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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Friday, February 26, 2021

वित्त का विस्तार (जनसत्ता)


 अब सरकार ने निजी बैंकों के लिए भी सरकारी लेनदेन का रास्ता खोल दिया है। अभी तक पेंशन, कर भुगतान, राजस्व से जुड़े लेनदेन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों या संबंधित संस्थानों के माध्यम से ही होते हैं, पर अब वे सारे काम निजी बैंकों में भी हो सकेंगे। केंद्रीय वित्तमंत्री ने इस फैसले के बारे में जानकारी देते हुए उम्मीद जताई है कि इससे बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी और लोगों को काफी सहूलियत हो जाएगी। इस तरह निजी बैंक भी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में बराबर के सहभागी होंगे। हालांकि पहले भी कुछ क्षेत्रों में निजी बैंकों के लिए कारोबार के रास्ते खोले जा चुके हैं। मसलन, बीमा के क्षेत्र में निजी बैंकों को कारोबार की अनुमति बहुत पहले दे दी गई थी। उसके पहले मुख्य रूप से दो सरकारी कंपनियां बीमा संबंधी काम करती थीं। निजी बैंकों को इस क्षेत्र में उतरने की इजाजत मिलने से प्रतियोगिता बढ़ी और लोगों को अनेक दुश्वारियों से निजात मिली। यही नहीं, लोगों को यह भी सुविधा दी गई कि अगर वे अपनी बीमा कंपनी से खुश नहीं हैं तो दूसरी बीमा कंपनी में जा सकते हैं। इससे हर निजी बैंक और बीमा कंपनी लोगों को आकर्षित करने के लिए बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास करती है। अभी तक लोगों को अपनी पेंशन आदि के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के किसी बैंक में खाता खुलवाना होता है और उसी की मार्फत वे उसका भुगतान प्राप्त कर सकते हैं। कई लोगों की शिकायत रहती है कि उनकी पेंशन का भुगतान समय पर नहीं मिल पाता या बैंक उनके साथ ठीक से व्यवहार नहीं करते। अब इसके लिए निजी बैंकों को भी इजाजत मिलने से निस्संदेह प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी। फिर ऐसे लोगों को भी सुविधा हो जाएगी, जिनके खाते निजी बैंकों में हैं। अब वे पेंशन पाने के लिए अलग से बैंक खाता खुलवाने को बाध्य नहीं होंगे। इसी तरह करों के भुगतान की सुविधा निजी बैंकों में मिलने से बहुत सारे लोगों को बेवजह कुछ खिड़कियों पर कतार में नहीं लगना पड़ेगा, खिड़कियों का विस्तार होगा और लोग अपनी सुविधा से उनका चुनाव कर सकेंगे। बचत पत्रों की खरीद भी अब केवल सरकारी बैंकों और डाक घरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि निजी बैंकों से भी इनकी खरीद की जा सकती है। स्वाभाविक है, इससे वित्तीय सेवाओं का विस्तार होगा और बैंकों के कारोबार में सहजता आएगी। दरअसल, सरकारी योजनाओं और राजस्व संबंधी लेनदेन इसलिए सार्वजनिक बैंकों में अनिवार्य किया गया था कि किसी अनियमितता की स्थिति में सरकार खुद उसकी भरपाई के लिए जिम्मेदारी ले सकेगी। इसके अलावा यह भी कि बैंकों का कारोबार चूंकि मुख्य रूप से लोगों के धन से चलता है, इसलिए कम से कम सरकारी योजनाओं और लेनदेन से जुड़े काम अगर सार्वजनिक बैंकों के माध्यम से होंगे, तो उन बैंकों की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी। चूंकि सरकारी योजनाओं के लिए धन आबंटन, कर्ज आदि की जिम्मेदारी सार्वजनिक बैंकों पर होती है, इसलिए उनकी स्थिति जब तक सुदृढ़ नहीं होगी, सरकारी योजनाओं को गति दे पाना मुश्किल होगा। पिछले कुछ सालों से सरकारी बैंकों की माली हालत कुछ ठीक नहीं है। उनका बहुत सारा पैसा बट्टे खाते में फंसा हुआ है। ऐसे में सरकारी लेनदेन से जो कुछ वित्तीय मजबूती उन्हें मिल पा रही थी, वह निजी बैंकों को इसमें हिस्सेदारी मिलने से कुछ कमजोर होने की आशंका बनी रहेगी। डाकघर जैसी इकाइयां भी कुछ ठीक स्थिति में नहीं हैं, उन्हें इस कदम से झटका लग सकता है।

सौजन्य - जनसत्ता।

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दायरे में अभिव्यक्ति (जनसत्ता)

किसी भी लोकतांत्रिक समाज और देश की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वहां वैचारिक सहमति और असहमति को अभिव्यक्त करने की आजादी एक अधिकार के रूप में स्वीकार्य हो। लेकिन कई बार देखा जाता है कि अभिव्यक्ति की निर्बाध आजादी का इस्तेमाल कुछ लोग इस तरह करने लगते हैं जिससे भावनाओं के भड़कने और यहां तक कि अराजकता फैलने की आशंका खड़ी हो जाती है। खासतौर पर जब से सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों का विस्तार हुआ है, उस पर अपनी राय जाहिर करने की सुविधा तक बहुत सारे लोगों की पहुंच बनी है, तब से एक बड़ी आबादी को अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए एक नया आाकाश जरूर मिला है, लेकिन इसके बरक्स ऐसे तमाम लोग भी हैं, जो इन मंचों का इस्तेमाल अपनी कुत्सित मंशा को पूरा करने के लिए करने लगे हैं। ऐसी घटनाएं अक्सर दर्ज की गई हैं, जो महज एक व्यक्ति के आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर फैलाए गए भ्रम के चलते होती है और उसमें नाहक ही जानमाल का नुकसान हो जाता है। विडंबना यह है कि सोशल मीडिया के मंचों पर ऐसी हरकतें करने वाले लोगों की वजह से कभी झूठी धारणा तो कभी अराजकता फैल जाती है, लेकिन इसके नुकसानों की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता है। शायद इसी के मद्देनजर केंद्र सरकार ने गुरुवार को अगले तीन महीने में एक कानून लाने की घोषणा की है, जिसके जरिए डिजिटल माध्यमों पर सामग्रियों को नियमित किया जा सकेगा और इसके लिए जिम्मेदारी तय की जा सकेगी। सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया गलत तस्वीर दिखाने को लेकर लगातार शिकायतें आ रही थीं; चूंकि अपराधी भी इसका इस्तेमाल करने लगे हैं, इसलिए ऐसे मंचों से संबंधित एक नियमित तंत्र होना चाहिए। अब सरकार ने सोशल मीडिया के नियमन से संबंधित जो दिशानिर्देश लाने की बात कही है, उसके मुताबिक फेसबुक या ट्विटर जैसे किसी भी मंच को शिकायतों पर विचार करने के लिए अफसरों की तैनाती करनी होगी और आपत्तिजनक सामग्री को चौबीस घंटे के भीतर हटाना होगा। अफवाह फैलाने वाले पहले व्यक्ति की पहचान करके उसकी जानकारी देनी होगी। साथ ही ओटीटी प्लेटफार्म या डिजिटल मीडिया को भी अपनी सामग्री तैयार करने के बारे में बताना होगा। इसके अलावा, कई अन्य बिंदु दिशानिदेर्शों में शामिल किए गए हैं, जिनका मकसद सरकार के मुताबिक अवांछित मनमानीपन और अराजकता पर लगाम लगाना है। दरअसल, आज सोशल मीडिया के साथ-साथ अभिव्यक्ति के दायरे का जो विस्तार हुआ है, उसमें बहुत सारे लोगों को अपने विचार को सार्वजनिक रूप से साझा करने का मौका मिला है। मुश्किल यह है कि इन्हीं मंचों पर कुछ असामाजिक तत्त्व भी कई बार नफरत और हिंसा फैलाने के मकसद से अफवाह फैला देते हैं। ऐसे लोग आमतौर पर पकड़ में नहीं आते। निश्चित तौर पर ऐसे लोगों की पहचान करने और उनके खिलाफ साइबर कानूनों के तहत कार्रवाई सुनिश्चित किया जाना चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि इस प्रवृत्ति के लोगों की वजह से वाजिब अभिव्यक्ति की आजादी प्रतिबंधित नहीं की जानी चाहिए। गलत को परिभाषित करने का अधिकार अगर कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित किया जाएगा तो इसका भी दुरुपयोग संभव है। अगर सरकार सोशल मीडिया और ओटीटी मंचों पर होने वाली गतिविधियों को नियमित करने जा रही है तो उसे इस बात का खयाल रखना चाहिए कि इसके नाम पर नियंत्रण की कोई ऐसी व्यवस्था नहीं खड़ी हो जाए, जो लोकतंत्र को सीमित या बाधित कर दे। एक विचार से सहमति-असहमति की प्रक्रिया और उसके प्रति सहिष्णुता किसी व्यक्ति या समाज को उदार बनाती है, उसमें लोकतांत्रिक मूल्यों का विस्तार करती है और इस तरह मानवीय संवेदनाओं की बुनियाद मजबूत होती है।

सौजन्य - जनसत्ता।

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मंगल का रहस्य (जनसत्ता)

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का अंतरिक्ष यान पर्सवियरेंस मंगल ग्रह की धरती पर सुरक्षित उतर गया।", यह वहां के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का बहुत महत्त्वाकांक्षी अभियान है। स्वाभाविक ही उसके सुरक्षित उतरने से वैज्ञानिकों में खुशी और उत्साह है। इसमें भारत के लिए गौरव की बात यह है कि इस अभियान में भारतीय मूल की एक वैज्ञानिक भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। यह अमेरिका का नौवां मंगल अभियान है। अब तक के उसके अभियानों में करीब आधे विफल रहे हैं। उन सबके अनुभवों के आधार पर इस यान को अधिक सुरक्षित और कुछ विशेष सुविधाओं से लैस किया गया है। यह न सिर्फ मंगल की तस्वीरें भेजेगा, बल्कि वहां की मिट्टी, चट्टानें आदि भी अपने साथ लाएगा, जिसके अध्ययन से पता लगाने में मदद मिलेगी कि वास्तव में वहां कभी जीवन था भी या नहीं। अभी तक मंगल ग्रह की तस्वीरों को देख कर सिर्फ अनुमान लगाया जा सका है कि वहां अरबों साल पहले जीवन रहा होगा। उसकी सतह पर बनी खाइयों और स्रोतों से अंदाजा लगता है कि कभी जल स्रोत भी रहे होंगे। इसलिए पर्सवियरेंस का वहां उतरना मंगल ग्रह संबंधी अध्ययनों में बहुत मददगार साबित हो सकता है। पृथ्वी से बाहर की दुनिया के बारे में जानना मनुष्य के लिए सदा से जिज्ञासा का विषय रहा है। सतत अंतरिक्ष अध्ययनों से सौरमंडल के ग्रहों के बारे में काफी कुछ जानकारी प्राप्त की जा चुकी है। मगर उनमें से कहीं भी जीवन की संभावना नजर नहीं आई है। कुछ साल पहले जब मंगल ग्रह पर जल स्रोतों जैसी तस्वीरें सामने आर्इं, तो वैज्ञानिकों की खोज की दिशा बदल गई। भरोसा पैदा हुआ कि अगर कभी वहां जल रहा होगा, तो जीवन भी जरूर रहा होगा। वह जीवन कैसा था, वहां किस प्रकार के जीव-जंतु, वनस्पतियां अदि पाई जाती थीं। फिर वहां जीवन समाप्त हो गया, तो उसकी वजह क्या थी। उन सब तथ्यों के बारे में पता लगाने को लेकर वैज्ञानिक उत्सुक हुए। इसी के चलते विभिन्न देशों ने अपना ध्यान चंद्र अभियान की अपेक्षा मंगल अभियान की तरफ केंद्रित करना शुरू कर दिया। भारत ने भी मंगल मिशन शुरू किया था, पर उसमें अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई। अंतरिक्ष का अध्ययन कई कारणों से महत्त्वपूर्ण माना जाता है। चूंकि पृथ्वी भी सौरमंडल की एक इकाई है, जब दूसरे ग्रहों पर कोई हलचल होती है, तो उसका प्रभाव इस पर भी पड़ता है। चूंकि जीवन सिर्फ पृथ्वी पर है, इसलिए मानव जीवन की सुरक्षाा की दृष्टि से भी अंतचरिक्ष के दूसरे ग्रहों पर चल रही हलचलों पर नजर रखना बहुत जरूरी होता है। मंगल ग्रह पर अगर जीवन के प्रमाण मिलते हैं, तो आगे यह पता लगाने में भी मदद मिल सकती है कि वहां किन स्थितियों के चलते जीवन समाप्त हो गया। ग्रहों की स्थितियों के बारे में जानना केवल ज्योतिष विज्ञान का विषय नहीं है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि जब दूसरे ग्रहों की स्थिति में बदलाव होता है, तो मनुष्य के जीवन पर भी उसका प्रभाव पड़ता है, पृथ्वी की जलवायु, वनस्पतियों, सूक्ष्म जीवों के स्वभाव में भी बदलाव नजर आने लगता है। यह भी तथ्य है कि तमाम ग्रहों की स्थिति में निरंतर कुछ न कुछ बदलाव होता रहता है। सूर्य सहित सारे ग्रह कुछ न कुछ क्षरित भी हो रहे हैं। इसलिए अंतरिक्ष अध्ययनों में सफलता चाहे जिस देश के वैज्ञानिकों को मिले, उससे पूरी मानव जाति के लिए भविष्य का रास्ता मिलता है।

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Saturday, January 23, 2021

चीन के मंसूबे (जनसत्ता)

गलवान घाटी विवाद की आंच अभी ठंडी भी नहीं पड़ी कि चीन ने अब अरुणाचल प्रदेश में मोर्चा खोल दिया है। अपना पुराना रवैया दोहराते हुए चीन ने कहा है कि तिब्बत के दक्षिणी हिस्से- जंगनान क्षेत्र जो कि भारत का अरुणाचल प्रदेश है, को लेकर उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है और वह अरुणाचल प्रदेश को कोई मान्यता नहीं देता। हाल में यह विवाद तब उठा जब अरुणाचल प्रदेश के सुबनसिरी जिले में सरी चू नदी के पास एक छोटा गांव बसा देने की चीनी साजिश का खुलासा हुआ। पिछले एक साल में चीन ने जिस गुपचुप तरीके से इस गांव को बसा लिया, वह उसकी पड़ोसी देशों की जमीन हड़पने की नीति का प्रमाण है।

हकीकत यह है कि सुबनसिरी जिले का यह इलाका वास्तविक नियंत्रण रेखा से सटा है और भारत के हिस्से में पड़ता है। लेकिन चीन ने इस पर कब्जा कर रखा है और इसे विवादित क्षेत्र बना रखा है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर इलाका विवादित है भी, तो फिर वह क्यों यहां अवैध निर्माण कर अशांति पैदा कर रहा है। यह इलाका सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से बहुत ही संवेदनशील है और यहां किसी भी तरह की चीनी गतिविधि उकसावे वाली कार्रवाई से कम नहीं है। जाहिर है, चीन भारत को घेरने के लिए नए रास्ते तलाश रहा है।

पिछले कुछ सालों में चीन ने अरुणाचल प्रदेश के सीमाई इलाकों में जिस तेजी से अपना जाल बिछाना शुरू किया है, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भविष्य में चीन इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज करेगा। इसी क्रम में तिब्बत की राजधानी ल्हासा से न्यांगची तक रेल लाइन बिछाने की परियोजना पर तेजी से किया है और यह रेल लाइन अरुणाचल प्रदेश के पास से गुजरती है। न्यांगची से लेकर ल्हासा तक चार सौ नौ किलोमीटर की सड़क वह पहले ही बना चुका है।

चीन का सारा जोर भारत से लगी साढ़े चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा पर जगह-जगह ऐसे निर्माण करना है जिससे सीमाई इलाकों में उसकी पहुंच आसान हो सके। इसीलिए अरुणाचल से लेकर डोकलाम और गलवान तक वह भारतीय सीमा क्षेत्र में पड़ने वाले इलाकों पर कब्जा करता जा रहा है और इन इलाकों को विवादित बना रहा है ताकि भारत इन इलाकों में अपनी पहुंच न बना सके।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद कोई नया तो है नहीं। चीन चाहता भी नहीं है कि सीमा विवाद कभी सुलझे। अगर एक बार सीमा विवाद सुलझ गया तो उसके विस्तारवादी मंसूबे पूरे कैसे होंगे! चीन का भारत के साथ ही नहीं, अपने सभी पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद है और हर देश के भू-भाग को उसने इसी तरह विवादित बना कर कब्जा रखा है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत का रुख शुरू से ही स्पष्ट रहा है कि यह भारत का अभिन्न हिस्सा है।

भारत के रक्षा मंत्रियों के अरुणाचल प्रदेश के सीमाई इलाकों के दौरों पर चीन आपत्ति करता रहा है। हालांकि अरुणाचल प्रदेश में उसकी गतिविधियों पर भारत पर नजर है। सामरिक महत्त्व और चीनी गतिविधियों को देखते हुए भारत ने भी अरुणाचल प्रदेश से सटे सीमाई इलाकों में सड़कों का जाल बिछाने और पुलों के निर्माण के निर्माण का काम जोरों पर है। लेकिन भारत को लेकर चीन जिस तरह की विरोधाभासी और संदेहास्पद कूटनीति अपनाए हुए है, उससे तो लग रहा है कि वह गलवान विवाद को हल करने की दिशा में बढ़ने की बजाय भारत को और बड़े जाल में फंसाने की साजिश रच रहा है।

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Friday, January 22, 2021

अभिव्यक्ति के सामने (जनसत्ता)

हाल ही में डिजिटल माध्यम के एक मंच पर आई वेब शृंखला ‘तांडव’ पर विवाद अब भी थमने के आसार नहीं नजर आ रहे हैं। हालांकि इस शृंखला से उन दृश्यों को हटा दिया गया है, जिन्हें लेकर हंगामा चल रहा है। उसके निर्देशक ने इसके लिए माफी मांगी। इस मामले में निर्देशक और अन्य कुछ लोगों को अदालत से अग्रिम जमानत लेनी पड़ी। हालांकि इसके बाद भी कुछ संगठन सिरीज और उसके निर्माताओं के खिलाफ अदालत में जाने की बात कह रहे हैं।

गुरुवार को कई जगहों से इस मसले पर प्राथमिकी दर्ज कराने की खबरें आर्इं। बल्कि उत्तर प्रदेश की पुलिस सिरीज के निर्देशक और लेखक के घर पूछताछ के लिए पहुंची और नहीं मिलने पर नोटिस चिपका दिया। गौरतलब है कि ‘तांडव’ के कुछ दृश्यों को लेकर कुछ संगठनों ने यह आपत्ति जताई कि इससे उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंची है। इसके बाद कई अन्य संगठन भी इसमें कूद पड़े।

दरअसल, किसी फिल्म के कुछ दृश्यों से आस्था के आहत होने या धार्मिक भावना के चोट पहुंचने का यह कोई नया मामला नहीं है। लेकिन हर बार इस तरह के मौके पर यह सोचने की जरूरत महसूस होती है कि कला माध्यमों में किसी विषय की अभिव्यक्ति की सीमा क्या है और क्या उसे नियंत्रित किया जाना चाहिए। अगर किसी फिल्म में धार्मिक भावनाओं के आहत करने के मकसद से कोई दृश्य परोसा गया है तब उसकी व्याख्या होनी चाहिए और उसे उसके दर्शकों के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वे फिल्म के बारे में क्या राय रखते हैं।

इस तरह से कोई समाज अपनी लोकतांत्रिकता भी बचा लेता है और अपनी समझ को और ज्यादा स्पष्ट बनाता है। मगर विडंबना यह है कि इस तरह के विश्लेषण से गुजरने के बजाय कुछ संगठन सीधे ही आपत्ति और विरोध का झंडा उठा लेते हैं, हिंसक रुख अख्तियार कर लेते हैं और इस तरह विचार और विश्लेषण की किसी भी प्रक्रिया में लोगों के जाने की गुंजाइश खत्म कर देते हैं। जबकि यह प्रक्रिया किसी भी व्यक्ति और समाज को परिपक्व बनने में मददगार होती है।

बहरहाल, इस विवाद के बाद अब संभव है कि सरकार इस तर्क पर फिल्में और दूसरी सामग्री डिजिटल मंचों पर लोगों को मुहैया कराने वाले माध्यम में दखल दे कि किसी को अराजक तरीके से कोई चीज दिखाने की एक सीमा है। मगर सवाल है कि अगर यह रास्ता आगे बढ़ा तो नियंत्रण की यह सीमा कहां तक जा सकती है। जहां तक अदालत का सवाल है, तो करीब तीन दशक पहले ही एक फिल्म ‘ओरे ओरु ग्रामाथिले’ के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में अपना फैसला दिया था। अफसोस की बात यह है कि हमारा जो समाज अब तक अलग-अलग विचारों का संगम रहा है और यही हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती रही है, उसमें अब अभिव्यक्तियों के सामने कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

कला-माध्यमों में किसी विषय-वस्तु को संप्रेषित करने के लिए जिन बिंबों और प्रतीकों का सहारा लिया जाता है, उसका मकसद आमतौर पर आस्था या धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना नहीं होता है। लेकिन अगर कभी किसी को ऐसा महसूस होता भी है तो इसका सबसे बेहतर समाधान विवेक और समझदारी के साथ विषय पर बहस और विचार करना है। यह एक दीर्घकालिक विचार-प्रक्रिया की भी शुरुआत करता है। विडंबना यह है कि इसके बजाय बहुत सारी जरूरी बातें हंगामे और शोर में दब कर रह जाती हैं और उन पर लोगों को सोचने और अपने विवेक के आधार पर राय बनाने में मदद नहीं मिलती है।

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भरोसे की खातिर (जनसत्ता)

कोरोना का टीकाकरण शुरू हुआ तो लोगों में काफी उत्साह और भरोसा दिखा कि अब जल्दी ही इस संक्रमण के खतरे से मुक्ति मिल जाएगी। मगर जैसे-जैसे टीकाकरण आगे बढ़ने लगा, लोगों का उत्साह ठंडा पड़ता नजर आने लगा। टीकाकरण अभियान अपने लक्ष्य से काफी पीछे चल रहा है। जिन लोगों ने इसके लिए पंजीकरण कराया था, वे भी संशकित होकर पांव पीछे खींचने लगे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और मुख्यमंत्रियों का टीकाकरण के दूसरे चरण में आगे आना लोगों के डिगे भरोसे को फिर से बहाल करने में मददगार साबित हो सकता है।

हालांकि टीकाकरण शुरू होने के पहले ही कुछ लोगों ने इस पर एतराज जताना शुरू कर दिया था। कुछ राजनेताओं ने अंतिम परीक्षण से पहले लोगों को लगाए जाने पर सवाल उठाए थे। मगर चिकित्सक लगातार भरोसा दिलाते रहे कि इस टीके का दुष्प्रभाव बिल्कुल नहीं पड़ेगा। इसीलिए टीकाकरण के पहले दिन एम्स के निदेशक और सीरम इंस्टीट्यूट के मुखिया ने खुद टीका लगवाया, ताकि लोगों में भरोसा बन सके। मगर पहले ही दिन कुछ लोगों के अस्वस्थ होने की खबर आ गई। फिर कुछ चिकित्सकों ने चिट्ठी लिख कर विरोध जताया कि वे यह टीका नहीं लगवाएंगे। इन सबका लोगों के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

हालांकि टीकाकरण के पहले चरण में स्वास्थ्यकर्मियों और कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए अगली कतार में काम करने वाले लोगों को लगाया जा रहा है, पर उनमें भी इस टीकाकरण को लेकर भ्रम है। इस बीच कोवैक्सीन बनाने वाली संस्था भारत बायोटेक ने एक निर्देश जारी करते हुए कहा कि जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है या कोई बीमारी है, उन्हें यह टीका नहीं लगवाना चाहिए। उस निर्देश में विभिन्न रोगों की सूची भी दी गई। इस तरह लोगों में पैदा हुई आशंका भय में बदलती नजर आने लगी। स्वाभाविक ही इसका असर टीकाकरण पर पड़ा और यह अभियान अपने लक्ष्य से काफी पीछे चलना शुरू हो गया।

इस तरह टीकों की बर्बादी भी हो रही है, क्योंकि एक बार खुलने के बाद टीके देर तक नहीं रखे जा सकते। जाहिर है, इसे लेकर स्वास्थ्य विभाग और सरकार की चिंता बढ़ गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन बार-बार लोगों को आश्वस्त करते रहे हैं, फिर समझाया है कि टीका लगवाने को लेकर किसी प्रकार की झिझक नहीं होनी चाहिए। अब मुख्यमंत्रियों के साथ हुई बैठक में प्रधानमंत्री ने भी दूसरे चरण में खुद टीका लेने की घोषणा कर दी है, तो निस्संदेह इसका सकारात्मक संदेश जाएगा।

विपक्षी दलों के नेता और बहुत सारे आम लोग भी यह सवाल उठा रहे थे कि अगर कोरोना के टीके सुरक्षित हैं, तो पहले मंत्री और सांसद खुद क्यों नहीं लगवाते। कुछ देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने टीकाकरण के पहले ही दिन टीके लगवाए थे। अब ऐसे सवाल करने वालों के मन में शायद कोई शंका न रहे। यों भी प्रधानमंत्री की बातों का लोगों पर प्रभाव पड़ता है, उनके इस कदम से टीकाकरण अभियान को बल मिलेगा।

हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब किसी व्यापक टीकाकरण अभियान को लेकर लोगों के मन में शंका और भय देखा गया है। चेचक और पोलियो टीकों को लेकर भी शुरू में ऐसी ही भ्रांतियां बनी रही थीं। पोलियो की खुराक को लेकर बने भ्रमों को तोड़ने में लंबा समय लगा था। प्रधानमंत्री और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के इस दिशा में आगे बढ़ने से वह हिचक दूर होगी और स्वास्थ्यकर्मियों तथा आम लोगों का विश्वास बनेगा।

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हौसले की जीत (जनसत्ता)

वरना मैचों के पहले और उसके दौरान टीम की जो तस्वीर दिख रही थी, उसमें तमाम विश्लेषक इस तरह का निश्चित अंदाजा लगाने में नाकाम थे कि नतीजों में इतनी बड़ी उलट-फेर हो सकती है। खासतौर पर जब भारतीय टीम के कई अहम माने जाने वाले खिलाड़ी शृंखला के बीच में ही गंभीर रूप से चोटिल हो गए और विराट कोहली सिर्फ पहला टैस्ट खेलने के बाद छुट्टी लेकर स्वदेश लौट आए, तब यह आशंका खड़ी हुई कि अब मजबूत आस्ट्रेलियाई टीम की चुनौती का सामना कैसे किया जाएगा!

सच यह है कि जब दोनों टीमों के बीच टैस्ट मैचों की शुरुआत हुई थी, तब आस्ट्रेलिया की टीम ने इसे हल्के में लिया और शायद इसी का असर उनके प्रदर्शन पर पड़ा। अब स्थिति यह है कि आस्ट्रेलियाई टीम सहित सभी विश्लेषक भारतीय टीम की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। आस्ट्रेलिया में मीडिया ने भी भारत की शृंखला में 2-1 से जीत को ‘सबसे बेहतरीन वापसी के साथ मिली जीत’ कहा।

गौरतलब है कि एडिलेड मैच में टीम इंडिया के सभी खिलाड़ी टैस्ट इतिहास में अपने सबसे कम स्कोर यानी महज छत्तीस रन पर आउट हो गए थे और उसमें आस्ट्रेलियाई टीम हारी हुई बाजी जीत गई थी। अगर इसको उदाहरण माना जाए तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि भारतीय खिलाड़ियों की क्षमता और मनोबल को किस स्तर से देखा गया होगा।

लेकिन क्षमताओं की असली परीक्षा विपरीत हालात में होती है। चार मैचों की शृंखला में शुरुआत से ही भारतीय टीम जिन मुश्किलों से दो-चार थी, कई अहम खिलाड़ी चोट का सामना कर रहे थे और बाकी खिलाड़ियों को अनुभवहीन माना जा रहा था, उसमें खुश कर देने वाले किसी नतीजे उम्मीद कम थी। इसके अलावा, ब्रिसबेन के गाबा मैदान पर आखिरी टैस्ट में टीम के सामने एक दिन में तीन सौ रन बनाने का लक्ष्य था।

ऐसी स्थिति में ज्यादातर मौकों पर कोई टीम किसी तरह मैच को बराबरी पर खत्म कर लेने के मकसद से खेलती है। लेकिन भारतीय टीम ने चुनौती के इस मौके पर अपने हौसले का सहारा लिया, सामना किया, तीन सौ अट्ठाईस रन का पीछा किया और आखिरकार तीन विकेट से जीत दर्ज की। इस तरह पिछले बत्तीस सालों से ब्रिसबेन के गाबा मैदान पर आस्ट्रेलिया की अजेय बादशाहत भी टूट गई।

जाहिर है, टैस्ट मैचों के आम नतीजों के मुकाबले इस शृंखला की अहमियत भारत के लिए बेहद खास है। इसमें टीम इंडिया को जहां जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद सिराज, अश्विन, अजिंक्य रहाणे, उमेश यादव जैसे कई खिलाड़ियों ने भविष्य की उम्मीदों को लेकर आश्वस्त किया, वहीं इस मैच ने यह भी दर्ज किया कि हौसला साथ हो तो हार की हालत को भी जीत में तब्दील किया जा सकता है।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि आस्ट्रेलियाई टीम और वहां के मीडिया की ओर से कमतर करके आंकने के समांतर मैच के दौरान दर्शक दीर्घा की ओर से कई अवांछित और नस्लवादी टिप्पणियां खिलाड़ियों के मनोबल को तोड़ने के काफी थीं, मगर टीम इंडिया ने शायद इन्हीं प्रतिक्रियाओं को चुनौती के तौर पर लिया और इसका जवाब मैदान में देने का मन बनाया। यही वजह है कि आस्ट्रेलिया के कई वरिष्ठ खिलाड़ियों से लेकर वहां के मीडिया तक को भारतीय खिलाड़ियों के बारे में अपनी हड़बड़ी की धारणा के बरक्स तारीफ करनी पड़ी। अब यह उम्मीद स्वाभाविक है कि आने वाले दिनों में एक बार फिर विश्व क्रिकेट में भारतीय टीम अपनी चमक बिखेरेगी।

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सुरक्षा का सवाल (जनसत्ता)

स्वास्थ्यकर्मियों का ऐसा डर कहीं न कहीं टीके के प्रभाव और उसके सुरक्षित होने को लेकर सवाल खड़े करता है। टीकाकरण के पहले ही दिन दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल के रेजीडेंट डॉक्टरों ने कोवैक्सीन लगवाने से इनकार कर दिया। इसके अलावा, टीका लगवाने के बाद दो लोगों (एक उत्तर प्रदेश में और एक कर्नाटक में) की मौत से भी अफवाहों का बाजार गर्म हुआ।

हालांकि बाद में पता चला कि दोनों मौतों का कारण टीका नहीं था। कुछ लोगों में टीका लगवाने के बाद जिस तरह के प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिले, उससे भी लोगों को लगा कि यह टीका सुरक्षित नहीं है। इसीलिए मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्रालय को स्पष्टीकरण देना पड़ा कि कोरोना के दोनों ही टीके- कोविशील्ड और कोवैक्सीन पूरी तरह से कारगर और सुरक्षित हैं।

अगर स्वास्थ्यकर्मी ही इसे लगवाने में हिचक दिखाएंगे तो आम जनता टीका लगवाने के लिए कैसे प्रेरित होगी? हालांकि नई दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया और नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ वीके पॉल ने पहले ही दिन स्वयं टीका लगवा कर इसके सुरक्षित होने का प्रमाण दिया। इसलिए इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं होना चाहिए कि भारत में लगाए जा रहे टीके सुरक्षित नहीं हैं।

देश के लिए यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है कि एक साल से भी कम समय के भीतर टीके विकसित कर लिए गए, बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हो गया और महामारी से निपटने का रास्ता निकला। भारत में इस वक्त दो टीके- कोविशील्ड और कोवैक्सीन लगाए जा रहे हैं। इन दोनों ही टीकों को भारत के औषधि महानियंत्रक ने विशेषज्ञों की समिति की सिफारिश के बाद आपात इस्तेमाल की मंजूरी दी है।

कोविशील्ड को आॅक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका ने विकसित किया है, जिसका उत्पादन भारत की सीरम इंस्टीय्टूट आॅफ इंडिया कर रही है, जबकि कोवैक्सीन पूरी तरह से देश में तैयार किया पहला स्वदेशी टीका है, जिसे भारत बायोटैक ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के साथ मिल कर बनाया है। अगर टीकों को लेकर कोई डर या संशय पैदा होता है और सवाल उठाए जाते हैं तो यह निश्चित रूप से चिंताजनक है। ऐसे में लोगों में टीकाकरण प्रति जागरूकता पैदा करने के साथ ही यह भी जरूरी है कि उनके भीतर टीके को लेकर बैठा डर निकाला जाए।

लोगों में डर भारत बायोटेक के कोवैक्सीन को लेकर है। इसका बड़ा कारण यह है कि अभी इस टीके के तीसरे चरण के परीक्षण चल रहे हैं। ऐसे में मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब परीक्षण ही पूरे नहीं हुए तो टीके को जल्दबाजी में मंजूरी क्यों दे दी गई! दरअसल, कोवैक्सीन को मंजूरी देने को लेकर जिस तरह की राजनीति हुई और विपक्ष ने जो सवाल उठाए, उससे भी इस टीके को लेकर लोगों में डर पनपा है।

लोग टीकाकरण के लिए प्रेरित हों और टीकों को लेकर किसी के मन में कोई भय न पैदा हो, इसके लिए बेहतर होगा कि देशभर में हमारे जनप्रतिनिधि और नौकरशाह स्वयं टीका लगवाने की पहले करें। इससे लोगों में भरोसा पैदा होगा और लोग आगे चल कर टीका लगवाएंगे। कोरोना से मुकाबले की जिम्मेदारी तो सबकी है, चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, टीके को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और आरोपों से तो ऐसे अभियान को धक्का ही पहुंचेगा।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Thursday, January 21, 2021

बाइडेन की चुनौतियां (जनसत्ता)

अमेरिका के इतिहास में ऐसे मौके कम ही आए हैं जब हिंसा, तनाव, कर्फ्यू जैसे माहौल में अभेद्य सुरक्षा के बीच राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण समारोह हुआ। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सुरक्षा व्यवस्था में लगे हर शख्स पर कड़ी निगरानी रही, ताकि कहीं कोई सुरक्षाकर्मी बाइडेन के शपथ ग्रहण समारोह में हमला न कर दे।

ऐसा पहले कभी देखने में नहीं आया जब अमेरिका में अपने ही लोगों खासतौर से सुरक्षा में लगे जवानों को भी इतने संदेह से देखा गया हो। पिछले दो महीने के दौरान अमेरिका में जिस तरह की घटनाएं देखने को मिलीं, वे स्तब्ध कर देने वाली हैं। क्या कोई कभी यह सोच सकता था कि चुनाव हार जाने के बाद एक राष्ट्रपति चुनाव नतीजों को पलटवाने के लिए कैसे-कैसे हथकंडे अपना सकता है, अपने समर्थकों से उत्पात करवा सकता है और हथियारों से लैस उसके समर्थकों की फौज देश की सर्वोच्च विधायी संस्था को निशाना बना सकती है!

हाल की घटनाओं ने दुनिया में अमेरिका की छवि धूमिल की है। डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिकी समाज जिस तरह से बंटा है और नस्लवाद की खाई चौड़ी हुई है, अमेरिका के लिए इसे अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। जो देश दुनिया को लोकतंत्र, समानता, मानवाधिकार जैसे उपदेश देता है, उसी देश में अश्वेतों को किस तरह से निशाना बनाया जा रहा है, यह दुनिया देख रही है।

ऐसे में बाइडेन के समक्ष घरेलू मोर्चे पर बड़ी चुनौती अश्वेत समुदाय के प्रति पनप रही घृणा को खत्म करना है। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका के निर्माण में अश्वेतों की भूमिका श्वेतों की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ी रही है। पिछले एक साल में कोरोना महामारी ने अमेरिका को हर तरह से तोड़ कर रख दिया है। कोरोना से निपटने में ट्रंप ने जिस तरह का लापरवाही भरा रवैया दिखाया, उसका खमियाजा अमेरिकी आज भुगत रहे हैं। अर्थव्यवस्था चौपट हाल में है, बेरोजगारी चरम पर है और अमेरिकी उद्योग-धंधे संरक्षण मांग रहे हैं।

राष्ट्रवाद के नाम पर ट्रंप की नीतियों ने अमेरिका को जिस तरह बर्बाद किया है, उससे पार पाना बाइडेन के लिए आसान नहीं होगा। वैश्विक मोर्चे पर चीन, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे संकट भी बाइडेन को विरासत में मिले हैं। अगर अमेरिका ने इन दोनों देशों के प्रति विवेकपूर्ण और तार्किक नीति नहीं अपनाई तो संकट और ज्यादा बढ़ेगा।

भारत को लेकर बाइडेन ने हालांकि सकारात्मक रुख ही दिखाया है। ट्रंप के कार्यकाल में दोनों देशों के रिश्तों में मजबूती आई थी, खासतौर से रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र कारोबारी समझौते हुए। तीन बड़े रक्षा करार भी हो चुके हैं और अरबों डॉलर के हथियार सौदे प्रक्रिया में हैं। हालांकि द्विपक्षीय व्यापार को लेकर समय-समय पर ट्रंप भारत को आंखें दिखाने से बाज नहीं आए और तरजीह व्यापार व्यवस्था से भारत को बाहर कर दिया।

इसलिए अब कारोबार और रणनीतिक समझौतों में बाइडेन प्रशासन का क्या रुख रहेगा, यह आने वाले दिनों में पता चलेगा। भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध उपराष्ट्रपति कमला हैरिस पहले ही कर चुकी हैं। जाहिर है, कश्मीर को लेकर अमेरिका और भारत के बीच संबंध सहज नहीं होंगे। बाइडेन को अमेरिका के हितों को सर्वोपरि रखते हुए आगे बढ़ना है, लेकिन चीन और रूस के साथ वे कैसे शक्ति संतुलन बना पाते हैं, यही उनके कौशल की परीक्षा भी होगी।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Tuesday, January 19, 2021

भ्रष्टाचार की जड़ें (जनसत्ता)

दो दिन पहले गुवाहाटी में रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी को एक करोड़ रुपए की घूस मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इस अधिकारी ने एक निजी कंपनी को ठेका दिलवाने के एवज में यह रकम मांगी थी। पिछले हफ्ते राजस्थान में दौसा जिले की एसडीएम और पुलिस अधीक्षक को लाखों रुपए की घूस लेने के मामले में पकड़ा गया।

देश सेवा का संकल्प लेकर प्रशासनिक सेवा में आए इन अधिकारियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने के काम में लगी कंपनी से यह घूस ली थी। इसी महीने राजस्थान में ही एक जिला कलक्टर और उनके निजी सचिव को मोटी घूस लेने के मामले में गिरफ्तार किया गया था। ये घटनाएं बताती हैं कि चाहे बड़े स्तर पर हो या फिर जिला, तहसील या पंचायत स्तर पर, भ्रष्टाचार से मुक्त प्रशासन की कल्पना नहीं की जा सकती। भले कोई राज्य कितने दावे क्यों न करे कि उसके यहां भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन है, लेकिन भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी और अधिकारी जिस तरह से लूट-खसोट मचा रहे हैं, वह सरकारों के भ्रष्टाचार मुक्त होने के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।

भारत के शासन-प्रशासन में भ्रष्टाचार का रोग जन्मजात है। पिछले तीन-चार दशकों में यह समस्या और विकट हुई है। आश्चर्य की बात तो यह है कि चुनावों में कोई भी राजनीतिक दल इसे मुद्दा बनाने से चूकता नहीं है और भ्रष्टाचार खत्म करने और साफ-सुथरा प्रशासन देने का वादा करता है, लेकिन सत्ता में आते ही यह वादा हवा हो जाता है।

सरकारों और प्रशासन में हर स्तर भ्रष्टाचार पर जिस तेजी से बढ़ा है, उससे आमजन की मुश्किलें ज्यादा बढ़ी हैं। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल इक्यावन फीसद लोगों ने घूस देकर अपने काम निकलवाए। सबसे ज्यादा यानी छब्बीस फीसद लोगों को संपत्ति और भूमि संबंधी कामों के लिए घूस देनी पड़ी, बीस फीसद लोगों को पुलिस में पैसे खिलाने पड़े। इसी तरह नगर निगम, बिजली विभाग, जल विभाग, आरटीओ दफ्तर और अस्पताल ऐसे ठिकाने हैं, जिनसे आमजन का सीधा साबका पड़ता है और जहां बिना घूस के काम करा पाना संभव नहीं है।

भारत में केंद्रीय जांच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, राजस्व खुफिया निदेशालय सहित कई जांच एजेंसियां हैं जिन पर भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की जिम्मेदारी है। हालांकि जांच एजेंसियां भी इस बीमारी से पूरी तरह मुक्त होंगी, कह पाना मुश्किल है। सीबीआइ को लेकर तो समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने जो तल्ख टिप्पणियां की हैं, वे स्थिति की गंभीरता को बताने के लिए पर्याप्त हैं। राज्यों में भी भ्रष्टाचार निरोधक विभाग और लोकायुक्त जैसी संस्थाएं हैं। फिर भी भ्रष्ट अधिकारियों के हौसले बुलंद होना बताता है कि उनके आगे सरकारी तंत्र बौना पड़ चुका है।

इसकी वजह यह है कि भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित और ठोस कार्रवाई नहीं होती और ज्यादातर मामलों में आरोपियों को बचाने में एक बड़ा तंत्र जुट जाता है। पकड़े गए अधिकारियों और कर्मचारियों को दिखावे के तौर पर निलंबित भले कर दिया जाए, लेकिन थोड़े समय बाद ही सब कुछ पहले की तरह हो जाता है।

वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने कर महकमों से जुड़े कई अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर यह संकेत दिया था कि वह भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेगी। लेकिन भ्रष्टाचारियों का तंत्र सरकार के तंत्र से कहीं ज्यादा सुसंगठित और मजबूत है। ऐसे में भ्रष्टाचारियों से निपटने के लिए सख्त कानूनों के उपयोग से भी ज्यादा जरूरी है मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना, जिसका अभाव भ्रष्ट तंत्र के विकास को बढ़ावा देता है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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सावधानी के साथ (जनसत्ता)

पिछले साल कोरोना को जब वैश्विक महामारी घोषित किया गया था, तभी से समूची दुनिया को किन हालात का सामना करना पड़ा है, यह सब जानते हैं। समूचा सामाजिक जीवन ठप होने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर हालत ऐसी कमजोर हो चुकी है कि उससे उबरने में शायद लंबा वक्त लगे। पिछले कुछ महीनों से इस महामारी का जोर कमजोर होने के साथ-साथ पूर्णबंदी में क्रमश: ढील दी जा रही है और आम जनजीवन की गतिविधियां फिर से सामान्य होने के क्रम में हैं। इसी संदर्भ में पिछले कुछ समय से सरकार से लेकर आम लोगों के बीच अलग-अलग स्तरों पर इस बात पर चिंता जाहिर की जा रही थी कि पूर्णबंदी की वजह से बंद हुए स्कूल कब खुलेंगे।

महामारी और संक्रमण की गंभीर स्थिति के मद्देनजर निश्चित तौर पर स्कूलों को खोलना एक बड़ी चुनौती रही, लेकिन दूसरे कई क्षेत्रों में राहत देकर जब यह देख लिया गया कि जनजीवन के सामान्य होने की ओर बढ़ने के बावजूद कोरोना के मामले आमतौर पर काबू में हैं, तब इस मसले पर भी राय बनने लगी। अब कुछ राज्यों में सरकार ने स्कूलों को खोलने की इजाजत दे दी है, हालांकि उसमें कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिए निर्धारित सभी नियम-कायदों का खयाल रखना होगा। यानी बच्चों की संख्या, स्कूल का समय, एक दूसरे से दूरी, मास्क लगाने आदि के लिए निर्देशों पर अमल सुनिश्चित करना होगा।

कुछ अन्य राज्यों में हाल ही में इस ओर कदम बढ़ाने के बाद अब दिल्ली और राजस्थान में भी सोमवार से कुछ शर्तों के साथ स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई शुरू कराने की इजाजत दी गई है। महाराष्ट्र में स्कूल सत्ताईस जनवरी से खुलने की खबर है, हालांकि मुंबई के लिए फिलहाल इस पर सहमति नहीं बनी है। दिल्ली में अभी दसवीं और बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए यह फैसला लिया गया है, मगर जो विद्यार्थी स्कूल जाएंगे, उन्हें अपने अभिभावक की लिखित अनुमति लेनी होगी। जाहिर है, स्कूलों को खोलने के फैसले तक आने के लिए सरकारों को कई स्तरों पर सावधानी के तकाजे का खयाल रखना पड़ा है।

दरअसल, स्कूल-कॉलेज या कोई भी शिक्षण संस्थान चूंकि सामूहिक उपस्थिति के परिसर होते हैं और ऐसी स्थिति में संक्रमण का खतरा अपेक्षया ज्यादा हो सकता था, इसलिए उन्हें बंद रखना जरूरी था। सही है कि स्कूल-कॉलेज बंद होने की हालत में बच्चों के नियमित शिक्षण पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, मगर सरकार ने इसकी भरपाई आॅनलाइन पढ़ाई के जरिए कराने की वैकल्पिक व्यवस्था की। हालांकि शिक्षा की गुणवत्ता के लिहाज से नियमित कक्षाओं के मुकाबले आॅनलाइन माध्यम की अपनी सीमा है।

यह हकीकत है कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी कई स्तरों पर संसाधनों के अभाव में जी रही है। ऐसे तमाम लोग हैं, जिनके घरों में पढ़ने वाले बच्चों की आॅनलाइन कक्षाओं की जरूरतें पूरी करने के लिए कंप्यूटर, स्मार्टफोन और इंटरनेट जैसे संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में यह आशंका खड़ी हो रही थी कि अगर स्कूलों की बंदी लंबे समय तक खिंची तो बच्चों की एक बड़ी संख्या पढ़ाई-लिखाई से वंचित हो जाएगी। ऐसे में कोरोना पर काबू की स्थिति बनने के साथ अब स्कूलों को खोलने का फैसला लिया या है तो यह अच्छा है। मगर अभी भी संक्रमण की संवेदनशीलता के मद्देनजर बचाव के लिए सभी जरूरी एहतियात बरती जानी चाहिए।

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सावधानी के साथ (जनसत्ता)

पिछले साल कोरोना को जब वैश्विक महामारी घोषित किया गया था, तभी से समूची दुनिया को किन हालात का सामना करना पड़ा है, यह सब जानते हैं। समूचा सामाजिक जीवन ठप होने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर हालत ऐसी कमजोर हो चुकी है कि उससे उबरने में शायद लंबा वक्त लगे। पिछले कुछ महीनों से इस महामारी का जोर कमजोर होने के साथ-साथ पूर्णबंदी में क्रमश: ढील दी जा रही है और आम जनजीवन की गतिविधियां फिर से सामान्य होने के क्रम में हैं। इसी संदर्भ में पिछले कुछ समय से सरकार से लेकर आम लोगों के बीच अलग-अलग स्तरों पर इस बात पर चिंता जाहिर की जा रही थी कि पूर्णबंदी की वजह से बंद हुए स्कूल कब खुलेंगे।

महामारी और संक्रमण की गंभीर स्थिति के मद्देनजर निश्चित तौर पर स्कूलों को खोलना एक बड़ी चुनौती रही, लेकिन दूसरे कई क्षेत्रों में राहत देकर जब यह देख लिया गया कि जनजीवन के सामान्य होने की ओर बढ़ने के बावजूद कोरोना के मामले आमतौर पर काबू में हैं, तब इस मसले पर भी राय बनने लगी। अब कुछ राज्यों में सरकार ने स्कूलों को खोलने की इजाजत दे दी है, हालांकि उसमें कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिए निर्धारित सभी नियम-कायदों का खयाल रखना होगा। यानी बच्चों की संख्या, स्कूल का समय, एक दूसरे से दूरी, मास्क लगाने आदि के लिए निर्देशों पर अमल सुनिश्चित करना होगा।

कुछ अन्य राज्यों में हाल ही में इस ओर कदम बढ़ाने के बाद अब दिल्ली और राजस्थान में भी सोमवार से कुछ शर्तों के साथ स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई शुरू कराने की इजाजत दी गई है। महाराष्ट्र में स्कूल सत्ताईस जनवरी से खुलने की खबर है, हालांकि मुंबई के लिए फिलहाल इस पर सहमति नहीं बनी है। दिल्ली में अभी दसवीं और बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए यह फैसला लिया गया है, मगर जो विद्यार्थी स्कूल जाएंगे, उन्हें अपने अभिभावक की लिखित अनुमति लेनी होगी। जाहिर है, स्कूलों को खोलने के फैसले तक आने के लिए सरकारों को कई स्तरों पर सावधानी के तकाजे का खयाल रखना पड़ा है।

दरअसल, स्कूल-कॉलेज या कोई भी शिक्षण संस्थान चूंकि सामूहिक उपस्थिति के परिसर होते हैं और ऐसी स्थिति में संक्रमण का खतरा अपेक्षया ज्यादा हो सकता था, इसलिए उन्हें बंद रखना जरूरी था। सही है कि स्कूल-कॉलेज बंद होने की हालत में बच्चों के नियमित शिक्षण पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, मगर सरकार ने इसकी भरपाई आॅनलाइन पढ़ाई के जरिए कराने की वैकल्पिक व्यवस्था की। हालांकि शिक्षा की गुणवत्ता के लिहाज से नियमित कक्षाओं के मुकाबले आॅनलाइन माध्यम की अपनी सीमा है।

यह हकीकत है कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी कई स्तरों पर संसाधनों के अभाव में जी रही है। ऐसे तमाम लोग हैं, जिनके घरों में पढ़ने वाले बच्चों की आॅनलाइन कक्षाओं की जरूरतें पूरी करने के लिए कंप्यूटर, स्मार्टफोन और इंटरनेट जैसे संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में यह आशंका खड़ी हो रही थी कि अगर स्कूलों की बंदी लंबे समय तक खिंची तो बच्चों की एक बड़ी संख्या पढ़ाई-लिखाई से वंचित हो जाएगी। ऐसे में कोरोना पर काबू की स्थिति बनने के साथ अब स्कूलों को खोलने का फैसला लिया या है तो यह अच्छा है। मगर अभी भी संक्रमण की संवेदनशीलता के मद्देनजर बचाव के लिए सभी जरूरी एहतियात बरती जानी चाहिए।

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Monday, January 18, 2021

निजता पर नजर (जनसत्ता)

दरअसल, वाट्स ऐप्प ने लोगों को संदेश भेज कर उनसे अपनी नई शर्तें स्वीकार करने को कहा है। जो लोग इन शर्तों को नहीं मानते, वे स्वत: इस सेवा से अलग हो जाएंगे। यह बदलाव अगले महीने से होना है। इन शर्तों के लागू हो जाने के बाद कंपनी उपयोगकर्ता के मोबाइल फोन में मौजूद समस्त जानकारियों को साझा कर सकती, मसलन उसमें दर्ज फोन नंबर आदि।

मगर इसमें सबसे अधिक एतराज इस बात पर है कि कंपनी उपयोगकर्ता की स्थिति और वह जिन लोगों से बातचीत करता है, उन सबका विवरण भी साझा कर सकती है। यानी वह इस वक्त कहां है और कहां-कहां जाता है, किस-किस से और क्या-क्या बातें करता है, सब कुछ की जानकारी वह साझा कर सकता है।

लोगों ने जैसे ही इन नियमों के खिलाफ बोलना-लिखना शुरू किया और दूसरे विकल्पों की तरफ रुख करने लगे, कंपनी ने साफ किया है कि उसका इरादा लोगों की निजता में सेंधमारी का नहीं है। केवल व्यावसायिक गतिविधियों से संबंधित जानकारियां साझा की जाएंगी। उपयोगकर्ता के परिजनों आदि से की गई बातचीत को साझा नहीं किया जाएगा।

अब इस मामले में सरकार ने भी दखल दी है। वह कंपनी की शर्तों से संबंधित जानकारियों को खंगाल रही है। दरअसल, अभी तक वाट्स ऐप्प ने दुनिया भर में अपनी साख इसलिए बनाई है कि यह त्वरित संदेश प्रदाता ऐप्प है।

इसके जरिए वीडियो कॉल करने की भी सुविधा है। अभी तक इस पर की गई बातचीत की जानकारियों में कोई सेंध नहीं लगा सकता था, यानी जिस तरह फोन के जरिए की गई बातचीत और संदेशों आदि का ब्योरा उपलब्ध हो जाता है, उसी तरह इस पर चल रही गतिविधियों का ब्योरा नहीं लिया जा सकता। नए नियमों से वह सुरक्षा खत्म हो जाएगी।

मगर हाल के कुछ सालों में जिस तरह इस गोपनीयता का कुछ शरारती तत्त्वों ने बेजा इस्तेमाल किया है, अफवाहें फैलाने, गलत सूचनाएं प्रसारित करने और भीड़ को भड़काने, किसी का चरित्र हनन या उसका अपमान करने वाले संदेश परोसने आदि में वे कामयाब होते रहे हैं, उसे देखते हुए इस माध्यम को अनुशासित करने की मांग भी खूब उठती रही है।

इस लिहाज से देखें, तो वाट्स ऐप्प की नई शर्तें कुछ हद तक मनमानियों पर लगाम लगाने में कारगर साबित हो सकती हैं। मगर अक्सर देखा गया है कि संचार तकनीक में अंकुश लगाने के लिए अपनाए गए उपाय दूसरे तरीके से मनमानी के रास्ते खोल देते हैं, इसलिए इस पर उठे विवाद को गंभीरता से परखने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।

यों स्मार्ट फोन और इंटरनेट सेवाओं के आने से बहुत सारे कामों में काफी सुविधा हो गई है, मगर इसके जरिए लोगों की निजता में सेंधमारी की घटनाएं भी बढ़ी हैं। वाट्स ऐप्प इस मामले में अपवाद नहीं होगा। बहुत सारी कंपनियां किसी न किसी गैरकानूनी तरीके से आपका डाटा चुराती, बेचती रहती हैं।

यहां तक कि आधारकार्ड से जुड़ी जानकारियों में भी सेंधमारी की आशंका जाहिर की जाती रही है। इन्हें रोकने के कई उपाय आजमाए जा चुके हैं, पर डिजिटल माध्यमों में सेंध लगाने वालों पर नकेल कसना चुनौती बना हुआ है। वाट्स ऐप्प की नई शर्तें जासूसी और निजी डाटा की चोरी, खरीद-बिक्री का एक और रास्ता खोल सकती हैं। किसी भी कंपनी या माध्यम को किसी की निजता पर नजर रखने की इजाजत क्यों होनी चाहिए!

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चुनौती का सामना (जनसत्ता)

मार्च 2020 के आखिरी हफ्ते से ही देश में डेढ़ महीने की सख्त पूर्णबंदी की गई थी, ताकि कोरोना संक्रमण के प्रसार को रोका जा सके। इसमें काफी हद तक सफलता मिली भी, लेकिन साथ ही अर्थव्यवस्था चौपट हो जाने का प्रतिकूल परिणाम भी सामने आया। पूर्णबंदी में देश की सभी छोटी-बड़ी औद्योगिक गतिविधियों पर पूरी तरह से विराम लग गया था।

अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों जैसे- कोयला, बिजली, इस्पात, सीमेंट, उर्बरक, रिफाइनरी उत्पाद, कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस तक का उत्पादन ठप-सा हो गया था। औद्योगिक गतिविधियां बंद रहने से बिजली उत्पादन में भारी गिरावट आई। बिजली नहीं बनने से कोयले के उत्पादन पर असर पड़ा।

छोटे उद्योग और कारखाने बंद रहने से इस्पात के कारखानों में भी उत्पादन ठप रहा। पेट्रोलियम उत्पादों की मांग भी नहीं के बराबर रही। ऐसे में अर्थव्यवस्था में ठहराव तो आना ही था। पहली तिमाही में जीडीपी शून्य से चौबीस फीसद नीचे चली गई थी। जाहिर है, जब इतनी भारी गिरावट रही है तो नतीजे भी लंबे समय तक भुगतने होंगे।

हाल में रेटिंग एजेंसी फिच ने कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था पर कोरोना का असर लंबे समय तक बना रहेगा। ऐसे अनुमान और आकलन अब नए नहीं रह गए हैं। पिछले एक साल में देश की आर्थिक वृद्धि को लेकर तमाम रेटिंग एजेंसियां ऐसे ही अनुमान व्यक्त करती रही हैं। फिच का कहना है कि अगले वित्त वर्ष यानी 2021-22 में भारत की अर्थव्यवस्था में ग्यारह फीसद की वृद्धि देखने को मिल सकती है, लेकिन उसके बाद अगले चार साल तक देश की जीडीपी साढ़े छह फीसद के आसपास ही रहेगी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वक्त भारत ही नहीं बल्कि दुनिया की तमाम विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं भयानक मंदी से जूझ रही हैं और इससे इन अर्थव्यवस्थाओं में भारी संकुचन पैदा हुआ है। यह सभी के लिए बड़ी चुनौती है। इस संकट से वही निकल पाएगा जो तात्कालिक कदमों के साथ दूरगामी नतीजे देने वाली नीतियों का निर्माण और उन पर अमल करेगा।

हालांकि भारत ने हालात को संभालने के लिए अब तक कई तरह के राहत पैकेज जारी किए हैं, ताकि मंदी की मार झेल रहे छोटे-बड़े उद्योग फिर से खड़े हो सकें। उद्योगों को करों में छूट जैसी कई रियायतें भी दी गई हैं। लेकिन ये सब ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही हैं। कारण साफ है कि संकट के मुकाबले राहत बहुत ही न्यून है।

भारत में इस वक्त सबसे बड़ा संकट बाजार में मांग का है। इसके मूल में महंगाई और बेरोजगारी जैसे कारण हैं। पिछले कुछ महीनों में रोजमर्रा की जरूरत से जुड़े उत्पादों के दाम जिस तेजी से बढ़े हैं, उससे भी मांग कमजोर पड़ी है। दूसरा बड़ा संकट लोगों के पास काम-धंधा नहीं होना है। पूर्णबंदी के दौरान जिन लोगों का रोजगार चला गया था, उनमें से अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनके पास काम नहीं है। असंगठित क्षेत्र की हालत तो बहुत ही खराब है।

अर्थव्यवस्था की हालत को देखते हुए लोग भविष्य को लेकर आशंकित हैं, इसलिए जो पैसा पास में है उसे बचा कर रख रहे हैं। बढ़ते एनपीए के कारण बैंकिंग क्षेत्र अलग संकट में है। ऐसे में अब सबकी निगाहें आम बजट पर हैं। देखना होगा कि अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए सरकार क्या कदम उठाती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाले वक्त की चुनौतियां कहीं ज्यादा बड़ी और गंभीर हैं।

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Saturday, January 16, 2021

चुनौती भरा अभियान (जनसत्ता)

देश में कोरोना महामारी से बचाव के लिए आज से शुरू होने जा रहा टीकाकरण अभियान निश्चित ही एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण कदम है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि हम महामारी का मुकाबला कर पाने के काफी करीब पहुंच चुके हैं। महामारी की भयावहता और दुनियाभर में इसके कहर से इतना तो साफ हो गया था कि जब तक टीका नहीं आ जाता, तब तक बचाव संबंधी उपाय ही जीवन को बचाने में मददगार साबित हो सकते हैं।

भारत की आबादी को देखते हुए टीकाकरण का काम चुनौती भरा है। सबको जल्द ही एक साथ टीका लगा पाना किसी भी सूरत में संभव नहीं है। इसलिए इसके लिए प्राथमिकता तय की गई और फैसला हुआ कि अग्रिम मोर्चे पर जूझ रहे लोगों को सबसे पहले टीका दिया जाए। इनमें चिकित्सा और स्वास्थ्यकर्मियों से लेकर सुरक्षा बल तक शामिल हैं। आपात सेवाओं में लगे कर्मचारी और स्वयंसेवक भी हैं।

टीके के लिए शोध, परीक्षण से लेकर इसके निर्माण और देश में जगह-जगह पहुंचाने का काम कोई मामूली नहीं है। तैयार टीकों को सुरक्षित रूप से हर राज्य में भेजने के लिए वायुसेना की भी सेवाएं ली जा रही हैं। टीकाकरण के काम में कहीं कोई चूक न रह जाए, इसके लिए देश भर में कई बार पूर्वाभ्यास किए जा चुके हैं। अस्पतालों में कैसे इंतजाम रहेंगे, इसकी व्यवस्था भी चाक-चौबंद है। इसलिए उम्मीद है कि दुनिया का यह सबसे बड़ा अभियान महामारी से लोगों को बचा पाने में कामयाब रहेगा।

भारत के वैज्ञानिकों, डाक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और इस महाभियान से जुड़े लोगों ने जिस जीवट के साथ काम किया, उसी का परिणाम है कि साल भर के भीतर ही कुछ गिने-चुने देशों के साथ हम भी टीका बनाने से लेकर उसे लगाने में सफल हो पाए हैं। इसे भी बड़ी कम बड़ी उपलब्धि नहीं माना जाना चाहिए कि भारत में बने टीकों का दुनिया के दूसरे देशों में भी परीक्षण चल रहा है और जरूरत पड़ने पर हम टीकों का निर्यात करने में भी सक्षम हैं।

देश में सीरम इंस्टीट्यूट आफ इंडिया के टीके कोविशील्ड और भारत बायोटेक के टीके कोवैक्सीन के आपात इस्तेमाल को मंजूरी दी गई है। हालांकि टीकों को लेकर कुछ विवाद भी खड़े हुए और इस कारण लोगों में भय और अविश्वास भी पैदा हुआ। लेकिन देश के चिकित्सा विशेषज्ञों और महामारी विशेषज्ञों ने टीके कारगर होने का भरोसा दिलाया है। टीकाकरण जैसे अभियानों की सफलता के लिए जरूरी है कि इन्हें लेकर लोगों के मन में कोई संदेह पैदा न किया जाए।

टीकों को मंजूरी देने के मुद्दे पर भारत में जैसी राजनीति देखने को मिली और जिस तरह की आशंकाएं पैदा कर लोगों को डराया जा रहा है, उसे कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता। महामारी के प्रकोप को देखते हुए जितनी जल्दी टीके बने हैं, उसमें हो सकता है कि वे सौ फीसद कारगर न हों, लेकिन ऐसा मान बैठना भी सही नहीं है कि टीकों का कोई लाभ नहीं होगा। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ टीका ही हमें नहीं बचाएगा, बल्कि मास्क लगाने और सुरक्षित दूरी जैसे बचाव संबंधी उपाय भी उतने ही जरूरी हैं।

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प्रदूषण की चादर (जनसत्ता)

राजधानी दिल्ली में प्रदूषण की खबर अब कोई चौंकाने वाली बात नहीं रह गई है। हर कुछ समय बाद अलग-अलग वजहों से हवा की गुणवत्ता का स्तर ‘बेहद खराब’ की श्रेणी में दर्ज किया जाता है और सरकार की ओर से इस स्थिति में सुधार के लिए कई तरह के उपाय करने की घोषणा की जाती है। हो सकता है कि ऐसा होता भी हो, लेकिन सच यह है कि फिर कुछ समय बाद प्रदूषण का स्तर गहराने के साथ यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर इसकी असली जड़ क्या है और क्या सरकार की कोशिशें सही दिशा में हो पा रही हैं!

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में तेज हवा की वजह से पारा में तेज गिरावट तो आई और उससे ठंड की तस्वीर और बिगड़ी, मगर उससे हवा के साफ होने की भी गुंजाइश बनी थी। अब एक बार फिर दिल्ली में कोहरे या धुंध की हालत बनने के साथ वायुमंडल के घनीभूत होने की हालत पैदा हो गई है और इसमें प्रदूषण की मात्रा बढ़ गई है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत वायु गुणवत्ता और मौसम पर नजर रखने वाली संस्था ‘सफर’ ने जो ताजा आकलन जारी किया है, उसके मुताबिक दिल्ली में एक बार फिर प्रदूषण की स्थिति गंभीर होने वाली है।

दरअसल, वायु की गुणवत्ता की कसौटी पर दिल्ली पहले भी अक्सर ही चिंताजनक हालत में रही है। ऐसे बहुत कम मौके आए, जब इसमें राहत महसूस की गई। पिछले साल पूर्णबंदी लागू होने के बाद जब वाहनों और औद्योगिक इकाइयों का संचालन नाममात्र का रह गया था, तब न सिर्फ वायु, बल्कि यमुना में भी प्रदूषण की समस्या में काफी सुधार देखा गया था। लेकिन उसके बाद पूर्णबंदी में क्रमश: ढिलाई के साथ-साथ जब आम जनजीवन सामान्य होने लगा है, तब धुएं और धूल के हवा में घुलने के साथ ही प्रदूषण ने फिर से अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है।

‘सफर’ के ताजा आकलन के मुताबिक दिल्ली में वायु गुणवत्ता का स्तर चार सौ इकतीस अंकों तक पहुंच गया। गौरतलब है कि वायु गुणवत्ता का यह दर्जा ‘गंभीर श्रेणी’ में माना जाता है और यह आम लोगों में सांस से संबंधित कई तरह की दिक्कतों के लिहाज से जोखिम की स्थिति है। ज्यादा चिंताजनक यह है कि इसमें अगले कुछ दिनों तक और गिरावट आने की आशंका जताई गई है। ‘सफर’ के अनुसार वायु गुणवत्ता का स्तर चार सौ उनसठ अंक तक पहुंच सकता है।

यों इस मौसम में दिन की शुरुआत यानी सुबह के समय कोहरे या धुंध की चादर का घना होना कोई हैरानी की बात नहीं है। यह कड़ाके की ठंड के दिनों की एक खासियत भी है। लेकिन मुश्किल यह है कि वायुमंडल के घनीभूत होने की वजह से जमीन से उठने वाली धूल और वाहनों से निकलने वाले धुएं के छंटने की गुंजाइश नहीं बन पाती है। नतीजतन, वायु में सूक्ष्म जहरीले तत्त्व घुलने लगते हैं और प्रदूषण के गहराने की दृष्टि से इसे खतरनाक माना जाता है।

यानी राजधानी में फिलहाल वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर होने की वजह साफ दिख रही है। विडंबना यह है कि जब भी प्रदूषण की समस्या खतरनाक हालत में पहुंचती है, तब सरकारें कुछ प्रतीकात्मक उपाय करके सब कुछ ठीक हो गया मान लेती हैं। मसलन, कुछ समय पहले दिल्ली में सरकार की ओर से प्रदूषण की समस्या पर काबू करने के मकसद से चौराहों पर लगी लालबत्ती पर वाहनों को बंद करने का अभियान चलाया गया था। सवाल है कि ऐसे प्रतीकात्मक उपायों से प्रदूषण की समस्या का कोई दीर्घकालिक और ठोस हल निकाला जा सकेगा!

सौजन्य - जनसत्ता।
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Friday, January 15, 2021

निजता का हक (जनसत्ता)

खासतौर पर उत्तर प्रदेश में कई ऐसे मामले सामने आए, जिनमें अलग-अलग धर्मों से संबंधित जोड़ों को ‘लव जिहाद’ पर बने नए कानून के तहत पुलिस की ओर से कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसके समांतर एक अहम पहलू यह है कि अब तक अपनी पसंद से अगर कोई बालिग युवक और युवती विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी करना चाहते हैं तो उनके नाम पर तीस दिन पहले सार्वजनिक तौर पर नोटिस जारी होती है, ताकि इस पर कोई आपत्ति दर्ज कर सके।

इससे आमतौर पर वैसे युवा जोड़ों के सामने कई तरह की मुश्किलें खड़ी होती रही हैं, जिनकी पसंद में उनके अभिभावकों और समाज की सहमति शामिल नहीं होती है। जाति और धर्म की कसौटी पर अलग होने की स्थिति में अक्सर ऐसे जोड़ों को किन हालात का सामना करना पड़ता है, यह किसी से छिपा नहीं है।

अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मसले पर जो फैसला सुनाया है, उसके तहत दो बालिगों के चुनाव और निजता को अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है। बुधवार को अदालत ने साफतौर पर कहा कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी के तीस दिन पहले जरूरी तौर पर नोटिस देने का नियम अनिवार्य नहीं है और इसे वैकल्पिक बनाना चाहिए; इस तरह का नोटिस निजता का हनन है।

सभी जानते हैं कि ऐसी स्थिति में पसंद, चुनाव और विवाह के लिए सहमति के बावजूद ऐसे जोड़ों पर किस तरह का सामाजिक दबाव पड़ता है। यह सीधे तौर पर अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के उनके अधिकार में भी दखल है। कहा जा सकता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समाज और परिवार के दायरे से अलग अपनी पसंद से विवाह करने वाले बालिग युवाओं के हक में एक बेहद अहम फैसला दिया है। खासतौर पर ऐसे वक्त में जब कई राज्यों में भिन्न धार्मिक मत वाले जोड़ों या अपनी पसंद से विवाह के इच्छुक युवक-युवतियों के सामने कई तरह चुनौतियां खड़ी हो रही थीं।

सही है कि विवाह एक ऐसी परंपरा है, जिसमें समाज शामिल होता है। लेकिन भारतीय समाज में परंपराएं और उनके तहत प्रचलित मान्यताएं व्यवहार में इतनी ज्यादा घुली हुई हैं कि कई बार इसमें अलग तरीके अपनाने वालों को गंभीर अड़चनों का सामना करना पड़ जाता है।

विवाह के मामले में आमतौर पर वर और वधू के परिवारों के बीच आपस में सहमति होती है और इसके सार्वजनिक आयोजन से किसी पक्ष को परेशानी नहीं होती है। जबकि किन्हीं हालात में बालिग लड़के और लड़की के बीच विवाह की सहमति का आधार जब अपनी पसंद और चुनाव होता है और उसमें अभिभावक शामिल नहीं होते हैं, तब कई बार परिवार और समाज में उसे सहज स्वीकार्यता नहीं मिल पाती है। खासतौर पर जाति और धर्म के रूढ़ दायरों में जीते समुदायों में विवाह के लिए इससे इतर रास्ता अख्तियार करने वाले जोड़ों का सफर आसान नहीं होता है।

हालांकि समाज की परंपरा और मानस के समांतर देश का संविधान दो बालिग युवक-युवती की पसंद को जगह देने के लिए विशेष व्यवस्था करता है, ताकि बाधा या अड़चन की स्थिति में युवा वैकल्पिक तरीके से विवाह कर सकें। ऐसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट के ताजा फैसले से वैसे बालिग युवकों-युवतियों को बड़ी राहत मिलेगी जो विवाह के मामले में अपनी निजता बना कर रखना चाहते हैं।

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बढ़ती सामरिक शक्ति (जनसत्ता)

इसी के मद्देनजर रफाल विमानों की खरीद की गई थी। अब तेजस की अगली पीढ़ी के तिरासी नए एमके-1ए विमानों की खरीद को मंजूरी दे दी गई है। इसके पहले ही चालीस तेजस जेट युद्धक विमानों की खरीद को मंजूरी दे दी गई थी। इस तरह भारतीय वायुसेना के पास तेजस शृंखला के एक सौ तेईस विमान हो जाएंगे, जिससे छह से आठ स्क्वाड्रन तैयार हो जाएंगे।

ये सारे विमान आधुनिक तकनीक और मौजूदा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किए जाएंगे। अच्छी बात है कि ये सभी विमान स्वदेशी तकनीक से तैयार होंगे। भारत सरकार लंबे समय से इस जरूरत को रेखांकित करती रही है कि सामरिक मामलों में भारत को आत्मनिर्भर बनाना होगा। हमारे यहां हिंदुस्तान एरोनाटिक्स और डीआरडीओ जैसी संस्थाएं इस दिशा में लंबे समय से काम करती रही हैं, मगर विश्व मानकों के अनुरूप सैन्य साजो-सामान तैयार करने में पिछड़ती रही हैं। तेजस विमानों से निस्संदेह इन संस्थानों को बल मिलेगा।

यों सैन्य साजो-सामान पर अधिक खर्च को लेकर अक्सर आलोचना होती रही है, मगर इस हकीकत से मुंह नहीं फेरा जा सकता कि आज की स्थितियों में आर्थिक विकास बढ़ाने के साथ-साथ सामरिक रूप से मजबूती हासिल करके ही दुनिया में कोई देश अपने को शक्तिशाली साबित कर सकता है। फिर भारत जैसे देश को जब हर समय पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों से चुनौतियां मिलती रहती हों, तब हमारी सेना का किसी भी रूप में कमजोर दिखना अच्छा नहीं माना जा सकता।

सीमाओं पर शांति रहेगी तभी विकास संबंधी गतिविधियों को भी गति दी जा सकती है। फिर यह भी उजागर तथ्य है कि सामरिक रूप से शक्तिशाली बने बिना दुनिया के अग्रणी देशों की कतार में खड़ा हो पाना संभव नहीं है। सामरिक रूप से शक्तिशाली होने का अर्थ सिर्फ युद्ध जीतने में सक्षम होना नहीं होता, सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर होना भी होता है।

आतंकवाद जैसी गतिविधियों पर काबू पाने में भी इससे मदद मिलती है। इसके अलावा सैन्य साजो-सामान बनाने के मामले में आत्मनिर्भर होने से उन्नत तकनीक वाले हथियार वगैरह के विश्व बाजार में भी उपस्थिति बनाने में मदद मिलती है। भारत अगर उस दिशा में बढ़ रहा है, तो इसे अच्छी बात ही कहा जा सकता है।

अब वही देश सामरिक मामलों में शक्तिशाली माना जाता है, जिसके पास हवाई हमले के लिए उन्नत तकनीक वाले हथियार हैं। तेजस श्रेणी के विमान न सिर्फ हवा में तेजी से हमले कर सकते हैं, बल्कि इनमें दुनिया के तमाम युद्धक विमानों से प्रतिस्पर्द्धा करते हुए उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।

कंप्यूटर प्रणाली से गहरे धुंधलके में भी निशानदेही करने और लक्ष्य साधने की क्षमता इनमें है, तो भारी मात्रा में विस्फोटक ले जाने और हवा में ही र्इंधन भरने जैसी खूबियां भी इनमें होगी। इस तरह ये दुनिया के उन्नत माने जाने वाले युद्धक विमानों को टक्कर देने वाले विमान साबित होंगे। तुलनात्मक रूप से देखें तो पाकिस्तान और चीन की वायुसेना को इनके जरिए जबर्दस्त टक्कर दी जा सकती है। इन विमानों की कुछ और खेप खरीदने की तैयारी चल रही है। इससे निस्संदेह भारतीय वायुसेना का मनोबल बढ़ेगा।

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Thursday, January 14, 2021

अपराध बेलगाम (जनसत्ता)

अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराध अब एक बार फिर राज्य की छवि बनते जा रहे हैं और सरकार केवल सख्त कार्रवाई का आश्वासन जारी कर अपना कर्तव्य पूरा मान लेती है।

जबकि राज्य को सुशासन देने के भरोसे पर ही मौजूदा गठबंधन ने जनता से समर्थन हासिल किया था। मगर आज तस्वीर चिंताजनक दिख रही है। राज्य की राजधानी पटना में मंगलवार की शाम इंडिगो विमान कंपनी के एक मैनेजर पर जिस तरह गोलियों की बौछार कर दी गई, उससे यही लगता है कि अपराधियों के भीतर किसी तरह का खौफ नहीं है। हत्या को अंजाम देकर अपराधी सरेआम गोलियां चलाते हुए आराम से फरार हो गए। मारे गए व्यक्ति का किसी भी तरह के अपराध में संलिप्त होने का कोई इतिहास नहीं था, फिर भी उसकी जान ले ली गई।

दरअसल, राज्य में पिछले कुछ सालों से जैसे हालात बनते जा रहे हैं, उसमें किसी आम नागरिक की हत्या की यह कोई चौंकाने वाली घटना नहीं है। हाल के महीनों में लगभग हर जिले से हत्या, अपहरण, बलात्कार, लूट आदि अपराधों की बढ़ती संख्या ने सरकार और पुलिस की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। ऐसा नहीं है कि बिहार में अपराधों को लेकर हाल के दिनों में कोई बड़ी तेजी आई है। इसमें एक तरह की निरंतरता रही है।

बीते साल राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में यह बताया गया था कि बिहार के पंद्रह जिलों में हत्या की घटनाएं ज्यादा होती हैं। यों अन्य जिले भी अपराधों से मुक्त नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे जघन्य अपराधों का ग्राफ पिछले सालों के मुकाबले तेजी से ऊपर गया है। हर रोज जघन्य अपराधों की जैसी घटना सामने आ रही है, उससे ऐसा लगने लगा है कि या तो कानून-व्यवस्था पर सरकार का नियंत्रण बेहद कमजोर हो गया है या फिर अपराधियों को खुली छूट मिल गई है! वरना क्या वजह है कि एक अपराध पर लोग चिंता जता रहे होते हैं कि कहीं दूसरी जगह से उससे गंभीर घटना की खबर आ जाती है।

सच यह है कि अब आम लोगों के बीच एक परोक्ष डर हावी रहने लगा है और कुछ लोग राज्य में अपराधों के पुराने दिनों को याद करने लगे हैं। अफसोस की बात यह है कि राज्य की मौजूदा गठबंधन सरकार के सत्ता में आने का सबसे अहम नारा लोगों को सुशासन मुहैया कराना था, मगर अब इस नारे की हकीकत सबके सामने है। खासतौर पर इस बार सत्ता संभालने के बाद ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार एक विचित्र प्रकार की उलझन से गुजर रहे हैं।

एक समय उनके बारे में यही बात प्रचारित थी कि प्रशासन की चौकसी और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर वे कोई नरमी नहीं बरतते हैं, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि अपराधियों को रोकने-टोकने वाले महकमे लाचार खड़े सब कुछ होते देख रहे हैं। जबकि राज्य की पुलिस और अपराधों की रोकथाम करने वाले सभी महकमों को राजनीतिक समीकरणों के भीतर की दुनिया में उठा-पटक से इतर अपना काम ईमानदारी से करना चाहिए, क्योंकि तकनीकी तौर पर कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर सरकार सहित जनता की ओर से उठे सभी सवालों के कठघरे में वही खड़े होंगे।

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राहत की खेप (जनसत्ता)

पहले चरण में स्वास्थ्य कर्मियों और अगली धार में काम करने वाले लोगों को टीका लगाया जाएगा। इसे लगाने को लेकर पहले से सारी तैयारियां की जा चुकी हैं। टीकाकरण केंद्र भी तैयार हैं। केंद्र सरकार पहले ही घोषणा कर चुकी है कि वह तीस करोड़ टीके खरीदेगी और उनका मुफ्त वितरण करेगी। दिल्ली सरकार ने भी कहा है कि वह अपने नागरिकों को मुफ्त टीके लगवाएगी। अच्छी बात है कि इस दौरान कोरोना संक्रमण की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई है।

इस तरह टीकाकरण संबंधी आगे की चुनौतियों से पार पाना कठिन नहीं होगा। यह भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश में अब तक का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान होगा। पहले तो टीके की उपलब्धता, सभी जगह उसकी पहुंच और उसके उचित रखरखाव आदि को लेकर आशंकाएं जताई जा रही थीं, पर इन सारे पहलुओं की पहले से रूपरेखा तैयार कर ली गई है। पहले चरण के टीकाकरण से इस दिशा में आने वाली अन्य कठिनाइयों से पार पाने का रास्ता भी निकल आएगा।

यह दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान होगा, इसलिए इसे चुनौतियों से परे नहीं माना जा सकता। पर भारत के लिए टीकाकरण का यह नया अनुभव नहीं है। यहां के चिकित्साकर्मियों के लिए खसरा, डिप्थीरिया, पोलियो आदि के देशव्यापी टीकाकरण का लंबा अनुभव है। बेशक यह टीकाकरण उन सारे टीकों से कुछ अलग तरह का है और इसमें विशेष एहतियात की जरूरत है, मगर इसे लेकर देशव्यापी तैयारियां आश्वस्त करती हैं कि मुश्किलें बहुत नहीं आएंगी।

कुछ लोग अवश्य इस टीके के प्रभाव को लेकर सशंकित हैं और कुछ राजनीतिक दल इसे सियासी रंग देने का प्रयास करते देखे जा रहे हैं। सवाल उठाए जा रहे हैं कि दो चरणों में ही इसका परीक्षण पूरा होने के बाद इसे आम लोगों को नहीं लगाया जाना चाहिए। कायदे से टीकों का तीन तरण में परीक्षण किया जाता है और उनके प्रभावों का अध्ययन करने के बाद ही आगे की प्रक्रिया शुरू की जाती है।

इसका विरोध करने वाले कुछ उदाहरण भी पेश कर रहे हैं, जिनमें इन टीकों का दुष्प्रभाव देखा गया। मगर इस तरह के जटिल और संवेदनशील टीकों के परीक्षण में हमेशा सौ फीसद एक समान नतीजे कभी नहीं आते, इसलिए फिलहाल इसे लेकर आशंका व्यक्त करना उचित नहीं।

ये टीके मनुष्य के शरीर में कोरोना विषाणु से लड़ने संबंधी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए लगाए जाने हैं। और हर व्यक्ति के शरीर की क्षमता और प्रकृति अलग-अलग होती है, उसमें पहले से चले आ रहे कुछ रोग भी बाधा उपस्थित कर सकते हैं। इसलिए बिना नतीजे सामने आए, अभी से इन टीकों को लेकर परेशान होने की तुक नहीं बनती।

इसे भारत की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है कि इतने कम समय में उसके वैज्ञानिकों ने टीका तैयार कर लिया और अब टीकाकरण की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। दुनिया के कुछ ही देश हैं, जो खुद कोरोना के टीके तैयार कर व्यापक टीकाकरण अभियान चलाने लगे हैं, भारत उनमें से एक है।

फिलहाल दो टीके अंतिम रूप से तैयार हो पाए हैं, अभी चार टीके और आने वाले हैं। इस तरह भारत सस्ती दर पर और वातावरण के हिसाब से अधिक उपयुक्त टीका बनाने वाला शायद पहला देश है। इस मामले में अगर राज्यों का भी अपेक्षित और उत्साहजनक सहयोग मिलेगा तो निस्संदेह जल्दी इसके बेहतर नतीजे देखने को मिलेंगे।

सौजन्य - जनसत्ता।
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