्र पहले नंबर पर किया है।

कैसे गठित होती है सरकार
आम तौर पर जिस पार्टी की सीटें ज्यादा होती हैं वही ब्रिटेन में सरकार बनाती है। भारत की तरह वहां भी कम सीटें जीतने पर भी पार्टी अन्य पार्टियों के साथ मिलकर अल्पमत सरकार बना सकती है। इसके बाद प्रधानमंत्री पद के लिए एक प्रतिनिधि चुना जाता है जो कि पहले से भी घोषित हो सकता है। प्रधानमंत्री विभिन्न विभागों के लिए प्रभारियों की नियुक्ति करता है और उनमें से ही वरिष्ठ लोग कैबनेट में शामिल होते हैं। प्रधानमंत्री का चयन महारानी करती हैं।

बड़ी पार्टियां
ब्रिटेन में मुकाबल कंजरवेटिव पार्टी और लेबर पार्टी के बीच है। इसके अलावा लिबरल डेमोक्रेट्स, स्कॉटिश नैशनल पार्टी भी मैदान में हैं। ज्यादातर ओपिनियन पोल में कंजरवेटिव पार्टी को आगे दिखाया गया है। ब्रिटेन में बहुमत का जादुई आंकड़ा 326 सीटों का है। सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को बढ़त मिलती दिख रही है।

कौन दे सकता है वोट?
भारत की ही तरह ब्रिटेन में भी 18 साल के ऊपर के वे लोग्य जिन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में रजिस्टर कराया हो वोट डाल सकते हैं। 16 साल की आयु सीमा के बाद रजिस्ट्रेशन कराया जा सकता है, हालांकि वोट देने का अधिकार 18 साल की उम्र के बाद ही मिलता है। इसके लिए ब्रिटेन का नागरिक होना जरूरी है। कॉमनवेल्थ देशों और आयरलैंड के वे नागरिक जो ब्रिटेन में रहते हों, भी वोट दे सकते हैं।

अहम है भारतीयों की भूमिका
माना जा रहा है कि इस बार ब्रिटेन के भारतीय मूल के निवासियों का सरकार बनाने में अहम रोल होगा। यहां भारतीयों की बड़ी आबादी रहती है। कंजरवेटिव पार्टी हिंदुओं को भी रिझाने में सक्षम रही है। वहीं लेबर पार्टी ने कश्मीर पर भारत विरोधी बयान देकर हिंदुओं को अपने खिलाफ खड़ा कर लिया है। ब्रिटेन में कंजरवेटिव पार्टी ने 25 भारतीय मूल के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है वहीं लेबर ने 13 उम्मीदवारों को उतारा है।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स ।
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