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Saturday, January 23, 2021

Netaji Subhash Chandra Bose 125th Jayanti : हर भारतीय के हृदय में बसने वाले एक कालजयी नेता, पढ़ें सुभाषचंद्र बोस की जयंती पर गृहमंत्री अमित शाह का लेख (प्रभात खबर)

By अमित शाह, केंद्रीय गृह मंत्री 

 

Netaji Subhash Chandra Bose 125th Jayanti : आज सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जन्म जयंती के अवसर पर मैं उस वीर को प्रणाम करता हूं, जिन्होंने देशहित में अपने जीवन का सर्वस्व अर्पित करके, रक्त के कतरे-कतरे से इस देश को सिंचित किया है. मैं प्रणाम करता हूं, बंगजननी के उस गौरवशाली संतान को, जिसने समस्त भारत को अपना नेतृत्व दिया है, देश को स्वाधीन कराने के लिए उन्होंने पूरी दुनिया का भ्रमण किया. जिनका जीवन कोलकाता में शुरू हुआ व कालांतर में वह भारतीय राजनीति के शिखर पर पहुंचे व उसके बाद बर्लिन से शुरू करके सिंगापुर तक भारत माता के संतानों को लेकर उन्होंने देशहित में वृहद अभियान चलाया. उनका जीवन दर्शन भारत के युवा समाज के लिए आदर्श है, उनके जीवन युवा समाज के तन-मन को राष्ट्रवादी भावना से भर देता है.


उस समय भारत मे सर्वाधिक जरूरत थी एक सटीक योजना लेकर देश को आगे ले जाने की, इस विचार के आधुनिक भारत के सर्वप्रथम प्रस्तावक थे सुभाषचंद्र. 1938 के फरवरी महीने में हरिपुर कांग्रेस में उन्होंने राष्ट्रीय योजना का मुद्दा उठाया था. दिसंबर 1936 में, पहली राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया गया था. उसी वर्ष सुभाष ने वैज्ञानिक मेघनाद साहा को एक साक्षात्कार में कहा : मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यदि हमारी राष्ट्रीय सरकार बनती है, तो हमारा पहला काम राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन करना होगा. स्वातंत्र्योत्तर योजना आयोग उनकी विरासत है.


यह विचार सुभाषचंद्र के दिमाग में अपने छात्र जीवन में आया. 1921 में उन्होंने देशबंधु चित्तरंजन दास को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह सरकारी नौकरी नहीं चाहते हैं, अपितु राजनीति में शामिल होकर अपना योगदान करना चाहते हैं. इसके साथ ही उन्होंने संक्षिप्त, लेकिन स्पष्ट रूप से लिखा कि वह कांग्रेस के कार्यों में योजनाबद्ध कदम देखना चाहते हैं. आज के युवाओं के लिए राष्ट्र निर्माण के कार्य में सुभाषचंद्र के ये विचार आज भी प्रासंगिक हैं.


आजकल बहिरागत बोलने की बात शुरू हुई है. बहिरागत का मतलब अब तक लोग किसी दूर देश के व्यक्ति अथवा किसी घुसपैठिया को समझते थे. लेकिन देश के भिन्न अंश के लोगों को बहिरागत अथवा बाहरी बोलने की संकीर्ण क्षेत्रवाद सुभाषचंद्र के राज्य में शुरू करना दुर्भाग्यपूर्ण है. जिस राज्य ने भारत के लोगों में राष्ट्रवाद के विचार को पुनर्जीवित किया है, उसे 'वंदे मातरम' और जन-गण-मन राष्ट्र गान दिया, उस राज्य में ऐसी सोच बहुत दुखद व खतरनाक है. इस राज्य के लोगों के मुकुट में गहना, सुभाषचंद्र को तत्कालीन राष्ट्र की सबसे बड़ी संगठन इंडियन नेशनल कांग्रेस द्वारा अपना अध्यक्ष चुना गया था. लेकिन सुभाषचंद्र उनसे एक कदम आगे थे और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से परिचित थे.


 

दुनिया के विभिन्न देशों के मुक्ति संघर्षों के इतिहास का अध्ययन करते हुए, उन्होंने सोचा कि देश की स्वतंत्रता के हित में विदेशी गठबंधन की आवश्यकता हो सकती है. 1932 में नेताजी को इलाज के लिए वियना जाना पड़ा. वहां उनकी मुलाकात एक अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विठ्ठल भाई पटेल से हुई. भारत के ये दो देशभक्त नेता विदेश में भी राष्ट्र को स्वाधीन करने की चर्चा में व्यस्त रहे. वहां चर्चाओं में, उन्होंने महसूस किया कि देश की स्वतंत्रता के लिए विदेशी सहायता की आवश्यकता थी. उस समय बहुत कम भारतीय नेताओं ने इस तरह की अंतर्राष्ट्रीय सोच व्यक्त की थी. इसी अंतर्राष्ट्रीय सोच ने नेताजी सुभाष चंद्र को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक सशक्त कदम उठाने और सशस्त्र बलों के साथ देश को स्वतंत्र करने के लिए आगे बढ़ने की ताकत दी. नेताजी युवा समाज के एक वीर सैनिक थे. मन आज भी यह सोचकर प्रसन्न होता है कि एक उच्च शिक्षित सज्जन, ब्रिटिश सरकार की गिरफ्त से बचकर, ब्रिटिश पुलिस की नजरों से बचकर और पूरे भारत को पार करके अलग-अलग नामों से अफगानिस्तान पहुंचे और वहां से मध्य-पूर्व होते हुए यूरोप पहुंच गये.


भारत के युवाओं के मन में यह साहस, देशभक्ति हमेशा प्रज्ज्वलित रही है. केवल यह ही नहीं, कुछ साल बाद, जब उन्हें अहसास हुआ कि जर्मनी में बैठकर काम नहीं होगा, तो उन्होंने भारत के समीप दक्षिण-पूर्व एशिया जाना तय किया और इस क्रम में नेताजी ने एक और साहसिक अभियान चुना. तब द्वितीय विश्वयुद्ध का सबसे खूनी अध्याय चल रहा था. तत्कालीन भारत के विशिष्ट नेता सुभाषचंद्र तीन महीने से लगातार पनडुब्बी में जर्मनी से सिंगापुर जा रहे थे. इस खतरनाक यात्रा का विवरण आज भी रोम-रोम पुलकित कर देता है. आज भी, मुझे यह सोचकर गर्व होता है कि भारत की स्वतंत्रता की घोषणा से बहुत पहले, नेताजी अंडमान द्वीप समूह में स्वतंत्रता का राष्ट्रीय ध्वज फहरा रहे थे.


भारत की पूर्वी सीमा पर इंफाल में स्वतंत्रता का झंडा फहराया गया था. आजाद हिंद फौज की 75वीं वर्षगांठ पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था और भारत सरकार ने तय किया है कि अब से इस नायक को श्रद्धांजलि देने के लिए, सुभाषचंद्र का जन्मदिन 23 जनवरी को 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाया जायेगा. परंतु कांग्रेस और वामपंथी इस नायक के सम्मान पर ठेस पहुंचा रहे हैं. यह वे लोग हैं, जिन्होंने न नेताजी को तब सम्मान दिया और न ही आज देने के पक्षधर हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी, सुभाष बाबू के सपनों और विचारोंवाला एक सशक्त व आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए संकल्पित हैं.


आज, सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जयंती की उपलक्ष्य में, हम भारत मां के इस सुपुत्र के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धा व्यक्त करते हैं. बंगाल व समस्त भारत के लोग इस वीर सेनानी को सदैव याद रखेंगे. भारत के युवा आजाद हिंद फौज की वीरता से प्रेरित होंगे. नेताजी देश विरोधी ताकतों को खत्म करने के हमारे संघर्ष में सबसे आगे रहेंगे.


मैं अपनी श्रद्धा वाणी को कविगुरु के शब्दों में समाप्त करूंगा : 'सुभाषचंद्र,.... मैंने आपको राष्ट्र की साधना की शुरुआत से ही देखा है. आपने जो विचार प्रकाशित किये हैं, उसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है. आपकी शक्ति की कठिन परीक्षा, जेल, निर्वासन, अपार दुःख व गंभीर बीमारियों के मध्य हुई है, किसी भी कठिनाई ने आपको अपने पथ से नहीं हिलाया, अपितु आपके चिंतन को और विस्तृत किया है, आपकी दृष्टि को देश की सीमाओं से परे इतिहास के विस्तृत क्षेत्र तक ले जाने का काम किया है.


आपने विपत्तियों को भी अवसर में बदला है. आपने बाधाओं को एक स्वाभाविक क्रम बना दिया. यह सब संभव हुआ है, क्योंकि आपने किसी भी हार को अपनी नियति नहीं मानी. आपकी इस चारित्रिक शक्ति को बंगाल के हृदय में संचारित करने की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है. आपके विचारों की शक्ति से ही हम प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में बंगाल को पुनः सोनार बंगला बनाने के लिए संकल्पित हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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कोविड-19: आगे और कड़े कदम उठाने होंगे बाइडन को (पत्रिका)

लीना एस. वेन, विजिटिंग प्रोफेसर, मिल्केन इंस्टीट्यूट स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी

अमरीका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने कोविड-19 को लेकर जो रणनीति बनाई है, उसकी हर हाल में तारीफ की ही जानी चाहिए। उनकी रणनीति से पता चलता है कि वह देश को किस दिशा में ले जाना चाहेंगे। पदभार ग्रहण करने के चौबीस घंटे से भी कम समय में उन्होंने कोविड-19 से निपटने के लिए राष्ट्रीय रणनीति का मसौदा जारी कर दिया। महामारी से निपटने के लिए उन्होंने संघीय सरकार के नेतृत्व वाली भूमिका को दृढ़ता के साथ स्थापित किया है। पूर्व के ट्रंप प्रशासन ने इस महामारी से निपटने को लेकर अस्वीकार करने का, कमतर आंकने का और शर्तों से ओतप्रोत जो रुख अपनाया था, उसके यह ठीक विपरीत है। बाइडन की रणनीति व्यापक, विस्तृत है। मैं उनके मजबूत इरादों की कद्र करती हूं, लेकिन यह समय और भी आक्रामकता से काम करने का है।

आइए, बाइडन द्वारा उठाए गए पहले कदम से ही शुरुआत करते हैं। उन्होंने संघीय कार्यालयों में मास्क लगाने वाला पहला आदेश जारी किया है। उन्होंने अंतरराज्यीय यात्राओं के लिए भी मास्क जरूरी किया है। यह आदेश अमरीकियों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि नया प्रशासन जनस्वास्थ्य के निर्देशों का पालन करने के लिए तत्पर है। जबकि यह साफ है कि मास्क लगाना जीवन का कवच है, तो फिर बाइडन ने क्यों नहीं पूरे देश के लिए ऐसा आदेश जारी किया। कुछ लोगों का कहना है कि संघीय भवनों और अंतरराज्यीय व्यापार से परे किसी आदेश को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। पूरे राष्ट्र के लिए आदेश जारी करने का स्पष्ट संकेत होगा कि देश संकट में है। इस अधिकार का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि बाइडन मास्क की पूर्ति के लिए राजकीय कोष से जुड़े कई अधिकारों का इस्तेमाल करेंगे। इससे राज्यों के गवर्नर भी फैसला लेने को मजबूर होंगे।

कुछ और कदम भी उठाने चाहिए: बाइडन को चाहिए कि वे इनडोर सामाजिक कार्यक्रमों को नजरअंदाज करने के लिए अमरीकियों को प्रेरित करें और कड़ा आदेश जारी करें। अन्य देशों ने भी व्यापारिक बैठकों और घर से बाहर जाने पर रोक लगाई है, लॉकडाउन किया है। ब्रिटेन ने तो कम्युनिटी सदस्यों के एक-दूसरे से मिलने पर अर्थदंड लगाया है जो ट्रैफिक टिकट की तरह का है। महामारी के मोर्चे पर केवल एक ही रास्ता है - बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन। दस करोड़ लोगों का सौ दिनों में वैक्सीनेशन करने का मकसद अच्छा है, लेकिन यह काफी कम है। अऩुमान लगाइए - यदि दस लाख लोगों को प्रति व्यक्ति दो डोज की दर से टीके लगाए जाते हैं तो इसमें वर्ष 2022 तक का समय लग जाएगा।

बाइडन की टीम ने तेज गति और समानता वाली महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। हमें एक दिन में कम से कम पच्चीस लाख टीकाकरण करने की जरूरत है। पिछले हफ्ते तत्कालीन स्वास्थ्य सेवा सचिव एलेक्स अजार ने स्वीकार किया था कि वैक्सीन का कोई रिजर्व नहीं है। हो सकता है कि बाइडन की टीम को आपूर्ति की समस्याएं आएं। ऐसी हालत में उन्हें अमरीकियों को सब कुछ बता देना चाहिए। बाइडन को हमारे समय की सबसे बड़ी समस्या विरासत में मिली है। उनके पूर्ववर्ती की उपेक्षा से हालात और बदतर हुए हैं। बाइडन ने लोगों की अपेक्षाएं जागृत की हैं। इस समय बाइडन को और मजबूत होना चाहिए। यही आका ंक्षाएं ही सूर्य की नई किरणें हैं।

द वॉशिंग्टन पोस्ट

सौजन्य - पत्रिका।
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ट्विटर को क्यों रोक लगानी चाहिए ईरान के सर्वोच्च नेता के अकाउंट पर ? (पत्रिका)

मसीह अलीनेजाद (ईरानी पत्रकार, वॉइस ऑफ अमेरिका की पर्शियन सेवा के लिए टॉक शो 'टैब्लिट' का संचालन करती हैं।)

यूएस कैपिटल पर 6 जनवरी को हमले के चलते ट्विटर और फेसबुक ने पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के अकाउंट अपने-अपने प्लेटफॉर्म पर निलंबित कर दिए - शुरुआत में अस्थायी तौर पर। बाद में फेसबुक ने कहा कि इसका प्रतिबंध अनिश्चितकाल के लिए जारी रहेगा, जबकि ट्विटर ने प्रतिबंध को स्थायी करार दे दिया। अपने कदम के लिए ट्विटर ने वजह बताई - 'और हिंसा भड़कने का खतरा।' कितने ही ईरानी मानवाधिकार कार्यकर्ता अक्सर इस बात पर आश्चर्यचकित होते हैं कि इस्लामिक गणराज्य के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामनेई और अन्य सरकारी अधिकारियों ने 8 करोड़ 30 लाख ईरानी लोगों को ट्विटर पर प्रतिबंधित किया, जबकि वे खुद अपने झूठ का प्रचार करने के लिए लगातार सोशल प्लेटफॉर्म का पूरा इस्तेमाल करते आ रहे हैं - और वह भी बिना किसी चेतावनी के।

इस बात से तो यही कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया के मंच का रुख तानाशाहों के पक्ष में झुका हुआ रहता है। बीते अक्टूबर माह के दौरान सीनेट के सामने पेश हुए ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी ने कहा था कि खामनेई के यहूदी-विरोधी ट्वीट और इजरायल का नामोनिशान मिटाने के नारों से कंपनी के नियमों का उल्लंघन इसलिए नहीं होता क्योंकि ये 'कोरी धमकियां मात्र' हैं। डोर्सी ने दावा किया क्योंकि खामनेई के जुबानी हमले अपने नागरिकों के खिलाफ नहीं हैं, इसलिए वे स्वीकार्य हैं। यह कोरा झूठ है और इसमें दूरदर्शिता का अभाव है। नवंबर 2019 के विरोध प्रदर्शन इसका उदाहरण हैं, जब शासन ने कम से कम एक सप्ताह के लिए इंटरनेट बंद कर दिया था। इंटरनेट बहाल होने पर सामने आए वीडियो दिल दहला देने वाले थे।

अमरीकी नागरिकों को जिस तरह की लोकतांत्रिक संस्थाएं सुलभ हैं, ईरानी नागरिकों के लिए उनका अभाव है और उनके लिए सोशल मीडिया का मंच ही अपनी बात कहने का उपकरण है। अब समय आ गया है कि सोशल मीडिया कंपनियां तानाशाहों को नफरत फैलाने के लिए इन प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग करने से रोकें।

- द वॉशिंग्टन पोस्ट

सौजन्य - पत्रिका।
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चीन के मंसूबे (जनसत्ता)

गलवान घाटी विवाद की आंच अभी ठंडी भी नहीं पड़ी कि चीन ने अब अरुणाचल प्रदेश में मोर्चा खोल दिया है। अपना पुराना रवैया दोहराते हुए चीन ने कहा है कि तिब्बत के दक्षिणी हिस्से- जंगनान क्षेत्र जो कि भारत का अरुणाचल प्रदेश है, को लेकर उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है और वह अरुणाचल प्रदेश को कोई मान्यता नहीं देता। हाल में यह विवाद तब उठा जब अरुणाचल प्रदेश के सुबनसिरी जिले में सरी चू नदी के पास एक छोटा गांव बसा देने की चीनी साजिश का खुलासा हुआ। पिछले एक साल में चीन ने जिस गुपचुप तरीके से इस गांव को बसा लिया, वह उसकी पड़ोसी देशों की जमीन हड़पने की नीति का प्रमाण है।

हकीकत यह है कि सुबनसिरी जिले का यह इलाका वास्तविक नियंत्रण रेखा से सटा है और भारत के हिस्से में पड़ता है। लेकिन चीन ने इस पर कब्जा कर रखा है और इसे विवादित क्षेत्र बना रखा है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर इलाका विवादित है भी, तो फिर वह क्यों यहां अवैध निर्माण कर अशांति पैदा कर रहा है। यह इलाका सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से बहुत ही संवेदनशील है और यहां किसी भी तरह की चीनी गतिविधि उकसावे वाली कार्रवाई से कम नहीं है। जाहिर है, चीन भारत को घेरने के लिए नए रास्ते तलाश रहा है।

पिछले कुछ सालों में चीन ने अरुणाचल प्रदेश के सीमाई इलाकों में जिस तेजी से अपना जाल बिछाना शुरू किया है, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भविष्य में चीन इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज करेगा। इसी क्रम में तिब्बत की राजधानी ल्हासा से न्यांगची तक रेल लाइन बिछाने की परियोजना पर तेजी से किया है और यह रेल लाइन अरुणाचल प्रदेश के पास से गुजरती है। न्यांगची से लेकर ल्हासा तक चार सौ नौ किलोमीटर की सड़क वह पहले ही बना चुका है।

चीन का सारा जोर भारत से लगी साढ़े चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा पर जगह-जगह ऐसे निर्माण करना है जिससे सीमाई इलाकों में उसकी पहुंच आसान हो सके। इसीलिए अरुणाचल से लेकर डोकलाम और गलवान तक वह भारतीय सीमा क्षेत्र में पड़ने वाले इलाकों पर कब्जा करता जा रहा है और इन इलाकों को विवादित बना रहा है ताकि भारत इन इलाकों में अपनी पहुंच न बना सके।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद कोई नया तो है नहीं। चीन चाहता भी नहीं है कि सीमा विवाद कभी सुलझे। अगर एक बार सीमा विवाद सुलझ गया तो उसके विस्तारवादी मंसूबे पूरे कैसे होंगे! चीन का भारत के साथ ही नहीं, अपने सभी पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद है और हर देश के भू-भाग को उसने इसी तरह विवादित बना कर कब्जा रखा है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत का रुख शुरू से ही स्पष्ट रहा है कि यह भारत का अभिन्न हिस्सा है।

भारत के रक्षा मंत्रियों के अरुणाचल प्रदेश के सीमाई इलाकों के दौरों पर चीन आपत्ति करता रहा है। हालांकि अरुणाचल प्रदेश में उसकी गतिविधियों पर भारत पर नजर है। सामरिक महत्त्व और चीनी गतिविधियों को देखते हुए भारत ने भी अरुणाचल प्रदेश से सटे सीमाई इलाकों में सड़कों का जाल बिछाने और पुलों के निर्माण के निर्माण का काम जोरों पर है। लेकिन भारत को लेकर चीन जिस तरह की विरोधाभासी और संदेहास्पद कूटनीति अपनाए हुए है, उससे तो लग रहा है कि वह गलवान विवाद को हल करने की दिशा में बढ़ने की बजाय भारत को और बड़े जाल में फंसाने की साजिश रच रहा है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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लोन एप्स हैं डिजिटल मगरमच्छ, गोरखधंधे में चीनी गिरोह का हाथ (अमर उजाला)

विराग गुप्ता  

ट्रंप और चीन के कारनामों से यह साफ है कि जंग और राजनीति में सब कुछ जायज होता है। रुखसत होने से कुछ ही दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कोरोना के वैश्विक विस्तार के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराते हुए, संयुक्त राष्ट्र यानी यूएन से सख्त कार्रवाई की मांग की थी। ट्रंप के दावों की पुष्टि होना मुश्किल है, लेकिन यह बात निश्चित है कि कोरोना से उपजी


त्रासदी में चीनी गिद्ध सबसे बड़ा सुपर पावर बनने के लिए बेताब है। महामारी से भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई, जिसका असंगठित क्षेत्र और गरीबों को सबसे ज्यादा खामियाजा उठाना पड़ा। कोरोना काल में रोजगार और व्यापार खोने वाले आपदाग्रस्त लोगों की मदद के नाम पर, हजारों डिजिटल एप ने लाखों लोगों का सुख-चैन छीन लिया है। तेलंगाना पुलिस की शुरुआती जांच के अनुसार, लोन एप के गोरखधंधे में चीनियों का भी गिरोह काम कर रहा है।



लॉकडाउन के अंधेरे में पनपे इस कारोबार को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला डिजिटल लोन एप्स। देश में 100 करोड़ से ज्यादा मोबाइल हैं, जिनमें लोग फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे एप्स चलाते हैं। गूगल और एपल के प्लेटफॉर्म पर इस समय लगभग 47 लाख एप्स से हर तरह के कारोबार हो रहे हैं। एप्स और वेबसाइट आदि के लिए वर्ष 2000 में आईटी कानून बनने के बावजूद भारत में इनके रजिस्ट्रेशन, नियमन और टैक्सेशन के लिए अभी तक कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं बनी। देश में गरीबों की मदद के लिए हजारों योजनाएं चल रही हैं, लेकिन जरूरतमंदों को समय पर लोन देने के लिए शायद ही कोई बैंक आगे आता है, इसलिए बगैर कागज-पत्तर के झटपट लोन देने वाले इन एप्स का कारोबार खूब चल निकला। लोन एप्स ने ग्रामीण क्षेत्रों में कारोबार और वसूली के लिए पुणे, बंगलूरू, नोएडा, हैदराबाद और चेन्नई जैसे आईटी हब्स में अपने कॉल सेंटर खोल रखे हैं।


पूरे देश में चल रहे इस कारोबार का खुलासा तेलंगाना पुलिस ने किया। सिर्फ एक राज्य की पुलिस की जांच में लगभग 1.4 करोड़ लेन-देनों से 21 हजार करोड़ के कारोबार का खुलासा हो चुका है। लोन घोटाले की भारी रकम चीन और दूसरे देशों में ट्रांसफर होने के सबूत आने पर केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी आपराधिक मामला दर्ज कर लिया। इस घोटाले का दूसरा पक्ष वे पीड़ित और गरीब लोग हैं, जो इन लोन एप्स के शिकंजे में फंस कर बर्बाद हो गए। भारत में लगभग 80 करोड़ लोगों को कोरोना काल में सरकारी भोजन और अनाज की मदद मिली। उनमें से करोड़ों जरूरतमंदों ने बीमारी, पढ़ाई, शादी आदि के लिए नए जमाने के इन डिजिटल साहूकारों से भारी ब्याज दर पर छोटे-छोटे लोन ले लिए। बगैर वैध समझौते के हुए लोन के एवज में लाचार लोगों ने अपने मोबाइल डाटा और आधार आदि का विवरण इन सूदखोर कंपनियों के हवाले गिरवी रख दिया।


लोन के मूलधन के भुगतान के बावजूद भारी ब्याज को वापस करने में जब लोग फेल हो गए, तो इन कंपनियों ने ब्लैकमैलिंग के हथकंडे से कर्जदारों को पीड़ित करना शुरू कर दिया। लोन की रकम न चुका पाने के कारण ये एप लोन लेने वाले शख्स को धमकाने के साथ उसके रिश्तेदारों और जानकारों को फोन करके बदनाम करने लगे। फोटो के साथ छेड़खानी करके व्हाट्सएप में दुष्प्रचार, धमकी वाले कॉल और फर्जी कानूनी नोटिस भी कर्जदारों और उनके परिचितों को भेजी गईं। इन कंपनियों से लोन लेने वाले लोग कमजोर और गरीब वर्गों से आते हैं, जो इन डिजिटल प्लेटफॉर्म के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने से घबराते हैं। इसके अलावा छोटे कस्बों और शहरों में पुलिस का साइबर सेल भी नहीं होता। कुछ हजार लोन लेने वाले पीड़ित लोग राहत के लिए थकाऊ और महंगी अदालती व्यवस्था के पास भी नहीं जा पाए और कई ने प्रताड़ना से ऊब कर अपनी जान दे दी।


मनी लेंडिंग कानून के तहत राज्यों में लोन का कारोबार करने के लिए अलग-अलग नियम हैं, लेकिन रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार, बैंक और एनबीएफसी कंपनियां ही लोन का कारोबार कर सकती हैं। लोन एप्स का मर्ज जब पूरे देश में बढ़ गया, तो फिनटेक कंपनियों और ऑनलाइन लोन के कारोबार को नियमबद्ध करने के लिए रिजर्व बैंक ने एक समिति बना दी। लेकिन रिजर्व बैंक ने पिछले साल 24 जून, 2020 को जो आदेश जारी किया था, उस पर ही यदि ढंग से अमल किया जाए, तो लोन एप्स के डिजिटल गिरोह की कमर तोड़ी जा सकती है। रिजर्व बैंक के आदेश से साफ है कि डाटा के दुरुपयोग और कर्ज वसूली के लिए लोन एप्स द्वारा की जा रही डिजिटल पहलवानी गैर-कानूनी है। इस आदेश से यह भी स्पष्ट है कि बैंकों और एनबीएफसी कंपनियों की वेबसाइट में सभी डिजिटल लोन एप्स का पूरा विवरण हो, जिससे किसी भी गलत काम के लिए उन्हें भी जवाबदेह बनाया जा सके। रिजर्व बैंक के अनुसार, कर्ज देते समय ग्राहकों को लिखित स्वीकृति पत्र देना जरूरी है, जिसमें कानूनी सीमा के भीतर ब्याज दरों के विवरण के साथ बैंक और एनबीएफसी कंपनी का पूरा खुलासा जरूरी है। 


भारत में एप्स के माध्यम से लोन देने वाले ऑपरेटर्स अधिकांशतः गैरकानूनी तरीके से कारोबार कर रहे हैं और लोन वसूली के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हथकंडे तो पूरी तरह से आपराधिक हैं। इस मसले पर देशव्यापी गुस्सा बढ़ने के बाद गूगल ने अपने प्लेटफार्म से कुछ लोन एप्स को हटा दिया। लेकिन डिजिटल एप्स तो रक्त बीज की तरह व्यापक हैं, जो लोगों को ठगने के लिए मारीच की तरह रूप भी बदल लेते हैं। गूगल और एपल के प्ले स्टोर से बिक रहे इन एप्स की डेवलपर पॉलिसी में बैंक और एनबीएफसी कंपनियों का पूरा खुलासा नहीं होने से पूरी गफलत हो रही है।


गूगल और एपल प्ले स्टोर के माध्यम से भारत में कारोबार कर रहे हर लोन एप में रिजर्व बैंक की अनुमति प्राप्त बैंक और कंपनियों का पूरा विवरण आ जाए, तो ठगी करने वाले एप्स बेनकाब हो जाएंगे। इसलिए रिजर्व बैंक के नियमों को लागू करने के लिए गूगल और एपल जैसी बड़ी कंपनियों पर सरकार को दबाव बनाना होगा, तभी लोन एप्स के मगरमच्छों से आम जनता को मुक्ति मिलेगी।

सौजन्य - अमर उजाला।

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परीकथा-सी है नेताजी की कहानी, लगती रही हैं इस तरह की अटकलें (अमर उजाला)

शिशिर कुमार बोस 

(नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आज 125वां जन्मदिन है। उनके रहस्यमय ढंग से गायब होने के बारे में कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। उनके भतीजे शिशिर कुमार बोस ने अपनी पुस्तक 'सुभाष ऐंड शरत' में उन्हें याद किया है। पेश है, उसी पुस्तक के अंश- )

 

विस्तार

सुभाष चाचा के लापता होने की खबर उसी तरह फैलाई गई, जैसी हमने योजना बनाई थी। हमारी तरकीब प्रभावकारी थी और सरकार व पुलिस पूरी तरह भ्रम में थी। हमने सुना कि अधिकारियों ने 19 जनवरी (1941) को कलकत्ता से रवाना हुए एक जापानी जहाज का पता लगाया और उसकी तलाशी लेने के लिए उसे एक चीनी बंदरगाह की तरफ मोड़ दिया है! हालांकि, हमने यह भी सुना कि दिल्ली में केंद्रीय खुफिया ब्यूरो के आकाओं ने उन अफवाहों पर विश्वास नहीं किया, कि सुभाष चाचा ने  सांसारिक जीवन को त्याग दिया था और कहीं संन्यासी बन गए थे। सुभाष बोस का पता लगाने और उन्हें पकड़ने के लिए सभी सीमाओं और बंदरगाहों पर एक एहतियात संदेश भेजा गया। लेकिन जब तक पुलिस को लापता होने के बारे में पता चला, तब तक चाचा भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा पार कर काबुल जाने वाले आदिवासी इलाकों में घुस चुके थे।



कुछ समय बाद, आनंदबाजार पत्रिका के सुरेश मजूमदार ने पिता को एक जानकारी के बारे में बताया, जो उन्होंने दिल्ली के किसी स्रोत से सुनी थी। जाहिर है, कुछ दिनों बाद अखबारों में एक सनसनीखेज खुलासा हुआ कि ईस्ट इंडियन रेलवे के एक टिकट चेकर ने सुभाष चंद्र बोस की तरह दिखने वाले किसी व्यक्ति को देखा था। पुलिस ने उससे पूछताछ की। और श्री मजूमदार की जानकारी के अनुसार, उस व्यक्ति ने यात्री की पोशाक और भेष का जो विवरण दिया था, वह चाचा के मोहम्मद जियाउद्दीन के रूप वाले छद्म भेष से मिलता-जुलता था। एक शाम पिताजी ने मुझे बुलाकर मजूमदार के संदेश के बारे में कहा कि विवरण वास्तविकता के इतने करीब है कि लगता है, टिकट चेकर ने शायद सुभाष चाचा को देखा था। मैं उनकी बात से सहमत था और मुझे चिंता हुई।



इस बीच घर और बाहर, सुभाष चाचा के गायब होने के बारे में अटकलों की कोई सीमा नहीं थी। परिवार के कई सदस्य चुप थे, खासकर वे लोग, जो मानते थे कि चाचा का कोई राजनीतिक उद्देश्य था। मैं अपनी दादी का दिमाग कभी पढ़ नहीं पाया। मुझे लगता है कि वह गंभीर रूप से चिंतित थीं, लेकिन बाह्य तौर पर वह शांत थीं। हमारे डॉक्टर चाचा सुनील व्यावहारिक ढंग से सोचते थे। उन्हें डर था कि राजनीतिक रूप से पूरी तरह से अलग-थलग रहने के बाद, सुभाष ने हताशा से बाहर आने के लिए कुछ किया होगा। वह भारत में खुद को कैसे छिपाते? यहां तक कि छोटा बच्चा भी उन्हें जानता था। वहीं कुछ लोगों ने उनके संन्यास लेने की बात मान ली।


मेरी नानी धार्मिक महिला थीं। उन्होंने हमें बड़े यकीन के साथ बताया कि सुभाष एक दिन साधु के भेष में लौटेगा। यह सच है कि किशोर उम्र में सुभाष चाचा एक बार आध्यात्मिक गुरु की तलाश में घर से भाग गए थे। आजादी के दशकों बाद अनेक तरह की अफवाहें फैलीं कि सुभाष चाचा को साधुओं के भेष में देखा गया। हमारे पारिवारिक मित्र नृपेंद्र चंद्र मित्र ने सुना कि एक शाम दो सिख व्यक्ति सुभाष चाचा से मिलने आए और बाद में तीन पगड़ीधारी व्यक्ति एल्गिन रोड के घर से बाहर गए। मेरे चचेरे भाई गणेश ने एक बहुत रंगीन कहानी सुनाई, जो उसने सुनी थी। एक दिन देर रात एक लंबा, खूबसूरत आदमी गंगा के तट पर आया और नाविक से नदी के बीच में ले जाने के लिए कहा। उसने नाविक को काफी पैसे देने की बात कही, तो नाविक तैयार हो गया। जैसे ही नाव गहरे पानी में पहुंची, एक तेज आवाज सुनाई दी और एक पनडुब्बी सामने आई। उस लंबे व्यक्ति ने नाविक को पैसे थमाए और कूदकर पनडुब्बी में सवार हो गया। 


पनडुब्बी ने एक बार फिर तेज आवाज की और पानी में समा गई। एल्गिन रोड के घर को संग्रहालय में तब्दील करने के बाद पूरे भारत से लोग इसे तीर्थस्थान की तरह देखने आने लगे। एक बार मैंने सुना कि एक बूढ़ी महिला अपने छोटे पोते को बता रही थी कि कैसे सुभाष चाचा ने खुद को शरीरविहीन जीव में बदल लिया और कमरे की खिड़की के लोहे की सलाखों से निकलकर भागने के लिए सड़क पर उतर गए। सुभाष चाचा का दुस्साहसिक और उल्लेखनीय कारनामा यह था कि वह एक वास्तविक और प्रतिबद्ध क्रांतिकारी थे, जो कई परी कथाओं का विषय बन गए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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पुदुच्चेरी की दिलचस्प राजनीति और नारायणसामी की भूमिका (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस 

एक वक्त था जब कांग्रेस नेता और पुदुच्चेरी के वर्तमान मुख्यमंत्री वी नारायणसामी को उनके नारंगी बालों की वजह से बहुत दूर से पहचाना जा सकता था। अब उनकी जगह काले बालों ने ले ली है। हां, गंभीरता दिखाने के लिए बीच-बीच में कुछ भूरे-सफेद बाल भी हैं। बहरहाल, पुदुच्चेरी (और तमिलनाडु) में आगामी अप्रैल-मई में आम चुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों में नारायणसामी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

इस महीने के आरंभ में संकट को टालने के लिए ही नारायणसामी ने अपने कांग्रेस सहयोगियों के साथ खुली सड़क पर सितारों के नीचे रात बिताई। अवसर था पुदुच्चेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का। वही किरण बेदी जिन्हें नारायणसामी दुष्ट आत्मा तक बता चुके हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि कांग्रेस की चुनावी साझेदार द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) इस विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं थी। पार्टी ने केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ कांग्रेस सरकार के बुलाए विधानसभा के विशेष सत्र में भी हिस्सा नहीं लिया। वह यह दबाव बना रही है कि कांग्रेस अपने दम पर अकेले विधानसभा चुनाव लड़े। सत्ताविरोधी माहौल को देखते हुए नारायणसामी चुनावी मुद्दे की तलाश में हैं। किरण बेदी ने शायद उन्हें यह अवसर प्रदान किया है।


अन्य दावेदारों की बात करें तो ए नमशिवायम को सरकार में शामिल कर लिया गया और पूर्व मुख्यमंत्री वी वैद्यलिंगम लोकसभा में चले गए। ऐसे में कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने पार्टी में अपने विरोधियों को शांत कर लिया है लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या है द्रमुक का प्रबंधन करना। यह वह दल है जिसे कांग्रेस अपना सहयोगी मानती है। सन 2016 के विधानसभा चुनाव में इस गठजोड़ को 56 फीसदी मत मिले थे।


परंतु इस बार द्रमुक की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं। द्रमुक सांसद एस जगतरक्षकन, जो पुदुच्चेरी के प्रभारी रहे हैं, उन्होंने पिछले दिनों एक बैठक के बाद कहा कि उनकी पार्टी सभी 30 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और सारी सीटें जीतेगी। उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि वह नाकाम होते हैं तो उसी मंच पर आत्महत्या कर लेंगे। जाहिर है अगर द्रमुक जीतती है तो वह मुख्यमंत्री हो सकते हैं।


मौजूदा विधानसभा में द्रमुक के तीन विधायक हैं जबकि कांग्रेस के 15 विधायक। पड़ोसी राज्य तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (एआईएडीएमके) के पास चार सीटें हैं जबकि कांग्रेस से अलग होकर बनी अखिल भारतीय एनआर कांग्रेस के पास सात सीटें हैं। विधानसभा में 30 सीटे हैं। पुदुच्चेरी में 23, कारैक्काल में 5 तथा माहे और यनम मेंं एक-एक सीट है। ये सभी सीटें बहुत छोटे आकार की हैं जहां कुल मतदाता 15,000 से 30,000 के बीच हैं।


सन 2016 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सभी 30 सीटों पर अपने दम पर लड़ी थी लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। कांग्रेस ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 15 पर जीत हासिल हुई थी। द्रमुक नौ सीटों पर लड़ी और उसे दो पर जीत हासिल हुई। एआईएडीएमके ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे चार पर जीत हासिल हुई। एआईएनआर कांग्रेस ने सभी 30 सीटों पर प्रत्याशी उतारे और आठ पर जीती।


अधिकांश मौकों पर यही देखने को मिला है कि तमिलनाडु में जीतने वाला गठबंधन ही पुदुच्चेरी में जीतता है और परिणाम कमोबेश एक समान होते हैं। परंतु 2016 में यह रुझान उलट गया: हालांकि एआईएडीएमके को तमिलनाडु में जीत मिली और उसने सरकार भी बनाई लेकिन पुदुच्चेरी में कांग्रेस-द्रमुक गठजोड़ सत्ता में आया। इस बार गठबंधन टूटने की कोई वजह नहीं है केवल जगतरक्षकन की महत्त्वाकांक्षा ही आड़े आ रही है।


नारायणसामी पुरानी शैली के कांग्रेसी राजनेता हैं। वह शांत और समझदार हैं। सन 2016 में वह विधानसभा के सदस्य तक नहीं थे लेकिन वह चुने गए और उन्होंने पांच वर्ष तक पार्टी को एकजुट रखा। राजीव गांधी उन्हें पुदुच्चेरी से दिल्ली ले गए थे। वह महज 31 वर्ष की उम्र में राज्य सभा के सदस्य बने। एसएस आहलूवालिया, रत्नाकर पांडेय और सुरेश पचौरी के साथ वह संसद में राजीव के उस दस्ते का हिस्सा थे जिसे शोर मचाने वाला माना जाता था। नरसिंह राव के दौर में वह संसदीय दल के नेता बने। वह पहली बार तब सुर्खियों में आए जब राव के निर्देश पर सन 1996 में उन्होंने संयुक्त मोर्चा सरकार को कांग्रेस का समर्थन पत्र देने में देरी की। नतीजा यह हुआ कि अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। राव को आशा थी कि वाजपेयी की विफलता के बाद राष्ट्रपति उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे। नारायणसामी उस बड़े खेल में एक छोटा हिस्सा थे।


नारायणसामी की सबसे बड़ी प्रतिभा सतर्कता से पेशकदमी करने की है। उन्हें सभी पसंद करते हैं। उनके जीवन की शुरुआत गुलाम नबी आजाद और ऑस्कर फर्नांडिस जैसे लोगों को रिपोर्ट करने से हुई। अब वह उनसे आगे निकल चुके हैं। अहमद पटेल के साथ उनके बहुत खास रिश्ते थे। जब राहुल गांधी केवल सांसद थे तब नारायणसामी उनके आवास पर नियमित मुलाकात के लिए जाते थे।


हाल ही में सी-वोटर-एबीपी के एक पोल में कहा गया कि पुदुच्चेरी में कांग्रेस की सत्ता में वापसी मुश्किल है। कारण केवल यह नहीं है कि द्रमुक के साथ गठजोड़ टूट रहा है बल्कि राजग की बढ़ती लोकप्रियता भी इसकी वजह है। यहां राजग में भाजपा के साथ एआईएडीएमके और एआईएनआर कांग्रेस भी शामिल हैं। यदि द्रमुक कांग्रेस के साथ गठबंधन से बाहर होती है तो राजग को सत्ता में आने से रोकना मुश्किल नजर आता है। बहरहाल, अभी काफी समय बाकी है और नारायणसामी बालों को रंगीन रखें या काला, उन्हें कमतर नहीं आंका जाना चाहिए।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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ब्रॉडबैंड का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए जरूरी कदम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम पोनप्पा 

गत माह कैबिनेट ने देश भर में वाई-फाई कवरेज का विस्तार करने और ब्रॉडबैंड इंटरनेट की पहुंच और उसका इस्तेमाल बढ़ाने के लिए नीति घोषित की है। इस नीति में उल्लेख किया गया है कि कैसे विशिष्ट प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सार्वजनिक वाई-फाई हॉटस्पॉट नेटवर्क की स्थापना की जा सकती है और ब्रॉडबैंड इंटरनेट को उपयोगकर्ताओं को बेचा जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट में इसे काफी उत्साह के साथ दर्ज किया गया। हालांकि कई बार इसे लेकर भ्रामक रिपोर्टिंग भी की गई। जाहिर है दूरसंचार सेवा प्रदाताओं और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं ने इसका कड़ा विरोध किया है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि ऐसा करना उनके लाइसेंसशुदा अधिकारों का अतिक्रमण होगा। उनकी यह दलील सही प्रतीत होती है कि वे भी ऐसी ही शर्तों पर वाई-फाई हॉटस्पॉट विकसित कर सकते हैं क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में इस बात की अनदेखी कर दी गई है कि उन्होंने पहले ही इन लाइसेंस के लिए भारी धनराशि का भुगतान किया है।


नई नीति के तहत कोई भी व्यक्ति या उद्यम बिना लाइसेंस के सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें सरकार को कोई शुल्क भी नहीं चुकाना पड़ा। अब तक केवल लाइसेंसधारी दूरसंचार कंपनियां और आईएसपी ही ऐसा कर सकते थे और वे इसके लिए बाकायदा लाइसेंस शुल्क चुकाते थे। दूरसंचार कंपनियों को तो स्पेक्ट्रम भी खरीदना होता था। यही कारण है कि बिना सरकारी शुल्क के वाई-फाई सस्ता प्रतीत होता है। नई नीति के कुछ पहलू स्पष्ट नहीं हैं। उदाहरण के लिए मौजूदा कानून इंटरनेट सेवाओं को उपभोक्ताओं को दोबारा बेचने की इजाजत देते हैं या नहीं (पहले इस पर प्रतिबंध था) या फिर यह छोटे कारोबारों के लिए वाणिज्यिक रूप से कैसे व्यवहार्य होगा। दूसरे शब्दों में यदि सस्ती सेल्युलर सेवाओं तक पहुंच सुलभ होगी तो भला कोई भुगतान क्यों करेगा? एक सवाल यह भी है कि क्या रुचि होने पर गूगल, फेसबुक, एमेजॉन आदि विदेशी कंपनियों को यह इजाजत होगी कि वे संचार सेवाओं में निवेश कर सकें। खासतौर पर कॉर्पोरेट और सघन वाणिज्यिक क्षेत्रों में। इसके अलावा क्या रुचि रखने वाली भारतीय कंपनियों को ऐसा करने दिया जाएगा। इन सवालों के जवाब आवश्यक हैं।


सर्वव्यापी ब्रॉडबैंड इंटरनेट की सबसे बड़ी आवश्यकता है उच्च क्षमता वाले विश्वसनीय संचार की। यदि डेटा के प्रवाह की समुचित व्यवस्था नहीं की गई तो इसकी उपलब्धता और पहुंच बहुत सीमित रहेगी। नीतिगत बदलाव का पूरा ध्यान अंतिम उपभोक्ता पर केंद्रित है जबकि हमारी समस्याएं फाइबर कोर या सबनेटवर्क तक विस्तारित हैं। फाइबर से ग्राहक के घर तक या ग्राम पंचायत से गांव तक का मध्यम स्तर का लिंक भी नदारद है। भारतीय दूरसंचार विकास सोसाइटी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश गांव ग्राम पंचायत से 5-10 किलोमीटर के दायरे में हों।


ब्रॉडबैंड पहुंच में सुधार की आवश्यकता को स्वीकार करना होगा। इस दिशा में एक कदम यह हो सकता है कि संचार शृंखला में मौजूद कमियों को दूर किया जाए। इसमें वितरण और तकनीकी क्षेत्र की कमियां भी शामिल हैं। डिजिटल संचार का सबसे बुनियादी तत्त्व है संचार। ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा आपूर्ति की बात करें तो कहां किस तरह की आवश्यकता है, इसे लेकर योजना और क्रियान्वयन में कमी देखने को मिल रही है। ऐसा कुछ हद तक इसलिए है क्योंकि बाजार की अपेक्षा स्वसंगठित तंत्र की है जो हर जगह मौजूद नहीं है।


मध्य मील के लिए वायरलेस सेवाएं काफी करीब हैं क्योंकि स्पेक्ट्रम उपलब्ध है लेकिन भारत में उसकी इजाजत नहीं है। यह वह स्थान है जो प्रमुख नेटवर्क को स्थानीय नेटवर्क से जोड़ता है। ऐसा आंशिक तौर पर इसलिए है क्योंकि कुछ बैंड को अलग-अलग तरीके से बरतने को लेकर विवाद है। उदाहरण के लिए खुला वाई-फाई या दूरसंचार कंपनियों की सीमित पहुंच या प्रसारण या फिर केवल 4जी आदि। दूरसंचार विभाग के मुताबिक केवल लाइसेंस वाले सेवा प्रदाताओं को इन बैंड तक अबाध पहुंच की जरूरत होगी।


दूसरा पहलू विचार और सलाह-मशविरे से संबंधित है क्योंकि यहां मामला नई नीति के साथ विरोधाभास का है और एकदम अलग नीति की मांग करता है। इसके बावजूद यह अहम है क्योंकि ऐसी अहम बुनियादी सेवा में स्थिरता बरकरार रखना आवश्यक है जो जीवन, कामकाज, शिक्षा, मनोरंजन, सरकार और सुरक्षा समेत तमाम पहलुओं को प्रभावित करती है या उनसे संबंध रखती है। इसी प्रकार फिलहाल जब दुनिया महामारी से जूझ रही है और फंसी हुई परिसंपत्ति बड़ी बाधा बनी हुई है तब हमें न्यूनतम उथलपुथल के साथ उपयोग बढ़ाने की जरूरत है। क्या बेहतर नहीं होगा कि दूरसंचार कंपनियों और आईएसपी से सरकारी शुल्क समाप्त कर दिया जाए और इस क्षेत्र के लाइसेंसधारक सेवाप्रदाताओं को भी आगे बढऩे का अवसर दिया जाए? ऐसा इसलिए भी कि उनके पास बाजार में स्थापित पहुंच है, क्षमता है और अनुभव है। इससे जरूरी समय पर स्थिरता कायम रखने में मदद मिलेगी। सेवाप्रदाताओं के पास यह अधिकार है और वे विस्तार के अवसर का भी लाभ उठाना चाहेंगे। लेकिन ऐसा तभी होगा जब उन्हें संसाधन और प्रोत्साहन मिले। संसाधन के रूप में वह राशि काम आ सकती है जो लाइसेंस शुल्क नहीं चुकाने से बचेगी। सभी सरकारी शुल्क और लाइसेंस शुल्क समाप्त कर दिए जाने चाहिए। ऐसे में न केवल सेवा प्रदाता कई शहरी इलाकों में हॉटस्पॉट में निवेश करेंगे बल्कि संचार सेवा उद्योग में नई तेजी भी देखने को मिलेगी।


निष्पक्ष तरीके से देखा जाए तो सेवा प्रदाता पहले ही लाइसेंस शुल्क चुका चुके हैं और वे स्पेक्ट्रम की नीलामी की कीमत भी दे चुके हैं। ऐसे में सरकारी शुल्क इन कंपनियों के राजस्व का 30 फीसदी हो जाता है। उन्हें आयकर अलग से चुकाना होता है। 2जी घोटाले ने इस क्षेत्र की गति पूरी तरह समाप्त कर दी थी क्योंकि कुछ के खिलाफ जुर्माने ने पूरे उद्योग को भयभीत किया। स्पेक्ट्रम महंगा हो गया और उपकरणों की लागत भी बढ़ी। इन बातों का असर राजस्व पर पड़ा। परिणामस्वरूप उपभोक्ता कई सुविधाओं से वंचित हैं और उत्पादकता पर असर पड़ा है।


यदि ऐसा हो गया तो संविदा भंग के मामलों का जोखिम भी समाप्त हो जाएगा। हालांकि अतीत से प्रभावी कर की समस्या को समाप्त करना शेष रहेगा। 5जी तथा स्पेक्ट्रम का प्रबंधन करने के लिए भी रुख में व्यापक बदलाव करने होंगे। इन बदलावों के कारण उत्पन्न अंतर जिसे नई नीति कवर करती है, उसके लिए ग्रामीण इलाकों में सामुदायिक वाई-फाई नेटवर्क की आवश्यकता होगी क्योंकि शायद वे वाणिज्यिक रूप से कम आकर्षक हों और सहयोगी व्यवस्था के अभाव में उनका निर्माण और संचालन करना मुश्किल होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार को प्रोत्साहन की जरूरत होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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