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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Wednesday, April 7, 2021

जन स्वास्थ्य का संक्रमण (बिजनेस स्टैंडर्ड)

भारत में कोविड-19 संक्रमण के नए मामले रिकॉर्ड तेजी से बढ़ रहे हैं और महज 25 दिन में इनकी तादाद 20,000 रोजाना से बढ़कर 100,000 का आंकड़ा पार कर गई है। इस वजह से महाराष्ट्र और दिल्ली समेत देश के कई इलाकों में आंशिक लॉकडाउन और कर्फ्यू लागू किया जा रहा है। इसके बावजूद धार्मिक कार्य और चुनाव जो कोविड के प्रसार में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं, उन्हें कोविड-19 प्रोटोकॉल से एक तरह से छूट प्राप्त है। आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल से शुरू हुए महाकुंभ मेले तथा खासतौर पर असम और बंगाल के चुनाव प्रचार में मास्क पहनने और शारीरिक दूरी जैसे बुनियादी मानकों तक का पालन होता नहीं दिखता। ऐसा तब हो रहा है जब सामान्य नागरिकों को प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने पर जुर्माना भरना पड़ रहा है और कई लोग रोजगार गंवाने और रोजगार के कम अवसरों से परेशान हैं। इस बीच कोविड-19 की दूसरी लहर ने आपूर्ति शृंखला को बाधित करना तथा छोटे और मझोले उपक्रमों को संकट में डालना शुरू कर दिया है।

महाकुंभ इस बात का प्रबल और स्पष्ट उदाहरण है कि कोविड-19 के समय में कैसे लोग नियंत्रणहीन तरीके से भीड़ लगा रहे हैं। शुरुआती दौर में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कह दिया था कि कुंभ में आने वालों के लिए जांच आवश्यक नहीं है। इस संबंध में होर्डिंग लग गए और न केवल हरिद्वार बल्कि उत्तराखंड में भी कोविड-19 के मामले बढऩे लगे। स्वयं मुख्यमंत्री और कई नागा साधू कोविड संक्रमित पाए गए। हालांकि केंद्र ने रावत के आदेश को तत्काल रद्द कर दिया और कहा कि हर श्रद्धालु को 72 घंटे पुरानी आरटी-पीसीआर रिपोर्ट दिखानी होगी और मास्क तथा शारीरिक दूरी का पालन करना होगा। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। जनवरी में करीब 700,000 लोगों ने गंगा नदी में पवित्र स्नान किया और अप्रैल में निर्धारित स्नान में 50 लाख लोगों के शामिल होने की आशा है।


घाट पर स्नान के दौरान सीमित स्थान पर इतनी बड़ी तादाद में लोगों के एकत्रित होने पर सुरक्षा मानकों के पालन की बात सोची भी नहीं जा सकती। यदि सरकार जवाबदेही समझती तो 2020 की कांवड़ यात्रा की तरह महाकुंभ रद्द कर देती। असल फर्क यह है कि महाकुंभ के पहले केंद्र और राज्य सरकारों ने पर्यटन के बुनियादी ढांचे में जमकर निवेश किया है। इसे रद्द करने का मतलब होता स्थानीय पर्यटन कारोबार को नुकसान। यह चिंतित करने वाली बात है लेकिन सरकार कहीं अधिक कल्पनाशील विकल्प पर विचार करते हुए महाकुंभ का आयोजन न होने से बचने वाले प्रशासनिक व्यय को हर्जाने के रूप में वितरित कर सकती थी। महाकुंभ के मामले में प्रशासनिक स्तर पर वैसा रुख नजर नहीं आता जबकि नई दिल्ली में गत वर्ष मार्च में तबलीगी जमात के लोगों के एकत्रित होने पर जबरदस्त सांप्रदायिक आलोचना हुई थी। ध्यान दें कि रमजान के आसपास मक्का गए श्रद्धालुओं को उमरा से पहले टीका लगाया जाएगा या उन्हें यह प्रमाण देना होगा कि वे हाल में कोविड से पीडि़त रह चुके हैं।


सबसे बड़ी विडंबना यह है कि महाकुंभ में न्यूनतम सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू किए जाने पर द्वारका के शक्तिशाली शंकराचार्य नाराज हो गए। उन्होंने प्रतिबंधों की आवश्यकता पर प्रश्न करते हुए कहा कि जब प्रधानमंत्री मोदी और ममता बनर्जी की रैलियों में इनका उल्लंघन हो रहा है तो इनकी क्या जरूरत है। उन्होंने तंज किया कि वायरस चुनाव के दौरान नदारद हो जाता है और फिर वापस आ जाता है। उनकी बात में दम है। जब देश के सबसे ताकतवर नेता अनदेखी कर रहे हों तो प्रोटोकॉल कैसे लागू किया जाए। अभी भी बड़े पैमाने पर टीकाकरण होना शेष है। कोरोना की दूसरी लहर आर्थिक सुधार को प्रभावित कर सकती है। फिलहाल तो यही लग रहा है कि धर्म और राजनीति ने जन स्वास्थ्य को संक्रमित कर रखा है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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ढिलाई पर कड़ाई से लगे लगाम (हिन्दुस्तान)

जुगल किशोर, वरिष्ठ जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञ

अपने यहां कोरोना के नए मामले डराते हुए दिख रहे हैं। ब्राजील (रोजाना के 66,176 मामले औसतन) और अमेरिका (रोजाना के 65,624 मामले औसतन) को पीछे छोड़ते हुए भारत कोविड-19 का नया ‘हॉट स्पॉट’ बन गया है। देश में पहली बार संक्रमण के एक लाख से अधिक नए मामले बीते रविवार को सामने आए। यह शोचनीय स्थिति तो है, लेकिन फिलहाल बहुत घबराने की बात नहीं है। सोमवार को ही इसमें हल्की सी गिरावट आई है और उस दिन करीब 97 हजार नए कोरोना मरीजों की पहचान की गई। आखिर हमें घबराने की जरूरत क्यों नहीं है? असल में, मरीजों की यह संख्या इसलिए बढ़ी है, क्योंकि अब ‘जांच’ ज्यादा होने लगी है। जब जांच की रफ्तार बढ़ती है, तो नए मामलों की संख्या स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। अभी अपने यहां रोजाना 11 लाख से अधिक टेस्ट किए जा रहे हैं। यह पिछले साल की जून, जुलाई या अगस्त तक की स्थिति से भी बढ़िया है। नवंबर में ही जब दिल्ली में सीरो सर्वे किया गया था, तब करीब 50 फीसदी लोग संक्रमित पाए गए थे। कुछ जगहों पर तो इससे भी ज्यादा संक्रमण था। अगर इस आंकडे़ को संख्या में बदल दें, तो उस समय राजधानी दिल्ली में संक्रमितों की संख्या एक करोड़ से भी ज्यादा थी, जबकि आरटी-पीसीआर अथवा रैपिड एंटीजेन टेस्ट दो से तीन लाख लोगों को ही बीमार बता रहा था।

अभी संक्रमण का इसलिए प्रसार हो रहा है, क्योंकि फरवरी से लोगों का आवागमन बहुत बढ़ गया है। उस समय नए मामले कम आने लगे थे, टेस्ट भी कम हो रहे थे, वैक्सीन आने की वजह से लोग उत्सुक भी थे और उन्होंने ढिलाई बरतनी शुरू कर दी थी। अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर्मियों को भी वापस अपने विभागों में भेज दिया गया था। इन सबसे वायरस को नियंत्रित करने के प्रयासों में शिथिलता आ गई और फिर कोरोना वायरस का ‘म्यूटेशन’ भी हुआ। चूंकि, पिछले साल मामले दबे-छिपे थे, इसलिए आहिस्ता-आहिस्ता संक्रमण फैलता दिखा। मगर इस बार लोगों का आपसी संपर्क बहुत तेजी से बढ़ा। वे बेखौफ हुए और बाजार में भीड़ बढ़ाने लगे। नतीजतन, संक्रमण में रफ्तार आ गई।

यह अनुमान है कि 15-20 अप्रैल के आसपास इस दूसरी लहर का संक्रमण अपने शीर्ष पर हो सकता है। जिस तेजी से नए मामले सामने आ रहे हैं, उससे यह आकलन गलत भी नहीं लग रहा। मगर, संक्रमण की वास्तविक स्थिति इन अनुमानों से नहीं समझी जा सकती। अगर हमने बचाव के उपायों और ‘कंटेनमेंट’ प्रयासों पर पर्याप्त ध्यान दिया, तो मुमकिन है कि संक्रमण का प्रसार धीमा हो जाए। यह समझना होगा कि जब तक सौ फीसदी टीकाकरण नहीं हो जाता अथवा सभी लोग संक्रमित होकर रोग प्रतिरोधक क्षमता हासिल नहीं कर लेते, तब तक संक्रमण की रफ्तार कम-ज्यादा होती रहेगी। अभी हर संक्रमित व्यक्ति तीन से चार व्यक्तियों को बीमार कर रहा है। हमारा यह ‘रिप्रोडक्शन नंबर’ जब तक एक से कम नहीं होगा, संक्रमण में ऊंच-नीच बनी रहेगी। एक अच्छी स्थिति यह है कि मृत्य-दर में वृद्धि नहीं हुई है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमारा स्वास्थ्य-ढांचा पहले से बेहतर हुआ है। हम वैज्ञानिक तरीकों से कोरोना मरीजों का इलाज करने लगे हैं। टेस्ट के बजाय यदि संक्रमण की वास्तविक संख्या को आधार बनाएं, तो मृत्यु-दर एक फीसदी से भी कम होगी। देशव्यापी सीरो सर्वे भी यही बताएगा कि 60 फीसदी से अधिक आबादी में प्रतिरोधक क्षमता बन गई है, जो ‘हर्ड इम्युनिटी’ वाली स्थिति है। अब जो संक्रमण हो रहा है, वह अमूमन उन लोगों को हो रहा है, जो अब तक इस वायरस से बचे हुए थे। इसलिए ऐसे लोग जल्द से जल्द टीके लगवा लें अथवा अपनी गतिविधियों को काफी कम कर दें। इससे वे संक्रमित होंगे जरूर, पर आहिस्ता-आहिस्ता, जिससे उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं होगी। असल में, वायरस की मात्रा के हिसाब से मरीज हल्का या गंभीर बीमार होता है। हर शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता अलग-अलग होती है। यदि वायरस काफी अधिक मात्रा में शरीर में दाखिल हो जाए, तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता नाकाम हो सकती है। दोबारा संक्रमित होने अथवा टीका लगने के बाद भी बीमार होने की वजह यही है। टीका द्वारा वायरस की खुराक हमारे शरीर में पहुंचाई जाती है। जब उस सीमा से अधिक वायरस शरीर में आ जाता है, तब हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता जवाब दे जाती है। इसीलिए टीका लेने के बाद भी बचाव के तमाम उपाय अपनाने की सलाह दी जा रही है। इसी तरह, पूर्व में गंभीर रूप से बीमार मरीजों में रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है, जबकि हल्का संक्रमित व्यक्ति के दोबारा बीमार पड़ने का अंदेशा होता है। अपने देश में वैसे भी 90 फीसदी से अधिक मामले मामूली रूप से संक्रमित मरीजों के हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता तीन से छह महीने के बाद खत्म होने लगती है। मगर एक सच यह भी है कि टीका लेने के बाद यदि कोई बीमार होता है, तो उसकी स्थिति गंभीर नहीं होगी। अभी देश के कुछ राज्यों में जिस तरह से संक्रमण बढ़ा है, वह काफी हद तक लोगों की गैर-जिम्मेदारी का ही नतीजा है। अगर सभी मरीज अस्पताल पहुंच जाएंगे, तो डॉक्टरों पर दबाव बढे़गा ही। इसीलिए मामूली मरीजों को घर पर और हल्के गंभीर मरीजों को ऐसे किसी केंद्र पर इलाज देने की वकालत की जा रही है, जहां ऑक्सीजन की सुविधा उपलब्ध हो। गंभीर मरीजों को ही अस्पताल में भर्ती किया जाना चाहिए। इससे मरीजों को बढ़ती संख्या संभाली जा सकती है। मगर ऐसा नहीं हो रहा है, और फिर से लॉकडाउन लगाने की मांग की जाने लगी है। देखा जाए, तो अभी लॉकडाउन की जरूरत नहीं है। पहली बार यह रणनीति इसलिए अपनाई गई थी, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जा सके। हम इसमें सफल रहे, और आज हमारे पास पयाप्त संसाधन हैं। जनता की गतिविधियों को रोकने का एक तरीका लॉकडाउन जरूर है, लेकिन इससे लोगों को कई अन्य तकलीफों का ही सामना करना पड़ता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Tuesday, April 6, 2021

ठोस पहल जरूरी ( प्रभात खबर)

कोरोना महामारी की दूसरी लहर लगातार आक्रामक होती जा रही है. अमेरिका के बाद भारत दूसरा ऐसा देश बन गया है, जहां एक दिन में एक लाख से अधिक संक्रमण के मामले सामने आये हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वायरस के प्रसार, रोकथाम और टीकाकरण समेत विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की है. उन्होंने विशेषज्ञों का एक दल महाराष्ट्र भेजने का निर्देश दिया है, जो महामारी से सर्वाधिक प्रभावित है. ऐसी एक टीम पंजाब और चंडीगढ़ भी जा रही हैं, जहां मृत्यु दर बहुत अधिक है.

प्रधानमंत्री मोदी ने जांच और उपचार की व्यवस्था को बेहतर करने पर जोर दिया है ताकि जानें बचायी जा सकें. सरकार ने टीकाकरण अभियान को तेज करने तथा टीकों की समुचित खुराक मुहैया कराने के लिए निर्माता कंपनियों से उत्पादन बढ़ाने को कहा है. इसके अलावा अन्य देशी-विदेशी कंपनियों को भी निर्माण में लगाने की कोशिशें हो रही हैं. सरकार का मानना है कि मास्क पहनने, शारीरिक दूरी बरतने तथा हाथ धोते रहने जैसे निर्देशों के प्रति लोगों की लापरवाही संक्रमण की मौजूदा स्थिति का एक कारण हो सकती है.

विशेषज्ञ भी पहले इस कमी की ओर संकेत करते रहे हैं. इसे दूर करने के लिए एक सप्ताह का जागरूकता अभियान चलाने का सरकार का निर्णय स्वागतयोग्य है. इस प्रक्रिया में नागरिक संगठनों, समुदायों और मीडिया को भी पूरा योगदान करना चाहिए. बीते एक साल में तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए देश ने महामारी पर लगभग काबू पा लिया था.


इस अवधि में दो टीके भी मुहैया कराये गये हैं तथा दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान जारी है. शासन और विशेषज्ञों की लगातार चेतावनी और सलाह के बावजूद निर्देशों के पालन में जान-बूझकर हो रही चूक बेहद चिंताजनक है. यह लापरवाही न केवल ऐसा करनेवालों के लिए घातक है, बल्कि इससे उनके परिजन, सहकर्मी और संपर्क में आनेवाले लोगों के लिए भी जोखिम बढ़ जाता है.


जब इतने महीने तक हम अपने व्यवहार में सावधान रहे हैं, तो कुछ समय और संयम बरतने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. संक्रमण बढ़ने की स्थिति में पाबंदियों को कड़ाई से लागू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है. इससे हमारी ही मुश्किलें बढ़ती हैं. इसलिए हमारा ध्यान सतर्क रहने और टीका लगाने पर होना चाहिए.


अभी दस राज्यों में 90 फीसदी से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं. पिछले कुछ दिनों से संक्रमण जिस तेजी से पसरा है, उसे देखते हुए इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह अन्य राज्यों में भी फैल सकता है. बीते 52 दिनों में सात गुना मामले बढ़े हैं.


कस्बों और गांवों में वायरस के फैलाव को रोकना भी सरकार की प्राथमिकताओं में है क्योंकि ऐसे इलाकों में शहरों की तुलना में संसाधनों की कमी है. हमें बिना बेचैन हुए निर्देशों और पाबंदियों के अनुपालन तथा आसपास के लोगों को सचेत करने पर ध्यान देना चाहिए.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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स्वशासी ग्राम पंचायत जरूरी ( प्रभात खबर)

 By अशोक भगत 


भारत की स्वतंत्रता का हम अमृत महोत्सव मना रहे हैं. इस मौके पर हमें अपने सर्वांगीण विकास का सिंहावलोकन करना चाहिए. ऐसा करते समय हम कतिपय मानदंडों को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं. उनमें सबसे महत्वपूर्ण गांवों का समेकित विकास है. प्रकृति और परंपराओं के अनुकूल गांव का विकास तभी संभव है, जब गांवों में स्वायत्त, स्वशासी और सभी दृष्टि से मजबूत प्रशासनिक ढांचे का निर्माण हो. इसके लिए ग्राम पंचायत ही एक मात्र विकल्प है.



देश के दो बड़े हिंदी भाषी राज्यों- उत्तर प्रदेश और बिहार, में पंचायत चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ हो गयी है. झारखंड में भी पंचायत चुनाव अपेक्षित है. प्राचीन भारत में भी पंचायती राज व्यवस्था अस्तित्व में रही है, लेकिन उसका स्वरूप वर्तमान पंचायती राज जैसा नहीं था. वह एक स्वायत्त इकाई होती थी और उसके पास राज परिषद के द्वारा प्रदत्त असीम अधिकार थे. गांव के न्याय एवं शासन संबंधी कार्य 'ग्रामिक' द्वारा संचालित किये जाते थे.



इसका निर्देशन अनुभवी जनों के एक परिषद द्वारा होता था, जिसमें मुख्य रूप से वृद्ध व्यक्ति होते थे. ग्रामिकों के ऊपर 5-10 गांवों की व्यवस्था के लिए 'गोप' एवं लगभग एक-चौथाई जनपद के लिए 'स्थानिक' होते थे. यह प्रशासनिक ढांचा अपने क्षेत्र में कर लगाने और वसूलने के लिए केंद्रीय शासन द्वारा अधिकृत था. प्राचीनकाल से आदिवासी समाज में मांझी, परगनैत, मानकी मुंडा, राजी पड़हा आदि व्यवस्थाएं थीं.


तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा राजस्थान के नागौर जिले में 2 अक्तूबर, 1959 को पंचायती राज व्यवस्था लागू हुई. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया है. साल 1991 हुए 73वें संविधान संशोधन के तहत पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दी गयी. इस संबंध में पहले मुकम्मल अध्ययन कराया गया था.


इस व्यवस्था के अंतर्गत क्या-क्या हो और इसका स्वरूप कैसा हो, इसके लिए सबसे पहले बलवंत राय मेहता के नेतृत्व में 1956 में एक समिति गठित हुई थी. इसके बाद अशोक मेहता के नेतृत्व में 1977 में एक समिति बनी. फिर जीवीके राव समिति ने 1985 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. फिर डॉ एलएम सिंघवी समिति की रिपोर्ट 1986 में आयी.


इन तमाम रिपोर्टों व सिफारिशों पर गहन मंथन के बाद शासन इस निर्णय पर पहुंचा कि जब तक ग्रामीण क्षेत्र में स्वशासी इकाई गठित नहीं होगी, तब तक ग्रामीण भारत का चित्र नहीं बदल सकता है. संपूर्ण भारत में 24 अप्रैल, 1993 को पंचायती राज व्यवस्था लागू कर दी गयी. इस तरह महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना को धरती पर उतार तो दिया गया, लेकिन वह अभी तक साकार नहीं हो पायी है.


आधुनिक पंचायती राज व्यवस्था का प्रशासनिक ढांचा त्रिस्तरीय है. इसमें ग्राम पंचायत, पंचायत समिति या मध्यवर्ती पंचायत तथा जिला पंचायत शामिल हैं. ग्राम सभा की स्थापना, हर पांच वर्ष में नियमित चुनाव, अनुसूचित जाति, जनजाति, महिला एवं पिछड़ी जाति के लिए समुचित आरक्षण, पंचायतों की निधियों में सुधार के लिए उपाय सुझाने हेतु राज्य वित्त आयोगों का गठन, राज्य चुनाव आयोग का गठन आदि इसके सांगठनिक संरचना का हिस्सा हैं.


पंचायतों को आवश्यक शक्तियां और अधिकार दिये गये हैं. इनमें पंचायत को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करना, उनका निष्पादन करना, कर, शुल्क आदि लगाने और वसूलने का अधिकार है. भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल की तरह अम्बुड्समैन का प्रावधान भी है, जो कहीं लागू नहीं है.


आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक व जनोपयोगी बनाने के लिए संसद में पंचायत उपबंध विस्तार अधिनियम (पेसा), 1996 पारित किया गया. इसमें जनजाति समाज को कई अधिकार मिले हैं, जैसे- ग्राम सभा को आदिवासी समाज की परंपरा, रीति-रिवाज, सांस्कृतिक पहचान, समुदाय, स्थानीय संसाधन और विवाद समाधान के लिए परंपरागत तरीकों के इस्तेमाल का अधिकार है. विडंबना यह है कि इसके बावजूद किसी जनजाति बहुल प्रदेश ने इस कानून को पूरी तरह लागू नहीं किया है.


पंचायती राज की अपेक्षाओं के पूरा नहीं होने के लिए सरकारी उदासीनता, अनर्गल प्रशासनिक हस्तक्षेप और भयंकर भ्रष्टाचार जिम्मेदार हैं. इन बीमारियों को जब तक ठीक नहीं किया जायेगा, पंचायती राज व्यवस्था से ग्रामीण भारत का विकास कतई संभव नहीं है. यदि ग्राम स्वराज्य का लक्ष्य प्राप्त करना है, तो पंचायती राज को प्रशासनिक हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा.


इसे संविधान सम्मत अधिकार देना होगा. ग्राम सभाओं को गतिशील व जागरूक बनाना होगा. वित्तीय अनियमितता व चुनावी अपव्यय पर निगरानी के लिए प्रभावी आयोग का गठन करना होगा. कुछ आलोचकों के अनुसार, इस व्यवस्था के कारण ग्रामों के सामाजिक एवं आर्थिक ताने-बाने में गिरावट आयी है तथा भाई-भतीजावाद, जातिवाद व धन का दुरुपयोग आदि समस्याएं बढ़ रही हैं. इनका समाधान भी सशक्त और स्वावलंबी ग्राम पंचायतों में ही निहित है.


यदि सरकार सचमुच पंचायती संस्थाओं को मजबूत करना चाहती है, तो चयनित प्रतिनिधियों को पेशेवर प्रशिक्षकों से प्रशिक्षित कराये. अभी प्रशिक्षण के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है. प्रचार और जन-जागरण भी जरूरी है. इन तत्वों का नियोजन कर पंचायती राज संस्थाओं को सुचारू, व्यवस्थित एवं ताकतवर बनाया जा सकता है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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भारतीय थाली को ट्यूना की क्या जरूरत ! (पत्रिका)

मेनका गांधी

अमरीका में खाद्य एवं औषधि विभाग ने पीले रंग के फिन वाली ट्यूना फिश के सारे उत्पाद बाजार से वापस लेने का आदेश दिया है। इसका कारण है कि इन उत्पादों से एक खास प्रकार की फूड पॉइजनिंग, स्कोम्ब्रॉइड फिश पॉइजनिंग का डर है। ऐसा तब होता है, जब लोग ऐसी मछली का सेवन कर लेेते हैं, जो हिस्टमीन नामक तत्व से दूषित हो चुकी हो। हिस्टमीन के कारण शरीर में एलर्जी के लक्षण दिखाई देते हैं।

यह दोष तब आता है जब फिश को समुचित रूप से फ्रीज नहीं किया जाता और बैक्टीरिया त्वचा के जरिये फिश के अंदर चला जाता है और वह उच्च स्तरीय हिस्टमीन से दूषित हो जाती है। स्कोम्ब्रॉइड पॉइजनिंग की पहचान यह है कि दूषित मछली के सेवन के बाद मुंह में जलन होने लगती है, मुंह सूज जाता है, त्वचा पर रैशेज दिखने लगते हैं और खुजली होती है। मरीज में जी घबराने, उल्टी और डायरिया के लक्षण दिखाई देते हैं। मुुंह लाल हो जाता है, सिर दर्द और बेहोशी के साथ ही कई बार आंखों के आगे अंधेरा छा जाना, पेट में ऐंठन, सांस लेने में तकलीफ होना एवं दम घुटने का आभास होना या मुंह का स्वाद बिगड़ जाना कुछ अन्य लक्षण हैं। ये लक्षण मछली के सेवन के बाद पांच से तीस मिनट के बीच ही दिखाई देने शुरू हो जाते हैं। कुछ घंटों में ये ठीक हो जाते हैं लेकिन कई लोगों में ज्यादा दिन तक ये लक्षण दिखाई देते हैं, उन्हें एंटी-हिस्टमीन लेने से लाभ हो सकता है। कई बार मरीज को आपात स्थिति में अस्पताल भी ले जाना पड़ता है। अस्थमा व दिल के रोगियों के लिए हिस्टमीन फूड पॉइजनिंग जानलेवा हो सकती है। इसके लक्षण हृदय रोग जैसे भी हो सकते हैं, इसलिए रोग की जांच में उचित चिकित्सीय सावधानी की जरूरत है। भारत के चिकित्सा समुदाय में इस संबंध में व्यापक जानकारी का अभाव है।

ट्यूना फिश के अलावा माही-माही, ब्लू फिश, सार्डिन, एन्कॉवी और हैरिंग नामक मछलियों में भी हिस्टमीन की आशंका पाई जाती है। मछलियों के अलावा हिस्टमीन अन्य खाद्य पदार्थों जैसे चीज, वाइन, अचार और स्मोक्ड मीट में भी पाया जा सकता है। अमरीकी बाजारों से लिए गए ट्यूना उत्पादों में हिस्टमीन लेवल मानक 50 पीपीएम से कहीं अधिक पाया गया। इन उत्पादों में यह 213 से 3,245 पीपीएम के बीच था। बर्गर और सैंडविच में इस्तेमाल होने वाला ट्यूना कई बार फ्रीजर से निकाल कर वापस रख दिया जाता है जबकि यह तापमान के उतार-चढ़ाव और बैक्टीरिया दोनों से ही प्रदूषित हो सकता है। सुशी, सैंडविच और सलाद में ट्यूना कच्ची प्रयोग की जाती है जबकि फिलेट्स, स्टीक्स और बर्गर में यह पकी हुई होती है। तेल, खारे पानी, पानी और सॉस में डिब्बाबंद मिलने वाली ट्यूना फिश का इस्तेमाल सैंडविच और सलाद में किया जाता है। कैन में भी बैक्टीरिया जनित हिस्टमीन जीवित रह सकता है। ट्यूना फिश को पकड़ते ही फ्रीज करने की जरूरत होती है लेकिन भारतीय मछुआरे तेज धूप में इसे कुछ घंटों बाद बंदरगाह पहुंचाते हैं। वहां से यह रेफ्रिजरेटेड ट्रकों में भेजी जाती है। विषाक्त मछली के सेवन से दुनिया में जितनी भी मौतें होती हैं, उनमें संभवत: हिस्टमीन ही बहुत बड़ा कारण है। ट्यूना फिश, गिल-जाल में पकड़ी जाती हैं, जान बचाने की जद्दोजहद में इनकी त्वचा छिल जाती है और जब तक इन्हें जाल से निकाला जाता है, हिस्टमीन बन जाता है। भारत में ट्यूना फिश खुले में बिना बर्फ पर रखे बेची जाती है, जबकि इसे पानी से निकालते ही फ्रीजर में रखना जरूरी होता है। इसलिए यहां हिस्टमीन को 100 पीपीएम से नीचे रखना मुश्किल है।

अब तक ट्यूना केरल और गोवा में ज्यादा बेची जाती थी और घरेलू बाजार में यह प्रमुख रूप से नहीं पाई जाती क्योंकि इसे यहां पारम्परिक तौर पर नहीं पकड़ा जाता। मत्स्य पालन और जैवविविधता संरक्षण के विश्व बैंक द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त प्रोजेक्ट और चेन्नई स्थित बे ऑफ बंगाल प्रोग्राम अंतर सरकारी संगठन (बीओबीपी-आइजीओ) के माध्यम सेे घरेलू ग्राहकों के बीच इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। केंद्रीय समुद्री मत्स्य शोध संस्थान के अनुसार भारतीय समुद्र में मछली की नौ प्रजातियां पाई जाती हैं लेकिन बाहर से लाई जाने वाली ट्यूना को सही ढंग से नहीं रखा जाता। अगर अमरीका और फ्रांस से प्रतिस्पद्र्धा करनी हो तो ज्यादा ट्यूना रखनी होगी, जिसके लिए ऑन बोर्ड रेफ्रिजरेशन की सुविधा सुनिश्चित करने की जरूरत है। परन्तु जो मछली स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, उसका प्रचार करना कहां तक उचित है? ट्यूना व कुछ अन्य मछलियों में मर्करी और धात्विक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर डालते हैं। बच्चों का तंत्रिका तंत्र वैसे भी विकसित होने की प्रक्रिया में होता है, इसलिए इस पर मर्करी का दुष्प्रभाव पड़़ सकता है। मार्च 2004 में अमरीका ने एक दिशानिर्देश जारी कर गर्भवती महिलाओं, नई माताओं और बच्चों को ट्यूना फिश का इस्तेमाल कम करने की सलाह जारी की थी। 2008 की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुशी ट्यूना की कुछ किस्मों में मर्करी का स्तर खतरनाक मात्रा में पाया गया था।

अंतरराष्ट्रीय सी-फूड सस्टेनबिलिटी फाउंडेशन के अनुसार हिन्द महासागर में पीले फिन वाली ट्यूना, प्रशांत महासागर में बिगये ट्यूना और उत्तरी अटलांटिक में अल्बाकोर ट्यूना पाई जाती हैं। पैसिफिक कम्यूनिटी सचिवालय द्वारा 2012 में जारी की गई ट्यूना फिशरी असेसमेंट रिपोर्ट 2010 के अनुसार, हर किस्म का ट्यूना मत्स्य पालन कम कर देना चाहिए। क्या भारतीय जलवायु में न रह सकने वाली ट्यूना का भारतीय थाली में होना जरूरी है?

जो मछली स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, उसका प्रचार करना कहां तक उचित है? ट्यूना व कुछ अन्य मछलियों में मर्करी और धात्विक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर डालते हैं।

(लेखिका लोकसभा सदस्य, पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता हैं)

सौजन्य - पत्रिका।
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एक और नदी जल विवाद... मिस्र व इथियोपिया में बढ़ रही टकराव की आशंका (पत्रिका)

एजेदीन सी. फिशर, (द पोस्ट के दूसरे जमाल खशोगी फेलो और 'द इजिप्टियन असैसिन' के लेखक)

नील नदी पर ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां डैम बनाए जाने और उसके संचालन को लेकर चल रही वार्ता विफल हो गई है, क्योंकि मिस्र को डर है कि कहीं इससे देश में सूखा न पड़ जाए। बीते सप्ताह मिस्र के राष्ट्रपति ने चेतावनी दी थी कि 'कोई भी मिस्र से पानी की एक बूंद भी नहीं ले सकता और अगर कोई ऐसा करना चाहता है तो कोशिश करके देख ले।' इसके अगले दिन ही मिस्र और सूडान ने 'नील ईगल्स' नाम से संयुक्त वायु सेना अभ्यास का ऐलान किया। सूडान भी काफी हद तक इथियोपिया से आने वाले नील नदी के पानी पर निर्भर है।

इस बीच इथियोपियाई सरकार बांध के जलाशय को भरने की योजना बना रही है। वह 2023 तक यह कार्य पूरा कर लेना चाहती है। 2015 में दोनों देशों ने इस बांध को लेकर एक समझौता किया थे, जो अब अर्थहीन हो गया है। मिस्र व सूडान ने हाल ही मध्यस्थता प्रस्ताव भी रखा, जिसे इथियोपिया ने नकार दिया। मिस्र की नील नदी का 85 फीसदी पानी ब्लू नील से आता है। मिस्र, जहां न के बराबर बारिश होती है, सदियों से पानी से जुड़ी तमाम जरूरतों के लिए इसी पानी पर निर्भर हैं। इसलिए इस पानी में कटौती मिस्र को अस्तित्व पर संकट की तरह लगती है। इथियोपिया (संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में 173वें पायदान पर) को लगता है कि इस जल स्रोत के बल पर वह देश के लोगों का जीवन स्तर सुधार सकता है।

सौजन्य - पत्रिका।
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बड़े खतरे की घंटी (जनसत्ता)

कोरोना की दूसरी लहर में भारत में संक्रमण जिस तेजी से फैल रहा है, वह और बड़े की खतरे की घंटी है। एक दिन में एक लाख से ज्यादा नए मामलों का सामने आना बता रहा है कि हालात बेकाबू हो चुके हैं। एक लाख से ज्यादा का आंकड़ा वह सरकारी आंकड़ा है जो जांच के बाद आया है। यह भी संभव है कि बड़ी संख्या में लोगों की जांच ही नहीं हुई हो या लोगों ने ही नहीं करवाई और वे संक्रमण से ग्रस्त हों।

इसलिए यह आंकड़ा सवा-डेढ़ लाख रोजाना भी हो तो हैरत नहीं होगी। हकीकत यह है कि हम फिर से महामारी की चपेट में आ गए हैं और हालात अब ज्यादा गंभीर हैं। देश में महामारी दस्तक के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब एक दिन में नए मामलों का आंकड़ा एक लाख से ऊपर निकल गया। दुनिया के लिहाज से भी देखें तो सबसे ज्यादा हालत अब हमारी खराब है। भारत दुनिया में पहला देश हो गया है जहां संक्रमण के नए मामले मिलने की रफ्तार सबसे ज्यादा है। अभी तक पहले नबंर पर अमेरिका और दूसरे पर ब्राजील था।

कुछ दिन पहले तक देश के आठ राज्यों में ही हालात गंभीर होने की बात थी, लेकिन अब यह संख्या बढ़ कर पंद्रह हो गई है। चिंता की बात ज्यादा इसलिए है कि नए मामले तब बढ़ रहे हैं जब देश में टीकाकरण का अभियान जोरों पर चल रहा है और एक दिन में पैंतीस लाख लोगों को टीका लगाने की उपलब्धि हासिल की जा चुकी है। फिर भी अगर संक्रमण बढ़ रहा है तो इसके पीछे कहीं न कहीं हमारी लापरवाही बड़ी वजह है और महामारी से जंग में यही सबसे बड़ी बाधा बन गई है


इसका सबसे कारण तो यही है कि महामारी को लेकर लोगों के भीतर डर खत्म हो गया है। इसलिए लोग मास्क पहनने, सुरक्षित दूरी और बार-बार हाथ धोने जैसे बचाव संबंधी उपायों का पालन भी नहीं कर रहे। बाजारों में पहले की तरह भीड़ उमड़ रही है। देशभर में कमोबेश यही स्थिति है। देश की सत्तर फीसद आबादी में एंटीबॉडी विकसित नहीं हुई है, इसलिए भीड़ के जरिए संक्रमण फैलने का खतरा और बढ़ गया है।

चुनावी राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के हालात भी नींद उड़ा देने वाले हैं। चुनावी रैलियों और सभाओं में राजनीतिक दल और आमजन जिस तरह से नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, वह बड़े संकट को न्योता देना है। पश्चिम बंगाल डॉक्टर्स फोरम ने तो चुनाव आयोग और राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिख कर चेताया भी है कि अगर जल्दी ही कोरोना से बचाव के लिए समुचित प्रबंध नहीं किए गए तो हालात विस्फोटक हो सकते हैं। एक मार्च से एक अप्रैल के बीच संक्रमण के नए मामलों में पश्चिम बंगाल में छह सौ पैंतालीस फीसद और तमिलनाडु में चार सौ चौरानवे फीसद का इजाफा हुआ है।

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में टीकाकरण की दर में सत्ताईस और असम में इकतालीस फीसद की गिरावट आई है। न राजनीतिक दलों को चिंता है न सभाओं-रैलियों में पहुंचने वालों को। प्रधानमंत्री बार-बार बचाव संबंधी नियमों का सख्ती से पालन करने पर जोर दे रहे हैं, संक्रमण रोकने के लिए पांच सूत्रीय रणनीति यानी जांच, संक्रमितों के संपर्कों का पता लगाने, इलाज, बचाव और टीकाकरण पर जोर दे रहे हैं। पर हैरानी होती है यह देख कर कि कहीं भी कोई भी इनका पालन नहीं कर रहा। यह लापरवाही की पराकाष्ठा है। जब हम ही संक्रमण से बचाव की कोशिशों पर पलीता लगाएंगे तो कैसे कोरोना को हराएंगे!

सौजन्य - जनसत्ता।
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इस्तीफे के बाद (जनसत्ता)

पिछले कई दिनों से चल रहे विवाद के बाद महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने आखिर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि होना यह चाहिए था कि जिस तरह के आरोप सामने आए थे, उसकी गंभीरता को देखते हुए उन्हें पहले ही खुद को कसौटी पर रख देना चाहिए था। राजनीति में आदर्श और नैतिकता के मद्देनजर यह वक्त का तकाजा भी था। लेकिन उन्होंने तब तक शायद मामले के टल जाने का इंतजार किया, जब तक बॉम्बे हाई कोर्ट ने पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह की याचिका की सुनवाई करते हुए आरोपों पर सीबीआइ जांच का आदेश नहीं दे दिया।

इससे पहले ऐसे आरोप सामने आ रहे थे कि गृह मंत्री जांच में दखल दे रहे हैं और इसके अलावा अदालत ने भी यह टिप्पणी की कि अनिल देशमुख गृह मंत्री हैं और इसलिए पुलिस निष्पक्ष जांच नहीं कर सकती है। इस लिहाज से देखें तो निश्चित रूप से अब इस मसले पर उनके इस पक्ष पर गौर किया जा सकता है कि सीबीआइ जांच को देखते हुए उनका पद पर बने रहना नैतिक रूप से सही नहीं है। अब यह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर निर्भर है कि आगे वे क्या रुख अख्तियार करते हैं। फिलहाल खबरों के मुताबिक उद्धव ठाकरे सरकार और अनिल देशमुख ने बॉम्बे हाइकोर्ट के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय जाने की बात कही है।

गौरतलब है कि मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख के खिलाफ जब भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे, तभी से यह माना जा रहा था कि इस मामले पर राज्य की राजनीति में भी उथल-पुथल तय है। स्वाभाविक ही वहां एक राजनीतिक विपक्ष के रूप में भाजपा ने इस मामले पर तीखा सवाल उठाया और मुद्दे के सभी पहलुओं की जांच और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की मांग की।

यों राजनीति की दुनिया में आरोप-प्रत्यारोपों पर खींच-तान चलती रहती है और शायद ही कोई दल अपने विपक्ष की बातों को बहुत गंभीरता से लेता है। लेकिन उच्च स्तर के पद पर रह चुके पुलिस अधिकारी के तबादले के बाद उनकी ओर से लगाया गया यह आरोप बेहद गंभीर है कि राज्य के गृह मंत्री ने उच्च पुलिस अधिकारी को हर महीने कथित तौर पर सौ करोड़ रुपए की उगाही का लक्ष्य दिया था। यों फिलहाल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की ओर से यही कहा जा रहा है कि इन आरोपों में तथ्य नहीं हैं, लेकिन अब मामला जहां तक पहुंच गया लगता है कि वहां यह सब सीबीआइ जांच के बाद ही साफ हो पाएगा।

दरअसल, मुंबई में जब उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर के पास विस्फोटक मिलने के मामले में वहां एक पुलिस अधिकारी की गिरफ्तारी हुई थी, तभी से यह लग रहा था कि सबसे सुरक्षित माने जाने वाले इलाके में कानून-व्यवस्था का यह मसला तूल पकड़ सकता है। खासतौर पर पूर्व पुलिस आयुक्त के पत्र के बाद अनिल देशमुख के राजनीतिक भविष्य को आशंकाएं खड़ी गई थीं।

महाराष्ट्र की राजनीति में अनिल देशमुख कुछ वैसे नेताओं के बीच अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे, जो एक छोटे अंतराल को छोड़ कर वहां की सरकार में खासी पैठ रखते रहे हैं। लेकिन अब उनके इस्तीफे के बाद देखना यह है कि जांच के बाद कैसी तस्वीर उभरती है। हालांकि अगर हाइकोर्ट की समय सीमा में जांच पूरी होती है तो दो हफ्ते के बाद इस मसले की गुत्थियां और ज्यादा स्पष्ट रूप से खुल सकती हैं। लेकिन ताजा घटनाक्रम यह बताने के लिए काफी है कि अब राज्य की राजनीति में सत्ता कायम रखने और उसे हासिल करने के लिए दांवपेच का नया दौर फिर शुरू हो सकता है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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फिर लगी आग, धधकते जंगल से आखिर कैसे निपटें (अमर उजाला)

रोहित कौशिक  

उत्तराखंड के जंगल एक बार फिर धधक रहे हैं। इस राज्य में एक अक्तूबर, 2020 से लेकर चार अप्रैल 2021 की सुबह तक जंगलों में आग लगने की 989 घटनाएं हो चुकी हैं। इन घटनाओं में 1297.43 हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश के उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में भी भीषण आग लग गई थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कभी प्राकृतिक कारणों से जंगलों में आग लगती है, तो कभी अपने निहित स्वार्थों के कारण जानबूझकर जंगलों में आग लगा दी जाती है। इस वर्ष फरवरी और मार्च का महीना औसत से ज्यादा गर्म रहा। इसलिए उत्तराखंड के जंगलों में भी आग लगने की आशंकाएं पहले ही बढ़ गई थी। कुछ समय पहले भी जंगलों में लगी आग से उत्तराखंड की जैवविविधता एवं पर्यावरण को काफी हानि हुई थी।

दरअसल जंगलों की आग से न केवल प्रकृति झुलसती है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार पर भी सवाल खड़ा होता है। गर्मियों के मौसम में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के जंगलों में आग लगने की घटनाएं अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। जंगलों में लगी आग से जान-माल के साथ-साथ पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। पेड़-पौधों के साथ-साथ  जीव-जन्तुओं की विभिन्न प्रजातियां जलकर राख हो जाती हैं। जंगलों में विभिन्न पेड़-पौधे और जीव-जन्तु मिलकर समृद्ध जैवविविधता की रचना करते हैं। पहाड़ों की यह समृद्ध जैवविविधता ही मैदानों के मौसम पर अपना प्रभाव डालती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसी घटनाओं के इतिहास को देखते हुए भी कोई ठोस योजना नहीं बनाई जाती है। एक अध्ययन के अनुसार, पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और समुद्र तटीय क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने की समस्या बढ़ती जा रही हैं।



इस आग से लोगों का स्वास्थ्य, पर्यटन, अर्थव्यवस्था और परिवहन उद्योग गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। पूर्व एशिया में तो आग की बारंबारता, उसका पैमाना, उससे होने वाली क्षति और आग बुझाने में होने वाला खर्च सभी कुछ बढ़ा है। जंगल में आग लगने की घटनाओं में वृद्धि के पीछे ज्यादा समय तक सूखा पड़ने, मौसम में बदलाव, बढ़ते प्रदूषण जैसे बहुत से कारक हैं। गौरतलब है कि दक्षिण एशिया में आग से नष्ट होने वाले 90 फीसदी जंगल भारत के हैं। पहाड़ों पर चीड़ के वृक्ष आग जल्दी पकड़ते हैं। कई बार वनमाफिया अपने स्वार्थ के लिए वनविभाग के कर्मचारियों के साथ मिलकर जंगलों में आग लगा देते हैं। यह विडंबना ही है कि पहाड़ों के जंगल हमारे लोभ की भेंट चढ़ रहे हैं। 

 

जंगलों में यदि आग विकराल रूप धारण कर लेती है, तो उसे बुझाना आसान नहीं होता है। कई बार जंगल की आग के प्रति स्थानीय लोग भी उदासीन रहते हैं। दरअसल हमारे देश में ऐसी आग बुझाने की न तो कोई उन्नत तकनीक है और न ही कोई स्पष्ट कार्ययोजना। विदेशों में जंगल की आग बुझाने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य होता है। पिछले दिनों नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जंगलों की आग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय और अन्य प्राधिकरण वन क्षेत्र में आग लगने की घटना को हल्के में लेते हैं। जब भी ऐसी घटनाएं घटती हैं, तो किसी ठोस नीति की आवश्यकता महसूस की जाती है। लेकिन बाद में सब कुछ भुला दिया जाता है। 


जंगलों में आग लगने से पर्यावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे तापमान में वृद्धि होने की आशंका रहती है। पिछले दिनों विश्व बैंक ने चेतावनी दी थी कि यदि तापमान वृद्धि पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो दुनिया से गरीबी कभी खत्म नहीं होगी। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से बांग्लादेश, मिस्र, वियतनाम और अफ्रीका के तटवर्ती क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादन को तगड़ा झटका लगेगा, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में सूखा कृषि उपज के लिए भारी तबाही मचाएगा। इससे दुनिया में कुपोषण के मामलों में वृद्धि होगी। इसके साथ ही उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में तूफान और चक्रवातों का प्रकोप बढ़ेगा। इसलिए अब समय आ गया है कि हम जंगलों की आग से निपटने के लिए ठोस योजनाएं बनाएं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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बुनियादी सिद्धांत का उल्लंघन (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सरकार ने यह तय किया है कि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के अनुपूरक के रूप में सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) के लिए 'पहले से तैयार' निस्तारण प्रक्रिया की आवश्यकता है और उसने इसके लिए एक अध्यादेश भी पेश कर दिया है। कहा जा रहा है कि एमएसएमई क्षेत्र पर महामारी के भारी असर ने ऐसी उन्नत ऋणशोधन-पूर्व प्रक्रिया को अनिवार्य बना दिया है। इस पैकेज में उस समय-सीमा पर जोर दिया जाएगा जो आईबीसी के ढांचे का हिस्सा थी। इसके तहत प्रक्रिया को 120 दिन में पूरा करने की जरूरत पर बल दिया जाएगा। एक अनौपचारिक तत्त्व यह रहा है कि निस्तारण पेशेवर की औपचारिक नियुक्ति के पहले कारोबार के संभावित खरीदार से निस्तारण को लेकर चर्चा की जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो कंपनी पर पूर्ववर्ती बोर्ड और प्रबंधन का नियंत्रण बना रहेगा जबकि निस्तारण की चर्चा चलती रहेगी। बस इसे निस्तारण पेशेवर अंजाम नहीं देगा। करीब एक वर्ष पहले सरकार ने आईबीसी के अधीन ऋणशोधन प्रक्रिया शुरू करने के लिए डिफॉल्ट की राशि एक लाख रुपये से बढ़ाकर एक करोड़ रुपये कर दी थी। यह कदम शायद एमएसएमई को बचाने के लिए उठाया गया था। उसके एक साल बाद यह निर्णय हुआ है। हालांकि उस वक्त भी सीमा बढ़ाने से उन एमएसएमई को नुकसान हुआ था जो परिचालन ऋणदाता थीं।

यह समझना आसान है कि इस बदलाव से सरकार की अपेक्षा क्या है और आखिर क्यों इसे जरूरी समझा गया। पहली बात, अभी भी आईबीसी के पास आने वाले मामलों में बड़ी तादाद छोटी कंपनियों की है। शायद यह सोचा गया होगा कि ऐसी कंपनियों के लिए पूर्व निर्धारित निस्तारण प्रक्रिया आईबीसी प्रक्रिया को सुसंगत बनाने में मदद करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि बड़े मामले समय पर निपटाए जा सकें। दूसरा, यह कहा जा रहा है कि एमएसएमई की कुछ विशिष्ट जरूरतें होती हैं। कई मामलों में उनका कोई एक ग्राहक हो सकता है। ऐसे में संकटग्रस्त संपत्ति के खरीदारों की कमी हो सकती है। यदि मौजूदा प्रवर्तक नाकाम होते हैं तो भारी पैमाने पर पूंजी का नुकसान हो सकता है। तीसरा, यदि बकाया राशि कम हो तो कर्जदाताओं को बदलाव के लिए मनाना आसान होगा। उस स्थिति में बैंकों समेत कर्जदाता शायद निस्तारण पेशेवर के अधीन या न्यायालय से अतिरिक्त सुरक्षा की मांग न करें। चौथा, अन्य क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्था कारगर रही है। अंत में, न्यायालय के बाहर निस्तारण और छोटी कंपनियों दोनों के लिए व्यवस्था में अंतर है जिसे यह अध्यादेश दूर कर सकता है।


ये चिंताएं जायज हैं और सरकार के प्रयास समझे जा सकते हैं। इसके बावजूद आईबीसी के एक बुनियादी सिद्धांत का ध्यान नहीं रखा गया। आईबीसी में हमेशा यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि पूंजी नष्ट न होने पाए बल्कि कारोबार को जवाबदेह बनाने की बात भी इसमें शामिल है। इसमें संकटग्रस्त परिसंपत्तियों की नीलामी की जानी है और प्रयास यह है कि कारोबार को डुबाने वाले पुराने मालिक उसे दोबारा न खरीद पाएं। दीर्घावधि में देश के पूंजीवाद को बचाए रखने के लिए यह निष्पक्षता आवश्यक है। अध्यादेश के पक्ष में सरकार की दलील मजबूत है लेकिन आईबीसी के मूल सिद्धांतों को दरकिनार करने के लिए अपर्याप्त है। प्रवर्तकों को उनकी कंपनियों का नियंत्रण नहीं मिलना चाहिए। यदि यह सिद्धांत कमजोर पड़ा तो समय के साथ बड़ी कंपनियां भी इसकी चपेट में आएंगी। यदि आईबीसी की सक्षमता ने ही एमएसएमई का निस्तारण रोक रखा है तो हल क्षमता तथा निस्तारण पेशेवरों की तादाद बढ़ाने में निहित है, न कि आईबीसी की क्षमता कम करने में।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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आर्थिक जगत में एक और तूफान की आहट (बिजनेस स्टैंडर्ड)

राजेश कुमार 

कोविड-19 संक्रमण के नए मामलों में लगातार इजाफे ने आर्थिक स्थितियों में सुधार को लेकर खतरा बढ़ा दिया है। आशा तो यही है कि वायरस पर जल्दी नियंत्रण कर लिया जाएगा और यह आर्थिक गतिविधियों को अधिक प्रभावित नहीं करेगा। परंतु देश के नीति निर्माताओं के लिए सिर्फ वायरस ही चुनौती नहीं है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जो परिस्थितियां बन रही हैं वे नीतिगत क्षेत्र की जटिलताएं बढ़ा सकती हैं। उदाहरण के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के ताजे मासिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि ऐसे बॉन्ड निवेशक सुधार की प्रक्रिया को क्षति पहुंचा सकते हैं जो मुद्रास्फीति बढ़ाने वाली मौद्रिक या राजकोषीय नीतियों की स्थिति में बॉन्ड बिकवाली करते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आरबीआई प्रतिफल में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत है लेकिन हालात नियंत्रित करने में दोनों पक्षों की भूमिका होती है।

हालिया दिनों में बॉन्ड प्रतिफल में इजाफा हुआ है और मुद्रा की बढ़ी हुई लागत सुधार की प्रक्रिया को बाधित कर सकती है। परंतु आरबीआई का आकलन कुछ हद तक अतिरंजित लगता है। प्रतिफल बढऩे के पीछे कुछ बुनियादी वजह हैं और केंद्रीय बैंक को आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं है। सरकारी ऋण में भी काफी इजाफा हुआ है और वह निकट भविष्य में भी ऊंचे स्तर पर बना रह सकता है। मूल मुद्रास्फीति फरवरी में छह फीसदी के स्तर पर पहुंच गई और बढ़ती जिंस कीमतें शीर्ष दर को एक बार फिर बढ़ा सकती हैं।


यह बात भी ध्यान देने लायक है कि भारत इकलौता बाजार नहीं है जहां उधारी लागत बढ़ रही है। 10 वर्ष के अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल 2020 के निचले स्तर से 100 आधार अंक बढ़ चुका है। अमेरिका में उच्च प्रतिफल का असर वैश्विक वित्तीय तंत्र पर पड़ेगा। भारतीय बाजार भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। ऐसी चिंताएं हैं कि अमेरिका में 1.9 लाख करोड़ डॉलर का अतिरिक्त प्रोत्साहन कीमतों में इजाफा कर सकता है। अर्थशास्त्री लॉरेंस समर्स ने हाल ही में द वॉशिंगटन पोस्ट में एक आलेख में लिखा, '...ऐसी संभावना है कि सामान्य मंदी की स्थिति के बजाय द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर के स्तर का वृहद आर्थिक प्रोत्साहन ऐसा मुद्रास्फीतिक दबाव बनाएगा जो पीढिय़ों से नहीं देखा गया हो।' परंतु अमेरिकी फेडरल रिजर्व फिलहाल चिंतित नहीं है। फेड के चेयरमैन जेरोम पॉवेल का मानना है कि कीमतों में इजाफा अस्थायी होगा।


पॉवेल के चिंतित न होने की वजह है। वर्ष 2007-08 के वित्तीय संकट के बाद से ही मुद्रास्फीति अधिकांश समय 2 फीसदी के स्तर के नीचे बनी रही। इसके अलावा फेडरल रिजर्व कुछ समय के लिए उसे 2 फीसदी के दायरे से ऊपर जाने दे सकता है ताकि बीते वर्षों की कम कीमत की भरपाई हो सके। इससे वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ेगी। बाजारों को यह पता नहीं कि फेड किस समय क्या कदम उठाएगा। इसके अतिरिक्त प्रश्न यह भी है कि यदि मुद्रास्फीति फेड के अनुमान से बहुत अधिक ऊपर चली गई तो क्या होगा? विगत एक वर्ष में फेड की बैलेंस शीट करीब दोगुनी हो चुकी है और ऋण की लागत कम रखने के लिए वह निरंतर परिसंपत्तियां खरीद रहा है। फेडरल रिजर्व बोर्ड के सदस्यों के ताजा पूर्वानुमान बताते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के 2021 में 6.5 फीसदी की दर से विकसित होने की उम्मीद है। जबकि दिसंबर में 4.2 फीसदी वृद्घि का अनुमान जताया गया था। बहुत संभव है कि अतिरिक्त मौद्रिक समायोजन के कारण भारी राजकोषीय प्रोत्साहन उच्च वृद्घि के साथ-साथ मुद्रास्फीति में इजाफा करे।


चूंकि राजकोषीय हस्तक्षेप के आकार की तुलना दूसरे विश्वयुद्घ से की जा रही है इसलिए नतीजों पर ध्यान देना भी अहम है। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ सेंट लुइस ने गत वर्ष एक नोट में कहा था कि फेड ने सन 1942 में प्रतिफल को सीमित किया था ताकि उधारी लागत कम रखी जा सके। परंतु घाटे के लगातार बढ़ते रहने के कारण फेड ने सरकारी बॉन्ड एकत्रित करना जारी रखा। सन 1947 तक मुद्रास्फीति बढ़कर 17 फीसदी हो गई थी। आखिरकार सन 1951 में मुद्रास्फीति के 20 फीसदी का स्तर पार करने के बाद प्रतिफल को लक्षित करना बंद किया गया। यह जरूरी नहीं है कि मुद्रास्फीति उसी तरह बढ़ेगी। जापान में 2016 से प्रतिफल को निशाना बनाया जा रहा है लेकिन वहां कीमतें नहीं बढ़ीं। परंतु जापान जैसी मुद्रास्फीति अमेरिका और शेष विश्व के लिए अधिक दिक्कत खड़ी कर सकते हैं।


हालात अनिश्चित हैं जिससे बॉन्ड बाजारों में अनिश्चितता बढ़ रही है। परंतु एक बात तय है कि अमेरिका पहले जताए अनुमानों की तुलना में तेज वृद्घि हासिल करेगा। इसका अलग प्रभाव होगा। मसलन अमेरिका में उच्च वृद्घि पूंजी आकर्षित करेगी और डॉलर को मजबूत करेगी। इससे शेष विश्व में हालात तंग हो सकते हैं। वृद्घि और वित्तीय स्थिरता को भी जोखिम उत्पन्न हो सकता है। जिन उभरते बाजारों ने अल्पावधि के डॉलर वाला कर्ज लिया है उन्हें भी दिक्कत हो सकती है।


यकीनन भारत 2013 से बेहतर स्थिति में है। आरबीआई ने 2020 में अतिरिक्त विदेशी पूंजी की मदद से भंडार बनाकर बेहतर किया। इससे बाहरी मोर्चे पर अस्थिरता का प्रबंधन हो सकेगा। अमेरिका में बॉन्ड प्रतिफल का सामान्य होना भारत में पूंजी की आवक और ऋण लागत को भी प्रभावित करेगा। वृहद आर्थिक स्थिरता के क्षेत्र में भारत की स्थिति कमजोर कड़ी है। अमेरिका में उच्च वृद्घि जिंस कीमतों को प्रभावित कर सकती है और मुद्रास्फीति बढ़ा सकती है। ऐसे में आरबीआई को कई चुनौतियों का सामना करना होगा। उसे मुद्रा बाजार की अस्थिरता का प्रबंधन करना होगा, सरकार की बढ़ी उधारी और मुद्रास्फीति के दबावों से निपटना होगा तथा आर्थिक स्थिति बहाल करनी होगी।


आने वाले महीनों में घरेलू और अंतरराष्ट्र्रीय आर्थिक हालात को देखते हुए विरोधाभासी हालात बन सकते हैं। अर्थशास्त्री रॉबर्ट शिलर द्वारा एकत्रित आंकड़ों के अनुसार 10 वर्ष का अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल सन 1871 से ही औसतन 4.5 फीसदी रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में प्रतिफल अपेक्षाकृत कम रहा है क्योंकि मुद्रास्फीति कम रही लेकिन भारी राजकोषीय प्रोत्साहन, केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट में तेजी से विस्तार, मांग में इजाफा और बचत के कारण मजबूत पारिवारिक स्थिति से हालात बदल सकते हैं। ऐसे में वैश्विक वित्तीय बाजार में सही मायनों में तांडव देखने को मिल सकता है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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पानी की हर बूंद बचानी होगी जलवायु परिवर्तन के दौर में (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सुनीता नारायण 

हर साल 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। इस साल भी हमने यह दिन मनाया और पानी की महत्ता स्वीकार की। विश्व जल दिवस इस लिहाज से भी अलग था कि जलवायु परिवर्तन अपने शबाब पर है। यानी हमें हर वह काम करना होगा जो करने की जरूरत है। वर्षा-जल की हरेक बूंद को जमा कर पानी की उपलब्धता बढ़ानी है, इसका इस्तेमाल इतने कारगर ढंग से करना है कि वर्षा-जल की हरेक बूंद का इस्तेमाल हमारे भोजन या फ्लश होने वाले पानी में हो। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि इस्तेमाल पानी की हरेक बूंद का पुनर्चक्रण हो और प्रदूषण से वह खराब न हो। हम यह बात पहले से जानते हैं और अमल में भी लाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में इतना ही काफी नहीं होगा। हमें ये सारे काम कहीं अधिक तेजी से और व्यापक स्तर पर अलग ढंग से करने होंगे।


हमें मालूम है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का ताल्लुक गर्मी और कम-ज्यादा बारिश से है। इन दोनों का जल चक्र से सीधा सह-संबंध है। इस तरह जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए पानी एवं उसके प्रबंधन पर ध्यान देना होगा।


हमें पता है कि हर नया साल इतिहास का सर्वाधिक गरम साल बनता जा रहा है और पिछले रिकॉर्ड को तोड़ता जा रहा है। भारत में ओडिशा के कुछ हिस्सों में तापमान फरवरी की शुरुआत में ही 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया था। उत्तर भारतीय राज्य बढ़ती गर्मी एवं सामान्य से अधिक तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह सब 'ला नीना' के साल में हो रहा है। ला नीना प्रशांत महासागर की वे जल धाराएं हैं जो दुनिया का तापमान कम करने के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं। लेकिन भारत के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक ताप वृद्धि ने ला नीना के इस शीतकारी प्रभाव को कम कर दिया है।


बढ़ती हुई गर्मी का जल सुरक्षा के लिहाज से कई मायने हैं। पहला, इसका मतलब है कि जल इकाइयों से अधिक वाष्पीकरण होगा। यानी हमें न सिर्फ लाखों जल निकायों में पानी जमा करने पर ध्यान देने की जरूरत है बल्कि वाष्पन के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भी योजना बनानी होगी। एक विकल्प भूमिगत जल भंडारण यानी कुओं पर काम करने का है। भारत लंबे वक्त से भूमिगत जल प्रणालियों के प्रबंधन को कम तवज्जो देता रहा है क्योंकि सिंचाई विभाग की समूची अफसरशाही ही नहरों एवं अन्य सतही जल प्रणालियों पर आधारित है। लेकिन जलवायु परिवर्तन एवं पानी की भारी किल्लत के इस दौर में इसे बदलने की जरूरत होगी। हमें तालाबों, पोखरों एवं नहरों से होने वाले नुकसान की भरपाई के तरीके तलाशने होंगे। ऐसा नहीं है कि वाष्पीकरण से पहले नुकसान नहीं होता था लेकिन तापमान बढऩे के साथ इसकी दर बहुत ज्यादा हो गई है। हमें योजना बनाने और अधिक काम करने की जरूरत है।


दूसरा, बढ़ती गर्मी का मतलब है कि मिट्टी में नमी कम होती जाएगी जिससे जमीन में धूल की मात्रा बढ़ जाएगी और सिंचाई की जरूरत बढ़ती जाएगी। भारत जैसे देश में जहां भोजन का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा-सिंचित इलाकों में ही पैदा होता है, वहां पर मिट्टी की नमी कम होने से भूमि अपरदन तेज होगा और धूल का बनना भी बढ़ जाएगा। जल प्रबंधन को वनस्पति नियोजन के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा ताकि मिट्टी में पानी को रोके रखने की क्षमता बेहतर हो, अधिक देर तक चलने वाली तीव्र गर्मी के दौर में भी।


तीसरा, साफ है कि गर्मी बढऩे से पानी का इस्तेमाल बढ़ जाएगा क्योंकि पीने एवं सिंचाई के साथ ही जंगलों या इमारतों में लगी आग बुझाने के लिए भी ज्यादा पानी की दरकार होगी। हम दुनिया के कई हिस्सों एवं भारत में भी जंगलों में भीषण आग लगने के डरावने दृश्य देख चुके हैं। तापमान जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा, यह सिलसिला भी तेज होता जाएगा। जलवायु परिवर्तन से पानी की मांग बढ़ेगी लिहाजा यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम पानी के साथ अपशिष्ट जल को भी बरबाद न करें।


सच यह है कि अत्यधिक बारिश होने की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। हम बारिश के एक बाढ़ के तौर पर आने की भी अपेक्षा करें। इस तरह बाढ़ों का एक चक्र पूरा होने के बाद सूखे की स्थिति और भी गंभीर हो। भारत में पहले से ही साल में बारिश कम दिन होती है। साल भर में औसतन सिर्फ 100 घंटे की ही बारिश होती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन बारिश वाले दिनों की संख्या और कम करेगा। वैसे भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ जाएगी।


इसका जल प्रबंधन की हमारी योजनाओं पर बड़ा असर होगा। हमें बाढ़ प्रबंधन पर अधिक शिद्दत से गौर करने की जरूरत है, नदियों के तटबंध बनाने के साथ ही बाढ़ के पानी को भूमिगत एवं सतहीय जलभंडार निकायों-कुओं एवं तालाबों में जमा किया जा सके। लेकिन हमें वर्षाजल को इक_ा करने के बारे में अलग तरह से योजना बनाने की जरूरत है।


फिलहाल मनरेगा के तहत लाखों की संख्या में बन रहे तालाब एवं पोखर सामान्य बारिश के हिसाब से डिजाइन हैं। लेकिन अब भारी बारिश की बात आम होने के साथ ही ये जल भंडार संरचनाओं को भी नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत है ताकि वे लंबे समय तक लबालब रहें। मूल बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें पानी की हर बूंद बचानी होगी, चाहे बारिश का पानी हो या बाढ़ का पानी।


हमें पानी एवं उसके प्रबंधन को लेकर पहले जुनूनी होना था लेकिन अब तो सेहत एवं दौलत के आधार पानी को लेकर हमें संकल्पित एवं सुविचारित रवैया अपनाना होगा। यह अपने भविष्य को बनाने- बिगाडऩे की बात है।


(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कानून के लंबे, लेकिन झूलते हाथ ( हिन्दुस्तान)

विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी

कहावत है कि कानून के हाथ बड़े लंबे होते हैं और अपराधी लाख कोशिश करे, उससे बच नहीं सकता। पर इस बार सच सिद्ध होते-होते भी इसने कुछ ऐसे भयावह यथार्थ से हमारा सामना कराया है कि हममें से बहुत समझ ही नहीं पाए कि हम इन अपराधियों के जरिए अपने ही समाज का चेहरा देख रहे हैं। सिर्फ दो राज्यों, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की ये दो आपराधिक गाथाएं यद्यपि एक-दूसरे से जुड़ी नहीं हैं, लेकिन दोनों समान रूप से इशारा कर रही हैं कि अपराधी के बदले प्रोफाइल ने उसे किस कदर सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान बना दिया है!

हममें से बहुत से लोगों को यह पढ़कर अविश्वसनीय लगा होगा कि सचिन वाजे नाम के एक अपराधी पुलिस इंस्पेक्टर को उसके राजनीतिक आका ने मुंबई के सिर्फ एक क्षेत्र- बार और नाइट क्लबों से प्रतिमाह 100 करोड़ रुपये इकट्ठा करने का दायित्व सौंप रखा था। इनसे कम कमाऊ  नहीं हैं भवन-निर्माण, तस्करी या फिल्म निर्माण जैसे क्षेत्र। इन सबको जोड़ लें, तो सिर चकरा सकता है, पर अब इसे सच मानना होगा। इसी तरह, उत्तर प्रदेश के मुख्तार अंसारी की बार-बार लिखी-सुनी कहानी का सद्य:रचित अध्याय एक ऐसा प्रोफाइल निर्मित करता है, जिस तक पहुंचते-पहुंचते कानून के लंबे हाथ भी कई बार असहाय से झूलने लगते हैं। मुख्तार की कहानी किसी मुंबइया फिल्म की तरह रोचक है। एक बेहद चालाक और क्रूर अपराधी कैसे राजनीति, तंत्र और अर्थशास्त्र का चतुर इस्तेमाल कर इतना ताकतवर हो जाता है कि पुलिस, जेलें और अदालतें भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पातीं। इसे समझने के लिए मुख्तार की जीवन यात्रा को पढ़ना होगा। मुख्तार ने चुनावी गणित की खामियों का भरपूर फायदा उठाया है। जाति, धर्म, पैसा और बाहुबल इत्यादि सारे समीकरण उसके पक्ष में थे। उत्तर प्रदेश की दो महत्वपूर्ण पार्टियों ने अलग-अलग समय पर उसका इस्तेमाल किया या यूं कहें कि वह इनका उपयोग ऊपर चढ़ने की सीढ़ी की तरह करता रहा। पिछले कई दशकों में अलग-अलग चुनाव चिन्हों पर वह माननीय बनने में कामयाब हुआ। चालाकी और क्रूरता उसकी सफलता के मुख्य औजार थे। चालाकी का हाल यह था कि बार-बार धोखा खाने के बाद भी एक निश्चित कालखंड में भिन्न दलों के नेता उसे अपना सबसे नजदीकी मानते रहे। क्रूरता का एक ही उदाहरण उसके व्यक्तित्व को समझने में मददगार सिद्ध होगा। कहा जाता है, वर्ष 1996 में विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी रुंगटा का इसने अपहरण कराया, उनकी हत्या कर शव इलाहाबाद में गंगा में फिंकवाकर बिना किसी भावनात्मक उद्वेग के उनके परिजनों को विश्वास में लेकर अपहृत की तलाश का नाटक करता रहा। इस बीच परिवार से फिरौती के रूप में कई करोड़ रुपये भी झटक लिए गए। उसे पता था कि अपराध की दुनिया में सफलता के लिए चालाकी और क्रूरता जरूरी सोपान हैं। इस पूरी गाथा में पुलिस उपाधीक्षक शैलेंद्र प्रताप सिंह के प्रसंग इसे किसी ग्रीक दुखांतिका में तब्दील कर देते हैं। कहानी में यह मोड़ आता है 2003- 04 में, जब वर्दी के जोश में आदर्शवाद से लबरेज एक पुलिस अधिकारी अपराध से सीधे भिड़ने का साहस करता है और नतीजतन, उसे इस्तीफा देना पड़ता है। मुख्तार का तो कुछ नहीं बिगड़ता, उल्टा उसी के खिलाफ मुकदमे कायम होते रहते हैं। एक मुकदमे से अभी हाल में वह बरी हो सका है। तब के मुख्यमंत्री ने फौज से एक लाइट मशीन गन की चोरी और संभावित अपराध में इसके इस्तेमाल की योजना को नजरंदाज करके उसके खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी और नतीजा हमारे सामने है। एक माफिया कानून से ऊपर जाकर फलता-फूलता रहा और दूसरा कर्तव्य परायण पुलिस अधिकारी कहानी में अपना अंश सुनाते-सुनाते मीडिया के सामने रोने लगता है। सचिन वाजे और शैलेंद्र प्रताप सिंह के रास्ते अलग थे, लेकिन इनकी कहानी एक जैसी ही है। दोनों ही अपराध के जरिए अकूत धन और ताकत हासिल करने की दिलचस्प दुनिया हमारे सामने उद्घाटित करते हैं। फर्क इतना है कि एक का नायक इस तिलिस्म को तोड़ने का प्रयास करता है और दूसरा खुद इसका सक्रिय अंग बन जाता है। शैलेंद्र प्रताप सिंह की जलालत देखकर किसी भी पुलिस अधिकारी को सचिन वाजे बनना ज्यादा आकर्षक लग सकता है।

मुख्तार और वाजे, दोनों को राज्य सरकारों ने बचाने की आखिर तक कोशिश की। मुख्तार को सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के चलते पंजाब से उत्तर प्रदेश भेजना मुमकिन हुआ और वाजे केंद्र व राज्य की संस्थाओं के क्षेत्राधिकार की अस्पष्टता के चक्कर में फंसकर जेल गया। अपराध को लेकर यह ज्यादा चिंताजनक पहलू है। राज्य यदि इतनी बेशर्मी से अपराधियों के पक्ष में खड़ा दिखेगा, तो हम अनुमान ही लगा सकते हैं कि उनकी बेशुमार ताकत में कितना कुछ और जुड़ जाएगा। अभी ही उनके बाहुबल, धनबल और राजनीतिक आकाओं के चलते अक्सर कानून के हाथ उनके सामने छोटे लगने लगते हैं, अगर राज्य भी खुलकर उनके साथ दिखने लगे, तब तो मुहावरे का यह हाथ हमेशा लुंज-पुंज झूलता ही नजर आएगा। अपराध की दुनिया का यह भयावह यथार्थ है कि राज्य की सारी संस्थाएं अपराधियों के सामने बौनी पड़ती जा रही हैं। वाजे अगर महीने भर में एक ही महानगर के एक सेक्टर से 100 करोड़ रुपये वसूल सकता है, तो अंदाज लगाया जा सकता है कि इस रास्ते से कितना धन कमाया जा सकता है। इसी तरह, मुख्तार के बाहुबल के आगे कौन गवाह अदालत में टिकेगा, यह समझना भी मुश्किल नहीं है। अपराधी किसी को भी खरीद सकते हैं, किसी को भी भयाक्रांत करके उसे समर्पण को मजबूर कर सकते हैं और अक्सर देश की पुलिस, अदालतें और जेल इनके सामने असहाय लगने लगती हैं। यही कारण है कि पुलिस द्वारा अपराधियों को खुद ही गैर-कानूनी तरीकों से दंडित किए जाने को  सामाजिक स्वीकृति मिल गई है। कोई इस पर गौर नहीं करना चाहता कि कथित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट सिस्टम से ही वाजे जैसा लुटेरा पैदा होता है। मुख्तार के समर्थकों के मन में भी खौफ है कि उसे उत्तर प्रदेश में झूठी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। अगर ऐसा हुआ, तो कोई अच्छा संदेश नहीं जाएगा। कानून के लंबे और निष्पक्ष हाथों की गवाही तो ऐसी कार्रवाई देगी, जो विधि-सम्मत हो और जिसमें एक सक्षम अदालत आरोपी को सफाई का पूरा मौका देकर उसे उसके किए की सजा दे। यह राज्य के लिए भी परीक्षा जैसा होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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नक्सलियों का नश्तर (नवभारत टाइम्स)

एक बार फिर छत्तीसगढ़ स्थित बीजापुर के जंगलों में नक्सलवादियों ने 22 जवानों को शिकार बनाया है। कैसी विडंबना है कि तीन सुरक्षा बलों के दो हजार जवान जिन नक्सलियों के सफाये के लिये गये थे उन्हीं की साजिश का शिकार बन गये। जाहिर तौर पर यह कारगर रणनीति के अभाव और खुफिया तंत्र की नाकामी का ही नतीजा है कि नक्सली हमारे जवानों को जब-तब आसानी से अपना निशाना बनाते हैं। जो सत्ताधीशों के उन दावों की पोल खोलता है, जिसमें वे नक्सलवाद के खात्मे के कगार पर होने की बात करते हैं। उनकी जड़ों के सही आकलन न कर पाने का ही नतीजा है कि तीन दशकों से हर बार नक्सलवादी अपने मंसूबों में कामयाब हो जाते हैं। शनिवार को बीजापुर व सुकमा की सीमा पर हुए हमले में सुरक्षा बलों को भारी क्षति उठानी पड़ी और वास्तविक तस्वीर सामने आने में वक्त लगा। रविवार को जाकर स्थिति स्पष्ट हुई है वास्तव में चौबीस जवान मारे गये हैं। जंगलों में जवानों के छितरे शव नक्सलियों की क्रूरता की कहानी कहते थे। अभी हाल ही में जवानों को ले जा रही बस पर हमले में भी पांच जवान मारे गये थे। देश छह अप्रैल, 2010 को नहीं भूला है जब दंतेवाड़ा में नक्सलियों के बड़े हमले में 76 जवान शहीद हो गये थे। तब भी नक्सलियों के सफाये की बातें हुई और योजनाएं बनी, लेकिन नक्सलियों की मजबूती बढ़ती गई। वर्ष 2013 को भी नहीं भुलाया जा सकता है जब छत्तीसगढ़ की जीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा को घेर कर नक्सलियों ने क्रूरता दिखायी थी। तब भी कई दिग्गज कांग्रेसियों समेत तीस लोगों के मरने की खबर आई थी। बीते वर्ष भी सुकमा में 17 जवानों की हत्या नक्सलियों ने कर दी थी। दरअसल, हर साल कुछ बड़े हमले करके नक्सली अपनी उपस्थिति का अहसास तंत्र को कराते रहे हैं। उन दावों को नकारते हैं कि नक्सलवाद आखिरी सांस ले रहा है।


ये सुनियोजित हमले यह भी बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में नक्सलियों की समानांतर सरकार चल रही है। इनके न हौसले कम होते हैं और न ही आधुनिक हथियारों व संसाधनों में कोई कमी आई है। गोला-बारूद की पर्याप्त आपूर्ति जारी है। वे छापामार युद्ध में इतने पारंगत हैं कि दो हजार प्रशिक्षित व सशस्त्र जवानों के समूह को आसानी से अपना निशाना बना लेते हैं। उनका खुफिया तंत्र सरकारी खुफिया तंत्र पर भारी पड़ता है। निस्संदेह जटिल भौगोलिक परिस्थितियां हमारे जवानों के लिये मुश्किल बढ़ाती हैं। इससे जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। लेकिन हमें इन हालातों से निपटने के लिये उन्हें प्रशिक्षित करने की जरूरत है। केंद्र राज्यों में बेहतर तालमेल से रणनीति बनाने की जरूरत है। अन्यथा जवानों के मारे जाने का सिलसिला यूं ही जारी रहेगा। सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्यों दशकों के बाद नक्सलवाद से निपटने की हमारी रणनीति कारगर नहीं हो रही है। कहीं न कहीं हमारी रणनीति की खामियां नक्सलियों को हावी होने का मौका देती हैं। खुफिया तंत्र की नाकामी भी एक बड़ी वजह है। यह भी एक विडंबना ही है कि नक्सलियों से बातचीत की कोई गंभीर पहल होती नजर नहीं आती। हमें उन कारणों की पड़ताल भी करनी है, जिसके चलते नक्सलवाद को इन इलाकों में जन समर्थन मिलता है। हमें सोचना होगा कि क्यों इन इलाकों में गरीब व हाशिये पर गये लोग सरकार के बजाय नक्सलियों का पर ज्यादा विश्वास करते हैं। इस समस्या का सामाजिक व आर्थिक आधार पर भी मंथन करना होगा। यह भी कि इन दुर्गम इलाकों में विकास की किरण क्यों नहीं पहुंच पायी है। सरकार का विश्वास लोगों में क्यों कायम नहीं हो पाता। दरअसल, नक्सली समस्या के सभी आयामों पर विचार करके समग्रता में समाधान निकालने की कोशिश होनी चाहिए। केंद्र व राज्य सरकारों के बेहतर तालमेल से ही यह संभव हो पायेगा। अन्यथा देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये यह खतरा और गहरा होता जायेगा। 

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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नक्सलियों का जाल (नवभारत टाइम्स)

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में शनिवार को नक्सलियों ने जिन हालात में और जिस तरह का हमला सुरक्षाबलों पर किया, वह न केवल नक्सल उन्मूलन की हमारी दीर्घकालिक नीति पर बल्कि खास ऑपरेशनों के लिए बनाई जाने वाली रणनीति से लेकर उसके अमल तक पर गहरे सवाल खड़े करता है। जो बात इस घटना को खास बनाती है वह मारे जाने या घायल होने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या मात्र नहीं है, हालांकि वह संख्या भी किसी लिहाज से कम नहीं मानी जा सकती। सबसे बड़ी बात यह है कि यह सामान्य गश्त पर जा रही टीम पर किया गया हमला नहीं है। 2000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी एक खास टारगेट के साथ एक विशेष ऑपरेशन पर भेजे गए थे। यह ऑपरेशन कई अलग-अलग स्रोतों से मिली खुफिया सूचनाओं पर आधारित था। वरिष्ठ अधिकारियों की देखरेख में पिछले कई दिनों से इस ऑपरेशन की तैयारी की जा रही थी। इतना सब कुछ होने के बाद भी बताई गई जगह पर कुछ नहीं मिला। ऐसा भी नहीं कि यह सब किसी अत्यंत दुर्गम जंगली इलाके में हुआ हो। अगले दिन पत्रकारों को मौके पर पहुंचने में न कोई खास दिक्कत हुई और न ज्यादा वक्त लगा क्योंकि कैंप और मेन रोड से घटनास्थल बमुश्किल आधे घंटे की दूरी पर बताया जाता है।


साफ है कि सूचना इकट्ठा करने और मिली सूचनाओं की प्रामाणिकता जांचने के हमारे तरीकों में बहुत बड़ी गड़बड़ियां हैं। इस मामले में न केवल सुरक्षा बलों तक गलत जानकारी विश्वसनीय ढंग से पहुंचाई गई बल्कि सुरक्षा बलों की तैयारियों और उनकी कार्रवाई से जुड़ी एक-एक सूचना भी नक्सलियों को मिलती रही। दूसरा सवाल कारगर और बड़े ऑपरेशन के बीच फर्क का है। क्या कथित नक्सली इलाकों में ज्यादा सुरक्षाकर्मियों वाले बड़े ऑपरेशनों के कारगर होने की भी संभावना रहती है? ताजा हमले ने यह जरूरत एक बार फिर रेखांकित की है कि सुरक्षा बलों के ऑपरेशन को अधिक से अधिक कारगर बनाने के तरीकों पर और ध्यान दिया जाना चाहिए। तीसरा और सबसे पुराना लेकिन बड़ा सवाल है नक्सलवाद के प्रति सरकार और प्रशासन के नजरिये का। पिछले वर्षों में इसे विशुद्ध रूप से कानून व्यवस्था की समस्या मानने का चलन बढ़ा है। इसमें दो राय नहीं कि कोई भी लोकतांत्रिक समाज बदलाव के हिंसक तरीकों को बर्दाश्त नहीं कर सकता। यह भी सही है कि हिंसा के प्रयासों को सख्ती से ही कुचलना होगा। लेकिन जिन वजहों से समाज का कोई खास हिस्सा हिंसक रास्ता अख्तियार करने वालों के झांसे में आता है, उन्हें दूर करना भी हमारी प्राथमिकता में होना चाहिए और हमारी यह प्राथमिकता समाज के उस हिस्से को नजर भी आनी चाहिए।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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छापों में राजनीति का रंग (नवभारत टाइम्स)

हमारी जांच एजेंसियां ठीक से जांच करके वास्तविक दोषियों तक पहुंचें और उन्हें कानून के मुताबिक सजा दिलाएं, यह जितना जरूरी है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि वे ऐसा करते हुए नजर आएं। इससे उनके तौरतरीकों और नीयत को लेकर किसी के मन में संदेह नहीं रह जाएगा।

 

तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के लिए होने वाले मतदान के ठीक पहले डीएमके नेता एमके स्टालिन की बेटी, पार्टी के अन्य नेताओं और उनसे जुड़े लोगों पर आयकर विभाग के छापे पड़े। इससे एक बार फिर यह आरोप लगाया जा रहा है कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी अपने राजनीतिक हित साधने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। इस आरोप के जवाब में कहा जा सकता है कि अगर किसी के खिलाफ शिकायतें आती हैं और कोई एजेंसी जांच शुरू करती है तो फिर उस प्रक्रिया को किसी भी बात से क्यों प्रभावित होना चाहिए। अगर बीच में कोई चुनाव वगैरह आ जाते हैं तो क्या सिर्फ इसीलिए वह जांच रोक दी जाए? 'कानून को अपना काम करने देना चाहिए' का बहुप्रचारित तर्क इस सवाल का जवाब ना में देता है और सत्तारूढ़ दल आम तौर पर विरोधियों की आलोचना को शांत करने के लिए इसी का इस्तेमाल करते आए हैं। बात तो यह भी सही है कि इन एजेंसियों का दुरुपयोग कोई आज से शुरू नहीं हुआ है। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के दौरान ही

सीबीआई को 'पिंजरे के तोते' का 'तमगा' मिला था। लेकिन बीजेपी के नेतृत्व में केंद्र में एनडीए सरकार बनने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि यह पुरानी रीत बदलेगी। मगर देखने में यह आया कि ऐसी शिकायतें कम होने के बजाय और बढ़ गईं।


कुछ अरसा पहले की ही बात है। राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार अंदरूनी चुनौतियों की वजह से संकट में थी। तभी गहलोत के करीबी नेताओं पर आयकर विभाग के छापे पड़ने लगे। और बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। इस मुद्दे पर केंद्र और राज्यों के बीच टकराव तक हो चुके हैं। कुछ राज्य बगैर इजाजत सीबीआई के अपने यहां आने पर पाबंदी लगा चुके हैं। यह बात भी छिपी नहीं है कि राजनीति में आरोपों का जवाब आरोपों से देकर काम चला लिया जाता है। लेकिन यहां मूल सवाल राजनीति का नहीं, देश की जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता का है। हमारी जांच एजेंसियां ठीक से जांच करके वास्तविक दोषियों तक पहुंचें और उन्हें कानून के मुताबिक सजा दिलाएं, यह जितना जरूरी है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि वे ऐसा करते हुए नजर आएं। इससे उनके तौरतरीकों और नीयत को लेकर किसी के मन में संदेह नहीं रह जाएगा। अब अगर यह मान भी लें कि तमिलनाडु में जिन मामलों में शुक्रवार को छापे मारे गए, वे सचमुच गंभीर थे, तब भी यह सवाल बना रहता है कि क्या ये मामले ऐसे थे कि दो-तीन दिन रुक जाने से जांच पटरी से उतर जाती? क्या छह अप्रैल को मतदान हो जाने का इंतजार ये अफसर नहीं कर सकते थे ताकि इन छापों को राजनीतिक रंग देने की कोई गुंजाइश ही न बचती?

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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आतंकवादी हैं ये (राष्ट्रीय सहारा)

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में माओवादियों ने फिर साबित किया कि आतंकवाद की तरह खून और हिंसा के अलावा उनका कोई मानवीय उद्देश्य नहीं। पूरा देश शहीद और घायल जवानों के साथ है। करीब चार घंटे चली मुठभेड़ में १५ माओवादियों के ढेर होने का मतलब उनको भी बड़ी क्षति हुई है। साफ है कि वे भारी संख्या में घायल भी हुए होंगे। किंतु‚ २२–२३ जवानों का शहीद होना बड़ी क्षति है। ३१ से अधिक घायल जवानों का अस्पताल में इलाज भी चल रहा है। इससे पता चलता है कि माओवादियों ने हमला और मुठभेड़ की सघन तैयारी की थी। 


 जो जानकारी है माओवादियों द्वारा षडयंत्र की पूरी व्यूह रचना से घात लगाकर की गई गोलीबारी में घिरने के बाद भी जवानों ने पूरी वीरता से सामना किया‚ अपने साथियों को लहूलुहान होते देखकर भी हौसला नहीं खोया‚ माओवादियों का घेरा तोड़ते हुए उनको हताहत किया तथा घायल जवानों और शहीदों के शव को घेरे से बाहर भी निकाल लिया। कई बातें सामने आ रहीं हैं। सुरक्षाबलों को जोनागुड़ा की पहाडि़यों पर भारी संख्या में हथियारबंद माओवादियों के होने की जानकारी मिली थी। छत्तीसगढ़ के माओवाद विरोधी अभियान के पुलिस उप महानिरीक्षक ओपी पाल की मानें तो रात में बीजापुर और सुकमा जिले से केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कोबरा बटालियन‚ डीआरजी और एसटीएफ के संयुक्त दल के दो हजार जवानों को ऑपरेशन के लिए भेजा गया था। माओवादियों ने इनमें ७०० जवानों को तर्रेम इलाके में जोनागुड़ा पहाडि़यों के पास घेरकर तीन ओर से हमला कर दिया। 


 इस घटना के बाद फिर लगता है मानो हमारे पास गुस्से में छटपटाना और मन मसोसना ही विकल्प है। यह प्रश्न निरंतर बना हुआ है कि आखिर कुछ हजार की संख्या वाले हिंसोन्माद से ग्रस्त ये माओवादी कब तक हिंसा की ज्वाला धधकाते रहेंगेॽ ध्यान रखिए माओवादियों ने १७ मार्च को ही शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा था। इसके लिए उन्होंने तीन शर्तं रखी थीं–सशस्त्र बल हटें‚ माओवादी संगठनों से प्रतिबंध खत्म हों और जेल में बंद उनके नेताओं को बिना शर्त रिहा किया जाए। एक ओर बातचीत का प्रस्ताव और इसके छठे दिन २३ मार्च को नारायणपुर में बारूदी सुरंग विस्फोट में पांच जवान शहीद हो गए। दोपहर में सिलगेर के जंगल में घात लगाए माओवादियों ने हमला कर दिया था। ऐसे खूनी धोखेबाजों और दुस्साहसों की लंबी श्रृंखला है। साफ है कि इसे अनिश्चितकाल के लिए जारी रहने नहीं दिया जा सकता। यह प्रश्न तो उठता है कि आखिर दो दशकों से ज्यादा की सैन्य– असैन्य कार्रवाइयों के बावजूद उनकी ऐसी शक्तिशाली उपस्थिति क्यों हैॽ निस्संदेह‚ यह हमारी पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यहीं से राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रश्नों के घेरे में आती है। पिछले करीब ढाई दशक से केंद्र और माओवाद प्रभावित राज्यों में ऐसी कोई सरकार नहीं रही जिसने इन्हें खतरा न बताया हो। यूपीए सरकार ने आंतरिक सुरक्षा के लिए माओवादियों को सबसे बड़ा खतरा घोषित किया था। केंद्र के सहयोग से अलग–अलग राज्यों में कई सैन्य अभियानों के साथ जन जागरूकता‚ सामाजिक–आÌथक विकास के कार्यक्रम चलाए गए हैं‚ लेकिन समाज विरोधी‚ देश विरोधी‚ हिंसाजीवी माओवादी रक्तबीज की तरह आज भी चुनौती बन कर उपस्थित हैं। हमें यहां दो पहलुओं पर विचार करना होगा। 


 भारत में नेताओं‚ बुद्धिजीवियों‚ पत्रकारों‚ एक्टिविस्टों का एक वर्ग माओवादियों की विचारधारा को लेकर सहानुभूति ही नहीं रखता उनमें से अनेक इनको कई प्रकार से सहयोग करते हैं। राज्य के विरु द्ध हिंसक संघर्ष के लिए वैचारिक खुराक प्रदान करने वाले ऐसे अनेक चेहरे हमारे आपके बीच हैं। इनमें कुछ जेलों में डाले गए हैं‚ कुछ जमानत पर हैं। इनके समानांतर ऐसे भी हैं‚ जिनकी पहचान मुश्किल है। गोष्ठियों‚ सेमिनारों‚ लेखों‚ वक्तव्यों आदि में जंगलों में निवास करने वालों व समाज की निचली पंक्ति वालों की आÌथक–सामाजिक दुर्दशा का एकपक्षीय चित्रण करते हुए ऐसे तर्क सामने रखते हैं‚ जिनका निष्कर्ष यह होता है कि बिना हथियार उठाकर संघर्ष किए इनका निदान संभव नहीं है। अब समय आ गया है जब हमारे आपके जैसे शांति समर्थक आगे आकर सच्चाइयों को सामने रखें। अविकास‚ अल्पविकास‚ असमानता‚ वंचितों‚ वनवासियों का शोषण आदि समस्याओं से कोई इनकार नहीं कर सकता‚ लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। केंद्र और राज्य ऐसे अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम चला रहे हैं‚ जो धरातल तक पहुंचे हैं। 


 उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए जा रहे और बने हुए आवास‚ स्वच्छता अभियान के तहत निÌमत शौचालय‚ ज्योति योजनाओं के तहत बिजली की पहुंच‚ सड़क योजनाओं के तहत दूरस्थ गांवों व क्षेत्रों को जोड़ने वाली सड़कों का लगातार विस्तार‚ किसानों के खाते में हर वर्ष ६००० भुगतान‚ वृद्धावस्था व विधवा आदि पेंशन‚ पशुपालन के लिए सब्सिडी जैसे प्रोत्साहन‚ आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य सेवा‚ कई प्रकार की इंश्योरेंस व पेंशन योजनाएं को साकार होते कोई भी देख सकता है। हर व्यक्ति की पहुंच तक सस्ता राशन उपलब्ध है। कोई नहीं कहता कि स्थिति शत–प्रतिशत बदल गई है‚ लेकिन बदलाव हुआ है‚ स्थिति बेहतर होने की संभावनाएं पहले से ज्यादा मजबूत हुई हैं तथा पहाड़ों‚ जंगलों पर रहने वालों को भी इसका अहसास हो रहा है। ॥ इसमें जो भी इनका हित चिंतक होगा वो इनको झूठ तथ्यों व गलत तर्कों से भड़का कर हिंसा की ओर मोड़ेगा‚ उसके लिए विचारों की खुराक उत्पन्न कराएगा‚ संसाधनों की व्यवस्था करेगा या फिर जो भी सरकारी‚ गैर सरकारी कार्यक्रम हैं‚ वे सही तरीके से उन तक पहुंचे‚ उनके जीवन में सुखद बदलाव आए इसके लिए काम करेगाॽ साफ है माओवादियों के थिंक टैंक और जानबूझकर भारत में अशांति और अस्थिरता फैलाने का विचार खुराक देने वाले तथा इन सबके लिए संसाधनों की व्यवस्था में लगे लोगों पर चारों तरफ से चोट करने की जरूरत है। निश्चित रूप से इस मार्ग की बाधाएं हमारी राजनीति है। तो यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आखिर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई में राजनीतिक एकता कैसे कायम होॽ 

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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नक्सलियों को जल्द उखाड़ फेंकने की बातें एक लंबे अरसे से की जा रही हैं फिर भी आतंक के इस नासूर से अब तक नहीं मिली मुक्ति (दैनिक जागरण)

नक्सलियों के प्रति किसी भी किस्म की नरमी नहीं दिखाई जानी चाहिए क्योंकि वे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इनसे निपटने के लिए हरसंभव उपाय किए जाने चाहिए और वह भी पूरी ताकत के साथ।


छत्तीसगढ़ में नक्सलियों से मुठभेड़ में 20 से अधिक जवानों के बलिदान के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की ओर से यह जो घोषणा की गई कि नक्सली संगठनों के खिलाफ जल्द ही निर्णायक लड़ाई छेड़ी जाएगी, वह वक्त की जरूरत के अनुरूप है। इसके बावजूद इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि नक्सलियों को जल्द उखाड़ फेंकने की बातें एक लंबे अरसे से की जा रही हैं और फिर भी आज कोई यह कहने की स्थिति में नहीं कि आतंक के इस नासूर से मुक्ति कब मिलेगी? यदि नक्सलियों के समूल नाश का कोई अभियान छेड़ना है तो सबसे पहले अर्बन नक्सल कहे जाने वाले उनके हितैषियों की परवाह करना छोड़ना होगा। ये अर्बन नक्सल मानवाधिकार की आड़ में नक्सलियों की पैरवी करने वाले बेहद शातिर तत्व हैं। वास्तव में ये उतने ही खतरनाक हैं, जितने खुद नक्सली। नक्सली संगठन इनसे ही खुराक पाते हैं। इनकी नकेल कसने के साथ ही इसकी तह तक भी जाना होगा कि नक्सली संगठन उगाही और लूट करने के साथ आधुनिक हथियार हासिल करने में कैसे समर्थ हैं? निश्चित रूप से नक्सलियों को स्थानीय स्तर पर समर्थन और संरक्षण मिल रहा है। इसी के बलबूते उन्होंने खुद को जंगल माफिया में तब्दील कर लिया है। यह मानने के भी अच्छे-भले कारण हैं कि वन संपदा का दोहन करने वालों की भी नक्सलियों से मिलीभगत है। हैरत नहीं कि उन्हें बाहरी ताकतों से भी सहयोग मिल रहा हो।


नक्सलियों का नाश तब तक संभव नहीं, जब तक उन्हें अपने लोग अथवा भटके हुए नौजवान माना जाता रहेगा। शायद व्यर्थ की इसी धारणा के चलते नक्सलियों के खिलाफ आर-पार की कोई लड़ाई नहीं छेड़ी जा पा रही है। समझना कठिन है कि यदि कश्मीर के आतंकियों और पूर्वोत्तर क्षेत्र के उग्रवादियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल हो सकता है तो खूंखार नक्सलियों के खिलाफ क्यों नहीं? आखिर यह क्या बात हुई कि नक्सलियों से लोहा लेते समय अपना बलिदान देने वाले जवानों के शव लाने के लिए तो सेना के संसाधनों का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन नक्सली संगठनों के खिलाफ उनका उपयोग करने में संकोच किया जाए? यह संकोच बहुत भारी पड़ रहा है। इसी संकोच के कारण नक्सली बार-बार सिर उठाने में समर्थ हो जाते हैं। देश अपने जवानों के और अधिक बलिदान को सहन करने के लिए तैयार नहीं। नक्सलियों के प्रति किसी भी किस्म की नरमी नहीं दिखाई जानी चाहिए, क्योंकि यह पहले की तरह आज भी एक तथ्य है कि वे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इस सबसे बड़े खतरे से निपटने के लिए हरसंभव उपाय किए जाने चाहिए और वह भी पूरी ताकत के साथ।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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टीकाकरण में सुस्ती: कोरोना संक्रमित मरीजों की बढ़ती संख्या के चलते टीकाकरण की रफ्तार तेज करने की जरूरत (दैनिक जागरण)

जब कोरोना संक्रमण ने फिर से सिर उठा लिया है तब फिर पात्र होते हुए भी टीका लगवाने में देरी नहीं करनी चाहिए। कोरोना संक्रमण से बचे रहने के उपायों को लेकर सावधानी बरतें वहीं दूसरी ओर टीकाकरण की रफ्तार तेज की जाए।


कोरोना संक्रमित मरीजों की बढ़ती संख्या देखकर यह स्पष्ट है कि संक्रमण की दूसरी लहर पहली लहर को पार करने वाली ही है। जल्द ही प्रतिदिन एक लाख से अधिक कोरोना संक्रमित लोग सामने आ सकते हैं। नि:संदेह यह चिंताजनक स्थिति होगी। इस स्थिति से तभी बचा जा सकता है, जब एक ओर जहां आम लोग कोरोना संक्रमण से बचे रहने के उपायों को लेकर सावधानी बरतें, वहीं दूसरी ओर टीकाकरण की रफ्तार तेज की जाए। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि अभी तक सात करोड़ से अधिक लोगों को टीके लगाए जा चुके हैं। टीकाकरण अभियान जनवरी मध्य से शुरू हुआ था और कायदे से अब तक 10-15 करोड़ से अधिक लोगों को टीके लग जाने चाहिए थे। यह ठीक है कि जब से 45 वर्ष से ऊपर के लोगों को टीका लगवाने की सुविधा प्रदान की गई है, तब से टीकाकरण की रफ्तार कुछ बढ़ी है, लेकिन यह अब भी लक्ष्य से पीछे है। केंद्र और राज्य सरकारों को यह देखना चाहिए कि आखिर प्रतिदिन 50 लाख लोगों के टीकाकरण का लक्ष्य क्यों नहीं हासिल हो पा रहा है? यह लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है, जब टीकाकरण केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए और पात्र लोग टीका लगवाने में तत्परता का परिचय दें।


यह समझना कठिन है कि जब टीकाकरण का लक्ष्य प्राप्त करने में कठिनाई आ रही है, तब फिर सभी आयु वर्ग के लोगों को टीका लगवाने की सुविधा देने से क्यों बचा जा रहा है? इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि टीकों के खराब होने का एक कारण वांछित संख्या में लोगों का टीकाकरण केंद्रों में न पहुंचना है। यदि पर्याप्त संख्या में टीके उपलब्ध हैं तो फिर घर-घर टीके लगाने का भी कोई अभियान शुरू करने पर विचार किया जाना चाहिए। कम से कम यह तो होना ही चाहिए कि जो लोग अपने काम-धंधे के सिलसिले में घरों से बाहर निकलते हैं और भीड़-भाड़ वाले इलाकों में जाते हैं, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर टीका लगे भले ही उनकी उम्र 45 वर्ष से कम क्यों न हो। ऐसे कोई उपाय इसलिए आवश्यक हो गए हैं, क्योंकि यह देखने में आ रहा है कि अब अपेक्षाकृत कम आयु वाले लोग भी कोरोना संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं। अब जब कोरोना संक्रमण के खतरे ने फिर से सिर उठा लिया है, तब फिर पात्र होते हुए भी टीका लगवाने में देरी करने का कोई औचित्य नहीं। जो लोग किसी न किसी कारण टीका लगवाने से बच रहे हैं, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि हाल-फिलहाल कोविड महामारी से छुटकारा मिलता नहीं दिख रहा और वह अभी भी घातक बनी हुई है।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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फिर बेलगाम होते नक्सली: नक्सलियों की कमर तोड़ने के लिए सबसे पहले सप्लाई लाइन को करना होगा ध्वस्त (दैनिक जागरण)

बीते कुछ वर्षों में नक्सलियों की ताकत कम हुई है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे हथियार डालने की स्थिति में आ गए हैं। नक्सलियों की सप्लाई लाइन को ध्वस्त करने के साथ यह भी जरूरी है कि उनके खुले-छिपे समर्थकों से भी सख्ती से निपटा जाए।


छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों से मुठभेड़ में पांच जवानों का बलिदान इसलिए कहीं अधिक चिंताजनक है, क्योंकि बीते दस दिनों में यह दूसरी बार है, जब सुरक्षा बलों को निशाना बनाया गया। इसके पहले छत्तीसगढ़ में ही नारायणपुर में नक्सलियों ने सुरक्षा बलों की एक बस को विस्फोट से उड़ा दिया था। इस हमले में भी पांच जवानों की जान गई थी। नक्सलियों के ये हमले यही बता रहे हैं कि उनका दुस्साहस फिर सिर उठा रहा है और उनकी ओर से हिंसा का परित्याग करने के जो कथित संकेत दिए जा रहे, वे सुरक्षा बलों की आंखों में धूल झोंकने के लिए ही हैं। नक्सलियों पर भरोसा करने का कोई मतलब नहीं। उनके मुंह में खून लग चुका है। वे लूट, उगाही के साथ हिंसा से बाज आने वाले नहीं हैं। यह भी साफ है कि वे जब हिंसक गतिविधियों को अंजाम नहीं दे रहे होते, तब अपनी ताकत बटोरने के साथ सुरक्षा बलों को निशाने पर लेने की साजिश रच रहे होते हैं। चूंकि वे इस सनक से ग्रस्त हैं कि बंदूक के बल पर भारतीय शासन को झुकाने में सफल हो जाएंगे, इसलिए उनके प्रति नरमी बरतने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।


यह सही है कि बीते कुछ वर्षों में नक्सलियों की ताकत कम हुई है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे हथियार डालने की स्थिति में आ गए हैं। नक्सली अब भी जिस तरह नासूर बने हुए हैं, उससे उन्हेंं जल्द उखाड़ फेंकने के दावों पर प्रश्नचिन्ह ही लगता है। ध्यान रहे कि इस तरह के दावे पिछले करीब एक दशक से किए जा रहे हैं। इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि नक्सली संगठन अब भी देश के नौ राज्यों के 50 से अधिक जिलों में सक्रिय हैं। यदि सुरक्षा बलों की तमाम सक्रियता के बाद भी नक्सली गिरोह इतने अधिक जिलों में अपना असर बनाए हुए हैं तो इसका अर्थ है कि उन्हेंं सहयोग, समर्थन और संरक्षण देने वालों की कमी नहीं। नि:संदेह इसका एक मतलब यह भी है कि वे हथियार और विस्फोटक हासिल करने में समर्थ हैं। यदि नक्सलियों की कमर तोड़नी है तो सबसे पहले इस सवाल का जवाब खोजना होगा कि आखिर उन्हेंं आधुनिक हथियारों की आपूर्ति कहां से हो रही है? नक्सलियों की सप्लाई लाइन को ध्वस्त करने के साथ यह भी जरूरी है कि उनके खुले-छिपे समर्थकों से भी सख्ती से निपटा जाए। केंद्र के साथ राज्यों को ऐसा करते समय अर्बन नक्सल कहे जाने वाले उन तत्वों पर भी निगाह रखनी होगी, जो नक्सलियों के पक्ष में माहौल बनाने या फिर उनकी हिंसा को जायज ठहराने का काम करते हैं।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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