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Saturday, January 23, 2021

शेयरों में उछाल से मामूली सुकून (हिन्दुस्तान)

अरुण कुमार, अर्थशास्त्री 


कोरोना महमारी की वजह से पैदा हुए आर्थिक संकट से क्या हम तेजी से उबरने लगे हैं? गुरुवार को बंबई शेयर सूचकांक आश्चर्यजनक रूप से 50 हजार के आंकड़े के पार चला गया। अपने 145 साल के इतिहास में पहली बार बीएसई ने इस ऊंचाई को छुआ है। दूसरी तरफ, रिजर्व बैंक का मानना है कि देश की जीडीपी दर सकारात्मक होने के करीब है, और वित्त वर्ष 2020-21 की तीसरी तिमाही में यह बढ़कर 0.1 फीसदी हो सकती है। सरकार यह भी मान रही है कि चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था में 7.7 फीसदी की ही गिरावट हो सकती है, जो पहले 10 फीसदी आंकी गई थी। जाहिर है, ये आंकड़े किसी को भी सुकून दे सकते हैं। मगर इन्हीं आंकड़ों के आधार पर पूरी अर्थव्यवस्था को सेहतमंद बता देना भ्रम पैदा करने जैसा होगा। सबसे पहले बात शेयर बाजार की। यह लोगों की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है। अपने यहां अब भी महज तीन फीसदी आबादी इक्विटी म्यूचुअल फंड में पैसे लगाती है। इसकी तुलना यदि अमेरिका जैसे देश से करें, तो वहां शेयर बाजार में लगभग आधी आबादी निवेश करती है।  दिक्कत यह भी है कि अपने यहां 0.1 फीसदी कारोबारी ही पूरे शेयर बाजार पर हावी हैं। ये वे लोग हैं, जिनकी कंपनियां अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। जैसे कि तकनीक और प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनियां, एफएमसीजी यानी उपभोक्ता वस्तु बनाने वाली कंपनियां आदि। इसीलिए शेयर बाजार की इस उछाल को आम लोगों की आर्थिक तरक्की से नहीं जोड़ सकते। सेंसेक्स की इस तेजी की एक वजह और भी है। अब बैंक जैसे वित्तीय संस्थानों में ब्याज कम हो गए हैं। इनमें ब्याज दरें लगातार घटती गई हैं, जिसके कारण निवेशक नए विकल्प तलाश रहे हैं। रियल एस्टेट उनके निवेश का एक रास्ता जरूर था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उसमें भी मंदी छाई हुई है। अच्छी बात है कि कोरोना संकट को देखते हुए अमेरिका, यूरोप जैसे देशों के बाजार में वहां के केंद्रीय बैंकों ने तरलता बढ़ाई है। अपने यहां भी नौ लाख करोड़ रुपये की नकदी बाजार में आने की बात कही जा रही है। चूंकि बैंकों की हालत अभी खस्ता है और रियल एस्टेट से आमद कम, इसलिए स्वाभाविक ही शेयर बाजार की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा है।

जनवरी 2020 की तुलना में भी हमारी अर्थव्यवस्था अब भी लगभग 10 फीसदी कम है। लॉकडाउन हटने के बाद कुछ ही कंपनियां खुद को संभाल सकी हैं। विमानन उद्योग, पर्यटन उद्योग, होटल-रेस्तरां आदि की हालत तो अब भी खस्ता है। आकलन यह है कि ऐसी स्थिति अभी एक-डेढ़ साल तक बनी रहेगी। इसका सीधा मतलब है कि इतने दिनों तक बाजार में भी अनिश्चितता बनी रहेगी। उम्मीद जरूर कोरोना टीकाकरण अभियान से है, और माना जा रहा है कि जैसे-जैसे इसमें गति आती जाएगी, अर्थव्यवस्था में सुधार दिखने लगेंगे। मगर टीकाकरण की रफ्तार को देखकर यही कहा जा सकता है कि देश की 60 फीसदी आबादी को टीका लगने में एक साल का वक्त लग जाएगा। यानी बाजार अभी अनिश्चितता में फंसा रहेगा। ऐसे में, शेयर बाजार की यह तेजी इसलिए भी छलावा साबित हो सकती है, क्योंकि अब भी यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता कि कोविड-19 संक्रमण की नई लहर अपने यहां नहीं आएगी। कई देशों में कोरोना संक्रमण बढ़ने पर फिर से लॉकडाउन लगाया गया है। इसलिए जब तक हम ‘हर्ड इम्यूनिटी’ विकसित नहीं कर लेते, बाजार के स्थिर होने का दावा नहीं कर सकते। अपने यहां साल 2007 के दिसंबर में सेंसेक्स पहली बार 21 हजार के पार गया था। उस वक्त दुनिया भर में जबर्दस्त तेजी थी। मगर सब-प्राइम संकट की वजह से जब अमेरिका में प्रॉपर्टी बाजार का गुब्बार फूटा, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था डूब गई। हर देश के शेयर बाजार 50 फीसदी से भी ज्यादा गिर गए। अपने यहां भी तब सूचकांक घटकर 9,000 पर आ गया था। 1990 के दशक के हर्षद मेहता घोटाले ने भी आम लोगों की जमा-पूंजी को डूबा दिया था। इसीलिए शेयर बाजार को असल अर्थव्यवस्था से अलग माना जाता है।

रही बात सकल घरेलू उत्पाद की, तो इसके तिमाही आंकड़े लगातार अच्छी तस्वीर दिखा रहे हैं। यह वाजिब भी है। हमने अब अपने बाजार पूरी तरह से खोल दिए हैं। लॉकडाउन के दौरान देशव्यापी बंदी की जो स्थिति थी, वह अब पूरी तरह से खत्म हो गई है। ऐसे में, उत्पादन का बढ़ना बिल्कुल स्वाभाविक है, जिसका असर बाजार पर भी दिख रहा है और आंकड़ों में भी। मगर सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में मुख्यत: संगठित क्षेत्र को शामिल किया जाता है। इसमें कृषि को छोड़कर किसी असंगठित क्षेत्र की गिनती नहीं होती। हमारी अर्थव्यवस्था में 14 फीसदी हिस्सा कृषि का है, जबकि 31 प्रतिशत के करीब हिस्सेदारी गैर-कृषि असंगठित क्षेत्र की है। वित्तीय संस्थाएं यह मान बैठती हैं कि संगठित क्षेत्र की तरक्की के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र भी समान गति से आगे बढ़ते हैं। वास्तव में, यह सोच गलत है।

यदि असंगठित क्षेत्र को भी जीडीपी के आंकड़ों में शामिल कर लें, तो अब भी हमारी अर्थव्यवस्था नकारात्मक 10 फीसदी होगी और उसकी सालाना गिरावट निगेटिव 29 फीसदी। यह भी इस आधार पर अंदाजा लगाया गया है कि जनवरी में पांच फीसदी की गिरावट के बावजूद फरवरी में हमारी अर्थव्यवस्था साल 2019 के स्तर पर आ जाएगी। असंगठित क्षेत्रों की हालत कितनी बिगड़ी हुई है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक महीने पूर्व सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग की 20 फीसदी इकाइयां अपना कर्ज वापस करने में सक्षम नहीं थीं। इसका अर्थ है कि उनके पास पैसे नहीं हैं, जबकि असंगठित क्षेत्र की बुनियाद पर ही संगठित क्षेत्र आगे बढ़ सकता है। साफ है, दो महीने की तुलना में अभी जीडीपी दर बेशक ज्यादा है, लेकिन साल 2019 के बनिस्बत यह अब भी काफी कम है। लॉकडाउन के समय हमारे यहां उत्पादन में लगभग 75 फीसदी की गिरावट आई थी, और यह अब भी 10 फीसदी कम है। इसलिए अगले वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में हम अप्रत्याशित वृद्धि भी देख सकते हैं। लेकिन इसको अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर तो नहीं ही कहेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Friday, January 22, 2021

अमेरिकी गौरव लौटाने का इरादा (हिन्दुस्तान)

अरविंद गुप्ता, डायरेक्टर, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन 

अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद जो बाइडन का भावपूर्ण उद्बोधन कई मायनों में भरोसा जगाता है। यह वही राष्ट्र है, जहां संसद की गरिमा को कुछ दिन पूर्व चंद लोगों ने तार-तार करने की कोशिश की थी। लिहाजा, कैपिटल हिल के प्रांगण से देश को संबोधित करते समय बाइडन के सामने न सिर्फ लोकतंत्र के प्रति लोगों के डिगे विश्वास को बचाए रखने की चुनौती थी, बल्कि विश्व नेता के तौर पर अमेरिका का खाका भी खींचना था। वह इसमें सफल साबित हुए हैं। इसीलिए डेमोक्रेटिक पार्टी के आलोचक भी यह कहने से नहीं चूक रहे कि जॉन एफ केनेडी के बाद बाइडन से अच्छा भाषण शायद ही किसी राष्ट्रपति ने दिया है। बाइडन ने अपने संबोधन में कैपिटल हिल की हिंसा, कोविड-19 से निपटने में नाकामी और सामाजिक अलगाव की खासतौर से चर्चा की है। अपने चुनाव अभियान के समय उन्होंने कहा भी था कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति-काल में अमेरिकी समाज कहीं ज्यादा बंट गया है। अपने संबोधन में वह इस खाई को पाटने के लिए गंभीर दिखे। बाइडन ने कहा कि बिना एक हुए अमेरिका में शांति नहीं आ सकती। नए राष्ट्रपति ने मूलत: अपने नागरिकों को ही संबोधित किया। उन्होंने अमेरिका में पसर रही नाउम्मीदी पर चिंता जताई। बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट, नस्लवादी असमानता जैसी तमाम समस्याओं को अपने लिए चुनौती माना। अर्थव्यवस्था पर बढ़ते भार और जलवायु परिवर्तन से पैदा होती मुश्किलों का भी उन्होंने जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका के 200 साल के इतिहास में इस तरह एक साथ इतने संकट नहीं आए थे। इनको ठीक करना है, और यह तभी हो सकता है, जब पूरा अमेरिका एक हो जाए। 

बाइडन ने यूरोप और ट्रांस अटलांटिक का भले ही नाम नहीं लिया, लेकिन इशारों-इशारों में अपनी विदेश नीति जरूर स्पष्ट कर दी। उनकी बातों का यदि मजमून देखें, तो आने वाले दिनों में अमेरिका विश्व के साथ अपने रिश्ते नए सिरे से शुरू करेगा। इतना ही नहीं, सहयोगी अथवा मित्र राष्ट्रों के साथ बिगड़ते संबंधों को भी दुरुस्त किया जाएगा। पहले ही दिन बाइडन ने जलवायु परिवर्तन समझौते पर वापस लौटकर, विश्व स्वास्थ्य संगठन से हटने के फैसले को रोककर, सीमा पर दीवार बनाने के फैसले को पलटकर अपनी मंशा जाहिर कर दी है। डोनाल्ड ट्रंप जब ह्वाइट हाउस में दाखिल हुए थे, तब उन्होंने ‘अमेरिका फस्र्ट’ का नारा दिया था, लेकिन जो बाइडन ‘अमेरिका टुगेदर’ की वकालत कर रहे हैं। देखा जाए, तो आज के अमेरिका को इसकी सर्वाधिक जरूरत है। वहां जिस तरह से नस्लीय विभाजन बढ़ गया है, उसको देखते हुए अमेरिकियों में एका की सर्वाधिक जरूरत है। अमेरिका की घरेलू खुफिया और सुरक्षा सेवा एजेंसी ‘फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन’ की रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका में जाति, नस्ल, वंश, धर्म, लिंग आदि के प्रति पूर्वाग्रह से प्रेरित अपराधों में खासा वृद्धि हुई है। साल 2019 में इस तरह के 7,314 अपराध हुए थे, जबकि 2018 में 7,120 अपराध। ये दशक भर पहले यानी 2008 में दर्ज 7,783 मामलों के बाद सबसे ज्यादा ‘हेट क्राइम’ वाले साल हैं।

इसके अलावा भी दोनों राष्ट्रपतियों के भाषण में कई अंतर थे। मसलन, 1,433 शब्दों के अपने भाषण में ट्रंप ने जहां अधिकतर समय उन लोगों की आलोचना की, जो उन्हें पसंद नहीं करते थे, तो बाइडन पूरे अमेरिकियों को संबोधित करते दिखे और सभी से अधिकतम एकता बनाए रखने का आग्रह किया। ट्रंप ने ‘स्ट्रॉन्ग अमेरिका’ (मजबूत अमेरिका), ‘प्राउड अगेन’ (फिर से गौरव अर्जित करना), ‘सेफ अगेन’ (फिर से सुरक्षित होना), ‘ग्रेट अगेन’ (फिर से महान बनना), ‘अमेरिका फस्र्ट’ (सबसे पहले अमेरिका) जैसे नारे दिए थे, तो वहीं जो बाइडन ‘अमेरिका टुगेदर’ (एक अमेरिका), ‘हील अमेरिका’ (अमेरिका के जख्मों पर मरहम लगाना) जैसे शब्दों पर जोर देते नजर आए। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति ऐसी आग नहीं बननी चाहिए, जो अपने मार्ग में आने वाले हर चीज को जला दे। राजनीतिक असहमति किसी भी तरह से युद्ध की वजह नहीं बननी चाहिए। अपनी इन पंक्तियों के जरिए वह अमेरिकियों को आदर्श लोकतांत्रिक मूल्यों से परिचित कराते दिखे।

बहरहाल, भारत के लिए अच्छी बात यह है कि 20 भारतवंशियों को नए अमेरिकी प्रशासन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। इनमें से कई ह्वाइट हाउस का हिस्सा होंगे, जो अमेरिकी सरकार का प्रमुख स्तंभ माना जाता है। भारतवंशियों का यह सम्मान संकेत देता है कि अमेरिका की शासन-व्यवस्था में भारतीयों का महत्व समझा जाने लगा है, जबकि कुल अमेरिकी आबादी में भारतीय मूल के लोगों की संख्या बमुश्किल एक फीसदी है। भारतीय मूल की कमला हैरिस को उप-राष्ट्रपति तो बनाया ही गया है, नीरा टंडन को ह्वाइट हाउस में प्रबंधन और बजट कार्यालय का निदेशक नियुक्त किया गया है। इसके अलावा, विवेक मूर्ति को अमेरिकी सर्जन जनरल, वनिता गुप्ता को असोशिएट अटॉर्नी जनरल, उजरा जेया को विदेश मंत्रालय में नागरिक सुरक्षा, लोकतंत्र और मानवाधिकारों का सचिव बनाया गया है। बाकी तमाम भारतवंशियों को भी अहम ओहदे मिले हैं।

हालांकि, इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि ये सभी भारत के हित में ही काम करेंगे। इनमें से अनेक के पूर्वज जब अमेरिका में बसने गए थे, तब से अब तक दो-तीन पीढ़ियां गुजर चुकी हैं। इसीलिए ये सभी बुनियादी तौर पर अमेरिकी हैं और अमेरिकी हितों का ही पोषण करेंगे। हमें नहीं भूलना चाहिए कि कमला हैरिस ने भी अपने चुनाव अभियान में भारतीय मां की तुलना में जमैका मूल के अश्वेत पिता का ज्यादा जिक्र किया था। वह अपनी अश्वेत पहचान को दक्षिण एशियाई पहचान से ज्यादा तवज्जो देती हैं। यही कारण है कि हमें अपने मुद्दों को लेकर खास रणनीति बनानी होगी। भारत के विदेश मंत्रालय और कूटनीतिज्ञों को पूरी बाइडन टीम से सरोकार रखना होगा। बाइडन प्रशासन में ऐसे भी कई लोग हैं, जो कथित मानवाधिकार हनन और कश्मीर मसले पर भारत की निंदा कर चुके हैं। फिर भी, बाइडन सरकार से काफी उम्मीदें हैं। एक बड़ा मसला आप्रवसान का भी है, जिससे जुड़े दो आदेश पारित करके नए राष्ट्रपति ने अपने पहले दिन की शुरुआत की है। अब नजर ट्रंप की एच-1 बी वीजा पॉलिसी पर है, जिसे खुद बाइडन भेदभावपूर्ण बता चुके हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Thursday, January 21, 2021

अमेरिका में भरोसे की नई भोर (हिन्दुस्तान)

फ्रैंक एफ इस्लाम, अमेरिकावासी उद्यमी व समाजसेवी  


अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के रूप में जो बाइडन का शपथ लेना इसके इतिहास के एक सबसे दुखद और काले अध्याय का अंत होने के साथ ही उम्मीद व भरोसे से भरे एक नए युग की शुरुआत भी है। पूर्व उप-राष्ट्रपति और पूर्व सीनेटर बाइडन के राष्ट्रपति पद संभालते ही न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया में एक नई सुबह तय है। बतौर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रवृत्ति किस कदर विनाशकारी रही, इसे देश-दुनिया के तमाम मीडिया ने बताया ही है। ह्वाइट हाउस में बिताए गए उनके चार वर्षों में कई बडे़ रद्दोबदल हुए। मसलन, नस्ल संबंधी मसलों के खिलाफ अमेरिका ने जो लाभ कमाया था, ट्रंप ने उनमें से ज्यादातर को गंवा दिया। आप्रवासन को उन्होंने जमकर हतोत्साहित किया, जबकि गैर-यूरोपीय देशों से आए लोगों ने ही अमेरिका का निर्माण किया है। पर्यावरण से जुड़े सौ से अधिक प्रावधान उन्होंने वापस लिए। मीडिया सहित देश के तमाम संस्थानों को उन्होंने लगातार निशाना बनाया। और तो और, पेरिस समझौते, विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी वैश्विक संधियों-संस्थाओं से उन्होंने अमेरिका को निकाल बाहर किया, और विश्व नेता की उसकी छवि खंडित करके रूस व चीन जैसे देशों को उस शून्य को भरने दिया।

स्थिति यह थी कि ओवल ऑफिस से विदा होते हुए भी ट्रंप ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नतीजों को स्वीकार नहीं किया। अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत, शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता सौंपने के बजाय उन्होंने अपने समर्थकों को बगावत के लिए उकसाया। संक्षेप में कहें, तो अमेरिका में अलगाव की लकीर को गहरा करके उन्होंने अपना पद छोड़ा है।

विभिन्न मुद्दों को निपटाने और समस्याओं के समाधान के मामले में भी ट्रंप अमेरिका के अक्षम राष्ट्रपतियों में गिने जाएंगे। कोविड-19 से निपटने का ही मामला लें, तो इस देश के पास सबसे बड़ा और अत्याधुनिक स्वास्थ्य ढांचा है। इसे तो अन्य राष्ट्रों के मुकाबले बेहतर तरीके से इस महामारी से लड़ना चाहिए था। मगर कोरोना के कुल वैश्विक मामलों में 25 फीसदी से अधिक यहीं दर्ज किए गए और कुल मौतों में भी 20 फीसदी से अधिक मौतें यहीं हुईं, जबकि यहां वैश्विक आबादी का महज पांच फीसदी हिस्सा ही बसता है। सुखद है कि अब अमेरिका की कमान एक ऐसे नेता के हाथों में है, जो देश को इन तमाम मुश्किलों से बाहर निकालने में सक्षम हैं। अपने चुनाव अभियान में बाइडन ने मतदाताओं से वायदा भी किया था कि वह सिर्फ अपने समर्थकों के मुखिया के रूप में नहीं, पूरे राष्ट्र के राष्ट्रपति के रूप में काम करेंगे। जीत के बाद उनके यही शब्द थे कि वह समाज में बढ़ती अलगाव की भावना को कम करने का प्रयास करेंगे। इतना ही नहीं, सुकून की बात यह भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में एक ऐसे इंसान ने सत्ता संभाली है, जो अमेरिकी संस्थानों में विश्वास रखता है, फिर चाहे वह न्यायपालिका हो, विधायिका हो या फिर मीडिया। तथाकथित ‘कंजर्वेटिव’ राष्ट्रपतियों के विपरीत, बाइडन तमाम परंपराओं का सम्मान करते रहे हैं। 

पिछले चार वर्षों में ह्वाइट हाउस ने ‘जवाबदेही-मुक्त क्षेत्र’ के रूप में काम किया है। बाइडन ने स्पष्ट कहा है कि उनकी सरकार में वह हर तरह से जवाबदेह बनेगा। नए प्रशासन से उम्मीद इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि विभिन्न विभागों व एजेंसियों के शीर्ष पदों को भरने में विविधता, विषय-वस्तु की विशेषज्ञता और क्षमता का पूरा ख्याल रखा गया है। माना जा रहा है कि नया प्रशासन जिम्मेदारी संभालते ही कोरोना वायरस सुधार पैकेज तो जारी करेगा ही, ऐसे कई आदेश भी पारित करेगा, जो ट्रंप के कई विवादित फैसलों को पलट देगा। पेरिस जलवायु समझौते में फिर से शामिल होने, विश्व स्वास्थ्य संगठन का हिस्सा बनने और मुस्लिम देशों पर लगाए गए यात्रा प्रतिबंधों को रद्द करने जैसे कदम इनमें प्रमुखता से शामिल हो सकते हैं। नई सरकार कोरोना वायरस को लेकर भी कई नियम बना सकती है। जैसे मास्क पहनना अनिवार्य बनाया जा सकता है, कोविड जांच का दायरा बढ़ाया जा सकता है, और किराया व देनदारी आदि भुगतान न कर सकने वाले लोगों की बेदखली रोकी जा सकती है। बाइडन प्रशासन कोविड-19 से युद्धस्तर पर निपटने के लिए तैयार दिख रहा है, जिसकी तस्दीक इस बात से भी होती है कि नए राष्ट्रपति सत्तासीन होने से पहले ही विशेषज्ञ व वैज्ञानिकों के संपर्क में थे।

इसी तरह, घरेलू व विदेश नीति, और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी टीमों के गठन में भी अनुभव और प्रतिभा को तवज्जो दी गई है। बाइडन अमेरिका को फिर से विश्व नेता बनाने के लिए तैयार दिख रहे हैं। यह वह हैसियत है,  जिसको अमेरिका एक सदी से भी अधिक समय तक जीता रहा है। अपने नाटो सहयोगियों के साथ संबंध सुधारने, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसी सक्रिय भूमिका निभाने के लिए यह तत्पर दिख रहा है, जो दुनिया के सभी देशों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा। निस्संदेह, बाइडन प्रशासन वैश्विक राजनीति और नीतियों में भी हलचल पैदा करेगा। नए राष्ट्रपति ने कहा भी है कि ‘अमेरिका इज बैक’, यानी अमेरिका लौट आया है, और हम एक बार फिर शीर्ष पर आएंगे। 32 साल पहले अपने विदाई भाषण में रिपब्लिकन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने अमेरिका को ‘शाइनिंग सिटी ऑन अ हिल’ कहा था। खुशहाल अमेरिका की कल्पना करते इस मुहावरे का इस्तेमाल उन्होंने अपने आठ वर्षों के राष्ट्रपति काल मं् लगातार किया। रोनाल्ड रीगन ने, जो तब सोवियत संघ के साथ शीत युद्ध में मुकाबिल थे,  हमेशा अमेरिका को अच्छी ताकत के रूप में देखा था। विडंबना है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को फिर से महान बनाने का वायदा तो किया, पर अमेरिका के इस चरित्र को 1,461 दिनों में खत्म कर दिया। रीगन जब ह्वाइट हाउस पहुंचे थे, तब बाइडन 39 वर्षीय सीनेटर थे। आज जीवन के आठवें दशक में वह एक बार फिर अमेरिका को अच्छी ताकत बनाने के लिए तैयार हैं, और देश को ‘शाइनिंग सिटी ऑन अ हिल’ बनाना चाहते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Wednesday, January 20, 2021

नेपाल को संदेश और सहयोग (हिन्दुस्तान)

पुष्परंजन, संपादक, ईयू-एशिया न्यूज 


नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावाली काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय विमान स्थल पर शनिवार को जैसे ही उतरे, पत्रकारों का सबसे पहला सवाल था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आपसे मिले क्यों नहीं? ज्ञावाली ने इसका जवाब न देकर 15 जनवरी, 2021 को भारत-नेपाल संयुक्त आयोग की छठी बैठक में क्या कुछ हुआ, उसकी प्रमुख बातें बताकर पत्रकारों से पीछा छुड़ाया। नेपाली विदेश मंत्री ने यह जरूर जोड़ा कि भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मैं मिला, और सुरक्षा सहयोग पर चर्चा के साथ कालापानी पर भी मैंने नेपाल का पक्ष रखा। इतना बयान दे देने भर से यह विषय नेपथ्य में नहीं गया है। विक्रम और वेताल की तरह बात वहीं आ जाती है कि प्रधानमंत्री मोदी मिले क्यों नहीं? नेपाली अखबारों के संपादकीय, वहां का सोशल मीडिया, समवेत स्वर में यह टिप्पणी कर रहे हैं, ‘21 अगस्त, 2019 को भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर जब पांचवीं बैठक के वास्ते काठमांडू आए थे, तब प्रधानमंत्री ओली से भेंट हुई थी। प्रधानमंत्री मोदी ने समय न देकर नेपाल के राष्ट्राभिमान को आहत किया है।’ इससे यही प्रतीत होता है कि सातवीं बैठक काठमांडू में हुई, तो वहां के राष्ट्रवादियों का प्रयास होगा कि नेपाल के प्रधानमंत्री भारतीय विदेश मंत्री को मिलने का समय न दें।

लेकिन क्या यह प्रोटोकॉल का अनिवार्य हिस्सा है कि नेपाली विदेश मंत्री संयुक्त बैठक के वास्ते पधारें, तो प्रधानमंत्री से मिलें ही? इसे कूटनीतिक शिष्टाचार का निर्वाह कह लीजिए कि प्रधानमंत्री विदेश से पधारे बड़े नेताओं से मिल लेते हैं। 23 साल से मुर्दा पडे़ इस संयुक्त आयोग को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के रहते फिर से जिंदा किया गया था। सुषमा स्वराज और उनके तत्कालीन समकक्ष महेंद्र बहादुर पांडे ने काठमांडू में 26 जुलाई, 2014 को पहली ‘जेसीएम’ अर्थात ज्वॉइंट कमीशन मीटिंग की थी। मोदी काल में भारत-नेपाल संयुक्त आयोग की बैठकों को पुनर्जीवित करना अच्छा फैसला था, जिससे दोनों पक्षों की शंकाओं के निवारण और सहयोग के नए आयाम ढूंढे़ जाते हैं। इस समय नेपाल को तत्काल कोविड वैक्सीन की आवश्यकता है। भारत से वैक्सीन नेपाल पहुंच जाएं, तो इसे विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावाली को अपनी दिल्ली यात्रा की उपलब्धि माननी चाहिए। 15 जनवरी, 2021 की बैठक में स्वयं विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावाली ने कोविशील्ड व कोवैक्सीन के लिए भारत को बधाई दी है, और वह वैक्सीन की एक करोड़ 20 लाख डोज भेजने का आग्रह कर गए हैं। उधर चीन भी नेपाल में वैक्सीन कूटनीति खेलने के प्रयास में है। ज्ञावाली यह भी प्रस्ताव दे गए हैं कि नेपाल को इसके निर्माता सीरम इंस्टीट्यूट से वैक्सीन खरीदने की अनुमति दी जाए। भारत को इस पर त्वरित कार्रवाई करने की जरूरत है।

संयुक्त आयोग की बैठक में ज्ञावाली के साथ उपस्थित विदेश मंत्री एस जयशंकर, विदेश सचिव हर्षवद्र्धन शृंगला, उनके नेपाली समकक्ष भरत राज पौडेल ने कनेक्टिविटी, अर्थ-व्यापार, ऊर्जा, तेल और गैस, जल संसाधन, सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, पर्यटन, शिक्षा, संस्कृति के क्षेत्र में आदान-प्रदान जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की। मोतिहारी से अमलेखगंज तक पेट्रोलियम पाइपलाइन को चितवन तक विस्तार देने, इससे इतर पूर्वी क्षेत्र में सिलीगुड़ी से झापा तक ऐसी ही पाइपलाइन लगाने पर चर्चा हुई। जयनगर से नेपाल के कुर्था तक बड़ी रेल लाइन लग जाने से इस इलाके का कायाकल्प होना है, इसे नेपाली पक्ष भी महसूस करता है। रक्सौल से काठमांडू ब्रॉड गेज रेल पर यदि काम शुरू होता है, तो यह सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाए। साझा बैठक में पशुपतिनाथ रिवर फ्रंट बनाने, ऐतिहासिक पाटन दरबार का भंडारखाल बगैचा के कायाकल्प समेत पंचेश्वर बहुउद्देश्यीय परियोजना पर भी चर्चा हुई। मुश्किल यह है कि नेपाली मीडिया का पूरा ध्यान नकारात्मक खबरों पर केंद्रित रहा है। वहां इस बात की खोज होती रही कि कालापानी-लिपुलेख मुद्दे को विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावाली ने कितने पुरजोर तरीके से उठाया, और भारतीय पक्ष की ओर से क्या उत्तर मिला? मगर, भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस बैठक पर जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, उसमें कालापानी-लिपुलेख की चर्चा नहीं है। ज्ञावाली शायद ऐसा सोचकर दिल्ली आए थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात में इस विषय पर चर्चा करूंगा। संभवत: यही वह बिंदु है, जिसकी वजह से प्रधानमंत्री भेंट को टाल गए। नेपाल के लिए यह राजनीतिक संक्रमण काल है। संसद भंग है और सड़क पर शीर्ष नेता हिसाब-किताब कर रहे हैं। प्रचंड ने आरोप लगाया कि ओली की कुरसी प्रधानमंत्री मोदी की वजह से टिकी हुई है, वरना वह  निपट गए होते। ऐसे संदेह वाले माहौल में नरेंद्र मोदी का ज्ञावाली से न मिलना, कूटनीतिक विवेक और गंभीरता को ही दर्शाता है। कालापानी-लिपुलेख से भी बड़ा विषय भारत-नेपाल के बीच 1950 की संधि को बनाए रखना है। ओली और प्रचंड का राष्ट्रवाद समय-समय पर इस विषय को लेकर जगता रहा है। इसमें पलीता लगाने में भूगोलवेत्ता, राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अध्यक्ष डॉक्टर हर्क गुरूंग की बड़ी भूमिका थी। 23 सितंबर, 2006 को गुरूंग हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए, मगर अपने जीवनकाल में यह निष्कर्ष दे गए कि 1950 संधि की धाराएं बदली जाएं। नेपाली कम्युनिस्टों को आपत्ति 1950 संधि के अनुच्छेद 2 पर है, जिसमें क्षेत्रीय अखंडता की चर्चा है, अनुच्छेद 5 को बदलकर नेपाल तीसरे मुल्क से हथियारों का अबाध आयात चाहता है, अनुच्छेद 6 में आर्थिक बाध्यताएं हैं, और अनुच्छेद 7को संशोधित करने के बाद भारतीय मूल के लोग वर्क परमिट के आधार पर ही नेपाल में काम कर सकेंगे। इन अनुच्छेदों में बदलाव दोनों देशों के नागरिकों के लिए परेशानियों से भरा होगा। 1950 की संधि को दुरुस्त करने के वास्ते, जुलाई 2016 में भारत-नेपाल के प्रसिद्ध लोगों का आठ सदस्यीय समूह बना, जिसका नाम रखा था ईपीजी (इमीनेंट पर्सन्स ग्रुप)। नेपाल की ओर से इस समूह के संयोजक हैं राजदूत भेख बहादुर थापा और भारत में भगत सिंह  कोश्यारी इसका नेतृत्व कर रहे हैं। ‘ईपीजी’ की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है, मगर नेपाली मीडिया पूरे विश्वास से कह जाता है कि भारत 1950 की संधि बदलने को तैयार है। ईपीजी की अवधि 2018 में पूरी हो गई, पर प्रधानमंत्री मोदी को रिपोर्ट अभी सौंपी नहीं गई है। रिपोर्ट चाहे जब भी सार्वजनिक हो, मानकर चलिए कि बर्र के छत्ते में हाथ डालने के बराबर है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Tuesday, January 19, 2021

पुराने समीकरण में नया गठजोड़ (हिन्दुस्तान)

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार  

तमिलनाडु की राजनीति में ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी योजना भविष्य के लिए टाल दी है। काफी ऊहापोह के बाद अब वह फिर से सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के नेतृत्व को स्वीकारती हुई दिख रही है और मिलकर ही आगामी राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ेगी। इस समय भाजपा की सोच यही लग रही है कि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के तमाम सहयोगी दलों को साथ लाकर अन्नाद्रमुक के हाथों को मजबूत करना चाहती है, ताकि सभी मिलकर द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन को हरा सकें। साल 2016 के विधानसभा चुनाव में जयललिता के नेतृत्व के बावजूद अन्नाद्रमुक गठबंधन अपने प्रतिद्वंद्वी द्रमुक गठजोड़ से बमुश्किल एक फीसदी वोट अधिक पा सका था। इसलिए कोई भी आंतरिक कलह और वोट प्रतिशत में गिरावट गठबंधन को प्रभावित कर सकता है।

भाजपा राज्य में अपना शासन चाहती है, ताकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल सके। इसके अलावा, अन्नाद्रमुक की हमराह बनकर यदि इसने कुछ विधानसभा सीटें जीत लीं, तो बिहार मॉडल की तरह यहां भी वह मंत्रिमंडल साझा कर सकती है। यह रणनीति मुख्यमंत्री ई पलानीसामी के भी अनुकूल है, जो तमाम उठापटक के बावजूद पिछले चार वर्षों से अपनी पार्टी अन्नाद्रमुक को एक रखने में सफल रहे हैं। राज्य में भाजपा बेशक कमजोर है और वह अन्नाद्रमुक की ताकत में बहुत ज्यादा इजाफा नहीं कर सकेगी, पर करीबी मुकाबले में हरेक वोट ही कीमती होता है। भाजपा को गठबंधन से बाहर रखना समझदारी भरा कदम नहीं होगा, क्योंकि केंद्र में वह सत्ता में है, जिसका नुकसान मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी को हो सकता है। मुख्यमंत्री पलानीसामी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सकते हैं। संभावना है कि दोनों नेता गठबंधन पर अंतिम मुहर लगा सकते हैं। प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी अन्नाद्रमुक के साथ पीएमके (डॉ रामदास), डीएमडीके (विजयकांत), टीएमसी (दिवंगत कांग्रेसी जी के मूपनार) जैसे एनडीए के अन्य घटक दलों के साथ भी गठबंधन पर चर्चा कर सकते हैं। हालांकि, पलानीसामी प्रधानमंत्री को चेन्नई के मरीना तट पर बने जे जयललिता मेमोरियल के उद्घाटन के लिए आमंत्रित करने आ रहे हैं, पर इस मौके का उपयोग सूबे की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा के लिए किया जा सकता है। 

भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति राज्य की राजनीति में अपनी जमीन मजबूत करने की है, ताकि अगले दशक में वह अपने पांव पर खड़ी हो सके। पिछले चार वर्षों से भाजपा राज्य में अपना आधार मजबूत करने के लिए प्रयास करती रही है, क्योंकि जब राज्य में एम करुणानिधि और जे जयललिता जैसे शक्तिशाली क्षत्रप थे, तब उसके लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जयललिता के भले ही अच्छे रिश्ते रहे, लेकिन उन्होंने 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन करने से इनकार कर दिया था। उनके निधन के बाद हतोत्साहित अन्नाद्रमुक ने 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठजोड़ किया। मगर इस गठबंधन को द्रमुक नेतृत्व वाले गठबंधन से करारी शिकस्त मिली और सिर्फ एक सीट उसके खाते में आ सकी। हालांकि, विधानसभा के उप-चुनावों में 11 सीटें जीतकर सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक राज्य में अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रही, जबकि 13 सीटें जीतने के बाद भी द्रमुक उसकी कुरसी छीन नहीं पाई। 2019 के आम चुनाव के बाद से ही भाजपा और संघ परिवार तमिलनाडु में भगवा लहर के उभार के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए कई योजनाएं बनाई गईं, जिनमें से एक धार्मिक आयोजनों के दौरान अपने काडर को संगठित करना भी था। इन प्रयासों का मकसद राज्य में हिंदू वोट को एक करना था। हालांकि, ब्राह्मणों को छोड़कर अन्य कई उच्च जाति के हिंदू भाजपा की तरफ झुकाव रखते थे, लेकिन पार्टी को उन्हें भुनाने का मौका नहीं मिल सका। ऐसा इसलिए, क्योंकि तमिलनाडु अत्यधिक धार्मिक राज्य तो है, लेकिन धर्म और चुनावी राजनीति का घालमेल तमिल लोग नहीं करते। भाजपा इसका तोड़ नहीं निकाल सकी है। भाजपा के पास राज्य में करिश्माई नेतृत्व का अभाव है, लेकिन जो थोड़ी-बहुत उम्मीद थी, वह भी सुपर स्टार रजनीकांत के एलान के बाद जमींदोज हो गई। पार्टी को भरोसा था कि रजनीकांत या तो भाजपा में शामिल हो जाएंगे या ऐसी पार्टी बनाएंगे, जो भाजपा के साथ होगी। आपस में मिलकर चुनावी बाजी मारने के सपने भी वह देख रही थी। पर स्वास्थ्य कारणों से राजनीति से दूर रहने की रजनीकांत की घोषणा ने यह योजना विफल कर दी। नतीजतन, द्रविड़ राजनीति के इतर सरकार देने का वादा करने वाली भाजपा गठबंधन का राग अलापने लगी। इस बाबत पहला संकेत तब मिला, जब राज्य में पार्टी के पर्यवेक्षक सी टी रवि ने पलानीसामी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में कुबूल कर लिया। यह उन स्वरों को शांत करने जैसा था, जिसमें पार्टी के कुछ स्थानीय पदाधिकारी पलानीसामी को अन्नाद्रमुक का मुख्यमंत्री चेहरा बता रहे थे, एनडीए का नहीं। उनका कहना था कि एनडीए के नेता का चयन चुनाव के बाद किया जाएगा। इस तरह के बयानों से पलानीसामी खेमा काफी खफा था। मुख्यमंत्री, जो उप-मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम द्वारा पैदा की गई राजनीतिक चुनौती से पार पाने में सफल रहे हैं, एन शशिकला की वापसी को लेकर भी खासे चिंतित हैं। शशिकला इस महीने के अंत में बेंगलुरु जेल से रिहा हो सकती हैं, जहां आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में वह सजा काट रही हैं। जाहिर है, भाजपा-अन्नाद्रमुक गठजोड़ होने के बाद चुनावी जंग द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच ही होगी। हालांकि, शुरुआत में द्रमुक को बढ़त मिलती दिखी थी, लेकिन पलानीसामी के जबर्दस्त प्रदर्शन से उसकी चमक फीकी पड़ने लगी है। कोविड संकट का बेहतर प्रबंधन करके भी मुख्यमंत्री लोगों का दिल जीतते हुए दिख रहे हैं, और नीट मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास करने वाले सरकारी स्कूलों के बच्चों को कॉलेजों में दाखिल में 7.5 फीसदी आरक्षण देने, एक बड़ी आबादी को 2,500 रुपये पोंगल उपहार देने जैसे लोक-लुभावन कदम भी उन्हें लोकप्रिय बना रहे हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Monday, January 18, 2021

डाटा महाठगिनी हम जानी (हिन्दुस्तान)

हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार 

वाट्सएप, फेसबुक, यू-ट्यूब, जी-मेल वगैरह हमें मुफ्त में मिलते हैं और प्ले स्टोर या एप स्टोर के जरिए हमारे मोबाइल फोन में आ विराजते हैं। हमारे यहां दान की बछिया के दांत न गिनने की परंपरा है, इसलिए इनकी खामियों या हमारे जीवन पर इनके अन्यथा असर को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। अगर ये सब आपको मुफ्त नहीं मिलते तो? तब आपको उसकी पूरी कीमत चुकानी पड़ती। यानी इनोवेशन, डेवलपमेंट और लगातार अपग्रेड की लागत, दुनिया के सबसे महंगे प्रबंधकों और कर्मचारियों की तनख्वाहें, आलीशान दफ्तरों और परिसरों के रखरखाव पर होने वाले खर्च, कंपनी के हरदम चलते रहने वाले सर्वरों पर व्यय होने वाली रकम, इसके अलावा अलाने-फलाने मदों में लगे ढेर सारे पैसे भी तब हमसे वसूले जाते। हमारी सरकारें भी इन पर जीएसटी वगैरह लगातीं। तब हो सकता है कि हमारे सारे एप की कुलजमा कीमत हमारे मोबाइल फोन से भी ज्यादा हो जाती। 

जाहिर है, हम आज सुबह-शाम जिन एप का इस्तेमाल करते हैं, उनमें से बहुत सारे एप तब हमारे मोबाइल में नहीं होते। काफी सारे लोग या तो इतना खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं होते, या उन्हें यह पैसे की बर्बादी लगता। किसी भी स्थिति में वे एप की कीमत को उससे मिलने वाली सुविधाओं से तौलते तो जरूर ही। मोबाइल सॉफ्टवेयर कंपनियां ये सब जानती हैं, इसलिए उन्होंने इसका दूसरा तरीका अपनाया है- तुम हमें अपनी जानकारियां दो, हम तुम्हें मुफ्त एप और उसकी सेवाएं देंगे। संचार की इस नई दुनिया का सारा अर्थशास्त्र हमारी इन जानकारियों, यानी डाटा के कारोबार पर टिका है, जैसे अखबार और टेलीविजन जैसे परंपरागत मीडिया का व्यवसाय विज्ञापनों पर। हम इसे सहर्ष स्वीकार करते हैं और बीच-बीच में ऋतु परिवर्तन की तरह निजता जैसे नैतिक मुद्दे भी उठते रहते हैं। नए साल की इन सर्दियों में वाट्सएप की निजता नीति में बदलाव हमारे 4-जी विमर्श को नई गरमी दे गया। वाट्सएप ने अगले महीने के दूसरे सप्ताह से लागू होने वाली जो नई निजता नीति की घोषणा की थी, उसमें आपकी बहुत सारी जानकारियां अपनी पैरेंट कंपनी फेसबुक के हवाले करने की बात थी। हालांकि, इसमें भी कुछ नया नहीं था। साल 2014 में जब फेसबुक ने वाट्सएप को खरीदा था, तब उसने यह कहा था कि दोनों कंपनियां डाटा शेयर नहीं करेंगी। लेकिन दो साल बाद ही यह वचन तोड़ दिया गया और पिछले चार साल से यह सब आराम से चल रहा है। इसमें नई चीज यह है कि अब इसका दायरा बढ़ाया जा रहा है। अभी तक वाट्सएप आपसे बहुत सी जानकारियां नहीं लेता था, अब वह भी आपसे ले लेना चाहता है। बहुत से लोगों की चिंता इसलिए भी है कि वाट्सएप के जरिए बहुत से लोग पेमेंट भी करने लगे हैं। इसके अलावा, ऐसी व्यवस्था भी की जा रही है कि लोग वाट्सएप के जरिए खरीदारी भी कर सकें। लोगों को डर है कि अब उनके सारे लेन-देन और खरीद-फरोख्त की जानकारियां भी वाट्सएप से होती हुई फेसबुक के हवाले हो जाएंगी। यह पहली बार होगा, ऐसा भी नहीं है। गूगल पहले से यह कर रहा है, लेकिन उसकी बात हम बाद में करेंगे, फिलहाल एक और एप की बात। अमेजन के एप से आप ऑनलाइन खरीदारी भी कर सकते हैं, भुगतान भी कर सकते हैं और वह इस पर भी नजर रखता है कि आप इस समय हैं कहां? यानी वाट्सएप जो नया कर रहा है, वह तो पहले से ही हो रहा है।

फिर ऐसी कोई जानकारी नहीं है, जो गूगल आपसे इस या उस तरीके से न लेता हो। उसे पता होता है कि आप इस समय कहां हैं? उसे मालूम होता है कि आप कब कहां गए थे? उसे पता होता है कि आपने किन बिलों का भुगतान कर दिया, किनका अभी बाकी है और किस बैंक की किस्त इस बार आप नहीं चुका पाए? वह जानता है कि किसने आपको मेल भेजा, आपने किसको जवाब दिया और किसको नहीं? कई बार वह यह भी बता देता है कि आपको जवाब क्या देना है? आपकी ही नहीं, आपके पूरे परिवार की जन्मतिथि भी उसे पता है, उनके फोन नंबर और बैंक अकाउंट नंबर भी। आपके मर्ज और डॉक्टर की जानकारी भी उससे नहीं छिपी है। लोगों की जानकारियों के बदले उन्हें सेवा देने के कारोबार की बड़े पैमाने पर शुरुआत गूगल ने ही की थी और वही इस बाजार का अगुवा भी है। साल 2019 में उसने 161 अरब डॉलर का मुनाफा कमाया था, जबकि फेसबुक का मुनाफा इसके आधे से भी कम, यानी 71 अरब डॉलर के करीब था। फेसबुक भी अब गूगल के रास्ते पर चलकर अपना मुनाफा बढ़ाना चाहता है, और इसके लिए आपसे वही सब जानकारियां मांग रहा है, जो आप खुशी-खुशी गूगल को देते रहे हैं। लेकिन ऐसा क्या हो गया कि गूगल का गुड़ खाने वाले अचानक ही फेसबुक और वाट्सएप के गुलगुलों से परहेज करने लग गए? इसका जवाब फेसबुक कंपनी के चरित्र में है। फेसबुक एक ऐसी कंपनी है, जो अक्सर गलत कारणों से खबरों में रहती है। चाहे डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव से जुडे़ विवाद हों या भारत में उसकी प्रतिनिधि आंखी दास से जुड़े विवाद। हर बार फेसबुक एक ऐसी कंपनी के रूप में सामने आती है, जिसे प्रबंधन की भाषा में ‘बैडली मैनेज्ड’ कंपनी कहा जाता है। निजता नीति के ताजा विवाद में भी यही दिखाई देता है। यह नीति तकरीबन सभी कंपनियां समय-समय पर बदलती रही हैं, लेकिन वाट्सएप ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उसमें एक तरह की धमकी निहित थी- आप सहमत नहीं हैं, तो आपका अकाउंट बंद!  धमकी ने संदेह भी पैदा किए और उपयोगकर्ताओं को सिग्नल व टेलीग्राम जैसे प्रतिद्वंद्वियों की ओर धकेल दिया, यानी शब्दों ने खता की, साख ने सजा पाई। फिलहाल इसे टाल दिया गया है।


(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Saturday, January 16, 2021

टीके से इतिहास रचता भारत (हिन्दुस्तान)

एन के अरोड़ा, चिकित्सा विशेषज्ञ एवं पूर्व प्राध्यापक, एम्स 


कोविड-19 के खिलाफ दुनिया के सबसे बडे़ टीकाकरण अभियान की आज शुरुआत हो रही है। इससे भारत विश्व के उन अग्रणी देशों में शुमार हो गया है, जहां विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है। पहले हम ऐसी उपलब्धियों के लिए पश्चिम का मुंह ताका करते थे, और कभी-कभी दशकों बाद हम इनका लाभ ले पाते थे। मगर अब हमारे वैज्ञानिक इस हैसियत में हैं कि वे अपनी सफलता दूसरे देशों से साझा कर सकेंगे। लिहाजा, देश के लिए प्रसन्नता के साथ-साथ यह गर्व का दिन है।

इस मुकाम तक पहुंचना जितना कठिन था, आगे की राह भी उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। पहली चुनौती इतनी बड़ी आबादी को एक साथ टीका लगाने की है। आमतौर पर यह देश साल भर में पांच से छह करोड़ जरूरतमंदों का टीकाकरण करता है। इनमें से आधे बच्चे होते हैं और शेष महिलाएं, विशेषकर गर्भवती माएं। यह पहला मौका है, जब वयस्कों को टीका दिया जाएगा। अगले चार महीने में लगभग 30 करोड़ लोगों को टीका लगाने की योजना है। इसका अर्थ है कि मौजूदा क्षमता से छह गुना अधिक टीके लगाए जाएंगे, जो एक बड़ा काम है। अच्छी बात यह है कि पोलियो और खसरा-रूबेला के टीकाकरण अभियान का अनुभव हमारे पास है। इससे हमें पता है कि एक बड़ी आबादी को एक साथ कैसे टीका लगाया जा सकता है? मसलन, पोलियो अभियान के तहत चार-पांच दिनों के भीतर देश के करीब 17 करोड़ बच्चों को इसकी खुराक दी जाती है, जबकि खसरा-रूबेला से बचाव के लिए 15 साल से कम उम्र के 42 करोड़ बच्चों को टीका दिया गया। जाहिर है, यह बहुमूल्य अनुभव है, जो कोरोना के खिलाफ हमारे टीकाकरण अभियान में खूब काम आएगा।

दूसरी चुनौती, टीकाकरण को सुनिश्चित करने, यानी प्राथमिकता समूह के हर इंसान को टीके लगाने की है। मानव शरीर कोरोना वायरस के खिलाफ तभी प्रतिरोधक क्षमता विकसित करेगा, जब वैक्सीन की दोनों खुराक उसे दी जाएगी। अपने यहां बच्चों के लिए टीकाकरण-कार्ड उपलब्ध है, लेकिन वयस्कों के लिए ऐसी कोई परंपरा नहीं रही है। इस चुनौती से पार पाने के लिए एक खास तरीका अपनाया गया है। टीकाकरण केंद्रों पर टीके की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए हमारे पास पहले से एक सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म है, जिससे केंद्रीय एजेंसियां सीधे निगरानी कर सकती हैं। साथ ही, 29,000 कोल्ड चेन भी हैं। इसमें नया बदलाव यह किया गया है कि जिसको टीका लगाया जाएगा, उसे भी इस प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया है। यह को-वीन एप के माध्यम से हो रहा है। अभी भले ही हर व्यक्ति इस एप का इस्तेमाल नहीं कर सकता, लेकिन जल्द ही यह सबके लिए उपलब्ध हो जाएगा। इसके साथ-साथ देशव्यापी एईएफआई सर्विलांस तंत्र भी बनाया गया है, जो टीका लगे व्यक्ति में किसी तरह के नकारात्मक असर होने पर तुरंत सक्रिय हो जाएगा। ऐसा सिस्टम पहले से अपने यहां मौजूद है, लेकिन इस बार वयस्कों को टीका लगाया जाना है, इसलिए इस टीम में वयस्कों के विशेषज्ञ डॉक्टरों को भी शामिल किया गया है। यह टीम किसी भी प्रतिकूल असर या घटना पर तुरंत हरकत में आ जाएगी। 

तीसरी चुनौती है, कम वक्त में अधिक लोगों को टीका लगाना। इस मुश्किल को दूर करने के लिए न सिर्फ टीके की उपलब्धता बढ़ाई जाएगी, बल्कि आम लोगों तक इसे पहुंचाया भी जाएगा। उम्मीद है, अगले तीन-चार महीने में प्राथमिकता सूची के तमाम लोगों को टीका लगा दिया जाएगा। फिर, जिस तरह से कई कंपनियां टीका बनाने की दिशा में अग्रसर हैं, उनसे यह भरोसा है कि इस साल भारत में छह-सात वैक्सीन को अनुमति मिल सकती है। इसी कारण, 2021 की आखिरी छमाही में बाजार में भी वैक्सीन के आने की बात कही जा रही है। चौथी चुनौती, आम लोगों के मन में टीकों के प्रति पनप रही शंकाओं को दूर करने की है। सरकार ने एक कम्यूनिकेशन प्रोग्राम बनाया है, जिसके तहत आशा और आंगनबाड़ी सेविकाओं व सार्वजनिक सूचना के माध्यमों द्वारा लोगों के संदेह दूर किए जा रहे हैं। यह समझना होगा कि किसी भी टीके को कई आयाम पर परखने के बाद इस्तेमाल की अनुमति मिलती है, जिनमें तीन महत्वपूर्ण हैं। पहला, टीका सुरक्षित है अथवा नहीं? दूसरा, यह शरीर में कितनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता विकसित करता है? और तीसरा, एक बड़ी आबादी पर यह कितना प्रभावी है? 

कोविशील्ड और कोवैक्सीन को भी इन सवालों से गुजरना पड़ा है। आंकडे़ बताते हैं कि दोनों टीके मानव शरीर के लिए सुरक्षित हैं, और ये दोनों पर्याप्त मात्रा में प्रतिरोधक-क्षमता विकसित करते हैं। बस एक अंतर यह है कि कोविशील्ड की प्रभावशीलता हमें पता है, जबकि कोवैक्सीन की उतनी नहीं। इसका पता भी अगले दो महीनों में चल जाएगा। इसी कारण टीकाकरण-केंद्रों पर यह सहमति पत्र का विकल्प दिया गया है कि अगर कोई कोवैक्सीन नहीं लगवाना चाहता, तो उसे कतई बाध्य नहीं किया जाएगा। टीका को ऐच्छिक बनाया गया है, अनिवार्य नहीं। किस केंद्र पर कौन-सा टीका उपलब्ध है, इसकी जानकारी पहले से लोगों को दे दी जाएगी। पहली खुराक के 28 दिन के बाद टीके की दूसरी खुराक लगाई जाएगी और उसके दो हफ्ते के बाद शरीर कोरोना वायरस के खिलाफ तैयार हो जाएगा। ये टीके कोरोना के तमाम स्ट्रेन पर कारगर भी माने गए हैं। कुल मिलाकर, आज हम एक इतिहास रचने जा रहे हैं। देश ने इस टीकाकरण अभियान की अभूतपूर्व तैयारी की है। इससे पहले शायद ही किसी अभियान में ड्राई-रन के रूप में जिला स्तर तक तीन-चार बार पूर्वाभ्यास किया गया हो। इसकी वजह भी है। पहले चरण के टीकाकरण अभियान की सफलता बहुत मायने रखती है। खासतौर से, निम्न और मध्यम आय वाले देशों की नजर हम पर है। विभिन्न स्रोतों से मिल रही सूचनाओं की मानें, तो अभी 65-70 देश हमसे वैक्सीन मांग रहे हैं। विकसित देशों के लिए भी हम उम्मीद हैं, क्योंकि इतने बडे़ पैमाने पर किसी राष्ट्र ने टीकाकरण अभियान नहीं चलाया है। जाहिर है, भारत अगुवाई वाला देश बन गया है, और टीकाकरण अभियान की सफलता से उसकी हैसियत में खासा इजाफा होगा। विज्ञान और मजबूत इच्छाशक्ति से हमें यह रुतबा मिलने जा रहा है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Friday, January 15, 2021

हमें जाना है तेजस से बहुत आगे (हिन्दुस्तान)

सुशांत सरीन, सीनियर फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन 


आज सेना दिवस है और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। इसकी सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) ने उन्नत श्रेणी के 83 स्वदेशी तेजस मार्क- 1ए जेट विमानों की खरीद का जो फैसला किया है, उसका देश की अर्थव्यवस्था और रक्षा पर दूरगामी असर पडे़गा। डिजाइन और विनिर्माण क्षेत्रों में एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योग) सहित करीब 500 भारतीय कंपनियां इस खरीद में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ मिलकर काम करेंगी। जाहिर है, इससे हमारी आर्थिकी भी आगे बढ़ेगी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित आकाश मिसाइल, अर्जुन टैंक, ध्रुव हैलिकॉप्टर, पिनाका रॉकेट लॉन्चर, नाग टैंक रोधी मिसाइल जैसी कई उपलब्धियों का भी हमें खासा फायदा मिला है। आज यदि कोई राष्ट्र दुनिया में अपना सिक्का चलाना चाहता है, तो उसे आत्मनिर्भर बनना ही पड़ेगा। मगर आत्मनिर्भरता का अब वह अर्थ नहीं रहा, जिसे पुरानी पीढ़ी के नेता पालते-पोसते रहे। 1960-70 के दशक में जिस तरह की आत्मनिर्भरता की हम वकालत किया करते थे, उसमें हमने खुद को एक लिहाज से दुनिया से काट लिया था। इससे हमारा विकास थम सा गया था और हमारी अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई थी। मगर आज आत्मनिर्भरता का मतलब है, अपना दबदबा इस कदर बनाना कि दूसरे देश चाहकर भी हमसे रिश्ता तोड़ न सकें। मसलन, चीन रक्षा क्षेत्र में जहाज से लेकर पनडुब्बी तक सब कुछ बनाता है। वह कृत्रिम बुद्धिमता, यानी एआई का उपयोग इस तरह से करता है कि साइबर व सैटेलाइट युद्ध लड़ने में भी सक्षम है। किसी पर उसकी निर्भरता नहीं है। नतीजतन, कोई देश उससे संबंध नहीं तोड़ सकता।

अपने यहां नेहरू काल से ही सुरक्षा से जुड़े मसले सरकारी संस्थानों के अधीन रहे। हमारा जोर आयात पर अधिक रहा। निजी क्षेत्र को रक्षा उत्पाद विकसित करने की अनुमति नहीं दी गई। मगर हाल के वर्षों में उसका महत्व समझा गया है, जिससे तरक्की के नए दरवाजे खुले। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने काम नहीं किया। मगर 1962 में हमें यह सबक मिला कि यदि हम किसी देश पर बहुत ज्यादा निर्भर रहेंगे, तो वह हमें मुश्किल में भी डाल सकता है। चीन के साथ 62 की जंग में हमने पहले उस रूस से मदद मांगी थी, जिससे हम हथियार खरीदते रहे थे। मगर तब उसने टका सा जवाब दे दिया था, लिहाजा हमें अमेरिका का मुंह ताकना पड़ा। इस संदर्भ में देखें, तो 48,000 करोड़ रुपये की स्वदेशी विमान की खरीद का यह फैसला काफी महत्व रखता है। मगर कुछ सवाल हैं, जिन पर हमें सोचने की जरूरत है, खासकर रक्षा चुनौतियों के मोर्चे पर। तेजस एक अच्छा लड़ाकू विमान है, पर यह दुनिया का सबसे बेहतरीन जहाज नहीं है। यह अच्छी बात है कि इसमें हम लगातार सुधार कर सकते हैं। मगर इसको उन्नत बनाने के लिए पूंजी की दरकार होगी और वक्त भी खासा लगेगा। ये दोनों काफी मायने रखते हैं। जैसे, सुखोई विमान हम अपने देश में भी बनाते हैं, पर इसे रूस से खरीदना आसान और सस्ता सौदा है। असल में, कुछ विमानों का उत्पादन आसान है, लेकिन बड़ी संख्या में उनका निर्माण मुश्किल भरा काम है। इसमें ऐसी दक्षता की दरकार होती है कि कम समय में अधिक उत्पादन संभव हो सके। उम्मीद है, पूर्व की खरीद के साथ 120 तेजस विमानों की खरीदारी से अपने यहां यह ढांचा तैयार हो सकेगा, जिसका फायदा उद्योग जगत को मिलेगा। और, अगर यह ‘प्रोडक्शन लाइन’ नहीं बन सकी, तो फिर तेजस हमारे लिए महंगा साबित हो सकता है। हालांकि, मारुति का अनुभव हमारी उम्मीद बढ़ाता है। उल्लेखनीय है कि मारुति की गाड़ियां पहले अपने यहां ‘असेंबल’ होती थीं। उसके कल-पुर्जे दूसरे देशों से आयात होते थे। फिर, धीरे-धीरे स्थानीय कंपनियां इस काम में आगे आईं, और आज ऑटो दुनिया में पाट्र्स निर्यात करने वाले देशों में भारत पहले स्थान पर है।

दूसरी चिंता की बात इसकी आपूर्ति में लगने वाला वक्त है। मार्च, 2020 में ही रक्षा खरीद परिषद ने तेजस विमानों की खरीद को मंजूरी दी थी, लेकिन इस पर कैबिनेट को सहमति जताने में करीब 10 महीनों का वक्त लग गया। कहा गया है कि जब इस करार पर अंतिम मुहर लगेगी, तब उसके तीन साल के बाद पहला जहाज मिलेगा। इसका अर्थ है कि आज समझौता यदि हो भी जाए, तो 2024 से पहले हमें इस खरीद का पहला तेजस नहीं मिल सकता। फिर, पूरी आपूर्ति पांच साल में होगी, जिसका अर्थ है कि हर साल कमोबेश 16 विमान बेड़े में शामिल होंगे। ऐसे में, क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम ऐसी व्यवस्था करें कि हमारा उत्पादन समय के साथ बढ़ता चला जाए? खासतौर से चीन व पाकिस्तान से मिल रही चुनौतियों के मद्देनजर ऐसा किया जाना जरूरी है। सवाल यह भी है कि इसमें इस्तेमाल हो रही तकनीक चार-पांच साल के बाद कितनी प्रासंगिक रह पाएगी? खासतौर से सूचना-प्रौद्योगिकी में जिस तेजी से बदलाव होते हैं, उसको देखते हुए यह चिंता स्वाभाविक है। ड्रोन का ही उदाहरण लें। पांच साल के बाद किस उन्नत श्रेणी के ड्रोन रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल होंगे, इसकी कल्पना आज नहीं कर सकते। जाहिर है, शोध व अनुसंधान के कामों को इतना तवज्जो देना होगा कि वे भविष्य की तकनीकों पर आज ही शोध-कार्य करें। स्पष्ट है, ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में स्वदेशी विमानों की खरीद एक प्रशंसनीय कदम जरूर है, लेकिन रक्षा चुनौतियों को देखते हुए हमें कई दूसरे प्रयास भी करने होंगे। हमें दुश्मन देशों के बराबर ताकत जुटाने पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि यह कोशिश करनी चाहिए कि उनकी ताकत को हम किस तरह से बेअसर कर सकते हैं। यानी, काट की रणनीति हमें अपनानी चाहिए, न कि हथियारों की दौड़ में मुब्तिला रहना चाहिए। हमें यह तय करना ही होगा कि हमारी लड़ाई किससे है और किस नई तकनीक से हम जीत हासिल कर सकते हैं? यह सवाल तब और प्रासंगिक हो जाता है, जब सामने चीन जैसा राष्ट्र हो, क्योंकि सैन्य साजो-सामान के मामले में फिलहाल हम उससे बीस साबित नहीं हो सकते।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Thursday, January 14, 2021

साख बहाली में बरसों लगेंगे ( हिन्दुस्तान)

फ्रैंक एफ इस्लाम, अमेरिकावासी उद्यमी व समाजसेवी


एक अमेरिकी होने के नाते पिछले पांच दशकों में मैं इतना दुखी और चिंतित पहले कभी नहीं हुआ था, जितना पिछली 6 जनवरी को हुआ। कैपिटल हिल की हिंसा दरअसल अमेरिकी लोकतंत्र के खिलाफ डोनाल्ड ट्रंप के नौ सप्ताह लंबे चुनाव अभियान की परिणति थी। पूर्व उप-राष्ट्रपति जो बाइडन के हाथों सत्ता गंवाने के चंद घंटों के बाद ही ट्रंप आक्रामक हो गए थे। बाइडन को 306 इलेक्टोरल वोट मिले थे, जो 2016 में ट्रंप को मिले वोट के बराबर ही हैं, जिसे तब उन्होंने भारी जीत बताया था। ट्रंप चुनाव अभियान के दौरान बार-बार यह दावा करके तनाव को हवा-पानी दे रहे थे कि अगर वह हारे, तो मतदान में देश भर में की गई व्यापक धोखाधड़ी इसकी वजह होगी। चुनाव के बाद वह सोच-समझकर अपनी इस रणनीति पर आगे बढ़ते गए। सबसे पहले उन्होंने वकीलों की फौज द्वारा चुनाव नतीजों को पलटने के लिए 60 से अधिक मुकदमे दर्ज कराए, जिनका नेतृत्व न्यूयॉर्क सिटी के पूर्व मेयर रूडी गियूलिआनी कर रहे थे। मगर एक को छोड़ सभी में वह नाकाम साबित हुए। फिर, स्विंग स्टेट्स के चुनाव अधिकारियों पर यह दबाव बनाने के लिए उन्होंने खुद उन्हें फोन किया कि या तो वे बाइडन की जीत को प्रमाणित न करें या फिर इतने वोट जुटाएं कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी से आगे दिख सकें। जब यह  प्रयास भी विफल हो गया, तब ट्रंप ने अपने उप-राष्ट्रपति माइक पेंस से कहा कि जब मुख्य राज्यों के नतीजों को कांग्रेस में पेश किया जाएगा, तब वह उनको प्रमाणित न करें। पिछले चार वर्षों में ट्रंप के साथ हर मोड़ पर खडे़ रहने वाले उप-राष्ट्रपति के लिए ऐसा करना असंभव था। नतीजतन, आखिरी दांव के रूप में कैपिटल हिल पर चढ़ाई की गई। सुखद है कि यह भी कई कारणों से विफल साबित हुआ, जिनमें एक बड़ी वजह है, अमेरिकी संस्थाओं का मजबूत होना। हालांकि, अपने राष्ट्रपति-काल में ट्रंप ने तमाम संस्थानों को अपने अधीन लाने का हरसंभव प्रयास किया था, लेकिन न्यायपालिका हो या कई राज्य सरकारें या फिर अमेरिका का आजाद मीडिया, सभी ने उनका खासा विरोध किया। बहरहाल, इस घटना के परिणामों का आकलन करना फिलहाल जल्दबाजी होगी, लेकिन कुछ चीजें बिल्कुल स्पष्ट हैं। मसलन, इसने दुनिया भर में अमेरिकी लोकतंत्र की छवि को धक्का पहुंचाया है। यह वह राजनीतिक पूंजी थी, जिसके द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया भर में लोकतंत्र को बढ़ावा दे रहे थे। यहां तक कि 6 जनवरी से पहले भी, लोकतांत्रिक नैतिकता का जमकर हवाला दिया जाता था, फिर चाहे ट्रंप लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों पर हमलावर ही क्यों न थे। मगर इस घटना से जो नुकसान पहुंचा है, उसे देखते हुए अंदेशा है कि विश्व नेतृत्व की अपनी पुरानी हैसियत को हासिल करने में अमेरिका को संभवत: दशकों का वक्त लग जाएगा। घरेलू तौर पर भी कैपिटल हिल की घटना का असर ट्रंप के ह्वाइट हाउस छोड़ने के काफी समय बाद तक बना रहेगा। अराजकतावादी, षड्यंत्र बताने वाले सिद्धांतवादी और कैपिटल हिल पर हमला करने वाले दंगे समर्थक अपने नेता का राष्ट्रपति-काल तो नहीं बढ़ा सके, लेकिन आज अमेरिकी समाज में मौजूद खाई व बंटवारे को जरूर बेपरदा कर दिया। अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसी शख्सियतों द्वारा अमेरिका को एक ‘बेहतर संघ’ बनाने के प्रयासों के बावजूद अमेरिकी समाज हमेशा से वैचारिक, मत-संबंधी और नस्लीय विभाजन से ग्रस्त रहा है। हालांकि, मानवाधिकारों के क्षेत्र में अमेरिका ने पिछली आधी सदी में खासा तरक्की की है, और एक समाज के रूप में जातिवादी व कट्टरपंथी तत्वों को हाशिये पर रखने में सफल रहा है। श्वेत राष्ट्रवादियों, आप्रवासी विरोधी समूहों, यहूदी-विरोधी भावनाओं आदि को हवा देना ट्रंप के राष्ट्रपति-काल का मुख्य उद्देश्य रहा। लगातार प्रसारित की जा रही झूठी और गलत सूचनाओं द्वारा वह काफी हद तक रिपब्लिकन पार्टी की पैठ बनाने में सफल भी रहे। कुल 252 रिपब्लिकन सांसदों में से हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 139 और सीनेट में आठ सांसदों द्वारा इलेक्टोरल कॉलेज के नतीजों को बदलने के लिए हस्ताक्षर करना संकेत है कि रिपब्लिकन पार्टी और अमेरिका को ट्रंप ने किस कदर नुकसान पहुंचाया है। जिन समूहों ने कैपिटल हिल और लोकतंत्र पर हमला किया है, वे बहुत जल्द खत्म नहीं होंगे। वास्तव में, उन्होंने यह संकेत दिया है कि उनकी लड़ाई तो अभी शुरू हुई है।

लिहाजा उन पर सख्त और त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसा होने की उम्मीद है भी, क्योंकि अमेरिकी न्याय विभाग ने पहले से ही उनको सजा देने के लिए मुकदमा चलाने की शुरुआत कर दी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस घटना से उबरने के प्रयास शुरू हो भी चुके हैं। सौभाग्य से अमेरिका के पास जो बाइडन के रूप में अब एक ऐसे राष्ट्रपति हैं, जो इन दोनों मोर्चों पर सुधार को गति देने में सक्षम हैं। जाहिर है, नए राष्ट्रपति के सामने चुनौतियां बड़ी हैं। इनसे पार पाने के लिए योजना, संयम और दृढ़ता की जरूरत होगी। अमेरिका ने करीब 250 वर्षों में जो प्रगति की है, वह एकरूपीय नहीं है। गृह युद्ध, वैश्विक आर्थिक महामंदी, जॉन एफ केनेडी की हत्या जैसे तमाम उठापटक के बाद भी राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्रों की कई ऐतिहासिक उपलब्धियां इसके खाते में हैं। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि दो कदम आगे बढ़कर यह एक कदम पीछे हटा है। जैसे, नस्ल के आधार पर समुदायों को बांटने के लिए बनाए गए जिम क्रो कानूनों को अमल में लाने के बाद की गई मुक्ति की घोषणा। ऐसे में, उम्मीद यही है कि 20 जनवरी को जब जो बाइडन राष्ट्रपति पद की  शपथ लेंगे, तब उसके बाद अमेरिका एक नई राह पर आगे बढ़ सकेगा। हालांकि, तब तक डोनाल्ड ड्रंप की तानाशाही प्रवृत्ति और निरंकुश व्यवहार पर लगाम लगानी होगी। 25वें संविधान संशोधन के तहत कार्रवाई से उप-राष्ट्रपति ने मना कर दिया है, अत: अब ट्रंप पर महाभियोग चलाने व पद से हटाने की कवायदें तेज होने लगी हैं। मगर दीर्घावधि में यह जरूरी है कि ट्रंप और उनके कट्टर समर्थकों की इस गैर-अमेरिकी गतिविधि की जिम्मेदारी तय की जाए। यह प्रयास भी करना होगा कि अमेरिका अपना पुराना रुतबा पा सके। इसे फिर से अमेरिका बनाने की जरूरत है, न कि ट्रंप-भूमि। यहां पर लोकतंत्र की जीत पूरी दुनिया में लोकतंत्र समर्थकों की जीत मानी जाएगी।


(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Wednesday, January 13, 2021

टकराव टलने की बंधती उम्मीद (हिन्दुस्तान)

योगेंद्र नारायण, पूर्व महासचिव, राज्यसभा

सर्वोच्च न्यायालय ने नए कृषि कानूनों पर केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच चल रही तकरार को सुलझाने की ठोस पहल की है। कानूनों के अमल पर फौरी तौर पर रोक लगाना और चार सदस्यों की एक समिति का गठन बताता है कि अदालत तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर कानूनों को देखना चाहती है। टकराव के कारण बिगड़ रहे हालात को संभालने की वह मंशा रखती है, और हर हाल में शांति की बहाली की हिमायती है। ताजा फैसले से यह संदेश भी निकलता है कि केंद्र सरकार और किसान, दोनों को अदालत यह मौका दे रही है कि वे चार कृषि विशेषज्ञों की नजर से कानूनों को परखें और यदि इनमें संशोधन की दरकार है, तो उन्हें जल्द से जल्द अमल में लाएं, ताकि टकराव टाले जा सकें।

फिर भी कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ा जाना चाहिए। खासकर कानूनों का प्रबंधकीय पक्ष काफी उलझा हुआ है। मसलन, इन कानूनों पर भला किस तरह से रोक लगाई जा सकेगी? उल्लेखनीय है कि ये कानून जून, 2020 से लागू हो चुके हैं। केंद्रीय कानून होने के कारण देश के सुदूर हिस्सों तक पर ये आयद हैं। अब कागजी तौर पर भले ही इन पर रोक लग गई है, लेकिन जमीन पर इससे जुड़ी व्यवस्था को बंद करना आखिर कैसे संभव है? इन कानूनों के लागू होने से पहले भी निजी डीलर सक्रिय रहे हैं। किसानों से वे कृषि उत्पाद खरीदते रहे हैं। नए कानूनों में सिर्फ उनकी हैसियत को स्वीकार किया गया था। इसलिए अगर इन कानूनों पर रोक लगी भी है, तो बाजार में निजी डीलर का मौजूदा तंत्र शायद ही ध्वस्त हो सकेगा। यही नहीं, किसानों द्वारा अपनी मर्जी से फसल उत्पाद बेचने की व्यवस्था भी नहीं रोकी जा सकती। अरसे से वे बाजार में निजी कारोबारियों को अपने उत्पाद बेचते रहे हैं, और सौदा न पटने पर किसी दूसरे कारोबारी के पास जाते रहे हैं। वायदा खेती भी पहले से ही जारी है। हां, नए कानूनों में यह प्रावधान किया गया था कि ऐसे  किसी समझौते में कारोबारी किसानों से उनकी जमीन नहीं खरीद सकते। जाहिर है, नए कानून में किसानों के हक की ही बात थी। मगर अब इस पर भी रोक लग गई है, यानी इस नए अदालती फैसले के बाद वायदा खेती से किसानों की हैसियत में कोई सुधार नहीं हो सकेगा। देखा जाए, तो इन कानूनों को लागू करने में सरकार की कोई भूमिका थी भी नहीं। वह सिर्फ कारोबारियों और किसानों के बीच कड़ी का काम कर रही थी। मसलन, किसान यदि शिकायत करता कि वायदे के मुताबिक कारोबारी ने उसे पैसे नहीं दिए या शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो सरकारी संस्थाएं उस कारोबारी को वायदा खेती से जुड़ी शर्तों को मानने के लिए बाध्य करतीं। इसलिए कानूनों के मुताबिक जिन प्रावधानों के अमल का भरोसा सरकार ने दिया था, वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लागू रहेंगे। तो फिर आगे होगा क्या? शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में चार जहीन लोगों की एक समिति बनाई है। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान, जाने-माने कृषि विशेषज्ञ और अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान के प्रमोद कुमार जोशी, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और शेतकरी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवत इसके सदस्य हैं। ये सभी खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों से भली-भांति परिचित हैं। अदालती फैसले के मुताबिक अब यह समिति कानूनों में मौजूद खामियों को देखेगी और यह तय करेगी कि इनमें कहां-कहां संशोधन की दरकार है। समिति के गठन से अब इन कानूनों की तमाम गड़बड़ियां सार्वजनिक हो सकेंगी और आम लोगों को भी यह पता चल सकेगा कि इनमें किस तरह के सुधार होने चाहिए। मगर इसमें एक पेच है। सरकार इस तरह की समिति के गठन की बात पहले से करती रही है, जबकि किसान संगठन इसके खिलाफ थे। इसका मतलब है कि शीर्ष अदालत ने एक तरह से सरकार का पक्ष मजबूत माना है। वह इससे सहमत दिख रही है कि गड़बड़ियों को दुरुस्त करना ही मुफीद होगा। यही बात किसान संगठनों को नागवार गुजर रही है। नतीजतन, ज्यादातर किसान संगठनों ने इस समिति के सामने न जाने का फैसला लिया है। इसका अंदेशा था भी, क्योंकि समिति के सामने जाने पर यह संदेश जाएगा कि वे इन कानूनों के पक्ष में हैं और सुधार चाहते हैं, जबकि तीनों कानूनों को खत्म करने की मांग पर वे शुरू से अडे़ हुए हैं।

समिति के सामने यदि किसान संगठन नहीं पहुंचे, तो इससे सर्वोच्च न्यायालय की छवि को धक्का लग सकता है। एकाध कृषक संगठन ने समिति पर हामी भरी है, लेकिन उनका जाना या न जाना शायद ही मायने रखेगा। इसका साफ-साफ अर्थ है कि अदालत के रास्ते इस मामले को अंजाम तक पहुंचाना दिवा-स्वप्न साबित हो सकता है। अदालत किसानों के प्रति जरूर सहानुभूति रखती दिख रही है, लेकिन समाधान देश की संसद ही निकालेगी। हां, सरकार समिति की सिफारिशों को मान सकती है, क्योंकि सरकारी संस्थान होने के नाते उसके लिए अदालत का आदेश मानना अनिवार्य है। यहां बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद की याद स्वाभाविक तौर पर हो आती है। इस विवाद को सुलझाने के लिए शीर्ष अदालत ने पहले कुछ न्यायाधीशों और जहीन लोगों की एक समिति बनाई थी, ताकि तमाम पक्षों में सहमति बन जाए। मगर जब ऐसा न हो सका, तो फिर अदालत की पीठ ने तथ्यों के आधार पर स्वयं फैसला सुनाया, जिसे सभी पक्षों ने खुले दिल से स्वीकारा। इस मामले में भी ऐसा कुछ हो सकता है। समिति की सिफारिशों पर गौर करते हुए अदालत आने वाले दिनों में कुछ इस तरह का फैसला दे सकती है, जो इस विवाद को सुलझाने में मील का पत्थर साबित हो। फिलहाल हमें उसी दिन का इंतजार करना चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Tuesday, January 12, 2021

सिर्फ शब्द न रह जाए संविधान (हिन्दुस्तान)

 विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी  

जमशेदपुर कई अर्थों में बड़ा दिलचस्प शहर है। यहां 1907 में टाटा औद्योगिक घराने की नींव रखने वाले जमशेदजी नौशेरवानजी टाटा ने इलाके के पहले बडे़ कारखाने टिस्को की स्थापना के साथ ही भविष्य के एक बड़े शहर की शुरुआत भी की थी। आज अपनी सुदृढ़ नागरिक सुविधाओं, फुटबॉल और शिक्षण संस्थाओं के अतिरिक्त यह शहर मुझे इसके नागरिकों की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बहसों में सक्रिय भागीदारी और गहरी समझ के लिए उल्लेखनीय लगता है। इस शहर की मेरी चौथी यात्रा एक ऐसे कार्यक्रम के सिलसिले में थी, जिसका विषय शुरू में तो मुझे घिसा-पिटा लगा, पर वहां जाकर शहरियों की भागीदारी और जुड़ाव देखकर समझ में आया कि हाशिए पर अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, दलितों या औरतों के लिए ऐसे विमर्श क्या अर्थ रखते हैं? विषय भारतीय संविधान और उसके चलते देश की अखंडता या संप्रभुता को बचाने से जुड़ा था। आयोजक संस्था का नाम भी ‘देश बचाओ संविधान बचाओ अभियान’ है। विभिन्न राजनीतिक दलों और स्वयंसेवी संगठनों से जुडे़ ये लोग संविधान को लेकर कितने चिंतित हैं, इसे इनके पिछले कुछ वर्षों के कार्यक्रमों की सूची देखकर समझा जा सकता है। कुछ ही दिनों में हम 72वां गणतंत्र दिवस मनाने वाले हैं। हाल-फिलहाल बहुत कुछ ऐसा घटा है, जिसके चलते नागरिकों को स्मरण कराना जरूरी है कि संविधान की हिफाजत की शपथ लेते रहना सिर्फ औपचारिकता नहीं है। आजादी के फौरन बाद मुसलमानों की एक पस्त भीड़ के सामने बोलते हुए मौलाना आजाद ने कहा था कि उन्हें तब तक अपनी हिफाजत की चिंता नहीं करनी चाहिए, जब तक 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ भारतीय संविधान सुरक्षित है। अब तो देश के दूसरे हाशिए के समुदायों को भी समझ में आ गया है कि अगर संविधान नहीं बचा, तो उनके एक सभ्य मनुष्य के रूप में जीने की संभावना भी नहीं बचेगी। इस संविधान के बनने और उसके जनता द्वारा स्वीकृत किए जाने की प्रक्रिया को बार-बार याद किए जाने की जरूरत है। 1947 से 1949 के बीच नई दिल्ली की संविधान सभा में जो कुछ घट रहा था, वह किसी शून्य से नहीं उपजा था। यह असाधारण जरूर था, पर अप्रत्याशित तो बिल्कुल नहीं कि रक्तरंजित बंटवारे के बीच काफी लोगों ने मान लिया था कि हिंदू और मुसलमान, दो अलग राष्ट्र हैं, इसलिए साथ नहीं रह सकते। तब संविधान सभा ने देश को ऐसा संविधान दिया, जो एक उदार और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की परिकल्पना करता है। यह अप्रत्याशित इसलिए नहीं कि देश की आजादी की लड़ाई जिन मूल्यों से परिचालित हो रही थी, वे आधुनिकता और धर्मनिरपेक्षता की ही उपज थे। अस्पृश्यता या स्त्री-पुरुष समानता जैसे प्रश्नों पर संविधान सभा की दृष्टि एक आधुनिक दृष्टि थी और इसके चलते भारतीय समाज में दूरगामी परिवर्तन होने जा रहे थे। इसी तरह, एक करोड़ से अधिक लोगों के विस्थापन और विकट मार-काट के बीच भी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अर्जित एकता की भावना ने ही इस धर्मनिरपेक्ष संविधान को संभव बनाया। 

यह संविधान 26 नवंबर, 1949 को बन तो गया, पर इसे बनाने वाली सभा ही जनता से सीधे नहीं चुनी गई थी और इसकी वैधता के लिए जरूरी था कि इस पर जन-स्वीकृति की मोहर लगवाई जाए। इस जिम्मेदारी को निभाया पंडित जवाहरलाल नेहरू ने, जो प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ 1952 के पहले आम चुनाव के ठीक पहले एक बार फिर कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए थे। चुनाव के पहले 1951 में उन्होंने देश भर में घूम-घूमकर 300 सभाएं कीं। जालंधर से शुरू हुई उस शृंखला में उनका एक ही एजेंडा था, लोगों को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए तैयार करना। हर सभा में वह इस सवाल से अपना कार्यक्रम शुरू करते, देश बंटवारे के साथ आजाद हुआ है, हमारे बगल में एक धर्माधारित इस्लामी हुकूमत कायम हो गई है, अब हमें क्या करना चाहिए? क्या हमें भी एक हिंदू राज बना लेना चाहिए? इन सवालों के जवाब वह खुद अगले डेढ़ घंटे तक आसान हिन्दुस्तानी में देते। वह लगभग अशिक्षित श्रोताओं को अपने तर्कों से कायल करके ही भाषण समाप्त करते कि कैसे देश की एकता, अखंडता और तरक्की के लिए एक धर्मनिरपेक्ष भारत जरूरी है। समय ने उन्हें सही साबित किया। मजहब के नाम पर बना पाकिस्तान 25 वर्षों में ही टूट गया और तमाम हिचकोलों के बावजूद भारत एक मजबूत राह पर आगे बढ़ रहा है। जालंधर को पहले सभा-स्थल के रूप में चुनना नेहरू की आगे बढ़कर चुनौती स्वीकार करने की प्रवृत्ति का ही परिचायक था। गौर कीजिए, जालंधर की उनकी सभा के अधिसंख्य श्रोता वे हिंदू और सिख थे, जो कुछ ही दिनों पहले बने पाकिस्तान से अपने प्रियजनों और जीवन भर की जमा-पूंजी गंवाकर वहां पहुंचे थे। नेहरू जानते थे कि अगर इन हिंसा पीड़ितों को वह समझा सके कि धार्मिक कट्टरता बुरी चीज है, तो बाकी देश में उनका काम आसान हो जाएगा। यही हुआ भी, चुनावी नतीजों ने एक धर्मनिरपेक्ष संविधान को वैधता प्रदान कर दी। जमशेदपुर के कार्यक्रम में न्यायविद फैजान मुस्तफा ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया। एक अच्छे संविधान के बावजूद अमेरिका में ट्रंप के उकसावे पर भीड़ संसद पर चढ़ दौड़ी, इस स्थिति में सारी सदिच्छाओं का क्या होगा?  वहां कम से कम संस्थाओं में इतना दम तो है कि प्रारंभिक झटके के बाद उन्होंने अपने राष्ट्रपति का हुक्म मानने से इनकार कर दिया। क्या हमारी संस्थाएं इतनी मजबूत हैं? लोकतंत्र में जरूरी है कि विवाद या तो बातचीत से हल हों या फिर संविधान के दायरे में न्यायिक समीक्षा द्वारा, पर हाल का किसान आंदोलन इस मामले में निराशाजनक है कि सरकार ने मामले को सुप्रीम कोर्ट भेजने की बात की। संविधान की रोशनी में सरकार को खुद आगे बढ़कर समाधान की तलाश करनी चाहिए। हमारे तंत्र पर ऐसे खतरे तब तक मंडराते रहेंगे, जब तक हम संविधान में शामिल धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता या कानून के सामने सबकी बराबरी जैसे मूल्यों को अपनी जीवन पद्धति का अंग नहीं बनाएंगे। संविधान में दर्ज शब्द कितने खोखले हो सकते हैं, यह हमसे बेहतर कौन जान सकता है? 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Monday, January 11, 2021

अपने वक्त के कुबेर और हकीकत (हिन्दुस्तान)

आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार 


टेस्ला के सीईओ एलन मस्क अब दुनिया के सबसे अमीर आदमी हो चुके हैं। उन्होंने एमेजॉन के सीईओ जेफ बेजोस को पछाड़ दिया है। मतलब साफ है कि ऑनलाइन शॉपिंग से आगे का आइडिया बन चुकी है टेस्ला की बैटरी से चलने वाली कार। यानी अब टेस्ला का टाइम आ गया है। कुछ ही वर्ष पहले यह मजाक लगता था कि बैटरी से कार चलेगी, पर अब यह न सिर्फ असलियत है, बल्कि फिलहाल दुनिया का सबसे चमकदार आइडिया भी है। टेस्ला के शेयर में आए तेज उछाल की वजह से गुरुवार को एलन मस्क की कुल हैसियत 185 अरब डॉलर हो गई थी, जबकि उसी दिन बेजोस के शेयरों की कुल कीमत 184 अरब डॉलर ही थी। अगले दिन यानी शुक्रवार को भी टेस्ला में 7.84 प्रतिशत का उछाल दिखा, जबकि एमेजॉन में एक प्रतिशत से भी कम की बढ़ोतरी हुई। अर्थात अमीरों की सूची के पहले पायदान पर एलन मस्क की जगह और पक्की ही हुई। 

यह किस्सा और चमत्कारी हो जाता है, जब आप देखें कि 2020 की शुरुआत में एलन मस्क दुनिया के पचास धनकुबरों की लिस्ट में भी मुश्किल से ही शामिल हो पाते। उस वक्त उनकी कुल हैसियत थी करीब 28 अरब डॉलर। उससे भी छह महीने पहले तो मस्क की कंपनी के बेतहाशा खर्च पर सवाल उठ रहे थे और उन्हें खुद अपने शेयर गिरवी रखकर मोटा कर्ज उठाना पड़ा था। दुनिया के इतिहास में वह सबसे तेजी से कुबेरों की सूची में टॉप पर पहुंचने वाले इंसान हैं। जुलाई में मस्क ने दिग्गज वैल्यू इन्वेस्टर वॉरेन बफेट को पीछे छोड़ा और सातवें नंबर पर पहुंचे। नवंबर के अंतिम सप्ताह में वह बिल गेट्स को भी पार कर दूसरे नंबर पर आ गए, और अब जनवरी की शुरुआत में वह दुनिया के सबसे अमीर इंसान बन चुके हैं।   

जिन लोगों को मस्क ने पीछे छोड़ दिया है, उनका हाल भी कुछ खास बुरा नहीं है। एक ऐसे दौर में, जब कोरोना महामारी और उससे पैदा हुआ आर्थिक संकट दुनिया के हर हिस्से में लाखों-करोड़ों लोगों के रोजगार, बचत और जीविका तक छीन चुका है, अमीरों की संपत्ति में हुई वृद्धि चौंकाने वाली है। एक अमेरिकी थिंक टैंक के मुताबिक, कोरोना काल में ही सबसे अमीर 641 लोगों की हैसियत में एक लाख करोड़ डॉलर यानी सत्तर लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम का इजाफा हुआ है। एक चौथाई हिस्सा तो इनमें से सिर्फ ऊपर के दस लोगों के हाथ लगा है। आप सोचते होंगे कि यह तो दूर देश की कहानी है, तो भारत का हाल भी कुछ खास अलग नहीं है। यहां भी इसी दौरान यानी कोरोना काल में देश के सात सबसे बड़े धन्ना सेठों की संपत्ति में करीब 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। कुल मिलाकर, इन्होंने अपनी हैसियत में करीब 64 अरब डॉलर की बढ़त दर्ज की है। और यह हिसाब लगा था दिसंबर के बीच में। तब से अब तक बाजार में करीब साढे़ पांच प्रतिशत का उछाल और आ चुका है, तो यह आंकड़ा भी बढ़ चुका होगा। भारत में टॉप पर तो पिछले कुछ वर्षों से मुकेश अंबानी ही हैं, लेकिन इस बार वह दुनिया के दस बडे़ सेठों की सूची से बाहर हैं। अब वह 13वें नंबर पर हैं। सबसे तगड़ी छलांग लगाई है गौतम अडानी ने। उनकी कुल संपत्ति करीब 29 अरब डॉलर की हो गई है, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुनी है। संपत्ति बढ़ाने के मामले में अडानी इस साल दुनिया में नौवें नंबर पर रहे। उन्होंने हर रोज अपनी संपत्ति में करीब साढे़ चार सौ करोड़ रुपये जोड़े हैं। उधर, चीन में जैक मा के गायब होने की खबर है। तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। जैक मा दुनिया के व्यापार में चीन के दबदबे का एक बड़ा जरिया ही नहीं, दुनिया भर में चीन के पोस्टर बॉय भी थे। हुआ यह कि 24 अक्तूबर को जैक मा ने एक आयोजन में भाषण दिया और वहां चीन के बैंकिंग सिस्टम पर कुछ गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चीन के बैंक सूदखोर महाजनों की तरह काम कर रहे हैं और जमाने के साथ कदम मिलाकर नहीं चलते। उन्होंने बैंकिंग रेगुलेटर की भी आलोचना की। इस भाषण के बाद से जैक मा कहीं दिखाई नहीं पड़े हैं। उनकी कंपनी की जांच शुरू हो गई है और उनकी कंपनी एंट ग्रुप का आईपीओ भी सरकार ने रुकवा दिया है, जो दुनिया का सबसे बड़ा आईपीओ होता। चीन में बडे़ व्यापारियों या उद्योगपतियों के गायब होने का यह पहला मामला नहीं है। ऐसे किस्से वहां होते रहते हैं।अक्तूबर में ही वहां एक और उद्योगपति ऐसे ही गायब हुए थे। कुछ समय बाद खबर मिली, भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें 18 साल की सजा सुना दी गई है। यह मामला इसलिए बड़ा और गंभीर है, क्योंकि यह वही जैक मा हैं, जिन्होंने दुनिया के रिटेल कारोबार में तहलका मचा रखा था। जिनकी सफलता दिखाकर भारत जैसे देशों में बहुत से उद्योगपति और उद्योग संगठन न सिर्फ चीन की तारीफ करते रहे हैं, बल्कि भारत में ‘टू मच डेमोक्रेसी’ होने की शिकायत भी। इधर भारत में शेयर बाजार उसी अंदाज में चल रहा है, मानो वह भारत का नहीं, चीन का बाजार हो। जीडीपी नीचे जाए, महंगाई बढ़े, बेरोजगारी बढ़े, कोर सेक्टर में गिरावट से लेकर जीडीपी में 7.7 प्रतिशत की सालाना गिरावट का अनुमान हो। ये सारी खबरें जैसे भारत के शेयर बाजारों के लिए मायने ही नहीं रखती हैं। इस चक्कर में हुआ यह कि इस धुआंधार तेजी के बावजूद भारत सरकार को टाटा समूह ने मात दे दी। बाजार में लिस्टेड सरकारी कंपनियों के शेयरों की कुल कीमत के मुकाबले टाटा समूह की लिस्टेड कंपनियों की कीमत कुछ ज्यादा हो गई। पहली बार ऐसा हुआ कि भारत के शेयर बाजार में सबसे बड़ी निवेशक भारत सरकार नहीं, बल्कि टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा सन्स है। आज देशी-विदेशी निवेशक बाजार में जमकर पैसा झोंक रहे हैं। जानकारों का कहना है कि अब खासकर नए निवेशकों या छोटे निवेशकों को सावधान रहना चाहिए। जरूरी है कि हर कंपनी को ठोक बजाकर देखा जाए और आईपीओ में अर्जी लगाने के पहले पूरी पड़ताल की जाए। वरना साल भर से चल रहा यह दिवाली जैसा माहौल दिवालिया होने का कारण भी बन सकता है। सावधान रहें, कहीं आपका पैसा ही अमीरों की अमीरी और बढ़ाने में काम न आ जाए। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Saturday, January 9, 2021

विकास दर संभालने की कवायद ( हिन्दुस्तान)

अरुण कुमार, अर्थशास्त्री 

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के मुताबिक, कोरोना महामारी की वजह से मौजूदा वित्तीय वर्ष में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7.7 फीसदी तक की गिरावट हो सकती है। यह गिरावट पहले के अनुमान से कहीं ज्यादा है। पिछले वित्तीय वर्ष में विकास दर 4.2 प्रतिशत थी। वैसे तो, पहले भी जीडीपी दर ऊपर-नीचे होती रही है, लेकिन आजादी के बाद यह पहला मौका होगा, जब इसमें इतनी बड़ी गिरावट दर्ज की जाएगी। आखिर ऐसा क्यों हुआ? दरअसल, कोविड-19 के कारण इस वर्ष अप्रत्याशित हालात बन गए। लॉकडाउन लगाकर हमने अपनी आर्थिक गतिविधियां खुद बंद कर दीं। युद्ध के समय भी ऐसा नहीं होता। वैसी स्थिति में संघर्ष के बावजूद मांग की स्थिति बनी रहती है, जिसके कारण उत्पादन का ढांचा बदल जाता है और अर्थव्यवस्था चलती रहती है। जैसे, दूसरे विश्व युद्ध के समय जर्मनी में चॉकलेट बनाने वाली एक कंपनी ने हवाई जहाज के कल-पुर्जे बनाने शुरू कर दिए। मगर कोरोना संक्रमण-काल में मांग और आपूर्ति, दोनों ठप हो गई।

अपने यहां जब कभी भी गिरावट आई, तब उसकी वजहें तात्कालिक रहीं। मसलन, सन 1979 से पहले अर्थव्यवस्था में सिकुड़न सूखे के कारण होता था। चूंकि उस दौर में उत्पादन का प्रमुख आधार कृषि था, इसलिए साल 1951, 1965, 1966, 1971, 1972 और 1979 में पर्याप्त बारिश न होने से विकास दर प्रभावित हुई। कृषि-उत्पादन बढ़ते ही अर्थव्यवस्था अपनी गति पा लेती थी। सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं होती थी।  साल 1967-68 में यह भी पाया गया कि देश में जब सूखा आता है, तो कपड़ेकी मांग कम हो जाती है। असल में, सूखा पड़ जाने से लोगों की क्रय-क्षमता कम हो जाती थी और वे नए कपड़े खरीदने से बचने लगते थे। चूंकि कृषि के बाद कपड़ा उद्योग दूसरा सबसे बड़ा सेक्टर था, इसलिए वहां मांग कम होने का असर हमारी पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखता।

मगर 1979-80 के बाद अर्थव्यवस्था पर सर्विस सेक्टर हावी होता गया, जिसके कारण सूखे के बावजूद अर्थव्यवस्था बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं हुई। जैसे, साल 1987 के सूखे के बाद भी विकास दर धनात्मक रही। अब अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी घटकर 13 प्रतिशत के करीब रह गई है, जबकि सर्विस सेक्टर की भागीदारी बढ़कर 55 प्रतिशत हो गई है। इस कारण यदि कृषि में 20 फीसदी तक की गिरावट (जो काफी ज्यादा मानी जाएगी) भी आती है, तो अर्थव्यवस्था को सिर्फ 2.6 प्रतिशत का नुकसान होगा, जबकि सर्विस सेक्टर आठ प्रतिशत की दर से भी बढ़ता रहा, तो वृद्धि दर में उसका पांच फीसदी का योगदान रहेगा। 

विगत वर्षों में जब कभी संकट आया, तो सरकार को खास पहल करनी पड़ी। साल 2007-08 की वैश्विक मंदी का ही उदाहरण लें। इसमें सरकार ने मांग बढ़ाने का काम किया, जिसके कारण विकास दर काबू में रही। उस समय न सिर्फ किसानों के कर्ज माफ किए गए, बल्कि मध्याह्न भोजन, ग्रामीण रोजगार गारंटी जैसी योजनाओं का बजट बढ़ाकर दो-तीन लाख करोड़ रुपये ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचाए गए। इससे देश का राजकोषीय घाटा जरूर बढ़ गया, लेकिन लोगों के हाथों में पैसे आने से बाजार में मांग पैदा हो गई। 

ग्रामीण क्षेत्रों में पैसे भेजने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को खूब लाभ मिलता है। इसके बरअक्स, शहरी लोग रुपये की आमद होने पर विलासिता की चीजें अधिक खरीदते हैं। चूंकि विलासिता के ज्यादातर उत्पाद विदेश से आयात होते हैं, इसलिए इन पर खर्च किया  जाने वाला काफी पैसा संबंधित निर्यातक देश के खाते में चला जाता है, जबकि ग्रामीण बाजार में विलासिता की चीजें तुलनात्मक रूप से कम खरीदी जाती हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था में पैसों की आमद बढ़ जाती है।

आंकड़ों में इस साल कृषि क्षेत्र में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। मगर पहली तिमाही में इस क्षेत्र में जबर्दस्त गिरावट आई है, क्योंकि मंडी में फल-सब्जी जैसे उत्पाद काफी कम मात्रा में पहुंचे। दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था कुछ संभली जरूर, लेकिन पटरी पर नहीं लौट सकी। तीसरी-चौथी तिमाही की भी बहुत अच्छी तस्वीर नहीं दिख रही। यानी, जो आकलन किया गया है, उससे भी ज्यादा की गिरावट आ सकती है। जैसे कि सर्विस सेक्टर में रेस्तरां, होटल, परिवहन आदि की सेहत अब भी डांवांडोल ही है। इस संकट का समाधान क्या है? सार्वजनिक खर्च बढ़ाने का दांव खेला जा सकता है, पर हमारा राजकोषीय घाटा पहले से ही बढ़ा हुआ है। कोविड-19 से पहले केंद्र, राज्य और सार्वजनिक इकाइयों का संयुक्त घाटा करीब 10 फीसदी था। पिछले साल की आखिरी तिमाही में वृद्धि दर 3.5 प्रतिशत थी, जबकि इससे दो साल पूर्व की तिमाही में आठ फीसदी। पहले से बिगड़ रही आर्थिक सेहत को कोरोना महामारी ने आईसीयू में पहुंचा दिया है। मांग और आपूर्ति खत्म हो जाने के कारण नए तरीके से इस संकट से हमें लड़ना होगा। इसलिए सार्वजनिक खर्च बढ़ाना एकमात्र उपाय नहीं हो सकता, क्योंकि राजकोषीय घाटा अभी 20 फीसदी से भी अधिक है। बीते साल 22 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज का भी एलान किया गया। मगर इसका सिर्फ 15 फीसदी हिस्सा बजट के रूप में आवंटित किया गया, शेष 85 फीसदी राशि बतौर कर्ज बांटने की बात कही गई। चूंकि कर्ज लेने के लिए लोग तैयार नहीं थे, इसलिए यह राशि उनकी क्रय-क्षमता नहीं बढ़ा सकी। बेहतर तो यह होता कि सरकार ग्रामीण योजनाओं के बजट बढ़ाती, ताकि लोगों के हाथों में सीधे पैसे पहुंचे। वैसे भी, संगठित क्षेत्र की कंपनियां खुद को संभाल सकती हैं, क्योंकि उनके पास पूंजी भी होती है और बैंक के दरवाजे भी उनके लिए खुले रहते हैं, जबकि अपने देश में असंगठित क्षेत्र की तकरीबन छह करोड़ छोटी-मोटी इकाइयां हैं, जो बहुत छोटे, लघु और मध्यम उद्योग के 99 फीसदी रोजगार बांटती हैं। परेशानी इन्हीं क्षेत्रों को है। यहीं से लोगों का पलायन हुआ है। जाहिर है, ग्रामीण रोजगार योजनाओं का विस्तार जरूरी है। 100 दिनों के बजाय जरूरतमंदों को 200 दिनों का रोजगार दिया जाना चाहिए। इस समय जरूरत एक शहरी रोजगार योजना की भी है। अर्थव्यवस्था तभी संभलेगी, जब मांग बढे़गी। और, इसके लिए लोगों के हाथों में पैसे देने चाहिए। रही बात सर्विस सेक्टर की, तो टीकाकरण अभियान का जैसे-जैसे विस्तार होगा, यह क्षेत्र भी अपनी पुरानी लय पा लेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Friday, January 8, 2021

अमेरिका की साख पर बट्टा ( हिन्दुस्तान)

शशांक, पूर्व विदेश सचिव 

रिपब्लिकन पार्टी क्या जनादेश को स्वीकार नहीं कर पा रही है, या राष्ट्रपति चुनाव में धांधली के उसके आरोप वाकई सही हैं? अमेरिकी संसद भवन ‘कैपिटल हिल बिल्डिंग’ की घटना इस बाबत काफी कुछ संकेत दे रही है। जो खबरें अब तक सामने आई हैं, उनके मुताबिक, रिपब्लिकन समर्थकों ने संसद भवन पर कब्जा करने की असफल कोशिश की, जिसमें उन्होंने हिंसा का भी सहारा लिया। लोकतंत्र के मंदिर पर इस हिंसक हमले का दुष्प्रभाव तो बाद के दिनों में पता चलेगा, लेकिन रिपब्लिकन समर्थकों की इस आक्रामकता के कई मकसद हो सकते हैं। पहली और बड़ी वजह रिपब्लिकन का सीनेट, यानी ऊपरी सदन में भी बहुमत खो देना है। सीनेट में 100 सदस्य होते हैं, और इसमें रिपब्लिकन सांसद डेमोक्रेट्स पर भारी थे। जॉर्जिया की दो सीटों को छोड़ दें, तो उसके 50 सदस्य सीनेट में थे। मगर हालिया चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने जॉर्जिया में जीत हासिल कर ली है। इसका मतलब है कि अब इस सीनेट में दोनों पार्टियों के बराबर-बराबर सांसद हो गए हैं। ऐसे में, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (निचला सदन) से पारित विधेयक आसानी से सीनेट से भी पास हो सकते हैं, क्योंकि मत-विभाजन की स्थिति में उप-राष्ट्रपति का शपथ लेने जा रहीं कमला हैरिस का मत निर्णायक होगा, जो डेमोके्रट के पक्ष में ही जाएगा। इसमें कोई शक नहीं है कि अमेरिका के अंदर सामाजिक विद्वेष काफी ज्यादा बढ़ गया है। राष्ट्रपति चुनाव में भी हमने यह देखा है। स्थिति यह है कि श्वेत नस्ल के नागरिक अपना अलग आंदोलन चलाते हैं, तो अश्वेत अलग तरीके से अपने हक-हुकूक की आवाज बुलंद करते हैं। यहां नस्लीय भेदभाव की समस्या बेशक पहले से रही है, लेकिन ट्रंप के शासनकाल में यह ज्यादा गहरी हुई है। इसका असर राजनीति में भी दिख रहा है और तमाम समुदाय अपने-अपने प्रतिनिधित्व की मांग करने लगे हैं। चूंकि दो साल बाद फिर से कुछ सीटों के लिए सीनेट के चुनाव होंगे, इसलिए रिपब्लिकन पार्टी सदन में फिर से बहुमत के लिए जोर आजमाइश करना चाहेगी। यह पार्टी चाहेगी कि चुनाव में पूरे दम-खम से मुकाबला किया जाए, ताकि सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी को ‘मनमर्जी’ करने से रोका जा सके। लिहाजा संसद भवन पर हमला अपने समर्थकों में जोश भरने की मंशा से किया गया कृत्य हो सकता है। रिपब्लिकन यह कभी नहीं चाहेंगे कि डेमोके्रट उन नीतियों को बदलने की सोचें, जो ट्रंप शासनकाल में बनाई गई हैं। वे डेमोक्रेट को यह संदेश देना चाहते होंगे कि ऐसी किसी कवायद में उसे हिंसक विरोध तक झेलना पड़ सकता है, और अगर अगले सीनेट चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी ने बाजी मार ली, तो किसी भी बिल को पारित कराना डेमोक्रेट के लिए काफी मुश्किल हो जाएगा। एक मकसद रिपब्लिकन पार्टी का अपने सांसदों को संदेश देना भी हो सकता है। दरअसल, कांग्रेस में मुद्दों के आधार पर दोनों पार्टियां एक-दूसरे का समर्थन करती रही हैं। कभी-कभी तो आलाकमान के खिलाफ भी ऐसा किया जाता है। रिपब्लिकन नेतृत्व को संभवत: यह डर हो कि कांग्रेस के उसके प्रतिनिधि यदि डेमोक्रेट का समर्थन करने लगेंगे, तो वह पार्टी पर अपनी पकड़ खो सकते हैं। फिर, एक संदेश उन सीटों के संभावित प्रतिनिधियों को भी देना हो सकता है, जहां दो साल बाद चुनाव होने वाले हैं। संभव है, रिपब्लिकन नेतृत्व स्थानीय इकाइयों की दखलंदाजी के बिना अपने तईं प्रतिनिधियों का चयन करना चाहता होगा। अब सवाल यह है कि इस हिंसक घटनाक्रम का बाइडन प्रशासन पर  क्या असर पड़ेगा? इसका ठीक-ठीक पता तो जनवरी के दूसरे पखवाडे़ में चलेगा, जब जो बाइडन अमेरिका के नए राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेंगे। मगर ऐसा लगता है कि अमेरिका की विदेश नीति में हाल-फिलहाल शायद ही कोई फेरबदल हो। मुमकिन है कि बाइडन उन्हीं नीतियों का पोषण करेंगे, जो रिपब्लिकन शासनकाल में बनाई गई हैं। हां, घरेलू मोर्चे पर कुछ बदलाव देखे जा सकते हैं। मगर यहां भी जो नीतियां ‘ऑटोमेटिक मोड’ में हैं, यानी कांग्रेस से पास हो चुकी हैं और जिनको तय वक्त में लागू किया जाना अनिवार्य है, उनकी राह में कोई बाधा शायद ही डाली जाएगी। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उन रिपब्लिकन सांसदों को डेमोक्रेट अपने पक्ष में करना चाहेंगे, जो उनके प्रति उदार रुख रखते हैं। इसके अलावा, बाइडन प्रशासन सामाजिक तनाव को कम करने का प्रयास भी गंभीरता से कर सकता है। अश्वेतों के प्रति डेमोक्रेटिक पार्टी का रवैया नरम रहा है, इसलिए यह माना जा रहा है कि अगली सरकार में उनके हितों को पर्याप्त तवज्जो दी जाएगी। बाइडन प्रशासन इस दिशा में इसलिए भी आगे बढ़ना चाहेगा, क्योंकि कैपिटल हिल बिल्डिंग पर हमले की एक बड़ी वजह आम लोगों में बढ़ती नस्लीय तनातनी भी है। मगर नई सरकार की ताजपोशी में अब भी 10 से अधिक दिनों का वक्त बाकी है। इस बीच क्या अमेरिका यूं ही बगावत की आग में जलता रहेगा? इसका जवाब रिपब्लिकन नेतृत्व और उनके पुराने राष्ट्रपतियों के रुख से मिल सकेगा। अगर वे निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर दबाव बनाते हैं, तो संभव है, यह मामला यहीं थम जाए। अमेरिकी लोकतंत्र की सेहत के लिए भी ऐसा किया जाना जरूरी है। मगर ऐसा नहीं हुआ, तो घरेलू मोर्चे के साथ-साथ इस घटना का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खासा असर पडेग़ा। वहां अमेरिका की हैसियत घट सकती है। इतना ही नहीं, वह अभी कई वैश्विक मुद्दों में भी उलझा हुआ है। चीन के साथ ‘ट्रेड वार’ की आग भी वक्त-वक्त पर धधक उठती है। ऐसे में, कांग्रेस के रुतबे को कमतर करना कई मामलों में उसकी सर्वोच्चता को कमजोर कर सकता है। उम्मीद है, ट्रंप प्रशासन इस आरोप के साथ अपनी विदाई नहीं चाहेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Thursday, January 7, 2021

कई मुश्किलों का हल सेंट्रल विस्टा (हिन्दुस्तान)

योगेंद्र नारायण, पूर्व महासचिव, राज्यसभा 


सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिलने के बाद सेंट्रल विस्टा परियोजना का रास्ता साफ हो गया है। इस परियोजना के तहत राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट होते हुए यमुना किनारे तक की ज्यादातर सरकारी इमारतों का पुनरोद्धार या पुनर्निर्माण किया जाएगा। राजपथ को भी नया रूप दिया जाएगा। इसी में प्रधानमंत्री और उप-राष्ट्रपति के आवास सहित कई नए कार्यालय भवन भी बनाए जाएंगे, ताकि मंत्रालयों और विभागों के कामकाज में सहूलियत हो। बेशक संसद भवन सहित सभी मौजूदा इमारतें कमोबेश मजबूत हैं, मगर कई दिक्कतों की वजह से नए निर्माण-कार्य की जरूरत आन पड़ी है।

मौजूदा संसद भवन की योजना, डिजाइन और निर्माण का काम लुटियन्स और हर्बर्ट बेकर की देखरेख में किया गया था, और 18 जनवरी, 1927 को तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया था। निचले सदन को पहले सेंट्रल लेजिस्लेटिव कौंसिल कहा जाता था, जिसकी इमारत दिल्ली के मॉडल टाउन में थी। इसमें 150 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था थी। बाद में उसका पुनरोद्धार किया गया और नई इमारत बनाई गई। इसमें 396 की सदस्यों के बैठने की व्यवस्था गई, फिर 461, 499, 522 व 530 सांसद बैठने लगे। आज 550 सांसदों के बैठने की यहां व्यवस्था है। माननीयों की संख्या बढ़ने की वजह से ही लोकसभा में कई सीटें पीलर के पीछे हैं। 

संसद भवन में लोकसभा, राज्यसभा के साथ-साथ सेंट्रल हॉल भी है, जहां संयुक्त सत्र बुलाए जाते हैं। राष्ट्रपति जब बजट सत्र की शुरुआत करते हैं, तब उनका अभिभाषण इसी कक्ष में होता है। ऐसे किसी आयोजन में यहां पर सभी सांसदों (545 लोकसभा और 250 राज्यसभा) के लिए बैठने की व्यवस्था करना एक कठिन काम होता है। और, जब कोई बड़े विदेशी नेता यहां आते हैं, तब तमाम सांसदों के साथ कई अन्य मेहमानों को भी न्योता दिया जाता है। अंदाज लगाया जा सकता है कि यहां के प्रशासनिक तंत्र को कितनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता होगा। यहां यह महसूस किया जाता रहा है कि सदस्यों के अनुपात में जगह काफी कम है। सत्र के दौरान मंत्रियों का अपने कार्यालयों में बैठना अनिवार्य होता है। मगर मंत्रियों की संख्या बढ़ने के कारण उनके बैठने के लिए अंदरखाने में कई तरह के कतर-ब्योंत करने पड़े हैं। चूंकि यहां कमरे सीमित हैं, इसलिए उन्हें लगातार छोटा किया जाता रहा है। अब तो आलम यह है कि संसदीय क्षेत्रों से आने वाले लोगों को भी सांसद शायद ही कहीं बिठा पाते हैं। गैलरी या केंद्रीय कक्ष में ही उनसे मेल-मुलाकात की जाती है।

मौजूदा संसद भवन का नक्शा 1921-27 का है। वह संरचना आज के हिसाब से काफी पुरानी पड़ चुकी है। जब मैं लोकसभा महासचिव के रूप में अपनी सेवा दे रहा था, तब मुझे शिकायत मिली कि कमरों में काफी अधिक बदबू है, जिसके कारण वहां बैठना संभव नहीं। जांच-पड़ताल के बाद पता चला कि यहां की रसोई से जो कचरा निकलता है, वह नालियों में फंस जाता है। चूंकि जब इस इमारत को तैयार किया गया था, तब रसोई की संकल्पना नहीं की गई थी। इसकी शुरुआत बाद में हुई है, इसलिए रसोई से निकलने वाले कचरे को नालियों में ही बहाया जाता रहा है। पुरानी योजना की वजह से हम लोकसभा में पंखे उल्टा लटकते हुए देखते हैं और फायर अलार्म की व्यवस्था भी काफी बाद में की गई है। सरकार अपने कामकाज में सहूलियत के लिए संसदीय समिति बनाती रही है। मौजूदा संसद भवन में इसकी बैठकों के लिए तीन कमरे आरक्षित हैं। चूंकि समितियां अब ज्यादा बनाई जाती हैं, इसलिए सदस्यों को बैठकों में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें या तो कहीं और बैठकें करनी पड़ती हैं या फिर कक्ष के खाली होने का लंबा इंतजार करना पड़ता है। सुरक्षा के लिहाज से भी नए भवन की जरूरत है। सुरक्षा जांच करने वाले अधिकारियों ने बताया था कि रासायनिक युद्ध होने पर यह भवन सांसदों के लिए सुरक्षित नहीं रहेगा। भविष्य के युद्ध का हमें कोई इल्म नहीं है, इसलिए ऐसी व्यवस्था होनी ही चाहिए कि ऐसे किसी हमले में सांसदों को बचाया जा सके। सवाल यह है कि नया भवन कितना मुफीद होगा? इसमें तमाम सांसदों के लिए अलग-अलग कमरे होंगे, जैसा कि अमेरिका में होता है। मंत्रियों के लिए भी कमरे बनाए जाएंगे। बैठक के लिए हॉल भी अधिक बनेंगे। इतना ही नहीं, नए भवन में तमाम राज्यों की कलाकृतियों को जगह दी जाएगी। पुराने भवनों के रख-रखाव पर हमें हर साल तकरीबन 800 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। अत्याधुनिक तकनीक से बनने वाली नई इमारतें इस खर्च को काफी कम कर देंगी। 

इस परियोजना के तहत प्रधानमंत्री आवास भी बनाया जाएगा। अभी यह जिमखाना क्लब से सटा हुआ है, जहां की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है। फिर, वह मुख्य सड़क पर भी है। प्रधानमंत्री जब बैठकें बुलाते हैं, तो सभी को मंत्रालय छोड़कर उनके घर पर जाना पड़ता है। इसमें काफी वक्त जाया होता है। नए भवन में सभी 83 मंत्रालय एक साथ रहेंगे। इससे अंतर-मंत्रालयी बैठकों में शामिल होना आसान होगा।

इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि अभी की व्यवस्था में शासन पर कोई बहुत ज्यादा असर पड़ता है। मगर हां, सेंट्रल विस्टा से कामकाज में सहूलियत जरूर हो जाएगी, जिससे कर्मचारियों व सांसदों की कार्यक्षमता बढ़ जाएगी। मसलन, अभी हमें वित्त मंत्रालय जाने के लिए कई  जगह पास बनवाने पड़ते हैं। इसमें दो-तीन घंटे का समय लग जाता है। और इस दरम्यान यदि दूसरे मंत्रालय का कोई जरूरी काम आन पड़ा, तो काफी दौड़-भाग करनी पड़ जाती है। रक्षा मंत्रालय का ही उदाहण लें। अभी वायु भवन, सेना भवन जैसी कई इमारतें हैं। यहां से कई फाइलें लाई और ले जाई जाती हैं। इसमें संवेदनशील जानकारियों के लीक हो जाने का खतरा बना रहता है। नई परियोजना में तमाम ब्लॉक अंदर ही अंदर आपस में जुड़े रहेंगे। सुरक्षा के लिहाज से भी न्यूक्लियर सेंटर नीचे बनाया जा सकता है। रासायनिक युद्ध में बचाव तो होगा ही। साफ है, सेंट्रल विस्टा परियोजना हर मामले में हमारे लिए लाभदायक साबित होने वाली है।

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Tuesday, January 5, 2021

कहीं लोगों का भरोसा डिग न जाए (हिन्दुस्तान)

 नीरजा चौधरी, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक  

देश में कोरोना टीके को लेकर चल रही राजनीति प्रत्याशित थी। इसकी शुरुआत 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से ही हो गई थी, जब भारतीय जनता पार्टी ने अपने संकल्प पत्र में मतदाताओं को मुफ्त में कोरोना टीका देने की बात कही। इस वादे का उसे कितना चुनावी लाभ मिला, यह ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है, लेकिन सत्ता में उसकी वापसी कोरोना वैक्सीन पर संभावित सियासी टकराव का संकेत दे रही थी। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा इसे भारतीय जनता पार्टी की  वैक्सीन बताना, इसी की कड़ी है। हालांकि, बाद में उन्होंने सफाई भी दी, लेकिन तब तक विरोधी पार्टियां उन पर हमलावर हो चुकी थीं। साफ है, मतदाताओं को प्रलोभन देने के लिए वैक्सीन की राजनीति करना जितना गलत था, उसे खास पार्टी का टीका बताना उतना ही निंदनीय। मगर इसमें तीसरा पक्ष भी है। कुछ विपक्षी नेता स्वदेशी वैक्सीन की मंजूरी पर सवाल उठा रहे हैं। उनकी चिंता है कि तीसरे फेज का ट्रायल पूरा हुए बिना टीके का इस्तेमाल जोखिम भरा हो सकता है। इसे हम राजनीति नहीं कह सकते। चिकित्सक व महामारी विज्ञानी भी इस बाबत चिंता जता रहे हैं। लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और इसके लिए विपक्ष का आवाज बुलंद करना वाजिब है। सरकार की नीतियां अगर सही से काम नहीं कर रही हों, तो उस पर सवाल उठेंगे ही। संविधान ने तमाम दलों को ये अधिकार दे रखे हैं। पर विपक्ष का अति-उत्साहित होकर अपना यह दायित्व निभाना जन-विरोधी भी हो सकता है। उसे फूंक-फूंककर अपना कदम उठाना चाहिए, क्योंकि यदि लोगों के मन में एक बार शंका घर कर गई, तो फिर टीकाकरण अभियान पर  इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है, और इसका नुकसान अंतत: आम जनता को ही होगा। विरोधियों को बेशक प्रश्न पूछने चाहिए, लेकिन किसी तरह के अविश्वास को खाद-पानी देने से उन्हें बचना चाहिए। यह बहुत बारीक रेखा है, जिसके लिए विपक्ष को सतर्क रहना होगा। इसका यह मतलब नहीं है कि सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है। लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए उसे कहीं ज्यादा गंभीरता दिखानी होगी। सावधानी और सुरक्षा लाजिमी है, लेकिन सबसे जरूरी पारदर्शिता है। इसलिए सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सुरक्षित ट्रायल के बिना टीके के इस्तेमाल की अनुमति क्यों दी गई है? ऐसी कौन सी मजबूरी है कि उसे यह जोखिम भरा कदम उठाना पड़ा? कहा जा रहा है कि कोरोना वायरस के लगातार म्यूटेट (रूप बदलने) करने और नए स्ट्रेन के बढ़ते संक्रमण की वजह से सरकार ने आनन-फानन में टीकों को मंजूर किया। क्या यही एकमात्र वजह है? हालांकि, अभी अपने यहां नए स्ट्रेन से संक्रमित मरीजों की संख्या 50 के आस-पास है, और इनके आइसोलेशन व ट्रेसिंग से संक्रमण थामा जा सकता है। या, सरकार यह साबित करना चाहती है कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ परवान चढ़ चुका है और स्वदेशी वैक्सीन से टीकाकरण की शुरुआत करने में देश सक्षम है? ऐसे सवालों के ठोस जवाब सामने आने चाहिए। सरकार द्वारा अपनी मंशा और मकसद को जाहिर करना किस कदर तंत्र में लोगों का भरोसा बढ़ाता है, न्यूयॉर्क इसका एक बड़ा उदाहरण है। अमेरिका के सर्वाधिक आबादी वाले इस शहर के गवर्नर एंड्रयू क्योमो की आज इसलिए तारीफ हो रही है, क्योंकि उन्होंने कोरोना काल में हर अच्छी-बुरी खबरें लोगों से साझा कीं। उनका मंत्र यही था कि जनता को सब कुछ पता होना चाहिए; बिना उसकी मदद से कोरोना के खिलाफ जंग नहीं जीती जा सकती। यह एक बेहतरीन रवैया था। इस तरह के संवेदनशील मामलों में पारदर्शिता बहुत जरूरी होती है। जनता अगर यह समझती है कि सरकार उससे कुछ नहीं छिपा रही, तो तंत्र में उसकी भागीदारी स्वाभाविक तौर पर बढ़ जाती है। कोरोना संक्रमण-काल की नाजुकता से हर कोई वाकिफ है। यह सभी जानते हैं कि सरकार एक बड़ी चुनौती से मुकाबिल है। भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में सबको टीका लगाना इतना आसान भी नहीं। हालांकि, अपने यहां टीकाकरण का बुनियादी ढांचा मौजूद है, जो एक राहत की बात है। हमने बडे़-बडे़ टीकाकरण अभियान सफलतापूर्वक चलाए हैं। वैक्सीन के उत्पादन का हमारा अनुभव और क्षमता भी हमें कई देशों से बेहतर बनाता है। ऐसी स्थिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष का आपस में उलझना हमें कई मोर्चों पर पीछे धकेल सकता है। हर लोकतांत्रिक देश में विभिन्न मुद्दों पर राजनीतिक दल आपस में गुत्थम-गुत्था होते रहते हैं। अमेरिका में तो जबर्दस्त खींचतान है। यूरोप में भी कुछ कम थी, लेकिन जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन खुद कोरोना-संक्रमित हुए, तब सरकार का रवैया बदल गया। अब वहां फिर से लॉकडाउन लगाया गया है और जनता भी सरकार का हरसंभव साथ दे रही है। लोग सरकार की मंशा भांप लेते हैं, इसलिए हर मुद्दों पर वे पारदर्शिता की अपेक्षा रखते हैं। अगर विपक्ष द्वारा कुछ वाजिब सवाल पूछे जा रहे हैं, तो सरकार को उतनी ही गंभीरता से जवाब देना चाहिए। इस संक्रमण-काल में सरकार के लिए कई नए मोर्चे खुले हैं और कई मोर्चों पर उसकी जंग लगातार जारी है। ऐसे में, चूक होने की आशंका भी स्वाभाविक है। और अगर कोई उस गलती की तरफ उसका ध्यान खींचता है, तो उसे उस पर गौर करना चाहिए। उसका यह व्यवहार कोरोना के खिलाफ जंग को मजबूत बनाएगा। प्रधानमंत्री चाहें, तो एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर अपने इस रुख का परिचय दे सकते हैं। वह बंद कमरे में सभी राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं से कोरोना संक्रमण के विस्तार, मंजूर किए गए दोनों टीकों के असर, टीकाकरण अभियान की चुनौती, सरकार की रणनीति जैसी तमाम बातें साझा कर सकते हैं। यकीनन इसका व्यापक असर होगा। मगर सवाल यह है कि कुछ मामलों में संवादहीनता को बतौर रणनीति इस्तेमाल करने वाली सरकार इस दिशा में आगे बढ़ेगी? इसका जवाब तो सत्ता पक्ष ही दे सकता है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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Monday, January 4, 2021

दुनिया ने देखा भारत का आत्मविश्वास (प्रभात खबर)

प्रो सतीश कुमार, राजनीतिक विश्लेषक

घरेलू राजनीति की तरह विश्व राजनीति की पड़ताल वार्षिक नहीं हो सकती. एक वर्ष में बहुत कुछ नहीं बदल सकता. लेकिन 2020 एक ऐसा वर्ष रहा, जहां से विश्व राजनीति की बुनियाद बदली है या बदलने का पूरा बंदोबस्त हो चुका है. अगर भारत की विश्व राजनीति में शिरकत और उसकी खासियत की चर्चा करें, तो कई चौराहे आते है, जहां से भारत की विदेश नीति किसी और दिशा में भी मुड़ सकती थी, लेकिन उसने जो करवट ली, उसमें 1954, 1991, 1998 और 2020 की पहचान अलग है.


विदेशमंत्री एस जयशंकर ने अपनी पुस्तक में भी छह महत्वपूर्ण कालखंडों के आधार पर भारतीय विदेश नीति की चर्चा की है. लेकिन वर्ष को ध्यान में रखकर अगर विवेचना करें, तो 2020 को नये काल खंड का प्रारंभ माना जा सकता है.

वैश्विक महामारी के साथ इस साल की शुरुआत हुई थी और देखते-देखते चीन के वुहान से निकला वायरस पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन गया.

चीन और अमेरिका के बीच के शीत युद्ध ने विश्व को दो खंडों में बांट दिया. चीन के आर्थिक बोझ से दबे देशों ने उसके विरुद्ध बन रही गोलबंदी से अपने को बाहर रखा. उस गोलबंदी में चीन के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव से चोटिल देश चीन उसके विरुद्ध एक मुहिम के साथ खड़े थे. इस शीत युद्ध में अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी थीं. पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन और फिर सयुंक्त राष्ट्र भी घेरे में आ गया. भारत का आरंभिक निर्णय पहले की तरह गुटनिरपेक्षता की तरह था, लेकिन महामारी के बीच चीन ने लद्दाख क्षेत्र में भारत के विरुद्ध नये सीमा विवाद की चिंगारी पैदा कर दी.

वह अपनी सैनिक और आर्थिक शक्ति के मद में इतना चूर था कि उसे 2017 का दोकलाम घटनाक्रम याद नहीं रहा. उसे गुमान था कि भारत की जरूरत की ढेरों चीजें चीन से मुहैया होती हैं, तो भारत सीमा विवाद पर घुटने टेक देगा. भारत का सिद्धांत था कि राजनीतिक झगड़े व्यापार के आड़े नहीं आयेंगे, लेकिन चीन ने भारत को महज आश्रित समझने की भूल कर दी. भारत ने ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के साथ हिंद प्रशांत क्षेत्र में साझा पहल को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है. चीन के आक्रमक और व्यवस्था विरोधी रवैये के बरक्स इस चतुष्क मंच को कारगर बनाने की चुनौती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लिया गया आत्मनिर्भर भारत का निर्णय 2020 का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय बन गया. दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी भारत में है. साल 1978 में चीन ने जब तत्कालीन राष्ट्रपति देंग के कार्यकाल में आर्थिक उदारवाद की शुरुआत की थी, तब सबसे बड़ी युवा आबादी चीन के पास थी. लेकिन चार दशकों में वह पीढ़ी बुढ़ापे के मुहाने पर पहुंच चुकी है.

जो चमत्कार चीन ने हुनर और कौशल के साथ उस समय किया, उसी परिवर्तन का प्रारंभ भारत ने 2020 में किया है. यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि हमेशा से हमारी विदेश नीति का आधार आत्मबल रहा है. शीत युद्ध (1947-91) के दौरान भारत किसी गुट का हिस्सा नहीं बना. साल 1991 से 2008 के बीच जब विश्व व्यवस्था पर अमेरिका हावी हुआ, तब भी भारत ने अपनी संयमित दूरी बनाये रखी.

आज जब भारत एक मिडिल पॉवर है और अमेरिका के साथ संबंध अच्छे हैं, तब भी भारत अपनी स्वायत्तता और स्वतंत्रता को बनाये हुए है. अमेरिका के साथ रूस और फ्रांस से भी भारत की मित्रता है.

आत्मनिर्भर भारत का अर्थ बिल्कुल दुनिया से कटना या संबंध विच्छेद करना नहीं है, बल्कि दुनिया को विकास की धारा में जोड़ना और एक दूसरे की शक्ति का आधार बनना है. अगर पड़ोसी देशों की नीति की व्याख्या करें, तो उसका मूल अर्थ पड़ोसी के साथ जोड़ना है. पिछले दिनों में आत्मनिर्भर भारत मुहिम के तहत भारत ने उत्तर-पूर्वी राज्यों को बांग्लादेश, म्यांमार और भूटान से जोड़ने की कवायद भी शुरू कर दी है.

ढाका से अगरतला के बीच मैत्री और बंधन एक्सप्रेस की लाइन खींची जा रही है. उसी तरह म्यांमार और थाइलैंड के बीच भी सड़क और रेलमार्ग की तैयारी चल रही है. अमेरिका सहित यूरोप के बड़े देश भी इस मुहिम के साथ हैं. साल 2020 में कई द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठकों में भारत ने भागीदारी की है. उन बैठकों में भारत का आत्मविश्वास भी दिखा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग व सहकार की उसकी मंशा भी जगजाहिर हुई.

वैश्विक सप्लाइ चेन में चीन के वर्चस्व को कमतर करने तथा दुनिया की तस्वीर बदलने में आत्मनिर्भर भारत बहुत कारगर हो सकता है, दुनिया के कई देश भली-भांति इस बात को समझ चुके हैं. स्वाभाविक रूप से इससे भारत का महत्व भी बढ़ेगा, लेकिन भारत की शक्ति किसी भी देश के लिए मुसीबत नहीं बनेगी. उससे पड़ोसी देशों की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है, यह संदेश भी विश्व को पहुंचा है.

प्रधानमंत्री मोदी ‘एक सूर्य, एक विश्व और एक ग्रिड’ का सिद्धांत पहले ही रख चुके हैं और पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन उनकी प्राथमिकताओं में हैं. साल 2021 का प्रारंभ अमेरिकी नीतियों में बदलाव के साथ होगा. उससे भारतीय विदेश नीति भी प्रभावित हो सकती है. बीतता वर्ष इस बात के लिए याद रखा जायेगा कि भारत ने न केवल आर्थिक ढांचे में आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला रखी है, बल्कि विदेश नीति में भी वह अपने निर्णय के लिए स्वतंत्र है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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उम्मीद का टीका (जनसत्ता)

इस बीच कई देशों की प्रयोगशालाओं में कोरोना का टीका तैयार करने का काम चलता रहा। पहले रूस से यह खबर आई कि वहां स्पुतनिक-वी नामक टीका तैयार हो गया जो इस महामारी से बचा सकेगा। समूचे परिदृश्य में इसे एक उम्मीद की तरह देखा गया और इसी सिरे को आगे बढ़ाते हुए कई देशों के चिकित्सा वैज्ञानिक और ज्यादा पुख्ता टीका बनाने की कोशिश में लगे रहे।

अब आॅक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका के कोरोना टीके को आपात इस्तेमाल के लिए ब्रिटेन के दवा नियामक की मंजूरी मिलने की खबर वैश्विक स्तर पर इस बीमारी से जूझ रहे देशों और लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन कर आई है।

बताया जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में ब्रिटेन के लोगों को आॅक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका के टीके की खुराक मिलनी शुरू हो जाएगी। हालांकि इससे पहले ब्रिटेन ने फाइजर कंपनी के टीके को आपात इस्तेमाल की इजाजत दी थी और अब तक सात लाख से ज्यादा लोगों को इसकी पहली खुराक दी जा चुकी है। लेकिन अब आॅक्सफोर्ड के टीके को भी वहां मंजूरी मिल गई है।

स्वाभाविक रूप से ब्रिटेन में टीके को मंजूरी मिलने के बाद अब भारत में भी इस मसले पर उम्मीदें बढ़ गई हैं। गौरतलब है कि यहां इस्तेमाल के लिए स्वीकृति हासिल करने के मामले में आॅक्सफोर्ड का कोरोना टीका सबसे पहले स्थान पर है। भारत में दवा बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट आॅक्सफोर्ड के कोराना टीके का वितरण करने जा रही है।

ब्रिटेन में इसके प्रयोग और असर को देखने के बाद अगले कुछ दिनों में इस मसले पर भारत सरकार कोई बड़ी घोषणा कर सकती है। यों प्रधानमंत्री ने इस बारे में संकेत दे दिए हैं और कहा है कि नया साल इलाज की आशा लेकर आ रहा है; देश में टीके को लेकर तैयारियां अब अंतिम चरण में हैं और अब दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू होगा।

कहा जा सकता है कि आॅक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका के टीके को ब्रिटेन में मंजूरी मिलने के बाद भारत या दुनिया के दूसरे तमाम देशों के लोगों के बीच यह उम्मीद भी जगी है कि अब उन्हें एक लाइलाज बीमारी की चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा, बल्कि उसका टीका उपलब्ध होगा।

पिछले नौ-दस महीनों के दौरान महामारी का सामना करती हुई दुनिया के लगभग सभी देशों ने स्वास्थ्य से लेकर अर्थव्यवस्था सहित तमाम मोर्चे पर कितने दंश झेले हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। अब टीका तैयार होने से जुड़ी खबरों के बाद निश्चित रूप से दुनिया भर में एक सकारात्मक संदेश गया होगा। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि टीका आने की खबर के बाद फिलहाल मामूली लापरवाही भी एक बड़ा जोखिम पैदा कर सकती है।

इसलिए महज टीका आने की खबर या टीका लेने के बाद अगले कुछ समय तक हर स्तर पर कोरोना से बचाव से संबंधित सावधानी बरतनी होगी।। साथ ही उम्मीदों के बीच टीके के दुष्प्रभावों से संबंधित आशंकाओं को दूर करने की जरूरत होगी। इसके अलावा, कोरोना के नए स्वरूप के खतरे के बारे में अब लगभग सभी लोग जान चुके हैं।

यानी अब दुनिया के सामने नए कोरोना की चुनौती भी खड़ी हो गई है। कई देशों में इससे लोगों के संक्रमित होने की खबरें आ चुकी हैं। लेकिन राहत की बात यह है कि चिकित्सा वैज्ञानिकों ने यह उम्मीद जताई है कि कोरोना के नए स्ट्रेन से संक्रमित मरीजों में भी टीका कारगर तरीके से काम करेगा।

सौजन्य - जनसत्ता।

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अब क्रांति नहीं, विकास चाहिए (हिन्दुस्तान)

हरजिंदर वरिष्ठ पत्रकार 

जैसे पर्वतीय घाटियों से निकलने वाली कोई उछलती-कूदती वेगवती नदी मैदान में पहुंचकर अचानक ही शांत होने लग जाए। 21वें साल को उम्र का वह पड़ाव माना जाता है, जब बचपन और जवानी का शुरुआती अल्लहड़पन पीछे छूट जाता है और परिपक्वता का दौर शुरू होता है। इस सदी के 21वें साल से भी क्या बस इतनी उम्मीद बांधनी होगी? वैसे, इस समय हम 21वीं सदी में भी हैं। अगर पिछली सारी सदियों से तुलना करें, तो कम से कम अपने शुरुआती दो दशकों में तो यह सदी नीरसता में लिपटी परिपक्वता से बार-बार मुलाकात कराती रही है। पिछली सदी का पूरा पूर्वाद्र्ध बदलाव की कसमें खाने और क्रांतियों के लिए अधीर दिखाई देता है। लेकिन 21वीं सदी के आते-आते वे सारे उबाल ठंडे पड़ चुके हैं और अब क्रांति नहीं, विकास की बात होती है। बदलाव के हरावल दस्तों को संगठित करने पर नहीं, बल्कि संसाधनों को जुटाने पर जोर दिया जाता है। एक तरह से यह ठंडे पड़ चुके जोश की सदी का 21वां साल भी है। इस सदी के 21वें साल की तुलना अगर हम पिछली सदी के 21वें साल से करें, तो एक समानता साफ तौर पर दिखाई देती है। दोनों की शुरुआत महामारी के भयानक सदमे के बीच हुई। हालांकि, स्पैनिश फ्लू की शुरुआत 1918 में हुई थी, लेकिन उसका ज्यादा प्रकोप 1919 और 1920 में रहा, और उसका अंतिम सिरा 1921 तक गया। वैसे ही, जैसे कोविड-19 दरअसल 2019 में शुरू हुआ, लेकिन उसके प्रकोप का वर्ष 2020 को ही माना जाएगा। दोनों सदी का एक अंतर हम इन दो महामारियों से भी समझ सकते हैं। स्पैनिश फ्लू निश्चित तौर पर ज्यादा भयावह महामारी थी। उसने कहीं ज्यादा लोगों की जान ली। और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह था कि जहां कोरोना वायरस संक्रमण ने सबसे ज्यादा संख्या में बुजुर्गों को अपना निशाना बनाया, तो वहीं स्पैनिश फ्लू का ज्यादातर शिकार नौजवान थे। एक अंतर ज्ञान और विज्ञान का भी है। स्पैनिश फ्लू जब फैला, तब वायरस शब्द का इस्तेमाल भले ही होने लगा था, लेकिन वायरस क्या होता है, यह जानकारी नहीं थी। वायरस के बारे में जानकारी तो एक दशक के बाद मिल पाई, जब इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप बना और पहली बार उसे देखा जा सका। जबकि इस बार महामारी फैलने के कुछ ही सप्ताह बाद कोरोना वायरस की पूरी जिनोम कुंडली दुनिया भर के वैज्ञानिकों के पास थी और चंद महीनों के बाद अब हमारे पास एक दर्जन से ज्यादा तरह की वैक्सीन भी लगभग तैयार हैं। पिछली सदी के 21वें साल की तारीखों और घटनाओं को अगर गौर से देखें, तो वह एक तरह से महामारी के दुखों को भुलाने का साल था। यह वह साल था, जब पूरी दुनिया ने सारे गम भुलाकर फिर से बदलाव की अपनी प्रतिबद्धता की ओर लौटना शुरू कर दिया था। वे सारे संकल्प लौट आए, महामारी का तूफान भी जिनका बाल-बांका नहीं कर सका था। भारत के संदर्भ में देखें, तो 1921 ही वह साल था, जब देश में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन ने तिरंगे झंडे को अपनाया और उसे गुलामी से मुक्ति की चाह का परचम बना दिया। खादी अपनाने का आंदोलन भी इसी साल शुरू हुआ था। बदलाव की  इतनी ही तेज चाह इसी साल पूरी दुनिया में लौटी थी। इसी साल चीन में कम्युनिस्ट पार्टी बनी और अफीमचियों का देश कहलाने वाले इस मुल्क ने इस छवि से मुक्ति की राह पकड़नी शुरू कर दी। एशिया के तकरीबन सभी देशों में साम्यवादी और समाजवादी पार्टियों की स्थापना इसी के बाद शुरू हुई। नया हासिल करने की कोशिश में 1921 के पुराने गम न सिर्फ भुलाए गए, बल्कि उसका रिकॉर्ड रखने की भी जरूरत नहीं समझी गई। दो साल पहले स्पैनिश फ्लू की एक सदी पूरी होने पर जब कुछ इतिहासकारों ने दस्तावेज खंगालने शुरू किए, तो पता चला कि उस महामारी की बहुत सी बातें कहीं दर्ज ही नहीं हैं। यहां तक कि भारत समेत बहुत सारे देशों में ऐसे प्रामाणिक आंकडे़ भी उपलब्ध नहीं हैं कि महामारी ने कितने लोगों को संक्रमित किया, कितने बच पाए और कितनों को नहीं बचाया जा सका? एक कारण यह भी है कि दुनिया पहले विश्व युद्ध से बस निकली ही थी और ज्यादातर देशों की दिलचस्पी आंकड़ों को जमा करने से ज्यादा उन्हें छिपाने में थी। खासकर वे आंकड़े, जो उस समय की विश्व शक्तियों के उपनिवेशों के थे। यानी 1921 में बीते समय की बुरी यादों को सिर्फ भुलाया नहीं गया, बल्कि दफ्न भी कर दिया गया। इस मामले में 2021 एक अलग तरह का वर्ष होगा। इस समय हमारे पास महामारी के ढेर सारे आंकड़े हैं। कंप्यूटर की भाषा में बात करें, तो अभी तक कई टेराबाइट आंकड़े जमा हो चुके हैं और हर रोज जमा हो रहे हैं। इसके अलावा, हम जितनी भी तरह की मानव त्रासदियों से इस दौर में गुजरे हैं, उनमें से ज्यादातर लेखों, रिपोर्टों और कई तरह के वीडियो में दर्ज हो चुकी हैं। ये सब चीजें हमारे पास अब हमेशा रहने वाली हैं। बाद में भले ही इनकी याद धूमिल पड़ जाए, लेकिन 2021 में इन्हें कोशिश करके भुला पाना शायद मुमकिन नहीं होगा। भुलाया भी जाए, तो किसके लिए? उसके बचपन और जवानी ने 21वीं सदी को वे सपने और संकल्प नहीं दिए, जिनकी दीवानगी सब कुछ भुलाने का एक बड़ा और वाजिब कारण बन सकती थी। हम यह उम्मीद भी नहीं बांध रहे कि 2021 हमें 2020 की बुरी यादों से मुक्ति दिला देगा। उम्मीद सिर्फ इतनी है कि 2020 में हम जिन कष्टों से गुजरे हैं, 2021 हमें वैसे कष्टों से बचा लेगा। और शायद कुछ ऐसी व्यवस्थाएं भी देगा, जो भविष्य की किसी महामारी में हमारी रक्षा करेंगी। यथार्थ की जमीन पर खड़ा 2021 एक परिपक्व सदी का परिपक्व साल साबित होने वाला है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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वैक्सीन के साथ साल का स्वागत (हिन्दुस्तान)

अभिलाषा द्विवेदी, जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञ 


हम साल 2021 में कोविड-19 से निजात पाने के लिए टीकाकरण की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। दस से ज्यादा देशों में टीकाकरण की शुरुआत भी हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी साल बीतते-बीतते वैक्सीन को स्वास्थ्य आपातकाल के आधार पर अनुमति दे दी है। दुनिया को इस पल का इंतजार था। विश्व स्वास्थ्य संगठन से मिली मंजूरी के बाद भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में टीकाकरण अभियान में तेजी आ जाएगी। अब दुनिया में कहीं भी जरूरत पड़ने पर वैक्सीन कोवीशील्ड का इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत में भी ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेका की कोवीशील्ड और कोवैक्सीन के आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी लगभग तय हो गई है। भारत में और भी वैक्सीन को मंजूरी मिल सकती है, वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां अपने-अपने ढंग से अपने टीके को कारगर साबित करने में लगी हैं। 

इन दिनों दुनिया के अन्य देशों के साथ-साथ भारत में भी टीकाकरण कार्यक्रम की पूरी तैयारी हो रही है।  देशव्यापी पूर्वाभ्यास चल रहा है। यह टीकाकरण की सभी व्यवस्थाओं के प्रबंधन का पूर्वाभ्यास है। भारत वैक्सीन निर्माताओं के साथ निरंतर संपर्क में है। वैक्सीन बन चुकी है। अपने परीक्षण के प्रारंभिक तीन चरण पूरे कर चुकी है, जिनकेआधार पर विशेषज्ञ स्तर से आपातकालीन मंजूरी मिलनी तय है। वैसे अभी भी कुछ विवरण, जैसे कीमत, खुराक इत्यादि बहुत स्पष्ट नहीं हो सके हैं। भारत सरकार लगातार वैक्सीन अपडेट पर अपनी नजर और संपर्क बनाए हुए है। वैक्सीन ऐसा विषय है, जिसमें तमाम सरकारों को दुनिया भर में चल रहे वैज्ञानिक प्रयासों से जुड़ना होगा। वैक्सीन की गुणवत्ता में विशेष रूप से निगाह रखने की जरूरत रहेगी। 

भारत में वैक्सीन की पूरी हलचल है। पूर्वाभ्यास के जरिए 96,000 के करीब वैक्सीनेटरों को प्रशिक्षित किया गया है। राष्ट्रीय प्रशिक्षण द्वारा 2,360 प्रशिक्षक तैयार किए गए हैं। देश भर के 719 जिलों में जिला-स्तरीय प्रशिक्षण में 57,000 से अधिक प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया गया है। वैक्सीन और सॉफ्टवेयर संबंधित प्रश्नों के लिए राज्य हेल्पलाइन नंबर 104 लाने की तैयारी चल रही है। यह हेल्पलाइन नंबर 1075 के अतिरिक्त होगा। जब टीकाकरण अभियान आगे बढ़ेगा, तब निचले स्तर पर लोगों को जोड़ने के लिए और भी सुविधाएं देने की जरूरत पडे़गी।

सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के तमाम प्रयासों के बावजूद कोरोना वैक्सीन की चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। वैक्सीन में भ्रष्टाचार की अटकलों से भारत भी अछूता नहीं है। स्वास्थ्य आपातकाल की इस परिस्थिति में सफल वैक्सीन बाजार में आने वाली है। इसके बाद यह सुनिश्चित करना है कि सही लोगों को सही समय पर सही वैक्सीन मिले, यह एक बड़ी चुनौती है। हम सब जानते हैं, भारत में यह एक बहुत बड़ा काम होगा। 

वैक्सीनेशन की सुविधा का समान रूप से राष्ट्रीय स्तर पर वितरण हो, यह सुनिश्चित करने के लिए प्रारूप तैयार किया गया है। अभी तक भारत में अधिकांश राष्ट्रीय टीका वितरण प्रणाली का प्रारूप बच्चों के पूर्ण टीकाकरण के उद्देश्य से ही रहा है। अभी तक इतने बड़े पैमाने पर वयस्क टीकाकरण के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं है, तो यह भी एक नई चुनौती होगी। भारत में खासकर स्वास्थ्य प्रशासन के लिए यह परीक्षा की घड़ी होगी। 

प्रशासन में विभिन्न स्तर पर कोरोना वायरस प्रतिरोधी टीकाकरण अभियान की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इस महामारी के संक्रमण की गति और प्रभाव में बड़ा अंतर देखने को मिला है। इस आधार पर टीकाकरण को लेकर लोगों में वैक्सीन की जरूरत और उसके असर की विश्वसनीयता को लेकर संशय है। जनता के बीच वैक्सीन की मांग और स्वीकार्यता को लेकर सोच-समझ में भारी अंतर है।

कई तरह की अफवाहें और फर्जीवाड़े भी लोगों के विचार पर असर डाल रहे हैं। वैक्सीन के रखरखाव और उसे प्रभावी बनाए रखने की व्यवस्था को लेकर भी नकारात्मक चर्चाओं से लोगों में असमंजस की स्थिति बनी है। प्रशासन को लोगों के बीच ज्यादा मुस्तैदी के साथ जागरूकता के लिए काम करना पड़ सकता है। लोगों को वैक्सीन के लिए तैयार करने में मुश्किल आ सकती है। यह अच्छी बात है कि लोग वैक्सीन की चर्चा कर रहे हैं। जगह-जगह कोल्ड चेन सिस्टम, कोल्ड स्टोरेज को आखिरी स्वरूप दिया जा रहा है। सिरिंज, बिजली व्यवस्था, सोलर पावर कोल्ड स्टोरेज को भी बेहतर करने पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है। इन तैयारियों से भी देश में वैक्सीन के प्रति स्वीकार का भाव बन रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वक्तव्य में देशवासियों को आश्वस्त किया है कि हमारे लिए सुरक्षा महत्वपूर्ण है, जितनी भी वैक्सीन भारत अपने नागरिकों को देगा, वे सभी वैज्ञानिक मानकों पर सुरक्षित होंगी। 

उधर, अमेरिका में पहले ही कोविड-19 टीकाकरण शुरू कर दिया गया है। इजरायल में अभी तक सात प्रतिशत नागरिकों को टीका लगाया जा चुका है। बेंजामिन नेतन्याहू ने भी वैक्सीन लगवाई है और लोगों को जागरूक और प्रेरित करने के लिए उनके टीकाकरण का सीधा प्रसारण किया गया है। दुनिया में बडे़-बड़े नेता आगे आकर टीका लगवा रहे हैं, ताकि अन्य लोगों को प्रेरणा मिले। भारत में भी इसकी जरूरत पड़ सकती है। अमेरिका के अलावा स्विट्जरलैंड, इजरायल, मलेशिया, ब्रिटेन, बहरीन, कनाडा, मैक्सिको, रूस और चीन में भी टीकाकरण चल रहा है।

कई देशों में अनेक टीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं, लेकिन उनका सभी मानव समूहों पर समग्र प्रभाव परखना अभी बाकी है। टीका व्यक्ति के बीमार पड़ने और उसे फिर अस्पताल में भर्ती होने के खतरे से बचाएगा, लेकिन यह भी संभव है कि वैक्सीन लिया हुआ व्यक्ति वायरस का वाहक हो, वह दूसरों के लिए संक्रामक हो सकता है। इसलिए टीकाकरण के बाद भी लोगों को मास्क पहनने के साथ-साथ शारीरिक दूरी बनाए रखने जैसे एहतियात बरतने होंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी यह कहना है कि टीका संक्रमण को रोककर वायरस के प्रसार को रोक सकता है, लेकिन अभी और प्रमाण की जरूरत है। साथ ही, टीकाकरण से हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को वैक्सीन लगाने की जरूरत पड़ सकती है और इसमें समय लगेगा। 

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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