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नेताओं से एक गुस्ताख गुजारिश

शशि शेखर 


ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अपनी कुरसी छोड़ने का इरादा व्यक्त किया है। आमतौर पर राजनेता पैरों तले सियासी जमीन खिसकती देखकर ऐसा करते हैं, मगर जॉनसन की वजह कुछ और है। उनका कहना है कि बतौर प्रधानमंत्री उन्हें जो वेतन-भत्ते मिलते हैं, उनसे उनका गुजारा नहीं होता। शेष जिंदगी वह व्याख्यानों और लेखन के जरिए उपार्जित धन से व्यतीत करना चाहते हैं। 


भारतीयों को उनका फैसला चौंकाने वाला लग सकता है। हमलोग तो चुनाव-दर-चुनाव तमाम नेताओं की आमदनी ज्यामितीय कोणों की तरह पनपती पाते आए हैं। 

शायद आप जानते हों, फिर भी बताने में हर्ज नहीं कि बतौर ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को ब्रिटेन के खजाने से सालाना 1,50,402 पौंड हासिल होता है। अगर भारतीय रुपये में आंका जाए, तो यह रकम एक करोड़, 45 लाख के करीब बैठती है। जॉनसन का हाथ इसलिए तंग है, क्योंकि उनके छह बच्चे हैं और पूर्व पत्नी मरीना ह्वीलर को दिए गए तलाक के इकरारनामे के मुताबिक उन्हें मोटा गुजारा-भत्ता भी देना होता है। अभी उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और पालन-पोषण में जो रकम खर्च होती है, उसकी भरपाई सरकारी वेतन-भत्ते नहीं कर पाते हैं। टोरी पार्टी का नेता बनने से पूर्व उन्हें द टेलीग्राफ  से सालाना 2,75,000 पौंड हासिल हो जाया करते थे। इसके अलावा, अगर वह महीने में दो व्याख्यान भी दे लेते थे, तो उन्हें 1,60,000 पौंड तक की अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी। जाहिर है, जॉनसन उन दिनों को ‘मिस’ करते हैं और अब विचार व व्याख्यान की दुनिया में वापसी चाहते हैं। 


उनकी पूर्ववर्ती टेरेसा मे शायद उन्हें इस मामले में प्रेरित कर रही हैं। टेरेसा ने पदत्याग के पश्चात सिर्फ एक साल में भाषण और लेखन के जरिए दस लाख पौंड की कमाई कर ली थी। एक जमाना था, जब राजनेता अवकाश प्राप्त करने के बाद एकांत को अपना आश्रय बनाते थे, पर दुनिया बदल रही है। लोग सब कुछ जान लेना चाहते हैं। सियासत, कूटनीति, व्यापार आदि के तिलिस्मों की तह तक पहुंचने के लिए लालायित इन लोगों के लिए सत्ता के शीर्ष पर समय बिता चुके लोगों की शरण के अलावा कोई चारा नहीं बचता। ऐसे महानुभावों के पास सांविधानिक शपथ के दायरे के बाहर भी ऐसा बहुत कुछ होता है, जिससे असीमित जानकारियां प्राप्त की जा सकती हैं। टेरेसा मे तो इसका एक उदाहरण भर हैं। दुनिया के सबसे बडे़ कारोबारी देश अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों का तो यह पुराना शगल रहा है। बराक ओबामा को पद छोडे़ हुए चार साल होने को आए, पर वह आज भी दुनिया के सबसे महंगे व्याख्याताओं में एक हैं। बगोटा टाइम्स  के मुताबिक, पिछले साल कोलंबिया के ‘एक्समा’ में व्याख्यान देने के लिए उन्होंने छह लाख डॉलर वसूले थे। हालांकि, ओबामा राष्ट्रपति बनने से पहले भी बतौर लेखक अच्छी-खासी कमाई कर लेते थे। उनकी दो किताबें द ऑडैसिटी ऑफ होप  और ड्रीम्स फ्रॉम माई फादर खासी लोकप्रिय थीं। इनकी रॉयल्टी स्वरूप लाखों डॉलर उनके बैंक खातों में जमा होते थे। इस मायने में वह औरों के मुकाबले अधिक कारगर साबित हुए हैं। 


ओबामा तो लंबे समय तक अपनी लोकप्रियता की आव और ताव बरकरार रखने में कामयाब रहे, पर बेहद बदनामी के साथ पद से विदा लेने वाले बिल क्लिंटन भी अच्छा-खासा अर्जन कर लेते हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा माई लाइफ  से काफी धन कमाया। इसकी 22.5 लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। उन्हें इससे लगभग दो करोड़ डॉलर तो अग्रिम कमाई हुई थी। वह और उनकी पत्नी हिलेरी क्लिंटन ने ‘पेड लेक्चर’ के जरिए फरवरी 2001 से 2016 में हिलेरी के राष्ट्रपति चुनाव लड़ने तक 729 व्याख्यानों से 15 करोड़, 30 लाख डॉलर से अधिक की कमाई कर ली थी। क्लिंटन दंपति की कुल कमाई में करीब 60 फीसदी व्याख्यानों और किताबों से आती है।

ऐसा नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति सदा-सर्वदा से ह्वाइट हाउस छोड़ने के बाद इसी तरह अपनी झोलियां भरते आए हों। अमेरिका को उद्धत राष्ट्रवाद की झोली में डालने वाले रोनाल्ड रीगन की इस मामले में खासी लानत-मलामत हुई थी। हुआ कुछ यूं था कि ह्वाइट हाउस में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद वह जापान में व्याख्यान देने गए। खबर उड़ी कि इसके बदले में उन्होंने 20 लाख डॉलर की मोटी रकम वसूली है। अमेरिकी भद्रलोक को तब यह नागवार गुजरा और उनकी लानत-मलामत शुरू हो गई। नतीजतन, रीगन साहब ने कसम खा ली कि अब वह किसी सार्वजनिक व्याख्यान का हिस्सा नहीं बनेंगे।


अब तो हमारे देश में भी यह प्रचलन जोर पकड़ रहा है। यह बात अलग है कि हमारे यहां विचारपूर्ण व्याख्यान देने वाले राजनेताओं की खासी कमी है। कइयों को तो इसके जरिए धन उपार्जित करने की जरूरत भी नहीं है। उनके आयकर रिटर्न गवाह हैं कि राजनीति में वे कंगाली का रोना रोते हुए आए थे और देखते-देखते अरबों के आसामी बन बैठे। मतदाता इसलिए भी उन पर जान छिड़कते हैं, क्योंकि राजनीति हमारे यहां अभी सामंती सत्ता और उससे जुड़ी ऐशो-इशरत का जरिया मानी जाती है। बहुत दूर क्यों जाएं, बिहार में इस समय चुनाव का माहौल है। वहीं पर नजर डाल देखते हैं। ‘असोसिएशन फॉर डेमोके्रटिक रिफॉम्र्स’(एडीआर) द्वारा जारी आंकड़ों में दावा किया गया है कि पहले चरण में दोनों मुख्य गठबंधनों के लगभग साठ फीसदी उम्मीदवार करोड़पति हैं। इनके पास एक से लेकर साठ करोड़ रुपये तक की संपत्ति है। यही नहीं, पिछले साल चुनाव आयोग में जो हलफनामे दिए गए थे, उनके आधार पर एडीआर ने बताया कि मौजूदा लोकसभा के 539 में 475 सांसद करोड़पति हैं। 

उम्मीद है, अब आप समझ गए होंगे, मैंने इस लेख की शुरुआत में बोरिस जॉनसन के फैसले को आश्चर्यजनक क्यों बताया था। 


यहां एक बात और साफ कर दूं। संसद और विधान मंडलों में करोड़पतियों की आमद में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते देश की जनता भी उनकी तरह खुशहाल हो। अफसोस! 107 देशों के ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ में भारत 94वें स्थान पर आता है और हमारी प्रति-व्यक्ति आय महज एक लाख, 35 हजार रुपये सालाना है। 25 करोड़ से अधिक लोग गरीबी की रेखा के नीचे बसर करते हैं। यह गरीबी की रेखा भी कहां से शुरू होती है, जानकर आश्चर्य होगा। 32 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाले को हमारी हुकूमतें निर्धन नहीं मानतीं। वे यह भी नहीं मानतीं कि इतने में दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं, शिक्षा और सेहत तो दूर की बात है। भारत इस मामले में अलबेला रहा है, जहां की जनता गरीब है और जन-प्रतिनिधि अमीर।

क्या मैं ऐसे राजनेताओं से बोरिस जॉनसन के बहाने अपने अंदर झांकने की गुस्ताख गुजारिश कर सकता हूं?


सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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अमेरिकी सहयोग से बढ़ती सुरक्षा

अरविंद गुप्ता, पूर्व डिप्टी एनएसए, डायरेक्टर, वीआईएफ 

भारत और अमेरिका के बीच मंगलवार को नई दिल्ली में 2 प्लस 2 वार्ता का तीसरा दौर पूरा हुआ। पहली वार्ता 2018 में हुई थी, तो दूसरी 2019 में। कह सकते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका-भारत के संबंधों में जो तीव्र विकास दिखा है, यह वार्ता एक तरह से उसकी अहम कड़ी है। इसलिए दोनों ही पक्ष इसे बहुत अधिक महत्व दे रहे हैं। 

तीसरी वार्ता पिछली दो वार्ताओं में लिए गए दूरगामी निर्णयों को आगे बढ़ाने और पुख्ता करने में महत्वपूर्ण योगदान करेगी। इस वार्ता का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि अभी चीन व भारत के बीच सीमा पर तनाव है और दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। चीन का जो आक्रामक रुख है, उसे दक्षिण चीन सागर और पूर्वी सागर में भी देखा जा सकता है, जहां जापान के साथ भी चीन का तनाव चल रहा है। अमेरिका ने चीन की इस संदर्भ में कड़ी आलोचना भी की है।

डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में चीन और अमेरिका के आपसी संबंधों में बहुत गिरावट आई है। दोनों देशों में व्यापार युद्ध चल रहा है। तकनीकी और व्यापार, दोनों ही मोरचों पर दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ चुका है। इसका दूरगामी असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। 

यह सब कोविड-19 के परिदृश्य में हो रहा है। अमेरिका ने चीन को विश्व में कोरोना वायरस फैलाने के लिए सीधे जिम्मेदार माना है। इस महामारी ने विश्व व्यवस्था पर गहरा असर डाला है। वैश्विक आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई है। लाखों लोग मारे गए हैं। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में देखें, तो इस तीसरी 2प्लस 2 वार्ता का महत्व बहुत बढ़ जाता है। यानी, इस वार्ता की पृष्ठभूमि में तीन बातें हैं, पहली, चीन-भारत के बीच लद्दाख क्षेत्र में भीषण तनाव, दूसरी, चीन का आक्रामक रुख, और तीसरी, कोविड-19 महामारी का वैश्विक दुष्प्रभाव।

भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा सहयोग काफी बढ़ चुका है, खासतौर से वर्ष 2005 के बाद से, जब दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु सहयोग पर सहमति बनी थी। इसके बाद दोनों देशों ने 2006 में एक रक्षा कार्य-ढांचे संबंधी समझौते पर भी हस्ताक्षर किए थे। अमेरिकी विदेशी मंत्री माइक पोम्पियो की हालिया भारत यात्रा और इस 2प्लस2 वार्ता में खास बात यह भी रही कि दोनों पक्षों ने एक बुनियादी आदान-प्रदान और सहयोग समझौता यानी बेका (बीईसीए) एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता अपनी शृंखला में चौथा है। इस पर हस्ताक्षर के बाद अमेरिका-भारत की सेनाओं में सूचनाओं का आदान-प्रदान बढ़ जाएगा। महत्वपूर्ण सैटेलाइट डाटा और रक्षा सूचनाओं को साझा करने के लिए भी सहयोग बढ़ेगा। दोनों देशों की सेनाओं में समन्वय इस कदर मजबूत होगा कि आपसी युद्धाभ्यास की गुणवत्ता पर इसका गहरा और सकारात्मक असर पड़ेगा। यह एक बड़ी उपलब्धि है। इससे दोनों देशों को क्षेत्रीय सुरक्षा के मसलों पर सहयोग करने में मदद मिलेगी।

एक और महत्वपूर्ण बात। वार्ता के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत चाहता है, रक्षा उत्पादन क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश करें। उनकी कंपनियां यहां आएं और अपने हथियार व औजार भारतीय कंपनियों के सहयोग से यहां बनाएं, ताकि भारत को फायदा हो। यहां जो निर्माण हो, अमेरिका की सेनाएं भी उनका उपयोग करें। अगर ये बातें साकार होती हैं, तो एक बड़ी कामयाबी हमारे हिस्से आएगी।

गौर करने की बात यह है, इस वार्ता से पहले कुछ महत्वपूर्ण राजनयिक घटनाएं इंडो-पैसिफिक के संदर्भ में हुई हैं। पिछले दिनों टोक्यो में क्वाड की बैठक हुई, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच विदेश मंत्री स्तर की वार्ता हुई और उसके बाद भारत ने ऑस्ट्रेलिया की नौसेना को मालाबार युद्धाभ्यास में शामिल होने का न्योता दिया। भारत और अमेरिका, दोनों मुक्त और खुले इंडो-पैसिफिक के पक्ष में हैं, जहां अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक एक व्यवस्था कायम हो और समुद्री व हवाई-मार्गों से आने-जाने में रोक-टोक न हो।

जाहिर है, चीन इन बदलते घटनाक्रम को गौर से देख रहा है। उसे थोड़ी घबराहट भी हुई है। यही वजह है कि उसकी तरफ से यह बयान आया है कि क्वाड के तहत एकत्र चारों देश नाटो का एशियाई संस्करण तो नहीं बना रहे? हालांकि, भारत की ओर से जो वक्तव्य रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेशी मंत्री एस जयशंकर ने दिए हैं, उनमें चीन की खुलकर बात नहीं की गई है। हां, अमेरिकी पक्ष ने जरूर चीन की चर्चा की है। 

इस वार्ता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दोनों देश मैरीटाइम डोमेन, साइबर और अंतरिक्ष क्षेत्रों में अपना सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। इसका मतलब यह है कि अब दोनों देशों को यह पता रहेगा कि कौन जहाज कहां है? समुद्र में कहां-क्या चल रहा है? आदि। इन सबके बारे में सूचनाएं परस्पर साझा होंगी। दोनों पक्षों ने आतंकवाद के विरुद्ध भी बात की है। 

भारत का यह फैसला लेना भी दिलचस्प है कि हमारा एक नौसेना अधिकारी अमेरिका की सेंट्रल कमांड में पोस्टेड होगा, जो बहरीन में है, जबकि अमेरिका का एक सैन्य अफसर भारत स्थित इंटरनेशनल फ्यूजन सेंटर में बैठेगा, जहां हिंद महासागर में तमाम जहाजों की सूचनाएं दर्ज होती हैं। 

इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका के साथ हमारा सहयोग बढ़ रहा है, क्योंकि चीन की हरकतों से क्षेत्र में तनाव बढ़ रहा है। सभी देश चाहते हैं कि चीन पर लगाम लगे। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी इशारा किया कि दुनिया बहुधु्रवीय हुई है और कहीं ऐसा न हो कि एशिया एकधु्रवीय हो जाए। इसलिए चीन की आक्रामकता को रोकना जरूरी है। उसे नहीं रोका गया, तो उसका सीधा असर भारत पर होगा। बहरहाल, नवंबर में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में सत्ता-परिवर्तन से अमेरिका के लिए भारत के महत्व में कोई कमी नहीं आएगी और जो समझौता अभी हुआ है, वह आगे भी बहुत मायने रखेगा। इससे दोनों देशों के बीच वार्ता और सहयोग बढ़ेगा।  

    (ये लेखक के अपने विचार हैं) 


सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Editorials : शक्ति और मर्यादा संजोने का समय

प्रयाग शुक्ल, कवि और कला मर्मज्ञ

अब नवरात्र के दिनों में पुराना बंगाल खूब याद आता है। 1950 के दशक के शुरुआती वर्षों में बिजली आपूर्ति शुरू नहीं हुई थी, तेल से जलने वाली बड़ी-बड़ी बत्तियां रखी जाती थीं, खूब रोशनी होती थी, वह चकाचौंध आज भी याद है। बार-बार पंडाल जाने का वह उत्साह, भाई, बहन, चचेरे, ममेरे, फुफेरे, आस-पड़ोस के सब बच्चे मिलकर उत्सव मनाते थे। नए-नए वस्त्र पहनकर निकलते थे, तरह-तरह के भोग-पकवान मिलते थे। हर समाज के लोग, हर धर्म के लोग दुर्गा पूजा में शामिल होते थे, कभी कोई भेद महसूस नहीं होता था। पूरा गांव, शहर अपना सा लगने लगता था। परस्पर प्रेम और समन्वय का  भाव उमड़ आता था। बांग्ला समाज जैसे-जैसे भारत और दुनिया भर में फैला, दुर्गा पूजा का भी वैसे-वैसे फैलाव हुआ है। बंगाल के बाद दिल्ली के चितरंजन पार्क में भी बांग्ला संस्कृति की भव्यता दुर्गा पूजा के दौरान देखते बनती है। 


आज आयोजन बडे़ होते जा रहे हैं, लेकिन भाव में कमोबेश कमी होती जा रही है। शक्ति और देवी का अर्थ लोग भूलते जा रहे हैं। समय के साथ, महिला सुरक्षा में बहुत अंतर आया है। अपने युवा दिनों में कोलकाता में मैंने छेड़छाड़ या दुव्र्यवहार की घटनाएं कभी सुनी नहीं। बांग्लाभाषी समाज के साथ ही दूसरे शहरों में भी पहले ऐसी बातें चिंता की वजह नहीं बनी थीं। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदली हैं, दुव्र्यवहार की घटनाएं भी बढ़ी हैं और प्रतिकार भी बढ़ा है। बदलाव इस अर्थ में भी आया है कि स्त्री शक्ति की बात बहुत की जाने लगी है। बंगाल में तो छोटी बच्ची को भी ‘मां’ कहते हैं। घरों में महिलाओं का बहुत सम्मान रहा है। सामाजिक व्यवहार और सुधार में बांग्लाभाषी समाज आदर्श रहा है। इस समाज ने सबसे पहले लड़कियों को बाहर निकाला। साल 1962-63 में जितनी लड़कियां कोलकाता में तब दिखती थीं, उतनी दिल्ली आकर नहीं दिखीं। दिल्ली में तो यह हालत थी कि कॉफी हाउस में यदि कोई महिला चली जाती थी, तो लोग अचरज से देखने लगते थे। बहरहाल, हालत पहले जैसी नहीं रही, स्त्रियां बहुत सजग हुई हैं। अब तो संदेश ही यही है कि पुरुष सत्तात्मक समाज से बाहर निकलो। मां की पूजा करो, मां से बाहुबल लो, जैसे वह असुरों का दमन करती थीं, वैसे ही तुम भी करो। 


बंगाल में एक और परंपरा है, हर दैनिक समाचारपत्र के पूजा अंक निकलते थे, कुछ अब भी निकलते हैं, जिनकी तैयारी साल-दो साल पहले से ही शुरू हो जाती थी। लेखकों को बाकायदे टिकट देकर नैनीताल, मसूरी भेज देते थे कि जाइए, हमारे लिए उपन्यास लिख लाइए। बडे़ चित्रकारों से मुख पृष्ठ तैयार करवाए जाते थे। करीब 12-15 साल पहले की बात है कि एक दैनिक ने चित्रकार अर्पिता सिंह से कवर बनवाया। वह कवर बहुत चर्चित रहा था। उन्होंने दुर्गा के हाथों में पिस्तौल थमा दी थी। पत्रिका ने उसे प्रकाशित किया था, उसमें गहरा संदेश था। साधारण स्त्री की तरह दिखने वाली दुर्गा लोगों को खूब पसंद आईं, तो कुछ ने कहा कि ये तो हिंसा की बात कर रही हैं, लेकिन वास्तव में यह तो प्रतीक था। आज का अस्त्र है पिस्तौल। जब संकट आए, तो हरसंभव अस्त्र से अपना और सबका बचाव गलत नहीं। 

दुर्गा पूजा पर अपने देश में लगभग हर जगह सामयिक विषयों पर पंडाल बनाए जाते हैं। महिलाओं के साथ दुव्र्यवहार दर्शाने वाले पंडाल भी बनते रहे हैं। हालांकि, मेरी स्मृति में दशहरा या रावण दहन नहीं है, विजयादशमी जरूर है। पूजा के बाद देवी की प्रतिमाओं के साथ ही उनके चित्रों का भी विसर्जन होता है। रावण का उतना नहीं, महिषासुर मर्दन का ज्यादा महत्व है। विसर्जन बहुत धूमधाम से होता है। बंगाल के लोग जहां भी गए हैं, विसर्जन की परंपरा भी ले गए हैं। शुभ विजया नाम के कार्ड बनते हैं। लोग एक-दूसरे को शुभ विजया कहते हैं, यह भी बंगाल की विशेषता है। जिस तरह बंगाल की दुर्गा पूजा मशहूर है, ठीक उसी तरह से मैसूर का दशहरा, रामनगर की रामलीला, गुजरात का डांडिया, गरबा भी प्रसिद्ध है। कोरोना की वजह से इस बार धूमधाम कुछ कम लग रही है, वरना हरेक सोसायटी, मोहल्ले और गली में रावण दहन या रामलीला का प्रसार हो चुका है। उत्सव परस्पर मिल गए हैं, जैसे शक्ति और राम। खासकर उत्तर भारत में रामनवमी का बड़ा महत्व है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला राम की शक्ति पूजा को विशेष बना देते हैं-  

होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन।

कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन।

देवी की पूजा राम जी भी कर रहे हैं, उन्हें भी शक्ति की जरूरत पड़ रही है। इसी तरह के संबंधों में हमें अपनी परंपराओं को देखना चाहिए। उसके प्रतीक अर्थ में जाना चाहिए। प्रतीक के अर्थ गहरे हैं। पौराणिक, धार्मिक के रूप से न भी लें, कथाओं के रूप में भी लें, तो इस महोत्सव के भाव को समझने की जरूरत है। हमें विवादों से बचने की कोशिश करनी चाहिए। कुछ साल पहले बहस तेज हो गई थी, देवी महिषासुर का वध करती हैं और आप उत्सव क्यों मनाते हो? हम भूल जाते हैं कि यह मात्र प्रतीक है। यह बात बहुत ध्यान में रखने वाली है कि धार्मिक-सामाजिक आयोजनों को लेकर संकीर्णता बढ़ रही है। आपको हर बुराई का विरोध करना है, किसी भी तरह के अत्याचार का प्रतिकार, संहार करना है और अपने लिए सुरक्षा का घेरा बनाते चलना है। 

निराला की शक्ति पूजा एक जमाने में हममें से बहुतों को कंठस्थ थी, कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ इसका पाठ करते थे। निराला भी प्रतीकार्थों की ही बात करते हैं, वह एक पौराणिक घटना का उत्सव मना रहे हैं। मेरा मानना है, पौराणिक प्रसंगों में किसी जाति-बिरादरी के बारे में कुछ बातें आ भी जाती हैं, तो उसे उतनी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, प्रतीकार्थ देखने चाहिए। वरना हम ऐसी बहस में उलझ जाएंगे, जो बेमतलब होगी। शक्ति, विश्वास, श्रद्धा, मर्यादा का मोल हम समझेंगे, तो उत्सव और जीवन का सही आनंद ले पाएंगे। अच्छी बातों का अनादर हो रहा है, तो देखना होगा कि कमी कहां रह गई।

सारे उत्सव बच्चे बहुत उत्साह से मनाते रहे हैं। पहले हम उनसे विशेष रूप से मनवाते रहे थे, इसमें अब कमी आई है, इस पर ध्यान जाना चाहिए। प्रेमचंद की कहानी है, रामलीला , जिसमें एक बच्चा रामलीला देखकर मुग्ध हो जाता है। अब बच्चों में रोशनी को लेकर उत्साह रहता है, लेकिन उसका मूल अर्थ क्या है, जो बंगाल में अभी भी कमोबेश बना हुआ है, लेकिन दुर्भाग्य से उत्तर भारत में उतना नहीं है। बच्चों को सही रूप में अच्छी परंपराओं के अनुरूप ढालना होगा। शक्ति की समझ और मर्यादाओं का ज्ञान देना होगा, तभी वे वस्तुत: प्रेम, लगाव और उत्सव का सही अर्थ जान पाएंगे। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य  - हिन्दुस्तान।

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कैसी हो पुलिस, समाज तय करे (हिन्दुस्तान)

ओपीएस मलिक, सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी   

टेलीविजन रेटिंग प्वॉइंट्स (टीआरपी) घोटाले की आंच अब उत्तर प्रदेश तक पहुंच गई है। राज्य सरकार की सिफारिश पर हजरतगंज (लखनऊ) पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया है। टीआरपी में यदि गड़बड़ी हुई है, तो यह वाकई गंभीर अपराध है और अपराधियों को कानून के मुताबिक सजा मिलनी ही चाहिए। मगर इस घोटाले के दो अन्य पहलू भी हैं, जिन पर ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है। पहला पहलू मीडिया की आजादी से जुड़ा है, तो दूसरा, कानून लागू करने वाली एजेंसियों के कामकाज से। इन एजेंसियों में पुलिस, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई जैसी तमाम संस्थाएं शामिल हैं।

मीडिया अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर खुद को स्वतंत्र मानता है। इस मौलिक अधिकार का जिक्र संविधान के अनुच्छेद-19 में है। मगर 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के कुछ महीनों बाद ही यह महसूस किया जाने लगा था कि इस अधिकार को लोग असीमित मानने लगे हैं। इसीलिए 1951 में खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पहला संविधान संशोधन विधेयक लेकर आए, जिसमें कहा गया कि सार्वजनिक हित में मौलिक अधिकारों पर पाबंदी लगाई जा सकती है। नेहरू का कहना था कि ये बेशक सांविधानिक अधिकार हैं, लेकिन देश की सुरक्षा व सामाजिक हित के लिए एक सीमा के बाद इन अधिकारों पर पाबंदी जरूरी है। जब किसी एक का मौलिक अधिकार दूसरे व्यक्ति के अधिकार को प्रभावित करे, तो उस पर बंदिश लगनी ही चाहिए। नेहरू ने ये बातें मीडिया के संदर्भ में नहीं कही थीं, पर आज ये उस पर कहीं ज्यादा सटीक बैठ रही हैं। उनकी बातों का अर्थ यही था कि मौलिक अधिकार और उनके इस्तेमाल के बीच एक संतुलन आवश्यक है। 

दुर्भाग्य से, यही संतुलन आज बिगड़ता दिख रहा है। संविधान सभी से यह अपेक्षा करता है कि लोग उन कानूनों का पालन करेंगे, जो संविधान-विरोधी नहीं हैं। मगर जब ऐसा नहीं होता, तो पुलिसिंग शुरू हो जाती है। पुलिसिंग और पुलिस एजेंसी, दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं, इसे एक समझने की भूल कतई न करें। पुलिसिंग एक व्यापक विचार है, जिसमें कानून लागू करने वाली प्रक्रिया के सभी अंग आते हैं। यह दो तरह की होती है, आंतरिक और बाहरी। मीडिया के मामले में प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन या सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन जैसी संस्थाएं आंतरिक तौर पर रेग्यूलेट, यानी विनियमन का काम करती हैं। जबकि बाहरी पुलिसिंग का काम कानून लागू करने वाली एजेंसियों के जिम्मे है। अभी दिक्कत यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मौलिक अधिकारों का जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल नहीं हो रहा, जिस कारण बाहरी पुलिसिंग की जरूरत बढ़ती दिख रही है। मगर सवाल यह है कि जिसे यह जिम्मेदारी सौंपी जा रही है, वह एजेंसी इसके लिए कितनी तैयार है?

बेशक पुलिस कानून लागू करने वाली एकमात्र एजेंसी नहीं है, मगर आम धारणा में यह उसी का दायित्व माना जाता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि अपने यहां पुलिस सरकार का हिस्सा है, जबकि अमेरिका, जापान जैसे तमाम देशों में यह एक स्वायत्त संस्था है। इसी कारण अपने यहां पुलिस का सदुपयोग कम, दुरुपयोग ज्यादा दिखता है। इतना ही नहीं, अपने यहां पुलिस की जिम्मेदारी दोहरी प्रवृत्ति की है। वह नियुक्ति, तबादला, सेवा निवृत्ति जैसे कामों के लिए सरकार व राजनेताओं पर निर्भर है, जबकि कानून लागू करने के वास्ते न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह है। यह एक ऐसा भंवरजाल है, जिससे भारतीय पुलिस चाहकर भी नहीं निकल पा रही। पुलिस की इसी दोहरी प्रकृति का लाभ सरकार उठाती है। बाबरी मस्जिद ध्वंस इसका एक बड़ा उदाहरण है। 6 दिसंबर, 1992 को जब आयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, तब आनन-फानन में वहां के तत्कालीन डीएम और एसएसपी को निलंबित कर दिया गया था, लेकिन आज की तारीख में कानूनन कोई राजनेता या कोई इंसान इस घटना का कुसूरवार नहीं है। 

जाहिर है, लोकतंत्र में पुलिस के माध्यम से शासन करने का तरीका गलत है। स्थिति यह है कि आज पुलिस-प्रशासन को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष की अपनी-अपनी दलीलें हैं। जो आज सत्ता में है, वह विपक्ष में जाने पर वही भाषा दोहराता है, जो आज विपक्षी दल बोल रहे होते हैं। पुलिस सैद्धांतिक तौर पर ‘एजेंसी ऑफ लॉ’ (कानून लागू करने वाली संस्था) होती है, पर असलियत में उसे ‘रूलर्स एजेंसी’ (शासकों की एजेंसी) बना दिया गया है। नतीजतन, आज पुलिस जो कुछ भी करती है, हर किसी को यही लगता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे शख्स के इशारे पर वह हो रहा है। अब ‘अपराधी और पुलिस के गठजोड़’ जैसी बातें बेमानी हो चुकी हैं। इससे भी खतरनाक गठजोड़ ‘पुलिस और राजनेता’ का बन चुका है। लिहाजा समाज को ही यह सोचना होगा कि उसे कैसी पुलिस चाहिए? मीडिया से अपेक्षा होती है कि वह समाज को इस बाबत जागरूक करेगा, लेकिन दुखद है कि उसे भी पूरी जानकारी नहीं है। 

आजकल हम यह चर्चा तो खूब करते हैं कि अपने यहां एक लाख की आबादी पर सिर्फ 144 पुलिसकर्मी हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र कम से कम 222 पुलिसकर्मियों की वकालत करता है। मगर हम अपने समाज की प्रकृति पर बहस नहीं करना चाहते। स्वीडन में पुलिस की उतनी जरूरत नहीं होती। नॉर्वे, डेनमार्क जैसे देशों में भी नाममात्र के पुलिसकर्मी दिखेंगे। इसका अर्थ है कि उन समाजों को पुलिसिंग के लिए पुलिस की उतनी जरूरत नहीं है। लोग खुद-ब-खुद नियम-कानूनों का पालन करते हैं। आदर्श स्थिति भी यही है कि समाज में पुलिस का कम से कम दखल हो, लेकिन अपने यहां हालात उलट हैं। 

सन1980 के आसपास जब मैं मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) में तैनात था, तब स्थानीय लोग यह पूछने भी आते थे कि वे त्योहार मनाएं कि नहीं? ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्हें अपने आसपास सीआरपीएफ या केंद्रीय बल की तैनाती नहीं दिखती थी। वे आश्वस्त होना चाहते थे कि सब ठीक-ठाक रहेगा। मानो, त्योहार इन टुकड़ियों को मनाना हो, उन्हें नहीं! 

साफ है, एक जागरूक समाज ही अच्छी पुलिसिंग की व्यवस्था कर सकता है। मगर दुर्भाग्य से हमारा समाज इसके लिए तैयार नहीं है, और पुलिस भी उत्तरोत्तर शासन का हिस्सा बनती जा रही है, जिससे होने वाली गड़बड़ियां हमारे सामने हैं। हमें यह मान लेना चाहिए कि जब पुलिस को राजनीतिक पार्टी का हिस्सा बना दिया जाएगा, तब सदुपयोग से ज्यादा उसके दुरुपयोग होंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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पाक में पहली बार निशाने पर सेना (हिन्दुस्तान)

विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी 

क्या इमरान खान की उल्टी गिनती शुरू हो गई है? जो विश्लेषक पाकिस्तानी समाज और राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं, उनमें से कुछ कह सकते हैं कि अभी सटीक अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी, पर ज्यादातर इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में देंगे। घटनाएं उसी तरह घट रही हैं, जैसे साठ के दशक से अलग-अलग निर्वाचित सरकारों के अपदस्थ होने के पहले घटती रही हैं। जुल्फिकार अली भुट्टो, नवाज शरीफ या बेनजीर भुट्टो की सरकारों को बर्खास्त करने के पहले विरोधी दलों के गठबंधन बने, लोग सड़कों पर निकले, सेना और न्यायपालिका ने सरकार को अपने हथकंडों से अपंग बनाया और फिर उसे बर्खास्त करा दिया गया। इस बार भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो रहा है, फर्क सिर्फ इतना है कि पहले फौज के प्रोत्साहन से गठबंधन बनते थे और उसकी मर्जी से ही लोग सड़कों पर निकलते थे, मगर इस बार गठबंधन उसके बावजूद बना है। पिछले दिनों पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) के नाम से बना गठबंधन वैसे तो एक-दूसरे की मुखालिफ सियासी पार्टियों का जोड़ है, पर सेना के प्रति गुस्सा उन्हें एक किए हुए है।

लगभग दो साल पहले जिन परिस्थितियों में इमरान देश के प्रधानमंत्री बने, उसे समझने के लिए पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बिलावल भुट्टो जरदारी द्वारा नेशनल असेंबली के पहले ही सत्र में इस्तेमाल किया जाने वाला एक जुमला काफी होगा। नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री इमरान खान को बधाई देते हुए बिलावल ने उन्हें ‘सेलेक्टेड प्राइम मिनिस्टर’ कहा। यह जुमला इमरान के साथ ऐसा चिपका कि आज तक लोग यह मानने कोे तैयार नही हैं कि वह जनता द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं। जनता के बडे़ तबके की धारणा है कि उन्हें पाक सेना ने चुना है।

सरकार मुखालिफ पिछले गठबंधनों की ही तरह पीडीएम ने भी मुख्य कार्यक्रम जनता को सड़क पर उतारने का बनाया। चंद माह पहले पीडीएम के अध्यक्ष और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम(एफ) के नेता मौलाना फजलुर रहमान सरकार के खिलाफ देश भर में रैलियां निकाल चुके थे और किसी ईमानदार गठबंधन के अभाव में असफल हो चुके थे। इस बार भी उम्मीद यही थी कि ऊपर से एकता की बात करने वाली पार्टियां अंदरखाने फौज से दोस्ती के मौके तलाश रही होंगी। आखिर शरीफ और जरदारी परिवार के कई सदस्य जेल मे हैं और पाकिस्तानी समाज का यथार्थ समझने वाले जानते हैं कि फौज की हरी झंडी के बिना उनकी मुक्ति संभव नहीं है। पीडीएम की पहली रैली नवाज के गढ़ पंजाब के गुजरांवाला मे 16 अक्तूबर और दूसरी जरदारी के गढ़ कराची में 18 अक्तूबर को रखी गईं।

गुजरांवाला की रैली में लंदन से प्रसारित नवाज शरीफ के भाषण ने उस धारणा को ध्वस्त कर दिया, जिसके अनुसार कई चैनलों का मानना था कि फौज और आईएसआई ने नवाज के साथ सुलह की एक खिड़की खुली रख छोड़ी है। एक पाकिस्तानी चैनल के मुताबिक, सेना के प्रतिनिधि, लाहौर कैंटोनमेंट में स्थित एक मस्जिद के इमाम और नवाज के विश्वस्त पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी के बीच बातचीत काफी आगे तक बढ़ चुकी है और फौज ने इमरान खान को हटाने का मन बना लिया है। कुछ महीने पहले कैदी नवाज को इलाज के नाम पर लंदन जाने की इजाजत इसी सुलह वार्ता का नतीजा बताया जा रहा था। मगर 16 अक्तूूबर को अपने भाषण में सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा और आईएसआई चीफ लेफ्टिनेंट जनरल फैज के नाम लेकर नवाज शरीफ ने जिस तरह ललकारते हुए कहा कि उनकी लड़ाई इमरान खान से नहीं, बल्कि उन्हें सेलेक्ट करने वालों से है, उससे कुछ देर के लिए मंच पर सन्नाटा छा गया। अब तक कहा जाता रहा कि इमरान खान सेलेक्टेड प्राइम मिनिस्टर हैं, किंतु सेलेक्टर का नाम लेने का हौसला नवाज शरीफ ने भी पहली बार दिखाया। जनता की नब्ज पहचानने वाले राजनेता की तरह नवाज ने लोगों से पूछा कि उनकी सरकार को किसने हटाया और सेलेक्टेड पीएम को किसने चुना, तो भीड़ की तरफ से पहले कुछ सहमी आवाज में उत्तर आया- फौज; और जब उन्होंने ललकारते हुए सवाल दागने शुरू किए, तो श्रोताओं ने भी जोश में हाथ उठा-उठाकर जनरल साहेबान के नाम लेने शुरू कर दिए।

गुजरांवाला रैली की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि 18 अक्तूबर को कराची की रैली का दिन आ गया। सिंध में पंजाब से उलट पीडीएम के एक घटक पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का शासन है और अंदरूनी सिंध में उसका असर जबर्दस्त है, इसलिए उम्मीद के मुताबिक भीड़ भी खूब आई और उसमें जोश भी खूब दिखा, पर मजेदार बात यह थी कि इस बार जलसा लूटा मरियम नवाज ने। कुछ अज्ञात कारणों से लंदन में बैठे नवाज शरीफ का भाषण प्रसारित नहीं हो सका, पर मरियम ने गुजरांवाला की लाइन को आगे बढ़ाते हुए फौज पर हमला बोला। फर्क सिर्फ इतना था कि उन्होंने दोनों जनरलों के नाम नहीं लिए। इसकी जरूरत भी नहीं रह गई थी। सेलेक्टर कहने से ही जनता मतलब समझ जाती है। मरियम ने चालाकी से कोर कमांडरों को सेना के अधीनस्थ अफसरों से अलग कर यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी लड़ाई सेना से नहीं, बल्कि उनके पिता को हटाने का फैसला करने वालों से है। सभी जानते हैं, पाकिस्तान में बडे़ नीतिगत फैसले मंत्रिमंडल नहीं, कोर कमांडरों की समिति करती है। 

मरियम से भी ज्यादा बेबाकी दिखाई मौलाना फजलुर रहमान ने। उनका अब तक का सियासी सफर खुफिया एजेंसियों की छत्रछाया में तय हुआ । मगर उन्होंने भी फौज पर हमला करने में गुरेज नहीं किया। उनके भाषण का यह अंश मीडिया में सर्वाधिक उद्धृत हो रहा है कि अगर फौज नहीं चाहती कि चौराहों पर उसका नाम उछले, तो उसे राजनीति में भाग लेने से बचना चाहिए।

इन दोनों रैलियों में जो कुछ हुआ, वह पाकिस्तान के इतिहास में अभूतपूर्व था। कुछ वर्ष पहले जब एमक्यूएम नेता अल्ताफ हुसैन ने सेना के खिलाफ बोलने की जुर्रत की थी, तब सेना ने उनके साथ क्या सुलूक किया था, किसी से छिपा नहीं है। फिर नवाज शरीफ जैसे मंजे हुए राजनीतिज्ञ ने कैसे ऐसा दुस्साहस किया? कयास लगाए जा रहे हैं। एक चैनल इसके पीछे चीन का इशारा देख रहा है, जो सीपीसी की धीमी प्रगति से असंतुष्ट है, तो दूसरे हल्के जनता में इमरान के खिलाफ बढ़ते असंतोष को वजह मान रहे हैं। कुछ भी हो, निर्णायक लड़ाई शुरू हो गई है। सेना ने गुजरांवाला के दूसरे दिन मरियम के पति कैप्टन सफदर को गिरफ्तार करा दिया, पर क्या पीडीएम के दूसरे नेताओं के खिलाफ भी दमनात्मक कार्रवाई हो सकेगी? शायद नहीं, क्योंकि तब आशंका है कि ‘गो इमरान गो’ नारा ‘गो बाजवा गो’ में बदल सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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हमारी संप्रभुता (हिन्दुस्तान)

सोशल मीडिया साइट्स की निगरानी दिन-प्रतिदिन आवश्यक होती जा रही है। एक संप्रभु देश की आजादी और उदारता के साथ ट्विटर ने जो खिलवाड़ किया, उसका जवाब कुछ देर से ही सही, भारत सरकार के आईटी सचिव ने दे दिया है। करीब तीन दिन पहले ही ट्विटर की कमी सामने आ गई थी और नागरिक स्तर पर ही काफी विरोध के बाद ट्विटर ने अपनी बड़ी खामी को तकनीकी कमी बताकर बचने की कोशिश की थी। भारत में लोकप्रिय हो चुकी एक सोशल साइट का ऐसा चलताऊ नजरिया भत्र्सना-लायक है।


 यह पहली बार नहीं है कि लेह-लद्दाख के क्षेत्र को  ट्विटर न केवल जम्मू-कश्मीर का हिस्सा बता रहा है, बल्कि जम्मू-कश्मीर को रिपब्लिक ऑफ चाइना में दिखा रहा है। इस मामले में ट्विटर की कोशिश अनजान बने रहने की लगती है, इसलिए नागरिकों की शिकायत की उसे ज्यादा परवाह नहीं है। भारत में लद्दाख आज केंद्र शासित प्रदेश है, जिसकी राजधानी लेह है। लद्दाख अब कतई जम्मू-कश्मीर का हिस्सा नहीं है।


 अव्वल तो ट्विटर ने अभी तक लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश नहीं माना है, इसके बावजूद यह कंपनी भारत में सेवाएं दे रही है? दूसरी बात, लेह को जम्मू-कश्मीर का हिस्सा बताना और साथ ही चीन में बता देना तो देश की संप्रभुता के साथ खिलवाड़ है। 

अगर किसी एक कंपनी को हम अपने देश के नक्शे से खिलवाड़ करने देंगे, तो फिर अराजकता फैलने से कैसे रोकेंगे? क्या हमारी खुफिया या आईटी एजेंसियों को इस बात का एहसास नहीं है कि लेह-लद्दाख को चीन का हिस्सा कैसे दर्शाया जा सकता है? जो दावा साम्राज्यवादी चीन भी नहीं करता, उसे कोई कंपनी अपने ग्राहकों को कैसे दुस्साहस के साथ दिखा-बता सकती है? उस कंपनी में कौन लोग हैं, जिन्हें न भारत के भूगोल का ज्ञान है, न इतिहास का? संप्रभुता के साथ ऐसे खिलवाड़ को कतई हल्के में नहीं लेना चाहिए। नागरिकों को यह शिकायत का मौका नहीं मिलना चाहिए, यह देखना स्वयं सरकार का काम है कि कोई भी कंपनी अगर भारत में सेवा दे, तो वह भारतीय भूगोल, इतिहास और संविधान की पालना करे। 


यह सवाल बड़ा है कि क्या ट्विटर यही हिमाकत चीन में कर सकता है? क्या ऐसी हिमाकत अमेरिका में मुमकिन है? जब इन देशों के साथ खिलवाड़ संभव नहीं, तब भारत के साथ क्यों? विदेशी कंपनियों को भारत के बड़े बाजार का लाभ देते हुए भारत की उदारता का भी लाभ कतई नहीं देना चाहिए, जबकि ऐसा लगता है कि वे अधिकतम सीमा तक लाभ ले रही हैं। बेशक, विदेशी मूल की कंपनियां भारतीय गरिमा को लेकर बाद में जागेंगी, पहले भारतीय एजेंसियों को आंख-कान खुले रखने होंगे।

ठीक इसी तरह की शिकायत कई बार अरुणाचल प्रदेश से भी आती है, जहां चीन निर्मित कुछ मोबाइल सेट और उसके कुछ ऐप भारत की बजाय चीन की सेवा के लिए उत्सुक नजर आते हैं। ऐसे मामलों को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत है। जो कंपनियां बहुत सफाई से तकनीकी खामी का बहाना बनाकर किसी और देश की चौधराहट को तुष्ट कर रही हैं, उन्हें बहुत साफ तौर पर कड़ा संदेश देना होगा। जब सूचना युद्ध चल रहा है, तब साइबर संसार में अपने क्षेत्र की रक्षा करना हमारा दायित्व है। साइबर संसार में अगर हम हार मान लेंगे, तो असली संसार में हमारे लिए मुसीबतें बढ़ती चली जाएंगी।

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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अमेरिका में अब तक का सबसे विभाजनकारी चुनाव (हिन्दुस्तान)

सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत 

अधिकांश अमेरिकी नागरिक अपने देश के असाधारणवाद पर गर्व करते हैं। उनका मानना है, अमेरिका में बहुत कुछ ऐसा है, जो विरल और अतुलनीय है। सबसे पुराना लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून का शासन, मानवाधिकार, विभिन्न जाति, धर्म, जातीयता, भाषा व दुनिया के विभिन्न हिस्सों की अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं से आए लोगों को स्वीकार लेना दुर्लभ है। हालांकि, राष्ट्रपति पद के दो उम्मीदवारों की सियासी बयानबाजी के बिगड़े बोल, निजी आक्षेप और एक-दूसरे के खिलाफ लगाए गए आरोप-प्रत्यारोप सवालिया निशान लगा रहे हैं। लोगों को डराने, विभाजित करने केलिए जाति, धर्म, जातीयता और राजनीतिक विचारधारा के इस्तेमाल से स्व-घोषित अमेरिकी असाधारणवाद पर सवाल खडे़ होने लगे हैं।

डोलाल्ड ट्रंप और जो बिडेन, दोनों ने एक-दूसरे के शरीरिक-मानसिक स्वास्थ्य और नैतिकता पर सवाल उठाए हैं। ट्रंप के चुनाव अभियान में कथित रूप से एक झूठे वीडियो का उपयोग भी हो रहा है, जिसमें बिडेन को व्हील चेयर पर बढ़ी उम्र के साथ दिखाया जा रहा है। दूसरी ओर, बिडेन के समर्थक कोविड-19 से निपटने में ट्रंप की अयोग्यता को दर्शाने में जुटे हैं, जिसकी वजह से 2,20,000 से ज्यादा अमेरिकियों की जान गई है, इतने अमेरिकी तो वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान, लीबिया व सीरिया में भी नहीं मरे। ट्रंप के आयकर रिटर्न, उनकी सेहत के बारे में अपारदर्शिता को भी विपक्ष निशाना बना रहा है। अपने खिलाफ किसी भी  रिपोर्ट, टिप्पणी को ट्रंप नकली समाचार बताकर खारिज कर दे रहे हैं। उनकी कुछ टिप्पणियों को अभद्र भाषा के संदेह में फेसबुक, ट्विटर ने बाधित किया है। कुछ लोग इसे सियासी शालीनता के लिए पहचाने जाने वाले देश में बीमार बहस के रूप में देख रहे हैं। राष्ट्रपति पद के पूर्व उम्मीदवार मिट रोमनी कहते हैं, कई अमेरिकी अपने देश के लिए भयभीत हैं, इसलिए विभाजित हैं, नाराज हैं, हिंसक हैं। 

दिलचस्प रूप से यह अमेरिकी चुनाव भारतीय चुनावों की तरह ज्यादा लग रहा है। भारत में चुनाव अभियान विकास के एजेंडे पर जोर देते हुए शुरू होता है, लेकिन जैसे-जैसे मतदान पास आता है, ऐसा हर कार्ड, हर तरीका, हर मुद्दा इस्तेमाल किया जाता है, जो मतदाताओं को आकर्षित कर सके। भारत में साल 2019 के संसदीय चुनावों से पहले बहुत से उम्मीदवारों ने खुले तौर पर कहा कि अगर कांग्रेस पार्टी जीती, तो इस्लामाबाद में लड्डू बंटेंगे। यह बताने की कोशिश हुई थी कि कांग्रेस देशभक्त पार्टी नहीं है। इसी तरह, ट्रंप अपनी रैलियों में कह रहे हैं कि उनके खिलाफ किया गया वोट चीन के पक्ष में जाएगा। ऐसा कहते हुए उनकी कोशिश है कि वह चीन के विरुद्ध भड़की भावनाओं का लाभ उठाएं। साथ ही, वह यह भी कह रहे हैं कि बिडेन चीन के विरुद्ध अमेरिकी हितों को पूरा नहीं कर पाएंगे। 

साल 2019 चुनाव से पहले भारत में कुछ संसदीय क्षेत्रों में हमने यह अफवाह सुनी थी, जिन्हें कुछ संगठनों ने बढ़ावा दिया था। लोगों को डराया गया कि अर्बन नक्सल घरों में घुस जाएंगे और समाज की शांति भंग कर देंगे। क्या ट्रंप भी ऐसी ही बातें नहीं कर रहे? लोगों को वह कह रहे हैं, अगर बिडेन को वोट किया, तो वामपंथी उनके घरों पर हमला कर देंगे, कानून-व्यवस्था पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। उनके अनेक भाषण विभेदकारी और भड़काऊ रहे हैं, जो पुलिस ज्यादती के शिकार लोगों के पक्ष से ज्यादा पुलिस के पक्ष में लगते हैं। कई अप्रिय मुद्दे चुनाव में उठ रहे हैं। फेक न्यूज, फेक फोटो, अपुष्ट दावों-आरोपों का इस्तेमाल खूब हो रहा है।  

फिर भी बचे हुए दिनों में ट्रंप अगर बिडेन के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में कुछ साक्ष्य नहीं जोड़ पाते, तो जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, वह अपने तमाम दावों के बावजूद मौका गंवा देंगे। कुछ रिपब्लिकन सीनेटरों को तो लगता है, वह न सिर्फ हारेंगे, बल्कि सीनेट को भी साथ ले जाएंगे। ट्रंप ने यह महसूस कर लिया है, साल 2000 के राष्ट्रपति चुनाव की तरह ही दो प्रतियोगियों के भाग्य का फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ सकता है। इसलिए भारी विरोध के बावजूद  उन्होंने रिपब्लिकन समर्थक एमी कोनी बैरेट को सुप्रीम कोर्ट में नामांकित किया है।

हालांकि सौभाग्य से, जो भी जीते, प्राकृतिक साथी के रूप में उसे भारत की तलाश रहेगी। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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लॉकडाउन ने बढ़ाई मोटापे से जूझ रहे लोगों की परेशानी, मानसिक सेहत पर भी पड़ा बुराअसर (हिन्दुस्तान)

एजेंसी,वाशिंगटन 

कोरोना महामारी ने दुनियाभर में लोगों की नींद और चैन छीन लिया है। संक्रमण की वजह से शुरुआत में लगे लॉकडाउन के चलते लोगों की जीवनशैली में अनचाहे बदलाव आए। एक नए शोध के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान लोगों के खान-पान में आए बदलाव के चलते मोटापे से जूझ रहे लोगों को सबसे ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसके चलते नींद भी बुरी तरह प्रभावित हुई।


अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन से यह खुलासा हुआ है। जर्नल ओबेसिटी में प्रकाशित इस अध्ययन ने महामारी के व्यापक प्रतिबंधों के तहत लोगों के स्वास्थ्य व्यवहारों में होने वाले अनजाने परिवर्तनों का मूल्यांकन किया। अमेरिका में लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी (एलएसयू) के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया। उनके अनुसार लॉकडाउन के दौरान लोगों का वजन काफी बढ़ा। परिणामस्वरूप स्वास्थ्य संबंधी तमाम समस्याएं पैदा हो गईं।


लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी से अध्ययन की सह-लेखक लीन रेडमैन ने कहा, लॉकडाउन के दौरान लोगों ने पौष्टिक भोजन का सेवन ज्यादा किया और घर पर रहकर खाने-पीने पर पूरा ध्यान दिया,वहीं, दूसरी तरफ शारीरिक गतिविधियां बहुत कम हो गईं। व्यायाम नहीं किया। घर से काम करने के चलते नींद का पैटर्न बदल गया। रात को देरी से सोने की वजह से नींद में खलल आई और नींद पूरी नहीं हुई। काम के घंटों में बढ़ोतरी और स्क्रीन पर बिताए गए समय ने नींद की खलल में बहुत बड़ी भूमिका अदा की। नींद की आदतें बदलने की वजह से लोगों में चिंता का स्तर काफी बढ़ गया।


मानसिक सेहत पर असर पड़ा

रेडमैन ने कहा, अध्ययन में पाया गया कि मोटापे से ग्रस्त लोगों ने अपनी डाइट में सबसे ज्यादा सुधार किया लेकिन इस बीच उन उनकी मानसिक सेहत पर विपरीत असर पड़ा। वजन बढ़ने का अनुभव करने के साथ-साथ उनका मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ गया। मोटापे से ग्रसित एक तिहाई लोगों ने यह स्वीकार किया कि लॉकडाउन के दौरान उनकी यह बीमारी पहले से ज्यादा बढ़ गई। अध्ययन से पता चलता है कि मोटापे जैसी बीमारी सिर्फ शारीरिक सेहत पर नहीं, बल्कि मन की सेहत पर भी असर डालती है।  


अप्रैल माह में हुए इस अध्ययन में 7,754 लोगों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों में से अधिकांश ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिकर के निवासी थे। इनके अलावा इसमें 50 से अधिक अन्य देशों ने भी भाग लिया।


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नई चीन नीति गढ़ने का मौका (हिन्दुस्तान)

विवेक काटजू, पूर्व राजदूत



विदेश सचिव हर्ष शृंगला ने 4 सितंबर को कहा, ‘भारत-चीन सीमा पर एक अभूतपूर्व स्थिति बन गई है। 1962 के बाद कभी भी इस तरह से हालात नहीं बिगडे़ थे।’ उन्होंने मौजूदा ‘तनातनी से पहले की स्थिति बहाल’ करने की मांग भी की। हालांकि, न तो उन्होंने और न ही सरकार के किस नुमाइंदे ने, न दोनों देशों की सेनाओं की साझा-वार्ता संबंधी बयानों और न ही कूटनीतिक बातचीत में यह बताया गया कि ‘हालात’ आखिर खराब क्यों हुए या स्थिति कैसे इतनी बिगड़ गई?

इस संदर्भ में मीडिया में जो भी खबरें आई हैं, वे या तो ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ बातचीत यानी सूत्रों के हवाले से तैयार की गईं या फिर लीक सूचनाओं के आधार पर। आधिकारिक बयानों में साफगोई नहीं दिखी। जैसे, चीन के अपने समकक्ष के साथ भारतीय रक्षा मंत्री की मॉस्को-वार्ता के बाद रक्षा मंत्रालय ने जो बयान जारी किया, उसमें बीजिंग पर यह आरोप लगाया गया कि यथास्थिति में एकतरफा बदलाव की उसकी कोशिशों से मुश्किलें बढ़ गई हैं। लेकिन क्या उसका प्रयास सफल हुआ? अगर नहीं, तो फिर विदेश सचिव ने यथास्थिति बहाल करने की जो मांग की है, उसके क्या निहितार्थ हैं?

बेशक सीमा-विस्तार की चीन की गतिविधियों पर हमने कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन जो स्पष्ट है, वह यह कि बीजिंग ने अपनी हरकतों से ‘आपसी विश्वास में सेंध’ लगाई है। पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने इन शब्दों का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ किया था, जब उसने कारगिल युद्ध में नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया था। जाहिर है, चीनी अतिक्रमण बहुत बड़ा और गंभीर है। 

अब यही माना जाना चाहिए कि भारत की मौजूदा चीन-नीति काम की नहीं रही, क्योंकि इसकी बुनियाद आपसी विश्वास ही थी। यह नीति सन 1988 में राजीव गांधी ने बनाई थी और बाद की सभी सरकारें इसी पर आगे बढ़ती रहीं। इसमें शांत व स्थिर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी), सीमा विवाद का स्थाई समाधान और कारोबार सहित हर क्षेत्र में भारत-चीन संबंधों की स्वाभाविक प्रगति की वकालत की गई है।

सवाल है कि नई नीति क्या होनी चाहिए? इसके लिए जरूरी है कि भारत और चीन में आज जो ताकत का असंतुलन है, उसे स्वीकार किया जाए। अभी चीन के साथ हमारी तुलना ठीक उसी तरह से हो सकती है, जिस तरह से पाकिस्तान की हमारे साथ। मगर इसमें एक बड़ा अंतर यह है कि पाकिस्तान जितना भी साधन जुटा ले, वह भारत से कमजोर ही रहेगा, जबकि भारत और चीन के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। बेशक भारत को आगे बढ़ने के लिए काफी कुछ करना होगा, लेकिन पिछले चार दशकों में दोनों देशों के बीच में बन आई खाई को पाटने की पर्याप्त क्षमता हमारे पास है। हां, इसके लिए राष्ट्रीय सहमति बनाना आवश्यक है, लेकिन यह किया जा सकता है और किया जाना चाहिए भी।

जब तक पाकिस्तान-भारत-चीन का मौजूदा शक्ति असंतुलन बना रहेगा, तब तक पाकिस्तान की भारत-नीति पर गौर करना कारगर हो सकता है। इस नीति के मूल में नियमित टकराव है और यह आर्थिक व वाणिज्यिक सहित किसी भी तरह के सहभागी रिश्ते को विकसित होने से रोकती है। उल्लेखनीय है कि साल 1996 में चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति जियांग जेमिन ने पाकिस्तान को सलाह यह दी थी कि वह चीन-भारत रिश्तों का मॉडल अपनाए, जिसमें आपसी मतभेदों को दूर करते हुए अन्य क्षेत्रों में सामान्य संबंध बनाने और उसे विस्तार देने की बात कही गई है।

मगर जियांग जेमिन के विचारों को नजरंदाज किया गया, क्योंकि पाकिस्तानी सेना का स्वाभाविक तौर पर यही मानना है कि यदि कारोबारी और आर्थिक रिश्ते मजबूत बनाए गए, तो युद्ध या जंग की हालत में भारत को फायदा मिल सकता है। इसके अलावा, इस तरह के संबंध बनने से भारत जम्मू-कश्मीर पर बातचीत करने से भी बचेगा। लिहाजा, इस्लामाबाद ने अपने तीन पारंपरिक नजरिए के साथ ही आगे बढ़ने का फैसला किया- परमाणु हथियारों और उनसे जुड़ी आपूर्ति-व्यवस्था का विकास, नियंत्रण रेखा पर सैन्य संतुलन और आतंकवाद का इस्तेमाल। बीते तीन दशकों में पाकिस्तान जितना दिवालिया हुआ है, उसमें एक बड़ा योगदान उसकी इस भारत-नीति का भी है।

जाहिर है, चीन-नीति में हमें उन गलतियों से सबक लेना होगा, जो पाकिस्तान ने अपनी भारत-नीति में की हैं। संभव हो, तब भी एक बडे़ पड़ोसी देश के खिलाफ आतंकवाद या तनातनी की नीति पर आगे बढ़ना अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही होगा। मगर भारत को अपनी परमाणु क्षमता इस रूप में जरूर मजबूत करनी चाहिए कि वह थल, नभ और जल, तीनों स्थितियों में मारक हो। चीन के दखल को रोकने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा की सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हो। बेशक, इसके लिए पूंजीगत निवेश की जरूरत होगी, लेकिन मौजूदा आर्थिक परेशानियों के बावजूद इसको टाला नहीं जा सकता है।

चीन-नीति के अन्य पहलुओं पर भी गहन विचार की दरकार है, जो आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों से जुडे़ हुए हैं। असल में, आज चीन से शुरू होने वाली कुछ आपूर्ति शृंखलाओं पर भारत की निर्भरता रणनीतिक रूप से काफी शोचनीय है। फार्मास्यूटिकल्स जैसे कई उद्योगों पर यह बात लागू होती है। हमें इनका आयात कम से कम करना होगा और जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना की संकल्पना है, इनका जल्द से जल्द घरेलू उत्पादन करना होगा। 

इसके अलावा, चीन की आक्रामक नीतियों से खार खाए छोटे-बड़े देशों के साथ भी भारत को अपने रिश्ते और अधिक सींचने होंगे। नई दिल्ली को अपनी पारंपरिक सोच से ऊपर उठना होगा और यह समझना होगा कि वह इतना बड़ा मुल्क है कि किसी भी ताकतवर देश से कंधे से कंधा मिला सकता है। और अंत में, चीन-पाकिस्तान की दुरभि-संधि तोड़ने के लिए पाकिस्तान की कमजोर नसों को दबाना भी अनिवार्य है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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चौथी क्रांति के जरूरी हथियार

प्रांजल शर्मा, डिजिटल नीति विशेषज्ञ



वक्त आ गया है, भारत आत्मनिर्भरता के लिए अपनी तकनीकी बुनियाद तैयार करे। भारत को तकनीकी संप्रभुता की ओर तेजी से बढ़ना होगा। इस बात का क्या मतलब है? आज हम एक ऐसी दुनिया में हैं, जहां 3डी प्रिंटिंग, ऑटोमेशन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और ड्रोन जैसे कनेक्टेड डिवाइस सभी तरह की गतिविधियों के लिए मौलिक हो गए हैं। ये सब चौथी औद्योगिक क्रांति के आधार तत्व हैं। जो देश इन तकनीकों का उपयोग अपने खुद के प्लेटफॉर्म बनाने के लिए नहीं करेगा, उसे समाधान की तलाश में बाहरी शक्तियों पर निर्भर रहना पडे़गा। प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता हमारी आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत को अपनी तकनीकी क्षमताओं के निर्माण के लिए अपने निवेश और कोशिशों को तेज कर देना चाहिए। हमें गौर करना चाहिए कि चीन ने अमेरिका के तकनीकी मुकाबले के लिए क्या-कया कदम उठाए थे? वह 2030 तक अमेरिका की तकनीकी बराबरी कर लेने के लक्ष्य के साथ बढ़ रहा है। अनेक मामलों में चीन की आलोचना हो सकती है, लेकिन हमें सीखना चाहिए कि दूरगामी रणनीति बनाकर तकनीकी संप्रभुता को कैसे हासिल किया जा सकता है। दवा क्षेत्र पर हमें सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित करना होगा। ज्यादातर दवाओं के लिए 60 से 80 प्रतिशत सामग्री चीन से आयात की जाती है। ऐसा पिछले 15 वर्ष में हुआ है, जब हमने आयात को मंजूरी देते हुए अपने देश में निर्माण को खत्म या कम होने दिया। 

आज तकनीकी संप्रभुता का मोल बहुत अधिक है, हमारा उद्देश्य भारत को डिजिटल बुनियादी ढांचे के मामले में आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए। हमारे व्यवसायों और सरकारी कामकाज में लगे अधिकांश हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर पर हमारा अपना नियंत्रण होना चाहिए। आइए, हम कुछ ऐसे क्षेत्रों को लेते हैं, जहां संप्रभु नियंत्रण की जरूरत है। संप्रभु नियंत्रण का मतलब यह नहीं कि सरकार ही डिजिटल बुनियादी ढांचे की मालिक हो जाए। इसका मतलब है, सरकार को व्यापक जनहित के लिए इस क्षेत्र या काम को विनियमित करने में सक्षम होना चाहिए।

हमें सबसे पहले डाटा और साइबर सुरक्षा चाहिए। भारत दुनिया में सबसे बडे़ खुले बाजार वाला लोकतंत्र है। एक अरब से अधिक नागरिकों से जुड़े डाटा को घरेलू संस्थानों द्वारा ही नियंत्रित और विनियमित किया जाना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में डाटा के स्थानीयकरण और गोपनीयता पर जीवंत बहस चली है और एक अच्छे लोकतंत्र में यह बहस होनी चाहिए। भारत को डाटा के उपयोग को लेकर स्पष्ट कानून बनाने होंगे। डाटा संरक्षण कानून पर अभी भी संसद में चर्चा चल रही है और उम्मीद है, इसी साल एक सशक्त और व्यावहारिक कानून बन जाएगा। इसी से जुड़ा है साइबर सुरक्षा का मामला। आज नकद सब्सिडी देने से लेकर करोड़ों के कारोबार तक ऑनलाइन हो गए हैं। व्यवसाय के हर आयाम को साइबर सुरक्षा की जरूरत है। आज की दुनिया में साइबर हमला सीमा पर हमले की तुलना में अधिक हानिकारक हो सकता है। फिलहाल भारत को साइबर सुरक्षा प्रबंधन के लिए भारतीय या मित्र देशों द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना होगा। हमें समान विचारधारा वाली कंपनियों के साथ ठीक उसी तरह काम करना चाहिए, जैसे हमने आतंकवाद विरोधी गठबंधन बनाया है। सरकार साइबर सुरक्षा नवाचार के लिए राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र बना रही है। आगामी वर्षों में करोड़ों लोग डिजिटल मुख्यधारा में शामिल होंगे, उन्हें डिजिटल माहौल के हिसाब से प्रशिक्षित करने का काम हो सकेगा। 

दूसरी जरूरत है सुरक्षित सामाजिकता और संवाद विकसित करना। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) की ताजा रिपोर्ट में भारत में डिजिटल बाजार पर प्रकाश डाला गया है। देश में 50 करोड़ से अधिक सक्रिय इंटरनेट यूजर्स हैं, जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक गांवों में हैं। लगभग 14 प्रतिशत यूजर्स 5 से 11 वर्ष की आयु वर्ग में हैं। इसका मतलब है, 7.10 करोड़ नाबालिग मोबाइल या होम वाई-फाई का उपयोग कर रहे हैं। ये सभी भी यूजर्स असुरक्षित श्रेणी में है। चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगाने से इन लाखों यूजर्स की सुरक्षा हुई है। रोपोसो और चिनगारी जैसे भारतीय सोशल वीडियो एप का तेजी से उदय हुआ है। 

तीसरी जरूरत है डिजिटल ढांचा और विनिर्माण पर ध्यान देना। मोबाइल फोन संचार के हार्डवेयर से लेकर रक्षा विनिर्माण तक, पेमेंट गेटवे से ऊर्जा उत्पादन उपकरण तक, सभी क्षेत्रों में भारत को आत्मनिर्भरता का विकास करना चाहिए। नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने मास्टरकार्ड और वीजा जैसे वैश्विक दिग्गजों के एकाधिकार का मुकाबला करने के लिए भारत इंटरफेस फॉर मनी (भीम) एप और रूपे कार्ड से भुगतान की शुरुआत की है। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) का निर्माण, जिस पर भीम और रूपे काम करते हैं, भारत की आत्मनिर्भरता की ओर उठाया गया शानदार कदम है। यूपीआई के तहत जून 2020 में 35 अरब डॉलर से भी अधिक के 1.34 अरब लेन-देन हुए हैं। 

भारत को अपनी नीतियों में सुधार करने के साथ ही उपयोगी शिक्षा में निवेश बढ़ाना चाहिए। अच्छी खबर है कि सरकार सभी मोर्चों पर उत्सुकता से आगे बढ़ रही है। ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ और ‘मशीन लर्निंग’ जैसे पद अब सरकार की चिंता का हिस्सा हैं। पिछले बजट में यह वादा किया गया था कि पांच साल में 80 अरब रुपये खर्च करके डाटा सेंटर पार्क, नेशनल मिशन ऑन क्वांटम टेक्नोलॉजी और अप्लिकेशंस बनाए जाएंगे। सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों को भारत नेट फाइबर-टू-होम कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए 60 अरब रुपये का प्रावधान भी कर रखा है। उम्मीद है, त्रुटिपूर्ण डाटा संग्रह प्रणालियों को नई प्रक्रियाओं के साथ तेजी से ठीक किया जाएगा।

कोविड बाद की दुनिया में भारत आत्मनिर्भरता के लिए प्रतिबद्ध दिख रहा है। हालांकि यही पर्याप्त नहीं है। शी जिनपिंग ने चीन और उसके संस्थानों में 2025 तक एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक के निवेश की घोषणा कर रखी है। इसके साथ ही, भारत को समान विचारधारा वाले देशों के साथ गठबंधन बनाना चाहिए। भारत और अन्य देशों को चीन के नेतृत्व वाले नियमों में फंसने से बचने के लिए प्रौद्योगिकी के अपने मानक गढ़ने होंगे। तकनीक हमारे भविष्य का नेतृत्व करे, यह हमारी आर्थिक सुरक्षा के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना देश की सीमाओं की रक्षा। आज सीमाएं आभासी हो गई हैं, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति तोपखाने की मारक क्षमता से भी अधिक मायने रखती है। चौथी औद्योगिक क्रांति की प्रौद्योगिकियां खुली और समतावादी हैं। भारत को एक वैश्विक नेता के रूप में चमकने के लिए अपनी तकनीकी क्षमताओं का विकास करना ही होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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ब्याज पर ब्याज लगाने का सवाल

आलोक जोशी 



‘सवाल चक्रवृद्धि ब्याज का है। राहत के लिए किस्त भरने से छूट और जुर्माने के तौर पर ब्याज एक साथ नहीं चल सकते। रिजर्व बैंक को यह बात साफ करनी होगी।’ यह कहना है सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस आर सुभाष रेड्डी का। सुप्रीम कोर्ट ने बैंक कर्ज पर किस्त न भरने की छूट बढ़ाई तो नहीं है, लेकिन यह निर्देश जरूर दे दिया है कि जिन देनदारों का कर्ज 31 अगस्त तक एनपीए नहीं किया गया है, अब उसे इस मामले पर फैसला होने तक एनपीए नहीं किया जा सकता। 

आपको या हमको इसमें होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन की अपनी ईएमआई पर राहत नजर आ रही है। हालांकि, जानकार बार-बार सलाह देते रहे हैं कि अगर बहुत जरूरी न हो, तो इस मोरेटोरियम या राहत का फायदा न उठाएं, क्योंकि आगे चलकर यह बहुत महंगा पड़ सकता है। महंगा पड़ने की वजह वही चक्रवृद्धि ब्याज या कंपाउंड इंटरेस्ट है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है। कारण यह है कि छूट का एलान करते समय ही आरबीआई ने साफ कह दिया था कि छूट सिर्फ किस्त भरने में दी जा रही है और इस छूट के दौरान भी बकाया रकम पर ब्याज जुड़ना जारी रहेगा। इस वक्त ब्याज का यही हिसाब झगड़े का कारण बना हुआ है। अदालत इस बात पर सवाल उठा रही है कि ब्याज पर ब्याज कैसे वसूला जा रहा है? सरकार और बैंकों के संगठन आईबीए की तरफ से यह दलील लगातार दी जा रही है कि ब्याज पर ब्याज ही तो बैंकिंग सिस्टम को चलाता है। 

भारत में होम लोन देने वाली सबसे बड़ी कंपनी एचडीएफसी के चेयरमैन तो इस पूरे मसले को ही दुर्भाग्यपूर्ण बता चुके हैं। अपने शेयरधारकों के नाम जारी सालाना चिट्ठी में उन्होंने लिखा कि मोरेटोरियम के मामले पर सुप्रीम कोर्ट आरबीआई से सवाल पूछे, यही दुर्भाग्यपूर्ण है। जिन बुनियादी सिद्धांतों पर वित्तीय प्रणाली चलती है, उन पर ही देश के केंद्रीय बैंक को अदालत के सामने जवाबदेह क्यों होना चाहिए? कोटक महिंद्रा बैंक के मुखिया उदय कोटक और स्टेट बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार भी मोरेटोरियम बढ़ाए जाने के पक्ष में नहीं हैं।  उनके लिए मुश्किल और बड़ी है, क्योंकि वहां बात सिर्फ घर या कार के कर्ज की नहीं है। उद्योग और व्यापार में लगे बहुत सारे लोगों, खासकर छोटे और मझोले कारोबारियों के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल हो रहा है। सिर्फ स्टेट बैंक का करीब पांच लाख तिरसठ हजार करोड़ रुपये का कर्ज इस वक्त मोरेटोरियम के दायरे में है। 

रिजर्व बैंक की ताजा फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट से पता चलता है कि सरकारी बैंकों से खुदरा लोन लेने वाले करीब 80 फीसदी लोग मोरेटोरियम की शरण में जा चुके हैं, यानी अब किस्त नहीं भर रहे हैं। नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों के लिए यह आंकड़ा 45.9 प्रतिशत बताया गया और छोटे बैंकों के लिए 73.2 प्रतिशत। छोटे बैंकों के लिए मुसीबत कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी से लगता है कि जहां स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई, कोटक महिंद्रा और एक्सिस जैसे बड़े बैंकों के करीब 30 प्रतिशत से कम कर्ज मोरेटोरियम के दायरे में हैं, वहीं बंधन बैंक के लिए यह अनुपात 71 प्रतिशत है। बंधन बैंक ज्यादातर कर्ज बहुत छोटे व्यापारियों को देता है। बैंकों को डर है कि अभी न जाने और लोग किस्तें न चुकाने की छूट मांगने वाले हैं। 

जाहिर है, इस वक्त बैंक, आरबीआई और सरकार, सभी इस मुसीबत से निकलने का रास्ता ढूंढ़ रहे हैं। उन्हें तीर भी चलाना है और परिंदों को भी बचाना है, यानी बैंक और कर्जदार, दोनों को ही बचाने का रास्ता निकालना है। मुसीबत बहुत बड़ी है और इतिहास में कोई उदाहरण नहीं है, जिसे नजीर बनाकर आगे का रास्ता देखा जा सके। इसीलिए वित्त मंत्री बैंक प्रमुखों के साथ बैठकें कर रही हैं और रिजर्व बैंक भी उपाय तलाशने में जुटा है। 

वित्त मंत्री ने पिछले दिनों बैंकरों की एक बैठक बुलाई और हिसाब लिया कि कहां किसको कितनी राहत दी जा चुकी है या दी जा रही है? खासकर एमएसएमई, यानी सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों के लिए जो तीन लाख करोड़ रुपये की क्रेडिट गारंटी स्कीम लाई गई है, उसका जायजा लिया गया। बैंकों ने बताया कि अगस्त के अंत तक एक लाख साठ हजार करोड़ रुपये के आसपास के लोन पास हुए, जिनमें से एक लाख ग्यारह हजार करोड़ रुपये के लोन दिए जा चुके हैं। वित्त मंत्री का ज्यादा जोर इस बात पर था कि त्योहारी मौसम आने से पहले जितनी राहत दी जा सकती है, उसे कर्जदारों तक पहुंचाने का इंतजाम किया जाए। 

बैंकों और एनबीएफसी कंपनियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कोरोना के पहले तक जिस कर्ज पर एक महीने किस्त नहीं आती थी, उसे वे एनपीए मानकर इंतजाम शुरू कर देते थे। यही सीमा अब तीन महीने कर दी गई है, और यह तीन महीने भी तब से गिने जाएंगे, जब मोरेटोरियम की मियाद खत्म हो जाए। यानी 1 सितंबर से गिनती शुरू होती, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने पर भी रोक लगा दी है, जब तक वह इस बारे में अगला आदेश न सुना दे। बैंकों और रिजर्व बैंक, दोनों के लिए इसमें संकट यह है कि उन्हें इस बात का पता ही नहीं चल पाएगा कि कितना कर्ज वापस आने वाला है और कितना डूबने का खतरा है! यही बात वे सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। 

जहां तक ब्याज का सवाल है, तो बैंक में रखी रकम पर आपको मूल के साथ ब्याज पर भी ब्याज मिलता है और इस बात की आशंका काफी ज्यादा है कि अगर कहीं अदालत ने वह ब्याज माफ करने का आदेश दे  दिया, तो उसका खामियाजा बैंक में पैसा रखने वाले खाताधारकों को भुगतना पड़ सकता है। उनकी बचत पर ब्याज पहले ही बहुत कम हो चुका है, और ऐसी हालत  में बैंक उसे और घटाने पर मजबूर हो सकते हैं, यानी मुसीबत के मारों में एक बिरादरी और शामिल हो जाएगी। 

ऐसी सूरत में जिम्मेदारी सरकार पर आ सकती है कि बैंकों को होने वाले नुकसान की भरपाई वह अपने खजाने से करे, लेकिन उसके खजाने का जो हाल है, उसे देखते हुए यह समझना भी मुश्किल नहीं है कि ऐसा हुआ, तब भी उसका बोझ आम भारतीय के सिर पर ही आएगा। उम्मीद करनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला करते समय इस पहलू को भी ध्यान में रखेगा। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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अवसाद या आवेश के निहितार्थ

के सी गुरनानी, मनोरोग विशेषज्ञ 



आत्महत्या हो या हत्या, दोनों ही हालत में होने वाली हत्या मनोरोगियों के एक ही विकार की वजह से हुई घटना है। मरीज की मानसिक हालत पर निर्भर करता है कि वह आत्महत्या करेगा या हत्या। मिसाल के लिए, एक मामला सामूहिक आत्महत्या का है, जिसमें अवसाद से पीड़ित एक मां आत्महत्या करती है, लेकिन अपने बच्चों को भी जीवित नहीं छोड़ती। 

कोई अवसाद के लिए इलाज करा रहा था और उसने आत्महत्या कर ली, तो इसका मतलब यह नहीं कि इसके लिए उसका अवसाद जिम्मेदार है। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के मामले में भी यह बात लागू होती है। यदि यह तय किया जाना है कि क्या उन्हें ऐसा अवसाद था, जिसके कारण उन्होंने आत्महत्या कर ली, तो मैकनोटेन रूल के तहत वही पैरामीटर लागू करना होगा, जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति द्वारा की गई हत्या के मामले का आकलन करने में लागू होता है। 

यह समझने के लिए कि अवसाद की वजह से आत्महत्या की कोशिश करने वाले व्यक्ति की मानसिक स्थिति क्या है, हमें एक सामान्य व्यक्ति की स्थिति की कल्पना करनी होगी, जो अपने जीवन में ऐसी ही स्थिति का सामना कर रहा हो। उस व्यक्ति के बारे में सोचें, जिस पर बहुत कर्ज है और जिसके लिए कोई भविष्य या गुंजाइश नहीं। उसे लगता है, उसका सारा परिवार अपमानित हो सकता है या उसे सलाखों के पीछे डाला जा सकता है। ऐसे में, उसके लिए बेहतर क्या है कि वह मर जाए या जीवित रहकर बिगडे़ हालात का सामना करे? वह आत्महत्या के बारे में सोच सकता है, लेकिन फिर वह यह भी सोचता है कि उसके प्रियजनों को कष्ट होगा। वह दुविधा में होता है, और तय नहीं कर पाता कि क्या किया जाए। अनिश्चितता की यह स्थिति उसके दर्द को बढ़ा देती है, उसे और उदास कर देती है। अवसाद में वृद्धि उसकी शारीरिक शक्ति व ऊर्जा में कमी की वजह बनती है। कई बार उसमें इतनी ताकत नहीं होती कि वह हत्या या आत्महत्या को अंजाम दे सके। इसलिए गंभीर अवसाद में रहने वाले लोग आमतौर पर आत्महत्या करने में सक्षम नहीं होते या अगर कोशिश करते हैं, तो अक्सर नाकाम रहते हैं। देखा गया है कि अवसादग्रस्त लोग आत्महत्या करते भी हैं, तो कुछ उपचार के बाद। ऐसे लोग अपने प्रियजनों के लिए कोई पत्र छोड़ जाते हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि उन्हें नुकसान उठाना पड़े। ऐसी आत्महत्या के अन्य कारण भी हो सकते हैं, जिसमें लोग कोई पत्र नहीं छोड़ते, इसके पीछे क्रोध या बदला लेने की इच्छा हो सकती है। आज हमें अलग ढंग से भी सोचना होगा, आज से कुछ साल पहले आत्महत्या को अपराध माना जाता था। अगर कोई आत्महत्या की कोशिश के बावजूद बच जाता था, तो उस पर मुकदमा चलता था, मगर अब यदि यह साबित हो जाए कि व्यक्ति ने अवसाद की वजह से आत्महत्या की है, तो इसे अपराध नहीं माना जाता। मान लीजिए, सुशांत बच गए होते और उन पर आत्महत्या की कोशिश का केस चलता, तो उन्हें अपने बचाव में साबित करना पड़ता कि मैं अवसाद में था। 

आज घरों में दस झगडे़ होते हैं, कोई भी कह देता है कि मैं मरने जा रहा हूं। बच्चों को मां डांटती है, तो कह देते हैं, मर जाऊंगा। वह बच्चा अगर आत्महत्या की कोशिश करता है, तो क्या हम कहेंगे कि उसे अवसाद था? अवसाद की वजह से आत्महत्या हुई है या नहीं, यह तय करने के लिए हमें बीमारी की गंभीरता को समझना होगा। 

घटना से दो-तीन दिन पहले सुशांत की जो स्थिति थी, क्या वह यह सोचने-समझने की स्थिति में नहीं थे कि क्या करने जा रहे हैं? कहा जा रहा है कि उनके घर पार्टी हो रही थी और वह अवसाद में थे, दोनों बातों में विरोधाभास है। अगर वह सोचने-समझने की स्थिति में थे, तो अवसाद कारण नहीं है। अपनी जान लेने के अनेक कारण हो सकते हैं, कोई आदमी क्षणिक आवेश में आकर भी ऐसा कर सकता है। जिन दवाओं की सूची सुशांत मामले में सामने आ रही है, उन्हें मैं गंभीर स्थिति की दवा नहीं कहूंगा। अगर मनोचिकित्सक कहते हैं कि दवाएं न लेने से कुछ भी हो सकता है, तो उनकी मात्रा से यह पता चलना चाहिए कि जो मात्रा दी जा रही थी, वह गंभीर बीमारी में दी जाती है। आज अवसाद आम हो गया है, रोजगार के लिए लोग परेशान हैं। ऐसे में, अगर कोई मनोबल बनाए रखने के लिए कोई दवाई लेता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे गंभीर अवसाद की बीमारी है। सुशांत के व्यवहार से नहीं लगता कि उन्हें गंभीर बीमारी थी। 

दूसरी चर्चा चल रही है कि बाइपोलर होने की। वैसे सुशांत को दी जा रही जो दवाएं मैंने देखी हैं, उनमें कोई भी बाइपोलर बीमारी की नहीं है। क्या दो-तीन साल के दौरान उनके किसी भी वीडियो में दिखता है कि सुशांत की स्थिति बाइपोलर थी? जो बाइपोलर होता है, वह साफ नजर आ जाता है। इसमें इंसान कमा भले दस रुपये रहा हो, लेकिन करोड़ों की योजनाओं पर काम करके खुद को मुसीबत में डाल लेता है। मेनिया में इंसान को मूड्स स्टेबलाइजर दवा भी दी जाती है, जिससे भावना में ज्यादा उतार या चढ़ाव न हो। सुशांत की दवाओं में कोई ऐसी नहीं दिखती, जिसे मूड्स स्टेबलाइजर कहा जाए।

आजकल बच्चे कई बार ज्यादा आक्रामक ढंग से हठ करते हैं, मां-बाप के लिए दुविधा वाली स्थिति हो जाती है। यहां तय करना होगा कि यह अवसाद है या भावनात्मक असंतुलन। ऐसी स्थिति में कोई हो, तो आसपास के लोगों को सजग हो जाना चाहिए। विशेषज्ञों को फैसला लेना चाहिए कि किस स्तर का अवसाद है और क्या उपचार किया जाए। 99 प्रतिशत मामलों में गंभीर अवसाद नहीं, क्षणिक आवेश होता है। 

आज जरूरी है कि कभी अपने मन में मरने के विचार को नहीं आने दें। बुरा लगा है, एक दिन खाना मत खाइए, नाराजगी को दूसरी तरह से जाहिर कीजिए। किसी को गुस्से में भी कभी मत बोलिए कि जा, मर  जा। आजकल फैशन हो गया है, लोग एक-दूसरे की नकल करने लगते हैं। एक आत्मघात से कई लोग दुष्प्रेरित होते हैं, जबकि ऐसा करना कतई समाधान नहीं है। बेहतर यही है कि नकल कीजिए, तो अच्छी चीजों की, बुरी चीजों या आदतों की नहीं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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हर जरूरतमंद के घर पहुंचे अनाज


यामिनी अय्यर, अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी, सेंटर फॉर पॉलिसी  


काश! अभी जो कुछ हो रहा है, वह सच न होता। मार्च के अंत में, जब देश में लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी, तब सरकार को लालफीताशाही से बचने, अपना तौर-तरीका बदलने, केंद्र-राज्य के आपसी संबंध को सुधारने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को चुस्त-दुरुस्त बनाने की तत्काल जरूरत मैंने बताई थी। लॉकडाउन से पैदा होने वाले आर्थिक संकट से मुकाबले के लिए यह सब किया जाना जरूरी था। हमें भरोसा था कि केंद्र सरकार अपना खजाना खोलते हुए राहत-उपायों के लिए कहीं अधिक उदार साबित होगी। मगर बीते पांच महीनों में 80,000 करोड़ टन मुफ्त अनाज में से महज एक चौथाई प्रवासी मजदूरों में बंट पाए हैं। इससे पता चलता है कि देश ने न तो राजकोषीय उदारता दिखाई और न ही अपना तौर-तरीका बदला। अब आर्थिक संकट भी गहरा रहा है। ऐसे में, पांच महीने पहले कही गई उन बातों को फिर से समझने की दरकार है। 

सबसे पहले, सार्वजनिक जन-वितरण प्रणाली (पीडीएस) को सभी के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए। लॉकडाउन से पहले केंद्र ने इस दु:साध्य योजना का विस्तार किया था, और अब इसे नवंबर तक बढ़ा दिया गया है। पर सरकार इसे सार्वभौमिक नहीं बना सकी, यानी जिनके पास राशन कार्ड नहीं है, उन्हें अनाज उपलब्ध कराने की वह कोई ठोस व्यवस्था नहीं कर सकी।

मई में, जब प्रवासी मजदूरों के विराट संकट से बचना असंभव हो गया, तब पीडीएस की पात्रता आठ करोड़ प्रवासी मजदूरों तक बढ़ा दी गई, जिनमें से अधिकतर के पास राशन कार्ड नहीं थे। उस सिस्टम के लिए, जो कागजी कार्रवाई और ‘पहचान मांगने’ की समस्या में उलझा हो, पात्रता के इस विस्तार को जमीन पर उतारना आसान नहीं था। इसकी बजाय, उसने प्रवासियों की पहचान और अस्थाई राशन कार्ड जारी करने से संबंधित अपनी नीतियां बनाईं। यह बताने के लिए कि तमाम मुश्किलों के बावजूद सराहनीय काम किए गए हैं, कुछ राज्य सरकारों ने इसका हल निकालने की कोशिश करते हुए स्थानीय सर्वेक्षणों के माध्यम से, ऑनलाइन पोर्टल से अस्थाई राशन कार्ड जारी किए। मगर ये सभी प्रक्रियाएं बोझिल और समय जाया करने वाली होती हैं। ये सरकारी कामकाज में दु:साध्य कागजी कार्रवाइयों का एक नया दरवाजा खोल देती हैं। यही वजह है कि तय किए गए आठ करोड़ मजदूरों में से महज 18 फीसदी को इस योजना का लाभ मिल पाया है।

ऐसा सिर्फ प्रवासी श्रमिकों के साथ नहीं हुआ। जाने-माने अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा और ज्यां द्रेज के अनुमानों के मुताबिक, सामान्य समय में भी करीब 10 करोड़ भारतीय पीडीएस के हकदार होने के बावजूद इसका लाभ नहीं उठा पाते। दूसरे शब्दों में, उनके पास राशन कार्ड नहीं है, जिस वजह से उन्हें अनाज नहीं मिल पाता। सर्वे बताते हैं कि लॉकडाउन के बाद से बिना राशन कार्ड वाले बहुत कम लोग पीडीएस से अनाज पा सके हैं।

संभावित लाभार्थियों का नाम लिखने या अस्थाई राशन कार्ड जारी करने की बजाय जरूरी यह है कि पीडीएस का अनाज सभी जरूरतमंदों को मिले। पीडीएस केंद्र पर भ्रष्टाचार और एक बार से अधिक अनाज ले जाने वालों को रोकने के लिए कई उपाय किए जा सकते हैं, मगर सबसे पहले राज्यों को कागजी कार्रवाई या पहचान-पत्र मांगने जैसे तौर-तरीके छोड़ने होंगे। वक्त का तकाजा है कि संकट को पहचानकर मांग-आधारित पीडीएस व्यवस्था बनाई जाए। ‘एक देश-एक राशन कार्ड’ पर काम करने की बजाय सार्वजनिक जन-वितरण प्रणाली को तत्काल सर्वसुलभ बना देने की दिशा में सरकार को तत्परता दिखानी चाहिए। ऐसा कम से कम तब तक जरूर किया जाना चाहिए, जब तक कि हम मौजूदा आर्थिक संकट से बाहर नहीं निकल जाते।

दूसरा, राज्यों को धन मुहैया कराने के प्रति लचीला रुख अपनाया जाना चाहिए। कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में राज्य सबसे आगे खडे़ हैं, लेकिन वे एक अलग तरीके से महामारी व इसके आर्थिक परिणामों का सामना कर रहे हैं। अपनी आर्थिक मुश्किलों को देखते हुए अधिकांश राज्यों ने राजस्व में कमी की भरपाई के लिए केंद्र से कोविड-19 राहत अनुदान देने की मांग की है। लेकिन केंद्र ने सीमित संसाधनों के साथ एक केंद्रीकृत राहत पैकेज का रास्ता चुना, जिसमें बहुत लचीलापन नहीं दिखाया जा सकता। उदाहरण के लिए, यदि राज्य नकद हस्तांतरण के साथ मनरेगा के कार्यस्थल को बदलने की सोचते हैं, तो वे ऐसा नहीं कर सकते। इससे राज्यों को आर्थिक संकट से निपटने के लिए अभिनव तरीके न अपनाने का बना-बनाया बहाना भी मिल गया है। अभी देश में एक गतिशील, विकेंद्रित, संस्थागत संरचना विकसित करने की जरूरत है, जो चुनौतियों के खिलाफ कारगर हो। राज्यों को कोविड-19 राहत अनुदान देने के लिए हमें एक चुस्त राजकोषीय हस्तांतरण फॉर्मूला अपनाना होगा, जो साझा बीमा प्रणाली की तरह हो। इसके लिए राज्यों में समन्वित प्रयास की भी दरकार होगी। ऐसा करने के लिए अंतर-राज्यीय परिषद जैसा संस्थागत तंत्र हमारे पास है। इसे तत्काल पुनर्जीवित करना चाहिए। और आखिरी में, भारत सरकार आय में मदद करने संबंधी प्रावधानों में अधिक खर्च करने से नहीं बच सकती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संभावित लचीलापन मनरेगा से ही जुड़ा हुआ है।

चूंकि ज्यादातर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग अपनी आधी क्षमता में काम कर रहे हैं और बुआई का मौसम भी जल्द खत्म होने वाला है, इसलिए मनरेगा की मांग और बढ़ जाएगी। मगर इसका पैसा तेजी से खत्म भी हो रहा है। राज्यों ने इसके लिए आवंटित सालाना धनराशि का एक तिहाई पहले ही खर्च कर दिया है। ऐसे में, मनरेगा में फंड मुहैया कराया जाना और इसके काम का विस्तार निहायत जरूरी है। इस बात के पर्याप्त सुबूत हैं कि कोविड-19 से पैदा हुए आर्थिक संकट के मूल में मांग की कमी है। लिहाजा, अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए राज्यों को अपना खजाना खोलना होगा। लेकिन इसके लिए जरूरी यह भी है कि वे अपना तौर-तरीका बदलें। देखा जाए, तो आज सबसे बड़ी बाधा यही है कि देश संकट से प्रभावी ढंग से लड़ने और उदार प्रतिक्रिया में अड़ियल रवैया अपना रहा है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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रोजगार नहीं, तो भत्ते का इंतजाम



आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार 

जब अप्रैल में लॉकडाउन के बावजूद लाखों लोग सड़कों पर उतर आए, तो वे गुस्सा नहीं दिखा रहे थे। वे सब बस अपने घर जा रहे थे। उन शहरों से नाउम्मीद होकर, जो अब तक उनका बसेरा ही नहीं, एक बेहतर भविष्य का रास्ता भी थे। देश भर में तालाबंदी थी, तो रोजगार पर मार पड़नी ही थी, मगर हालात कितने बिगड़ गए थे, इसका जवाब तब मिला, जब अर्थव्यवस्था को पढ़ने वाली सबसे भरोसेमंद संस्था सीएमआईई ने बताया कि सिर्फ अप्रैल महीने में देश में 12 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए थे। राहत की बात है कि सीएमआईई के ताजा आंकड़ों के अनुसार इसमें तेज सुधार हुआ है। बेरोजगारों की गिनती घटकर जुलाई में एक करोड़ के आसपास रह गई, यानी 11 करोड़ लोग वापस काम पर लग चुके हैं। मगर ध्यान देने की बात है कि यह बेरोजगारी असंगठित क्षेत्र की है। ये दिहाड़ी पर काम करने वाले लोग हैं, इसीलिए इन्हें वापस काम मिलना उतना मुश्किल नहीं था। मनरेगा पर खर्च हुई रकम भी काम आई है। यानी सरकार के 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज का सीधा फायदा यहां दिखाई पड़ा है। 

दूसरी तरफ, एक और बुरी खबर है, वह यह कि नौकरी-पेशा लोगों के बेरोजगार होने की रफ्तार तेज हो गई है। अप्रैल से जुलाई के बीच ऐसे 1.90 करोड़ लोगों की नौकरी जा चुकी है, इनमें से 50 लाख लोग तो सिर्फ जुलाई में नौकरी से बाहर हुए हैं। यह चिंता की बात इसलिए है कि दिहाड़ी मजदूरों की तरह इनके लिए दोबारा काम पाना आसान नहीं है। वैकेंसी, विज्ञापन, टेस्ट, इंटरव्यू के सिलसिले से बार-बार गुजरना कई बार आत्मविश्वास को भी तोड़ देता है। और अगर कुछ कर्ज है, तो ईएमआई का दबाव अलग से है। 

ऐसे में, कम तनख्वाह वाले बहुत से लोगों के लिए सरकार की तरफ से एक राहत वाली खबर आई है। जो लोग कर्मचारी राज्य बीमा निगम, यानी ईएसआईसी के तहत आते हैं, उन्हें अब तीन  महीने के लिए कमाई की आधी रकम बीमा स्कीम से मिलेगी। अभी तक ऐसे लोगों को सिर्फ एक चौथाई रकम ही मिलती थी। ईएसआई के नियमों के तहत जो लोग दो साल से ज्यादा नौकरी में रहकर ईएसआई का प्रीमियम भरते हैं, उन्हें बेरोजगार होने की स्थिति में यह पैसा अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना के तहत मिलता है। अभी तक बेरोजगार होने के 90 दिन बाद ही इस बेरोजगारी भत्ते का दावा किया जा सकता था, लेकिन यह समय घटाकर 30 दिन कर दिया गया है। खासकर कोरोना की मार से बेरोजगार हुए लाखों लोग इसका सहारा ले पाएंगे। ईएसआई स्कीम उन जगहों पर लागू होती है, जहां कम से कम दस लोग काम करते हों और इसके सदस्य वही लोग होते हैं, जिनकी महीने की कमाई 21,000 रुपये से कम हो। यानी एक व्यक्ति को कुल मिलाकर 31,500 रुपये ही मिलेंगे। ईएसआई के पास 78,000 करोड़ रुपये जमा हैं। अनेक व्यापार और उद्योग संगठन सरकार पर दबाव डाल रहे थे कि इस पैसे को निकालकर कामगारों की तनख्वाह देने के लिए इस्तेमाल किया जाए, मगर सरकार इनकार करती रही। उसका तर्क था कि यह रकम कामगारों को बेहद मुसीबत की स्थिति में बेरोजगारी भत्ता देने के लिए ही निकाली जा सकती है। अब सरकार ने इसकी शर्तों में ढील देकर बहुतों की जिंदगी आसान कर दी है। 

यह फैसला ऐसे समय पर हुआ है, जब पूरी दुनिया में बेरोजगारी भत्ते पर बहस छिड़ी हुई है। नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी तक यह तर्क दे चुके हैं कि आने वाले वक्त में सरकार को हर आदमी के लिए यूनिवर्सल बेसिक इनकम यानी भत्ते या पेंशन का इंतजाम करना पडे़गा। जिस तरह से मशीनीकरण बढ़ रहा है और रोजगार के मौके कम होते जा रहे हैं, वहां इस मांग को बेतुका कहना भी मुश्किल है। 

कोरोना की वजह से भी बहुत से काम-धंधे सिमटते जा रहे हैं। बीते हफ्ते ही एक रिपोर्ट से पता चला कि भारत में बड़ी कंपनियों ने 60 लाख वर्ग फुट, यानी करीब 78 फुटबॉल मैदानों के बराबर जगह खाली की है। यह ‘ए’ ग्रेड, यानी सबसे महंगे व्यावसायिक ऑफिस स्पेस थे, जिसका किराया जगह के हिसाब से 100-200 रुपये फुट या उससे ज्यादा भी होता था और रखरखाव ऊपर से। रोजगार पर अभी खतरा बना रहेगा। 

उधर अमेरिका में भी बेरोजगारी भत्ता मांगने वाले नए लोगों की गिनती जुलाई में फिर बढ़कर 11 लाख हो गई है। इससे वहां की अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेतों पर सवाल उठने लगे हैं। नए आंकडे़ जारी करते वक्त भी अमेरिकी श्रम विभाग ने इनके लिए ‘अप्रत्याशित’ विशेषण इस्तेमाल किया, यानी ये आंकड़े सारी उम्मीदों पर पानी फेरते दिख रहे हैं। 

यूरोप में और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी बेरोजगारी और बेरोजगारी भत्ता इस वक्त के सबसे गंभीर मुद्दे बने हुए हैं। खासकर इसलिए, क्योंकि अभी कोरोना संकट खत्म होना तो दूर, उसके आसार तक नहीं दिख रहे। अब सरकारें परेशान हैं कि इस हाल में बेरोजगारी भत्ता या रोजगार बनाए रखने के लिए कंपनियों को दी जाने वाली मदद वे कब तक जारी रख पाएंगी? कोरोना के मामले फिर बढ़ने से उन पर दबाव बन रहा है कि वे ऐसी स्कीमों को बढ़ाती चलें। अमेरिका के मुकाबले यूरोप में बेरोजगारी की दर कम बढ़ती दिखी, इसकी वजह यही है कि वहां की सरकारों ने कंपनियों को पैसा दिया, ताकि वे वेतन बांट सकें और लोगों को नौकरी से न निकालें। न्यूजीलैंड में तो 50 प्रतिशत से ज्यादा रोजगार इसी भरोसे चल रहा है। फ्रांस में 40 प्रतिशत और पुर्तगाल व जर्मनी में 20 प्रतिशत से ज्यादा रोजगार ऐसी ही मदद पाकर चल रहे हैं। यही वजह है कि इन देशों में अमेरिका जैसी बेरोजगारी नहीं दिखाई पड़ी, लेकिन हर जगह यह अस्थाई योजना थी। मार्च-अप्रैल में उम्मीद जताई जा रही थी कि जुलाई-अगस्त तक कोरोना खत्म हो चुका होगा। पर न कोरोना खत्म होने के आसार दिख रहे हैं और न ही इन अस्थाई योजनाओं को खत्म करने का माहौल बन पा रहा है। 

यूरोप के देशों में अब तैयारी है कि नौकरी बचाने पर खर्च होने वाली रकम को बेरोजगारी भत्ता देने पर खर्च किया जाए। इसमें दुविधा इस बात की है कि किसे कितना पैसा दिया जाए? वह रकम क्या होगी, जिसे पाकर इंसान का खर्च भी चल जाए और उसके भीतर नौकरी तलाशने की इच्छा भी बची रहे, क्योंकि ऐसा नहीं हुआ, तो संकट और बढ़ जाएगा। लोगों को बैठकर खाने की आदत पड़ जाएगी। भारत में ऐसी किसी भी योजना या स्कीम के विरोधी काफी समय से यही तर्क देते आए हैं। फैसला सरकार को ही करना पडे़गा, क्योंकि बेरोजगार हुए लोगों को तीन महीने तक आधी तनख्वाह कितना सहारा दे पाएगी? यह सवाल भी जल्दी ही सामने खड़ा हो जाएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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हमें उबारेगी आर्थिक सुधार की रोशनी


सुदीप्तो मंडल, फेलो, नेशनल कौंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च 


भारत में कोरोना वायरस से जान गंवाने वालों की संख्या 55 हजार से अधिक हो चुकी है, और यह आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है, हालांकि मृत्यु-दर में अब गिरावट दिखने लगी है। रिकवरी रेट, यानी कोरोना की जंग जीतने वाले मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। उम्मीद है कि अगले साल की शुरुआत तक इसका टीका आम लोगों के लिए उपलब्ध हो जाएगा। इन सबसे ऐसा लगता है कि महामारी का बुरा दौर बीत चुका है। जाहिर है, अब वह वक्त आ गया है कि अर्थव्यवस्था को गति दी जाए।

2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में एक  से 15 फीसदी तक की गिरावट का अनुमान लगाया गया है। मेरा मानना है कि इसमें पांच प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। दरअसल, अप्रैल-जून की तिमाही कोरोना से सबसे बुरी तरह प्रभावित हुई थी। साल-दर-साल उत्पादन बेशक घट रहा है, पर इसकी गति काफी धीमी है। चौथी तिमाही तक संभवत: यह गति थमने लगेगी, जिससे उत्पादन फिर से लय पकड़ने लगेगा। इस सुधार का दायरा दूसरे क्षेत्रों में भी फैल सकता है। गैर-खाद्य ऋण (खेती व इससे जुड़ी गतिविधियों, उद्योग, सेवा और पर्सनल लोन जैसे कर्ज), ऊर्जा खपत, औद्योगिक उत्पादन, रोजगार और जीएसटी संग्रह जैसे प्रमुख संकेतकों के आंकड़ों का भी यही संकेत है। सिर्फ यह साल और अगला वर्ष सुखद नहीं है। 2021-22 के अंत में हमारा उत्पादन उस स्तर पर आ जाएगा, जिस स्तर पर 2019-20 के अंत में था। इसके बाद भारत की विकास-गाथा उन नीतियों पर निर्भर करेगी, जो अगले डेढ़ साल में अपनाई जाएंगी। तमाम विकल्प इसी बात पर निर्भर करते हैं कि हम आज कहां खडे़ हैं।

इस साल संयुक्त राजकोषीय घाटा जीडीपी का 10.5 प्रतिशत हो सकता है, या फिर इसमें राज्यों को अतिरिक्त उधार की मिली अनुमति को भी शामिल कर लें, तो यह 12.5 फीसदी तक जा सकता है। सार्वजनिक क्षेत्रों की उधार आवश्यकता, जिसमें सार्वजनिक उपक्रम भी शामिल हैं, जीडीपी की करीब 14-15 फीसदी हो सकती है। जीडीपी का करीब नौ प्रतिशत तरलता या नकदी बढ़ाने में लगाया गया है, यह राशि भी बड़े पैमाने पर मांग को प्रोत्साहित करेगी। अब इसका कितना हिस्सा उत्पादन की रिकवरी में मददगार होगा और महंगाई कितनी बढ़ाएगा, यह आपूर्ति की रुकावटें तय करेंगी। अधिकांश विश्लेषक मौजूदा मंदी पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं, जबकि कुछ ने कीमतों में सामान्य स्तर से भी अधिक की गिरावट की आशंका जताई है। मगर मैं स्टैगफ्लेशन यानी मुद्रास्फीति जनित मंदी (बढ़ती महंगाई के साथ आने वाली मंदी) के खतरों का जिक्र करता रहा हूं, जो दुर्भाग्य से सही साबित हुआ है। जीडीपी में तेज गिरावट के साथ हमारी मुद्रास्फीति लगभग सात फीसदी तक बढ़ गई है और खाद्य मुद्रास्फीति भी 10 प्रतिशत के करीब है।

इसीलिए 2022-23 तक देश की राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों को धीरे-धीरे नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाना होगा। महामारी की वजह से आई वैश्विक मंदी और गहराता भू-राजनीतिक तनाव जब तक शांत नहीं होंगे, यह उम्मीद फिजूल है कि अंतरराष्ट्रीय कारक हमारे विकास में मददगार होंगे। हमारा चालू खाता तात्कालिक रूप से इसलिए बढ़ गया था, क्योंकि तेल की कीमतों में कमी के साथ-साथ जीडीपी में गिरावट से आयात में कमी आई थी। हालांकि, जैसे-जैसे हालात सुधरेंगे, आयात में तेजी आएगी, जिससे व्यापार घाटा बढ़ेगा और कुल मांग पर नकारात्मक असर होगा। इस सूरतेहाल में, अगर हम चाहते हैं कि हमारी विकास दर सात फीसदी या इससे अधिक हो, तो अच्छी रणनीति यही होनी चाहिए कि लंबित संरचनात्मक सुधारों को फिर से आगे बढ़ाते हुए निवेश और उद्योग का भरोसा जीता जाए।

इस तरह के सुधारों में वित्तीय क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकारी बैंकों को रिजर्व बैंक की विशेष निगरानी में लाया जाना चाहिए और उस पर सरकार का स्वामित्व 50 फीसदी से कम किया जाना चाहिए। हालांकि, यह सुधार अपने-आप में पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यस बैंक, आईएल ऐंड एफएस जैसे निजी बैंकों में फर्जीवाड़े हुए हैं। ऐसे में, बैंकों और गैर-बैंकों, दोनों तरह के वित्तीय संस्थानों पर कड़ी निगरानी जरूरी है, ताकि गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां यानी डूबत कर्ज की समस्या पर काबू पाया जा सके। 

दूसरा, राजकोषीय सुधार किए जाएं, जिसके तहत कर रियायतों और छूट में भारी कमी जरूरी है। इसके साथ-साथ भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में दी जा रही सब्सिडी को छोड़कर बाकी सभी रियायतों को बंद करना भी जरूरी है। इसके अलावा, केंद्र व राज्य सरकारों को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचों के विकास पर अतिरिक्त खर्च करना चाहिए। 

तीसरा सुधार ऊर्जा क्षेत्र में होना चाहिए। इसमें वितरण का काम निजी कंपनियों के हवाले कर देना चाहिए। दिल्ली जैसे राज्य उदाहरण हैं। चौथा, हमें उन नियमों को खत्म कर देना चाहिए, जो लघु व मध्यम उद्योगों के विकास में रोडे़ अटकाते हैं। फैक्टरी ऐक्ट इसका एक उदाहरण है। ऐसा किया जाना इसलिए जरूरी है, ताकि उद्योग व सेवाओं में रोजगार-सृजन हो। 

पांचवां, सार्वजनिक उपक्रमों में सुधार जरूरी है। यह काम अब तक कठिन साबित हुआ है। सरकार-संचालित कंपनियों को या तो निजी उद्यमों से उचित स्पद्र्धा करनी चाहिए या फिर उनसे जीतना चाहिए, क्योंकि इनमें करदाताओं का पैसा लगाया जाता है। छठा सुधार कृषि क्षेत्र में होना चाहिए। इसमें मार्केटिंग सिस्टम को ठीक करना जरूरी है, क्योंकि उपभोक्ताओं के भुगतान का उचित हिस्सा किसानों को आज भी नहीं मिल पाता।

ध्यान रखें, हमारे सरकारी संस्थानों, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की गुणवत्ता भी देश के आर्थिक प्रदर्शन को प्रभावित करती है। इसलिए आर्थिक सुधारों के अलावा उच्च विकास के लिए इन संस्थानों को मजबूत करना भी आवश्यक है। हमें सुधारों को एक प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए, किसी घटना के रूप में नहीं। और इस प्रक्रिया के प्रभावी होने में एक दशक तक का वक्त भी लग सकता है। चीन, भारत और अन्य देशों का इतिहास यही बताता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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ज्ञान आधारित विकास की ओर


दीपक कुमार श्रीवास्तव, प्रोफेसर, आईआईएम तिरुचिरापल्ली
                                                           
आने वाले समय में किसी भी व्यक्ति का सिर्फ एक योग्यता से काम नहीं चलेगा। एक से ज्यादा कौशल रखने वाले युवाओं को जीविका की दौड़ में आगे निकलने में सुविधा होगी। एक दौर था, जब एक योग्यता से भी काम चल जाता था, एक ही ढंग के काम या रोजगार में लगकर लोग अपनी जिंदगी ठीक-ठाक गुजार लेते थे। आज कॉरपोरेट की दुनिया में एक योग्यता वाले को ‘आई शेप्ड’(अंग्रेजी अक्षर आई) कहा जाता है, जबकि एकाधिक योग्यता वालों को ‘टी-सेप्ड’(अंग्रेजी अक्षर टी)। जाहिर है, कॉरपोरेट की दुनिया में ‘टी-सेप्ड’ लोगों को तरजीह दी जा रही है। भारत की नई शिक्षा नीति भी इस कोशिश में है कि देश में ‘टी-सेप्ड’ लोगों की तादाद बढे़। 
भारत की नई शिक्षा नीति से 34 वर्ष बाद ऐसे कई सुधारों की उम्मीद बंधी है। इस शिक्षा नीति में देश की शिक्षा-व्यवस्था की तस्वीर बदलने के कई नए उपाय किए गए हैं, जैसे- तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए अब एक नियामक होगा। इससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को पहले से ज्यादा मजबूती मिलेगी। नई नीति में डिजिटल लर्निंग को तरजीह दी गई है, शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण किया जाएगा, बहु-विषयक शैक्षणिक नजरिए पर खास ध्यान दिया जाएगा, संस्थागत स्वायत्तता बढ़ाई जाएगी, इनोवेशन यानी नवाचार व रचनात्मकता को प्रोत्साहित किया जाएगा, शिक्षा में अनुभव पर आधारित गंभीर चिंतन को प्रेरित किया जाएगा, विशिष्ट शोध व अनुसंधान के लिए धनराशि जारी की जाएगी आदि।
नई शिक्षा नीति नालंदा, तक्षशिला, वल्लभी और विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों के गौरव को भी याद करती है, जिनमें अनुसंधान और शिक्षण का जीवंत माहौल हुआ करता था। ऐसी परंपरा को फिर से अपनाने की दरकार है। आज विद्यार्थियों में ‘क्रॉस-स्किल’ यानी हर तरह के कौशल को विकसित करने के लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण जरूरी हो चला है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अब उद्योग जगत में उन नौजवानों की ज्यादा मांग है, जो तमाम तरह की विधाओं में दक्ष हैं। अब हम ‘इंडस्ट्री 4.0’ (ऑटोमेशन प्रौद्योगिकी पर आधारित चौथी औद्योगिक क्रांति) की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं, जो रोजगार के लिए अनिवार्य योग्यता में कई महत्वपूर्ण बदलाव लाएगा। भविष्य के कल-कारखाने ऑटोमेशन यानी स्वचालन पर काम करेंगे और रोबोटिक्स पर ज्यादा निर्भर होंगे। इसमें जाहिर तौर पर क्रॉस-स्किल वाले कर्मियों को ज्यादा तवज्जो मिलेगी। 
नई नीति एक ऐसे दूरदर्शी नजरिए की वकालत करती है, जिसमें शिक्षा कुशल कार्य-बल के साथ-साथ एक जागरूक और शिक्षित समाज के विकास का सपना पूरा कर सकेगी। इससे हम कई सामाजिक समस्याओं का उचित समाधान कर सकेंगे। यह वाकई बहुत अच्छा होगा, जब सभी विश्वविद्यालय, कॉलेज और अन्य शिक्षण संस्थान अपने ‘विजन डॉक्यूमेंट’ को नई शिक्षा नीति के अनुसार तैयार करेंगे।
शिक्षा आर्थिक विकास के बुनियादी कारकों में एक मानी जाती है। कोई भी देश मानव पूंजी और ज्ञान की नींव मजबूत किए बिना टिकाऊ आर्थिक विकास के रास्ते पर नहीं बढ़ सकता। यह शिक्षा ही है, जिसने कई कृषि-प्रधान या अविकसित अर्थव्यवस्थाओं को दुनिया की सबसे अधिक प्रतिस्पद्र्धी व औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में शुमार किया है। दक्षिण कोरिया व फिनलैंड का उदाहरण हमारे सामने है, जहां के नीति-नियंताओं ने शिक्षा की गुणवत्ता पर खासा ध्यान दिया और जल्दी ही अपने देश को उस मुकाम पर ले आए, जहां दूसरे राष्ट्र उनकी तरक्की पर रश्क कर सकते हैं। 
नई शिक्षा नीति छात्र-छात्राओं में सामाजिक व नैतिक मूल्यों के विकास पर भी जोर देती है। इस तरह के गुण विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए बहुत जरूरी हैं। मौजूदा परीक्षा व कोचिंग संस्कृति को बदलने पर भी नई नीति बल देती है और इसकी जगह हकीकत में समस्याओं से रूबरू होकर समझ विकसित करने और नए अवसर खोजने के लिए अधिक लचीली व्यवस्था अपनाने की वकालत करती है। इससे छात्र-छात्राओं का सर्वांगीण विकास हो सकेगा। इसी कारण अब परीक्षा पैटर्न को इस रूप में विकसित किया जाएगा कि परीक्षार्थियों की रटने की क्षमता की बजाय उनकी बुनियादी क्षमताओं का मूल्यांकन हो सके। नई नीति पठन-पाठन में भी लचीलेपन को बढ़ावा देने की बात कहती है, जिसमें छात्र-छात्राओं के पास अध्ययन के लिए विषयों के बेहतर विकल्प होंगे।
यह नीति मौजूदा शिक्षा-व्यवस्था की महत्वपूर्ण समस्याओं की भी पड़ताल करती है। आज हमारे सामने तमाम तरह की दिक्कतें हैं। जैसे, हमारा शिक्षा-तंत्र कई हिस्सों में बंटा हुआ है, सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित इलाकों में शिक्षा की पहुंच सीमित है, शिक्षकों की कमी है, संस्थागत स्वायत्तता सीमित है, और तमाम विषयों में अनुसंधान के मद मेंफंडिंग की कमी है। नई नीति में शोधकर्ताओं के लिए प्रतिस्पद्र्धी व योग्यता-आधारित अनुसंधान के लिए फंड की व्यवस्था करते हुए नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की बात कही गई है। इससे शोध की संस्कृति को बढ़ावा मिल सकेगा।
पिछले सात दशकों में देश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रभावशाली तरक्की हुई है। आज केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्य विश्वविद्यालय, निजी विश्वविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यालय जैसे तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। इन वर्षों में संबद्ध कॉलेज भी कई गुना ज्यादा खोले गए हैं। फिर भी, सच यही है कि उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या में वृद्धि के मुताबिक शिक्षा की गुणवत्ता में विकास नहीं हुआ है। गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।
नई शिक्षा नीति से प्रबंधन शिक्षा को भी बल मिलने की उम्मीद है। छात्र जब पहले की तुलना में ज्यादा विविध विषयों में पारंगत होकर प्रबंधन की पढ़ाई करने आएंगे, तो खुद शिक्षा संस्थानों व देश को बहुत लाभ होगा। उम्मीद है, नई नीति से भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव आ सकेगा और हमारे संस्थान दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शुमार होंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सौजन्य - हिन्दुस्तान।
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महामारी से जंग में भी राजनीति


एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार  
 
                                                                               
कोरोना महामारी से कुशलता से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 जून को कर्नाटक सरकार की प्रशंसा की थी। मौका था, राज्य के एक प्रमुख स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के रजत जयंती समारोह का। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों व अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की भी तारीफ की। इसे उस पेशे को प्रोत्साहित करने के रूप में देखा गया, जिसको देश के विभिन्न हिस्सों में कलंकित किया जा रहा था। उन्होंने हर किसी से अग्रिम मोर्चे पर तैनात इन योद्धाओं का सम्मान करने का आह्वान किया और कहा, ‘डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मी सैनिकों की तरह हैं, बिना वरदी वाले जवान’।
प्रधानमंत्री के इस संदेश को एक खास संदर्भ में देखने की जरूरत थी, लेकिन फौरन ही इस पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जाने लगीं। कोविड-19 से जंग में एक नए ब्रांड ‘कर्नाटक मॉडल’ का जन्म हो गया। मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने इसका इस्तेमाल एक अवसर के रूप में किया। दावा किया गया कि कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग (संक्रमित मरीजों के संपर्क जाल की पहचान) के मामले में कर्नाटक सर्वश्रेष्ठ रहा। महामारी  के नियंत्रण में ‘प्रौद्योगिकी’ के प्रभावी इस्तेमाल को लेकर भी अपनी पीठ थपथपाई गई। सोशल मीडिया के बयानवीरों ने तुरंत तमिलनाडु और केरल जैसे पड़ोसी राज्यों से तुलना करते हुए जंग छेड़ दी। मांग होने लगी कि ‘राज्य के बाहर से किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। सिर्फ कर्नाटक का आधार कार्ड रखने वाले कन्नड़ों को ही आने दिया जाए।’
1 जून को बेंगलुरु में कोविड-19 के कुल 385 मामले थे। यहां तक कि 20 जून तक भी यहां संक्रमित मरीजों की संख्या 1,076 थी, जबकि मुंबई में 65,329, चेन्नई में 39,641 और दिल्ली में 56,746 लोग वायरस से संक्रमित हो चुके थे। संभवत: इन्हीं सबसे राजनेताओं को इस तरह की बयानबाजी करने का हौसला हुआ, जबकि आम जनता यह देखकर हैरान थी कि जमीनी हालात में तो कोई अंतर नहीं है। 
जाहिर है, भाजपा सरकार एक ऐसे नैरेटिव (माहौल बनाने) की तलाश में थी, जो महामारी के खिलाफ ‘केरल मॉडल’ की बढ़ती स्वीकृति का मुकाबला कर सके। केरल में 30 जनवरी को संक्रमण का पहला मामला सामने आया था, और नेपाह वायरस के अनुभव का इस्तेमाल करते हुए उसने जल्द ही कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग, आइसोलेशन (मरीज को अलग-थलग करना) और इलाज की व्यवस्था शुरू कर दी। नतीजतन, उसे जल्द सफलता मिल गई और उसने कोरोना मुक्त राज्य की घोषणा कर दी। हालांकि, इस वायरस की प्रकृति ऐसी है कि केरल में इसकी फिर से वापसी हो गई।
19 जुलाई तक कर्नाटक में संक्रमितों की संख्या 55,000 से ज्यादा हो चुकी है, और इनमें से करीब 28,000 संक्रमण के मामले अकेले बेंगलुरु में मिले हैं। यहां स्वास्थ्यकर्मियों की कई डरावनी कहानियां सुनने में आ रही हैं। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के संगठन का कहना है कि करीब 30 फीसदी डॉक्टर, 50 फीसदी नर्स और कई वार्ड ब्यॉय संक्रमण की आशंका में चिकित्सा दायित्व से बाहर किए गए हैं। कर्नाटक मेडिकल एसोसिएशन का दावा है कि पूरे राज्य में 40-50 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है। जब स्वास्थ्य शिक्षा मंत्री के सी सुधाकर ने एक अस्पताल का औचक निरीक्षण किया, तो उन्हें बताया गया कि 112 मरीजों की देखभाल के लिए महज दो नर्स हैं, जबकि मानदंड के मुताबिक प्रति 10 मरीज पर कम से कम एक नर्स को होना चाहिए।
बेंगलुरु में निजी अस्पतालों द्वारा कोरोना मरीजों को भरती न करने पर जब एक मरीज की सरकारी अस्पताल के सामने मौत हो गई, तब राज्य सरकार ने 18 निजी अस्पतालों को नोटिस जारी किया। शवों का अंतिम संस्कार भी बेंगलुरु में एक बड़ा मसला बनता जा रहा है, क्योंकि ऐसे मैदान रिहाइशी इलाकों में हैं। चूंकि इस्तेमाल किए गए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई किट) का निस्तारण नियमों के खिलाफ हो रहा है, इसलिए यहां के लोग डर रहे हैं। चिंता की बात यह भी है कि बेंगलुरु मेडिकल कॉलेज ऐंड रिसर्च यूनिट की क्रिटिकल केयर यूनिट में 13 जुलाई तक 90 में से 89 मरीजों की मौत हुई। हालांकि, डॉक्टरों ने इसकी वजह उनका देर से अस्पताल आना और कई अन्य रोगों से पीड़ित होना बताया है। इन सबके बीच मुख्यमंत्री ने महामारी से निपटने के लिए एक के बाद दूसरे मंत्री बदले। इतना ही नहीं, राज्य सरकार ने अपने इस दावे से उलट कि वह अब लॉकडाउन नहीं लगाएगी, अचानक 14 जुलाई से 22 जुलाई तक बंदी की घोषणा कर दी। हालांकि, यह कोई नहीं जानता कि विनिर्माण-कंपनियों को काम करने की अनुमति देकर भला लॉकडाउन से क्या हासिल हो सकता है? सरकार की इस घोषणा से भ्रम की स्थिति बनी, क्योंकि कुछ मजदूर पहले ही शहर छोड़ चुके थे।
इस उलझन ने कुछ हफ्ते पहले के तमिलनाडु के घटनाक्रम की याद ताजा कर दी। दरअसल, अप्रैल में इसी तरह शेखी बघारते हुए मुख्यमंत्री ई पलानीसामी ने घोषणा की थी कि राज्य जल्द ही वायरस से निजात पा लेगा। मगर कुछ ही हफ्तों में संक्रमण में व्यापक वृद्धि हुई। कर्नाटक की तरह ही यहां भी राजनीतिक ईष्र्या, प्रतिद्वंद्विता और दूसरों पर हावी होने की आदत देखी गई थी। 
सौभाग्य से तमिलनाडु में सुधार हुआ है। चेन्नई ने पांच लाख टेस्ट किए हैं, जो देश में सबसे अधिक है। बेंगलुरु भी टेस्ट की अपनी क्षमता सुधार रहा है। 15 जुलाई को यहां 22,000 टेस्ट हुए थे, जिसे महीने के अंत तक रोजाना 30,000 तक ले जाने का इरादा है। हालांकि, मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से यह भी कहा था कि उनका सूबा एक लाख मामलों को संभाल सकता है, लेकिन इसकी आधी संख्या पर ही यह संघर्ष करता हुआ दिख रहा है, जबकि जुलाई के अंत तक संक्रमण के शीर्ष स्तर पर पहुंचने की आशंका है।
साफ है, राजनीतिक वर्ग को सियासत और महामारी का घालमेल नहीं करना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को यह एहसास होना चाहिए कि वे महामारी से लड़ रही हैं, एक-दूसरे से नहीं। वायरस केरल, कर्नाटक या तमिलनाडु में अंतर नहीं करेगा। फिर, भारत का इस कदर विस्तार है कि एक हिस्से में संक्रमण के थमते ही दूसरे इलाकों में इसका प्रसार हो सकता है। लिहाजा, एक-दूसरे पर उंगली उठाने की बजाय हमारे राजनीतिक वर्ग को परिपक्वता दिखानी चाहिए। आखिरकार यह मसला लोगों की जान से जुड़ा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


सौजन्य - हिल्दुस्तान।
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कोरोना युद्ध में अमेरिका से सबक


फ्रैंक एफ इस्लाम, अमेरिका वासी उद्यमी व समाजसेवी 
 
स्वास्थ्य सेवा पर दुनिया भर में सबसे ज्यादा खर्च करने वाला अमेरिका कोरोना वायरस से सबसे अधिक प्रभावित है। अफसोस की बात यह है कि इस महामारी को शुरू हुए छह महीने गुजर चुके हैं, पर वह इसे थाम पाने की सफलता से कोसों दूर दिख रहा है। ये हालात इसलिए बन गए हैं, क्योंकि शुरू से ही जवाबी प्रतिक्रिया में वह एक के बाद दूसरी गलती करता रहा। मैं यहां अमेरिका की 10 प्रमुख त्रुटियों का जिक्र कर रहा हूं, जिनसे हमें सीखना चाहिए कि हमें क्या नहीं करना है।
पहली गलती है कि अमेरिका में फैसले वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राजनीतिक तौर पर लिए गए। यह गलती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शीर्ष स्तर से शुरू हुई। उन्होंने शुरुआत में कोविड-19 को मौसमी बुखार कहकर खारिज कर दिया था। उप-राष्ट्रपति माइक पेंस को उन्होंने उस टास्क फोर्स का मुखिया जरूर बनाया, जिसका गठन आगामी कार्ययोजना के बारे  में सलाह देने के लिए किया गया था, पर वास्तव में उन्हें कोई अधिकार दिया ही नहीं गया।
दूसरी चूक, महामारी से निपटने के लिए कोई कानून सम्मत राष्ट्रीय कार्ययोजना नहीं बनाई गई। टास्क फोर्स ने राज्यों के लिए टेस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट (जांच, संक्रमित की खोज और इलाज) को लेकर दिशा-निर्देश तो जारी किए, संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए मास्क के इस्तेमाल व फिजिकल डिस्टेंसिंग की बात भी कही गई, मगर ये सभी दिशा-निर्देश तक ही सिमटे रहे। इसे कानून द्वारा अनिवार्य नहीं बनाया गया। 
तीसरी, महामारी को राज्यों का, यानी स्थानीय मसला माना गया। एक संघ के तौर पर संजीदा प्रयास नहीं किए गए। गवर्नरों और स्थानीय अधिकारियों को अपने तईं इसके उपाय तलाशने को कहा गया। नतीजतन, महामारी से निपटने के तरीके व परिणाम राज्य-दर-राज्य अलग-अलग दिखे।
चौथी गलती, जांच, चिकित्सा उपकरणों और उनकी आपूर्ति को लेकर संघ का दखल सीमित था। इनकी आपूर्ति शृंखला काफी हद तक कमजोर थी। विदेशी और निजी स्रोतों से इन्हें जुटाने की व्यवस्था करने के लिए राज्यों को ही कहा गया।
पांचवीं, महामारी को लेकर सटीक सूचनाओं का अभाव रहा। जब तक शट  डाउन नहीं हटाया गया था, तब तक तो टास्क फोर्स ने नियमित प्रेस-ब्रीफिंग की, पर बाद में ट्रंप ने ब्रीफिंग की कमान खुद संभाल ली। उन्होंने इसे भाषण देने का मंच बना दिया, संवाददाताओं के साथ बहस की जाने लगी, चिकित्सा विशेषज्ञों के तर्कों को खारिज किया गया, और यहां तक कि असुरक्षित दवाओं को बढ़ावा दिया गया। 
छठी, शट डाउन जल्द से जल्द हटाने के लिए अतिरिक्त प्रयास किए गए। ट्रंप लोगों के घरों में सिमटे रहने के शुरू से विरोधी रहे। शट डाउन के निर्देश जारी होते ही राष्ट्रपति इसे हटाने के बारे में सोचने लगे। उन्होंने वर्जीनिया और मिशिगन जैसे राज्यों में अपने लाखों समर्थकों के लिए ट्वीट भी किया, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि वहां के गवर्नर उनका विरोध कर सकते हैं या शट डाउन हटाने में ढीले पड़ सकते हैं। ट्रंप खुद के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने की संभावनाओं को तलाशते हुए ही तमाम कदम उठाते दिखे, और इसके लिए उन्होंने लोगों की सेहत को भी नजरंदाज किया।
सातवीं गलती, अगर देश के किसी एक हिस्से में सफलता मिली, तो उसके सापेक्ष दूसरी जगहों पर भी महामारी की प्रकृति को नजरंदाज करते हुए नियमों में ढील दी गई। शुरुआत में महामारी के हॉटस्पॉट थे पूर्वोत्तर, मध्य-पश्चिमी राज्य, शहरी इलाके व कैलिफोर्निया। मई के मध्य से जून की शुरुआत तक इन जगहों में कोरोना का प्रकोप कुछ कम हुआ, जबकि बाकी देश में चरम पर पहुंचता दिखा। इसलिए जॉर्जिया, फ्लोरिडा, टेक्सास व एरिजोना जैसे राज्य नियमों में अपेक्षाकृत अधिक ढील देने लगे। नतीजतन, इन-इन प्रांतों में भी संक्रमण में तेजी आई और अब ये नए हॉटस्पॉट बन गए हैं।
आठवीं गलती, नियमों को लागू करने वाला कोई एक  तंत्र अमेरिका में नहीं था। यहां तक कि लोगों के घर से बाहर न निकलने, मास्क पहनने और शारीरिक दूरी के पालन संबंधी निर्देशों को लागू कराने में भी व्यापक अंतर रहा। जॉर्जिया व टेक्सास जैसे कुछ राज्यों में रिपब्लिकन गवर्नरों ने इन नियमों को लेकर महज दिशा-निर्देश जारी किए, जबकि इन्हीं राज्यों के बडे़ शहरों के डेमोक्रेट मेयरों ने इस बाबत कानूनी प्रावधानों की जरूरत बताई।
नौवीं चूक। अमेरिका में स्वास्थ्य-चिंता की बजाय आर्थिक चुनौतियों को ज्यादा महत्व दिया गया। महामारी की वजह से चरमराई अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए ही शट डाउन हटाया गया, जिसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। आखिरी और संभवत: सबसे बड़ी गलती, विशेषज्ञों की सलाहों को लगातार खारिज किया जाता रहा। जैसे,  अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध संक्रामक रोग विशेषज्ञ और टास्क फोर्स के सदस्य एंथोनी फौसी की राय की अवहेलना की गई। शुरू से ही ट्रंप विशेषज्ञों की सलाहों की अनदेखी कर अपना मत परोसते रहे। 
कुल मिलाकर, अमेरिका ने कोविड-19 के खिलाफ दूरदर्शी सोच के साथ जंग लड़ने की बजाय हालात देखकर कदम उठाए। इस नाकामी के लिए काफी हद तक ट्रंप को जिम्मेदार माना जाना चाहिए। महीनों तक उन्होंने खुद मास्क नहीं पहना, हालांकि हाल में उन्हें मास्क में देखा गया है। इतना ही नहीं, वह लगातार यही कहते रहे कि एक समय के बाद महामारी खुद खत्म हो जाएगी। साफ है, ट्रंप वह प्रतीक बन गए हैं, जो यह बताता है कि महामारी के खिलाफ व्यक्तिगत, राजनीतिक और पेशेवर तौर पर क्या नहीं करना चाहिए।  
ये कुछ बुनियादी सबक हैं, जो भारत या दूसरे देश अमेरिका से सीख सकते हैं। भारत को खासतौर से ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यहां संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। मौजूदा स्थिति बता रही है कि दुनिया के संभवत: सबसे कठिन लॉकडाउन का वह नतीजा नहीं निकला, जिसकी उम्मीद थी। भारत 10 लाख संक्रमण का आंकड़ा पार कर चुका है, जो एक बुरी खबर है। हालांकि, अब भी सभी दरवाजे बंद नहीं हैं, क्योंकि यहां मृत्यु-दर बहुत कम है। इसके अलावा, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कोरोना के 80 फीसदी मामले 49 जिलों में ही हैं। इसका मतलब है कि देश के महज सात फीसदी जिलों में अधिकतर मामले हैं, यानी हॉटस्पॉट के लिए एक समग्र नीति बनाकर महामारी को थामा जा सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सौजन्य - हिल्दुस्तान।
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लॉक और अनलॉक की आंख मिचौली : Hindustan Editorial


आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार 
                          
कंपनियों के तिमाही नतीजे आने लगे हैं। यह उसी तिमाही के नतीजे हैं, जिसके तीन में से दो महीने पूरी तरह लॉकडाउन में स्वाहा हो चुके हैं। अप्रैल और मई महीने। जून में कारोबार खुलना शुरू हुआ और कई जगह काफी हद तक खुल भी गया, पर अनलॉक का काम अभी चल ही रहा है। देश के अनेक हिस्सों में तो लॉक और अनलॉक के बीच आंख मिचौली जारी है। अनलॉकिंग का असर क्या होगा और कब होगा, यह जानने के लिए पहले समझना जरूरी है कि लॉकडाउन का असर क्या हुआ। 
कंपनियों के तिमाही नतीजों पर नजर डाले बिना ही सबको पता है कि रिजल्ट क्या होने वाला है। वही, जो कई राज्यों में छात्रों का हो रहा है। इम्तिहान ही पूरे नहीं हो पाए और अब बिना इम्तिहान के अगले दर्जे में जाना है। कारोबार चलाने वाले के पास अगले दर्जे में जाने का रास्ता तो है नहीं। कोई बड़ी फैक्टरी अगर आधे घंटे के लिए बंद हो जाए, तो उसे वापस पटरी पर आने में करीब-करीब दो दिन लग जाते हैं। अपने आसपास की किसी दुकान में जाकर देखिए कि दो या तीन महीने बंद रहने के बाद जब शटर फिर खुला, तो भीतर सामान का हाल क्या था, कितनी धूल जमी थी और कितनी चीजें खराब हो गईं। 
यही हाल इस वक्त पूरे देश का है। भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टीसीएस के तिमाही नतीजे खराब होने की आशंका थी, पर जो परिणाम आया, वह तो आशंका से भी कमजोर है। मुनाफे में 13.81 प्रतिशत की गिरावट के साथ कंपनी ने अप्रैल से जून के बीच 7,008 करोड़ रुपये कमाए हैं। यह वह कारोबार है, जिसमें सबसे ज्यादा वर्क फ्रॉम होम संभव है और हो रहा है। लेकिन जहां लोगों का आना-जाना जरूरी है, यानी फैक्टरियां, दुकानें और इस तरह के दफ्तर या अन्य कारोबार, उनकी क्या स्थिति है? लगातार दूसरे महीने भारत सरकार ने औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, यानी आईआईपी के आंकड़े सामने रखने से इनकार कर दिया है। सरकार का कहना है कि अप्रैल और मई में पूरी तालाबंदी की वजह से यह सही नहीं होगा कि इस दौर के आंकड़े को पिछले साल के इन्हीं महीनों के आंकड़ों के साथ रखकर देखा जाए। फिर भी, जानना जरूरी है कि मई के महीने में हालात अप्रैल से कुछ सुधरे जरूर, पर जितनी जानकारी सांख्यिकी कार्यालय ने सामने रखी है, उसका हिसाब जोड़कर समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कहा है कि मई में भारत का फैक्टरी आउटपुट 37.8 प्रतिशत कम रहा है। जून में लॉकडाउन हटने के बाद से हालात सुधरने चाहिए, लेकिन जून का आंकड़ा अगस्त में आएगा। 
इस बीच उद्योग संगठन फिक्की और कंसल्टिंग फर्म ध्रुव एडवाइजर्स ने देश के 100 से ज्यादा चोटी के कारोबार चलाने वाले प्रबंधकों के बीच सर्वे किया है। जून के अंत में हुए इस सर्वे में पाया गया कि अभी सिर्फ 30 प्रतिशत संस्थानों में 70 प्रतिशत या उससे ज्यादा क्षमता पर काम चल रहा है, लेकिन 45 प्रतिशत को उम्मीद है कि जल्दी ही उनका कामकाज भी 70 प्रतिशत से ऊपर होने लगेगा। इनकी उम्मीदें अनलॉक के साथ बढ़ गई हैं। 22 प्रतिशत प्रबंधकों का कहना है कि उनका निर्यात बढ़ने लगा है। 25 प्रतिशत प्रबंधक कहते हैं, ऑर्डर बुक सुधर रही है और 30 प्रतिशत कंपनियों का कहना है कि उनकी आपूर्ति शृंखला पटरी पर आ रही है। 
हालांकि फिक्की की प्रेसिडेंट संगीता रेड्डी का कहना है कि जितनी गहरी मार पड़ी है, उससे उबरने का काम काफी धीरे-धीरे ही हो पाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस वक्त ऐसे कदम उठाने जरूरी हैं, जिनसे कारोबारियों को न सिर्फ मौजूदा संकट से निकलने में मदद मिले, बल्कि वे लंबे दौर में आने वाले मौकों के लिए भी खुद को तैयार कर सकें। लेकिन इस बीच कोरोना के झटके लग रहे हैं और सरकारें भी लॉकडाउन में कभी ढिलाई, तो कभी कड़ाई कर रही हैं। एक तरफ, बीमारी फैलने का डर है, तो दूसरी तरफ, अर्थव्यवस्था के डूबने का खतरा। यही वजह है कि पिछले 15 दिनों में तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, बिहार, यूपी और असम के कई इलाकों में लॉकडाउन लग चुका है। देश के दस राज्यों में 45 करोड़ से ज्यादा लोग लॉकडाउन में ही हैं। 
इसका सीधा असर काम, रोजगार और कमाई पर पड़ना तय है। कारोबार के वापस पटरी पर लौटने की उम्मीद पाले कंपनियों का कहना है कि इस तरह बार-बार बंदी होती रही, तो फिर आर्थिक वापसी मुश्किल होती जाएगी। अप्रैल में ही इस बारे में जब सवाल उठे थे, तब मारुति उद्योग के चेयरमैन आर सी भार्गव ने कहा था कि फैक्टरी में या आसपास 20,000 लोगों के रहने का इंतजाम संभव नहीं है। अब फिक्की ने जो सुझाव दिए हैं, उसमें यह मांग शामिल है कि सरकार कामगारों के लिए उनके काम की जगह के आसपास सस्ती रिहाइश का इंतजाम करने में मदद करे। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने मांग की है कि केंद्र सरकार पूरे देश में लॉकडाउन लगाने और हटाने पर एक केंद्रीय व्यवस्था बनाए। 
व्यापार जगत और सरकार के बीच चर्चा चल रही है, सुझाव भी लिए-दिए जा रहे हैं, लेकिन रोजगार के मोर्चे पर हालत कितनी खराब है, इसकी खुलकर बात नहीं हो रही है। अभी तक का हाल समझना हो, तो म्यूचुअल फंडों के संगठन ‘एम्फी’ की ताजा रिपोर्ट को देखना जरूरी है। जून के महीने में इक्विटी म्यूचुअल फंड में लगने वाले पैसे में 95 प्रतिशत की गिरावट आई है और लगातार तीसरे महीने एसआईपी यानी किस्तों में आने वाले पैसे में गिरावट दिखाई पड़ी है। साफ संकेत है कि लोगों के पास पैसा बच नहीं रहा है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अभिजित बनर्जी से लेकर भारत के तमाम उद्योग संगठन तक केंद्र सरकार से लगातार मांग कर रहे हैं कि लोगों की जेब में पैसा डालिए, ताकि वे खर्च कर सकें। बस यही एक रास्ता है। 
और ऐसे में, अगर बार-बार छोटे-बडे़ लॉकडाउन लगते रहे, तो खतरा और गंभीर होने जा रहा है। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने शनिवार को कहा है कि यह स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए सौ साल का सबसे बड़ा संकट है। जाहिर है, अपने-अपने मोर्चे पर लड़ना होगा, पर एक से निपटने के चक्कर में दूसरे को नजरंदाज करना बहुत महंगा साबित होगा और दर्दनाक भी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।
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नकल उपयोगी लेकिन नैतिकता भी : Hindustan Editorial

विवेक वाधवा, फेलो, हार्वर्ड लॉ स्कूल 

अभी जैसे ही वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग एप ‘जियोमीट’ का एलान किया गया, सोशल मीडिया में नकल करने के आरोप उछलने लगे। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह एप ‘जूम’ से मिलता-जुलता है। एक व्यक्ति ने ट्वीट करते हुए लिखा, इसका नाम ‘झूम’ रखा जाना चाहिए था, क्योंकि अपने यहां इसे यही कहकर बुलाया जाएगा। ऐसा नहीं है कि ‘जियोमीट’ लाने वाली कंपनी प्रौद्योगिकी उद्योग के काम-काज से अनजान है, नावाकिफ तो आलोचक हैं। वे दरअसल नहीं जानते कि प्रौद्योगिकी जगत में इनोवेशन, यानी नवाचार कैसे होता है? 

यह कहना अजीब लग सकता है, लेकिन सच यही है कि इनोवेशन के लिए नकल अच्छी बात है। चीन की प्रौद्योगिकी कंपनियों ने इसी बूते अपनी शुरुआत की थी। उन्होंने सबसे पहले अपने लोगों के लिए सिलिकॉन वैली की तकनीकें अपनाईं और फिर खुद को निखारती चली गईं। वे आज भी दुनिया भर पर नजरें रखती हैं कि कौन-सा एप कहां सफल हो रहा है और उसमें नए फीचर जोड़ने और इनोवेशन से पहले उसकी नकल तैयार कर लेती हैं। हालांकि, सिलिकॉन वैली भी इसी तरह काम करता है। यहां तक कि जूम भी उन एप की नकल करके तैयार किया गया है, जिनसे वह मुकाबिल है, जैसे- वेबएक्स, स्काइपी और ब्लूबींस।

स्टीव जॉब्स ने भी पालो ऑल्टो रिसर्च सेंटर से विंडोविंग इंटरफेस की नकल करके मैकिन्टोश तैयार किया था। 1994 में उन्होंने इसे कुबूल करते हुए कहा था, ‘पिकासो कहते हैं- अच्छे कलाकार नकल करते हैं और महान कलाकार चोरी। और हम महान विचारों को चुराने को लेकर हमेशा बेशर्म रहे हैं’। एप्पल की अधिकतर विशेषताएं किसी दूसरे ने तैयार की है। शायद ही कोई तकनीक कंपनी ने खुद अपने यहां विकसित की है। जैसे, आईपॉड ब्रिटिश आविष्कारक केन क्रैमर ने बनाया है, जबकि आईट्यून्स साउंडजाम से खरीदी गई तकनीक पर तैयार हुआ। आईफोन तो अक्सर सैमसंग की मोबाइल तकनीकों की नकल करता है, जबकि सैमसंग एप्पल की।

मार्क जकरबर्ग ने भी माइस्पेस और फ्रेंडस्टर की नकल करके फेसबुक परोसा था। वह आज भी तमाम उत्पादों की नकल किया करते हैं। जैसे फोरस्क्वॉयर से फेसबुक प्लेसेज बना, और स्काइपी से मैसेंजर वीडियो। स्नैपचैट की नकल फेसबुक स्टोरीज है, तो मीरकट और पेरिस्कोप की अच्छी-अच्छी फीचरों का मिश्रण फेसबुक लाइव। अब जकरबर्ग प्राइवेट मैसेजिंग ग्रुप और पेमेंट को एक करके वीचैट की कॉपी तैयार करने में जुटे हैं। यही वजह है कि भारतीय नीति-नियंताओं द्वारा वाट्सएप पेमेंट्स को मंजूरी दिए जाने पर उनका पूरा जोर है। वाट्सएप को खरीदने से पहले, उन्होंने उसकी नकल बनाने की पूरी कोशिश की थी, पर वह लगातार विफल रहे। इसीलिए अंत में उन्होंने इस कंपनी को ही खरीद लिया, वह भी आश्चर्यजनक रूप से 20 अरब डॉलर में, जो फेसबुक के बाजार मूल्य का 10 फीसदी था। सिलिकॉन वैली का एक राज यह भी है कि यदि चोरी नहीं कर पा रहे, तो कंपनी को ही खरीद लें।
हालांकि, वे लोग इसे नकल या चोरी नहीं कहते, इसे ‘नॉलेज शेर्यंरग’ यानी ‘ज्ञान का साझाकरण’ कहा जाता है। दरअसल, सिलिकॉन वैली में एक कंपनी को छोड़कर दूसरी कंपनी में काम करने का चलन काफी अधिक है। यहां अच्छे इंजीनियर शायद ही किसी एक कंपनी में तीन साल से अधिक काम करते हैं। वे या तो प्रतिस्पद्र्धी कंपनियों को नियमित तौर पर ज्वॉइन करते रहते हैं या फिर खुद की कंपनी बना लेते हैं। जब तक इंजीनियर कंप्यूटर कोड या डिजाइन नहीं हासिल कर लेते, तब तक वे उस पर काम कर सकते हैं, जो उन्होंने पूर्व की कंपनी में किया होता है। सिलिकॉन वैली की कंपनियां भी बखूबी समझती हैं कि एक ही वक्त में सहयोग व प्रतिस्पद्र्धा से ही सफलता संभव है। कैलिफोर्निया के कई कानूनों में भी इसकी झलक दिखती है, जो नियोक्ता व कर्मचारियों के बीच उन समझौतों की वकालत करते हैं, जिनमें कर्मचारी रोजगार के दौरान या उसके बाद नियोक्ता के साथ किसी तरह की प्रतिस्पद्र्धा न करने पर सहमति जताता है।

ज्यादातर जगहों पर, उद्यमी दूसरों को यह बताने में कतराते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। मगर, सिलिकॉन वैली में उद्यमियों को पता है कि अपने विचार साझा करने पर ही उन्हें जरूरी फीडबैक (प्रतिक्रिया) मिलेंगे। दोनों पक्ष विचारों के इस आदान-प्रदान से सीखते हैं और नए आइडिया का जन्म होता है। इसलिए जब आप पालो ऑल्टो में किसी कॉफी शॉप में जाएंगे और सामने वाले इंसान से उसके उत्पाद के बारे में पूछेंगे, तो वह यह बताने में कतई संकोच नहीं करेगा कि उसने किस तरह और कैसे इसे तैयार किया है।

हालांकि, महज नकल करके न तो कंपनियां सफल हो सकती हैं, और न देश। उन्हें न सिर्फ बहुत तेजी से आगे बढ़ना होगा, बल्कि खुद को सुधारना भी होगा। बदलते बाजार और प्रौद्योगिकियों के अनुकूल भी उन्हें ढलना होगा। एप्पल इसलिए दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी बन पाई, क्योंकि इसने अपनी तकनीक को अपने हाथों खत्म करने से कभी परहेज नहीं किया। स्टीव जॉब्स को इस बात की कतई चिंता नहीं थी कि आईपैड उनके लैपटॉप की बिक्री को नुकसान पहुंचाएगा या आईफोन का म्यूजिक प्लेयर आईपॉड की जरूरत को खत्म कर देगा। प्रतिस्पद्र्धी कंपनियां इसकी डिजाइन की जैसे ही नकल करतीं, यह कंपनी अगली तकनीक को अपना लेती। मुझे उम्मीद है कि जियो भी ऐसा करेगी। भारतीय बाजार में जो सबसे अच्छा काम कर रही है, उससे वह सीखे और बेहतर तकनीक के साथ सामने आए।

हालांकि, यहां एक महीन रेखा भी है, जिसे कभी पार नहीं किया जाना चाहिए। यह है, बौद्धिक संपदा की चोरी। जैसे, चीन की हुआवेई पर सिस्को ने बौद्धिक संपदा के उल्लंघन का मुकदमा दायर किया था। उसकी 5जी तकनीक नोकिया और अन्य से संभवत: चुराई हुई थी। चीन की कई उन्नत प्रौद्योगिकियों की बुनियाद इसी तरह की चोरी है। यह चलन नवाचार के लिए कतई सुखद नहीं है, और कहीं अधिक विनाशकारी आदतों को जन्म दे सकता है। इसका एक नुकसान और है, जो अभी हुआवेई भुगत रहा है। उसकी तकनीक पर अब कई देश पाबंदी लगा रहे हैं। लिहाजा, भारतीय उद्यमी इनोवेशन से पहले बेशक नकल करें, लेकिन किसी नैतिक रेखा को कतई पार न करें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।
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