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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Saturday, March 20, 2021

‘घर लौटने के लिए होता है’ (हिन्दुस्तान)

प्रयाग शुक्ल, कवि और कला मर्मज्ञ 


लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में, जब सामान्य जीवन थम गया, तब सभी को यही लगा कि जिंदगी कटेगी कैसे? फिर धीरे-धीरे यह भी लगने लगा कि अब इसी के साथ रहना है। यह अच्छा है, जीवन में हर बार योजनाएं नहीं बनानी पड़तीं, कई चीजें अपने आप होती हैं। जीवन अपनी गति से चलता रहता है और किसी न किसी किनारे लगता है। लॉकडाउन के गाढ़े समय में मैंने बहुत से लोगों को बागवानी करते देखा, जो पहले पौधों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते थे। कलाकार-लेखक मित्रों से बात हुई, तो कुछ ने यहां तक कहा कि हमें कोई फर्क नहीं पड़ा। चित्रकारों ने कहा कि हम तो अपने स्टूडियो में रहते थे, किसी ने परेशान नहीं किया। पढ़ने-लिखने वाले बहुत से लोगों ने लॉकडाउन काल का अच्छा सदुपयोग कर लिया। 

खुद मेरे साथ यह हुआ कि मैंने धीरे-धीरे कलर पेंसिल से कुछ चित्र बनाने शुरू किए, तो इस उम्र में भी कला का एक नया सिलसिला आगे बढ़ा। कला व लेखन क्षेत्र में बहुत सी अच्छी चीजें हुई हैं, परस्पर आदान-प्रदान भी पहले की तुलना में बढ़ा है। किताबों और संवादों के ऑनलाइन विस्तार-प्रसार ने भी हमें बहुत संभाला है। हां, थियेटर, सिनेमा की दुनिया को ज्यादा चोट लगी है। ये ऐसी कलाएं हैं, जो समूह में संभव होती हैं। लेखकों कलाकारों का काम तो इसलिए भी चल गया कि वह स्वयं लिखने-बनाने वाले हैं, लेकिन फिल्म कलाकार, संगीतकार क्या करते? इन्हें हुए नुकसान की भरपाई में बहुत वक्त लगेगा। लॉकडाउन के सन्नाटे में मुझे खुद भय तो नहीं लगा, लेकिन थोड़ी-बहुर्त ंचता जरूर हुई, दुकानें वगैरह जब बंद हो गई थीं, कहां से जरूरी सामान आएगा? कौन लाएगा? लेकिन यह ऐसा समय था, जब भले पड़ोसियों से भी खूब मदद मिली। हम जैसे अनेक स्वतंत्र लेखकों को यह भी चिंता हुई कि लॉकडाउन बहुत लंबा चला, तो खर्च कैसे चलेगा? देश में करोड़ों लोगों के मन में यह चिंता रही है। ऐसी चिंताओं ने ही लोगों को भविष्य के बारे में अलग ढंग से सोचने के लिए विवश किया। लॉकडाउन काल की एक बड़ी उपलब्धि यह रही है कि बहुत से लोगों ने घर का महत्व समझा। हमने देखा, हम सबके लिए घर एक नई तरह से प्रगट हो रहा है। उस दृश्य ने खासतौर पर विचलित किया, जब हमने देखा कि लाखों लोग पैदल घर लौट रहे हैं। घर का एक नया ही अर्थ खुला, जिसे हम भूल से गए थे। अज्ञेय जी की पंक्ति याद आई-घर लौटने के लिए होता है।  कितनी सुंदर बात उन्होंने कही थी। घर एक ठिकाना है। आप सात समुंदर पार चले जाते हैं, लेकिन अपना ठिकाना नहीं भूलते, आप हर बार वहीं लौटते हैं। हरिवंश राय बच्चन की कविता भी बार-बार याद आई- दिन जल्दी-जल्दी ढलता है / बच्चे प्रत्याशा में होंगे,/ नीड़ों से झांक रहे होंगे / यह ध्यान परों में चिड़ियों के/ भरता कितनी चंचलता है! / दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! रोज कमाने-खाने वालों की पीड़ा तो हम अब शायद ही भूल पाएंगे। बड़ी चिंता हुई कि सरकार कैसे इतने लोगों को संभालेगी? काम-धंधे गंवाने वालों का क्या होगा? लेकिन जीवन के बारे में यह बहुत सुंदर पक्ष है कि आप बहुत देर तक हंस नहीं सकते, तो बहुत देर तक रो भी नहीं सकते। बहुत देर तक आप भय में नहीं रह सकते। बहुत देर तक आप निश्चिंत नहीं रह सकते। यही जीवन संतुलन सदियों से चला आ रहा है। इस दौर के जो अनुभव हैं, सबके लिए वरदान जैसे हैं। जीवन में कोई न कोई गति मिलती है अच्छी हो या खराब। गति को जब आप पहचानते हैं, तो जीवन से सीखते हैं। लॉकडाउन में लोगों ने छोटी-छोटी चीजों पर गौर करना शुरू किया। जैसे मैं कबूतरों के लिए रोज पानी रखता था, कभी-कभी उनकी तस्वीरें भी खींचता था और दूसरों को भेजा करता था। छोटी-छोटी खुशियां थीं, आज एक कली आ गई, आज एक पत्ती निकली। जितनी भी जगह थी, उसमें मैंने बागवानी शुरू की। पौधों पर नए सिरे से ध्यान देना शुरू किया। उसी दौरान एक माली को फोन किया, तो वह बहुत खुश हुआ कि किसी ने तो उसका हाल पूछा। काम तो उसका भी ठप था, लोग उसे बुलाने से बचने लगे थे। अपनों से दूर रहने और कुछ लोगों से हमेशा के लिए बिछड़ जाने का दुख भी बहुत चुभा। कोरोना से ठीक होने के बाद मेरी बहन भी दुनिया से चली गई। ऐसी रुलाने वाली घटनाएं न जाने कितने परिवार में हुई होंगी। वह मेरी सगी बहन थी, हमने इतना समय साथ बिताया था, लेकिन उसके अंतिम संस्कार में मैं कहां शामिल हो पाया। फोन पर सूचना मिल गई कि चार लोग आ गए हैं और संस्कार कर रहे हैं। ऐसी यादें आपके मन में छप जाती हैं, जो आपको अक्सर याद आएंगी और दुखी करेंगी। वह ऐसा दौर था, हम किससे शिकायत करते, सभी परेशानी में थे। ये जो सुख-दुख के पलडे़ हैं, ये ऐसे ही उतरते-चढ़ते रहते हैं, यह जरूरी है कि हम खुद को हर स्थिति के लिए तैयार रखें। भयभीत न हों। 

गांधी की आत्मकथा का इन दिनों अनुवाद कर रहा हूं। उनसे जुड़ा एक प्रसंग आपसे जरूर साझा करना चाहूंगा। गांधीजी फैसला करते हैं कि वह गोखले से मिलने जाएंगे। वह दक्षिण अफ्रीका से लंदन आते हैं। लंदन आते ही उन्हें पता चलता है कि गोखले तो पेरिस में फंस गए हैं, विश्व युद्ध शुरू हो चुका है, पर गांधीजी लिखते हैं कि उन दिनों लंदन देखने लायक था। लोगों में युद्ध का भय नहीं था, लोग सेना में जाने की तैयारियां कर रहे थे। संकट के जो दिन होते हैं, मनुष्य को बहुत कुछ सिखाते भी हैं। हमें अपनी गति से चलते रहना है। हजारी प्रसाद द्विवेदी की कविता मेरे लिए जीवन का मंत्र है- कोई रोते रहे/ कोई खोते रहे/ अपना रथ पर हम जोते रहे। इसका मतलब यह नहीं कि हम यह न देखें कि लोगों के साथ क्या हो रहा है, परिवार में क्या हो रहा है? पर हां, मुझे अपना रथ नहीं रुकने देना है। लॉकडाउन के दौर की अच्छाइयों को कभी भूलना नहीं चाहिए। बड़ी संख्या में सेवाभावी लोगों ने जरूरतमंदों की मदद की, भूखे लोगों को भोजन देने में, लाचार लोगों को घर पहुंचाने के लिए अनेक लोग बहुत साहस और प्रेम के साथ सामने आए हैं। गांधीजी ने सिखाया था कि भेद मत करो, अपने और दूसरे में। अपने-पराये में हम अक्सर बहुत भेद करते हैं। लॉकडाउन के दौरान यह भेद कुछ दूर हुआ है, उसे अभी और दूर करना है। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Friday, March 19, 2021

ड्रैगन ने छिपाकर दिया बड़ा दर्द (हिन्दुस्तान)

शशांक, पूर्व विदेश सचिव 

करीब 15 महीने पहले 31 दिसंबर, 2019 को वुहान (चीन) प्रशासन ने पहली बार यह बताया कि वहां के अस्पतालों में दर्जन भर निमोनिया मरीजों का इलाज चल रहा है, जिनकी बीमारी की वजह स्पष्ट नहीं है। मगर तब यही कहा गया था कि यह वायरस इंसान से इंसान को संक्रमित नहीं कर रहा है। इसके एक पखवाडे़ के अंदर ही 11 जनवरी, 2020 को वहां के मीडिया ने वायरस से पहली मौत की पुष्टि कर दी। इसके पहले सरकार ने इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी, इसलिए लाखों लोग नए साल का जश्न मनाने के लिए अपने-अपने घर आए और उत्सव मनाकर वापस देश-विदेश में अपनी कर्मभूमि पर लौट गए। वैज्ञानिकों का मानना है कि यही वह मोड़ था, जब कोरोना वायरस वुहान से पूरे चीन में और फिर विश्व भर में पहुंच गया। इसमें कोई शक नहीं कि अगर इसे वुहान शहर में ही थाम लिया जाता, तो दुनिया यूं घरों में दुबकने को मजबूर नहीं होती। हालांकि, अब भी इस वायरस के जन्म का ठीक-ठीक पता नहीं चल सका है और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) इसके बारे में अपनी जांच कर रहा है, लेकिन यह धारणा कुछ ठोस वजहों से बनी हुई है कि दुनिया को दर्द देने वाला कोरोना वायरस चीन की देन है।

आखिर ये कारण हैं क्या? दरअसल, चीन ने शुरू से ही सूचनाओं को छिपाने का भरसक प्रयास किया और अभी भी उसकी नीति कोई बदली नहीं है। वुहान सेंट्रल हॉस्पिटल के नेत्र-रोग विशेषज्ञ डॉक्टर ली वेनलियांग ने जब अपने साथी डॉक्टरों को बताया कि सार्स जैसे वायरस के लक्षण कुछ मरीजों में दिख रहे हैं, तो स्थानीय पुलिस ने न सिर्फ उन्हें अपना मुंह बंद रखने को कहा, बल्कि वहां का प्रशासन भी उदासीन बना रहा। मगर जल्द ही ली की बातें सच साबित हुईं और खुद ली भी इस वायरस से अपनी जान गंवा बैठे। यही वजह है कि चीन सरकार द्वारा डब्ल्यूएचओ को भ्रम में रखने के आरोप सच जान पड़ते हैं। बल्कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो तब नाराज होकर डब्ल्यूएचओ को दी जाने वाली आर्थिक मदद रोकने का एलान भी कर दिया था और कहा था कि अगर समय पर इस संक्रामक वायरस के बारे में सूचना दी गई होती, तो काफी सारे लोगों की जान बचाई जा सकती थी। चीन से यह शिकायत अन्य देशों की भी है।

आलम यह है कि आज भी बीजिंग में बैठी सरकार हरसंभव बचने की कोशिश करती है। जैसे, डब्ल्यूएचओ की टीम जब महामारी के स्रोत का पता लगाने वुहान जाना चाहती थी, तब शुरुआत में उसे इसकी अनुमति नहीं दी गई। फिर कोरोना के शुरुआती मामलों से जुड़े आंकड़े तक उसे नहीं दिए गए। हालांकि, अब जांच टीम वुहान की उस प्रयोगशाला तक पहुंच चुकी है, जहां से इस वायरस के ‘लीक’ होने का अनुमान है। फिलहाल इसके विस्तृत नतीजों का सभी देश इंतजार कर रहे हैं।

कोरोना जैसी महामारी देने और छिपाने से चीन को खासा नुकसान पहुंचा है। यूरोप के मित्र राष्ट्र तो अब भी उससे खफा हैं, क्योंकि वे भी यही मानते हैं कि समय पर जानकारी मिलने से वहां हुए जान-माल के भारी नुकसान को टाला जा सकता था। चीन साख के संकट से भी जूझ रहा है। कोरोना संक्रमण-काल से पहले वह ‘विनिर्माण का गढ़’ माना जाता था, लेकिन अब मोबाइल उपकरण, दवा निर्माण जैसे क्षेत्रों की कंपनियां वहां से मुंह मोड़ने लगी हैं। वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भी चीन की भागीदारी घटी है और भारत समेत तमाम अन्य अर्थव्यवस्थाओं को इसका फायदा मिला है। कोरोना-काल में जिस निम्न गुणवत्ता के चिकित्सा-उपकरण चीन ने दूसरे देशों को निर्यात किए, उससे भी उसकी छवि को दाग लगा है।

यह वैश्विक संकट भारत के लिए नए अवसर लेकर आया है। हमारी अर्थव्यवस्था बेशक चीन के मुकाबले छोटी है, लेकिन ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान का हमें फायदा मिलने लगा है। मैन्यूफैक्चरिंग के लिए अब कई देश हमारे यहां आने लगे हैं। यही नहीं, विश्व स्तर पर हमारी उपलब्धियों को दरकिनार करने वाले देश भी हमें अब सिर आंखों पर बिठाने को तैयार हैं। श्रीलंका, मालदीव जैसे एशियाई देश बीजिंग के बजाय नई दिल्ली को महत्व देने लगे हैं। नेपाल ने शुरुआत में भले ही चीन का समर्थन किया, मगर अब वहां की जनता सरकार के विरोध में सड़कों पर उतर आई है। दुनिया के ज्यादातर देशों में चीन की वैक्सीन को महत्व नहीं मिल रहा है और उसने अपने वैक्सीन के प्रचार के लिए जरूरी उदारता का भी प्रदर्शन नहीं किया है। ब्राजील के राष्ट्रपति ने तो भारत से टीके मिलने के बाद बाकायदा हनुमान जी की तस्वीर ट्वीट की, जिसका संकेत था कि जिस तरह से रामायण में लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर आए थे, उसी तरह से ये टीके उनके नागरिकों की जान बचाने के लिए भारतवर्ष की तरफ से भेजे गए हैं। कभी हम अनेक चीजों के लिए चीन का मुंह ताका करते थे। मगर जरूरत के समय खराब उत्पाद भेजकर जब उसने अपनी भद पिटवाई, तो भारत सरकार ने खुद ही इन्हें बनाने का फैसला किया। इन सबका हमें काफी कूटनीतिक लाभ मिला है। 2020 के अमेरिकी चुनाव में कहा जा रहा था कि यदि डेमोक्रेटिक पार्टी चुनाव जीतेगी, तो नई सरकार का झुकाव चीन की तरफ होगा, जबकि रिपब्लिकन के सत्तारूढ़ होने पर भारत को तवज्जो मिलेगी। मगर जो बाइडन की सरकार ने चीन को आईना दिखा दिया है। क्षेत्रीय सुरक्षा के मद्देनजर गठित क्वाड (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत की संयुक्त पहल) को लेकर अमेरिकी सरकार खासा संजीदा है। हालांकि, पिछले दिनों हुई इसकी बैठक में चीन को सीधे तौर पर तो कुछ नहीं कहा गया, लेकिन यह स्पष्ट दिखा कि अमेरिका एशिया में सत्ता संतुलन बनाने के लिए भारत के साथ मिलकर काम करना चाहता है। साफ है, नए साल में चीन की वैश्विक राह थमती नजर आ रही है, जबकि भारत को आगे बढ़ने का रास्ता मिला है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Thursday, March 18, 2021

उन्हें निजीकरण से डर लगता है (हिन्दुस्तान)

अरुण कुमार, अर्थशास्त्री 

देश के बैंकिंग सेक्टर में इन दिनों खासा उथल-पुथल है। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स (यूएफबीयू) के बैनर तले सोमवार और मंगलवार को नौ सरकारी बैंकों के कर्मचारियों ने हड़ताल की, और चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो वे अनिश्चितकालीन आंदोलन पर उतरने को बाध्य होंगे। इस हड़ताल की वजह केंद्र सरकार का वह एलान है, जिसमें उसने कहा था कि आईडीबीआई सहित वह दो अन्य सरकारी बैंकों का निजीकरण करने जा रही है। हालांकि, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भरोसा दिया है कि ऐसा किए जाने के बावजूद बैंककर्मियों के हितों को अनदेखा नहीं किया जाएगा। मगर अतीत की घटनाएं बैंक कर्मचारियों को कहीं अधिक परेशान कर रही हैं। अपने देश में सबसे पहले भारतीय रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण 1949 में हुआ था, जिसके बाद 1955 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का हुआ। फिर जुलाई, 1969 में 14 अन्य बैंकों और 1980 में छह बैंकों को सरकार ने अपने अधीन ले लिया। लेकिन 1990 के दशक में ‘वाशिंगटन कन्सेंन्सस’ के तहत केंद्र सरकार निजीकरण की तरफ बढ़ने लगी, जिसका लब्बोलुआब यह है कि बाजार को आगे बढ़ाया जाए और अर्थव्यवस्था में सरकार का दखल कम से कम हो। इससे निजी क्षेत्र को बढ़ावा मिलने लगा और सरकारी क्षेत्र पिछड़ता गया। हालांकि, इस ‘कन्सेन्सस’ को अपनाने के बाद संसार भर में असमानताएं बढ़ी हैं। सन 2005 के आसपास जाने-माने अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने अपने एक लेख में 2001 के आंकड़ों के हवाले से बताया था कि अमेरिका में जितनी गैर-बराबरी 1920 के दशक में थी, उससे कहीं ज्यादा 2000 के दशक में दिखने लगी है।

बैंकों के निजीकरण से भी कुछ ऐसे ही खतरे हैं। यह सही है कि अभी सरकार के पास संसाधनों का अभाव है, इसलिए राजस्व जुटाने के लिए उसने निजीकरण का सहारा लिया है। मगर इससे देश की आर्थिक तस्वीर कहीं ज्यादा स्याह हो सकती है। भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जहां गरीबी पसरी हुई है। यहां की करीब 90 फीसदी आबादी गरीब है (गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले तो अति-गरीब हैं)। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही इन सबकी सुध लेते हैं। इसी कारण गांवों और कस्बों तक में सरकारी बैंकों की शाखाएं दिख जाती हैं। चूंकि निजी बैंक सामाजिक जवाबदेही से कन्नी काटते हैं, इसलिए वे वहीं अपनी शाखा खोलते हैं, जहां पर उनको फायदा नजर आता है। लॉकडाउन में भी लोगों की जितनी सेवा सरकारी बैंकों ने की, उतनी निजी बैंकों ने नहीं। चूंकि छोटे-छोटे अकाउंट को चलाने में खर्च ज्यादा है, इसलिए जन-धन खाते भी सरकारी बैंकों में ज्यादा खोले गए। नकदी का लेन-देन भी सरकारी बैंकों ने तुलनात्मक रूप से ज्यादा किया। यह सब इसलिए संभव हो सका, क्योंकि सरकारी बैंकों का मकसद लोगों की सेवा करना है, न कि नफे-नुकसान के आधार पर अपनी सेवाएं देना। अगर बैंकों को निजी हाथों में सौंप दिया जाएगा, तो संभव है, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या विश्वविद्यालय जैसे बड़े-बड़े संस्थानों के वित्तीय लेन-देन में तो वे रुचि लेंगे, लेकिन गरीबों के छोटे-छोटे अकाउंट पर शायद ही उनकी नजर जाए। इससे उन सरकारी योजनाओं के भी बेअसर होने का खतरा होगा, जिनको फिलहाल सरकारी बैंकों के जरिए लाभार्थियों तक पहुंचाया जा रहा है। इसके अलावा, 1969 से पहले निजी बैंक अपनी ही कंपनियों को ज्यादा कर्ज बांटते थे। अब यह खतरा फिर से बढ़ सकता है। इससे अन्य वित्तीय कामों को नुकसान पहुंच सकता है। निजीकरण के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि सरकारी बैंकों पर एनपीए (डूबत कर्ज) काफी ज्यादा है। मगर इसकी एक वजह उन पर कई तरह की सामाजिक जिम्मेदारियों का होना भी है। लिहाजा, सरकार यदि इन जवाबदेहियों के बदले बैंकों को कुछ सब्सिडी दे, तो संभव है कि उनके एनपीए में कमी आ जाए।

बैंक कर्मचारियों का डर है कि निजी होते ही बैंकों से छंटनी शुरू हो जाएगी, क्योंकि निजी बैंकों को सामाजिक जिम्मेदारियों से जुड़े कर्मियों की शायद ही दरकार होगी। उनका यह डर वाजिब है, क्योंकि बैंकों के विलय के बाद भी कुछ कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया ही गया है। दुनिया भर में जहां-जहां विलय या निजीकरण हुए हैं, वहां रोजगार कम हुए हैं। यही कारण है कि सरकार पर निजीकरण के बहाने छंटनी की जमीन तैयार करने का आरोप बैंककर्मी लगा रहे हैं। यहां ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ भी एक बड़ा मसला है, जो बैंकिंग व्यवस्था में कहीं गहरे तक प्रभावी है। असल में, यह ऐसी अनधिकृत व्यवस्था है, जिसमें उद्योगपतियों के हित में सरकारी प्रशासन काम करता है। इसी कारण यहां बैंकों में राजनीतिक दखल अधिक है और वे उद्योगपतियों के लिए काम करते दिखते हैं। सरकारी बैंकों के एनपीए बढ़ने का एक बड़ा कारण यही है। इससे उनका लाभ कम हो जाता है। लिहाजा, इन बैंकों को सरकार सस्ते दाम पर अपने करीबी ‘क्रोनी’ को दे सकती है। अभी निजीकरण का सही वक्त है भी नहीं। महामारी के कारण हमारी अर्थव्यवस्था पहले ही सुस्त है, जिसके कारण बाजार में बैंकों का सही मूल्य नहीं मिल सकेगा और नुकसान अंतत: सरकारी खजाने को होगा।

इन सबके बीच केंद्र सरकार ने मंगलवार को एक नए ‘विकास वित्त संस्थान’ के गठन को मंजूरी दी है, जो इन्फ्रास्ट्रक्चर की बड़ी परियोजनाओं को दीर्घकालिक कर्ज देने का काम करेगा। सरकार का यह फैसला भी बहुत दूर तक जाता नहीं दिखता। बड़ी परियोजनाओं को बेशक लंबे समय तक फाइनेंस की जरूरत होती है और सामान्य बैंकों को जमाकर्ताओं से कम समय के लिए पैसे मिलते हैं। लेकिन पूर्व में आईसीआईसीआई, आईएफसीआई, आईडीबीआई जैसे बैंक दीर्घावधि के लिए फंड मुहैया कराते थे, तो वह बिना सरकारी मदद से संभव नहीं होता था। फिर, इन्फ्रास्ट्रक्चर में हमने उन परियोजनाओं को ज्यादा महत्व दिया है, जिनकी लागत काफी ज्यादा है। मसलन, यातायात में ही रेल के बजाय सड़कों पर ज्यादा ध्यान दिया गया और लंबे-लंबे हाईवे बनाए गए। पर आर्थिक तंगी की वजह से लोग सड़क के बजाय ट्रेन से ही लंबी दूरी तय करना पसंद करते हैं। नतीजतन, ‘हाई कॉस्ट’ परियोजनाएं घाटे में चल रही हैं और उनमें निवेश करने वाले बैंकों का एनपीए बढ़ रहा है। यह समस्या ‘विकास वित्त संस्थान’ के सामने भी आएगी ही। लिहाजा, हमें कम लागत वाली छोटी परियोजनाओं पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। अन्यथा, नए बैंक के एनपीए की भरपाई भी सरकार को ही करनी पड़ सकती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


सौजन्य  - हिन्दुस्तान।

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Wednesday, March 17, 2021

आज भी बरकरार कुछ मुगालते (हिन्दुस्तान)

संघमित्रा शील आचार्य, प्रोफेसर, जेएनयू  


करीब एक साल पहले 22 मार्च, 2020 को कोरोना वायरस के प्रसार को थामने की पहली कोशिश के रूप में हमने ‘स्वेच्छा से जनता कफ्र्यू’ का पालन किया था। इससे लगभग दो महीने पहले 30 जनवरी को ही अपने यहां इस वायरस का पहला मरीज मिल चुका था। जनता कफ्र्यू के बाद हमने ‘ताली व थाली’ बजाए और ‘दीये’ जलाए। फिर भी, वायरस अपनी गति आगे बढ़ता रहा। नतीजतन, 24 मार्च को केंद्र सरकार ने 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा की। उस वक्त देश में कोविड-19 मरीजों की संख्या 500 के करीब थी। 21 दिनों की  उस पूर्ण बंदी का क्या गणित था, यह तो अब भी रहस्य है। मगर वायरस के प्रसार में जो तेजी आई, वह आश्चर्यजनक थी, क्योंकि महज नौ हफ्ते पहले देश में कोरोना के बमुश्किल एकाध मामले थे। परिणामस्वरूप, कोविड-19 प्रभावित इलाकों में कई तरह के प्रतिबंध आयद कर दिए गए। 

अप्रैल के पहले सप्ताह में जहां छह दिन में पॉजिटिव मामले दोगुने हो रहे थे, वे तीसरे हफ्ते में बढ़कर आठ दिन हो गए। यह सकारात्मक रुझान था, जिसके कारण विशेषज्ञों ने लॉकडाउन बढ़ाने का सुझाव दिया था। मगर दूसरी तरफ, जिन 16 सबसे अधिक संक्रमित देशों में कम से कम तीन हफ्तों का लॉकडाउन लगाया गया था, उनमें जर्मनी, फ्रांस, इटली जैसे ज्यादातर यूरोपीय देशों के बाद भारत सातवें स्थान पर था।

लॉकडाउन का सबसे ज्यादा फायदा केरल ने उठाया। वहां मरीजों के बढ़ने की रोजाना की दर 6.8 प्रतिशत थी, जबकि तमिलनाडु में 23.1 प्रतिशत। दिल्ली, आंध्र   व जम्मू-कश्मीर में भी 20 फीसदी से अधिक की दर से रोज नए मामले सामने आ रहे थे। अत: लॉकडाउन को लगातार बढ़ाया जाता रहा। पहले 14 अप्रैल तक, फिर 3 मई तक, फिर 17 मई तक, फिर 31 मई तक यह बढ़ाया जाता रहा। सरकार ने यह भी कहा कि चरणबद्ध तरीके से इसे हटाया जाएगा, लेकिन कंटेनमेंट जोन में 30 जून तक लॉकडाउन बना रहा। 8 जून से अनलॉक की चरणबद्ध प्रक्रिया शुरू हुई, जो अब भी जारी है।

राज्य मशीनरी बेशक अपनी पीठ थपथपाए कि उन्होंने कोरोना के खिलाफ एक ‘अच्छी योजना’ बनाई थी, मगर सच्चाई कुछ अलग है। लॉकडाउन का जैसे-जैसे विस्तार हुआ, वह और अधिक सख्त होता गया। बाद के महीनों में तो मास्क न पहनने पर 2,000 रुपये तक के जुर्माने की व्यवस्था की गई। इस तरह के जुर्माने ने जाहिर तौर पर राज्य के खजाने को बढ़ाने का काम किया। यह समझना होगा कि यदि देखभाल करने के बजाय सरकारों की नीयत सजा देने की हो, तो संक्रमण के वास्तविक मामलों की जानकारी नहीं मिल पाती। लोग बीमारी को छिपाने का प्रयास करते हैं। यही वजह है कि हॉटस्पॉट पर संक्रमण का प्रसार न होने और नए हॉटस्पॉट न बनने की सूरत में 20 अप्रैल, 2020 से लॉकडाउन में छूट देने का एलान कारगर नहीं रहा। खुद सरकारी आंकड़े बताते हैं कि उस दिन देश भर में संक्रमित मरीजों की संख्या 17,890 थी, जिनमें से 1,500 मरीज (8.5 प्रतिशत) कोरोना की जंग जीत चुके थे और 587 मरीज (3.3 प्रतिशत) बचाए नहीं जा सके थे, जबकि 14 अप्रैल तक मृत्यु-दर महज 0.3 प्रतिशत थी। आम लोगों में जहां इस बीमारी के ‘सामाजिक कलंक’ को लेकर डर व संशय था, वहीं स्वास्थ्यकर्मियों की अलग चिंता थी। दिल्ली के अस्पतालों में कोविड वार्डों में सेवारत स्वास्थ्यकर्मियों की पिटाई और केरल में एअर इंडिया के पायलटों को मकान मालिकों द्वारा घर खाली करने के लिए मिल रही नोटिस खबरों में रहीं। राज्यसभा में पिछले दिनों बेशक सरकार ने माना कि 22 जनवरी, 2021 तक 162 डॉक्टर सहित 313 स्वास्थ्यकर्मी कोरोना की भेंट चढ़ चुके हैं, लेकिन अक्तूबर, 2020 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने कहा था कि कम से कम 515 डॉक्टर कोरोना मरीजों का इलाज करते हुए अपनी जान गंवा चुके हैं। परिजनों की सुरक्षा के लिए स्वास्थ्यकर्मी अपने घरों से भी दूर रहे। यहां तक कि नवजात और छोटे बच्चों को छोड़कर भी डॉक्टरों ने देश की सेवा की। इन दिनों मातृ और बाल स्वास्थ्य केंद्रों सहित अन्य आवश्यक सेवाएं कमोबेश बंद रहीं, जिसका प्रतिकूल असर पड़ा और लॉकडाउन के दौरान ‘होम डिलिवरी’ में खासा वृद्धि हुई। माताओं व बच्चों के नियमित टीकाकरण भी छूट गए, जिसके भयावह नतीजे आने वाले दिनों में दिख सकते हैं।

बाद के महीनों में जांच में तेजी आई, तो प्लाज्मा थेरेपी को इलाज के विकल्प के रूप में भी अपनाया गया। इन सबके बीच कई देशों में वैक्सीन का परीक्षण चलता रहा, जिसमें भारत भी शामिल था। सुखद रहा कि 2020 के बीतते-बीतते अपने यहां भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट के टीकों के जरिए महामारी का तोड़ आ गया। अब तो ऐसी वैक्सीन आने की संभावना है, जो स्प्रे के जरिए नाक में दी जाएगी। इसके ज्यादा असरदार होने की संभावना है। वाशिंगटन स्कूल ऑफ मेडिसिन के साथ भारत बायोटेक इस वैक्सीन पर काम कर रहा है, जिसके नतीजों के लिए फिलहाल हमें इंतजार करना होगा। यदि हम घातांक नियम के मुताबिक भारत में 50 पुष्ट संक्रमित मामलों के बाद कोरोना की वृद्धि दर देखें, तो 10 मार्च, 2020 को देश में 58 कोविड मरीज थे, जिसे दोगुने होने में महज चार दिन लगे। 20 मार्च को यह आंकड़ा 258 पर पहुंच गया। फिर अगले दो दिन में ही दोगुना हो गया। तब से कोरोना मरीजों की संख्या दो से आठ दिनों के भीतर दोगुनी होती रही है। पर संक्रमण की यह गति नहीं होती है। जब संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ती है, तो संक्रमण दर में कमी आ जाती है और बीमारी का अंत हो जाता है। कोरोना वायरस को लेकर भी यही अनुमान लगाया गया था कि जब देश की 70 फीसदी आबादी इससे संक्रमित हो जाएगी, तो इसका प्रसार खुद-ब-खुद रुक जाएगा। मगर अब आधे से अधिक भारतीयों ने इसके खिलाफ एंटीबॉडी विकसित कर ली है और टीका 81 फीसदी तक प्रभावशाली है, तो फिर दोबारा लॉकडाउन की जरूरत कैसे आ पड़ी? स्पष्ट है, जो चीज आज भी प्रासंगिक है, वह है भ्रम को दूर करना। यह टीकाकरण अभियान की सफलता के लिए भी जरूरी है और महामारी के अंत के लिए भी।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Tuesday, March 16, 2021

भुलाए न भूलेगी वह भयावहता ( हिन्दुस्तान)

सी एस वर्मा, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी

अगले चंद दिनों में कोरोना महामारी के मद्देनजर देश भर में लगाए गए लॉकडाउन को एक साल पूरा होने जा रहा है। इसके संताप से हुए खट्टे-मीठे अनुभव अभी तरोताजा हैं। यह व्यापक जनहानि बचाने के उद्देश्य से उठाया गया एक सरकारी अस्त्र था। आमजन को हुई तमाम दुश्वारियों के बावजूद यह काफी हद तक सफल भी रहा। भय और भूख मानव स्वभाव के लक्षण हैं। ये दोनों ही ऊर्जा व नए-नए आविष्कार करने हेतु प्रेरित करते रहे हैं। लॉकडाउन एक त्रासदी टालने के लिए लागू हुआ, लेकिन इसने अनगिनत कठिनाइयां आमजन के लिए खड़ी कर दी थीं। हालांकि, यह सब जगह कड़ाई से लागू किया भी नहीं जा सकता था। आबादी की लगभग 60 फीसदी संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। इस आबादी के कमोबेश सक्रिय बने रहने से एक और बड़ी त्रासदी टल गई। जब लॉकडाउन लगा, तब गेहूं की फसल कटाई के चरण पर आ गई थी। भारतीय किसानों ने वैसे भी आपदाओं से दो-दो हाथ नियमित अंतराल पर करने की आदत डाल रखी है। ज्यादातर किसान निडरता से खेतों में जुटे रहे और लॉकडाउन समाप्त होने तक गल्ला मंडियों, गोदामों और अपने घरों तक में खूब भंडारण कर दिया। सकल घरेलू उत्पाद में भले ही कृषि क्षेत्र का अंशदान घट गया हो, पर  कृषि का यह योगदान देश में अन्न के लिए मचने वाले भावी उपद्रव व अशांति को टालने में कामयाब रहा।

लॉकडाउन की पहली निर्धारित अवधि समाप्ति की बाट जोह रहे शहरी व कस्बाई कामगार, मजदूर व अनेक छोटे-मोटे व्यवसायी इसकी अवधि फिर से बढ़ने से आशंकित व आक्रोशित हो गए। तब तक तमाम धर्मार्थ संस्थाएं व उदारजन इन करोड़ों लोगों को भोजन-पानी उपलब्ध कराते रहे थे। फिर अफवाहों की आंधी सोशल मीडिया से चलने लगी कि यह लॉकडाउन अनिश्चित समय तक चलेगा। गांव में रहने वाले अपने स्वजनों से मिलने व वहां ज्यादा सुरक्षा की उम्मीद में लौट चले। सिर पर पोटली रख, सीने से बच्चों को लगाए पैदल ही लौट जाने का क्रम चला। एक अनुमान के अनुसार, उस दौर में करीब दस करोड़ लोग सड़कों पर थे। भूख, प्यास, बीमारी झेलते हजारों किलोमीटर की यात्रा तय करते गए। मजबूर सरकार ने बाद में विशेष श्रमिक रेल गाड़ियां, बसें चलाकर घर-गांव पहुंचने में लोगों की मदद की। लॉकडाउन ने निजी क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोगों को बेरोजगार कर दिया। असंगठित क्षेत्र में बगैर पंजीकरण काम करने वाले करोड़ों लोग थे ,जो रोजी-रोटी के मोहताज हो गए। नौबत ऐसी आ गई थी कि ‘जान है, तो जहान है’ के सिद्धांत पर सरकारें काम करने लगी थीं। फिर धीरे-धीरे डेढ़ महीने बाद एक-एक करके लॉकडाउन में रियायतें शुरू हुईं। रियायतें जरूरी थीं, ताकि जान भी बची रहे और जीविका भी। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था पर लॉकडाउन का असर सामने आने लगा, सरकार बारी-बारी से गतिविधियों को मंजूरी देती गई। यह  हमारे इतिहास में दर्ज है कि वर्क फ्रॉम होम, ई-कॉमर्स के प्लेटफॉर्म और मोबाइल नेटवर्क ने हमें गर्त में जाने से कैसे बचाया।

हम कैसे भूल जाएं, शुरुआत में न जांच आसान थी और न इलाज। 23 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश से कोविड के सैंपल पुणे जांच के लिए भेजे जाते थे। पूरे देश में ज्यादातर जांच केंद्रों का कोई अर्थ नहीं रह गया था। सभी को बस कोरोना महामारी ही नजर आ रही थी, बाकी बीमारियों की चर्चा गायब थी। मास्क निर्माण बहुत सीमित था। पीपीई किट का तो नाम भी बहुत कम लोगों ने सुना था। उस समय सैनिटाइजर भी ज्यादा नहीं बनते थे। ऑक्सीजन सिलेंडर व वेंटिलेटर तो अच्छे-अच्छे नामचीन अस्पतालों में ही मिलते थे, वहां भी सीमित संख्या में। हम विदेश की ओर देखने लगे थे और फिर बाद में हमने खुद बनाना शुरू किया। आज हम कोरोना से लड़ने की सामग्रियां अन्य विकासशील जरूरतमंद देशों को निर्यात करने लगे हैं। अस्पताल और दवा क्षेत्र बहुत हद तक विकसित हो चुके हैं। विश्व की 80 प्रतिशत दवाएं यहां निर्मित और निर्यात हो रही हैं। लॉकडाउन ने हमारी जीवन शैली व जीवन दर्शन, दोनों को प्रभावित किया है। संयम, श्रम, अनुशासन, स्वल्पाहार जैसे नैतिक पाठ लोग पढ़ना भूल गए थे। लॉकडाउन के दौर में घरों में बंद लोगों को आशा की किरणें इन्हीं मानवीय गुणों में नजर आने लगीं। निजी व आसपास की सफाई के प्रति जो लापरवाह थे, अब सजग हो गए हैं। नदियों में गंदगी बहाना हमारी संस्कृति का हिस्सा लगता है, लेकिन हमने पहली बार लॉकडाउन के एक माह में ही ऋषिकेश से वाराणसी तक गंगा-जल को निर्मल होते देखा। जलचर सक्रिय हो गए। अनेक जगहों पर जंगली जानवर सड़कों तक आने लगे। जालंधर से हिमालय, नंदा देवी की बर्फीली चोटियां नजर आने लगीं। आगरा में लॉकडाउन की अवधि में आंधी आई और तेज वर्षा हो गई, फिर तेज धूप खिली, तब ड्रोन कैमरे से किले और ताज की ली गई तस्वीरें आज भी अविश्वसनीय सी लगती हैं। वर्ष 1569 में बनकर तैयार हुआ किला जितना लाल तब लगता रहा होगा, वैसा ही तस्वीरों में लगने लगा। लॉकडाउन के सन्नाटे में एक ऐसा समय भी आया, जब न्यूनतम मूलभूत जरूरतें बहुत सिमट गईं, आने वाला कल एक स्वप्न सा लगने लगा। चोरी, छिनैती, डकैती, दुश्मनी, अपहरण, हत्या दुर्घटनाएं तो जैसे फंतासी उपन्यास की विषय-वस्तु लगने लगीं। घमंड से चूर हो रहे इंसानों की हेकड़ी एक अदृश्य वायरस ने निकाल दी और न जाने कितने पाठ पढ़ा दिए। अजीब-अजीब भय थे। एक खबर अमेरिकी मीडिया से छनकर आई कि वहां धनाढ्य लोग बड़ी संख्या में बंदूकें व कारतूस खरीद रहे हैं, उन्हें आशंका हो गई थी कि भूखे-प्यासे लोग समूह में हमले कर खाने-पीने का सामान लूटेंगे। यह आशंका भारत में भी थी, लेकिन सेवाभावियों से भरे इस देश ने सबको बचा लिया। तब अफवाहों का बाजार भी गरम था। कई लोग जमाखोरी में लगे थे। दूध-सब्जी, दवा जैसी जरूरी चीजें प्रशासन और पुलिस ने सभी लोगों को उपलब्ध कराने की युद्धस्तर पर जिम्मेदारी संभाल रखी थी। लोग बिना बाल कटाए रह गए। कम से कम कपड़ों में काम चलाने लगे। अच्छे-महंगे कपड़े, जेवर के प्रति लगाव ही मानो खत्म हो गया। एक खुशी यह भी है कि यह अदृश्य वायरस सामाजिक समरसता की ऐसी क्रांति ले आया कि भिश्ती, मुंशी, हाकिम, सब बचने के लिए एक ही नाव पर सवार हो गए और अच्छे-बुरे अनुभवों से धनी हुए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Monday, March 15, 2021

कट्टर दक्षिणपंथ और कट्टर वामपंथ, दोनों का एक ही लक्ष्य (अमर उजाला)

रामचंद्र गुहा 

मैं अग्रणी ब्रिटिश नारीवादी और शिक्षाविद् डोरा रसेल के संस्मरण पढ़ रहा हूं। इनका प्रकाशन तीन खंडों में किया गया था और मैंने अभी बस पहला खंड ही पूरा किया है। इसमें एडवार्डियान इंग्लैंड में उनकी परवरिश, कैम्ब्रिज में उनकी शिक्षा, लैंगिक समानता पर उनके दृष्टिकोण का विकास, उनके द्वारा स्थापित एक प्रायोगिक स्कूल और विद्वान तथा विवादास्पद दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल के साथ विवाह में बिताए वर्षों को समाहित किया गया है।


उनकी पीढ़ी के अन्य लोगों की तरह डोरा रसेल भी बोल्शेविक क्रांति से गहराई से प्रभावित थीं, जो कि तब हुई थी, जब उनकी उम्र बीस-बाइस साल की रही होगी। क्रांति के भड़कने के बाद उन्होंने रूस की यात्रा की, ताकि इसके प्रभाव का सीधा अध्ययन कर सकें। 1918-19 के दौरान रूस में उत्साही बोल्शेविकों के साथ बात करते हुए डोरा को मध्य युगीन ईसाई धर्मशास्त्रियों की याद आ गई, जिन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड का सपना देखा था, इस उम्मीद में कि इसकी रचना ईश्वर करेंगे। उन धार्मिक कल्पनाजीवियों की तरह, जैसा कि रसेल ने लिखा, 'ये लोग (रूस में) ब्रह्मांड के वास्तुकार 'ग्रेट क्लॉकमेकर' की नकल कर रहे हैं और जिस तरह से उसने ग्रहों की गति स्थापित की थी, ठीक उसी तरह से वे नए समाज के ब्लू प्रिंट की रचना करेंगे, जो कि औद्योगिक रणनीति पर आधारित होगा, जिसमें प्रत्येक पुरुष और स्त्री को काम मिलेगा और वे अपना योगदान देंगे। एक बार गति पकड़ लेने के बाद यह नई तर्कसंगत समाज व्यवस्था खुद से चलने लगेगी।' 



सोवियत रूस में बातचीत के दौरान डोरा रसेल बोल्शेविकों की भयानक मताधंता को देखकर प्रभावित और कुछ हद तक परेशान हुईं। उन्होंने लिखा, 'ऐसा दिखता है कि भविष्य के साम्यवादी राज्य की स्थापना के लिए साम्यवाद की शिक्षा अनिवार्य हो सकती है, लेकिन यह मुझे एक बुराई लगी, क्योंकि इसे रचनात्मकता के बजाय घृणा और उग्रवाद की अपील के साथ भावनात्मकता और उन्माद के जरिये किया जा रहा है। यह स्वतंत्र समझ पर रोक लगाता है और ऐसी पहल को ध्वस्त करता है।'


डोरा रसेल के एक दशक बाद कवि रवींद्रनाथ टैगोर सोवियत रूस की यात्रा पर गए। टैगोर दो हफ्ते के प्रवास के दौरान वहां स्कूलों और फैक्टरियों में गए और विभिन्न वर्गों के लोगों से बात की। लौटने से थोड़ा पहले टैगोर ने पार्टी के अखबार इजवेस्तिया को एक साक्षात्कार दिया। सोवियतों ने जिस अद्भुत सघनता के साथ शिक्षा का विस्तार किया, उसकी उन्होंने सराहना की, लेकिन साथ ही उन्होंने यह चेतावनी भी दी, 'मैं आपसे पूछना चाहूंगा ः क्या आप प्रशिक्षण में अपने लोगों के मन में उन लोगों के प्रति गुस्सा, वर्गीय घृणा और बदले की भावना को भड़का कर अपनी विचारधारा का भला कर रहे हैं, जो आपकी विचारधारा से साझा नहीं करते, जिन्हें आप अपने दुश्मन समझते हैं? यह सच है कि आपको बाधाओं से लड़ना होगा, आपको अज्ञानता और संवेदनहीनता से लड़ना होगा यहां तक कि निरंतर आने वाले प्रतिरोध से भी। आपके अनुसार आपका मिशन अपने खुद के राष्ट्र या खुद की पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी मानवता की बेहतरी के लिए है। लेकिन क्या जो लोग आपके लक्ष्य से सहमत नहीं हैं, वे मानवता के दायरे में नहीं आते?'


टैगोर के विचार से एक परिपक्व राजनीतिक व्यवस्था असहमति को स्वीकार करती है, जहां मन को स्वतंत्र होने की इजाजत हो। यदि दबाव बनाकर सारे विचार एक जैसे हो जाएं, तो यह न केवल अरुचिकर, बल्कि यांत्रिक नियमन से संचालित निर्जीव दुनिया बन जाएगी। यदि आपके पास ऐसा मिशन है जिसमें सारी मानवताएं समाहित हैं, तो फिर मत भिन्नता को स्वीकार कीजिए। बौद्धिक ताकतों के मुक्त प्रवाह तथा नैतिक प्रोत्साहन से विचार निरंतर बदलते रहते हैं और पुनः बदलते हैं। हिंसा, हिंसा और अंध मूर्खता का कारण बनती है। सत्य को स्वीकार करने के लिए मन की स्वतंत्रता जरूरी है; आतंक इसे निराशाजनक ढंग से नष्ट कर देता है।'


डोरा रसेल पर लौटते हैं। सोवियत रूस की यात्रा के कई साल बाद वह चीन गईं और वहां उन्होंने नौसिखुआ कम्युनिस्ट पार्टी से बात की। उनकी कट्टरता और उत्कंठा अपने रूसी कॉमरेड से कम नहीं थी। जनवरी, 1921 में बीजिंग से अपने एक मित्र को भेजे एक पत्र में डोरा ने टिप्पणी की कि 'विचारकों में साम्यवाद को सत्ता में लाने का दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन चीन और रूस दोनों जगह यह धर्म से कम नहीं है... धर्म के रूप में इसका लाभ यह हो सकता है कि राज्यों के निर्माण में धर्म लोगों को एक समुदाय के रूप में एकजुट रखते हैं और उनमें एक झुंड में रहने की भावना जगाते हैं।'


विशेष रूप से, जैसा कि हमारे अपने देश के समकालीन इतिहास से पता चलता है कि कट्टर दक्षिणपंथ कट्टर वामपंथ के साथ कई गुणों का साझा करता है। वे इस पर भी यकीन करते हैं कि साधन चाहे कुछ भी हो लक्ष्य ही अंतिम है, जैसे कि सत्तारूढ़ राजनेताओं को नौकरशाही और न्यायपालिका को नियंत्रित करना चाहिए, राज्य और सत्तारूढ़ दल के पास यह अधिकार हो कि वह नियंत्रित और निर्देशित कर सकें कि उपन्यास कैसे लिखे जाएं, गाने कैसे गाए जाएं, किन नारों को प्रोत्साहित किया जाए और किन्हें प्रतिबंधित किया जाए। कट्टर दक्षिणपंथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी नकारता है और अपने खुद के धर्म के रहस्यमय और अतार्किक तत्वों से निर्देशित होता है। फ्रेंच इतिहासकार फ्रैंकोइस फ्यूरे ने दक्षिणपंथी और वामपंथी निरंकुशता की समानताओं को खूबसूरती से अपनी किताब द पासिंग ऑफ एन इल्यूशन में दर्ज किया है। फ्यूरे ने लिखा, 'सोवियत लोगों की तरह ही नेशनल सोशलिस्ट लोग थे, उनसे बाहर हर व्यक्ति एंटीसोशल था। एकता का निरंतर जश्न मनाया जाता था और सार्वजनिक रूप से वैचारिक घोषणाओं में इसकी पुष्टि की जाती थी। इसका सर्वोच्च रूप था, इसके नेता फ्यूहरर की मनुष्येतर छवि। इस प्रकार जनता अनिवार्य और स्थायी रूप से पार्टी स्टेट का हिस्सा थी। इससे परे, केवल लोगों के दुश्मन थे, लेनिन के लिए इसका मतलब बूर्जुआ था और हिटलर के लिए यहूदी। हर समय लोग निगरानी में रहते थे और सत्ता शाश्वत थी।' फ्यूरे ने लिखा कि फासीवाद की तरह साम्यवाद को हिंसा और अनैतिक साधन मंजूर थे, बशर्ते कि वे राजनीतिक प्रभुत्व की ओर ले जाएं। लिहाजा लेनिन और हिटलर के लिए, 'आप अपने साथी नागरिकों को उसी तरह से मार सकते हैं, जिस तरह से युद्ध में शत्रु को। इसके लिए बस यह जरूरी है कि वे गलत वर्ग या विपक्षी दल के हों।'


फ्यूरे की किताब अंतर यूरोपीय युद्ध पर केंद्रित है, इसलिए इसमें लेनिन और हिटलर का जिक्र है। युद्धोतर एशिया का कोई भावी इतिहासकार चीन में साम्यवाद के उदय और भारत में सत्तावादी हिंदुत्व के उदय में समानताएं देख सकता है, खासतौर से माओ और मोदी की मनुष्येतर छवि में। वास्तव में फ्यूरे कभी भारत नहीं आए और संभव है कि उन्होंने इस देश के इतिहास के बारे में भी कम पढ़ा हो, लेकिन मैंने जिस अंश का जिक्र किया वह भारत के संबंध में पूर्वाभास-सा लगता है। माओ के अधीन साम्यवादी चीनियों की तरह मोदी के नेतृत्व में भाजपा एक पार्टी वाली व्यवस्था कायम करना चाहती है। इसके लिए महान और कभी गलती न करने वाले नेता की छवि गढ़ी गई है; विपक्षियों को भयभीत किया गया है और राष्ट्रविरोधी बताकर उनकी आलोचना की जाती है। एक अंतराल के बाद दावा किया जाता है कि प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश हो रही है। और सबसे दुखद है कि भारतीय मुस्लिमों को ठीक उसी तरह आतंकित किया जा रहा है, जैसा कि कम्युनिस्टों ने चीन में गैर हान समुदायों के साथ किया। दोनों ही पक्ष स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन कट्टर दक्षिणपंथ और कट्टर वामपंथ में काफी समानताएं हैं। डोरा रसेल की ऊपर दी गई पंक्तियों को याद करें और 'साम्यवाद' की जगह 'हिंदुत्व' रख दें, तो यह इस बात का स्पष्ट निरूपण होगा कि आरएसएस और भाजपा आज भारत में क्या करना चाहते हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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अन्य टीकों को भी तेजी से मंजूरी दे सरकार (बिजनेस स्टैंडर्ड)

मिहिर शर्मा  

इसमें कोई शक नहीं है कि कोविड-19 महामारी से निपटने और नियंत्रित करने के भारत के प्रयासों में आत्मसंतोष की भावना के कारण कुछ शिथिलता आई है। इसकी वजहों को आसानी से समझा जा सकता है। अर्थव्यवस्था हर तरह से सुधर रही है। पिछले साल के अंत से कोविड के मामलों की संख्या में भी भारी कमी आई है और वे देश के ज्यादातर हिस्सों में नियंत्रण में हैं। इसक अलावा टीकाकरण कार्यक्रम का दूसरा चरण शुरू हो गया है, जिसमें इस बीमारी के गंभीर मामलों के जोखिम वाले लोगों को टीके लगाए जाएंगे।


फिर भी अति आत्मविश्वासी होना एक गलती होगी। हाल में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन ने दावा किया था कि देश में महामारी का खात्मा नजदीक है, लेकिन अभी ऐसी स्थिति नहीं होने की कई वजह हैं। सबसे पहले, टीकाकरण की दरों में अहम बढ़ोतरी हुई है। वहीं, ऐसा लगता है कि हम कई बार यह भूल जाते हैं कि यह बहुत बड़ा देश है। अगर हमें देश के एक बड़े हिस्से में उचित समयसीमा में टीका पहुंचाना है तो हमें टीकों की मौजूदा स्तर से पांच से 10 गुना अधिक आपूर्ति की दरकार होगी। दूसरा, हमें वायरस के म्युटेशन से पैदा होने वाले खतरों को लेकर सजग रहना चाहिए। अधिकारियों के मुताबिक अब तक कोविड-19 के ब्राजीलियाई, ब्रिटिश और दक्षिण अफ्रीकी रूप समुदाय में नहीं फैल रहे हैं। हाल में बीबीसी के सौतिक विश्वास ने खबर दी थी कि अब तक वायरस की इन किस्मों के 250 से भी कम मामले देश में पाए गए हैं, लेकिन अब तक का यह अनुभव रहा है कि जब वे फैलते हैं तो तेजी से मूल किस्म की जगह ले लेते हैं। ऐसा कुछ मामलों में जांच नहीं होने पर ही हो सकता है। दूसरा यह भी हो सकता है कि सही आंकड़े सामने नहीं आ रहे हों। भारत ने तेजी से पॉजिटिव आरटी-पीसीआर जांचों की जीनोम-सीक्वेंसिंग में बढ़ोतरी नहीं की है। हाल तक पॉजिटिव आरटी-पीसीआर जांचों के महज 0.5 से 0.6 फीसदी मामलों को वायरस की किस्मों की पहचान के लिए जीनोमिक सीक्वेंसिंग के लिए भेजा जा रहा था। इसके लिए धन आवंटित नहीं किया गया है, लेकिन उस अनुपात को बढ़ाकर 5 से 10 फीसदी करने के लिए काफी काम किया जाना जरूरी है। इस समय भारत के सीमा पर नियंत्रण भी संतोषजनक नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर केवल उन्हीं लोगों की जांच हो रही है, जो विश्व के तीन सबसे अधिक जोखिम वाले भौगोलिक क्षेत्रों से आ रहे हैं। इसकी कोई वजह नहीं है कि अनिवार्य सीक्वेंसिंग के अलावा जांच सभी के लिए लागू की नहीं की जाए। ऐसा नहीं हो सकता कि हम साफ तौर पर यह पहचान सकें कि वायरस की ये किस्में कहां फैल रही हैं या उड़ान में कौन किसके पास बैठा था।


आखिर में अन्य वायरल संक्रमणों की तरह कोविड-19 का मूल स्ट्रेन सीजन में बदलाव के दौरान ज्यादा संक्रामक बन सकता है। हम अब भी पुख्ता तौर पर यह नहीं जानते हैं कि यह भारत में ज्यादातर मामलों में कैसे फैल रहा है, इसलिए यह मानना जल्दबाजी होगी कि गर्मियों में तीसरी लहर आना नामुमकिन है। निश्चित रूप से अब भारतीय एहतियात को लेकर कम फिक्रमंद हैं, जितने वे पिछले साल गर्मियों में महामारी के अपने चरम पर होने के समय थे। इसके भी अपने खतरे हैं।


जीनोम सीक्वेंसिंग को जांचों का एक मुख्य हिस्सा बनाने के अलावा महामारी को लेकर क्या कदम उठाए जा सकते हैं? एक महत्त्वपूर्ण कदम यह है कि अगर जरूरत पड़े तो स्थानीय लॉकडाउन फिर से लगाने की मंजूरी दी जाए। केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर प्रतिबंध लगाने के लिए राज्यों और स्थानीय सरकारों को हतोत्साहित किया है। वह सलाह वापस ली जानी चाहिए।


लेकिन सबसे अहम कदम टीकाकरण की रफ्तार तेज करना है। हालांकि हमें ऑक्सफर्ड/एस्ट्राजेनेका और भारत बायोटेक के टीकों का उत्पादन करने की अपनी क्षमता पर भरोसा है, लेकिन हमें अतिरिक्त टीकों की अपनी जरूरत में भी ढील देने की जरूरत है। इसकी वजह यह है कि महामारी के दौरान टीका विनिर्माण संयंत्रों को अनुपयोगी पड़े रखना एक अपराध है। उदाहरण के लिए जॉनसन ऐंड जॉनसन (जेऐंडजे) का टीका क्यों हमारे टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल नहीं है? इसे अमेरिका में उपयोग की मंजूरी मिल गई है और यह दक्षिण अफ्रीकी किस्म के खिलाफ असरदार रहा है। जेऐंडजे पहले ही एक भारतीय साझेदार के साथ गठजोड़ कर चुकी है, जिसने टीकों की करोड़ों खुराक के उत्पादन के लिए क्षमता अलग बचाकर रखी है। हम एक प्रभावी टीके पर क्यों कड़ी नियामकीय बंदिशें लगा रहे हैं? साफ तौर पर उन टीकों के लिए भारत में ब्रिजिंग परीक्षण की मांग करना हास्यास्पद है, जो भारत में मौजूदा बीमारी के वायरस से भी खतरनाक किस्म के खिलाफ तीसरे चरण के परीक्षणों में कारगर रहे हैं। कोई भी व्यक्ति सभी नियामकीय अनुपालन सुनिश्चित करने के खिलाफ तर्क नहीं देगा। लेकिन ब्रिजिंग परीक्षणों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी यह परामर्श है कि ये परीक्षण तभी किए जाने चाहिए, जब यह मानने का कोई कारण हो कि विशेष स्थानीय परिस्थितियों से नतीजे बदल जाएंगे। ब्रिजिंग परीक्षण उन टीकों के लिए अनिवार्य स्थानीय परीक्षण हैं, जिन्हें अन्य किसी जगह सुरक्षित एवं प्रभावी पाया गया है। सरकार के वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों के पास ऐसी क्या वजह हैं? अगर फिलहाल ऐसी कोई वजह नहीं हैं तो हमें जेऐंडजे ही नहीं बल्कि फाइजर जैसे उन अन्य टीकों को भी तेजी से मंजूरी देनी चाहिए, जो अन्य जगहों पर प्रभावी साबित हुए हैं। आराम से बैठने और केवल मौजूदा टीका उत्पादन की रफ्तार एवं आकार पर निर्भर रहने से अब तक की भारत की मेहनत पर पानी फिर जाएगा।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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महामारी में समाज का सेल्फी क्षण ( हिन्दुस्तान)

हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार 

स्वास्थ्य सेवा में लगे लोगों के बाद वैक्सीन का रास्ता अब आम लोगों के लिए खुल गया है। बेशक, अभी टीकाकरण का हमारा पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर इतना बड़ा नहीं कि सभी लोगों को वैक्सीन लगाई जा सके, इसलिए प्राथमिकता वरिष्ठ नागरिकों को दी गई है। बाकी का नंबर बाद में आएगा। पूरे एक साल से सरकार के लॉकडाउन और परिवार की तमाम पाबंदियों के मनहूस बोझ में दबे उम्रदराज लोग बढ़-चढ़कर अस्पताल पहुंच रहे हैं। अब ऐसी खबरें अखबारों में नहीं दिख रहीं कि सिर्फ इतने प्रतिशत लोग टीका लगवाने पहुंचे। अखबारों और टेलीविजन की खबरों से अलग अगर हम सोशल मीडिया पर देखें, तो वहां इस टीकाकरण का एक अलग ही नजारा देखने को मिलेगा। महामारी से त्रस्त समाज का यह सेल्फी क्षण है। हर रोज टीकाकरण की ढेर सारी सेल्फी सोशल मीडिया पर चिपकाई जा रही हैं। लोग टीका लगवा रहे हैं और सेल्फी खींच रहे हैं। सेल्फी मास्क लगाकर नहीं खिंचवाई जाती, इसलिए सुई चुभने के उस नाजुक क्षण में जब स्मार्टफोन का कैमरा क्लिक करने जा रहा होता है, तो सावधानी के सारे निर्देश ताक पर रख दिए जाते हैं और मास्क थोड़ी देर के लिए नीचे सरक जाता है। महामारी के भय से जिस मास्क को पूरे एक साल से चेहरे पर चिपकाए रखा था, वह अस्पताल की उस इमारत में थोड़ी देर के लिए हट जाता है, जो कोरोना संक्रमण के लिहाज से सबसे ज्यादा आशंकाओं वाली जगह मानी जा सकती है। सेल्फी के लिए कुछ जोखिम तो लेना ही पड़ता है! जो लोग छत से लटककर, नदी में कूदकर, शेर की पीठ पर हाथ रखकर या सांप के साथ खड़े होकर सेल्फी लेते हैं, वे भी तो आखिर यही करते हैं।

दिल्ली में ट्रैफिक का एक नया नियम यह है कि अगर आप शीशे बंद करके भी कार चला रहे हैं और आपने मास्क नहीं लगाया है, तो आपको दो हजार रुपये बतौर जुर्माना देना पड़ सकता है। लेकिन अगर वैक्सीन लगवाते समय मास्क नहीं लगाया, तो इसके लिए कोई जुर्माना नहीं है। अस्पताल तो एक तरह से इसे प्रोत्साहित ही कर रहे हैं। कई अस्पतालों ने तो बाकायदा सेल्फी बूथ ही बनवा दिया है। टीका लगवाएं और वहां खड़े होकर फोटो खिचवाएं, आपके साथ ही सोशल मीडिया पर अस्पताल को भी थोड़ा प्रचार मिल जाएगा। ठीक यहीं पर हमें लंदन के अखबार द टाइम्स की लेखिका जेनिस टर्नर के पछतावे को भी देखना होगा। उन्हें दुख है कि उन्होंने कोविड-19 टीके के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के अस्पताल को चुना, उनके वे दोस्त ज्यादा चतुर निकले, जिन्होंने इसके लिए कैथेड्रल और एक्सेल सेंटर जैसी जगहों को चुना। ज्यादा अच्छी जगह, यानी ज्यादा अच्छी सेल्फी। खैर, भारत में ऐसे विकल्प नहीं हैं। यहां बस दो ही विकल्प हैं- सरकारी अस्ताल या निजी अस्पताल। आप अपनी पसंद, सुविधा और जेब के अनुसार यह चुन सकते हैं कि आपकी वैक्सीन सेल्फी कहां खिंचेगी? इसे आप एक तरह का फैशन भी कह सकते हैं और भेड़चाल भी, जो कि यह है भी। इसे अच्छा मानें या बुरा, लेकिन सेल्फी 21वीं सदी के समाज की सबसे अभिन्न हमसफर बन चुकी है। हर अवसर पर सेल्फी होती है, हर उत्सव में सेल्फी होती है। सेल्फी हर अवसर को उत्सव में बदल देती है। कोरोना टीकाकरण भी इसी तरह का एक मौका है, जिसे हमने एक उत्सव में बदल दिया है।

अमेरिका में तो सरकार टीकाकरण से ज्यादा बड़ी उम्मीद सेल्फी से बांध रही है। कई पश्चिमी देशों की तरह ही वहां दिक्कत वैक्सीन को लेकर उभर रही दो प्रवृत्तियों से है। इनमें से एक है, वैक्सीन का विरोध और दूसरा है, इसे लेकर हिचक, जिसे ‘वैक्सीन हेजीटेन्सी’ कहा जाता है। अमेरिका, जर्मनी जैसे कई देशों में कुछ ऐसे लोग और संगठन काफी मुखर हैं, जो वैक्सीन की अवधारणा को ही गलत मानते हैं। भले ही ये लोग संख्या में बहुत ज्यादा नहीं हैं, लेकिन वे सिर्फ वैक्सीन का विरोध नहीं करते, बल्कि उसके खिलाफ तरह-तरह का दुष्प्रचार भी करते हैं। तमाम अफवाहें भी फैलाते हैं। कुछ इसके असर की वजह से और कुछ अपनी आशंकाओं के चलते। ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा है, जो अभी कोविड-19 की वैक्सीन लगवाने से हिचक रहे हैं। वे वैक्सीन विरोधी नहीं है, लेकिन कुछ अनजाने से डर हैं, जो उन्हें वैक्सीन से दूर रखे हुए हैं। सरकार का मानना है कि सेल्फी ऐसे लोगों को टीका लगवाने के लिए प्रेरित करने का काम कर सकती है। जब वे सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों को वैक्सीन लगवाते देखेंगे, तो उनकी आशंकाएं खत्म हो सकती हैं। जहां तर्क काम न कर रहे हों, वहां वहम का मुकाबला किसी भेड़चाल से करने में आखिर बुराई ही क्या है? इजरायल में वैक्सीनेशन का काम लगभग पूरा हो चुका है और ब्रिटेन में यह काम जुलाई तक पूरा हो जाएगा। यानी इजरायल में लगभग पूरे देश को वैक्सीन सेल्फी खिंचवाने का मौका मिल चुका है, ब्रिटेन में अगले चार महीनों में पूरी आबादी को यह मौका मिल सकेगा। अमेरिका में भी यह काम साल खत्म होते-होते पूरा हो जाएगा। लेकिन भारत में अगले दो साल में भी सभी लोगों को ऐसी सेल्फी खिंचवाने का मौका मिल पाएगा, यह अभी गारंटी के साथ नहीं कहा जा सकता। आबादी के अनुपात में टीकाकरण करने वाले बहुत कम हैं। यहां कुछ देर के लिए उन देशों के बारे में भी सोच लेना चाहिए, जिन्हें अब भी वैक्सीन का इंतजार है। वहां न तो अभी वैक्सीन पहुंची है और न ही उसे लगवाते समय सेल्फी खिंचवाने का अवसर पहुंचा है। सर्बिया के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर व्यूसिक ने कुछ ही दिनों पहले कहा था, ‘आज की दुनिया में परमाणु हथियार हासिल करना आसान है, कोविड-19 की वैक्सीन हासिल करना काफी कठिन’। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीकाकरण के दूसरे दौर की शुरुआत जब दिल्ली के एम्स में टीका लगवाकर की, तो उस समय खींची गई उनकी तस्वीर शायद सबसे ज्यादा प्रसारित फोटो में से एक है। पर दुनिया के कई देशों के नेताओं को अभी तक यह अवसर नहीं मिला है। हम चाहे वैक्सीन की नजर से देखें या सेल्फी की, महामारी के दौर में यह दुनिया एक ही तरह की नजर आएगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Saturday, March 13, 2021

हमें लॉकडाउन से आगे सोचना होगा (हिन्दुस्तान)

जुगल किशोर, वरिष्ठ जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञ 


भारत में कोरोना का संक्रमण फिर से बढ़ने लगा है। गुरुवार को देश भर में 23,285 नए मामले सामने आए, जो 23 दिसंबर, 2020 के बाद एक दिन में नए मरीजों की सर्वाधिक संख्या है। इनमें से 60 फीसदी से अधिक (14,317 मामले) मरीज तो अकेले महाराष्ट्र में मिले हैं, जबकि केरल में 2,133 और पंजाब में 1,305 नए मरीजों का पता चला। रोजाना के मामलों में नई बढ़ोतरी कर्नाटक (783), गुजरात (710) और तमिलनाडु (685) जैसे राज्यों में भी दिख रही है। इस तरह से देश में सक्रिय मरीजों की संख्या 1.97 लाख से ज्यादा हो गई है, जो कुल संक्रमित मरीजों का 1.74 प्रतिशत है। महाराष्ट्र को लेकर विशेष चिंता है। यहां 21 फरवरी को कोविड-19 मरीजों की संख्या 21 लाख को पार कर गई थी, पर 22 लाख के आंकडे़ को छूने में इसे बमुश्किल 13 दिन लगे, जबकि 21 जनवरी को यह 20 लाख पर पहुंचा था। संक्रमण की इस बढ़ती रफ्तार के कारण ही नागपुर व अकोला जैसे इलाकों में लॉकडाउन लगाकर जनजीवन को रोक दिया गया है, और पुणे में रात्रिकालीन कफ्र्यू का एलान किया गया है। मुंबई में भी पॉजिटिविटी रेट (प्रति 100 जांच पर पॉजिटिव मामलों की दर) बढ़कर 7-7.5 फीसदी हो गई है और कहा गया है कि अगर यह दर 15 फीसदी के करीब पहुंच जाएगी, तो कई दूसरे प्रतिबंध आयद किए जाएंगे।

साफ है, संभलते हालात दोबारा से बिगड़ने लगे हैं। इसकी कई वजहें हो सकती हैं। पहला कारण यह हो सकता है कि वायरस लगातार म्यूटेट (अपना चरित्र बदलना) कर रहा है। यह उसका नैसर्गिक गुण है। वह जितना अधिक फैलता है, उतना अधिक म्यूटेट करता है। अपने यहां हर महीने कम से कम दो बार वायरस अपना रूप बदल रहा है। चूंकि इसके संक्रमण को हम पूरी तरह से रोक नहीं पाए हैं, इसलिए इसका म्यूटेशन होता रहेगा। उल्लेखनीय है कि म्यूटेट वायरस फिर से पूरी आबादी के लिए खतरा बन जाता है। इससे संक्रमण का एक नया चरण आ सकता है। पिछली सदी के स्पेनिश फ्लू में हमने यह देखा था कि संक्रमण का दूसरा दौर जान-माल का भारी नुकसान दे गया। 

दूसरा कारण यह हो सकता है कि हमारे शरीर में इसके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो गई हो। छह-सात महीने में इसका खत्म होना स्वाभाविक है। हमारी तकरीबन 55-60 फीसदी आबादी इस वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित कर चुकी थी। चूंकि महाराष्ट्र, केरल, दिल्ली जैसे राज्यों में शुरुआत में ही वायरस का प्रसार हो गया था, इसलिए बहुत मुमकिन है कि यहां ‘हर्ड इम्यूनिटी’ (करीब 60-70 फीसदी जनसंख्या में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाने की स्थिति) खत्म हो गई हो। नतीजतन, लोग फिर से संक्रमित होने लगे हैं। कई ऐसे मामले सामने आए भी हैं, जिनमें एक बार कोरोना से ठीक हुआ मरीज दोबारा इसकी गिरफ्त में आ गया है। ऐसे में, फिर से सीरो सर्वे कराने की जरूरत आन पड़ी है। इसमें ब्लड सीरम की जांच करके यह पता लगाया जाता है कि कोई आबादी वायरस से किस हद तक लड़ चुकी है। अब तक तीन देशव्यापी सर्वे हो चुके हैं। भले ही हर सर्वे में वायरस के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती दिखी, लेकिन जिस रफ्तार से इसके बढ़ने का अनुमान लगाया गया था, वह हो नहीं सका। यह बताता है कि मानव शरीर में एंटीबॉडी संभवत: खत्म हो रही है। 

तीसरी वजह यह हो सकती है कि नए इलाकों में संक्रमण का प्रसार हो रहा होगा। महाराष्ट्र में अमरावती और नागपुर जैसे क्षेत्रों से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं, जबकि कभी धारावी जैसे इलाके कोविड-19 का केंद्र हुआ करते थे। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी पूर्वी हिस्से की तुलना में मध्य दिल्ली और बाहरी सीमावर्ती इलाकों से अधिक मरीज मिलने के अनुमान हैं। इसका यह मतलब है कि जिन्हें पहले यह रोग नहीं हुआ है, उन पर खतरा कहीं ज्यादा है। हालांकि, संक्रमण की नई लहर नवजात शिशुओं की संख्या बढ़ने से भी आ सकती है, लेकिन कोरोना का नवजातों और बच्चों में अब तक कम असर दिखा है।  मानवीय गतिविधियों के बढ़ने के कारण भी उछाल आए हो सकते हैं। भले ही अनलॉक की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से की गई, लेकिन अब सारा आर्थिक जनजीवन पटरी पर लौट आया है। इस कारण बाजार में चहल-पहल बढ़ गई है। अच्छी बात यह है कि अपने यहां मृत्यु-दर अब भी कम है। यह 1.5 फीसदी के आसपास रुकी हुई है, जो संकेत है कि संक्रमण में यह उछाल जानलेवा नहीं है। यह हमारी बेहतर होती चिकित्सा व्यवस्था व स्वास्थ्य सेवाओं का नतीजा है। बहरहाल, वैज्ञानिक नजरिए से देखें, तो अब लॉकडाउन से संक्रमण को थामना मुश्किल है। बेशक पिछले साल इसी उपाय पर हमारा पूरा जोर था, लेकिन इसका फायदा यह मिला कि कोरोना के खिलाफ हमने अपनी तैयारी चाक-चौबंद कर ली। अस्पतालों की सेहत सुधार ली। लेकिन अब ऐसी कोई जरूरत नहीं है। सावधानी ही बचाव का सबसे जरूरी उपाय है। मास्क पहनना, शारीरिक दूरी का पालन करना और सार्वजनिक जगहों पर जाने से बचना कहीं ज्यादा जरूरी है। हमें ‘न्यू नॉर्मल’ को अपनाना ही होगा। कोरोना संक्रमण के शुरुआती महीनों में इन पर ध्यान तो दिया गया था, लेकिन अब लापरवाही बरती जाने लगी है। यह काफी खतरनाक हो सकता है। कई लोग ‘न्यू नॉर्मल’ के नीरस होने का बहाना बनाते हैं, क्योंकि उन्होंने यह धारणा बना ली है कि इसमें उन्हें घर में कैद होना पड़ेगा। ऐसा कतई नहीं है। मानसिक और सामाजिक सेहत के लिए हमारा घर से बाहर निकलना जरूरी है। मगर हां, निकलते वक्त हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। टीकाकरण भी फायदेमंद उपाय है और इस पर खास तौर से ध्यान दिया जा रहा है। मगर हाल के महीनों में पूरी आबादी को टीका लग पाना संभव नहीं है। इसके अलावा, यह भी अब तक साफ नहीं हो सका है कि टीका लेने मात्र से कोरोना से सुरक्षा संभव है। इसलिए बचाव के बुनियादी उपायों को अपने जीवन में ढालना ही होगा। तभी इस वायरस का हम सफल मुकाबला कर सकेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Friday, March 12, 2021

एनएसई को वरीयता देनेका जारी है सिलसिला (बिजनेस स्टैंडर्ड)

देवाशिष बसु 

गत 24 फरवरी को नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) पर होने वाला कारोबार तकनीकी दिक्कत का शिकार हो गया। सुबह 10.06 बजे एनएसई सूचकांक में दिक्कत आने लगी लेकिन एनएसई ने बाजार खुला रखा। इसके बाद सुबह 11.40 बजे एनएसई ने डेरिवेटिव बाजार बंद कर दिया और तीन मिनट बाद शेयर बाजार भी। इसकी कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई। इसके पश्चात एनएसई की पूर्ण स्वामित्व वाली अनुषंगी कंपनी एनएसई क्लियरिंग लिमिटेड (एनसीएल)जो सभी कारोबारी गतिविधियों के क्रियान्वयन के लिए जवाबदेह है उसने तथा जोखिम प्रबंधन ने काम करना बंद कर दिया। अगले चार घंटे बाजार बंद रहे। एनएसई की तरफ से कोई जानकारी नहीं दी गई। ब्रोकरों और निवेशकों ने माना कि बाजार नहीं खुलेगा। अपराह्न करीब 2.30 बजे देश की सबसे बड़ी ब्रोकरेज कंपनी जीरोधा ने अपने ग्राहकों को संदेश दिया कि वह एनएसई में दिन के कारोबार को बीएसई पर स्थानांतरित कर रही है। चूंकि एनएसई की ओर से कोई और जानकारी नहीं थी इसलिए अपराह्न करीब 3.10 बजे जीरोधा तथा अन्य बड़े ब्रोकरों ने ग्राहकों का जोखिम कम करने का प्रयास किया।

अचानक अपराह्न 3.17 बजे जब उस दिन के सारे सौदे निपटाए जा चुके थे तब जीरोधा के मुताबिक एनएसई ने बताया कि अपराह्न 3.45 से शाम पांच बजे तक विस्तारित अवधि में कारोबार होगा। यदि एनएसई ने तीन बजे तक भी बता दिया होता कि एक्सचेंज दोबारा खुलेगा और काम के घंटे बढ़ाए जाएंगे तो शायद कई ब्रोकरों ने जोखिम कम करने का प्रयास नहीं किया होता। जीरोधा के मुताबिक ब्रोकरों को कोई अपडेट नहीं दिया गया और वे विकल्पहीन हो गए। इससे कई निवेशकों को नुकसान हुआ।


जुलाई 2017 के बाद यह 10वां मौका था जब एनएसई में ऐसी गंभीर तकनीकी खामी सामने आई। इस बार एनएसई ने अपनी दिक्कतों के लिए दो दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को जिम्मेदार ठहराया। एनएसई ने कहा कि उनके लिंकों में स्थिरता नहीं थी और इसका असर एनएसई क्लियरिंग के ऑनलाइन जोखिम प्रबंधन तंत्र पर पड़ा। एनएसई के कारोबार जहां एनसीएल द्वारा मंजूर किए जाते हैं वहीं बीएसई के कारोबारियों का निपटान इंडियन क्लियरिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा किया जाता है। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि इन दोनों क्लियरिंग हाउस के बीच अंतरसक्रियता नहीं थी जबकि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के अनुसार यह आवश्यक है। दो वर्ष से भी अधिक समय पहले 27 नवंबर, 2018 को सेबी ने इन दोनों के बीच अंतरसक्रियता की घोषणा की थी ताकि ब्रोकर एक ही क्लियरिंग हाउस से अपने सौदों का निपटान कर सकें, भले ही वे किसी भी स्टॉक एक्सचेंज पर कारोबार कर रहे हों। यदि सेबी ने यह सुनिश्चित किया होता तो 24 तारीख को हालात काबू में किए जा सकते थे। एनएसई के सभी कारोबारी आसानी से बीएसई पर चले जाते।


अजीब बात है कि सेबी ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया कि यह व्यवस्था सही ढंग से काम कर रही थी क्योंकि बीएसई का इक्विटी कारोबार बढ़कर 40,600 करोड़ रुपये तक पहुंच गया जबकि उससे पहले के 30 दिनों के दौरान उसका औसत दैनिक कारोबार करीब 5,200 करोड़ रुपये था। इस बात में केवल एक समस्या है कि 40,600 रुपये के इस आंकड़े में बॉश कंपनी के 29,000 करोड़ रुपये के वे सौदे भी शामिल हैं जो बाजार खुलने के सामान्य समय से करीब आधा घंटे पहले 8 बजकर 57 मिनट पर किए गए। उसे निकाल दिया जाए तो कारोबार बमुश्किल 11,000 करोड़ रुपये का बचता है यानी बीएसई के रोज के औसत कारोबार से बस दोगुना। यदि अंतरसक्रियता होती तो बीएसई का कारोबार कम से कम 8-10 गुना बढ़ता।


एनएसई ने स्वयं स्वीकार किया है कि कारोबार ठप हुआ क्योंकि एनसीएल का ऑनलाइन जोखिम प्रबंधन तंत्र काम नहीं कर रहा था। ऐसे में ब्रोकर और उनके निवेशक बीएसई पर कारोबार नहीं कर सकते थे और वे एनएसई की व्यवस्था के बंधक बन गए। एक सूत्र के मुताबिक एनएसई और एनसीएल के एक साथ ध्वस्त होने के कारण सेबी और वित्त मंत्रालय के तमाम नेक इरादे एक साथ नाकाम हो गए। बीएसईने सेबी से शिकायत करते हुए कहा कि एनसीएल ने गैर प्रतिस्पर्धी और अनैतिक तरीका अपनाते हुए अपना कामकाज रोका ताकि एनएसई का वर्चस्व और एकाधिकार बना रहे। परंतु सेबी, एनएसई के साथ रहा और उसने जोर दिया कि अंतरसक्रियता ने अपना काम किया (जबकि एनएसई ने स्वयं माना था कि एनसीएल का काम ठप हो गया था) ऐसे में संभव है बीएसई की शिकायत पर कोई सुनवाई न हो। सेबी की प्रेस विज्ञप्ति में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि कारोबार का यूं ठप होना दुनिया भर में चिंता का विषय है। बहरहाल, तकनीकी खामी के बाद कमजोर प्रबंधन और कारोबारियों के साथ खराब संवाद से उन्हें नुकसान हुआ। ये सारी बातें कई सवाल पैदा करती हैं।


पहला, एनएसई को 45 मिनट बाद आपदा सुधार साइट से दोबारा शुरुआत करनी चाहिए थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसने इस विषय में कुछ नहीं बताया और सेबी को भी इससे कोई समस्या नहीं है। दूसरा, एनएसई ने शाम 3.18 बजे दोबारा कारोबार शुरू करने की घोषणा क्यों की? जबकि उस समय तक तमाम ब्रोकर अपना दिन का कारोबार बीएसई पर निपटा चुके थे? तीसरा, एनएसई ने स्वयं माना कि एनसीएल ठीक से काम नहीं कर रहा था और ब्रोकर एनसीएल की साइट इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में सेबी ने यह दावा कैसे किया कि अंतरसक्रियता काम कर रही थी? क्या इस मसले पर एनएसई और एनसीएल को पाकसाफ बताने के पहले सेबी की तकनीकी सलाहकार समिति को इस मसले की जांच नहीं करनी चाहिए थी?


सन 1992 में जब एनएसई की परिकल्पना की गई तब विचार था कि बिना नियम कायदे वाले बीएसई को मजबूत प्रतिस्पर्धा दी जाए। परंतु अब हालात उलट चुके हैं। बीते दो दशक में एनएसई का इस हद तक दबदबा कायम हुआ है कि वह लगातार गलतियां करके भी बचता रहा है। क्लाइंट-कोड परिवर्तन के जरिये कर वंचना की इजाजत (2011), मानव त्रुटि से बाजार में अचानक गिरावट का प्रबंधन (2012), उसी वर्ष शीर्ष पर नियुक्ति में अनियमितता, प्रतिस्पर्धा को कुचलने की कोशिश (2008-2013), सेबी के नियमों का उल्लंघन आदि इसके उदाहरण हैं। यह सब समझा जा सकता है क्योंकि एनएसई प्रबंधन को शक्तिशाली राजनेताओं का समर्थन हासिल था। यह रहस्यमय है कि एकाधिकार वाले एनएसई को संरक्षण कैसे मिलता है। 24 फरवरी की घटना भी यही दिखाती है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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अब नवाचारों को परखने का समय (हिन्दुस्तान)

संध्या वेंकटेश्वरन, स्वास्थ्य-नीति विशेषज्ञ 


हाल-फिलहाल के वर्षों में किसी भी अन्य घटना से कहीं ज्यादा इस महामारी ने जीवन, आजीविका, शिक्षा और स्वास्थ्य को प्रभावित किया है। इस दौर की चुनौतियों से पार पाने के लिए दुनिया भर में नवाचार, यानी इनोवेशन हुए हैं और उनके मुताबिक कुछ तौर-तरीके भी बदले गए हैं, लेकिन इनका लाभ चंद लोगों को ही मिल सका, सभी को नहीं। स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें, तो बेहतर स्वास्थ्य-व्यवहार अपनाने के उपाय, स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचों की सीमाएं, मानव संसाधनों की उपलब्धता में कमी और आपूर्ति शृंखला में रुकावट जैसी समस्याएं व्यापक तौर पर देखी गई हैं। बेशक ये सभी महामारी की देन नहीं थीं, बल्कि कई तो पहले से हमारे समाज में मौजूद थीं, लेकिन महामारी के दौरान ये सभी समस्याएं कहीं ज्यादा गहरी नजर आईं। हमने देखा कि किस तरह से संक्रमण से बचाव और उससे निपटने जैसे कामों में स्वास्थ्यकर्मियों को लगाया गया। उन्हें अपनी नियमित जिम्मेदारियों से अलग कर दिया गया, जिस कारण उन सेवाओं में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी हो गई। इसी तरह, कोरोना मरीजों की जांच और इलाज के लिए स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी सुविधाएं इस्तेमाल की जाने लगीं, जिससे नियमित सेवाएं उन सुविधाओं से महरूम हो गईं। आपूर्ति शृंखला लॉकडाउन की वजह से बाधित हो ही गई थी। इन सभी से नियमित स्वास्थ्य सेवाएं, जैसे नियमित टीकाकरण, टीबी के मरीजों की जांच व इलाज, मातृ एवं बाल स्वास्थ्य देखभाल और पोषण संबंधी कार्यक्रमों में खासा रुकावट पैदा हुई। पर भारत के लिए नवाचार कोई नई घटना नहीं है। महामारी के कुछ महीनों में ही ऐसे कई प्रयोग हुए, जो स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों की कुछ समस्याओं को हल करते दिखे। कम से कम चार मामलों में खासा नवाचार हुए। पहला मामला है, प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना। दूसरा, सामुदायिक (सोशल) मंचों का फायदा लेना। तीसरा, अग्रिम पंक्ति के कर्मियों को सशक्त बनाना और चौथा, आपूर्ति शृंखलाओं में बढ़ोतरी करना।

ज्यादातर नवाचारों में डिजिटल प्लेटफॉर्म का लाभ उठाया गया। जैसे, सुदूर इलाकों में ऑनलाइन काउंसिलिंग की गई और लोगों को परामर्श दिए गए; राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की निगरानी के लिए बाल विकास-निगरानी एप बनाया गया; उत्तर प्रदेश में नियमित टीकाकरण के बारे में लाभार्थी समाज के लिए ‘रिमांइडर कॉल’ की व्यवस्था की गई; गुजरात, केरल और पंजाब में अग्रिम मोर्चे के स्वास्थ्यकर्मियों के लिए टीबी व कोविड से जुड़े डिजिटल निगरानी एप तैयार किए गए; छाती का स्कैन करने व गड़बड़ियों का पता लगाने के लिए कृत्रिम-बुद्धिमता, यानी एआई आधारित जांच की व्यवस्था की गई। विभिन्न संगठनों ने अग्रिम मोर्चे के अपने कर्मचारियों के प्रशिक्षण और उन तक सूचना आदि पहुंचाने के लिए डिजिटिल मंचों का इस्तेमाल किया। इस तरह की अनेक सेवाएं शुरू की गईं, जिनमें ई-संजीवनी, स्वस्थ, प्रैक्टो, पोर्टिया, टेको, अनमोल जैसे नाम प्रमुख हैं। स्वयं सहायता समूहों और ग्राम संगठनों के रूप में समुदाय-आधारित संस्थाओं की भागीदारी ने समाज में हाशिये के लोगों की सेवा करने की क्षमता बढ़ाने में मदद की। जागरूकता के माध्यम से सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा सक्रिय टीबी रोगियों की खोज; हेल्पलाइन नंबरों द्वारा स्वयंसेवक समूहों द्वारा गर्भवती महिलाओं के लिए समय पर सूचना पहुंचाना; पंचायती राज संस्थाओं के सहारे जरूरी स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने में मदद जैसे कामों ने स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने में अपना योगदान दिया। ई-फार्मेसी के माध्यम से टीबी के इलाज व घर पर दवा पहुंचाने के लिए सोशल फ्रेंचाइजिंग मॉडल का भी इस्तेमाल किया गया। वैसे भारत में कई नवाचार शुरू तो हुए, लेकिन उनके दायरे और प्रभाव का शायद ही मूल्यांकन किया गया। देखा जाए, तो देश में सफल नवाचारों के विस्तार और प्रसार की पर्याप्त क्षमता है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि सरकार इनकी क्षमता को नहीं समझ रही। टेलीमेडिसिन के लिए दिशा-निर्देश जारी करना और राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत दरअसल, डिजिटल प्लेटफॉर्म से अधिक से अधिक लाभ लेने का आधार ही तो है। बेशक ग्रामीण भारत में इंटरनेट की सीमा, इंटरनेट के इस्तेमाल में लैंगिक असमानता व डाटा साझा करने संबंधी मानदंडों की चिंताएं डिजिटल मंचों के प्रभाव को सीमित करती हैं। पर स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मंचों पर ध्यान देकर कुछ हद तक सूचना की जरूरत, काउंसिलिंग, घर तक दवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने जैसी मांग और आपूर्ति से जुड़ी समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। इसी तरह, मजबूत नीतियां बनाकर स्वयं सहायता समूहों की सात करोड़ महिला सदस्यों को स्वास्थ्य सेवा में संस्थागत भूमिका निभाने के लिए सक्षम बनाया जा सकता है। जरूरी सेवाओं की मांग और स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही तय करने जैसे कामों में उनकी मदद ली जा सकती है। महामारी के समय तमाम तरह के नवाचार हुए। कुछ का इस्तेमाल छोटी-छोटी जगहों पर भी हुआ, कुछ का उपयोग निजी संगठनों ने किया और बाकी सरकार ने। पर ज्यादातर के प्रभावों का मूल्यांकन नहीं किया गया है। इनके लिए नीतियां बनाने की दरकार है, खासतौर से उनके प्रभाव का आकलन करने के लिए। नवाचारों के भौगोलिक दायरों को पहचानने के लिए, वर्तमान सेवाओं के साथ उनकी सहभागिता परखने के लिए और निजी नवाचारियों के साथ सार्थक साझेदारी विकसित करने के लिए भी असर का आकलन करना चाहिए। नवाचारों के लिए कम से कम तीन पहलुओं पर हमें विशेष ध्यान देना होगा। एक, नवाचार के प्रभाव का आकलन के साथ ही उसे प्रमाणपत्र भी देना होगा, जिसके लिए संस्थागत तंत्र की दरकार होगी। दूसरा, ऐसा नीतिगत वातावरण बनाना होगा, जो नवाचारों के सार्वजनिक अनुबंधों को प्रोत्साहित करे। यह उस संदर्भ में खास जरूरी है, जब सार्वजनिक व्यवस्था में मौजूद व आजमाए गए उत्पादों या सेवाओं की खरीद का बड़ा लाभ मिलता हो। तीसरा पहलू, अनुदान व कर्ज के लिए ऐसा तंत्र बनाना, जो निवेशकों को स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरतें पूरी करने में सक्षम बनाए। उल्लेखनीय है कि जिन डिजिटल मंचों पर ये नवाचार मौजूद हैं, उनके पास पूंजी कम है। चूंकि महामारी के समय हमें इनका लाभ मिला है, तो हम इनकी मदद से मजबूत स्वास्थ्य तंत्र बना सकते हैं।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Wednesday, March 10, 2021

नंदीग्राम का संग्राम (हिन्दुस्तान)


विधानसभा चुनाव वैसे तो पांच राज्यों में हो रहे हैं, लेकिन जिस एक विधानसभा सीट पर न सिर्फ पूरे देश, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में दिलचस्पी रखने वाले बाहर के लोगों की निगाहें भी केंद्रित हो गई हैं, वह है पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम सीट। तृणमूल कांगे्रस की मुखिया और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज यहां से अपना नामांकन दाखिल कर रही हैं, जबकि उनके मुकाबले में भाजपा ने हाल ही में तृणमूल छोड़कर आए शुभेंदु अधिकारी को उतारा है। शुभेंदु इस इलाके से लंबे समय से संसद व विधानसभा में पहुंचते रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने 80 हजार से भी अधिक वोटों से वाम मोर्चे के प्रत्याशी को हराया था। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला करके शायद अपने कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने का काम किया है कि वह जोखिम से घबराने वाली नेता नहीं हैं। ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्थान में सिंगूर और नंदीग्राम का काफी महत्व है। वाम मोर्चे की साढे़ तीन दशक पुरानी सत्ता को खत्म करने में नंदीग्राम आंदोलन ने कितनी बड़ी भूमिका निभाई थी, यह देश जानता है। पिछले एक दशक से यह तृणमूल का गढ़ रहा है। ऐसे में, इस पर किसी अन्य दल को पांव जमाने से रोकने के लिए ममता के पास इससे बेहतर और कोई दांव हो भी नहीं सकता था। इस चुनावी संग्राम को जैसे उन्होंने तृणमूल के वजूद से जोड़ दिया है। लेकिन इस बार उनके सामने वह भाजपा है, जो प्रचुर संसाधनों, धारदार प्रचार अभियानों के साथ-साथ ‘अभी नहीं, तो कभी नहीं’ की रणनीति पर हर चुनाव लड़ने में यकीन रखती है। पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव किस तरह विकास के स्थानीय मुद्दों के बजाय ध्रुवीकरण के खेल में उलझ गया है, इसको नंदीग्राम बता रहा है। इस विधानसभा क्षेत्र में बहुसंख्यक मतदाता अधिक हैं, और भाजपा ‘जय श्रीराम’ के नारे के साथ उन्हें अपने पाले में करने के लिए काफी प्रखर चुनाव अभियान चला रही है। ममता बनर्जी ने कल नंदीग्राम की जनसभा में जिस तरह से ‘चंडी पाठ’ किया और लोगों से कहा कि वह ‘शिवरात्रि’ भी उनके बीच ही मनाएंगी, यह उजागर करता है कि धार्मिक धु्रवीकरण की चुनौती उनके लिए कितनी अहम हो चली है।

भारतीय राजनीति के लिए यह चिंता की बात है कि जब मतदाताओं के पास हिसाब-किताब का मौका आता है, तब हमारा राजनीतिक वर्ग उन्हें जमीनी मुद्दों से दूर करने में कामयाब हो जाता हैै और अक्सर भावनात्मक, धार्मिक मसले निर्णायक भूमिका अख्तियार कर लेते हैं! पिछले एक दशक से जो पार्टी सूबे की तरक्की और खुशहाली के वादे पर राज कर रही है, उसके शासन की खामियों व कमियों को निर्णायक मुद्दा न बना पाना न सिर्फ विपक्ष, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र की विफलता है। चुनाव गंभीर विमर्श की जगह यदि आज ‘खेला’ बन रहे हैं, तो इसके लिए राजनीतिक-व्यवस्था के सभी पक्ष जिम्मेदार हैं। क्या चुनाव सिर्फ सत्ता का खेल है? नहीं! ये बेहतर कल के सपनों-इरादों की बुनियाद हैं और इनकी शुचिता व गंभीरता को हास्यास्पद नारों, जुमलों और प्रलोभनों की भेंट नहीं चढ़ने दिया जा सकता। नंदीग्राम का चुनाव धार्मिक धु्रवीकरण के बजाय यदि जमीनी मुद्दों पर कोई परिणाम गढ़ता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए कहीं अधिक आश्वस्तकारी होगा। फिर ‘खेला हौबे’ जैसे नारों की जरूरत भी नहीं पडे़गी।

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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आरक्षण पर जरूरी विचार (हिन्दुस्तान)

पचास प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण देना सही है या नहीं, इसका फैसला करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का गंभीर होना स्वागतयोग्य है। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने आरक्षण के प्रावधानों और इसकी बदलती जरूरतों पर विचार शुरू कर दिया है। विगत वर्षों में एकाधिक राज्य ऐसे हैं, जहां 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण देने की कोशिश हुई और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। पूरे देश में अभी यह भ्रम की स्थिति है कि क्या किसी राज्य को 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण देने की अनुमति दी जा सकती है? वर्ष 1992 के इंद्रा साहनी मामले में संविधान पीठ के फैसले के बाद यह परंपरा रही है कि 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता। वैसे तो हमारी सरकारों को ही विधायिका के स्तर पर यह विचार कर लेना चाहिए था कि आरक्षण की सीमा क्या होनी चाहिए। यह दुर्भाग्य है कि आरक्षण राजनीति का तो विषय है, पर उसे लेकर वैधानिक गंभीरता बहुत नहीं रही है। वैधानिक गंभीरता होती, तो सांसद-विधायक आरक्षण की सीमा पर संवाद के लिए समय निकाल लेते और मामला सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुंच पाता।

अब अदालत को यह देखना है कि विगत दशकों में कैसे सामाजिक-आर्थिक बदलाव हुए हैं। इसके लिए अदालत ने सभी राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों से जवाब दाखिल करने को कहा है। वास्तव में, मराठा आरक्षण को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की संविधन पीठ ने सुनवाई के दौरान जो कदम उठाए हैं, उनका दूरगामी और गहरा असर तय है। महाराष्ट्र सरकार मराठा वर्ग को विशेष आरक्षण देना चाहती है, जिस वजह से 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा का उल्लंघन हो रहा है, अत: अदालत ने इस आरक्षण पर रोक लगा दी थी। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार की शिकायत और अन्य याचिकाओं ने गहराई से विमर्श की पृष्ठभूमि तैयार की है। इसमें कोई शक नहीं, अगर महाराष्ट्र के मामले में 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण को स्वीकृत किया गया, तो इसका असर सभी राज्यों पर पड़ेगा, अत: इसमें तमाम राज्यों की राय लेना एक सही फैसला है। सभी राज्यों को सुनकर एक रास्ता निकालना होगा, ताकि भविष्य में विवाद की स्थिति न बने। कई सवालों के हल होने की उम्मीद बढ़ गई है। क्या राज्यों को अपने स्तर पर आरक्षण देने का अधिकार है? क्या केंद्र सरकार के अधिकार में कटौती नहीं होगी? 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण देने से समाज के किसी वर्ग के साथ अन्याय तो नहीं होगा? आरक्षण का समानता के अधिकार से कैसे नया नाता बनेगा?

सर्वोच्च न्यायालय जब सुनवाई शुरू करेगा, तब अनेक जटिल सवालों के जवाब मिलते जाएंगे। संविधान की रोशनी में आरक्षण पर तथ्य आधारित तार्किक बहस जरूरी है, ताकि वंचित वर्गों को यथोचित लाभ मिले। सबसे अच्छा तरीका तो यही है कि आबादी के अनुपात में ही वंचितों को अवसर दिए जाएं। यह भी देखना है कि आज के समय में वंचित कौन है। वंचितों को अवसर देने की कोशिश में किसी के साथ अन्याय न होने लगे। चूंकि 50 प्रतिशत की मंजूर आरक्षण सीमा को  28 साल बीच चुके हैं, तो नई रोशनी में पुनर्विचार हर लिहाज से सही है। पुनर्विचार के जो नतीजे आएंगे, उससे देश की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक बुनियाद तय होगी। लोग यही उम्मीद करेंगे कि फैसला ऐसा आए, जो समाज को मजबूत करे।

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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चुनावी बजट (दैनिक ट्रिब्यून)

निस्संदेह पंजाब के वित्तमंत्री मनप्रीत सिंह बादल द्वारा सोमवार को विधानसभा में पेश बजट में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह के चुनावी चक्रव्यूह की छाया स्पष्ट नजर आती है। लक्षित समूहों को ध्यान में रखते हुए रियायत, लाभ व उपहार दिये गये हैं। वैसे भी आगामी वर्ष में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले राज्य की कांग्रेस सरकार का यह आखिरी बजट है। स्वाभाविक है कि बजट मीठा-मीठा होना ही था। किसान आंदोलन की तपिश को पार्टी की ऊर्जा में तब्दील करने की सुनियोजित कोशिश भी हुई है। कैप्टन को पता है कि पंजाब के किसान केंद्र द्वारा लागू किये कृषि सुधार कानूनों की खिलाफत में अगुआ हैं। इसके चलते इस बड़े वोट बैंक को आकर्षित करने के लिये कृषि क्षेत्र पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। वित्तमंत्री मनप्रीत बादल ने करीब 1.13 लाख किसानों का 1,186 करोड़ रुपये का ऋण माफ करने की घोषणा की है। इसके अलावा भूमिहीन किसानों को 526 करोड़ रुपये का कर्ज नहीं चुकाना पड़ेगा। कमोबेश यह दांव वर्ष 2017 में घोषित उस फसली ऋण माफी योजना का ही विस्तार है, जिसके बूते कांग्रेस अकाली भारतीय जनता पार्टी गठबंधन सरकार से सत्ता छीनने में कामयाब हुई थी। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि ऋणमाफी जैसे लोकलुभावन कदम इस समस्या का फौरी उपचार तो दे सकते हैं, लेकिन यह पूर्णरूप से स्थायी समाधान नहीं है। सही मायनों में ऋण माफी का राजनीतिक उपक्रम ऋण लेने की नई शृंखला को ही विस्तार देता है। कालांतर में राज्य की अर्थव्यवस्था को बीमार करने में इनकी बड़ी भूमिका भी होती है। ऐसी ही लोकलुभावनी राजनीति के कारण पंजाब की कृषि समस्याओं के समाधान की दिशा में कारगर पहल नहीं हो पायी है। अलाभकारी खेती, गिरता जलस्तर, भूमि की उर्वरता में गिरावट तथा फसलों की कटाई में होने वाली समस्याएं ऐसी ही लोकलुभावन राजनीति हथकंडों की वजह से विकट हुई हैं जिस पर दीर्घकालीन लक्ष्यों के अनुरूप विमर्श की जरूरत है। 


इन तमाम लोकलुभावन वादों-इरादों के बीच यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि राज्य की आर्थिक हालत खस्ता है। बजट पेश करने के दौरान वित्तमंत्री मनप्रीत बादल लगातार बढ़ते वित्तीय संकट के प्रति चिंता तो जताते हैं लेकिन उससे उबरने के लिये कोई ठोस रणनीति का जिक्र नहीं करते।  यह सार्वजनिक तथ्य है कि पंजाब के सिर पर कर्ज 2,73,730 करोड़ रुपये हो गया है। वर्ष 2016-17 में यह लगभग 1,53773 करोड़ रुपये था। इसके बावजूद सरकार ने किसानों को मुफ्त बिजली देने के लिये 7180 करोड़ रुपये आवंटित किये हैं। राज्य सरकारों के लिये इस तरह की सब्सिडी अपना जनाधार बढ़ाने का हथियार रहा है। इसके बावजूद कि नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी कैग इसे राज्य की चरमराती अर्थव्यवस्था के कारकों में मुख्य घटक बताते रहे हैं। कैग राज्य सरकार को इस स्थिति से उबरने को कहता रहा है। बहरहाल, इसके बावजूद वित्तमंत्री ने फसलों के विविधीकरण को प्रोत्साहित करने और बागवानी को बढ़ावा देने के लिये कतिपय योजनाओं की भी घोषणा अपने बजट में की है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि इन योजनाओं को व्यावहारिक व दीर्घकालीन दृष्टि से लाभदायक बनाया जाये। लक्षित समूहों को ध्यान में रखते हुए कैप्टन अमरेंद्र सरकार ने बड़े समूहों को कुछ न कुछ देने का प्रयास किया है। अब चाहे वे सरकारी कर्मचारी हों, वृद्धावस्था पेंशन पाने वाले लोग हों या कारोबारी लोग। इसके बावजूद कि राज्य सरकार संसाधनों के संकुचन के चलते आर्थिक तंगी से गुजर रही है। राज्य की अर्थव्यवस्था के सुचारु संचालन के लिये नये वित्तीय संसाधन जुटाने और राजकोषीय अनुशासन लागू करने की जरूरत है। यह जानते हुए भी कि सामाजिक क्षेत्र के लिये वित्तीय संसाधन जुटाने की अनदेखी होती रही है। साथ ही कर चोरी पर भी लगाम लगाने की जरूरत है जो राज्य के राजस्व में बड़ी सेंध लगा रही है। इसके अलावा सब्सिडी को तर्कसंगत बनाकर वित्तीय भार को कम करने की कोशिश तो की ही जा सकती है। यह मानते हुए कि राज्य के हित चुनावी लाभ से महत्वपूर्ण हैं। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Monday, March 8, 2021

खुद को जिद्दी बनाएं महिलाएं (हिन्दुस्तान)

बबीता फोगाट, प्रसिद्ध खिलाड़ी 

साल 2002 या 2003 की बात है। तब हम बहनों ने कुश्ती की बस शुरुआत ही की थी। पहलवानी में लड़कियां न के बराबर थीं, इसलिए हम पुरुषों के साथ लड़ा करती थीं। एक दिन हमारे पिता दंगल लड़वाने के लिए हम भाई-बहनों को राजस्थान ले गए। मुकाबले को लेकर हमारे अंदर एक अलग रोमांच था। मगर हमारा सारा उत्साह अचानक से फीका पड़ गया, जब आयोजक ने कहा, ‘आखिर किस ग्रंथ में लिखा है कि लड़कियां कुश्ती लड़ सकती हैं?’ मैं भौंचक रह गई। लिखा तो यह भी नहीं है कि लड़कियां दंगल नहीं कर सकतीं! मगर उस दिन उन्हें जवाब देने की हमारी हैसियत नहीं थी। मैंने कहा भी कि हम लड़कों से लड़ लेंगी, मगर वह टस से मस नहीं हुए। नतीजतन, हमें निराश वापस लौट जाना पड़ा। हालांकि, मेरे भाई को लड़ने की अनुमति मिल गई थी। उस दिन हमें सिर्फ यही मलाल था कि काश, हम लड़की न होते! काश, हमें भी मुकाबला करने देते! यह वह समय था, जब हरियाणा के हमारे समाज में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले नाममात्र के मौके मिलते थे। महिलाएं तो खेल का नाम लेने तक से घबराती थीं। लेकिन कहते हैं न कि हर बच्चे की सफलता के पीछे उसके मां-बाप का हाथ होता है। हम ‘फोगाट सिस्टर्स’ के लिए भी यही सच है। अपने मां-बाप की उंगलियां पकड़कर ही हमने यह मुश्किल यात्रा तय की है। उन दिनों तो लोग बस ताना मारा करते थे। कहा करते, देखो, ये लड़कियां दंगल खेलती हैं! मगर अब वही समाज हमें सिर आंखों पर बिठाता है। मेरे भाई को तो अब भी कहा जाता है कि पहले मेहनत करो, बहनों जैसी सफलता पाओ, तब कोई मांग करो। अब नजीर के तौर पर हम बहनों को पेश किया जाता है। पहले कहा जाता था, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे बनोगे खराब। मगर अब महिला खिलाड़ियों ने साबित कर दिया है, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे बनोगे लाजवाब।

आज महिला दिवस को मैं इन्हीं दो पहलुओं से देखती हूं। पहले हमारा मजाक उड़ाया जाता था, लेकिन आज खूब शाबाशी दी जाती है। अब पुरुषों में यह सोच नहीं रही कि महिलाएं चूल्हे-चौके के लिए ही बनी हैं। अब वे समझ गए हैं कि औरतें हर क्षेत्र में उनसे आगे निकल सकती हैं। देखा जाए, तो देश-समाज की सोच बदलने के लिए खिलाड़ियों ने ही नहीं, पूरी महिला बिरादरी ने लड़ाई लड़ी है। किसी का योगदान कम नहीं है। फिर चाहे वह मिस वल्र्ड मानुषी छिल्लर हों, मिस इंडिया रनरअप मान्या सिंह हों, अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला हों, आईपीएस किरण बेदी हों या फिर पीवी सिंधु, साक्षी मलिक या फोगाट सिस्टर्स। हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपना मुकाम हासिल किया और समाज में आदर्श बनकर उभरीं। इसका काफी असर पड़ा है। पहले खुद औरतों के मन में यह बात पैबंद होती थी कि उनकी जिम्मेदारी घर-परिवार तक ही सीमित है। मगर आज न सिर्फ सुदूर गांव की लड़कियां भी आसमान छूने की चाहत रखती हैं, बल्कि सफलता हासिल करके अपने समाज की सोच बदलने में भी सफल होती हैं। आज अपने दम पर आगे बढ़ने वाली तमाम महिलाओं की यही कोशिश है कि वे इसी तरह देश-दुनिया पर असरंदाज होती रहें। जाहिर है, आने वाले दिनों में महिलाएं और ज्यादा प्रभावशाली भूमिका में आ सकती हैं। इसके लिए उन्हें अधिक से अधिक जागरूक करना होगा। उनको हर क्षेत्र में अपनी भागीदारी निभाने के लिए प्रेरित करना होगा, क्योंकि जब वे खुद कदम बढ़ाएंगी, तो कुछ न कुछ नया करके ही दिखाएंगी। महिलाओं को मौका मिले, तो वे काफी कुछ कर सकती हैं। अपनी काबिलियत और मेहनत के दम पर नया इतिहास रच सकती हैं। कई योग्य महिलाएं तो आज भी मनमाफिक काम करने का अवसर ढूंढ़ रही हैं। उनकी मदद की जानी चाहिए। हमारे समाज में  घूंघट प्रथा बंद होनी चाहिए, क्योंकि यह भी महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकती है। 

एक प्रयास सुरक्षा के मोर्चे पर भी करना होगा। महिलाओं की सुरक्षा आज भी एक बड़ा मसला है। इसे यह तर्क देकर नहीं बचा जा सकता कि शुरू से ही महिलाओं को निशाना बनाया जाता रहा है। हां, यह जरूर है कि पहले वे इतनी जागरूक नहीं थीं। उनके साथ होने वाली ज्यादतियां उजागर नहीं हो पाती थीं। मगर अब मीडिया के सहयोग से महिला-उत्पीड़न की घटनाएं लगातार उजागर हो रही हैं। जब ऐसी घटनाएं सुर्खियां बनती हैं और देश-समाज के सामने आती हैं, तो महिलाओं को न्याय दिलाना आसान हो जाता है। सत्ता-प्रतिष्ठान भी इस कोशिश में है कि ऐसे कानून बनें, जिनसे महिलाओं का उत्पीड़न बंद हो। उन्हें ‘सेल्फ डिफेंस’ का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। तब भी, महिलाओं की सुरक्षा के लिए अभी और कदम उठाए जाने की जरूरत है। मौजूदा कानूनों को और सख्त किया जाए, ताकि महिलाओं के खिलाफ कुछ भी करने से पहले अपराधी सौ बार सोचें। कानून यदि मजबूत होगा, तो अपराधियों पर लगाम लग सकेगा। हमारे नीति-नियंता चाहें, तो आज के दिन इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। हालांकि, कुछ कोशिश महिलाओं की तरफ से भी होनी चाहिए। मिसाल के तौर पर, औरतों को जिद्दी बनना चाहिए। अगर उन्हें कुछ करना है, तो मंजिल पाने की ललक उनके अंदर होनी ही चाहिए। उनमें यह जिद होनी चाहिए कि उन्हें हर हाल में सफल होना है। यह बात उन्हें गांठ बांध लेनी चाहिए कि पुरुषों से वे किसी मामले में पीछे नहीं हैं, बल्कि कई क्षेत्रों में तो उनसे आगे निकल चुकी हैं। पिछले ओलंपिक (2016 रियो ओलंपिक) खेलों में तो पीवी सिंधु और साक्षी मलिक ने ही पदक जीतकर देश की लाज बचाई थी। वैश्विक मंचों पर आज महिलाएं देश का कहीं ज्यादा प्रतिनिधित्व करने लगी हैं। इसीलिए कोई समाज अपनी लड़कियों को यदि कहता है कि वे अमुक काम नहीं कर सकतीं, तो लड़कियों को जिद पालकर वह काम जरूर करना चाहिए। संकीर्ण सोच वाले लोगों के मुंह तभी बंद होंगे। आखिर म्हारी छोरियां छोरों से कम कहां हैं?

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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दोस्ती तक नहीं पहुंचेगी सैन्य वापसी (हिन्दुस्तान)

जयदेव रानाडे, प्रेसिडेंट, सेंटर फॉर चाइना एनालिसिस ऐंड स्ट्रैटजी 


भारत और चीन के विदेश मंत्रियों और सीमा पर सैन्य कमांडरों के बीच हाल ही में बनी सहमति के बावजूद दोनों देशों का आपसी रिश्ता नाजुक बना हुआ है। माना यही जा रहा है कि देपसांग मैदान, डेमचोक, गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स पर वार्ता आसान नहीं होगी, और इसी से पता चल सकेगा कि चीन सीमा पर तनाव कम करने और शांति बहाल करने के लिए गंभीर है अथवा नहीं। लद्दाख के पैंगोंग त्सो के उत्तरी और दक्षिणी तटों से 10 फरवरी से सैनिकों को वापस बुलाने पर बनी सहमति असल में चीनी फौज को उन जगहों से पीछे हटाने का पहला अल्पकालिक कदम है, जहां अप्रैल, 2020 से वह कब्जा जमाए बैठी थी। इसके अलावा, आपसी विश्वास की कमी और द्विपक्षीय वार्ता पर संदेह के बादल हालात को जटिल बना रहे हैं। दरअसल, मई 2020 के बाद से चीन ने लद्दाख से शुरुआत करते हुए 4,057 किलोमीटर लंबी पूरी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जो सैन्य दबाव बनाया, उसके गहरे सामरिक निहितार्थ हैं। बीजिंग सैन्य, नागरिक और कूटनीतिक माध्यमों का एक साथ इस्तेमाल करता रहा है। महत्वपूर्ण यह भी है कि दोनों देशों और लोगों के बीच तथाकथित ऐतिहासिक और पारंपरिक रूप से घनिष्ठ संबंध होने के मिथक को भी चीन ने स्पष्ट तौर पर बेपरदा किया है, और यह साफ कर दिया है कि बीजिंग कभी भी भारत के हितों या अच्छे संबंधों के प्रति संवेदनशील नहीं है। इसलिए भारत को इसी संदर्भ में द्विपक्षीय रिश्तों की पड़ताल करनी चाहिए।

ऊंचाई वाले लद्दाख क्षेत्र में नौ महीने से गतिरोध अब भी बना हुआ है, क्योंकि दोनों देश पूरी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर आमने-सामने हैं। एक रिपोर्ट ने यह बताया है कि मई महीने के बाद से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) तिब्बत-भूटान सीमा पर तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (टीएआर) में द्रोवा गांव के ठीक सामने एक सैन्य ठिकाना बना रही है। सिक्किम में नाथू ला के सामने यादोंग में उसने एक हवाई अड्डा भी बनाया है। ये ऐसे निर्माण-कार्य हैं, जो तिब्बत-भूटान सीमा पर तनाव बढ़ा सकते हैं। इसी तरह, तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र का दुष्प्रचार और जन सुरक्षा टीमों का दौरा भी महत्वपूर्ण है, जिन्होंने ग्रामीणों को चीन की सीमाओं के बारे में जानकारी देने के लिए पैंगोंग, शिक्वान्हे, डोमचोक तक यात्रा की और ‘पैंगोंग को अंतरराष्ट्रीय झील’ बनाने की बात कही। इस दरम्यान चीन ने एक वीडियो सम्मेलन भी आयोजित किया, जिसमें नेपाल के नेतृत्व ने ‘एक चीन की नीति’ के लिए काठमांडू की प्रतिबद्धता को दोहराया। नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने भारत के साथ इसी नाजुक समय पर विवादास्पद मुद्दे भी उठाए। चीन के विदेश मंत्री वांग यी अचानक अगस्त में तिब्बत गए। उन्होंने ल्हासा में तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के नेताओं से मुलाकात की और पैंगोंग त्सो व चुशूल में सीमावर्ती क्षेत्रों की भी यात्रा की। भारत के बिजली ग्रिड पर एक संदिग्ध साइबर हमला भी हुआ, और सितंबर में वांग यी की भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की मुलाकात के बाद, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के प्रभाव वाले अखबार ग्लोबल टाइम्स के मुख्य संपादक हू शीजीन ने एक संपादकीय लिखा, जिसमें युद्ध के लिए चीन को तैयार रहने के लिए कहा गया। भारत के खिलाफ बीजिंग की सैन्य कार्रवाई अप्रत्याशित नहीं थी। इसके संकेत 2016 में पीएलए के पश्चिमी थियेटर कमांड की स्थापना के साथ ही मिल गए थे, जो चीन द्वारा नव-निर्मित पांच सैन्य थियेटर कमांड में सबसे बड़ा है। इसका उद्देश्य क्षेत्र में चीन की ताकत को सुनिश्चित करना और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) की सुरक्षा करना है। वर्ष 2015 में सीपीईसी की घोषणा के तुरंत बाद, चीन के नेताओं ने भारत से आने वाले मेहमानों, यहां तक कि उच्चस्तरीय दौरे में भी, यह कहना शुरू कर दिया था कि ‘पाकिस्तान के साथ बातचीत फिर से शुरू करें, तनाव कम करें, कश्मीर मसले का हल निकालें और तब चीन के साथ संबंध सुधारने की तरफ बढ़ें’।  वर्ष 2017 में डोका ला में तनातनी के बाद पीएलए की थल और वायु सेना द्वारा ऊंचाई वाले तिब्बती पठार में प्रशिक्षण-कार्यक्रम आगे बढ़ाए गए। चीनी सैन्य मीडिया में इनके बारे में बताया गया कि ये भारत के खिलाफ तैयारी का हिस्सा हैं।

साफ है, आने वाले दिन अनिश्चित और तनावपूर्ण हो सकते हैं। यहां चाइनीज इंस्टीट्यूट ऑफ कंटेम्पररी इंटरनेशनल रिलेशन्स (सीआईसीआईआर) में दक्षिण एशिया मामलों के विभाग के निदेशक हू शीशेंग के दावे खासतौर से प्रासंगिक हो जाते हैं। यह संस्था चीन की मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट सिक्योरिटी का थिंक टैंक है, जो पोलित ब्यूरो को रिपोर्ट करती रहती है। हू शीशेंग ने दावा किया है कि भारत और चीन अपनी आजादी की शुरुआत और क्षेत्रीय पदानुक्रम बनाने के बाद से ही हितों के टकराव, यहां तक कि सैन्य संघर्ष में मुब्तिला रहने को अभिशप्त हैं। इसी तरह, उन्होंने यह भी महसूस किया कि सीमा विवाद से अधिक जटिल मसले प्रभुत्व स्थापित करने और इस क्षेत्र में श्रेष्ठता हासिल करने की होड़ हैं।

17 दिसंबर को ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित हू शिशेंग का एक लेख तो और भी हैरान करने वाला है। उन्होंने भारत पर चीन के प्रति नकारात्मक और रुकावटी रुख अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, चीन के उदय को रोकने के लिए भारत बहुपक्षीय तंत्र की आड़ में बीजिंग के खिलाफ अवरोध पैदा कर रहा है और ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका के संगठन ‘ब्रिक्स’ व ‘शंघाई सहयोग संगठन’ को महत्वहीन बनाने की कोशिशों में जुटा है। उनका मानना है कि भविष्य में भारत और चीन के बीच खाई बढ़ती जाएगी, क्षेत्रीय व वैश्विक मुद्दों में आपसी मतभेद बढ़ेंगे और चीन-भारत सहयोग के लिए अनुकूल माहौल फीका पड़ता जाएगा। ध्यान रहे, दोनों लेखों को प्रकाशित करने से पहले चीन में निश्चित तौर पर उच्च-स्तर पर अनुमति ली गई होगी। बेशक अभी कुछ समय के लिए सैन्य तनाव कम किए जा सकते हैं, पर कदम पीछे हटाने को लेकर चीन में आलोचना हुई है। चीन नई दिल्ली की सरकार को घेरने के लिए और भारत के उभार को कमतर साबित करने के लिए एक अन्य सैन्य दांव खेल सकता है। लिहाजा, पहली बार वार्ता में लेफ्टिनेंट-जनरल और राजनयिक को शामिल करने वाले भारत को यह सुनिश्चित करना  चाहिए कि उसके क्षेत्रीय और संप्रभु हितों से कतई समझौता नहीं किया जाएगा। भारत-चीन संबंध अब ज्यादा दिनों तक पहले जैसे नहीं रहेंगे और भारत को अपनी अर्थव्यवस्था व विकास के महत्वपूर्ण क्षेत्रों से चीन को बाहर करना ही होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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चुनावी खेल और असहाय लोकतंत्र (हिन्दुस्तान)

शशि शेखर 

क्या सिर्फ पश्चिम बंगाल में चुनाव हो रहा है? इस सवाल के जवाब में कोई भी कहेगा कि नहीं, कुल जमा पांच राज्यों में विधानसभा के लिए सिंहासन की लड़ाई जारी है। यही सही है, तो अधिकतर चर्चा बंगाल की क्यों हो रही है? क्या देश की राजनीति में अन्य चार प्रदेश कोई असर नहीं रखते? इन सवालों के जवाब के लिए भी आपको पश्चिम बंगाल की ओर रुख करना होगा। वहां जिस तरह की सियासी जंग चल रही है, उसका यह उदाहरण अकेले ही सच से सामना कराने को पर्याप्त है। पिछले दिनों फटाफट चैनलों पर एक दृश्य बार-बार दिखाया जा रहा था। इसमें नॉर्थ 24 परगना की निवासी 80 बरस से ऊपर की उम्र वाली एक महिला अपना बुरी तरह सूजा हुआ मुंह दिखाकर कहती है, ‘मुझे उन लोगों ने मारा। मैं मना करती रही, पर वे मारते गए। मुझसे सांस नहीं ली जा रही। पूरे शरीर में जोर का दर्द हो रहा है।’ दादी-नानी की उम्र वाली उस महिला का चेहरा, वेदना से कंपकंपाती आवाज और अस्पष्ट शब्द पीड़ा का अनलिखा, पर सहज ही दिल में उतर जाने वाला आख्यान आनन-फानन में रच देते हैं। उसकी यह दशा किसने बनाई?

इस प्रश्न का उत्तर लिए उसका पुत्र गोपाल मजूमदार अगले शॉट में नमूदार होता है। जीर्ण-शीर्ण अधोवस्त्र, बीच से चिरे होंठ से दिख रहे टेढे़-मेढे़ दांत मामले की भयावहता बढ़ाने को पर्याप्त हैं। गोपाल बताता है, ‘वे 10-12 लोग थे। उन्होंने आते ही मुझे मारना शुरू कर दिया। मां शोर-ओ-गुल सुनकर घर से बाहर आई, तो उसे भी पीटना शुरू कर दिया। घर के अन्य लोगों को भी  मारा। वजह? मैं भाजपा का कार्यकर्ता हूं। मारने वाले तृणमूल कांग्रेस के लोग थे।’‘किसी को पहचानते हो’, रिपोर्टर पूछता है। ‘नहीं, अंधेरा था, इसलिए नहीं देख पाया।’ शक और शुब्हे की तमाम गुंजाइशों के बावजूद यह जवाब आग भड़काने के लिए काफी था। भाजपा ने पूरे प्रदेश में पोस्टर टांग दिए। उनसे महिला का सूजा हुआ चेहरा झांक रहा था और मोटे हर्फों में सवाल लिखा था- ‘क्या यह बंगाल की बेटी नहीं है?’ खुद को बंगाल की बेटी बताने वाली ममता बनर्जी ने कुछ दिनों पहले ही कहा था, ‘बंगाल पर बंगाली राज करेंगे, बाहरी नहीं’। उनको यह जोरदार जवाब था।

फटाफट खबरों वाले चैनल गदगद थे। फुटेज बिकाऊ था, ऊपर से गला फाड़कर अपने दलों का दलदल बिखेरने वाले प्रवक्ता शोर मचा रहे थे कि तभी तृणमूल ने दावा किया कि यह सियासी अदावत नहीं, घरेलू हिंसा का मामला है। पुलिस भी इसी पर मोहर लगा रही थी। उनके समर्थन में पीड़िता के अन्य परिजन ‘बाइट’ दे रहे थे, खुद को चश्मदीद बताते हुए। स्वयं को वृद्धा का पोता और पतोहू बताने वाले दंपति इसे घरेलू हिंसा का मामला बता रहे थे। भाजपा प्रवक्ता की नजर में यह सत्तारूढ़ दल के दबाव से उपजा बयान था, तो  हुकूमतनशीं पार्टी के बयानवीर बुजुर्ग महिला और उसके बेटे को बिका हुआ साबित करने पर आमादा थे।

रही बात पुलिस की, तो उसे भाजपा पहले से ही सूबाई सरकार का एजेंट साबित कर चुकी है। इसके उलट तृणमूल सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग को केंद्र का पालतू तोता बताती है। याद करें, कोलकाता के पूर्व पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के मामले में कैसी लज्जाजनक रस्साकशी हुई थी! ऐसे ही, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा के काफिले और वाहन पर हुए हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने तीन आईपीएस अफसरों को पश्चिम बंगाल काडर से वापस बुला लिया था। अपने आप में यह अनूठा और बेहद कड़ा फैसला था, पर सिलसिला यहीं नहीं थमा। पिछले दिनों ममता बनर्जी की बहू को ईडी के समन और फिर पूछताछ ने कड़वाहटों के सिलसिले को नए आयाम दे दिए। बंगभूमि का दुर्भाग्य है कि यहां आए दिन नए विवादों की आग जलाई जाती है। अगले कथानक के रचे जाने तक राजनीतिक दल इन फुंके हुए अलावों पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने की कोशिश करते हैं। हम इस आघातकारी सिलसिले का कारण जानते हैं। भाजपा किसी भी कीमत पर इस प्रदेश को अपनी झोली में डाल लेना चाहती है और ममता बनर्जी सुई की नोक भी न देने की तर्ज पर जी-जान लड़ाए हुई हैं। इस खेल में कोई कम नहीं है, इसलिए हर बार एक नया प्रहसन रचा जाता है, खबरें गढ़ी जाती हैं। ऐसा लगता है, जैसे हजारों साल बाद हस्तिनापुर इतिहास की गहराइयों से बाहर निकल आया है। शोर है, चर्चा है, पर तथ्य और तर्क कहीं बिला गए हैं।

हम भारतीय हमेशा से तमाशापसंद थे, पर लोकतंत्र का ऐसा तमाशा बनेगा, यह अकल्पनीय था। बंगाल इसीलिए सुर्खियों में है और अन्य सूबे नेपथ्य में कहीं कुलबुलाते नजर आते हैं। हालांकि, वे कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। असम में भी तो वे सारी समस्याएं मौजूद हैं, जिनसे बंगाल बजबजा रहा है, पर वहां ऐसा हंगामा बरपा नहीं है। असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के महत्व पर चर्चा करना शुरू कर दूं, तो यह जगह नाकाफी साबित हो जाएगी। यह तकलीफदेह है कि अन्य चुनावी सूबों से भी गंभीर मुद्दे नदारद हैं। नेता या तो अतिरंजित आरोप लगा रहे हैं या ऐसे कौतुक रच रहे हैं, जिनसे उनके करतब वायरल हो जाएं। तमिलनाडु में दंड लगाते राहुल गांधी और असम में स्थानीय महिलाओं के साथ थिरकती प्रियंका की तस्वीरों के साथ शीर्ष भाजपा नेताओं की किसानों या दलितों के यहां भोजन की तस्वीरों ने सुर्खियां बटोरीं। क्या इससे किसानों की दशा सुधर जाएगी, दलित मुख्यधारा का हिस्सा बन जाएंगे, महिलाओं के हालात बदल जाएंगे और कुपोषण के मारे इस देश के अधिकांश लोग दंड-बैठक लगाने लायक हो जाएंगे? ऐसे तमाम प्रश्न हैं, जो चुनाव-दर-चुनाव उत्तर हासिल करने के लिए छटपटाते रहते हैं। इन सवालों में ही चुनावों के कौतुक बन जाने की दर्दनाक दास्तान छिपी हुई है। समय आ गया है, जब संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र खुद को पारदर्शी बनाने की पहल करे। राजनीतिक दलों पर कानून लागू हो कि वे जो वायदे करते हैं, उनके क्रियान्वयन पर छमाही या सालाना श्वेत-पत्र जारी करें। इसके उल्लंघन या गलतबयानी पर दंडात्मक कार्रवाई के प्रावधान किए जाएं। पर क्या ऐसा हो सकेगा? बंगाल लौटते हैं। यहां तृणमूल ने नारा दिया है- ‘खेला हौबे’यानी खेल होगा। भाजपा भी बिना देर किए इसे ले उड़ी। अब कांग्रेस और वाम के कार्यकर्ता भी इसे दोहरा रहे हैं। जिस तरह से मतदाता को भरमाने की प्रवृत्ति पांव पसार रही है, उससे आशंका उपजनी स्वाभाविक है कि कहीं हमारे लोकतंत्र के साथ तो खेल नहीं होने जा रहा?

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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पारदर्शिता बढ़ाए ईपीएफओ (बिजनेस स्टैंडर्ड)

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के केंद्रीय बोर्ड ने गत सप्ताह यह अनुशंसा की कि चालू वित्त वर्ष के लिए 8.5 फीसदी की ब्याज दर बरकरार रखी जाए। इस ब्याज का भुगतान तभी किया जाएगा जब वित्त मंत्रालय इस अनुशंसा को स्वीकार कर लेगा। स्पष्ट है कि ईपीएफ के 5 करोड़ योगदानकर्ताओं को उनके अंशदान पर मिलने वाला प्रतिफल किसी भी अन्य तयशुदा आय योजना की तुलना में अधिक है। उदाहरण के लिए भारतीय स्टेट बैंक 1-2 वर्ष की सावधि जमा योजनाओं पर 5 फीसदी ब्याज दे रहा है। 10 वर्ष के सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दर 6.2 फीसदी है और 2020 में तो यह और भी कम थी। इसके अलावा ईपीएफ के ब्याज से होने वाली आय कर मुक्त है। यह बात इसके प्रतिफल को और बेहतर बनाती है। परंतु शायद लंबे समय में यह स्थायित्व भरा न हो।


चालू वर्ष में ईपीएफओ से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा शेयर कीमतों में तेजी की वजह से आया है। शुरुआत में ईपीएफ की धनराशि को शेयर बाजार में लगाने को लेकर अनिच्छा देखने को मिली थी। बहरहाल अब यह केवल इस वजह से उच्च प्रतिफल दे पा रहा है क्योंकि शेयर बाजार में तेजी है। लंबी अवधि के फंड को शेयर बाजार में निवेश करना समझ में आता है क्योंकि शेयर आमतौर पर अन्य परिसंपत्तियों, खासकर तयशुदा आय वाली योजनाओं की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि शेयर हर वर्ष अन्य परिसंपत्तियों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं। ऐसा भी वक्त आता है जब शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव आता है और उसका प्रतिफल कम रहता है। समग्र प्रतिफल भी इस बात पर निर्भर करता है कि कैसे शेयरों का चयन किया गया। गत वर्ष ऐसी खबरें आई थीं कि ईपीएफओ को शेयर बाजार में नुकसान उठाना पड़ा। ऐसा आंशिक तौर पर इसलिए हुआ था क्योंकि सरकार समर्थित एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स में काफी अधिक निवेश किया गया था। देश के सरकारी उपक्रमों को मूल्यवद्र्घन के लिए नहीं जाना जाता। ऐसे में सरकार की विनिवेश योजना का समर्थन करने के बजाय इस सेवानिवृत्ति फंड प्रबंधक का लक्ष्य यह होना चाहिए कि सबस्क्राइबर को अधिकतम जोखिम रहित प्रतिफल दिलाया जा सके।


व्यापक स्तर पर जहां सेवानिवृत्ति संस्थान ने चालू वर्ष के लिए 8.5 फीसदी की उच्च ब्याज दर की अनुशंसा की है, वहीं उसे भविष्य में भी अपने सबस्क्राइबर की अपेक्षाओं का ध्यान रखना होगा क्योंकि आगे चलकर प्रतिफल व्यापक आर्थिक हकीकतों से प्रभावित हो सकता है। अतीत में वित्त मंत्रालय ने यह सुझाव भी दिया है कि दरों को बाजार के अनुरूप किया जाए। तयशुदा आय वाली योजनाओं के संदर्भ में देखें तो यह जानना जरूरी है कि देश की अर्थव्यवस्था में बुनियादी बदलाव आ रहा है। मुद्रास्फीति को लक्षित करने का लचीला तरीका अपनाने के बाद औसत मुद्रास्फीति दर और कीमतों में अस्थिरता दोनों में कमी आई है। परिणामस्वरूप संभव है कि नॉमिनल ब्याज दर 8.5 फीसदी से काफी कम रहे। हालांकि उच्च राजकोषीय घाटे के कारण निकट भविष्य में ब्याज दरें ऊपर जा सकती हैं।


सेवानिवृत्ति फंड प्रबंधक लंबी अवधि में प्रतिफल बढ़ाने के लिए शेयर आवंटन बढ़ाने का निर्णय ले सकता है। बहरहाल, प्रतिफल को बाजार से जोडऩे के लिए ईपीएफओ को पारदर्शिता बढ़ानी होगी। उसे नियमित अंतराल पर अपने निवेश और प्रदर्शन की जानकारी सबस्क्राइबर को देनी चाहिए। यदि सूचनाएं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होंगी तो उनका विश्लेषण और उन पर बहस हो सकेगी। इससे फंड प्रबंधक को भी बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलेगी। सालाना ईपीएफ प्रतिफल लंबे समय तक बाजार से दूर नहीं रह सकते। पारदर्शिता और खुलासे के बेहतर मानक इस बदलाव को आसान बनाएंगे।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Friday, March 5, 2021

नौकरी नहीं, तो आरक्षण ही सही (हिन्दुस्तान)

आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार  

हरियाणा सरकार के एक फैसले से हंगामा खड़ा हो गया है। फैसला है रोजगार में आरक्षण का। रोजगार भी सरकारी नहीं, प्राइवेट और आरक्षण भी किसी जाति, धर्म या आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि राज्य में रहने वालों को। राज्य सरकार ने यह फैसला अपने लोगों की भलाई या उन्हें खुश करने के लिए लिया है। लोग खुश हुए या नहीं, इसका पता तो चुनाव में लगेगा और उनकी कितनी भलाई हुई, इसका पता लगने में भी काफी वक्त लग सकता है, लेकिन फिलहाल इस फैसले से हंगामा खड़ा हो गया है। खासकर हरियाणा में जिन कंपनियों की फैक्टरियां या दफ्तर हैं, उनमें गंभीर चिंता फैल गई है। हरियाणा में प्राइवेट कारोबार में भी 50 हजार रुपये महीने से कम तनख्वाह वाली नौकरियों में 75 प्रतिशत पर सिर्फ हरियाणा के लोग रखे जा सकेंगे। विधानसभा में तो यह विधेयक पहले पारित हो चुका था, 28 फरवरी को राज्यपाल ने भी दस्तखत किए हैं। हरियाणा के उप-मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी ने घोषणापत्र में वादा किया था कि उनकी सरकार बनी, तो 75 फीसदी नौकरियां हरियाणा के लोगों के लिए आरक्षित करवाएगी। उद्योग और विकास के पैमाने पर हरियाणा देश के सबसे उन्नत राज्यों में रहा है, लेकिन इस वक्त बेरोजगारी बहुत बड़ी फिक्र है। सीएमआईई के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जहां पूरे देश में बेरोजगारी दर फरवरी महीने में 6.5 प्रतिशत थी, वहीं हरियाणा में 26.4 प्रतिशत पर थी। यानी देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी हरियाणा में है। जाहिर है, राज्य सरकार परेशान है। लेकिन आरक्षण की यह कोशिश नुकसान पहुंचा सकती है। देश के दोनों प्रमुख उद्योग संगठनों फिक्की और सीआईआई ने इस पर चिंता जताई है। सीआईआई ने आग्रह किया है कि पुनर्विचार किया जाए, जबकि फिक्की ने कहा है कि यह फैसला प्रदेश में औद्योगिक विकास के लिए तबाही जैसा है। 

देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुजुकी और बीपीओ कंपनी जेनपैक्ट के अलावा सॉफ्टवेयर व टेक्नोलॉजी में देश-दुनिया की दिग्गज कंपनियों ने गुड़गांव में दफ्तर खोल रखे हैं। इनमें माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, टीसीएस और इन्फोसिस जैसे नाम शामिल हैं। यह नया कानून इन कंपनियों के लिए सबसे बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है। बीपीओ या बीपीएम (बिजनेस प्रॉसेस मैनेजमेंट) कारोबार एक तरह से गुड़गांव की जान है। गुड़गांव को दुनिया की बीपीएम राजधानी भी कहा जाता है। दुनिया में इस काम में लगे लोगों का पांच प्रतिशत हिस्सा गुड़गांव में है। बीपीओ व आईटी कंपनियों के अलावा गुड़गांव और मानेसर के इलाके बडे़ औद्योगिक क्षेत्र हैं। देश की 50 प्रतिशत कारें, 60 प्रतिशत मोटरसाइकिलें और 11 प्रतिशत ट्रैक्टर यहीं पर बनते हैं। इन इलाकों में औद्योगिक विकास के साथ ही यूनियन और मैनेजमेंट के विवाद का भी लंबा इतिहास है। 2012 में मारुति के प्लांट में झगड़ा इतना विकराल हो गया था कि आंदोलनकारियों ने कंपनी के एक बड़े अफसर को जलाकर मार डाला था। उसके बाद से ही कंपनी ने अपने नए कारखाने दूसरी जगहों पर लगाने का काम तेज कर दिया। दूसरी कंपनियां भी इस क्षेत्र में निवेश करने से पहले काफी सोच-विचार करने लगी हैं। बेरोजगारी का आंकड़ा साफ दिखा रहा है कि हरियाणा में रोजगार की कितनी जरूरत है। सरकारी नौकरियां कम होती जा रही हैं। ऐसे में, चुनाव जीतने के लिए यह नारा बुरा नहीं है कि हम प्राइवेट नौकरियों में भी आरक्षण दिलवा देंगे और कंपनियों की तसल्ली के बारे में भी सोचा गया होगा। इसीलिए शर्त है कि महीने में 50 हजार रुपये से कम तनख्वाह वाली नौकरियों में ही आरक्षण देना होगा। एक छूट यह भी दी गई है कि योग्य उम्मीदवार न मिलें, तो बाहर के लोगों को रखा जा सकता है, लेकिन ऐसी हर नियुक्ति के लिए सरकार से मंजूरी लेनी होगी। यानी काम में रोड़ा अटकाने का एक और इंतजाम। कारोबारी इसे इंस्पेक्टर राज की वापसी का सुबूत मान रहे हैं। 

बीपीओ का तो करीब 80 प्रतिशत स्टाफ इस आरक्षण के दायरे में आ जाएगा। सॉफ्टवेयर कारोबार के जानकारों से बातचीत में पता चलता है कि ऐसी कंपनियों में 70 प्रतिशत से कुछ ही कम स्टाफ पांच साल से कम अनुभव वाला होता है और इनमें से करीब आधे 50 हजार रुपये से कम तनख्वाह पर काम करते हैं। राहत की बात यह है कि आरक्षण का नियम सिर्फ नई भर्ती के लिए है। कंपनी के मौजूदा स्टाफ पर इसका असर नहीं पड़ना है, लेकिन ये कंपनियां देश भर में साल में लाख-डेढ़ लाख नए लोगों को नौकरियां देती हैं। डर है, अब वे अपना कारोबार गुड़गांव या हरियाणा के बजाय देश के दूसरे हिस्सों में ले जाने की सोचने लगेंगी। कोरोना काल में जब पूरे-पूरे दफ्तर बंद करके वर्क फ्रॉम होम का अनुभव हो चुका है, तब कंपनियों में यह हौसला भी बढ़ चुका है कि वे आसानी से यहां से वहां जा सकती हैं। 

लेकिन क्या यह समस्या का हल है? याद कीजिए, वर्ष 2019 में मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एलान किया था कि वह ऐसा कानून लाएंगे, जिससे निजी कंपनियों को 70 प्रतिशत नौकरियां राज्य के नौजवानों के लिए आरक्षित करनी होंगी। इसके साल भर बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एलान किया कि प्रदेश की सारी सरकारी नौकरियां स्थानीय लोगों के लिए ही रखने, यानी 100 प्रतिशत आरक्षण का कानून बनाएंगे। इसी किस्म के एलान 1995 में गुजरात और 2016 में कर्नाटक की सरकारें कर चुकी हैं, लेकिन इनमें से कोई भी अमल में नहीं आ सका है। भारत का संविधान राज्य सरकारों को यह अधिकार नहीं देता कि वे इस तरह के आरक्षण लागू करें, जिससे बराबरी के अधिकार का उल्लंघन होता हो। सर्वोच्च न्यायालय भी कई मामलों में यह साफ कर चुका है कि राज्य सरकारें इस तरह भेदभाव करने वाले नियम-कायदे नहीं बना सकतीं। लेकिन कानूनी प्रावधानों में कुछ गुंजाइश भी है और संसद ने जब रोजगार में इस तरह के भेदभाव खत्म करने के लिए कानून पारित किया, तब कुछ राज्यों को रियायत भी दी गई। इसलिए यह आशंका बेबुनियाद नहीं कि दूसरी सरकारें भी ऐसे कानून बनाने की सोचेंगी। हालांकि, यह भी करीब-करीब तय है कि ऐसा कानून अदालत में टिक नहीं पाएगा। इससे बड़ी चिंता यह है कि देश में रोजगार का संकट कैसे खत्म किया जाए? जब तक उसका इलाज सामने नहीं आएगा, तब तक नीम हकीमों वाले ऐसे नुस्खों का सहारा राजनीतिक पार्टियां और सरकारें लेती रहेंगी। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Thursday, March 4, 2021

केवल स्वार्थ और दौलत की ओर युवाओं को न ले जाएं (हिन्दुस्तान)

तुलसी जयकुमार, प्रोफेसर, एस पी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ऐंड रिसर्च  


यह वर्ष का ऐसा समय है, जब देश भर के बिजनेस स्कूल छात्रों को दो साल के गहन प्रशिक्षण और संगठन के प्रबंधन के लिए तैयार करते हैं, खासकर आर्थिक फायदे के लिए। छात्र अपनी पसंद के प्रबंधन संस्थान का चयन करते हैं और तब पैसा उनमें से हर किसी के दिमाग में होता है। ऐसा करते हुए छात्र बीटल्स संगीत मंडली के एक गीत को चरितार्थ करते हैं। साल 1963 में बीटल्स का यह गीत आया था, जिसका शीर्षक था, यही तो मैं चाहता हूं, जिसके बोल के भावार्थ कुछ इस प्रकार हैं कि अभी मुझे दौलत दो, यही तो मैं चाहता हूं। प्रबंधन की पढ़ाई पैसे बनाने के इरादे से की जाती है। पढ़ने के बाद कुछ युवा खुद उद्यमी बन पैसे कमाने के बारे में सोचते हैं, तो दूसरे छात्रों को मोटे वेतन वाली कॉरपोरेट नौकरियों की उम्मीद होती है। साल-दर-साल यही होता आ रहा है। प्रबंधन संस्थान के संकाय सदस्य के रूप में मैं भी विशेषाधिकार प्राप्त युवाओं के दिमाग में ज्यादातर पैसे का ही वर्चस्व पाती हूं, जबकि समाज को प्रभावित करने वाले गंभीर मुद्दों को समझने की क्षमता उनमें कम ही लगती है। साक्षात्कार तब ऐसा मंच बन जाता है, जहां दिशा रवि मामले या अर्थव्यवस्था, समाज, राजनीति के मामले में पेश चुनौतियों पर युवाओं की राय एक मालूम पड़ती है। युवा अक्सर कहते हैं कि मेरी राजनीति में दिलचस्पी नहीं है और मैं उस पर गौर नहीं करता। ऐसा सतही स्पष्टीकरण आश्चर्य है। क्या भारत के विशेषाधिकार प्राप्त युवाओं को वास्तव में बड़े मुद्दों की भी परवाह नहीं है? यहां विशेषज्ञों के विचार अलग-अलग हैं। एक राय है, युवाओं को राजनीतिक, सामाजिक मामलों में अति-सक्रियता से बचना चाहिए। गैर-लाभकारी संगठनों  में काम करने से इनकार करना चाहिए। भौतिकवादी विचार रखने चाहिए। पैसे कमाना, कारोबार शुरू करना, भौतिक दुनिया में अच्छा करना ही उनका लक्ष्य होना चाहिए। एक राय यह भी है कि आंदोलन में भाग लेना देश को बेहतर स्थान बनाने का अक्षम तरीका है। युवाओं की एक पीढ़ी आज ‘योलो’ (यू वनली लाइव वंस : जिंदगी मिलेगी न दोबारा) में जीती है और ‘फोमो’ (फीयर ऑफ मिसिंग आउट : वंचित रह जाने के भय) से संचालित होती है। ऐसे में, किसी आंदोलन में भाग लेना इस पीढ़ी के युवाओं के दिमाग में आने वाली आखिरी चीजों में शुमार है।

यदि हम गौर करें, तो भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि के लोग ही बहुत हद तक आगे ले गए, जिन्होंने तमाम कठिनाइयों को स्वीकार करने की राह चुनी थी। एक धनी वकील के बेटे सुभाष चंद्र बोस ने 1920 में परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भी सिविल-सेवा करियर त्याग दिया था और 25 वर्ष की आयु से पहले ही राष्ट्रवादी गतिविधियों के लिए जेल में डाल दिए गए थे। भगत सिंह सिर्फ 23 के थे, जब उन्हें फांसी दी गई थी। गांधी का सत्याग्रह, जिसने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का आधार बनाया, आंशिक रूप से दक्षिण अफ्रीका में एक अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त वकील के रूप में भोगे गए भेदभाव का नतीजा था।

हालांकि, आज ‘एक्टिविज्म’ या आंदोलन में भाग लेने को एक गंदे शब्द के रूप में देखा जाने लगा है, जबकि भारत और दुनिया में ऐसे कई राजनीतिक-सामाजिक बदलाव हुए हैं, जो आंदोलन में युवाओं की सक्रियता का परिणाम हैं। अपने देश में भारतीय युवाओं की उच्च शिक्षा तक पहुंच वैसे ही कम है और जो युवा यहां तक पहुंच रहे हैं, उन्हें मात्र संकीर्ण स्वार्थ और धन की पूजा की ओर निर्देशित नहीं करना चाहिए। यह समय है, जब स्कूल, विश्वविद्यालय और प्रबंधन परिसरों में भारतीय युवाओं को बड़े मुद्दों को गंभीरता से देखने और तर्कपूर्ण तरीके से असंतोष व्यक्त करने के लिए शिक्षित किया जाए। यह एक ऐसे देश में महत्वपूर्ण है, जिसे अपनी आबादी की दृष्टि से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त है। देश में अच्छी गुणवत्ता वाली उच्च शिक्षा के लिए विशेषाधिकार व इससे जुडे़ अवसरों को कभी खत्म नहीं करना चाहिए। अपने तात्कालिक भौतिक फायदे के लिए यथास्थिति बनाए रखने पर जोर न रहे। निष्क्रिय उपभोक्ता, प्रबंधक या नेता बनने के बजाय युवाओं को एक बेहतर समाज निर्माण के लिए जिम्मेदार नागरिक व अच्छे बदलाव के प्रतिनिधि बनने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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