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संपादकीय: चीन को दो टूक


पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर चल रहे गतिरोध को दूर करने के लिए जारी सैन्य और कूटनीति स्तर की वातार्ओं का अब तक कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला है और ऐसे आसार भी नजर नहीं आ रहे कि आने वाले दिनों में वार्ता किसी नतीजे पर पहुंचेगी। जाहिर है, चीन चाहता ही नहीं है कि सीमा पर किसी तरह की शांति बहाली हो, बल्कि जिस तरह से उसकी हमलावर गतिविधियां बढ़ी हैं और भारत के प्रति जो आक्रामक रुख अपना रखा है, उससे साफ है कि वह अब बड़े टकराव की तैयारी में है। इसलिए वह बार-बार भारत को उकसाने वाली गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। सीमा पर चीनी सैनिकों का जमावड़ा इसका स्पष्ट प्रमाण है। लेकिन अब भारत ने चीन को लेकर जो सख्त रुख दिखाया है, उससे यह साफ हो गया है कि चीन को उसकी आक्रामक कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। भारत ने चीन को एक बार फिर साफ-साफ कह दिया है कि शांति बहाली तभी संभव है, जब चीनी सैनिक पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र से पीछे हट जाएंगे। भारत ने अपना रुख साफ करते हुए कहा है कि जब तक सीमा पर पांच मई से पूर्व की स्थिति बहाल नहीं हो जाती, तब तक शांति बहाली की दिशा में बढ़ पाना संभव नहीं है। सच्चाई तो यही है कि चीन ने यथास्थिति को बदलने की एकतरफा कार्रवाई करते हुए ताजा विवाद को जन्म दिया है। इसलिए जब तक चीनी सैनिक पीछे नहीं हटेंगे, तब तक गतिरोध दूर करने की दिशा में प्रगति की कोई उम्मीद नहीं है। भारत ने के कड़े रुख से साफ है कि वह अब चीन की किसी रणनीति के दबाव में नहीं आने वाला। इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि भारत की स्थिति अब 1962 वाली नहीं है। अब चीन को जवाब देने के लिए भारत के पास हर तरह के विकल्प मौजूद हैं। चीन की तरह भारत भी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है। रक्षा सेवाओं के प्रमुख जनरल बिपिन रावत हाल में संकेत दे भी चुके हैं कि अगर चीन बातचीत से नहीं माना तो उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई का विकल्प भी खुला है। थल सेनाध्यक्ष और वायु सेनाध्यक्ष का ताजा दौरा मजबूत सैन्य तैयारियों का संकेत है। अब ज्यादा बड़ा खतरा इसलिए भी है कि चीन और पाकिस्तान दोनों कभी भी एक साथ भारत के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। इसलिए अब यह जरूरी हो गया है कि भारत चीन और पाकिस्तान की किसी भी गतिविधि का करारा जवाब दे। इस वक्त दुनिया कोरोना महामारी के संकट से जूझ रही है। चीन खुद भी इस समस्या से घिरा है। ऐसे में भी अगर वह पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवादों को बढ़ा रहा है, तो साफ है कि वह दूसरे देशों की जमीन पर कब्जा करके उन्हें विवादित बनाने और अपनी सीमाओं का विस्तार करने की रणनीति पर चल रहा है। बेहतर होता इस वक्त चीन ऐसे सीमा विवादों के बजाय मानवीय रुख दिखाता। लेकिन उसे यह संकट एक बड़े अवसर के रूप में दिख रहा है। भारत ने एक बार फिर चीन को कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है कि अब पहले उसे पीछे हटना होगा। लेकिन चीन इस बात पर अड़ा है कि वह फिंगर-4 क्षेत्र से अब तभी हटेगा, जब भारत भी समान दूरी तक पीछे हटे। सवाल है कि अपने ही इलाके में आखिर भारत क्यों पीछे हटेगा! चीन को भारत के सख्त रुख का अर्थ समझने की जरूरत है।


सौजन्य- जनसत्ता।

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प्रवासी पर प्रहार : Jansatta Editorial


कोरोना संकट की वजह से दुनिया भर में कामगारों के सामने रोजगार का संकट गहरा हुआ है। बहुत सारे लोगों ने अपने रोजगार खोए हैं। ऐसे लोगों की भी बड़ी संख्या है, जो सुरक्षा की दृष्टि से विदेशों से लौट कर अपने देश गए या लाए गए थे, पर अब उनके अपने काम पर लौटने का रास्ता बंद हो गया है। इनमें सबसे बड़ी संख्या भारतीय नागरिकों की है। अब कई देश अपने यहां से विदेशी नागरिकों को बाहर निकालने के मकसद से नियम-कायदों में बदलाव कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले अमेरिका ने अपने वीजा नियमों में बदलाव किया था, जिसके चलते बहुत सारे भारतीय नागरिकों के रोजगार जाने का संकट पैदा हो गया। अब खबर है कि कुवैत सरकार भी अपने यहां से विदेशी कामगारों को बाहर निकालने के लिए कानून बना रही है। कुवैत में करीब सत्तर फीसद विदेशी नागरिक रहते हैं, जो वहां के सरकारी और निजी उपक्रमों में काम करते हैं। नए कानून में विदेशी नागरिकों की संख्या घटा कर तीस फीसद तक करने का प्रस्ताव है। अगर यह कानून पारित होता है, तो करीब आठ लाख भारतीय नागरिकों की छंटनी हो सकती है। जाहिर है, ये लोग यहां आएंगे, तो उनके लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना बड़ी चुनौती साबित होगी। फिर वे वहां से जो विदेशी मुद्रा भेजते थे, वह भी बंद हो जाएगी। खाड़ी देशों में भारतीय नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर आसानी से उपलब्ध हैं। वहां न सिर्फ डॉक्टर, इंजीनियर जैसे तकनीकी रूप से दक्ष लोगों की मांग अधिक है, बल्कि बिजली के उपकरण सुधारने, पानी के नल ठीक करने वालों की भी बहुत जरूरत है। यहां तक कि वहां के कल-कारखानों, खेती-बाड़ी और घरेलू कामों में अनपढ़ लोगों को भी काम आसानी से मिल जाता है। कुवैत सरकार के अनुसार वहां रह रहे साढ़े तैंतीस लाख विदेशियों में से करीब तेरह लाख अनपढ़ हैं या फिर बहुत कम पढ़ना-लिखना जानते हैं। ऐसे देशों में रोजगार के रास्ते बंद होंगे, तो बहुत सारे भारतीय नौजवानों के सामने रोजगार का संकट और बढ़ेगा। ये लोग खाड़ी देशों में जाकर न सिर्फ अपने परिवार के भरण-पोषण का जरिया बनते थे, बल्कि यहां बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी भेजते थे। विदेशी मुद्रा के मामले में कुवैत से सबसे ऊपर है। 2018 में वहां से भारतीय नागरिकों ने 4.8 अरब डॉलर भेजे थे। इस वक्त भारत की अर्थव्यवस्था काफी खराब है, विदेशी मुद्रा की आवक घटने से उस पर और मार पड़ेगी। आशंका है कि विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों के रोजगार पर संकट गहराने का मामला केवल कुवैत तक सीमित नहीं रहने वाला। अमेरिका पहले ही छंटनी का मन बना चुका है। कोरोना संक्रमण के चलते दुनिया के तमाम देशों के रोजगार पर संकट गहरा हुआ है। खर्चों में कटौती का सिलसिला जारी है। हर देश अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है। नए रोजगार सृजन की संभावना काफी क्षीण हो चुकी है। ऐसे में इन देशों की देखादेखी दूसरे देश भी बाहरी लोगों को वापस भेजने का कदम उठाते हैं, तो भारत पर उसकी मार गहरी पड़ सकती है। बाहर से आए लोगों के लिए रोजगार के अवसर जुटाने का दबाव सरकार पर बढ़ेगा। इसके अलावा, दूसरे देशों में रह रहे भारतीय नागरिकों में बड़ी संख्या कोरोना संक्रमितों की भी है। उनके आने से कोरोना संक्रमण का प्रसार रोकने की भी चुनौती बढ़ेगी।

सौजन्य - जनसत्ता।
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संपादकीय: सुराग की खातिर : Jansatta Editorial

कानपुर जिले के बिकरू गांव में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या करने वाले विकास दुबे को गिरफ्तार करने में पुलिस अब तक नाकाम रही है और अब अन्य स्रोतों के सहारे उस तक पहुंचने की कोशिश शुरू करनी पड़ी है। घटना के दिन ही आसपास के इलाकों को सील करने और अधिकतम सख्ती बरतने का दावा किया गया था, लेकिन पांच दिन बाद भी उसका कोई सुराग नहीं मिला। जाहिर है, पुलिस के अपने जाल के अलावा राज्य के खुफिया तंत्र को भी अब तक विकास दुबे के बारे में कोई भी जानकारी हासिल करने में कामयाबी नहीं मिल सकी है। यह समूचे ढांचे में एक ऐसी कमी का संकेत है, जिसके रहते अपराध-जगत पर काबू पाने का किसी भी सरकार का दावा महज आधा-अधूरा ही रहेगा। हालत यह है कि शायद अपनी सीमा को समझते हुए ही पुलिस की ओर से विकास दुबे के बारे में सूचना देने वाले को ढाई लाख रुपए इनाम देने की घोषणा की गई है। यानी पुलिस को उम्मीद है कि इनामी रकम की वजह से किसी अन्य स्रोत से मिली सूचना के आधार पर वह विकास दुबे को गिरफ्तार कर सकेगी। निश्चित रूप से यह पुलिस के लिए एक असहज स्थिति होगी कि पहले जहां इनाम की यह रकम पचास हजार रुपए थी, बाद में उसमें दो बार इजाफा करके ढाई लाख रुपए किया गया। इनाम घोषित कर किसी अपराधी के बारे में सूचना हासिल करना कानूनी कार्रवाई को कामयाब बनाने की प्रक्रिया का एक हिस्सा जरूर रहा है। लेकिन जिस दौर में समूचे उत्तर प्रदेश में अपराध-जगत के खिलाफ एक व्यापक अभियान चलाने के दावे के बीच मुठभेड़ों में अपराधियों को मार गिराए जाने को ही पुलिस की कामयाबी के रूप में पेश किया जा रहा हो, वैसे में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद विकास दुबे का ‘लापता’ हो जाना क्या समूचे पुलिस और खुफिया तंत्र की नाकामी के रूप में नहीं देखा जाएगा? इस मामले में एसओ विनय तिवारी सहित और कुछ पुलिसकर्मियों को इस बात के लिए निलंबित किया गया कि घटना के पहले उन्होंने विकास दुबे से फोन पर बातचीत की थी। यानी आशंका यह है कि खुद पुलिस महकमे के कुछ लोगों ने इस कांड में विकास दुबे की राह आसान की थी। एक ओर, खुद राज्य के मुख्यमंत्री यह दावा करते रहे हैं कि अपराध खिलाफ उनकी सरकार ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर चलेगी। दूसरी ओर, पिछले दो-ढाई दशक के दौरान विकास दुबे ने आम अपराधों से लेकर थाने में घुस कर हत्या करने जैसे अपने गंभीर अपराधों के जो रिकार्ड कायम किए थे और उसके खिलाफ कम से कम साठ मामले दर्ज थे, उसमें उसे अधिकतम सजा के तहत जेल में होना चाहिए था। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि किन वजहों से उसे हर बार जमानत मिलती रही और वह आजाद घूमता रहा। हालत यह है कि पिछले हफ्ते की घटना के पहले तक उसका नाम न केवल जिला, बल्कि थाना क्षेत्र तक में अपराधियों की शीर्ष सूची में नहीं था। आखिर उसे किसका संरक्षण मिल रहा था? ऐसी खबरें सामने आ चुकी हैं कि विकास दुबे की पहुंच लगभग हर राजनीतिक दल में रही और खुद भाजपा के कुछ नेताओं से भी उसके अच्छे संपर्क रहे। शायद इसी तरह के संरक्षण के दम पर उसने अपराध का साम्राज्य खड़ा किया था, जिसमें उसके इलाके में उसकी मर्जी के बिना कुछ भी करना संभव नहीं था। क्या यह सब सरकार और पुलिस की नजर में नहीं था? राजनीतिक संरक्षण से लेकर पुलिसकर्मियों की मिलीभगत तक के तार अगर तथ्य साबित होते हैं तो सरकार या पुलिस किस बूते अपराध और अपराधियों पर काबू पाने का भरोसा जता सकती है?

सौजन्य - जनसत्ता।
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संपादकीय: न्याय की उम्मीद

बलात्कार की घटनाओं से जुड़े मुकदमों की तत्काल सुनवाई के लिए देश के चौबीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में त्वरित अदालतें गठित करने के फैसले से यह उम्मीद बंधी है कि महिलाओं और बच्चों के साथ ऐसे जघन्य और घिनौने अपराध करने वालों को जल्द सजा मिल सकेगी। देशभर में बलात्कार की घटनाएं जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे यह साफ है कि ऐसा करने वालों में कानून का कोई भय नहीं रह गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि बलात्कार से संबंधित मामले वर्षों तक अदालतों में चलते रहते हैं और ऐसे में कई बार पीड़ित महिला का टूट जाना स्वाभाविक होता है। इससे अपराधियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं। देश में इस वक्त बलात्कार और पोक्सो के करीब पौने दो लाख मामले लंबित पड़े हैं। इसकी वजह यही है कि अदालतों में काम का बोझ है, जजों की कमी है, इसलिए निचली अदालतों से लेकर हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमों का अंबार लगा है। ऐसे में खासतौर से बलात्कार से संबंधित मामलों की सुनवाई में लंबा समय लगना स्वाभाविक है। देश के तीन सौ नवासी जिले ऐसे हैं जहां की अदालतों में पॉक्सो के तहत लंबित मामलों की संख्या सौ से ज्यादा है।
महिलाओं और बच्चों के खिलाफ ऐसे अपराधों पर लगाम लगाने के लिए लंबे समय से कवायद तो चलती रही है, लेकिन अभी तक भी ऐसे मामलों में त्वरित न्याय संभव हो नहीं पाया है। इसका बड़ा कारण यह है कि त्वरित अदालतें बनाने का फैसला राज्य सरकारों को करना होता है। लेकिन राज्य अपने संसाधनों का रोना रोकर इससे बचे रहते हैं। त्वरित अदालतें बनाने की दिशा में काम विधि और न्याय मंत्रालय ने शुरू किया था। लेकिन अभी भी देश के कुछ राज्य और केंद्र शासित प्रदेश मंत्रालय की इस योजना में शामिल नहीं हुए हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि केंद्र की पहल के बावजूद राज्य त्वरित अदालतें गठित करने की दिशा में तेजी दिखाएंगे। अभी यह माना जा रहा है कि अगर तय योजना के मुताबिक त्वरित अदालतों का गठन हो जाता है और ये समय से काम शुरू कर भी देती हैं तो हर अदालत हर साल एक सौ पैंसठ मामलों का निपटारा करेगी।
त्वरित अदालतों के गठन को लेकर सरकार ने सक्रियता सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद दिखाई है। इसी तरह बच्चों से जुड़े अपराधों, खासतौर से यौन अपराधों के तत्काल निपटारे के लिए शीर्ष अदालत ने पिछले साल देश के हर जिले में पॉक्सो अदालत बनाने का निर्देश दिया था। लेकिन मामला सिर्फ त्वरित अदालतों के गठन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मुकदमों की सुनवाई भी निर्बाध रूप से होनी जरूरी है। बलात्कार जैसे मामलों के मुकदमे में सबसे बड़ी समस्या यही आती है कि ऐसे ज्यादातर मामलों में पुलिस की भूमिका संदिग्ध बनी रहती है, पुलिस जांच में लापरवाही बरतती है, कई बार सबूतों से छेड़छाड़ करने और मामले को कमजोर बनाने जैसे उदाहरण भी देखने को मिलते हैं।
ये सब पीड़ित को न्याय दिलाने में बाधा साबित होते हैं। इसलिए भारत में बलात्कार के मामलों में दोषसिद्धि बत्तीस फीसद ही है। निर्भया कांड के बाद जिस तरह से अदालतों ने सक्रियता दिखाई थी, केंद्र और राज्य सरकारों की नींद टूटी, सख्त कानून भी बने, उनसे लगा था कि अब ऐसे मामलों में त्वरित न्याय मिलना संभव हो सकेगा। लेकिन अभी तक इन अदालतों का गठन नहीं हो पाना बता रहा है कि हम कैसे पीड़ितों को न्याय मुहैया कराएंगे!
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संपादकीय: पाबंदी की हद

हालांकि पिछले साल अगस्त में जब धारा 144 लागू करने के साथ-साथ कश्मीर में इंटरनेट पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी, तभी से अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों और राजनीतिक दलों ने सरकार के इस फैसले की सख्त आलोचना की थी। इसे अभिव्यक्ति की आजादी बाधित किए जाने के तौर पर देखा गया था और सरकार से इस फैसले को वापस लेने की मांग की गई थी। इसके बावजूद उस समय से लेकर अब तक सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया था और अशांति फैलने की आशंका का हवाला देकर कश्मीर में धारा 144 के साथ-साथ इंटरनेट पर पाबंदी को कायम रखा गया था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इस मसले पर जो टिप्पणियां की हैं, वे सरकार के फैसले को एक तरह से कठघरे में खड़ा करती हैं। अदालत ने साफ लहजे में कहा कि लंबे वक्त तक इंटरनेट पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती और ऐसा सिर्फ उसी स्थिति में हो सकता है जब कोई विकल्प नहीं बचे। इसके अलावा, समय-समय पर इसकी समीक्षा होनी चाहिए। अदालत ने जम्मू-कश्मीर सरकार को एक हफ्ते के भीतर इन पाबंदियों की समीक्षा करने को कहा है।
इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी तस्वीर को और साफ करती है कि इंटरनेट आज लोगों की अभिव्यक्ति का अधिकार है और यह संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकारों के तहत आता है। साथ ही अदालत ने पाबंदी से संबंधित सभी फैसलों को सार्वजनिक करने को कहा है। निश्चित रूप से यह सरकार के लिए असहज करने वाली और असुविधा की स्थिति है। यही नहीं, कोर्ट ने कश्मीर में धारा 144 लागू करने पर साफ शब्दों में कहा कि देश में कहीं भी लगातार इस कानून को लागू रखना सरकार द्वारा शक्ति का दुरुपयोग है।
यानी सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में अनुच्छेद 370 पर लिए गए फैसले के बाद वहां सामान्य स्थिति बहाल करने के नाम पर सरकार की ओर से उठाए गए कदमों पर सख्त रुख अख्तियार किया है तो इसके पीछे कुछ ठोस आधार हैं। सवाल है कि एक संघीय और लोकतांत्रिक ढांचे के तहत चलने वाले देश की सरकार को इन सबका खयाल रखना जरूरी क्यों नहीं लगा! क्या करीब पांच महीने पहले इंटरनेट पर पूरी तरह पाबंदी और धारा 144 लागू करने से सरकार का वह मकसद पूरा हो गया जो उसने सोचा था? आखिर अदालत को यह फैसला क्यों सुनाना पड़ा कि इस धारा का इस्तेमाल किसी के मत को दबाने के उपकरण के रूप में नहीं किया जा सकता है?
जिस दौर में किसी भी विचार की अभिव्यक्ति और उसे एक-दूसरे के साथ साझा करने से लेकर बैंक, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, पर्यटन, कहीं भी आवाजाही या बाजार की ज्यादातर गतिविधियां इंटरनेट पर निर्भर हो चुकी हैं, उसमें इतने लंबे वक्त तक इस माध्यम पर पाबंदी से कितना और किस तरह का नुकसान हुआ होगा, इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां तक कि खुद सरकारी महकमों के लगभग सभी कामकाज और कानून-व्यवस्था को लागू करने में इंटरनेट के इस्तेमाल का महत्त्व और इस पर निर्भरता किसी से छिपी नहीं है। फिर भी, इतने लंबे वक्त से इस पर पूरी तरह रोक पर पुनर्विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई।
आखिर अदालत को यह जरूरत महसूस हुई कि अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों जैसी तमाम आवश्यक सेवाएं प्रदान करने वाली सभी संस्थाओं में इंटरनेट सेवाओं को बहाल किया जाए तो इसकी कोई वजह होगी। यों भी लोगों की आम जिंदगी में इंटरनेट की जो जगह बन चुकी है और यह विचार साझा करने का एक उपयोगी साधन बन चुका है, उसमें अचानक ही देश की एक बड़ी आबादी को इससे वंचित कर दिया जाना लोकतंत्र के विरुद्ध है।

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