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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Wednesday, March 24, 2021

आतंक के विरुद्ध (जनसत्ता)

जम्मू-कश्मीर में थोड़े दिनों के अंतराल पर आतंकी संगठनों की हरकतें अब आम घटना की तरह होती जा रही हैं। लेकिन बीते कुछ समय में एक बड़ा फर्क यह आया है कि पहले जहां हमला करने के बाद आतंकियों के गिरोह आसानी से बच निकलते थे, अब उन्हें भारतीय सुरक्षा बलों की ओर से जवाबी हमले की तीव्रता का सामना करना पड़ता है। खासतौर पर पुलवामा में हुए आतंकी हमले में सीआरपीएफ के चालीस से ज्यादा जवानों की मौत की घटना के बाद अब आतंकियों के लिए कोई मौका नहीं छोड़ा जा रहा है।

चौकसी और निगरानी का दायरा बढ़ाने के साथ अब किसी आतंकी घटना को अंजाम देने के पहले ही सुरक्षा बल तेजी से कार्रवाई करते हैं और हमले को या तो नाकाम करते हैं या फिर आतंकियों को मार डाला जाता है। इसी क्रम में मंगलवार को एक और बड़ी कामयाबी तब मिली, जब जम्मू-कश्मीर में शोपियां के मनिहाल गांव में लश्कर-ए-तैयबा के चार आतंकियों के छिपे होने की खुफिया जानकारी के आधार पर सुरक्षा बलों ने धावा बोला। तलाशी अभियान के दौरान आतंकियों ने सुरक्षा बलों पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों ने चार आतंकियों को मार गिराया।

जम्मू-कश्मीर के समूचे इलाके में आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिहाज से इस ताजा घटना को सुरक्षा बलों की एक बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है कि जब से जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति हुई है, तब से वहां काम कर रहे अलगाववादी समूह कभी आम लोगों के बीच भावनाएं भड़का कर तो कभी आतंकी संगठनों का सहारा लेकर इलाके में उथल-पुथल पैदा करने की कोशिश में हैं।

कुछ समय के अंतराल पर छोटी या बड़ी आतंकी वारदात के सहारे वे जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता पैदा होने जैसा माहौल बनाना चाहते हैं, ताकि विश्व समुदाय के सामने भारत की गलत छवि पेश की जा सके। लेकिन सुरक्षा बलों ने अलगाववादी और आतंकी संगठनों के तालमेल से चलने वाली ऐसी राजनीति की हकीकत को समझा है और वे समय रहते जरूरी कार्रवाई करके ऐसी मंशा को ध्वस्त करते हैं।

सवाल है कि लश्कर-ए-तैयबा के जिन चार आतंकियों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया, उनका मकसद इसके सिवा और क्या रहा होगा कि वे कहीं मासूम और निर्दोष लोगों या फिर सुरक्षा बलों पर हमला करके इस इलाके में अराजकता फैलने या अस्थिर होने का संदेश दुनिया को दे सकें। जबकि पिछले कुछ समय से वहां अब पहले के मुकाबले जन-जीवन सामान्य होने लगा है और लोग खुद को सहज महसूस करने लगे हैं। मगर राज्य में स्थिरता और शांति शायद अलगाववादी और आतंकी संगठनों के लिए अनुकूल स्थिति नहीं है।

इतना तय है कि जम्मू-कश्मीर और सीमा के समूचे इलाके में भारतीय सुरक्षा बलों की चौकसी और निगरानी का जो स्तर है, उसमें आतंकी संगठनों का पांव जमाना संभव नहीं है। यह छिपा नहीं है कि लश्कर-ए-तैयबा या फिर जैश-ए-मुहम्मद जैसे आतंकी संगठन पाकिस्तान स्थित ठिकानों से अपनी गतिविधियां संचालित करते रहे हैं। इस तरह की हरकतों के सबूत सामने आने पर पाकिस्तान को अक्सर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फजीहत झेलनी पड़ती है।

इसके बावजूद अब भी वह इन आतंकी संगठनों को संरक्षण देने की कोशिश करता है। इसके अलावा, हाल में मारे गए कुछ आतंकियों के पास से बुलेट प्रूफ जैकेट तक को भेदने वाली जिस तरह की चीनी गोलियां और सामग्री बरामद की जा रही हैं, उससे ऐसा लगता है कि अब चीन की ओर से भी इस तरह की आतंकी हरकतों को बढ़ावा दिया जाने लगा है। जाहिर है, भारतीय सुरक्षा बलों के सामने आतंकी संगठनों की चुनौतियां अब भी कम नहीं हुई हैं।

सौजन्य - जनसत्ता।
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टीकाकरण का दायरा (जनसत्ता)

केंद्र सरकार ने कोरोना महामारी निपटने के लिए टीकाकरण अभियान का दायरा और बढ़ा दिया है। अब एक अप्रैल से पैंतालीस वर्ष से ऊपर के सभी लोग कोरोना का टीका लगवा सकेंगे। टीकाकरण अभियान में तेजी लाने के लिए यह जरूरी भी था कि इसका दायरा बढ़ाया जाए और ज्यादा से ज्यादा लोग टीका लगवा सकें।

अभी तक पैंतालीस साल से ऊपर के वही लोग टीका लगवा सकते थे जिन्हें पहले से कोई गंभीर बीमारी थी और इस कारण उन्हें संक्रमण का खतरा ज्यादा था। देश में एक बार फिर जिस तेजी से संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है और कोरोना की दूसरी लहर का खतरा सामने है, उसे देखते हुए जितनी जल्दी पूरी आबादी को टीका दिया जा सके, उतना बेहतर होगा और काफी हद तक लोगों को संक्रमित होने से बचाया जा सकेगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि कोरोना को हराने के लिए जरूरी है कि इससे बचाव के उपायों का सख्ती से पालन हो और लोगों को टीका भी लगे। बचाव के उपाय जहां संक्रमण को फैलने से रोकने में सहायक हैं, वहीं टीका व्यक्ति के भीतर संक्रमण के खतरे को कम करने में मददगार है। टीकाकरण कार्यक्रम को चरणबद्ध तरीके शुरू करने के पीछे मकसद यही था कि जिनको टीके की सबसे ज्यादा जरूरत है, उन्हें पहले दिया जाए।


स्वास्थ्यकर्मियों और अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को इसलिए दिया जाना जरूरी था कि यही लोग अस्पतालों में कोरोना मरीजों के इलाज में लगे हैं और इसलिए सबसे ज्यादा खतरा भी इन्हें है। टीका नहीं आने से पहले कई चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों को संक्रमण की वजह से जान से हाथ भी धोना पड़ा। हालांकि शुरू में टीकाकरण को लेकर लोगों में झिझक और भय भी देखने को मिला, यहां तक कि चिकित्साकर्मी खुद टीका लगवाने से बचते दिखे। पहली खुराक दबाव में लेने के बाद दूसरी खुराक नहीं लेने के मामले भी सामने आए। इस कारण अभियान की रफ्तार उतनी तेज नहीं हो पाई जितनी कि होनी चाहिए थी। लेकिन अब लोगों में टीकाकरण को लेकर जागरूकता भी आई है और टीके के प्रतिकूल प्रभावों को लेकर उत्पन्न डर भी कम हुआ है। इसलिए अब ज्यादातर राज्यों में टीकाकरण जोर पकड़ रहा है।

इस वक्त सबसे बड़ी जरूरत है टीकाकरण की मुहिम को प्रोत्साहित करने की। इसके लिए लोगों को जागरूक करने के अलावा टीकाकरण की सुविधाओं और इसके बेहतर प्रबंधन पर भी ध्यान देना होगा। लोगों को टीका लगवाने के लिए घर से काफी दूर के अस्पतालों में न जाना पड़े, यह विशेष रूप से खयाल रखने की आवश्कता है। कई अस्पतालों में टीकों के रखरखाव का समुचित इंतजाम नहीं होने की वजह से टीके खराब हो जाने की खबरें आर्इं।

जितने समय में उनका उपयोग हो जाना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। यह दुखद स्थिति है। टीकों के रखरखाव का प्रबंधन इस तरह हो कि एक भी टीका बर्बाद न जाए। अभी खतरा यह है कि ज्यादातर राज्यों में लोग मास्क लगाने और सुरक्षित दूरी जैसे जरूरी नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, खासतौर से उन राज्यों में तो स्थिति और भयावह है जहां चुनाव प्रचार चल रहा है और चुनावी सभाओं में पहुंचने वाले नेताओं से लेकर सभाओं में आने वाली भीड़ एकदम लापरवाह बनी हुई है। हरिद्वार में लाखों लोग कुंभ में पहुंच रहे हैं। ऐसे में कोरोना संक्रमण ने अगर विस्फोटक रूप ले लिया तो गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। इसलिए देश में जितना जल्दी और तेजी से टीकाकरण होगा, हम खतरे से उतना ही बच सकेंगे।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Tuesday, March 23, 2021

कोरोना का दंश (जनसत्ता)

गुजरे एक साल में कोरोना संकट ने करोड़ों भारतीयों को गरीबी के दलदल में धकेल दिया है। महामारी फैलने से तो हालात भयावह हुए ही, उससे भी बुरा असर यह पड़ा कि आमजन का जीवन पटरी से उतर गया और माली हालत दयनीय होती चली गई। महामारी से उपजे इस आर्थिक संकट ने लोगों को किस कदर बेहाल कर दिया, इसका पता भारतीय रिजर्व बैंक के हाल के एक आकलन से चलता है।

केंद्रीय बैंक ने अर्थशास्त्रियों ने बताया है कि पिछले एक साल में बड़ी संख्या में भारतीय परिवार कर्ज में डूब गए और बचत की दर में भी भारी गिरावट आई। परिस्थितिों के कारण यह दुश्चक्र बनना ही था। देश में पूर्णबंदी लागू होने से आर्थिक गतिविधियां एकदम से ठहर गर्इं थी। ऐसे में लोग क्या करते? गुजारा चलाने के लिए कर्ज और अपनी थोड़ी-बहुत बचत ही एकमात्र सहारा रह गए थे। यह संकट अभी खत्म नहीं हुआ है।

चालू वित्त वर्ष के आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि कोरोना संकट से अर्थव्यवस्था कैसे चौपट होती चली गई। पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद शून्य से चौबीस फीसद तक नीचे चला गया था। सबसे बड़ा और गंभीर संकट तो यह खड़ा हुआ कि पूर्णबंदी के कारण देश के ज्यादातर छोटे और मझौले उद्योग धंधे बंद हो गए थे। इनमें से कई तो आज भी चालू नहीं हो पाए हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था का पचास फीसद से ज्यादा हिस्सा छोटे उद्योगों और असंगठित क्षेत्र पर ही निर्भर है।


इनका नब्बे फीसद कारोबार नगदी पर चलता है। इसमें काम करने वालों की तादाद भी सबसे ज्यादा है। औद्योगिक प्रतिष्ठान बंद होने से कामगारों की छुट्टी कर दी गई। ऐसे में लोगों के समक्ष रहने से लेकर खाने तक संकट खड़ा हो गया और इसी वजह से लाखों प्रवासी कामगार अपने घरों को लौटने को विवश हुए थे। गैर-सरकारी क्षेत्र में ज्यादातर कंपनियों ने खर्च में कटौती और नुकसान का हवाला देते हुए लोगों को नौकरियों से निकाला और कर्मचारियों के वेतन में भारी कटौती की। यह मध्यवर्ग और निन्मवर्ग के लिए संक्रमण से भी ज्यादा बड़ा संकट बन गया। ऐसे में लोगों के सामने बचत के पैसे ही घर चलाने की मजबूरी रह गई। लाखों लोगों को भविष्य निधि तक से पैसे निकालने को मजबूर होना पड़ा। ऐसे में लोग कहां से पैसा बचाते?

पिछले एक साल में अर्थव्यवस्था में मांग, उत्पादन, खपत और बचत बुरी तरह से प्रभावित हुई है। जिनके पास पैसा है भी, वे आज भी भविष्य को लेकर आशंकित हैं। इसलिए लोग अभी भी बहुत जरूरी मदों में ही खर्च कर रहे हैं। लोगों को घर, कार आदि के कर्ज की किस्तें चुकाना भारी पड़ रहा है। करोड़ों लोगों के सामने नियमित आमद का संकट बना हुआ है। जब तक लोगों के पास रोजगार नहीं होगा और नियमित आय की गांरटी नहीं होगी, तब तक किसी के लिए भी बचत या निवेश के बारे में सोच पाना तो सपना ही होगा।

बचत के बारे में लोग तभी सोच सकते हैं जब नियमित और अच्छी आय हो। पर अब हालात साल भर पहले जैसे नहीं रह गए हैं। अब महंगाई ने आमजन की कमर तोड़ दी है। केंद्र और राज्य सरकारें अलग अपनी कंगाली का रोना रो रही हैं। इस वक्त सबसे बड़ी जरूरत रोजगार सृजन के उपायों पर काम करने की है, ताकि लोगों को काम मिले और उनके हाथ में पैसा आना शुरू हो। वरना आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी के दलदल में और धंसता चला जाएगा।

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शराब का कहर (जनसत्ता)

किसी त्रासद घटना का सबसे बड़ा सबक यह होना चाहिए कि भविष्य में वैसा न होने के सभी इंतजाम किए जाएं। लेकिन हमारे यहां आम लोगों से लेकर कानून-व्यवस्था पर अमल सुनिश्चित कराने वाले महकमों, संबंधित अधिकारियों और यहां तक कि सरकारों की नींद तब खुलती है, जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है या त्रासद घटना सामने आ जाती है। उससे पहले तक सभी अपनी धुन में लापरवाही में लीन रहते हैं।

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ समय से जहरीली शराब पीने की वजह से कई लोगों की जान जाने की कई घटनाएं सामने आती रहीं। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि सरकार और प्रशासन को ऐसी घटनाओं पर काबू पाने के लिए कोई ठोस कदम उठाना जरूरी क्यों नहीं रह रहा है। नतीजा यह है कि एक बार फिर राज्य में चित्रकूट के खोपा गांव में जहर की मिलावट वाली शराब पीने की वजह से पांच लोगों की मौत हो गई।

जान गंवाने वाले लोगों ने गांव की ही एक दुकान से शराब खरीद कर पी थी। जाहिर है, वहां लोग आमतौर पर शराब खरीदते रहे होंगे और उसकी बिक्री के लिए कोई नियम-कायदे तय नहीं रहे होंगे। इस पर किसी की निगरानी नहीं होगी कि वहां किस गुणवत्ता की शराब किन नियमों के तहत बिक रही है।

सवाल है कि इसके नियमन और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी? अब लोगों की जान जाने की घटना के तूल पकड़ने के बाद एक रस्मी कार्रवाई के तहत कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित करके सरकार की ओर से सख्ती बरतने का संदेश दिया गया है। लेकिन नाहक लोगों के मारे जाने के बाद इस तरह की औपचारिक कार्रवाइयां क्या ऐसी घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए काफी हैं? ऐसा नहीं है कि इस तरह की यह कोई पहली घटना है जिसमें लोगों ने विषाक्त शराब पी ली हो और उसमें कई परिवारों पर दुख का पहाड़ गिर गया।

अक्सर ऐसे मामले सामने आते रहते हैं, जिनमें लोगों ने स्थानीय स्तर पर बनाई जाने वाली या फिर अन्य मिलावटी शराब खरीद कर पी और उसकी जान चली गई। ऐसा लगता है कि शराब के निर्माण और उसकी बिक्री को लेकर अगर कोई नियमन और निगरानी की व्यवस्था है तो जमीनी स्तर पर वह अनुपस्थित है और जहरीली शराब के कारोबारियों को मनमानी करने के लिए खुला छोड़ दिया गया है। आखिर ऐसा पुलिस और प्रशासन के संबंधित और जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत के बिना कैसे संभव हो सकता है?

अफसोस की बात यह है कि देश भर में जहरीली शराब से मौत की घटनाएं आज एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जो महज इसलिए हो रही हैं कि कुछ लोग बेलगाम मुनाफा कमाना चाहते हैं और इसके नियमन और रोकथाम के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी या पुलिस महकमे के अफसर किसी सौदेबाजी या फिर लापरवाही के चलते अपनी आंखें मूंदे रहते हैं। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि देश के जिन राज्यों में शराब पर कानूनन पाबंदी है, वहां भी विषाक्त शराब पीकर लोगों की मरने की घटनाएं अक्सर सामने आती हैं।

आखिर यह सब किसकी अनदेखी और किसके संरक्षण में चलता है? कायदे से देखें तो किसी भी कोने में कोई छोटा कारोबार करने वाला भी पुलिस और प्रशासन की निगरानी की जद में होता है। जरूरत पड़ने पर पुलिस कहीं भी छिपे आरोपियों या अपराधियों को खोज निकालती है। लेकिन किसी बड़ी त्रासदी या फिर आपराधिक घटना के बाद ही प्रशासनिक अमले में सक्रियता क्यों आती है और उन लोगों को पकड़ कर कार्रवाई की जाती है, जो बिना किसी बड़ी बाधा के मौत या बीमारी का कारोबार चलाते रहते हैं।

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Monday, March 22, 2021

खतरे की सड़क (जनसत्ता)

सड़क सुरक्षा के मामले में एक बार फिर भारत को दुनिया के कुछ सबसे खस्ताहाल देशों में शुमार किया गया है। अंतरराष्ट्रीय चालक प्रशिक्षण एजेंसी जुतोबी के अध्ययन के मुताबिक खतरनाक सड़कों के मामले में भारत चौथे स्थान पर है। पहले स्थान पर दक्षिण अफ्रीका को पाया गया है। सड़कों की स्थिति, वाहन चलाने का सलीका और सड़क दुर्घटना में होने वाली मौतों आदि के आधार पर यह अध्ययन किया गया है।

यातायात नियमों का पालन सुनिश्चित कराने, अनुशासित और मर्यादित ढंग से वाहन चलाने की संस्कृति विकसित करने के उद्देश्य से यातायात नियमों को काफी कठोर बनाया गया। उनके उल्लंघन पर भारी जुर्माने और दंड का प्रावधान किया गया। महानगरों में सड़कों पर कैमरे से निगरानी की व्यवस्था की गई। मगर इन सबके बावजूद स्थिति यह है कि सड़कों पर मनमाने तरीके से वाहन चलाने की प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लग पाया है।

शराब या दूसरे तरह के नशे करके वाहन चलाना, गति सीमा का ध्यान न रखना, लाल बत्तियों का उल्लंघन करना जैसे लोग शान की बात समझते हैं। यही वजह है कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं में लोगों के मारे जाने की दर चिंताजनक है। जितने लोग कैंसर जैसी बिमारी से नहीं मरते, उससे अधिक सड़क हादसों की वजह से जान गंवा बैठते हैं।

इसके अलावा हमारे यहां सड़कों की दशा भी किसी से छिपी नहीं है। विचित्र है कि हर राजनीतिक दल और सरकार का जोर बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर होता है। उसमें सड़कों के विकास पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाता है। तेज रफ्तार से चलने लायक सड़कों का निर्माण न सिर्फ आम लोगों के सुचारु आवागमन के लिहाज से जरूरी माना जाता है, बल्कि औद्योगिक विकास में भी इससे मदद मिलती है।

इसलिए विकसित देशों की तरह हमारे यहां भी सड़कों को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने पर जोर दिया जाता रहा है। इसमें अनेक निजी और विदेशी कंपनियों को भी शामिल किया गया। उन्हें सड़कें बनाने, उनका रखरखाव करने और टोल के जरिए अपनी लागत वसूलने का अधिकार दिया गया। इससे देश में राष्ट्रीय मार्गों का तेजी से विकास भी हुआ। मगर स्थिति यह है कि राजमार्गों पर गड्ढों और पशुओं, पैदल चलने वालों की वजह से दुर्घटनाएं भी आए दिन होती रहती हैं। इसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय निजी कंपनियों को फटकार भी लगा चुका है कि जब वे टोल वसूलती हैं, तो उन्हें सड़कों पर गड्ढों को भरने और सड़कों को सुविधाजनक बनाने की अपनी जिम्मेदारी भी उठानी चाहिए। मगर अदालतों की फटकार का शायद उन पर कोई असर नहीं हुआ।

सड़कों पर टूट-फूट की एक बड़ी वजह भारत जैसे देश में मौसम को माना जाता है। यहां तेज गरमी, खूब ठंड और बारिश के चलते सड़कों में टूट-फूट जल्दी होती है। मगर इसे कोई बड़ा कारण नहीं माना जाना चाहिए। हकीकत यह है कि बहुत सारी सड़कें वाहनों की प्रकृति और उन पर पड़ने वाले बोझ का ठीक-ठीक आकलन किए बिना बना दी जाती हैं, जिसके चलते वे दबाव पड़ते ही दरक जाती हैं। उनमें गड्ढे बनने शुरू हो जाते हैं।

फिर राजमार्गों के किनारे सुरक्षित बाड़ नहीं लगाई जाती, जिससे पशु सड़कों पर आ जाते हैं, बरसात में वाहन फिसल कर दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं। उल्टी दिशा में चलने वाले वाहन भी दुर्घटनाओं का बायस बनते हैं। इसमें सबसे चिंताजनक बात नशे की हालत में और मनमाने तरीके से वाहन चलाने की वजह से होने वाली दुर्घटनाएं हैं। कड़े कानूनों के बावजूद अगर इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लग पा रही, तो इस पहलू पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

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रिश्तों की रणनीति (जनसत्ता)

अमेरिका के रक्षा मंत्री लॉयड जे आॅस्टिन के भारत दौरे ने दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते रिश्तों को रेखांकित किया है। आॅस्टिन का यह दौरा ऐसे वक्त में हुआ है जब वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य एक बड़ा बदलाव देख रहा है और महाशक्तियां नई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों से रूबरू होती दिख रही हैं। ऐसे में बिना आपसी सहयोग के किसी की गाड़ी नहीं चल सकती। इसलिए भारत और अमेरिका को अब एक दूसरे का पूरक भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए।

अमेरिका में बाइडेन के सत्ता संभालने के बाद किसी रक्षा मंत्री का यह पहला भारत दौरा है। अमेरिकी रक्षा मंत्री की भारत यात्रा इस बात का भी संदेश है कि न सिर्फ एशिया प्रशांत क्षेत्र में बल्कि दुनिया में शांति, स्थायित्व और खुशहाली के लिए बाइडेन प्रशासन भारत को एक बड़े रणनीतिक साझेदार के रूप में स्वीकार कर चुका है। अमेरिका यह भी देख रहा है कि भारत उसके लिए एक बड़ा बाजार है, विशेषरूप से हथियार और सैन्य साजोसामान बेचने के लिए। डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल मंं भारत और अमेरिका के बीच जो रक्षा समझौते हुए थे, उन्हें अब बाइडेन प्रशासन अमली जामा पहनाने में लगा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वक्त अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता चीन है। चीन के साथ उसका व्यापार युद्ध अभी जारी है। ट्रंप के कार्यकाल में चीन और अमेरिका के रिश्ते जिस तरह से बिगड़े, वे अब बाइडेन प्रशासन के लिए चुनौती बने हुए हैं। हाल में अलास्का में हुई अमेरिका और चीन के राजनयिकों की वार्ता से भी अच्छे संकेत नहीं आए। चीन की विस्तारवादी नीतियों से अमेरिकी की नींद उड़ी हुई है। दक्षिण चीन सागर से लेकर एशिया प्रशांत क्षेत्र तक में चीन अपने सामरिक गढ़ों को मजबूत बना रहा है।

पिछले दिनों क्वाड समूह (अमेरिका, भारत, आॅस्ट्रेलिया और जापान) के शिखर सम्मेलन में भी अमेरिका का असली निशाना चीन पर ही था। इसलिए अब अमेरिका का सारा जोर चीन के बढ़ते कदमों को रोकने पर है और इसके लिए वह भारत को सबसे बड़े और मजबूत सहयोगी के रूप में चिह्नित कर चुका है। भारत भी लंबे समय से चीन के षड़यंत्रों का शिकार है। चीन न सिर्फ भारतीय सीमा क्षेत्रों में घुसपैठ कर नए विवादित क्षेत्र खड़े करने की रणनीति पर चल रहा है, बल्कि पाकिस्तान को भी भारत के खिलाफ उकसाने से बाज नहीं आ रहा। इसलिए एक दूसरे के साथ आना अब अमेरिका और भारत दोनों की जरूरत और मजबूरी है।

आॅस्टिन के दौरे की बड़ी उपलब्धि दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग के रूप में देखी जा रही है। अब अमेरिका न सिर्फ एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाएगा, बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान तक पर नजर रखने के लिए मध्य कमान को और ज्यादा सशक्त बनाएगा और यह काम भारत के सैन्य सहयोग से ही संभव होगा। सामरिक लिहाज से भारत की स्थिति महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील है।

भारत को केंद्र में रख कर अमेरिका धरती के एक तिहाई से ज्यादा हिस्से में अपनी सैन्य स्थिति मजबूत कर सकता है। पिछले साल अक्तूबर में दोनों देशों के बीच सैन्य डाटा साझा करने और भारत को क्रूज व बैलेस्टिक मिसाइलों की तकनीक देने को लेकर बनी सहमति वाला ह्यबेसिक एक्सचेंज एंड कोआॅपरेशन एग्रीमेंट आॅन जिओस्पेशियल कोआॅपरेशनह्ण (बीका) चौथा रक्षा समझौता हुआ था। हालांकि रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली खरीदने के भारत के फैसले से अमेरिका खुश नहीं है। पर इससे उसे परेशान क्यों होना चाहिए? बल्कि अमेरिका को चाहिए कि वह स्वार्थ की दोस्ती से ऊपर उठते हुए और भारत के हितों का खयाल रखते हुए पाकिस्तान के प्रति सख्त नीति अपनाए।

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इंधन और प्रदूषण: अर्थ से अनर्थ तक (जनसत्ता)

प्रदूषण का खतरा जब मौत के भायवह आंकड़ों के तौर पर जाहिर होने लगे तो मान लेना चाहिए कि बात खतरे के निशान से काफी ऊपर पहुंच गई है। अकेले हवा में प्रदूषण की बात करें तो इसमें एक बड़ी भूमिका जीवाश्म ईंधन की है, जिसके इस्तेमाल से होने वाले प्रदूषण की वजह से दुनिया को रोजाना 57 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। यह लागत वैश्विक अर्थव्यवस्था का 3.3 फीसद है। एक पर्यावरणीय अनुसंधान समूह के अध्ययन रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। इसमें कहा गया है कि भारत में वायु प्रदूषण के कारण हर साल दस लाख लोगों की मौत हो रही है।

सेंटर फॉर रिसर्च आॅन एनर्जी एंड क्लीन एअर (सीआरईए) और ग्रीनपीस-साउथ ईस्ट एशिया द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में तेल, गैस और कोयले से होने वाले वायु प्रदूषण के नुकसान का आकलन किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदूषण के कारण चीन को सालाना 64 लाख लाख करोड़, अमेरिका को 42 लाख करोड़ और भारत को 11 लाख करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी कहना है कि हर साल दुनियाभर में जीवाश्म र्इंधन को जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण की चपेट में आने से 45 लाख लोगों की मौत होती है। इसमें 28 लाख लोगों की मौत सिर्फ दो देशों चीन और भारत में हो रही है।

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Saturday, March 20, 2021

प्राथमिक शिक्षा और बदहाल स्कूल (जनसत्ता)

आजादी के सात दशक बाद भी अगर देश के बहुत सारे सरकारी स्कूलों में पीने का पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद नहीं हैं तो यह अपने आप में सरकार की नीति-रीतियों पर एक बड़ा सवाल है कि शिक्षा का मसला उसके सरोकारों में किस प्राथमिकता पर है। यों सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे को लेकर पहले भी तमाम प्रश्न उठते रहे हैं और अक्सर सरकार इस समस्या को दूर करने का आश्वासन देती रही है। लेकिन आज भी हालत यह है कि देश के बयालीस हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा नहीं है, जबकि पंद्रह हजार से अधिक स्कूलों में शौचालय भी नहीं है।

गुरुवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने एक सवाल के जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अक्सर आर्थिक चकाचौंध की तस्वीर के जरिए हर ओर विकास का जो दावा किया जा रहा है, उसके पीछे कौन-से सबसे जरूरी क्षेत्र को बदहाली के बीच छोड़ दिया गया है। गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों के दौरान देश भर में हर घर शौचालय को लेकर एक व्यापक अभियान चलाया गया, जिसके तहत बड़ी संख्या में लोगों ने अपने घरों में शौचालय बनवाए। मगर देश भर के हजारों सरकारी स्कूलों पर सरकार की निगाह क्यों नहीं पड़ी, जहां हर रोज सैकड़ों बच्चे पढ़ाई करने जाते हैं?

पिछले कुछ दशकों में ऐसे तमाम अध्ययन सामने आए, जिनमें यह बताया गया है कि सरकारी स्कूलों के प्रति बच्चों का आकर्षण कम होने का कारण वहां पेयजल और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। जिन स्कूलों में ये सुविधाएं होती भी हैं उनमें से ज्यादातर जगहों पर आमतौर पर साफ-सफाई की हालत यह होती है कि उसका उपयोग एक तरह का जोखिम ही होता है। खासतौर पर शौचालयों में पानी का अभाव उसके होने को बेमानी बना देता है। ऐसी स्थिति में सरकारी स्कूलों की दशा-दिशा अगर दयनीय दिखती है तो इसमें हैरान होने वाली बात नहीं है। एक अहम तथ्य यह है कि स्कूलों में पेयजल और शौचालयों के अभाव का असर यों तो वहां पढ़ने वाले सभी बच्चों पर पड़ता है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित बालिकाएं होती हैं। बल्कि बालिकाओं के स्कूली पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने के एक महत्त्वपूर्ण कारणों में स्कूलों में शौचालयों का नहीं होना भी पाया गया है।


दूसरी ओर, शिक्षा का अधिकार अधिनियम के नियमों में स्कूलों में निर्धारित मानकों के तहत पेयजल और शौचालय की सुविधा सहित बुनियादी ढांचे की सभी चीजें अनिवार्य रूप से प्रदान करने की बात कही गई है। यह सुनिश्चित करना सभी सरकारों का दायित्व है। लेकिन अगर अब भी इतनी बड़ी तादाद में सरकारी स्कूल इन बुनियादी सुविधाओं तक से वंचित हैं, तो इसकी जिम्मेदारी किस पर आती है?


सवाल है कि अगर स्कूलों में बुनियादी ढांचे के अभाव की इस तस्वीर की वजह से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई बाधित होती है और इस तरह शिक्षा के अधिकार कानून का हनन होता है तो इसके कौन और किसके प्रति जवाबदेह होगा! विडंबना यह है कि एक ओर अर्थव्यवस्था के ऊंचे ग्राफ और बाजार की चकाचौंध का हवाला देकर देश के एक बड़ी आर्थिक शक्ति होने की तस्वीर पेश की जाती है, दूसरी ओर ऐसे तमाम स्कूल हैं, जहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। सवाल है कि इस तरह के मानदंडों पर हुए विकास को कैसे आंका जाएगा? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पेयजल और शौचालय जैसी सबसे अनिवार्य सुविधाओं सहित बुनियादी ढांचे के सभी पहलुओं की मजबूती के बगैर बेहतर शैक्षिक माहौल और शिक्षा मुहैया नहीं कराई जा सकती। और इस तरह का शैक्षिक ढांचा आखिरकार देश की बुनियाद को ही कमजोर करेगा!

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पाकिस्तान सेना प्रमुख और उनकी दोस्ती की बात! (जनसत्ता)

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने भारत के साथ रिश्तों को लेकर अचानक से जो रुख बदला है और दोस्ती का हाथ बढ़ाने की बातें की हैं, वह अच्छी बात है और ऐसा होना भी चाहिए। लेकिन जनरल बाजवा भारत के खिलाफ जिस कट्टर रुख के लिए जाने जाते हैं, उसे देखते हुए उनकी ये बातें हैरानी ज्यादा पैदा करती हैं। पिछले कुछ समय में प्रधानमंत्री इमरान खान भी इसी तरह की बातें करके यह जताते रहे हैं कि पाकिस्तान भारत के साथ अच्छे संबंधों का पक्षधर है।

इमरान खान ने जब सत्ता संभाली थी, तब भी वे बढ़-चढ़ कर ऐसी बातें करते थे और मौका मिलते ही यह कहने से चूकते नहीं थे कि रिश्तों की बेहतरी के लिए अगर भारत एक कदम आगे बढ़ेगा तो पाकिस्तान दो कदम बढ़ेगा। लेकिन वे अपने वादों और दावों पर कितने खरे उतरे, यह किसी से छिपा नहीं है। सवाल है कि आखिर पाकिस्तान का अचानक से हृदय परिवर्तन कैसे हो गया, क्यों उसे लगने लगा कि पड़ोसी देश भारत के साथ दोस्ताना रिश्ते रखने चाहिए। क्या दुनिया के सामने अपनी धूमिल छवि को साफ करने के लिए वह ऐसा कर रहा है, या फिर वह किसी के दबाव में इस रणनीति पर चल रहा है?

हाल में इस्लामाबाद संवाद में विदेशी प्रतिनिधियों और राजनयिकों के समक्ष अपने संबोधन में पाक सेना प्रमुख ने भारत के साथ बातचीत शुरू करने और बेहतर रिश्ते बनाने की बातें कह कर पाकिस्तान को एकदम पाक साफ बताने की कोशिश की है। यह कोई छिपी बात नहीं है कि लंबे समय से पाकिस्तान भारत को गहरे जख्म देता रहा है। ऐसे में अगर अब वह शांति की दुहाई देने लगे तो संशय पैदा होना लाजिमी है। आखिर भारत कैसे भूल सकता है पुलवामा की घटना को, या संसद भवन से लेकर मुंबई तक में कराए गए आतंकी हमलों को।


इन सब हमलों के आरोपी आज भी पाकिस्तान में सेना और आइएसआइ के संरक्षण में मौज काट रहे हैं। भारत ने सभी आरोपियों के खिलाफ पाकिस्तान को पुख्ता सबूत दिए, लेकिन किसी के खिलाफ भी पाकिस्तान ने आज तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं की, न ही हमलों के आरोपियों को भारत के हवाले किया। ऐसे में पाकिस्तान कैसे यह कल्पना कर रहा है कि भारत पिछली बातों को भूल कर अब आगे बढ़े और उसके साथ अच्छे रिश्ते बनाए!


अगर जनरल बाजवा की मंशा वाकई साफ होती तो वे अच्छे संबंधों की बातों के बीच कश्मीर का राग नहीं अलापते। कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, इसमें दुनिया के किसी को कोई संशय होना ही नहीं चाहिए। बल्कि पाकिस्तान को चाहिए कि वह कश्मीर में आंतकियों की घुसपैठ करवाए। पाकिस्तान हमेशा से कश्मीर को आड़ बना कर वार्ताओं को पटरी से उतारता रहा है और भारत के शांति प्रयासों के जवाब में करगिल युद्ध जैसे घाव दिए हैं। पाक सेना की निगरानी में चलने वाले सीमापार आंतकवाद और संघर्षविराम उल्लंघन की घटनाओं में हजारों निर्दोष भारतीय मारे गए हैं।

आखिर भारत इन सब बातों को कैसे भुला सकता है! दरअसल, पाकिस्तान इस वक्त वित्तीय कार्रवाई बल (एफएटीएफ) के जाल में फंस चुका है। उसने अपने यहां मौजूद आतंकियों के नेटवर्क का सफाया नहीं किया तो जल्दी ही उसे निगरानी सूची से हटा कर काली सूची में डाल दिया जाएगा। इससे उसे हर तरह की विदेशी मदद मिलना बंद हो जाएगी। घरेलू मोर्चे पर इमरान सरकार पहले ही संकटों में घिरी है। विपक्षी दलों के प्रदर्शनों ने सरकार की नींद उड़ा रखी है। अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठ चुका है। इसलिए अब बाजवा को भारत के साथ अच्छे रिश्तों का इल्म हुआ लगता है।

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Friday, March 19, 2021

चिंता की दूसरी लहर (जनसत्ता)

लग रहा था कि अब कोरोना संक्रमण का खतरा टल गया है। पूरे देश से संक्रमण के घटते हुए आंकड़े आने लगे थे। इस बीच कोरोना के टीके लगने शुरू हुए तो विश्वास बनता गया था कि इस विषाणु को अब जड़ से उखाड़ फेंकने में मदद मिलेगी। मगर अचानक फिर इसने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। रोज इसका रुख उठान पर नजर आने लगा है।

बुधवार को साढ़े चौंतीस हजार से अधिक मामले दर्ज हुए। देश के करीब सत्तर जिले सबसे अधिक प्रभावित हैं। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, केरल, पंजाब आदि कुछ राज्यों में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इसे कोरोना की दूसरी लहर बताया जा रहा है। कुछ राज्य रात का कर्फ्यू और कुछ जगहों पर बंदी तक का कदम उठाने लगे हैं। महाराष्ट्र के कुछ इलाके इस विषाणु की चपेट में अधिक देखे जा रहे हैं। इसलिए वहां कुछ शहरों में सख्त बंदी की गई है। इस दूसरी लहर के खतरों को देखते हुए स्वाभाविक ही प्रधानमंत्री ने बुधवार को राज्यों के मुख्यमंत्रियों को संबोधित करते हुए आह्वान किया कि इसे रोकने के लिए जितना जल्दी हो सके, व्यावहारिक कदम उठाने की जरूरत है।

यों कोरोना का संक्रमण पूरी तरह कभी खत्म नहीं हुआ था, कुछ जगहों पर काफी कम जरूर हो गया था। इस विषाणु की उपस्थिति कमोबेश हर जगह बनी हुई थी। इसलिए बार-बार सावधानी बरतने की हिदायत दी जा रही थी। मगर ज्यादातर लोगों ने जैसे मान लिया था कि बंदी हटने का मतलब है कि कोरोना का खतरा समाप्त हो गया। बाजारों, सार्वजनिक वाहनों आदि में पहले की तरह भीड़भाड़ और धक्का-मुक्की शुरू हो गई। महाराष्ट्र में संक्रमण के मामले लगातार सबसे अधिक दर्ज हो रहे थे, मगर वहां लोगों में लापरवाही का आलम बना रहा।


इसलिए इसके फिर से फैलने का वातावरण बना और सरकारों के सामने चुनौती पेश आने लगी है कि इस पर कैसे काबू पाया जाए। पूर्णबंदी के परिणामों को देखते हुए अब कोई भी सरकार पूरी तरह से बाजार, कार्यालय, सार्वजनिक वाहनों को बंद करने का फैसला नहीं करना चाहेगी। ऐसे में आम लोगों से ही अपेक्षा की जाती है कि वे खुद सावधानी बरतें। मगर फिर भी लोग मनमानी से बाज नहीं आ रहे, तो कुछ कड़े कदम उठाने पड़ रहे हैं। विचित्र है कि दूसरों की न सही, लोगों को अपनी सेहत की भी चिंता नहीं हो रही।

कोरोना के टीके पूरे देश में लगाए जा रहे हैं, अब तो निजी अस्पतालों में भी कुछ पैसे खर्च करके इन्हें लगाने की सुविधा उपलब्ध है। इसके बावजूद लोगों में इसे लेकर हिचक बनी हुई है। शुरू में कुछ विपक्षी दलों और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों ने इन टीकों पर कुछ सवाल क्या उठा दिए, लोगों का भ्रम गाढ़ा होता गया। मगर इस बीच में इन टीकों के गंभीर दुष्परिणाम नजर नहीं आए हैं, फिर भी लोग इसके लिए आगे नहीं आ रहे। इसकी वजह से टीके की खुराक रोज भारी मात्रा में बर्बाद जा रही है।

जो समस्याएं लोगों की जागरूकता और आपसी सहयोग से दूर की जा सकती हैं, उनके लिए भी अगर सरकारों और अदालतों को कठोर कदम उठाने पड़ें, तो इसे कोई अच्छी बात नहीं माना जा सकता। कोरोना की दूसरी लहर उठने के पीछे बड़ा कारण लोगों का अपेक्षित सावधानी न बरतना है। अगर वे उचित दूरी बनाए रखने, नाक-मुंह ढकने, हाथ धोते रहने और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले आहार लेने, दिनचर्या ठीक रखने, टीका लगवाने का प्रयास करें, तो वे इस समस्या से पार पाने में काफी मददगार साबित हो सकते हैं।

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तंग नजर (जनसत्ता)

आमतौर पर स्त्रियों के पहनावे को लेकर पुरुषों की ओर से ऐसी प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं, जिनसे लगता है कि हमारे समाज में व्यक्तिगत चुनाव को लेकर लोग आसानी से सहज नहीं हो पाते। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले से खबर आई कि वहां की एक पंचायत ने लड़कियों के जींस पैंट पहनने पर पाबंदी और इसे नहीं मानने पर जुर्माना लगाने की घोषणा कर दी।

एक प्रगतिशील समाज में यह उम्मीद की जाती है कि लोग स्त्री और पुरुष के बीच बराबरी के मूल्यों को स्वीकार करें और उसे बढ़ावा दें। यह सांस्कृतिक विकास-यात्रा का हिस्सा होता है, जिसमें समाज का नेतृत्व करने वाले लोगों की भूमिका बेहद अहम होती है। मगर अफसोस की बात यह है कि कई बार खुद जनता की नुमाइंदगी करने वाले लोग ही ऐसे तंगनजरी के वाहक बन जाते हैं। कुछ दिन पहले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने महिलाओं के आधुनिक शैली के जींस पैंट पहनने पर जिस तरह की अवांछित टिप्पणी की, वह न केवल उनके पद और मर्यादा के प्रतिकूल है, बल्कि किसी की व्यक्तिगत पसंद के अधिकार के खिलाफ भी है।

संभव है कि एक व्यक्ति अपनी विचार-प्रक्रिया के दायरे में किसी खास जीवनशैली और तयशुदा वेशभूषा को परंपरा और संस्कार का पर्याय मानता हो। लेकिन एक लोकतांत्रिक समाज का तकाजा यह है कि दूसरों की पसंद, सुविधा और चुनाव का भी सम्मान किया जाए। विविधता के प्रति सहज रह कर ही व्यक्ति लोकतांत्रिक, आधुनिक और प्रगतिशील हो सकता है।

यों भी किसी परिधान से विवेक, सोच-समझ, संवेदनशीलता आदि तय नहीं होते। जिस पहनावे को हम पारंपरिक और संस्कृति का उच्चतम मानक मान रहे होते हैं, उसे पहनने वाला व्यक्ति अपने व्यवहार में सामंती और पिछड़े मूल्यों का वाहक हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि मानवीय संवेदनाओं से लैस और बराबरी पर आधारित प्रगतिशील विचारों की जमीन मजबूत हो। कोई भी वस्त्र इसमें बाधक नहीं बनता।

आधुनिकता सोच, विवेक और व्यवहार में संवेदनशीलता पर निर्भर करती है, न कि पहनावे पर। समाज में प्रचलित परंपराओं में संकीर्णता पर आधारित चलन और बराबरी को बाधित करने वाली सोच को दूर करने की जिम्मेदारी नेताओं पर होती है। लेकिन जब खुद वे ही ऐसी संकीर्णताओं को बढ़ावा देने लगे तो सवाल उठाना लाजिमी है।

यों भी एक प्रगतिशील समाज समय के साथ चलता है, उसमें हो रहे बदलावों को अपनी जीवन-स्थितियों के अनुकूल पाता है तो उसे स्वीकार करता है और ऐसी स्थितियां बनाता है, जिसमें अलग-अलग लोग अपने चयन के प्रति सजग रहें तो दूसरों की पसंद को लेकर सहज भी रहें। लेकिन अपने सोचने-समझने के तौर-तरीके और सीमाओं की वजह से अन्य की पसंद को खारिज करना या फिर उसकी वजह से उसे कमतर बताना संकीर्णता का परिचायक है। आमतौर पर परंपरागत मानस में जीने वाले हमारे समाज में आधुनिक दौर के मुताबिक हो रहे बदलावों को लेकर लोग सहज नहीं रहते हैं और कई बार उसका विरोध भी करते हैं।

खासतौर पर स्त्रियों की जीवनशैली और पहनावे में कुछ नया देख कर बहुत सारे पुरुषों के भीतर नकारात्मक भाव आते हैं और इसके लिए वे स्त्रियों को परंपरा का पाठ भी पढ़ाने लगते हैं। जबकि वक्त के साथ चलने वाले पुरुषों के प्रति लोगों का नजरिया सामान्य और स्वीकार-भाव में रहता है। जाहिर है, ऐसा परंपरागत तौर पर चली आ रही पितृसत्तात्मक मानसिकता और उसमें स्त्रियों के प्रति संकीर्ण दृष्टि और कुंठाओं की वजह से होता है। जबकि होना यह चाहिए कि बदलती दुनिया में जरूरत के मुताबिक हर उस नए चलन के प्रति सहज रहा जाए, जो व्यक्ति और समाज को मानवीय और संवेदनशील बनाने में मददगार हो।

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Thursday, March 18, 2021

जहरीली हवा (जनसत्ता)

वायु प्रदूषण के मामले में भारत के शहरों की दिनोंदिन बदतर होती स्थिति बड़े खतरे का संकेत है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया के सबसे ज्यादा तीस प्रदूषित शहरों में से बाईस शहर भारत के हैं और इनमें भी ज्यादातर इलाके वे हैं जो दिल्ली से सटे हैं और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आते हैं।

स्विस टेक्नोलॉजी कंपनी आइक्यूएअर ने एक सौ छह देशों में वायु गुणवत्ता पर किए गए अध्ययन में बताया है कि दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी है वायु प्रदूषण के मामले में और भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है। ऐसे शोध अध्ययनों के नतीजे और वायु गुणवत्ता सूचकांक हर साल आते हैं और दिल्ली सहित भारत के शहरों की स्थिति भी कमोबेश यही रहती है। शहरों की हवा लगातार खराब हो रही है, यह तो चिंता का विषय है ही, लेकिन इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि पिछले कई सालों से चली आ रही इस स्थिति में सुधार जरा भी नहीं आया है, बल्कि हालात बिगड़ते जा रहे हैं।

आइक्यूएअर की रिपोर्ट बता रही है कि उत्तर भारत के राज्यों हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार आदि में हालात ज्यादा विकट हैं। उत्तर प्रदेश के आठ शहरों का दुनिया के तीस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल होना बेहद गंभीर स्थिति का संकेत है। कानपुर और लखनऊ की हालत तो इतनी खराब है कि कौन-सा शहर ज्यादा प्रदूषित है, यह देखने-बताने का कोई मतलब नहीं रह जाता। मुख्य बात यही है कि उत्तर भारत के ज्यादातर शहरों में वायु प्रदूषण के कारण हालात खराब हैं और इन शहरों के लोग जहरीली हवा में सांस लेने को विवश हैं।

अक्तूबर से दिसंबर तक तो उत्तर भारत के ज्यादातर राज्य धुएं की चादर में लिपटे रहते हैं। यह धुआं पराली जलाने, कारखानों और वाहनों से इस्तेमाल होने वाले र्इंधन और कूड़ा जलाने से पैदा होता है। इसलिए अगर भारत के शहर गंभीर वायु प्रदूषण की मार झेल रहे हैं तो उसकी बड़ी वजह यही है कि इन राज्यों की सरकारें घोर लापरवाह हैं और प्रदूषण से निपटना उनकी प्राथमिकता नहीं लगता। वरना आज ऐसी हालत नहीं होती कि लाखों लोग हर साल सिर्फ वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों से मर जाएं।

वायु प्रदूषण को कम करने के उपायों को लेकर हालांकि पिछले कुछ सालों में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को कसा है। किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों को सख्ती बरतने को कहा गया। पर्यावरण मंत्रालय भी सतर्क हुआ, लेकिन इन सबका बहुत उत्साहवर्धक नतीजा देखने को नहीं मिला। आज भी किसान पराली जला रहे हैं और सरकारें देख रही हैं।

कूड़ा जलाने की घटनाएं तो आम हैं। पुराने वाहन देशभर में समस्या बने हुए हैं। लाखों ऐसे वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं जिनकी अवधि पूरी हो चुकी है और सरकारों के पास ऐसा कोई इंतजाम नहीं है जो इन्हें सड़क पर न आने दे। ज्यादातर शहरों में प्रदूषण फैलाने वाले छोटे-बड़े उद्योग धड़ल्ले से चल रहे हैं। ऐसे में प्रदूषण बढ़ेगा ही।

इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रदूषण की समस्या सरकारों की लाचारी और लापरवाही की देन है। कई मामलों में जनता की लापरवाही और अज्ञानता देख कर भी निराशा होती है। बिना जनसहयोग के प्रदूषण तो क्या, किसी समस्या से नहीं निपटा जा सकता। अगर शहरों को प्रदूषणमुक्त बनाना है तो इसके लिए हर स्तर पर सतत प्रयासों की जरूरत है। ठोस योजनाएं बनें, उन पर ईमानदारी से अमल हो और नियम-कायदों को सख्ती से लागू कराया जाए, तभी हम प्रदूषण के खिलाफ जंग जीत पाएंगे।

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हिंसा का रास्ता (जनसत्ता)

अपने गंतव्य की ओर जाने के लिए सड़कों पर वाहन चलाता व्यक्ति क्या इतना उतावला और हिंसक हो सकता है कि बेहद मामूली टक्कर या विवाद के बाद किसी की जान ले ले या फिर अपनी जान दे दे? कोई भी होशमंद व्यक्ति शायद ऐसा नहीं करेगा। लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान दिल्ली या दूसरे शहरों-महानगरों में यह स्थिति एक चिंताजनक प्रवृत्ति के रूप में उभरी है।

लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिसमें किसी साधारण बात या वाहनों में बिना नुकसान वाली टक्कर के बाद लोग जानलेवा हिंसा पर उतारू हो गए। मंगलवार को दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में एक स्कूटी और एक मोटरसाइकिल के बीच मामूली टक्कर से उपजे विवाद ने ऐसी हिंसक शक्ल ले ली, जिसमें दो युवकों की चाकू से गोद कर हत्या कर दी गई। स्थानीय इलाके में सीसीटीवी कैमरे लगे होने की वजह से इस हत्या में लिप्त एक नाबालिग सहित एक अन्य युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि इतनी साधारण बातों पर हुआ विवाद आखिर इस कदर जानलेवा अंजाम तक कैसे पहुंच जाता है!

ताजा घटना सड़क पर बेलगाम रोष से थोड़ी अलग इसलिए है कि जिन युवकों ने चाकू से गोद कर दो युवकों की हत्या कर दी, वे संभवत: ऐसी स्थिति पैदा होने पर जानलेवा हिंसा यानी जघन्य अपराध तक करने के लिए तैयार थे। लेकिन सच यह है कि सड़क पर वाहनों में मामूली टक्कर, गलत तरीके से आगे निकलने, रफ्तार आदि बहुत छोटी बातों पर हुए विवाद के हिंसक शक्ल अख्तियार कर लेने की घटनाएं अब आम हो चुकी हैं और ऐसा पढ़े-लिखे लोग भी करते पाए जाते हैं।

ऐसी घटनाओं की महज तात्कालिक रोष का नतीजा बता कर अनदेखी कर दी जाती है, मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि शहरों-महानगरों में अब यह समस्या खतरनाक रूप लेती जा रही है। सड़क पर जा रहा कोई व्यक्ति खुद पर तो नियंत्रण रख सकता है, लेकिन दूसरे व्यक्ति के वाहन चलाने या उसके व्यवहार पर उसकी लगाम नहीं होती। नतीजतन, कई बार एक पक्ष शांति से विवाद को टालना भी चाहता है तो रोब या अकड़ की वजह से दूसरा पक्ष हिंसा पर उतर जाता है। सवाल है कि क्या कभी यह सोचा जाता है कि हादसों के अलावा सड़कों पर दौड़ती यह प्रवृत्ति भी लोगों के लिए बेहद खतरनाक और कई बार जानलेवा साबित हो रही है?

करीब तीन साल पहले सड़क पर बेलगाम होते गुस्से और बढ़ती हिंसक घटनाओं के मद्देनजर इस पर केंद्रित एक कानून बनाने की मांग उठी थी। लेकिन अफसोस की बात यह है कि ऐसी घटनाओं पर रोक के लिए अकेले कोई सख्त कानून भी शायद नाकाफी हो। दरअसल, यह लोगों के व्यवहार की समस्या है और इसकी जड़ें समाज में पल-बढ़ रही दूसरी वैसी स्थितियों से भी जुड़ी हैं, जिसमें विवेक और सूझ-बूझ के लिए जगह लगातार कम होती गई है।

किसी छोटी बात पर खुद पर काबू खोकर हिंसक हो जाने वाले व्यक्ति के पास यह समझ पाने का भी विवेक नहीं रह जाता है कि उसकी उत्तेजना और हिंसा के अंजाम में उसकी जान जा सकती है या फिर वह किसी की हत्या कर दे सकता है। उसके बाद कानूनी कार्रवाई की जद में उसकी बाकी जिंदगी भी बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। जाहिर है, इस मसले पर सख्त कानून के साथ-साथ व्यवहार और विवेक संबंधी विचारों से लैस जागरूकता कार्यक्रम भी व्यापक पैमाने पर चलाने की जरूरत है। विवेक का इस्तेमाल न केवल व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि उसके बेहतर और सभ्य इंसान बनने में भी मददगार साबित हो सकता है।

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Wednesday, March 17, 2021

दिल्ली की कमान (जनसत्ता)

पिछले कुछ वर्षों के दौरान दिल्ली में अलग-अलग मुद्दों पर फैसले लेने के सवाल पर सरकार और उपराज्यपाल के बीच कई मौकों पर स्पष्ट टकराव देखे गए। इसमें एक सवाल मुख्य रहा कि दिल्ली की जनता से जुड़े मुद्दों पर फैसला लेने और उस पर मंजूरी देने का अंतिम अधिकार आखिर किसके पास है। इस मसले पर सरकार को अक्सर यह शिकायत रही कि दिल्ली के विकास कार्यों को लेकर वह जो भी नीतिगत फैसले लेती है, उस पर बिना किसी मजबूत आधार के उपराज्यपाल की ओर से अड़चन खड़ी की जाती है।

जबकि उपराज्यपाल अपने पद से जुड़ी जिम्मेदारी के तहत इस तरह के दखल को वैध बताते रहे। इस पर खासी जद्दोजहद के बाद अधिकारों की लड़ाई का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और जुलाई, 2018 में शीर्ष अदालत ने स्थिति स्पष्ट कर दी कि दिल्ली के उपराज्यपाल के पास स्वतंत्र फैसले लेने का अधिकार नहीं है और उन्हें मंत्रिपरिषद के सहयोग और सलाह पर कार्य करना चाहिए। इसके अलावा, अदालत ने यह भी कहा कि भूमि, कानून-व्यवस्था और पुलिस को छोड़ कर दिल्ली सरकार के पास अन्य सभी विषयों पर कानून बनाने और उसे लागू करने का अधिकार है। यानी एक तरह से अदालत ने दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या कर दी।

इसके बावजूद बीते कुछ समय से अनेक ऐसे मौके आए जब दिल्ली में विकास कार्यों पर कोई फैसला लेने या उस पर अमल करने को लेकर सरकार और उपराज्यपाल के बीच खींचतान चलती रही। अब सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लोकसभा में इससे संबंधित जो विधेयक पेश किया है, उसमें उपराज्यपाल को अधिक शक्तियां देने का प्रावधान है। दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक, 2021 के तहत दिल्ली के विधानसभा में पारित कानूनों या मंत्रिपरिषद के फैसलों को लागू करने से पहले उपराज्यपाल को ‘जरूरी मौका’ देने की बात कही गई है।

जाहिर है, अगर यह विधेयक पारित हो जाता है तो दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल को कोई भी कानून लागू करने से पहले उपराज्यपाल की ‘राय’ पर निर्भर होना पड़ेगा। हालांकि पहले भी विधानसभा में कानून पास होने के बाद उपराज्यपाल के पास भेजा जाता था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह महज सूचना देने की औपचारिकता तक सीमित था। लेकिन अब अगर यही पक्ष बाध्यता या नियम के तहत लागू होगी तो स्वाभाविक रूप से यह इस मसले पर दिल्ली सरकार की भूमिका महज औपचारिक रह जाएगी और मुख्य शक्ति उपराज्यपाल के पास केंद्रित रहेगी। यानी व्यवहार में उपराज्यपाल को सरकार के तौर पर देखा गया है।

सवाल है कि केंद्र सरकार के इस कदम के बाद दिल्ली में सरकार का जो ढांचा रहेगा, उसमें जनता के प्रति किसकी जवाबदेही रहेगी! क्या यह दिल्ली में चुनी हुई सरकार की भूमिका को कमजोर करने की कोशिश है? अगर दिल्ली में विधानसभा के लिए चुनाव होंगे तो उसमें शामिल पार्टियों के जनता से वोट मांगने का आधार क्या होगा? मौजूदा व्यवस्था में उपराज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर काम करते हैं।

एक ओर केंद्रीय शक्ति उपराज्यपाल के हाथों में रहेगी, दूसरी ओर दिल्ली और केंद्र में दो विरोधी पार्टियों की सरकार होगी तो ऐसे में मुद्दों पर मतभेद के चलते कामकाज और नीतिगत फैसलों पर अमल को लेकर आखिरी जवाबदेही किसकी और किसके प्रति होगी? जनता के सामने अगर अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगने की नौबत आएगी तो वैसी स्थिति में वह किसी उपलब्धि या कमी के लिए किसे जिम्मेदार ठहराएगी? इस विधेयक के पेश होने के साथ ही ऐसे तमाम सवाल उभरना स्वाभाविक है।

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महंगाई की मार (जनसत्ता)

लंबे समय से लोग इस इंतजार में हैं कि अब तो महंगाई कम हो और राहत मिले। लेकिन हाल में आए थोक और खुदरा महंगाई के आकंड़े जो हालात बयां कर रहे हैं, उनसे नहीं लगता है कि निकट भविष्य में महंगाई से निजात मिलने वाली है। इस साल फरवरी में थोक महंगाई की दर 4.17 फीसद तक पहुंच गई, जो जनवरी में 2.03 फीसद थी, यानी एक ही महीने में दो गुनी से ज्यादा। चिंताजनक यह है कि फरवरी में थोक महंगाई दर पिछले सत्ताईस महीनों में सबसे ज्यादा रही।

इससे पहले नवंबर 2018 में थोक महंगाई दर 4.47 फीसद तक चली गई थी। अगर खुदरा महंगाई दर की बात करें तो यह और सिर चढ़ कर रुला रही है। फरवरी की खुदरा महंगाई दर पांच फीसद से ऊपर रही। कहा जा रहा है कि प्याज, दालों, दूध, फल, सब्जियों, पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ने से थोक महंगाई बढ़ी है। पिछले कुछ समय में पेट्रोल और डीजल के दामों ने आम आदमी पर जो कहर बरपाया है, उसका नतीजा महंगाई के रूप में देखने को मिल रहा है। लेकिन लगता है कि महंगाई की मार झेल रही विशालकाय आबादी की पीड़ा शायद सरकार के कानों तक नहीं पहुंच रही। वरना सरकार कुछ तो ऐसे कदम उठाती जो राहत देने वाले होते।

पेट्रोल और डीजल महंगा होने के साथ ही रोजमर्रा की जरूरत वाली चीजें भी महंगी होती चली जाती हैं। हर सामान का दाम सीधे ढुलाई से जुड़ा है। आम आदमी को महंगाई इसलिए भी ज्यादा रुलाती है कि डीजल के दाम बढ़ते ही उन चीजों के दाम आसमान छूने लगते हैं जिनके बिना गुजारा संभव नहीं है, जैसे- दूध, सब्जियां, फल, दालें, प्याज। शराब, सिगरेट महंगी हो जाएं, या कारें और दूसरे उपभोक्ता सामान महंगे होते रहें तो इतना असर नहीं पड़ता।


लेकिन जब गरीब की थाली पर भी महंगाई की बेरहमी दिखने लगेगी तो वह क्या खा पाएगा? रसोई गैस सिलेंडर दो महीने में ही सवा दो सौ रुपए तक महंगा हो गया। यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में करोड़ों की आबादी ऐसी है जिसकी आमदनी औसत दस हजार रुपए महीना भी नहीं है। इसी में उसे रहने, खाने, कपड़े, दुख-बीमारी, बच्चों की शिक्षा, परिवहन का खर्च जैसी जरूरतें पूरी करनी होती हैं। ऐसे में यह कम चिंताजनक बात नहीं है कि कैसे एक आम परिवार अपना गुजारा कर पा रहा होगा! फिर पिछले एक साल में कोरोना महामारी संकट के कारण भी करोड़ों लोगों की माली हालत बदतर हो गई है। अभी भी बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हैं। ऐसे में महंगाई का चाबुक भी चल रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि हाल की महंगाई की जड़ पेट्रोल और डीजल के बढ़े हुए दाम हैं। तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने के तर्क दे रही हैं। लेकिन असल समस्या यह है कि लंबे समय से केंद्र और राज्य सरकारें पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क, मूल्य वर्धित कर (वैट) जैसे करों को थोप कर अपना खजाना भरने में लगी है। यह पैसा आम आदमी की जेब से ही निकल रहा है।

सरकारें इस हकीकत को बखूबी समझती हैं कि मरता क्या न करता। दूध, सब्जी और दालें तो लोग खरीदेंगे ही, चाहे कितनी महंगी क्यों न होती जाएं। जनता के प्रति यह असंवेदनशील रुख ही महंगाई में आग में घी का काम कर रहा है। पिछले दिनों वित्त मंत्री ने संसद में कहा था कि केंद्र और राज्यों को मिल कर पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले करों में कटौती करके लोगों को राहत देनी चाहिए। फिर पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में भी लाने की बातें उठीं। पर अब तो सरकार ने फिलहाल इससे मुंह ही फेर लिया है। ऐसे में कैसे महंगाई से निजात मिलेगी!

सौजन्य - जनसत्ता।
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Tuesday, March 16, 2021

रक्षक ही भक्षक (जनसत्ता)

इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है कि जिस पुलिस अफसर को महिलाओं के खिलाफ अपराध और अत्याचार पर रोक लगाने की विशेष ड्यूटी पर तैनात किया जाए, वह कार्रवाई के आश्वासन के बदले खुद ही पीड़िता से रिश्वत और यहां तक कि शारीरिक शोषण की मांग करे। लेकिन राजस्थान के जयपुर में महिला अत्याचार अनुसंधान इकाई में तैनात एक पुलिस उप-अधीक्षक ने ऐसी महिला के सामने यह शर्त रखी जो अपने यौन शोषण और उत्पीड़न का मामला लेकर मदद के लिए पुलिस के पास पहुंची थी।

कायदे से शिकायत पर गौर करने के बाद पुलिस को तुरंत सक्रिय होकर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी। लेकिन शायद ही किसी ने सोचा हो कि जिस अधिकारी को सरकार ने इस तरह के मामलों को सुनने और कार्रवाई करने के लिए विशेष रूप से तैनात किया था, वह अपने पद का फायदा इस रूप में उठाने की कोशिश कर सकता है। पीड़ित महिला की सजगता की वजह से गनीमत यह रही कि शिकायत के बाद राज्य भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने समय पर छापा मार कर आरोपी पुलिस अफसर को गिरफ्तार कर लिया।

निश्चित रूप से राज्य भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाई। लेकिन रक्षक के ही भक्षक बनने का यह कोई अकेला मामला नहीं है। करीब हफ्ते भर पहले सामने आई खबर के मुताबिक अलवर जिले के खेरली थाने में पति से विवाद की एक अर्जी लेकर थाने पहुंची महिला को वहां पदस्थापित एक उप-निरीक्षक ने कार्रवाई का झांसा देकर तीन दिन तक बलात्कार किया।

सवाल है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध और अत्याचार पर रोक लगाने की जिम्मेदारी जिन अफसरों को सौंपी जा रही है, क्या उनके व्यक्तित्व और मानसिकता के बारे में पुख्ता आकलन करना जरूरी नहीं है? क्या गारंटी है कि शिकायत लेकर थाने पहुंचने वाली और पहले से ही परेशानी और दुख से घिरी महिलाओं के साथ ऐसे अधिकारी बुरा बर्ताव नहीं करते होंगे! जयपुर में गिरफ्त में आया पुलिस अधिकारी पहले भी कई आरोपों के घेरे में रहा है। फिर सरकार या संबंधित महकमे के उच्चाधिकारियों ने किस आधार पर उसे पदोन्नति दी और उसे महिलाओं की शिकायत सुनने जैसे संवेदनशील काम की जिम्मेदारी सौंपी? आखिर राजस्थान सरकार महिलाओं के खिलाफ अपराधों और अत्याचारों के मामले में किस तरह का उदाहरण कायम करना चाह रही है?

दरअसल, समाज से लेकर सत्ता और प्रशासन के समूचे तंत्र में जिस तरह की स्त्री-द्वेषी मानसिकता ने पैठ बनाई हुई है, उससे जूझे बिना सरकारें महिलाओं को सुरक्षित माहौल देने का आश्वासन देती रहती हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराधों की प्रकृति जैसी होती है, उसमें जांच से लेकर कार्रवाई की समूची प्रक्रिया को निभाने की जिम्मेदारी भाषा और व्यवहार के स्तर पर विशेष रूप से प्रशिक्षित और स्त्रियों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील लोगों को सौंपी जानी चाहिए।

लेकिन यह छिपा नहीं है कि किसी स्थिति में जब महिलाएं कोई शिकायत लेकर पुलिस के पास पहुंचती हैं, तो उनकी पीड़ा सुनने से लेकर उस पर प्रतिक्रिया देने तक के मामले में पुलिस कर्मचारी और अधिकारियों का रवैया कैसा होता है। यह बेवजह नहीं है कि कई बार पीड़ित महिलाएं या तो पुलिस के पास नहीं जाती हैं या फिर चुप रह जाती हैं। समय-समय पर पुलिस तंत्र और उसकी कार्यशैली में सुधार के लिए आवाजें उठती रही हैं। लेकिन कार्यशैली में बदलाव और महिलाओं सहित गरीब और कमजोर तबकों की सामाजिक समस्याओं को लेकर पुलिस महकमे को संवेदनशील बनाने और प्रशिक्षित करने की पहल नहीं की गई। नतीजतन, आज भी उत्पीड़न की शिकायत लेकर मदद के लिए पुलिस के पास पहुंचने वाली महिलाओं के दोहरे शोषण और उत्पीड़न की घटनाएं अक्सर सामने आ रही हैं।

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किसानों के हमदर्द (जनसत्ता)

बिना किसी लागलपेट के बेबाकी से अपनी बात कह देने के लिए जाने जाते रहे वरिष्ठ राजनेता और मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने एक बार फिर किसानों के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की है। रविवार को गृह जिले बागपत में अपने अभिनंदन समारोह में मलिक ने खुल कर किसान आंदोलन का समर्थन किया और प्रधानमंत्री व गृह मंत्री को किसानों को और नाराज नहीं करने तक की नसीहत दे डाली।

मलिक ने यह कहने में कोई संकोच नहीं किया कि नए कृषि कानून किसी भी रूप में किसानों के हितों में नहीं हैं। यह कोई पहला मौका नहीं है जब वे किसानों के पक्ष में बोले हैं। डेढ़ महीने पहले भी उन्होंने केंद्र सरकार को सचेत करते हुए कहा था कि किसानों के आंदोलन को दबाने के बजाय उनकी चिंताओं को सुनना चाहिए। मलिक की इन चिंताओं का संदेश दूर तक जाता है। वे खुद एक किसान परिवार से हैं। ऐसे में भला किसानों के दुखदर्द को उनसे ज्यादा कौन समझ सकता है! किसान आंदोलन के मुद्दे पर साफगोई से वे जो कहते आए हैं, उसे हल्के में तो नहीं लिया जा सकता।

सत्यपाल मलिक इस वक्त संवैधानिक पद पर हैं। इस पद की अपनी गरिमा और सीमाएं हैं। इसलिए कोई सोच भी नहीं सकता कि एक राज्यपाल अतिसंवेदनशील मसले पर केंद्र सरकार को नसीहत देने वाली बातें कह सकता है। राज्यपाल यों भी केंद्र सरकार के प्रतिनिधि से ज्यादा कुछ नहीं होते और आमतौर पर वे उस सत्ता की हां में हां मिला कर ही चलते हैं जिसमें उन्हें यह पद नवाजा जाता है। लेकिन औरों से अलग सत्यपाल मलिक दूसरे मिजाज के रहे हैं।


वे सरकार से ज्यादा परवाह सच की करते हैं। उन्हें जो सच लगता है, उसे कहने में कोई संकोच नहीं होता, भले वह किसी की नजर में न्यायोचित हो या नहीं। जब वे जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल थे तो उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों की भूमिका पर टिप्पणी करते यहां तक कह डाला था कि कश्मीर में राज्यपाल के पास अब तक कोई काम नहीं होता था, वह दारू पीकर गोल्फ खेलता था। इसी तरह उन्होंने एक बार यह कह कर सनसनी फैला दी थी कि आतंकवादियों को निर्दोष जवानों को नहीं, बल्कि उन नेताओं और अफसरों को मारना चाहिए जिन्होंने कश्मीर को लूट कर खा लिया है।

जिस निष्पक्षता और मुखरता से मलिक ने किसानों की मांगों का समर्थन किया है, उससे यह संदेश तो जाता है कि किसान आंदोलन की मांगें अपनी जगह जायज हैं। कई पूर्व नौकरशाहों ने भी किसानों की मांगों को जायज बताया है। जाहिर है, नए कृषि कानूनों में कुछ तो ऐसा है जिससे किसान उद्वेलित हैं। मलिक की इस बात को कोई कैसे गलत कहेगा कि किसान प्रतिदिन गरीब होता जा रहा है और दूसरी ओर सरकारी अफसरों का वेतन नियत समय पर बढ़ता जाता है।

हकीकत तो यही है कि किसानों का बड़ा वर्ग गरीबी, कर्ज जैसी समस्याओं से घिरा है और इसीलिए किसानों को आत्महत्या जैसा कदम उठाने के मजबूर होना पड़ता है। किसान आंदोलन को साढ़े तीन महीने से ज्यादा हो चुके हैं। गतिरोध से कोई हल नहीं निकलने वाला, बल्कि समस्या और जटिल रूप लेती जा रही है। अगर सरकार को लगता है कि किसान एक दिन थक-हार कर लौट जाएंगे, तो यह भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं। मलिक ने उम्मीद के साथ कहा है कि अगर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून ही बना दे तो किसान मान जाएंगे। हो सकता है इसी में समाधान छिपा हो! इसलिए सरकार और किसानों को हठधर्मिता छोड़ कर एक बार फिर से वार्ता शुरू करनी चाहिए।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Monday, March 15, 2021

कीर्तिमान की ओर (जनसत्ता)

किसी भी क्षेत्र में, खासकर खेलों में कीर्तिमान बनाने के लिए पूरी लगन, समर्पण, अपने कौशल को निरंतर निखारते रहने की जरूरत होती है। वह भी जब कोई खिलाड़ी ऐसे खेल में अपनी काबिलीयत साबित करने के लिए संघर्ष कर रहा हो, जिसे दर्शकों, प्रायोजकों, सरकारी महकमों का समुचित समर्थन हासिल न हो, तो उसकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। एक ऐसे वक्त में जब क्रिकेट का मतलब सिर्फ पुरुषों का खेल समझा जाता था और उसी के प्रोत्साहन, प्रश्रय पर सारा ध्यान केंद्रित हुआ करता था, तब भारतीय महिला क्रिकेट टीम को मिताली राज जैसी खिलाड़ियों ने अपने दम पर पहचान दिलाई। मिताली ने अब अपने दम पर कीर्तिमान भी बना डाला है।

उन्होंने अपने अब तक के खेल जीवन में दस हजार से अधिक रन बना लिए हैं। मिताली से कुछ ही आगे इंगलैंड की शार्लोट एडवर्ड्स का रिकार्ड है। शार्लोट अब हर तरह के क्रिकेट से संन्यास ले चुकी हैं। इस तरह मिताली के उनसे आगे निकलने की उम्मीद स्वाभाविक है। इसके अलावा भी मिताली के नाम कई रिकार्ड दर्ज हैं, जैसे वे एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट में करीब सात हजार रन बनाने वाली एकमात्र खिलाड़ी हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा दो सौ बारह वनडे खेलने का रिकार्ड भी उन्हीं के नाम है।

इन कीर्तिमानों के बीच सबसे सराहनीय बात यह है कि मिताली ने एक ऐसे समय में क्रिकेट खेलना शुरू किया, जब महिला क्रिकेट को कोई अहमियत नहीं दी जाती थी। न तो उसके लिए प्रशिक्षक मिलते थे, न प्रायोजक, न दर्शक। क्रिकेट को सबसे अधिक कमाई वाला खेल माना जाता है, फिर भी महिला क्रिकेट को कहीं से प्रोत्साहन न मिल पाना, एक तरह से महिला खिलाड़ियों की क्षमता पर अविश्वास ही था।

पर मिताली जैसी खिलाड़ियों ने अपनी जिद और कौशल से लोगों को मानने पर मजबूर कर दिया कि उनमें भी दुनिया जीतने का दम है। हालांकि ऐसा नहीं कि दुनिया के अन्य देशों में महिला क्रिकेट टीमें नहीं थीं, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका की महिला क्रिकेट टीमें पूरे दमखम के साथ मैदान में थीं, पर भारत में महिला खिलाड़ियों के हुनर को बहुत बाद में पहचाना गया। खासकर दो साल पहले इंगलैंड में हुए विश्वकप में जब महिला क्रिकेट का टेलीविजन पर प्रसारण हुआ और दर्शकों ने बढ़चढ़ कर उसमें दिलचस्पी दिखाई, तब प्रायोजकों और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को भरोसा हो गया कि केवल पुरुष टीम नहीं, महिला टीम को भी बराबरी से प्रोत्साहन दिया जा सकता है।

हमारे देश और समाज में यह कोई पहली बार नहीं था कि महिला खिलाड़ियों को पुरुष खिलाड़ियों से कमतर आंका जा रहा था और उनके जरूरी साजोसामान, प्रशिक्षण आदि को लेकर कंजूसी या फिर हिचक देखी जाती थी। हालांकि तुलनात्मक रूप से देखें तो पुरुष टीम में कई खिलाड़ी मिताली और अन्य महिला खिलाड़ियों से पीछे नजर आएंगे, पर जब भी क्रिकेट की बात होती है, पुरुष टीम की उपलब्धियों को ही ऊपर रखा जाता है।

इसीलिए मिताली ने एक बार कहा भी था कि पुरुष टीम की अपनी क्षमता है और हमारी अपनी, उनसे तुलना करने के बजाय हमारी क्षमता को केंद्र में रख कर हमारे बारे में बात की जानी चाहिए। यही बेबाकपन, साहस और अपने को साबित करने की जिद मिताली को इस मुकाम तक लेकर आई है। पिछले करीब दो दशक तक लगातार खेलते रहना और अपनी क्षमता को कहीं कम न होने देना भी उनका बड़ा हासिल है। उनके कीर्तिमान से निस्संदेह देश का मान बढ़ा है।

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क्‍वाड का संदेश (जनसत्ता)

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए शुक्रवार को हुआ क्वाड देशों का पहला शिखर सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मील का एक पत्थर माना जाना चाहिए। क्वाड समूह के सदस्य देशों- भारत, अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया और जापान ने इस शिखर सम्मेलन के जरिए एशियाई क्षेत्र और प्रशांत व हिंद महासागर में शक्ति संतुलन स्थापित करने की जो कवायद शुरू की है, वह चीन के लिए साफ संदेश है कि अब उसे अपने विस्तारवादी कदमों से बाज आना होगा। शिखर सम्मेलन में चीन को लेकर अमेरिका और जापान का जो रुख रहा, उससे भी यह साफ हो जाता है कि आने वाले दिनों में चीन की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

शिखर सम्मेलन में सदस्य राष्ट्रों ने जिस तरह से प्राथमिकताओं को निर्धारित किया है, उससे भविष्य में दुनिया के आधे हिस्से में क्वाड की निर्णायक भूमिका भी रेखांकित होती है। इसीलिए कूटनीति के विशेषज्ञों ने क्वाड की तुलना 1957 में पेरिस में हुई नाटो की पहली बैठक से करने में कोई संकोच नहीं किया। जाहिर है, क्वाड को एक नई वैश्विक व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। सम्मेलन के बाद चारों नेताओं की ओर से जारी साझा बयान में पहली बात यही है कि क्वाड समूह हिंद प्रशांत क्षेत्र को मुक्त, सभी के लिए खुला और समान अवसरों वाला, लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित और बिना किसी के दबदबे वाला क्षेत्र बनाने की कोशिश करेगा। चीन यही नहीं होने देना चाहता।

क्वाड की औपचारिक नींव वर्ष 2007 में जापान की पहल पर पड़ी थी। इसकी स्थापना के मूल में चिंता चीन को लेकर ही थी। हालांकि करीब एक दशक तक इस संगठन ने कोई सक्रियता नहीं दिखाई, लेकिन 2017 में इसे सक्रिय रूप दिया गया और 2019 में क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में यह साफ हो गया था कि क्वाड चीन के खिलाफ एक बड़ा रणनीतिक मोर्चा है। हकीकत यह है कि क्वाड के सभी सदस्य देशों का चीन के साथ टकराव है।

अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध अभी भी खत्म नहीं हुआ है। कोरोना महामारी फैलाने का ठीकरा भी अमेरिका ने चीन फोड़ा है, जिससे वह बौखलाया हुआ है। भारत के साथ चीन का सीमा विवाद पहले है और पिछले एक साल में दोनों देशों के बीच बेहद तनाव रहा। जापान और चीन के बीच दशकों से विवाद हैं और हाल में जापानी द्वीप और उसके समुद्री इलाके में चीन की गतिविधियां बढ़ने से तनाव और बढ़ गया है। आॅस्ट्रेलिया से भी चीन चिढ़ा हुआ है। सभी देश चीन की विस्तारवादी नीतियों को लेकर चिंतित हैं। ऐसे में क्वाड जैसे बड़े मोर्चे की अहमियत बढ़ जाती है।

क्वाड देशों ने कोरोना और जलवायु संकट की चुनौतियों से निपटने के लिए विशेषज्ञों के अलग-अलग समूह बनाने पर सहमति जताई है। भारत, जापान, अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया भौगोलिक रूप से भले दूर हों, लेकिन महत्त्वपूर्ण मोर्चों पर एक दूसरे के साथ खड़े हो कर यह संदेश दे रहे हैं कि वे किसी भी तरह की वैश्विक चुनौती का मिल कर सामना करने को तैयार हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाले वक्त में दक्षिण चीन सागर युद्ध का नया अखाड़ा बन सकता है।

यहां चीन ने अपने सैनिक अड्डे बना रखे हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के सैन्य बेड़े भी यहां मौजूद हैं। जरूरत पड़ने पर वियतनाम, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड जैसे देश भी क्वाड का साथ देने में नहीं हिचकेंगे। हालांकि चीन की शक्ति को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। रूस, पाकिस्तान, ईरान, उत्तर कोरिया जैसे देश उसके खेमे में हैं। वह सुरक्षा का स्थायी सदस्य है। ऐसे में वैश्विक राजनीति की नई बिसात पर कौन कैसी चाल चलता है और कितनी शांति रह पाती है, इसकी भविष्यवाणी आसान नहीं है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Saturday, March 13, 2021

हाशिये पर स्त्रियां (जनसत्ता)

अमूमन हर दौर में किसी भी संकट, युद्ध या मनुष्यजनित समस्या का सबसे बड़ा खमियाजा महिलाओं और बच्चों को उठाना पड़ा है। पिछले साल भर से चल रहे महामारी के दौर में इससे बचाव के लिए जो उपाय अपनाए गए, उसमें पूर्णबंदी और दूसरे सख्त नियम-कायदों की वजह से दुनिया भर में बहुत सारे क्षेत्र ठप पड़ गए या अस्त-व्यस्त हो गए। अब जब महामारी का जोर कम होता दिख रहा है, तो ऐसे में विश्व के तमाम देशों सहित भारत भी इससे उबरने की कोशिश में है।

ऐसे में अर्थव्यवस्था को पहले जैसी रफ्तार में लाना सबसे बड़ी चुनौती है। इसलिए पूर्णबंदी में जो क्रमश: राहत दी जा रही है, उसमें धीरे-धीरे बाजार और आम गतिविधियां सामान्य होने की ओर अग्रसर हैं। लेकिन इस बीच एक बड़ी चिंता यह खड़ी हुई है कि पिछले कुछ दशकों में स्त्रियों ने सार्वजनिक जीवन में भागीदारी से लेकर अर्थव्यवस्था के मोर्चे तक पर जो मुकाम हासिल किया था, उसमें तेज गिरावट आई है। हालत यह है कि रोजगार या नौकरी का जो क्षेत्र स्त्रियों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा जरिया रहा, उसमें इनकी भागीदारी का अनुपात बेहद चिंताजनक हालात में पहुंच चुका है।

गौरतलब है कि बबल एआइ की ओर से इस साल जनवरी से पिछले दो महीने के दौरान कराए गए सर्वेक्षण में ये तथ्य उजागर हुए हैं कि महिलाओं को कई क्षेत्रों में बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। भारतीय संदर्भों में रिपोर्ट के मुताबिक कोविड-19 के चलते बहुत सारी महिलाओं को अपना रोजगार बीच में ही छोड़ देना पड़ा। इसने श्रम क्षेत्र में महिलाओं की पहले से ही कम भागीदारी को और कम कर दिया है।


रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्यस्थलों पर इकहत्तर फीसद कामकाजी पुरुषों के मुकाबले महिलाएं महज ग्यारह फीसद रह गई हैं। जाहिर है, बेरोजगारी के आंकड़े भी इसी आधार पर तय होंगे। इसके मुताबिक, महिलाओं के बीच बेरोजगारी की दर पुरुषों में छह फीसद के मुकाबले सत्रह फीसद हो गई। इसमें शक नहीं कि सामाजिक परिस्थितियों में महिलाओं को रोजाना जिन संघर्षों का सामना करना पड़ता है, उसमें अब भी उनके हौसले बुलंद हैं। मगर सच यह भी है कि बहुत मुश्किल से सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह बनाने के बाद अचानक नौकरी और रोजगार गंवा देने का सीधा असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है और वे उससे भी जूझ रही हैं।


यों जब भी किसी देश या समाज में अचानक या सुनियोजित उथल-पुथल होती है तो उसका सबसे ज्यादा नकारात्मक असर स्त्रियों पर पड़ता है। महामारी के संकट में भी स्त्रियां ही सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं। ताजा सर्वे में नौकरियों और रोजगार के क्षेत्र में उन पर आए संकट पर चिंता जताई गई है। इससे पहले ऐसी रिपोर्ट आ चुकी है कि कोरोना की वजह से लगाई गई पूर्णबंदी के चलते महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई। सवाल है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा होती है, जिनमें हर संकट की मार महिलाओं को ही झेलनी पड़ती है!

दरअसल, इस तरह के हालात की वजह सामाजिक रही है। सोपान आधारित पितृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था में आमतौर पर सत्ता के केंद्र पुरुष रहे और श्रम और संसाधनों के बंटवारे में स्त्रियों को हाशिये पर रखा गया। सदियों पहले इस तरह की परंपरा विकसित हुई, लेकिन अफसोस इस बात पर है कि आज जब दुनिया अपने आधुनिक और सभ्य होने का दावा कर रही है, उसमें भी इसके ज्यादातर हिस्से में स्त्रियों को संसाधनों में वाजिब भागीदारी का हक नहीं मिल सका है। इसका असर हर संकट के दौर में देखने में आता है जब सभी वंचनाओं की गाज स्त्रियों पर गिरती है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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