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Editorials : असुरक्षित बेटियां

हाथरस, होशियारपुर से लेकर बल्लभगढ़ तक बेटियों के साथ क्रूरता की हदें पार करती घटनाओं ने पूरे देश के अंतर्मन को झिंझोड़ा है। इन घटनाओं के अलावा भी बेटियों के साथ यौन हिंसा की घटनाओं का अंतहीन सिलसिला जारी है। यह बात अलग है कि ये घटनाएं राजनीतिक निहितार्थों के अभाव और मीडिया की चूक के कारण राष्ट्रीय परिदृश्य में विमर्श का हिस्सा नहीं बन पातीं। 

सोमवार को बल्लभगढ़ में बी.कॉम. अंतिम वर्ष की छात्रा के अपहरण की असफल कोशिश के बाद दिनदहाड़े हुई हत्या कानून व्यवस्था के प्रति अपराधियों के बेखौफ होने को दर्शाती है। यह घटना जहां अपराधी के निरंकुश व्यवहार को दर्शाती है, वहीं पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करती है। छात्रा के अपहरण की कोशिश दो वर्ष पूर्व भी हुई थी। यदि इस मामले में सख्त कार्रवाई होती तो शायद छात्रा आज जिंदा होती। उस पर हरियाणा के गृहमंत्री का संवेदनहीन बयान कि पुलिस के द्वारा व्यक्तिगत सुरक्षा कर पाना संभव नहीं है।


 शासन-प्रशासन का संवैधानिक दायित्व बनता है कि व्यक्ति विशेष के जीवन पर आने वाले किसी भी खतरे से उसकी रक्षा की जाये। खासकर लड़कियों की शिक्षण संस्थाओं के बाहर तो सुरक्षा इंतजाम ऐसे होने चाहिए कि बेटियां सिरफिरे आशिकों से अपनी रक्षा करने में सक्षम हो सकें। सवाल समाज में पनप रही आपराधिक मनोवृत्ति का भी है कि क्यों और कैसे पथभ्रष्ट युवा हाथरस, होशियारपुर और बल्लभगढ़ जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं और बेकसूर बेटियों को उनकी क्रूरता का शिकार बनना पड़ रहा है। 

हाल ही में आये एक सर्वेक्षण में इस बात का खुलासा हुआ था कि समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित हो रही है। अभिभावक अब बेटियों के परिवार में आने का स्वागत कर रहे हैं और बिना किसी भेदभाव के उनका बेहतर ढंग से भरणपोषण कर रहे हैं। लेकिन बेटियों के प्रति लगातार बढ़ रहे अपराधों से उनका उत्साह कम हो सकता है। इन आशंकाओं को दूर करना शासन-प्रशासन का दायित्व बनता है।


दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने हाथरस में यौन हिंसा की शिकार हुई युवती को न्याय दिलाने की दिशा में सार्थक पहल की है। मंगलवार को शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि हाथरस कांड मामले में सीबीआई की जांच की निगरानी इलाहाबाद हाईकोर्ट करेगा। हाईकोर्ट मामले की जांच के बाद फिर तय करेगा कि केस का स्थानांतरण उत्तर प्रदेश से दिल्ली किया जाये या नहीं। साथ ही पीड़िता के परिजनों व गवाहों की सुरक्षा पर भी उच्च न्यायालय ध्यान देगा। 

दरअसल, इस सारे प्रकरण में प्रदेश सरकार की कारगुजारियों के मद्देनजर पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी कि मामले का ट्रायल दिल्ली में हो। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. ए. बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने एक जनहित याचिका व वकीलों की ओर से दायर हस्तक्षेप याचिकाओं पर पंद्रह अक्तूबर को अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था। आशंका जतायी जा रही थी कि उत्तर प्रदेश में निष्पक्ष सुनवाई की संभावना कम है। जांच को बाधित करने के आरोप लगाये गये थे। ऐसी आशंकाएं 14 सितबंर को यौन हिंसा की शिकार युवती के शव का आनन-फानन में परिवार की गैर मौजूदगी में रात में अंतिम संस्कार करने के बाद जतायी जा रही थी। दरअसल, इस सारे प्रकरण से उत्तर प्रदेश पुलिस व शासन सवालों के घेरे में आ गया था।

 इस मामले में भारी राजनीतिक विरोध के बाद योगी सरकार ने मामले की जांच पहले एसआईटी को सौंपी थी और बाद में जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की गई। मामले में राजनीतिक विरोध और पीड़ित परिवार की आशंकाओं के बीच अदालत ने मामले में हस्तक्षेप किया। 

इससे पूर्व योगी सरकार की ओर से शीर्ष अदालत में दायर हलफनामे में कहा गया था कि पीड़ित परिवार और गवाहों को तीन स्तरीय सुरक्षा प्रदान की गई है। बहरहाल, बेटियों के खिलाफ होने वाली हिंसा को रोकने के लिये पुलिस-प्रशासन को संवेदनशील व जवाबदेह बनाने की जरूरत है। वहीं समाज को भी मंथन करना होगा कि युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट होने से कैसे बचाया जाये।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Editorials : BECA समझौताः अमेरिका से दोस्ती

आखिरकार भारत और अमेरिका के बीच उस बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बेका) पर समझौता हो गया जिस पर बरसों से काम चल रहा था। यह दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग बढ़ाने की समझ के तहत किया जाने वाला चौथा समझौता है। इससे पहले दोनों देश 2002 में जनरल सिक्यॉरिटी ऑफ मिलिट्री इनफॉर्मेशन एग्रीमेंट, 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरैंडम ऑफ एग्रीमेंट और 2018 में कॉम्पैटिबिलिटी एंड सिक्यॉरिटी एग्रीमेंट पर दस्तखत कर चुके हैं। माना जा रहा है कि

बेका समझौता दोनों देशों के बीच रक्षा और भू-राजनीति के क्षेत्र में सहयोग और तालमेल को पूर्णता प्रदान करने वाला है। हालांकि अमेरिका जैसी सुपरपावर के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात जब भी उठती है तब उसके साथ कई तरह की आशंकाएं भी जुड़ी होती हैं। इसी बेका समझौते को लेकर जब बातचीत शुरू हुई तो तत्कालीन यूपीए सरकार ने कई तरह की चिंताएं जाहिर की थीं। समझौते के इस बिंदु तक पहुंचने में अगर इतना वक्त लगा तो उसका कारण यह था कि लंबी बातचीत के जरिए दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की आशंकाओं को दूर करने के रास्ते खोजे और फिर सहमति को पक्का किया।

बहरहाल, इस समझौते के बाद अब भारत को अमेरिकी सैन्य उपग्रहों द्वारा जुटाई जानी वाली संवेदनशील सूचनाएं और चित्र रियल टाइम बेसिस पर उपलब्ध हो सकेंगे। अमेरिका वैसे महत्वपूर्ण आंकड़े, मैप आदि भी भारत के साथ शेयर कर सकेगा जिनके आधार पर अपने सामरिक लक्ष्य पूरी सटीकता से हासिल करना भारत के लिए आसान हो जाएगा। खासकर दो पड़ोसी राष्ट्रों के साथ मौजूदा तनावपूर्ण रिश्तों के संदर्भ में देखें तो यह समझौता विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। लेकिन ऐसे समझौते तात्कालिक संदर्भों तक सीमित नहीं होते। न ही ये एकतरफा तौर पर फायदेमंद होते हैं। ध्यान रहे, यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव अपने अंतिम दौर में है। दो देशों के बीच कोई समझौता यूं भी किसी खास सरकार का मामला नहीं होता, लेकिन अमेरिकी आम चुनाव की मतदान तिथि से ऐन पहले हुआ यह समझौता इस बात को भी रेखांकित करता है कि दोनों देशों के संबंध अब खास नेताओं के बीच की पर्सनल केमिस्ट्री पर निर्भर नहीं रह गए हैं। यह दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग और बेहतर होते तालमेल का ठोस संकेत है। किसी भी अन्य रिश्ते की तरह यह नजदीकी भी दोनों देशों को लाभ पहुंचा रही है। सिर्फ रक्षा क्षेत्र की बात करें तो भारत-अमेरिका सहयोग बढ़ना शुरू होने के बाद से, यानी 2007 से अब तक अमेरिकी कंपनियां भारत को 21 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार बेच चुकी हैं। बदली परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों के रिश्तों में बढ़ता तालमेल न केवल भारत और अमेरिका के राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से बल्कि विश्व शांति और क्षेत्रीय संतुलन के लिए भी उपयोगी है।


सौजन्य - NBT।

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Editorials : राहत की बात

भारत को कोरोना विषाणु महमाारी के विरुद्ध लड़़ाई के हर क्षेत्र में सफलता मिल रही है। निश्चित तौर पर इसका श्रेय अस्पतालों में भर्ती मरीजों की देखभाल करने वाले चिकित्साकर्मियों सहित महामारी के चिकित्सकीय प्रबंधन करने में शामिल केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल को दिया जाना चाहिए। 


इसी बेहतर तालमेल का मिलाजुला परिणाम यह है कि अक्टूबर के इस महीने में बीते सोमवार को दूसरी बार २४ घंटे के भीतर ५० हजार से कम नये मामले सामने आए। पिछले आठ महीने के बाद मृत्यु दर भी घटकर ८.५ फीसद पर आ गई है। साढ़े  तीन महीने बाद एक दिन में महामारी से होने वाली मौतों का मामला भी ५०० से नीचे आ गया है। 


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी समय–समय पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ महामारी की समीक्षा करते रहे हैं और संबंधित एजेंसियों को निर्देश भी जारी करते रहे हैं। उन्होंने देश के नागरिकों को कई बार सावधान भी किया है। त्योहारों से पहले पिछले मंगलवार को उन्होंने देशवासियों को सावधान किया था कि लॉकड़ाउन भले हट गया है‚ लेकिन कोरोना का वायरस नहीं गया है। उन्होंने नारा भी दिया कि‚ ‘जब तक दवाई नहीं‚ तब तक ढिलाई नहीं।' प्रधानमंत्री की चेतावनियों का नागरिकों के साथ–साथ महामारी की रोकथाम में जुटे लोगों पर भी पड़़ रहा है।


 पिछले दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय ने संकेत दिया था कि अगले वर्ष फरवरी–मार्च तक महामारी का टीका भी बाजार में उपलब्ध हो जाएगा। इन दिनों केंद्र सरकार टीके के समुचित वितरण की तैयारियों में जुट गई है। केंद्रीय मंत्री प्रताप चंद्र सारंगी ने कहा है कि केंद्र सरकार ने हर नागरिक को कोरोना का टीका प्रदान करने के लिए ५० हजार करोड़़ रुûपये की व्यवस्था की है। देश के सभी नागरिकों को मुफ्त में टीका दिया जाएगा। यह खबर सभी देशवासियों के लिए राहत भरी है। क्योंकि पिछले दिनों बिहार विधानसभा चुनाव के घोषणा पत्र में भाजपा ने सूबे के हर व्यक्ति को मुफ्त में कोरोना का टीका देने का वादा किया है। 


उसके बाद यह विवाद का विषय बन गया था। शायद इसीलिए केंद्रीय मंत्री प्रताप चंद्रको यह कहना पड़़ा है कि हर देशवासियों को मुफ्त में टीका दिया जाएगा। जाहिर है जब कोरोना का टीका का फासला बहुत कम रह गया है तो हमें पहले से और ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि किसी एक व्यक्ति की मौत भी उसके परिवार‚ देश और समाज के लिए भारी पड़़ रही है। 


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Editorials : क्लाइमेट पॉलिसी वक्त की मांग

एक समय था जब यह माना जाता था कि दुनिया खत्म होगी आणविक युद्ध के माध्यम से। जब शीत युद्ध का माहौल था‚ लेकिन अब यह दुनिया अपनी विलासिता और मूर्खता के कारण तबाह होगी‚ जिसके लक्षण दिखाई भी दे रहे हैं। भूराजनीतिक वर्चस्व आज भी विदेश नीति की धार बना हुआ है। चीन की बेपनाह शक्ति प्रदर्शन और शीर्ष पर पहुंचने की बेताबी ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है‚ जहां से तबाही का मंजर हर किसी को नजर आ रहा है। अमेरिका अपनी जिद पर अड़ा हुआ है कि वह ग्रीन एनर्जी की प्राथमिकता को स्वीकार कर दोयम दरजे की शक्ति नहीं बनना चाहता। इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने पेरिस समझौते से हाथ खींच लिया था। अगर कार्बन जनित ऊर्जा की बात करें तो चीन इसमें सबसे अव्वल है‚ उसका कार्बन एमिशन (उत्सर्जन) भी सबसे ज्यादा है। 

अमेरिका और चीन मिलकर तकरीबन ४० प्रतिशत से ज्यादा गंदगी वायुमंडल में फैलाते हैं। अगर उसमें यूरोपीय देशो को शामिल कर लिया जाए तो यह औसत ७५ प्रतिशत के ऊपर चला जाता है। मालूम है कि १७ शताब्दी के उतरार्द्ध से लेकर अभी तक वायुमंडल का तापमान १।१ सेंटीग्रेड बढ़ चुका है। इसके लिए मुख्यतः दोषी यूरोपीय औद्यौगिक देश और अमेरिका है‚ जिनके कारण पिछले २०० वर्षो में पृथ्वी का तापमान इस हालत में पहुंच चुका है कि समुद्री तट पर स्थित देश जलमग्न होने से आक्रांत है। इसमें भारत के भी कई शहर हैं। छोटे–छोटे देशों ने परम्परागत ऊर्जा के साधन जैसे कोयला‚ डीजल और पेट्रोल से हाय तौबा कर लिया है‚ लेकिन उनके आकार इतने छोटे हैं कि समस्या का समाधान नहीं हो सकता। 


 यूरोपीय देशों में भी ग्रीन इÈधन की ललक बढ़ी है। उनका भी दायरा छोटा है। प्रश्न उठता है कि क्या चीन‚ अमेरिका और दर्जनों मध्यम दरजे की शक्तियां अपनी विदेश नीति को सीधे क्लाइमेट पालिसी (जलवायु नीति) बनाने के लिए तैयार है कि नहींॽ अगर नहीं तो दुनिया की समाप्ति भी सुनिश्चित है। तीन महkवपूर्ण प्रश्न हैं‚ जिसका विश्लेषण जरूरी है। पहला‚ भारत के लिए हरित ऊर्जा एक विकल्प नहीं बल्कि जरूरत है। दरअसल‚ यह जरूरत केवल भारत की नहीं बल्कि पूरे विश्व की है। १९९२ में सम्पन्न ‘रियो सम्मलेन' से लेकर २०१५ के बीच कई अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन सयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में संपन्न हुए। हर बार चेतावनी दी गई। चेतावनी का वैज्ञानिक आधार था। ब्यूनर्स आयर्स में १९९८ में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने कहा था कि अगर २०२० तक फॉसिल फ्यूल एनर्जी को बुनियादी रूप से कम नहीं किया गया तो २०२० में आपातकालीन स्तिथि पैदा हो सकती है‚ जिसका अंदाजा किसी को भी नहीं होगा। २०२० में कोरोना की अद्भुत महामारी से दुनिया सिकुड़ कर घरों में बंद हो गई। न्यूयार्क और पेरिस जैसे शहर जो कभी बंद नहीं होते थे‚ सन्नाटा पसर गया। २०१५ के पेरिस मीटिंग में चेतावनी एक सच्चाई बन गई। कहा गया कि २०५० तक अगर कार्बन मुक्त ऊर्जा का बंदोबस्त दुनिया के बड़े और विकसित देश नहीं कर लेते तो मानवता हर तरीके से खतरे में है। विश्व को तबाह करने के लिए आणविक युद्ध की जरूरत नहीं पड़ेगी। दुनिया अपने कर्मों के भार से समाप्त हो जाएगा। 


आश्चर्य इस बात का है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी दुनिया के पुरोधा इस बात को समझने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। जिस डाली पर बैठे हैं उसी डाली को काटने की मूर्खता कर रहे हैं। दुनिया के वैज्ञानिक मानते हैं कि वातावरण के गर्म होने का खमियाजा पूरी दुनिया के लिए मुसीबत है‚ लेकिन भारत और भारत के पडÃोसी देशों के लिए संकट ज्यादा तीखा और बहुरंगी है। चूंकि भारत सहित भारत के पडÃोसी देश ट्रॉपिकल जोन में आते हैं। घनीभूत आबादी है। आÌथक व्यवस्था कमजोर है। विकास की गति को भी बढ़ाना है। इसलिए भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के देशों में हरित ऊर्जा के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं है। दरअसल‚ सुखद आश्चर्य यह है कि भारत की वर्तमान सरकार हरित ऊर्जा को बहाल करने की जुगत में जुट गई है। यह कागजों से उतरकर जमीनी स्तर पर दिखाई भी देने लगा है॥। भारत में ऊर्जा का मुख्य उपयोग के कई खंड है‚ सबसे बड़ा ढांचा बिजली उत्पादन का है‚ जिसके सहारे अन्य व्यवस्थाएं चलती है। दूसरा परिवहन का है‚ जिसमें रेल और रोड ट्रांसपोर्ट के साथ कार्गो और हवाई जहाज आते हैं। तीसरा फैक्टरी का है‚ जिसमें मूलतः लोहा और सीमेंट फैक्टरी को ज्यादा इÈधन की जरूरत पड़ती है‚ चौथा घरेलू जरूरतें हैं और पांचवा कृषि व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। भारत ने पिछले ६ सालों में सौर ऊर्जा का आकर १७ जीबी से बढÃाकर ७८ जीबी कर लिया है। प्रधांनमंत्री नरेन्द्र मोदी की कोशिश दुनिया में एक स्मार्ट सौर ग्रिड के जरिये दुनिया को जोड़ने की है‚ जिसमें एक सूर्य‚ एक ग्रिड और एक विश्व की परिकल्पना भारत की अनोखी देन है। सबसे मजेदार बात यह भी है कि सौर ऊर्जा की कीमत फॉसिल फ्यूल से चार गुणा कम है। 


हरित ऊर्जा की सबसे बड़ी मुसीबत इसकी अबाध निरंतरता है। रात में सूर्य नहीं चमकता‚ इसके लिए स्टोरेज की जरूरत पड़ेगी। वह एक चुनौती है‚ जिसे आधुनिक टेक्नोलॉजी के जरिये पूरा कर लिया जाएगा। हर तरीके से भारत २०५० तक अपनी परम्परगत ऊर्जा व्यवस्था को बदलकर हरित ऊर्जा को स्थापित करने में सक्षम है। हरित ऊर्जा हर तरीके से विकेंद्रित होगा‚ अगर भारत के प्रधानमंत्री ने तमाम विवशताओं के बावजूद ग्रीन एनर्जी के आधार को अपना संकल्प बना लिया है‚ जिसमें २०५० तक फॉसिल फ्यूल्स से स्थांतरण ग्रीन एनर्जी में हो जाएगा। नीति आयोग के द्वारा रोडमैप भी तैयार किया गया। 

 अगर भारत यह सब कुछ कर सकता है तो अमेरिका और अन्य देश क्यों नहीं कर सकतेॽ चीन क्यों नहीं करना चाहताॽ यह संघर्ष सामूहिक है। १९९८ में सयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में सम्पान वाÌषक जलवायु अधिवेशन में यह बात कही गई थी कि अगर २०२० तक कार्बन जनित ऊर्जा में ३० प्रतिशत कमी नहीं की गई तो २०२० में आपदा की पूरी आशंका है‚ यह कितनी खतरनाक होगी इसका अंदाजा नहीं। देखना है कि दुनिया की महाशक्तियों के ज्ञान चक्षु खुलते भी है कि नहींॽ अगर ऐसा होता है तो क्लाइमेट पॉलिसी ही विदेश नीति होनी चाहिए।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Dynastic form of corruption: जब भ्रष्टाचार करने वाली एक पीढ़ी को सजा नहीं मिलती तो दूसरी पीढ़ी भी भ्रष्टाचार करती

केंद्रीय जांच ब्यूरो की ओर से आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार के जिस वंशवादी रूप की चर्चा की, वह एक कटु सच्चाई है। उन्होंने उचित ही इस तरह के भ्रष्टाचार को एक विकराल चुनौती करार दिया, लेकिन बात तब बनेगी जब उससे पार पाने के जतन किए जाएंगे। प्रधानमंत्री के अनुसार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति अपनाई जा रही है, लेकिन यदि ऐसा है तो फिर वंशवादी भ्रष्टाचार विकराल रूप क्यों धारण किए हुए है? नि:संदेह यह वह सवाल है, जिसका जवाब सरकार और उसकी एजेंसियों को देना होगा और वह भी इसके बावजूद कि भ्रष्टाचार से लड़ना किसी एक एजेंसी का काम नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है।


प्रधानमंत्री के इस आकलन से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि जब भ्रष्टाचार करने वाली एक पीढ़ी को उचित सजा नहीं मिलती तो दूसरी पीढ़ी और ज्यादा ताकत के साथ भ्रष्टाचार करती है, लेकिन यह देखना तो सरकार और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों का ही काम है कि भ्रष्ट तत्वों को समय रहते समुचित सजा मिले। जब तक भ्रष्ट तत्वों को उनके किए की सख्त सजा नहीं मिलती, तब तक भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के मन में भय का संचार नहीं होने वाला।



VDO.AI



यदि कई राज्यों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला भ्रष्टाचार राजनीतिक परंपरा का हिस्सा बन गया है और देश को दीमक की तरह खोखला कर रहा है तो फिर उससे निपटने के लिए विशेष उपाय किया जाना समय की मांग है। आखिर यह मांग कब पूरी होगी? यह सही है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद शासन-प्रशासन के शीर्ष स्तर के भ्रष्टाचार पर एक हद तक लगाम लगी है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि भ्रष्टाचार से जुड़े तमाम मामले जांच और अदालती सुनवाई से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इसका कोई औचित्य नहीं कि भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में भी जांच और सुनवाई का सिलसिला लंबा खिंचता रहे। कभी-कभी तो यह इतना लंबा खिंच जाता है कि अपनी महत्ता ही खो देता है।



कायदे से तो यह होना चाहिए कि भ्रष्टाचार के बड़े और खासकर नेताओं एवं नौकरशाहों से जुड़े मामलों की जांच एवं सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर हो। किसी को बताना चाहिए कि ऐसा क्यों नहीं होता? भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए सरकारी एजेंसियों के साथ न्यायपालिका को भी सक्रियता दिखानी होगी। अच्छा होता कि प्रधानमंत्री अपने संबोधन में इस जरूरी बात को खास तौर पर रेखांकित भी करते, क्योंकि देश इससे हैरान भी है और परेशान भी कि 2जी स्पेक्ट्रम सरीखे बड़े घोटालों का निपटारा जल्द से जल्द करने की जरूरत क्यों नहीं समझी जा रही है?



सौजन्य - दैनिक जागरण। 

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Opinion : सामाजिक पिरामिड में महिलाएं सबसे नीचे

प्रभु चावला, एडिटोरियल डायरेक्टर, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस


“जिस तरह से शक्तिशाली नदी मजबूत चट्टानों और पहाड़ों को तोड़ देती है, उसी तरह बुद्धिमान महिला दुष्टों के छल को ध्वस्त कर देती है. ऐसी बुद्धिमान महिलाओं को हमें नमन करना चाहिए”– ऋग्वेद. ताकत की राह गुणा-गणित की नक्शानवीशी से होकर गुजरती है. प्राचीन भारत में महिलाओं को ऊंचा दर्जा हासिल था. यजुर्वेद कहता है- “हे नारी! तुम पृथ्वी की तरह मजबूत हो और उच्च स्थान पर हो. दुनिया को बुराई और हिंसा के मार्ग से बचाओ.” आज उसे ही सुरक्षित किये जाने की जरूरत है.



आश्चर्य नहीं है कि आज महिलाएं सामाजिक पिरामिड में सबसे निचले स्थान पर हैं. केवल चुनाव प्रचार के दौरान ही महिलाएं देवी बन जाती हैं. इस वर्ष 25 मार्च से 31 मार्च के बीच लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के 1477 मामले दर्ज हुए. बीते 10 वर्षों में इस अवधि के दौरान यह संख्या सर्वाधिक है.



सदियों से, महिलाएं अपशब्द और उपासना दोनों का ही विषय रही हैं. पश्चिम बंगाल सर्वोच्च माता के रूप में काली की पूजा करता है. मान्यताओं में देवियों को ऊंचा स्थान प्राप्त है- सरस्वती ज्ञान और लक्ष्मी धन-समृद्धि प्रदान करती हैं और दुर्गा पापियों को दंड देती हैं. वास्तव में भारतीय महिलाओं के साथ देवदासियों या शूर्पणखा जैसा बर्ताव किया जाता है और चुनावी मंचों से राजनेताओं द्वारा उनके प्रति दिखावटी सहानुभूति प्रदर्शित की जाती है.


कमलनाथ ने अपनी ही सहयोगी को ‘आइटम’ कह दिया है, हालांकि, बाद में उन्होंने खेद व्यक्त किया. इससे पहले समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने राजनीतिक विरोधी जया प्रदा के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया था. हाल ही में भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने प्रियंका गांधी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उन्हें कांग्रेस का ‘चॉकलेटी चेहरा’ कहा था.


वास्तव में, बिजनेस से लेकर राजनीति तक हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से उनका उपहास उड़ाना सामान्य सी बात हो गयी है. वरिष्ठ समाजवादी नेता शरद यादव महिलाओं पर टिप्पणी के कारण कई बार घिर चुके हैं. डीएमके नेता नांजिल संपत ने पुदुचेरी की एलजी किरण बेदी के बारे में कहा कि ‘हम नहीं जानते कि वे पुरुष हैं या महिला.’ महिलाएं एक प्रकार का वोटबैंक बन गयी हैं, जिनसे हर चुनावी लड़ाई में लुभावने वादे किये जाते हैं. महिला मतदाताओं के प्रति दरियादिली दिखाने के लिए सभी नेता आपस में होड़ करते हैं.


जातिगत राजनीति वाले राज्य बिहार में महिला मतदाताओं के लिए खूब वादे किये गये हैं. महिला उद्यमिता के क्षेत्र में बिहार की शायद ही कोई पहचान हो. फिर भी, महिला नवउद्यमियों के लिए 50 प्रतिशत ब्याज मुक्त पांच लाख तक के ऋण की घोषणा की गयी है. शायद ही कोई विधानसभा या लोकसभा चुनाव होता हो, जिसमें महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए विशेष घोषणाएं न होती हों. हिंदू परंपराओं के इतर, महिला सशक्तीकरण की कवायद, मौद्रिक मदद, घर में और बाहर सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधान तथा शासन-प्रशासन में नाममात्र की भागीदारी तक ही सीमित होती है.


उन्हें शायद ही कभी नेतृत्व का जिम्मा दिया जाता है. यहां तक कि पंचायती राज जैसे संवैधानिक अधिनियम के बावजूद राजनीतिक पितृसत्ता उनकी भूमिका को प्रभावित करती है. जब महिलाओं ने अधिकारों और भागीदारी की मांग की, तो पुरुषवादी प्रतिष्ठान ने शक्तिहीन संस्थानों जैसे महिला आयोग (केंद्र और राज्य स्तर पर) का गठन कर दिया. उन्हें सभी सुविधाएं और शक्तियां दी गयीं, लेकिन उन पर मंत्रियों का प्रशासनिक नियंत्रण बरकरार रहा. महिलाओं के कल्याण हेतु लगभग सभी राज्यों में अलग से मंत्रालय की व्यवस्था है.


उनके बजट सीमित होते हैं. न तो आयोग और न ही मंत्रालय महिलाओं के मुद्दों का हल निकाल पाते हैं. लड़कियों और महिलाओं की मदद के लिए भारत में कल्याणकारी योजनाएं मेडिकल कॉलेजों से कहीं अधिक हैं. प्रत्येक मुख्यमंत्री और कई केंद्रीय मंत्री लड़कियों के लिए विवाह अनुदान से लेकर विधवा पेंशन तक कई मुफ्त योजनाओं की घोषणा करते हैं. लेकिन, यह केवल दिखावे के लिए ही होती हैं. महिलाओं को सम्मानजनक स्थान केवल धार्मिक समारोहों या विवाह के दौरान ही दिया जाता है, जबकि धर्मग्रंथों के अनुसार, महिलाओं की भागीदारी के बगैर कोई भी अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता.


बेहतर शिक्षा और कौशल प्राप्त करने के बाद भी उन्हें अहम जिम्मेदारियों से महरूम रखा गया. केंद्र स्तर पर केवल 12 प्रतिशत महिला अधिकारी सचिव स्तर के पदों पर हैं. महिला प्रशासक शायद ही रक्षा, वित्त, गृह, वाणिज्य, कार्मिक और रेल जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की प्रमुख बन पाती हैं. वास्तविक शक्तियों से दूर रखकर महिलाओं को अधिक नुकसान पहुंचाया गया है. उनके खिलाफ अपराधों में निरंतर वृद्धि हुई है. सोशल और डिजिटल मीडिया पर उन्हें निशाना बनाया जाता है. प्रत्येक सात में से एक ट्वीट महिलाओं के खिलाफ अपशब्दों से भरा होता है, प्रत्येक पांच में से एक ट्वीट लैंगिक भेदभाव से जुड़ा होता है.


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, रोजाना औसतन 88 बलात्कार होते हैं. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और प बंगाल में बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न महिला सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े करता है. साल 2019 में महिलाओं के साथ अपराध के चार लाख मामले दर्ज हुए, इससे पहले 3.75 लाख दर्ज हुए थे. दो दशकों से अधिक समय से लंबित महिला आरक्षण विधेयक लैंगिक भेदभाव नहीं है, तो क्या है? जाति आधारित पार्टियां इसका विरोध करती हैं. लेकिन, राष्ट्रीय पार्टियां चुप क्यों हैं? क्या इसलिए मौका मिलने पर महिलाएं अधिक सफलता प्राप्त करती हैं?


पिछले 70 वर्षों में अब तक केवल एक महिला प्रधानमंत्री बनी हैं और लगभग एक दर्जन ही मुख्यमंत्री बन पायी हैं. प्रत्येक भारतीय पुरुष मंदिर की चारदीवारी में महिलाओं को देवी के तौर पर सीमित रखना चाहता है. पौराणिक कथाओं के दायरे से बाहर महिला नेता नहीं, बल्कि अनुयायी बनी हुई हैं. ऋग्वेद भारतीय नारियों से कहता है कि “आप साम्राज्ञी बन सकती हैं और सभी का नेतृत्व कर सकती हैं.” भारतीय पुरुषों के लिए वह साम्राज्ञी तो है, लेकिन वह केवल किचन और घर की, यहां तक कि इसमें किचन कैबिनेट भी नहीं शामिल है.


(ये लेखक के निजी विचार हैं.) 


सौजन्य-  प्रभात खबर।

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Opinion : भारत के लिए जरूरी है ऊर्जा सुरक्षा

डॉ. अमित सिंह, सहायक प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय



इंडिया एनर्जी फोरम में प्रधानमंत्री ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर जो बातें कही हैं वह बहुत महत्वपूर्ण है़ं आनेवाले समय में यदि हमें अपनी अर्थव्यवस्था बचानी है, या फिर अपनी आंतरिक सुरक्षा और विदेश नीति के ध्येय को प्राप्त करना है, उसके लिए ऊर्जा सुरक्षा की नीति बनाना बहुत जरूरी है़ वर्तमान में भारत अमेरिका और चीन के बाद तीसरा ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा ऊर्जा का आयात करता है़ भारत की बढ़ती जनसंख्या के मद्देनजर हमें निर्बाध रूप से ऊर्जा आपूर्ति की जरूरत है़



भारत जानता है कि यदि उसे अपनी अर्थव्यवस्था सुचारु रूप से चलानी है, आत्मनिर्भर भारत बनाना है तो उसे भी ऊर्जा आयात को कम करते हुए घरेलू उत्पादन पर ध्यान देना होगा़ पिछले कई वर्षों में भारत ने तेल और गैस के घरेलू उत्पादन पर काफी पैसा खर्च किया है़ विदेशी कंपनियों के साथ नये-नये संयुक्त उद्यम हुए है़ं वर्ष 2014 के बाद मोदी सरकार ने सौर ऊर्जा पर भी ध्यान दिया और बहुत बड़े-बड़े सौर ऊर्जा पार्क भी बनाये, जिसके माध्यम से हमें ऊर्जा की प्राप्ति भी हो रही है़



अभी भी हम अपनी तेल एवं गैस जरूरतों का 80 प्रतिशत हिस्सा बाहर से ही मंगाते है़ं आनेवाले समय में हमारे देश की ऊर्जा जरूरतें काफी बढ़ेंगी़ वर्तमान में भारत के ऊर्जा उपभोग का 50 प्रतिशत कोयले पर, 30 प्रतिशत तेल पर और 10 प्रतिशत गैस पर निर्भर है़ हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी और परमाणु ऊर्जा का उपभाेग क्रमश: दो प्रतिशत और एक प्रतिशत ही है़ भारत में कोयले की बहुत सी खदानें हैं फिर भी उसे अच्छी गुणवत्ता का कोयला विदेशों से आयात करना पड़ता है़


भारत के कोयले के खदान भी धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं और आने वाले समय में ऊर्जा जरूरतों के बढ़ने की संभावना है़ ऐसे में हमारी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में प्राकृतिक गैस एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है़ यही कारण है कि पिछले छह वर्षों में मोदी सरकार ने कई ऊर्जा सम्मेलन किये हैं, बड़ी कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम किया है और कई ऐसे सुधार भी किये हैं जिसके माध्यम से विदेशी कंपनियां भारत में निवेश कर पाये़ं वर्तमान में हमें अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत तलाशने की जरूरत है़


जलवायु परिवर्तन को देखते हुए आज ज्यादातर देश गैस आधारित अर्थव्यवस्था चाहते है़ं इसका लाभ होगा. कोयला, डीजल या तेल की तुलना में गैस की ज्यादा खपत से प्रदूषण में कमी आयेगी़ मोदी सरकार इस बात को समझती है, इसलिए गैस आधारित अर्थव्यवस्था बनाने की बात हो रही है़ गैस आधारित अर्थव्यवस्था से पर्यावरण बचेगा और जलवायु परिवर्तन के हिसाब से भी यह अच्छा होगा़


इसके जरिये विदेशी कंपनियां भारत में निवेश करेंगी, जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ ही नौकरियों का सृजन भी होगा़ पर्यावरण भी बचेगा और आनेवाले समय में हम ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भी हो पायेंगे़ इतना ही नहीं, भारत अभी भी तेल एवं गैस की जरूरतों को पूरा करने के लिए पश्चिम एशिया के देशों पर बहुत ज्यादा निर्भर है़ इन देशों में बहुत ज्यादा राजनीतिक अस्थिरता रहती है, जिसका असर तेल की कीमतों पर पड़ता है़


इसका नकारात्मक प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था पर भी होता है़ साथ ही, अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर जिस तरह से अमेरिका प्रतिक्रिया देता है, उसका असर भी व्यापार और तेल एवं गैस की आपूर्ति पर पड़ता है़. मोदी ने ऑयल रिफाइनिंग की वर्तमान क्षमता बढ़ाने की भी बात भी कही है़ इसका एक कारण है कि हमारी ज्यादातर ऑयल रिफाइनरियां ईरान के तेल को ही रिफाइन करने में सक्षम है़ं रिफाइनरी की संख्या बढ़ने से ईरान के अलावा दूसरे देशों से आनेवाले तेल को भी हम अच्छी तरह रिफाइन कर पायेंगे.


इसके लिए सरकार को कई मोर्चों पर काम करना होगा़ 'वन नेशन वन गैस ग्रिड' की बात भी प्रधानमंत्री ने कही है, जो बहुत अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए काम करने की जरूरत है. क्योंकि जब निवेश के लिए कल कंपनियां आयेंगी तो वे चाहेंगी कि गैस भी जीएसटी के दायरे में आये़ जीएसटी के दायरे में गैस के आने से सभी जगह गैस के दाम एक जैसे हो जायेंगे़ इससे दाम भी कम होगा और कंपनिया भी मुनाफा कमा पायेंगी़ केंद्र को भी उचित फायदा मिलेगा़


दूसरे, अभी गैस का जो भी उत्पादन होता है, वह राज्य या ज्योग्राफिकल लोकेशन के आधार पर होता है और गैस का अधिकतम उपभोग भी उसी राज्य में हो जाता है़ लेकिन जब राष्ट्र के स्तर पर इसको चैनलाइज किया जायेगा तब एक तरीके की गैस या एक ही माध्यम से पूरे देश में इसकी आपूर्ति होगी़ रिस्पांसिबल फ्यूएल प्राइसिंग का अर्थ भी पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में जानबूझकर या राजनीतिक अस्थिरता के कारण होनेवाली बेतहाशा वृद्धि पर रोक लगाने की एक पहल है़


भविष्य में इस बात की पूरी संभावना है कि राष्ट्रों के मध्य ऊर्जा संसाधनों को लेकर युद्ध हों, इसलिए भारत को ऊर्जा सुरक्षा पर बल देने की जरूरत है तभी उसका चहुंमुखी विकास होगा और वह आत्मनिर्भर हो पायेगा़ भारत की ऊर्जा सुरक्षा आर्थिक दृष्टिकोण से भी आवश्यक है और पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन के दृष्टिकोण से भी़ स्वच्छ एंव आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए विदेश नीति के माध्यम से राष्ट्रीय हितों को साधने में भी यह सार्थक होगा़


(ये लेखक के निजी विचार हैं.)


सौजन्य-  प्रभात खबर।

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Opinion : संयुक्त सैन्य कमान

भारत को लगातार युद्धों, लड़ाइयों, अतिक्रमण और घुसपैठ का सामना करना पड़ता है. आज यह चुनौती पहले से कहीं अधिक गंभीर है. इससे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए सेना के तीनों अंगों के बीच समायोजन, सहकार और सहभागिता को बढ़ाने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है. इस वर्ष के प्रारंभ में डिफेंस स्टाफ के प्रमुख के रूप में जनरल बिपिन रावत की नियुक्ति इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल थी. दुनिया की ताकतवर सेनाओं में यह व्यवस्था पहले से ही है. अब इस प्रक्रिया को विस्तार देते हुए सरकार ने पांच सैन्य थिएटर कमान की स्थापना करने का निर्णय लिया है.



ऐसे कमान में एक शीर्ष अधिकारी के नेतृत्व में तीनों सेनाओं की शक्ति और उनके संसाधनों का नियंत्रण रहता है ताकि सुरक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति बेहतर ढंग से हो सके. जानकारों की मानें, तो अभी तक ऐसी व्यवस्था केवल अंडमान एवं निकोबार क्षेत्र में है. नयी व्यवस्था में उत्तरी कमान का जिम्मा लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक लगभग साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा की सुरक्षा का होगा. चीन के पांच ऐसे कमानों में से एक पूरी तरह भारत को लक्षित है.



पश्चिमी कमान पाकिस्तान से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा की निगरानी करेगी. अन्य तीन कमान द्वीपीय, वायु और सामुद्रिक सुरक्षा से संबद्ध होंगे. चीन और अमेरिका जैसे देशों के पास ऐसे कमानों की शृंखला है. चीन में पांच और अमेरिका में ग्यारह ऐसे कमान हैं. हालांकि युद्ध या संघर्ष की स्थिति में तीनों सेनाएं सम्मिलित रूप से शत्रु का सामना करती हैं, लेकिन एक सुनिश्चित नियंत्रण और सामंजस्य के अभाव में संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं हो पाता है तथा संवाद स्थापित करने एवं निर्णय लेने में भी अक्सर मुश्किलें पैदा होती हैं.


सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी के लिए भी तीनों सेनाएं अलग-अलग तंत्रों का इस्तेमाल करती हैं. केंद्रित नेतृत्व प्रणाली के रूप में कमान बनाने से सूचनाओं को एकत्र करने और संभावित चुनौतियों की तैयारी सम्मिलित रूप से की जा सकेगी तथा इसे नियंत्रित व निर्देशित करने का दायित्व एक अधिकारी पर होगा. वह स्थितियों के हिसाब से रणनीति बनाने और तैयारी करने में सक्षम हो सकेगा. उसके अधीन तमाम संसाधनों के रहने से कार्रवाई के दौरान उसे जरूरत पूरा करने के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा.


उदाहरण के लिए, नौसैनिक लड़ाकू विमान को आवश्यकता होने पर तुरंत पश्चिमी क्षेत्र के रेगिस्तानी इलाकों में तैनात किया जा सकेगा और वायु सेना के युद्धकों को किसी दूसरे मोर्चे पर भेजा जा सकेगा. समुद्र में पहले से चली आ रही वर्तमान व्यवस्था में तीनों सेनाओं के अधिकारी एक कार्रवाई में सम्मिलित रूप से हिस्सा लेने के बावजूद अपनी टुकड़ियों और क्षमताओं को अलग-अलग निर्देशित करते थे. एकल कमान की स्थापना से ऐसी विसंगतियों का समाधान हो सकेगा. उम्मीद है कि तय लक्ष्य के अनुसार 2022 तक भारतीय सेना के ये नये पांच कमान मोर्चा संभाल लेंगे.


सौजन्य-  प्रभात खबर।

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Opinion : संपादकीय: दूरगामी मोर्चा

भारत और अमेरिका के बीच नई दिल्ली में मंगलवार को जो महत्त्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ है, वह दोनों देशों के बीच मजबूत होते रक्षा संबंधों को रेखांकित करता है। सैन्य डाटा साझा करने और भारत को क्रूज व बैलेस्टिक मिसाइलों की तकनीक देने को लेकर बनी सहमति वाला ‘बेसिक एक्सचेंज एंड कोआॅपरेशन एग्रीमेंट आॅन जिओस्पेशियल कोआॅपरेशन’ (बीका) चौथा रक्षा समझौता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि रक्षा क्षेत्र में अमेरिका और भारत एक दूसरे के सबसे करीबी सैन्य साझीदार बन गए हैं। यह करार ऐसे वक्त में हुआ है जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव को हफ्ता भर भी नहीं रह गया है। लेकिन सामरिक और रक्षा क्षेत्र में अमेरिका और भारत जिस तरह से एक दूसरे का सहयोग कर रहे हैं, उससे यह साफ है कि दोनों देशों के बीच ये रिश्ते स्थायी बन जाएंगे। अमेरिका में राष्ट्रपति चाहे कोई बने, भारत को लेकर रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों ही सकारात्मक रुख रखते हैं और चुनाव प्रचार के दौरान सभी ने खुल कर यह बात कही भी है। भारत आज चारों ओर से जिस तरह की सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहा है, उसे देखते हुए देश के रक्षा तंत्र को मजबूत बनाना वक्त की मांग है। ऐसे में यह करार मील का पत्थर साबित होगा। बीका समझौता कोई एक दिन की उपलब्धि नहीं हैं। सबसे पहले साल 2002 में दोनों देशों के बीच सैन्य सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए करार हुआ था। यह वह दौर था जब अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ था और उसे भारत जैसे देशों के साथ की जरूरत थी, ताकि आतंकवाद से निपटने में मिल कर काम कर सकें। इसके बाद 2016 और 2018 में रक्षा उपकरणों की आपूर्ति और सुरक्षा से संबंधित दो और समझौते हुए थे। बीका इसी कड़ी का करार है। इस करार के बाद अब भारत को अमेरिका से अतिसंवेदनशील सूचनाएं, डाटा, नक्शे आदि मिल सकेंगे। ऐसी तमाम गोपनीय सूचनाएं और जानकारियां होती हैं, जिनके अभाव में हम दुश्मन के ठिकानों तक मार नहीं कर पाते। अगर हमारे पास जटिल भौगोलिक इलाकों के नक्शे और जानकारियां हो तो दुश्मन का मुकाबला करना कहीं ज्यादा आसान होगा। इस करार के तहत युद्ध के दौरान अमेरिका अपने उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़े और तस्वीरें भारत के साथ साझा करेगा। आज भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों से गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियां भी सुरक्षा के लिए नया खतरा बन गई हैं। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच नए रक्षा करार से दोनों देश इस क्षेत्र में चीन के प्रसार को रोकने के लिए काम करेंगे। भारत संतुलन बनाए रखते हुए अपनी सैन्य क्षमता को निरंतर मजबूत कर रहा है। रूस से भी भारत सैन्य मदद ले रहा है। भारत और अमेरिका के विदेश और रक्षा मंत्रियों की बैठक में सीमा पार आतंकवाद पर भी चर्चा हुई। अमेरिकी रक्षा व विदेश मंत्री ने गलवान घाटी में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देकर यह साफ कर दिया कि चीन के साथ टकराव की स्थिति में अमेरिका भारत के साथ खड़ा है। अमेरिका भी यह बात अच्छी तरह से समझता है कि चीन से निपटने के लिए भारत को साथ रखना जरूरी है और इसके लिए पहले उसे सैन्य रूप से सुदृढ़ करना होगा। दक्षिण एशिया में चीन के प्रभाव को कम करने के लिए अमेरिका, भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया का संगठन- क्वाड भी पूरी तरह से सक्रिय है। चूंकि सैन्य तकनीक और प्रौद्योगिकी में भारत अभी वह मुकाम हासिल नहीं कर पाया है जो रूस और अमेरिका जैसे देश कर चुके हैं, इसलिए भारत को अमेरिका का साथ चाहिए।

सौजन्य - जनसत्ता।

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सब्जियों का समर्थन मूल्य भी तय हो, मुट्ठी भर व्यापारियों के हाथ में प्याज का कारोबार

देविंदर शर्मा, कृषि नीति विशेषज्ञ

पिछले कई वर्षों से आलू और प्याज की कीमतें जिस गति से बढ़ती हैं, उसमें एक पैटर्न नजर आता है। वह पैटर्न यह है कि हर बार इसी मौसम में (अगस्त, सितंबर, अक्तूबर के दौरान) कहा जाता है कि बारिश के कारण फसलों का काफी नुकसान हो गया, जिसके चलते प्याज की कीमतें बढ़ रही हैं। दूसरा पैटर्न यह नजर आता है कि जब भी चुनाव आता है, तो उससे पहले प्याज की कीमतें बढ़ जाती हैं, तो इसका कोई न कोई राजनीतिक निहितार्थ जरूर होगा। इसके पीछे व्यापारी जो भी कारण बताएं, लेकिन एक साल मैंने देखा कि प्याज की पैदावार में मात्र चार फीसदी की गिरावट आई थी, लेकिन कीमतों में चार सौ फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। इसके पीछे कारण यह है कि प्याज का व्यापार मुट्ठी भर लोगों के हाथों में है और वे उसकी कीमत नियंत्रित करते हैं।


इस साल जब प्याज की कीमतें 80 से सौ रुपये प्रति किलो हो गई, तो सरकार ने प्याज के निर्यात पर रोक लगा दी है और आयात को भी मंजूरी दे दी है। मुख्य रूप से यही कहा जा रहा है कि बरसात से फसल को नुकसान हुआ, जिससे कीमतें बढ़ गई हैं। पहली सितंबर से लेकर 30 सितंबर पर सरकारी वेबसाइट पर जो आधिकारिक आंकड़ा है, वह बता रहा है कि सितंबर में लासलगांव की मंडी, जो प्याज की एशिया की सबसे बड़ी मंडी है, में 38.84 फीसदी प्याज की ज्यादा आवक हुई है। और पूरे महाराष्ट्र में देखा जाए, तो 53.17 फीसदी प्याज की आवक ज्यादा हुई है। यानी महाराष्ट्र की मंडियों में 19.23 लाख क्विंटल अधिक प्याज आया। फिर भी कीमतें बढ़ जाती हैं, तो साफ है कि कोई तो बात है, जिसे हमें समझने की जरूरत है। 

यह तो हुई प्याज की बात, पर आलू की कीमतें भी बढ़ी हैं। अभी बाजार में साठ रुपये प्रति किलो आलू उपभोक्ताओं को खरीदना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा आलू की पैदावार उत्तर प्रदेश में होती है और इस समय उत्तर प्रदेश में कोल्ड स्टोरेज आलू से भरे पड़े हैं, जहां 30.56 लाख टन आलू जमा है, फिर भी आलू की कीमतें बढ़ रही हैं। इसी को देखते हुए सरकार ने यह निर्देश जारी किया है कि 31 अक्तूबर तक सभी कोल्ड स्टोरेज को खाली कर दिया जाए। ऐसा इसलिए किया गया, ताकि कीमतों को नियंत्रण में लाया जा सके। उत्तर प्रदेश के कोल्ड स्टोरेज में जरूरत से 22 लाख टन ज्यादा आलू पड़ा हुआ है। साफ है कि बाजार में कमी पैदा करके कीमतों को बढ़ाया जा रहा है। इसी पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने 31 दिसंबर तक प्याज के खुदरा और थोक भंडारण के लिए क्रमशः दो टन और पच्चीस टन की सीमा तय की है। इसका असर भी तुरंत दिखा, जिस दिन सरकार ने यह घोषणा की, उस दिन थोक में 8,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर थी, जो घटकर 6,000 रुपये पर आ गई। कीमतों के बढ़ने के पीछे जमाखोरी एक बहुत बड़ा कारण है, जिस पर नियंत्रण जरूरी है। 

मगर अफसोस कि जमाखोरी पर हम आज तक नियंत्रण नहीं लगा पाए हैं। जमाखोरी का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 पारित किया है, उसमें भंडारण की ऊपरी सीमा को हटा दिया गया है। इसका नतीजा यह हुआ कि जमाखोरी अब वैध हो गई है। ऊपरी सीमा हटाने का क्या नतीजा हो सकता है, इसका अनुमान प्याज और आलू की बढ़ रही कीमत से लगाया जा सकता है। इस संशोधन से किसानों को तो कोई फायदा नहीं होगा, हां, उपभोक्ताओं को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। देश के उपभोक्ता यह समझ रहे हैं कि ये तीनों कानून खेती से संबंधित हैं और उसका असर किसानों पर पड़ेगा। लेकिन आलू और प्याज के उदाहरण से पता चलता है कि ऊपरी सीमा हटाने से उपभोक्ताओं पर असर पड़ेगा। यानी जिस चीज को विनियमित करना चाहिए था, या जिस बड़ी आपूर्ति शृंखला को नियंत्रित करना चाहिए था, वह न करके बड़े खिलाड़ियों को भंडारण की अनुमति दे दी गई। इससे कीमतों में जो छेड़छाड़ होती है और इसका जब तक उपभोक्ताओं को पता चलता है, तब तक वे भारी नुकसान उठा चुके होते हैं। 


कीमतों को नियंत्रित करने का एक तरीका तो यह है कि अभी हमारे पास टेक्नोलॉजी है, अन्य तमाम संसाधन हैं, तो क्यों न हम फसल उत्पादन से पहले ही यह जान लें कि हमें पूरे देश के लिए कौन-सी फसल कितनी चाहिए, और किस राज्य में किस फसल की कितनी जरूरत है और उस हिसाब से हम उसका मैपिंग करें और आपूर्ति शृंखला को नियंत्रित करें। दूसरा तरीका यह है कि बिचौलियों को नियंत्रित करने के लिए हमें एक तंत्र विकसित करना होगा। छोटे व्यापारी और बिचौलियों को हम खराब मानते हैं, पर बड़े व्यापारी व बिचौलिए भी उससे कम नहीं हैं। आप देखेंगे कि स्थानीय बाजार में अभी आलू, प्याज की जो कीमत है, उससे कम अमेजन या फ्लिफकार्ट पर नहीं है। तो दोनों में फर्क क्या है? किसान को मक्के का दाम अभी आठ से नौ रुपये प्रति किलो मिल रहा है और पैकेटबंद होकर जो मक्का बाजार में बिकने आ रहा है, उसकी कीमत 45 से 50 रुपये प्रति किलो है। हम समझते हैं कि बाजार की अदृश्य शक्तियां अपने-आप इसमें संतुलन ले आएगी, लेकिन ऐसा होता नहीं है।


जब भी आलू, प्याज के व्यापारियों पर आयकर विभाग का छापा पड़ता है, तो हंगामा मच जाता है कि इससे व्यापारियों में गलत संदेश जाएगा। पर जमाखोरी रोकने के लिए ऐसा करने की जरूरत है। जब कीमतें बढ़ती हैं, तब सारे देश में उपभोक्ताओं के हित में हंगामा होता है। पर जब किसानों को वाजिब कीमत नहीं मिलती है और वह अपनी उपज सड़कों पर फेंकता है, तब कोई हंगामा नहीं होता। क्या कारण है कि सिर्फ उपभोक्ताओं के लिए ही सरकार सक्रिय होती है, किसानों के लिए नहीं? किसान जब अपनी फसल को औने-पौने दाम में बेचने के बजाय उसे सड़कों पर फेंकता है, तो उसे कितनी पीड़ा होती होगी और उसकी आजीविका पर कितना असर पड़ता होगा, इसे समझने की जरूरत है। सरकार किसानों के लिए एक योजना लेकर आई थी 'टॉप' (टमाटर, ओनियन, पोटेटो), उसे और सुदृढ़ करने की जरूरत है और सब्जियों का एक आधार मूल्य तय करना चाहिए, अगर कीमत उससे कम होती है, तो सरकार को हस्तक्षेप करके उसकी भरपाई किसानों को करनी चाहिए। 


केरल ने सभी सब्जियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिया है। इससे सबक लेकर सब्जियों के लिए एक आधार मूल्य पूरे देश में तय होना चाहिए। यही किसानों की असली आजादी है। पंजाब के किसान भी इसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 


सौजन्य - अमर उजाला।

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Opinion : हस्तशिल्प की ओर भी बढ़े मदद का हाथ

सत्यनारायण सिंह, सेवानिवृत्त आईएएस

स्वतंत्रता के पश्चात भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के जरिये योजनाबद्ध विकास प्रारंभ हुआ था। ग्रामीण विकास हेतु अनेक योजनाओं एवं कार्यक्रमों को लागू किया गया। कृषि उत्पादन में वृद्धि के बावजूद, जनसंख्या वृद्धि के कारण छोटी जोत वाले कृषकों व भूमिहीन श्रमिकों के रोजगार के दिनों व वास्तविक मजदूरी में गिरावट आई। भारत जैसे कृषि प्रधान देश की अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों को बढ़ावा देना सबसे अधिक तर्कसंगत माना गया है। तीव्र गति से विकास के लिए कुटीर, लघु व मझौले उद्योगों की भूमिका को महसूस किया गया। राजस्थान लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए जाना जाता है। खासतौर से यहां के हस्तशिल्प ने वैश्विक पहचान बनाई है। राजस्थान में सामंती शासन रहने के कारण वृहत उद्योगों को प्रोत्साहन नहीं मिला। परंतु मझौले स्तर के सूती-ऊनी वस्त्र उद्योग, शक्कर, सीमेंट, कांच, नमक व कुटीर उद्योग प्रमुख रहे। 


परंपरागत कलाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी कायम रखने और विकासवान बनाने में राजस्थान के हस्तशिल्पियों का अभूतपूर्व योगदान है। कोरोना महामारी की वजह से राजस्थान लौटने वाले अधिकांश प्रवासी मजदूर व कारीगर लघु उद्योग विशेषकर पत्थर, वस्त्र व आभूषण उद्योगों से जुड़े हैं। ये प्रवासी मजदूर ग्रामीण औद्योगिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कुटीर उद्योग प्रायः परिवार के सदस्यों द्वारा संचालित होते हैं, जिनमें बहुत कम मात्रा में पूंजी लगती है। प्रदेश की प्रसिद्ध वस्तुओं में मूल्यवान सोने-चांदी के कलात्मक आभूषण, पीतल पर खुदाई-भराई, पत्थर व लकड़ी पर खुदाई, ब्ल्यू पॉट्री, लाख व हाथी दांत के सामान, चंदन की वस्तुएं, सांगानेरी प्रिंट के कपड़े, पाल व मारवाड़ की रंगाई-छपाई के वस्त्र, कोटा की डोरिया साड़ियां, बीकानेर के कालीन व कंबल, जयपुर की मूर्तियां, उदयपुर, सवाई माधोपुर व डुंगरपुर के लकड़ी के खिलौने, शाहपुरा की फड़ पेंटिग्स, जैसलमेर और बाड़मेर में जाली के कपड़े पर हाथ की छपाई, नाथद्वारा के आभूषण, जयपुर व जोधपुर की बंधेज साड़ियां, उदयपुर की हाथी दांत की वस्तुएं, सलमा सितारे, व गोटे-किनारी के काम से युक्त परिधान, नागौर के लोहे के औजार इत्यादि हैं, जिन्हें प्रोत्साहन देकर राज्य की आर्थिक वित्तीय स्थिति को सुधारा जा सकता है। 

नोटबंदी, जीएसटी व कोराना लॉकडाउन से आई मंदी का सर्वाधिक असर राजस्थान के इन लघु उद्योगों पर पड़ा है। एक ओर जहां कच्चा माल नहीं मिल रहा, दूसरी ओर मांग समाप्त हो गई, निर्यात बंद हो गया। पर्यटन उद्योग पर पड़े दुष्प्रभाव ने हस्तशिल्प, ज्वेलरी, खादी व चर्म उद्योग में उत्पादन रोकने पर मजबूर कर दिया। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मांग नहीं होने से इनका संकट बढ़ गया है। बेरोजगारी की वजह से कलाकार व मजदूर रोजी-रोटी के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। वृद्ध कारीगर, महिलाएं बेरोजगार हैं। कच्चे माल की मांग की कमी से उत्पन्न विपणन की समस्या, उद्योगपतियों की उदासीनता, परिवहन की कठिनाइयों के कारण सर्वाधिक प्रभावित समाज के कमजोर वर्ग के दस्तकारों का रोजगार समाप्त हुआ है। प्रमुख शहरों में विशेष मेले, प्रदर्शनियां व शिल्पकारों का आयोजन बंद हो गया है। पर्यटकों की कमी के कारण एम्पोरियम सूने पड़े हैं। एयर कार्गो कांप्लेक्स बंद है, जिससे निर्यात बंद है। 

राजस्थान के कुटीर उद्योग और हस्तशिल्प कलाकारों, श्रमिकों को मदद आज प्राथमिक जरूरत है। प्रदेश में खादी के क्षेत्र में नए उद्योग स्थापित करना आवश्यक है, अकेले इस उद्योग में सवा दो लाख व्यक्तियों को रोजगार मिलने की संभावना है। इन उद्योगों में सर्वाधिक रोजगार ग्रामीण महिलाओं को मिलता है। हाथकरघा, हैंडलूम क्षेत्र में हस्त कलाएं रोजगार सृजन के साथ निर्यात की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। महात्मा गांधी ने कहा था,'बेरोजगारी उन्मूलन, ग्रामीण उद्योग, विकेंद्रीकरण के लिए मैं उस मशीनरी का स्वागत करता हूं, जो बिना दो हाथों को हटाए उत्पादन व आय बढ़ाती है।' प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने घोषणा की थी कि राष्ट्र के लिए जरूरी है, गरीबी, अज्ञानता, बीमारी, असमानता दूर करना और लघु उद्योग इसमें सर्वाधिक सहायक सिद्ध हो सकते हैं। यदि बुनियादी सुविधाओं में सुधार किया जाए, तो इन सपनों को साकार किया जा सकता है।


सौजन्य - अमर उजाला।

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Opinion : वृहद आर्थिक परिस्थितियों की नहीं होनी चाहिए अनदेखी

मिहिर शर्मा  

सन 2020 कतई 2008 जैसा नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था जिस संकट से गुजर रही है वह वित्तीय संकट नहीं बल्कि जन स्वास्थ्य संकट है जो अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। दोनों वर्षों में इकलौती समानता यह है कि अर्थव्यवस्था की हालत एकदम खस्ता है। सन 2008 में ऐसा वित्तीय तंत्र ध्वस्त होने के कारण हुआ था और 2020 में मांग में अस्थायी कमी के कारण।


परंतु 2021 का घटनाक्रम 2009 से एकदम अलग होगा क्योंकि वजह एकदम अलग हैं। कुछ मायनों में 2008 में वास्तविक अर्थव्यवस्था मजबूत थी, केवल वित्तीय क्षेत्र में दिक्कत थी जिसके चलते पूंजी का गलत आवंटन हुआ और दुनिया भर में असंतुलन फैला। सन 2020 में वास्तविक अर्थव्यवस्था दबाव में है। ऐसे में मौद्रिक उपायों की मदद से समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता है। हमने 2008 के बाद सीखा कि बेशुमार मौद्रिक तरलता दिक्कतें पैदा कर सकती है। इससे परिसंपत्ति कीमतों में मुद्रास्फीति आती है, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रवाह प्रभावित होता है और असमानता बढ़ती है।


भारत के लिए प्रासंगिक एक अंतर यह भी है कि सरकारों की वृहद आर्थिक स्थिति, खासकर उभरते बाजारों वाले देशों की स्थिति प्रभावित हुई है। विकसित देश कम से कम फिलहाल वृहद आर्थिक हकीकत की अनदेखी करने की स्थिति में हैं। वे घाटा बढऩे दे सकते हैं और कर्ज का वित्तीय स्थिरता और मुद्रास्फीति पर असर पडऩे से बच सकते हैं। कम से कम अल्पावधि से मध्यम अवधि में वे ऐसा कर सकते हैं। परंतु उभरते बाजारों को यह सुविधा नहीं है। जीडीपी की तुलना में अधिक सार्वजनिक ऋण उनके लिए समस्या बन सकता है। भारत जैसे देश के लिए तब और अब में अंतर तीन मामलों में है। पहला राजकोषीय स्थिति, दूसरा मुद्रास्फीति और तीसरा चीन।


राजकोषीय स्थिति की बात करें तो 2008-09 को घाटे और कर्ज के लिए याद किया जाता है। राजकोषीय घाटा दोगुना से अधिक बढ़कर जीडीपी के 3.1 फीसदी से 6.5 फीसदी हो गया। इसमें संकटकालीन खर्च के अलावा चुनाव पूर्व घोषणाएं और वेतन आयोग शामिल था। टीकाकारों ने उस समय भी इस पर काफी बातें कही थीं। केयर रेटिंग द्वारा इस बार घाटा और बढ़कर जीडीपी के 9 फीसदी के बराबर रहने की बात कही गई है। जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तो कई लोग सवाल करेंगे कि वर्ष 2019-20 में घाटा जीडीपी के 4.6 फीसदी के बराबर क्यों था? यह फरवरी में बजट में तय 3.8 फीसदी के लक्ष्य से भी खराब रहा। यह ऐसी राजकोषीय स्थिति है जिसने सरकार को राहत और प्रोत्साहन व्यय के मामले में भी सतर्क कर दिया है।


संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के 2007-08 के कार्यकाल की तुलना में राजकोषीय हालात खराब हो सकते हैं लेकिन मुद्रास्फीति के मोर्चे पर हालात बेहतर हैं। मई-जून 2008 में संकट के तुरंत पहले उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति 7 से 9 फीसदी के बीच थी। जुलाई 2008 में थोक मूल्य महंगाई 12 फीसदी थी। इसके लिए रिजर्व बैंक ने वैश्विक जिंस कीमतों, कमजोर कृषि उपज और मजबूत मांग को वजह बताया था। आज उपभोक्ता मूल्य महंगाई 7 फीसदी के आसपास है लेकिन रिजर्व बैंक को यह अस्थायी लग रही है। काफी संभावना है कि मुद्रास्फीति के अनुमान 2008 की तुलना में स्थायी रूप से कम हो चुके हैं।


उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में 2008 की तुलना में कमतर मुद्रास्फीति ने विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों को यह अवसर प्रदान किया कि वे अधिक आक्रामक प्रति चक्रीय मौद्रिक नीति अपनाएं। इसमें ऐसे अपारंपरिक उपाय अपनाना शामिल है जो केवल समृद्ध देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा अपनाए जाते हैं। भारत में रिजर्व बैंक खामोशी से सरकारी प्रतिभूतियों के बाजार और उच्च श्रेणी के कॉर्पोरेट ऋण का आंशिक समर्थन कर सकता है। उसे यह भरोसा मुद्रास्फीति के प्रबंधन की क्षमता से मिला है।


मौजूदा दौर और 2008 में एक अंतर चीन का भी है। उसने वित्तीय संकट के बाद वाले वर्षों की तरह इस बार ऐसा कोई बड़ा प्रोत्साहन नहीं दिया है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की मदद करे। भारत के नजरिये से यह मिलाजुला आशीर्वाद है। वैश्विक मांग कमजोर है लेकिन अहम बात यह है कि जिंस कीमतों का भी कोई चक्र नहीं है। 2008 के बाद चीन ने मांग बढ़ाने के लिए जो उपाय किए थे उनसे ऐसा चक्र उत्पन्न हुआ था। यह इस तथ्य के बावजूद है कि चीन महामारी के आर्थिक झटकों से अपेक्षाकृत सुरक्षित है। सन 2008 के उलट भारत इस बार सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक है। कई विश्लेषण बताते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था में जो गिरावट आई है वह वैश्विक वृद्धि में एक फीसदी तक की कमी करने में सक्षम है। जबकि 2008 के वित्तीय संकट के बाद वाले वर्ष में इसने वैश्विक वृद्धि में 0.5 फीसदी का योगदान किया था। 2020 में एक अंतर यह भी हो सकता है कि वैश्विक पूंजी उभरते देशों के बजाय चीन का रुख करे। 2008 के संकट के बाद उभरते बाजारों में पूंजी की आवक 5 फीसदी बढ़ी थी।


जब संकट आता है तो यह विचार करने का वक्त होता है कि क्या ठीक से किया गया और आपातकाल में कौन सा काम अलग तरह से किया जाना चाहिए था? इस मामले में भारत ने भले ही निवेश का बेहतर केंद्र होने का दावा किया हो लेकिन यह स्पष्ट है कि वह गहराई, स्थिरता और प्रतिफल के मामले में चीन के आसपास भी नहीं है।


मुद्रास्फीति और घाटे के मामले में सबक और स्पष्ट है। मुद्रास्फीति को लक्षित करने की दिशा में कष्टकारी बदलाव ने देश को बुरे समय के लिए कुछ मौद्रिक गुंजाइश प्रदान की। इस बीच सरकार अच्छे वर्षों में अर्थव्यवस्था के राजकोषीय पक्ष का सही ढंग से प्रबंधन नहीं कर पाई जिसका खमियाजा अब उठाना पड़ रहा है। पिछले संकट के समय सरकार की राजकोषीय स्थिति उतनी बुरी नहीं थी जितनी मौजूदा संकट के समय वर्तमान सरकार की है। राजकोषीय मोर्चे पर मेहनत की कमी, बेहतर वर्षों में कड़े निर्णय लेने की अनिच्छा बुरे वर्षों में भारी पड़ती है।


सौजन्य - बिजनेस स्टेंडर्ड।

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सार्वजनिक संसाधनों की नीलामी और मुनाफा

नितिन देसाई  

नीलामी के सिद्धांत ने सन 1996 के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री विलियम विकरे के जमाने से ही अर्थशास्त्रियों का काफी ध्यान आकृष्ट किया है। विकरे ने सन 1961 में इस विषय पर एक अहम आलेख लिखा था। गत सप्ताह सन 2020 का आर्थिक विज्ञान का स्वरिजेस रिक्सबैंक पुरस्कार (इसे अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के समकक्ष माना जाता है) पॉल आर मिलग्रॉम और स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के उनके पीएचडी सुपरवाइजर रॉबर्ट बी विल्सन को दिया गया। इन्होंने भी नीलामी के सिद्धांत में कई योगदान दिए हैं लेकिन उन्हें अमेरिका में संघीय संचार आयोग के नीलामी के तरीकों में नवाचार का डिजाइन तैयार करने के लिए जाना जाता है। इसे साइमल्टेनस मल्टिपल राउंड ऑक्शन (एसएमआरए) कहा जाता है।

खुली नीलामी के दो तरीके हैं-एक तरीका वह है जहां नीलामी तब समाप्त होती है जब एक को छोड़कर शेष बोलीकर्ता बाहर हो जाते हैं और नीलामी सबसे बड़ी बोली लगाने वाले के नाम हो जाती है। दूसरे तरीके में नीलामी करने वाला एक तयशुदा कीमत से शुरू करता है और उसे तब तक कम करता है जब तक कि पहली स्वीकृति हासिल नहीं हो जाती। सीलबंद नीलामी के भी दो तरीके होते हैं जहां सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बोली हासिल होती है या फिर दूसरी सर्वोच्च बोली का भी विकल्प होता है। इनके नतीजे भी खुली नीलामी जैसे ही होते हैं।


एसएमआरए मॉडल इससे कई मायनों में अलग है। पहली बात, इसमें तमाम पारस्परिक निर्भरता वाली चीजें शामिल होती हैं, मसलन अर्हताप्राप्त बोलीकर्ताओं की समांतर बोली के लिए दूरसंचार स्पेक्ट्रम का भौगोलिक वितरण। दूसरा, बोली कई दौर में पूरी होती है और बोलीकर्ता सभी प्रतिभागियों को बोली से अवगत कराता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक किसी वस्तु के लिए कोई नई बोली नहीं लगती। तीसरा, बोली वस्तु दर वस्तु समाप्त नहीं होती बल्कि तब तक खुली रहती है जब तक समस्त वस्तुएं समाप्त नहीं हो जातीं। चौथा, बोलीकर्ताओं को प्रतीक्षा का तरीका अपनाने से रोकने के लिए यह व्यवस्था होनी चाहिए कि वे नई बोली लगाएं या किसी ऐसी वस्तु की ऊंची बोली पर कायम रहें जहां नई बोली लगनी बंद हो गई हों। जब कोई पारस्परिक निर्भरता वाली वस्तु पेशकश पर हो तो इसका अर्थ यह होता है कि कोई व्यक्ति जो किसी वस्तु को गंवा रहा हो वह किसी ऐसी वस्तु के लिए बोली लगा दे जहां बोली ठहर गई हो। यानी यदि कोई व्यक्ति अगर महाराष्ट्र और मुंबई क्षेत्र का स्पेक्ट्रम चाहता है वह अगर मुंबई का स्पेक्ट्रम गंवा रहा है तो वह गुजरात के स्पेक्ट्रम के लिए बोली लगा सकता है। बाद के कुछ चर ऐसे भी हैं जो विभिन्न वस्तुओं के मिश्रण के लिए बोली की इजाजत देकर लिंकेज को आसान बनाते हैं।


भारत में एसएमआरए पद्धति का पहला इस्तेमाल 2010 में 3जी नीलामी में किया गया था जब 22 दूरसंचार सर्किल में तीन-चार जेनरिक लाइसेंस समांतर बोली के लिए रखे गए। यह प्रक्रिया 34 दिनों तक और 183 दौर में चली और इससे 670 अरब रुपये का राजस्व हासिल हुआ। नीलामी के लिए प्रस्तुत सभी उत्पाद आरक्षित मूल्य से ऊपर बिके। बहरहाल, 2012 से 2016 के बीच दूरसंचार स्पेक्ट्रम की पांच एसएमआरए नीलामी उतनी सफल नहीं रहीं। इतना ही नहीं एक व्यापक मान्यता यह है कि दूरसंचार कंपनियों द्वारा चुकाए गए उच्च मूल्य ने उनकी व्यवहार्यता पर असर डाला है।


संसाधनों की सीलबंद बोली अधिक आम है। देश में तेल खनन को लेकर नीलामी प्रक्रिया अपनाई गई और उन कंपनियों को ब्लॉक आवंटन किया गया जो सरकार को अधिकतम गैस और तेल देने का वादा कर रहे थे। अभी हाल ही में बिना खनन वाले या कम खनन वाले ब्लॉक का आवंटन उन कंपनियों को किया जा रहा है जो अधिकतम खनन करने को राजी हैं। सरकारी राजस्व पर इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि खनन लाइसेंस का वास्तविक क्रियान्वयन किस तरह होता है। वाणिज्यिक कोल ब्लॉक के लिए पहली सीलबंद बोली वाली नीलामी हाल ही में की गई। इसके लिए 38 कोयला खदानों में राजस्व साझेदारी की व्यवस्था तय की गई। इनमें से 15 के लिए कोई बोली नहीं लगी। यहां भी सार्वजनिक राजस्व पर प्रभाव क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।


क्या ऐसी नीलामी सबसे बेहतर है जहां सार्वजनिक राजस्व सर्वाधिक हो? सर्वोच्च न्यायालय ने 2जी और कोयला खनन लाइसेंस मामले में कहा कि खुली नीलामी ही इसका इकलौता विधिक तरीका है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय में एक स्पष्टीकरण में कहा, 'नीलामी राजस्व बढ़ाने का सबसे बेहतर तरीका हो सकती है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि राजस्व में इजाफा ही इकलौता सार्वजनिक लक्ष्य हो।' न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 39(ब) के तहत प्राकृतिक संसाधनों के वितरण में साझा बेहतरी ही एकमात्र कारक होना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि अनिवार्य नीलामी आर्थिक दलीलों के साथ विरोधाभासी हो सकता है। विभिन्न संसाधनों के साथ भिन्न प्रकार के बरताव की आवश्यकता हो सकती है। परंतु जो भी वैकल्पिक तरीका हो उसे निष्पक्ष, तार्किक, गैर भेदभावकारी, पारदर्शी, पूर्वग्रहमुक्त और बिना पक्षपात का होना चाहिए ताकि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और समतापूर्ण व्यवहार को प्राथमिकता दी जा सके।


चुनिंदा मामलों में यह संभव है कि साझा बेहतरी को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक संसाधनों पर अधिकतम प्रतिफल हासिल करना उपयुक्त हो परंतु वैकल्पिक तरीकों पर भी विचार किया जाना चाहिए। हालिया तेल खनन नीलामी में ऐसा किया भी गया।


सर्वोच्च न्यायालय ने 2012 में जो प्रतिक्रिया दी थी उसका यही अर्थ है कि अधिकतम राजस्व हासिल करने का कोई भी विकल्प नियम आधारित होना चाहिए और उसमें मनमाने निर्णयों की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। ताकि भ्रष्टाचार या विकृत पूंजीवाद की कोई भी आशंका दूर की जा सके। यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। खुली नीलामी प्रक्रिया ऐसी ही होती है। इसकी शर्तें ऐसी होनी चाहिए जो बोलीकर्ताओं के लिए भी एकदम निष्पक्ष हों। उदाहरण के लिए शहरी भूमि की नीलामी की बोली की प्रक्रिया में बोलीकर्ता द्वारा सस्ते आवास की तादाद या इसके लिए जमीन की पेशकश, तयशुदा आरक्षित मूल्य पर जमीन हासिल करने की वजह बन सकती है। वास्तविक चुनौती यह है कि साझा बेहतरी को ऐसे परिभाषित किया जाए कि उसे मापा जा सके और जो उन संसाधनों के लिए प्रासंगिक हो जिन्हें निजी कंपनियों या व्यक्तियों को हस्तांतरित किया जाना है।


सार्वजनिक संसाधनों की नीलामी स्वागतयोग्य है क्योंकि इसने पारदर्शिता सुनिश्चित की है और भ्रष्टाचार की आशंका कम हुई है। परंतु नीलामी का डिजाइन ऐसा होना चाहिए कि वह संविधान की भावना के अनुरूप साझा बेहतरी के काम आए और जिसमें छेड़छाड़ या बदलाव से बचाव की पूरी गुंजाइश मौजूद हो।


सौजन्य - बिजनेस स्टेंडर्ड।

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Editorials : क्षेत्रीय हितों का ध्यान

अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर की द्विपक्षीय रक्षा सहयोग संबंधी तीसरी 2+2 वार्ता में भारत के लिए अवसर भी हैं और जोखिम भी। यह बैठक उस समय हो रही है जब लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ पांच महीनों से तनाव बना हुआ है। अमेरिका के लिए यह बैठक एशिया में चीन के खिलाफ अमेरिकी नेतृत्व वाली रणनीतिक साझेदारी के गति पकडऩे का मामला है। पॉम्पिओ की इस यात्रा में मालदीव, श्रीलंका और इंडोनेशिया भी शामिल हैं। उन्होंने कभी नहीं छिपाया कि उनकी सरकार 'चीन की कम्युनिस्ट पार्टी' की धमकियों का मुकाबला करने के रास्ते तलाश रही है। यह बैठक दोनों देशों के बीच बीते डेढ़ दशक से चली आ रही करीबी के साथ निरंतरता में है। इस दौरान एजेंडे में एक अहम बात है मूलभूत विनिमय एवं सहयोग समझौते (बीईसीए) पर हस्ताक्षर। यह उन चार बुनियादी समझौतों में से अंतिम है जो रक्षा रिश्तों में गहराई लाने से संबंधित हैं। बीईसीए भारतीय सेना को अमेरिका के स्थलीय, समुद्री और हवाई डेटा तो मुहैया कराएंगे ही, साथ ही अमेरिकी रक्षा विभाग के सैटेलाइट नेटवर्क की बदौलत भारत लंबी दूरी की चुनिंदा मिसाइल शक्तियों में भी शामिल हो जाएगा।

परंतु हकीकत यह है कि यह चर्चा अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के एक सप्ताह पहले हो रही है। चुनाव के नतीजे दोनों देशों के रिश्तों में तब्दीली ला सकते हैं। हालांकि अब यह तय हो चुका है कि चीन और अमेरिका का तनाव बना रहेगा, भले ही अमेरिका में किसी भी दल का राष्ट्रपति हो। ऐसे में एक सहयोगी के रूप में भारत की भूमिका काफी हद तक अमेरिका के साथ उसके रिश्तों पर निर्भर करेगी। यदि डॉनल्ड ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति बने रहते हैं तो चीन के साथ चल रहे तनाव में भारत एक अहम साझेदार बना रहेगा। पॉम्पिओ ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के भारत के दावे को समर्थन दिया है और भारत तथा ईरान के बीच के संयुक्त उपक्रम वाले चाबहार बंदरगाह को को प्रतिबंधों से छूट देने की इच्छा जताई है। यह बात ट्रंप प्रशासन के लिए भारत के महत्त्व को साबित करती है।


यदि बड़े कारोबारी घरानों के समर्थन वाले जो बाइडन जीतते हैं तो माना जा सकता है कि वह चीन के साथ कारोबारी तनाव कम करेंगे।  भारत की बात करें तो उसे भी एच1बी वीजा व्यवस्था में ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाई गई कड़ाई से मुक्ति मिल सकती है। परंतु बाइडन बराक ओबामा के ईरान के साथ परमाणु समझौते और प्रशांत पार साझेदारी को नए सिरे से शुरू कर सकते हैं। ट्रंप ने इन दोनों को नकार दिया। बहरहाल यदि ऐसा हुआ तो संतुलन भारत से दूर हो जाएगा। बाइडन ने भारत को मित्र जरूर बताया है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका में जिस तरह ट्रंप की वकालत की वह डेमोक्रेट प्रशासन में पैठ कमजोर करेगा।


बहरहाल भारत को महाशक्ति के साथ गठजोड़ से परे अपनी क्षेत्रीय पहचान मजबूत करने की दिशा में काम करना होगा। ऑस्ट्रेलिया को नवंबर में मालाबार कवायद के लिए आमंत्रित करना हिंद महासागर और हिंद प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बेहतर होगा। भारत ने नवंबर में शांघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन की शासन प्रमुखों की परिषद की मेजबानी की बात कही है जो चीनी आक्रामकता के बीच कूटनीतिक परिपक्वता का उदाहरण है। मोदी सरकार के कार्यकाल में नेपाल के साथ रिश्ते अवश्य खराब हुए हैं। श्रीलंका के साथ शुरुआती करीबी भी कमजोर पड़ी क्योंकि भारत ने श्रीलंका के कर्ज राहत के अनुरोध पर देरी की। वहीं नागरिकता संशोधन अधिनियम के मसले पर बांग्लादेश के साथ तनाव बढ़ा है। भारत अमेरिका के साथ करीबी का फायदा उठाकर पाकिस्तान पर आतंकी समूहों का समर्थन रोकने का दबाव भी नहीं बना पाया है। भारत को पड़ोसियों पर भी नजर डालने की जरूरत है।


सौजन्य - बिजनेस स्टेंडर्ड।

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नेताओं से एक गुस्ताख गुजारिश

शशि शेखर 


ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अपनी कुरसी छोड़ने का इरादा व्यक्त किया है। आमतौर पर राजनेता पैरों तले सियासी जमीन खिसकती देखकर ऐसा करते हैं, मगर जॉनसन की वजह कुछ और है। उनका कहना है कि बतौर प्रधानमंत्री उन्हें जो वेतन-भत्ते मिलते हैं, उनसे उनका गुजारा नहीं होता। शेष जिंदगी वह व्याख्यानों और लेखन के जरिए उपार्जित धन से व्यतीत करना चाहते हैं। 


भारतीयों को उनका फैसला चौंकाने वाला लग सकता है। हमलोग तो चुनाव-दर-चुनाव तमाम नेताओं की आमदनी ज्यामितीय कोणों की तरह पनपती पाते आए हैं। 

शायद आप जानते हों, फिर भी बताने में हर्ज नहीं कि बतौर ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को ब्रिटेन के खजाने से सालाना 1,50,402 पौंड हासिल होता है। अगर भारतीय रुपये में आंका जाए, तो यह रकम एक करोड़, 45 लाख के करीब बैठती है। जॉनसन का हाथ इसलिए तंग है, क्योंकि उनके छह बच्चे हैं और पूर्व पत्नी मरीना ह्वीलर को दिए गए तलाक के इकरारनामे के मुताबिक उन्हें मोटा गुजारा-भत्ता भी देना होता है। अभी उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और पालन-पोषण में जो रकम खर्च होती है, उसकी भरपाई सरकारी वेतन-भत्ते नहीं कर पाते हैं। टोरी पार्टी का नेता बनने से पूर्व उन्हें द टेलीग्राफ  से सालाना 2,75,000 पौंड हासिल हो जाया करते थे। इसके अलावा, अगर वह महीने में दो व्याख्यान भी दे लेते थे, तो उन्हें 1,60,000 पौंड तक की अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी। जाहिर है, जॉनसन उन दिनों को ‘मिस’ करते हैं और अब विचार व व्याख्यान की दुनिया में वापसी चाहते हैं। 


उनकी पूर्ववर्ती टेरेसा मे शायद उन्हें इस मामले में प्रेरित कर रही हैं। टेरेसा ने पदत्याग के पश्चात सिर्फ एक साल में भाषण और लेखन के जरिए दस लाख पौंड की कमाई कर ली थी। एक जमाना था, जब राजनेता अवकाश प्राप्त करने के बाद एकांत को अपना आश्रय बनाते थे, पर दुनिया बदल रही है। लोग सब कुछ जान लेना चाहते हैं। सियासत, कूटनीति, व्यापार आदि के तिलिस्मों की तह तक पहुंचने के लिए लालायित इन लोगों के लिए सत्ता के शीर्ष पर समय बिता चुके लोगों की शरण के अलावा कोई चारा नहीं बचता। ऐसे महानुभावों के पास सांविधानिक शपथ के दायरे के बाहर भी ऐसा बहुत कुछ होता है, जिससे असीमित जानकारियां प्राप्त की जा सकती हैं। टेरेसा मे तो इसका एक उदाहरण भर हैं। दुनिया के सबसे बडे़ कारोबारी देश अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों का तो यह पुराना शगल रहा है। बराक ओबामा को पद छोडे़ हुए चार साल होने को आए, पर वह आज भी दुनिया के सबसे महंगे व्याख्याताओं में एक हैं। बगोटा टाइम्स  के मुताबिक, पिछले साल कोलंबिया के ‘एक्समा’ में व्याख्यान देने के लिए उन्होंने छह लाख डॉलर वसूले थे। हालांकि, ओबामा राष्ट्रपति बनने से पहले भी बतौर लेखक अच्छी-खासी कमाई कर लेते थे। उनकी दो किताबें द ऑडैसिटी ऑफ होप  और ड्रीम्स फ्रॉम माई फादर खासी लोकप्रिय थीं। इनकी रॉयल्टी स्वरूप लाखों डॉलर उनके बैंक खातों में जमा होते थे। इस मायने में वह औरों के मुकाबले अधिक कारगर साबित हुए हैं। 


ओबामा तो लंबे समय तक अपनी लोकप्रियता की आव और ताव बरकरार रखने में कामयाब रहे, पर बेहद बदनामी के साथ पद से विदा लेने वाले बिल क्लिंटन भी अच्छा-खासा अर्जन कर लेते हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा माई लाइफ  से काफी धन कमाया। इसकी 22.5 लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। उन्हें इससे लगभग दो करोड़ डॉलर तो अग्रिम कमाई हुई थी। वह और उनकी पत्नी हिलेरी क्लिंटन ने ‘पेड लेक्चर’ के जरिए फरवरी 2001 से 2016 में हिलेरी के राष्ट्रपति चुनाव लड़ने तक 729 व्याख्यानों से 15 करोड़, 30 लाख डॉलर से अधिक की कमाई कर ली थी। क्लिंटन दंपति की कुल कमाई में करीब 60 फीसदी व्याख्यानों और किताबों से आती है।

ऐसा नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति सदा-सर्वदा से ह्वाइट हाउस छोड़ने के बाद इसी तरह अपनी झोलियां भरते आए हों। अमेरिका को उद्धत राष्ट्रवाद की झोली में डालने वाले रोनाल्ड रीगन की इस मामले में खासी लानत-मलामत हुई थी। हुआ कुछ यूं था कि ह्वाइट हाउस में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद वह जापान में व्याख्यान देने गए। खबर उड़ी कि इसके बदले में उन्होंने 20 लाख डॉलर की मोटी रकम वसूली है। अमेरिकी भद्रलोक को तब यह नागवार गुजरा और उनकी लानत-मलामत शुरू हो गई। नतीजतन, रीगन साहब ने कसम खा ली कि अब वह किसी सार्वजनिक व्याख्यान का हिस्सा नहीं बनेंगे।


अब तो हमारे देश में भी यह प्रचलन जोर पकड़ रहा है। यह बात अलग है कि हमारे यहां विचारपूर्ण व्याख्यान देने वाले राजनेताओं की खासी कमी है। कइयों को तो इसके जरिए धन उपार्जित करने की जरूरत भी नहीं है। उनके आयकर रिटर्न गवाह हैं कि राजनीति में वे कंगाली का रोना रोते हुए आए थे और देखते-देखते अरबों के आसामी बन बैठे। मतदाता इसलिए भी उन पर जान छिड़कते हैं, क्योंकि राजनीति हमारे यहां अभी सामंती सत्ता और उससे जुड़ी ऐशो-इशरत का जरिया मानी जाती है। बहुत दूर क्यों जाएं, बिहार में इस समय चुनाव का माहौल है। वहीं पर नजर डाल देखते हैं। ‘असोसिएशन फॉर डेमोके्रटिक रिफॉम्र्स’(एडीआर) द्वारा जारी आंकड़ों में दावा किया गया है कि पहले चरण में दोनों मुख्य गठबंधनों के लगभग साठ फीसदी उम्मीदवार करोड़पति हैं। इनके पास एक से लेकर साठ करोड़ रुपये तक की संपत्ति है। यही नहीं, पिछले साल चुनाव आयोग में जो हलफनामे दिए गए थे, उनके आधार पर एडीआर ने बताया कि मौजूदा लोकसभा के 539 में 475 सांसद करोड़पति हैं। 

उम्मीद है, अब आप समझ गए होंगे, मैंने इस लेख की शुरुआत में बोरिस जॉनसन के फैसले को आश्चर्यजनक क्यों बताया था। 


यहां एक बात और साफ कर दूं। संसद और विधान मंडलों में करोड़पतियों की आमद में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते देश की जनता भी उनकी तरह खुशहाल हो। अफसोस! 107 देशों के ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ में भारत 94वें स्थान पर आता है और हमारी प्रति-व्यक्ति आय महज एक लाख, 35 हजार रुपये सालाना है। 25 करोड़ से अधिक लोग गरीबी की रेखा के नीचे बसर करते हैं। यह गरीबी की रेखा भी कहां से शुरू होती है, जानकर आश्चर्य होगा। 32 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाले को हमारी हुकूमतें निर्धन नहीं मानतीं। वे यह भी नहीं मानतीं कि इतने में दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं, शिक्षा और सेहत तो दूर की बात है। भारत इस मामले में अलबेला रहा है, जहां की जनता गरीब है और जन-प्रतिनिधि अमीर।

क्या मैं ऐसे राजनेताओं से बोरिस जॉनसन के बहाने अपने अंदर झांकने की गुस्ताख गुजारिश कर सकता हूं?


सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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अमेरिकी सहयोग से बढ़ती सुरक्षा

अरविंद गुप्ता, पूर्व डिप्टी एनएसए, डायरेक्टर, वीआईएफ 

भारत और अमेरिका के बीच मंगलवार को नई दिल्ली में 2 प्लस 2 वार्ता का तीसरा दौर पूरा हुआ। पहली वार्ता 2018 में हुई थी, तो दूसरी 2019 में। कह सकते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका-भारत के संबंधों में जो तीव्र विकास दिखा है, यह वार्ता एक तरह से उसकी अहम कड़ी है। इसलिए दोनों ही पक्ष इसे बहुत अधिक महत्व दे रहे हैं। 

तीसरी वार्ता पिछली दो वार्ताओं में लिए गए दूरगामी निर्णयों को आगे बढ़ाने और पुख्ता करने में महत्वपूर्ण योगदान करेगी। इस वार्ता का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि अभी चीन व भारत के बीच सीमा पर तनाव है और दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। चीन का जो आक्रामक रुख है, उसे दक्षिण चीन सागर और पूर्वी सागर में भी देखा जा सकता है, जहां जापान के साथ भी चीन का तनाव चल रहा है। अमेरिका ने चीन की इस संदर्भ में कड़ी आलोचना भी की है।

डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में चीन और अमेरिका के आपसी संबंधों में बहुत गिरावट आई है। दोनों देशों में व्यापार युद्ध चल रहा है। तकनीकी और व्यापार, दोनों ही मोरचों पर दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ चुका है। इसका दूरगामी असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। 

यह सब कोविड-19 के परिदृश्य में हो रहा है। अमेरिका ने चीन को विश्व में कोरोना वायरस फैलाने के लिए सीधे जिम्मेदार माना है। इस महामारी ने विश्व व्यवस्था पर गहरा असर डाला है। वैश्विक आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई है। लाखों लोग मारे गए हैं। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में देखें, तो इस तीसरी 2प्लस 2 वार्ता का महत्व बहुत बढ़ जाता है। यानी, इस वार्ता की पृष्ठभूमि में तीन बातें हैं, पहली, चीन-भारत के बीच लद्दाख क्षेत्र में भीषण तनाव, दूसरी, चीन का आक्रामक रुख, और तीसरी, कोविड-19 महामारी का वैश्विक दुष्प्रभाव।

भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा सहयोग काफी बढ़ चुका है, खासतौर से वर्ष 2005 के बाद से, जब दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु सहयोग पर सहमति बनी थी। इसके बाद दोनों देशों ने 2006 में एक रक्षा कार्य-ढांचे संबंधी समझौते पर भी हस्ताक्षर किए थे। अमेरिकी विदेशी मंत्री माइक पोम्पियो की हालिया भारत यात्रा और इस 2प्लस2 वार्ता में खास बात यह भी रही कि दोनों पक्षों ने एक बुनियादी आदान-प्रदान और सहयोग समझौता यानी बेका (बीईसीए) एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता अपनी शृंखला में चौथा है। इस पर हस्ताक्षर के बाद अमेरिका-भारत की सेनाओं में सूचनाओं का आदान-प्रदान बढ़ जाएगा। महत्वपूर्ण सैटेलाइट डाटा और रक्षा सूचनाओं को साझा करने के लिए भी सहयोग बढ़ेगा। दोनों देशों की सेनाओं में समन्वय इस कदर मजबूत होगा कि आपसी युद्धाभ्यास की गुणवत्ता पर इसका गहरा और सकारात्मक असर पड़ेगा। यह एक बड़ी उपलब्धि है। इससे दोनों देशों को क्षेत्रीय सुरक्षा के मसलों पर सहयोग करने में मदद मिलेगी।

एक और महत्वपूर्ण बात। वार्ता के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत चाहता है, रक्षा उत्पादन क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश करें। उनकी कंपनियां यहां आएं और अपने हथियार व औजार भारतीय कंपनियों के सहयोग से यहां बनाएं, ताकि भारत को फायदा हो। यहां जो निर्माण हो, अमेरिका की सेनाएं भी उनका उपयोग करें। अगर ये बातें साकार होती हैं, तो एक बड़ी कामयाबी हमारे हिस्से आएगी।

गौर करने की बात यह है, इस वार्ता से पहले कुछ महत्वपूर्ण राजनयिक घटनाएं इंडो-पैसिफिक के संदर्भ में हुई हैं। पिछले दिनों टोक्यो में क्वाड की बैठक हुई, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच विदेश मंत्री स्तर की वार्ता हुई और उसके बाद भारत ने ऑस्ट्रेलिया की नौसेना को मालाबार युद्धाभ्यास में शामिल होने का न्योता दिया। भारत और अमेरिका, दोनों मुक्त और खुले इंडो-पैसिफिक के पक्ष में हैं, जहां अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक एक व्यवस्था कायम हो और समुद्री व हवाई-मार्गों से आने-जाने में रोक-टोक न हो।

जाहिर है, चीन इन बदलते घटनाक्रम को गौर से देख रहा है। उसे थोड़ी घबराहट भी हुई है। यही वजह है कि उसकी तरफ से यह बयान आया है कि क्वाड के तहत एकत्र चारों देश नाटो का एशियाई संस्करण तो नहीं बना रहे? हालांकि, भारत की ओर से जो वक्तव्य रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेशी मंत्री एस जयशंकर ने दिए हैं, उनमें चीन की खुलकर बात नहीं की गई है। हां, अमेरिकी पक्ष ने जरूर चीन की चर्चा की है। 

इस वार्ता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दोनों देश मैरीटाइम डोमेन, साइबर और अंतरिक्ष क्षेत्रों में अपना सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। इसका मतलब यह है कि अब दोनों देशों को यह पता रहेगा कि कौन जहाज कहां है? समुद्र में कहां-क्या चल रहा है? आदि। इन सबके बारे में सूचनाएं परस्पर साझा होंगी। दोनों पक्षों ने आतंकवाद के विरुद्ध भी बात की है। 

भारत का यह फैसला लेना भी दिलचस्प है कि हमारा एक नौसेना अधिकारी अमेरिका की सेंट्रल कमांड में पोस्टेड होगा, जो बहरीन में है, जबकि अमेरिका का एक सैन्य अफसर भारत स्थित इंटरनेशनल फ्यूजन सेंटर में बैठेगा, जहां हिंद महासागर में तमाम जहाजों की सूचनाएं दर्ज होती हैं। 

इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका के साथ हमारा सहयोग बढ़ रहा है, क्योंकि चीन की हरकतों से क्षेत्र में तनाव बढ़ रहा है। सभी देश चाहते हैं कि चीन पर लगाम लगे। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी इशारा किया कि दुनिया बहुधु्रवीय हुई है और कहीं ऐसा न हो कि एशिया एकधु्रवीय हो जाए। इसलिए चीन की आक्रामकता को रोकना जरूरी है। उसे नहीं रोका गया, तो उसका सीधा असर भारत पर होगा। बहरहाल, नवंबर में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में सत्ता-परिवर्तन से अमेरिका के लिए भारत के महत्व में कोई कमी नहीं आएगी और जो समझौता अभी हुआ है, वह आगे भी बहुत मायने रखेगा। इससे दोनों देशों के बीच वार्ता और सहयोग बढ़ेगा।  

    (ये लेखक के अपने विचार हैं) 


सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Editorials : कर्जदारों की दीवाली, कोर्ट के दखल पर सरकार ने दी राहत

सुप्रीम कोर्ट द्वारा लोन मोरेटोरियम मामले में दबाव बनाने के बाद केंद्र सरकार ने कहा है कि तयशुदा ऋण खातों वाले कर्जदार ब्याज में छूट ले सकते हैं। दरअसल, कोरोना संकट के चलते एक मार्च से 31 अगस्त तक की अवधि तक ईएमआई भरने में रियायत लेने वालों के ऋण पर चक्रवृद्धि ब्याज वसूले जाने से उपभोक्ता खफा थे। इस बाबत कई याचिकाएं शीर्ष अदालत में दाखिल की गई थीं। 

जिस पर सख्ती दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनुचित बताया था। गत 14 अक्तूबर को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सरकार से इस मामले पर शीघ्र फैसला लेने का निर्देश देते हुए कहा था कि लोगों की दीवाली आपके हाथों में है। अब वित्त मंत्रालय ने यह फैसला लिया है और 21 अक्तूबर को हुई कैबिनेट की बैठक में इसे हरी झंडी दी गई। इसके तहत दो करोड़ तक के विभिन्न तरह के कर्ज की ईएमआई पर ब्याज माफी की घोषणा की गई है। किस्त भुगतान में मोहलत न लेकर नियमित ईएमआई भरने वालों को भी इसका लाभ मिलेगा। 

बताया जा रहा है कि इस फैसले से सरकारी खजाने पर 6500 करोड़ का बोझ पड़ने का अनुमान है। दरअसल, सरकार ने यह फैसला दो नवंबर को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से ठीक पहले लिया। निस्संदेह केंद्र सरकार द्वारा दाखिल एफिडेविट से ऋण लेने वाले एक बड़े वर्ग को त्योहार के मौसम में एक बड़ी सौगात मिलेगी। यह इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि कोरोना संकट के चलते बड़े तबके के आय स्रोतों का संकुचन हुआ है और बड़ी संख्या में लोगों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है। 

बड़ा कर्मचारी तबका ऐसा भी है, जिसके वेतन में कटौती के चलते उसे ईएमआई चुकाने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में ब्याज पर ब्याज चुकाना उसके लिये बेहद मुश्किल काम था। निस्संदेह न्यायिक सक्रियता की इस लाभ को लोगों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका रही।

सरकार द्वारा दाखिल शपथ पत्र में कहा गया है कि चक्रवृद्धि ब्याज और सामान्य ब्याज के अंतर को पांच नवंबर तक ऋण लेने वालों के खाते में जमा करा दिया जायेगा। यह लाभ केवल एक मार्च से इकत्तीस अगस्त 2020 के बीच की अवधि के लिये दिया जा सकेगा। सरकार ने कहा है कि जिन कर्जदारों ने केंद्रीय बैंक द्वारा 27 मार्च को घोषित भुगतान छूट का पूर्णत: व आंशिक विकल्प चुना हो या नहीं, दोनों इस राहत के पात्र होंगे। निस्संदेह सरकार ने यह फैसला दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए कर्जदारों की स्थिति तथा अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों को दृष्टिगत रखते हुए लिया है। दरअसल, शीर्ष अदालत ने कोरोना संकट से प्रभावित लोगों की स्थिति को महसूस करते हुए व त्योहारी मौसम में इस बाबत सरकार से शीघ्र सर्कुलर जारी करने को कहा था। जिसके बाद सरकार ने विश्वास दिलाया था कि वह खुद बैंकों को ब्याज चुकाएगी।


 सरकार के इस फैसले से अब दो करोड़ तक के एम.एस.एम.ई, ऑटो, आवास, शिक्षा समेत आठ सेक्टर के ऋण पर लगाये गये चक्रवृद्धि ब्याज को माफ किया जाएगा। इसके साथ ही क्रेडिट कार्ड बकाया पर भी ये ब्याज नहीं वसूले जायेंगे। दरअसल, सरकार के इस कदम को बाजार में मांग बढ़ाने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है ताकि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से बाजार को गति मिले। निस्संदेह पर्व शृंखला के मौके पर चक्रवृद्धि ब्याज के दुश्चक्र से राहत मिलना कर्जदारों के लिये बड़ी राहत है। ऐसे वक्त में जब लॉकडाउन की वजह से वाणिज्यिक और औद्योगिक गतिविधियां बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं, कर्मचारियों तक को वेतन देने के लाले पड़े हों, चक्रवृद्धि ब्याज थोपना न्यायसंगत नहीं था। 

साथ ही ऐसे उद्यम, जिन्होंने कर्ज लेकर कारोबार बढ़ाना चाहा था, उनके सामने किस्त चुकाने का भी संकट खड़ा हो गया था। कारोबार की शृखंला टूटने से कई कारोबार तालाबंदी के दौरान बंद हो गये, लेकिन बैंकों का ब्याज और चक्रवृद्धि ब्याज लगातार बढ़ता गया। उनके लिये निस्संदेह यह राहतकारी है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Opinion : स्वामित्व योजनाः किसानों को प्रॉपर्टी कार्ड

हाल ही में सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े कानून बनाए हैं। लेकिन अगर किसानों के पास अपनी जमीन के स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हुए तो वे किसी कंपनी या व्यक्ति से कॉन्ट्रैक्ट कैसे करेंगे? जाहिर है, कृषि सुधारों को जमीन पर उतारने के लिए भी यह आवश्यक है कि किसानों के पास भू-स्वामित्व के कानूनी तौर पर मान्य सबूत मौजूद हों। प्रॉपर्टी कार्ड इस जरूरत को अच्छी तरह पूरा कर सकते हैं।

 

ग्रामीण भारत के लिए स्वामित्व योजना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को ‘स्वामित्व’ योजना के तहत गांवों के लोगों को प्रॉपर्टी कार्ड बांटने की शुरुआत की। आरंभ में इसके तहत छह राज्यों में फैले 750 गांवों के एक लाख लोगों को प्रॉपर्टी कार्ड मिलने हैं, लेकिन सरकार कह रही है कि अगले चार साल में पूरे देश के छह लाख से ज्यादा गांवों में यह काम पूरा कर लिया जाएगा। साफ है कि इस महत्वाकांक्षी योजना से देश के ग्रामीण समाज में एक बड़ी उथल-पुथल आने वाली है। भारत की दो-तिहाई आबादी आज भी गांवों में रहती है और इसका ज्यादातर हिस्सा ऐसा है जिसके पास न केवल अपना घर है बल्कि थोड़ी-बहुत कृषि योग्य जमीन भी है। लेकिन इस संपत्ति का मालिकाना साबित करने वाले दस्तावेज बहुत कम परिवारों के पास हैं। ऐसे में ये परिवार चाह कर भी अपनी इस संपत्ति पर बैंकों से कोई लोन नहीं ले सकते। न ही कानूनी तौर पर किसी से इस संपत्ति के आधार पर कोई कॉन्ट्रैक्ट कर सकते हैं।

नतीजा यह कि देश की इस संपदा का पूंजीकरण नहीं हो पा रहा है। हाल ही में सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े कानून बनाए हैं। लेकिन अगर किसानों के पास अपनी जमीन के स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हुए तो वे किसी कंपनी या व्यक्ति से कॉन्ट्रैक्ट कैसे करेंगे? जाहिर है, कृषि सुधारों को जमीन पर उतारने के लिए भी यह आवश्यक है कि किसानों के पास भू-स्वामित्व के कानूनी तौर पर मान्य सबूत मौजूद हों। प्रॉपर्टी कार्ड इस जरूरत को अच्छी तरह पूरा कर सकते हैं। ध्यान में रखने वाली बात इस सिलसिले में यह है कि गांवों में मामला चाहे जमीन का हो या पुश्तैनी मकान का, इसके स्वामित्व का सवाल देश के सबसे उलझे सवालों में एक है। पुश्त दर पुश्त आपसी समझदारी से काम चलता रहता है। लेकिन बात अगर कानूनी अधिकार की आएगी तो कोई भी अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं होगा।

जो अभी शहर में नौकरी से गुजारा करते हैं और खेती से होने वाली उपज गांवों में रह रहे परिजनों के लिए छोड़े हुए हैं, वे भी मालिकाने के सवाल पर इंच-इंच नपा लेंगे। शादीशुदा बेटियां अपनी पैतृक संपत्ति में भले कोई दिलचस्पी न लेती हों, अपना कानूनी मालिकाना भला कैसे छोड़ देंगी? लब्बोलुआब यह कि इस ‘सर्वे ऑफ विलेजेज एंड मैपिंग विद इंप्रोवाइज्ड टेक्नॉलजी इन विलेज एरियाज’ यानी स्वामित्व मिशन के परिणामस्वरूप गांवों के हर घर में जबर्दस्त टकराव की स्थिति देखने को मिल सकती है। यह सही है कि आवश्यक सुधारों को संभावित झगड़ों और विवादों के डर से अनंत काल तक स्थगित नहीं रखा जा सकता, लेकिन इतना जरूर सुनिश्चित किया जा सकता है कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए धीरे-धीरे और सावधानी बरतते हुए आगे बढ़ा जाए।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Editorials : कितनों के लिए एमएसपी

कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का तगड़ा विरोध मुख्यतः दो राज्यों- पंजाब और हरियाणा- में ही केंद्रित क्यों रहा। इसकी वजह यही थी कि इन दो राज्यों के किसानों की मंडी व्यवस्था तक अच्छी पहुंच है और उन्हें इसका लाभ मिल रहा है।


कृषि सुधारों की टेढ़ी-मेढ़ी राह


पिछले दिनों नए कृषि कानूनों को लेकर जिस तरह किसान सड़कों पर आ गए और जिस तरह से कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी पार्टी की राज्य सरकारों से वैकल्पिक कानून बनाकर इन कानूनों को बेअसर करने को बोल दिया है, उसे देखते हुए हाल के कुछ कृषि आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। वर्ष 2018-19 में महज 12 फीसदी धान उत्पादक किसान ही एमएसपी पर सरकारी खरीद व्यवस्था का फायदा उठा पाए थे। साल 2018-19 के जो सरकारी आंकड़े उपलब्ध हैं, उनके मुताबिक देश के कुल 8 करोड़ धान उत्पादक किसानों में से मात्र 97 लाख किसानों के धान की सरकारी खरीद ही एमएसपी पर की जा सकी। इनमें भी अलग-अलग राज्यों के किसानों की भागीदारी में जबर्दस्त अंतर दिखता है। पंजाब के 95 फीसदी और हरियाणा के 70 फीसदी किसानों को इसका फायदा मिला लेकिन बाकी राज्यों के किसान बहुत पीछे नजर आते हैं। अन्य प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में उत्तर प्रदेश के मात्र 3.6 फीसदी, पश्चिम बंगाल के 7.3 फीसदी और बिहार के महज 1.7 फीसदी किसान ही इसका फायदा उठा सके।

ये आंकड़े बताते हैं कि एमएसपी पर फसलों की खरीद के लिए बनी मंडी व्यवस्था का देश के ज्यादातर किसानों के लिए कोई मायने नहीं है। इन आंकड़ों से इस सवाल का भी काफी हद तक जवाब मिल जाता है कि कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का तगड़ा विरोध मुख्यतः दो राज्यों- पंजाब और हरियाणा- में ही केंद्रित क्यों रहा। इसकी वजह यही थी कि इन दो राज्यों के किसानों की मंडी व्यवस्था तक अच्छी पहुंच है और उन्हें इसका लाभ मिल रहा है। सवाल उठता है कि आखिर बाकी राज्यों में यह व्यवस्था कारगर क्यों नहीं हो पा रही? जवाब कई बातों पर निर्भर करता है। जैसे, पंजाब और हरियाणा में जितनी सघनता से मंडियां बनाई गई हैं और चल रही हैं, क्या अन्य राज्यों में भी उसी तरह गांवों के आसपास मंडियां उपलब्ध हैं? क्या किसानों को मंडियों तक फसलें आसानी से पहुंचाने की सुविधा प्राप्त है? क्या एक दिन में बिक्री न होने पर मंडियों के आसपास अपनी उपज सुरक्षित रखवाने के लिए गोदाम की व्यवस्था मौजूद है? जाहिर है, ये सवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े हैं जो हर राज्य में समान स्तर का नहीं है।


इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए निवेश की जरूरत है, जिससे सरकारें लगातार कतरा रही हैं। इसका रास्ता खेती में निजी क्षेत्र के आने से ही निकल सकता है, जिसके लिए कृषि सुधार आवश्यक हैं। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में कृषि उपज के प्रकार, किसानों की जरूरतें, उनके हित और आशंकाएं भी अलग-अलग हैं। यही वजह है कि कुछ राज्यों के किसान कृषि सुधार संबंधी विधेयकों को लेकर मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं जबकि अन्य राज्यों के किसान इस विरोध से निरपेक्ष बने रहते हैं। देश में कृषि सुधारों की गाड़ी इन विविधताओं का ध्यान रखते हुए और हर राज्य के लिए अलग ढांचे की गुंजाइश बनाते हुए ही आगे बढ़ाई जा सकती है।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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Opinion : मायूस ठेलों को राहत की आस

वर्षों से सड़कों पर मेहनत कर गुज़र बसर करने वाले त्योहारी मौसम में भी मायूस हैं। कोरोना के शुरूआती दौर में जिनके मुंह का निवाला सबसे पहले छिना उनमें ये तबका बड़ा है जो हर दिन की कमाई की बदौलत जिन्दा रहता है। ना बचत कर पाता है‚ न छत का इन्तजाम‚ न ही घर परिवार की फर्जअदायगी। कर्ज में ही डूबा रहता है क्योंकि मौसम की मार‚ ओहदेदारों की बदनीयति और हालात का शिकार रहते हुए ठेले खुद कभी भरपेट नहीं रह पाते। अपने बच्चों की परवरिश ही उसका छोटा सा ख्वाब है‚ जिसे वो मोलभाव करने वालों से जिरह की जिद छोड़कर बमुश्किल जिन्दा रखता है।  


कभी आप उसकी दुखती रगों को छुएंगे तो मालूम होगा कि प्रशासन और नेता इन्हें इन्सान नहीं सड़कों पर बिखरे फिजूल सामान की तरह देखते हैं‚ जिन्हें कहीं से उठाकर कहीं भी फेंक दिया जाए। देश की अर्थव्यवस्था को छोटे दुकानदार और व्यवसायी किस हद तक मजबूती देते हैं इसका अहसास तब होता है जब मन्दी की मार में बड़े धराशायी हो जाते हैं। दुनिया भर की गड़बड़ाई गणित के दौरान भारत के अन्नदाताओं ने और औरतों की छोटी–छोटी बचत के साथ ही फेरीवालों और फुटकर सामान बेचने वालों ने भी देश की सांसों को जिन्दा रखा। हाल का दौर उन्हें क्यों अखरता जिन व्यवसायियों का गल्ला पहले ही भरा–पूरा था‚ लेकिन जिनके चूल्हे आठ दस दिन से ज्यादा की आग ना जुटा पाए उनकी गैरत ने उन्हें हाथ भी नहीं फैलाने दिए।  


कुछ ठेलेवालों ने खुदकुशी तक कर ली। मगर ये हताशा बाजार को चमकाने वाले इश्तेहारों की भीड़ में दब कर रह गई। देश की आबादी में करीब ढाई फीसद हिस्सेदारी वाले ठेले–थड़ीवालों के लिए केन्द्र सरकार ने ५० लाख लोन देकर राहत का ऐलान किया‚ जिसकी जमीनी हकीकत ये है कि बैंक खानापूÌत कर असल जरूरतमन्दों की दावेदारी कई बहाने से खारिज कर रहे हैं। फॉर्म भरने प्रक्रिया में ही उनकी उम्मीदें भरना तो दूर जेब ही हल्की होकर लौट रही है। इस हल्के में नहीं लेना चाहिए। सड़क के किनारे‚ मोहल्ले के नुक्कड़ और बाजारों के फुटपाथ पर फल‚ सब्जियां‚ नाश्ता‚ खाना‚ खिलौने‚ कपड़े‚ बैग‚ जूते सहित हमारी रोजाना की जरूरतों का अनगिनत सामान हमें हमारी जेब पर भार बने बगैर यहां हासिल है। पूरे देश की अर्थव्यवस्था में इनकी हिस्सेदारी का ठीक हिसाब कभी इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि ये असंगठित तबका है। इनका लेखा–जोखा नगर निकायों के पास इसलिए नहीं रहता। शहरों में यातायात व्यवस्था दुरूस्त करने या भीड़–भाड़ कम करने या सफाई अभियानों या अतिक्रमण हटाने की मुहिम के नाम पर थड़ी ठेले वालों पर ही गाज गिरती है। हफ्ता वसूली की जड़ें इतनी गहरी हैं कि हर दिन देश भर में करोड़ों की कमाई भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती है। इन दिनों त्योहारों पर बाजारों में रौनक लौट रही है मगर खुशियां बेचते दिलों में इस बात की दहशत पल रही है कि जाने कब कोई डंडा ठेला पलट दे और फिर ठेलों और सामान को छुड़ाने के लिए रिश्वत का इन्तजाम करना पड़े। पुलिस और निगम के कारिंदों से मिलने वाली धौंस और उगाही इतनी आम बात है कि ठेला व्यवसायी भी इसे अपनी किस्मत ही मान कर बैठे हैं। ॥ 


फेरीवालों की फिक्र की पहल वाजपेयी सरकार ने २००४ में फेरीवालों का संसार नीति बनाकर की। फिर २००९ में भी नीति बनी‚ फुटपाथों के भरोसे आजीविका बसर करने वालों के हक के बारे में समझ बनी और आखिरकार २०१३ में सुप्रीम कोर्ट में बॉम्बे हॉकर यूनियन की याचिका पर फैसला आने के बाद केन्द्र में २०१४ में कानून बना और उन्हें आजीविका का हक हासिल हुआ। राज्य सरकारों ने अपने यहां पहले से बनी वेंडर नीतियों और फिर केन्द्रीय कानून को लेकर भी खानापूÌत की तो हेरिटेज सिटी थड़ी ठेला यूनियन के तले एक जुझारू ठेला व्यवसायी बनवारी लाल ने २०१५ में सुप्रीम कोर्ट दस्तक दी। कोर्ट ने हिदायत दी कि कानून पर अमल हो और संवेदनशील इलाकों को छोड़कर वेंडिंग जोन बनाए जाएं। मगर तब तक इन्हें अपनी जगह से बेदखल करना गैर–कानूनी होगा। कानून ने तो सांविधानिक अधिकार मानते हुए फुटपाथ–ठेले व्यवसायियों को उनकी मर्जी की जगह कमाई करने की आजादी भी सौंपी है। ये सब वेंडिंग समिति के जरिए होगा।  


ज्यादातर राज्यों में पहली केन्द्रीय नीति आने के बाद हॉकर्स‚ पथविक्रेता‚ स्ट्रीट वेंडर जैसे अलग–अलग नाम से नीति लाकर इनकी फिक्र तो की। कई जगह कवायद भी हुई‚ लेकिन ज्यादातर मामला सिर्फ कागजी फुर्ती का ही रहा। इन्दौर‚ पटना‚ भुवनेश्वर जैसे कई शहरों ने काफी अमल भी किया‚ लेकिन जयपुर जैसे हेरिटेज शहरों में जगह–जगह नॉन–वेंडिंग जोन की तख्तियां लग गई। मानो पूरा शहर ही संवेदशील इलाका हो। बिहार के ठेला व्यवसायियों ने तो इस चुनाव में मांग भी रखी है कि राज्य में कानून लागू करते हुए लाइसेन्स मिले‚ स्मार्ट सिटी के नाम पर थड़ी–ठेलेवाले नजरअंदाज न हों‚ आवास सहित दूसरी सरकारी योजनाओं और बीमा‚ हेल्थ कार्ड से जोड़ें‚ लोन आसानी से मुहैया हो। कानूनन फुटपाथ–ठेलों पर सामान बेचने वालों का सर्वे होना है‚ जब तक और कहीं बसाने का इन्तजाम नहीं होगा तब तक हटाया नहीं जाना है‚ नई बसावट से पहले उनकी सहूलियत का ख्याल रखना है और तमाम मसलों के हल और आवाज के लिए वेंडिग समिति का वजूद भी होना है‚ लेकिन देश भर में ही टाउन वेंडिंग समिति तक को नेताओं और दबंगों ने अपनी घुसपैठ से नहीं बख्शा। असल हकदार हर जगह दरकिनार हैं। 


 इलाज सिर्फ यही है कि सरकार ईमानदार अफसरों को असल ठेले व्यवसायियों की पहचान करने और उन्हें लाइसेन्स देने का जिम्मा दे दे। एक और दुखती रग है इनकी जिसका इलाज तो सरकारों को बिना वक्त गंवाए करना ही चाहिए। जिस बेदर्दी से सामान उठाने‚ फेंकने और ठेलों की जब्ती की हरकत नगर निकाय करता है उसका हर्जाना उन्हें ही भुगतने का फरमान हो तो इस पर लगाम लगे। ठेले–फुटपाथ पर कमाई करने वाले आत्मनिर्भर बनने की चाह वाले भारत के ही पहिए हैं‚ जिन्हें दौड़ता देखना हमारे अपने ही दमखम का नजारा होगा। इस वक्त रफ्तार में रहना‚ फिक्रमंद होना साझी जरूरत है।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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