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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Saturday, April 17, 2021

ताकि शिक्षा का स्तर गिरने न लगे (हिन्दुस्तान)

हरिवंश चतुर्वेदी, डायरेक्टर, बिमटेक 


कोरोना की मार से कोई भी क्षेत्र बच नहीं पाएगा। भारत की उच्च शिक्षा इससे अभी तक उबर नहीं पाई है। अब सामने फिर संकट खड़ा हो गया है। सीबीएसई द्वारा 12वीं की परीक्षाओं को स्थगित करने और 10वीं की परीक्षाओं को निरस्त करने के फैसले के बाद भारत की उच्च शिक्षा और डिग्री कक्षाओं में दाखिले की व्यवस्था पर अनिश्चितता और संकट के बादल छाते दिखते हैं। यह फैसला इतना महत्वपूर्ण था कि प्रधानमंत्री मोदी को भी इस पर होने वाले विमर्श में शामिल होना पड़ा। सीबीएसई बोर्ड की परीक्षाओं में कुल मिलाकर, 35 लाख विद्यार्थी बैठते हैं। देश के राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों की बोर्ड परीक्षाओं में करोड़ों छात्र बैठते हैं। इन सभी माध्यमिक शिक्षा बोर्डों को अब फैसला लेना होगा कि वे परीक्षाएं लेंगे या नहीं और अगर लेंगे, तो कब लेंगे। यह फैसला लेना आसान नहीं होगा। इसे लेने में एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति है। कोरोना की खतरनाक दूसरी लहर ठीक ऐसे वक्त पर आई है, जब 12वीं पास करके करोड़ों विद्यार्थियों को अपने भविष्य का रास्ता चुनना है। देश के तमाम राज्यों के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड भी सीबीएसई के फैसले को एक मॉडल मानकर या तो 12वीं की परीक्षाएं स्थगित करेंगे या फिर स्थिति अनुकूल होने की दशा में परीक्षाएं संचालित करने की तिथि घोषित करेंगे। क्या गारंटी है कि 1 जून तक कोरोना की खतरनाक दूसरी लहर थम जाएगी और जून-जुलाई में परीक्षाएं हो पाएंगी? अभी तक हम यह नहीं सोच पाए हैं कि 16 वर्ष और उससे अधिक आयु के युवाओं को वैक्सीन देनी चाहिए या नहीं, जबकि अमेरिका एवं यूरोपीय देशों में स्कूली व विश्वविद्यालय छात्रों को वैक्सीन लगाने पर गंभीर विचार किया जा रहा है। 12वीं की परीक्षाएं जून-जुलाई में आयोजित करने पर यह खतरा सामने आएगा कि कहीं लाखों युवा विद्यार्थी परीक्षा केंद्रों पर कोविड संक्रमण के शिकार न हो जाएं। क्या हम सभी विद्यार्थियों को वैक्सीन नहीं लगा सकते?

अगले दो-तीन महीने में इंजीनिर्यंरग, मेडिकल और लॉ की अखिल भारतीय प्रतियोगी परीक्षाएं भी होनी हैं। देखते हैं, कोरोना की दूसरी लहर इनके आयोजन पर क्या असर डालती है? अगर 12वीं की परीक्षाएं आयोजित नहीं हो पाएंगी, तो पिछले दो वर्षों के आंतरिक मूल्यांकन का सहारा लेकर रिजल्ट बनाए जा सकते हैं। पिछले एक साल से सारी पढ़ाई ऑनलाइन आधार पर हुई। इस पढ़ाई में डिजिटल असमानता का गहरा असर दिखाई दिया था। 12वीं के विद्यार्थियों का बहुत बड़ा वर्ग ऐसा था, जिसके पास घर में कंप्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन नहीं थे। जो अन्य बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित थे। पिछले एक साल के आंतरिक मूल्यांकन को आधार बनाने से निम्न मध्यवर्ग और गरीब परिवारों के बच्चे निस्संदेह दाखिले की दौड़ में पीछे रह जाएंगे। बिल गेट्स का कहना है कि यह महामारी वर्ष 2022 के अंत तक हमारा पीछा नहीं छोडे़गी। कोविड इस सदी की आखिरी महामारी नहीं है। क्या हमें अपनी शिक्षा-व्यवस्था में ऐसे बदलाव नहीं करने चाहिए, जो उसे आपदाओं और महामारियों का मुकाबला करने के लिए सक्षम बना सकें? क्या हमारे स्कूलों, कॉलेजों व यूनिवर्सिटियों के शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों को आपदा-प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित नहीं किया जाना चाहिए? क्या शिक्षा परिसरों का ढांचा इस तरह नहीं बनाना चाहिए कि महामारी व प्राकृतिक आपदा की स्थिति में भी पढ़ाई-लिखाई में कोई बाधा न पैदा हो? क्या कॉलेज परिसरों में सामान्य बीमारियों से बचाव की स्वास्थ्य सेवाएं हर समय उपलब्ध नहीं होनी चाहिए? दर्जनों आईआईटी, एनआईटी व आईआईएम संस्थानों में कोविड के बढ़ते प्रकोप से तो यही जाहिर होता है कि हमारे परिसरों में आपदा प्रबंधन न के बराबर है। कोविड-19 की महामारी ने हमारी स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा की एक बड़ी कमजोरी की ओर इशारा किया है, वह है वार्षिक परीक्षाओं पर अत्यधिक निर्भरता। 21वीं सदी के शिक्षा शास्त्र के अनुसार, विद्यार्थियों के मूल्यांकन की यह प्रणाली अपनी अर्थवत्ता खो चुकी है। आधुनिक शिक्षा शास्त्रियों के अनुसार, वर्ष के अंत में खास अवधि के दौरान लाखों विद्यार्थियों की परीक्षा लेना इनके मूल्यांकन का सही तरीका नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में जिन परीक्षा सुधारों की सिफारिश की गई है, उनमें वर्ष भर चलने वाले मूल्यांकन पर जोर दिया गया है। इसमें कक्षा-कार्य, गृहकार्य, मासिक टेस्ट, प्रोजेक्ट वर्क आदि शामिल हैं। बोर्ड परीक्षाएं युवा विद्यार्थियों के मूल्यांकन का श्रेष्ठ तरीका नहीं हैं। साल भर की पढ़ाई-लिखाई का तीन घंटे की परीक्षा द्वारा किया गया मूल्यांकन कई जोखिमों से भरा है। बोर्ड की परीक्षाएं हमारे किशोर विद्यार्थियों पर मशीनी ंढंग से रट्टा लगाने, ट्यूशन पढ़ने और किसी भी तरह ज्यादा से ज्यादा माक्र्स लाने का मनोविज्ञानिक दबाव पैदा करती हैं। इसने स्कूलों की पढ़ाई की जगह एक अति-संगठित ट्यूशन उद्योग को जन्म दिया है, जो अभिभावकों पर लगातार बोझ बनता जा रहा है। विश्लेषण क्षमता, रचनात्मकता, नेतृत्वशीलता, नवाचार जैसे गुणों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। युवाओं के मानसिक व शारीरिक विकास केलिए यह घातक है। परीक्षाफल निकलने पर हर साल होने वाली आत्महत्याएं इसका प्रमाण हैं। बोर्ड परीक्षाओं के मौजूदा स्वरूप को बुनियादी ढंग से बदलने का वक्त आ गया है। हमें साल भर चलने वाले सतत मूल्यांकन को अपनाना होगा, जिसमें विद्यार्थियों की प्रतिभा और परिश्रम का बहुआयामी मूल्यांकन हो सके। भविष्य में भी आपदाओं व महामारियों के कारण शिक्षा परिसरों को बंद करना पड़ सकता है। कई कारणों से ऑनलाइन शिक्षण और परीक्षाएं करनी पड़ेंगी। हमें हर शिक्षक, विद्यार्थी को लैपटॉप, पीसी या टैबलेट से लैस करना पडे़गा। हर घर में इंटरनेट की व्यवस्था होनी चाहिए। कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में प्रवेश की मौजूदा प्रक्रिया गरीबों व धनवानों के बच्चों में भेद नहीं करती। क्या हमें साधनहीन, पिछडे़ वर्गों और क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों को प्रवेश में अलग से प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए? जेएनयू व कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में इस प्रगतिशील प्रवेश व्यवस्था के अच्छे परिणाम निकले हैं। यह दुर्भाग्य की बात है कि अभी तक अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा सभी को देना हमारे देश की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है। कोरोना की मार से जूझते हुए भी दुनिया के कई देश अपने विद्यार्थियों को डिजिटल साधन देने के साथ-साथ एक सुरक्षित शिक्षा परिसर दे पाए हैं। इन देशों में पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्थाएं फिर से सामान्य हो चुकी हैं। हमें भी उन देशों से कुछ सीखना चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Monday, April 12, 2021

महामारी की रात में कर्फ्यू के मायने (हिन्दुस्तान)

 हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार 

यह बात पिछले साल 14 अक्तूबर की है। कोरोना वायरस संक्रमण के तेज प्रसार और उसकी वजह से मरने वालों की बढ़ती संख्या को देखते हुए फ्रांस ने तय किया कि वह पेरिस और आस-पास के इलाके में रात का कर्फ्यू लगाएगा। संक्रमण रोकने का काम ढीले-ढाले लॉकडाउन के हवाले था, इसलिए लगा कि रात्रिकालीन कर्फ्यू से शायद कुछ बड़ा हासिल किया जा सकेगा। पेरिस जिस तरह का शहर है और पश्चिमी देशों में जैसी संस्कृति है, उसके चलते यह कर्फ्यू अर्थपूर्ण भी लग रहा था।

वहां लोग दिन भर अपने काम-धंधे में जुटते हैं, जबकि शाम का समय मौज-मस्ती और मनोरंजन का होता है। लोग पार्टी करते हैं, नाइट क्लब, बार, थिएटर वगैरह में जाते हैं। ऐसी जगहों पर भारी भीड़ भी जुटती है और लगातार रिपोर्टें मिल रही थीं कि थोड़ी ही देर बाद वहां न लोगों को मास्क लगाने का ख्याल रहता है और न ही सामाजिक दूरी का कोई अर्थ रह जाता है। कहा जा रहा था कि ये जगहें कभी भी कोरोना संक्रमण की ‘हॉट-स्पॉट’ बन सकती हैं, या शायद बन भी चुकी हैं। ऐसे में, रात का कर्फ्यू दिन भर लगने वाली पाबंदी से ज्यादा बेहतर था। तब तक यह समझ में आ चुका था कि दिन भर की पाबंदियां संक्रमण तो नहीं रोकतीं, अलबत्ता अर्थव्यवस्था को जरूर ध्वस्त कर देती हैं। अर्थव्यवस्था पहले ही बुरी हालत में पहुंच चुकी थी, इसलिए रात के कर्फ्यू में समझदारी दिखाई दे रही थी।

ऐसा भी नहीं है कि रात के कर्फ्यू का यह पहला प्रयोग था। ऐसे कर्फ्यू दुनिया भर में लगते रहे हैं। दूर क्यों जाएं, भारत में ही तनावपूर्ण हालात में कई जगहों पर रात का कर्फ्यू लगाया जाता रहा है। एक समय वह था, जब ऑस्ट्रेलिया में रात को होने वाले अपराधों की वजह से वहां रात्रिकालीन कर्फ्यू लगाया गया था। लेकिन यह पहली बार हुआ, जब किसी महामारी को रोकने के लिए रात के कर्फ्यू का इस्तेमाल हो रहा था। जल्द ही फ्रांस में इसमें एक नई चीज जोड़ दी गई। जब रात की मस्ती को सरकार ने छीन लिया, तो पाया गया कि शाम ढले अपने-अपने घर में बंद हो जाने वाले लोग शनिवार-रविवार की साप्ताहिक छुट्टी के दौरान समुद्र तटों पर भारी संख्या में पहुंच रहे हैं। वहां भी जब संक्रमण के नए हॉट-स्पॉट की आशंका दिखी, तो ‘वीकेंड कर्फ्यू’ लागू कर दिया गया। इस तरह के सारे कर्फ्यू की आलोचना भी हुई और संक्रमण रोकने में वह कितना कारगर है, यह भी विवाद के घेरे में रहा। यह भी कहा गया कि किसी वायरस को आप सरकारी पाबंदियों और प्रशासनिक सख्ती से नहीं रोक सकते। जब पेरिस के बाजार रात नौ बजे बंद होने लगे, तब पाया गया कि शाम सात-आठ बजे के आसपास बाजार में भीड़ अचानक बढ़ने लग जाती है। तब एक साथ महामारी के प्रसार और अर्थव्यवस्था के संकुचन से जूझ रही दुनिया को फ्रांस की इस कोशिश में उम्मीद की एक किरण दिखाई दी। एक के बाद एक कई देशों ने इसे अपनाया। रात का कर्फ्यू जल्द ही इटली, स्पेन, ब्रिटेन और जर्मनी होता हुआ अमेरिका के कई शहरों तक पहुंच गया। 

कोरोना संक्रमण में हम अभी तक यही समझ सके हैं कि इसका ग्राफ तेजी से ऊपर बढ़ता है और एक बुलंदी तक जाने के बाद उतनी ही तेजी से नीचे आने लगता है। इसलिए हम ठीक तरह से या पूरे दावे से यह नहीं कह सकते कि बाद में इस संक्रमण पर जो कथित नियंत्रण हासिल हुआ, वह वास्तव में था क्या? वह ‘ट्रेस, टेस्ट ऐंड आइसोलेट’, यानी जांच, संपर्कों की तलाश और उन्हें अलग-थलग करने की रणनीति का परिणाम था या उस सतर्कता का, जो आतंक के उस दौर में लोगों ने बरतनी शुरू कर दी थी? इसी तरह, यह स्वास्थ्य सेवाओं की सक्रियता का नतीजा था या फिर उस कर्फ्यू का, जिसका मकसद था, जरूरत से ज्यादा लोगों के एक जगह जमा होने पर रोक लगाना? इनका जवाब हम ठीक से नहीं जानते, इसलिए थोड़ा श्रेय कर्फ्यू को भी दिया ही जाना चाहिए, और दिया भी गया। ठीक यहीं हमारे सामने भारत में लागू वह 68 दिनों का लॉकडाउन भी है, जिसे दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन कहा जाता है, और वह संक्रमण का विस्तार रोकने में नाकाम रहा था। अब जब कोरोना वायरस ने भारत पर पहले से भी बड़ा हमला बोला है, तब रात का कर्फ्यू हमारे देश के दरवाजे भी खटखटा रहा है। इस नए संक्रमण से जब सरकारों की नींद खुली है, तो उन्हें भी रात के कर्फ्यू में ही एकमात्र सहारा दिखाई दे रहा है। लॉकडाउन की तरह से इसमें आर्थिक जोखिम कम हैं, इसलिए अदालतें भी इसी की सिफारिश कर रही हैं। रात के कर्फ्यू के साथ ही ‘वीकेंड लॉकडाउन’ भी भारत पहुंच गया है। निराशा के कर्तव्य की तरह एक-एक करके सारे राज्य इन्हें अपनाते जा रहे हैं। लेकिन समस्या यह है कि जिस ‘नाइट लाइफ’ को नियंत्रित करने के लिए रात के कर्फ्यू की शुरुआत हुई थी, वह जीवनशैली तो भारत में सिरे से गायब है। लोग जहां रात को भारी संख्या में जमा होते हों, ऐसे आयोजन भारत में बहुत कम होते हैं। ऐसा या तो बड़ी शादियों में होता है या फिर देवी जागरण जैसे आयोजनों में, फिलहाल इन दोनों ही तरह के बड़े आयोजन बंद हैं। इसलिए यह बहुत स्पष्ट नहीं हो रहा है कि रात के कर्फ्यू से वायरस पर निशाना कैसे सधेगा? हमारे यहां राजनीतिक रैलियों और मेलों जैसे कई आयोजन ज्यादा बड़े होते हैं, जिनमें भारी भीड़ जुटती है। यह बात अलग है कि अभी तक इनके जरिए संक्रमण फैलने की कोई बात सामने नहीं आई है, लेकिन इनके निरापद होने की भी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए संकट से निपटने के हमें अपने तरीके खोजने होंगे। पश्चिम की दवाइयां भले ही काम आ जाएं, लेकिन उसके सामाजिक तरीके शायद हमारे लिए उतने कारगर नहीं होंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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जंगल के लिए दांव पर लगा दी जिंदगी (हिन्दुस्तान)

 नंदादेवी कुंवर वन संरक्षक, नेपाल 

जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां  मुखड़ा शैलेंद्र ने राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर  के लिए लिखा था। लेकिन यह पंक्ति कितनों का जीवन दर्शन बन जाएगी, इसका अंदाज शायद न राज साहब को रहा होगा और न शैलेंद्र को। नंदादेवी कुंवर जैसों ने तो इसे सचमुच मानीखेज बना दिया। नेपाल के सुदूरपश्चिम सूबे में अछाम जिले के एक गरीब परिवार में पैदा नंदा महज 13 साल की थीं, जब उनकी शादी लक्ष्मण कुंवर से कर दी गई। उन्होंने इसका कोई विरोध नहीं किया, क्योंकि तब समाज का यही दस्तूर था। लड़कपन ने ठीक से दामन भी न छोड़ा था कि नंदा खुद मां बन गईं। चंद वर्षों के भीतर ही उनकी चार संतानें हुईं। नंदा और लक्ष्मण का अब एकमात्र लक्ष्य परिवार का भरण-पोषण था। दोनों काफी मेहनत करते, लेकिन छह सदस्यों के परिवार का गुजारा बहुत मुश्किल से हो पाता। उस पर सबसे छोटी बेटी लकवाग्रस्त पैदा हुई थी। देखते-देखते बच्चे बडे़ होने लगे। उनकी जरूरतें भी बढ़ रही थीं, मगर कमाई बढ़ने के आसार नहीं नजर आ रहे थे। पति-पत्नी ने जगह बदलने का फैसला किया और साल 1995 में वे रोजगार की तलाश में कैलाली आ गए।

कैलाली नेपाल का एक बड़ा जिला है। उम्मीद थी कि यहां जिंदगी कुछ आसान हो जाएगी। मगर यहां आए भी काफी दिन हो चले थे, हालात जस के तस बने हुए थे। पति जब भी नेपाल से बाहर निकलने की बात करते, नंदा छोटे-छोटे बच्चों का हवाला देकर उन्हें रोक लेतीं। इस तरह तीन साल और बीत गए। आखिरकार बीवी-बच्चों की बढ़ती तकलीफों से आहत होकर एक दिन लक्ष्मण कुंवर ने भारत का रुख कर लिया। पुणे में उन्हें जल्द ही चौकीदारी का काम मिल गया। वह हर महीने नंदा को कुछ पैसे भेजने लगे थे। पति के भारत आ जाने के बाद नंदा के लिए जिंदगी अधिक चुनौती भरी हो गई थी। वह कैलाली में ही मधुमालती सामुदायिक वन के करीब एक झोंपड़ी में परिवार के साथ रहने लगी थीं। वहां पहुंच उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि अब जगह नहीं बदलेंगे। यहीं पर जिएंगे। धीरे-धीरे वह सामुदायिक वन प्रबंधन समिति की सक्रिय सदस्य बन गईं। दरअसल, वन नंदादेवी जैसे लोगों की जिंदगी में हमेशा उम्मीद बनाए रखते हैं। वनाश्रित परिवार न सिर्फ इन जंगलों से मवेशियों के लिए चारा और जरूरत की लकड़ियां पाते हैं, बल्कि इनसे हासिल मौसमी फल बेचकर घर-परिवार पालते रहे हैं। इसलिए वनों के साथ इनका रिश्ता काफी प्रगाढ़ होता है।

मधुमालती सामुदायिक वन लगभग 17.5 हेक्टेयर में फैला हुआ है, लेकिन समाज के लालची तत्वों की निगाह न सिर्फ इसके अन्य संसाधनों पर, बल्कि इसकी जमीन पर भी थी। वे आहिस्ता-आहिस्ता इसके अतिक्रमण में जुटे हुए थे। नंदादेवी जब मधुमालती वन प्रबंधन समिति की अध्यक्ष बनीं, तब उन्होंने इस वन से जुडे़ कई बड़े काम किए। सबसे पहले उन्होंने खाली जगहों पर खूब सारे पौधे लगवाए। नई-नई प्रजाति के पक्षियों और जानवरों का बसेरा बनवाया। फिर उन्होंने महसूस किया कि चूंकि यह वन संरक्षित नहीं है, इसीलिए जंगली जानवर आस-पास के गांवों में घुस आते हैं। नंदादेवी ने लोहे की बाड़ लगाकर इसे संरक्षित करने का फैसला किया। वन, वनोपज और वन्य-जीवों के हक में यह काफी अहम फैसला था, मगर लकड़ी तस्करों और भू-अतिक्रमणकारियों को यह नागवार गुजरा। एक सुबह जब कुछ लोग जंगल की जमीन अपने खेत में मिलाने की कोशिश कर रहे थे, नंदा ने उनका साहसपूर्वक विरोध किया। अतिक्रमणकारियों ने धारदार हथियारों से उन पर हमला बोल दिया। नंदा के दोनों हाथ बुरी तरह जख्मी हो गए। उनकी चीख-कराह सुन पड़ोसी दौड़कर पहुंचे, तब तक नंदा बेहोश हो चुकी थीं। उन्हें फौरन काठमांडू ले जाया गया। डॉक्टरों ने काफी मशक्कत की। दोनों हाथ के ऑपरेशन हुए, मगर मेडिकल टीम एक हाथ न बचा सकी। इस हमले ने शरीर के साथ-साथ मन को भी घायल कर दिया था। खासकर नंदा के बच्चे बुरी तरह भयभीत हो गए थे। मां पर इस्तीफे के लिए उनका दबाव बढ़ता गया। अंतत: नंदा ने इस्तीफा दे दिया। लेकिन इस बीच वन के प्रति उनकी निष्ठा और उनके साथ हुए हादसे की खबर नेपाल भर में फैल गई थी। सरकार उनके साथ खड़ी हुई, बल्कि ‘ऑर्किड’ की एक दुर्लभ किस्म की खोज करने वाले वनस्पति विज्ञानियों की सिफारिश पर इसका नाम नंदादेवी कुंवर पर ‘ओडोंचिलस नंदेई’ रखा गया। मधुमालती सामुदायिक वनक्षेत्र का नाम भी ‘मधुमालती नंदादेवी सामुदायिक वन’ कर दिया गया। तब अभिभूत नंदादेवी के अल्फाज थे, ‘मेरे प्रति समुदाय के लोगों ने जो विश्वास जताया, इसी के कारण मैं मधुमालती से कभी दूर न जा सकी। मैं इस वन से हमेशा प्यार करती रहूंगी।’ कई सम्मानों से पुरस्कृत नंदा के योगदान को विश्व बैंक ने भी सराहा। आज जब उत्तराखंड में जंगल धधक रहे हैं, तब हमें नंदादेवी सरीखे लोगों की कमी शिद्दत से महसूस होती है।

प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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बदलते आर्थिक पूर्वानुमान (हिन्दुस्तान)

 ग्लोबल टाइम्स, चीन 

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 2021 के वैश्विक आर्थिक विकास संबंधी अपने पूर्वानुमान में दूसरी बार बदलाव किया है। नई रिपोर्ट के मुताबिक, विकसित अर्थव्यवस्थाएं इस साल 5.1 फीसदी की दर से बढ़ सकती हैं, जबकि पहले 4.3 फीसदी का अनुमान लगाया गया था। विकसित मुल्कों में अमेरिका की वृद्धि दर 6.4 फीसदी रह सकती है, जबकि विकासशील देशों में चीन से काफी उम्मीद लगाई गई है और 8.4 फीसदी की दर से इसके बढ़ने की संभावना जाहिर की गई है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं, खासकर अमेरिका के बारे में जो अनुमान लगाया गया है, उसकी दो मुख्य वजहें हैं। पहली, टीकाकरण की तेज गति, और दूसरी, बड़ा प्रोत्साहन पैकेज। अधिकांश विकासशील देश इन दोनों के बारे में सोच भी नहीं सकते। गौर कीजिए, अमेरिका अब तक कोविड वैक्सीन की 15 करोड़ से ज्यादा खुराक लगा चुका है, जो किसी भी देश में सबसे ज्यादा है। विडंबना है, यह राष्ट्र मानवाधिकार का अगुवा बनने का दावा करता है और इसे लेकर दूसरे मुल्कों पर प्रतिबंध लगाता है, मगर टीके का भंडार जमा करने के बावजूद उसने विकासशील देशों को इस मुश्किल वक्त में टीका देने से इनकार कर दिया।

बहरहाल, यह सुखद है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, पर यह वृद्धि नैतिक व निष्पक्ष होनी चाहिए। ऐसे विकास के कम से कम दो निहितार्थ हैं। पहला, लोगों की मौत कम से कम हो। हमें महामारी की रोकथाम संबंधी व्यवस्था में ठोस सुधार के आधार पर आर्थिक गतिविधियां तेज करनी चाहिए, न कि सिर्फ विकास को ध्यान में रखकर। सिर्फ आर्थिक विकास के मद्देनजर कोविड-19 की रोकथाम के उपायों को नजरंदाज करना अनैतिक होगा। दूसरा, समानता के सिद्धांत का ख्याल रखा जाना चाहिए। अगर सभी अमेरिकियों को टीके लग जाते हैं, जबकि कई विकासशील देशों में स्वास्थ्यकर्मी तक इससे वंचित रहते हैं, तो यह आधुनिक मानव सभ्यता का अपमान माना जाएगा। साफ है, 2021 में तमाम तरह की अनिश्चितताएं बनी रहेंगी। हमें बीमारी पर नियंत्रण व रोकथाम और आर्थिक विकास, दोनों ही मोर्चों पर अच्छे नतीजे पाने होंगे।

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Saturday, April 10, 2021

दिग्गजों से आदर्श की उम्मीद (हिन्दुस्तान)

संघमित्रा शील आचार्य, प्रोफेसर, जेएनयू 

मानव जाति के अब तक के इतिहास में शायद ही इंसानों पर इस कदर चौतरफा वार हुआ होगा, जैसा अभी कोरोना महामारी के समय हो रहा है। मसला स्वास्थ्य (शारीरिक और मानसिक, दोनों) का हो या फिर रोजगार, शिक्षा, आवागमन अथवा पारस्परिक संबंधों का, लोग परेशान हैं। वायरस, उसके प्रसार, संक्रमण-दर और मृत्यु की आशंका आदि को लेकर प्रचारित-प्रसारित होने वाली तमाम सूचनाएं तेजी से बदल रही हैं, और उतनी ही तीव्रता से नामचीन हस्तियों (राजनेता, उद्योगपति, फिल्मी कलाकार, डॉक्टर आदि) का अपनी ही ‘सलाहों’ पर खरे न उतरना भी हमें हैरत में डाल रहा है। पल-पल बदलती जानकारियों के कारण हमारे छोटे-बडे़ लक्ष्य प्रभावित हो रहे हैं। मसलन, छात्र-छात्राओं को मार्च, 2020 में जब कॉलेज कैंपस खाली करने के लिए कहा गया था, तब उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि अपने शिक्षण संस्थान से वे इतने समय तक (करीब एक साल) दूर रहेंगे। और अब तो, फिर से अलग-अलग रूप में लॉकडाउन लागू किए जा रहे हैं, जिनसे एक बार फिर अनिश्चितता का माहौल बनता जा रहा है, जबकि शिक्षण संस्थान पर्याप्त तैयारी के बिना विद्यार्थियों को ऑनलाइन शिक्षा देने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि खेल जगत, उद्योग, राजनीति, फिल्म जैसे तमाम क्षेत्रों की कमोबेश सभी हस्तियों ने कोविड-19 से बचने के लिए उचित व्यवहार अपनाने की जरूरत को बार-बार दोहराया, लेकिन उनकी ऐसी कई तस्वीरें और वीडियो भी लोगों की नजरों में आए, जिनमें ये ‘जिम्मेदार नागरिक’ खुद अपनी ही बातों पर अमल नहीं कर रहे। यही कारण है कि आम लोग, जो इन हस्तियों की प्रशंसा के गीत गाते नहीं थकते, कोरोना से बचाव की बुनियादी सावधानियों पर संदेह करने लगे हैं। सभी क्षेत्रों का हाल समान है। राजनेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे हमें ऐसा रास्ता दिखाएंगे, जिनसे हम महामारी से बच सकेंगे। यही उम्मीद फिल्मी कलाकारों, खिलाड़ियों आदि से भी की जाती है। मगर हम सबने देखा कि किस तरह से अधिकांश हस्तियां सरकारी दिशा-निर्देशों को रटती तो रहीं, लेकिन उन्होंने वैसा आचरण नहीं किया। एकाध को छोड़कर तो किसी ने यह देखने की भी जहमत नहीं उठाई कि प्रवासी श्रमिकों की भूख शांत करने या उन्हें घर तक पहुंचाने में उनकी छोटी सी मदद ही काफी कारगर हो सकती है। यह तो कुछ मीडियाकर्मी और फिल्मी कलाकार थे, जिन्होंने उन मजदूरों के दर्द को समझा। ऐसा करके संभवत: उन्होंने प्रस्तावित सुरक्षा मानदंडों की कमियों को ही उजागर किया। जैसे, बार-बार हाथ धोते रहने की बात तो नामचीनों द्वारा की जाती रही, लेकिन उन्हें शायद ही यह पता होगा कि शहरी कॉलोनियों में कितने बजे स्थानीय निकाय पानी की सप्लाई करते हैं? उन्हें नहीं मालूम होगा कि मेट्रो शहरों की करीब 20 फीसदी आबादी तभी पानी ले पाती है, जब पानी टैंकरों और नलों के आसपास ‘गाली-गलौज भरे शोर’ पर वह विजय पाती है। इसलिए यह जानने के बावजूद कि इन हस्तियों की बातें माननी चाहिए, कई लोगों के लिए उनका पालन मुश्किल था। इसी तरह, शारीरिक दूरी बरतने का आह्वान भी तब अकल्पनीय जान पड़ता है, जब हम देखते हैं कि 31 फीसदी से अधिक परिवारों के तीन-चार सदस्य एक ही कमरे में सोते हैं। ऐसी हालत में, इन हस्तियों का अनुसरण करने के बजाय जमीनी हकीकत से इनकी दूरी पर सवाल उठने लगते हैं, जो स्वाभाविक भी हैं। दिलचस्प यह भी है कि तमाम हस्तियों ने यह तो खूब साझा किया कि लॉकडाउन के दौरान उन्होंने क्या-क्या किया। जिम-योगाभ्यास करने से लेकर बर्तन मांजने, खाना पकाने, पेंटिंग करने, पढ़ने-लिखने, कहानी-गाना सुनने तक, सब कुछ बताया गया। मगर शायद ही किसी ने छात्र-छात्राओं को कोई मशविरा देना उचित समझा या फिर उन महिलाओं की बातें की, जो एक ही कमरे में झगड़ालू पति के साथ रहने को मजबूर हैं। ‘इनडोर योग’ ने अचानक से खुली जगह और ताजी हवा को हमसे दूर कर दिया, जबकि योग या सामान्य श्वसन के लिहाज से ये अनिवार्य तत्व हैं। मीडिया में काफी चर्चा में रहने वाले डॉक्टर भी प्रासंगिक सवालों के माकूल जवाब देने से बचते दिखे। जैसे, कोविड से बचाव संबंधी व्यवहार अपनाना यदि अनिवार्य है, तो फिर टीकाकरण से क्या फायदा? टीका लेते वक्त यदि कोई संक्रमित हो और उसे इसकी जानकारी न हो, तो फिर टीका उसे किस हद तक मदद करेगा? अगर टीके की दोनों खुराक के बीच में कोई बीमार पड़ता है, तो क्या होगा? टीके के प्रतिकूल प्रभाव की भी खबरें हैं, उनसे भला कैसे पार पाया जाएगा? यदि टीकाकरण ही हमें संक्रमण से बचाएगा, तो क्या ‘हर्ड इम्युनिटी’ (जब 60 से 70 फीसदी आबादी रोग प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर लेती है और महामारी का अंत मान लिया जाता है) की अवधारणा गलत है? वह भी तब, जब हर पांच में से एक इंसान के शरीर में प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो चुकी है? और फिर, प्राकृतिक चिकित्सा के बारे में डॉक्टरों, विशेषज्ञों की क्या राय है, जो हम भारतीय हमेशा से करते रहे हैं, और इसीलिए प्राकृतिक रूप से प्रतिरोधी क्षमता हमारे शरीर में होती है? जाहिर है, लोग ऐसे फैसलों की उम्मीद कर रहे हैं, जो उन्हें सुरक्षित व स्वस्थ रखें, और बीमारी को उनके घर आने से रोक सकें। उन्हें आसान शब्दों में यह समझाना जरूरी है, और इसके लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि जो लोग इस काम में लगाए गए हैं, वे भी इन सलाहों को अपने जीवन में उतारें। वरना महाकुंभ, चुनावी रैलियों और इन रैलियों के वक्तागण, लोगों को भीड़-भाड़ वाली जगहों पर भी उन्हें ‘ठीक’ महसूस कराते रहेंगे। साफ है, तमाम क्षेत्रों के नेतृत्व को पहले खुद कोरोना बचाव संबंधी व्यवहार अपनाने को बाध्य किया जाना चाहिए और फिर वे अपने सहयोगियों, अधीनस्थों और समर्थकों को ऐसा करने को कहें। समाज के सामने एक आदर्श हमें प्रस्तुत करना ही होगा।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Friday, April 9, 2021

अभी सही नहीं सबको टीका लगाना (हिन्दुस्तान)

चंद्रकांत लहारिया, जन-नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ 

आज हम में से कुछ लोग 1980 और 1990 के दशकों को याद कर सकते हैं, जब डिप्थीरिया, पोलियो, काली खांसी जैसी टीकारोधी बीमारियों के शिकार बच्चों के फोटो वाले ‘टिन-प्लेट’ से बने पोस्टर गांवों और शहरों के प्रमुख स्थानों पर चिपके होते थे। स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों के बाहर तो ये विशेष तौर पर बड़े-बड़े आकार में लगाए जाते थे। देश में दरअसल, उन दिनों नौनिहालों को इन रोगों से बचाने के लिए सार्वभौमिक टीकाकरण अभियान शुरू किया गया था। आज लगभग चार दशक बाद इनमें से अधिकांश रोग कमोबेश खत्म हो गए हैं, और साथ-साथ टिन-प्लेट के ये पोस्टर भी। यह टीके का महत्व और उसकी ताकत दर्शाते हैं। अभी भारत में कोविड-19 टीकाकरण का जो बड़ा अभियान चल रहा है, वह पिछले चार दशकों में प्रशिक्षित वैक्सीनेटर (टीका लगाने वाले) की बड़ी संख्या, कोल्ड चेन प्वॉइंट्स और टीकाकरण के अन्य बुनियादी ढांचे में हुए अहम सुधार के कारण ही संभव हो पा रहा है। महामारी के दौरान पिछले एक वर्ष में हम यह बखूबी समझ चुके हैं कि सार्स कोव-2 अन्य वायरस से बिल्कुल अलग है। कई देशों में दूसरी व तीसरी लहर के रूप में यह महामारी लौटी है, और हर बार इसका असर विनाशकारी रहा। इसीलिए पूरी दुनिया ने शिद्दत के साथ इसके टीके का इंतजार किया। इस महामारी से पहले भी भारत विभिन्न टीकों के उत्पादन में एक अग्रणी देश रहा है। यहां कई निम्न और मध्यम आय वाले देशों की तुलना में कम लागत पर उच्च गुणवत्ता के पारंपरिक टीके बनाए और मुहैया कराए जाते हैं। हमने कोविड-19 संक्रमण काल में भी दो टीकों को मंजूरी दी, जिनका अब इस्तेमाल हो रहा है। कुछ और टीके भी मंजूरी की राह पर हैं। देश के भीतर तो टीकाकरण अभियान चल ही रहा है, एक अग्रणी टीका-निर्माता देश होने के कारण हमने दुनिया भर के 80 से अधिक देशों को यह वैक्सीन उपलब्ध कराई। ऐसा करके, भारत ने दुनिया को संदेश दिया कि वैश्विक महामारी जैसी बड़ी चुनौती से एकजुट होकर ही लड़ सकते हैं।

बहरहाल, अपने यहां लोगों में झिझक की वजह से शुरुआती हफ्तों में टीकाकरण अभियान प्रभावित हुआ, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर आने के बाद और 45 साल से अधिक उम्र के लोगों को टीके दिए जाने की मंजूरी के बाद वैक्सीन की मांग बढ़ने लगी है। हालांकि, अब इस अभियान में नई चुनौतियां भी नजर आ रही हैं। मसलन, कुछ राज्यों ने टीके की सीमित स्टॉक होने की सूचना दी है और केंद्र सरकार से अधिक आपूर्ति की मांग की है। खबरें यह भी आ रही हैं कि टीके की अनुपलब्धता के कारण कुछ जगहों पर टीकाकरण रुक गया है। रिपोर्टें ये भी हैं कि भारत में हर दिन टीके की जितनी खुराक लोगों को दी जा रही है, उत्पादन उससे काफी कम हो रहा है। चंद दिनों पहले ही खबर आई थी कि कोविड-19 टीके का कुल उत्पादन, अनुमानित आपूर्ति से कम हो गया है। लिहाजा, एक अग्रणी वैक्सीन निर्माता ने अपने उत्पादन को बढ़ाने के लिए आर्थिक मदद मांगी है। इसके अलावा, कुछ राज्य और समूह देश के सभी वयस्क नागरिकों को टीका लगाने की मांग कर रहे हैं। आज जब तमाम राज्य कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहे हैं, तब टीकाकरण अभियान की निरंतरता सुनिश्चित करने के साथ-साथ महामारी के खिलाफ ठोस रणनीति बनाने की दरकार है। जब संक्रमण-दर कम थी, तब स्वाभाविक तौर पर टीकाकरण अभियान पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया। हालांकि, दूसरी लहर के बीच इसे और अधिक लक्षित करना जरूरी है। अब जबकि संक्रमण के मामले बहुत तेजी से सामने आ रहे हैं, तब सात आयामी रणनीति का पालन किया जाना चाहिए। ये आयाम हैं- जांच, एकांतवास या क्वारंटीन, मरीज के संपर्क में आए लोगों की पहचान, इलाज, बचाव संबंधी व्यवहारों (मास्क पहनना, हाथ धोना व शारीरिक दूरी बनाना) का पालन, साझीदारी व जन-भागीदारी और  कोविड-19 टीकाकरण अभियान। हमारा प्रयास न सिर्फ महामारी के बढ़ते प्रसार को थामना होना चाहिए, बल्कि हमें आगामी महीनों के लिए रणनीति भी बनानी चाहिए। इसके लिए इन सातों रणनीतियों पर मजबूती से अमल करने की जरूरत है।

अभी तमाम वयस्कों के लिए टीकाकरण शुरू करने से हमें कोई खास फायदा नहीं होगा। टीके का लाभ तभी मिलता है, जब उसकी दोनों खुराक तय समय पर ली जाए। ऐसे में, अगर किसी को आज टीके की पहली खुराक लगाई जाएगी, तो मई या जून के अंत तक वह पूरी तरह से सुरक्षित हो सकेगा। यानी, मौजूदा लहर का मुकाबला करने की यह समयानुकूल रणनीति नहीं है। इसीलिए अधिकाधिक लोगों को टीके लगाना और टीके को लेकर लोगों की हिचक को दूर करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। देश के सभी वयस्कों के लिए टीकाकरण शुरू कर देने से कुछ और स्वास्थ्यकर्मियों को इस काम में लगाना होगा, जिससे कोविड और गैर-कोविड अनिवार्य स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतरता प्रभावित हो सकती है। फिर भी, इस महामारी की गंभीरता को देखते हुए चुनिंदा इलाकों या जिलों में अतिरिक्त जनसंख्या समूहों के टीकाकरण संबंधी विचार को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जाना चाहिए। जाहिर है, टीकाकरण अभियान में जो चुनौतियां उभर रही हैं, उन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। कोविड-19 रोधी टीके की आपूर्ति को सुनिश्चित किया जाना बहुत जरूरी है। टीकाकरण अभियान गति पकड़ चुका है और जिन्होंने पहली खुराक ले ली है, वे बड़ी संख्या में दूसरी खुराक लेने के लिए टीका-केंद्रों पर आने लगेंगे। इससे टीके की मांग तेजी से बढ़ जाएगी। आपूर्ति और मांग के मौजूदा अंतर को पहले के उत्पादन से कुछ समय के लिए ही पाटा जा सकता है, लिहाजा टीका आपूर्ति की व्यवस्था को कहीं अधिक टिकाऊ बनाने की दरकार है। यह वक्त पिछले एक साल की चुनौतियों से सीखने का भी है। जन-भागीदारी बढ़ाने के लिए व्यवहारमूलक और समाज विज्ञान संबंधी रणनीति का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। 1980 के दशक की तरह आज टिन-प्लेट के पोस्टर तो नहीं दिख रहे, पर पिछले चार दशकों में टीकाकरण का जो ढांचा हमने खड़ा किया है, उसका फायदा हमें आज मिल रहा है। 2021 में हमें कोरोना आपदा को भारत की स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने के अवसर के रूप में बदलना होगा। इसी से आने वाली पीढ़ियों को कहीं बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं दी जा सकेंगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Thursday, April 8, 2021

आयोग की साख पर गलत सवाल (हिन्दुस्तान)

ओ पी रावत, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त

मौजूदा विधानसभा चुनावों में इक्का-दुक्का ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनको लेकर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों के तर्क कितने वाजिब हैं, उन पर बात करने से पहले उन दो प्रसंगों का जिक्र, जब मैं मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में अपनी सेवा दे रहा था। पहली घटना 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव की है। मेरी नियुक्ति ही हुई थी। मुझे बहुत ज्यादा इल्म नहीं था, फिर भी हमने खूब कड़ाई बरती। मतदान स्थलों पर पर्याप्त सुरक्षा बल लगाए गए। नतीजतन, नक्सल इलाकों तक में कोई हिंसा नहीं हुई। एक मतदान-केंद्र पर एक उम्मीदवार ने हंगामा मचाने की कोशिश की भी, तो उसको तत्काल हिरासत में ले लिया गया। बावजूद इसके, उस चुनाव में हमने अपने 17 कर्मियों को खो दिया। वे किसी गोलीबारी के शिकार नहीं हुए थे, बल्कि निष्पक्ष चुनाव कराने का तनाव उनकी जान ले बैठा था। 

दूसरा प्रसंग अगस्त, 2017 का है। गुजरात की तीन सीटों के लिए राज्यसभा चुनाव हो रहे थे। कांग्रेस की तरफ से अहमद पटेल मैदान में थे। तब विधानसभा में कांग्रेस के 57 विधायक हुआ करते थे, लेकिन उनमें से 12 विधायक टूटकर सत्ताधारी दल में चले गए थे। चूंकि एक सीट जीतने के लिए 44 वोटों की जरूरत थी, लिहाजा बाकी बचे 45 विधायकों को लेकर अहमद पटेल बेंगलुरु चले गए, और मतदान के एक दिन पूर्व उन सबको लेकर लौटे। फिर भी, वोट डालते-डालते दो और विधायकों ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। इस तरह, कांग्रेस के पास 43 विधायक ही बच गए थे। मगर जब मतदान हो रहे थे, तब बाद में टूटे कांगे्रसी विधायकों ने अपना मतपत्र नियमत: अपने दल के अधिकृत प्रतिनिधि को दिखाने के साथ-साथ अनधिकृत व्यक्तियों को भी दिखा दिया, जिससे उसकी गोपनीयता भंग हो गई। अहमद पटेल ने बहुत सही शब्दों में शिकायत की। उनका कहना था, मुझे चुनाव आयोग पर पूरा भरोसा है। कृपया, मतदान का वीडियो देखिए, और अगर आपको लगता है कि मतपत्र की गोपनीयता भंग नहीं हुई है, तो आप बेझिझक मेरी शिकायत खारिज कर दीजिए। इसके बाद मतगणना रोक दी गई। भाजपा की तरफ से अरुण जेटली के नेतृत्व में आठ कैबिनेट मंत्री, जबकि पी चिदंबरम के नेतृत्व में आठ वरिष्ठ कांग्रेस नेता हमारे पास आए। आयोग ने दोनों पक्षों को अपना-अपना तर्क रखने के लिए एक-एक घंटा का वक्त दिया। दोनों पक्षों को दोबारा समय भी दिया गया। मगर तीसरी बार उनकी मांग खारिज कर दी गई, क्योंकि मतगणना रुकने की वजह से हंगामे के आसार बन रहे थे। चुनाव आयोग ने दो-दो बार धैर्यपूर्वक उनकी बातों को सुना और फिर मतदान की वीडियो रिकॉर्डिंग मंगवाई। रिकॉर्डिंग अहमद पटेल के दावों की पुष्टि कर रही थी। लिहाजा फैसला कांग्रेस के हक में गया। मगर इस दरम्यान मीडिया में यही बहस चल रही थी कि मौजूदा दोनों चुनाव आयुक्त भाजपा सरकार के कार्यकाल में नियुक्त किए गए हैं, इसलिए भाजपा उम्मीदवार ही चुनाव जीतेगा। इन प्रसंगों की रोशनी में जब हम मौजूदा मामलों को देखते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि चुनाव आयोग अथवा मतदानकर्मी किस जवाबदेही से अपने दायित्व का निर्वहन करते हैं। यह सही है कि असम में पीठासीन अधिकारी ने भाजपा नेता की गाड़ी में लिफ्ट लेने के पीछे जो तर्क दिए हैं, उसमें संदेह की गुंजाइश है, लेकिन इसे महज एक घटना मानकर आगे बढ़ना चाहिए। यह उनका बचाव नहीं है, बल्कि इस तरह की छोटी-मोटी गड़बड़ियां इसलिए सामने आती हैं, क्योंकि हर इंसान में तनाव झेलने की अलग-अलग क्षमता होती है। पीठासीन अधिकारी प्राय: या तो शिक्षक होते हैं अथवा क्लास-सी अफसर, जबकि चुनाव के दबाव में बडे़ से बड़ा आदमी भी टूट जाता है। इसी तरह, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नेता के घर से जो ईवीएम या वीवीपैट की बरामदगी हुई है, वे बतौर रिजर्व रखे गए थे। 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी सागर के एक पुलिस थाने में 48 ईवीएम मिले थे। ये मामले दरअसल इसी का परिणाम हैं कि चुनाव ड्यूटी में लगे हरेक व्यक्ति का चरित्र अलग-अलग होता है। सभी समान शिद्दत से अपना दायित्व नहीं निभाते, जबकि चुनाव आयोग सभी को एक सांचे में ढालकर निष्पक्ष चुनाव कराने की कोशिश करता है। यही वजह है कि ताजा घटनाओं के सामने आने के बाद आयोग ने तुरंत कार्रवाई की। हालांकि, वह और सख्त रुख अपना सकता था, क्योंकि मतदानकर्मियों में यह संदेश जरूर जाना चाहिए कि प्रोटोकॉल का उल्लंघन दंडनीय अपराध है। फिर भी, इसमें चुनाव आयोग की नीयत पर शक की गुंजाइश नहीं है।

इन्हीं कारणों से भारतीय चुनाव आयोग और उसके द्वारा संचालित मतदान की विश्व भर में साख है। भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां अब 90 करोड़ से अधिक मतदाता हैं। अमेरिका और यूरोप के सभी वोटरों को भी जोड़ दें, तो वे भारतीय संख्या के आगे उन्नीस साबित होंगे। इतनी बड़ी संख्या के साथ शांतिपूर्ण चुनाव कराना और सभी सियासी दलों द्वारा जनादेश को स्वीकार करना चुनाव आयोग पर उनके भरोसे का संकेत है। अमेरिका जैसे विकसित देश तक में सत्ता के हस्तांतरण में हिंसा हो गई। कई मुल्कों में तो गृह युद्ध की नौबत आ जाती है। मगर अपने यहां चुनाव में भले ही धींगामुश्ती चलती हो, एक-दूसरे पर आरोप उछाले जाते हैं, लेकिन जब नतीजा आता है, तो बिना ना-नुकुर के उसे मान लिया जाता है। यह बात हर किसी को समझनी चाहिए कि अपने यहां चुनाव आयोग एक तरह से ‘पंचिंग बैग’ है। सभी इसे अपनी ओर खींचना चाहते हैं। चुनाव के समय यह प्रयास बहुत ज्यादा होता है। फिर भी, चुनाव आयोग सभी को धैर्यपूर्वक सुनकर फैसला सुनाता है। सबका ध्यान रखना उसकी मजबूरी भी है, क्योंकि उसका हर फैसला सुप्रीम कोर्ट तक जाता है। अगर उसने अपने फैसले में एक भी कमजोर कड़ी रखी, तो अदालत में उसकी लानत-मलामत होगी। इसीलिए सभी तर्कों का आकलन करके ही चुनाव आयोग कानून सम्मत फैसला लेता है। इस हिसाब से ताजा मामलों से आयोग की साख पर सवाल उठाना गलत है। हां, आदर्श स्थिति तो यही होगी कि एक भी ऐसी घटना न घटे। मगर यह तब होगा, जब हमारे नीति-नियंता मानव संसाधन के विकास पर इतना ध्यान देंगे कि हर व्यक्ति शारीरिक व मानसिक तौर पर स्वस्थ और शिक्षित हो। इस दिशा में काम हो रहा है, लेकिन अभी इसमें वक्त लगेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Wednesday, April 7, 2021

ढिलाई पर कड़ाई से लगे लगाम (हिन्दुस्तान)

जुगल किशोर, वरिष्ठ जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञ

अपने यहां कोरोना के नए मामले डराते हुए दिख रहे हैं। ब्राजील (रोजाना के 66,176 मामले औसतन) और अमेरिका (रोजाना के 65,624 मामले औसतन) को पीछे छोड़ते हुए भारत कोविड-19 का नया ‘हॉट स्पॉट’ बन गया है। देश में पहली बार संक्रमण के एक लाख से अधिक नए मामले बीते रविवार को सामने आए। यह शोचनीय स्थिति तो है, लेकिन फिलहाल बहुत घबराने की बात नहीं है। सोमवार को ही इसमें हल्की सी गिरावट आई है और उस दिन करीब 97 हजार नए कोरोना मरीजों की पहचान की गई। आखिर हमें घबराने की जरूरत क्यों नहीं है? असल में, मरीजों की यह संख्या इसलिए बढ़ी है, क्योंकि अब ‘जांच’ ज्यादा होने लगी है। जब जांच की रफ्तार बढ़ती है, तो नए मामलों की संख्या स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। अभी अपने यहां रोजाना 11 लाख से अधिक टेस्ट किए जा रहे हैं। यह पिछले साल की जून, जुलाई या अगस्त तक की स्थिति से भी बढ़िया है। नवंबर में ही जब दिल्ली में सीरो सर्वे किया गया था, तब करीब 50 फीसदी लोग संक्रमित पाए गए थे। कुछ जगहों पर तो इससे भी ज्यादा संक्रमण था। अगर इस आंकडे़ को संख्या में बदल दें, तो उस समय राजधानी दिल्ली में संक्रमितों की संख्या एक करोड़ से भी ज्यादा थी, जबकि आरटी-पीसीआर अथवा रैपिड एंटीजेन टेस्ट दो से तीन लाख लोगों को ही बीमार बता रहा था।

अभी संक्रमण का इसलिए प्रसार हो रहा है, क्योंकि फरवरी से लोगों का आवागमन बहुत बढ़ गया है। उस समय नए मामले कम आने लगे थे, टेस्ट भी कम हो रहे थे, वैक्सीन आने की वजह से लोग उत्सुक भी थे और उन्होंने ढिलाई बरतनी शुरू कर दी थी। अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर्मियों को भी वापस अपने विभागों में भेज दिया गया था। इन सबसे वायरस को नियंत्रित करने के प्रयासों में शिथिलता आ गई और फिर कोरोना वायरस का ‘म्यूटेशन’ भी हुआ। चूंकि, पिछले साल मामले दबे-छिपे थे, इसलिए आहिस्ता-आहिस्ता संक्रमण फैलता दिखा। मगर इस बार लोगों का आपसी संपर्क बहुत तेजी से बढ़ा। वे बेखौफ हुए और बाजार में भीड़ बढ़ाने लगे। नतीजतन, संक्रमण में रफ्तार आ गई।

यह अनुमान है कि 15-20 अप्रैल के आसपास इस दूसरी लहर का संक्रमण अपने शीर्ष पर हो सकता है। जिस तेजी से नए मामले सामने आ रहे हैं, उससे यह आकलन गलत भी नहीं लग रहा। मगर, संक्रमण की वास्तविक स्थिति इन अनुमानों से नहीं समझी जा सकती। अगर हमने बचाव के उपायों और ‘कंटेनमेंट’ प्रयासों पर पर्याप्त ध्यान दिया, तो मुमकिन है कि संक्रमण का प्रसार धीमा हो जाए। यह समझना होगा कि जब तक सौ फीसदी टीकाकरण नहीं हो जाता अथवा सभी लोग संक्रमित होकर रोग प्रतिरोधक क्षमता हासिल नहीं कर लेते, तब तक संक्रमण की रफ्तार कम-ज्यादा होती रहेगी। अभी हर संक्रमित व्यक्ति तीन से चार व्यक्तियों को बीमार कर रहा है। हमारा यह ‘रिप्रोडक्शन नंबर’ जब तक एक से कम नहीं होगा, संक्रमण में ऊंच-नीच बनी रहेगी। एक अच्छी स्थिति यह है कि मृत्य-दर में वृद्धि नहीं हुई है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमारा स्वास्थ्य-ढांचा पहले से बेहतर हुआ है। हम वैज्ञानिक तरीकों से कोरोना मरीजों का इलाज करने लगे हैं। टेस्ट के बजाय यदि संक्रमण की वास्तविक संख्या को आधार बनाएं, तो मृत्यु-दर एक फीसदी से भी कम होगी। देशव्यापी सीरो सर्वे भी यही बताएगा कि 60 फीसदी से अधिक आबादी में प्रतिरोधक क्षमता बन गई है, जो ‘हर्ड इम्युनिटी’ वाली स्थिति है। अब जो संक्रमण हो रहा है, वह अमूमन उन लोगों को हो रहा है, जो अब तक इस वायरस से बचे हुए थे। इसलिए ऐसे लोग जल्द से जल्द टीके लगवा लें अथवा अपनी गतिविधियों को काफी कम कर दें। इससे वे संक्रमित होंगे जरूर, पर आहिस्ता-आहिस्ता, जिससे उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं होगी। असल में, वायरस की मात्रा के हिसाब से मरीज हल्का या गंभीर बीमार होता है। हर शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता अलग-अलग होती है। यदि वायरस काफी अधिक मात्रा में शरीर में दाखिल हो जाए, तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता नाकाम हो सकती है। दोबारा संक्रमित होने अथवा टीका लगने के बाद भी बीमार होने की वजह यही है। टीका द्वारा वायरस की खुराक हमारे शरीर में पहुंचाई जाती है। जब उस सीमा से अधिक वायरस शरीर में आ जाता है, तब हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता जवाब दे जाती है। इसीलिए टीका लेने के बाद भी बचाव के तमाम उपाय अपनाने की सलाह दी जा रही है। इसी तरह, पूर्व में गंभीर रूप से बीमार मरीजों में रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है, जबकि हल्का संक्रमित व्यक्ति के दोबारा बीमार पड़ने का अंदेशा होता है। अपने देश में वैसे भी 90 फीसदी से अधिक मामले मामूली रूप से संक्रमित मरीजों के हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता तीन से छह महीने के बाद खत्म होने लगती है। मगर एक सच यह भी है कि टीका लेने के बाद यदि कोई बीमार होता है, तो उसकी स्थिति गंभीर नहीं होगी। अभी देश के कुछ राज्यों में जिस तरह से संक्रमण बढ़ा है, वह काफी हद तक लोगों की गैर-जिम्मेदारी का ही नतीजा है। अगर सभी मरीज अस्पताल पहुंच जाएंगे, तो डॉक्टरों पर दबाव बढे़गा ही। इसीलिए मामूली मरीजों को घर पर और हल्के गंभीर मरीजों को ऐसे किसी केंद्र पर इलाज देने की वकालत की जा रही है, जहां ऑक्सीजन की सुविधा उपलब्ध हो। गंभीर मरीजों को ही अस्पताल में भर्ती किया जाना चाहिए। इससे मरीजों को बढ़ती संख्या संभाली जा सकती है। मगर ऐसा नहीं हो रहा है, और फिर से लॉकडाउन लगाने की मांग की जाने लगी है। देखा जाए, तो अभी लॉकडाउन की जरूरत नहीं है। पहली बार यह रणनीति इसलिए अपनाई गई थी, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जा सके। हम इसमें सफल रहे, और आज हमारे पास पयाप्त संसाधन हैं। जनता की गतिविधियों को रोकने का एक तरीका लॉकडाउन जरूर है, लेकिन इससे लोगों को कई अन्य तकलीफों का ही सामना करना पड़ता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Tuesday, April 6, 2021

कानून के लंबे, लेकिन झूलते हाथ ( हिन्दुस्तान)

विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी

कहावत है कि कानून के हाथ बड़े लंबे होते हैं और अपराधी लाख कोशिश करे, उससे बच नहीं सकता। पर इस बार सच सिद्ध होते-होते भी इसने कुछ ऐसे भयावह यथार्थ से हमारा सामना कराया है कि हममें से बहुत समझ ही नहीं पाए कि हम इन अपराधियों के जरिए अपने ही समाज का चेहरा देख रहे हैं। सिर्फ दो राज्यों, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की ये दो आपराधिक गाथाएं यद्यपि एक-दूसरे से जुड़ी नहीं हैं, लेकिन दोनों समान रूप से इशारा कर रही हैं कि अपराधी के बदले प्रोफाइल ने उसे किस कदर सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान बना दिया है!

हममें से बहुत से लोगों को यह पढ़कर अविश्वसनीय लगा होगा कि सचिन वाजे नाम के एक अपराधी पुलिस इंस्पेक्टर को उसके राजनीतिक आका ने मुंबई के सिर्फ एक क्षेत्र- बार और नाइट क्लबों से प्रतिमाह 100 करोड़ रुपये इकट्ठा करने का दायित्व सौंप रखा था। इनसे कम कमाऊ  नहीं हैं भवन-निर्माण, तस्करी या फिल्म निर्माण जैसे क्षेत्र। इन सबको जोड़ लें, तो सिर चकरा सकता है, पर अब इसे सच मानना होगा। इसी तरह, उत्तर प्रदेश के मुख्तार अंसारी की बार-बार लिखी-सुनी कहानी का सद्य:रचित अध्याय एक ऐसा प्रोफाइल निर्मित करता है, जिस तक पहुंचते-पहुंचते कानून के लंबे हाथ भी कई बार असहाय से झूलने लगते हैं। मुख्तार की कहानी किसी मुंबइया फिल्म की तरह रोचक है। एक बेहद चालाक और क्रूर अपराधी कैसे राजनीति, तंत्र और अर्थशास्त्र का चतुर इस्तेमाल कर इतना ताकतवर हो जाता है कि पुलिस, जेलें और अदालतें भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पातीं। इसे समझने के लिए मुख्तार की जीवन यात्रा को पढ़ना होगा। मुख्तार ने चुनावी गणित की खामियों का भरपूर फायदा उठाया है। जाति, धर्म, पैसा और बाहुबल इत्यादि सारे समीकरण उसके पक्ष में थे। उत्तर प्रदेश की दो महत्वपूर्ण पार्टियों ने अलग-अलग समय पर उसका इस्तेमाल किया या यूं कहें कि वह इनका उपयोग ऊपर चढ़ने की सीढ़ी की तरह करता रहा। पिछले कई दशकों में अलग-अलग चुनाव चिन्हों पर वह माननीय बनने में कामयाब हुआ। चालाकी और क्रूरता उसकी सफलता के मुख्य औजार थे। चालाकी का हाल यह था कि बार-बार धोखा खाने के बाद भी एक निश्चित कालखंड में भिन्न दलों के नेता उसे अपना सबसे नजदीकी मानते रहे। क्रूरता का एक ही उदाहरण उसके व्यक्तित्व को समझने में मददगार सिद्ध होगा। कहा जाता है, वर्ष 1996 में विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी रुंगटा का इसने अपहरण कराया, उनकी हत्या कर शव इलाहाबाद में गंगा में फिंकवाकर बिना किसी भावनात्मक उद्वेग के उनके परिजनों को विश्वास में लेकर अपहृत की तलाश का नाटक करता रहा। इस बीच परिवार से फिरौती के रूप में कई करोड़ रुपये भी झटक लिए गए। उसे पता था कि अपराध की दुनिया में सफलता के लिए चालाकी और क्रूरता जरूरी सोपान हैं। इस पूरी गाथा में पुलिस उपाधीक्षक शैलेंद्र प्रताप सिंह के प्रसंग इसे किसी ग्रीक दुखांतिका में तब्दील कर देते हैं। कहानी में यह मोड़ आता है 2003- 04 में, जब वर्दी के जोश में आदर्शवाद से लबरेज एक पुलिस अधिकारी अपराध से सीधे भिड़ने का साहस करता है और नतीजतन, उसे इस्तीफा देना पड़ता है। मुख्तार का तो कुछ नहीं बिगड़ता, उल्टा उसी के खिलाफ मुकदमे कायम होते रहते हैं। एक मुकदमे से अभी हाल में वह बरी हो सका है। तब के मुख्यमंत्री ने फौज से एक लाइट मशीन गन की चोरी और संभावित अपराध में इसके इस्तेमाल की योजना को नजरंदाज करके उसके खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी और नतीजा हमारे सामने है। एक माफिया कानून से ऊपर जाकर फलता-फूलता रहा और दूसरा कर्तव्य परायण पुलिस अधिकारी कहानी में अपना अंश सुनाते-सुनाते मीडिया के सामने रोने लगता है। सचिन वाजे और शैलेंद्र प्रताप सिंह के रास्ते अलग थे, लेकिन इनकी कहानी एक जैसी ही है। दोनों ही अपराध के जरिए अकूत धन और ताकत हासिल करने की दिलचस्प दुनिया हमारे सामने उद्घाटित करते हैं। फर्क इतना है कि एक का नायक इस तिलिस्म को तोड़ने का प्रयास करता है और दूसरा खुद इसका सक्रिय अंग बन जाता है। शैलेंद्र प्रताप सिंह की जलालत देखकर किसी भी पुलिस अधिकारी को सचिन वाजे बनना ज्यादा आकर्षक लग सकता है।

मुख्तार और वाजे, दोनों को राज्य सरकारों ने बचाने की आखिर तक कोशिश की। मुख्तार को सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के चलते पंजाब से उत्तर प्रदेश भेजना मुमकिन हुआ और वाजे केंद्र व राज्य की संस्थाओं के क्षेत्राधिकार की अस्पष्टता के चक्कर में फंसकर जेल गया। अपराध को लेकर यह ज्यादा चिंताजनक पहलू है। राज्य यदि इतनी बेशर्मी से अपराधियों के पक्ष में खड़ा दिखेगा, तो हम अनुमान ही लगा सकते हैं कि उनकी बेशुमार ताकत में कितना कुछ और जुड़ जाएगा। अभी ही उनके बाहुबल, धनबल और राजनीतिक आकाओं के चलते अक्सर कानून के हाथ उनके सामने छोटे लगने लगते हैं, अगर राज्य भी खुलकर उनके साथ दिखने लगे, तब तो मुहावरे का यह हाथ हमेशा लुंज-पुंज झूलता ही नजर आएगा। अपराध की दुनिया का यह भयावह यथार्थ है कि राज्य की सारी संस्थाएं अपराधियों के सामने बौनी पड़ती जा रही हैं। वाजे अगर महीने भर में एक ही महानगर के एक सेक्टर से 100 करोड़ रुपये वसूल सकता है, तो अंदाज लगाया जा सकता है कि इस रास्ते से कितना धन कमाया जा सकता है। इसी तरह, मुख्तार के बाहुबल के आगे कौन गवाह अदालत में टिकेगा, यह समझना भी मुश्किल नहीं है। अपराधी किसी को भी खरीद सकते हैं, किसी को भी भयाक्रांत करके उसे समर्पण को मजबूर कर सकते हैं और अक्सर देश की पुलिस, अदालतें और जेल इनके सामने असहाय लगने लगती हैं। यही कारण है कि पुलिस द्वारा अपराधियों को खुद ही गैर-कानूनी तरीकों से दंडित किए जाने को  सामाजिक स्वीकृति मिल गई है। कोई इस पर गौर नहीं करना चाहता कि कथित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट सिस्टम से ही वाजे जैसा लुटेरा पैदा होता है। मुख्तार के समर्थकों के मन में भी खौफ है कि उसे उत्तर प्रदेश में झूठी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। अगर ऐसा हुआ, तो कोई अच्छा संदेश नहीं जाएगा। कानून के लंबे और निष्पक्ष हाथों की गवाही तो ऐसी कार्रवाई देगी, जो विधि-सम्मत हो और जिसमें एक सक्षम अदालत आरोपी को सफाई का पूरा मौका देकर उसे उसके किए की सजा दे। यह राज्य के लिए भी परीक्षा जैसा होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Monday, April 5, 2021

हम छोटी बचत से हाथ न धोएं (हिन्दुस्तान)

 आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार 


वित्त मंत्रालय से आया अप्रैल फूल का झटका तो वापस हो गया, लेकिन यह सवाल हवा में तैर रहा है कि एनएससी, पीपीएफ और अन्य छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर आगे भी बरकरार रहेगी या मौजूदा विधानसभा चुनावों के खत्म होने के बाद यानी अगली तिमाही में कटौती होगी? कहा गया है कि वित्त मंत्रालय से ब्याज दर कम करने का जो आदेश जारी हुआ, वह भूल से जारी हो गया था। यह बताने के लिए वित्त मंत्री ने अंग्रेजी में एक शब्द इस्तेमाल किया, ‘ओवरसाइट’। शब्दकोश में इसके कई अर्थ हैं। पहला और प्रचलित अर्थ तो है, निगरानी या नजर रखना। पूर्व केंद्रीय सचिव अनिल स्वरूप ने अपने ट्वीट में चुटकी भी ली कि अगर ‘ओवरसाइट’ इस्तेमाल की जा रही होती, तो शायद यह ‘ओवरसाइट’ न होती। मतलब यह है कि अगर कामकाज पर किसी की नजर होती, तो ऐसी चूक नहीं होती। शब्दकोश में ओवरसाइट का दूसरा अर्थ चूक ही है। जाहिर है, वित्त मंत्री यही कहना चाहती हैं कि ब्याज दरों में कटौती का आदेश गलती से जारी हो गया। लेकिन अर्थव्यवस्था और राजनीति पर बारीक नजर रखने वालों की राय है कि आदेश वापस भले ही हो गया, लेकिन उसका जारी होना कोई चूक नहीं, बल्कि वक्त की जरूरत थी। कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का तो यहां तक कहना है कि दरों में कटौती वापस लेने का फैसला ही सरकार की गलती है।

लेकिन उस किस्से पर चलने से पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर यह आदेश वापस हुआ क्यों? यहां एक महत्वपूर्ण आंकड़ा देखना पड़ेगा। देश भर में किस-किस राज्य के लोग छोटी बचत योजनाओं में कितना पैसा जमा करते हैं? इसके एकदम ताजा आंकड़े तो अभी सामने नहीं हैं, पर नेशनल सेविंग्स इंस्टीट्यूट ने 2017-18 तक के आंकड़े जारी किए हैं। इनके मुताबिक, इन स्कीमों में सबसे ज्यादा पैसा बंगाल से जमा होता है, पूरे देश के मुकाबले उसकी हिस्सेदारी 15 फीसदी से ऊपर है। और, जिन चार राज्यों व एक केंद्र शासित क्षेत्र में अभी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, वे सब मिलकर इन स्कीमों में करीब एक चौथाई पैसा देते हैं। जाहिर है, पैसा जमा करने वाले ये सारे परिवार ब्याज में कटौती से नाराज हो सकते थे। कोई भी सरकार ऐन चुनाव के दिन अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला ऐसा फैसला जानते-बूझते तो करेगी नहीं। 

मगर वित्तीय व्यवस्था पर नजर रखने वालों का तर्क है कि पूरी दुनिया में ब्याज दरें घट रही हैं। कर्ज भी सस्ता हो रहा है और बैंकों की जमा-राशि पर भी ब्याज दरें काफी गिर चुकी हैं। अमेरिका में शून्य फीसदी, तो जर्मनी में ब्याज लेने के बजाय उल्टे ब्याज देने की व्यवस्था, यानी ‘निगेटिव इंटरेस्ट रेट’ हो गई है। भारत सरकार भी बॉन्ड जारी करके जो कर्ज ले रही है, उस पर ब्याज दर काफी गिर चुकी है। ऐसे में, छोटी बचत योजनाओं का ब्याज कम नहीं किया गया, तो इसके दो खतरे हैं। एक तो यह कि लोग बैंकों से पैसा निकालकर इस तरफ खिसकाना शुरू कर सकते हैं, जो बैंकों के लिए घातक हो सकता है। अगर उन्हें डिपॉजिट कम मिलेंगे, तो फिर वे लोन कैसे देंगे? चारों ओर गिरती ब्याज दरों के बीच देश की सबसे बड़ी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी एचडीएफसी ने अपने फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दर चौथाई फीसदी बढ़ाने का एलान कर दिया। इसका साफ मतलब है कि या तो कंपनी के पास डिपॉजिट कम हो रहे हैं या फिर उसके पास कर्ज की मांग बढ़ने लगी है, जिसे पूरा करने के लिए उसे और रकम चाहिए। सरकार का खजाना और हिसाब-किताब देखने वाले अधिकारियों की दूसरी बड़ी फिक्र यह है कि अगर छोटी बचत योजनाओं का ब्याज कम नहीं किया गया, तो इससे सरकारी खजाने पर ही बोझ बढ़ेगा, क्योंकि इस ब्याज का भुगतान तो सरकार को ही करना होता है। अभी सरकार के खजाने पर दबाव जारी है और कोरोना के ताजा हमले की वजह से आर्थिक स्थिति में सुधार पर फिर ब्रेक लगने का डर बढ़ रहा है। इस हालत में कहीं से भी खर्च बढ़ाने वाला कोई भी काम करना समझदारी नहीं माना जाएगा। लिहाजा यह मानने का कोई कारण नहीं है कि वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने यह सब सोच-समझकर ही छोटी बचत पर ब्याज घटाने का फैसला किया था, और इसीलिए यह आशंका बनी हुई है कि जैसे ही राजनीति का दबाव घटेगा, आर्थिक तर्कशास्त्र हावी होगा और यह फैसला वापस आ जाएगा। 

आर्थिक उदारीकरण और नवीन अर्थशास्त्र के पैरोकार भी कहते रहे हैं कि आम जनता का पैसा सीधे या म्यूचुअल फंड स्कीमों के जरिए शेयर बाजार में जाएगा, तभी अर्थव्यवस्था पूरी रफ्तार पकड़ेगी। मोटे तौर पर ये विशेषज्ञ छोटी बचत योजनाओं में बड़ी रकम जमा होने को अच्छा नहीं मानते। लेकिन सरकार को और इस तर्क के समर्थकों को कुछ सवालों के जवाब भी देने चाहिए। लघु बचत की ज्यादातर योजनाओं में जमा होने वाला पैसा कम से कम एक साल और ज्यादा से ज्यादा 15 साल के लिए लॉक रहता है। यानी, सरकार लंबी जरूरतों के लिए इस पैसे का इस्तेमाल कर सकती है। वह इसे सही जगह लगाकर इस पर बेहतर रिटर्न भी दिला सकती है। आखिर 1986 से 2000 तक पीपीएफ पर 12 फीसदी का सालाना ब्याज मिलता रहा। हालांकि, उसके बाद से ही इसमें गिरावट का सिलसिला चल रहा है। सिर्फ पिछली सरकार के दौरान दो बार इसमें हल्की बढ़त हुई। बहरहाल, इन योजनाओं की शुरुआत इसलिए की गई थी, ताकि आम जनता में बचत की आदत डाली जा सके, उनका पैसा सुरक्षित हाथों में रहे और सरकार को विकास योजनाओं के लिए पैसे मिल सकें। योजनाओं की सफलता का सुबूत है कि देश भर में घरेलू बचत का 80 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सा इन्हीं योजनाओं में जाता है। 2008 के आर्थिक संकट के वक्त भारत दुनिया के सामने मजबूती से खड़ा रहा, उसका बहुत बड़ा श्रेय लघु बचत योजनाओं को जाता है। ब्याज दर घटाने के पीछे तमाम तर्क हो सकते हैं, लेकिन आम आदमी के पैसे की सुरक्षा का क्या इंतजाम हो रहा है, इसका भी जवाब सरकार की तरफ से आना चाहिए। खासकर यह देखते हुए कि आने वाले वक्त में नौकरियों पर खतरे की तलवार लटकी ही रहने वाली है। ऐसे में, लोगों में बचत की आदत को बढ़ावा देना सरकार के लिए भी फायदेमंद होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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चुनावी जीत के कई गुणा-भाग (हिन्दुस्तान)

ज्योतिप्रसाद चटर्जी, पश्चिम बंगाल विशेषज्ञ, सीएसडीएस


पश्चिम बंगाल में अब तक दो चरणों में 60 सीटों पर विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। मतदाताओं के रुख अभी ठीक-ठीक नहीं आंके जा सकते, लेकिन पहले चरण में 27 मार्च को मुख्यत: जंगलमहल क्षेत्र में चुनाव हुए थे, जो पहले कभी उग्र वामपंथ के गढ़ माने जाते थे। मगर 2019 के लोकसभा चुनाव में यहां भगवा झंडा लहराया था, जिस कारण यहां की ज्यादातर सीटों पर भाजपा अपनी जीत देख रही होगी। मगर एक सच यह भी है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के रुझान अलग-अलग होते हैं और मुद्दे भी। इसका अनुभव भाजपा ने भी हाल के वर्षों में कई राज्यों में किया है। लिहाजा, तृणमूल कांग्रेस ने यहां से अपनी उम्मीदें नहीं छोड़ी होगी।

दूसरे चरण में भी 30 सीटों पर 1 अप्रैल को चुनाव हुए हैं, जिनमें पूर्व और पश्चिम मेदिनीपुर की नौ-नौ सीटें शामिल थीं, जो मूलत: तृणमूल के खाते में जाती रही हैं। शुभेंदु अधिकारी के दल बदलने से भाजपा को यहां कुछ सीटें मिल सकती हैं, लेकिन मतदान-केंद्रों पर मतदाता इस उलझन में रहे होंगे कि तृणमूल सरकार में तीन-तीन महत्वपूर्ण विभाग संभालने वाले और पार्टी में दबदबा रखने वाले शुभेंदु अचानक भाजपा में क्यों शामिल हो गए? प्रचार के दौरान साल 2007 के नंदीग्राम आंदोलन में शुभेंदु के योगदान को बार-बार कठघरे में खड़ा करके ममता बनर्जी ने मतदाताओं की उलझन को और बढ़ाने की कोशिश की थी। चूंकि पश्चिम मेदिनीपुर और बांकुड़ा जिले जंगलमहल के नजदीक हैं, इसलिए इन इलाकों से भाजपा को भरोसा होगा, मगर पूर्व मेदिनीपुर में अधिकारी परिवार के हावी रहने के बावजूद ममता बनर्जी को नंदीग्राम से अपनी जीत पक्की लग रही होगी। इस आत्मविश्वास की कई वजहें हैं। मसलन, निर्वाचन आयोग के आंकड़े बताते हैं कि नंदीग्राम में तृणमूल कांग्रेस को 2011 के विधानसभा चुनाव में 60.17 प्रतिशत, 2014 के लोकसभा चुनाव में 68.15 प्रतिशत, 2016 के विधानसभा चुनाव में 66.79 प्रतिशत और 2019 के लोकसभा चुनाव में 62.77 प्रतिशत वोट मिले थे। यानी, पिछले 10 वर्षों में यहां तृणमूल का वोट प्रतिशत 60 फीसदी से ऊपर ही रहा है, जो संकेत है कि लोग पार्टी पर भरोसा कर रहे हैं, किसी एक नेता पर नहीं। इसके बरअक्स, भाजपा को इन चुनावों में क्रमश: 3.39 प्रतिशत, 5.69 प्रतिशत, 5.32 प्रतिशत और 29.92 प्रतिशत वोट मिले, जबकि वाम मोर्चा को क्रमश: 34.75 प्रतिशत, 22.28 प्रतिशत, 26.49 प्रतिशत और 4.49 प्रतिशत। चूंकि इन वर्षों में तृणमूल का वोट प्रतिशत स्थिर रहा है, इसलिए माना जाता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चा के मतदाता ही छिटककर भाजपा के साथ चले गए होंगे। ऐसे में, अगर मौजूदा विधानसभा चुनाव में संयुक्त मोर्चा (वाम मोर्चा, कांग्रेस और इंडियन सेक्युलर फ्रंट का गठबंधन) 2016 का प्रदर्शन दोहरा सका (जिसकी उम्मीद इसलिए की जा रही है, क्योंकि मोर्चा ने युवा नेत्री मीनाक्षी मुखर्जी को मैदान में उतारा है), तो भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है। इसके अलावा, दो ब्लॉक (नंदीग्राम-1 व नंदीग्राम-2) में बंटे नंदीग्राम का सामाजिक समीकरण भी भाजपा की चिंता का कारण होगा। नंदीग्राम-1 में 34.04 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जबकि नंदीग्राम-2 में 12.12 फीसदी। भाजपा द्वारा धार्मिक ध्रुवीकरण किए जाने से माना यही जा रहा है कि यहां के मुस्लिम मतदाता तृणमूल के साथ गए होंगे। फिर, नंदीग्राम-1 इलाके में महज 2.79 प्रतिशत शहरी आबादी है और यहां की अधिसंख्य जनसंख्या अब भी गांवों में बसती है व विकास से दूर है। जबकि नंदीग्राम-2 में 4.28 फीसदी शहरी आबादी है। इस सबको तृणमूल अपने लिए मुफीद मान रही होगी, क्योंकि पार्टी सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछडे़ लोगों की नुमाइंदगी करने का दावा करती है। इन्हीं सब वजहों से ममता आत्मविश्वास से भरी हुई हैं और मतदान केंद्र से ही राज्यपाल को फोन लगाने व कई बूथों पर गड़बड़ियों की शिकायत करने के बावजूद वह दोबारा मतदान की मांग नहीं कर रही हैं। उनके शब्दों पर गौर कीजिए- हम नंदीग्राम के लिए चिंतित नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र के लिए चिंतित हैं। इसी आधार पर वह अफवाह भी खारिज हो जाती है, जिसमें कहा गया कि अब वह किसी अन्य सुरक्षित सीट से भी चुनाव लड़ सकती हैं। अब तो पार्टी ने भी इसका खंडन कर दिया है।

पिछले दो चरणों का ऊंचा मतदान-प्रतिशत भी सत्ता-विरोधी रुझान नहीं माना जा सकता। दोनों चरणों में 80 फीसदी से अधिक मत जरूर डाले गए हैं, लेकिन चुनाव के दिन मतदाताओं का घरों से बाहर निकलना पश्चिम बंगाल की पहचान रही है। यहां हर चुनाव में औसतन 75 फीसदी से अधिक वोट पड़ते हैं। इसीलिए ऊंचा मतदान-प्रतिशत अन्य राज्यों में जीत-हार का समीकरण बनाता है, पश्चिम बंगाल में नहीं। अब छह चरणों के चुनाव शेष हैं और ये उन इलाकों में होने वाले हैं, जिनको पश्चिम बंगाल का केंद्र कहा जाता है। बंगाल के दक्षिणी हिस्से के बीरभूम, बर्धमान, हुगली जैसे जिलों में तृणमूल कांग्रेस मजबूत स्थिति में है, तो उत्तरी हिस्से के मालदा व मुर्शिदाबाद जिलों में कांग्रेस को अपने पारंपरिक वोटरों पर भरोसा होगा। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि भाजपा खाली हाथ रह जाएगी। दार्जिलिंग (यहां तृणमूल कांग्रेस और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा शायद ही एक-दूसरे का साथ छोड़ना चाहेंगे) को छोड़ दें, तो पिछले कुछ महीनों में भाजपा ने जलपाईगुड़ी जैसे इलाकों में अपना आधार मजबूत किया है। इसका उसे लाभ मिल सकता है। मगर जिस तरह से तृणमूल के नेताओं का उसने खुले दिल से स्वागत किया, उसका फायदा उसे हर जगह मिलता नहीं दिख रहा। जाहिर है, अगले चरणों में संयुक्त मोर्चा के बैनर तले कांग्रेस भी जोर आजमाइश करती दिखेगी और वाम मोर्चा भी। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा तो आमने-सामने होंगी ही। लिहाजा, 2019 के लोकसभा चुनाव का ट्रेंड यदि मौजूदा चुनाव में भी बना रहा, तो भाजपा को फायदा हो सकता है और करीबी  मुकाबला हम देख सकते हैं, वरना पिछले दो चरणों जैसे आरोप-प्रत्यारोप उछलते रहेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Saturday, April 3, 2021

चुनावी जीत के कई गुणा-भाग ( हिन्दुस्तान)

ज्योतिप्रसाद चटर्जी, पश्चिम बंगाल विशेषज्ञ, सीएसडीएस


पश्चिम बंगाल में अब तक दो चरणों में 60 सीटों पर विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। मतदाताओं के रुख अभी ठीक-ठीक नहीं आंके जा सकते, लेकिन पहले चरण में 27 मार्च को मुख्यत: जंगलमहल क्षेत्र में चुनाव हुए थे, जो पहले कभी उग्र वामपंथ के गढ़ माने जाते थे। मगर 2019 के लोकसभा चुनाव में यहां भगवा झंडा लहराया था, जिस कारण यहां की ज्यादातर सीटों पर भाजपा अपनी जीत देख रही होगी। मगर एक सच यह भी है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के रुझान अलग-अलग होते हैं और मुद्दे भी। इसका अनुभव भाजपा ने भी हाल के वर्षों में कई राज्यों में किया है। लिहाजा, तृणमूल कांग्रेस ने यहां से अपनी उम्मीदें नहीं छोड़ी होगी।

दूसरे चरण में भी 30 सीटों पर 1 अप्रैल को चुनाव हुए हैं, जिनमें पूर्व और पश्चिम मेदिनीपुर की नौ-नौ सीटें शामिल थीं, जो मूलत: तृणमूल के खाते में जाती रही हैं। शुभेंदु अधिकारी के दल बदलने से भाजपा को यहां कुछ सीटें मिल सकती हैं, लेकिन मतदान-केंद्रों पर मतदाता इस उलझन में रहे होंगे कि तृणमूल सरकार में तीन-तीन महत्वपूर्ण विभाग संभालने वाले और पार्टी में दबदबा रखने वाले शुभेंदु अचानक भाजपा में क्यों शामिल हो गए? प्रचार के दौरान साल 2007 के नंदीग्राम आंदोलन में शुभेंदु के योगदान को बार-बार कठघरे में खड़ा करके ममता बनर्जी ने मतदाताओं की उलझन को और बढ़ाने की कोशिश की थी। चूंकि पश्चिम मेदिनीपुर और बांकुड़ा जिले जंगलमहल के नजदीक हैं, इसलिए इन इलाकों से भाजपा को भरोसा होगा, मगर पूर्व मेदिनीपुर में अधिकारी परिवार के हावी रहने के बावजूद ममता बनर्जी को नंदीग्राम से अपनी जीत पक्की लग रही होगी। इस आत्मविश्वास की कई वजहें हैं। मसलन, निर्वाचन आयोग के आंकड़े बताते हैं कि नंदीग्राम में तृणमूल कांग्रेस को 2011 के विधानसभा चुनाव में 60.17 प्रतिशत, 2014 के लोकसभा चुनाव में 68.15 प्रतिशत, 2016 के विधानसभा चुनाव में 66.79 प्रतिशत और 2019 के लोकसभा चुनाव में 62.77 प्रतिशत वोट मिले थे। यानी, पिछले 10 वर्षों में यहां तृणमूल का वोट प्रतिशत 60 फीसदी से ऊपर ही रहा है, जो संकेत है कि लोग पार्टी पर भरोसा कर रहे हैं, किसी एक नेता पर नहीं। इसके बरअक्स, भाजपा को इन चुनावों में क्रमश: 3.39 प्रतिशत, 5.69 प्रतिशत, 5.32 प्रतिशत और 29.92 प्रतिशत वोट मिले, जबकि वाम मोर्चा को क्रमश: 34.75 प्रतिशत, 22.28 प्रतिशत, 26.49 प्रतिशत और 4.49 प्रतिशत। चूंकि इन वर्षों में तृणमूल का वोट प्रतिशत स्थिर रहा है, इसलिए माना जाता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चा के मतदाता ही छिटककर भाजपा के साथ चले गए होंगे। ऐसे में, अगर मौजूदा विधानसभा चुनाव में संयुक्त मोर्चा (वाम मोर्चा, कांग्रेस और इंडियन सेक्युलर फ्रंट का गठबंधन) 2016 का प्रदर्शन दोहरा सका (जिसकी उम्मीद इसलिए की जा रही है, क्योंकि मोर्चा ने युवा नेत्री मीनाक्षी मुखर्जी को मैदान में उतारा है), तो भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है। इसके अलावा, दो ब्लॉक (नंदीग्राम-1 व नंदीग्राम-2) में बंटे नंदीग्राम का सामाजिक समीकरण भी भाजपा की चिंता का कारण होगा। नंदीग्राम-1 में 34.04 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जबकि नंदीग्राम-2 में 12.12 फीसदी। भाजपा द्वारा धार्मिक ध्रुवीकरण किए जाने से माना यही जा रहा है कि यहां के मुस्लिम मतदाता तृणमूल के साथ गए होंगे। फिर, नंदीग्राम-1 इलाके में महज 2.79 प्रतिशत शहरी आबादी है और यहां की अधिसंख्य जनसंख्या अब भी गांवों में बसती है व विकास से दूर है। जबकि नंदीग्राम-2 में 4.28 फीसदी शहरी आबादी है। इस सबको तृणमूल अपने लिए मुफीद मान रही होगी, क्योंकि पार्टी सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछडे़ लोगों की नुमाइंदगी करने का दावा करती है। इन्हीं सब वजहों से ममता आत्मविश्वास से भरी हुई हैं और मतदान केंद्र से ही राज्यपाल को फोन लगाने व कई बूथों पर गड़बड़ियों की शिकायत करने के बावजूद वह दोबारा मतदान की मांग नहीं कर रही हैं। उनके शब्दों पर गौर कीजिए- हम नंदीग्राम के लिए चिंतित नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र के लिए चिंतित हैं। इसी आधार पर वह अफवाह भी खारिज हो जाती है, जिसमें कहा गया कि अब वह किसी अन्य सुरक्षित सीट से भी चुनाव लड़ सकती हैं। अब तो पार्टी ने भी इसका खंडन कर दिया है।

पिछले दो चरणों का ऊंचा मतदान-प्रतिशत भी सत्ता-विरोधी रुझान नहीं माना जा सकता। दोनों चरणों में 80 फीसदी से अधिक मत जरूर डाले गए हैं, लेकिन चुनाव के दिन मतदाताओं का घरों से बाहर निकलना पश्चिम बंगाल की पहचान रही है। यहां हर चुनाव में औसतन 75 फीसदी से अधिक वोट पड़ते हैं। इसीलिए ऊंचा मतदान-प्रतिशत अन्य राज्यों में जीत-हार का समीकरण बनाता है, पश्चिम बंगाल में नहीं। अब छह चरणों के चुनाव शेष हैं और ये उन इलाकों में होने वाले हैं, जिनको पश्चिम बंगाल का केंद्र कहा जाता है। बंगाल के दक्षिणी हिस्से के बीरभूम, बर्धमान, हुगली जैसे जिलों में तृणमूल कांग्रेस मजबूत स्थिति में है, तो उत्तरी हिस्से के मालदा व मुर्शिदाबाद जिलों में कांग्रेस को अपने पारंपरिक वोटरों पर भरोसा होगा। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि भाजपा खाली हाथ रह जाएगी। दार्जिलिंग (यहां तृणमूल कांग्रेस और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा शायद ही एक-दूसरे का साथ छोड़ना चाहेंगे) को छोड़ दें, तो पिछले कुछ महीनों में भाजपा ने जलपाईगुड़ी जैसे इलाकों में अपना आधार मजबूत किया है। इसका उसे लाभ मिल सकता है। मगर जिस तरह से तृणमूल के नेताओं का उसने खुले दिल से स्वागत किया, उसका फायदा उसे हर जगह मिलता नहीं दिख रहा। जाहिर है, अगले चरणों में संयुक्त मोर्चा के बैनर तले कांग्रेस भी जोर आजमाइश करती दिखेगी और वाम मोर्चा भी। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा तो आमने-सामने होंगी ही। लिहाजा, 2019 के लोकसभा चुनाव का ट्रेंड यदि मौजूदा चुनाव में भी बना रहा, तो भाजपा को फायदा हो सकता है और करीबी  मुकाबला हम देख सकते हैं, वरना पिछले दो चरणों जैसे आरोप-प्रत्यारोप उछलते रहेंगे।

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Friday, April 2, 2021

स्पेनिश फ्लू की राह पर कोरोना (हिन्दुस्तान)

राजीव दासगुप्ता, प्रोफेसर (कम्यूनिटी हेल्थ), जेएनयू 

देश भर में कोविड-19 के बढ़ते मामले चिंताजनक हैं। कम से कम छह राज्यों में संक्रमण की रफ्तार तेज है और कई अन्य सूबों में भी ऐसी ही आशंका जताई जाने लगी है। गुरुवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में देश में 72,330 नए मामले सामने आए, जो रोजाना के नए संक्रमण के हिसाब से 11 अक्तूबर, 2020 (उस दिन 74,383 नए मरीज मिले थे) के बाद से सर्वाधिक है। साफ है, हम अब कोरोना की दूसरी लहर से मुकाबिल हैं। संक्रमण में यह तेजी स्पेनिश फ्लू की याद दिला रही है, जिसकी गिनती आज भी सबसे घातक वैश्विक महामारियों में होती है। सन 1918 में जब पहले विश्व युद्ध का अंत हो रहा था, तब स्पेनिश फ्लू पश्चिम से पूरी दुनिया में फैला था। तकरीबन एक तिहाई वैश्विक आबादी की अकाल मौत इससे हुई थी। अप्रैल-मई के महीनों में यह महामारी तेजी से ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और इटली में फैली थी। इसमें मृत्यु दर सामान्य मौसमी फ्लू की तरह ही थी, लेकिन अगस्त के महीनों से जब इसकी दूसरी लहर आई, तो वह कहीं ज्यादा घातक साबित हुई। दूसरे चरण में नौजवान भी इससे खूब प्रभावित हुए, और अगले दो महीने में मृत्यु दर आसमान पर पहुंच गई। भारत भी इन सबसे अछूता नहीं था। यहां की करीब छह फीसदी आबादी इसकी वजह से बेमौत मारी गई थी। यहां भी वैश्विक ट्रेंड के मुताबिक, 1918 की गरमियों में यह महामारी कम घातक थी, जबकि सर्दियों में यह ज्यादा मारक हो गई थी। करीब दो साल तक स्पेनिश फ्लू ने दुनिया को परेशान किया था, इसीलिए कोविड-19 के भी लंबा खिंचने की आशंका जताई जा रही है। कई दूसरे देशों में ऐसा दिख भी रहा है। 

दिक्कत यह है कि अपने यहां अब मानव संसाधन की कमी खलने लगी है। मसलन, पिछले साल सरकार ने जब कोरोना के खिलाफ जंग की शुरुआत की थी, तब स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ गैर-स्वास्थ्य कर्मचारी भी मोर्चे पर लगाए गए थे। अब इन कर्मियों की अपने-अपने विभाग में वापसी हो चुकी है, क्योंकि सभी सरकारी व सामाजिक क्षेत्र की सेवाएं फिर से बहाल हो गई हैं। स्वास्थ्य कर्मचारी भी सर्जरी जैसी गैर-कोविड सेवाओं पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं, क्योंकि उनका ‘बैकलॉग’ काफी बढ़ चुका है। इसके कारण ‘टेस्ट, ट्रैक ऐंड ट्रीट’ (जांच, संक्रमितों की खोज और इलाज) जैसी कोरोना की बुनियादी सेवाओं के लिए स्वास्थ्यकर्मियों की कमी होने लगी है। समुदाय के स्तर पर भी बचाव संबंधी उपायों के प्रति उदासीनता साफ-साफ दिखने लगी है। ऐसा मालूम पड़ता है कि लोग अब इस महामारी से लड़ते-लड़ते थक से गए हैं। उनकी निश्चिंतता बताती है कि सरकार को कुछ नए प्रयास करने होंगे, ताकि जनता इस महामारी के खतरे की गंभीरता को समझ सके। अब शादी और अन्य सामाजिक उत्सव ‘सुपर स्प्रेडर इवेंट’ (कहीं तेजी से संक्रमण फैलाने वाले आयोजन) बनने लगे हैं। इस नई लहर में युवा व किशोर भी तेजी से बीमार हो रहे हैं। शिक्षण संस्थानों के खुलने और नौजवानों में सामाजिक संपर्क बढ़ने के कारण संभवत: ऐसा हो रहा है। चिंता की बात यह भी है कि ग्रामीण इलाकों में यह वायरस पसरने लगा है, जबकि वहां पिछले चरण में कमोबेश नहीं के बराबर संक्रमण थे। इससे स्वाभाविक तौर पर छोटे जिलों या कस्बों की स्वास्थ्य सेवाओं पर अप्रत्याशित बोझ बढ़ गया है, जो पहले से ही बेहाल हैं। इन सबका अर्थ यह है कि पिछले एक साल में सरकार ने जितना ध्यान इलाज और अनुसंधान संबंधी कार्यों पर दिया, उतना सामाजिक व्यवहार संबंधी एहतियातों पर नहीं दिया। अब इस असंतुलन को पहचानने और दुरुस्त करने का वक्त है। तभी जोखिम से जुड़ी संचार-योजना व समाज को जोड़कर महामारी से निपटने की रणनीतियां बनाई व लागू की जा सकती हैं। इनसे टीकाकरण के प्रति लोगों की हिचकिचाहट कम हो सकती है और टीके की मांग भी बढ़ सकती है। वैक्सीन को लेकर लोगों की कायम दुविधा कोरोना के खिलाफ हमारी जंग को कमजोर कर देगी।

सवाल यह है कि इस नई लहर से पार पाने के लिए क्या हमें फिर से लॉकडाउन का सहारा लेना होगा? देश के कुछ हिस्सों में यह रणनीति अपनाई भी गई है। मगर ऐसी किसी योजना को लागू करने से पहले हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि आखिर किन परिस्थितियों में लॉकडाउन का सहारा लिया जा सकता है? कई शहरों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि वहां के अस्पताल कोरोना मरीजों से भरने लगे हैं, मगर अभी तक ऐसी कोई सूचना नहीं है कि अस्पताल मरीजों के अत्यधिक बोझ से हांफने लगे हैं। इसीलिए अस्पतालों की दशा देखकर लॉकडाउन पर फैसला किया जाना चाहिए। सरकारों को यह समझना होगा कि अभी लोगों में बचाव से जुड़ी व्यवहार संबंधी जागरूकता फैलाने की जरूरत है, न कि ‘दंडात्मक उपाय’ के रूप में लॉकडाउन लगाने की। अभी इससे बचने की आवश्यकता है, लेकिन छोटे शहरों में इसकी जरूरत पड़ सकती है, क्योंकि वहां स्वास्थ्य सेवाएं बहुत जल्द दम तोड़ने लगती हैं। हां, प्रसार को थामने के लिए छोटे-छोटे ‘कंटेन्मेंट जोन’ जरूर बनाए जाने चाहिए, ताकि संक्रमण की शृंखला तोड़ी जा सके। उम्मीद टीकाकरण से भी की जा सकती है। हालांकि, सवाल यह है कि कितनी तेजी से यह संभव हो सकेगा? भारत में 16 जनवरी को ही टीकाकरण अभियान की शुरुआत हुई थी, और बीते 75 दिनों में टीके की 6.43 खुराक लोगों को दी जा चुकी है। अब तक खास-खास वर्गों को ही टीका दिया गया है, लेकिन जिन 30 करोड़ लोगों को टीके लगाने का लक्ष्य रखा गया था, उनमें से महज 20 फीसदी का ही अब तक टीकाकरण हो सका है। शेष 80 फीसदी लक्षित आबादी को 120 दिनों में टीके लगाने की जरूरत होगी, जिसके लिए हमें भगीरथ प्रयास करने होंगे। और हमारी यह कोशिश तभी सफल हो सकती है, जब समाज टीकाकरण के प्रति उत्साहित हो और इसकी मांग बढ़े। जाहिर है, यह सरकार और  जनता के आपसी विश्वास व उपयुक्त समन्वय-संवाद से ही संभव हो सकेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Thursday, April 1, 2021

कहां तक पहुंचाएंगी ये चिट्ठियां (हिन्दुस्तान)

राजीव डोगरा, पूर्व राजदूत 

पाकिस्तान ने फिर से दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। वजीर-ए-आजम इमरान खान ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस चिट्ठी का जवाब भेजा है, जो उन्होंने पाकिस्तान के ‘नेशनल डे’ पर दस्तूर के मुताबिक लिखी थी। इमरान खान के खत की कई बातों की तारीफ की जा सकती है, लेकिन कुछ शब्दों से पाकिस्तान की मंशा उजागर होती है। मिसाल के तौर पर, पहले पैराग्राफ में ही इमरान खान ने लिखा है कि पाकिस्तान यह दिन इसलिए मनाता है, क्योंकि उसके संस्थापकों ने आजाद रहने के लिए एक खुदमुख्तार मुल्क की कल्पना की थी। इसका अर्थ है कि बांग्लादेश के निर्माण से जो ‘दो राष्ट्र का सिद्धांत’ गलत साबित हुआ था, उसे फिर से प्रासंगिक बनाने का उन्होंने प्रयास किया है। यानी, दिल की खटास उन्होंने शुरू में ही जाहिर कर दी। इसके अलावा, पुराना राग अलापते हुए उन्होंने लिखा है कि शांति व स्थिरता तभी आ सकती है, जब जम्मू-कश्मीर के ‘विवाद’ (इसे पाकिस्तान पहले मुद्दा मानता था) का समाधान हो जाएगा। ये शब्द नौकरशाहों के हैं या राजनेताओं के, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन इस पहल का स्वागत करते हुए भी सवाल यही है कि नई ‘शुरुआत’ आखिर पाकिस्तान क्यों कर रहा है? पिछले दिनों सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने भी पुरानी बातें भुलाकर नई राह बनाने की बात कही थी। हालांकि, इस तरह की पहल पूर्व में भी पाकिस्तानी फौज कर चुकी है, लेकिन इस बार कुछ खास वजहें हो सकती हैं। पहली, हाल के वर्षों में पाकिस्तानी सेना खुद को तानाशाह शासक न बनने देने की नीति पर आगे बढ़ी है, क्योंकि उसका मानना है कि ऐसा करने पर सारा दोष उसके ऊपर ही आ जाता है। याह्या खान, अयूब खान, जियाउल हक या फिर परवेज मुशर्रफ, सभी के शासनकाल में फौज इस आरोप को झेल चुकी है। मगर परदे के पीछे से सरकार चलाने का उसका भेद ज्यादा दिनों तक छिप न सका, और अब जगजाहिर है कि छोटे ओहदे से लेकर बड़े पदों तक, फौज ही देश चला रही है। इसीलिए वहां एक नारा बराबर गूंजता है- यह जो दहशतगर्दी है, इसके पीछे वरदी है। इसी सोच को बदलने के लिए वहां की जम्हूरी हुकूमत ने यह पैगाम भेजा है। 

दूसरी वजह पाकिस्तान की विफल होती नीतियां हो सकती है। आलम यह है कि मुल्क में महंगाई चरम पर है। छोटी-छोटी चीजें भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। गरीबी बढ़ती जा रही है। गरीबों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विश्व बैंक का आकलन है कि पाकिस्तान पर कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 94 फीसदी तक हो चुका है। इतना ही नहीं, पूर्व में भारी इमदाद देने वाले अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे मुल्क अब ऐसा करने से हिचकने लगे हैं। ले-देकर उम्मीद चीन से है, लेकिन उसकी कर्ज-नीति किसी से भी छिपी नहीं है। लिहाजा, पाकिस्तान खुद को चौतरफा घिरा पा रहा है। पैसे न होने पर सेना का भारी-भरकम बजट भी प्रभावित हो सकता है। इसी कारण, वह अपनी आयात-लागत कम करने की कोशिश में है। और यह तभी संभव है, जब पड़ोसी देशों से उसके अच्छे संबंध हों। भारत इस मामले में उसके लिए मददगार साबित हो सकता है, क्योंकि यूरोप और चीन से सामान मंगवाने की तुलना में उसे हिन्दुस्तान से आयात काफी सस्ता पडे़गा। 

तीसरा कारण अफगानिस्तान हो सकता है। पाकिस्तान को पता है कि अमेरिका किसी भी तरह से यहां से निकलना चाहता है। इसके बाद अगर अफगानिस्तान में तालिबान का राज स्थापित होता है, तो आईएसआई व फौज की मदद से पाकिस्तान वहां असरंदाज हो सकता है। मगर उसकी राह में दो अड़चनें हैं। पहली, आम अफगानी अवाम भारत को पसंद करता है, इसीलिए काबुल में नई दिल्ली की भूमिका अहम रही है। और दूसरी, अफगानिस्तान में सिर्फ पश्तून आबादी नहीं है, बल्कि आधी जनसंख्या गैर-पश्तूनों की है। ऐसे में, तालिबानी राज में यहां गृह युद्ध का खतरा बना रहेगा। इसीलिए यदि पाकिस्तान इस मुल्क पर अपना नियंत्रण बनाना चाहता है, तो उसे अफगानिस्तान को कुछ पैसे देने पड़ेंगे, और अभी जब खुद उसकी जेब फटी हुई है, तो वह भला अफगानिस्तान को क्या देगा? नतीजतन, वह पूर्वी सीमा (भारत) पर हालात सामान्य बनाना चाहता है, ताकि अपने उद्देश्यों को पा सके। एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर निकलने के लिए वह ऐसा कर रहा है। बेशक यह भी एक वजह हो सकती है, लेकिन इसका बहुत ज्यादा फायदा उसे नहीं होगा। मुमकिन है कि जल्द ही वह इस सूची से बाहर निकल जाए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका उसे मदद देने को आगे आएगा या गूगल और मर्सीडीज जैसी कंपनियां वहां निवेश करने लगेंगी। सभी उद्योगपति सुरक्षित निवेश चाहते हैं और पाकिस्तान की सच्चाई जगजाहिर है कि वह दहशतगर्दी को खाद-पानी देता है। यहां बड़ा सवाल यह भी है कि कथनी और करनी में पाकिस्तान कितनी एकरूपता दिखाएगा? पाकिस्तानी मीडिया में छपने वाले सेवानिवृत्त उच्चायुक्तों अथवा राजदूतों के लेखों में एक बात आम है कि कश्मीर किसी भी कीमत पर पाकिस्तान को ही मिलना चाहिए। यानी, पाकिस्तान ने देर से कदम तो उठाया ही है, मगर दुरुस्त उठाया है या नहीं, यह अभी नहीं कहा जा सकता। हां, भारत को जरूर इतिहास से सबक लेकर आगे बढ़ना चाहिए। अभी संघर्ष विराम पर बनी सहमति तात्कालिक हो सकती है, क्योंकि पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति जैसे ही बिगडे़गी और कश्मीर पर वह पुराना राग अलापने लगेगा, स्थिति ढाक के तीन पात वाली ही होगी। पाकिस्तान के संदर्भ में हमें हरेक कदम इसलिए भी फूंक-फूंककर उठाना चाहिए, क्योंकि पंडित नेहरू  का अनुभव, ताशकंद समझौता अथवा शिमला समझौता जैसे संबंध सुधारने के प्रयास बताते हैं कि पाकिस्तान अपनी कुत्सित मंशा कभी नहीं छोड़ता। जैसे, शिमला समझौता के वक्त उसने अपने युद्धबंदियों को वापस मांग लिया था, तो ताशकंद में कूटनीतिक रूप से अहम हाजी पीर दर्रा को। कहने का मतलब यह है कि हमें हर बार यह देखना होगा कि हमारी पीठ पर वह कोई वार तो नहीं करने जा रहा। लिहाजा, पाकिस्तान की ताजा पहल उम्मीद जगाने के बावजूद शक पैदा करती है। इसी रोशनी में हमें आगे बढ़ना चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Wednesday, March 31, 2021

क्षत्रपों के सहारे दक्षिण में जंग (हिन्दु्स्तान)

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार 

साल 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा एक मजबूत नेतृत्व, हिंदुत्व के एजेंडे और सशक्त चुनावी मशीनरी के सहारे दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई। केंद्र में बेशक दोनों ही बार इसने आसानी से सरकार बना ली, लेकिन राज्य के चुनावों में इसका ट्रैक रिकॉर्ड थोड़ा अलग रहा है। गुजरात में यह बमुश्किल अपनी सरकार बचाने में कामयाब रही, तो वहीं उत्तर प्रदेश में इसने विरोधियों को सूपड़ा साफ कर दिया और असम व पूर्वोत्तर में भी अपनी जमीन काफी मजबूत की। कुछ विद्रूपताओं और कांग्रेस के बागियों की मदद से इसने मध्य प्रदेश एवं कर्नाटक पर फिर से कब्जा किया और अरुणाचल प्रदेश में पहली बार सरकार बनाने में सफलता हासिल की। महाराष्ट्र, जिसे भाजपा-शासित राज्य होना चाहिए था, वहां पर यह सत्ता से बाहर हो गई, क्योंकि चुनाव-पूर्व की सहयोगी शिवसेना ने उसे झटका देते हुए अप्रत्याशित रूप से एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिला लिया। इसी तरह, राजस्थान में बहुत मामूली अंतर से कांग्रेस को बढ़त मिली और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जैसे-तैसे सत्ता-संतुलन बनाने में सफल रहे। यही वजह है कि भाजपा ‘कांगे्रस मुक्त भारत’ का सपना उत्तर, पश्चिम और पूर्वोत्तर में जल्द ही साकार होते देख सकी, जबकि पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा व तमिलनाडु, जो केरल तट से होते हुए पश्चिमी छोर तक फैला हुआ है, जैसे सूबों में इसका अनुभव खासा अलग रहा। इन राज्यों में कांग्रेस के धीरे-धीरे कमजोर पड़ते जाने से भाजपा खुद के लिए मौके ढूंढ़ती रही है, लेकिन क्षेत्रीय ताकतें उसकी राह रोक देती हैं। मौजूदा विधानसभा चुनावों में भाजपा जहां पश्चिम बंगाल में इन मुश्किलों से पार पाकर सरकार बनाने की हरसंभव कोशिश कर रही है, तो वहीं तमिलनाडु में अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए जी-जान से जुटी है। तमिलनाडु में वह अन्नाद्रमुक और पुडुचेरी में रंगासामी कांग्रेस की मदद से सत्ता में आना चाहेगी, तो वहीं केरल में 2026 में सरकार बनाने की योजना के साथ वह आगे बढ़ सकती है।

मगर सवाल यह है कि इन राज्यों में भाजपा कैसे सत्ता में आएगी, जहां के सामाजिक-राजनीतिक समीकरण देश के उत्तर व पश्चिमी हिस्सों से बिल्कुल अलग हैं। भगवा पार्टी यह बखूबी समझ रही होगी कि हिंदुत्व का उसका कार्ड इन हिस्सों में शायद ही काम कर सकता है। इसी कारण उसने इन सूबों में अपनी योजना को नया रूप दिया है और यह तमिलनाडु में साफ-साफ जाहिर भी हो रहा है। जैसे, भाजपा यहां समझ चुकी है कि बेशक देश भर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता शीर्ष पर है, लेकिन तमिलनाडु इस मामले में अपवाद है, इसीलिए उसने उम्मीदवारों को अपने तईं रणनीति बनाने को कहा है। नतीजतन, कुछ प्रत्याशी मोदी के बजाय पोस्टरों पर स्थानीय क्षत्रप एमजीआर और जयललिता की तस्वीरों का प्रमुखता से इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा भले ही हिंदू कार्ड को सबसे ऊपर रखने में कोताही नहीं बरतती, लेकिन स्थानीय संवेदनशील मसलों पर सावधानी से कदम बढ़ा रही है। मिसाल के तौर पर, केरल में ईसाई समुदाय का समर्थन हासिल करने के लिए ईसाई बहुल क्षेत्रों में चुनावी समीकरण साधने या मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने में भी उसे ऐतराज नहीं है। लेकिन सबसे खास बात है, भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग, जो वह तमिलनाडु के दक्षिणी हिस्से में करने के प्रयास कर रही है। यह ठीक उसी तरह की कोशिश है, जैसे उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में की गई थी। तमिलनाडु में लगभग 18 फीसदी दलित और दो प्रतिशत आदिवासी आबादी है। भाजपा उत्तर में यादव और जाट जातियों पर किए गए अपने प्रयोगों की तरह इन्हें भी एक साथ लुभाकर तमिलनाडु पर काबिज होना चाहती है। दलितों की संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु करीब-करीब समान धरातल पर हैं। उत्तर प्रदेश में दलितों में समरूप नहीं है और यहां अनुसूचित जाति में वर्गीकृत जाटव, अहिरवार जैसी 66 जातियां हैं। तमिलनाडु में ऐसी 71 जातियां तीन बड़े दलित समुदायों- पल्लार, पारयार और अरुंधति में सूचीबद्ध हैं। करीब एक पखवाड़े पहले केंद्र ने उन सात जातियों का एक समूह देवेंद्र कुला वेल्लार बनाने का फैसला लिया है, जो फिलहाल पल्लार का हिस्सा हैं, और लंबे समय से यह मांग कर रही थीं। इनकी दूसरी प्रमुख मांग, खुद को अनुसूचित जाति से बाहर निकालना और अन्य पिछड़े वर्ग में शामिल करना है। इस पर अब भी विचार जारी है। फिर भी, यह कहना गलत नहीं होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ और भगवा परिवार के अन्य सहयोगी दलों की मदद से भाजपा समाज के दमित वर्गों के बीच चुपचाप काम कर रही है, ताकि उनकी पहचान फिर से बन सके और उनके स्थानीय देवी-देवताओं को समाज में जगह मिल सके। यह हिंदुत्व के आख्यान के साथ फिट भी बैठता है। यह इस सोच पर आधारित है कि जाति की जंजीर टूट जानी चाहिए और सभी समुदाय हिंदुत्व की विशाल छतरी के नीचे एकजुट हो जाएं। हालांकि, तमिलनाडु के दलित दलों ने इस तरह के कदमों का मजाक उड़ाते हुए कहा कि यह केवल एक चाल है और इसका मकसद दलितों को ऐसे समूह में बांट देना है, जो वोट के एक मजबूत ब्लॉक बन सकें। उनका आरोप है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में यह प्रयोग कर चुकी है, जिससे मायावती की बहुजन समाज पार्टी को अच्छा-खासा नुकसान पहुंचा था। हालांकि, तमिलनाडु में सबसे बड़ा सवाल यही है कि देवेंद्र कुला वेल्लार की जातियां अनुसूचित जाति से बाहर निकलने के बावजूद आरक्षण का लाभ लेना चाहेंगी, इसीलिए उनको भला कहां समायोजित किया जाएगा? बहरहाल, उत्तर में अन्नाद्रमुक ने पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) के साथ गठबंधन किया है, जो एक जाति आधारित पार्टी है। अन्नाद्रमुक जहां प्रमुख पिछड़ी जातियों की नुमाइंदगी करता है, तो पीएमके पार्टी मोस्ट बैकवार्ड क्लासेस (एमबीसी) की। इस गठबंधन का आधार मुख्यमंत्री ई पलानीसामी द्वारा अंतिम क्षणों में की गई घोषणा है कि वह 10.5 फीसदी आंतरिक आरक्षण देंगे। राज्य में शिक्षा व रोजगार में जितना आरक्षण है, उसमें 20 फीसदी एमबीसी को हासिल है। ऐसे में, अगले सप्ताह होने वाले चुनावों के नतीजों से ही इन रणनीतियों की सफलता का पता चलेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Saturday, March 27, 2021

कुछ रह गए तो सब पर खतरा (हिन्दुस्तान)

हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार  

एक भी बच्चा छूट गया, सुरक्षा चक्र टूट गया- क्या यह नारा याद है आपको। वैक्सीनेशन यानी टीकाकरण का मूल सिद्धांत यह है कि जितनी जल्दी हो सके, ज्यादातर लोगों को वैक्सीन की सुरक्षा दे दी जाए, तभी महामारी की आफत से निजात पाई जा सकती है। कोविड-19 फैलाने वाले कोरोना वायरस के मामले में तो यह और भी जरूरी है। ऐसे वायरस की दिक्कत यह होती है कि वे अगर रहेंगे, तो नए रूप धरते रहेंगे और हमारी चुनौतियां बदलते, बढ़ाते रहेंगे। आप यह सोचते हुए राहत की आरामकुरसी पर इत्मीनान से बैठे होंगे कि मैंने तो वैक्सीन ले ली है, तभी हो सकता है कि वायरस ऐसा वेष धरकर आपका दरवाजा खटखटाए, जिसके लिए आपकी वैक्सीन भी तैयार न हो। इसलिए जरूरी है कि ज्यादातर लोगों को वैक्सीन लगाई जाए और पूरी दुनिया में लगाई जाए। सुरक्षा का हमारे पास इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है। दुनिया के देशों में सिर्फ इजरायल ही ऐसा है, जिसने अपने सभी नागरिकों को वैक्सीन की दोनों खुराक दे दी है। अमेरिका ने कहा है कि वह एक मई तक इस काम को अंजाम दे देगा। ब्रिटेन ने अगस्त को लक्ष्य बनाया है। पर हम भारतीयों की किस्मत इतनी अच्छी नहीं है। संतोष की बात सिर्फ इतनी है कि यहां बहुत तेजी से टीकाकरण चल रहा है। समस्या यह जरूर है कि हमारे यहां जिस बड़ी तादाद में टीकाकरण की जरूरत है, उसके मुकाबले हमारा स्वास्थ्य-इंफ्रास्ट्रक्चर काफी कम है, इसलिए समय तो लगेगा ही। लेकिन दुनिया के बहुत से देशों की स्थिति तो शायद इतनी अच्छी भी नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख एंटोनियो गुटेरस की बात मानें, तो दुनिया के 130 देश ऐसे हैं, जहां अभी तक वैक्सीन की एक भी खुराक नहीं पहुंची है। विश्व स्वास्थ्य संगठन बार-बार कह रहा है कि अगर यही स्थिति रही, तो यह महामारी हाल-फिलहाल में नहीं जाने वाली। यानी जो देश पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य हासिल करके फिर से पुराने दिनों की रौनक में लौटने का रोडमैप बना रहे हैं, उनके सुरक्षित भविष्य की भी कोई गारंटी नहीं होगी। जिस वैक्सीन को रामबाण मानकर हमने पिछले 12 महीने जैसे-तैसे काटे थे, वह हासिल भले ही हो गई, पर अपने लक्ष्य से बहुत दूर है।

तो इस लक्ष्य को हासिल करने का रास्ता क्या है? एक रास्ता वह है, जो पिछले साल अक्तूबर में भारत और दक्षिण अफ्रीका ने सुझाया था। इन दोनों देशों ने विश्व व्यापार संगठन को एक पत्र लिखकर यह आग्रह किया था कि कोविड-19 की बनने वाली वैक्सीन से बौद्धिक संपदा अधिकार यानी पेटेंट वगैरह को हटा लिया जाए। इससे इस वैक्सीन को कोई भी कहीं भी बना सकेगा और कहीं भी भेज सकेगा। फिलहाल सबसे बड़ी जरूरत यही है कि बड़े पैमाने पर वैक्सीन बने, सस्ती बने और सबको उपलब्ध हो और सघन टीकाकरण हो। जाहिर है, इन पत्रों पर किसी ने कान नहीं दिए। उसके बाद से अब तक दुनिया के 80 देश ऐसे पत्र लिख चुके हैं। अभी कोई इस पर ध्यान भले न दे रहा हो, लेकिन इसने अमेरिका की दवा कंपनियों को जरूर चिंतित कर दिया है। इन कंपनियों ने अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को एक संयुक्त ज्ञापन भेजकर कहा कि भारत और दक्षिण अफ्रीका ऐसी मांग कर रहे हैं और किसी भी तरह से ऐसा होने से रोका जाए। बाइडन ने इस पर चुप्पी साध ली है, वह न तो इन कंपनियों को नाराज करना चाहते हैं और न ही दुनिया के गुस्से का शिकार बनना चाहते हैं। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि इन कंपनियों ने वैक्सीन का विकास और निर्माण अपने निवेश से नहीं किया है, इनमें से लगभग सभी की अमेरिकी सरकार ने बड़ी आर्थिक मदद की है। सबसे पहले वैक्सीन को बाजार में लाने वाली मॉडेरना को तो डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इसके लिए 50 करोड़ डॉलर की मदद की थी। यानी अमेरिकी कंपनियों की जितनी भी वैक्सीन बाजार में उतर चुकी हैं, उनमें उनका खुद का नहीं, बल्कि वहां के लोगों और कंपनियों द्वारा दिए गए कर का पैसा है। ये कर भी उन्होंने अपनी उस कमाई में से चुकाए हैं, जो पूरी दुनिया के लोगों के माइक्रोसॉफ्ट और एडोब के सॉफ्टवेयर खरीदने, गूगल और एंड्राएड के इस्तेमाल करने या अमेजन जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खरीदारी से उन्हें हुई है। इस गणित से इन टीकों पर पूरी दुनिया का अधिकार बनता है। अब अमेरिकी सरकार के निवेश से इन दवा कंपनियों के शेयरों के भाव लगातार बुलंदी पर जा रहे हैं और उनका बाजार पूंजीकरण भी तेजी से बढ़ रहा है। इस बीच अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट  में एक खबर बांग्लादेश की छपी है। बांग्लादेश की एक दवा कंपनी है इन्सेप्टा, जो वैक्सीन भी बनाती है। उसने वैक्सीन बनाने वाली दुनिया की तकरीबन सभी कंपनियों से कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने के लिए मदद मांगी है, लेकिन अभी तक किसी ने पलटकर जवाब तक नहीं दिया है। अमेरिकी कंपनियां खासतौर पर किसी अन्य देश की कंपनी के साथ समझौता करने से बच रही हैं। एकमात्र अपवाद जॉनसन ऐंड जॉनसन है, जिसने एक भारतीय कंपनी से वैक्सीन की एक करोड़ खुराक बनाने का समझौता किया है। जबकि ब्रिटिश कंपनी एस्ट्राजेनेका की कोवीशील्ड भारत की सीरम इंडिया में बन रही है और यहां इस्तेमाल भी हो रही है। इसी तरह, रूस ने भी अपनी स्पूतनिक वैक्सीन बनाने के लिए डॉ. रेड्डी लेबोरेटरीज से समझौता किया है। अगर बौद्धिक संपदा अधिकार पर भारत और दक्षिण अफ्रीका की मांग स्वीकार कर ली जाती है, तो भारतीय व तमाम दूसरे देशों की और  कंपनियां आगे आ सकती हैं और पूरी दुनिया में वैक्सीन की किल्लत खत्म हो सकती है। अगर नहीं मानी जाती है, तो आगे जाकर यह भारत को परेशान भी कर सकती है। तब यह पूछा जाएगा कि भारत अपने यहां विकसित वैक्सीन को बौद्धिक संपदा अधिकार से क्यों नहीं मुक्त कर देता? जब बौद्धिक संपदा कानून को पूरी दुनिया में लागू करने के लिए विश्व व्यापार संगठन ने आस्तीनें चढ़ाई थीं, तब इसे मानव सभ्यता का एक बड़ा कदम कहा जा रहा था, लेकिन अब जब इस सभ्यता पर सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है, तो यही कानून अड़चन बना हुआ है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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बांग्लादेश के पचास वर्ष (हिन्दुस्तान)

बांग्लादेश निर्माण की पचासवीं वर्षगांठ भारत के साथ ही पूरे दक्षिण एशिया के लिए खुशी का क्षण है। सबसे ज्यादा महत्व इस बात का है कि बांग्लादेश ने ऐसे अहम मौके पर भारत को जिस तरह याद किया है, उसका प्रभाव पूरे क्षेत्र की शांति व तरक्की की बुनियाद मजबूत करेगा। दक्षिण एशिया में यह एक ऐसा देश है, जो कम समय में खुद को एक मुकाम पर पहुंचाकर अपनी सार्थकता सिद्ध कर चुका है। न केवल राजनीतिक, सामाजिक, बल्कि आर्थिक रूप से भी यह दक्षिण एशिया की एक शान है। वह हमारा ऐसा पड़ोसी है, जिसने कभी भारत के प्रति दुर्भाव का प्रदर्शन नहीं किया है। चीन, पाकिस्तान की जुगलबंदी हम जानते हैं और इधर के वर्षों में जब हम नेपाल को भी देखते हैं, तब हमें बांग्लादेश का महत्व ज्यादा बेहतर ढंग से समझ में आता है। शुक्रवार को ढाका के परेड ग्राउंड पर यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक घड़ी को गर्व के क्षण बताया है, तो कतई आश्चर्य नहीं।

बांग्लादेश हमारा ऐसा दोस्त पड़ोसी है, जिसके बारे में प्रधानमंत्री मोदी एकाधिक बार ‘पड़ोसी पहले’ की भावना का इजहार कर चुके हैं। सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक संबंधों के आधार पर बांग्लादेश भारत के ऐसे निकटतम सहयोगियों में शुमार है, जो भारतीय हितों के प्रति सदा सचेत रहे हैं। आज पूर्वोत्तर राज्यों में जो शांति है, उसमें भी बांग्लादेश का बड़ा योगदान है। महत्व तो इसका भी है कि बांग्लादेश के बुलावे पर महामारी के समय में अपनी पहली विदेश यात्रा पर प्रधानमंत्री वहां गए हैं। इस यात्रा का फल पूरे क्षेत्र को मिलना चाहिए। दोनों देशों के बीच जो कुछ विवाद हैं, उन्हें जल्द सुलझाने के साथ ही नई दिल्ली और ढाका को विकास अभियान में जुट जाना होगा। बांग्लादेश को 50 वर्ष हो गए, तो आजाद भारत भी अपनी 75वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहा है। गरीबी और सांप्रदायिक हिंसा ने दोनों देशों को समान रूप से चिंतित कर रखा है, मिलकर प्रयास करने चाहिए, ताकि दोनों देशों में व्याप्त बड़ी कमियों को जल्द से जल्द अलविदा कहा जा सके। बांग्लादेश की असली मुक्ति और भारत की असली आजादी समेकित विकास की तेज राह पर ही संभव है। प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा के अवसर पर बांग्लादेशी अखबार केलिए जो लेख लिखा है, उसे भी याद किया जाएगा। ध्यान रहे, अपने-अपने घरेलू मोर्चे पर अशिक्षा, कट्टरता, सांप्रदायिक हिंसा में भी हमने बहुत कुछ गंवाया है। वाकई, यदि बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की हत्या न हुई होती, तो आज दक्षिण एशिया की तस्वीर अलहदा होती। बंगबंधु उस दर्द को समग्रता में समझते थे, जिससे गुजरकर दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश उभरा। उनके असमय जाने से देश कुछ समय के लिए भटकता दिखा, लेकिन आज वह विकास के लिए जिस तरह प्रतिबद्ध है, उसकी मिसाल पाकिस्तान में भी दी जाती है। प्रधानमंत्री ने सही इशारा किया है कि दोनों देश एक उन्नत एकीकृत आर्थिक क्षेत्र का निर्माण कर सकते हैं, जिससे दोनों के उद्यमों को तेजी से आगे बढ़ने की ताकत मिलेगी। जो देश दहशतगर्दी के पक्ष में रहना चाहते हैं, उन्हें छोड़ आगे बढ़ने का समय आ गया है। अब सार्क या दक्षेस को ज्यादा घसीटा नहीं जा सकता, क्योंकि अभावग्रस्त लोग इंतजार नहीं कर सकते। भारत और बांग्लादेश की मित्रता का भविष्य उज्ज्वल है।

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Friday, March 26, 2021

सेना में हक (हिन्दुस्तान)

हमारी सेनाओं में महिलाओं की भूमिका पर देश की सर्वोच्च अदालत ने जो टिप्पणी की है, वह न केवल सुखद, बल्कि प्रशंसनीय भी है। सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को महिलाओं के स्थाई कमीशन पर सेना के मानकों को बेतुका और मनमाना बताया है। वैसे तो दिल्ली उच्च न्यायालय ने लगभग ग्यारह साल पहले ही सेना में महिलाओं को स्थाई कमीशन देने का फैसला सुना दिया था, लेकिन हकीकत यही है कि वह फैसला अभी भी पूरी तरह लागू नहीं हुआ है। इस दिशा में साल 2019 में काम चालू हुआ, लेकिन साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट को फिर एक बार व्यवस्था देनी पड़ी कि सेना में महिलाओं के साथ किसी तरह का भेदभाव न किया जाए। अफसोस इसके बाद भी महिलाओं को अपने हक के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा और अब सुप्रीम कोर्ट ने सेना, सरकार व समाज के नजरिए पर जो टिप्पणी की है, वह मील के पत्थर की तरह है। अदालत ने तल्खी के साथ कहा है कि भारतीय समाज का ढांचा ऐसा है, जो पुरुषों द्वारा और पुरुषों के लिए बना है। आज के समय में भी अगर यह बात सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर समझाने की जरूरत पड़ रही है, तो यह त्रासद है। वाकई, महिलाओं को उनके पूरे हक मिलने चाहिए, पुरुषों को कोर्ई हक नहीं कि वे फैसले महिलाओं पर थोपें। इसके साथ ही कोर्ट ने सेना को दो महीने के भीतर 650 महिलाओं की अर्जी पर पुनर्विचार करते हुए स्थाई कमीशन देने के लिए कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन में तैनात महिलाओं की क्षमता के आकलन का जो तरीका है, वह मनमाना और बेतुका है। यह तरीका सही होता, तो महिला अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। कोर्ट ने अपने 137 पृष्ठों के फैसले में यह भी कहा है कि कुछ ऐसी चीजें हैं, जो कभी नुकसानदायक नहीं लगती हैं, लेकिन जिनमें पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था के कपट के संकेत मिलते हैं।’ महिलाओं के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का ऐसे खड़ा होना ऐतिहासिक है, क्योंकि एकाधिक फैसलों में हमने कुछ जजों को पितृ-सत्तात्मक होते देखा है। बहरहाल, गुरुवार को शीर्ष अदालत जिस तरह स्त्रियों के पक्ष में खड़ी दिखी, उससे निश्चित ही महिलाओं को आगे के संघर्ष के लिए बुनियादी मनोबल हासिल होगा। सेना को आने वाले दिनों में अपने मानदंड सुधारने पड़ेंगे। यह धारणा पुरानी है कि महिलाओं का सेना में क्या काम। जब महिलाएं हर मोर्चे पर तैनाती के लिए तैयार हैं, तब उन्हें कौन किस आधार पर रोक सकेगा? जो योग्य महिलाएं हैं, जिनकी सेना में बने रहने की दिली तमन्ना है, उन्हें दस या बीस साल की नौकरी के बाद खोना नहीं चाहिए। उन्हें अफसर बनाकर उनके अनुभव का पूरा लाभ लेना चाहिए और पुरुषों के लिए तय उम्र में ही रिटायर करना चाहिए। उनको आगे बढ़ने से रोकने के लिए अलग मानदंड बनाना और तरह-तरह के बहानों से उनको कमांड या जिम्मेदारी देने की राह में बाधा बनना पुरुषवाद तो है ही, संविधान की अवहेलना भी है। बेशक, हर महिला मोर्चे पर नहीं जाएगी, लेकिन जो महिला जाना चाहेगी, उसे जाने देना ही सही न्याय है। बदले समय के साथ अब सेना की मानसिकता में बदलाव जरूरी है। हमारी सेना में महिलाओं की यथोचित भागीदारी उसे ज्यादा शालीन, सामाजिक, योग्य और कारगर ही बनाएगी।

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अप्रिय घटनाक्रम (हिन्दुस्तान)

बिहार विधानसभा में जो अप्रिय स्थिति बनी, उसकी प्रशंसा कोई नहीं करेगा। साथ ही, इस मामले में जिस तरह राजनीति बढ़ रही है, वह भी कतई शुभ संकेत नहीं है। बुधवार को भी विधानसभा परिसर में खूब हंगामा हुआ। विपक्षी नेताओं, कांग्रेस और राजद के विधायकों ने परिसर में आंखों पर काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन किया। इन विधायकों की मांग थी कि विधानसभा में विधायकों के साथ हुए दुव्र्यवहार के दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। बुधवार को विधानसभा की कार्यवाही में एक भी विपक्षी विधायक ने भाग नहीं लिया और बाद में कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करनी पड़ी। जो दुखद संकेत हैं, उससे यही लगता है कि अब अप्रिय स्थिति की गुंजाइश सदन में नहीं, बल्कि सड़कों पर बनेगी।


 बिहार की राजनीति में विपक्ष की मजबूती किसी से छिपी नहीं है और सरकार विपक्ष को राजी या नाराज रखने के लिए क्या कर सकती है, यह विधानसभा उपाध्यक्ष के चुनाव में प्रदेश ने देख लिया है। संभव है, विधानसभा उपाध्यक्ष के चुनाव में हार की आशंका से भी विपक्ष को विरोध तेज करने की प्रेरणा मिली हो। यह आज की राजनीति में कोई नई बात नहीं है। जो भी जहां सत्ता में है, वह विपक्ष को कोई मौका या पद देना नहीं चाहता, तो बढ़ती सियासी तल्खी को कैसे रोका जाए? मंगलवार को विधानसभा में जो हुआ है, उसके बाद तो बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 का मामला कुछ नेपथ्य में चला गया। 

इस विधेयक से विपक्ष की नाराजगी को समझना राजनीतिक रूप से भले जरूरी न हो, लेकिन अपराध रोकने के लिए सबको साथ लेकर चलना कितना जरूरी है, सब जानते हैं। बिहार में अब भी यदा-कदा ऐसी हिंसक घटनाएं हो जाती हैं, जिनके सामने हम पुलिस को हांफते देखते हैं। बिहार में आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए जान-माल की संपूर्ण सुरक्षा की बहाली कितनी जरूरी है, इसे प्रदेश के बाहर भी लोग समझने लगे हैं। दूसरे प्रदेशों में भी ऐसे कड़े कानून बने हुए हैं, जिनमें पुलिस को कुछ ज्यादा अधिकार दिए गए हैं। सरकार के अनुसार, नया कानून इसलिए लाया गया है, ताकि वर्तमान में कार्यरत बीएमपी को कुशल, प्रशिक्षित और क्षेत्रीय सशस्त्र पुलिस बल के रूप में विकसित किया जा सके। यह विधेयक किसी नए पुलिस बल का गठन नहीं करता, बल्कि 129 साल से सेवारत बिहार सैन्य पुलिस (बीएमपी) को विशेष सशस्त्र पुलिस बल के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखता है। शायद विपक्ष को विश्वास में लेने में कोई कमी रह गई। 


जहां तक विधानसभा में मारपीट का प्रश्न है, तो आलोचना के निशाने पर आए सुरक्षा बलों को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। सदन के अंदर किसी प्रतिनिधि से मारपीट सांविधानिक कृत्य नहीं है। जिन लोगों के हाथ जन-प्रतिनिधियों पर उठे हैं, वे कहां ड्यूटी करने लायक हैं, संविधान और लोक-व्यवहार की रोशनी में विचार कर लेना चाहिए। इसके साथ ही, विधायकों को भी ध्यान रखना होगा कि संविधान उन्हें अपनी बात रखने के लिए किस हद तक जाने की इजाजत देता है। सोचना ही चाहिए कि लोगों के बीच क्या संदेश गया है। क्या देश की विधानसभाओं में ऐसे दृश्य आम हो जाएंगे? क्या विधायकों को सुरक्षा बलों से मुकाबले के लिए तैयार होकर सदन में आना पड़ेगा? ऐसी कोई परंपरा नहीं बननी चाहिए, जो राज्य के दामन पर दाग बढ़ाती हो।

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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एक साल बाद (हिन्दुस्तान)

पिछले साल इन्हीं दिनों जिस लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी, उससे हम आज तक आजाद नहीं हुए हैं। भूलना कठिन है, संपूर्ण लॉकडाउन की अवधि चार बार बढ़ाई गई थी और उसके बाद से अब तक अनलॉक होने का सिलसिला चल रहा है। फिलहाल देश अनलॉक 10 से गुजर रहा है, मगर देश के करीब एक तिहाई हिस्से में फिर से लॉकडाउन का खतरा मंडरा रहा है। चिंता कायम है, सिर्फ यह महारोग ही मुसीबत नहीं है, उसके साथ समस्याओं का पूरा गिरोह सा चल रहा है। एक लाख साठ हजार से ज्यादा लोगों की मौत कोरोना से हुई है, लेकिन उससे कई गुना ज्यादा लोग अपनी माली हालत से बेहाल हुए हैं। कोरोना से हानि के अनेक आंकडे़ सामने आते रहते हैं और दिल केवल यही चाहता है कि जल्द से जल्द इससे मुक्ति मिले और इस चाह में लॉकडाउन से मुक्ति भी शामिल है। यह बहस तो अनंतकाल तक जारी रहेगी कि कोरोना ने ज्यादा नुकसान पहुंचाया या लॉकडाउन ने? यह बहस भी हमेशा रहेगी कि क्या लॉकडाउन ही बचाव का एकमात्र विकल्प था? 

इसी दुनिया में ताइवान जैसे देश भी हैं, जहां एक दिन भी लॉकडाउन नहीं लगा और बीमारी को भी पांव पसारने नहीं दिया गया। ताइवान का अध्ययन और अनुभव हमारे लिए उपयोगी हो सकता है। ऐसे तमाम देशों से हमें युद्ध स्तर पर सीखना चाहिए, जो बगैर लॉकडाउन के महामारी से लड़ गए। विशाल आबादी वाले भारत जैसे देश को यह सोचना और परखना होगा कि ऐसी संक्रामक बीमारियों की स्थिति में क्या हमारे पास लॉकडाउन ही एकमात्र विकल्प है? क्या हम अपना काम करते हुए, सामान्य जीवन जीते हुए किसी महामारी से नहीं लड़ सकते? यहां यह विवेचना भी महत्वपूर्ण है कि लॉकडाउन का हमने कितना आदर किया है? लॉकडाउन तोड़ने वाले कितने लोगों को जेल भेजा गया? हमारी स्वच्छंदता और तंत्र की उदारता कई बार विचलित कर देती है। लॉकडाउन ने जहां समाज के धैर्य की परीक्षा ली है, वहीं कोरोना ने हमें नई जीवनशैली के बारे में सोचने पर विवश किया है। शारीरिक दूरी बरतना एक स्वभाव है। पर चौराहे से धर्मस्थल तक परस्पर शारीरिक दूरी बनाए रखना क्या हमारे लिए संभव है? क्या हम यह बात समझ पाए हैं कि भीड़ में न सुरक्षा संभव है, न भक्ति और न स्वस्थ सभ्यता? इस महामारी के बाद हमारे शिक्षा पाठ्यक्रम में एक अलग अध्याय जोड़कर नागरिक शास्त्र पढ़ाने की जरूरत बहुत बढ़ गई है। विशेषज्ञ अभी यह नहीं बता पा रहे कि कोरोना कब जाएगा, तो यह बताना भी संभव नहीं कि लॉकडाउन की आशंका कब खत्म होगी, अत: आगे हमारी सुरक्षा का एक ही रास्ता है, हम खुद को और अपनी आने वाली पीढ़ियों को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत जीना सिखाएं। कोई शक नहीं, कोरोना ने हमारी चिंताओं को जितना बढ़ाया है, उससे कहीं ज्यादा चिंताएं लॉकडाउन की वजह से पैदा हुई हैं। आने वाले दिनों में समाज को ऐसी तैयारी करनी और दिखानी पड़ेगी, ताकि वह सरकार से कह सके कि बिना लॉकडाउन भी हम महामारियों से लड़ सकते हैं। वैसे समाजों, क्षेत्रों को पुरस्कृत-प्रोत्साहित करना भी जरूरी है, जिन्होंने लॉकडाउन और स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों की बेहतर पालना की है। उससे भी जरूरी है, उन विभागों, समूहों और लोगों का सम्मान, जो लॉकडाउन के समय समाज-देश के काम आए।

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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