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कोविड और अर्थव्यवस्था आपस में जुड़े हैं?

नीलकंठ मिश्रा 



देश में कोविड-19 महामारी के शिकार लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है लेकिन आर्थिक गतिविधियों के अधिकांश सूचकांकों में बहुत धीमा सुधार देखने को मिल रहा है। सुधार की गति में नाटकीय धीमापन आया है लेकिन सुधार नजर आ रहा है। केंद्र की ओर से कानूनों में रियायत दी गई है लेकिन देश के कई राज्यों तथा इलाकों में स्थानीय स्तर पर लॉकडाउन अभी तक लगाया जा रहा है। इन हालात में भी निरंतर सुधार होता दिख रहा है। सवाल यह है कि क्या अर्थव्यवस्था ने स्वयं को वायरस से असंबद्ध कर लिया है?


देश में रोज कोविड के रोज नए सामने आने वाले मामलोंं की गति धीमी पड़ी है लेकिन बीमारी के प्रसार के बारे में जानकारी जुटाने में इस बात की कोई खास प्रासंगिकता नहीं है: देश के कई बड़े शहरों में कराए गए सीरो अध्ययन से पता चला है कि संक्रमण का स्तर जाहिर स्तर से 20 से 50 गुना तक अधिक है। इस अध्ययन में लोगों के रक्त में कोविड ऐंटीबॉडी की मौजूदगी देखी जाती है। यदि रक्त में यह ऐंटीबॉडी मौजूद है तो उक्त व्यक्ति कोविड से संक्रमित हो चुका है। इन अध्ययन में जिस तादाद में मामले सामने आ रहे हैं उससे यही पता चलता है कि जांच की मौजूदा प्रणाली में कई संक्रमण पकड़े नहीं जा रहे। इससे रोज सामने आ रहे नए मामलों की प्रासंगिकता ही समाप्त हो रही है। सीरो अध्ययन के माध्यम से महामारी के भौगोलिक प्रसार को अवश्य चित्रित किया जा सकता है। परंतु कई राज्यों और जिलों में सकारात्मक जांच नतीजों के अनुपात को देखते हुए उक्त नतीजों में भी खामी होने की पूरी संभावना है क्योंकि सकारात्मक मामले कहीं बहुत अधिक हैं तो कहीं कम।


कोविड-19 से देश में रोज 900 से 1,000 लोगों की मौत हो रही है। यह स्तर काफी अधिक है लेकिन देश में कुल मौतों मेंं इसका योगदान केवल 4 फीसदी है। चिंता इस बात को लेकर भी है कि कोविड से होने वाली मौतों का आंकड़ा कम करके बताया जा रहा है। हालांकि यह समस्या केवल भारत में नहीं है। सीरो अध्ययन बताता है कि संक्रमण से होने वाली मौत के मामले एक प्रतिशत के भी दसवें हिस्से से कम हैं। ध्यान रहे कि कोई भी संक्रमण तभी दर्ज किया जाता है जब मरीज जांच में सकारात्मक निकलता है।


दिल्ली, मुंबई और पुणे जैसे शहरों में आबादी का 30 से 50 फीसदी पहले ही संक्रमित है और वहां संक्रमण के दर्ज मामलों में भी निरंतर कमी आ रही है। दिल्ली में नए मामलों और कोविड से होने वाली मौतों के मामले कम होने के बाद आशा की जा रही थी कि भले ही महामारी पर नियंत्रण हमारी समग्र प्रशासनिक क्षमताओं से परे नजर आ रहा हो लेकिन शायद कुछ महीनों में यह महामारी स्वयं समाप्त हो जाए। ऐसे में भले ही कई जिलों में रोज 100 से अधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं लेकिन यह प्राकृतिक रूप से समाप्त हो जाएगी। महामारी से होने वाली मौतें भी पहले जताई गई आशंका से बहुत कम रही हैं।


परंतु सच्चाई तो यह है कि जब कोई महामारी सही मायनों में समाप्त होती है तो पीडि़तों के आंकड़े स्थिर नहीं रहते बल्कि उनमें गिरावट आती है। अमेरिका का न्यूयॉर्क शहर या ब्राजील का मानाउस कस्बा इसके उदाहरण हैं। मुंबई में समुचित जांच के अभाव और उच्च संक्रमण अनुपात के बाद हमने यह अध्ययन किया कि ऐसे कितने बेड इस्तेमाल में हैं जहां ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ रही है। मई और जून में इनमें इजाफा हुआ लेकिन जुलाई में यह 6,300 पर स्थिर हो गया। उसके पश्चात गिरावट आने लगी। हालांकि कई सप्ताह तक आंकड़ा 5,400 के नीचे नहीं आया। इसी प्रकार पुणे में सीरो अध्ययन में 50 फीसदी संक्रमण की बात कहे जाने के बावजूद नए मामले और मौत के आंकड़े निरंतर बढ़ रहे हैं।


वायरस को लेकर हमारी समझ बढऩे के साथ-साथ वैश्विक और स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों में दोबारा संक्रमण के मामले सामने आए हैं। कुछ लोग तो छह सप्ताह के भीतर दोबारा संक्रमित हो गए। राष्ट्रीय व्याधि नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के एक अध्ययन से भी पता चला हैकि पहले संक्रमित रह चुके 208 में से 97 लोगों के शरीर में कोरोना के ऐंटीबॉडी नहीं मिले। शायद ऐसा इसलिए हुआ कि कुछ लोगों में तात्कालिक ऐंटीबॉडी विकसित हुईं या फिर शायद वायरस के कई स्वरूप हैं। इससे सामूहिक प्रतिरोध की अवधारणा को भी नुकसान पहुंचा है और विकसित हो रहे टीकों को लेकर भी सवाल उठे हैं। अब हम महामारी के प्राकृतिक रूप से समाप्त होने की बात भी नहीं कर सकते। हमें टीके के बनने तक महामारी के साथ ही जीना होगा। अब संपर्क का पता लगाकर प्रसार रोकने का विकल्प समाप्त हो चुका है। इसका अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?


ऐसी आर्थिक गतिविधियां जिनमें बंद माहौल में लोग एक दूसरे के संपर्क में आते हैं उनमें अभी कुछ महीनों तक रोक रह सकती है। विद्यालय तथा रेस्तरां ऐसी ही जगह हैं। हालांकि सरकार ज्यादा से ज्यादा गतिविधियां शुरू करना चाहती है। मॉल खुल गए हैं लेकिन खाली पड़े हैं जबकि ई-कॉमर्स कंपनियों के कारोबार में दोगुना इजाफा हुआ है। लोगों का डर जाने मेंं अभी वक्त लगेगा।


आबादी का एक बड़ा हिस्सा यूं भी बाहर निकलेगा। कुछ लोग जोखिम लेने की आदत के चलते तो कुछ आजीविका कमाने के लिए और कुछ अन्य लॉकडाउन से बोर होकर बाहर निकलेंगे। परंतु आर्थिक हालत सामान्य होने के लिए जरूरी है कि बड़े पैमाने पर आबादी घरों से निकले।


जून तिमाही मेंं सकल घरेलू उत्पाद में भारी गिरावट आई। इस बीच निजी क्षेत्र का खपत और व्यय रुझान दोबारा सुधार की दिशा में अग्रसर होगा ऐसा अनुमान है। परंतु कारोबारियों और उद्यमियों के नैसर्गिक उत्साह को देखते हुए कहा जा सकता है कि सरकार की ओर से राजकोषीय और नीतिगत कदमों की मदद से मजबूत आर्थिक वृद्धि की दिशा में प्रतिबद्धता देखने को मिलेगी। आने वाले समय में यह कारोबारियों में उत्साह पैदा करने का काम करेगी। ऐसा होने पर उस नुकसान की भरपाई की जा सकती है जो टीका न बनने के कारण महामारी के कारण आर्थिक गतिविधियों को हो रहा है।

(लेखक क्रेडिट सुइस के एशिया-प्रशांत रणनीति सह-प्रमुख एवं भारत रणनीतिकार हैं)


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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न्यूनतम सरकार, शासकीय सेवकों के कामकाज की समीक्षा को लेकर नए दिशानिर्देश जारी


मोदी सरकार ने शासकीय सेवकों के कामकाज की समीक्षा को लेकर नए दिशानिर्देश जारी करने के साथ ही अफसरशाही को और अधिक सक्षम तथा सुसंगत बनाने की कोशिश तेज कर दी है। इसके मुताबिक उन कर्मचारियों के कामकाज की समीक्षा की जाएगी जो 50 से 55 आयु वर्ग के हों या 30 वर्ष की सेवा अवधि पूरी कर चुके हों। ऐसे जो अधिकारी भ्रष्ट या अक्षम पाए जाएंगे उन्हें सेवानिवृत्ति लेनी होगी। ये नियम केंद्रीय सिविल सर्विसेज (पेंशन) नियम 1972 के फंडामेंटल रूल 56(जे) में पहले से मौजूद थे। जून 2019 में 27 वरिष्ठ कर अधिकारियों को भ्रष्टाचार के कारण इसी नियम के तहत जबरन सेवानिवृत्त किया गया था। इसके अलावा राजस्व सेवा के 22 अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया था और केंद्रीय सचिवालय सेवा के 284 अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के लिए छांटा गया था। यह पहला मौका था जब इस नियम का इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। अपने ताजा परिपत्र में सरकार इस प्रक्रिया को नियमित कर रही है। इसके लिए लक्षित समूह के अफसरशाहों का एक रजिस्टर तैयार किया जा रहा है और उनकी त्रैमासिक समीक्षा की जा रही है।


नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद यह अफसरशाही को तीसरा संगठनात्मक झटका है। सबसे पहले 2016 में शासकीय सेवकों के लिए सालाना गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) के अलावा कॉर्पोरेट शैली में मूल्यांकन की व्यवस्था की गई थी। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि एसीआर को प्राय: निष्प्रभावी माना जाता था। दूसरे कदम में सन 2018 और 2019 के दौरान अफसरशाही में संयुक्त सचिव, निदेशक और उपसचिव स्तर के पदों को सेवा से बाहर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों के लिए खोल दिया गया। अब 'मिशन कर्मयोगी' पहल के तहत अफसरशाही को और अधिक रचनात्मक, सक्रिय, पेशेवर और तकनीक संपन्न बनाने के लिए एक परिषद का गठन किया जा रहा है जिसमें मंत्रीगण, मुख्यमंत्री  और मानव संसाधन विशेषज्ञ शामिल हैं तथा जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री के पास है। इसके अलावा 'क्षमता निर्माण आयोग' के गठन की बात भी कही गई है। एक साथ देखें तो इन घटनाओं ने अफसरशाही के मजबूत ढांचे को झटका दिया है लेकिन छह वर्ष में 20 लाख से अधिक कर्मचरियों में से करीब 300 पर कार्रवाई करने से यही पता चलता है कि इस दिशा में बहुत सक्रियता नहीं दिखाई गई। अफसरशाही को आराम की नौकरी माना जाता है और इसके लिए अधिक मजबूत आकलन प्रक्रिया अपनाने की जरूरत लंबित थी लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कदम मोदी के न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन  या सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेंगे?


नीति में उम्र वाला हिस्सा शायद ठीक नहीं। तीन दशक के अनुभव वाले अफसरशाह अनमोल अनुभव और जानकारी से लैस होते हैं। भ्रष्ट और अक्षम लोगों को जरूर निकाला जाना चाहिए लेकिन यह स्पष्ट नहीं है यह नीति युवा अधिकारियों पर क्यों नहीं लागू होनी चाहिए। भारत जैसे देश में अफसरशाही और कार्यपालिका का रिश्ता उलझाऊ है ऐसे में किफायत के मानक अलग-अलग हो सकते हैं। ईमानदार अधिकारियों के दंडात्मक तबादले और अफसरशाही के कामकाज में राजनीतिक बाधाओं से हम सभी वाकिफ हैं। तीसरा, एक पुरानी समस्या यह भी है कि अफसरशाहों को अतीत में लिए गए निर्णयों के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है। यह अफसरशाहों के पूरी क्षमता से काम करने की राह में बड़ा रोड़ा है। कांग्रेस सरकार के दौर में कोयला ब्लॉक आवंटन के मामले में और सन 2000 के दशक के आरंभ में पहली भाजपानीत सरकार के कार्यकाल में निजीकरण के दौरान ऐसा देखने को मिला। इस इतिहास को देखते हुए यह अहम है कि उम्रदराज और काम न करने वाले अधिकारियों को हटाना राजनीतिक बदले की कवायद न बन जाए। 'मिशन कर्मयोगी' में इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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अवसाद या आवेश के निहितार्थ

के सी गुरनानी, मनोरोग विशेषज्ञ 



आत्महत्या हो या हत्या, दोनों ही हालत में होने वाली हत्या मनोरोगियों के एक ही विकार की वजह से हुई घटना है। मरीज की मानसिक हालत पर निर्भर करता है कि वह आत्महत्या करेगा या हत्या। मिसाल के लिए, एक मामला सामूहिक आत्महत्या का है, जिसमें अवसाद से पीड़ित एक मां आत्महत्या करती है, लेकिन अपने बच्चों को भी जीवित नहीं छोड़ती। 

कोई अवसाद के लिए इलाज करा रहा था और उसने आत्महत्या कर ली, तो इसका मतलब यह नहीं कि इसके लिए उसका अवसाद जिम्मेदार है। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के मामले में भी यह बात लागू होती है। यदि यह तय किया जाना है कि क्या उन्हें ऐसा अवसाद था, जिसके कारण उन्होंने आत्महत्या कर ली, तो मैकनोटेन रूल के तहत वही पैरामीटर लागू करना होगा, जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति द्वारा की गई हत्या के मामले का आकलन करने में लागू होता है। 

यह समझने के लिए कि अवसाद की वजह से आत्महत्या की कोशिश करने वाले व्यक्ति की मानसिक स्थिति क्या है, हमें एक सामान्य व्यक्ति की स्थिति की कल्पना करनी होगी, जो अपने जीवन में ऐसी ही स्थिति का सामना कर रहा हो। उस व्यक्ति के बारे में सोचें, जिस पर बहुत कर्ज है और जिसके लिए कोई भविष्य या गुंजाइश नहीं। उसे लगता है, उसका सारा परिवार अपमानित हो सकता है या उसे सलाखों के पीछे डाला जा सकता है। ऐसे में, उसके लिए बेहतर क्या है कि वह मर जाए या जीवित रहकर बिगडे़ हालात का सामना करे? वह आत्महत्या के बारे में सोच सकता है, लेकिन फिर वह यह भी सोचता है कि उसके प्रियजनों को कष्ट होगा। वह दुविधा में होता है, और तय नहीं कर पाता कि क्या किया जाए। अनिश्चितता की यह स्थिति उसके दर्द को बढ़ा देती है, उसे और उदास कर देती है। अवसाद में वृद्धि उसकी शारीरिक शक्ति व ऊर्जा में कमी की वजह बनती है। कई बार उसमें इतनी ताकत नहीं होती कि वह हत्या या आत्महत्या को अंजाम दे सके। इसलिए गंभीर अवसाद में रहने वाले लोग आमतौर पर आत्महत्या करने में सक्षम नहीं होते या अगर कोशिश करते हैं, तो अक्सर नाकाम रहते हैं। देखा गया है कि अवसादग्रस्त लोग आत्महत्या करते भी हैं, तो कुछ उपचार के बाद। ऐसे लोग अपने प्रियजनों के लिए कोई पत्र छोड़ जाते हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि उन्हें नुकसान उठाना पड़े। ऐसी आत्महत्या के अन्य कारण भी हो सकते हैं, जिसमें लोग कोई पत्र नहीं छोड़ते, इसके पीछे क्रोध या बदला लेने की इच्छा हो सकती है। आज हमें अलग ढंग से भी सोचना होगा, आज से कुछ साल पहले आत्महत्या को अपराध माना जाता था। अगर कोई आत्महत्या की कोशिश के बावजूद बच जाता था, तो उस पर मुकदमा चलता था, मगर अब यदि यह साबित हो जाए कि व्यक्ति ने अवसाद की वजह से आत्महत्या की है, तो इसे अपराध नहीं माना जाता। मान लीजिए, सुशांत बच गए होते और उन पर आत्महत्या की कोशिश का केस चलता, तो उन्हें अपने बचाव में साबित करना पड़ता कि मैं अवसाद में था। 

आज घरों में दस झगडे़ होते हैं, कोई भी कह देता है कि मैं मरने जा रहा हूं। बच्चों को मां डांटती है, तो कह देते हैं, मर जाऊंगा। वह बच्चा अगर आत्महत्या की कोशिश करता है, तो क्या हम कहेंगे कि उसे अवसाद था? अवसाद की वजह से आत्महत्या हुई है या नहीं, यह तय करने के लिए हमें बीमारी की गंभीरता को समझना होगा। 

घटना से दो-तीन दिन पहले सुशांत की जो स्थिति थी, क्या वह यह सोचने-समझने की स्थिति में नहीं थे कि क्या करने जा रहे हैं? कहा जा रहा है कि उनके घर पार्टी हो रही थी और वह अवसाद में थे, दोनों बातों में विरोधाभास है। अगर वह सोचने-समझने की स्थिति में थे, तो अवसाद कारण नहीं है। अपनी जान लेने के अनेक कारण हो सकते हैं, कोई आदमी क्षणिक आवेश में आकर भी ऐसा कर सकता है। जिन दवाओं की सूची सुशांत मामले में सामने आ रही है, उन्हें मैं गंभीर स्थिति की दवा नहीं कहूंगा। अगर मनोचिकित्सक कहते हैं कि दवाएं न लेने से कुछ भी हो सकता है, तो उनकी मात्रा से यह पता चलना चाहिए कि जो मात्रा दी जा रही थी, वह गंभीर बीमारी में दी जाती है। आज अवसाद आम हो गया है, रोजगार के लिए लोग परेशान हैं। ऐसे में, अगर कोई मनोबल बनाए रखने के लिए कोई दवाई लेता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे गंभीर अवसाद की बीमारी है। सुशांत के व्यवहार से नहीं लगता कि उन्हें गंभीर बीमारी थी। 

दूसरी चर्चा चल रही है कि बाइपोलर होने की। वैसे सुशांत को दी जा रही जो दवाएं मैंने देखी हैं, उनमें कोई भी बाइपोलर बीमारी की नहीं है। क्या दो-तीन साल के दौरान उनके किसी भी वीडियो में दिखता है कि सुशांत की स्थिति बाइपोलर थी? जो बाइपोलर होता है, वह साफ नजर आ जाता है। इसमें इंसान कमा भले दस रुपये रहा हो, लेकिन करोड़ों की योजनाओं पर काम करके खुद को मुसीबत में डाल लेता है। मेनिया में इंसान को मूड्स स्टेबलाइजर दवा भी दी जाती है, जिससे भावना में ज्यादा उतार या चढ़ाव न हो। सुशांत की दवाओं में कोई ऐसी नहीं दिखती, जिसे मूड्स स्टेबलाइजर कहा जाए।

आजकल बच्चे कई बार ज्यादा आक्रामक ढंग से हठ करते हैं, मां-बाप के लिए दुविधा वाली स्थिति हो जाती है। यहां तय करना होगा कि यह अवसाद है या भावनात्मक असंतुलन। ऐसी स्थिति में कोई हो, तो आसपास के लोगों को सजग हो जाना चाहिए। विशेषज्ञों को फैसला लेना चाहिए कि किस स्तर का अवसाद है और क्या उपचार किया जाए। 99 प्रतिशत मामलों में गंभीर अवसाद नहीं, क्षणिक आवेश होता है। 

आज जरूरी है कि कभी अपने मन में मरने के विचार को नहीं आने दें। बुरा लगा है, एक दिन खाना मत खाइए, नाराजगी को दूसरी तरह से जाहिर कीजिए। किसी को गुस्से में भी कभी मत बोलिए कि जा, मर  जा। आजकल फैशन हो गया है, लोग एक-दूसरे की नकल करने लगते हैं। एक आत्मघात से कई लोग दुष्प्रेरित होते हैं, जबकि ऐसा करना कतई समाधान नहीं है। बेहतर यही है कि नकल कीजिए, तो अच्छी चीजों की, बुरी चीजों या आदतों की नहीं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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हर जरूरतमंद के घर पहुंचे अनाज


यामिनी अय्यर, अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी, सेंटर फॉर पॉलिसी  


काश! अभी जो कुछ हो रहा है, वह सच न होता। मार्च के अंत में, जब देश में लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी, तब सरकार को लालफीताशाही से बचने, अपना तौर-तरीका बदलने, केंद्र-राज्य के आपसी संबंध को सुधारने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को चुस्त-दुरुस्त बनाने की तत्काल जरूरत मैंने बताई थी। लॉकडाउन से पैदा होने वाले आर्थिक संकट से मुकाबले के लिए यह सब किया जाना जरूरी था। हमें भरोसा था कि केंद्र सरकार अपना खजाना खोलते हुए राहत-उपायों के लिए कहीं अधिक उदार साबित होगी। मगर बीते पांच महीनों में 80,000 करोड़ टन मुफ्त अनाज में से महज एक चौथाई प्रवासी मजदूरों में बंट पाए हैं। इससे पता चलता है कि देश ने न तो राजकोषीय उदारता दिखाई और न ही अपना तौर-तरीका बदला। अब आर्थिक संकट भी गहरा रहा है। ऐसे में, पांच महीने पहले कही गई उन बातों को फिर से समझने की दरकार है। 

सबसे पहले, सार्वजनिक जन-वितरण प्रणाली (पीडीएस) को सभी के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए। लॉकडाउन से पहले केंद्र ने इस दु:साध्य योजना का विस्तार किया था, और अब इसे नवंबर तक बढ़ा दिया गया है। पर सरकार इसे सार्वभौमिक नहीं बना सकी, यानी जिनके पास राशन कार्ड नहीं है, उन्हें अनाज उपलब्ध कराने की वह कोई ठोस व्यवस्था नहीं कर सकी।

मई में, जब प्रवासी मजदूरों के विराट संकट से बचना असंभव हो गया, तब पीडीएस की पात्रता आठ करोड़ प्रवासी मजदूरों तक बढ़ा दी गई, जिनमें से अधिकतर के पास राशन कार्ड नहीं थे। उस सिस्टम के लिए, जो कागजी कार्रवाई और ‘पहचान मांगने’ की समस्या में उलझा हो, पात्रता के इस विस्तार को जमीन पर उतारना आसान नहीं था। इसकी बजाय, उसने प्रवासियों की पहचान और अस्थाई राशन कार्ड जारी करने से संबंधित अपनी नीतियां बनाईं। यह बताने के लिए कि तमाम मुश्किलों के बावजूद सराहनीय काम किए गए हैं, कुछ राज्य सरकारों ने इसका हल निकालने की कोशिश करते हुए स्थानीय सर्वेक्षणों के माध्यम से, ऑनलाइन पोर्टल से अस्थाई राशन कार्ड जारी किए। मगर ये सभी प्रक्रियाएं बोझिल और समय जाया करने वाली होती हैं। ये सरकारी कामकाज में दु:साध्य कागजी कार्रवाइयों का एक नया दरवाजा खोल देती हैं। यही वजह है कि तय किए गए आठ करोड़ मजदूरों में से महज 18 फीसदी को इस योजना का लाभ मिल पाया है।

ऐसा सिर्फ प्रवासी श्रमिकों के साथ नहीं हुआ। जाने-माने अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा और ज्यां द्रेज के अनुमानों के मुताबिक, सामान्य समय में भी करीब 10 करोड़ भारतीय पीडीएस के हकदार होने के बावजूद इसका लाभ नहीं उठा पाते। दूसरे शब्दों में, उनके पास राशन कार्ड नहीं है, जिस वजह से उन्हें अनाज नहीं मिल पाता। सर्वे बताते हैं कि लॉकडाउन के बाद से बिना राशन कार्ड वाले बहुत कम लोग पीडीएस से अनाज पा सके हैं।

संभावित लाभार्थियों का नाम लिखने या अस्थाई राशन कार्ड जारी करने की बजाय जरूरी यह है कि पीडीएस का अनाज सभी जरूरतमंदों को मिले। पीडीएस केंद्र पर भ्रष्टाचार और एक बार से अधिक अनाज ले जाने वालों को रोकने के लिए कई उपाय किए जा सकते हैं, मगर सबसे पहले राज्यों को कागजी कार्रवाई या पहचान-पत्र मांगने जैसे तौर-तरीके छोड़ने होंगे। वक्त का तकाजा है कि संकट को पहचानकर मांग-आधारित पीडीएस व्यवस्था बनाई जाए। ‘एक देश-एक राशन कार्ड’ पर काम करने की बजाय सार्वजनिक जन-वितरण प्रणाली को तत्काल सर्वसुलभ बना देने की दिशा में सरकार को तत्परता दिखानी चाहिए। ऐसा कम से कम तब तक जरूर किया जाना चाहिए, जब तक कि हम मौजूदा आर्थिक संकट से बाहर नहीं निकल जाते।

दूसरा, राज्यों को धन मुहैया कराने के प्रति लचीला रुख अपनाया जाना चाहिए। कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में राज्य सबसे आगे खडे़ हैं, लेकिन वे एक अलग तरीके से महामारी व इसके आर्थिक परिणामों का सामना कर रहे हैं। अपनी आर्थिक मुश्किलों को देखते हुए अधिकांश राज्यों ने राजस्व में कमी की भरपाई के लिए केंद्र से कोविड-19 राहत अनुदान देने की मांग की है। लेकिन केंद्र ने सीमित संसाधनों के साथ एक केंद्रीकृत राहत पैकेज का रास्ता चुना, जिसमें बहुत लचीलापन नहीं दिखाया जा सकता। उदाहरण के लिए, यदि राज्य नकद हस्तांतरण के साथ मनरेगा के कार्यस्थल को बदलने की सोचते हैं, तो वे ऐसा नहीं कर सकते। इससे राज्यों को आर्थिक संकट से निपटने के लिए अभिनव तरीके न अपनाने का बना-बनाया बहाना भी मिल गया है। अभी देश में एक गतिशील, विकेंद्रित, संस्थागत संरचना विकसित करने की जरूरत है, जो चुनौतियों के खिलाफ कारगर हो। राज्यों को कोविड-19 राहत अनुदान देने के लिए हमें एक चुस्त राजकोषीय हस्तांतरण फॉर्मूला अपनाना होगा, जो साझा बीमा प्रणाली की तरह हो। इसके लिए राज्यों में समन्वित प्रयास की भी दरकार होगी। ऐसा करने के लिए अंतर-राज्यीय परिषद जैसा संस्थागत तंत्र हमारे पास है। इसे तत्काल पुनर्जीवित करना चाहिए। और आखिरी में, भारत सरकार आय में मदद करने संबंधी प्रावधानों में अधिक खर्च करने से नहीं बच सकती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संभावित लचीलापन मनरेगा से ही जुड़ा हुआ है।

चूंकि ज्यादातर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग अपनी आधी क्षमता में काम कर रहे हैं और बुआई का मौसम भी जल्द खत्म होने वाला है, इसलिए मनरेगा की मांग और बढ़ जाएगी। मगर इसका पैसा तेजी से खत्म भी हो रहा है। राज्यों ने इसके लिए आवंटित सालाना धनराशि का एक तिहाई पहले ही खर्च कर दिया है। ऐसे में, मनरेगा में फंड मुहैया कराया जाना और इसके काम का विस्तार निहायत जरूरी है। इस बात के पर्याप्त सुबूत हैं कि कोविड-19 से पैदा हुए आर्थिक संकट के मूल में मांग की कमी है। लिहाजा, अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए राज्यों को अपना खजाना खोलना होगा। लेकिन इसके लिए जरूरी यह भी है कि वे अपना तौर-तरीका बदलें। देखा जाए, तो आज सबसे बड़ी बाधा यही है कि देश संकट से प्रभावी ढंग से लड़ने और उदार प्रतिक्रिया में अड़ियल रवैया अपना रहा है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य -  हिन्दुस्तान।

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रोजगार नहीं, तो भत्ते का इंतजाम



आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार 

जब अप्रैल में लॉकडाउन के बावजूद लाखों लोग सड़कों पर उतर आए, तो वे गुस्सा नहीं दिखा रहे थे। वे सब बस अपने घर जा रहे थे। उन शहरों से नाउम्मीद होकर, जो अब तक उनका बसेरा ही नहीं, एक बेहतर भविष्य का रास्ता भी थे। देश भर में तालाबंदी थी, तो रोजगार पर मार पड़नी ही थी, मगर हालात कितने बिगड़ गए थे, इसका जवाब तब मिला, जब अर्थव्यवस्था को पढ़ने वाली सबसे भरोसेमंद संस्था सीएमआईई ने बताया कि सिर्फ अप्रैल महीने में देश में 12 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए थे। राहत की बात है कि सीएमआईई के ताजा आंकड़ों के अनुसार इसमें तेज सुधार हुआ है। बेरोजगारों की गिनती घटकर जुलाई में एक करोड़ के आसपास रह गई, यानी 11 करोड़ लोग वापस काम पर लग चुके हैं। मगर ध्यान देने की बात है कि यह बेरोजगारी असंगठित क्षेत्र की है। ये दिहाड़ी पर काम करने वाले लोग हैं, इसीलिए इन्हें वापस काम मिलना उतना मुश्किल नहीं था। मनरेगा पर खर्च हुई रकम भी काम आई है। यानी सरकार के 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज का सीधा फायदा यहां दिखाई पड़ा है। 

दूसरी तरफ, एक और बुरी खबर है, वह यह कि नौकरी-पेशा लोगों के बेरोजगार होने की रफ्तार तेज हो गई है। अप्रैल से जुलाई के बीच ऐसे 1.90 करोड़ लोगों की नौकरी जा चुकी है, इनमें से 50 लाख लोग तो सिर्फ जुलाई में नौकरी से बाहर हुए हैं। यह चिंता की बात इसलिए है कि दिहाड़ी मजदूरों की तरह इनके लिए दोबारा काम पाना आसान नहीं है। वैकेंसी, विज्ञापन, टेस्ट, इंटरव्यू के सिलसिले से बार-बार गुजरना कई बार आत्मविश्वास को भी तोड़ देता है। और अगर कुछ कर्ज है, तो ईएमआई का दबाव अलग से है। 

ऐसे में, कम तनख्वाह वाले बहुत से लोगों के लिए सरकार की तरफ से एक राहत वाली खबर आई है। जो लोग कर्मचारी राज्य बीमा निगम, यानी ईएसआईसी के तहत आते हैं, उन्हें अब तीन  महीने के लिए कमाई की आधी रकम बीमा स्कीम से मिलेगी। अभी तक ऐसे लोगों को सिर्फ एक चौथाई रकम ही मिलती थी। ईएसआई के नियमों के तहत जो लोग दो साल से ज्यादा नौकरी में रहकर ईएसआई का प्रीमियम भरते हैं, उन्हें बेरोजगार होने की स्थिति में यह पैसा अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना के तहत मिलता है। अभी तक बेरोजगार होने के 90 दिन बाद ही इस बेरोजगारी भत्ते का दावा किया जा सकता था, लेकिन यह समय घटाकर 30 दिन कर दिया गया है। खासकर कोरोना की मार से बेरोजगार हुए लाखों लोग इसका सहारा ले पाएंगे। ईएसआई स्कीम उन जगहों पर लागू होती है, जहां कम से कम दस लोग काम करते हों और इसके सदस्य वही लोग होते हैं, जिनकी महीने की कमाई 21,000 रुपये से कम हो। यानी एक व्यक्ति को कुल मिलाकर 31,500 रुपये ही मिलेंगे। ईएसआई के पास 78,000 करोड़ रुपये जमा हैं। अनेक व्यापार और उद्योग संगठन सरकार पर दबाव डाल रहे थे कि इस पैसे को निकालकर कामगारों की तनख्वाह देने के लिए इस्तेमाल किया जाए, मगर सरकार इनकार करती रही। उसका तर्क था कि यह रकम कामगारों को बेहद मुसीबत की स्थिति में बेरोजगारी भत्ता देने के लिए ही निकाली जा सकती है। अब सरकार ने इसकी शर्तों में ढील देकर बहुतों की जिंदगी आसान कर दी है। 

यह फैसला ऐसे समय पर हुआ है, जब पूरी दुनिया में बेरोजगारी भत्ते पर बहस छिड़ी हुई है। नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी तक यह तर्क दे चुके हैं कि आने वाले वक्त में सरकार को हर आदमी के लिए यूनिवर्सल बेसिक इनकम यानी भत्ते या पेंशन का इंतजाम करना पडे़गा। जिस तरह से मशीनीकरण बढ़ रहा है और रोजगार के मौके कम होते जा रहे हैं, वहां इस मांग को बेतुका कहना भी मुश्किल है। 

कोरोना की वजह से भी बहुत से काम-धंधे सिमटते जा रहे हैं। बीते हफ्ते ही एक रिपोर्ट से पता चला कि भारत में बड़ी कंपनियों ने 60 लाख वर्ग फुट, यानी करीब 78 फुटबॉल मैदानों के बराबर जगह खाली की है। यह ‘ए’ ग्रेड, यानी सबसे महंगे व्यावसायिक ऑफिस स्पेस थे, जिसका किराया जगह के हिसाब से 100-200 रुपये फुट या उससे ज्यादा भी होता था और रखरखाव ऊपर से। रोजगार पर अभी खतरा बना रहेगा। 

उधर अमेरिका में भी बेरोजगारी भत्ता मांगने वाले नए लोगों की गिनती जुलाई में फिर बढ़कर 11 लाख हो गई है। इससे वहां की अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेतों पर सवाल उठने लगे हैं। नए आंकडे़ जारी करते वक्त भी अमेरिकी श्रम विभाग ने इनके लिए ‘अप्रत्याशित’ विशेषण इस्तेमाल किया, यानी ये आंकड़े सारी उम्मीदों पर पानी फेरते दिख रहे हैं। 

यूरोप में और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी बेरोजगारी और बेरोजगारी भत्ता इस वक्त के सबसे गंभीर मुद्दे बने हुए हैं। खासकर इसलिए, क्योंकि अभी कोरोना संकट खत्म होना तो दूर, उसके आसार तक नहीं दिख रहे। अब सरकारें परेशान हैं कि इस हाल में बेरोजगारी भत्ता या रोजगार बनाए रखने के लिए कंपनियों को दी जाने वाली मदद वे कब तक जारी रख पाएंगी? कोरोना के मामले फिर बढ़ने से उन पर दबाव बन रहा है कि वे ऐसी स्कीमों को बढ़ाती चलें। अमेरिका के मुकाबले यूरोप में बेरोजगारी की दर कम बढ़ती दिखी, इसकी वजह यही है कि वहां की सरकारों ने कंपनियों को पैसा दिया, ताकि वे वेतन बांट सकें और लोगों को नौकरी से न निकालें। न्यूजीलैंड में तो 50 प्रतिशत से ज्यादा रोजगार इसी भरोसे चल रहा है। फ्रांस में 40 प्रतिशत और पुर्तगाल व जर्मनी में 20 प्रतिशत से ज्यादा रोजगार ऐसी ही मदद पाकर चल रहे हैं। यही वजह है कि इन देशों में अमेरिका जैसी बेरोजगारी नहीं दिखाई पड़ी, लेकिन हर जगह यह अस्थाई योजना थी। मार्च-अप्रैल में उम्मीद जताई जा रही थी कि जुलाई-अगस्त तक कोरोना खत्म हो चुका होगा। पर न कोरोना खत्म होने के आसार दिख रहे हैं और न ही इन अस्थाई योजनाओं को खत्म करने का माहौल बन पा रहा है। 

यूरोप के देशों में अब तैयारी है कि नौकरी बचाने पर खर्च होने वाली रकम को बेरोजगारी भत्ता देने पर खर्च किया जाए। इसमें दुविधा इस बात की है कि किसे कितना पैसा दिया जाए? वह रकम क्या होगी, जिसे पाकर इंसान का खर्च भी चल जाए और उसके भीतर नौकरी तलाशने की इच्छा भी बची रहे, क्योंकि ऐसा नहीं हुआ, तो संकट और बढ़ जाएगा। लोगों को बैठकर खाने की आदत पड़ जाएगी। भारत में ऐसी किसी भी योजना या स्कीम के विरोधी काफी समय से यही तर्क देते आए हैं। फैसला सरकार को ही करना पडे़गा, क्योंकि बेरोजगार हुए लोगों को तीन महीने तक आधी तनख्वाह कितना सहारा दे पाएगी? यह सवाल भी जल्दी ही सामने खड़ा हो जाएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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हमें उबारेगी आर्थिक सुधार की रोशनी


सुदीप्तो मंडल, फेलो, नेशनल कौंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च 


भारत में कोरोना वायरस से जान गंवाने वालों की संख्या 55 हजार से अधिक हो चुकी है, और यह आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है, हालांकि मृत्यु-दर में अब गिरावट दिखने लगी है। रिकवरी रेट, यानी कोरोना की जंग जीतने वाले मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। उम्मीद है कि अगले साल की शुरुआत तक इसका टीका आम लोगों के लिए उपलब्ध हो जाएगा। इन सबसे ऐसा लगता है कि महामारी का बुरा दौर बीत चुका है। जाहिर है, अब वह वक्त आ गया है कि अर्थव्यवस्था को गति दी जाए।

2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में एक  से 15 फीसदी तक की गिरावट का अनुमान लगाया गया है। मेरा मानना है कि इसमें पांच प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। दरअसल, अप्रैल-जून की तिमाही कोरोना से सबसे बुरी तरह प्रभावित हुई थी। साल-दर-साल उत्पादन बेशक घट रहा है, पर इसकी गति काफी धीमी है। चौथी तिमाही तक संभवत: यह गति थमने लगेगी, जिससे उत्पादन फिर से लय पकड़ने लगेगा। इस सुधार का दायरा दूसरे क्षेत्रों में भी फैल सकता है। गैर-खाद्य ऋण (खेती व इससे जुड़ी गतिविधियों, उद्योग, सेवा और पर्सनल लोन जैसे कर्ज), ऊर्जा खपत, औद्योगिक उत्पादन, रोजगार और जीएसटी संग्रह जैसे प्रमुख संकेतकों के आंकड़ों का भी यही संकेत है। सिर्फ यह साल और अगला वर्ष सुखद नहीं है। 2021-22 के अंत में हमारा उत्पादन उस स्तर पर आ जाएगा, जिस स्तर पर 2019-20 के अंत में था। इसके बाद भारत की विकास-गाथा उन नीतियों पर निर्भर करेगी, जो अगले डेढ़ साल में अपनाई जाएंगी। तमाम विकल्प इसी बात पर निर्भर करते हैं कि हम आज कहां खडे़ हैं।

इस साल संयुक्त राजकोषीय घाटा जीडीपी का 10.5 प्रतिशत हो सकता है, या फिर इसमें राज्यों को अतिरिक्त उधार की मिली अनुमति को भी शामिल कर लें, तो यह 12.5 फीसदी तक जा सकता है। सार्वजनिक क्षेत्रों की उधार आवश्यकता, जिसमें सार्वजनिक उपक्रम भी शामिल हैं, जीडीपी की करीब 14-15 फीसदी हो सकती है। जीडीपी का करीब नौ प्रतिशत तरलता या नकदी बढ़ाने में लगाया गया है, यह राशि भी बड़े पैमाने पर मांग को प्रोत्साहित करेगी। अब इसका कितना हिस्सा उत्पादन की रिकवरी में मददगार होगा और महंगाई कितनी बढ़ाएगा, यह आपूर्ति की रुकावटें तय करेंगी। अधिकांश विश्लेषक मौजूदा मंदी पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं, जबकि कुछ ने कीमतों में सामान्य स्तर से भी अधिक की गिरावट की आशंका जताई है। मगर मैं स्टैगफ्लेशन यानी मुद्रास्फीति जनित मंदी (बढ़ती महंगाई के साथ आने वाली मंदी) के खतरों का जिक्र करता रहा हूं, जो दुर्भाग्य से सही साबित हुआ है। जीडीपी में तेज गिरावट के साथ हमारी मुद्रास्फीति लगभग सात फीसदी तक बढ़ गई है और खाद्य मुद्रास्फीति भी 10 प्रतिशत के करीब है।

इसीलिए 2022-23 तक देश की राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों को धीरे-धीरे नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाना होगा। महामारी की वजह से आई वैश्विक मंदी और गहराता भू-राजनीतिक तनाव जब तक शांत नहीं होंगे, यह उम्मीद फिजूल है कि अंतरराष्ट्रीय कारक हमारे विकास में मददगार होंगे। हमारा चालू खाता तात्कालिक रूप से इसलिए बढ़ गया था, क्योंकि तेल की कीमतों में कमी के साथ-साथ जीडीपी में गिरावट से आयात में कमी आई थी। हालांकि, जैसे-जैसे हालात सुधरेंगे, आयात में तेजी आएगी, जिससे व्यापार घाटा बढ़ेगा और कुल मांग पर नकारात्मक असर होगा। इस सूरतेहाल में, अगर हम चाहते हैं कि हमारी विकास दर सात फीसदी या इससे अधिक हो, तो अच्छी रणनीति यही होनी चाहिए कि लंबित संरचनात्मक सुधारों को फिर से आगे बढ़ाते हुए निवेश और उद्योग का भरोसा जीता जाए।

इस तरह के सुधारों में वित्तीय क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकारी बैंकों को रिजर्व बैंक की विशेष निगरानी में लाया जाना चाहिए और उस पर सरकार का स्वामित्व 50 फीसदी से कम किया जाना चाहिए। हालांकि, यह सुधार अपने-आप में पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यस बैंक, आईएल ऐंड एफएस जैसे निजी बैंकों में फर्जीवाड़े हुए हैं। ऐसे में, बैंकों और गैर-बैंकों, दोनों तरह के वित्तीय संस्थानों पर कड़ी निगरानी जरूरी है, ताकि गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां यानी डूबत कर्ज की समस्या पर काबू पाया जा सके। 

दूसरा, राजकोषीय सुधार किए जाएं, जिसके तहत कर रियायतों और छूट में भारी कमी जरूरी है। इसके साथ-साथ भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में दी जा रही सब्सिडी को छोड़कर बाकी सभी रियायतों को बंद करना भी जरूरी है। इसके अलावा, केंद्र व राज्य सरकारों को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचों के विकास पर अतिरिक्त खर्च करना चाहिए। 

तीसरा सुधार ऊर्जा क्षेत्र में होना चाहिए। इसमें वितरण का काम निजी कंपनियों के हवाले कर देना चाहिए। दिल्ली जैसे राज्य उदाहरण हैं। चौथा, हमें उन नियमों को खत्म कर देना चाहिए, जो लघु व मध्यम उद्योगों के विकास में रोडे़ अटकाते हैं। फैक्टरी ऐक्ट इसका एक उदाहरण है। ऐसा किया जाना इसलिए जरूरी है, ताकि उद्योग व सेवाओं में रोजगार-सृजन हो। 

पांचवां, सार्वजनिक उपक्रमों में सुधार जरूरी है। यह काम अब तक कठिन साबित हुआ है। सरकार-संचालित कंपनियों को या तो निजी उद्यमों से उचित स्पद्र्धा करनी चाहिए या फिर उनसे जीतना चाहिए, क्योंकि इनमें करदाताओं का पैसा लगाया जाता है। छठा सुधार कृषि क्षेत्र में होना चाहिए। इसमें मार्केटिंग सिस्टम को ठीक करना जरूरी है, क्योंकि उपभोक्ताओं के भुगतान का उचित हिस्सा किसानों को आज भी नहीं मिल पाता।

ध्यान रखें, हमारे सरकारी संस्थानों, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की गुणवत्ता भी देश के आर्थिक प्रदर्शन को प्रभावित करती है। इसलिए आर्थिक सुधारों के अलावा उच्च विकास के लिए इन संस्थानों को मजबूत करना भी आवश्यक है। हमें सुधारों को एक प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए, किसी घटना के रूप में नहीं। और इस प्रक्रिया के प्रभावी होने में एक दशक तक का वक्त भी लग सकता है। चीन, भारत और अन्य देशों का इतिहास यही बताता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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ज्ञान आधारित विकास की ओर


दीपक कुमार श्रीवास्तव, प्रोफेसर, आईआईएम तिरुचिरापल्ली
                                                           
आने वाले समय में किसी भी व्यक्ति का सिर्फ एक योग्यता से काम नहीं चलेगा। एक से ज्यादा कौशल रखने वाले युवाओं को जीविका की दौड़ में आगे निकलने में सुविधा होगी। एक दौर था, जब एक योग्यता से भी काम चल जाता था, एक ही ढंग के काम या रोजगार में लगकर लोग अपनी जिंदगी ठीक-ठाक गुजार लेते थे। आज कॉरपोरेट की दुनिया में एक योग्यता वाले को ‘आई शेप्ड’(अंग्रेजी अक्षर आई) कहा जाता है, जबकि एकाधिक योग्यता वालों को ‘टी-सेप्ड’(अंग्रेजी अक्षर टी)। जाहिर है, कॉरपोरेट की दुनिया में ‘टी-सेप्ड’ लोगों को तरजीह दी जा रही है। भारत की नई शिक्षा नीति भी इस कोशिश में है कि देश में ‘टी-सेप्ड’ लोगों की तादाद बढे़। 
भारत की नई शिक्षा नीति से 34 वर्ष बाद ऐसे कई सुधारों की उम्मीद बंधी है। इस शिक्षा नीति में देश की शिक्षा-व्यवस्था की तस्वीर बदलने के कई नए उपाय किए गए हैं, जैसे- तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए अब एक नियामक होगा। इससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को पहले से ज्यादा मजबूती मिलेगी। नई नीति में डिजिटल लर्निंग को तरजीह दी गई है, शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण किया जाएगा, बहु-विषयक शैक्षणिक नजरिए पर खास ध्यान दिया जाएगा, संस्थागत स्वायत्तता बढ़ाई जाएगी, इनोवेशन यानी नवाचार व रचनात्मकता को प्रोत्साहित किया जाएगा, शिक्षा में अनुभव पर आधारित गंभीर चिंतन को प्रेरित किया जाएगा, विशिष्ट शोध व अनुसंधान के लिए धनराशि जारी की जाएगी आदि।
नई शिक्षा नीति नालंदा, तक्षशिला, वल्लभी और विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों के गौरव को भी याद करती है, जिनमें अनुसंधान और शिक्षण का जीवंत माहौल हुआ करता था। ऐसी परंपरा को फिर से अपनाने की दरकार है। आज विद्यार्थियों में ‘क्रॉस-स्किल’ यानी हर तरह के कौशल को विकसित करने के लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण जरूरी हो चला है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अब उद्योग जगत में उन नौजवानों की ज्यादा मांग है, जो तमाम तरह की विधाओं में दक्ष हैं। अब हम ‘इंडस्ट्री 4.0’ (ऑटोमेशन प्रौद्योगिकी पर आधारित चौथी औद्योगिक क्रांति) की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं, जो रोजगार के लिए अनिवार्य योग्यता में कई महत्वपूर्ण बदलाव लाएगा। भविष्य के कल-कारखाने ऑटोमेशन यानी स्वचालन पर काम करेंगे और रोबोटिक्स पर ज्यादा निर्भर होंगे। इसमें जाहिर तौर पर क्रॉस-स्किल वाले कर्मियों को ज्यादा तवज्जो मिलेगी। 
नई नीति एक ऐसे दूरदर्शी नजरिए की वकालत करती है, जिसमें शिक्षा कुशल कार्य-बल के साथ-साथ एक जागरूक और शिक्षित समाज के विकास का सपना पूरा कर सकेगी। इससे हम कई सामाजिक समस्याओं का उचित समाधान कर सकेंगे। यह वाकई बहुत अच्छा होगा, जब सभी विश्वविद्यालय, कॉलेज और अन्य शिक्षण संस्थान अपने ‘विजन डॉक्यूमेंट’ को नई शिक्षा नीति के अनुसार तैयार करेंगे।
शिक्षा आर्थिक विकास के बुनियादी कारकों में एक मानी जाती है। कोई भी देश मानव पूंजी और ज्ञान की नींव मजबूत किए बिना टिकाऊ आर्थिक विकास के रास्ते पर नहीं बढ़ सकता। यह शिक्षा ही है, जिसने कई कृषि-प्रधान या अविकसित अर्थव्यवस्थाओं को दुनिया की सबसे अधिक प्रतिस्पद्र्धी व औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में शुमार किया है। दक्षिण कोरिया व फिनलैंड का उदाहरण हमारे सामने है, जहां के नीति-नियंताओं ने शिक्षा की गुणवत्ता पर खासा ध्यान दिया और जल्दी ही अपने देश को उस मुकाम पर ले आए, जहां दूसरे राष्ट्र उनकी तरक्की पर रश्क कर सकते हैं। 
नई शिक्षा नीति छात्र-छात्राओं में सामाजिक व नैतिक मूल्यों के विकास पर भी जोर देती है। इस तरह के गुण विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए बहुत जरूरी हैं। मौजूदा परीक्षा व कोचिंग संस्कृति को बदलने पर भी नई नीति बल देती है और इसकी जगह हकीकत में समस्याओं से रूबरू होकर समझ विकसित करने और नए अवसर खोजने के लिए अधिक लचीली व्यवस्था अपनाने की वकालत करती है। इससे छात्र-छात्राओं का सर्वांगीण विकास हो सकेगा। इसी कारण अब परीक्षा पैटर्न को इस रूप में विकसित किया जाएगा कि परीक्षार्थियों की रटने की क्षमता की बजाय उनकी बुनियादी क्षमताओं का मूल्यांकन हो सके। नई नीति पठन-पाठन में भी लचीलेपन को बढ़ावा देने की बात कहती है, जिसमें छात्र-छात्राओं के पास अध्ययन के लिए विषयों के बेहतर विकल्प होंगे।
यह नीति मौजूदा शिक्षा-व्यवस्था की महत्वपूर्ण समस्याओं की भी पड़ताल करती है। आज हमारे सामने तमाम तरह की दिक्कतें हैं। जैसे, हमारा शिक्षा-तंत्र कई हिस्सों में बंटा हुआ है, सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित इलाकों में शिक्षा की पहुंच सीमित है, शिक्षकों की कमी है, संस्थागत स्वायत्तता सीमित है, और तमाम विषयों में अनुसंधान के मद मेंफंडिंग की कमी है। नई नीति में शोधकर्ताओं के लिए प्रतिस्पद्र्धी व योग्यता-आधारित अनुसंधान के लिए फंड की व्यवस्था करते हुए नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की बात कही गई है। इससे शोध की संस्कृति को बढ़ावा मिल सकेगा।
पिछले सात दशकों में देश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रभावशाली तरक्की हुई है। आज केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्य विश्वविद्यालय, निजी विश्वविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यालय जैसे तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। इन वर्षों में संबद्ध कॉलेज भी कई गुना ज्यादा खोले गए हैं। फिर भी, सच यही है कि उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या में वृद्धि के मुताबिक शिक्षा की गुणवत्ता में विकास नहीं हुआ है। गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।
नई शिक्षा नीति से प्रबंधन शिक्षा को भी बल मिलने की उम्मीद है। छात्र जब पहले की तुलना में ज्यादा विविध विषयों में पारंगत होकर प्रबंधन की पढ़ाई करने आएंगे, तो खुद शिक्षा संस्थानों व देश को बहुत लाभ होगा। उम्मीद है, नई नीति से भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव आ सकेगा और हमारे संस्थान दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शुमार होंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सौजन्य - हिन्दुस्तान।
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तकनीकी तंत्र, धरती के पड़ोसी को निकट से जानने की जुगत


देवांशु दत्ता  
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने सोमवार को अपना मंगल यान सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया। इसी महीने मंगल ग्रह के लिए अमेरिका और चीन के अभियान भी शुरू होने वाले हैं। ये दोनों पहले से ही अंतरिक्ष गतिविधियों में स्थापित हैं लेकिन यूएई ने पहली बार दूसरे ग्रह पर अपना यान भेजा है। इन अभियानों का मकसद यह पता लगाना होगा कि क्या मंगल पर कभी जीवन मौजूद था?
इनके लगभग एक साथ प्रक्षेपित होने के पीछे भी खगोलीय स्थितियां हैं। दरअसल पृथ्वी एवं मंगल सबसे करीब होने पर केवल 5.5 करोड़ किलोमीटर ही दूर होते हैं। इन दोनों ग्रहों के बीच सबसे अधिक दूरी करीब 40 करोड़ किलोमीटर की होती है। इसे आसानी से समझने के लिए पिज्जा के बारे में सोचें। ग्रहीय कक्षाएं पिज्जा के आकार वाली यानी अंडाकार होती हैं। पिज्जा के टुकड़े आकार में समान होते हैं। इसका मतलब है कि खगोलीय पिंड समान समयावधि में एक तय कक्षा में समान दूरी तय करते हैं।

कुछ कक्षाएं आकार में अधिक अंडाकार होती हैं जबकि कुछ अधिक 'उत्केंद्रित' होती हैं। सूर्य से दूर होने के कारण मंगल की कक्षा पृथ्वी से अधिक बड़ी है और यह अधिक उत्केंद्रित भी है। हरेक 26 महीने पर कुछ हफ्तों की ऐसी अवधि होती है जिसमें मंगल एवं पृथ्वी की पंक्तियोजना आदर्श होती है। उस समय अंतरिक्षयान भेजने पर ईंधन की खपत कम होने के साथ ही यात्रा के समय में भी बचत होती है। फिर भी, मंगल तक पहुंचने में यान को करीब सात महीने लग जाते हैं।

यूएई के अंतरिक्षयान 'अमाल' का कोलोराडो यूनिवर्सिटी की सलाह से डिजाइन और निर्माण किया गया है। इसे जापान से प्रक्षेपित किया गया और 2021 की शुरुआत में इसके मंगल तक पहुंचने की संभावना है। उस समय यूएई के गठन के 50 वर्ष पूरे होने वाले होंगे। अमाल यान मंगल ग्रह के ऊपरी वायुमंडल का अध्ययन करने के साथ ही जलवायु में बदलाव पर भी नजर रखेगा।

चीन अपना यान अगले कुछ दिनों में ही छोडऩे वाला है। थ्यानवेन मिशन में मंगल ग्रह का चक्कर लगाने वाले ऑर्बिटर के अलावा लैंडर भी शामिल है। चीन ने मिशन के बारे में अधिक जानकारी नहीं दी है।

वहीं अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के यान 'पर्सिवरेंस' के जुलाई के अंत में छोड़े जाने की योजना है। यह मंगल के जेजेरो क्रेटर इलाके में उतरेगा जहां पर अभी तक कोई यान नहीं उतरा है। मंगल का यह इलाका संभवत: एक सूखी हुई नदी का डेल्टा है। इस उबड़-खाबड़ इलाके में यान को उतारना काफी महत्त्वाकांक्षी अभियान है। एक नई मार्गदर्शन प्रणाली और पैराशूट से लैस उपकरण का इस्तेमाल किया जाएगा। मंगल का चक्कर लगाना तुलनात्मक रूप से आसान काम है। लेकिन मंगल ग्रह पर यान को उतारना पूरी तरह अलग प्रक्रिया है जिसे 'सात मिनट के आतंक' की संज्ञा दी जाती है। पहले यान को कक्षा में लाया जाता है और फिर लैंडर को उससे अलग कर सतह पर उतारने का जोखिमभरा काम अंजाम देना होता है।

इसमें समस्या यह होती है कि पृथ्वी से मंगल तक रेडियो सिग्नल भेजने और वापस प्राप्त करने में न्यूनतम सात मिनट का समय लग जाता है। इसका मतलब है कि वास्तविक समय में हम मंगल तक पहुंचे यान की गतिविधियों पर नजर नहीं रख सकते हैं, नियंत्रित करना तो दूर की बात है। कृत्रिम मेधा के दौर में भी स्वायत्त कलाबाजी को अंजाम दे पाना एक बड़ी चुनौती है। इस समय मंगल की नजदीकी कक्षा में छह यान मौजूद हैं जिनमें भारत का मंगलयान भी शामिल है। इसके अलावा नासा के तीन यान और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के दो यान भी हैं। अभी तक केवल अमेरिका ही मंगल पर सफलतापूर्वक अपना लैंडर उतार सका है और उसने इस काम को आठ बार अंजाम दिया है। नासा के इनसाइट एवं क्यूरिऑसिटी अब भी सक्रिय अवस्था में हैं। मंगल एवं पृथ्वी हमारे सौरमंडल के क्रमश: तीसरे और चौथे ग्रह हैं और दोनों की ही सतह ठोस है। लेकिन मंगल पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में केवल 38 फीसदी है। इसका वायुमंडल बहुत हल्का है और बेहद कमजोर चुंबकीय क्षेत्र होने से यह और भी हल्का हो रहा है। धरती का मजबूत चुंबकीय क्षेत्र सौर विकिरण को रोकता है और अधिक गुरुत्वाकर्षण होने से यहां का वायुमंडल भी सघन रहता है। मंगल की चुंबकीय शक्ति करोड़ों साल पहले खत्म हो चुकी है। यहां बहने वाली सौर हवाओं में अत्यधिक ऊर्जावान कण होते हैं जिससे वहां का वायुमंडल लगातार आयनीकृत होता रहता है और ऊर्जावान कणों के अंतरिक्ष में चले जाने से वायुमंडल भी धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। वायुमंडल के लोप ने मंगल की सतह पर पानी को भी विलुप्त कर दिया है जबकि ध्रुवों पर बर्फ मौजूद है। सतह का तापमान 20 डिग्री से लेकर माइनस 150 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है।

मंगल की सतह देखने से लगता है कि अतीत में यहां समुद्र एवं नदियां रही होंगी और अब भी सतह के नीचे पानी द्रव रूप में मौजूद हो सकता है। वास्तव में, लैंडर मंगल की सतह पर उतरने के बाद इसी की पड़ताल करेंगे। सतह का अन्वेषण अपने आप में बड़ा काम है। भले ही पृथ्वी का आकार बड़ा है लेकिन इसका करीब 80 फीसदी हिस्सा तो पानी से ही घिरा हुआ है। वहीं मंगल का भू-परिदृश्य पूरी तरह खुला है और इसका सतही इलाका धरती के सूखे इलाकों जितना ही बड़ा है। द्रवीय रूप में पानी एवं ठोस वायुमंडल होने पर मंगल पर जीवन संभव हो सकता था। पर्सिवरेंस यान चट्टानों में छेद कर नमूने इक_े करेगा ताकि जैविक निशानियों की तलाश की जा सके। यह सतह के भीतर पानी की मौजूदगी का भी पता लगाने की कोशिश करेगा। रोवर कार्बन डाई ऑक्साइड को विघटित कर ऑक्सीजन पैदा करने का भी प्रयास करेगा।

इन अभियानों में नई तकनीकों के प्रयोग अगले दशक में मंगल पर इंसान भेजने की तैयारी के लिए अहम होंगे। हालांकि यह अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। अंतरिक्ष यात्री सात महीनों का सफर कर मंगल पर जाएंगे और बेहद विपरीत परिस्थितियों में 26 महीने रहेंगे। फिर वापसी में भी सात महीने लगेंगे।
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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ऑनलाइन शिक्षा में अचानक इजाफा


अजित बालकृष्णन  
जब मैंने समाचारों में देखा कि आईआईएम और आईआईटी जैसे हमारे उच्च शिक्षण संस्थान ही नहीं बल्कि हार्वर्ड और एमआईटी जैसे बड़े परिसर वाले विश्वविद्यालय भी पूरी तरह ऑनलाइन शिक्षा की दिशा में बढ़ रहे हैं, तो मैं अपनी हंसी बमुश्किल रोक पाया।

मुझे हंसी क्यों आई? करीब 10 वर्ष पहले मैं देश के शिक्षा मंत्रालय (एमएचआरडी) की ऑनलाइन शिक्षा संबंधी समिति का अध्यक्ष था। समिति ने जोर देकर कहा था कि हमें तत्काल ऑनलाइन और वेब आधारित शैक्षणिक तौर तरीके अपनाने चाहिए। समिति ने यह भी कहा था कि आईआईटी और आईआईएम के शीर्ष प्रोफेसरों के उच्च गुणवत्ता वाले व्याख्यान देश के अन्य इंजीनियरिंग तथा प्रबंध संस्थानों के छात्रों को भी उपलब्ध होने चाहिए। उस वक्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने मेरे गंभीर प्रयासों के लिए धन्यवाद दिया लेकिन मेरी रिपोर्ट को दिल्ली स्थित मंत्रालय के मुख्यालय के पुस्तकालय में धूल फांकने के लिए रख दिया गया। उस समय मैं आईआईएम कलकत्ता के बोर्ड का चेयरमैन था। उसने कामकाजी पेशेवरों के लिए ऑनलाइन पाठ्यक्रम की शुरुआत की लेकिन उसका प्रमुख पाठ्यक्रम यानी प्रबंधन में दो वर्ष का स्नातकोत्तर डिप्लोमा पूरी तरह आवासीय था और उसके छात्रों को पूरा समय परिसर में रहना जरूरी था। मैंने अपनी हंसी को तत्काल रोक क्यों लिया? उस समय यह बात कही नहीं गई लेकिन उस समय भी मेरे दिमाग में यह बात थी कि शायद इन शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों की अर्थव्यवस्था उनके पाठ्यक्रम की पूरी तरह आवासीय प्रकृति पर निर्भर करती थी। छात्र और उनके माता-पिता अच्छी खासी धनराशि देने को तैयार थे क्योंकि पाठ्यक्रम के लिए वहीं रहना जरूरी था। पढ़ाई यानी अध्ययन को केवल जटिल तकनीकी कौशल में दक्षता हासिल करना नहीं माना जाता बल्कि यह अन्य संस्कृतियों और जीवनशैलियों को जानने और ताउम्र चलने वाली दोस्तियां बनाने का अवसर भी है।

यह बात एक तरह से सही भी है। सन 1971 में केरल के एक छोटे से कस्बे से स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब मैं आईआईएम कलकत्ता गया तो मैं पहली बार किसी बंगाली, सिख, असमी तथा अन्य लोगों से मिला। ऐसी जगहों पर जाकर आपको अन्य संस्कृतियों की बातें पता चलती हैं। मैंने वहां जाकर रवींद्र संगीत क रूप में पहली बार ऐसा दूसरा संगीत देखा जो मेरी भाषा के संगीत से प्रतिस्पर्धा कर सकता था। ऐसी जगह जाकर आप शैक्षणिक स्तर पर भी अपनी कक्षा के अन्य बच्चों के साथ अकादमिक रूप से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। अगर मैंने कन्नूर के अपने घर में बैठकर ऑनलाइन पढ़ाई की होती तो मैं जीवन के इतने बड़े अनुभवों से वंचित नहीं रह जाता?

क्या विश्व के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों द्वारा अचानक ऑनलाइन पढ़ाई का रुख करना फौरी बदलाव है और बाद में वे दोबारा पारंपरिक परिसर आधारित शिक्षा पर लौट जाएंगे? गत माह लंदन के प्रतिष्ठित टाइम्स हायर एजुकेशन ने दुनिया के 53 देशों के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के 200 विद्वानों पर एक सर्वे किया। इनमें यूरोप और अमेरिका के साथ चीन और भारत जैसे देश शामिल थे। सवाल था: क्या आपके विश्वविद्यालय में अगले पांच वर्ष में पूर्णकालिक ऑनलाइन डिग्री पाठ्यक्रम बढ़ेंगे? जवाब में 85 फीसदी लोगों ने माना कि ऐसा होगा।

एक और पहलू है जहां विशुद्ध ऑनलाइन शिक्षा दुनिया भर में मौजूदा कॉलेज आधारित शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बने रहने के लिए विदेशी विद्यार्थियों, खासकर चीन और भारत के विद्यार्थियों की आवश्यकता है। ये विश्वविद्यालय अपने छात्रों की तुलना में विदेशी छात्रों से कई गुना अधिक शुल्क लेते हैं। अधिक शुल्क देने वाले विद्यार्थी अच्छीखासी तादाद में हैं। न्यूयॉर्क के न्यू स्कूल में 31 फीसदी, फ्लोरिडा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्रॉलजी में 28 फीसदी, न्यूयॉर्क के रोचेस्टर विश्वविद्यालय में 27 फीसदी, कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय में 22 फीसदी, बॉस्टन विश्वविद्यालय में 21 फीसदी विदेशी विद्यार्थी हैं।

क्या ऐसे विदेशी विद्यार्थी पाठ्यक्रम के पूरी तरह ऑनलाइन होने और अपने देश से ही पढ़ाई करने की सुविधा होने के बाद भी इन विश्वविद्यालयों में रुचि दिखाएंगे? ऐसे अधिक शुल्क देने वाले विद्यार्थियों को गंवाने की आशंका से ही उस समय हड़कंप मचा जब ट्रंप प्रशासन ने यह घोषणा की कि अमेरिका में रहने वाले जिन विदेशी छात्रों के पाठ्यक्रम ऑनलाइन हो चुके हैं उनका वीजा रद्द कर दिया जाएगा और उन्हें तत्काल अमेरिका छोडऩा होगा। अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने इतना दबाव बनाया कि ट्रंप प्रशासन को उक्त आदेश वापस लेना पड़ा। ऑनलाइन शैक्षणिक पाठ्यक्रम प्लेटफॉर्म मसलन मूक (मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स) काफी समय से हैं और वेंचर कैपिटलिस्ट के पसंदीदा हैं। कोर्सेरा, खान अकादमी और यूडीमाई आदि अमेरिका के कुछ उदाहरण हैं। जबकि चीन में आधा दर्जन से अधिक सूचीबद्ध एडटेक साइट हैं। ऑनलाइन टेस्ट की तैयारी कराने वाली वेबसाइट भारत में भी बच्चों को कोचिंग दे रही हैं और यह कारोबार खूब फलफूल रहा है। बायजू, टॉपर और वेदांतु आदि इसके उदाहरण हैं और अनुमान है कि तीन अरब डॉलर से अधिक की वेंचर फंडिंग इस क्षेत्र को मिल चुकी है।

क्या ऑनलाइन पढ़ाई हर विषय और पाठ्यक्रम में अनिवार्य हो जाएगी या चुनिंदा में? टाइम एजुकेशन के उसी सर्वेक्षण पर प्रतिक्रिया देने वालों ने कहा कि कंप्यूटर विज्ञान, कारोबारी प्रशासन, सामाजिक अध्ययन और विधि विषयों की पढ़ाई को ऑनलाइन करना अन्य विषयों की अपेक्षा अधिक आसान होगा। उन्होंने कहा कि चिकित्सा, दंत चिकित्सा, जीव विज्ञान और पशुचिकित्सा आदि विषयों की ऑनलाइन पढ़ाई करना सबसे मुश्किल होगा।

एक ओर जहां हम सभी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि कोविड-19 के कारण लागू लॉकडाउन तथा उच्च शिक्षा को को ऑनलाइन करना उसके भविष्य को किस प्रकार प्रभावित करेगा, वहीं इस सवाल को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि क्या हम कुछ ज्यादा ही हो हल्ला कर रहे हैं और यह महामारी जल्दी समाप्त हो जाएगी तथा जीवन एक बार फिर पुराने ढर्रे पर लौट जाएगा? हाल मेंं आए आलेख और किताबों का कहना है कि सन 1347 में आई बुबोनिक प्लेग, जिसने यूरोप की एक तिहाई इंसानी आबादी खत्म कर दी थी, उसके बाद श्रमिकों का मेहनताना इतना बढ़ गया कि इसके चलते श्रम की बचत करने की दृष्टि से औद्योगिक क्रांति हुई।
(लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं और भारत सरकार की केंद्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद में रह चुके हैं)
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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सरकारी नियंत्रण से पूर्णत: मुक्त मीडिया नियामक?



वनिता कोहली-खांडेकर 
 
क्या अब सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त मीडिया नियामक के बारे में चर्चा होनी चाहिए? पिछले सप्ताह पांच दिन से अधिक चले उद्योग के सबसे बड़े कार्यक्रम भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) फ्रेम्स में तस्वीर धुंधली थी। गूगल इंडिया के कंट्री मैनेजर एवंउपाध्यक्ष और फिक्की मीडिया एवं मनोरंजन समिति के चेयरमैन संजय गुप्ता ने कहा, 'अगर मैं पूरे 2020 के बारे में विचार करता हूं तो इस क्षेत्र का आकार 20 अरब डॉलर से घटकर 15 अरब डॉलर होने का अनुमान है। एक अनुमान यह भी है कि हमारे करीब 15 से 20 फीसदी कर्मचारियों की नौकरी जा सकती है।' इसका मतलब यह है कि मीडिया एवं मनोरंजन क्षेत्र में कार्यरत 50 लाख भारतीयों में से करीब 10 लाख अपनी नौकरी गंवा देंगे।
फिक्की फ्रेम्स दो विषयों-आर्थिक मंदी के तत्काल बाद आई मौजूदा महामारी के असर और नियमन पर केंद्रित रहा। इन दोनों का आपसी संबंध है। यह ऐसा साल है, जिसमें हर चीज भारत के 1,82,200 करोड़ रुपये के मीडिया एवं मनोरंजन कारोबार पर चोट कर रही है। ऐसे में नियामकीय मदद सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। अगर इस उद्योग को सीधी बजट मदद नहीं भी दी जाती है तो कम से कम मीडिया कारोबार को चलाना आसान बनाने से ही बड़ी मदद मिलेगी। ऐसा करने में नाकामी ही पिछले 25 से अधिक वर्षों में भारत में मीडिया नियमनों की सबसे बड़ी कमजोरी रही है।

इसका उदाहरण मीडिया एवं मनोरंजन में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाला 79,000 करोड़ रुपये का टेलीविजन उद्योग है। वर्ष 2004 से प्रसारण नियामक भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्र्राई) ने टीवी कीमतों को नियंत्रित करने में बाल की खाल निकाल रहा है। इससे कार्यक्रम नवप्रवर्तन थम गया है और भुगतान राजस्व सीमित हो गया है, जबकि स्ट्रीमिंग में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इस साल मई की सिफारिशें उद्योग के स्वामित्व वाली रेटिंग संस्था को अद्र्ध-राष्ट्रीयकृत बना सकती हैं। अगर इन्हें लागू किया गया तो विज्ञापन राजस्व भी घटेगा। इस महामारी के प्रकोप से काफी पहले से ही टीवी राजस्व सुस्त पड़ रहा था। अब वह 25 से 40 फीसदी घटेगा।

इसके विपरीत हर बार जब नियामक मदद को आगे आए हैं तो कारोबार फला-फूला है। फिल्मों को वर्ष 2000 में 'उद्योग' का दर्जा देने के एक साधारण से फैसले की बदौलत राजस्व छह गुना से अधिक बढ़ गया। लेकिन ऐसे मददगार कदम कभी-कभार ही उठाए जाते हैं। ऐसा पिछला मददगार कदम वर्ष 2011 में केबल डिजिटलीकरण था। आम तौर पर मीडिया एवं मनोरंजन क्षेत्र की या तो अनदेखी की जाती है या अर्थव्यवस्था के आकर्षक मगर बुद्धू क्षेत्र के रूप में बरताव किया जाता है या किसी विवादित फिल्म या शो के लिए छोटे-मोटा दंड दिया जाता है। सरकार मीडिया एवं मनोरंजन को सामग्री/प्रभाव/नियंत्रण की नजर से देखती है। उस उद्योग के रूप में नहीं, जो कर और रोजगार सृजित करता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि विश्व का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार, सबसे बड़ा फिल्म निर्माता देश या सबसे तेजी से बढ़ता इंटरनेट बाजार कमाई के मामले में बहुत पीछे है।

मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र का सर्वोच्च नियामक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय है, जो ट्राई, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) जैसे अपने कई अंगों के जरिये काम करता है। इसके अलावा भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) जैसी स्व-नियमन संस्थाएं हैं।

क्या अब सभी चीजों-प्रिंट, टीवी, फिल्म, म्यूजिक, रेडियो, डिजिटल आदि को सरकार के नियंत्रण से मुक्त नियामक के तहत लाया जाना चाहिए? पैनी नजर वाली यह संस्था देखेगी कि अगर टीवी का वजूद बचाना है और उसे बढ़ाना है तो शुल्क नियंत्रण खत्म करने होंगे या अगर छोटे शहरों में मल्टीप्लेक्स क्रांति लानी है तो मंजूरियों को आसान बनाया जाए। क्या ब्रिटेन के संचार नियामक ऑफकॉम जैसी कोई संस्था कारगर हो सकती है, जिसे संसद में एक अधिनियम पारित कर बनाया गया और उसका अपना स्वतंत्र बजट एवं बोर्ड है? ज्यादातर मीडिया वकील इससे सहमत नहीं हैं। साईकृष्णा ऐंड एसोसिएट्स के प्रबंध साझेदार साईकृष्णा राजगोपाल ने कहा, 'इस देश में पर्याप्त कानून हैं।' वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, टीडीसैट, भारतीय दंड संहिता, केबल अधिनियम की तरफ इशारा करते हैं। प्रमुख मुद्दा इनका कार्यान्वयन है।

इसके लिए उद्योग और सरकार का हाथ मिलाना जरूरी है। ऑफकॉम के बोर्ड में सरकारी-निजी मिश्रण है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि न बीसीसी जैसा सरकारी प्रसारक और न ही स्काई जैसा निजी प्रसारक एजेंडा को नियंत्रित कर सकता है। फिक्की फ्रेम्स में बार-बार यह बात सामने आई कि ट्राई अफसरों से भरा है, जिसमें उद्योग के लोग शामिल नहीं हैं।

लॉ-एनके के वकील अभिनव श्रीवास्तव कहते हैं, 'नियामक का मुख्य उद्देश्य बाजार को एक विशेष दिशा में बढ़ाना है। अगर देश की संप्रभुता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों जैसे नियमन की जरूरत वाले मुख्य सिद्धांत परिभाषित होंगे तो बाजार शक्तियों और सरकार के द्वारा स्व-नियमन कामयाब रहेगा।' वह इसके लिए भारतीय विज्ञापन मानक परिषद का उदाहरण देते हैं।

मैंने उद्योग के जिन वरिष्ठ लोगों से बात की, उनमें से लगभग सभी ने दो चीजें कहीं। पहली, कोई भी सरकार अपना नियंत्रण नहीं त्यागना चाहेगी। 'स्वतंत्र' जैसी कोई चीज नहीं है। दूसरी, पहले से ही बहुत से अधिनियम और संस्थाएं हैं, नया नियामक बनने से एक और तकलीफ बढ़ जाएगी।

फिक्की फ्रेम्स में ज्यादातर सरकारी प्र्रवक्ताओं ने 'लाइट टच' नियमन शब्दों का इस्तेमाल किया। कुछ ने स्व-नियमन की वकालत की। साफ तौर पर कुछ बुद्धिमान अभी मौजूद हैं। लेकिन अगर मीडिया और मनोरंजन को वृद्धि घटने को वर्तमान खाई से बाहर निकलना है तो बहुत कुछ करना होगा।
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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भारत में एफडीआई प्रवाह के रुझान पर एक नजर

 
ए के भट्टाचार्य 
 
लगातार तीन वर्षों (2016-17 से लेकर 2018-19) तक भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रवाह में एक अंक की वृद्धि दर्ज की गई। यह एक आश्चर्य था। नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में इसके मंत्री देश के भीतर एफडीआई प्रवाह में आई तेजी के लिए अक्सर अपनी उपलब्धियों का जिक्र करते रहते थे। वर्ष 2014-15 में एफडीआई प्रवाह 25 फीसदी बढ़कर 45 अरब डॉलर रहा था और 2015-16 में यह फिर से 23 फीसदी की उछाल के साथ 56 अरब डॉलर पर पहुंच गया था। लेकिन मोदी सरकार के इन शुरुआती दो वर्षों के बाद एफडीआई प्रवाह के मामले में किस्मत का साथ मिलना मानो बंद हो गया। वर्ष 2016-17 में एफडीआई वृद्धि केवल 8 फीसदी और उसके अगले साल 1.2 फीसदी ही रही। हालांकि 2018-19 में थोड़े सुधार के साथ एफडीआई प्रवाह में 1.7 फीसदी की बढ़त देखी गई और यह 62 अरब डॉलर रहा। इस दौरान भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि में भी गिरावट का रुख देखा गया। वर्ष 2016-17 में 8.3 फीसदी पर रही वृद्धि दर 2017-18 में 7 फीसदी और 2018-19 में 6.1 फीसदी ही रही।
लेकिन एफडीआई प्रवाह में बड़ा बदलाव वर्ष 2019-20 में देखा गया जो मोदी के दूसरे कार्यकाल का पहला साल था। भले ही जीडीपी वृद्धि 2019-20 में 4.2 फीसदी पर लुढ़क गई लेकिन एफडीआई प्रवाह 18 फीसदी की तीव्र वृद्धि के साथ 73 अरब डॉलर रहा। ऐसा होने की क्या वजह थी? आर्थिक वृद्धि के गिरावट वाले साल में जब निर्यात में भी कमी दर्ज की गई थी, एफडीआई प्रवाह किन वजहों से बढ़ा?

सरकार एफडीआई प्रवाह के रूप में चार अवयवों की वर्गीकृत करती है- एफडीआई इक्विटी, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा स्वीकृत एफडीआई आवेदन, इक्विटी पूंजी प्रवाह एवं पुनर्निवेशित आय और अन्य पूंजी। इन सभी श्रेणियों में पिछले साल तेजी देखी गई लेकिन एफडीआई इक्विटी एवं अन्य पूंजी श्रेणियों में अधिक उछाल रही। इक्विटी निवेश 13 फीसदी बढ़कर करीब 50 अरब डॉलर रहा जबकि अन्य पूंजी श्रेणी 150 फीसदी की जबरदस्त छलांग के साथ 8 अरब डॉलर रही। अनिगमित इकाइयों में इक्विटी प्रवाह भी बढ़ा लेकिन उसकी राशि महज 1.2 अरब डॉलर ही थी। पुनर्निवेशित आय भी 3 फीसदी की सुस्त दर के साथ 14 अरब डॉलर रही थी।

पुनर्निवेशित आय में वृद्धि की अपेक्षाकृत धीमी दर चिंता का विषय है क्योंकि यह विदेशी निवेशकों के मन में विश्वास की कमी को दर्शाता है और वे मौजूदा उद्यमों से होने वाली आय या लाभांश को निकालने लगते हैं। यह भी हो सकता है कि रिटर्न इतनी तेजी से नहीं बढ़ रहे थे कि निवेशक अपनी आय को दोबारा निवेश करने के बारे में सोचें।

लेकिन अधिक उलझाने वाला पहलू अन्य पूंजी में आई 150 फीसदी की उछाल है। इस श्रेणी में मोटे तौर पर वरीय पूंजी जैसे अद्र्ध-इक्विटी साधनों के जरिये हुआ निवेश शामिल होता है। एक साल में ही निवेश की इस श्रेणी में इतनी तेजी क्यों आई? सरकार ने स्पष्ट किया है कि अन्य पूंजी के संदर्भ में आंकड़ा पिछले दो वर्षों के औसत के आधार पर जारी होता है। वर्ष 2017-18 और 2018-19 में अन्य पूंजी प्रवाह क्रमश: 2.91 अरब डॉलर और 3.27 अरब डॉलर रहा था। फिर 2019-20 में इस श्रेणी में इतनी अधिक उछाल कैसे आ गई? इसकी एक व्याख्या सरकारी आंकड़ा संकलन व्यवस्था में हुआ व्यापक बदलाव हो सकती है। जब 2018-19 में हुए अन्य पूंजी प्रवाह के आंकड़े पहली बार जारी किए गए थे तो यह 64.37 अरब डॉलर के कुल एफडीआई प्रवाह में 5.74 अरब डॉलर था। एक साल बाद इस साल के अन्य पूंजी प्रवाह को संशोधित कर 3.27 अरब डॉलर कर दिया गया। इसकी वजह से उस साल का कुल एफडीआई प्रवाह भी घटकर 62 अरब डॉलर पर आ गया था।

अधिक संभावना यह है कि 2019-20 के दौरान के अन्य पूंजी प्रवाह को आगे चलकर संशोधित कर दिया जाए। ऐसा होने पर पिछले वित्त वर्ष का कुल एफडीआई प्रवाह भी कम हो जाएगा।

बहरहाल, भारत के एफडीआई प्रवाह के आंकड़ों से तीन प्रमुख रुझान दिखाई देते हैं। पहला, भारत का चीन से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 2019-20 में कम हुआ है और यह दोनों देशों के रिश्तों में आई तल्खी से पहले की बात है। वर्ष 2018-19 में चीन से भारत में 1.23 अरब डॉलर का एफडीआई आया था लेकिन 2019-20 में यह घटकर महज 0.16 अरब डॉलर रहा। इस दौरान हॉन्ग कॉन्ग से भारत में एफडीआई 0.59 अरब डॉलर से बढ़कर 0.69 अरब डॉलर हो गया।
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दूसरा रुझान, भारत में एफडीआई के स्रोत के तौर पर मॉरीशस की भूमिका कम हुई है। भारत और मॉरीशस के बीच दोहरे कर से बचने के लिए हुई संधि के चलते एफडीआई इस देश के रास्ते से होता रहा है लेकिन 2016 में इस संधि को संशोधित किए जाने के बाद कम दरों का लोभ नहीं रह गया है। पिछले दो वर्षों से मॉरीशस भारत में एफडीआई का प्रमुख जरिया नहीं रहा है। उसके पहले तो मॉरीशस ही हर साल एफडीआई का प्रमुख उद्गम स्थल हुआ करता था। अब यह स्थान सिंगापुर ने ले लिया है और मॉरीशस की हिस्सेदारी सिंगापुर की आधी रह गई है।

तीसरे रुझान का ताल्लुक कर से बचाव करने वाले केमैन आइलैंड के उदय से है। वहां से एफडीआई प्रवाह पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ता रहा है। वर्ष 2018-19 में यह 3.7 अरब डॉलर रहा। नीदरलैंड भी कम कर दरों की वजह से जाना जाता है और वहां से भी भारत में एफडीआई प्रवाह 2019-20 में बढ़कर 6.7 अरब डॉलर रहा।

सरकार ने अपनी एफडीआई नीति की समग्र समीक्षा करने की घोषणा की है। इन प्रवृत्तियों की गहन पड़ताल जरूरी है ताकि अधिक टिकाऊ तरीके से विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने वाले कदम उठाए जा सकें।
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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महामारी से जंग में भी राजनीति


एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार  
 
                                                                               
कोरोना महामारी से कुशलता से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 जून को कर्नाटक सरकार की प्रशंसा की थी। मौका था, राज्य के एक प्रमुख स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के रजत जयंती समारोह का। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों व अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की भी तारीफ की। इसे उस पेशे को प्रोत्साहित करने के रूप में देखा गया, जिसको देश के विभिन्न हिस्सों में कलंकित किया जा रहा था। उन्होंने हर किसी से अग्रिम मोर्चे पर तैनात इन योद्धाओं का सम्मान करने का आह्वान किया और कहा, ‘डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मी सैनिकों की तरह हैं, बिना वरदी वाले जवान’।
प्रधानमंत्री के इस संदेश को एक खास संदर्भ में देखने की जरूरत थी, लेकिन फौरन ही इस पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जाने लगीं। कोविड-19 से जंग में एक नए ब्रांड ‘कर्नाटक मॉडल’ का जन्म हो गया। मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने इसका इस्तेमाल एक अवसर के रूप में किया। दावा किया गया कि कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग (संक्रमित मरीजों के संपर्क जाल की पहचान) के मामले में कर्नाटक सर्वश्रेष्ठ रहा। महामारी  के नियंत्रण में ‘प्रौद्योगिकी’ के प्रभावी इस्तेमाल को लेकर भी अपनी पीठ थपथपाई गई। सोशल मीडिया के बयानवीरों ने तुरंत तमिलनाडु और केरल जैसे पड़ोसी राज्यों से तुलना करते हुए जंग छेड़ दी। मांग होने लगी कि ‘राज्य के बाहर से किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। सिर्फ कर्नाटक का आधार कार्ड रखने वाले कन्नड़ों को ही आने दिया जाए।’
1 जून को बेंगलुरु में कोविड-19 के कुल 385 मामले थे। यहां तक कि 20 जून तक भी यहां संक्रमित मरीजों की संख्या 1,076 थी, जबकि मुंबई में 65,329, चेन्नई में 39,641 और दिल्ली में 56,746 लोग वायरस से संक्रमित हो चुके थे। संभवत: इन्हीं सबसे राजनेताओं को इस तरह की बयानबाजी करने का हौसला हुआ, जबकि आम जनता यह देखकर हैरान थी कि जमीनी हालात में तो कोई अंतर नहीं है। 
जाहिर है, भाजपा सरकार एक ऐसे नैरेटिव (माहौल बनाने) की तलाश में थी, जो महामारी के खिलाफ ‘केरल मॉडल’ की बढ़ती स्वीकृति का मुकाबला कर सके। केरल में 30 जनवरी को संक्रमण का पहला मामला सामने आया था, और नेपाह वायरस के अनुभव का इस्तेमाल करते हुए उसने जल्द ही कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग, आइसोलेशन (मरीज को अलग-थलग करना) और इलाज की व्यवस्था शुरू कर दी। नतीजतन, उसे जल्द सफलता मिल गई और उसने कोरोना मुक्त राज्य की घोषणा कर दी। हालांकि, इस वायरस की प्रकृति ऐसी है कि केरल में इसकी फिर से वापसी हो गई।
19 जुलाई तक कर्नाटक में संक्रमितों की संख्या 55,000 से ज्यादा हो चुकी है, और इनमें से करीब 28,000 संक्रमण के मामले अकेले बेंगलुरु में मिले हैं। यहां स्वास्थ्यकर्मियों की कई डरावनी कहानियां सुनने में आ रही हैं। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के संगठन का कहना है कि करीब 30 फीसदी डॉक्टर, 50 फीसदी नर्स और कई वार्ड ब्यॉय संक्रमण की आशंका में चिकित्सा दायित्व से बाहर किए गए हैं। कर्नाटक मेडिकल एसोसिएशन का दावा है कि पूरे राज्य में 40-50 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है। जब स्वास्थ्य शिक्षा मंत्री के सी सुधाकर ने एक अस्पताल का औचक निरीक्षण किया, तो उन्हें बताया गया कि 112 मरीजों की देखभाल के लिए महज दो नर्स हैं, जबकि मानदंड के मुताबिक प्रति 10 मरीज पर कम से कम एक नर्स को होना चाहिए।
बेंगलुरु में निजी अस्पतालों द्वारा कोरोना मरीजों को भरती न करने पर जब एक मरीज की सरकारी अस्पताल के सामने मौत हो गई, तब राज्य सरकार ने 18 निजी अस्पतालों को नोटिस जारी किया। शवों का अंतिम संस्कार भी बेंगलुरु में एक बड़ा मसला बनता जा रहा है, क्योंकि ऐसे मैदान रिहाइशी इलाकों में हैं। चूंकि इस्तेमाल किए गए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई किट) का निस्तारण नियमों के खिलाफ हो रहा है, इसलिए यहां के लोग डर रहे हैं। चिंता की बात यह भी है कि बेंगलुरु मेडिकल कॉलेज ऐंड रिसर्च यूनिट की क्रिटिकल केयर यूनिट में 13 जुलाई तक 90 में से 89 मरीजों की मौत हुई। हालांकि, डॉक्टरों ने इसकी वजह उनका देर से अस्पताल आना और कई अन्य रोगों से पीड़ित होना बताया है। इन सबके बीच मुख्यमंत्री ने महामारी से निपटने के लिए एक के बाद दूसरे मंत्री बदले। इतना ही नहीं, राज्य सरकार ने अपने इस दावे से उलट कि वह अब लॉकडाउन नहीं लगाएगी, अचानक 14 जुलाई से 22 जुलाई तक बंदी की घोषणा कर दी। हालांकि, यह कोई नहीं जानता कि विनिर्माण-कंपनियों को काम करने की अनुमति देकर भला लॉकडाउन से क्या हासिल हो सकता है? सरकार की इस घोषणा से भ्रम की स्थिति बनी, क्योंकि कुछ मजदूर पहले ही शहर छोड़ चुके थे।
इस उलझन ने कुछ हफ्ते पहले के तमिलनाडु के घटनाक्रम की याद ताजा कर दी। दरअसल, अप्रैल में इसी तरह शेखी बघारते हुए मुख्यमंत्री ई पलानीसामी ने घोषणा की थी कि राज्य जल्द ही वायरस से निजात पा लेगा। मगर कुछ ही हफ्तों में संक्रमण में व्यापक वृद्धि हुई। कर्नाटक की तरह ही यहां भी राजनीतिक ईष्र्या, प्रतिद्वंद्विता और दूसरों पर हावी होने की आदत देखी गई थी। 
सौभाग्य से तमिलनाडु में सुधार हुआ है। चेन्नई ने पांच लाख टेस्ट किए हैं, जो देश में सबसे अधिक है। बेंगलुरु भी टेस्ट की अपनी क्षमता सुधार रहा है। 15 जुलाई को यहां 22,000 टेस्ट हुए थे, जिसे महीने के अंत तक रोजाना 30,000 तक ले जाने का इरादा है। हालांकि, मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से यह भी कहा था कि उनका सूबा एक लाख मामलों को संभाल सकता है, लेकिन इसकी आधी संख्या पर ही यह संघर्ष करता हुआ दिख रहा है, जबकि जुलाई के अंत तक संक्रमण के शीर्ष स्तर पर पहुंचने की आशंका है।
साफ है, राजनीतिक वर्ग को सियासत और महामारी का घालमेल नहीं करना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को यह एहसास होना चाहिए कि वे महामारी से लड़ रही हैं, एक-दूसरे से नहीं। वायरस केरल, कर्नाटक या तमिलनाडु में अंतर नहीं करेगा। फिर, भारत का इस कदर विस्तार है कि एक हिस्से में संक्रमण के थमते ही दूसरे इलाकों में इसका प्रसार हो सकता है। लिहाजा, एक-दूसरे पर उंगली उठाने की बजाय हमारे राजनीतिक वर्ग को परिपक्वता दिखानी चाहिए। आखिरकार यह मसला लोगों की जान से जुड़ा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


सौजन्य - हिल्दुस्तान।
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कोरोना युद्ध में अमेरिका से सबक


फ्रैंक एफ इस्लाम, अमेरिका वासी उद्यमी व समाजसेवी 
 
स्वास्थ्य सेवा पर दुनिया भर में सबसे ज्यादा खर्च करने वाला अमेरिका कोरोना वायरस से सबसे अधिक प्रभावित है। अफसोस की बात यह है कि इस महामारी को शुरू हुए छह महीने गुजर चुके हैं, पर वह इसे थाम पाने की सफलता से कोसों दूर दिख रहा है। ये हालात इसलिए बन गए हैं, क्योंकि शुरू से ही जवाबी प्रतिक्रिया में वह एक के बाद दूसरी गलती करता रहा। मैं यहां अमेरिका की 10 प्रमुख त्रुटियों का जिक्र कर रहा हूं, जिनसे हमें सीखना चाहिए कि हमें क्या नहीं करना है।
पहली गलती है कि अमेरिका में फैसले वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राजनीतिक तौर पर लिए गए। यह गलती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शीर्ष स्तर से शुरू हुई। उन्होंने शुरुआत में कोविड-19 को मौसमी बुखार कहकर खारिज कर दिया था। उप-राष्ट्रपति माइक पेंस को उन्होंने उस टास्क फोर्स का मुखिया जरूर बनाया, जिसका गठन आगामी कार्ययोजना के बारे  में सलाह देने के लिए किया गया था, पर वास्तव में उन्हें कोई अधिकार दिया ही नहीं गया।
दूसरी चूक, महामारी से निपटने के लिए कोई कानून सम्मत राष्ट्रीय कार्ययोजना नहीं बनाई गई। टास्क फोर्स ने राज्यों के लिए टेस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट (जांच, संक्रमित की खोज और इलाज) को लेकर दिशा-निर्देश तो जारी किए, संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए मास्क के इस्तेमाल व फिजिकल डिस्टेंसिंग की बात भी कही गई, मगर ये सभी दिशा-निर्देश तक ही सिमटे रहे। इसे कानून द्वारा अनिवार्य नहीं बनाया गया। 
तीसरी, महामारी को राज्यों का, यानी स्थानीय मसला माना गया। एक संघ के तौर पर संजीदा प्रयास नहीं किए गए। गवर्नरों और स्थानीय अधिकारियों को अपने तईं इसके उपाय तलाशने को कहा गया। नतीजतन, महामारी से निपटने के तरीके व परिणाम राज्य-दर-राज्य अलग-अलग दिखे।
चौथी गलती, जांच, चिकित्सा उपकरणों और उनकी आपूर्ति को लेकर संघ का दखल सीमित था। इनकी आपूर्ति शृंखला काफी हद तक कमजोर थी। विदेशी और निजी स्रोतों से इन्हें जुटाने की व्यवस्था करने के लिए राज्यों को ही कहा गया।
पांचवीं, महामारी को लेकर सटीक सूचनाओं का अभाव रहा। जब तक शट  डाउन नहीं हटाया गया था, तब तक तो टास्क फोर्स ने नियमित प्रेस-ब्रीफिंग की, पर बाद में ट्रंप ने ब्रीफिंग की कमान खुद संभाल ली। उन्होंने इसे भाषण देने का मंच बना दिया, संवाददाताओं के साथ बहस की जाने लगी, चिकित्सा विशेषज्ञों के तर्कों को खारिज किया गया, और यहां तक कि असुरक्षित दवाओं को बढ़ावा दिया गया। 
छठी, शट डाउन जल्द से जल्द हटाने के लिए अतिरिक्त प्रयास किए गए। ट्रंप लोगों के घरों में सिमटे रहने के शुरू से विरोधी रहे। शट डाउन के निर्देश जारी होते ही राष्ट्रपति इसे हटाने के बारे में सोचने लगे। उन्होंने वर्जीनिया और मिशिगन जैसे राज्यों में अपने लाखों समर्थकों के लिए ट्वीट भी किया, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि वहां के गवर्नर उनका विरोध कर सकते हैं या शट डाउन हटाने में ढीले पड़ सकते हैं। ट्रंप खुद के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने की संभावनाओं को तलाशते हुए ही तमाम कदम उठाते दिखे, और इसके लिए उन्होंने लोगों की सेहत को भी नजरंदाज किया।
सातवीं गलती, अगर देश के किसी एक हिस्से में सफलता मिली, तो उसके सापेक्ष दूसरी जगहों पर भी महामारी की प्रकृति को नजरंदाज करते हुए नियमों में ढील दी गई। शुरुआत में महामारी के हॉटस्पॉट थे पूर्वोत्तर, मध्य-पश्चिमी राज्य, शहरी इलाके व कैलिफोर्निया। मई के मध्य से जून की शुरुआत तक इन जगहों में कोरोना का प्रकोप कुछ कम हुआ, जबकि बाकी देश में चरम पर पहुंचता दिखा। इसलिए जॉर्जिया, फ्लोरिडा, टेक्सास व एरिजोना जैसे राज्य नियमों में अपेक्षाकृत अधिक ढील देने लगे। नतीजतन, इन-इन प्रांतों में भी संक्रमण में तेजी आई और अब ये नए हॉटस्पॉट बन गए हैं।
आठवीं गलती, नियमों को लागू करने वाला कोई एक  तंत्र अमेरिका में नहीं था। यहां तक कि लोगों के घर से बाहर न निकलने, मास्क पहनने और शारीरिक दूरी के पालन संबंधी निर्देशों को लागू कराने में भी व्यापक अंतर रहा। जॉर्जिया व टेक्सास जैसे कुछ राज्यों में रिपब्लिकन गवर्नरों ने इन नियमों को लेकर महज दिशा-निर्देश जारी किए, जबकि इन्हीं राज्यों के बडे़ शहरों के डेमोक्रेट मेयरों ने इस बाबत कानूनी प्रावधानों की जरूरत बताई।
नौवीं चूक। अमेरिका में स्वास्थ्य-चिंता की बजाय आर्थिक चुनौतियों को ज्यादा महत्व दिया गया। महामारी की वजह से चरमराई अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए ही शट डाउन हटाया गया, जिसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। आखिरी और संभवत: सबसे बड़ी गलती, विशेषज्ञों की सलाहों को लगातार खारिज किया जाता रहा। जैसे,  अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध संक्रामक रोग विशेषज्ञ और टास्क फोर्स के सदस्य एंथोनी फौसी की राय की अवहेलना की गई। शुरू से ही ट्रंप विशेषज्ञों की सलाहों की अनदेखी कर अपना मत परोसते रहे। 
कुल मिलाकर, अमेरिका ने कोविड-19 के खिलाफ दूरदर्शी सोच के साथ जंग लड़ने की बजाय हालात देखकर कदम उठाए। इस नाकामी के लिए काफी हद तक ट्रंप को जिम्मेदार माना जाना चाहिए। महीनों तक उन्होंने खुद मास्क नहीं पहना, हालांकि हाल में उन्हें मास्क में देखा गया है। इतना ही नहीं, वह लगातार यही कहते रहे कि एक समय के बाद महामारी खुद खत्म हो जाएगी। साफ है, ट्रंप वह प्रतीक बन गए हैं, जो यह बताता है कि महामारी के खिलाफ व्यक्तिगत, राजनीतिक और पेशेवर तौर पर क्या नहीं करना चाहिए।  
ये कुछ बुनियादी सबक हैं, जो भारत या दूसरे देश अमेरिका से सीख सकते हैं। भारत को खासतौर से ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यहां संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। मौजूदा स्थिति बता रही है कि दुनिया के संभवत: सबसे कठिन लॉकडाउन का वह नतीजा नहीं निकला, जिसकी उम्मीद थी। भारत 10 लाख संक्रमण का आंकड़ा पार कर चुका है, जो एक बुरी खबर है। हालांकि, अब भी सभी दरवाजे बंद नहीं हैं, क्योंकि यहां मृत्यु-दर बहुत कम है। इसके अलावा, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कोरोना के 80 फीसदी मामले 49 जिलों में ही हैं। इसका मतलब है कि देश के महज सात फीसदी जिलों में अधिकतर मामले हैं, यानी हॉटस्पॉट के लिए एक समग्र नीति बनाकर महामारी को थामा जा सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सौजन्य - हिल्दुस्तान।
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लॉक और अनलॉक की आंख मिचौली : Hindustan Editorial


आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार 
                          
कंपनियों के तिमाही नतीजे आने लगे हैं। यह उसी तिमाही के नतीजे हैं, जिसके तीन में से दो महीने पूरी तरह लॉकडाउन में स्वाहा हो चुके हैं। अप्रैल और मई महीने। जून में कारोबार खुलना शुरू हुआ और कई जगह काफी हद तक खुल भी गया, पर अनलॉक का काम अभी चल ही रहा है। देश के अनेक हिस्सों में तो लॉक और अनलॉक के बीच आंख मिचौली जारी है। अनलॉकिंग का असर क्या होगा और कब होगा, यह जानने के लिए पहले समझना जरूरी है कि लॉकडाउन का असर क्या हुआ। 
कंपनियों के तिमाही नतीजों पर नजर डाले बिना ही सबको पता है कि रिजल्ट क्या होने वाला है। वही, जो कई राज्यों में छात्रों का हो रहा है। इम्तिहान ही पूरे नहीं हो पाए और अब बिना इम्तिहान के अगले दर्जे में जाना है। कारोबार चलाने वाले के पास अगले दर्जे में जाने का रास्ता तो है नहीं। कोई बड़ी फैक्टरी अगर आधे घंटे के लिए बंद हो जाए, तो उसे वापस पटरी पर आने में करीब-करीब दो दिन लग जाते हैं। अपने आसपास की किसी दुकान में जाकर देखिए कि दो या तीन महीने बंद रहने के बाद जब शटर फिर खुला, तो भीतर सामान का हाल क्या था, कितनी धूल जमी थी और कितनी चीजें खराब हो गईं। 
यही हाल इस वक्त पूरे देश का है। भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टीसीएस के तिमाही नतीजे खराब होने की आशंका थी, पर जो परिणाम आया, वह तो आशंका से भी कमजोर है। मुनाफे में 13.81 प्रतिशत की गिरावट के साथ कंपनी ने अप्रैल से जून के बीच 7,008 करोड़ रुपये कमाए हैं। यह वह कारोबार है, जिसमें सबसे ज्यादा वर्क फ्रॉम होम संभव है और हो रहा है। लेकिन जहां लोगों का आना-जाना जरूरी है, यानी फैक्टरियां, दुकानें और इस तरह के दफ्तर या अन्य कारोबार, उनकी क्या स्थिति है? लगातार दूसरे महीने भारत सरकार ने औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, यानी आईआईपी के आंकड़े सामने रखने से इनकार कर दिया है। सरकार का कहना है कि अप्रैल और मई में पूरी तालाबंदी की वजह से यह सही नहीं होगा कि इस दौर के आंकड़े को पिछले साल के इन्हीं महीनों के आंकड़ों के साथ रखकर देखा जाए। फिर भी, जानना जरूरी है कि मई के महीने में हालात अप्रैल से कुछ सुधरे जरूर, पर जितनी जानकारी सांख्यिकी कार्यालय ने सामने रखी है, उसका हिसाब जोड़कर समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कहा है कि मई में भारत का फैक्टरी आउटपुट 37.8 प्रतिशत कम रहा है। जून में लॉकडाउन हटने के बाद से हालात सुधरने चाहिए, लेकिन जून का आंकड़ा अगस्त में आएगा। 
इस बीच उद्योग संगठन फिक्की और कंसल्टिंग फर्म ध्रुव एडवाइजर्स ने देश के 100 से ज्यादा चोटी के कारोबार चलाने वाले प्रबंधकों के बीच सर्वे किया है। जून के अंत में हुए इस सर्वे में पाया गया कि अभी सिर्फ 30 प्रतिशत संस्थानों में 70 प्रतिशत या उससे ज्यादा क्षमता पर काम चल रहा है, लेकिन 45 प्रतिशत को उम्मीद है कि जल्दी ही उनका कामकाज भी 70 प्रतिशत से ऊपर होने लगेगा। इनकी उम्मीदें अनलॉक के साथ बढ़ गई हैं। 22 प्रतिशत प्रबंधकों का कहना है कि उनका निर्यात बढ़ने लगा है। 25 प्रतिशत प्रबंधक कहते हैं, ऑर्डर बुक सुधर रही है और 30 प्रतिशत कंपनियों का कहना है कि उनकी आपूर्ति शृंखला पटरी पर आ रही है। 
हालांकि फिक्की की प्रेसिडेंट संगीता रेड्डी का कहना है कि जितनी गहरी मार पड़ी है, उससे उबरने का काम काफी धीरे-धीरे ही हो पाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस वक्त ऐसे कदम उठाने जरूरी हैं, जिनसे कारोबारियों को न सिर्फ मौजूदा संकट से निकलने में मदद मिले, बल्कि वे लंबे दौर में आने वाले मौकों के लिए भी खुद को तैयार कर सकें। लेकिन इस बीच कोरोना के झटके लग रहे हैं और सरकारें भी लॉकडाउन में कभी ढिलाई, तो कभी कड़ाई कर रही हैं। एक तरफ, बीमारी फैलने का डर है, तो दूसरी तरफ, अर्थव्यवस्था के डूबने का खतरा। यही वजह है कि पिछले 15 दिनों में तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, बिहार, यूपी और असम के कई इलाकों में लॉकडाउन लग चुका है। देश के दस राज्यों में 45 करोड़ से ज्यादा लोग लॉकडाउन में ही हैं। 
इसका सीधा असर काम, रोजगार और कमाई पर पड़ना तय है। कारोबार के वापस पटरी पर लौटने की उम्मीद पाले कंपनियों का कहना है कि इस तरह बार-बार बंदी होती रही, तो फिर आर्थिक वापसी मुश्किल होती जाएगी। अप्रैल में ही इस बारे में जब सवाल उठे थे, तब मारुति उद्योग के चेयरमैन आर सी भार्गव ने कहा था कि फैक्टरी में या आसपास 20,000 लोगों के रहने का इंतजाम संभव नहीं है। अब फिक्की ने जो सुझाव दिए हैं, उसमें यह मांग शामिल है कि सरकार कामगारों के लिए उनके काम की जगह के आसपास सस्ती रिहाइश का इंतजाम करने में मदद करे। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने मांग की है कि केंद्र सरकार पूरे देश में लॉकडाउन लगाने और हटाने पर एक केंद्रीय व्यवस्था बनाए। 
व्यापार जगत और सरकार के बीच चर्चा चल रही है, सुझाव भी लिए-दिए जा रहे हैं, लेकिन रोजगार के मोर्चे पर हालत कितनी खराब है, इसकी खुलकर बात नहीं हो रही है। अभी तक का हाल समझना हो, तो म्यूचुअल फंडों के संगठन ‘एम्फी’ की ताजा रिपोर्ट को देखना जरूरी है। जून के महीने में इक्विटी म्यूचुअल फंड में लगने वाले पैसे में 95 प्रतिशत की गिरावट आई है और लगातार तीसरे महीने एसआईपी यानी किस्तों में आने वाले पैसे में गिरावट दिखाई पड़ी है। साफ संकेत है कि लोगों के पास पैसा बच नहीं रहा है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अभिजित बनर्जी से लेकर भारत के तमाम उद्योग संगठन तक केंद्र सरकार से लगातार मांग कर रहे हैं कि लोगों की जेब में पैसा डालिए, ताकि वे खर्च कर सकें। बस यही एक रास्ता है। 
और ऐसे में, अगर बार-बार छोटे-बडे़ लॉकडाउन लगते रहे, तो खतरा और गंभीर होने जा रहा है। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने शनिवार को कहा है कि यह स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए सौ साल का सबसे बड़ा संकट है। जाहिर है, अपने-अपने मोर्चे पर लड़ना होगा, पर एक से निपटने के चक्कर में दूसरे को नजरंदाज करना बहुत महंगा साबित होगा और दर्दनाक भी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।
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राहत को आर्थिक तुष्टीकरण बनाना अनुचित : Dainik Tribune Editorial

गुरबचन जगत
तीस जून को सरकार ने हमारे गरीब भाई-बहनों को कोविड-19 महामारी के दृष्टिगत और कुछ महीने राशन सामग्री जारी रखने की घोषणा की है। जाहिर है यह मात्रा बहुत बड़ी है। उक्त निर्णय भली नीयत के साथ जनता को राहत देने वाला है। विश्वास है कि केंद्र सरकार की इस घोषणा के बाद गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी इसका अनुसरण करेंगे। पिछले कई सालों में कोई भी मौका बनने पर मुफ्त राहत सामग्री देने का चलन पैदा हो गया है, फिर चाहे अवसर प्राकृतिक आपदा का हो या चुनाव का, यहां तक कि किसी विशेष समस्या के बिना भी घोषणा कर दी जाती है। नतीजतन अब जब कभी भी कुछ घटित होता है तो लोगों की ओर से पैसे, अन्न-दाल इत्यादि के लिए मांग होनी शुरू हो जाती है। देखना यह है कि इसमें जरूरतमंदों के हाथ में वास्तव में कितना पहुंचता है? आपदा के समय राहत देना एकदम न्यायोचित है लेकिन इसे आर्थिक तुष्टीकरण की नीति बनाना सही नहीं है।
राहत किस किस्म की हो और कब, इस पर विचार होना चाहिए। आपात स्थिति बनने पर जहां हमारी सरकारों का ध्यान आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को न्यूनतम जरूरत का दाल-चावल देने पर लगा होता है वहीं पश्चिमी जगत में सरकारें बेरोजगारों और प्रभावित हुए व्यवसायियों के हाथ में गुजारे लायक पैसा बना रहे, इस पर अपना ध्यान केंद्रित करती हैं। कोविड-19 महामारी के कारण किए गए निष्ठुर लॉकडाउन ने हमारी आर्थिकी को करारा झटका दिया है और मंतव्य संभालने में नाकामयाबी से अर्थव्यवस्था को दुबारा पटरी पर लाने के लिए बहुत ज्यादा प्रयास करने पड़ेंगे। हमारे सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली मात्र 1 प्रतिशत की कमी से ही असंख्य परिवार गरीबी की गर्त में और नीचे धंस जाएंगे। मौजूदा चोट पहले से कमजोर पड़ी अर्थव्यवस्था के समय में पड़ी है। 

बृहद सवाल पर आएं तो जब कोई आपदा न हो तब खैरात बांटना क्यों जरूरी होता है? यह कृत्य हमारी नीतियों में बड़े बदलाव का हिस्सा बन गया है और राजनेताओं को जब कभी जनता को पुचकारना हो या चुनावों में वोट बटोरने हों तो मुफ्त चीजों की घोषणा कर देते हैं। देश के आर्थिक परिदृश्य में सार्थक सुधार करने की बजाय नेताओं के लिए यह पत्ता खेलना ज्यादा आसान होता है। पिछले 72 सालों के दौरान हम ऐसा कारगर कृषि-औद्योगिक ढांचा बनाने में विफल रहे हैं जो देशवासियों के लिए रोजगार और विकास सुनिश्चित कर सके। मुद्दा चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा का हो या विकास एवं रोजगार का, हम एक राष्ट्रीय नीति बनाने में असफल रहे हैं। हम अपनी बजट प्रक्रिया को जरूरत से ज्यादा महत्व देते हैं जबकि बजट का काम केवल विभागों को धन का प्रावधान करना है। विगत में हमने पंचवर्षीय योजनाएं बनाई हैं, मिश्रित अर्थव्यवस्था का प्रयोग किया है। इस दौरान विपक्षी दल निजी क्षेत्र को और ज्यादा भूमिका देने की मांग करते रहे जबकि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का ‘द बॉम्बे क्लब’ यानी कुछ बहुत बड़े सरमाएदारों का समूह देश के मुख्य क्षेत्रों पर बने अपने एकाधिकार से खुश था।
वर्ष 2014 में नई सरकार के गठन के साथ लगा था कि आखिर देश में निजीकरण के दिन आ गए हैं। हालांकि इसे लागू करने वालों को अंदाजा नहीं था कि यहां भी मायूसी मिलने वाली है, क्योंकि आरंभिक शोरगुल के बाद समाजोन्मुखी आर्थिक नीतियां फिर से अपनानी पड़ीं और धरातल पर विशेष बदलाव नहीं हुए सिवाय इसके कि ‘बॉम्बे क्लब’ की जगह धीमे से एक अन्य कुलीन गुट को स्थापित कर दिया गया, जिसने सरकार की मदद से देश के टेलीकॉम, सौर ऊर्जा, तेल, बिजली, दृश्य एवं प्रिंट मीडिया इत्यादि क्षेत्रों में लगभग एकाधिकार बना लिया है। तो आज हम जहां हैं वहां पाते हैं कि एक ओर समाजवाद की बात करने वाले और कुलीन गुट है, जिसके साथ एक मजबूत केंद्रीकृत सरकार है तो दूसरी ओर वह जनता है जो आम स्थितियों में भी आर्थिक मदद और वस्तु रूपी खैरात की आस रखती है। चुनावों से पहले तो इसमें अतिरिक्त दरकार जुड़ जाती है।

हम इस खैरात संस्कृति को कैसे बदल सकते हैं? इसके लिए नए संस्थागत उपाय किए जाएं और मौजूदा व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए। प्रगति के लिए सबसे मूलभूत जरूरत है अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण एवं शहरी विकास तंत्र और एक ऐसी न्याय व्यवस्था जो यथेष्ठ समय में फैसले दे सके। आज याचिकाकर्ता को अदालती फैसले के लिए अंतहीन इंतजार करना पड़ता है, लिहाजा हमारा न्यायिक ढांचा ऐसा बनकर रह गया है, जिसमें अंतर्निहित अक्षमता की पैठ हो चुकी है, इस तरह तो हमारी अर्थव्यवस्था आधुनिक बनने से रही। समयबद्ध कानूनी फैसले होने चाहिए, न कि मुकदमे एक अदालत से दूसरी में फुदकते फिरें, तभी कहते हैं ‘देर से मिला न्याय… अन्याय’ है।
आज देश के ग्रामीण अंचल में प्रभावी शिक्षा तंत्र लगभग कहने भर का है, खासकर उत्तर और मध्य भारत में, गोकि शिक्षा के मामले में दक्षिण भारत के विद्यालयों और कॉलेजों की स्थिति बेहतर है। अगर अमेरिका की सिलिकॉन वैली, अंतरिक्ष क्षेत्र और आईवी लीग यूनिवर्सिटियों में कार्यरत भारतीयों की संख्या को देखें, तो पाते हैं कि उनमें बहुत बड़ी संख्या में विशेषज्ञ दक्षिण भारत से आते हैं और उनमें लगभग सभी विदेशों में बसे हुए हैं। यही स्थिति कॉलेज और विश्वविद्यालयों में भी देखने को मिलती है जहां दक्षिण भारतीय आगे हैं। अनुसंधान एवं विकास पर हमारे उद्योग और विश्वविद्यालय ज्यादा समय और धन नहीं लगाते। समाज में कारगर स्वास्थ्य तंत्र एक बहुत बड़ी जरूरत है और हालिया घटनाक्रम ने सिद्ध कर दिया है कि मानव संसाधनों और ढांचागत सुविधाओं की कितनी बड़ी कमी है। वहन योग्य स्वास्थ्य देखभाल सभी नागरिकों को उपलब्ध होनी चाहिए, खासकर उनको जो समाज के निचले तबके में हैं।
गरीबी के निचले पायदान के लोगों का कहना है कि यदि अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मयस्सर हों तो हमारे बच्चे भी इस गुरबत से निकल सकते हैं। इसीलिए निजी सुख तजकर वे अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। जिनकी माली हालत अच्छी है, वे अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ने भेज देते हैं। अगर हम शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्या से सही ढंग से निपट पाएं तो हम अपनी बहुत बड़ी अलामत यानी अनियंत्रित ढंग से बढ़ती आबादी पर लगाम लगा सकते हैं। लेकिन आज की तारीख में कोई भी राजनीतिक दल इस पर सख्ती से काम करने को राजी नहीं है। हालांकि अगर पढ़े-लिखे वर्ग पर नजर दौड़ाएं तो पाते हैं कि ज्यादातर परिवारों में एक या दो ही बच्चे हैं। इससे बच्चे को अच्छी शिक्षा और व्यावसायिक दर्जा पाने में खुद-ब-खुद आसानी हो जाती है। अगर हम इस समस्या पर आज से काम करना शुरू करें तब भी नतीजे आने में दो दशक लग जाएंगे।
औद्योगिक क्षेत्र को फिर से सरकारी उपक्रम बनाने की बजाय मैदान को निजी क्षेत्र के लिए खुला छोड़ देना चाहिए और नए उद्यमियों को मदद देने के अलावा एकाधिकार बनाने पर रोक लगानी होगी। युवा भारतीय उद्यमियों को आगे आने का मौका देना होगा और उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए ताकि वे अपना भविष्य विदेशों की बजाय देश में बनाना पसंद करें। स्थापित उद्योग-धंधा लंबे समय तक चलता है और इसमें विस्तार भी होता है। लेकिन इस क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाई जाए।
कृषि से आय को इतना आकर्षक बनाया जाए ताकि युवा खेती तजने की बजाय करना पसंद करें। फसल चक्र को क्षेत्रीय जरूरतों और मंडी के हिसाब से बनाया जाए। नई कृषि नीति को लेकर किसानों में बहुत-सी आशंकाएं पैदा हो गई हैं और उन्हें डर है कि सरकारी एजेंसियां खरीद करने मंडी में नहीं आएंगी और कृषक व्यापारियों के रहमोकरम पर छूट जाएगा। मूल्य निर्धारण का मुद्दा ऐसा है जो किसान के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण है।
बिना जायज कारण मुफ्त की खैरात देने की प्रथा बंद होनी चाहिए। मदद केवल आपदा के समय दी जाए, दान में मिली सहायता संस्थागत व्यवस्थाओं के जरिए मिलने वाले संबल, जैसे कि उद्योग, कृषि विकास, तकनीक, शिक्षा और स्वास्थ्य का विकल्प नहीं हो सकती। जरूरी हुआ तो वृद्धि एवं विकास पर राष्ट्रीय नीति बनाने हेतु संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए। वैसे भी संसद की संस्थागत विधि को दरकिनार किया जा रहा है। अब संसद में बाकायदा बहस के बाद कानून बनाकर लागू करने की बजाय अध्यादेशों से काम चलाया जा रहा है।

लेखक यूपीएससी के अध्यक्ष एवं मणिपुर के राज्यपाल रहे हैं।
सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।
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खेती पर किसान का नियंत्रण बना रहे, अनुबंध कृषि की विसंगतियां : Dainik Tribune Editorial


राजेन्द्र चौधरी

जून, 2020 में जब देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा था, तब भारत सरकार ने खेती में तीन बड़े कानूनी बदलाव अध्यादेश जारी करके कर दिए क्योंकि देर सवेर ये अध्यादेश संसद में पारित करने के लिए रखे जायेंगे, इसलिए इन पर पुनर्विचार करने का अभी भी एक मौका बाकी है।
सब से महत्वपूर्ण है अनुबंध खेती अध्यादेश। आमतौर पर अनुबंध खेती का मतलब है कि बुआई के समय ही बिक्री का सौदा हो जाता है ताकि किसान को भाव की चिंता न रहे। परन्तु सरकार द्वारा पारित कानून में अनुबंध की परिभाषा को बिक्री तक सीमित न करके, सभी किस्म के कृषि कार्यों को शामिल किया गया है। इस तरह से परोक्ष रूप में कम्पनियों द्वारा किसान से ज़मीन लेकर खुद खेती करने की राह भी खोल दी है। धारा 2 एच II के अनुसार कम्पनी किसान को किसान द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के लिए भुगतान करेगी। यानी किसान अपनी उपज की बिक्री न करके अपनी ज़मीन और अपने श्रम का भुगतान पायेगा।
आज़ादी की लड़ाई के समय से यह मांग रही है कि खेती पर किसान का नियंत्रण रहे, न कि व्यापारियों का। इसलिए आज़ादी के बाद किसी व्यक्ति द्वारा रखी जाने वाली कृषि भूमि की अधिकतम सीमा तय कर दी गई। इससे पहले छोटू राम के काल में यह कानून बनाया गया था कि गैर-कृषक या साहूकार खेत और खेती के औजारों पर कब्ज़ा नहीं ले सकता। इन कानूनों का उद्देश्य यही था कि खेती पर चंद लोगों का अधिकार न होकर यह आम लोगों की आजीविका का साधन रहे। कोरोना काल ने इस नीति की ज़रूरत को फिर से रेखांकित किया है। अनुबंध पर खेती कानून ग्रामीण इलाकों के इस अंतिम सहारे को छीनने का क़ानून है।
नए कानून को बनाने वाले भी इस बदलाव की भयावहता को जानते हैं। इसलिए इसे इसके असली नाम ‘कम्पनियों द्वारा खेती’ का नाम न देकर अनुबंध खेती का रूप दिया है। एक ओर धारा 8-ए में कहा गया है कि इस कानून के तहत ज़मीन को पट्टे पर नहीं लिया जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर धारा 8-बी में भूमि पर कम्पनी द्वारा किये स्थाई चिनाई, भवन निर्माण या ज़मीन में बदलाव इत्यादि का ज़िक्र है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि ज़मीन अनुबंध की अवधि के दौरान अनुबंध करने वाले के नियंत्रण में है। यानी कि खेती किसान नहीं, अनुबंध करने वाला कर रहा है।
अन्य दो कानूनी बदलावों द्वारा सरकार ने कृषि क्षेत्र से नियमन, विशेष तौर पर मंडी कानून को बहुत हद तक ख़त्म कर दिया है। कई बार किसान भी यह सवाल उठाते हैं कि सरकार क्यों फसलों के मूल्य तय करती है। ऊपरी तौर पर यह बात ठीक भी प्रतीत होती है पर वास्तव में यह ठीक नहीं है। सरकार तो न्यूनतम बिक्री मूल्य निर्धारित करती है। कृषि में सरकारी नियमन कृषि की प्रकृति के कारण है। एक तो बुनियादी ज़रूरत होने के कारण भोजन की मांग में कीमत या आय बढ़ने पर ज्यादा बदलाव नहीं होता और दूसरा मौसम पर निर्भरता के कारण कृषि उत्पाद में बहुत ज्यादा बदलाव होते हैं। आपूर्ति में बहुत ज्यादा बदलाव और मांग का बेलचीला होने का परिणाम यह होता है कि अगर बाज़ार के भरोसे छोड़ दिया जाए तो कृषि की कीमतों में बहुत ज्यादा बदलाव होते हैं। ऐसा न किसान के हित में होता है और न ग्राहक के हित में। जब फसल नष्ट होने के कारण कीमतें बढ़ती हैं तो जिस किसान की फसल ही नष्ट हो गई, उसको कोई फायदा नहीं होता और जब अच्छी पैदावार के कारण कीमतें इतनी घट जाती हैं कि खड़ी फसल की जुताई करनी पड़ती है तो भी किसान को कोई फायदा नहीं होता। इसलिए ही दुनिया भर में सरकारें कृषि बाज़ार का नियमन करती हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि कृषि मंडी की वर्तमान व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत है। अभी भी सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य सभी जिंसों में और सभी इलाकों में नहीं मिलता, और ऐसा सरकार खुद मानती है। मंडी में किसानों को और भी कई तरह की दिक्कतें आती हैं, पर इसका इलाज़ कृषि मंडी नियमन को ख़त्म करने में नहीं है। इसका उपाय है मंडी कमेटी को किसानों के प्रति जवाबदेह बनाया जाए; उस में सभी हितधारकों के चुने हुए प्रतिनिधि हों, जैसा कि अब भी कानूनी प्रावधान है। अगर नियमन के बावज़ूद छोटे छोटे व्यापारियों और आढ़तियों से सरकार किसानों को नहीं बचा सकती, सरकारी खरीद का भी पैसा सीधे किसानों के खातों में नहीं पहुंचा सकती, तो अब जब बड़ी-बड़ी दैत्याकार वाली विशाल देशी-विदेशी कम्पनियां बिना किसी सरकारी नियंत्रण या नियमन के किसान का माल खरीदने लगेंगी तो फिर किसान को कौन बचाएगा?
जब संपन्न किसान अनाज मंडी से बाहर चला जाएगा, तो सरकारी स्कूलों की तरह अनाज मंडियां भी बंद होने लग जायेंगी, और फिर छोटे, आम किसान के लिए कोई राह नहीं बचेगी।
सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।
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चीन: टकराव टलना बड़ी बात : Navbharat Times Editorial


पिछले महीने की 15 तारीख को हुई हिंसक झड़प के बाद से ही भारत-चीन सीमा पर कायम तनाव में कमी आने के ठोस संकेत पहली बार मिले हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच रविवार को फोन पर हुई बातचीत के दौरान दोनों पक्षों में इस बात पर सहमति बनी कि सीमा पर सैनिकों को अलग करने और तनातनी कम करने की प्रक्रिया जल्दी पूरी करना दोनों देशों के हित में है।

इसके बाद यह खबर आई कि दोनों देशों के सैनिक अपने-अपने स्थान से कुछ पीछे हटने शुरू हुए हैं। हालांकि इस प्रक्रिया के ब्यौरे अभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किए गए हैं। सूत्रों के हवाले से मीडिया में आई खबरों में एकसूत्रता का अभाव है। कहा जा रहा है कि दोनों पक्षों में सीमा पर 3 किलोमीटर का बफर जोन बनाने पर सहमति हुई है। यानी दोनों देशों की सेनाएं डेढ़-डेढ़ किलोमीटर पीछे हटेंगी और बीच के तीन किलोमीटर खाली इलाके में कोई हरकत करने से पहले उन्हें दूसरे पक्ष को इसकी जानकारी देनी होगी।

खबरों में यह स्पष्ट नहीं है कि डेढ़ किलोमीटर पीछे हटना वे कहां से शुरू करेंगी- दोनों सेनाओं की मौजूदा स्थिति से, या ताजा विवाद शुरू होने के पहले अप्रैल में दोनों सेनाओं की जो स्थिति थी, वहां से? यह भी समझना बाकी है कि यह विश्वास बहाली के मकसद से उठाया जा रहा एक तात्कालिक कदम भर है, या इसे देर तक कायम रखने का इरादा है। एक महत्वपूर्ण सवाल भारतीय सीमा के अंदर चल रहे निर्माण कार्यों का भी है। बफर जोन बनाने के लिए भारतीय सेना अपनी मौजूदा स्थिति से डेढ़ किलोमीटर पीछे हटती है, तो क्या उसकी जद में ये प्रॉजेक्ट भी आएंगे? जाहिर है इस इलाके में सड़कों और पुलों का निर्माण भारत के दूरगामी राष्ट्रीय हितों से जुड़ा है और इनका किसी वजह से अटकना देश के लिए रणनीतिक नुकसान साबित होगा।

बहरहाल, भारत-चीन सीमा पर शांति की जरूरत से किसी भी स्थिति में इनकार नहीं किया जा सकता। यह अच्छी बात है कि दोनों पक्षों ने इस बात को स्वीकार करते हुए शांति की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू किए हैं। सीमा पर न्यूनतम समझ कायम करने के बाद बातचीत के जरिए आपसी विवाद सुलझाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है। हिंसक झड़प की घटना के बाद तनावपूर्ण माहौल के बीच भी भारत ने अलग-अलग तरीकों से यह बात स्पष्ट कर दी है कि अपनी एक-एक इंच जमीन को लेकर वह पूरी तरह सजग है। इसलिए चीन को या किसी को भी इस मामले में कोई गफलत नहीं पालनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट है कि चाहे कुछ भी हो जाए, पर भारत और चीन हमेशा एक-दूसरे के पड़ोसी ही रहेंगे। लड़ाई दोनों को विकास की दौड़ में बहुत पीछे धकेल देगी, जबकि आपसी दोस्ती के जरिये वे अब भी इक्कीसवीं सदी को एशिया की सदी बना सकते हैं।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स।
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पाठ्यक्रम में कटौती : Rashtriya Sahara Editorial


कोरोना के कारण सीबीएसई द्वारा कक्षा ९ से १२ तक के पाठ्यक्रम में कटौती स्वागतयोग्य कदम है। पाठ्यक्रम में ३० प्रतिशत की कमी करने का निर्णय लिया गया है। इसका मतलब यह होगा कि जो अध्याय पाठ्यक्रम से हटाए गए हैं‚ वे बोर्ड और आंतरिक परीक्षाओं का हिस्सा नहीं होंगे। हालांकि कक्षा एक से लेकर आठ तक के पाठ्यक्रम में सीबीएसई ने किसी कमी का ऐलान नहीं किया है‚ लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि इन कक्षाओं के छात्र–छात्राओं पर से भी पढÃाई का बोझ घटेगा। सीबीएसई का यह निर्णय आकस्मिक नहीं‚ बल्कि सुविचारित है। दरअसल‚ कोरोना के कारण उत्पन्न असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए सीबीएसई को कक्षा ९ से १२ तक के पाठ्यक्रम में कमी करने को कहा गया था। कोरोना के कारण देश भर में स्कूल बंद हैं। हालांकि कुछ स्कूलों की ओर से ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था की गई है‚ लेकिन अधिकतर छात्र इससे वंचित रहे। ऑनलाइन शिक्षा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्कूल और उसके छात्र–छात्राओं के पास इसके लिए आवश्यक सुविधा हैं‚ या नहीं। जाहिर है जो छात्र गरीब परिवार के होंगे‚ वे इस व्यवस्था से बाहर हो जाएंगे‚ क्योंकि नई तकनीक उनकी पहुंच के बाहर है। ऐसा न हो कि नई तकनीक संपन्न परिवार के बच्चों के लिए ही फायदेमंद रहे। लेकिन मौजूदा संकट के लिए सरकार और स्कूल प्रशासन को दोष देना उचित नहीं होगा‚ क्योंकि कोरोना के कारण इन्हें तैयारी करने तक का समय नहीं मिला जबकि इसके लिए पहले से कोई तैयारी नहीं थी‚ चाहे वह पाठ्यक्रम के स्तर पर हो या शिक्षकों के। ऐसी स्थिति में यह पूरी कवायद छात्रों को व्यस्त रखने तक सीमित हो गई है और शिक्षण अधिगम के मूल उद्श्देय से भटकती प्रतीत होती है। न केवल भारत‚ बल्कि संपूर्ण दुनिया में कोरोना ने शिक्षा व्यवस्था को अस्त–व्यस्त कर दिया है। अधिकतर देशों में स्कूल पूर्णतः या अंाशिक रूप से बंद कर दिए गए हैं। स्कूलों की बंदी से न केवल छात्र‚ शिक्षक और अभिभावक प्रभावित हुए हैं‚ बल्कि इसके दूरगामी सामाजिक–आर्थिक नतीजे भी रहे‚ खासकर वंचित समुदाय के बच्चों के लिए। बहरहाल‚ भारत सरकार का यह फैसला सराहनीय है‚ जिससे सभी विद्यार्थी लाभान्वित होंगे। कम से कम उन पर पढÃाई और परीक्षा का तनाव तो कम होगा ही। ॥

 सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।
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बेहतर भविष्य की आश्वस्ति : Rashtriya Sahara Editorial


अनेक गंभीर वैश्विक और स्थानीय चुनौतियों के बीच हमारे देश को एक बेहतर भविष्य की ओर कैसे बढÃना है‚ इसकी एक समग्र सोच बनाने के साथ यह भी जरूरी है कि हम अपने इतिहास और विरासत से इसके लिए प्रेरणा और जरूरी सबक प्राप्त करें। इतिहास को कई oष्टिकोणों से देखा जा सकता है और यदि एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए जरूरी सरोकारों की oष्टि से देखा जाए तो कुछ सवाल अधिक महkवपूर्ण होंगे। इतिहास के किस दौर में आपसी भाईचारे‚ सुलह–समझौते और परस्पर सहयोग का माहौल अधिक मजबूत हुआ और किन कारणों से हुआॽ किस दौर में मनुष्य ने केवल समृद्धि नहीं अपितु संतोष को भी समुचित महkव दियाॽ किस दौर में समता और न्याय के जीवन–मूल्य को अधिक महkव मिलाॽ किस दौर में >ंचे आदशाç से प्रेरित होकर लोग व्यापक जन–हित के मुद्दों के लिए अधिक आगे आएॽ किस दौर में लोग पेडÖपौधों‚ जीव–जंतुओं की रक्षा के प्रति अधिक संवेदनशील हुएॽ किस दौर में मनुष्य ने भावी पीढिÃयों का‚ भविष्य का अधिक ध्यान रखाॽ॥ ये बहुत महkवपूर्ण विषय हैं क्योंकि सबसे बडÃा सरोकार तो धरती पर दुख–दर्द कम करना ही है। जब समाज में करुणा‚ भाईचारे‚ सहयोग और न्याय के जीवन–मूल्य मजबूत होंगे तभी दुख–दर्द भी कम होगा। यदि हम इतिहास के अध्ययन से यह समझ सके कि समाज में किस दौर में ये जीवन–मूल्य बहुत मजबूत हुए और इस तरह का माहौल बनाने में किन कारणों‚ प्रेरकों और उत्प्रेरकों की मुख्य भूमिका रही तो यह इतिहास का सर्वाधिक मूल्यवान योगदान होगा। हम अपने इतिहास में झांक कर देखना चाहिए कि कब–कब इन मूल्यों के अनुरूप सशक्त आवाज हमारे देश में उठी‚ वे कौन–सी विशेष स्थितियां थीं जिनमें यह आवाज इतनी गहरी हो सकी कि उसने बहुत बडÃी संख्या में लोगों को प्रभावित किया॥। हमारे इतिहास में ऐसे चार समय तो निश्चित तौर पर नजर आते हैं। ऐसा पहला समय ईसा पूर्व छठी शताब्दी का था अथवा आज से लगभग २६०० वर्ष पहले का समय था। इस समय गंगा के मैदानों में या इसके आसपास अनेक सुधारवादी धार्मिक संप्रदायों का जन्म हुआ जिन्होंने प्रचलित कुरीतियों का विरोध करते हुए सादगी‚ अहिंसा‚ सहयोग और समता का संदेश दिया। इनमें से दो संप्रदायों का इतिहास पर स्थायी प्रभाव बौद्ध और जैन धर्म के रूप में हुआ। महावीर जैन ने अहिंसा के बहुत व्यापक रूप का प्रचार किया। अपरिग्रह के उनके सिद्धांत ने सादगी के जीवन को प्रतिपादित किया और आधिपत्य पर आधारित संबंधों का विरोध किया। महात्मा बुद्ध ने समता और अहिंसा पर जोर देने के साथ–साथ धर्म के रास्ते को कर्मकांडों से मुक्त करा उसे व्यावहारिक बनाया। मध्यम मार्ग का संदेश देते हुए उन्होंने कहा–जीवन रूपी वीणा को इतना मत कसो कि वह टूट जाए। उसे इतना ढीला भी मत छोडÃो कि उसमें से स्वर ही न निकले॥। दूसरा समय आज से लगभग २२५० वर्ष पहले का है जब कलिंग–युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने एक बहुत शक्तिशाली सेना होने के बावजूद आक्रमण और विजय की नीति को पूरी तरह छोडà दिया और इसके स्थान पर धर्म विजय को अपनाया। कुछ हद तक मिस्र के अखनातोन को छोडÃकर प्राचीन विश्व के इतिहास मेंे ऐसा कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता है। उनने अपने जीवन को जन कल्याण और पशु पक्षियों के कल्याण में लगा दिया। उनने बौद्ध धर्म का प्रचार दूर–दूर तक किया पर साथ ही अन्य धमाç के प्रति पूरी सहनशीलता दिखाई। अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए ही अशोक ने देश में अद्भुत राजनीतिक एकता स्थापित की॥। भारतीय इतिहास में ऐसा तीसरा ऐतिहासिक दौर तेरहवीं से सोलहवीं शताब्दी के भक्ति और सूफी आंदोलन का है‚ जिसे हम आध्यात्मिकता की गहराइयों में उतर कर जीवन की एक सार्थक समझ बनाने की oष्टि से देख सकते हैं। दक्षिण भारत में यह भक्ति लहर इस समय से पहले ही देखी गई। प्रचलित सामाजिक कुरीतियों और इनके पोषक निहित स्वाथाç के विरुद्ध बहादुरी और दिलेरी से किए गए विद्रोह की oष्टि से देखें या दो समुदायों द्वारा एक दूसरे को समझने और भाईचारे से रहने की oष्टि से देखें‚ हर oष्टि से यह बहुत प्रेरणादायक समय था॥। हमारे इतिहास का ऐसा चौथा प्रेरणादायक दौर निश्चय ही ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आजादी की लडÃाई का दौर था जिसके साथ समाज–सुधार के अनेक आंदोलन भी अनिवार्य तौर पर जुडÃे हुए थे। एक पवित्र और बेहद जरूरी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कितनी कुर्बानी दी जा सकती हैं‚ कितना कष्ट सहा जा सकता है‚ कितनी असंभव लगने वाली चुनौती भी स्वीकार की जा सकती हैं‚ कितना अथक प्रयास किया जा सकता है–इसकी बहुत ही हिम्मत बंधाने वाली अनेक मिसालें इस दौर में कायम हुइÈ। साथ ही‚ यह सामाजिक बदलाव के अनेक महkवपूर्ण प्रयोगों का समय था जिन्हें वांछित सफलता मिली हो या न मिली हो‚ लेकिन उनसे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। ॥ इन सभी महkवपूर्ण दौरों से पहले समस्याएं बहुत बढà गई थीं। समस्याएं बहुत बढà जाने पर ये विभिन्न दौर उम्मीद लेकर आए। बौद्ध धर्म और जैन धर्म के उदय से पहले हिंसा‚ विषमता और कर्मकांड़ों से समाज बुरी तरह ग्रस्त था। अशोक द्वारा शांति का मार्ग अपनाने से पहले भीषण हिंसा के कलिंग युद्ध में बहुत बडÃी संख्या में लोग मारे गए थे और बर्बाद हुए थे। भक्ति और सूफी आंदोलन की जरूरत को जिस समाज ने पहचाना वह तरह–तरह के भेदभाव‚ निरर्थक हिंसा और अंधविश्वास से उत्पन्न कष्ट भुगत रहा था। आजादी की लडÃाई में कुछ सबसे साहसी और नई समझ बनाने वाले कार्य तब हुए जब शोषण और जुल्म से समाज बुरी तरह त्रस्त हो चुका था। अतः स्पष्ट है कि मौजूदा समाज की अधिक समस्याओं से विचलित नहीं होना है। वर्तमान कमजोरियों के बावजूद ऐसी प्रेरणादायक शुरुûआत हो सकती है‚ जो हमारी समस्याओं के वास्तविक और स्थायी हल खोजने या समाधान निकालने के साथ–साथ भटकी हुई दुनिया में एक वैकल्पिक रास्ते की उम्मीद भी जगाए॥।

 सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।
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