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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Thursday, February 4, 2021

चौरीचौरा विद्रोह के अनुत्तरित सवाल और ब्रिटिश दंभ को ध्वस्त करने का दिन (अमर उजाला)

सुभाष चंद्र कुशवाहा 

भारतीय इतिहास में चार फरवरी 1922 का दिन ब्रिटिश दंभ को ध्वस्त करने के लिए याद किया जाएगा। सौ साल पहले आज के ही दिन चौरीचौरा में हुए विद्रोह ने सत्याग्रह आंदोलन के दूसरे चरण में किसान विद्रोह के क्रांतिकारी पक्ष को उभारा और स्वराज प्राप्ति के लिए चलाए गए मुक्ति संघर्ष के छद्म का पर्दाफाश किया। सत्याग्रह का पहला चरण, बंबई के मजदूर विद्रोह को कलंकित कर समेट लिया गया था, तो दूसरा चरण, चौरी चौरा विद्रोह के माथे पर धब्बा लगा कर। इतिहास में इन विद्रोहों को कलंकित करने वाली शक्तियों के सिद्धांतों से एम.एन. रॉय, देशबंधु चितरंजन दास, सुभाष चंद्र बोस से लेकर भगत सिंह तक का विरोध दर्ज है। ब्रिटिश सत्ता को नेस्तनाबूद करने वाले इस कृत्य को गौरवान्वित करने के बजाय, उपेक्षित किया गया है। इसका कारण भारतीय सामंती समाज के उस वर्गचरित्र में ढूंढा जा सकता है, जहां गरीब किसानों, मुसलमानों और निम्न जातियों का शोषण, उपेक्षा और तिरस्कार किया गया है। 



चौरीचौरा विद्रोह की शुरुआत एक फरवरी 1922 को होती है, जब मुण्डेरा बाजार में स्वयंसेवक भगवान अहीर और उसके दो अन्य साथियों को जागीरदार के इशारे पर चौरा थाने का दरोगा मारता है। स्वयंसेवकों की बैठक उसी दिन शाम को डुमरी खुर्द गांव में होती है। चार फरवरी को अन्य गांवों से स्वयंसेवकों का जुटान होता है तथा एक जुलूस भोपा बाजार होते हुए चौरा थाने को जाता है। आसपास के जमींदारों के कारिंदे जुलूस को रोकने का असफल प्रयास करते हैं। चौकीदारों द्वारा लाठीचार्ज करने और पुलिस द्वारा गोली चलाए जाने से अनेक स्वयंसेवक मारे जाते हैं। इसी प्रतिक्रिया में किसान रेलवे पटरी की गिट्टियों की बौछार करते हैं। जब पुलिस वाले थाना भवन में छिपकर बचने का प्रयास करते हैं, तो आक्रोशित जनता मिट्टी का तेल छिड़कर थाना भवन को जला देती है और 23 पुलिसकर्मी मारे जाते हैं। जुल्मी दरोगा गुप्तेश्वर सिंह भी मारा जाता है, जिसे द लीडर जैसा जमींदारपरस्त अखबार ‘हीरो ऑफ द गोरखपुर’ कहता है। 



स्वयंसेवकों की भीड़ रेलवे लाइन को तोड़ देती है। पोस्ट ऑफिस पर तिरंगा झंडा फहरा कर आजादी का शुभारंभ किया जाता है। उसके बाद ब्रिटिश दमन का दौर शुरू होता है। सेशन कोर्ट, गोरखपुर द्वारा नौ जनवरी, 1923 को 172 किसानों को फांसी की सजा सुनाई जाती है। हाई कोर्ट द्वारा 19 स्वयंसेवकों को फांसी की सजा बहाल रखी जाती है। बाकी को आजीवन से लेकर तीन-तीन साल सजा सुनाई जाती है। आज उस विद्रोह के सौ वर्षों होने को हैं, मगर अभी तक चौरीचौरा के शहीदों को वाजिब सम्मान नहीं मिला है। इस कांड में शामिल ज्यादातर निम्नवर्गीय अनपढ़ और अस्पृश्य समाज के लोग थे। नजर अली, लाल मुहम्मद, भगवान अहीर, अब्दुल्ला, श्यामसुंदर और इन्द्रजीत कोइरी इस विद्रोह के नायकों में थे। फांसी की सजा पाए 19 शहीद परिवारों को कोई खास सहायता नहीं मिली। 1982 के पूर्व तक तो इस विद्रोह को आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं किया गया था। बाद में पेंशन के नाम पर खानापूर्ति हुई। 


देश के इतिहासकारों और प्रबुद्धजनों के सामने चौरीचौरा विद्रोह एक प्रश्न चिह्न बन खड़ा है। 100 साल बाद भी देश की पीढ़ी को गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है। चौरीचौरा ‘शहीद स्मारक’ कहने से स्पष्ट नहीं हो पाता कि इसका तात्पर्य थाने पर आक्रमण करने वाले स्वयंसेवकों के शहीद स्मारक से है या गोली चलाने वाले ब्रिटिश पुलिस के शहीद स्मारक से। दोनों के नाम एक ही हैं। स्वयंसेवकों के शहीद स्मारक के मुख्य द्वार पर एक बड़ा-सा काला ग्रेनाइट पत्थर लगा है, जिसमें डुमरी खुर्द गांव का नाम ही गायब कर दिया गया है, जहां के मुसलमानों, अनूसूचित जाति के लोगों और अहीरों सहित तमाम निम्न जातियों की अगुवाई में चौरीचौरा विद्रोह ने दुनिया में अपना नाम दर्ज कराया। इस स्मारक पर खुदे गलत इतिहास को दर्ज करने की जवाबदेही तय होनी चाहिए, यही शहीदों के प्रति वास्तविक सम्मान होगा। 


(चौरीचौरा विद्रोह और स्वधीनता आंदोलन, पुस्तक के लेखक) 


सौजन्य - अमर उजाला।

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रक्षा बजट से निकल रहे संकेत और भविष्य के जरूरी कदम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

अजय शुक्ला 

कोविड-19 महामारी से उपजे आर्थिक संकट और लद्दाख में चीन की घुसपैठ की दोहरी चुनौती के बीच चालू वित्त वर्ष में सरकार ने रक्षा बजट का जिस तरह प्रबंधन किया वह काबिलेतारीफ है। पहली बात, सेना ने बिना राजस्व बजट में अनावश्यक इजाफा किए चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के दूरस्थ इलाकों में 40,000 सैनिक तैनात किए। सैनिकों की गतिविधि, प्रशिक्षण और बुनियादी निर्माण इसी बजट से होता है।


दूसरी बात, तीनों सेनाओं ने चीन के साथ संकट का प्रबंधन बिना पूंजीगत बजट बढ़ाए किया है। थलसेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर पूंजीगत बजट में महज 20,776 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय किया है। तीसरा, तीनों सेनाओं ने पेंशन भुगतान में कमी कर संसाधन जुटाए हैं। यह आवंटन बजट में उल्लिखित 133,825 करोड़ रुपये से घटाकर 125,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। यानी 8,825 करोड़ रुपये की बचत। सन 2021-22 के लिए पेंशन आवंटन राशि महज 115,850 करोड़ रुपये है जो पहले से 9,150 करोड़ रुपये कम है। इससे पता चलता है कि हमारी थलसेना ने दुनिया की दूसरी सबसे ताकतवर सेना को मुश्किल हालात में केवल पेंशनरों की राशि से की जाने वाली आपातकालीन खरीद के बूते रोक दिया। क्या ऐसा संभव है, आइए देखते हैं यह अनुमान किन बातों पर आधारित है।


पहली बात, चूंकि पेंशन बजट सावधानीपूर्वक जुटाए आंकड़ों पर आधारित होता है तो 8,825 करोड़ रुपये कैसे बच गए? या तो फरवरी 2020 के बजट में उल्लिखित महंगाई भत्ते की दो किस्तों का भुगतान नहीं किया गया या फिर सरकार सैनिकों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से रोक रही है जिससे वह राशि बच रही है जो सामान्य हालात में इन सैनिकों के सेवानिवृत्त होने पर देनी होती।


मुझ समेत कई रक्षा विश्लेषक कहते रहे हैं कि पेंशन बजट कम करना जरूरी है ताकि उपकरणों के आधुनिकीकरण जैसे काम के लिए संसाधन जुटाए जा सकें। हालांकि इसे हासिल करने के लिए सेवा अवधि कम की जानी चाहिए ताकि पेंशन के हकदार सेवानिवृत्त कम हो सकें। इसके विपरीत महंगाई भत्ता रोकना या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को रोकना आदि अस्थायी उपाय हैं। बहुत संभव है कि वित्त वर्ष 2021-22 में महंगाई भत्ते में इजाफा होगा और ऐसे में पेंशन आवंटन बढ़ाना होगा।


इस सवाल पर वापस आते हैं कि बिना राजस्व बजट में इजाफा किए इतने सैनिकों की तैनाती कैसे संभव है। इसका जवाब यह है कि यदि यह तैनाती मौजूदा संसाधनों के जरिये की जाए तो व्यय में बहुत अधिक इजाफा नहीं होता है। किसी इन्फैंट्री बटालियन या टैंक दस्ते को उड़ान के माध्यम से एक से दूसरे स्थान पर ले जाने में बहुत अधिक लागत आती है। इसका भुगतान थलसेना द्वारा वायुसेना को किया जाता है और यह मामला आपसी रह जाता है।


तीसरा पूंजीगत व्यय की बात करें तो रक्षा मंत्री ने पूंजीगत आवंटन में 18.75 फीसदी इजाफा किया है जो गत 15 वर्षों में सबसे अधिक है। लेकिन सच यह है कि 20,777 करोड़ रुपये की यह राशि बजट में उल्लिखित नहीं थी। यह चीन की घुसपैठ का पता चलने के बाद के महीनों में हुआ। इस राशि से अत्यधिक ठंड में पहनने वाले कपड़े, हथियार और अन्य सैन्य उपकरण खरीदे गए। यदि पूंजीगत बजट में सालाना बदलाव की तुलना की जाए और एक वर्ष के बजट आवंटन की तुलना अगर आगामी वर्ष के आवंटन से की जाए तो इसमें 2,700 करोड़ रुपये की कमी आई है।


यह संभव है कि एलएसी पर हालात सामान्य हो जाएं और तीनों सेनाओं को अगले वर्ष पूंजीगत बजट से 20,000 करोड़ रुपये की आपात खरीद न करनी पड़े। इससे तीनों सेनाओं को 2 लाख करोड़ रुपये की पूंजीगत खरीद शुरू करने का अवसर मिलेगा क्योंकि हस्ताक्षर के समय कुल राशि का केवल 10 फीसदी चुकाना होता है। यदि मान लें कि सरकार आने वाले वर्षों में पूंजीगत व्यय इसी स्तर पर रखेगी तो देश के हथियार और उपकरण आधुनिकीकरण में आमूलचूल बदलाव आ सकता है। यदि सरकार का सेना और रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनियों मसलन हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड आदि की जमीन बेचने का प्रस्ताव फलीभूत होता है तो यह बदलाव और क्रांतिकारी हो सकता है। इससे सेना के पुराने पड़ चुके हथियारों के आधुनिकीकरण की राह भी आसान हो सकती है।


बीते आठ वर्ष के औसत पूंजीगत बजट आवंटन की बात करें तो थलसेना को औसतन 29 फीसदी, नौसेना को 29 फीसदी और वायुसेना को 42 फीसदी आवंटन हुआ। नौसेना एक ऐसी सेना है जहां अधिकांश खरीद परियोजनाएं निर्णायक मोड़ पर हैं। सरकार के आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों को देखें तो बीते दो वर्ष में बहुत कम विदेशी अनुबंध पूरे हुए हैं। नौसैनिक नियोजकों का मानना है कि इससे 13,000 करोड़ रुपये मूल्य की अगली पीढ़ी के मिसाइल क्षमता संपन्न पोत खरीदने के लिए अनुकूल हालात बन सकते हैं। इसके अलावा दो प्रशिक्षण पोत, एक तेज हमला करने में सक्षम पोत और 9,000 करोड़ रुपये में 11 नौसैनिक गश्ती पोत का अनुबंध किया जा सकता है। ये सारे अनुबंध बड़ा बदलाव ला सकते हैं।


इसी प्रकार वायुसेना जिसे पूंजीगत व्यय बजट में सबसे अधिक हिस्सेदारी मिलती है, वह एचएएल के साथ 83 तेजस मार्क 1ए लड़ाकू विमान और कुछ तादाद में सुखोई-30एमकेआई जंगी जहाज बनाने के लिए 45,000 करोड़ रुपये का अनुबंध कर सकती है। पूंजीगत व्यय बजट में 3,200 करोड़ रुपये के इजाफे के साथ थलसेना तोपखाने के लिए जरूरी चीजें खरीद पर ध्यान केंद्रित कर सकती है। वह पिनाका रॉकेट लॉन्चर की दोबारा खरीद और के-9 वज्र तोप खरीद सकती है जिसे भारत में लार्सन ऐंड टुब्रो दक्षिण कोरियाई तकनीक से बना रही है।


जरूरत यह है कि रक्षा मंत्रालय अपनी खरीद प्राथमिकताओं को नए सिरे से तय करे। कहा जाता रहा है कि सैन्य परिचालन प्राथमिकताएं रक्षा बजट के अनुरूप होनी चाहिए। यह बात भारत पर लागू नहीं होती जहां सैन्य खरीद का परिचालन जरूरतों से कोई लेनादेना नहीं होता बल्कि लंबे समय से लंबित खरीद को सिलसिलेवार ढंग से निपटाया जाता है।



सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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लीक से हटकर है इस बार का बजट (बिजनेस स्टैंडर्ड)

ए के भट्टाचार्य  

भारत में आम बजट के साथ एक खास बात यह रही है कि देश के एक के बाद एक वित्त मंत्रियों ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भारी गिरावट के बाद बड़े कर प्रस्ताव लाने से परहेज किया है। वित्त वर्ष 2021-22 का बजट तब आया है जब देश की अर्थव्यवस्था करीब पिछले एक वर्ष से भारी उथलपुथल से गुजरी है। निर्मला सीतारमण ने भी अगले वित्त वर्ष के बजट में बड़े कर प्रस्ताव नहीं शामिल करने की चेष्टा की है। हालांकि कुछ अन्य बातों में वह अपने पूर्ववर्तियों से अलग रही हैं। बजट में सीमा शुल्क एक सहज स्तर पर लाने, घरेलू उद्योगों की मदद के लिए कुछ आयात शुल्कों में कमी एवं बढ़ोतरी और करदाताओं के लिए प्रत्यक्ष कर से जुड़े नियम सरल करने जैसे कुछ उपायों के अलावा दूसरी कर दरें मोटे तौर पर अपरिवर्तित रही हैं। हालांकि इस कदम से संरक्षणवाद से जुड़ी चिंताएं जरूर पैदा हुई हैं और 400 से अधिक वस्तुओं को शुल्क से मिली छूट की समीक्षा के वादे से कुछ हद तक अनिश्चितता भी पैदा हुई है।

यह बात का ध्यान रखना विशेष महत्त्व का है कि अगले वर्ष केंद्र सरकार के सकल कर संग्रह में सीमा शुल्क राजस्व की हिस्सेदारी महज 6 प्रतिशत ही रहेगी। वित्त वर्ष 2020-21 के संशोधित अनुमान के अनुसार सकल कर संग्रह कर 17 प्रतिशत तेजी के साथ 22 लाख करोड़ रुपये रहने की उम्मीद लगाई जा रही है। अगर अगले वर्ष नॉमिनल जीडीपी में 14.4 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो कर संग्रह में 17 प्रतिशत की तेजी का मतलब है कि टैक्स बॉयंसी (जीडीपी और कर संग्रह में बढ़ोतरी का अनुपात) 1.2 रहेगी।


यह एक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य जरूर लग सकता है लेकिन इसे प्राप्त करना भी बहुत मुश्किल नहीं है। इसकी वजह यह है कि बजट में किसी तरह की कर छूट नहीं दी गई है और न ही कर प्रत्यक्ष कर आधार में ही कमी की गई है। इसके अलावा उत्पाद शुल्क संग्रह का अनुमान भी ठीक-ठाक लग रहा है। उत्पाद शुल्क संग्रह में वित्त वर्ष 2020-21 के 3.61 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 7 प्रतिशत कमी आने का अनुमान है। शायद सरकार ने तेल उत्पादों पर उत्पाद शुल्क वापस लेने से होने वाले नुकसान का आकलन पहले ही कर लिया है। सरकार ने अप्रैल-मई 2020 में इन उत्पादों पर उत्पाद शुल्क लगाया था।


वर्ष 2019-20 में कुल संग्रह 2.4 लाख करोड़ रुपये रहा था। उत्पाद शुल्क से प्राप्त होने वाले ज्यादातर राजस्व में पेट्रोलियम उत्पादों की भागीदारी अधिक होती है। यह अगले वर्ष सरकार के राजस्व को काफी सहारा दे सकता है। हालांकि यह तभी होगा जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहती हैं और वित्त मंत्रालय पर पेट्रोल एवं डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने का दबाव नहीं बढ़ता है। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सीतारमण ने मंदी के बाद बजट पेश करने में अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले लीक से अलग हटकर काम किया है। इससे पहले जवाहर लाल नेहरू ने 1958, सचिंद्र चौधरी ने 1966, यशवंतराव चव्हाण ने 1973 और आर वेंकटरमण ने 1980 में बजट में किसी तरह का साहसिक कदम उठाने से परहेज किया था। हालांकि उनके उलट सीतारमण ने वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में कम से कम चार नई पहल की हैं। पहली बात तो यह कि उन्होंने वर्ष 2020-21 में बजट प्रावधानों से इतर उधारी में कमी कर राजकोषीय घाटे के लिहाज से बजट को अधिक पारदर्शी बना दिया है। चालू वित्त वर्ष में बजट प्रस्तावों से इतर उधारी रकम कम कर 1.26 लाख करोड़ रुपये तक करने के बाद उन्होंने आगामी वर्षों में इसे घटाकर मात्र 30,000 करोड़ रुपये रखने का प्रस्ताव दिया है। वास्तव में जो पादर्शिता दिखाई गई है उसी वजह से चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 9.5 प्रतिशत तक पहुंच जाने का अनुमान लगाया गया है। यह प्रयास अगले वर्ष भी जारी रहेगा, जिसका मतलब यह हुआ कि राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएएसएफ) का इस्तेमाल 2021-22 में खाद्य सब्सिडी देने के मद में बिल्कुल नहीं होगा। इसका आशय यह भी है कि राजकोषीय घाटे की गुणवत्ता को लेकर स्थिति अधिक पेचीदा नहीं रहेगी।


दूसरी बात यह कि वित्त वर्ष 2021-22 में सरकार ने पूंजीगत व्यय 26 प्रतिशत वृद्धि के साथ 5.54 लाख करोड़ रुपये रखने की बात कही है। वित्त वर्ष 2020-21 में सरकार ने पूंजीगत व्यय में 31 प्रतिशत इजाफा किया था। कुल मिलाकर इससे इशारा मिलता है कि वित्त मंत्री इस मद में लगातार अधिक खर्च करना चाहती हैं।


हालांकि इसका यह अर्थ निकलता है कि हाल के दिनों में सरकार का राजस्व व्यय काफी दबाव में रहा है। आने वाले वर्ष में राजस्व व्यय में चालू वित्त वर्ष के 30 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 3 प्रतिशत गिरावट आएगी। अगर इसमें ब्याज भुगतान देनदारी हटा दें तो आने वाले वर्ष में विभिन्न कार्यक्रमों पर राजस्व व्यय वास्तव में 9 प्रतिशत कम हो जाएगा। जिन लोगों को राजस्व व्यय के जरिये बजट में प्रोत्साहन उपाय होने की उम्मीद थी उन्हें जरूर निराशा हाथ लगी होगी।


तीसरी अहम बात यह है कि प्रत्यक्ष कर आधार में कमी करने का भी प्रयास नहीं किया गया है। दूसरे शब्दों में तो वित्त मंत्री ने कर श्रेणियों में कोई बदलाव नहीं किया है और न ही कर छूट का दायरा ही बढ़ाया है। चौथी बात यह है कि वित्त मंत्री ने बजट में कई नई घोषणाएं की हैं। उदाहरण के लिए सरकार ने बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत करने की घोषणा की है। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों और एक सामान्य जीवन बीमा कंपनी के निजीकरण का भी प्रस्ताव है। सार्वजनिक क्षेत्रों में सरकार की हिस्सेदारी बेचने के संबंध में एक नई नीति और कई ढांचागत क्षेत्रों में परिसंपत्तियों की बिक्री की भी घोषणा की गई है।


हालांकि इन सभी नई नीतियों के बीच यह देखना थोड़ा खलता है कि सीतारमण ने अपने तीसरे बजट में कुछ पेचीदा मामलों को शामिल करने से परहेज नहीं किया है। वित्तीय क्षेत्र में मौजूदा दबाव के मद्देनजर 'बैड बैंक' की स्थापना एक अच्छा कदम नहीं माना जा सकता है। विकास वित्त संस्थान की स्थापना से ढांचागत क्षेत्र को रकम मुहैया कराने में आ रही दिक्कतों का वास्तविक समाधान नहीं पाया जा सकता है।


एक बार फिर राज्यों के पास शिकायतें करने की वजह मौजूद हैं। केंद्र 2025-26 तक राजकोषीय घाटा कम कर जीडीपी का 4.5 प्रतिशत कर लेगी, लेकिन राज्यों के लिए 2023-24 तक इसे 3 प्रतिशत तक समेटना कठिन लग रहा है। हालांकि केंद्र सरकार के पास इसका तर्क मौजूद है। वह सीधा कहेगी कि 15वें वित्त आयोग ने ऐसा ही सुझाव दिया है!

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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साहसी कदम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सोमवार को प्रस्तुत आम बजट की सबसे बड़ी घोषणाओं में से एक थी केंद्र सरकार के उपक्रमों (सीपीएसई) का रणनीतिक विनिवेश करने की घोषणा। अन्य बातों के अलावा इससे समग्र आर्थिक सुधार के एजेंडे को बल मिलेगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गत वर्ष घोषणा की थी कि सरकार ऐसी एक नीति लाएगी। उसे हाल ही में कैबिनेट की मंजूरी मिली। नई नीति सीपीएसई के लिए एक स्पष्ट खाका पेश करेगी। लक्ष्य होगा उनकी मौजूदगी को न्यूनतम करना और निजी क्षेत्र को  अधिक जगह देना। सरकार ने चार व्यापक रणनीतिक क्षेत्रों की पहचान कर ली है। इनमें नाभिकीय ऊर्जा, अंतरिक्ष और रक्षा, बिजली, पेट्रोलियम, कोयला और खनिज, परिवहन और दूरसंचार तथा वित्तीय सेवाएं शामिल हैं। इन क्षेत्रों में सीपीएसई की उपस्थिति न्यूनतम होगी। गैर सामरिक क्षेत्रों में सीपीएसई का निजीकरण होगा या उन्हें बंद किया जाएगा।

सरकार की इस बात के लिए सराहना करनी होगी कि उसने असाधारण रूप से यह साहसी नीतिगत कदम उठाया। हकीकत तो यह है कि वित्त मंत्री ने अगले वित्त वर्ष में दो सरकारी बैंकों और एक बीमा कंपनी के निजीकरण का प्रस्ताव भी रखा है। यकीनन इससे नीतिगत अवरोध टूटेंगे और एक नई शुरुआत होगी। इस प्रक्रिया को आगे ले जाने के लिए सरकार ने नीति आयोग से कहा है कि वह रणनीतिक विनिवेश वाली कंपनियों की सूची तैयार करे। इस नीति के कई लाभ होंगे। यह मानना अहम है कि विभिन्न क्षेत्रों में सरकारी कंपनियों की मौजूदगी प्राय: विसंगति पैदा करती है और निजी क्षेत्र की कंपनियों को बाधित करती है जबकि उन्हें अधिक कठिन वित्तीय हालात का सामना करना होता है। इतना ही नहीं बड़ी तादाद में सरकारी कंपनियां घाटे में हैं और वे सरकारी वित्त पर बोझ के समान हैं। उदाहरण के लिए भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की एक रिपोर्ट दर्शाती है कि मार्च 2018 में समाप्त वित्त वर्ष में 184 सरकारी कंपनियों को कुल मिलाकर 1.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हुआ और 77 कंपनियों का विशुद्ध मूल्य पूरी तरह नष्ट हो गया। समस्या यह है कि मुनाफे में चल रही सीपीएसई का प्रदर्शन भी अधिकांश मानकों पर निजी क्षेत्र की समकक्ष कंपनियों की तुलना में काफी खराब है। ऐसे में बड़ी तादाद में सीपीएसई की वित्तीय स्थिति को देखते हुए बेहतर यही होगा कि सरकार या तो उनका निजीकरण कर दे या उन्हें बंद कर दे। चूंकि सरकार की वित्तीय स्थिति भी दबाव में है इसलिए विनिवेश प्राप्तियों का इस्तेमाल बुनियादी ढांचा जैसे क्षेत्रों में वित्त पोषण के लिए किया जा सकता है। ध्यान देने वाली बात है कि अधिकांश सीपीएसई का मुनाफा पेट्रोलियम और कोयला जैसे क्षेत्र से आता है जहां प्रतिस्पर्धा अपेक्षाकृत सीमित है। सरकारी उपक्रमों के लिए निजी क्षेत्र से मुकाबला करना मुश्किल होता है। ऐसे में निजीकरण और प्रबंधन में बदलाव से उनकी क्षमता और उत्पादन सुधर सकते हैं। इसके अतिरिक्त बड़े पैमाने पर कमजोर वाणिज्यिक उपक्रमों के संचालन में ऊर्जा और वित्तीय संसाधन लगाने के बजाय सरकार नीतिगत मसलों पर ध्यान केंद्रित करने में कामयाब रहेगी। यह सबके लिए बेहतर होगा।


हालांकि रणनीतिक विनिवेश के लाभ स्पष्ट हैं लेकिन समुचित क्रियान्वयन भी उतना ही अहम होगा क्योंकि अतीत में हमारा प्रदर्शन बहुत उत्साहित करने वाला नहीं रहा है। इसके अलावा व्यापक पैमाने पर निजीकरण का विचार, खासतौर पर सरकारी बैंकों के निजीकरण का चौतरफा विरोध भी होगा। सरकार को उनसे निपटने की राजनीतिक तैयारी भी रखनी होगी। सरकार को इस दौरान अधिकतम पारदर्शिता भी बरतनी चाहिए। अतीत में विनिवेश के निर्णय विवादों और जांच का विषय बनते रहे हैं। कोशिश करनी होगी कि इस बार ऐसा नहीं हो क्योंकि इससे निजीकरण की प्रक्रिया और व्यापक तौर पर इससे जुड़ी नीति को नुकसान पहुंच सकता है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Wednesday, February 3, 2021

एक्सप्रेस प्रदेश बन चुका है उत्तर प्रदेश (अमर उजाला)

दुर्गेश उपाध्याय

 

किसी भी राज्य की तरक्की की पहचान उसके बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर से होती है, जितना बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी होगी, उतने ही बड़े पैमाने पर निवेश आता है और विकास के साथ बड़े पैमाने पर रोजगार के साधन उत्पन्न होते हैं। उत्तर प्रदेश में मौजूदा योगी सरकार द्वारा पूरे प्रदेश में एक्सप्रेस-वे का ऐसा जाल बिछाने का कार्य तीव्र गति से किया जा रहा है, जो प्रदेश की जनता को बेहतरीन सड़कों के अलावा विकास की अपार संभावनाओं से जोड़ देगा। उत्तर प्रदेश में इन दिनों निवेश का जितना बेहतरीन वातावरण उपलब्ध है, उतना शायद ही कभी रहा हो। यही वजह है कि सरकार द्वारा विश्व स्तरीय सुविधाओं से लैस एक्सप्रेस-वे के जरिये यातायात को तीव्र, सुगम और सुलभ बनाए जाने की दिशा में तेजी से काम कराया जा रहा है।



मार्च, 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने से पहले प्रदेश में केवल दो एक्सप्रेस-वे ही मौजूद थे, किंतु पिछले चार वर्षों में विकास की दौड़ में किए जा रहे प्रयास साफ दिखाई दे रहे हैं। इसी वजह से 30 नवंबर, 2020 को देव-दीपावली के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब वाराणसी आए, तो उन्होंने मुख्यमंत्री की तारीफ करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश अब 'एक्सप्रेस-वे प्रदेश' बन चुका है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे बिहार और उत्तर प्रदेश के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में जुड़ने जा रहा है और यह एक्सप्रेस-वे संपूर्ण पूर्वांचल क्षेत्र के विकास की रीढ़ साबित होगा।



यूपीडा (उत्तर प्रदेश एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण) की टीम द्वारा इन दिनों सबसे तेज गति से पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे, गंगा एक्सप्रेस-वे और उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का निर्माण कराया जा रहा है। पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे परियोजना की कुल भौतिक प्रगति 74 प्रतिशत से अधिक पूरी हो चुकी है और युद्ध स्तर पर इन दिनों निर्माण कार्य चल रहा है। न केवल पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, बल्कि बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे में भी तेजी से काम हो रहा है। वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री प्रदेश के निवासियों को पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के रूप में एक बेहतरीन सौगात देने जा रहे हैं। 


इसके अलावा योगी सरकार ने बुंदेलखंड की धरती को विकास का नया केंद्र बिंदु बनाने के लिए पूरी तैयारी कर ली है और तमाम नई योजनाएं शुरू की गई हैं। मुख्यमंत्री के विजन का ही परिणाम था कि वर्ष 2019 के कुंभ मेले के दौरान उन्होंने गंगा एक्सप्रेस-वे के निर्माण की घोषणा की थी। उत्तर प्रदेश के सर्वांगीण विकास हेतु जनपद मेरठ से लेकर जनपद प्रयागराज तक पूर्णतः नियंत्रित गंगा एक्सप्रेस-वे के निर्माण कार्य के लिए भूमि अधिग्रहण का कार्य शीघ्र शुरू होने जा रहा है, इसके लिए कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी है। गंगा एक्सप्रेस-वे के निर्माण कार्य में हजारों की संख्या में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, जो कि प्रदेश की तरक्की को नया आयाम देगा।


कोरोना संक्रमण के दौरान भी न केवल तेजी से एक्सप्रेस-वे का निर्माण कार्य निर्बाध गति से हो रहा है, बल्कि बड़े पैमाने पर प्रवासी मजदूरों को रोजगार भी मुहैया कराया गया है। एक्सप्रेस-वे के निर्माण के दौरान रोजगार प्रदान करने की दृष्टि से भी यूपीडा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उत्तर प्रदेश, एक्सप्रेस-वे के निर्माण की दृष्टि से पूरे देश में नंबर एक प्रदेश हो गया है और इतने बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में रोजगार सृजित हुए हैं। सरकार द्वारा प्रदेश के छह जिलों में चित्रकूट, झांसी, कानपुर, लखनऊ, आगरा और अलीगढ़ में बड़े पैमाने पर जमीन लेकर डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। यूपीडा ने अब तक 45 एमओयू पर हस्ताक्षर कर लिए हैं, जिनसे बड़े स्तर पर निवेश आएगा और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होंगे। इससे बड़े पैमाने पर निवेश की संभावना है और उत्तर प्रदेश रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काफी तेजी से आगे बढ़ेगा।


सौजन्य - अमर उजाला।

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सरकार की बदली हुई सोच का बजट (अमर उजाला)

अजय बग्गा 

अब तक जो बजट पेश किए जाते थे, उनमें विकास की तरफ अग्रसर होने की तुलना में रेटिंग एजेंसी, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दबाव में राजकोषीय घाटे और उधार को नियंत्रित रखने को ज्यादा अहमियत दी जाती थी। पहली बार बजट में काफी पारदर्शिता के साथ कहा गया है कि हमने कोविड महामारी की वजह से 9.5 फीसदी का राजकोषीय घाटा रखा है, हमारे पास आय केवल 23 लाख करोड़ थी, लेकिन हम 34 लाख करोड़ खर्च कर रहे हैं और आगे हम और खर्च करेंगे। अगले वर्ष भी 6.8 फीसदी का राजकोषीय घाटा रखेंगे और हम विकास को तवज्जो दे रहे हैं। अर्थव्यवस्था में जब हम पैसा डालते हैं, तो उसका प्रभाव अर्थव्यवस्था में कई गुना होता है। यदि आप सौ रुपये सड़क निर्माण पर खर्च करते हैं, तो अर्थव्यवस्था में 800 रुपये का असर दिखता है। सरकार ने कहा है कि हम साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये सड़कें, पुल, रेलवे जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण पर खर्च करेंगे। यह एक बहुत बड़ी सकारात्मक पहल है, क्योंकि इससे जीडीपी पर छह से आठ गुना असर पड़ेगा। यह एक बड़ा वित्तीय प्रोत्साहन है। रिजर्व बैंक की तरफ से मौद्रिक प्रोत्साहन तो दिया ही जा रहा था, बजट के जरिये बाजार और अर्थव्यवस्था को और प्रोत्साहन दिया गया है। 

दुनिया भर में वित्तीय प्रोत्साहन दिया जा रहा था। पिछले साल सरकार ने गरीबों के खाते में पैसे डाले और उन्हें अन्न दिया, लेकिन प्रोत्साहन के तौर पर कुछ खास नहीं किया गया था। बजट में सरकार ने कंजूसी नहीं दिखाई है, बल्कि विकास को तेजी देने के लिए खर्च करने पर जोर दिया है। इसके जरिये सरकार ने यह संदेश देना चाहा है कि हम उद्योग और अर्थव्यवस्था में तेजी के पक्षधर हैं और विकास लाएंगे। इसलिए शेयर बाजार ने भी इसका स्वागत किया। पहले बाजार को इस बात का डर था कि सरकार राजस्व कहां से जुटाएगी। सरकार ने टैक्स में कोई बढ़ोतरी नहीं की, जो स्वागत योग्य है। यह भी भय था कि वित्तीय स्थिति संभालने के लिए कोविड शेष थोपा जाएगा, या शेयर बाजार में टैक्स लगाया जाएगा। लेकिन मध्यवर्ग या उपभोक्ताओं पर बोझ डालने के बजाय सरकार ने कहा कि हम बाजार में जाकर पैसा उधार लेंगे। यह भी एक अच्छी बात है।



स्वास्थ्य क्षेत्र में, खाद्य सामग्री में खर्चा बढ़ाने की भी बात की गई। बैंकिंग क्षेत्र में जो खराब कर्जों की समस्या है, उसके लिए घोषणा की गई कि एक संस्था बनेगी, जो इन बैंकों से खराब कर्जे ले लेगी और उसका समाधान निकालेगी। इससे बैंक की बैलेंस शीट से वे कर्ज हट जाएंगे और बैंक को फिर सकारात्मक चीजों पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिलेगा। फिर किफायती आवास, तरह-तरह के सुधारात्मक उपाय, टेक्सटाइल पार्क आदि की भी घोषणा की गई। इस बार मध्य वर्ग के लिए कोई खास राहत की घोषणा नहीं की गई है। आयकर अधिनियम में पारदर्शिता लाने और उसे आसान बनाने की बात जरूर की गई है। मसलन, 75 वर्ष के वरिष्ठ नागरिकों को रिटर्न नहीं भरना पड़ेगा, फेसलेस एसेसमेंट और अगर आयकर विभाग से पचास लाख रुपये से कम की रकम का विवाद चल रहा है, तो आयकर के मामले नहीं खोले जाएंगे।


लगता है कि इस बार के बजट को केवल किसी अकाउंटेंट ने तैयार नहीं किया है। इसमें सरकार की बदली हुई सोच दिख रही है कि जब दुनिया भर में नोट छापके अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने और बचाने की कोशिश हो रही है, तो हम क्यों नहीं। इससे रोजगार बढ़ेगा, उपभोग बढ़ेगा और समग्र रूप से अर्थव्यवस्था के विकास का माहौल बनेगा। बाजार ने इसलिए इसका जोर-शोर से स्वागत किया।

सौजन्य - अमर उजाला।

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क्या गरीबों पर खर्च घट जाएगा (हिन्दुस्तान)

यामिनी अय्यर, अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च 


कोविड-19 जैसा कोई दूसरा संकट नहीं और जैसी आशंका थी, इसने केंद्र सरकार के पूरे अंकगणित पर कहर बरपा दिया है। गिरते कर राजस्व और खर्च के बढ़ते दबाव से सरकार की जद्दोजहद साफ दिख रही है। इसलिए दो सवाल हैं, जो इस बार के बजट से पूछे जाने की जरूरत है। एक, महामारी के कारण हुई भारी आर्थिक क्षति का मुकाबला करने के लिए सरकार ने अपनी व्यापक-राजकोषीय स्थिति को किस तरह फिर से खड़ा करने का प्रयास किया और कोविड-19 के कारण बिगडे़ आर्थिक संकट के जवाब में उसने जो नीतियां अपनाईं, उनके बारे में यह बजट क्या कहता है? दूसरा, अर्थव्यवस्था को फिर से सेहतमंद बनाने के लिए 2021-22 का बजट कैसी नीतिगत राह दिखाता है? वित्त वर्ष 2020-21 में लॉकडाउन से पैदा आर्थिक ठहराव के कारण राजस्व में गिरावट अपेक्षित थी, जबकि खर्च का दबाव बढ़ता चला गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को बधाई देनी चाहिए कि वित्तीय वर्ष 2025-26 तक राजकोषीय घाटे को युक्तिसंगत बनाने की राह तैयार करते हुए उन्होंने इस घाटे के आंकड़ों को साफगोई से सबके सामने रखा है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि खाद्य सब्सिडी के लिए ऑफ-बजट कर्ज (ऐसा कर्ज, जो सरकार खुद न लेकर किसी सरकारी संस्था को लेने के लिए कहती है। ये कर्ज सरकार के खर्च को पूरा करने में मदद करते हैं) की परंपरा को भी उन्होंने तोड़ा है। हालांकि, आंकड़ों पर गौर करें, तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल जान पड़ती है।

पहली वजह, कर राजस्व बेशक लुढ़क गया, लेकिन केंद्र की आमदनी पर वास्तविक चोट विनिवेश में गिरावट और बही-खाता में ‘ऑफ-बजट खर्च’ (ऐसा खर्च, जिसकी चर्चा आम बजट में न हो) की आमद के कारण पड़ी है। दूसरा कारण, व्यय में बढ़ोतरी मूलत: खाद्य एवं खाद सब्सिडी (करीब 80 फीसदी) के कारण हुई है, जबकि 3.88 फीसदी वृद्धि की वजह स्वास्थ्य खर्च है। तीसरी वजह, करों के राजस्व-पुल में राज्यों की हिस्सेदारी 32 फीसदी के बजटीय अनुमान से घटकर 28.9 फीसदी (संशोधित अनुमान 2020-21) हो गई है। सरकार ने इस धारणा पर भरोसा किया है कि विनिवेश से होने वाली आय से खर्च संबंधी जरूरतों को वह पूरा कर लेगी। अच्छें वक्त में यह बुरी अर्थनीति मानी जाती है, मगर महामारी के समय में यह गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती है। सरकार पूंजी-प्रवाह को बढ़ाने के लिए यदि खर्च बढ़ाने या करों में कटौती जैसे बजटीय प्रावधानों से परहेज करती है, तो यह राजकोषीय कुप्रबंधन का नतीजा है, न कि कोविड-19 से मिले आर्थिक झटकों का। इस बार के बजट में विनिवेश पर जोर दिया गया है, जो स्वागतयोग्य तो है, पर यह खासा जोखिम भरा भी है। इन लक्ष्यों को पाने के लिए वित्त वर्ष 2021-22 में सरकार को बिना देरी मजबूत प्रतिबद्धता दिखानी पड़ेगी। 

दूसरा, वित्त वर्ष 2020-21 में खर्च में बढ़ोतरी सब्सिडी और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के माध्यम से जरूरी राहत देने तक सीमित थी। कुल मिलाकर, वित्त वर्ष 2021 में व्यय का जीडीपी बजट अनुमान 13.53 से बढ़कर 14.4 प्रतिशत हो गया। हालांकि, अर्थव्यवस्था ज्यादा सिमटी है और खर्चों में कम बढ़ोतरी हुई है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस वित्त वर्ष में केंद्र प्रायोजित योजनाओं का खर्च बढ़ा है। मनरेगा जैसी कुछ ही योजनाओं में सरकार ने खर्च बढ़ाया है, जबकि दूसरी अनेक योजनाओं का खर्च घटा है। कोरोना की वजह से राज्यों को बाजार से उधार लेने के लिए मजबूर किया गया है, क्योंकि केंद्र सरकार के करों में राज्यों का हिस्सा काफी घट गया था। राज्यों के बजट पर इसका दीर्घावधि में परिणाम दिखेगा। बेशक, राज्य सरकारें केंद्र सरकार की तुलना में ज्यादा बेहतर राजकोषीय अनुशासन का प्रदर्शन करती हैं। जैसा कि इस लेख में हम चर्चा कर चुके हैं कि लॉकडाउन के बाद के आर्थिक सुधार असमानता को गहरा करने के संकेत दे रहे हैं। अब आर्थिक गतिविधियां महामारी पूर्व की स्थिति के करीब पहुंच गई हैं, लेकिन यह काफी हद तक लाभ द्वारा संचालित हैं। बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों ने छोटी कंपनियों व असंगठित क्षेत्र की कीमत पर मुनाफा बटोरा है। इसका श्रम बाजार पर गहरा असर हुआ है, खासकर असंगठित क्षेत्र में श्रम पर संकट गहराया है। अच्छी अर्थनीति या नैतिकता तो यही है कि इस प्रवृत्ति या ढर्रे को उलट दिया जाए। आखिरकार, यदि बहुसंख्यकों या ज्यादातर लोगों की क्रय शक्ति कम रहती है, तो मांग में गिरावट आएगी। इस संदर्भ में वित्तीय वर्ष 2021-22 के बजट में जन-कल्याण के लिए होने वाले खर्च में बढ़ोतरी करनी चाहिए। जन-कल्याणकारी योजनाएं होती ही इसलिए हैं कि वे समावेशी सामाजिक सुरक्षा ढांचे का निर्माण करें। कमजोर समूहों को बल प्रदान करें। विशेष रूप से प्रवासी मजदूरों और उनके पूंजीगत व्यय बढ़ाने का काम ऐसी जन-कल्याण योजनाएं करती हैं। पहली नजर में देखें, तो सोमवार को पेश बजट में सरकार ने केवल पूंजीगत व्यय सुधार की दिशा में काम किया है। सुधार के लक्ष्य के साथ कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं, जिन्हें अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यन ने ‘सॉफ्टवेयर’ कहा है, जैसे एक खराब बैंक का निपटारा, डीएफआई के लिए प्रस्ताव और बैंक पुनर्पूंजीकरण। ये सभी सही दिशा में उठाए गए कदम हैं। हालांकि, यहां होने वाली बढ़ोतरी तुरंत रोजगार में तब्दील नहीं होगी और न गरीबों की मजदूरी बढ़ाएगी। अभी शासन के सामने ऐसी चुनौतियां हैं, जिन्हें रातोंरात दुरुस्त नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में यह मान लेना एक गलती होगी कि वित्त वर्ष 2021-22 अपने कल्याणकारी व्यय कम करने के लिए सरकार को मौका देगा। लेकिन वित्त वर्ष इस वर्ष के बजट में खाद्य सब्सिडी और मनरेगा के आवंटन में कटौती साफ है। ऐसे कदम कतई तसल्ली नहीं देते कि सरकार देश के असंगठित क्षेत्र और शहरी श्रमिकों की कमजोरियों, समस्याओं को दूर करेगी। हम इतना जरूर कह सकते हैं कि वित्त वर्ष 2022 में 2015 की तुलना में थोड़ा नियोजित विकास होगा। महामारी ने भारत के गरीब और कमजोर लोगों पर काफी प्रतिकूल प्रभाव डाला है। उम्मीद यह थी कि यह बजट विस्तारवादी राजकोषीय रुख अपनाकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के दौरान उनकी जरूरतों को संबोधित करेगा, लेकिन यह हुआ नहीं।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Tuesday, February 2, 2021

Budget 2021: ढांचागत विकास और निवेश पर जोर (अमर उजाला)

सी एम वासुदेव  

कई तरह की चुनौतियों के बीच वित्तीय वर्ष 2021-22 का केंद्रीय बजट पेश किया गया है। इनमें तीन चुनौतियां  प्रमुख हैं। पहली है अर्थव्यवस्था में मंदी, दूसरी कोविड के अर्थव्यवस्था पर कुप्रभाव से और तीसरी है व्यापक आर्थिक संतुलन बनाए रखना। इन सभी चुनौतियों से निपटने के लिए वित्तमंत्री ने बजट में सार्थक प्रस्ताव रखे हैं। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट को हम यहां इस प्रकार समझ सकते हैं-

ढांचागत विकास को बढ़ावा देने के लिए इस बार के बजट में कई प्रकार के निवेश प्रस्ताव प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें हाई-वे, रेलवे, बंदरगाह इत्यादि में सरकारी व निजी निवेश करने के प्रस्ताव हैं। बजट में सामाजिक बुनियादी ढांचा, जिसमें स्वास्थ्य व शिक्षा सम्मिलित है, की ओर विशेष ध्यान दिया गया है और इन क्षेत्रों में, निवेश की सीमा बढ़ाई है।

आर्थिक क्षेत्र को मजबूत करने के लिए बजट में कई प्रस्ताव दिए गए हैं। इनमें बैंकों के नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए), जो कोविड की वजह से काफी बढ़ गए हैं, उससे निपटने के लिए विशेष प्रयास किए जाएंगे। इसके साथ ही दो सरकारी बैंकों का निजीकरण भी प्रस्तावित है, जिससे इन बैंकों के संचालन में दक्षता आएगी। वहीं बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा को 49 फीसदी से बढ़ाकर 74 फीसदी कर दिया गया है।

राजकोषीय घाटा इस वर्ष जीडीपी का 9.5 फीसदी होने का अनुमान है, और अनुमानों के अनुसार अगले वर्ष यह घाटा 6.8 फीसदी होना अनुमानित है। इससे यह लगता है कि वित्तमंत्री ने विकास की गति तेज करने के लिए राजकोषीय घाटे में ढील देना आवश्यक समझा है। इसका मुद्रास्फीति पर क्या प्रभाव होगा यह देखने वाली बात है।

कृषि क्षेत्र में भी इस बजट में कई प्रस्ताव रखे गए हैं, जिनमें किसानों की आमदनी दुगुनी करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई गई है। एमएसपी चालू रखने के लिए सार्थक प्रयास दोहराए गए हैं। कृषि मंडियों का सुधार और उनके माध्यम से कृषि क्षेत्र के ढांचे में निवेश के लिए कृषि मंडियों के माध्यम से वित्तीय संसाधन जुटाए जाएंगे। पेट्रोल और डीजल पर कृषि सेस लगाने का प्रस्ताव है। हालांकि आम आदमी पर अभी कोई इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। 

जहां तक सरकार के संसाधन जुटाने का प्रश्न है, इस बजट में कोई नए कर प्रस्तावित नहीं किए गए हैं। सरकारी उपक्रम आैर संपत्ति के विनिवेश के माध्यम से लगभग 1.70 लाख करोड़ रुपये जुटाने का प्रस्ताव है। कुछ क्षेत्र में कस्टम ड्यूटी बढ़ाने व कम करने के प्रस्ताव इस बजट में हैं, जिनसे छोटे व मध्य श्रेणी के उद्योंगों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। आयकर व

जीएसटी में सरलीकरण के कई प्रस्ताव इस बजट में हैं।  साथ ही पहली बार पूरे देश में एक डिजिटल जनगणना की घोषणा की गई है, जिससे अर्थव्यवस्था में डिजिटल भुगतान को सुदृढ़ किया जा सकेगा।

स्वास्थ्य बजट में 137 फीसदी की बढ़ोतरी की है, इसके बावजूद पूरे देश में हर व्यक्ति को कोविड वैक्सीन उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए बजट में 35,000 करोड़ का प्रावधान रखा गया है, जो संभवत: हर व्यक्ति को सरकारी खर्च पर वैक्सीन लगाने के लिए पर्याप्त न हो। मेरे विचार में प्रत्येक व्यक्ति को वैक्सीन उपलब्ध कराना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक धनराशि जुटानी चाहिए, क्योंकि देश में यदि कामगार स्वस्थ्य और गतिशील होंगे, तो देश के आर्थिक विकास में और तेजी आएगी। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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वैश्विक महामारी की पृष्ठभूमि में बड़े बदलाव लाने वाला बजट (अमर उजाला)

मोहनदास पई एवं निशा होला 

वर्ष 2021-22 के बजट को वैश्विक महामारी की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए हो रहे अप्रत्याशित खर्च की भरपाई के साथ-साथ अगले वित्त वर्ष में मितव्ययिता उपायों के जरिये राजकोषीय घाटे को तेजी से कम करने के लिए कर लगाए जाने की आशंका थी। शुक्र है कि ऐसा नहीं हुआ। देश के स्वास्थ्य एवं बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाते हुए और कोविड-19 के नकारात्मक असर से निकलने के लिए विकासोन्मुखी बजट की जरूरत थी और यह बजट इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। 



सबसे बड़ी बात है कि सरकार स्वास्थ्य एवं बुनियादी ढांचों पर खर्च करने की एक विस्तारवादी विकास नीति बना रही है। इसने वित्त वर्ष 2021 में  9.5 फीसदी के राजकोषीय घाटे का आकलन किया है, जिसमें बजट सब्सिडी भी शामिल है। पिछले बजट में 2.28 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी की तुलना में इस बार के बजट में सब्सिडी के मोर्चे पर 5.95 लाख करोड़ रुपये हैं, जिनमें 4.2 लाख करोड़ रुपये की खाद्य सब्सिडी और 1.3 लाख करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी है। बजट में इतनी भारी-भरकम सब्सिडी का प्रावधान रखने से राजकोषीय घाटे का इस सीमा तक पहुंचना स्वाभाविक है। इस राजकोषीय घाटे को वित्त वर्ष 2022 में खत्म करने का लक्ष्य है, जब सब्सिडी को घटाकर 3.35 लाख करोड़ रुपये किया जाएगा, जिसमें खाद्य सब्सिडी 2.4 लाख करोड़ रुपये और उर्वरक सब्सिडी 79,000 करोड़ रुपये शामिल होंगे। राष्ट्रीय लघु बचत कोष को भी सीधे बजट में लाया गया है, भारतीय खाद्य निगम एनएसएफ से उधार नहीं लेगा। 18.5 लाख करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे (वित्त वर्ष 2021 के 194.8 लाख करोड़ रुपये के जीडीपी का 9.5 फीसदी) के साथ उम्मीद है कि सरकार अपने वित्तपोषण को साफ करेगी, वर्ष के सभी खर्च पूरे करेगी और इस असाधारण साल को पीछे छोड़ देगी। कम उधार के साथ 2022 में रोजकोषीय घाटे को कम कर 6.8 फीसदी तक लाने का लक्ष्य है।



कोविड के लिए 35,000 करोड़ आवंटन के साथ इस वर्ष स्वास्थ्य पर खर्च में 137 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है, जो स्वागतयोग्य है। वैश्विक अर्थव्यवस्था से होड़ करने  और विकास के लिए भारत को वैश्विक स्तर के बुनियादी ढांचों की जरूरत है। सार्वजनिक व्यय यहां विकास का सबसे बड़ा प्रेरक है और सरकार ने इस बजट में इसे गति देने पर ध्यान केंद्रित किया है। 

राजमार्गों और हवाई अड्डों जैसी मौजूदा परिसंपत्तियों का मौद्रीकरण करके, उसे बेचकर बीस हजार करोड़ रुपये की लागत से एक विकास वित्तीय संस्थान शुरू कर परियोजनाओं के लिए पांच लाख करोड़ जुटाने का अभिनव तरीका निकाला है। 


इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च को 4.39 लाख करोड़ से बढ़ाकर 5.4 लाख करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव रखा गया है। 13 प्रमुख उद्योग क्षेत्रों के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना का विस्तार करना और कई वस्तुओं के लिए सीमा शुल्क बढ़ाना स्वदेशी विनिर्माण को प्रोत्साहित करेगा। मेट्रो और बसों जैसे सार्वजनिक परिवहन विकल्पों की क्षमता में सुधार से विकास में योगदान  होगा। बिजली उत्पादन एवं ट्रांसमिशन में पिछले कुछ वर्षों में सुधार हुआ है, लेकिन वितरण अब भी उचित कीमत के अभाव, बर्बादी और लूट से पीड़ित है। डिस्कॉम निवेश और उन्नयन के लिए तीन लाख करोड़ रुपये के भारी परिव्यय के साथ उपभोक्ताओं के लिए प्रतिस्पर्धात्मक विकल्प पैदा करने पर ध्यान केंद्रित करने से कीमत में हेरफेर रोकने में मदद मिलेगी और नागरिकों की बिजली तक पहुंच बेहतर होगी।


एमएसपी के माध्यम से किसानों को मिलने वाले लाभ की मात्रा के साथ पेश किया गया आंकड़ा दिलचस्प है और इसे सार्वजनिक डाटाबेस पर एकत्र किया जाना चाहिए। किसानों को खाद्य, बिजली, उर्वरक, पानी, प्रत्यक्ष धन हस्तांतरण और अन्य सहित कुल केंद्रीय और राज्य सब्सिडी 7.5 लाख करोड़ से अधिक है; यह एक बड़ी राशि है, जिस पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए। इसकी एक बड़ी राशि करदाताओं की कीमत पर संभवतः बड़े किसानों को दी जाती है, जिसे संतुलित किए जाने की जरूरत है। निजी क्षेत्र द्वारा प्रबंधित उच्च शिक्षा विश्वविद्यालयों के प्रस्तावित क्लस्टरिंग के अलावा, विशेष रूप से राष्ट्रीय शैक्षिक नीति-2020 के मद्देनजर शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। पांच वर्षों में राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन पर 50,000 करोड़ रुपये का परिव्यय एक स्वागत योग्य कदम है, जो चीन एवं अमेरिका के बरक्स भारत में नवाचार को बेहतर बनाने में योगदान देगा। डिजिटल पेमेंट, देसी भाषाओं, अंतरिक्ष और महासागरों पर फोकस अच्छा है, और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के साथ इसे संवर्धित किया जा सकता है। इसका लाभ केवल सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि निजी क्षेत्र को इसमें शामिल करना चाहिए।


सरकार कर सुधारों के बारे में गंभीर है और इलेक्ट्रॉनिक निष्पादन के अलावा अधिकरणों की स्थापना करके डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये स्कैलेबिलिटी (मापनीयता) का लाभ उठा रही है। करदाता मध्यवर्ग के लिए विशेष रूप से कोविड-19 और पिछले वर्ष के सात स्लैब के टैक्स ढांचे को ध्यान में रखते हुए टैक्स ढांचे को सरल बनाना स्वागत योग्य कदम है। कुल मिलाकर कोविड-19 की पृष्ठभूमि को देखते हुए यह बजट दस में से 9.5 अंक का हकदार है। सबसे बड़ी राहत की बात है कि इसमें कोई नया कर या उपकर नहीं लगाया गया है। सरकार ने यह समझा है कि एक बुरे वर्ष में नागरिकों पर गलत तरीके से कर नहीं लगाया जा सकता है। उद्यमियों का उत्साह फिर से उभरेगा।


हालांकि स्टार्ट अप को समर्थन का अभाव निराश करता है, लेकिन अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर बढ़ता खर्च, स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा, कर सुधार और वित्तीय क्षेत्रों में सुधार स्वागत योग्य कदम हैं और पचास खरब की अर्थव्यवस्था बनने की भारत की आकांक्षा की दिशा में हैं। 


(-टीवी मोहनदास पई एरियन कैपिटल के चेयरमैन एवं निशा होला ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विजिटिंग फेलो हैं।)

सौजन्य - अमर उजाला।

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आखिर आ गया भारतीय जनता पार्टी का 'अपना बजट' (बिजनेस स्टैंडर्ड)

शेखर गुप्ता  

इस बार का बजट पिछले 30 वर्षों में भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में पहला बड़ा बदलाव लेकर आया है। यह बदलाव सही दिशा में भी है। यह वैचारिक स्तर के अलावा समझदारी के स्तर पर भी सही है। अगर इसे सियासी अंदाज में कहा जाए तो यह मोदी सरकार के समय पेश किया गया 'पहला भाजपाई बजट' है। अभी तक पेश किए गए सारे बजट में कांग्रेस की नीतियों में ही थोड़ा हेरफेर था।  

यह फैशन हो चुका है कि भारत की तमाम समस्याओं के लिए 1991 के सुधारों को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए। दूसरी तरफ भारत का अभिशाप यह है कि सुधारों के पल बहुत कम रहे हैं। यही वजह है कि जब भी कोई सुधार दिखता है तो हम उसे स्वप्निल बजट कहने लगते हैं।


1991 के सुधारों के बाद 1997-98 में वामदलों के समर्थन से चल रही देवेगौड़ा सरकार में पी चिदंबरम वित्त मंत्रालय संभाल रहे थे। उस सरकार में इंद्रजित गुप्ता एवं चतुरानन मिश्रा जैसे वरिष्ठ वाम नेता गृह और कृषि जैसे अहम मंत्रालय संभाल रहे थे।


अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के परवर्ती 'इंडिया शाइनिंग' काल में यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह ने भी तीन बजट पेश किए थे। तमाम गतिरोधों और सीमा शुल्क एवं कर कटौतियों के बावजूद वह एक बढिय़ा दौर था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने निजीकरण की रफ्तार रोक दी थी। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह के समय आर्थिक सुधारों का सिलसिला करीब 18 महीनों में ही रुक गया, चिदंबरम ने एक साल ही ऐसा किया था। वाजपेयी को 2004 में मिली औचक शिकस्त के बाद बनी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की नई सरकार ने समावेशी विकास के नए समीकरण को अपना लिया। उस चुनावी नतीजे का यही मतलब निकाला गया था कि भारत के गरीबों ने आर्थिक प्रगति पर वाजपेयी सरकार के जोर को नकारते हुए कांग्रेस को मत दिया है। किसी ने भी इस बात पर गौर नहीं किया कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के बीच सिर्फ सात सीटों का अंतर था।


लेकिन संप्रग सरकार का दूसरा कार्यकाल आने तक भारत में मौजूद हरेक समस्या के लिए वृद्धि को ही जिम्मेदार ठहराया जाने लगा और गरीबों की दुर्दशा के लिए भी वही दोषी माना गया। उस सरकार ने शिक्षा, खाद्य एवं रोजगार के अधिकार देने वाले कानून भी पारित किए थे। रहम की बात है कि संप्रग सरकार इतना नहीं चली कि सोनिया गांधी एवं राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बढिय़ा मॉनसून और क्रिकेट में जीत की गारंटी देने वाले कानून भी बना दे।  


ये सरकारें कह सकती थीं कि उनके पास बहुमत नहीं है। वैसे नरेंद्र मोदी को मतदाताओं ने दो बार बहुमत देकर इस तर्क से वंचित कर दिया था। मोदी ने भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक को लोकसभा में पारित कराते हुए पहला बड़ा कदम उठाया था। फिर उन पर 'सूट बूट की सरकार' चलाने का आरोप लगा और मोदी ने अपने कदम पीछे खींच लिए। इस वजह से बड़े सुधार छह वर्षों तक खयाल में भी नहीं आए। नोटबंदी ने हालात को और भी बिगाड़ दिया।


मोदी को महामारी की वजह से उपजे हालात से मदद मिली और इस बजट ने घड़ी को पीछे कर दिया। एक लोकतंत्र में स्वास्थ्य एवं शिक्षा से लेकर रक्षा, अर्थव्यवस्था, कल्याण एवं बाजार तक सब कुछ राजनीति से ही तय होता है। एक लोकतंत्र में अर्थव्यवस्था का प्रबंधन एवं दिशा राजनीति ही तय करती है।  


आप अब तरकीब से सुधार नहीं कर सकते हैं। बगीचे में नीचे लटक रहे सारे फलों को पहले ही तोड़ा जा चुका है। इसके उलट मोदी के पहले छह वर्षों में कुछ पुरानी बुरी आदतें भी लौट आई हैं- अफसरशाही नए सिरे से ताकतवर हुई है, आयात नियंत्रण एवं सीमा शुल्क का संरक्षणवादी रवैया और कर दरों की अनिश्चितता।


अर्थशास्त्री एवं लोक वित्त विशेषज्ञ ही बजट के बारीक बिंदुओं को समझ पाएंगे। मेरा नजरिया तो राजनीतिक है। मैं इसे भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में एक बदलाव के तौर पर देखता हूं। इस बजट में सबसे अच्छी खबर यह है कि कराधान पर कोई खबर नहीं है। सभी कर दरें पुराने स्तर पर ही हैं। यह एक प्रगति है और यह राजनीतिक है।


सैकड़ों बुरे खयाल चर्चा में थे। कर दरों में बढ़ोतरी, संपत्ति जब्त करने, असफल हो चुके उत्तराधिकार एवं संपत्ति करों की वापसी, अप्राप्त पूंजी लाभ पर भी कर लगाने जैसे प्रस्तावों का जिक्र हो रहा था। प्रतिष्ठित क्षेत्रों में उन विचारों पर अधिक जोर था। अगर बजट में इन खयालों पर अमल किया गया होता तो एक दिन बाद हम बजट को किस रूप में देख रहे होते?


मोदी सरकार एक बात को लेकर खासी ईमानदार है कि वह अर्थशास्त्रियों की नहीं सुनती है। इस मामले में अच्छा ही है कि उसने उनकी नहीं सुनी। इसका कारण यह है कि अर्थशास्त्रियों को बजट के बाद जवाबदेह नहीं होना पड़ता है। जवाब नेताओं को देना पड़ता है। आप पसंद करें या नहीं लेकिन मोदी सरकार ने यह अलहदा राजनीतिक फैसला लिया है।


कई दशकों तक भारत वृद्धि बनाम असमानता के द्वंद्व में उलझा रहा है। यह एक बनावटी बहस है। क्योंकि अगर वृद्धि से अधिक असमानता पैदा होती है तो वृद्धि का अभाव क्या करता है? वृद्धि से अमीर और धनवान बनता है लेकिन क्या इससे गरीब और भी गरीब हो जाता है? अमीर तो उस समय भी बढिय़ा स्थिति में होते हैं जब वृद्धि तेजी से कम हो रही होती है। महामारी के साल में करोड़ों लोगों के बेरोजगार होने के बीच भी कुछ अरबपतियों की संपत्ति बढऩे पर दुनिया भर में मचे रोने-धोने को ही देख लीजिए।


इस बजट का सियासी संकेत यह है कि मोदी सरकार अब अधिक राजस्व के लिए वृद्धि पर दांव लगा रही है। मैं वॉल स्ट्रीट में प्रकाशित माइकल डगलस गॉर्डन गेक्को के लेख में कुछ बदलाव करते हुए अपनी बात रखना चाहूंगा-- बात यह है कि किसी बेहतर शब्द के अभाव में वृद्धि अच्छा है। वृद्धि ठीक है और यह कारगर है। वृद्धि विकासवादी भावना के सार को अपनाती है। जिंदगी, प्यार एवं पैसे जैसे अपने तमाम रूपों में वृद्धि ने मानवता को उन्नत ही किया है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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आम बजट में नहीं है कोई नयापन (बिजनेस स्टैंडर्ड)

रथिन रॉय  

इस वर्ष अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री बजट के बुनियादी काम पर लौट आईं और उन्होंने वृहद-राजकोषीय स्थिति का स्पष्ट उल्लेख किया। यह बात बहुत अहम है क्योंकि बजट भाषण एक ऐसा दस्तावेज है जिसका रिकॉर्ड रहता है और आंकड़ों का उल्लेख सरकार को संसद के प्रति और आगे चलकर इतिहास के प्रति जवाबदेह बनाता है। सकारात्मक बात यह भी थी कि वित्त मंत्री ने बजट से इतर लेनदेन को बजट में शामिल करने की प्रतिबद्धता जताई और व्यय कार्यक्रम को लेकर पंचवर्षीय परिदृश्य में सोचने की शुरुआत की। यह देखना राहत की बात थी कि पंद्रहवें वित्त आयोग में राज्यों को किए जाने वाले हस्तांतरण की राशि अपरिवर्तित रखी गई और अतिरिक्त हस्तांतरण का प्रस्ताव रखा गया तथा स्वीकार किया गया।

वित्त वर्ष 2020-21 की शुरुआत कमजोर रही क्योंकि राजस्व प्राप्तियां कम रहीं। राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को भी संशोधित करना पड़ा। महामारी के असर ने सरकार पर और अधिक दबाव बनाया कि वह संसाधनों का समुचित इस्तेमाल करने और अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखने के लिए व्यय में इजाफा करे। ऐसे में मैं राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में इजाफे को लेकर चिंतित नहीं था बल्कि मेरी चिंता यह थी कि उधार ली गई धनराशि का क्या किया गया।


राजकोषीय घाटा बढ़कर जीडीपी के 6 फीसदी तक पहुंच चुका है। इसमेंं से एक फीसदी का इजाफा तो राजस्व में कमी के कारण आया है। बहरहाल, ऐसा व्यापक तौर पर गैर कर राजस्व में कमी के कारण हुआ। यह कमी इसलिए आई क्योंकि सरकारी उपक्रमों के लाभांश में भारी कमी दर्ज की गई। कर राजस्व में कमी अपेक्षाकृत कम रही। यह जीडीपी का बमुश्किल 0.43 फीसदी रही। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि केंद्रीय उत्पाद शुल्क में हुए इजाफे, यानी पेट्रोलियम उत्पाद प्राप्तियों के कारण हुई बढ़ोतरी ने प्रत्यक्ष कर और जीएसटी संग्रह में कमी की काफी हद तक भरपाई कर दी। परंतु संसाधन जुटाने की प्रक्रिया को सबसे बड़ा झटका कोविड के कारण नहीं लगा। विनिवेश प्राप्तियों के लिए जहां 2.1 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य तय किया गया था, वहीं केवल 32 हजार करोड़ रुपये का विनिवेश हो सका। ऐसा तब हुआ जब शेयर बाजार और पूंजी बाजार में पर्याप्त तेजी थी। राजस्व के मोर्चे पर कमजोर प्रदर्शन के साथ यह विफलता वित्त मंत्रालय की खराब क्रियान्वयन क्षमता का भी प्रदर्शन करती है।


वित्त मंत्री ने दावा किया कि पूंजीगत व्यय में भारी इजाफा किया गया है लेकिन आंकड़ों में यह नजर नहीं आया। राजस्व घाटा इस बात का आकलन पेश करता है कि सरकार अपने राजस्व व्यय की भरपाई के लिए किस हद तक उधारी लेती है। सन 2020-21 के बजट अनुमान में कहा गया था कि ऐसी उधारी राजकोषीय घाटे का 77 फीसदी होगी और केवल 23 फीसदी पूंजीगत व्यय के लिए शेष रह जाएगी। संशोधित अनुमान में यह घटकर 21 फीसदी रहा। अगले वर्ष के लिए सरकार का प्रस्ताव है कि यह बढ़कर 24 प्रतिशत हो जाएगा। सार्वजनिक व्यय को देखते हुए यह किसी भी तरह अधिक नहीं है। राजकोषीय गणित के समक्ष बड़े आंकड़े कुछ खास नहीं करते। इस वर्ष व्यय की प्रतिबद्धता काफी अलग है। देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि व्यय प्रतिबद्धता में काफी कमी आई है। बहरहाल, यह गिरावट काफी हद तक इसलिए आई क्योंकि जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर के संग्रह में नाकामी हाथ लगी। इस प्रकार राज्यों को मिलने वाली राशि में 26,400 करोड़ रुपये की कमी आई और वित्त आयोग के अनुदान में हुए 32,427 करोड़ रुपये के इजाफे को इसने प्राय: निष्प्रभावी कर दिया।


कुल व्यय में 4 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ। बहरहाल, इसका अधिकांश हिस्सा आय समर्थन या स्वास्थ्य व्यय में नहीं है। कम से कम 40 प्रतिशत वृद्धिकारी व्यय खाद्य और उर्वरक से जुड़ी सब्सिडी के क्षेत्र में हुआ जबकि अन्य 12 प्रतिशत मनरेगा आवंटन में इजाफे में। ऐसे में बहुप्रचारित राजकोषीय प्रोत्साहन अनिवार्य तौर पर राहत से संबंधित रहा है। यह भले ही बेहतर है लेकिन इससे यह संकेत नहीं मिलता कि राजकोषीय संसाधनों का इस्तेमाल आर्थिक सुधार को अंजाम देने की मंशा से किया गया।


ऐसे में राजकोषीय घाटे में छह फीसदी की बढ़ोतरी का एक तिहाई हिस्सा संसाधन जुटाने में कमी से संबंधित है और शेष का बड़ा हिस्सा राहत और सब्सिडी से ताल्लुक रखता है। निवेश की इस पूरी कहानी में कोई खास हिस्सेदारी नहीं है। न ही स्वास्थ्य पर व्यय बढ़ाया गया है। राजस्व व्यय अभी भी राजकोषीय घाटे में वृद्धि का प्राथमिक स्रोत है। दुख की बात है कि महामारी ने बजट में ढांचागत बदलाव को इस हद तक गति नहीं प्रदान की है जिसके आधार पर कहा जा सके कि सक्रिय राजकोषीय नीति ने आर्थिक सुधार को जन्म दिया है। यही कारण है कि वित्त वर्ष 2021-22 का जीडीपी अनुमान अभी भी 2019-21 से कम है।


बजट ने यह लक्ष्य तय किया है कि अगले वर्ष राजस्व व्यय में वृद्धि को कम करके राजकोषीय घाटे को कम किया जाएगा। राजस्व प्राप्तियों में इजाफा करने की कोई इच्छा नहीं जताई गई है। यह काबिले तारीफ है खासकर यह देखते हुए कि बीते चार वर्ष में प्रदर्शन बहुत खराब रहा। बहरहाल, विनिवेश के मोर्चे पर यह नजर नहीं आता और वहां आंकड़ों में मामूली बदलाव है। यह राजकोषीय नियोजन की शाश्वत समस्या है। परिसंपत्तियों की बिक्री और विनिवेश की बातें तो काफी होती हैं लेकिन यह सरकार इस दिशा में ठोस कदम कम ही उठा सकी है। यही कारण है कि यह एक आम सा बजट है जो बताता है कि सरकार ने कैसे लोगों को महामारी के असर से बचाने के लिए धन खर्च किया। हालांकि इस बीच समाज का अमीर तबका लगातार मुनाफा कमाता रहा।


देश के समक्ष तमाम आर्थिक चुनौतियां होने के बावजूद अरुण जेटली का 2016 का बजट इस प्रशासन के लिए एक स्वर्णिम मानक बना हुआ है। इसमें किसी आर्थिक नीति का कोई संकेत नहीं है। न ही मध्यम अवधि के व्यय की कोई योजना है जो महामारी के कारण हुए घावों को भरने में मदद करे। मांग के घटक में बदलाव की भी कोई नीति नहीं है। निर्यात आधारित वृद्धि को बढ़ाने वाली कोई बात भी इसमें नजर नहीं आती। कई एकबारगी सुधार जरूर हैं जो जरूरी हैं लेकिन इनसे ऐसी सुसंगत नीति नहीं बनेगी जो 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था तैयार करे या आत्मनिर्भरता को सुरक्षित करे। नए एफआरबीएम लक्ष्यों को लेकर कोई विशिष्ट दलील नहीं दी गई है। मुझे वित्त आयोग की रिपोर्ट का विश्लेषण करना होगा ताकि यह देख सकूं कि क्या ऐसी कोई दलील है? बहरहाल बढ़ी हुई पारदर्शिता, कर प्रशासन को सहज बनाने के लिए की गई सकारात्मक पहल और बजट से इतर चीजों को राजकोषीय लेखा के अधीन लाने के रूप में कुछ सकारात्मक कदम भी उठाए गए हैं जो अच्छी बात है।


(लेखक ओडीआई लंदन के प्रबंध निदेशक हैं। लेख में विचार व्यक्तिगत हैं)

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वंचितों के लिए नाकाफी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

वर्ष 2021-22 के आम बजट में वृद्धि और सुधार का नया एजेंडा तय किया गया है। यह एजेंडा बाजार से ली गई उधारी और अल्प बचत के माध्यम से पूंजीगत व्यय बढ़ाने पर केंद्रित है।


किसी भी अन्य वर्ष में बजट से जुड़े प्रश्न इस नीति के प्रभाव पर केंद्रित रहते। परंतु 2020-21 सामान्य वर्ष नहीं है। यह ऐसा वर्ष है जब महामारी ने संपूर्ण विश्व के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को भी चपेट में लिया। इस वर्ष बहुत बड़ी तादाद में भारतीयों ने रोजगार गंवाया।


ऐसे में यह सवाल भी होना चाहिए कि इस बजट ने देश के सर्वाधिक संवेदनशील और महामारी से सर्वाधिक प्रभावित तबके की चिंताओं को किस हद तक दूर किया। यह वह वर्ग है जो आय वितरण में एकदम निचले क्रम पर आता है।


इसका स्पष्ट उत्तर है कि उनकी चिंताओं का अच्छी तरह निराकरण नहीं किया गया। सच यह है कि अधोसंरचना को उन्नत बनाकर मध्यम और दीर्घावधि में रोजगार तैयार करने की नीति के अपने लाभ हो सकते हैं लेकिन एक ऐसे वर्ष में जब अल्पावधि की चिंताएं बहुत गहन हैं, एक दीर्घकालिक नीति शायद तात्कालिक समस्याओं को हल नहीं करे।


कहने का अर्थ यह नहीं है कि बजट में स्वाभाविक तौर पर लोककल्याणकारी रुख अपनाया जाना चाहिए। बल्कि संकट के समय बजट का आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित लोगों को उबारने के लिए उसमें क्या कदम उठाए गए।


इस नजरिये से देखा जाए तो बजट के व्यय संबंधी रुख के बारे में ज्यादा से ज्यादा यही कहा जा सकता है कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय यह मान चुका है कि महामारी समाप्त हो चुकी है।


उदाहरण के लिए खाद्य सब्सिडी शायद पिछले वर्ष लंबी खिंच गई क्योंकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से होने वाला वितरण लॉकडाउन के दौरान शिखर पर रहा। फिर भी यह स्पष्ट नहीं है कि आखिर क्यों महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के लिए आवंटन में एक तिहाई की कटौती की गई जबकि भारी पैमाने पर लोगों ने रोजगार गंवाए हैं। कुल मिलाकर सब्सिडी में काफी कमी की गई है। यह हाल के वर्षों की एक बड़ी उपलब्धि है।


परंतु इस समय इसे प्राथमिकता देने पर सवाल उठ सकता है। इसके अलावा बात करें तो ग्रामीण क्षेत्र की कुछ अधोसंरचना योजनाओं का वित्त पोषण जारी रखा जाएगा और महिलाओं और शिशुओं पर केंद्रित एकीकृत योजनाओं का पुनर्गठन किया जा रहा है। परंतु ऐसे समय में जबकि रिकॉर्ड तादाद में भारतीय गरीबी के दुष्चक्र में दोबारा उलझ गए हैं, क्या ऐसा करना उचित है?


शायद आम बजट की इस नाकामी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अधिक सचेत कोई और नहीं है। उन्होंने बजट पर केंद्रित अपनी टिप्पणी में कहा है कि इसे गत मार्च में लॉकडाउन लागू होने के बाद अपनाए गए उपायों की शृंखला में केवल एक उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए।


उन्होंने कहा कि इन उपायों में से अनेक महामारी, सामाजिक दूरी मानकों और लॉकडाउन के असर को कम करने में सहायक रहे। इसके बावजूद यह तथ्य बरकरार है कि उन पैकेजों के आकार, उनके वास्तविक राजकोषीय प्रभाव को लेकर तमाम दावों के बावजूद उनका वास्तविक असर सीमित रहा है। आशा की जा रही थी कि एक ऐसे वर्ष में जब सरकार को महामारी के सबसे अधिक शिकार लोगों को और अधिक धनराशि मुहैया करानी चाहिए थी, बजट ऐसा करने में नाकाम रहा।

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बजट अच्छा है लेकिन बेहतर बनाया जा सकता था (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सुकुमार मुखोपाध्याय  

आम बजट की सबसे अच्छी बात यह है कि इसने उन आशंकाओं को समाप्त कर दिया है जो आयातकों और विश्लेषकों के मन में थीं। उन्हें भय था कि बजट में सीमाशुल्क बढ़ाया जाएगा जिससे संरक्षणवादी रुख एक बार फिर मजबूत होगा। सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया है। हालांकि शुल्क दरों में बदलाव किए गए हैं और उद्योगों की प्रकृति के अनुसार उनमें कमी और बढ़ोतरी दोनों देखने को मिली है। लौह और इस्पात उद्योग की बात करें तो कई चीजों के लिए शुल्क दरें कम की गई हैं ताकि लोहे और इस्पात से बनने वाले उत्पादों के दाम में हुए इजाफे का असर समाप्त किया जा सके। कैप्रोलैक्टम (प्लास्टिक बनाने में इस्तेमाल होने वाला), नायलॉन चिप, नायलॉन फाइबर और धागे पर शुल्क 5 प्रतिशत कम किया गया है। नेफ्था पर लगने वाला शुल्क 2.5 प्रतिशत कम किया गया है। किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए बजट में कपास पर लगने वाले सीमा शुल्क को शून्य से बढ़ाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया है और कच्चे रेशम तथा रेशम के धागे पर शुल्क 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया है। बजट में एथाइल एल्कोहल के अंतिम उपयोग पर आधारित रियायत को समाप्त कर दिया गया है ताकि उसे ऐसे अन्य उत्पादों पर लगने वाले शुल्क के साथ तार्किक बनाया जा सके। कृषि क्षेत्र का बुनियादी ढांचा सुधारने के लिए कई उत्पादों पर अधोसंरचना एवं विकास उपकर लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। सीमा शुल्क संबंधी जांच पूरी करने के लिए एक तय समय-सीमा घोषित करने की बात कही गई है। बजट में एक अच्छा प्रस्ताव यह है कि सभी सीमा शुल्क रियायतें अगली 31 मार्च को दो वर्ष के बाद स्वत: समाप्त हो जाएंगी।

एक नकारात्मक पहलू यह है कि बजट के अनुसार एक ओर जहां 80 रियायतें समाप्त की गई हैं, वहीं इसमें इस वर्ष 400 पुरानी रियायतों की समीक्षा की बात भी शामिल है। इससे मुझे सर स्टैफर्ड क्रिप्स के प्रस्तावों के बारे में गांधीजी का कथन याद आता है। उन्होंने उन प्रस्तावों के बारे में कहा था कि वे ऐसे कैंसिल चेक के समान हैं जो जिन्हें भविष्य में ही भुनाया जा सकता है। सच तो यह है कि बजट टीम को बजट के पहले ही समीक्षा करनी चाहिए थी और नतीजों की घोषणा बजट में करनी थी। रियायतों की समीक्षा बजट टीम का काम है और वह यह नहीं कह सकती कि इसे अगले साल किया जाएगा। किसी भी रियायत की समीक्षा किसी भी समय हो सकती है और इसका उल्लेख बजट में करना जरूर नहीं। अब यह पता नहीं चल पाएगा कि इन 400 में से कितनी रियायतें समाप्त की गईं। ऐसे में इसके जिक्र का कोई अर्थ नहीं।


आम जनता से सुझाव लेने की जो बात बजट में कही गई वह भी बहुत भ्रामक है। हर वर्ष सभी अंशधारक सरकार को पत्र लिखकर प्रत्यक्ष तौर पर या किसी उद्योग या व्यापार संगठन (मसलन सीआईआई या फिक्की) आदि के माध्यम से अथवा वित्त मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात कर अपनी राय देते हैं। यह भी जनता की राय लेने जैसा ही है। बजट के संदर्भ में आम जनता का अर्थ राह चलता व्यक्ति नहीं होता। केवल अंशधारक ही लिखते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि क्या लिखना है। उदाहरण के लिए जब हम ग्रेन ओरियेंटेड स्टील शीट पर शुल्क कम करने की बात लिखते हैं तो हम आम जनता से नहीं केवल उनसे चर्चा करते हैं जो देश में इनका इस्तेमाल करते हैं। जब हम सॉफ्टवेयर पर शुल्क कम करते हैं तो हम इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के निर्माताओं और आयातकों तथा इलेक्ट्रॉनिक विभाग से बात करते हैं। सीमा शुल्क दरें आम आदमी का विषय नहीं हैं। ऐसे में आम आदमी का जिक्र केवल लोकलुभावन बनने का प्रयास है। ऐसा विचार पेश करने की कोशिश की गई कि यह बजट आम जनता के सुझावों से निर्मित है। यह गलत है क्योंकि हर वर्ष बजट ऐसे ही बनता है। अंशधारकों से चर्चा में कुछ भी नया नहीं।


बजट में ऐसी बातें शामिल की गईं जिनका उल्लेख बजट में नहीं होता। बजट में उन बातों के प्रस्ताव रखे जाते हैं जो की जानी हैं। यह कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है जिसमें यह बताया जाए कि पिछले साल कौन से अच्छे कदम उठाए गए। बताया गया कि वस्तुओं को बिना संपर्क, कागजी कार्रवाई और व्यक्तिगत मौजूदगी के स्वीकृति देने के लिए तुरंत प्रक्रिया शुरू की गई। यह भी कहा गया कि विदेश व्यापार समझौतों के क्षेत्र में की गई पहल सफल रही हैं। खासकर किसी वस्तु के निर्माण के मूल देश के बारे मेंं। इन बातों का उल्लेख जरूरी नहीं था क्योंकि ये बजट प्रस्ताव नहीं हैं। सच तो यह है कि मूल देश का मसला बहुत कटुता भरा है। जानकारी के मुताबिक मौजूदा मसलों को बॉन्ड और बैंक गारंटी के माध्यम से हल किया गया है और बजट इसका श्रेय नहीं ले सकता।


इस बजट में किसी सुधार की शुरुआत नहीं की गई है। सीमा शुल्क ढांचा पूरी तरह अतार्किक है क्योंकि इसमें विभिन्न शर्तों, प्रमाणन आवश्यकताओं आदि के साथ विविध दरें हैं। फिलहाल सीमा शुल्क के क्षेत्र में 150, 100, 85, 70, 65, 50, 40, 35, 30, 25, 15, 10, 7.5, 5, 3, 2.5, शून्य और कुछ विशिष्ट दरों समेत 19 दरें हैं। सैकड़ों रियायतें, शर्तें और सूचियां हैं जो सीमा शुल्क के वर्गीकरण को काफी जटिल बनाती हैं। सीमा शुल्क के क्षेत्र में रियायतें हटाने की दिशा में कुछ नहीं किया गया जबकि इससे अतिरिक्त राजस्व आ सकता था। इतना ही नहीं वर्गीकरण भी आसान होता। दरों को 150, 100, 50, 25, 15, 10 और 5 के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता था। रियायतों को समाप्त करना एक बड़ा कदम होता जो नहीं उठाया गया।


जीएसटी कानून में मुनाफा-विरोधी प्रावधान एक बड़ी कमी है। करीब 80 पक्ष इस मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष ले जा चुके हैं। इसमें शामिल राजस्व बहुत अधिक नहीं है। जीएसटी के कामकाज को सहज बनाने के लिए वित्त मंत्री बता सकती थीं कि इस प्रावधान को कब समाप्त किया जाएगा।


बजट अच्छा है लेकिन वह इतना भी अच्छा नहीं है कि वित्त मंत्री के 'समाजवादी बोझ' को उतार फेंकने के वादे को निभाता हो। वह ऐसा कब करेंगी?



सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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बजट अच्छा है लेकिन बेहतर बनाया जा सकता था (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सुकुमार मुखोपाध्याय  

आम बजट की सबसे अच्छी बात यह है कि इसने उन आशंकाओं को समाप्त कर दिया है जो आयातकों और विश्लेषकों के मन में थीं। उन्हें भय था कि बजट में सीमाशुल्क बढ़ाया जाएगा जिससे संरक्षणवादी रुख एक बार फिर मजबूत होगा। सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया है। हालांकि शुल्क दरों में बदलाव किए गए हैं और उद्योगों की प्रकृति के अनुसार उनमें कमी और बढ़ोतरी दोनों देखने को मिली है। लौह और इस्पात उद्योग की बात करें तो कई चीजों के लिए शुल्क दरें कम की गई हैं ताकि लोहे और इस्पात से बनने वाले उत्पादों के दाम में हुए इजाफे का असर समाप्त किया जा सके। कैप्रोलैक्टम (प्लास्टिक बनाने में इस्तेमाल होने वाला), नायलॉन चिप, नायलॉन फाइबर और धागे पर शुल्क 5 प्रतिशत कम किया गया है। नेफ्था पर लगने वाला शुल्क 2.5 प्रतिशत कम किया गया है। किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए बजट में कपास पर लगने वाले सीमा शुल्क को शून्य से बढ़ाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया है और कच्चे रेशम तथा रेशम के धागे पर शुल्क 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया है। बजट में एथाइल एल्कोहल के अंतिम उपयोग पर आधारित रियायत को समाप्त कर दिया गया है ताकि उसे ऐसे अन्य उत्पादों पर लगने वाले शुल्क के साथ तार्किक बनाया जा सके। कृषि क्षेत्र का बुनियादी ढांचा सुधारने के लिए कई उत्पादों पर अधोसंरचना एवं विकास उपकर लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। सीमा शुल्क संबंधी जांच पूरी करने के लिए एक तय समय-सीमा घोषित करने की बात कही गई है। बजट में एक अच्छा प्रस्ताव यह है कि सभी सीमा शुल्क रियायतें अगली 31 मार्च को दो वर्ष के बाद स्वत: समाप्त हो जाएंगी।

एक नकारात्मक पहलू यह है कि बजट के अनुसार एक ओर जहां 80 रियायतें समाप्त की गई हैं, वहीं इसमें इस वर्ष 400 पुरानी रियायतों की समीक्षा की बात भी शामिल है। इससे मुझे सर स्टैफर्ड क्रिप्स के प्रस्तावों के बारे में गांधीजी का कथन याद आता है। उन्होंने उन प्रस्तावों के बारे में कहा था कि वे ऐसे कैंसिल चेक के समान हैं जो जिन्हें भविष्य में ही भुनाया जा सकता है। सच तो यह है कि बजट टीम को बजट के पहले ही समीक्षा करनी चाहिए थी और नतीजों की घोषणा बजट में करनी थी। रियायतों की समीक्षा बजट टीम का काम है और वह यह नहीं कह सकती कि इसे अगले साल किया जाएगा। किसी भी रियायत की समीक्षा किसी भी समय हो सकती है और इसका उल्लेख बजट में करना जरूर नहीं। अब यह पता नहीं चल पाएगा कि इन 400 में से कितनी रियायतें समाप्त की गईं। ऐसे में इसके जिक्र का कोई अर्थ नहीं।


आम जनता से सुझाव लेने की जो बात बजट में कही गई वह भी बहुत भ्रामक है। हर वर्ष सभी अंशधारक सरकार को पत्र लिखकर प्रत्यक्ष तौर पर या किसी उद्योग या व्यापार संगठन (मसलन सीआईआई या फिक्की) आदि के माध्यम से अथवा वित्त मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात कर अपनी राय देते हैं। यह भी जनता की राय लेने जैसा ही है। बजट के संदर्भ में आम जनता का अर्थ राह चलता व्यक्ति नहीं होता। केवल अंशधारक ही लिखते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि क्या लिखना है। उदाहरण के लिए जब हम ग्रेन ओरियेंटेड स्टील शीट पर शुल्क कम करने की बात लिखते हैं तो हम आम जनता से नहीं केवल उनसे चर्चा करते हैं जो देश में इनका इस्तेमाल करते हैं। जब हम सॉफ्टवेयर पर शुल्क कम करते हैं तो हम इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के निर्माताओं और आयातकों तथा इलेक्ट्रॉनिक विभाग से बात करते हैं। सीमा शुल्क दरें आम आदमी का विषय नहीं हैं। ऐसे में आम आदमी का जिक्र केवल लोकलुभावन बनने का प्रयास है। ऐसा विचार पेश करने की कोशिश की गई कि यह बजट आम जनता के सुझावों से निर्मित है। यह गलत है क्योंकि हर वर्ष बजट ऐसे ही बनता है। अंशधारकों से चर्चा में कुछ भी नया नहीं।


बजट में ऐसी बातें शामिल की गईं जिनका उल्लेख बजट में नहीं होता। बजट में उन बातों के प्रस्ताव रखे जाते हैं जो की जानी हैं। यह कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है जिसमें यह बताया जाए कि पिछले साल कौन से अच्छे कदम उठाए गए। बताया गया कि वस्तुओं को बिना संपर्क, कागजी कार्रवाई और व्यक्तिगत मौजूदगी के स्वीकृति देने के लिए तुरंत प्रक्रिया शुरू की गई। यह भी कहा गया कि विदेश व्यापार समझौतों के क्षेत्र में की गई पहल सफल रही हैं। खासकर किसी वस्तु के निर्माण के मूल देश के बारे मेंं। इन बातों का उल्लेख जरूरी नहीं था क्योंकि ये बजट प्रस्ताव नहीं हैं। सच तो यह है कि मूल देश का मसला बहुत कटुता भरा है। जानकारी के मुताबिक मौजूदा मसलों को बॉन्ड और बैंक गारंटी के माध्यम से हल किया गया है और बजट इसका श्रेय नहीं ले सकता।


इस बजट में किसी सुधार की शुरुआत नहीं की गई है। सीमा शुल्क ढांचा पूरी तरह अतार्किक है क्योंकि इसमें विभिन्न शर्तों, प्रमाणन आवश्यकताओं आदि के साथ विविध दरें हैं। फिलहाल सीमा शुल्क के क्षेत्र में 150, 100, 85, 70, 65, 50, 40, 35, 30, 25, 15, 10, 7.5, 5, 3, 2.5, शून्य और कुछ विशिष्ट दरों समेत 19 दरें हैं। सैकड़ों रियायतें, शर्तें और सूचियां हैं जो सीमा शुल्क के वर्गीकरण को काफी जटिल बनाती हैं। सीमा शुल्क के क्षेत्र में रियायतें हटाने की दिशा में कुछ नहीं किया गया जबकि इससे अतिरिक्त राजस्व आ सकता था। इतना ही नहीं वर्गीकरण भी आसान होता। दरों को 150, 100, 50, 25, 15, 10 और 5 के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता था। रियायतों को समाप्त करना एक बड़ा कदम होता जो नहीं उठाया गया।


जीएसटी कानून में मुनाफा-विरोधी प्रावधान एक बड़ी कमी है। करीब 80 पक्ष इस मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष ले जा चुके हैं। इसमें शामिल राजस्व बहुत अधिक नहीं है। जीएसटी के कामकाज को सहज बनाने के लिए वित्त मंत्री बता सकती थीं कि इस प्रावधान को कब समाप्त किया जाएगा।


बजट अच्छा है लेकिन वह इतना भी अच्छा नहीं है कि वित्त मंत्री के 'समाजवादी बोझ' को उतार फेंकने के वादे को निभाता हो। वह ऐसा कब करेंगी?



सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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आर्थिक बहाली का वाहक बनेगा यह बजट (बिजनेस स्टैंडर्ड)

मुकेश बुटानी 

जिस पृष्ठभूमि में यह बजट पेश किया गया है, उसे देखते हुए निर्मला सीतारमण को यह अनूठा अवसर मिला कि वह ऐसी चिंताओं के असर में आए बगैर इस मौके का भरपूर फायदा उठाती हुई नजर आ रही हैं।

सरकार की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि महामारी के दौरान करों के संग्रह में आई कमी और राजस्व घाटे में हुई ऐतिहासिक वृद्धि के बावजूद उसने कॉर्पोरेट टैक्स एवं अप्रत्यक्ष करों में बढ़ोतरी करने की अपनी ललक पर लगाम लगाए रखी। इस पर आम सहमति थी कि अनुमानित कर संग्रह में आई भारी कमी की भरपाई के लिए एक नया कर या उपकर लगाना जरूरी है। हालांकि वित्त मंत्री ने राजस्व जुटाने के लिए कुछ दूसरे नवाचारी तरीके ईजाद किए हैं जिनमें जमीन की बिक्री एवं विनिवेश पर नए सिरे से जोर देना, अनुपालन बोझ को कम कर कारोबारों को फलने-फूलने वाला माहौल देना शामिल है। कर बोझ न बढ़ाने का फैसला भारतीय कंपनी जगत की धारणा को मजबूत करने और खपत एवं आर्थिक रिकवरी के नजरिये से अहम होगा।


इस बजट ने राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन का आगाज कर भौतिक, वित्तीय एवं पूंजीगत ढांचे पर मजबूती से जोर दिया है। परिसंपत्ति मुद्रीकरण की प्रगति जांचने के लिए एक समर्पित डैशबोर्ड के जरिये निवेशकों एवं रेटिंग एजेंसियों के बीच भरोसा पैदा किया जाएगा और गैर-कर राजस्व जुटाने के लिए सरकार की गंभीरता का भी अहसास होता है। मेट्रो, समर्पित मालढुलाई गलियारों, राजमार्गों एवं आर्थिक गलियारों के गठन समेत महत्त्वपूर्ण ढांचागत परियोजनाओं के लिए विशेष फंड आवंटित किए जाने और इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल अपनाए जाने से अर्थव्यवस्था को मेक इन इंडिया की राह पर डाला जा सकेगा।


कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार के भागीदारों को समर्थन देते हुए एक स्थायी संस्थागत ढांचा बनाया जा रहा है जो तनावग्रस्त समय एवं इतर मौकों पर भी निवेश योग्य ऋण प्रतिभूतियों की खरीद करेगा अन्यथा तरलता में भारी वृद्धि होगी। ढांचागत ऋण फंड अब कर-सक्षम ढंग से ज़ीरो कूपन बॉन्ड जारी कर पाएंगे। छोटे कर्जदारों को सुरक्षा देना सरकार की प्राथमिकता बना हुआ है क्योंकि इसने सराफेसी कानून के तहत कर्ज वसूली की प्रक्रिया शुरू करने के लिए न्यूनतम कर्ज सीमा को घटाकर 20 लाख रुपये कर दिया है।


बजट में निवेशक चार्टर लाने की बात कही गई है। यह चार्टर सेवा मानकों पर अमल को सुनिश्चित करने एवं अपेक्षाओं पर खरा उतरने से संबंधित मानक तय करने, तर्कसंगत बनाने एवं स्पष्टता लाएगा। बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा को 49 फीसदी से बढ़ाकर 74 फीसदी करने की उद्योग की लंबे समय से चली आ रही मांग को भी कुछ सुरक्षा उपायों के साथ अधिसूचित किया जाएगा। बीमा कंपनी के बोर्ड एवं अहम प्रबंधकीय पदों में स्वतंत्रता बनाए रखने के उपाय किए जाएंगे।


बजट में फंसे कर्ज की बढ़ती समस्या से निपटने एवं तनावग्रस्त परिसंपत्ति के निपटारे के लिए परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी के गठन जैसे कुछ साहसिक प्रस्ताव भी हैं। भारतीय रिजर्व बैंक पहले से ही तय नियामकीय ढांचे के तहत ऐसे बैड बैंक के प्रशासन में पहले अपना भरोसा जता चुका था। लेकिन बैंक एवं दूसरे देनदारों को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि समुचित अनुपालन संस्कृति का पालन किया जाए और शुरुआती दौर में ही जोखिमों को चिह्नित कर लिया जाए ताकि कर्ज डूबने की यह समस्या फिर से न पैदा हो।


राजस्व जुटाने के नवाचारी तरीकों में गैर-प्रमुख सरकारी परिसंपत्तियों की बिक्री शामिल है जिसमें मुख्य रूप से सरकारी संस्थाओं की जमीन हैं। इनकी बिक्री के लिए विशेष उद्देश्य इकाई का गठन किया जाएगा। भारतीय जीवन बीमा निगम का प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम लाने की जो घोषणा 2020 में ही की गई थी वह सरकार के लिए राजस्व जुटाने का सबसे बड़ा मौका हो सकती है। वित्त मंत्री ने नीति आयोग के सहयोग से रणनीतिक विनिवेश की कोशिशें नए सिरे से शुरू करने और घाटे में चल रही सार्वजनिक इकाइयों को बंद करने की बात कही है। ऐसे प्रयास किए जाने पर वृहद-आर्थिक संकेतकों में सुधार आएगा और राजस्व के लिए कर संग्रहों पर निर्भरता भी घटेगी।


समावेशी विकास की दिशा में अपना अभियान आगे बढ़ाने के क्रम में न्यूनतम मजदूरी का विस्तार एवं सभी श्रेणियों के कामगारों को कर्मचारी राज्य बीमा निगम के दायरे में लाना निश्चित रूप से सराहनीय कदम है। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के अंतर्गत विश्वविद्यालयों को मानक बनाना, मॉडल स्कूलों का विकास और राष्ट्रीय शिक्षा पर बाल शिक्षा ढांचे के निर्माण में अहम कदम साबित होंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की लहर पर सवार होकर अंतरराष्ट्रीय भागीदारी के जरिये कौशल, तकनीक एवं ज्ञान के हस्तांतरण को बढ़ावा देने वाले उपाय सराहनीय हैं। मुकदमेबाजी को कम करने के लिए वित्त मंत्री ने एक विवाद निपटान समिति के गठन की बात कही है जिसे छोटे करदाताओं के विवादों को दूर करने का जिम्मा दिया जाएगा। व्यक्तिगत संपर्क की जरूरत खत्म करने वाली पहचान-रहित कर आकलन योजना का प्रयोग सफल रहने से उत्साहित वित्त मंत्री ने राष्ट्रीय फेसलेस आयकर अपील पंचाट केंद्र बनाने की घोषणा की है जहां पर सभी कार्य-व्यवहार इलेक्ट्रॉनिक ढंग से ही किए जाएंगे। इससे भारत फेसलेस आकलन एवं अपील के मामले में अग्रणी देशों की कतार में शामिल हो जाएगा जो अन्य अदालतों एवं पंचाटों के लिए भी एक नजीर साबित होगा। सरकार ने जीएसटी एवं आयकर दोनों देने वाले करदाताओं पर ऑडिट एवं अनुपालन बोझ घटाने की दिशा में भी कदम उठाए हैं। भारत को उच्च वृद्धि पथ पर लाने के सपने पूरे हो पाए हैं क्योंकि सरकार ने महामारी की वजह से हुए अभूतपूर्व आर्थिक संकुचन को देखते हुए अपने पूंजीगत व्यय आवंटन में 34 फीसदी की भारी वृद्धि की है। वित्त मंत्री ने एक संतुलित बजट पेश किया है। यह एक ऐसा बजट है जो सुनिश्चित करता है कि आर्थिक रिकवरी की प्रक्रिया न्यूनतम गतिरोध के साथ बरकरार रहे।


(लेखक बीएमआर लीगल के पार्टनर हैं। इसमें फर्म के प्रमुख सहयोगी शैंकी अग्रवाल एवं वरिष्ठ सहयोगी मधुरा भट का भी योगदान है। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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व्यापक यथास्थिति, कुछ सुधार (बिजनेस स्टैंडर्ड)

यदि महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर बात की जाए तो प्रथमदृष्टया बजट में कुछ खास बदलाव नहीं नजर आता। हां, सरकार के राजकोषीय रूढि़वाद और उसकी व्यय नीति तथा कई मोर्चों पर सुधार को लेकर उसकी सकारात्मक इच्छा में अवश्य परिवर्तन नजर आया। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को लेकर व्यापक बदलाव, बीमा कंपनियों में विदेशी स्वामित्व बढ़ाने, सरकारी परिसंपत्तियों का स्वामित्व परिवर्तन, सरकारी बैंकों का निजीकरण और नई परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी (बैड बैंक) जैसा पहले खारिज किया गया वित्तीय क्षेत्र सुधार और विकास वित्त संस्थान शामिल हैं। इनमें से अंतिम दो उपाय तो ऐतिहासिक रूप से नाकाम रहे हैं लेकिन शेष का स्वागत किया जाना चाहिए। शेयर बाजार उत्साहित है क्योंकि सुधारों का प्रस्ताव रखा गया और एकबारगी उपकर भी नहीं लगा है जबकि इसकी आशंका थी। स्थिर कर नीति अपने आप में एक बेहतर बात है लेकिन बजट को लेकर किए गए वादों से इतर उसके वास्तविक प्रस्ताव शायद उत्साह को कम कर दें।

बजट के साथ जुड़ी चिरपरिचित नाटकीयता से इतर सामान्य अर्थ में यह सरकार का सालाना वित्तीय दस्तावेज है। उस दृष्टि से देखें तो अगले वर्ष भी व्यय इस वर्ष के समान ही रहेगा। उसमें एक फीसदी से भी कम इजाफा किया गया है। सकल कर प्राप्तियां ऊपर-नीचे होती रहती हैं लेकिन जीडीपी के संदर्भ में देखें तो यह अगले वर्ष भी इस वर्ष या बीते वर्ष के समान रहेगी। ध्यान देने वाली बात है व्यय की दिशा में बदलाव और आर्थिक समीक्षा की दलील के अनुरूप पूंजीगत व्यय को लेकर पक्षधरता। समीक्षा में कहा गया था कि ऐसा व्यय राजकोषीय दृष्टि से अहम है।


आवंटन के आंकड़ों में कुछ उल्लेखनीय नहीं है। स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और वित्तीय क्षेत्र के लिए अधिक आवंटन है लेकिन यदि कोविड पूर्व के 2019-20 से तुलना की जाए तो कोई खास इजाफा नहीं हुआ है। शिक्षा मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, ग्राम सड़क योजना, मेट्रो, रक्षा आदि क्षेत्र इसकी बानगी हैं। कई क्षेत्रों में आवंटन घटा है। मसलन एलपीजी के लिए प्रत्यक्ष नकदी स्थानांतरण, रोजगार गारंटी योजना और एकीकृत बाल विकास योजना आदि। रक्षा क्षेत्र की निरंतर अनदेखी समझ से परे है। व्यापक तौर पर यथास्थितिवादी इस तस्वीर के बीच अधिक ऋण लेकर राजस्व की कमी की पूरी करना स्पष्ट नजर आता है। इससे पहले यह इस पैमाने पर नहीं हुआ था लेकिन संकटपूर्ण वर्ष में इसे समझा जा सकता है।


हालांकि वित्त मंत्री ने पारदर्शी अंकेक्षण के साथ इस वर्ष के लिए राजकोषीय घाटा बढ़ा दिया है लेकिन 9.5 फीसदी का आंकड़ा एक बार झटका तो देता है। यह देखना दिलचस्प था कि इस आंकड़े के जिक्र के पहले वित्त मंत्री एक पल को ठिठकीं। अगले वर्ष के लिए घाटा जीडीपी के 6.8 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया जो एक दशक पहले की स्थिति दर्शाता है।


आर्थिक समीक्षा में अतिशय ऋण के जोखिम को तवज्जो नहीं दी गई लेकिन वह ब्याज भुगतान में नजर आता है जो कोविड के पहले यानी 2019-20 के 6.12 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर इस वर्ष 6.93 लाख करोड़ रुपये और अगले वर्ष 8.10 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। यह दो वर्ष में 32 फीसदी का इजाफा है। विनिवेश लक्ष्य हासिल न होने का भी जोखिम है क्योंकि अतीत में लगातार ऐसा ही हुआ है। अगले वर्ष का लक्ष्य इस वर्ष के प्राप्त आंकड़ों से पांच गुना से अधिक है। ध्यान देने वाली बात है कि अब तक घाटे का अधिकांश हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज भुगतान का है। इसका समायोजन करने पर हाल के वर्षों में प्राथमिक घाटा जीडीपी के 0.5 फीसदी के आसपास बचा। इस वर्ष इसमें तेज इजाफा हुआ और अगले वर्ष यह 3.1 फीसदी रह सकता है। गत वर्ष की उच्च वृद्धि के बाद कर-जीडीपी अनुपात 1.3 फीसदी कम हो चुका है। केंद्र की हिस्सेदारी के संदर्भ में देखें तो यह गिरावट अगले वर्ष के 223 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित जीडीपी में 1.6 लाख करोड़ रुपये होगी।


सीमा शुल्क में इजाफा देखने को मिला जो संरक्षणवादी और आत्मनिर्भर नीति के अनुरूप है। पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क भी बढ़ा। यह अपर्याप्त है। यही कारण है कि बजट में उल्लिखित 15.1 लाख करोड़ रुपये की उधारी, 15.5 लाख करोड़ रुपये के सरकार के शुद्ध कर राजस्व के बराबर रहेगी। सरकार ने अल्प बचत के जरिए मुद्रा बाजार और बाजार ब्याज दरों पर इसका असर सीमित रखा है। परंतु यह उच्च लागत वाला ऋण है और ब्याज के बोझ को कम नहीं करेगा। इसके बावजूद बॉन्ड प्रतिफल बढ़ा है।


अत्यंत विषम राजकोषीय हालात में वित्त मंत्री ने कड़ी मशक्कत से ऐसा बजट पेश किया है जो रुझान मजबूत करता है। परंतु यदि बजट में वृद्धि पर दांव लगाया गया है तो सीतारमण को पीछे रह जाने के जोखिम से अवगत होना चाहिए क्योंकि टीकाकारों का कहना है कि मध्यम अवधि में वृद्धि की संभावना पर असर पड़ा है। इससे केवल सुधारों के माध्यम से निपटा जा सकता है जो उत्पादकता बढ़ाएं। विनिवेश लक्ष्य हासिल करना तथा वित्तीय क्षेत्र में सुधार अहम है। विभिन्न श्रेणियों के करदाताओं के लिए प्रावधान आसान करना भी अच्छा कदम है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कहीं मायूसी तो कहीं उम्मीदें (हिन्दुस्तान)



योगेंद्र के अलघ, अर्थशास्त्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री 


कोरोना संक्रमण-काल में जिस तरह के ऐतिहासिक बजट की उम्मीद की जा रही थी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण उस पर पूरी तरह से खरी नहीं उतर सकीं। यह एक औसत बजट है, जिसमें तमाम तरह के वादे तो किए गए हैं, लेकिन उन वादों को पूरा करने का कोई ठोस रोडमैप पेश नहीं किया गया है। हालांकि, सरकार कोरोना महामारी से पैदा आर्थिक संकट से उबरने की कुछ कोशिश करती दिख रही है। बजट का एक खास पक्ष यह भी है कि ज्यादातर घोषणाओं को इस साल नहीं, बल्कि अगले कुछ वर्षों में पूरा किया जाएगा। सदन में सरकार ने यह भी कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाया जाएगा, लेकिन इसे सीधे-सीधे फायदा पहुंचाने वाली किसी भी योजना का जिक्र बजट में नहीं है। यह अच्छी बात है कि सरकार ने इस बार स्वास्थ्य क्षेत्र पर ज्यादा जोर दिया हैै। बीते साल के 94 हजार करोड़ रुपये के मुकाबले 2021-22 में 2.23 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इससे भले ही सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता हो, लेकिन सच यही है कि जान की कोई कीमत नहीं होती। मगर इसमें भी एक पेच है। यह अनुमान काफी पहले से लगाया जा रहा था कि इस साल राजकोषीय घाटा बढे़गा और यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5.8 प्रतिशत हो सकता है, लेकिन बजट में इसके 9.5 फीसदी होने की बात कही गई। यह काफी चिंताजनक स्थिति है। इसका अर्थ यह है कि कहीं न कहीं अधिक खर्च किए जा रहे हैं। संभव है, यह महामारी थामने के नाम पर ही हो रहा हो।

सरकार यह कहकर अपनी पीठ ठोक रही है कि पूंजीगत व्यय में उसने अच्छी-खासीबढ़ोतरी की है। कहा गया है कि इस वर्ष 4.39 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय पर खर्च किए जाएंगे, जबकि अगले साल के लिए 5.54 लाख करोड़ रुपये खर्च का अनुमान लगाया गया है। इसका अर्थ है कि इसमें सिर्फ पांच फीसदी की वृद्धि की गई है, जो हमारी विकास दर को शायद ही गति दे सकेगी। इससे हमारी अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं लौट सकती। हमारा निवेश-जीडीपी अनुपात भी लगातार लुढ़क रहा हैै। यह अनुपात 34 फीसदी से घटकर 28.3 फीसदी हो गया है। चूंकि कल के बजट में सरकार की तरफ से निवेश बढ़ाने को लेकर कुछ ठोस नहीं कहा गया है, इसलिए चिंता यही है कि आने वाले दिनों में इसमें और गिरावट आ सकती है। हालांकि, एक प्रोफेसर होने के नाते लेह में केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने की पहल का मैं स्वागत करता हूं। आने वाले दिनों में 100 नए सैनिक स्कूल भी खोले जाएंगे और उच्च शिक्षा के लिए आयोग भी बनाया जाएगा। शोध और अनुसंधानों पर भी खासा ध्यान दिया जाएगा। इसके अलावा, राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन स्थापित करने का वादा भी किया गया है। यह भारत जैसे देश की जरूरत है, क्योंकि यह मुल्क भाषायी तौर पर काफी विविधता रखता है। इस पहल का भी फायदा आम आदमी को हो सकता है। इसी तरह, विनिर्माण को संरक्षण देने की बात की गई है। इसके भी हमें फायदे मिलेंगे, लेकिन बाजारपरक अर्थव्यवस्था इसे कतई पसंद नहीं करेगी। इससे प्रतिस्पद्र्धा कम हो जाएगी, जिसका दुष्प्रभाव गुणवत्ता पर पड़ सकता है। दिक्कत यह है कि नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) जैसे संस्थानों के हाथ-पांव बांध दिए गए हैं, जिसके कारण हमें वास्तविक आंकडे़ नहीं मिल पाते हैं। एक समय था, जब इसे ‘तीसरी दुनिया’ का सर्वश्रेष्ठ सर्वेक्षण कार्यालय माना जाता था, लेकिन आज इसकी हैसियत वही नहीं है। इस वजह से हम बजट में पेश आंकड़ों को सत्यता की कसौटी पर नहीं कस पाते हैं और बजटीय घोषणाओं पर अविश्वास बढ़ने लगता है। मसलन, खेती-किसानी की ही बात करें, तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह तो कहा कि इस साल 43.36 लाख गेहूं उत्पादक किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का फायदा मिला है, जबकि इसके पहले 35.57 लाख किसान इससे लाभान्वित हुए थे। साथ ही, उन्होंने वित्त वर्ष 2020-21 में एमएसपी गेहूं खरीद किसानों को 75,060 करोड़ रुपये चुकाने का दावा भी किया। मगर इस खरीद-प्रक्रिया में किसानों को असल में कितना फायदा मिला, इसका सही-सही जवाब हमारे पास नहीं है। खरीद-बिक्री में आढ़तियों की दखलंदाजी कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है। ई-मंडी का भी यही हश्र है। इससे किसानों को लाभ मिलने के दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन जिन किसानों के पास पहचान पत्र नहीं है, वे अपना अनाज औने-पौने दाम पर आढ़तियों को ही बेचते हैं। हां, आंध्र प्रदेश बेशक एक अपवाद है, जहां पर लाल मिर्च की खरीद-बिक्री ई-मंडी से हो रही है, लेकिन देश के बाकी अन्य राज्यों में यह व्यवस्था अभी दिवास्वप्न ही है। फिर, रिजर्व बैंक की रिपोर्ट तो यह भी कहती है कि किसानों तक कर्ज नहीं पहुंच रहा। इसका मतलब है कि कृषि ऋण शायद ही काम कर रहा है। साफ है, अगर सार्वजनिक खर्च बढ़ाने की बात होती या सरकारी निवेश बढ़ाने के प्रयास किए गए होते, तो निजी निवेशक उत्साह दिखाते। सरकार की तरफ से ऐसी कोई घोषणा तो नहीं ही की गई, सरकारी उपक्रमों को बेचने का एलान जरूर कर दिया गया। हालांकि, राज्यों और अन्य एजेंसियों को निवेश करने के लिए कहा गया है, लेकिन उनके पास पैसे होंगे, तभी तो वे ऐसा कर सकेंगे। कुल मिलाकर, यह बजट बाजार में मांग बढ़ाता नहीं दिख रहा। बुजुर्गों को कर में राहत देकर आम आदमी को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई है, लेकिन वास्तव में इसका भी फायदा कुछ हजार लोगों को ही होगा। कर चुकाने वाली एक बड़ी आबादी जिस तरह की राहत खोज रही थी और जो मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा भी है, उसे बजट से मायूसी हाथ लगी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Monday, February 1, 2021

किस दिशा में नेपाल: क्या यह भुलावे का दौर है या बेहतर भविष्य का सूचक (अमर उजाला)

महेंद्र वेद  

ऐसा शायद ही कभी होता हो कि सरकार के पूर्ण बहुमत में होने के बावजूद संसद को भंग कर दिया जाए, सत्तारूढ़ पार्टी विभाजित हो जाए और प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर दिया जाए! और इस घटनाक्रम की भी भला किस तरह व्याख्या करेंगे कि केपी शर्मा ओली जैसे कट्टर कम्युनिस्ट और नेपाल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री पशुपतिनाथ मंदिर में जाकर विशेष पूजा करें? हालांकि दक्षिण एशिया में कम्युनिस्टों का धर्मस्थलों में जाना कोई अजूबा नहीं है, लेकिन ओली, जिन्होंने वर्षों पहले नेपाल में राजतंत्र खत्म करने के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी, पिछले दिनों पहली बार मंदिर में पूजा करने गए। यही नहीं, हाल ही में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अपने धड़े के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ओली ने कहा कि भगवान राम के जन्मस्थान में मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है।

ओली का इशारा बीरगंज के पास स्थित एक जगह से था, जिसे वह पहले भी असली अयोध्या बता चुके हैं। इस संदर्भ में यह याद रखना चाहिए कि मनमोहन अधिकारी, माधव कुमार नेपाल, पुष्प कमल दहल, बाबूराम भट्टराई और झालानाथ खनाल जैसे पूर्व कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री कभी मंदिरों में नहीं गए, न ही उन्होंने ईश्वर के नाम पर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।


ऐसे में, ओली के मंदिर जाने की घटना ने इस अनुमान को बल दिया है कि वह सत्ता के लिए हिंदुत्ववादी और राजतंत्र समर्थक समूहों का समर्थन हासिल करना चाहते हैं, जो पिछले काफी समय से हाशिये पर हैं। राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी ऐसी ही एक पार्टी है। ओली के प्रथम प्रधानमंत्री काल में यानी अगस्त, 2015 से अक्तूबर, 2016 तक इस पार्टी का मात्र एक सदस्य संसद में था। पार्टी नेता कमल थापा उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री थे। नेपाल में हिंदू बहुसंख्यक हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई माओवादी नेता राजशाही को पुनर्जीवित करने का खतरा उठा सकता है। जो लोग नेपाल में लोकतांत्रिक प्रयोग की विफलता से चिंतित हैं, उनसे पूछना चाहिए कि क्या यह भुलावे का दौर है या यह संकट  बेहतर भविष्य का सूचक है।


नेपाल में इन दिनों ऐसी अनेक घटनाएं घट रही हैं, जिनकी फौरी व्याख्या संभव नहीं है। इनमें से कुछ घटनाओं पर टिप्पणी की जा सकती है, तो कुछ घटनाएं स्वतःविरोधी हैं। इस हिमालयी राष्ट्र ने कोरोना महामारी और भारत व चीन जैसे दो बड़े पड़ोसियों के साथ कूटनीतिक रिश्तों के उतार-चढ़ाव के बीच अभूतपूर्व राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया है। पुष्प कमल दहल प्रचंड और ओली की पार्टियों में गठजोड़ होने के नतीजतन 2018 में कम्युनिस्ट सत्ता में आए। दोनों पार्टियों के गठजोड़ में चीन ने तब बड़ी भूमिका निभाई थी। प्रचंड और ओली में तब इस पर सहमति बनी थी कि वे बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन ओली प्रधानमंत्री पद छोड़ना नहीं चाहते थे, इसलिए बैठक बुलाए जाने के प्रस्तावों को वह जान-बूझकर लगातार टालते रहे। राजतंत्र की समाप्ति के बाद से ही राजनीतिक पार्टियों की उठा-पटक के बावजूद सत्तारूढ़ एनसीपी में टूट नेपाल में राजनीतिक व्यवस्था के क्रमागत क्षरण के बारे में बताती है।


स्थिति हाथ से निकलती देख ओली ने संसद को भंग करने की सिफारिश कर दी। सर्वोच्च न्यायालय में उनके इस फैसले को चुनौती दी गई, हालांकि फैसला आने में लंबा समय लग सकता है और चुनाव उसके बाद ही संभव है। वैसे तो ओली ने 30 अप्रैल से 10 मई के बीच चुनाव कराने का संकेत दिया है, लेकिन इस मामले में ओली पर पूरी तरह भरोसा शायद ही किया जा सकता है। सत्तारूढ़ पार्टी में टूट और खुद ओली के निष्कासन से जहां उनके द्वारा अपनी पार्टी सीपीएन (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) को फिर से खड़ा करने की

बात कही जा रही है, वहीं सड़कों पर हिंसा की आशंका भी जताई जा रही है। संसद भंग कर देने के बाद से वहां चीजें तेजी से बदली हैं। प्रचंड का आरोप है कि ओली ने भारत के कहने पर इन घटनाओं को अंजाम दिया है और भारत अपने हित में नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता चाहता है। अब ओली भारत समर्थक दिखना चाहते हैं।


विवादास्पद नक्शा वापस ले लिया गया है। विगत 15 जनवरी को नई दिल्ली में हुई भारत-नेपाल संयुक्त आयोग की बैठक में नेपाल के सुर भी अलग थे। नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली ने कहा कि उनकी सरकार किसी विदेशी शक्ति के चंगुल में नहीं है। यही नहीं, महामारी के खिलाफ चीनी टीके के बजाय उन्होंने भारतीय टीके को तरजीह दी। इसकी एक वजह यह भी है कि चीनी वैक्सीन अभी तैयार नहीं हैं। नई दिल्ली ने टीके का एक लाख डोज नेपाल को भेजा, जिस पर प्रधानमंत्री ओली ने भारतीय प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा किया। जबकि यही ओली सत्ता में आने के बाद लगातार भारत-विरोधी रुख अपनाए हुए थे। उन्होंने यह तक आरोप लगाया था कि भारत उन्हें सत्ता से बाहर करना चाहता है। कोविड-19 के कारण करीब दस महीने से बंद भारत-नेपाल सीमा को भी नेपाल सरकार ने पिछले सप्ताह खोल दिया, जिससे आवाजाही के साथ पर्यटन की बहाली की उम्मीद बढ़ी है।


फिलहाल भारत-विरोध की हवा खत्म होने के बाद नेपाल में अब चुनाव का माहौल है। यह देखना होगा कि कौन किसके साथ गठजोड़ करता है। पिछली बार ओली ने माओवादियों के साथ गठजोड़ करने में जल्दी दिखाई थी, क्योंकि उन्हें डर था कि ढिलाई बरतने पर नेपाली कांग्रेस का माओवादियों से गठजोड़ हो जाएगा। इन दिनों चर्चा है कि ओली नेपाली कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर सत्ता में बने रहने के बारे में सोच रहे हैं। काठमांडू से आ रही रिपोर्टें बताती हैं कि नेपाल की राजनीति में महत्वपू्र्ण भूमिका निभाने वाली नेपाली सेना आने वाले चुनाव में तटस्थ रहेगी।


हालांकि यह देखना होगा कि वह आनेवाले दिनों में सरकार-विरोधी प्रदर्शनों को तितर-बितर करने का ओली का अनुरोध मानती है या नहीं। कोविड-19 के कारण पर्यटन क्षेत्र के पूरी तरह बंद रहने के बाद, जो नेपाल की आय का एक बड़ा स्रोत है, आने वाली गर्मी में चुनाव के कारण नेपाल में राजनीतिक सरगर्मी तेज रहने की स्वाभाविक ही उम्मीद की जानी चाहिए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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वृद्धि और राजस्व बढ़ाने पर बड़ा दांव (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आकाश प्रकाश  

बाजार ने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए पेश बजट पर शानदार प्रतिक्रिया दी है। बाजार यह देखते हुए फूला नहीं समाया कि सरकार ने बजट में कर बढ़ाने की कोई घोषणा नहीं की है। बाजार को लग रहा था कि सरकार अति धनाढ्य लोगों पर कुछ अधिभार लगा सकती है। वैसे तो यह अच्छा कदम है लेकिन इसका एक नुकसान यह है कि कर नहीं बढ़ाने से कुल व्यय में भी इजाफा (एक प्रतिशत से भी कम)नहीं हुआ है। यह अलग बात है कि सरकार ने वित्त वर्ष 2022 में नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 14.4 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान व्यक्त किया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कर नहीं बढ़ाने से अर्थव्यवस्था को समर्थन देने के लिए सरकार पर्याप्त व्यय नहीं कर पाएगी। वित्त मंत्री ने बजट में प्रत्यक्ष करों और जीएसटी में 22 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान जताया है और इनके साथ विनिवेश से प्राप्त 175,000 करोड़ रुपये की रकम का इस्तेमाल राजकोषीय घाटा 341,000 करोड़ रुपये कम करने में किया है। कुल मिलाकर सरकार ने वृद्धि दर और राजस्व में बढ़ोतरी को लेकर एक बड़ा दांव खेला है, लेकिन मेरे विचार से यह जोखिम लेना सही ही था। मुझे लगता है कि वित्त वर्ष 2022 में नॉमिनल जीडीपी की वृद्धि दर 14.4 प्रतिशत से संभवत: अधिक रहेगी और राजस्व की स्थिति उम्मीद से अधिक बेहतर रहेगी।  

कुल व्यय में कोई बढ़ोतरी नहीं किए जाने के बीच पूंजीगत व्यय के लिए बजट में प्रावधान 26 प्रतिशत बढ़ाकर 554,236 करोड़ रुपये किया गया है (पूंजीगत व्यय में 115,000 करोड़ रुपये इजाफा हुआ है)। पूंजीगत व्यय में यह बढ़ोतरी और ब्याज के मद में 116,801 करोड़ रुपये का प्रावधान सब्सिडी में नाटकीय कमी करने के बाद किया गया है। कोविड-19 को मात देने के लिए दिए कुछ प्रोत्साहन वापस लिए जाने के बाद वित्त वर्ष 2022 में सब्सिडी में 260,000 करोड़ रुपये तक कमी आने का अनुमान है।


करों में बढ़ोतरी करने और राजकोषीय स्थिति तेजी से मजबूत बनाने की दिशा में काम करने के बजाय वित्त मंत्री ने राजकोषीय घाटा सीमित करने की प्रक्रिया को राजस्व की स्थिति से जोड़ दिया है। अगर सरकार ने इस समय राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने पर अधिक जोर दिया होता तो इससे बाजार सहित निवेशकों के मनोबल पर बुरा असर होता। वित्त मंत्री की यह रणनीति वाजिब है और सरकार को इससे राजकोषीय मोर्चे पर हाथ और अधिक खोलने का विकल्प मिलता है। यह अच्छी बात है कि सरकार ने एफआरबीएम अधिनियम और रेटिंग एजेंसियों की परवाह  किए बिना एक खाका तैयार किया है।


संरचनात्मक स्तर पर निश्चित तौर पर कुछ सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। सरकार ने निजीकरण की दिशा में आगे बढऩे की दिशा में अपना रुख स्पष्ट कर दिया है और इसमें अब किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं दिख रही है। यह बात भी ईमानदारी से स्वीकार कर ली गई है कि हम राजस्व के लिए 2 करोड़ करदाताओं पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकते और हमें अधिक रकम का बंदोबस्त करने के लिए सरकारी परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी बेचनी होगी। इस संबंध में पहले भी कई घोषणाएं हुई थीं। सरकार के पास उपलब्ध जमीन बेच कर रकम जुटाने पर भी खासा जोर दिया गया है। हालांकि इसके लिए सरकार को क्रियान्वयन के मोर्चे पर काफी मुस्तैदी दिखानी होगी।


वित्तीय प्रणाली के लिए दो सार्वजनिक बैंकों एवं एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण का निर्णय काफी साहस भरा है। यह दिखाता है कि कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर मुश्किलें झेलने के बाद भी सरकार कठिन एवं चुनौतीपूर्ण समझे जाने वाले आर्थिक सुधारों से पीछे हटते नहीं दिखना चाहती है। अगर भारत को वास्तव में 7-8  प्रतिशत दर से आगे बढऩा है तो इसे ऋण आवंटन में 14-15 प्रतिशत वृद्धि को पूरा समर्थन देना होगा। सार्वजनिक बैंक कम से कम अपनी मौजूदा हालत में तो ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं। निजीकरण और सार्वजनिक बैंकों का आपस में विलय ही एक रास्ता दिख रहा है। अब लगता है कि सरकार ने यह बात पूरी तरह समझ ली है। सार्वजनिक बैंकों के फंसे कर्ज लेने के लिए परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी की स्थापना से बैंकों का बहीखाता साफ-सुथरा हो जाएगा और उन्हें दोबारा कर्ज आवंटन शुरू करने में मदद मिलेगी।  


बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा बढ़ाकर 74 प्रतिशत करने से इस क्षेत्र को नई पूंजी प्राप्त करने और कारोबार बढ़ाने में मदद मिलेगी। बुनियादी ढांचे के लिए दीर्घ अवधि की पूंजी मुहैया कराने में बीमा क्षेत्र अहम भूमिका निभा सकता है। इस क्षेत्र को अधिक से अधिक पूंजी हासिल करने और कारोबार आगे बढ़ाने की इजाजत देना एक स्वागत योग्य कदम है। 20,000 करोड़ रुपये की शुरुआती पूंजी के साथ ढांचागत क्षेत्र पर केंद्रित नए डेवलपमेंट फाइनैंस इंस्टीट्यूशन (डीएफआई) की स्थापना और अगले तीन वर्षों में इसका बहीखाता बढ़ाकर 500,000 करोड़ रुपये करना आक्रामक लेकिन जरूरी कदम है। क्रियान्वयन पर निश्चित तौर पर सबकी नजरें होंगी।


एक ही संहिता में ज्यादातर वित्तीय बाजार नियामकों को लाने से पारदर्शिता बढ़ेगी और कानूनों में भी निरंतरता बनी रहेगी। बजट में सरकार ने रीट और इन्विट ढांचों पर अधिक जोर देने की कोशिश की है। एफपीआई को इन इकाइयों द्वारा जारी बॉन्ड खरीदने की इजाजत दी गई है और टीडीएस नियम भी सरल बनाने की पहल की गई है। कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार की मदद के लिए एक स्थायी संस्थागत ढांचा तैयार करने की कोशिश की गई है और इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि आईएलऐंडएफएस जैसी घटनाएं दोबारा नहीं हों। बिजली वितरण क्षेत्र को उबारने के लिए बजट में अतिरिक्त 300,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि पूर्व में आई इसी तरह की योजना के मुकाबले यह अधिक कारगर होगा। कराधान के मोर्चे पर सरकार ने चीजें सरल बनाने की दिशा में अतिरिक्त प्रयास किए हैं। हालांकि  इस मोर्चे पर क्रियान्वयन कैसा रहेगा यह देखने वाली बात होगी।


हालांकि बाजार से 967,708 करोड़ रुपये उधारी लेने की आवश्यकता को देखते हुए बॉन्ड बाजार थोड़ा चिंतित जरूर दिख सकता है। यह एक बड़ा आंकड़ा है क्योंकि सरकार ने वित्त वर्ष 2021 में 535,000 करोड़ रुपये उधारी लेने का लक्ष्य रखा था। बॉन्ड पर प्रतिफल 16 आधार अंक तक बढ़ गया है। हालांकि इस वर्ष हम बाजार से 12,37,788 करोड़ रुपये उधार लेने में कामयाब रहे हैं, जिनमें लघु बचत का योगदान 480,000 करोड़ रुपये रहा है। आरबीआई को बॉन्ड बाजार की चिंताएं दूर करनी चाहिए। अच्छी बात यह रही कि डॉलर के मुकाबले रुपया स्थिर रहा।


कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि वित्त मंत्री ने अच्छा बजट पेश किया है। बाजार भी राहत महसूस कर रहा है। सरकार वृद्धि दर और परिसंपत्तियों की बिक्री पर बड़ा दांव लगा रही है। इसके साथ ही इसने आर्थिक सुधार जारी रखने की इच्छाशक्ति दिखाई है। शेयर निवेशकों को भी अधिक चिंतित नहीं होना चाहिए।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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बजट वही, जो बुरे दौर से निकाले (हिन्दुस्तान)

हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार 

इन दिनों हम हर चीज से उम्मीद बांध रहे हैं। निराश, हताश और परास्त कर देने वाले साल के बाद इसके अलावा और हो भी क्या सकता है? शेयर बाजार थोड़ा चढ़ता है, तो न जाने क्यों एक उम्मीद जगती है। बेरोजगारी दर में अति मामूली गिरावट भी ढेर सारी आशा का संचार करने लगती है। मुद्रास्फीति जब बढ़ती है, तब उसके भी कई सकारात्मक से विश्लेषण होने लगते हैं, और महंगाई घटती है, तो उसके खैर कहने ही क्या। हरदम यही इंतजार रहता है कि इस बार विकास दर के आंकडे़ कम से कम पहले जितने तो बुरे नहीं ही होंगे। किसी क्षेत्र में कुछ होता है, तो चर्चा होने लगती है कि अब नए अंकुर फूट रहे हैं। हम खुश होते हैं, यह जानते हुए भी कि हरियाली अभी बहुत दूर है। जल्द से जल्द हम सब महामारी से पहले के उस दौर में लौट जाना चाहते हैं, तब जिसकी आलोचना करते हुए भी हम नहीं थकते थे। इन्हीं सबमें वे किसान भी शामिल हैं, जो दिल्ली की सीमाओं पर दो महीने से भी अधिक वक्त से धरने पर बैठे हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसी माहौल में आज अगले वित्त वर्ष का जो बजट पेश करेंगी, उसके लिए भी हमारे पास उम्मीद बांधने के अलावा और कुछ नहीं है। यह जानते हुए कि जिस आर्थिक आधार पर खड़े होकर देश का सालाना बजट तैयार होता है, वह इस समय काफी कमजोर है। महामारी और लॉकडाउन के चलते अर्थव्यवस्था जिस तरह से गोते लगा चुकी है, उसे यहां दोहराने की कोई जरूरत नहीं है। बात सिर्फ इतनी है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तेजी से गिरने के कारण सरकार का राजस्व भी काफी गिर चुका है। खर्च की उम्मीद तो रुपये से भी ज्यादा बांधी जा रही है, पर आमदनी अठन्नी रह गई है। ऐसे में, यह तय है कि वित्त मंत्री के लिए सबकी उम्मीदों पर खरा उतरना संभव नहीं होगा।

कुछ खर्चे हैं, जिन्हें आप कम नहीं कर सकते। मसलन, सरकारी कर्मचारियों के वेतन और सरकारी तंत्र के तमाम दूसरे खर्च, मुद्रास्फीति के हिसाब से इनमें बढ़ोतरी ही होनी है। इसी तरह, रक्षा खर्च है, जिसे भी आप कम नहीं कर सकते। चीन के साथ सीमाओं पर जिस तरह के तनाव हैं, उसे देखते हुए इसे बढ़ाना भी पड़ सकता है। वैसे, कम तो आप किसी भी खर्च को नहीं कर सकते। न शिक्षा के खर्च को, न स्वास्थ्य के खर्च को। पिछले साल किसान सम्मान निधि के लिए प्रावधान करने के बावजूद बजट में कृषि पर होने वाले खर्च को थोड़ा सा कम किया गया था, लेकिन इस बार जिस तरह से किसानों की नाराजगी दिख रही है, उसमें यह भी शायद बहुत ज्यादा संभव नहीं होगा। बल्कि यह भी हो सकता है कि सरकार को किसान हितैषी दिखाने के लिए वित्त मंत्री को इसमें कुछ बढ़ोतरी ही करनी पडे़। यह भी मुमकिन है कि सरकार की आमदनी में कमी करनी पड़ सकती है। मसलन, मध्यवर्ग को करों में कुछ राहत देकर। यह माना जाता है कि न किसान और न उद्योगपति, अंतत: मध्यवर्ग की जिजीविषा ही अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सकती है। और यही वह वर्ग है, जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का सबसे बड़ा समर्थक रहा है और उसके शासनकाल में सबसे कम उसी को मिला है। नोटबंदी से जीएसटी तक का सारा भार भी मुख्य रूप से उसी के सिर पर पड़ा है। परिभाषा यह बताती है कि बजट और कुछ नहीं, इन्हीं आमदनी और खर्चों का खातों में संतुलन बिठाना भर है। लेकिन किसी भी देश का बजट व्यवहार में सिर्फ इतना नहीं होता। उसमें देश की उम्मीदों, हसरतों और जरूरतों को जगह देनी होती है। यानी वे सारी चीजें, जिन्हें सत्ताधारी दल के पूर्वाग्रह, उसकी विचारधारा और उसकी राजनीति आकार देती हैं। यही वह जगह है, जहां किसी भी बजट में आमदनी और खर्च के खातों का संतुलन एक छोटी चीज रह जाता है और उसकी राजनीति बड़ी हो जाती है। कुछ ज्यादा ही बड़ी। यह भी कहा जाता है कि बजट सिर्फ बजट नहीं होता, यह सरकार की प्राथमिकताओं का एक दस्तावेज भी होता है। दूसरी तरफ, यह भी माना जाता है कि बजट सरकार के लिए पब्लिक रिलेशन, यानी जनसंपर्क का एक मौका बनकर आता है। पहले दिन बजट का जो रूप हमारे सामने आता है, वह वित्त मंत्री का सदन में दिया गया भाषण होता है, जो आमतौर पर लोक-लुभावन नारों और वादों से भरपूर होता है। बहुत सारी चीजें, जिनका नकारात्मक असर पड़ने की आशंका होती है, उन्हें अक्सर इससे गायब कर दिया जाता है। बजट का यह पब्लिक रिलेशन वाला रूप हमेशा से ही रहा है। पहले यह बजट के भाग दो में क्या सस्ता हुआ और क्या महंगा के रूप में सामने आता था और अगले दिन अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर जगह पाता था। जीएसटी आने के बाद से ये चीजें बदल गई हैं, लेकिन बजट के जरिए जनसंपर्क के रास्ते बंद नहीं हुए। बजट भाषण में अक्सर ऐसी घोषणाएं भी की जाती हैं, या ऐसी नीतियां भी गिनवाई जाती हैं, जिनका सीधे तौर पर बजट से कोई लेना-देना नहीं होता। कुछ दिनों पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि पिछली एक सदी में यह पहला मौका है, जब बजट तैयार करने का काम महामारी के साये में हो रहा है। जाहिर है, वित्त मंत्री के पास पिछली एक सदी का सबसे महत्वपूर्ण बजट पेश करने का भी मौका है। लेकिन क्या वह इस अवसर का फायदा उठा सकेंगी? इसकी उम्मीद तो हमें बांधनी ही होगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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