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इतने से ही खत्म नहीं होंगे निर्भया के भय

हरबंश दीक्षित, पूर्व मजिस्टे्रट, किशोर न्याय बोर्ड

निर्भया को तो न्याय मिल गया, पर निर्भया का भय अभी भी बरकरार है; दिसंबर 2012 में र्दंरदगी की शिकार निर्भया के कातिलों के सजा-ए-मौत पर मुहर लगने के बाद भी। वह भय केवल इस रूप में नही है कि इस मामले को लटकाने के लिए अब भी कानूनी दांव-पेच का इस्तेमाल किया जाएगा, बल्कि वह इसलिए भी है कि दुष्कर्म के दो तिहाई मामलों में आज भी सजा नहीं हो पाती, फैसला आने में दशकों लग जाते हैं, गवाही का प्रयास करने वाली निर्भया को मार दिया जाता है, सुबूत नष्ट करने के लिए उसे जला दिया जाता है, समाज भी अभी तक उसके प्रति संवेदनशील नहीं हो पाया है।

सरकारी प्रयासों के बावजूद बीते दशक में दुष्कर्म के मामलो में लगातार वृद्धि हुई है और अपराधियों को सजा मिलने की दर लगातार घट रही है। पिछले 17 वर्षों में दुष्कर्म के मामलों में दोगुनी वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, सन 2001 से 2017 के बीच औसतन 67 महिलाएं हर दिन इसका शिकार हुईं।

निर्भया मामले पर देश भर में उपजे आक्रोश के बाद फौजदारी कानून में व्यापक संशोधन किया गया। न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति के सुझावों के मुताबिक दुष्कर्म और महिलाओं के खिलाफ होने वाले दूसरे अपराधों के मामले में कठोर सजा की व्यवस्था की गई। कुछ मामलों में मृत्युदंड का भी प्रावधान किया गया। यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि अपराधियों को कानूनी खामियों का दुरुपयोग न करने दिया जाए। इसके लिए दंड-प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य विधि में संशोधन किया गया, पर अपराधियों को सजा मिलने की दर घटती रही है। सन 1973 में दुष्कर्म के 44.3 प्रतिशत अपराधियों को सजा मिल जाती थी, जबकि 2017 में यह घटकर 32 प्रतिशत पहुंच गई। सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि मेट्रोपॉलिटन शहरों में यह मात्र 27.2 प्रतिशत थी। इसके अलावा कानूनी प्रक्रिया में लगने वाला लंबा समय अब भी चिंता का सबब बना हुआ है। सन 2017 में अदालतों के सामने कुल 1,46,201 दुष्कर्म के मामले लंबित थे, जिनमें से केवल 18,099 मामलों का निपटारा किया जा सका। इस में से भी 5,822 मामलों में सजा हुई, जबकि 11,453 मामलों में दोष साबित नहीं हो सका। शेष 824 मामले ऐसे थे, जिन पर मुकदमा चलाए जाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे।

दुष्कर्म के मामलों में सजा के लिए यदि केवल 2017 को अलग करके देखा जाए, तो कानूनी प्रक्रिया में देरी का और भी चिंताजनक पहलू सामने आता है। सन 2017 में देश भर की अदालतों के सामने विचारण के मामलों में से केवल 1,010 यानी 3.5 प्रतिशत मामलों में सजा हुई। शेष या तो अदालतों के सामने लंबित रह गए या अभियुक्त छूट गए। दुष्कर्म के मामलों का विचारण जितना लंबा चलता है, उतनी ही पीड़िता की हिम्मत पस्त होती जाती है और सजा की संभावना कम होने लगती है। 2017 में अदालतों के सामने दुष्कर्म के 1,27,868 लंबित मामलों में से एक तिहाई ऐसे थे, जो तीन वर्ष से ज्यादा के समय से चल रहे थे। जबकि 12,216 मामले पांच वर्षों से अधिक तथा 1,840 मुकदमे 10 वर्षों से अधिक समय से लंबित थे। दुष्कर्म से जुड़े मामलों का कानूनी और सामाजिक ताना-बाना बहुत जटिल होता है। अभियुक्तों की ओर से पीड़िता पर मुकदमा वापस लेने से लेकर गवाही न देने तक सभी कोशिशें की जाती हैं। यदि किसी ने लड़ने की हिम्मत दिखाई, तो कानून की जटिलता उसकी रही-सही कसर पूरी कर देती है। समाज का व्यवहार भी पीड़िता के प्रति अच्छा नहीं होता। पुलिस और अदालतों के कर्मचारियों की सोच और व्यवहार भी शेष समाज से अलग नहीं होता।

महिलाओं के खिलाफ किए जाने वाले अपराधों के मामलों में हमारे कानूनी ढांचे में कोई कमी नहीं है। निर्भया मामले के बाद तो उसे और भी कठोर कर दिया गया है। मगर उसका अपेक्षित परिणाम नहीं आ पा रहा है। दुष्कर्म के मामलों में आमतौर पर पीड़िता के सिवाय कोई दूसरा गवाह नहीं होता, इसलिए सुबूत इकट्ठा करने के लिए योग्य और दक्ष कर्मचारियों की जरूरत होती है, जिसकी आज भी भारी कमी है। मुलजिम अदालती प्रक्रिया की खामियों का भी दुरुपयोग करते हैं और पीड़िता को इतना थका देते हैं कि इन दुश्वारियों से लड़ने की उसकी हिम्मत जवाब देने लगती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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मूल अधिकार को विस्तार देता फैसला

पवन दुग्गल साइबर कानून विशेषज्ञ

सांविधानिक हैसियत बदलने के बाद जम्मू-कश्मीर में लगाई गई पाबंदियों पर शुक्रवार को आया शीर्ष अदालत का फैसला दूरगामी महत्व रखता है। इसके निहितार्थ सिर्फ जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए हैं। यह पहला ऐसा फैसला है, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर इंटरनेट की भूमिका को पहचाना है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व किसी भी व्यवसाय के संचालन के लिए इंटरनेट के इस्तेमाल को मौलिक अधिकार का रूप दिया है। बेशक पूर्व में ऐसी बातें         कही जाती रही हैं और संदर्भ के तौर पर यह जिक्र भी
किया जाता रहा है, लेकिन आज से पहले ये बातें इतनी स्पष्ट रूप में हमारे सामने नहीं आई थीं, जबकि ये सभी को पता थीं। लिहाजा भारत की स्वतंत्रता के बाद लिखे जाने वाले इतिहास में शुक्रवार का फैसला सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।
यह फैसला मान्यता देता है कि इंटरनेट का न सिर्फ मोल और महत्व है, बल्कि यह मानव जीवन का            केंद्र-बिंदु भी है। जैसे ही इंटरनेट के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाती है, लोगों के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी हमें संविधान के अनुच्छेद 19 से हासिल है, जबकि जीवन जीने का मौलिक अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत। ऐसे में, आज इंटरनेट ही एकमात्र ऐसा जरिया है, जो किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह किसी भी ओहदे या स्थान पर हो, तुरंत एक अंतरराष्ट्रीय लेखक, प्रसारणकर्ता (ब्रॉडकास्टर) और हस्तांतरित करने वाला (ट्रांसमीटर) बना देता है, यानी विचारों की अभिव्यक्ति के लिए इंटरनेट से बेहतर कोई दूसरा माध्यम आज हमारे पास नहीं है।
अब जबकि अदालत ने इंटरनेट को नई मान्यता दी है, तो कई सारी गुत्थियां सुलझ सकेंगी। हालांकि इसका यह मतलब भी नहीं है कि इंटरनेट के इस्तेमाल को लेकर हमें अबाध आजादी हासिल हो गई है। अब भी इसके इस्तेमाल पर मुनासिब प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसा संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत किया जा सकता है। जब भारत की संप्रभुता, अखंडता या सुरक्षा पर कोई आंच आए, पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बिगड़ने की आशंका हो (सीमावर्ती इलाकों के लिए), व्यवस्था कायम करना हो, और सामाजिक मर्यादा व नैतिकता की रक्षा करनी हो, तो इंटरनेट का इस्तेमाल प्रतिबंधित किया जा सकता है। हां, अब तक चूंकि कानून और व्यवस्था के बिगड़ने के अंदेशे मात्र से सरकार इंटरनेट के इस्तेमाल पर रोक लगा देती थी, अब उसे इसकी वाजिब वजह बतानी होगी।
ताजा अदालती फैसले के बाद सरकार की जवाबदेही ज्यादा बढ़ गई है। इससे पारदर्शिता का भी इजाफा होगा। इंटरनेट के इस्तेमाल पर वह अब मनमर्जी रोक नहीं लगा पाएगी। अगर वह ऐसा करती है, तो उसके फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी। अब चूंकि आला अदालत ने इंटरनेट के प्रतिबंध को लेकर स्थिति स्पष्ट कर दी है, तो इससे जुड़े हाईकोर्ट में जो तमाम मामले लंबित थे, उन पर जल्दी ही फैसला आने की उम्मीद भी बढ़ गई है।
इंटरनेट आज कितना कारगर माध्यम है, यह हमने ‘अरब स्प्रिंग’ में देखा था। पिछले दशक के आखिरी वर्षों और नए दशक की शुरुआत में हुई इस क्रांति में हमने देखा कि किस तरह मिस्र में स्थानीय सरकार ने इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसका सीधा असर यह दिखा कि वहां की सरकार का तख्ता पलट हुआ और क्रांति आ गई। साफ है, अब अपने यहां भी सरकार कहीं न कहीं सावधान हो गई होगी। उसे अब इंटरनेट पर रोक लगाने संबंधी अपने किसी भी फैसले पर न सिर्फ काफी विचार करना पड़ेगा, बल्कि उसका कारण भी जनता से साझा करना होगा। एक सप्ताह के भीतर अपने फैसले की समीक्षा भी करनी होगी। इसका अर्थ है कि अब सरकारों को सामंजस्य बनाकर चलना होगा।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में भारतीयों को मिली आजादी और अधिकारों के इस्तेमाल को न्याय के तराजू में एक तरफ और सुरक्षा को दूसरी तरफ रखा है। अदालत ने माना है कि दोनों में मौलिक विरोधाभास हैं। लिहाजा यह अब सरकार की जवाबदेही है कि वह दोनों में संतुलन बनाकर चले। यानी, उसे लोगों के अधिकार और उनकी आजादी को भी बरकरार रखना होगा और राष्ट्र की संप्रभुता व सुरक्षा भी अक्षुण्ण रखनी होगी।
इस फैसले ने एक बार फिर साबित किया है कि इंटरनेट के वैश्विक प्रभाव को कतई नजरंदाज नहीं किया जा सकता। किसी इलाके में गड़बड़ी या इसकी आशंका होने या बिगड़ती कानून-व्यवस्था के आधार पर सरकार इंटरनेट के इस्तेमाल पर रोक लगा देती थी। आतंकी घटना की सूरत में भी यदि आतंकियों को इंटरनेट से फायदा मिलने की आशंका हो, तो इस पर प्रतिबंध लगा दिया जाता था। सीमावर्ती इलाकों में तो दुश्मन देशों के दुष्प्रचार को रोकने के लिए वक्त-बेवक्त यह किया ही जाता है। मगर अब बिना किसी ठोस वजह के महज एहतियातन इंटरनेट पर रोक लगाना उचित नहीं होगा। वैसे भी, यह कोई कारगर उपाय नहीं है। कुछ देर के लिए बेशक लोग इसे बर्दाश्त कर लें, लेकिन लंबे कालखंड के लिए ऐसा करना मुफीद नहीं।
साफ है, सरकार को फूंक-फूंककर यह हथियार इस्तेमाल करना होगा। उसे समझना होगा कि इसका वह जितना ज्यादा इस्तेमाल करेगी, लोगों का आक्रोश उतना ज्यादा बढ़ेगा। आज इंटरनेट का इतना विस्तार हो गया कि महज एक घंटे की रोक से लोगों के करोड़ों रुपये स्वाहा होते हैं। इंटरनेट का यह आर्थिक पक्ष संभवत: दूसरे तमाम तर्कों पर भारी साबित हुआ है। इसलिए इंटरनेट को बाधित करने की बजाय उसका संभलकर इस्तेमाल करने को लेकर सरकार लोगों को जागरूक करे। शुक्रवार का अदालती फैसला इसकी ओर भी इशारा करता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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क्या कहता है जेएनयू पर हुआ हमला

रोशन किशोर, राजनीतिक-आर्थिक संपादक  हिन्दुस्तान टाइम्स

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रविवार को हुई हिंसा लोकतांत्रिक समाज पर एक धब्बा है। कई घंटों तक बाहर से आए गुंडों ने जेएनयू कैंपस में काफी दंगा किया, छात्र-छात्राओं, शिक्षक-शिक्षिकाओं की पिटाई की। जब हिंसा चल रही थी, तब विश्वविद्यालय के मुख्य गेट पर भीड़ जुट गई थी। यह भीड़ छात्रों के खिलाफ हिंसा भड़का रही थी, यहां तक कि पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी घेर रही थी और पिटाई कर रही थी। यह सब तब हो रहा था, जब वहां पुलिस मौजूद थी। रविवार के हमले से जेएनयू के संघर्ष के अलग ही स्तर पर चले जाने का खतरा पैदा हो गया है। यह सिलसिला तीन साल पहले शुरू हुआ था, जब पुलिस ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार और दो अन्य को देशद्र्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया था। उस मामले में अभी तक आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया है, लेकिन तभी से जेएनयू को निरंतर उपेक्षा, धमकी और हिंसा का सामना करना पड़ा है। जेएनयू में हमला कोई पहला नहीं है। तथाकथित राष्ट्रवादियों ने जेएनयू को देश-विरोध के एक केंद्र के रूप में चित्रित करने की कोशिश की है। जेएनयू प्रशासन कैंपस के अंदर सभी लोकतांत्रिक मंचों को कमजोर करते हुए छात्रों व शिक्षकों को निशाना बनाता रहा है।

जेएनयू को निशाना बनाने की शृंखला में ही एक कोशिश फीस वृद्धि की घोषणा थी, जिसके कारण परिसर के अंदर और बाहर, दोनों जगह बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे। मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एचआरडी) को जेएनयू छात्र संघ से बात करने के लिए समिति का गठन करना पड़ा। जेएनयू के कुलपति बहुत लंबे समय से छात्रों से बात नहीं कर रहे हैं। रविवार की घटना पर जेएनयू प्रशासन द्वारा जारी बयान में शुल्क वृद्धि विरोधी प्रदर्शनकारियों को ही हिंसा के लिए खलनायक बताने का प्रयास हुआ है। हालांकि अधिकांश छात्र और शिक्षक ऐसा नहीं मानते। शुल्क वृद्धि के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान जेएनयू के विरोधियों ने यह कहकर आंदोलन को खारिज किया है कि जेएनयू छात्र सरकारी खैरात के आदी हैं, जबकि उनमें से ज्यादातर छात्र ऊंचे शुल्क का भुगतान कर सकते हैं।

हिंसा और धमकी के साथ विश्वविद्यालय का शायद ही कोई संबंध हो सकता है? एक ही संस्थान में अलग-अलग शुल्क लगाना या उन लोगों पर शुल्क लगाना, जो भुगतान कर सकते हैं, ठीक नहीं है। इसका विरोध करना चाहिए। दूसरे तमाम निवेशों की तरह ही उच्च शिक्षा में निवेश करते समय भी छात्र व उनके परिवार लागत-लाभ की विवेचना करते हैं। जहां शुल्क और अन्य संबंधित खर्च- लागत स्पष्ट है, वहीं एक कुलीन विश्वविद्यालय में अध्ययन के फायदे बहुत हद तक विषम होते हैं। बिहार के एक मध्यवर्गीय परिवार को नहीं पता होगा कि जेएनयू में प्रवेश एक ‘आईवी लीग’ पीएचडी के लिए एक लॉन्चपैड भी हो सकता है। उन्हें नहीं पता होगा कि अनुसंधान और बहस के माहौल में वर्षों रहने के बाद एक अच्छा पत्रकार भी बना जा सकता है। आर्थिक और सांस्कृतिक अभिजात वर्ग और उनके बच्चे यह सब जानते हैं और जाहिर है, वे इन लाभों को उठाने में गैर-अभिजात वर्ग की तुलना में बेहतर स्थिति में होते हैं। गैर-अभिजात वर्ग के पास सूचनाओं की कमी होती है और वे हमेशा सुरक्षा की तलाश में रहते हैं। इस वर्ग के लिए शिक्षा का क्षेत्र फायदेमंद विकल्प नजर आता है।

गैर-अभिजात वर्ग के अभिभावक आम तौर पर चाहते हैं कि उनके बच्चे एमए या पीएचडी की बजाय स्कूल शिक्षक, या बैंक अधिकारी बन जाएं। कुलीन संस्थानों में फीस यदि काफी अधिक हो जाए, तो गैर-अभिजात वर्ग इन संस्थानों को तरजीह नहीं देगा। कम धन वाले विकल्पों के लिए समझौता करने की प्रवृत्ति कई गुना बढ़ जाएगी। यही सबसे बड़ा कारण है कि कुलीन विश्वविद्यालयों में अलग-अलग शुल्क संरचना का विरोध किया जाना चाहिए। कम शुल्क वाला संसाधन संपन्न सार्वजनिक विश्वविद्यालय भी जरूरी है। ऐसे संस्थान गैर-अभिजात वर्ग के छात्रों को बहुत विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि से आए छात्रों के साथ रहने और प्रतिस्पद्र्धा करने का मौका देते हैं। इस प्रक्रिया में दोनों तरह के छात्र एक-दूसरे से सीखते हैं। गैर-अभिजात वर्ग नए अवसरों के बारे में जानता है और नए ज्ञान की बाधाओं को तोड़ता है। अभिजात वर्ग के छात्र भी सामान्य वर्गों से आए सहपाठियों के पिछड़ेपन, भेदभाव और अभाव के अनुभवों से सीखते हैं। शिक्षक भी सीखते हैं। शिक्षकों के सामने एक ही क्लास में कुछ सबसे कुलीन परिवारों के युवा होते हैं, तो कुछ विकास की पहली पीढ़ी पर चढ़ रहे युवा। भारत जैसे समाज में अलग-अलग वर्गों से आए छात्र सबसे बड़ी चुनौती है।

जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे संस्थान देश के संभ्रांत स्थान हैं, लेकिन ये देश में सामाजिक अभिजात वर्ग की अगली पीढ़ी में समानता को बढ़ावा देने के सबसे बडे़ सूत्रधार भी हैं। लोकतंत्र में गहराई लाने और न्यायप्रियता को मजबूत बनाने के लिए ये आवश्यक हैं। अगर यह सब कुछ राजकोषीय बचत में से कुछ सौ करोड़ रुपये खर्च करके भी हासिल हो जाए, तो कतई बुरा नहीं है। यहां यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि जेएनयू में प्रस्तावित फीस वृद्धि कर दी जाए, तब भी इसका खर्च नहीं निकाला जा सकता। यदि इस विश्वविद्यालय का खर्च फीस से ही निकालना है, तो फीस की मात्रा लाखों रुपये में चली जाएगी।

जेएनयू छात्रों की हरेक बात और मांग से हमेशा सहमत नहीं होना चाहिए, लेकिन अगर वे लोकतांत्रिक और अहिंसक ढंग से अपनी मांग रखते हैं, तो उन्हें अपनी बातें कहने का पूरा अधिकार होना चाहिए। रविवार को जेएनयू छात्रों के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया है, वह इस बात का प्रमाण है कि हम एक ऐसे युग में रह रहे हैं, जहां शिक्षण संस्थानों में वैचारिक मतभेदों को पाशविक बल से कुचल दिया जाएगा। एक ऐसा समाज, जिसके विश्वविद्यालयों के खिलाफ हिंसा होती है, केवल अपने भविष्य के विनाश के लिए तैयार होता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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आंदोलनों की आहटें और अर्थ

शशि शेखर

सबसे पहले तो देश के उन हजारों नवयुवकों और नवयुवतियों को बधाई, जिन्होंने सड़कों पर उतरकर साबित कर दिया है कि भारत जिंदा मुल्क है। यहां सहमति और असहमति के बीच वह द्वंद्व कायम है, जो लोकतंत्र के स्वस्थ होने की पहली निशानी है। ये सहमतियां और असहमतियां साथ चलें, तो कोई बुराई नहीं, पर अगर वे विग्रह के अनंत मकड़जाल में फंस जाएं, तो अनर्थ हो सकता है।

मौजूदा छात्र आंदोलन, असहमति और आक्रोश का सम्मान करते हुए भी मैं आग्रह करना चाहूंगा कि वे किसी भी तरह से अपने भविष्य को चौपट न होने दें। जरा सोचें, अगर हमारे गुस्साए नौजवान कक्षाओं में नहीं शामिल होंगे, इम्तिहान नहीं होने देंगे, तो यकीनन वे अपने साथ-साथ देश के भविष्य से भी इंसाफ नहीं कर रहे होंगे। यहां आती हुई इस जोशीली पीढ़ी को अतीत की कुछ अनहोनियों से रू-ब-रू कराना जरूरी है।

बात 1967 की है। राम मनोहर लोहिया का ‘अंग्रेजी हटाओ’ का नारा अपने पूरे उबाल पर था। वे भारतीय गणराज्य के भावुक दिन थे। आजादी मिले कुल जमा बीस बरस हुए थे और हमारे देश के नौजवान कभी सोवियत संघ, कभी जर्मनी, कभी फ्रांस, तो कभी अमेरिका से प्रभावित होते थे। उन दिनों यह जुमला आम था कि हमें अंग्रेजों के बाद उनकी भाषा की गुलामी करने की कोई जरूरत नहीं। अंग्रेजी के बिना यूरोप के तमाम देश तरक्की की सीढ़ियां चढ़ सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? उनके इस आह्वान पर हिंदी पट्टी के हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए थे। मुझे याद है, इलाहाबाद में सिविल लाइन्स की दुकानों पर अंग्रेजी के जो बोर्ड लगे थे, उन्हें रातोंरात पोत दिया गया। घरों के बाहर लगी नाम पट्टिकाएं काली कर दी गईं। जिन गृहस्वामियोंके नाम पत्थर पर खुदे हुए थे, उन पत्थरों को तोड़ने के प्रयास में घरों के दरवाजे अथवा मुख्य द्वार क्षतिग्रस्त कर दिए गए।

हमारी पीढ़ी के लोग उस समय प्राइमरी कक्षाओं में थे। खरामा-खरामा बोध ग्रहण करने की उस नाजुक अवस्था में हमने पाया कि हमारे अभिभावक भी उसी रंग में सराबोर हैं। नतीजतन, हमारी पीढ़ी के लोगों को आगे चलकर अपने ही देश में अंग्रेजी के अल्पज्ञान का नुकसान उठाना पड़ा। कमाल यह कि ‘गैर कांग्रेसवाद’ के नारे के जरिए पहली बार सात प्रदेशों से कांग्रेस की हुकूमत उखाड़ फेंकने वाले लोहिया और उनके सहयोगी तमिलनाडु का छात्र आंदोलन भूल गए थे। क्यों?

महज दो साल पहले 1965 में तमिलनाडु में ‘ऑफिशियल लैंग्वेज ऐक्ट-1963’ लागू किया गया था, जिसके तहत हिंदी पढ़ना अनिवार्य था। इसके विरोध में छात्र सड़कों पर उतर आए थे। देखते-देखते आंदोलन इतना उग्र हो गया कि कई छात्रों ने अपनी जान दे दी। तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के इस आश्वासन के बाद कि पंडित नेहरू ने हिंदी भाषा न थोपने का जो वादा किया था, उस पर सरकार पूरी तरह कायम है, वह आंदोलन खत्म हुआ था। इसके परिणामस्वरूप 1967 के चुनाव में कांग्रेस का राज्य से सफाया हो गया और द्रमुक सत्ता में आ गई।

ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी का अभाव महज हिंदीभाषियों को सता रहा था। तब के सर्वाधिक हिंदीद्रोही प्रांत तमिलनाडु के के कामराज इसके सबसे बडे़ उदाहरण हैं। कांग्रेस में उनका दर्जा ‘किंग मेकर’ का था। लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी उनकी मदद के बिना शीर्ष तक नहीं पहुंच सकते थे। ‘कामराज प्लान’ ने तमाम मंत्रियों की कुरसी छीन ली थी। उन्हें जब खुद सत्ता सम्हालने की सलाह दी गई, तो उनका जवाब था- ‘मुझे न अंग्रेजी आती है, न हिंदी, मैं कैसे प्रधानमंत्री बन सकता हूं?’ यह बात अलग है कि जिस ‘त्रिभाषा फॉर्मूले’ का दक्षिण में विरोध हुआ, उत्तर के तमाम राज्यों ने इसे बिना ना-नुकुर स्वीकार कर लिया। खुद मैंने इसी फॉर्मूले की मदद से तीन वर्ष बांग्ला पढ़ी। इसे मैं अपने जीवन की उपलब्धि मानता हूं।

फिर छात्र आंदोलन पर लौटता हूं। ‘अंग्रेजी हटाओ’ के हो-हंगामे को दस साल भी नहीं बीते थे कि जयप्रकाश नारायण सामने आ गए। उनके नेतृत्व की वजह से गुजरात और बिहार में फीस वृद्धि को लेकर हुए आंदोलनों ने नई शक्ल अख्तियार कर ली। उस समय यह नारा घर-घर में गूंज रहा था- ‘संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है’। आज के तमाम नेता उसी दौर में राजनीति में उतरे। क्या इनमें से एक ने भी जेपी के सपनों के साथ न्याय किया?

असम में भी इसी दशक में नया छात्र आंदोलन छिड़ा। असमी भाषा और अस्मिता को लेकर छिड़े इस आंदोलन ने वहां के सत्ता-सदन की चूलें हिला दी थीं। इसी का कमाल था कि अगले विधानसभा चुनाव में विद्यार्थियों की अगुवाई में बनी असम गण परिषद ने बहुमत अर्जित किया और सत्ता में आ गई। प्रफुल्ल कुमार महंत पहले ऐसे शख्स थे, जो छात्रावास से सीधे मुख्यमंत्री आवास पहुंचे थे। सत्ता में पहुंचकर उन्हें एहसास हुआ कि उनकी लड़ाई के मुद्दे महज भावना का उछाल थे। विधान और व्यवस्था की नजर में उनका कोई मोल नहीं। एक समीक्षक ने उनकी विवशता देख लिखा था, सरकारें हर मुद्दे पर अगर हमेशा सही नहीं होतीं, तो हमेशा गलत भी नहीं होतीं। यह सियासी जुमला हकीकत के कितना करीब था!

चाहूं तो ऐसे अनेक उदाहरण दे सकता हूं, पर आज की उबलती नौजवान पीढ़ी से सिर्फ इतनी गुजारिश है कि वे इस सत्य और तथ्य को कभी न बिसराएं कि राजनीति अंतत: सत्ता के लिए की जाती है और सत्ता मनुष्य के विचारों पर ग्रहण लगा देती है। यूरोपीय कहावत है- ‘पावर करप्ट्स’। यह जरूरी नहीं है कि सिर्फ अवैध तरीके से धन कमाने वालों को ही भ्रष्टाचारी कहा जाए। ऐसे लोग, जो अपने सिद्धांतों-विचारों से समझौता करते हैं, ज्यादा खतरनाक होते हैं। 21वीं शती के इस प्रतिस्पद्र्धी विश्व में हमारे नौजवानों को अपने संघर्ष और मकसद के बीच तारतम्य बैठाना होगा।

यहां सरकार से भी एक अपील। सिर्फ बल प्रयोग करके नौजवानों की भावनाओं को नहीं दबाया जा सकता। उनके साथ सहमति का रास्ता निकालना न केवल हुकूमत का दायित्व है, बल्कि समय की सबसे बड़ी मांग यही है। अच्छा होगा, इस आग को और फैलने से पहले रोक लिया जाए।
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शिक्षा में बच्चों के मनोभावों की अनदेखी कतई न हो (हिन्दुस्तान)

विशेष गुप्ता, अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग
स्कूली शिक्षा के भारी पाठ्यक्रम के चलते बच्चों के सहज मनोभाव गायब होने लगे हैं। आज की शिक्षा-व्यवस्था को बच्चों की चिंता भले हो, लेकिन पाठ्यक्रम से जुड़ी उनकी भावनाएं शिक्षा-व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं। आज कक्षा, पाठ्यक्रम, होमवर्क, परीक्षा और उसका तनाव है, साथ ही, मां-बाप की अपेक्षाएं भी हैं, लेकिन क्या कभी सोचा है कि यह संपूर्ण शिक्षा का ढांचा जिनके लिए बना है, उनके मनोभावों की उसमें क्या जगह है?

यही वजह है कि आज शिक्षा में बच्चे की अपनी सोच दब जा रही है और केवल तोता रटंत शिक्षा विकसित हो रही है। इसका परिणाम यह है कि बच्चों के व्यक्तित्व में अनेक विसंगतियां दिखने लगी हैं। आज चहुंमुखी वैश्विक प्रतिस्पद्र्धा का दौर है। बच्चों के पाठ्यक्रम में उनके मनोभावों के अनुरूप बदलाव करने की जरूरत है। बच्चों की चिंता, निराशा, विरोध, तनाव और शैक्षिक उदासीनता जैसे ज्वलंत विषयों पर गौर करना चाहिए।

ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय में 1998 से लेकर 2019 तक के शिक्षा व बाल मनोविज्ञान से जुड़े 160 शोध अध्ययनों के विश्लेषण के साथ-साथ 27 देशों के 42 हजार छात्रों पर एक शोध हुआ है। इस शोध के निष्कर्ष वहां के साइकोलॉजिकल बुलेटिन में प्रकाशित हुए हैं। जिन छात्रों ने अपने मनोभावों अर्थात मन में उपजती चिंता, तनाव व निराशा इत्यादि को समझकर और उनका प्रबंधन करते हुए तनावमुक्त पढ़ाई-लिखाई की है, वे बेहतर शैक्षिक परिणाम देने में कामयाब रहे हैं।

इसके उलट जिन छात्रों ने अपने शैक्षिक कार्य के दौरान अपनी भावनाओं को न तो काबू किया, न ही उनका प्रबंधन किया, वे छात्र अपने शैक्षिक प्रदर्शन में कमतर रह गए। शोध में स्पष्ट किया गया है कि शिक्षा में अकादमिक सफलता के लिए मनोभावी बुद्धि एक बहुत अहम लक्षण है। इसका अर्थ है कि काम का परिणाम देने के समय हमें चारों ओर से घेरने वाले अपने मनोभावों को काबू करना या उनका प्रबंधन करना आना चाहिए। जिन छात्रों का मनोभावों से जुड़ा बौद्धिक स्तर उच्च रहा, वे अपने अध्ययन में अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रहे। इतना ही नहीं, ऐसे छात्र अपने नकारात्मक मनोभावों को काबू करने में भी काफी हद तक कामयाब रहे।

आज अंग्रेजी शैक्षिक ढांचे के ग्लैमर में मां-बाप और बच्चे उलझ गए हैं। वे भूल गए हैं कि किताबी दुनिया से अलग बच्चों की भावनाओं की एक सतरंगी दुनिया भी होती है। भारतीय शिक्षा पद्धति से जुडे़ विद्या भारती के स्कूलों को छोड़ दें, तो आज का छात्र अनौपचारिक पढ़ाई के पांच चरणों- प्री नर्सरी, नर्सरी, केजी, एलकेजी, यूकेजी जैसे स्तरों से जूझ रहा है। देखा जाए, तो अनौपचाारिक शिक्षा का यह प्रतिमान पश्चिम से चलकर भारत आया है। सच यह है कि प्री-नर्सरी से यूकेजी तक की शिक्षा का यह प्रतिमान एक तरह से बच्चे को परिवार द्वारा दी जाने वाली शिक्षा का स्थानापन्न ही है।

परिवार में घटते बुजुर्ग और अभिभावकों की व्यस्तता ने बच्चों को अकेला कर दिया है। उनके मनोभावों को ठीक से समझा नहीं जा रहा है और इसका फायदा अंग्रेजी शिक्षा ने खूब उठाया है। चिंताजनक सच्चाई है कि आज एकल परिवारों में कोई बड़ा-बूढ़ा न होने से बच्चों को शुरुआती जिंदगी का ज्ञान नहीं मिल रहा है, इससे उन्हें समस्याएं होने लगी हैं। आज स्कूल फीस के रूप में भारी कीमत वसूलने के लिए तत्पर हैं, लेकिन भावनात्मक स्तर पर ये स्कूल असफल रहे हैं। प्री-स्कूल दंभ के साथ बच्चों को लोकाचार सिखाने के जो दावे करते हैं, वे सच नहीं हैं। इन शिक्षण संस्थानों के कारण भी सामाजिकता कमजोर पड़ रही है। आज भविष्य की वैश्विक जरूरतों और वर्तमान की प्रतिस्पद्र्धा को ध्यान में रखते हुए बाल मनोविज्ञान को समझना बहुत जरूरी है। आज वक्त की जरूरत है कि बच्चों को सामाजीकरण की प्रक्रिया में लाया जाए और यह काम मां-बाप व अभिभावक करें।

बच्चों से संवाद बनाकर उसे अपने वात्सल्य का आवरण प्रदान करें। आधुनिक डे-बोर्डिंग अथवा प्री-स्कूल हमारी कामकाजी जिंदगी में सुरक्षा कवच तो हो सकते हैं, मगर ये नैसर्गिक मां-बाप व घर के भावनात्मक माहौल की जगह नहीं ले सकते। आज अविभावकों के साथ-साथ बाल शिक्षा से जुडे़ मनोवैज्ञानिकों और नीति-निर्धारकों के सामने यह बड़ी चुनौती है। इस गंभीर मुद्दे पर अविलंब सोच बनाने की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सौजन्य - हिन्दुस्तान।
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हिंसा और लोकतंत्र (हिन्दुस्तान)

लोकतंत्र में मतभेद जताना या सरकार के किसी फैसले का विरोध करना जनता का मूल अधिकार माना जाता है। इसमें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि अलग नजरिया रखने वाले लोगों की संख्या कितनी है। दरअसल, यह सिर्फ लोकतंत्र की ही विशेषता है कि वह अल्प संख्या वालों को भी विरोध और प्रदर्शन के पूरे अधिकार देता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब ऐसे विरोध और प्रदर्शन के दौरान हिंसा की वारदात हो जाती है। लोकतंत्र में विरोध को व्यक्त करने के मंच और सामाजिक-राजनीतिक स्पेस देना सरकार की जिम्मेदारी होती है, लेकिन उसकी इतनी ही बड़ी जिम्मेदारी यह भी होती है कि वह समाज में किसी भी तरह की हिंसा न होने दे।

जब हिंसा हो जाती है, तो सरकार के सामने सबसे आसान विकल्प यही होता है कि वह उसे रोकने के लिए विरोध और आंदोलन के स्पेस को कम कर दे। यानी हिंसा करने वाले एक तरह से अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। इस समय देश भर में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जो आंदोलन चल रहे हैं, वे इसी खतरनाक राह को पकड़ते दिखाई दे रहे हैं। जहां कुछ लोगों ने आगे बढ़कर इस बात का ख्याल रखा कि शांति बनी रहे, वहां हिंसा नहीं भी हुई, लेकिन तनाव के माहौल में हिंसा की खबरें ही सुर्खियां बनती हैं और यही हो रहा है। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हो रहे आंदोलन से यह उम्मीद की जानी चाहिए थी कि वह समाज में एक विमर्श को शुरू करके वैकल्पिक सोच के दायरे को मजबूत बनाता, लेकिन यह विमर्श अब पुलिस पर पथराव और जवाबी कार्रवाई में लाठीचार्ज, आंसू गैस व गोलीबारी में सिमट गया है।

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा। हम ऐसा पहले भी कई आंदोलनों में देख चुके हैं। हाल-फिलहाल में गोरक्षा के नाम पर दिखी सक्रियता में भी यही भेड़चाल नजर आई थी। सबसे दुखद यह है कि यह सब ऐसे देश में हो रहा है, जिसे दुनिया भर में अहिंसक आंदोलन की सबसे मजबूत परंपरा शुरू करने के लिए जाना जाता है। ऐसा सिर्फ आजादी के आंदोलन में नहीं, उसके बाद भी कई बार हुआ है। कुछ साल पहले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ चले देशव्यापी आंदोलन में भी अहिंसक तेवर हर जगह दिखाई दिया था। इसी तरह, असम आंदोलन का पहला दौर भी पूरी तरह अहिंसक था। यह भी देखा गया है कि जिन आंदोलनों में नेतृत्व शांति बनाए रखने को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध होता है, वहां हिंसा नहीं हो पाती।

जहां यह प्रतिबद्धता नहीं होती, वहां भीड़ की मानसिकता हावी हो जाती है। फिलहाल यही हो रहा है। समस्या शायद इसलिए भी है कि यह आंदोलन जिस तरह से अचानक शुरू हुआ है, उसमें कोई प्रभावी केंद्रीय नेतृत्व नहीं है, इसलिए अक्सर असामाजिक तत्व इसका फायदा उठा लेते हैं। सरकार अभी तक इस स्थिति का मुकाबला दो तरह से करती रही है। एक तो ऐसे मौकों पर वह इंटरनेट ठप कर देती है और धारा-144 लागू कर दी जाती है। दूसरा तरीका वहां अपनाना पड़ता है, जहां हालात बेकाबू होने लगते हैं और पुलिस को बल-प्रयोग करना पड़ता है। ये दोनों ही तरीके कई समस्याएं पैदा करते हैं और नागरिक आजादी को भी बाधित करते हैं। यह बताता है कि हम अभी ऐसे परिपक्व लोकतंत्र बनने की मंजिल से दूर हैं, जहां ऐसी चीजों की नौबत ही न आए।
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राजनीतिक आंदोलनों में सामाजिक हिंसा (हिन्दुस्तान)

आनंद कुमार, वरिष्ठ समाजशास्त्री
लोकतांत्रिक देश की सत्ता-व्यवस्था के लिए यह जरूरी है कि संसद में चुने हुए प्रतिनिधियों के बीच लगातार संवाद रहे और संसद व सड़क की आवाज के बीच भी एक तारतम्य हो। कभी-कभी सरकारों को यह गलतफहमी हो जाती है कि संसदीय प्रक्रियाओं में चुने हुए जन-प्रतिनिधि और विभिन्न वैचारिक राजनीतिक समूह ही पूरे समाज व देश के प्रतिनिधि हैं। यह दृष्टि सिर्फ तकनीकी तौर पर सही होती है, क्योंकि नागरिकों की सत्ता को किसी खास तरीके से प्रकट जनमत के आधार पर हम टिकाऊ नहीं मान सकते। जिस तरह परिस्थितियों के अनुसार व्यक्तियों का निजी विचार और दृष्टिकोण बनता-बदलता रहता है, उसी तरह सामूहिक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों, वर्गों, जातियों और हित-समूहों का देश, काल और पात्र के अनुसार दृष्टिकोण बनता-बदलता रहता है।

जब सरकारों में बैठे नुमाइंदों का रोज-रोज की जिंदगी से रिश्ता कमजोर होने लगता है, तब लोग छोटे-बड़े समूहों में, सभाओं, प्रदर्शनों, हड़तालों और नागरिक नाफरमानी द्वारा शांतिपूर्ण तरीके से ध्यानाकर्षण का प्रयास करते हैं। यही लोकतंत्र का सत्ता-व्याकरण माना जाता है। इनमें से किसी भी एक पक्ष की अवहेलना लोकतंत्र के लिए अहितकर है। न तो हम वोट द्वारा प्रकट बहुमत के आधार पर बनी सरकार को दरकिनार कर सकते हैं, और न सरकारों में बैठे लोग आम जिंदगी की उथल-पुथल और अंतर्विरोधों से जुड़े आंदोलनों की अनदेखी कर सकते हैं। उन्होंने बहुत सोच-समझकर आपको अपना प्रतिनिधि बनाया और आप उस जनादेश के आधार पर अपने से असहमत लोगों को संवाद के भी काबिल नहीं मानते, तो इसे सत्ता का अहंकार ही कहा जाएगा।

सवाल सड़कों पर होने वाले सार्वजनिक आचरण का भी है। लंबी प्रक्रियाओं के बाद देश की संविधान सभा के अनुभवी संविधान सदस्यों ने हमें कुछ बुनियादी अधिकारों के काबिल माना है। इसमें शिक्षा, आयु, वर्ग, लिंग, भाषा और धर्म में से किसी को भी बाधक बनने से रोका गया है। नागरिक होने मात्र से हम अपने देश के भाग्य-विधाताओं की कतार में जोड़ दिए जाते हैं। लेकिन नागरिकता के अधिकारों में ही नागरिकता के कर्तव्यों का बहुत जरूरी हिस्सा शामिल होता है। बिना कर्तव्यपरायण नागरिकता के अधिकारवादी नागरिकता का कोई आधार नहीं बचता। इसीलिए हमने भारतीय राजनीति के नए निर्माण में स्वराज की लड़ाई को मूलत: सत्य और अहिंसा पर संगठित किया। हिंसावादी धाराएं भी थीं। मगर 1857 की पहली कोशिश की भयानक विफलता और लगभग आधी शताब्दी के आत्ममंथन के बाद हमारे देश के नायकों व लोगों ने सुसंगठित प्रतिरोध, विशेषकर असहयोग और अहिंसक आंदोलनों के रास्ते से बंगाल विभाजन से लेकर चंपारण और जलियांवाला बाग से होते हुए भारत छोड़ो आंदोलन तक एक राजनीतिक-संस्कृति की रचना की। यहां अपने प्रतिपक्षी के साथ पूर्ण असहयोग के बावजूद उसके विचारों या उसके व्यक्तिगत अधिकारों का मर्दन करने का रास्ता कभी नहीं अपनाया गया। वैसे, सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष के अलावा एक तीसरा तटस्थ नागरिक समाज भी होता है।

अगर हम अपनी बात को अलोकतांत्रिक तरीके की तरफ यानी फुटकर हिंसा से लेकर संगठित आतंक तक मोड़ देते हैं, तो न्याय की हमारी मांग और लोकतांत्रिक आधार पर हित-रक्षा का आंदोलन कमजोर होने लगता है। अत्यंत निर्मल आदर्शवाद के बावजूद अपने दावे को मजबूत करने के लिए सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या सत्ता-प्रतिष्ठान से जुड़ी नौकरशाही, सत्ताधीशों या न्यायपालिका को आतंक या अराजकता के बल पर अपने दावों को कुबूल करने के लिए विवश करने की रणनीति ऐसे अभियानों को व्यापक लोकतांत्रिक मर्यादाओं से अलग कर देती है।

जब जनांदोलन से जुड़े लोग लोकतांत्रिक लक्ष्मण रेखा लांघने का प्रयास करते हैं, तब सत्ता-प्रतिष्ठान को हर तरह की बर्बरता की छूट मिल जाती है। इसीलिए शुरू से आखिरी तक शांतिपूर्ण बने रहना एक असरदार प्रतिरोध की बुनियादी शर्त मानी गई है। अगर किसी सभा में वक्ताओं की तरफ से भाषायी हिंसा होने लगे या किसी सार्वजनिक प्रदर्शन में निर्दोष लोगों को आतंकित किया जाना शुरू हो जाए या सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने की हरकतें होने लगें, तो उस अभियान या आंदोलन के आयोजकों को समझ लेना चाहिए कि वे एक बेलगाम हो रहे घोड़े पर सवार हैं। और अगर घोड़े की लगाम जाती है, तो सबसे पहले सवार ही धराशायी होता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी जरूरत यही होती है कि हम अपने प्रतिपक्षी के साथ अशिष्टता से बचें। अगर हम शिष्ट तरीके से आगे बढ़ते हुए सत्ता-प्रतिष्ठान की हिंसा का शिकार बनते हैं, तो यह आम लोगों की निगाह में सत्ता की कमजोरी और जनांदोलन की मजबूती का संकेत होता है। जिस तरह आंदोलनकारियों द्वारा अलोकतांत्रिक तरीकों से अपनी मांगों को मनवाना अनुचित है, उसी तरह सत्ता-प्रतिष्ठान के लिए अहिंसक और शांतिपूर्ण नागरिक समूहों के खिलाफ लाठी-गोली की पद्धति का इस्तेमाल सत्ता के इकबाल को घटाता है।

आजकल हमारे जीवन में सामाजिक हिंसा बढ़ रही है। लेकिन चिंता की बात यह है कि अधिकांश राजनीतिक दल अलग-अलग वैचारिक आधारों पर समाज में पांव पसार रही सामाजिक हिंसा की या तो अनदेखी कर रहे हैं या महिमा मंडन। राष्ट्रवाद से लेकर साम्यवाद तक अलग-अलग चश्मों से इसे देखने वाले दरअसल आग से खेल रहे हैं। सामाजिक हिंसा कब राजनीतिक विमर्शों में फैल जाएगी, कहना मुश्किल है। जब समाज में हम मोटे तौर पर हिंसा को उचित साधन मानने लगेंगे, तब राजनीति में हिंसा का प्रतिरोध करना कठिन हो जाएगा।

एक समाज और शासन-व्यवस्था के रूप में हमें आत्म-समीक्षा का धर्म निभाना चाहिए। जहां हमारी शासन-व्यवस्था के स्वराजीकरण की जरूरत है, वहीं जन-हस्तक्षेप के लिए फुटकरिया हिंसा से लेकर छिपी व खुली हिंसा का इस्तेमाल भी दवा के नाम पर जहर जैसा है। अगर हम अपने सहज नागरिक-अधिकारों के आधार पर सुनवाई चाहते हैं, तो हिंसा का रास्ता तो कम से कम हमें नहीं ही अपनाना चाहिए। दूसरी तरफ, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और अब नरेंद्र मोदी की सरकारों के विभिन्न आंदोलनों से हुए समझौतों को देखते हुए यह भी साफ है कि हम एक देश के रूप में बहुत बड़ी सेना और सुसज्जित पुलिस बल के मालिक जरूर हैं, लेकिन जनता के प्रतिरोधों की अंतिम परिणति के रूप में बहुत शक्तिशाली सरकारों को भी संवाद की मेज पर अपने प्रतिपक्षों को बुलाना पड़ा है। संविधान-सम्मत समझौतों से ही तमाम चुनौतियां सुलझाई गई हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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दुनिया में कहीं नहीं इस मुद्दे का असर (हिन्दुस्तान)

शशांक, पूर्व विदेश सचिव
भारत में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ चल रहे देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों की गूंज अब विदेश में भी सुनी जाने लगी है। वॉशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्जियन, वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे चर्चित अंतरराष्ट्रीय अखबार जहां इन विरोध-प्रदर्शनों को अपनी सुर्खियां बनाने लगे हैं, वहीं ऑस्ट्रेलिया, रूस जैसे देशों ने अपने-अपने नागरिकों को भारत यात्रा पर एहतियात बरतने को कहा है। ब्रिटेन में भी आलोचनात्मक स्वर सुनाई दिए हैं। इन सबसे हमारे यहां का एक तबका कहने लगा है कि इस नए कानून के कारण वैश्विक समुदाय में भारत की उदार छवि को धक्का लगा है। पर क्या वाकई ऐसा है?

तमाम वैश्विक मंचों पर भारत एक धर्मनिरपेक्ष और उदार लोकतंत्र माना जाता रहा है। यहां बेशक सामाजिक विषमताएं रही हैं और वक्त-बेवक्त जातिगत व सामाजिक तनाव सतह पर आए हैं। लेकिन 1991 के बाद, खासतौर से जिस तरह अमेरिका, जापान या अन्य देशों के साथ हमारे रिश्ते सुधरे, उसका व्यापक असर पड़ा। पिछले कुछ वर्षों से आर्थिक प्रगति के मामले में भारत की साख दुनिया भर में बढ़ी है। हालांकि इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि एक वैश्विक गांव में उपभोक्ता वर्ग काफी मायने रखता है, और इस मामले में भारत काफी संपन्न देश है। फिर, बौद्धिक व तकनीकी कुशलता के लिहाज से भी भारतीय दुनिया भर में सम्मान पा रहे हैं।

यही कारण है कि दूसरे देशों को यह फर्क नहीं पड़ता कि हम अपने नागरिकों की पहचान के लिए कौन-सा रास्ता अपनाते हैं या कैसे दस्तावेज उन्हें सौंपते हैं। असम में जब राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बना, तब भी उसे भारत का आंतरिक मसला माना गया। जब कश्मीर की सांविधानिक स्थिति बदली गई, तब भी विश्व की यही सोच थी। और अब, जब नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर देश में बवाल मचा है, तब भी कूटनीतिक नजरिए से वैश्विक ताकतें इसे कोई खास तवज्जो नहीं दे रही हैं।

भारत ही नहीं, इस तरह की प्रक्रिया तमाम राष्ट्रों में अपनाई जाती है। यूरोप के अनेक देशों में नागरिकता को लेकर अपने नियम हैं। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लेकर भी अलग-अलग देशों में अलग-अलग प्रावधान हैं। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में राजनीतिक दल अपनी बातें चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल करते हैं, और फिर यदि उन्हें बहुमत मिलता है और वे सत्ता में आते हैं, तो घोषणा-पत्र के वादों को अमल में लाते हैं। इसके बाद भी यदि किसी समूह या व्यक्ति को स्पष्टीकरण की जरूरत महसूस होती है, तो वह सर्वोच्च अदालत में जाता है। तमाम देशों में यही चलन है। अपने यहां भी इससे अलग प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। नागरिकता का नया प्रावधान भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र का हिस्सा था। इसमें जिनको भी आपत्ति रही, वे सुप्रीम कोर्ट में गए हैं। एक लिहाज से यह सब कुछ सांविधानिक मर्यादाओं के तहत हुआ।

ये बातें दूसरे देशों की सरकारें समझती हैं। वहां के शैक्षणिक संस्थान भी परिस्थितियों को समझ रहे हैं। मगर गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के कुछ खास समूह हैं, जो अपनी वैश्विक भूमिका के लिए आलोचनात्मक सुर अपनाते हैं। ऐसे संगठन खुद को अपने देश की भौगोलिक सीमाओं से परे समझते हैं। पूरी दुनिया की जिम्मेदारी खुद ओढ़कर चलना पसंद करते हैं। कई देशों की राजनीतिक संस्थाएं इन्हें महत्व नहीं देतीं, फिर भी वैश्विक मसलों में उनकी दखलंदाजी जारी रहती है। विकासशील देश खासतौर से इनके निशाने पर होते हैं। यही वजह है कि भारत में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों को लेकर ये संगठन ज्यादा मुखर हैं। हमें कथित तौर पर और मानवीय बनाने की इस मुहिम में मीडिया उनका हथियार बनता है। चूंकि लोकतांत्रिक देशों में मीडिया स्वतंत्र होता है और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में वह अपनी जिम्मेदारियां निभाता है, इसलिए उसके माध्यम से ऐसे गैर-सरकारी संगठन अपनी बातें आसानी से लोगों के सामने रखने में सफल होते हैं।

रही बात पड़ोसी मुल्कों की, तो हमें घेरने के लिए पाकिस्तान सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है। कश्मीर से जब अनुच्छेद 370 और 35-ए निरस्त किया गया था, तब भी उसने तमाम वैश्विक मंचों पर हमारे खिलाफ आवाज उठाई थी। कुछ इस्लामी देश उसके प्रभाव में जरूर आए थे, मगर व्यापक तौर पर उसे मुंह की खानी पड़ी। इस बार भी चीन के साथ मिलकर वह हमारे खिलाफ माहौल बनाने में जुटा है। मगर सुखद बात यह है कि इस बार भी अमेरिका जैसे देशों ने उसे टका-सा जवाब दे दिया है। इन देशों का स्पष्ट मानना है कि अपनी भौगोलिक सीमा में नागरिकता को परिभाषित करने का अधिकार भारत के पास ही है। कोई दूसरा देश इसमें दखल नहीं दे सकता। इसी तरह, बांग्लादेश से हमारे मजबूत होते रिश्ते का यह असर है कि पहले ढाका की तरफ से बेशक यह दावा किया गया कि बांग्लादेशी भारत में फर्जी तरीके से मौजूद नहीं हैं, लेकिन अब ऐसे बयान भी सामने आ रहे हैं कि अगर भारत में फर्जी नागरिक मिलते हैं, तो उन्हें बांग्लादेश वापस ले सकता है।

साफ है, इन विरोध-प्रदर्शनों से भारत की छवि पर कोई असर नहीं पड़ा है। यही वजह है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर बीते बुधवार को उन अमेरिकी सांसदों से भी नहीं मिले, जिन्होंने कश्मीर मसले पर भारत की आलोचना की थी। साफ है, जिन सरकारों से हमारी कूटनीतिक व सामरिक साझेदारी है, वे हमें पूरी तवज्जो दे रही हैं। वे नहीं चाहतीं कि भारत से उनके रिश्ते खराब हों। इन देशों को हमारे धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने, मानवाधिकार संस्थाओं और सांविधानिक प्रावधानों पर पूरा विश्वास है।

हां, कुछ गैर-सरकारी, मानवाधिकार या सामाजिक संगठन तीखी नजरों से हमें जरूर देख रहे हैं, पर इसका हमारी छवि पर बहुत ज्यादा असर नहीं पडे़गा। फिर भी, हमारी यही कोशिश होनी चाहिए कि वैश्विक गैर-सरकारी संगठनों के सामने हम अपने मूल्य स्पष्ट करें, और उन्हें भरोसे में लें। घरेलू राजनीति में जिस तरह सत्तारूढ़ दल ने तमाम विपक्ष को अपने खिलाफ कर लिया है, वैश्विक राजनीति के साझेदारों के साथ ऐसी रणनीति नुकसानदेह हो सकती है। भूमंडलीकृत दुनिया में ‘एकला चलो रे’ की नीति कतई नहीं अपनाई जा सकती।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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सताए हुए लोगों के साथ खड़े होना (हिन्दुस्तान)

हरबंश दीक्षित, कानूनी मामलों के विशेषज्ञ
नागरिकता अधिनियम में संशोधन विधेयक पर संसद और उसके बाहर बहस छिड़ गई है। सरकार इस विधेयक को पारित कराना चाहती है, जबकि बहुत सारे लोग इसे संविधान विरोधी मानते हैं। इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से विस्थापित हिंदू, ईसाई, जैन, बौद्ध, सिख और पारसी समुदाय के लोगों को नागरिकता देने की व्यवस्था है। विधेयक में कहा गया है कि जो लोग भारत में 31 दिसंबर, 2014 या उससे पहले आ चुके हैं और भारत में पांच वर्ष तक रह चुके हैं, उन्हें गैर-कानूनी आब्रजक नहीं समझा जाएगा। उन्हें नागरिकता पाने का अधिकार मिलेगा। कई विपक्षी दल तथा देश में बहुत से लोग इसे संविधान विरोधी कह रहे हैं। उनका तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 25 में उपलब्ध आस्था के अधिकार तथा अनुच्छेद 21 में प्राप्त दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। कुछ लोग इसे मुस्लिमों के साथ भेदभाव मानते हैं, क्योंकि उन्हें इस विधेयक में मिलने वाले अधिकार से वंचित रखा गया है। उनकी मान्यता है कि यह समता के मूल अधिकारों का उल्लंघन है।

समानता का नियम कोई जड़ अवधारणा नहीं है। न्याय के दूसरे सिद्धांत की तरह इसमें भी विकास होता रहता है। देश-काल, परिस्थितियों के मुताबिक इसमें संशोधन होता रहता है। किसी वर्ग के साथ यदि जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो समानता का सिद्धांत अपने पारस्परिक दायरे से बाहर निकल उसे समाज के दूसरे लोगों के बराबर लाने के लिए आरक्षण के सिद्धांत को समाहित कर लेता है। शासन-व्यवस्था में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 व 16 में विशेष उपबंध बनाए गए। महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करने, उन्हें सुरक्षा देने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सकारात्मक पहल की जरूरत थी, क्योंकि सदियों से उनके साथ भेदभाव किया गया। हमारे संविधान में उनके लिए भी विशेष उपबंध बनाए गए। दहेज उत्पीड़न को रोकने और उन्हें घरेलू हिंसा से बचाने के लिए विशेष कानून बनाया गया। स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों में उनके लिए आरक्षण किया गया। सरकारी नौकरियों में उनकी नुमाइंदगी बढ़ाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह सब इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि समानता के सिद्धांत को अधिक सार्थक व न्यायपूर्ण बनाने के लिए उसे पारंपरिक सोच के खांचे से बाहर निकाला गया।

हमारे संविधान में पूर्वोत्तर की कुछ जनजातियों को भी विशेष अधिकार हासिल हैं। यदि यह मान लिया जाए कि देश के सभी क्षेत्र और सभी लोग एक जैसे हैं, और सभी के ऊपर एक जैसा कानून लागू होगा, तो ऐसा करना संभव नहीं है, क्योंकि उन्हें सुरक्षा देने और उनकी पहचान बनाए रखने के लिए ऐसा करना जरूरी है। यही वजह है कि संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची में उनके लिए विशेष व्यवस्था की गई और उनके इलाके को स्वशासी बनाया गया। यहां तक कि देश के दूसरे नागरिकों को उस क्षेत्र में जाने के लिए परमिट लेने की आवश्यकता पड़ती है। उनके अपने नियम-कानून हैं। उन्हें अपनी परंपरा के मुताबिक नियम बनाने की आजादी है। संसद द्वारा बनाए गए कानून उन पर लागू नहीं होते। दीवानी और फौजदारी विवादों में देश के दूसरे हिस्से में लागू होने वाला कानून उन पर लागू नहीं होता। नागरिकता संशोधन विधेयक में भी उनकी स्वायत्तता को सम्मान दिया गया है। यह उनके क्षेत्र में लागू नहीं होगा। यह जरूरी था, ताकि विशेष परंपराओं के आग्रही समाज की विशेष पहचान को कायम रखा जा सके। समानता का पारंपरिक सिद्धांत उन्हें न्याय नहीं दे सकता था। इसके लिए उसे व्यापक होने की जरूरत थी और उसे व्यापकता देकर हमारे संविधान ने पूर्वोत्तर व दीगर सामाजिक-समूहों को अलग वर्ग मानते हुए न्याय सुनिश्चित किया।

संविधान के अनुच्छेद 14 की सुरक्षा सभी ऐसे नागरिकों और गैर-नागरिकों को हासिल है, जो भारत के राज्य क्षेत्र में रहते हैं। इसमें सुनिश्चित किया गया है कि किसी के साथ भेदभाव न हो। परंतु समता के सिद्धांत को पुष्ट करने के लिए यह अनुच्छेद तार्किक वर्गीकरण की अनुमति देता है। भेदभाव और तार्किक वर्गीकरण के अंतर को स्पष्ट करने के लिए न्यायालय ने सिद्धांत दिया है कि इसके लिए दो शर्तों का पूरा होना जरूरी है। पहला यह कि वर्गीकरण करने का अधार स्पष्ट होना चाहिए, ताकि इसे आसानी से समझा जा सके कि इस प्रक्रिया में किसे सुविधा पाने वालों की श्रेणी में रखा जाए और किसे उससे बाहर रखा गया है। इसके अलावा, दूसरी शर्त यह है कि वर्गीकरण के आधार पर और उसके द्वारा हासिल किए जाने वाले उद्देश्य के बीच तार्किक संबंध है। साफ है कि वर्गीकरण करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उक्त वर्गीकरण से उसके न्यायपूर्ण उद्देश्य की प्राप्ति होगी।

नागरिकता संशोधन विधेयक में तीन पड़ोसी देशों से छह पूजा-पद्धतियों के मतावलंबियों को नागरिकता देने का प्रस्ताव है। चूंकि दोनों आधार स्पष्ट हैं। उन्हें समझना आसान है, इसलिए अनुच्छेद 14 में अनुमन्य तार्किक वर्गीकरण की शर्त पूरी होती है। इसे जानने के लिए कि इससे अधिनियम के उद्देश्य को कैसे पूरा किया जा सकेगा, विधेयक के उद्देश्य और उसे पारित करने के कारण से मदद मिल सकती है। इसमेें बताया गया है कि बीते वर्षों में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, और बांग्लादेश में लाखों हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई व पारसी समाज के लोग पूजा-पद्धति के आधार पर प्रताड़ित किए गए और उन्हें मजबूरन अपना देश छोड़़ना पड़ा। इसलिए उन्हें न्याय देने के लिए इसे लाया गया है।

विधेयक विरोधी इसे मुसलमान विस्थापियों के साथ भेदभाव मानते हैं। विधेयक का विश्लेषण करने पर यह विरोध निराधार प्रतीत होता है, क्योंकि तीनों देशों में गैर-मुस्लिमों के साथ भेदभाव के पर्याप्त प्रमाण हैं। अत: वहां के अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने से इस अधिनियम के उद्देश्य की पूर्ति होती है, इसलिए यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता। प्रस्तावित विधेयक के विरोधियों को इसे मुस्लिम, गैर-मुस्लिम बनाने की बजाय इसे गैर-प्रताड़ित और प्रताड़ित मानने की जरूरत है। जिस तरह जाति के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए जाति को ध्यान में रखना जरूरी है, उसी तरह पूजा-पद्धति के आधार पर भेदभाव के शिकार लोगों को प्रताड़ित और गैर-प्रताड़ित समुदाय मानने की जरूरत है, जो इस विधेयक द्वारा किया गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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क्यों आंदोलित हो रहा है पूर्वोत्तर (हिन्दुस्तान)

पेट्रीसिया मुखिम, वरिष्ठ पत्रकार
उस रात जब संसद में नागरिकता कानून में बदलाव के लिए चर्चा चल रही थी, तब गुवाहाटी की सड़कों पर यूनिवर्सिटी के छात्र विरोध में मार्च कर रहे थे। कुछ महीने पहले भी ऐसे विरोध-प्रदर्शन से असम में जनजीवन बाधित हो गया था। नारे वही थे, जोय आइ असम।  चिंता वही थी, ‘खिलोंजिया’ (मूल निवासी) के अधिकार।  जब आधी रात को लोकसभा ने संशोधन विधेयक पारित किया, तब असम के पड़ोसी राज्यों में भी विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। भाजपा ने नागरिकता को फिर परिभाषित करने की नई कोशिश करके इस पुराने सवाल को जिंदा कर दिया है कि कौन स्थानीय है और कौन बाहरी?

इस संशोधन का असम में सबसे मुखर और स्पष्ट विरोध चौंकाता नहीं है। असम के लोगों को ऐसा लग रहा है कि उन्हें किनारे कर दिया गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि उन राज्यों में यह कानून लागू नहीं होगा, जो इनर लाइन परमिट या छठी अनुसूची के दायरे में आते हैं। असम के कुछ ही जिलों में छठी अनुसूची लागू है। छठी अनुसूची जनजातीय परिषदों को ज्यादा स्वायत्तता देती है। चूंकि असम इनर लाइन परमिट वाला राज्य नहीं है, इसलिए यह पूर्वोत्तर का अकेला ऐसा राज्य बन जाएगा, जहां बांग्लादेश से आए अवैध हिंदू शरणार्थी बसाए जा सकेंगे। केंद्रीय गृह मंत्री ने मणिपुर को आश्वस्त किया है कि उसे भी इनर लाइन परमिट व्यवस्था के दायरे में लाया जाएगा।

स्वाभाविक है, ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और अन्य अनेक नागरिक संगठन ठगा महसूस कर रहे हैं। जो असम समझौता हुआ था, उसमें सहमति बनी थी कि 1971 से पहले जो लोग असम में आ गए हैं, उन्हें नागरिकता दी जा सकती है, लेकिन अब भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार 2014 तक आए अवैध शरणार्थियों को भी नागरिकता देगी। अकेले असम में लाखों लोगों को नागरिकता मिल जाएगी। पूर्वोत्तर में 238 मूल जनजातियां ऐसी हैं, जो आस्था से हिंदू नहीं हैं। पूर्वोत्तर के सात राज्यों की जनजातियां परस्पर मिलकर रहने पर कमोबेश सहमत हैं, लेकिन बाहरी लोगों को यहां बसाने की किसी भी कोशिश के प्रति सभी सशंकित हैं। चिंता सभी बाहरी लोगों को लेकर है, धर्म यहां कतई मायने नहीं रखता। मिसाल के लिए, अरुणाचल प्रदेश बौद्ध चकमा को नागरिकता देना नहीं चाहता, मिजोरम ब्रू और रियांग को बसाना नहीं चाहता। ये तीनों जनजातियां बांग्लादेश से आई हैं।

अपनी पहचान बनाए रखने की कोशिशों के कारण जहां पहले से ही अस्थिर माहौल हो, वहां नागरिकता संशोधन विधेयक नए प्रकार के दोष ही पैदा करेगा। पूर्वोत्तर में पिछले दो दशकों में कमोबेश जो शांति रही है, उसका क्या होगा? क्या नए राष्ट्रीय कानून से इन राज्यों के छोटे जनजाति समूहों की नींद उड़ जाएगी? क्या यह एक स्थाई चुनाव मुद्दा बन जाएगा?

भाजपा ने 2019 के राष्ट्रीय चुनावों में अपने घोषणापत्र में इस वादे को शामिल किया था। चूंकि लोकसभा में भाजपा के सांसदों की संख्या बढ़ी है, इसलिए पार्टी ने यह सोचा कि लोग इस विधेयक का समर्थन करेंगे। यह मानना वाजिब होगा कि असम के जिन मतदाताओं ने भाजपा सांसदों को चुना है, उन्होंने नागरिकता संशोधन विधेयक के समर्थन में मत दिया है। उन्हें शायद अब अपना कदम गलत लग रहा है। लोगों को लग रहा है कि भाजपा ने असम को बाकी राज्यों से अलग कर दिया, ताकि इस कानून के विरोध की कमर टूट जाए। साथ ही, सत्ताधारी पार्टी के लिए पूरे पूर्वोत्तर से जूझने की बजाय केवल असम से निपटना आसान हो जाए। लेकिन भाजपा ने इस कानून के असर का गलत आकलन कर लिया है। जनजातियों में ज्यादातर लोग ईसाई हैं, वे इस कानून को शक की निगाह से देख रहे हैं। उन्हें लगता है, कानून का मकसद बांग्लादेश से आए हिंदुओं को बसाना है।

उधर पिछले साल, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने नागरिकता संशोधन विधेयक को भाजपा की चुनावी रणनीति बताकर खारिज कर दिया था। आगे चुनाव में क्या होगा, यह कहना मुश्किल है, पर इसमें शक नहीं कि इससे पूर्वोत्तर में तनाव बढ़ेगा। त्रिपुरा का उदाहरण सामने है कि कैसे कुछ ही दशकों में यहां के मूल निवासी 32 प्रतिशत आबादी तक सिमट गए। राज्य को अब ऐसे लोग चला रहे हैं, जो पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से आए हैं। त्रिपुरा में बांग्ला बोलने वाली आबादी बहुसंख्यक हो गई है। ऐसी स्थिति कमोबेश क्षेत्र के दूसरे राज्यों में भी है।

मेघालय के शिलांग में ही दस गुणा दस वर्ग किलोमीटर का एक बड़ा इलाका है, जिसे यूरोपीय वार्ड कहा जाता है। यह छठी अनुसूची से बाहर है। इस इलाके में भारी आबादी है। कुछ इलाकों में झुग्गियां हैं, जहां बांग्लादेशी मूल के लोग ने कब्जे कर रखे हैं। कानून का विरोध करने वाले जानते हैं कि मेघालय में 1.70 करोड़ बांग्लादेशी हिंदू हैं, जिनका दावा है कि उन्हें उनके देश में सताया गया।  ऐसे लोग अब मेघालय और असम की बराक घाटी में बसना पसंद करेंगे, क्योंकि यहां बांग्ला बोलने वाली आबादी पहले से ही बड़ी संख्या में रह रही है। मेघालय ने समाधान के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है।

इस कदम के राजनीतिक निहितार्थ क्या हैं? इस कानून के जरिए असम में चुनाव जीतने की योजना है या निशाने पर पश्चिम बंगाल है? पश्चिम बंगाल में कुछ लाख हिंदुओं को नागरिकता देकर भाजपा स्थाई वोट बैंक बना लेगी। यह ममता बनर्जी की उस तृणमूल कांग्रेस से लड़ने का एक तरीका है, जो मुसलमानों का अत्यधिक संरक्षण कर रही है, क्योंकि वे राज्य में एक मजबूत वोट बैंक हैं। पश्चिम बंगाल 42 सांसद और असम 14 सांसद भेजता है। दिलचस्प यह कि दोनों ही राज्यों में 2021 में चुनाव होने हैं।

पूर्वोत्तर में बढ़ते तनाव को देखकर लगता है कि केंद्र सरकार को सीमा से आगे जाकर इस इलाके में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। भारत में अनगिनत विविधताएं हैं। इस देश में शासन करने वालों में दूरदर्शिता व बड़ा दिल होना चाहिए, ताकि वे तमाम विभेदों का समावेश भी करें और पूर्वोत्तर के लोगों की भावनाओं का भी पूरा ध्यान रखें।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)


सौजन्य - हिन्दुस्तान।
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युवाओं को कुशल बनाने के मोर्चे पर पिछड़ता भारत (हिन्दुस्तान)

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री
भारत सहित पूरी दुनिया में आईएमडी बिजनेस स्कूल स्विट्जरलैंड द्वारा प्रकाशित ग्लोबल टैलेंट रैंकिंग 2019 को गंभीरतापूर्वक पढ़ा जा रहा है। भारत 63 देशों की इस सूची में पिछले वर्ष के 53वें स्थान से छह पायदान फिसलकर 59वें स्थान पर आ गया है। रैंकिंग में स्विट्जरलैंड लगातार छठे साल शीर्ष पर है। डेनमार्क दूसरे व स्वीडन तीसरे स्थान पर है। चीन इसमें 42वें स्थान पर है। रूस 48वें और दक्षिण अफ्रीका 50वें स्थान पर है। 


प्रतिभाओं के विकास, उन्हें आकर्षित करने, उन्हें देश से ही जोड़े रखने तथा उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता के लिए किए जा रहे निवेश के आधार पर रैंकिंग तय की गई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि टैलेंट पूल की गुणवत्ता के मामले में भारत का प्रदर्शन औसत से बेहतर है, लेकिन कुछ मोर्चे हैं, जिन पर यह देश पिछड़ रहा है।

भारत में शैक्षणिक प्रणाली की गुणवत्ता कमतर है। सरकारी शिक्षा क्षेत्र में निवेश की कमी है। ज्यादातर युवा गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण और जीवन से वंचित हैं। प्रतिभाओं को आकर्षित करने और उन्हें बनाए रखने की क्षमता भी कम है। स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर बहुत अच्छा नहीं है। श्रमबल में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी नहीं है। इसके अलावा, निवेश और विकास के मामले में भारत सूची में शामिल देशों में बहुत पीछे है। ग्लोबल टैलेंट रैंकिंग में बहुत पीछे रहने पर चिंतित होना और सबक लेना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि देश की नई पीढ़ी को योग्य या कुशल बनाकर ही रोजगार की संभावनाओं को साकार किया जा सकता है। 


हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत में करीब पचास प्रतिशत आबादी ऐसी है, जिसकी उम्र पच्चीस साल से कम है। भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम आयु की है। चूंकि भारत के पास विकसित देशों की तरह रोजगार बढ़ाने के विभिन्न संसाधन और आर्थिक शक्तियां उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए यह देश अपनी युवा आबादी और उसकी योग्यता को ही अपनी ताकत बनाकर आगे बढ़ सकता है। 


हाल ही में केंद्रीय सांख्यिकीय कार्यालय ने श्रमबल के नवीनतम आंकड़े जारी करते हुए कहा है कि वर्ष 2017-18 के दौरान देश में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी रही है। देश में बेरोजगारी की यह दर 45 साल में सर्वाधिक है। इसमें कोई दो मत नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में श्रम का आधिक्य है, लेकिन कौशल की काफी कमी है। उच्च शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण से लैस भारतीय युवाओं के लिए देश-विदेश में नौकरियों की कमी नहीं है। इन युवाओं के अलावा भी ऐसी आबादी है, जिसके पास खूब डिग्रियां हैं, लेकिन योग्यता के अभाव में नौकरी नहीं मिल रही है। 


वास्तव में इस समय दुनिया के साथ-साथ देश का भी रोजगार परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। ऐसे बदलते परिदृश्य में रोजगार की जरूरतें भी बदल रही हैं। तकनीक की प्रधानता बढ़ रही है। दुनिया के अनेक देश योग्य-कुशल भारतीय युवाओं की राह देख रहे हैं। खासतौर से देश में मेक इन इंडिया की सफलता के लिए भी प्रशिक्षित युवाओं की जरूरत है। ख्याति प्राप्त स्टाफिंग फर्म मैनपावर ग्रुप की एक स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में उद्योग-कारोबार के लिए पर्याप्त संख्या में टैलेंटेड प्रोफेशनल्स नहीं मिल रहे हैं।



भारत में अभी भी उतने योग्य युवा आगे नहीं आ रहे हैं, जितनों की जरूरत है। ऐसे में, जरूरी है कि सरकार प्रतिभाओं के विकास पर पूरी ईमानदारी से ध्यान दे। दक्ष प्रतिभाओं का निर्माण करे। योग्य युवा ही आसानी से रोजगार पैदा कर सकते हैं और रोजगार पा सकते हैं।


गौर करने की बात है कि सरकार द्वारा देश में कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय गठित करके कौशल विकास को गतिशील बनाने की पहल के भी आशाजनक परिणाम नहीं आए हैं। इस विभाग ने वर्ष 2016 से 2020 तक एक करोड़ लोगों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना आरंभ की थी, लेकिन अक्तूबर 2016 से जून 2019 तक कोई 52 लाख लोगों को ही ट्रेनिंग दी जा सकी है। इनमें भी सबको नौकरी नहीं मिल सकी है। यदि हम चाहते हैं कि भारतीय प्रतिभाएं देश की मिट्टी को सोना बना दें, तो हमें ग्लोबल टैलेंट  रैंकिंग 2019 को ध्यान में रखते हुए बहुत सारे प्रभावी कदम उठाने होंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सौजन्य- हिन्दुस्तान।
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महामना, उन्हें माफ करें (हिन्दुस्तान)

महामना, उन्हें माफ करें
भारत सिर्फ हिंदुओं का देश नहीं है। यह मुसलमानों, ईसाइयों और पारसियों का भी देश है। यह तभी मजबूत होगा और उन्नति कर सकेगा, जब सभी धर्मों तथा समुदायों के लोग परस्पर भाईचारे के साथ इसमें रहेंगे। मेरी पूर्ण आशा और प्रार्थना है कि ज्ञान का यह जो केंद्र अस्तित्व में आ रहा है, वह ऐसे विद्यार्थी तैयार करेगा, जो न सिर्फ बौद्धिक श्रेष्ठता में दुनिया के अपने समकक्ष विद्यार्थियों की बराबरी करेंगे, बल्कि एक उत्कृष्ट जीवन भी बिताएंगे, अपने देश से प्रेम करेंगे और ईश्वर के प्रति समर्पित होंगे।


हम काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लोग क्या ‘मालवीय जी महाराज’ की ये पंक्तियां भूल गए? ऐसा न होता, तो विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में डॉक्टर फिरोज खान को अपनी नियुक्ति के शुरुआती दो हफ्ते विवादों की अनचाही आंच में झुलसते हुए न गुजारने पड़ते।


उनके खिलाफ रोष के पटाखे फोड़ने की कोशिश उसी समय शुरू हो गई थी, जब वह सात नवंबर को विश्वविद्यालय में योगदान के लिए दाखिल हुए थे। उनके विरोध में छात्रों की एक टोली विभाग के द्वार पर बैठी थी। उस दिन से संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय की कक्षाओं को चलने नहीं दिया जा रहा था और दो-तीन दर्जन छात्रों का जत्था कुलपति आवास के बाहर ढोल-मंजीरे बजा रहा था। हमारे ये नौजवान अपने कुलपति की नींद क्यों हराम कर रहे थे? कारण स्पष्ट करते हुए एक नौजवान ने एक फटाफट चैनल से कहा कि कोई ‘अनार्य’ हमें धर्म कैसे पढ़ा सकता है? उसे पता नहीं कि डॉक्टर खान की नियुक्ति साहित्य विभाग में हुई है। वह साहित्य पढ़ाएंगे, धर्म नहीं। इस संकाय में आठ विभाग हैं, जिनमें से सात में धर्म के अलावा काफी कुछ पढ़ाया जाता है। यहां जैन और बौद्ध दर्शन भी पढ़ाया जाता है। इन धर्मों का उदय क्यों और कैसे हुआ था, क्या यह भी बताने की जरूरत है?


साफ है, उन्हें संकाय के नाम पर बरगलाया गया था। मैं नहीं जानता कि नाराजगी प्रकट कर रहे उन नौजवानों ने जर्मन विद्वान गेटे, मोनियर विलियम्स अथवा मैक्समूलर का नाम सुना है या नहीं? यकीनन, वे जनरल कनिंघम के बारे में भी नहीं जानते होंगे, इन ‘अनार्यों’ का हम संस्कृत और संस्कृति प्रेमियों पर बड़ा एहसान है। गेटे और मैक्समूलर ने संस्कृत के ‘क्लासिक’ ग्रंथों को मदमाते यूरोपीय समाज में स्थापित किया था। जनरल कनिंघम पेशे से फौज में इंजीनियर थे, पर उन्होंने भारतीय पुरातत्व पर गजब का काम किया। हमारी संस्कृति और संस्कृत जिन परदेशियों की ऋणी है, उनकी सूची लंबी है। उससे पहले ये लोग हमारे बारे में क्या सोचते थे, जानना हो, तो मैकाले की वह रपट पढ़ लीजिए, जो भारत आने के बाद उसने लंदन में विराज रहे अपने आकाओं को भेजी थी।


जो लोग डॉक्टर खान का विरोध कर रहे थे, वे शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि मुगल राजकुमार दारा शिकोह काशी में वेद पढ़ने आया था। उसे यह अलौकिक ज्ञान सौंपते हुए तब के पंडितों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी, क्यों? क्या इसलिए कि वह राजकुमार था अथवा हम तब अपेक्षाकृत उदार थे? ऐसा नहीं है कि भाषा, संस्कृतियों और धर्मों पर परस्पर प्रभाव का यह रिश्ता एकतरफा है।

इसी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में प्रोफेसर महेश प्रसाद सहित तमाम हिंदुओं ने योगदान किया। खुद मुझे प्रोफेसर निसार अहमद ने इसी विश्वविद्यालय में मुद्राशास्त्र पढ़ाया था। गुप्त युग के सिक्कों पर धार्मिक प्रतीकों के बारे में उन्होंने जो ‘लेक्चर’ दिया था, वह मुझे आज तक जस का तस याद है। वह चीफ प्रॉक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी रहे। उनका ज्ञान और काम उनके प्रति श्रद्धा पैदा करता था।


इंसानियत अगर एक-दूसरे की उन्नति का रास्ता प्रशस्त न करे, तो हम इंसान कैसे? काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कुछ छात्रों का भटकाव इस भावना पर चोट पहुंचा रहा था। यहां डॉक्टर फिरोज खान के बारे में जानना जरूरी है। फिरोज जयपुर से कुछ दूर गांव बगरू के रहने वाले हैं। उन्होंने जयपुर के राष्ट्रीय संस्कृत शिक्षा संस्थान से एमए करने के बाद डॉक्टरेट की उपाधि ली। उनके पिता रमजान खान भी संस्कृत में शास्त्री हैं। रमजान साहब गौशाला जाते हैं और मंदिरों में कृष्ण भक्ति के भजन गाते हैं। माथे पर टीका लगाए शुद्ध संस्कृत और ब्रजभाषा का उच्चारण करते रमजान खान अपने आचरण और भाव-भंगिमा से क्या एहसास देते हैं?

यह बताने कि जरूरत नहीं कि उन्हें यह सब कुछ अपने पिता गफूर खान से मिला, जो खुद भी संगीत विशारद् थे और गौ-प्रेमी थे। ये लोग अरबी-फारसी नहीं, संस्कृत के पुजारी हैं। पुराने दिन होते, तो शायद उन्हें ‘पंडित’ की उपाधि दे दी गई होती। रमजान खान दुख से कहते हैं, यह विवाद उपजने के बाद मालूम पड़ा कि हम मुसलमान हैं। जिस व्यक्ति की वंश परंपरा ऐसी हो, क्या उसे धर्म के आधार पर उसके कर्तव्य से वंचित किया जा सकता है? न भारत का संविधान, न काशी हिंदू विश्वविद्यालय का यूजीसी द्वारा निर्देशित विधान और न ही हमारी परंपरा ऐसा कहती है।


मैं यहां आपको डॉक्टर असहाब अली से परिचित कराना चाहूंगा। 1977 में उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय में बहैसियत सहायक प्रवक्ता आमद दर्ज कराई थी। दो बरस बाद जब विश्वविद्यालय के सहायक प्रवक्ताओं को स्थाई किया जा रहा था, तब यह खबर उड़ी कि डॉक्टर असहाब के मुकाबले हिंदू प्रत्याशियों को तरजीह दी जा रही है। इससे छात्र भड़क उठे। डॉक्टर अली 2010 तक इस विश्वविद्यालय की सेवा में रहे और छात्रों की दो पीढ़ियों ने उनकी योग्यता के चलते उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया। हालांकि, इस बीच वह हज पर गए और तब से उन्होंने धोती-कुरता छोड़ मुस्लिम परिधान पहनने शुरू कर दिए, पर इससे उनकी लोकप्रियता में कोई फर्क नहीं आया। बीएचयू के आंदोलनकारी छात्रों को यह भी बताया जाना चाहिए था कि संसार के तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों में इस्लाम धर्म की शिक्षा मुस्लिमों के अलावा ईसाई और यहूदी भी देते हैं। शिक्षक अपनी शिक्षा से जाना जाता है, चेहरे, धर्म अथवा वेश-भूषा से नहीं। हमारे चारों ओर ऐसे शिक्षकों के उदाहरण बिखरे पडे़ हैं।


काशी हिंदू विश्वविद्यालय में इसका उलट हुआ। इससे विश्वविद्यालय की छवि को आघात लगा है और ‘महामना’ की भावना भी चोटिल हुई है। अगर संयम से काम लिया जाता, तो ‘सर्वविद्या की राजधानी’ (बीएचयू के कुलगीत का मुखड़ा) दुनिया के लिए नजीर पेश करती नजर आती। अफसोस, ऐसा न हो सका। महामना उन्हें माफ करें, वे नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं।

सौजन्य- हिन्दुस्तान।
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हर नागरिक को सुरक्षा देने के लिए (हिन्दुस्तान)

सी उदय भास्कर, निदेशक, सोसाइटी ऑफ पॉलिसी स्टडीज


इस लक्ष्य से सभी सहमत होंगे कि देश का हर नागरिक पूर्ण रूप से ‘सुरक्षित’ महसूस करे। आज लोगों की सुरक्षा-चिंताओं का दायरा बड़ा और व्यापक है। हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सामने जो बाहरी खतरा मौजूद है, उससे प्रभावी और वहनीय तरीकों से निपटा जाना चाहिए, हमारा आंतरिक सुरक्षा ढांचा भी इस तरह तैयार होना चाहिए कि नागरिकों को ‘योगक्षेमं’ (कल्याण) का आश्वासन राष्ट्र की विभिन्न इकाइयों से मिलता रहे। ‘योगक्षेमं’ को चाणक्य ने किसी भी शासक (आज के दौर में शीर्ष नेतृत्व) की मुख्य जिम्मेदारी बताया है। आज हमारा देश कितना सुरक्षित है? इस सवाल का जवाब तलाशने में ‘माहौल’ शब्द हमारे लिए उपयोगी साबित होगा। कल हम मुंबई हमले (26/11) की 11वीं बरसी मनाने जा रहे हैं। 26 नवंबर, 2008 को हुए इस आतंकी हमले की बरसी हमारे लिए एक ताकीद है कि भारत किस तरह की सुरक्षा मुश्किलों से जूझ रहा है और किस कदर इसकी बाहरी व भीतरी चुनौतियां आपस में जुड़ी हुई हैं।

साल 2008 के नवंबर में राष्ट्र-प्रायोजित आतंकी हमले से भारतीय राज्य और इसकी क्षेत्रीय अखंडता व शुचिता को चोट पहुंचाई गई थी। इससे पहले, 1999 की गरमियों में पाकिस्तानी फौज और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने संयुक्त रूप से कारगिल की पथरीली ऊंचाइयों पर दुस्साहसिक घुसपैठ की थी। बेशक हमारी फौज ने उसका माकूल जवाब दिया, लेकिन बदले में हमारे सैकड़ों सैनिक भी खेत रहे। अगर इससे भी पहले के दौर में वापस लौटें, जब भारत ने आजादी हासिल की थी, तो अक्तूबर, 1962 में चीन के साथ हुए संघर्ष ने देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व में सुरक्षा को लेकर अपर्याप्त चिंता, अक्षम सैन्य नेतृत्व और रक्षा प्रबंधन के शीर्ष स्तर पर मतभिन्नता को सार्वजनिक किया था। जवाहरलाल नेहरू- वीके कृष्ण मेनन- वीएम थापर की सामूहिक विफलता भारत के लिए एक शर्मनाक स्थिति लेकर आई। अतीत का यह प्रसंग हमारे लिए ऐसा उपयोगी संदर्भ है, जिसकी रोशनी में हम देश की समग्र सैन्य सुरक्षा के भविष्य की रूपरेखा तैयार कर सकते हैं। जब चीन की फौज भारत से उलझ रही थी, तब नेहरू प्रधानमंत्री, मेनन रक्षा मंत्री और थापर सेना प्रमुख थे।

भारतीय सैन्य व खुफिया ढांचे की गहन समीक्षा और पुनर्गठन की जरूरत को अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने समझा। उल्लेखनीय है कि उसी दौर में 1999 की कारगिल घुसपैठ भी हुई थी। दिवंगत के सुब्रह्मण्यम के नेतृत्व में एक समिति ने अध्ययन किया, जिसका निष्कर्ष सरकार के सामने औपचारिक रूप से ‘कारगिल समीक्षा कमेटी (केआरसी) रिपोर्ट’ के रूप में पेश किया गया। केआरसी के निष्कर्ष चौंकाते हैं। इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि ‘भारत की सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली में कई गंभीर खामियां हैं’। रिपोर्ट आगे बताती है, ‘राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन शांति-काल में भी सुस्त पड़ा रहा... कमेटी शिद्दत से महसूस करती है कि कारगिल का अनुभव, निरंतर जारी छद्म युद्ध और प्रबल हो रहे परमाणु हथियार सुरक्षा प्रबंधन को देखते हुए यह जरूरी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की संपूर्णता में गहन समीक्षा की जाए’

हालांकि, भारत की सैन्य सुरक्षा प्रणाली और इससे जुड़े तंत्र की पूर्ण संस्थागत समीक्षा फिर भी न हो सकी। सुरक्षा प्रणाली के नजदीकी तंत्र में रक्षा उत्पादन, अनुसंधान व विकास (आरऐंडडी), आयुध कारखाने, प्रौद्योगिकी आदि सभी शामिल हैं। अच्छी बात है कि 19 साल बाद अब नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती हुई दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ (सीडीएस) नामक पद बनाने की घोषणा की। इसे हकीकत बनाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के नेतृत्व में एक कार्यान्वयन समिति का गठन किया गया है, और माना जा रहा है कि पहले सीडीएस की नियुक्ति अगले महीने हो जाएगी। शुरुआती रिपोर्ट से पता चलता है कि सीडीएस केंद्र सरकार को सैन्य-संबंधी सलाह देने वाला एकमात्र सलाहकार होगा। मगर यह बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि यह कार्यालय भारतीय शासन प्रणाली की बहुस्तरीय जटिलता और गहरे जड़ें जमाए नागरिक-सैन्य असहमति से भला कैसे तालमेल बिठा पाएगा। इन सबके बीच सीडीएस को आखिर कितनी तवज्जो मिल सकेगी?

आज, जब फैसले लेने की प्रक्रिया में कारोबारी नियम और प्रासंगिकता की बात सामने आती है, तो पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश के शब्दों के मुताबिक, अंगों के प्रमुख ‘तीन अदृश्य पुरुषों’ की तरह बन जाते हैं। उम्मीद यही होगी कि जब सीडीएस की नियुक्ति की विधिवत घोषणा की जाएगी, तो वह ‘चौथे’ नहीं बनेंगे। एक और उम्मीद देश की संसद से है कि वह सैन्य साजो-सामान, घरेलू अनुसंधान-विकास व उत्पादन, और नई तकनीक को अपनाने के लिए संसाधनों का पर्याप्त आवंटन करेगी। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि दुनिया भर में एक बड़ी ताकत होने की हमारी छवि या सामरिक स्वायत्तता का हमारा दावा उस वक्त जमींदोज हो जाता है, जब हमारी गिनती दुनिया भर में सैन्य उपकरणों के शीर्ष आयातक देशों में होती है।

पड़ोस की यदि बात करें, तो चीन सहित विभिन्न क्षेत्रीय चुनौतियों से लड़ने को दिल्ली सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। हालांकि, आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी समस्या कम नहीं है। बीते मार्च तक भारत ने आतंकी घटनाओं में अपने करीब 20,000 नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों को गंवाया है, और जम्मू-कश्मीर की आंतरिक स्थिति अब तक साफ नहीं हो सकी है। वहां अगली गरमियों में जटिल सुरक्षा चुनौतियों का हमें सामना करना पड़ सकता है। जाहिर है, हमारा सुरक्षित भविष्य पूरी तरह से देश की व्यापक राष्ट्रीय क्षमताओं पर आधारित है। मजबूत आर्थिक और सैन्य संकेतकों के अलावा, राजनीतिक संकल्प, संस्थागत अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को लेकर प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य- हिन्दुस्तान।
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