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Tuesday, December 1, 2020

गहराता संकट (जनसत्ता)

ईरान के परमाणु कार्यक्रम के शीर्ष वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजादेह की हत्या ने पश्चिम एशिया को एक और गंभीर संकट में धकेल दिया है। इस हत्या के पीछे के कौन है, अभी इस बारे में ईरान ने स्पष्ट रूप से किसी का नाम नहीं लिया है, लेकिन उसका इशारा इजराइल की ओर ही है। जाहिर है, ईरान और इजराइल के बीच अब टकराव की आशंकाएं गहराती जा रही हैं।

ईरान किसी भी सूरत में चुप नहीं बैठने वाला। उसने खुल कर चेतावनी दे डाली है कि जिसने भी फखरीजादेह को मारा है, उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। ऐसे में अब क्या होगा, कोई नहीं जानता। पिछले कुछ समय से ईरान के सैन्य और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े शीर्ष लोगों के खात्मे का जो सिलसिला चला है, वह ईरान को कमजोर करने की पश्चिमी रणनीति का हिस्सा है।

लेकिन सवाल है कि क्या महत्त्वपूर्ण लोगों की हत्याओं से ईरान को झुकाया जा सकेगा? क्या इन हत्याओं से उसका मनोबल तोड़ा जा सकता है? इस साल के शुरू में अमेरिका ने ईरान की कुद्स आर्मी के प्रमुख कासिम सुलेमानी की इराक में हत्या करवा दी थी। अब परमाणु वैज्ञानिक फखरीजादेह को निशाना बनाया गया। लंबे समय से ईरान जिस दमखम के साथ अमेरिका और इजराइल जैसे देशों से लोहा ले रहा है, उसमें उसकी ताकत को कम करके आंकना भारी भूल होगी।

पिछले कई वर्षों से ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका सहित कई देशों के लिए किरकिरी बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र से लेकर अमेरिका सहित उसके कई सहयोगी देशों ने ईरान पर प्रतिबंध थोप रखे हैं। ईरान शिया बहुल देश है, इसलिए भी वह अरब जगत के सुन्नी बहुल देशों के निशाने पर है। इजराइल से उसकी पुरानी शत्रुता छिपी नहीं है।

ईरान को घेरने के पीछे अमेरिका का असल मकसद उसके तेल पर कब्जा करने और पश्चिम एशिया में अपना दबदबा बढ़ाना है। इसीलिए वह परमाणु हथियारों के निर्माण को आड़ बना कर ईरान के खिलाफ सालों से अभियान चला रहा है। अमेरिका की यह मुहिम ठीक वैसी ही है, जो उसने इराक के खिलाफ चलाई थी और उस पर जैविक व रासायनिक हथियार बनाने का आरोप लगाते हुए मित्र देशों की सेनाओं के सहयोग से हमला कर दिया था। लेकिन इराक में ऐसे महाविनाशक हथियारों का नामोनिशान तक नहीं पाया गया। बाद में अमेरिका ने इसे अपनी गलती बताते हुए हाथ झाड़ लिए। इसका खमियाजा इराक आज तक भुगत रहा है।

लेकिन ईरान इराक नहीं है। अपने पर हुए हर हमले का माकूल जवाब देकर उसने अपनी ताकत का अहसास कराया है। उसके पास यूरेनियम संवर्धन और परमाणु हथियार बनाने की तकनीक है। रूस और चीन जैसी अमेरिका विरोधी महाशक्तियों का उसे पुरजोर समर्थन है। अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन ईरान को लेकर पहले ही नरम रुख बरतने और परमाणु समझौता बहाल करने का संकेत दे चुके हैं।

इससे इजराइल चिढ़ा हुआ है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी ईरान को लेकर बाइडेन के लिए मुश्किलें बढ़ाने में लगे हैं। अगर ईरान ने इजराइल पर अभी बड़ी कार्रवाई की तो ट्रंप को उस पर हमला करने का बहाना मिल जाएगा और इससे बाइडेन की ईरान नीति को धक्का लगेगा। ईरान में इस वक्त उपजा गुस्सा बता रहा है कि वह फखरीजादेह के बलिदान को शायद व्यर्थ नहीं जाने देगा। साल 2010 से 2012 के बीच भी ईरान के चार परमाणु वैज्ञानिकों को मार डाला गया था। इसमें कोई संदेह नहीं कि फखरीजादेह की हत्या से ईरान को धक्का तो लगा है, लेकिन इसके डर से वह अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ने वाला नहीं। यह संदेश वह दे चुका है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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समझ और सवाल (जनसत्ता)

नए कृषि कानूनों के मसले पर किसानों के आंदोलन का दायरा फैलने के साथ अब सरकार के सामने यह चुनौती बड़ी हो रही है कि वह इस मामले को कैसे सुलझाए। फिलहाल किसान और सरकार, दो पक्ष बन गए लगते हैं और इसे कोई आदर्श स्थिति नहीं कहा जा सकता है। दिल्ली पहुंचने के रास्ते में जिस तरह के तौर-तरीकों से किसानों को रोकने की कोशिशें हुर्इं, उसमें बातचीत के बजाय टकराव जैसी स्थिति ही बनी।

इसके बाद दिल्ली में प्रदर्शन की जगह को लेकर खींचतान हुई, लेकिन किसानों से बातचीत और नए कृषि कानूनों के मुद्दे पर उनके भीतर छाई आशंकाओं को दूर करने की कोई गंभीर पहल नहीं हुई। सवाल है कि अगर नए कृषि कानूनों को लेकर सरकार आश्वस्त है कि यह किसानों के हित में है और इससे दूरगामी फायदा पहुंचने वाला है तो इस बात से किसान सहमत या संतुष्ट क्यों नहीं हो पा रहे हैं! गौरतलब है कि किसानों के बीच नए कृषि कानूनों के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य, आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से अनाज, दलहन, तिलहन, आलू, प्याज आदि के हटाए जाने और भंडारण से जुड़ी नई व्यवस्था सहित अनुबंध आधारित कृषि को लेकर गहरी आशंकाएं हैं।

विडंबना यह है कि कृषि ढांचे पर दीर्घकालिक असर डालने वाले इन कानूनों को लेकर सरकार न तो किसानों को समझा पाने में कामयाब हुई है, न इससे जुड़ी आशंकाओं या सवालों पर कोई स्पष्टता दिख रही है। एक ओर सरकार लगातार यह कह रही है कि इन कानूनों से किसानों को काफी फायदा होगा और उनकी आय में बढ़ोतरी होगी, दूसरी ओर किसान इन कानूनों के जमीनी स्तर पर अमल में पड़ने वाले असर के मद्देनजर इन्हें वापस लेने की मांग पर अड़े हैं। नतीजतन, जिन मुख्य बिंदुओं के तहत नए कृषि कानूनों पर विवाद खड़ा हुआ है, वह अपनी जगह कायम है।

क्या यह जटिल स्थिति मुद्दे को ‘ठीक से समझ नहीं पाने’ की वजह से खड़ी हुई है? रविवार को नीति आयोग के कृषि से संबंधित एक सदस्य रमेश चंद ने इसी बिंदु को रेखांकित करते हुए कहा कि आंदोलन कर रहे किसान नए कृषि कानूनों को पूरी तरह या सही प्रकार से समझ नहीं पाए हैं; इन कानूनों का मकसद वह नहीं है, जो आंदोलन कर रहे किसानों को समझ आ रहा है, बल्कि इसका उद्देश्य उलट है। यह राय एक तरह से किसानों के आंदोलन को ‘समझ के अभाव’ का नतीजे के तौर पर देखती है।

संभव है कि नीति आयोग के सदस्य अपनी राय के पीछे कुछ आधार देखते हों। लेकिन अगर इस पर गौर किया भी जाए तो यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि आखिर दूरगामी असर वाले इस तरह के किसी कानून को बनाने के क्रम में उसके बारे में प्रभावित पक्षों को समझाने की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए!

कोई भी कानून अपने निर्माण के दौरान अलग-अलग पक्षों के बीच विचार-विमर्श की किस प्रक्रिया से गुजरता है? एक लोकतांत्रिक ढांचे में किसी बड़े वर्ग के हित-अहित से जुड़े प्रश्नों पर अगर स्पष्टता और सहमति बना ली जाए, तो उससे संबंधित आशंकाओं को दूर किया जा सकता है। सरकार का पास जनप्रतिनिधियों सहित एक व्यापक तंत्र के साथ-साथ प्रचार माध्यमों के सहारे अपने पक्ष को प्रभावित पक्षों के सामने हर स्तर पर रखने की सुविधा है।

अध्यादेश के रूप में आने के समय से ही किसान इस कानून के प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं। इस बीच अध्यादेश कानून भी बन गया। लेकिन किसान संगठनों से बातचीत, उनके मुद्दे समझने या अपना पक्ष समझाने के लिए जिस स्तर पर कोशिशें होनी चाहिए थीं, उसमें कमी रह गई। अगर ऐसा हुआ होता तो शायद मौजूदा परिस्थितियों से बचा जा सकता था!

सौजन्य - जनसत्ता।
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Monday, November 30, 2020

भ्रष्टाचार की जड़ें (जनसत्ता)

भ्रष्टाचार के मामले में भारत का स्थान एक बार फिर एशिया में सबसे ऊपर दर्ज किया गया है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक यहां उनतालीस फीसद लोगों को रिश्वत देकर अपना काम कराना पड़ता है। छियालीस प्रतिशत लोगों को प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचने के लिए निजी संपर्कों का सहारा लेना पड़ता है।

इस साल यह आंकड़ा पिछले सालों की तुलना में कुछ बढ़ा हुआ ही है। यह तब है जब पिछले छह सालों में भ्रष्टाचार दूर करने का नारा बहुत जोर-शोर से लगता आ रहा है और अनियमितताएं दूर करने, प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए सरकार ने अनेक कड़े उपाय किए हैं। दफ्तरों में समय पर अधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली लगाई गर्इं।

तमाम दफ्तरों को इंटरनेट के माध्यम से जोड़ा गया और आम लोगों को अपनी शिकायतें दर्ज कराने, छोटे-मोटे दस्तावेज प्राप्त करने संबंधी अर्जियां देने आदि की आनलाइन व्यवस्था की गई। कई सेवाओं के लिए सरकारी कार्यालयों की खिड़कियों पर कतार लगाने की जरूरत समाप्त कर दी गई। माना गया कि इससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आएगी और आम लोगों को अनावश्यक बाबुओं की बेईमानियों का शिकार नहीं होना पड़ेगा। मगर इन सब कुछ के बावजूद अगर रिश्वतखोरी की दर पहले से बढ़ी दर्ज हुई है तो हैरानी स्वाभाविक है।

केंद्र सरकार दावा करते नहीं थकती कि उसने भ्रष्टाचार पर काफी हद तक रोक लगाने में कामयाबी हासिल की है और प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता आई है। मगर ताजा आंकड़ों में हकीकत कुछ और ही नजर आ रही है। भ्रष्टाचार पर काबू पाना इसलिए भी जरूरी माना जाता है कि इसके बिना विकास कार्यों में गति नहीं आ सकती।

बाबुओं में रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति बनी रहने से अनेक परियोजनाएं बेवजह लटकाई जाती रहती हैं। फिर उनमें रिश्वत का चलन होने से लागत भी बढ़ती रहती है। मगर आर्थिक विकास पर जोर देने और आम लोगों और प्रशासन के बीच की दूरी खत्म करने के दावों के बावजूद अगर रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति पर काबू नहीं पाया जा सका है और प्रशासनिक अधिकारियों की जनता से दूरी बढ़ती गई है, तो यह सरकार की विफलता ही कही जाएगी।

भारत में रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति इस कदर जड़ें जमा चुकी है कि आम लोगों में यह धारणा दृढ़ हो गई है कि बिना रिश्वत के कोई काम हो ही नहीं सकता। अपनी जमीन-जायदाद के दस्तावेजों की नकल लेने जैसे छोटे-मोटे काम भी बिना रिश्वत के नहीं होते। कचहरियों और जिला कार्यालयों में तो अलग-अलग कामों के लिए रिश्वत की दरें तक तय हैं।

इस तरह बहुत सारे लोग अधिकारियों को रिश्वत देकर गैरकानूनी तरीके से अपना काम कराते रहते हैं और वास्तविक हकदारों को उनका हक नहीं मिल पाता। रिश्वतखोरी और जनता से अधिकारियों की दूरी, दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। अधिकारियों से लोगों की नजदीकी बढ़ेगी, वे उनकी समस्याएं सीधे सुनने लगेंगे, तो रिश्वत का चक्र टूट जाएगा। एक लोकतांत्रिक देश में इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि वहां के नागरिक अपने लोकसेवकों से सीधे न मिल पाएं, उसके लिए उन्हें किसी संपर्क सूत्र की जरूरत पड़े।

अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसे में लोग अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से कहां तक मिल पाते होंगे। सरकार अगर सचमुच सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने, भ्रष्टाचार पर काबू पाने को लेकर प्रतिबद्ध है, तो उसे नौकरशाही और नागरिकों के बीच की दूरी को खत्म करने का प्रयास करना चाहिए।

सौजन्य - जनसत्ता।
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राहत बनाम संकट (जनसत्ता)

दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2020) के जीडीपी के आंकड़े इस बात का संकेत दे रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था अब संकट के दौर से निकलने लगी है। अभी राहत की बात सिर्फ इतनी ही है कि पहली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही में गिरावट का प्रतिशत उल्लेखनीय रूप से कम रहा। पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था में 23.9 फीसद की गिरावट दर्ज की गई थी, वहीं दूसरी तिमाही में यह प्रतिशत घट कर साढ़े सात अंक पर आ गया। गिरावट की रफ्तार का कम पड़ना बता रहा है कि औद्योगिक गतिविधियां अब जोर पकड़ने लगी हैं।

हालांकि तमाम रेटिंग एजेंसियों और वित्तीय संस्थानों को इस बात की उम्मीद नहीं थी कि हालात तेजी से सुधरने लगेंगे, इसीलिए रेटिंग एजेंसियों के अनुमान हालात की गंभीरता को कहीं ज्यादा आंक रहे थे और दूसरी तिमाही में गिरावट की दर दस फीसद से ऊपर रहने की बात कर रहे थे। लेकिन दूसरी तिमाही के आंकड़ों ने इन्हें गलत साबित करते हुए अर्थव्यवस्था में जोश पैदा किया है।

दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था में सुधार का बड़ा कारण यह रहा कि पूर्णबंदी का दौर लगभग खत्म हो जाने से व्यापारिक गतिविधियों ने जोर पकड़ा। अक्तूबर में त्योहारी मांग निकलने से बाजारों में तेजी रही। वाहनों और उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री में तेजी आई। इन सबका असर दूसरे उद्योगों पर भी पड़ा। कच्चे माल की आपूर्ति से लेकर उत्पादन तक की प्रक्रिया में उद्योग एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।

इसलिए बिजली, गैस, जलापूर्ति जैसे क्षेत्रों में 4.4. फीसद की वृद्धि दर्ज की गई। विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि भले 0.6 फीसद रही हो, लेकिन यह महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि पहली तिमाही में इसमें उनतालीस फीसद से ज्यादा की गिरावट आई थी। कारखानों और फैक्ट्रियों के चक्के चल जाने से इन पर निर्भर छोटे उद्योगों में भी फिर से जान आ गई है। अर्थव्यवस्था और उद्योगों की रीढ़ माने जाने छोटे और लघु उद्योगों का खड़ा होना बहुत जरूरी है, क्योंकि बड़े उद्योगों को ज्यादातर कच्चा माल यही तैयार करके देते हैं।

लेकिन दूसरी तिमाही के आकंड़ों से हमें खुश होकर बैठ नहीं जाना है। असल चुनौतियां बरकरार हैं। सुधार के संकेत सिर्फ कुछ ही क्षेत्रों से आए हैं। सबसे चिंताजनक तो यह है कि अर्थव्यवस्था में चालीस फीसद तक योगदान करने वाले सेवा क्षेत्र की हालत खस्ता बनी हुई है। दूसरी तिमाही में सेवा क्षेत्र में दस फीसद से ज्यादा की गिरावट रही।

जाहिर है, पर्यटन व इससे जुड़े कारोबार, संचार व अन्य सेवाओं में मांग अभी ठंडी पड़ी है। रीयल एस्टेट क्षेत्र की हालत भी खराब ही है। संकट अभी यह है कि बड़ी संख्या में लोगों के पास काम-धंधा नहीं है। पूर्णबंदी के दौरान जिन लोगों की नौकरियां चली गईं, उन्हें फिर से काम मिल नहीं रहा। असंगठित क्षेत्र के कामगारों की हालत तो और बुरी है।

लोगों के पास रोजमर्रा के खर्च के पैसे भी नहीं हैं। महंगाई ने कमर तोड़ कर रख दी है। ऐसे में कैसे मांग में तेजी आएगी, यह बड़ा सवाल है। कहने को सरकार ने प्रोत्साहन पैकेज दिए हैं, लेकिन जब तक लोगों के हाथ में नगदी नहीं आएगी, तब तक आर्थिकी के चक्र को चला पाना आसान नहीं होगा।

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Saturday, November 28, 2020

सजा और सवाल (जनसत्ता)

मुंबई पर आतंकी हमले के बारह साल बाद भी असल गुनहगारों के खिलाफ पाकिस्तान ने कोई कार्रवाई नहीं कर खुद ही इस बात का प्रमाण दे दिया है कि वह हमले के आरोपियों को बचा रहा है। जाहिर है, यह हमला उसी ने करवाया था, इसलिए गुनहगारों को बचाना उसकी मजबूरी भी है। वरना क्या कारण है कि मुंबई हमले को अंजाम देने वाले सलाखों के पीछे नहीं हैं! शुरू में तो पाकिस्तान इस हमले में अपना या अपने किसी नागरिक का या अपनी जमीन पर मौजूद किसी भी आतंकी संगठन का हाथ होने से साफ इंकार करता रहा था। लेकिन जैसे-जैसे जांच तेज हुई और भारत ने पाकिस्तान को पुख्ता सबूत सौंपे और उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनना शुरू हुआ, तब कहीं जाकर वह हरकत में आया। लेकिन आज स्थिति यह है कि किसी भी आतंकी के खिलाफ कोई ऐसी कार्रवाई नहीं हुई है, जिससे यह संदेश जाए कि पाकिस्तान मुंबई हमले के गुनहगारों पर कड़ा शिकंजा कस रहा है।

छब्बीस नवंबर 2008 की रात पाकिस्तान से नौकाओं में सवार हो कर आए लश्करे-तैयबा के दस आतंकियों ने जिस बड़े पैमाने पर मुंबई में हमले किए थे, उससे दुनिया दहल गई थी। इस हमले में अमेरिका और इजराइल के नागरिकों सहित एक सौ छियासठ लोग मारे गए थे और तीन सौ से ज्यादा जख्मी हो गए थे। तीन दिन तक आतंकियों से लोहा लेने के बाद सुरक्षा बलों ने नौ आतंकियों को मार गिराया था और एक आतंकी अजमल कसाब को जिंदा पकड़ लिया था, जिसे साल 2012 में भारत में कानूनी प्रक्रिया के तहत फांसी की सजा दी गई थी।

यह कोई छिपी बात नहीं है कि भारत में अब तक जितने आतंकी हमले हुए हैं, वे लगभग सभी पाकिस्तान सरकार के इशारे पर ही हुए हैं। इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि मुंबई हमले के आतंकी पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से लगातार संपर्क में थे। हमले की गहन जांच के बाद भारत ने साल 2009 में पाकिस्तान को अकाट्य सबूतों और सभी आतंकियों के डीएनए के साथ जो दस्तावेज सौंपे थे, उनको आधार मान कर यदि पाकिस्तान सरकार ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ हमले के आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करती तो सारे गुनहगार आज सलाखों के पीछे होते। लेकिन सच्चाई यह है कि आतंकी संगठनों के सरगना पाकिस्तान सेना और आइएसआइ के संरक्षण में हैं।

पाकिस्तानी अदालतों ने भारत के सबूतों को आधा-अधूरा बता कर खारिज कर दिया। दिखावे के लिए पाकिस्तान सरकार ने एक जांच आयोग बनाया भी था, लेकिन इस आयोग ने क्या किया, कोई नहीं जानता। हालांकि पाकिस्तान की जांच एजेंसियों ने मुंबई हमले की साजिश में लश्कर के आतंकी जकीउर रहमान लखवी सहित बारह आतंकियों को गिरफ्तार किया था, जिसमें लखवी को बाद में जमानत मिल गई।

मुंबई हमले का असली साजिशकर्ता तो अमेरिकी मूल का पाकिस्तानी नागरिक आतंकी डेविड हेडली है जो अभी अमेरिका के कब्जे में है। अमेरिका ने भारत को भरोसा दिलाया है कि वह मुंबई हमले के सभी आरोपियों को न्याय के कठघरे में लाने के लिए कोशिश करेगा और हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों की सूचना देने वालों को पचास लाख डॉलर का ईनाम देगा। लेकिन अमेरिका का ऐसा वादा किसी बेमानी कवायद से कम नहीं है। अगर अमेरिका की नीयत वाकई साफ है तो पहले वह हेडली को भारत के हवाले करे और फिर जैश और लश्कर के आतंकी सरगनाओं को भारत को सौंपने के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाए। पर सवाल है, क्या अमेरिका ये सब करेगा? अगर आज अमेरिका दोहरे मानदंड नहीं अपनाता तो पाकिस्तान के हौसले इस कदर नहीं बढ़ते। मुंबई हमले के गुनहगारों को असली सजा तो तभी मिलेगी, जब उनके खिलाफ मुकदमे भारत में चलेंगे।

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मौत के अस्पताल (जनसत्ता)

गुजरात में राजकोट के उदय शिवानंद अस्पताल में आग लगने से पांच मरीजों की मौत ने एक बार फिर लापरवाही के सिलसिले को ही उजागर किया है। हैरानी की बात यह है कि इस तरह की घटनाएं पहले भी सामने आईं और बेहद त्रासद नतीजों के साथ कई लोगों की जान चली गई। तब अफसोस और दुख के बावजूद हर बार लोगों को यह लगा था कि कम से कम आगे ध्यान रखा जाएगा और आने वाले समय में ऐसे हादसे नहीं देखने पड़ेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि अस्पताल प्रबंधनों की नजर में हादसों से बचाव के इंतजाम कोई गैर-प्राथमिकता के काम हैं और उसके खतरे की गंभीरता की उन्हें कोई परवाह नहीं है।

गौरतलब है कि राजकोट के उदय शिवानंद अस्पताल को सितंबर महीने में ही कोविड सेंटर के रूप में मंजूरी मिली थी। अस्पताल में फिलहाल कोरोना के तैंतीस मरीजों का इलाज चल रहा था, जहां आइसीयू वार्ड में अचानक आग लग गई। किसी तरह कई मरीजों को बचाया गया, लेकिन पांच लोग आग और धुएं की चपेट में आ गए और उनकी जान चली गई। फिलहाल शॉर्ट सर्किट को वजह बताया गया है। इमारतों में आग लगने की ज्यादातर घटनाओं में इसी को प्रमुख वजह बताया जाता है।

सवाल है कि आग लगने के लिए शॉर्ट सर्किट अगर कारण है भी तो यह कोई चमत्कार नहीं है कि अपने आप हो जाता है। यह निश्चित रूप से बिजली के प्रबंधन से जुड़ी खामी है, रखरखाव में लापरवाही का मामला है। अगर समय-समय पर बिजली के तारों या समूचे कनेक्शन के सही होने और ठीक से काम करने की जांच होती रहे तो उसमें खराबी की वजह से कोई हादसा होने की आशंका को कम या खत्म किया जा सकता है। इसके अलावा, आग से सुरक्षा के इंतजाम के पुख्ता होने की जांच और निगरानी हादसों से बचा सकता है। लेकिन अस्पतालों के प्रबंधनों को यह समझना जरूरी नहीं लगता कि किसी मामूली लापरवाही या चूक के नतीजे में कोई बड़ा हादसा हो सकता है और नाहक ही लोगों की जान जा सकती है।

अफसोसनाक यह है कि अकेले गुजरात में ही इससे पहले पिछले सिर्फ तीन महीनों के दौरान चार अस्पतालों और खासतौर पर कोविड सेंटरों में आग लगने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें कई लोग मारे गए। जबकि मौजूदा दौर में आम लोगों के बीच यह उम्मीद होती है कि अस्पतालों के प्रबंधन और वहां की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कोई समझौता नहीं किया जा रहा होगा, क्योंकि इस तरह के सारे अस्पताल एक तरह से बेहद संवेदनशील जगह के रूप में काम कर रहे हैं।

बहरहाल, राजकोट के अस्पताल में हुए ताजा हादसे की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। अमूमन हर ऐसी घटना के बाद जांच के आदेश जारी होते हैं, लेकिन उसके बाद उसकी रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई होती है, भविष्य में बचाव के इंतजामों के लिए क्या उपाय किए जाते हैं, यह कभी पता नहीं चल पाता। किसी एक हादसे का सबक यह होना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए हर स्तर पर सावधानी बरती जाए और उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि ऐसे हादसों के होने की आशंकाओं को खत्म किया जाए। लेकिन ऐसा लगता है कि बार-बार अस्पतालों में होने वाले हादसों के बावजूद बाकी जगहों पर उसके बारे में सोचना या सावधानी बरतना एक गैरजरूरी काम समझा जा रहा है।

नतीजतन, जो मरीज अस्पताल में स्वस्थ होने या अपनी जान बचाने की भूख में जाते हैं और आगे बेहतर जीवन जी सकते हैं, उनमें से कई महज अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही की वजह से मौत के मुंह में चले जाते हैं।

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Friday, November 27, 2020

संकट और चुनौतियां (जनसत्ता)

कोरोना से पार पाने की राह में मुश्किलें आसान होती नजर नहीं आ रहीं। एक तरफ कई राज्यों में फिर से इसका संक्रमण तेजी से फैल रहा है, तो दूसरी ओर इसके टीके आने में बाधा पड़ रही है। उम्मीद की जा रही थी कि इस साल के अंत तक इसका कोई टीका आ जाएगा और जल्दी ही इस संकट से निजात मिल सकेगी।

हालांकि और भी कंपनियां कोरोना टीके का परीक्षण कर रही हैं और सबका दावा है कि इस साल के अंत या फिर अगले साल की शुरुआत तक वे उन्हें बाजार में उतार सकेंगी। मगर आॅक्सफर्ड टीके को लेकर लोगों को सबसे अधिक उम्मीद बनी हुई थी। करोड़ों लोगों को इससे लाभ मिलने का अनुमान है। अब उसके विवादों में घिर जाने से स्वाभाविक ही दूसरे टीकों के परीक्षणों पर संदेह उठेगा।

विषाणुरोधी टीकों का परीक्षण काफी जटिल प्रक्रिया से गुजरता है, खासकर कोविड-19 जैसे विषाणु का टीका तैयार करना काफी चुनौतीपूर्ण काम है। इसमें एक भी चरण में बाधा पहुंचती है या किसी भी तरह का प्रतिकूल प्रभाव नजर आता है, तो वह टीका बनाने वालों के लिए चेतावनी की तरह होता है। हालांकि वैज्ञानिक परीक्षणों में विफलताएं हमेशा एक नया और बेहतर कदम बढ़ाने का अवसर देती हैं, इसलिए इस विफलता को लेकर बहुत निराश होने की बात नहीं है। पर यह अवश्य हुआ है कि इससे कोरोना पर काबू पाने में कुछ विलंब होगा।

भारत जैसे सघन आबादी और लचर स्वास्थ्य सुविधाओं वाले देश में कोरोना बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई जगह लगता है कि सरकारें इस पर काबू पाने की कोशिश करते-करते थक-सी गई हैं। जांचों में शिथिलता दिखाई देने लगी है। जहां जांचें कम हो रही हैं, वहां संक्रमितों की सही संख्या भी नहीं पता चल पा रही। इस तरह कई जगह मान लिया गया है कि वहां कोरोना संक्रमण उतार पर है।

मगर जहां जांचों में तेजी आई है, वहां के आंकड़े चिंताजनक हैं। दिल्ली और महाराष्ट्र में स्थिति ज्यादा खराब है। हालांकि मरने वालों की संख्या में कुछ कमी दर्ज हुई है, पर यह संतोष की बात नहीं। दिल्ली में जिस तरह नए सिरे से संक्रमण बढ़ा है, उससे दूसरे राज्यों को सबक लेने की जरूरत है।

बंदी के बाद बाजार और व्यावसायिक गतिविधियां खुल गई हैं। अपेक्षा की गई थी कि लोग खुद सावधानी बरतेंगे और संक्रमण को फैलने से रोकने में सहयोग करेंगे, मगर वह उम्मीद बेमानी साबित हुई। लोग शायद भुला बैठे हैं कि कोरोना का भय अभी समाप्त नहीं हुआ है। बिना नाक-मुंह ढंके और उचित दूरी का ध्यान रखे खुलेआम बाहर निकल रहे हैं, जगह-जगह भीड़भाड़ लगा रहे हैं।

इसे देखते हुए दिल्ली में मास्क न पहनने वालों पर जुर्माने की राशि चार गुना बढ़ी दी गई। अब उपराज्यपाल ने कहा है कि भीड़भाड़ लगाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। कई जगह आंशिक बंदी की गई है। ऐसे में दूसरे शहरों-कस्बों के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्या स्थिति होगी। कोरोना टीके के परीक्षण में देर लग रही है, इसलिए सरकारों से अधिक सतर्कता और सक्रियता की अपेक्षा की जाती है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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राजनीति:अनियोजित शहरीकरण से बढ़ती मुश्किले (जनसत्ता)

सुविज्ञा जैन

शहरीकरण को आजकल किसी देश की आर्थिक और सामाजिक वृद्धि का सूचक माना जाता है। लेकिन अगर यह अनियंत्रित तरीके से होने लगे तो वह बड़ी समस्या बन जाता है। अपने देश में तो शहरीकरण ने अनेक समस्याएं खड़ी कर दी हैं। हालांकि हकीकत यह भी है कि तेज शहरीकरण के बावजूद आज भी देश की पैंसठ फीसद आबादी गांवों में बसती है।

यानी अगर शहरीकरण को विकास का पैमाना मान भी लिया जाए तो हम दुनिया के ज्यादातर देशों से अभी बहुत पीछे माने जाएंगे। बहरहाल, कितने भी पीछे हों, लेकिन जितना और जैसा शहरीकरण हो रहा है उसने गंभीर सोच-विचार के लिए हमें मजबूर कर दिया है। खासकर तब, जब शहरीकरण की मौजूदा चाहत के चलते अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक देश की शहरी आबादी गांवों की आबादी से ज्यादा हो जाएगी।

कुछ दशकों से देश में शहरों का फैलाव जिस तेजी से बढ़ा है, उसने कई नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इसे दो कोटियों में बांटा जा सकता है। पहला, शहरों का भौगौलिक रूप से फैलाव यानी गांवों और जंगलों का शहर के अंदर शामिल किया जाना और दूसरा, गांव के लोगों का शहरों में आकर बस जाना। अगर शहरों के भौगोलिक फैलाव की बात करें तो इससे पर्यावरण और खेती के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

जंगल घटते जा रहे हैं। इससे जलवायु परिवर्तन का असर और बढ़ रहा है। खेती की जमीन को आवासीय और उद्योग की श्रेणी में लाए जाने से किसान खुद भी अपनी जमीनें बेच रहे हैं। वे खेती छोड़ रहे हैं। इस समय बढ़ती भयावह बेरोजगारी के बीच एकमुश्त रकम पाने के लिए ग्रामीण भारत के एक बड़े वर्ग का इस तरह अपनी आजीविका का साधन खो देना आगे बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है।

कथित विकास की चाहत में अब पर्यावरण की चिंता कम की जाने लगी है। शहरी बसावटों के फैलने से नदियों के पाट सिकुड़ते जा रहे हैं। जल प्रबंधन की चुनौतियां बढ़ रही हैं। इस बात को भी कौन नकार सकता है कि अनियोजित और अवैध निर्माणों से ज्यादातर जलाशयों का पेटा खत्म हो चुका है। जहां तहां बाढ़ की समस्या खड़ी होने लगी है। इसी तरह जंगलों के घटने से वन्यजीव मुश्किल में हैं।

देश के महानगरों में प्रदूषण की चर्चा अब पूरी दुनिया में होने लगी है। हम भले आजकल प्रदूषण के अलग-अलग कारण बताते रहें, लेकिन हकीकत है कि उद्योगीकरण पर्यावरण को बुरी तरह बिगाड़ रहा है। हालांकि प्रौद्योगिकी ने प्रदूषणमुक्त विकास के नए-नए तरीके ईजाद किए हैं, लेकिन ये सारे तरीके इतने खर्चीले हैं कि अगर इन्हें अपनाएं तो औद्योगिक उत्पाद के दाम बढ़ जाते हैं।

जब हम विकास के सुखभोग का खर्चा उठाने के लिए बिलकुल तैयार न हों तो पर्यावरण के बचाव के उपायों को अपनाना बहुत दूर की बात हो जाती है। बहरहाल, देश के शहरी इलाकों में प्रदूषण की तीव्रता इस कदर बढ़ रही है कि आज भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित शीर्ष देशों में शामिल हो गया है। पिछले कुछ सालों से दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर भारत के ही गिनाए जाने लगे हैं। संबधित नियोजकों और विशेषज्ञों को अगर आगे कोई सोच-विचार करना हो तो यह भी याद दिलाया जा सकता है कि प्रदूषण अब सिर्फ वायु तक सीमित नहीं, जल और जमीन भी इसकी चपेट में हैं।

शहरों की आबादी बढ़ने से पैदा चुनौतियों के अन्य कारणों को भी समझना चाहिए। मसलन, आज गांव में रोजगार के मौके कम होने और खेती घाटे का व्यवसाय बन जाने से गांव की एक बड़ी आबादी शहरों की ओर पलायन कर चुकी है। ग्रामीण बेरोजगारी हद से ज्यादा बढ़ने से आने वाले समय में यह आंकड़ा और बढ़ने का अंदेशा है। शहरों में इतनी बड़ी आबादी की जरूरतें पूरी करने की क्षमता नहीं है। धीरे-धीरे देश के सभी मुख्य शहर जनसंख्या घनत्व के मामले में गंभीर स्थिति में आते जा रहे हैं। शहरों में रोजगार के मौके सीमित हैं। ऐसे में ज्यादा आबादी की वजह से हर किसी के पास अपनी जरूरत लायक कमाने का साधन नहीं है।

बढ़ती आबादी से शहरों में आवास भी एक बड़ी समस्या है। ज्यादातर लोग एक कमरे के घर में या झुग्गी झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं। स्लम यानी मलिन बस्तियों की समस्या अलग है। शहरों की झुग्गी झोपड़ियों में न पानी और बिजली की आपूर्ति हो पाती है और न ही बाकी सुविधाएं उन तक पहुंच पाती हैं। आबादी का घनत्व बढ़ने और साफ-सफाई के अभाव की वजह से इन बस्तियों के लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के शिकार अधिक बनते हैं।
देश के शहरों को अगर नगर नियोजन की कसौटी पर कसें तो कमोबेश हर शहर का घनत्व नियमों को तोड़ता दिखाई दे रहा है।

ज्यादा से ज्यादा आवास परियोजनाएं बनाने के चक्कर में घनत्व के नए-नए पैमाने बनाने पड़ रहे हैं। पार्क या खुली जगह के लिए कम से कम जगह छोड़ी जा रही है। अब ऐसा कोई शहर नहीं बचा है, जहां की परिवहन व्यवस्था जनसंख्या घनत्व का बोझ उठा पा रही हो। वाहनों की बढ़ती संख्या ने वायु प्रदूषण की समस्या को कई गुना बढ़ा दिया है। चौड़ी से चौड़ी सड़कों पर घंटों जाम लगने लगा है।

इसका मुख्य कारण शहरों में बढ़ता आबादी का घनत्व ही माना जाना चाहिए। गौर करें तो शहरी इलाकों के घनत्व के पैमानों की चर्चा ही नहीं होती। दरअसल, कम से कम जमीन पर ज्यादा से ज्यादा लोगों को बसाने का अर्थशास्त्र नगर नियोजकों पर दबाव बढ़ा रहा है कि वे नए-नए तर्क तलाशें और शहरों में ज्यादा से ज्यादा घनत्व को मान्यता देने का नया पैमाना बनाएं।

शहरों में बढ़ती आबादी कई और संकट पैदा कर रही है। इनमें पानी की कमी सबसे बड़ी समस्या है। आज देश का शायद ही कोई शहर बचा हो जो पानी की कमी से न जूझ रहा हो। खासकर महानगरों के खाते में उतना पानी उपलब्ध ही नहीं है, जितनी उनकी जरूरत है। सबसे बड़ी मिसाल खुद देश की राजधानी दिल्ली है। जल विज्ञानी हिसाब लगाएंगे तो दिल्ली के जलग्रहण क्षेत्र में बरसा कुल पानी कम है और उसकी सालाना खपत ज्यादा है। इसीलिए ज्यादातर शहर भूजल पर आश्रित हो गए हैं। एक चिंताजनक रिपोर्ट है कि कई शहरों में भूजल का स्तर इतना नीचे जा चुका है कि वहां जल संकट कभी भी एक हादसा बन सकता है।

शहरों से निकले कूड़े-कचरे का निस्तारण एक अलग चुनौती है। यह इतनी बड़ी समस्या बन गई है कि शहरों की गंदगी अब गांवों के सिर डाली जाने लगी है। कूड़ा प्रबंधन में दसियों शहर नाकाम होते जा रहे हैं। लैंडफिल नाम से जो व्यवस्थाएं थी वहां कूड़े के इतने ऊंचे पहाड़ बन गए कि उनके ढह कर बिखरने का खतरा खड़ा हो गया है। सभी तरह के कूड़े के पुनर्चक्रण की चर्चाएं बहुत होती हैं, लेकिन कहीं से भी बड़ी सफलता की खबर नहीं सुनाई देती। अगर गंभीरता से कोई अध्ययन किया जाए तो शहरीकरण से पैदा दसियों और चुनौतियां दिख सकती हैं।

कुल मिलाकर बात यह निकलती है कि शहरीकरण सामाजिक स्तर और आर्थिक वृद्धि का सूचक जरूर माना जाने लगा है, लेकिन यह तभी ठीक है, जब शहर योजनाबद्ध तरीके से विकसित किए जाएं। विशेषज्ञों की समझ के मुताबिक सिर्फ आज के लिहाज से नहीं, बल्कि आगे के कई दशकों की जरूरत के हिसाब से सोचने की जरूरत पड़ती है। बहरहाल, देश इस समय अनियोजित शहरीकरण का शिकार नजर आ रहा है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Thursday, November 26, 2020

Editorial : प्रदूषण की आग (जनसत्ता)

दिल्ली में किसी छोटे पहाड़ की तरह दिखते कचरे के बड़े ढेर कोई नई समस्या नहीं हैं। बदलते मौसम में अलग-अलग वजहों से ये कचरे के ढेर आसपास के इलाकों में प्रदूषण फैलाते हैं। साल-दर-साल यह समस्या गहराती गई है, लेकिन इसे लेकर अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आ सका है। हालांकि कई बार इन कचरे के ढेरों में आग लगने से लेकर ढह जाने की वजह से बड़े हादसे भी हो चुके हैं।

तब सरकार की ओर से इस पर चिंता जताई जाती है, समस्या का समाधान करने के आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन फिर कुछ दिन बाद हालात पहले की तरह ही सहज भाव से चलने लगते हैं। मसलन, मंगलवार की रात पूर्वी दिल्ली के गाजीपुर में लैंडफिल साइट यानी कूड़े के ढेर में एक बार फिर आग लग गई और उससे न केवल आसपास के इलाकों के सामने एक बड़े हादसे का खतरा पैदा हुआ, बल्कि लगातार बढ़ते धुएं से समूचा वातावरण प्रदूषित हो गया। आग की तीव्रता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उसे बुझाने पहुंची दमकल की कई गाड़ियां एक जगह बुझा रही थीं और आग दूसरी जगहों पर फैल जा रही थी।

गौरतलब है कि दिल्ली में गाजीपुर, ओखला और भलस्वा सहित कुछ जगहों पर शहर का अवशिष्ट डालने की जगहें निर्धारित की गई है। किसी भी कचरे के ढेर से प्रदूषण होना आम बात है। सवाल है कि अगर सरकार ने अवशिष्ट डालने की जगहें निर्धारित की हैं, तो उसके प्रदूषित होने या आग लगने जैसी स्थितियों का सामना करने के लिए क्या उपाय किए गए हैं! निश्चित रूप से दस्तावेजों में इससे संबंधित नियम-कायदे तय किए गए होंगे।

लेकिन इस पर कितना अमल होता है, यह ऐसी जगहों पर अक्सर होने वाली दुर्घटनाओं से पता चलता है। गाजीपुर में कचरे के जिस ढेर में आग लगी, उसमें तीन साल पहले भी ऐसा ही हुआ था, जिस पर काबू पाने में दमकल विभाग को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। उस साल उस ढेर में अचानक ही एक बड़ा धमाका भी हुआ था, जिससे हजारों टन कचरा व्यस्त सड़क की तरफ ढह गया। उसकी चपेट में सड़क पर वहां से गुजर रही पांच कारें नहर में गिर गई और दो लोगों की मौत हो गई। तब कचरे के इस पहाड़ को कम करने या इस निर्धारित जगह को किसी अन्य जगह पर स्थानांतरित करने की भी मांग उठी थी।

किसी ऐसी घटना से सबक लेकर उससे बचाव के इंतजाम करना सरकार की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। लेकिन गाजीपुर में तीन साल पहले आग लगने, विस्फोट से पहाड़ ढह जाने से हुए हादसे के बावजूद इससे बचने के उपाय सुनिश्चित करना जरूरी नहीं समझा गया। राजधानी दिल्ली में अमूमन हर साल इस मौसम में प्रदूषण से निपटना एक बड़ी चुनौती होती है।

प्रदूषित हवा और धुएं के गुबार से जब हालात बेलगाम होने लगते हैं तब सरकार और संबंधित महकमे अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए कभी पड़ोसी राज्यों में पराली जलाए जाने तो कभी कोई अन्य वजह बता कर समस्या को भ्रमित करने की कोशिश करती हैं। लेकिन शायद ही कभी ऐसा होता है जब ऐसा लगे कि सरकार वास्तव में प्रदूषण की समस्या को खत्म करने या इस पर काबू पाने की ईमानदारी से कोशिश कर रही है।

खासतौर पर मौजूदा महामारी के दौर में जब प्रदूषण से हर हाल में बचना सभी स्तर पर एक अनिवार्य काम बन गया है, उसमें कचरे के ढेरों में आग लगना क्या दर्शाता है? क्या केवल प्रदूषण के विरुद्ध युद्ध के नारे से इस समस्या से निजात पाई जा सकती है?

सौजन्य - जनसत्ता।
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Editorial : विरोध और विरोधाभास (जनसत्ता)

कृषि कानूनों के विरोध में एक बार फिर बड़ी तादाद में किसान सड़कों पर उतर आए हैं और वे दिल्ली की तरफ आगे बढ़ रहे हैं। इसमें देश भर के किसान संगठन हिस्सा ले रहे हैं। पंजाब से दिल्ली की तरफ बढ़ते इन किसानों को रोकने के लिए हरियाणा सरकार ने अगले दो दिन के लिए राज्य की सीमाएं बंद कर दी हैं। इसके पहले भी किसान दिल्ली पहुंचे थे और राजपथ पर उग्र प्रदर्शन किया था। पंजाब से किसान इसलिए दिल्ली की तरफ कूच करने में सफल हो पा रहे हैं कि वहां कांग्रेस की सरकार है और वह खुद केंद्र के इन कानूनों का विरोध कर रही है। जिन प्रांतों में भाजपा की सरकारें हैं, वहां किसानों को सख्ती से रोकने का प्रयास किया जा रहा है।

हरियाणा में भी किसान इन कानूनों के खिलाफ लामबंद हैं, पर वहां उन पर सख्ती से अंकुश लगाने की कोशिश की जा रही है। पर पुलिस बल के जरिए किसानों को धरने-प्रदर्शन से रोक कर सरकारें उनके आक्रोश को कितना दबा पाएंगी, कहना मुश्किल है। केंद्र और भाजपा शासित राज्य सरकारें बार-बार दलील दे रही हैं कि कृषि कानून किसानों के हित में हैं, पर इस बात से किसान संतुष्ट नहीं हो पा रहे, तो जाहिर है कि कहीं न कहीं कोई कमी या भ्रम जरूर बना हुआ है।

सार्वजनिक हित में कानून बनाना सरकारों का कर्तव्य है। मगर यह भी उनका दायित्व है कि अगर उन कानूनों को लेकर विरोध या असहमति के स्वर उभरते हैं, तो उन्हें सुना और उनमें मौजूद कमियों को दूर किया जाए। कृषि कानूनों में सबसे बड़ा विरोध किसान मंडियों को खत्म करने को लेकर हो रहा है। किसानों को लग रहा है कि इस तरह कृषि उत्पाद का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होना बंद हो जाएगा और निजी कंपनियां मनमाने तरीके से दरें तय करने लगेंगी।

हालांकि केंद्र सरकार कह चुकी है कि वह न्यूनतम समर्थन मूल्य समाप्त नहीं करेगी, पर किसानों को इस पर भरोसा नहीं हो पा रहा। यह ठीक है कि किसान मंडियां पूरे देश में प्रभावी नहीं हैं और न पूरे देश में बड़ी जोत के किसान हैं, जिन्हें किसान मंडियों के खत्म होने से नुकसान उठाना पड़Þ सकता है। मगर नए कानूनों से निजी कंपनियों को लाभ मिलने की आशंका पैदा हो गई है, तो इसके समाधान के लिए प्रयास होने ही चाहिए। पहले ही कृषि उत्पादों पर निजी कंपनियों की दखल बढ़ने से महंगाई पर काबू पाना कठिन बना हुआ है, इसे लेकर सरकारों की भी चिंता होनी चाहिए।

किसी कानून या फैसले पर असहमति या विरोध हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। उससे निपटने का तरीका यह नहीं हो सकता कि दमन का रास्ता अख्तियार किया जाए। किसान नेताओं के साथ मिल-बैठ कर उनकी बातें सुनी जाएं और कानूनों में रह गई कमियों को दूर किया जाए। अगर किसानों को किन्हीं बिंदुओं पर भ्रम बना हुआ है, तो उसे दूर करना भी सरकार की ही जिम्मेदारी है।

जबसे यह कानून बना है, तभी से इसका लगातार विरोध हो रहा है। मगर यह समझना मुश्किल है कि सरकार इसे लेकर फैले भ्रमों को तार्किक ढंग से दूर करने के बजाय बल प्रयोग का सहारा क्यों ले रही है। सरकारों पर लोगों का भरोसा तभी बना रहता है, जब उनके फैसलों में पारदर्शिता होती है। ऐसा न हो तो उन पर विपक्षी दलों को अपनी राजनीतिक गोटियां बिठाने का मौका मिलता है और आम लोगों में असंतोष गाढ़ा होता है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Editorial : अभिव्यक्ति पर अंकुश (जनसत्ता)

एक ऐसे दौर में जब दुनिया भर में लोकतांत्रिक स्वरों और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए आवाजें उठ रही हैं, केरल में पहले से लागू कानूनों में संशोधन करके बोलने के अधिकार पर अंकुश लगाने की कोशिश हैरान करती है। हालांकि इस कदम के साथ ही देश भर में इसके खिलाफ तीखी आवाजें उठीं, उसके बाद राज्य की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार ने इस अधिनियम को वापस लेने की घोषणा की।

विचित्र यह भी है कि सरकार और मोर्चे में शामिल अन्य दलों तक को इस मसले पर विश्वास में लेने की जरूरत नहीं समझी गई थी। जबकि संशोधित केरल पुलिस अधिनियम के अमल में आने के बाद बोलने की आजादी पर अंकुश लगाए जाने की आशंका खड़ी हो रही थी। शायद यही वजह है कि न केवल राज्य की विपक्षी पार्टियां, बल्कि खुद सत्ताधारी खेमे में शामिल सहयोगी पार्टियों ने भी इस अधिनियम पर आलोचनात्मक रुख अख्तियार किया।

इसका हासिल यह हुआ कि सरकार ने इसे असहमति का सम्मान करने का हवाला देकर वापस लेकर वापस लेने की घोषणा कर दी। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने केरल पुलिस अधिनियम में संशोधन करके उसमें एक नया प्रावधान जोड़ा था, जिसके तहत अगर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर जारी टिप्पणियों के जरिए किसी की मानहानि या अपमान करता तो उसे दस हजार रुपए जुर्माना, तीन साल की कैद या दोनों सजा एक साथ दी जा सकती थी।

सही है कि एक संवेदनशील मसले पर विपक्ष और अन्य सभी पक्षों की ओर से आई आपत्तियों के मद्देनजर केरल सरकार ने लोकतांत्रिक चरित्र का उदाहरण पेश करते हुए अपने कदम वापस खींच लिए। लेकिन सवाल है कि जिस कानून से लोकतंत्र की बुनियाद के रूप में बोलने या अभिव्यक्ति की आजादी बाधित होने की आशंका खड़ी हो रही हो, उसे लागू करने की केरल सरकार को इतनी हड़बड़ी क्यों थी! राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथी पार्टियां निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मुखर पक्षधर रही हैं।

अक्सर दूसरे दलों की सरकारों की ओर जब लोगों पर गैरजरूरी पहरेदारी जैसे कोई नियम-कायदे थोपे जाते हैं, तब वामपंथी पार्टियां जरूरी सवाल उठाती हैं। लेकिन सत्ता में होने पर उसके पैमाने क्यों बदल जाते हैं? इस बात की सफाई केवल यह नहीं हो सकती कि यह प्रावधान केवल महिलाओं और बच्चों को साइबर अपराधों और धमकियों से बचाने के लिए किया गया था और इस पर अन्य पक्षों की ओर से आपत्ति जताए जाने के बाद सरकार ने अपना फैसला बदल लिया।

दरअसल, इस कानून से जुड़े संवेदनशील पहलू पर गौर करना, व्यवहार में उसके असर का ध्यान रखना और अन्य सहयोगियों और विपक्षी पार्टियों से सलाह लेना लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता को सुनिश्चित करता। इसके बजाय सरकार ने मनमर्जी तरीके से इस कानून को थोपना चाहा। यह किसी से छिपा नहीं है कि देश में कई ऐसे कानून अमल में आएं, जिन्हें लागू करते हुए यह आश्वासन दिया गया था कि इससे देश विरोधी गतिविधियों और आतंकवाद को रोकने में मदद मिलेगी। लेकिन व्यवहार में ऐसे कुछ कानूनों के दुरुपयोग पर तीखे सवाल उठे और उन्हें लोकतंत्र, आलोचना, अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले और दमन के औजार के तौर पर देखा गया।

इसी के मद्देनजर केरल में अब वापस ले लिए गए संशोधित कानून का इस्तेमाल स्वतंत्र स्वरों और आलोचनाओं के दमन के लिए होने की आशंकाएं जताई जा रही थीं। जबकि आलोचनाओं की मंशा अगर बेवजह अपमानित करना या धमकी देना न हो तो आलोचक स्वर लोकतंत्र को मजबूत करते हैं। बेहतर हो कि आधुनिक और सभ्य होती दुनिया में निजता की सुरक्षा, व्यक्तिगत, सामुदायिक गरिमा सहित लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकारों को भी मजबूत किया जाए।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Editorial : चुनौती का सामना (जनसत्ता)

देश के कुछ राज्यों में कोरोना संक्रमण की रफ्तार जिस तेजी से बढ़ रही है, उससे साफ हैो कि हालात अब बेकाबू हो चुके हैं। यह चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि पूर्णबंदी के दौरान लोगों ने जिस तरह से बचाव के उपाय किए और जोखिम से अपने को बचाया, अब वही लोग घोर लापरवाही बरत रहे हैं और संक्रमण को फैलाने में भागीदार बन रहे हैं। इसमें राज्य सरकारों की लापरवाही भी कम नहीं रही है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर स्थिति की समीक्षा करते हुए साफ कहा कि अब किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त न की जाए, न ही किसी भी तरह की ढील दी जाए। हालात पर काबू पाने के लिए यह जरूरी भी है कि बचाव के उपायों का सख्ती से पालन हो।

राज्यों को प्रधानमंत्री की यह हिदायत भी काफी महत्त्वपूर्ण है कि महामारी का मुकाबला करने के लिए सभी राज्य मिल कर काम करें। इसमें कोई संदेह भी नहीं कि इस संकट से पार पाने के लिए सबको मिल कर ही काम करना होगा। संक्रमण फैलने के लिए राज्य एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराएं या केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल का अभाव दिखे, या राज्य सरकारें केंद्र पर मदद नहीं करने के आरोप लगाएं, इन सबसे काम नहीं चलने वाला।

देश में कोरोना के मामले भले घट रहे हों, लेकिन दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश में तो अब संक्रमण विस्फोटक स्थिति में पहुंच गया है। हालात इतने विकट हैं कि सर्वोच्च अदालत ने भी चिंता व्यक्त करते हुए राज्य सरकारों से पूछा है कि आखिर वे कारगर कदम क्यों नहीं उठा पा रही हैं। आज जो हालात हैं, उसमें इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सरकारों और आमजन की लापरवाही ने ही इस समस्या को अचानक से बढ़ाया है।

त्योहारी मौसम के कारण जिस तरह बाजारों में भीड़ बढ़ी, वह संक्रमण फैलने की बड़ी वजह रही है। जबकि बेहतर यह होता कि बाजारों को खोलने के लिए व्यावहारिक नियम बनाए जाते, ताकि अचानक से भीड़ नहीं बढ़ती। इससे सुरक्षित दूरी के नियम की जम कर धज्जियां उड़ी। दिल्ली सहित देश के तमाम शहरों में बाजारों में भीड़ तो बढ़ी ही, लोगों ने मास्क का उपयोग करने में भी लापरवाही बरती। हालांकि अब मास्क नहीं लगाने पर दिल्ली सहित कई राज्यों में जुर्माना वसूला जा रहा है। लेकिन जुर्माना वसूल पाना भी पुलिस और इस काम में लगाए गए लोगों के लिए संभव नहीं हो पा रहा है।

कोरोना से निपटने के लिए प्रभावी कदम उठाने की दिशा में प्रधानमंत्री ने सबसे ज्यादा जोर आरटी-पीसीआर जांच बढ़ाने पर दिया है। सच्चाई तो यह है कि ज्यादातर राज्यों में जांच का काम उम्मीदों के मुताबिक गति नहीं पकड़ पाया है। जब तक सही जांच नहीं होगी, तब तक संक्रमितों का इलाज नहीं हो सकेगा। आरटी-पीसीआर जांच महंगी पड़ती है, इसलिए कई राज्यों ने इससे पहले ही पल्ला झाड़ लिया।

इसका नतीजा यह हुआ कि संक्रमण तेजी से फैलता गया। जब जांच ही नहीं होगी और लोग संक्रमण से मरेंगे तो कैसे हम कोरोना मृत्युदर को एक फीसद से नीचे रख पाएंगे, यह बड़ा सवाल है। केंद्र और राज्यों के समक्ष अब बड़ी चुनौती आने वाले टीके को लेकर है कि कैसे उसे सुरक्षित देश के करोड़ों लोगों तक पहुंचाया जाएगा। राज्य सरकारों ने अभी से इस दिशा में पुख्ता प्रबंधन नहीं किया तो टीकाकरण के अभियान को भी धक्का लग सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना जैसे संकट से न तो जनता अकेली लड़ सकती है, न सिर्फ सरकारें। दोनों को एक दूसरे का सहयोग करना होगा।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Editorial : तेजाब का दंश (जनसत्ता)

तेजाब से हमले की मार झेलती युवतियों या महिलाओं के जीवन के बारे में सोचना जब किसी अन्य संवेदनशील व्यक्ति के लिए बेहद तकलीफदेह होता है, तो पीड़िता के दुख और उनकी चुनौतियों का महज अंदाजा ही लगाया जा सकता है। विडंबना यह है कि लंबे समय से चिंता जताए जाने के बावजूद अब तक शासन के स्तर पर ऐसी कोई ठोस व्यवस्था अमल में नहीं आई है कि इस तरह के अपराध रोके जा सकें।

तेजाब से हमले की त्रासदी झेलने वाली पीड़ित लड़कियों के लिए शासकीय स्तर पर मुआवजे की राहत के लिए जो व्यवस्था की भी गई है, अगर उसमें भी लापरवाही या फिर बेईमानी की जा रही हो तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है! राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक देश भर में तेजाब से हमले के एक हजार दो सौ तिहत्तर मामलों में करीब आठ सौ पीड़िताओं को अब तक मुआवजा नहीं मिला है। आयोग ने ऐसी घटनाओं पर चिंता जताते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तुरंत संज्ञान लेने को कहा है। यानी जो काम सरकारों को अपनी ओर से बिना किसी के याद दिलाए खुद करना चाहिए था, उसके लिए महिला आयोग को याद दिलाना पड़ रहा है।

दरअसल, तेजाब के हमले से उपजी यह समस्या कई परतों के साथ हमारे आसपास पलती-बढ़ती रही है। उसमें एक ओर जहां समाज में स्त्री विरोधी कुंठाओं से लैस लोगों के प्रति अनदेखी या उसे आम जीवन का सहज हिस्सा मानना एक बड़ा कारण रहा है तो दूसरी ओर सरकार या संबंधित महकमों की ओर से इसकी जड़ों से संचालित अपराधों पर रोक लगा पाने में नाकामी दूसरी बड़ी वजह है।

विडंबना यह है कि घटना के हो जाने के बाद भी सरकार के हिस्से पीड़ित महिला को राहत, मुआवजा मुहैया कराने और दोषियों को सख्त सजा दिलाने का काम बचता है। लेकिन सरकार का रवैया ऐसा होता है, जिसमें संवेदनशीलता की झलक नहीं मिलती है। सवाल है कि तेजाबी हमलों को रोक पाने में नाकामी के बाद आखिर किन वजहों से इतनी बड़ी तादाद में इस अपराध की पीड़ित कुल महिलाओं में से आधे को भी समय पर मुआवजा तक देना जरूरी नहीं समझा गया? जब सरकार ने किसी नियम के तहत ये प्रावधान किए हुए हैं, तो उस पर अमल सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी है? खुद महिला आयोग के मुताबिक हालत यह है कि कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कई मामलों में पीड़ित महिलाओं को नियमित रूप से इलाज तक की सुविधा मुहैया नहीं कराई जाती।

गौरतलब है कि तेजाब से हमले की त्रासदी झेलने वाली पीड़िताओं को जितनी चोट पहुंची होती है, उसके आधार पर उनके लिए तीन लाख रुपए से आठ लाख रुपए तक का मुआवजा दिया जाता है। यह एक तरह से मामूली राहत भर है, जो उनके जीवन को हुए स्थायी नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती है। मगर इसे देने में भी अगर सरकारें आनाकानी करें तो इससे अफसोसजनक और क्या हो सकता है!

अव्वल तो हमारे यहां अब तक सरकार या समाज की ओर से इस तरह के सामाजिक प्रशिक्षण पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा गया है जिसमें लड़कों या पुरुषों को स्त्रियों के व्यक्तित्व, अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके, उनकी इच्छा का सम्मान करना मानसिकता और विचार का हिस्सा हो। नतीजतन, कई तरह कुंठाओं से घिरे युवक किसी लड़की के सिर्फ मना करने पर तेजाब से हमला कर देते हैं। फिर ऐसे अपराधों के बाद भी सरकार और समाज का रवैया बहुत सकारात्मक नहीं होता है। यह बेवजह नहीं है कि अब ज्यादा सख्त सजा के प्रावधान के बावजूद ऐसे अपराधों को रोक पाना एक मुश्किल काम बना हुआ है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Editorial : साजिश की सुरंग (जनसत्ता)

जम्मू संभाग के सांबा जिले में रिगाल गांव के पास अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सुरंग का मिलना बता रहा है कि भारतीय क्षेत्र में आतंकियों की घुसपैठ कराने के लिए पाकिस्तान कैसे-कैसे हथकंडे अपना रहा है। पिछले एक साल में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भारत ने जिस तरह से चौकसी कड़ी की है और चप्पे-चप्पे पर सीमा सुरक्षा बल और सेना के जवान पहरा दे रहे हैं, उससे आतंकियों की घुसपैठ पर काफी हद तक लगाम लगी है।

ऐसे में पाकिस्तान आतंकियों की घुसपैठ कराने के लिए नित नए तरीके निकाल रहा है। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब सुरंग के रास्ते आतंकियों को घुसाया जा रहा है। पहले भी कई बार ऐसी सुरंगों का पता लगा है और भारत ने साजिश को नाकाम किया है। अगर पांच दिन पहले नगरोटा में बन टोल प्लाजा पर जैश-ए-मोहम्मद के चार आतंकी नहीं मारे जाते तो इस सुरंग का पता शायद ही चल पाता और आतंकी भारत में बेधड़क घुसते रहते। इन आतंकियों के मारे जाने के बाद इनके पास से मिले कई सैटेलाइट फोन की जांच से पता लगा कि ये कहां-कहां से गुजरे थे। इसी को आधार बना कर इलाके की छानबीन की गई और सुरंग का पता चला। इस सुरंग के जरिए अब तक कितने आतंकी भारत में घुस चुके होंगे, कहा नहीं जा सकता।

सीमापार से होने वाली घुसपैठ को रोकना भारतीय सुरक्षा बलों के लिए चुनौती रही है। इसकी वजह यह है कि भारत-पाकिस्तान सीमा कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, गुजरात तक फैली है। कई स्थानों पर जटिल भौगोलिक बनावट, पहाड़ियों, नालों और घने जंगलों के कारण वहां अनवरत पहरा दे पाना संभव नहीं है और आतंकी इसी का फायदा उठा कर घुस आते हैं। पाकिस्तान हर साल कश्मीर में बर्फबारी से पहले बड़ी संख्या में आतंकियों को घुसाने का अभियान चला रहा है।

लेकिन अब जब आतंकियों को भेज पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है तो उसने सुरंग जैसे रास्ते निकाल लिए। इसे को लेकर जो जानकारियां सामने आई हैं, उनसे साफ है कि घुसपैठ जैसा काम बिना सेना की मदद के संभव नहीं है। यह कोई छिपी बात नहीं है कि पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ ही आतंकी संगठनों को खड़ा करते हैं, उन्हें हथियार और धन मुहैया कराते हैं, नौजवानों को बम बनाने से लेकर तमाम आतंकी गतिविधियों का प्रशिक्षण देते हैं और फिर इन्हें अपने मिशन पर भेजते हैं। जिस तरह से इस सुरंग को तैयार किया गया, वह प्रशिक्षित इंजीनियरों की टीम ही कर सकती है, अकेले आतंकियों के बस की बात नहीं है। इन कामों के लिए जिस बड़े पैमाने पर संसाधनों की जरूरत होती है, वे सेना और सरकारी तंत्र की मदद के बिना संभव कैसे हो सकते हैं!

सीमा पर बढ़ती आतंकी गतिविधियों को लेकर कई तरह की सूचनाएं हैं। मसलन, पठानकोट हमले के आरोपी और जैश के कमांडर कासिम को भारतीय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आतंकी घुसपैठ कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसी तरह सीमा क्षेत्रों में दूसरे आतंकी संगठन भी घुसपैठ के लिए तैयार बैठे हैं। सवाल है कि क्या पाकिस्तान सरकार इन सब गतिविधियों से अनजान है? नगरोटा की घटना के बाद भारत ने नई दिल्ली में पाकिस्तान उच्चायोग के अधिकारी को बुला कर चेताया भी है। एक तरफ तो पाकिस्तान अपने यहां मौजूद आतंकी संगठनों पर कार्रवाई का भरोसा दे रहा है और दूसरी ओर भारत से लगती सीमा पर आतंकियों की घुसपैठ करवा रहा है। उसकी यह दोहरी नीति ही उसके असल चेहरे को उजागर कर रही है।

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Editorial : हादसों की सड़क (जनसत्ता)

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुए हादसे से एक बार फिर सड़क सुरक्षा को लेकर प्रश्न गाढ़े हुए हैं। शुक्रवार देर रात को लखनऊ-प्रयागराज मार्ग पर एक तेज रफ्तार निजी वाहन सड़क किनारे खड़े ट्रक से टकरा गया, जिसमें सात बच्चों समेत कुल चौदह लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। वाहन में सवार लोग एक विवाह समारोह से लौट रहे थे। जाहिर है, वाहन चालक या तो नशे में रहा होगा या फिर सड़क पर ट्रक कुछ इस तरह खड़ा होगा कि उसका अंदाजा लगाने और वाहन को नियंत्रित कर पाने में विफल हुआ होगा, जिससे यह हादसा हो गया होगा।

इस हादसे पर राज्य के मुख्यमंत्री ने शोक जताया है, मृतकों के परिजनों को मुआवजे की घोषणा की है और उत्तर प्रदेश पुलिस ने ऐसे अंधेराग्रस्त और खतरनाक स्थानों पर चेतावनी वाले बोर्ड लगाने का भरोसा दिलाया है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर हादसे जैसे रोज की बात हैं। इन्हें लेकर लंबे समय से चिंता जाहिर की जा रही है और सड़क सुरक्षा के इंतजाम करने की तरफ राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का ध्यान आकर्षित किया जाता रहा है। मगर इस दिशा में अभी तक कोई अपेक्षित कदम नहीं उठाया जा सका है।

पश्चिमी देशों की नकल पर हमारे यहां भी ऐसी सड़कों के विस्तार पर जोर दिया जाने लगा। माना गया कि इससे माल ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन सुविधाओं में गति आएगी। निस्संदेह गति आई भी। मगर राष्ट्रीय राजमार्गों पर जैसी सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, वह अभी तक हमारे यहां नहीं हो पाई। निजी कंपनियों को जिम्मेदारी सौंप कर या फिर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर सड़कों के निर्माण की गति देकर आधारभूत संरचना को मजबूत करने का प्रयास किया गया। इन सड़कों के निर्माण की एवज में जगह-जगह टोल नाका भी लग गए, जिससे कर वसूल कर सड़क बनाने वाली कंपनियां अपनी लागत की भरपाई करती हैं।

कायदे से इन कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे अपने हिस्से की सड़कों पर सुरक्षा इंतजाम करें। मगर वे इस मामले में लापरवाह ही देखी जाती हैं। जगह-जगह सड़कों और पुलों में टूट-फूट बनी रहती है, सड़कों के किनारे बाड़ या अवरोध नहीं होते, जिससे बरसात आदि के समय गाड़ियों के पहियों को फिसलने से रोका जा सके। बीच-बीच में खतरनाक कटाव मौजूद हैं, जहां से लोग और वाहन सड़क पार करते रहते हैं। कई जगह खतरनाक मोड़ों वगैरह से संबंधित जानकारियां नहीं लगी होती हैं। इसके चलते भी सड़क दुर्घटनाएं अक्सर हो जाती हैं।

भारत में इतनी मौतें कैंसर जैसे असाध्य रोग से नहीं होतीं, जितनी सड़क दुर्घटना से हो जाती हैं। इस पर काबू पाने के लिए परिवहन नियमों को कड़ा बनाया गया, रफ्तार आदि से संबंधित जुर्माने बढ़ाए गए, मगर उनका असर नजर नहीं आता। राजमार्गों पर गतिसीमा निर्धारित नहीं होती, इसके चलते बहुत सारे युवा उन पर तेज रफ्तार वाहन चलाना अपनी शान समझते हैं।

किसी आपात स्थिति में तेज गति वाहनों को संभालना मुश्किल होता है, इसलिए भी अनियंत्रित होकर वे दुर्घटनाग्रस्त हो जाते और लोगों की मौत का कारण बनते हैं। राजमार्गों पर बने टोल नाका और दूसरे अवरोधों पर कर तो वसूले जाते हैं, पर नशा करके गाड़ी चलाने वालों की निशानदेही और उन पर कार्रवाई की पहल नहीं होती। जबकि देर रात को हुई अनेक दुर्घटनाओं में नशा करके गाड़ी चलाना मुख्य कारण पाया गया है। जब तक इन कमजोर पहलुओं को दुरुस्त करने का प्रयास नहीं किया जाता, सड़क दुर्घटनाओं पर काबू पाना मुश्किल बना रहेगा।

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Editorial : सेहत की फिक्र (जनसत्ता)

नीति आयोग ने देश के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए खर्च बढ़ाने की जो जरूरत रेखांकित की है, उसे इस बात की स्वीकारोक्ति माना जाना चाहिए कि हमारा स्वास्थ्य क्षेत्र सिर्फ कमजोर ही नहीं है, बल्कि आबादी के हिसाब से अपर्याप्त भी है। हालांकि यह कोई छिपा तथ्य नहीं है और सारी सरकारें इस हकीकत से वाकिफ हैं। लेकिन कटु सत्य यह है कि आमजन के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं सरकारों की प्राथमिकता में कभी रही नहीं।

इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र बीमार होता चला गया। पिछले आठ महीनों के कोरोना काल में स्वास्थ्य सेवाओं की जो बदहाली उजागर हुई, वह बहुत ही निराशाजनक तस्वीर पेश करती है। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे को मजबूत कैसे बनाया जाए, अब इस पर तेजी से काम करने का वक्त आ गया है। सवा अरब से ज्यादा आबादी वाले देश के लिए मजबूत और कारगर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को खड़ा करने के लिए भारी-भरकम रकम चाहिए। नीति आयोग के सदस्य वी के पॉल का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और उन्हें देश के हर व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्यों- दोनों को ही स्वास्थ्य सेवाओं की मद में खर्च बढ़ाना होगा।

जिस राज्य का पहला कर्तव्य अपने नागरिकों को पर्याप्त व उच्च गुणवत्ता वाला भोजन, उत्कृष्ट शिक्षा और स्वास्थ्य मुहैया कराना होना चाहिए, आज वह उन्हीं में सबसे ज्यादा नाकाम रहा है। आज भी देश में स्वास्थ्य सेवाओं का जो आलम है, उन्हें देख कर तो लगता है कि लोगों को उनके हाल पर ही छोड़ दिया गया है। यही वजह है कि देश में जहां एक तरफ झोलाछाप डॉक्टरों की भरमार है तो दूसरी ओर निजी क्षेत्र के अस्पताल सिर्फ मुनाफा बनाने में मग्न हैं।

कहने को देश के हर जिले में अस्पताल हैं, ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी हैं, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र ठप जैसी हालत में ही हैं। लंबे समय तक डाक्टर नदारद रहते हैं, दवाइयां नहीं होती, अस्पतालों में बिस्तर नहीं हैं, आॅपरेशन का सामान नहीं होता, साफ-सफाई का तो सवाल ही नहीं। ग्रामीणों को जरा-जरा सी बीमारियों के इलाज के लिए इलाज के लिए शहरों की ओर भागने को मजबूर होना पड़ता है। हालांकि ये प्रशासनिक तंत्र की खामियां हैं, जिन्हें सतत निगरानी से दूर किया जा सकता है। पर ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा, यह बड़ा सवाल है।

भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में जीडीपी का मात्र डेढ़ फीसद ही खर्च होता है। यानी सबसे जरूरी मद में सबसे कम खर्च। हालांकि सरकार ने अगले पांच साल में इसे तीन फीसद तक करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन भारत की जरूरतों के हिसाब से तो तीन फीसद भी नाकाफी है। दुनिया के कई देश स्वास्थ्य की मद में आठ से नौ फीसद तक खर्च कर रहे हैं। भले हम दूसरे देशों से होड़ न करें, लेकिन एक बेहतर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र खड़ा करने के लिए जितना जरूरी खर्च करने की जरूरत है, उतना तो किया जाए।

चाहे नीति आयोग द्वारा बनाया राज्यों का स्वास्थ्य सूचकांक देख लें, या वैश्विक स्वास्थ्य सेवा सूचकांक, भारत में चिकित्सा क्षेत्र की बदहाली की कहानी सब एक जैसे ही कहते मिलेंगे। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को बेहतर बनाने में धन संबंधी कोताही महंगी साबित हो रही है। भारत ने जिन बीमारियों से मुक्ति के लिए अगले एक दशक के लक्ष्य तय किए हैं, वे भी पैसे के अभाव में पूरे नहीं हो पाएंगे और देश की आबादी का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित ही बना रहेगा।

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Editorial : पाक का पाखंड (जनसत्ता)

लश्करे-तैयबा के संस्थापक और वैश्विक आतंकी हाफिज सईद को पाकिस्तान की एक अदालत ने दस साल की कैद की सजा सुनाई है। पाकिस्तानी न्यायपालिका के इस फैसले से पहली नजर में तो संदेश यही गया है कि आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान सरकार का रुख एकदम स्पष्ट और कड़ा है और वह आतंकी सरगनाओं के खिलाफ कार्रवाई में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? आतंकियों, उनके संगठनों और साम्राज्य को लेकर पाकिस्तान सरकार ने क्या सही में कड़ा रुख अपना लिया है?

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सब जानते हैं। हाफिज सईद को सजा, उसे जेल में बंद रखने और उसके संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें हैरानी इसलिए पैदा करती हैं क्योंकि यह पाकिस्तान का झूठ और पाखंड है। सईद को सजा पहले भी होती रही हैं और ऐसी कार्रवाइयां कर पाकिस्तान दुनिया की आंखों में धूल झोंकता रहा है। सवाल यह है कि अगर सईद और उसके संगठन के खिलाफ पाकिस्तान सरकार इतनी सख्त है तो फिर कैसे सईद जेल से आतंकी अभियानों को अंजाम देने में लगा है? दो दिन पहले जम्मू-कश्मीर में नगरोटा में बड़ा हमला करने वाले आतंकी लश्कर के ही थे।

पाकिस्तान दुनिया में किसी अच्छे या नेक काम के लिए नहीं, बल्कि आतंकवाद फैलाने वाले देश के रूप में जाना जाता है। उसे यह तमगा दशकों तक उसके करीबी मददगार रहे अमेरिका ने ही दिया है। आतंकवाद के खात्मे के लिए अमेरिका से पाकिस्तान को जो पैसा मिलता रहा, वह उसे आतंकवाद फैलाने में इस्तेमाल करता रहा। खुद अमेरिका की एजेंसियां इस बात का खुलासा कर चुकी हैं। अमेरिका पर सबसे बड़े आतंकी हमले के असली सूत्रधार अलकायदा सरगना उसामा बिन लादेन को पाकिस्तान ने अपने यहां छिपाए रखा था।

दरअसल, आतंकवाद पाकिस्तान की सरकारी नीति का हिस्सा है। यह बात भी दुनिया से छिपी नहीं है कि पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ ही आतंकी संगठनों को पैसे, हथियार और प्रशिक्षण मुहैया कराती है। लेकिन पिछले कुछ समय से पाकिस्तान पर पश्चिमी देशों ने जिस तरह से शिकंजा कसना शुरू किया है और विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे वित्तीय संस्थानों से आर्थिक मदद मिलने में उसे जिस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, उससे छुटकारा पाने के लिए ही पाकिस्तान अब हाफिज सईद जैसों के खिलाफ कुछ कदम उठाने को मजबूर हुआ है, हालांकि सब जानते हैं कि यह दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं है।

भारत में संसद भवन पर हमले से लेकर मुंबई हमले और उसके बाद पठानकोट, उरी जैसे जितने आतंकी हमले हुए, वे पाकिस्तान की जमीन से ही हुए। आतंकी सरगना पाकिस्तान में बैठ कर हमलावरों को निर्देश देते रहे। भारत इन सभी हमलों के गुनहगारों को उसे सौंपने की मांग करता रहा है। सभी हमलों में आतंकी संगठनों की भूमिका के अकाट्य प्रमाण भी पाकिस्तान को दिए जा चुके हैं। लेकिन पाकिस्तान तो इस बात से ही इंकार करता रहा है कि हमलों के असली साजिशकर्ता उसके यहां मौजूद हैं।

पुलवामा हमले की बात तो खुद पाकिस्तान सरकार के मंत्री ने हाल में संसद में स्वीकार की। इस बात के भी प्रमाण सामने आ चुके हैं कि मुंबई बम कांड का सरगना दाउद इब्राहिम पाकिस्तान में सेना और आइएसआइ की पनाह में रह रहा है, लेकिन पाकिस्तान इस हकीकत को भी झुठलाता रहा है और दाऊद को अब तक भारत को नहीं सौंपा है। हाफिज सईद जैसे आतंकियों की असली सजा तो यह होगी कि पाकिस्तान उन्हें भारत के हवाले करे और भारत उन्हें सजा दे।

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Editorial : बचाव की प्राथमिकता (जनसत्ता)

कोरोना के महामारी घोषित होने के बाद इससे बचाव की तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी लोगों के इससे संक्रमित होने का सिलसिला रुका नहीं है। संक्रमण पर काबू पाने के मकसद से लागू पूर्णबंदी, मास्क लगाने, दैहिक दूरी बरतने के साथ बार-बार हाथ धोने जैसे अन्य उपायों के बीच इसका जोर थोड़ा कम होता हुआ दिखा था, लेकिन अब कुछ शहरों में फिर से संक्रमण के मामले बढ़ने के बीच यह चिंता स्वाभाविक है कि इसका ठोस इलाज कब सामने आएगा।

पिछले कई महीने से दुनिया के अलग-अलग देशों में कोविड-19 के इलाज के लिए कारगर टीका तैयार करने का काम जोर-शोर से जारी है और इसमें प्रगति की भी सूचनाएं हैं। हालांकि यह भी तथ्य है कि किसी भी गंभीर संक्रमण वाली बीमारी का टीका तैयार करने में लंबा वक्त लगता है। उसे अनेक प्रयोगों और परीक्षणों के दौर से गुजरना पड़ता है, उसे पूरी तरह सुरक्षित होने की कसौटी पर परखा जाता है। इस लिहाज से देखें तो अभी यह तय नहीं है कि कोविड-19 से बचाव के लिए जिन टीकों पर काम हो रहा है, उसके अंतिम रूप से तैयार होकर सामने आने में कितना वक्त लगेगा। मगर टीका आने के बाद जरूरतमंद तबकों के बीच प्राथमिकता के मुताबिक वहां तक उसकी पहुंच सुनिश्चित करना भी एक बड़ी चुनौती होगी।

इस संदर्भ में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का यह बयान महत्त्वपूर्ण है कि टीका तैयार होकर आने के बाद स्वास्थ्यकर्मियों और बुजुर्गों को प्राथमिकता दी जाएगी। ये दोनों ही तबके चूंकि कोरोना के संक्रमण में आने के लिहाज से ज्यादा जोखिम की स्थिति में होते हैं, इसलिए इन्हें पहले सुरक्षित बनाना एक सही कदम होगा। अब तक दुनिया भर में यही देखा गया है कि इस बीमारी की जद में आने और जीवन गंवाने वालों में सबसे ज्यादा बुजुर्ग ही रहे। इसके अलावा, कोविड-19 के मरीजों के इलाज के क्रम में सीधे संपर्क में आने और खुद भी संक्रमित होने की वजह से कई डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की भी जान गई।

गौरतलब है कि कोरोना से बचाव के लिए कई देशों में टीका तैयार करने की कोशिश जारी है। कुछ समय पहले रूस की ओर से दावा किया गया था कि वहां चिकित्सा वैज्ञानिकों ने स्पुतनिक नामक टीका तैयार कर लिया है। तब इस महामारी का सामना करने के मामले में एक बड़ी उम्मीद जगी थी। लेकिन किसी भी संक्रामक रोग के लिए टीका तैयार करने की जो प्रक्रिया है, उसकी जटिलता और उसमें लगने वाले वक्त के मद्देनजर फिलहाल जल्दबाजी में तैयार किए गए टीके को लेकर अभी वैश्विक स्तर पर सहमति नहीं बन पाई है।

दरअसल, टीका तैयार करने को लेकर अधिकतम उच्चस्तरीय सावधानी की जरूरत इसलिए भी पड़ती है कि एक टीका जो जीवन रक्षक की भूमिका निभा सकता है, उसी में बरती गई बेहद मामूली कोताही किसी व्यक्ति के शरीर में दूसरी बीमारियां पैदा कर सकता है, उसकी जान तक जा सकती है। यही वजह है कि मनुष्यों को लगाए जाने वाले किसी भी टीके को पहले प्रयोगशालाओं में विभिन्न चरणों और पशुओं पर प्रयोग के बाद कुछ मानव समूहों पर भी परीक्षण के दौर से गुजारा जाता है। उसके दुष्परिणामों की हर आशंका को खत्म करके उसे निर्दोष बनाया जाता है। इसलिए यह ध्यान रखने की जरूरत होगी कि जो भी टीका तैयार होने के बाद उपलब्ध कराया जाए, वह वर्तमान और भविष्य में आम लोगों की सेहत के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित हो। इन तथ्यों के मद्देनजर फिलहाल इसका इंतजार करना होगा कि तमाम प्रयोगों और परीक्षणों से गुजरने के बाद दुनिया के चिकित्सा वैज्ञानिक किस टीके लेकर एक राय पर पहुंच पाते हैं।

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Editorial : दागी नुमाइंदे (जनसत्ता)

राजनीति को आपराधिक छवि के लोगों या दागियों से मुक्त कराने के लिए लंबे समय से सवाल उठाए जाते रहे हैं। इस मसले पर अपनी अध्ययन रिपोर्ट में कई संस्थाएं चुनाव लड़ने और जीतने वाले लोगों की पृष्ठभूमि का विश्लेषण कर बताते रहे हैं कि इस समूची प्रवृत्ति का राजनीति और जनता के हितों पर क्या असर पड़ सकता है। राजनीति के अपराधीकरण की आंच आए दिन न केवल जनप्रतिधिनियों के आचरण पर दिखती रही है, बल्कि आम लोगों के सरोकारों से संबंधित मसलों पर इसका नकारात्मक असर भी सबके सामने रहा है। अदालतों ने भी अपने स्तर पर ऐसे लोगों पर लगाम लगाने की कोशिश की है।

इसके बावजूद आज भी अमूमन हर विधानसभा और संसद के आम चुनावों के बाद चुने गए जनप्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि का अध्ययन और विश्लेषण करने पर निराशा हाथ लगती है। मसलन, हाल ही में संपन्न हुआ बिहार विधानसभा चुनाव देश में चर्चा का विषय रहा। लेकिन परिणामों के बाद न केवल जनप्रतिनिधियों के स्तर पर, बल्कि सरकार गठन तक के मामले में जिस तरह अपराध की छाया दिखी, वह हैरान करने वाली है।

गौरतलब है कि बिहार इलेक्शन वाच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर के ताजा अध्ययन के मुताबिक कुल दो सौ तैंतालीस सदस्यों वाले बिहार विधानसभा के लिए नए चुने गए विधायकों में से एक सौ बयालीस आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। इनमें से नब्बे यानी चालीस फीसद पर हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे संगीन मामले दर्ज हैं।

सत्तर विधायकों पर आरोप तय किए जा चुके हैं। क्या ऐसी ही तस्वीर के बूते राजनीति को दागियों से मुक्त करने की उम्मीद की जा रही है? ऐसा नहीं है कि इस छवि या पृष्ठभूमि के विधायक किसी एक दल से हैं। ज्यादातर पार्टियों ने जिस तरह आपराधिक छवि के लोगों को अपना टिकट दिया, उससे साफ है कि ऊपरी तौर पर राजनीति में अपराधियों के बोलबाले पर विरोध जताने वाले नेता और उनकी पार्टियां वास्तव में कितना इसके विरुद्ध हैं।

आमतौर पर सभी दल अपनी सुविधा मुताबिक ऐसे लोगों को उम्मीदवार बना देते हैं, जो राजनीति के अपराधीकरण के लिए जिम्मेदार होते हैं। फिर ऐसे लोग जब चुन कर विधायिका या सरकार में जगह भी पा जाते हैं तो निश्चित रूप से उनका असर सरकार के कामकाज की शैली से लेकर नीतियों तक पर पड़ता है और जनता लाचार देखती रहती है।

इस बढ़ती समस्या यानी राजनीति और सरकार में अपराधियों के बढ़ते दबदबे के लिए अक्सर राजनीतिक विश्लेषकों की ओर से जनता को भी कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है। सही है कि जनता को अपने विवेक का उपयोग कर आपराधिक छवि वाले लोगों को वोट नहीं देना चाहिए। लेकिन सवाल है कि जो आम मतदाता मुद्दों के आधार पर सरकार हटाना या बनाना चाहते हैं, वे उन स्थितियों में क्या करें जब उनके सामने विचारधारा आधारित समर्थन के क्रम में पार्टी के किसी वैसे उम्मीदवार को वोट देना मजबूरी हो, जो आपराधिक पृष्ठभूमि का होता है!

कभी-कभार अगर किसी खास विधायक या सांसद के अपराधों पर चर्चा तूल पकड़ने लगती है, तब सरकार को उसे हटाना पड़ता है। बिहार में नई सरकार के गठन के तीन दिन के भीतर शिक्षा मंत्री का पदभार संभालने के कुछ देर बाद मेवालाल चौधरी का इस्तीफा इसका उदाहरण है। मेवालाल चौधरी पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर में उपकुलपति रहते हुए सहायक प्राध्यापक और जूनियर वैज्ञानिक की नियुक्ति में अनियमितता बरतने के आरोप हैं। चुनाव प्रक्रिया को अपराध से मुक्त, स्वच्छ और स्वतंत्र तरीके संपन्न कराने का क्या हासिल, अगर आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार चुन कर कर विधानसभा, लोकसभा या सरकार में पहुंचते रहें!

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Editorial : दहशतगर्दी का दायरा (जनसत्ता)

तमाम सख्ती, चौकसी, सघन तलाशी अभियान और नियंत्रण रेखा पर गहन गश्ती के बावजूद पाकिस्तान पोषित दहशतगर्दों की घुसपैठ पर नकेल कसना चुनौती बना हुआ है। पहाड़ों पर बर्फबारी शुरू होते ही उनकी ये हरकतें और बढ़ जाती हैं। पुलवामा में सीआरपीएफ काफिले पर हथगोला फेंकने और फिर जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर हुई मुठभेड़ इसके ताजा उदाहरण हैं। हथगोला फेंकने से बारह स्थानीय लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग के टोल नाके पर सुरक्षाबलों ने एक संदिग्ध ट्रक को रोका, तो उसमें सवार दहशतगर्दों ने गोलीबारी शुरू कर दी। फिर घेराबंदी करके उसमें सवार चारों आतंकवादियों को मार गिराया गया। उनके पास से भारी मात्रा में विस्फोटक और अत्याधुनिक हथियार बरामद हुए। सुरक्षा बलों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में इतने भारी साजो-सामान के साथ घुसपैठ की कोशिश नहीं देखी गई। ट्रक में चावल की बोरियां लदी थीं और फिर रेत की बोरियों से बंकर बना कर आतंकवादी उसमें छिपे थे। उनके पास से बरामद सामग्री से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे किसी बड़ी वारदात को अंजाम देना चाहते थे। गनीमत है, समय रहते उनकी साजिश नाकाम हो गई।

मारे गए दहशतगर्दों का संबंध जैश-ए-मोहम्मद से होने का अनुमान है, जिसका संचालन पाकिस्तान की सरजमीं से होता है। जबसे जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त हुआ है, घाटी में आतंकवादी घुसपैठ बढ़ गई है। हालांकि निरंतर चौकसी और सख्ती की वजह से ज्यादातर मामलों में घुसपैठियों को मार गिराया गया है। कश्मीर में उनके संगठनों को पनपने से रोक दिया गया है।

पहले जिस तरह दहशतगर्द घाटी के युवाओं को बरगला कर हथियार उठाने के लिए उकसाने में कामयाब हो जाते थे, अब नहीं हो पाते। इन संगठनों को बाहर से मिलने वाली वित्तीय मदद पर भी रोक लगी है, जिससे उनके प्रसार पर काफी असर पड़ा है। फि

र भी पाकिस्तान कोई न कोई रास्ता तलाश ही लेता है घाटी में उनकी घुसपैठ कराने का। पिछले डेढ़ सालों में पाकिस्तानी सेना ने संघर्ष विराम उल्लंघन के सारे रेकार्ड तोड़ डाले हैं। वहां की सेना तभी गोलीबारी करती है, जब उसे आतंकवादियों की घुसपैठ करानी होती है। इस पर भारत की सख्त चेतावनी के बावजूद पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आता। यह संयोग मात्र नहीं है कि एक दिन पहले प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स सम्मेलन में आतंकवाद से निपटने के लिए एकजुटता पर बल दिया। चीन को भी पाकिस्तान की इन हरकतों को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

भारत जब भी अपने यहां आतंकवादी घटनाओं से संबंधित दस्तावेज सौंपता है, तो पाकिस्तान उसे सिरे से खारिज करने का प्रयास करता है। यहां तक कि उसकी अदालतें भी उन दस्तावेजों को कोई प्रमाण मानने से इनकार कर देती हैं। मुंबई हमले के साजिशकर्ता हाफिज सईद को लेकर उसका रवैया सदा से यही रहा है। हालांकि अब वहां की एक अदालत ने उसे दस साल जेल की सजा मुकर्रर कर दी है, पर उस पर कितना अमल हो पाएगा, देखने की बात है।

सरगना दहशतगर्दों के खिलाफ पाकिस्तान ऐसी कार्रवाइयां अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने अपनी प्रतिबद्धता जताने के मकसद से महज दिखावे के लिए करता रहा है। अनेक बार ऐसा हो चुका है कि आतंकी संगठनों के मुखिया के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाती है, फिर उन्हें सरकारी संरक्षण में सेना के कड़े पहरे के बीच रखा जाता है। पाकिस्तान की हकीकत को समझते हुए चीन जैसे उसके समर्थक देशों को आतंकवाद के विरुद्ध खड़ा होना ही चाहिए।

सौजन्य - जनसत्ता।
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