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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Monday, April 19, 2021

आपका धर्म नहीं पूछता (राष्ट्रीय सहारा)

पिछले वर्ष कोरोना ने जब अचानक दस्तक दी तो पूरी दुनिया थम गई थी। सदियों में किसी को कभी ऐसा भयावह अनुभव नहीं हुआ था। तमाम तरह की अटकलें और अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। एक दूसरे देशों पर कोरोना फैलाने का आरोप लगने लगे। चीन को सबने निशाना बनाया। पर कुछ तो राज की बात है कोरोना कि दूसरी लहर में। जब भारत की स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था लगभग अस्त–व्यस्त हो गई है तो चीन में इस दूसरी लहर का कोई असर क्यों नहीं दिखाई दे रहाॽ क्या चीन ने इस महामारी के रोकथाम के लिए अपनी पूरी जनता को टीके लगवा कर सुरक्षित कर लिया हैॽ 


 कोविड की पिछली लहर आने के बाद से ही दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इसके मूल कारण और उसका तोड़ निकालने की मुहिम छेड़ दी थी। पर भारत में जिस तरह कुछ टीवी चौनलों और राजनैतिक दलों ने कोविड फैलाने के लिए तब्लीगी जमात को जिम्मेदार ठहराया और उसके सदस्यों को शक की नजर से देखा जाने लगा वो बड़ा अटपटा था। प्रशासन भी उनके पीछे पड़ गया। जमात के प्रांतीय अध्यक्ष के खिलाफ गैर जिम्मेदाराना भीड़ जमा करने के आरोप में कई कानूनी नोटिस भी जारी किए गए। दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया गया। यही मान लिया गया कि चीन से निकला यह वायरस सीधे तब्लीगी जमात के कार्यक्रम का हिस्सा बनने के लिए ही आया था। ये बेहद गैर–जिम्मेदाराना रवैया था। माना कि मुसलमानों को लIय करके भाजपा लगातार हिंदुओं को अपने पक्ष में संगठित करने में जुटी है। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि जानता के बीच गैरवैज्ञानिक अंधविश्वास फैलाया जाए। 


जो भी हो शासन का काम प्रजा की सुरक्षा करना और समाज में सामंजस्य स्थापित करना होता है। इस तरह के गैर जिम्मेदाराना रवैये से समाज में अशांति और अराजकता तो फैली ही‚ जो ऊर्जा और ध्यान कोरोना के उपचार और प्रबंधन में लगना चाहिए थी वो ऊर्जा इस बेसिरपैर के अभियान में बर्बाद हो गई। हालत जब बेकाबू होने लगे तो सरकार ने कड़े कदम उठाए और लॉकडाउन लगा डाला। उस समय लॉकडाउन का उस तरह लगाना भी किसी के गले नहीं उतरा। सबने महसूस किया कि लॉकडाउन लगाना ही था तो सोच–समझकर व्यावहारिक दृष्टिकोण से लगाना चाहिए था। क्योंकि उस समय देश की स्वास्थ्य सेवाएं इस महामारी का सामना करने के लिए तैयार नहीं थी इसलिए देश भर में काफी अफरा–तफरी फैली‚ जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा करोड़ों गरीब मजदूरों को झेलना पड़ा। बेचारे अबोध बच्चों के लेकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर अपने गांव पहुंचे। लॉकडाउन में सारा ध्यान स्वास्थ्य सेवाओं पर ही केंद्रित रहा‚ जिसकी वजह से धीरे धीरे स्थित नियंत्रण में आती गई। उधर वैज्ञानिकों के गहन शोध के बाद कोरोना की वैक्सीन तैयार कर ली और टीका अभियान भी चालू हो गया‚ जिससे एक बार फिर समाज में एक उम्मीद की किरण जागी। इसलिए सभी देशवासी वही कर रहे थे जो सरकार और प्रधानमंत्री उनसे कह रहे थे। फिर चाहे कोरोना भागने के लिए ताली पीटना हो या थाली बजाना। पूरे देश ने उत्साह से किया। ॥ ये बात दूसरी है कि इसके बावजूद जब करोड़ों का प्रकोप नहीं थमा तो देश में इसका मजाक भी खूब उड़ा। क्योंकि लोगों का कहना था कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था‚ लेकिन हाल के कुछ महीनों में जब देश की अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर चलने लगी थी तो कोरोना की दूसरी लहर ने फिर से उम्मीद तोड़ दी है। आज हर तरफ से ऐसी सूचनाएं आ रही हैं कि हर दूसरे घर में एक न एक संक्रमित व्यक्ति है। अब ऐसा क्यों हुआॽ इस बार क्या फिर से उस धर्म विशेष के लोगों ने क्या एक और बड़ा जलसा कियाॽ या सभी धर्मों के लोगों ने अपने–अपने धार्मिक कार्यक्रमों में भारी भीड़ जुटा ली और सरकार या मीडिया ने उसे रोका नहींॽ तो क्या फिर अब इन दूसरे धर्मावलम्बियों को कोरोना भी दूसरी लहर के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएॽ ये फिर वाहियात बात होगी। कोरोना का किसी धर्म से न पहले कुछ लेनादेना था न आज है। सारा मामला सावधानी बरतने‚ अपने अंदर प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने और स्वास्थ्य सेवाओं के कुाल प्रबंधन का है‚ जिसमें कोताही से ये भयावह स्थित पैदा हुई है। इस बार स्थित वाकई बहुत गम्भीर है। लगभग सारे देश से स्वास्थ्य सेवाओं के चरमराने की खबरें आ रही है। 


 संक्रमित लोगों की संख्या दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ रही है और अस्पतालों में इलाज के लिए जगह नहीं है। आवश्यक दवाओं का स्टॉक काफी स्थानों पर खत्म हो चुका है। नई आपूर्ति में समय लगेगा। श्मशान घाटों तक पर लाइनें लग गई हैं। स्थिति बाद से बदतर होती जा रही है। मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ के हाथ पैर फूल रहे हैं। इस अफरा–तफरी के लिए लोग चुनाव आयोग‚ केंद्र व राज्य सरकारों‚ राजनेताओं और धर्म गुरुओं को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं‚ जिन्होंने चुनाव लड़ने या बड़े धार्मिक आयोजन करने के चक्कर में सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया। आम जनता में इस बात का भी भारी आक्रोश है कि देश में हुक्मरानों और मतदाताओं के लिए कानून के मापदंड अलग–अलग हैं। जिसके मतों से सरकार बनती है उसे तो मास्क न लगाने पर पीटा जा रहा है या आर्थिक रूप से दंडित किया जा रहा है‚ जबकि हुक्मरान अपने स्वार्थ में सारे नियमों को तोड़ रहे हैं। 


 सोशल मीडिया पर नावæ का एक उदाहरण काफी वायरल हो रहा है। वहां सरकार ने आदेश जारी किया था कि १० से ज्यादा लोग कहीं एकत्र न हों पर वहां की प्रधानमंत्री ने अपने जन्मदिन की दावत में १३ लोगों को आमंत्रित कर लिया। इस पर वहां की पुलिस ने प्रधानमंत्री पर १.७५ लाख रुपये का जुर्माना ठोक दिया‚ यह कहते हुए अगर यह गलती किसी आम आदमी ने की होती तो पुलिस इतना भारी दंड नहीं लगाती‚ लेकिन प्रधानमंत्री ने नियम तोड़ा‚ जिनका अनुसरण देश करता है‚ इसलिए भारी जुर्माना लगाया। प्रधानमंत्री ने अपनी गलती मानी और जुर्माना भर दिया। हम भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए नहीं थकते पर क्या ऐसा कभी भारत में हो सकता हैॽ हो सकता तो आज जनता इतनी बदहाली और आतंक में नहीं जी रही होती।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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कोरोना संक्रमण के बेलगाम होने के चलते कई राज्यों में लॉकडाउन की हुई वापसी, नहीं थमेगा उद्योगों का पहिया (दैनिक जागरण)

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की आशंका के बाद भी धार्मिक सांस्कृतिक एवं राजनीतिक कार्यक्रम और खासकर रैलियां करने की क्या जरूरत थी? कम से कम अब तो आम लोगों और नीति-नियंताओं को जरूरी सबक सीख ही लेने चाहिए।


दिल्ली में एक सप्ताह और राजस्थान में 15 दिन के लिए लॉकडाउन की घोषणा के साथ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की ओर से उत्तर प्रदेश के पांच शहरों में 26 अप्रैल तक लॉकडाउन लगाने के आदेश के बाद यह तय है कि कुछ और राज्य इसी दिशा में आगे बढ़ेंगे। महाराष्ट्र पहले ही लॉकडाउन लगा चुका है। यदि लॉकडाउन की वापसी हो रही है तो इसीलिए कि और कोई उपाय नहीं रह गया था। लॉकडाउन की मजबूरी यह बताती है कि रात के कर्फ्यू बेअसर थे। यह अच्छा हुआ कि इस बार केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर देशव्यापी लॉकडाउन लगाने के बजाय राज्यों पर यह छोड़ दिया कि वे अपने यहां के हालात के हिसाब से फैसला लें। राज्यों को यह ध्यान रहे कि लॉकडाउन में न तो जरूरी सेवाएं बाधित होने पाएं और न ही औद्योगिक उत्पादन थमने पाए। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आवश्यक वस्तुओं के साथ-साथ औद्योगिक उत्पाद एवं कच्चे माल की आवाजाही का तंत्र बिना किसी बाधा के काम करता रहे। यह ठीक नहीं कि महाराष्ट्र और दिल्ली से कामगारों की वापसी होती दिख रही है। इन कामगारों में कारखाना मजदूर भी हैं। जब औद्योगिक प्रतिष्ठान बंद नहीं किए जा रहे तो फिर कारखाना मजदूर क्यों पलायन कर रहे हैं?


यदि लॉकडाउन के कारण उद्योगों का पहिया थमा तो फिर से एक नई समस्या खड़ी हो जाएगी। ऐसे में यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि राज्य सरकारों की ओर से जनता को यह संदेश दिया जाए कि अबकी बार अलग तरह का लॉकडाउन है, जिसमें जरूरी सतर्कता यानी कोविड प्रोटोकॉल के साथ काफी कुछ चलता और खुला रहेगा, जैसे ई-कामर्स डिलीवरी और कुछ पाबंदियों के साथ सार्वजनिक परिवहन। वास्तव में इस आशय का केवल संदेश ही नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि ऐसे जतन भी किए जाने चाहिए कि लॉकडाउन का अर्थव्यवस्था पर न्यूनतम असर हो। लॉकडाउन की अवधि में जिन आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों के लिए अनुमति दी गई है, वहां संक्रमण से बचे रहने की पूरी सावधानी बरती जाए। इसके लिए जितनी कोशिश शासन-प्रशासन को करनी होगी, उतनी ही आम लोगों को भी। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि यदि न चाहते हुए लॉकडाउन लगाना पड़ रहा है तो कोरोना संक्रमण के बेलगाम होने के साथ-साथ कुछ भूलों के कारण भी। जैसे जनवरी-फरवरी के बाद आम जनता ने बेफिक्री दिखाई, वैसे ही उन्हें दिशा देने या उनका नेतृत्व करने वालों ने भी। समझना कठिन है कि संक्रमण की दूसरी लहर की आशंका के बाद भी धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक कार्यक्रम और खासकर रैलियां करने की क्या जरूरत थी? कम से कम अब तो आम लोगों और नीति-नियंताओं को जरूरी सबक सीख ही लेने चाहिए।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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देश की चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था, कई शहरों में ऑक्सीजन की कमी, कोरोना मरीजों को अस्पतालों में भर्ती होने के लाले पड़े (दैनिक जागरण)

हमारा स्वास्थ्य ढांचा देश की जरूरतों के अनुरूप नहीं है। देश में चिकित्सकों स्वास्थ्य कर्मियों एवं अस्पतालों की संख्या आबादी के अनुपात में बहुत कम है। यदि कोरोना संक्रमण की पहली लहर के समय ही सरकारें चेत जातीं तो शायद जो स्थिति बनी उससे बचा जा सकता था।


देश भर में 162 ऑक्सीजन प्लांट लगाने की मंजूरी के बाद अब यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ये प्लांट यथाशीघ्र कार्य करना प्रारंभ कर दें। बेहतर हो कि केंद्र के साथ राज्य सरकारें भी इस पर निगाह रखें कि ये प्लांट समय रहते कार्य शुरू करते हैं या नहीं? यह काम प्राथमिकता के आधार पर इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि देश के विभिन्न शहरों में ऑक्सीजन की कमी वास्तव में महसूस की जा रही है। इसके चलते कोरोना के मरीजों और उनके परिवार वालों में चिंता व्याप्त है। चिंता पैदा करने का काम कोरोना मरीजों के उपचार में उपयोगी इंजेक्शन रेमडेसिविर की अनुपलब्धता भी कर रहा है। यह ठीक है कि फार्मा कंपनियों ने इसके दाम कम कर दिए हैं, लेकिन इसका लाभ तो तब मिलेगा, जब यह इंजेक्शन आसानी से उपलब्ध भी हो। स्पष्ट है कि इस इंजेक्शन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए भी युद्धस्तर पर कार्य करने की जरूरत है। चिकित्सा संसाधन बढ़ाने के उपाय युद्धस्तर पर होने भी चाहिए और होते हुए दिखने भी चाहिए, क्योंकि तभी जनता को यह संदेश जाएगा कि केंद्र एवं राज्य सरकारें अपने सारे मतभेद भुलाकर आम लोगों को राहत देने के काम में जुट गई हैं। यह समय दलगत राजनीति करने अथवा आरोप-प्रत्यारोप लगाने का नहीं, बल्कि संकट का मिलजुलकर मुकाबला करने का है। यह खेद की बात है कि कुछ राजनीतिक दल अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह करने के बजाय सस्ती राजनीति करने का समय निकाल ले रहे हैं। उन्हें अपनी ऊर्जा उन कारणों का निवारण करने में लगानी चाहिए, जिनके चलते मरीजों को अस्पतालों में भर्ती होने के लाले पड़े हैं।


स्वास्थ्य ढांचे के समक्ष आज जो विषम स्थिति है, इसका एक कारण तो कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर का ज्यादा तेज होना है और दूसरा, इस लहर का सामना करने के लिए पूरी तैयारी न किया जाना। आखिर जब कोरोना संक्रमण की पहली लहर के वक्त ही यह स्पष्ट हो गया था कि हमारा स्वास्थ्य ढांचा देश की जरूरतों के अनुरूप नहीं है, तब फिर उसे मजबूत बनाने के प्रयास उसी समय क्यों नहीं शुरू किए गए? इस सवाल का जवाब इसलिए मिलना चाहिए, ताकि कम से कम अब तो किसी स्तर पर ढिलाई न बरती जाए। देश और प्रांत स्तर पर स्वास्थ्य तंत्र पर निगाह रखने वाले हमारे नीति-नियंता इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकते कि अपने देश में चिकित्सकों, स्वास्थ्य कर्मियों एवं अस्पतालों की संख्या आबादी के अनुपात में बहुत कम है। यदि कोरोना संक्रमण की पहली लहर के समय ही केंद्र एवं राज्य सरकारें चेत जातीं तो शायद जो स्थिति बनी, उससे बचा जा सकता था। कम से कम अब तो सही सबक सीखा जाए।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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कोरोना के प्रति लापरवाही से पहले डॉक्टरों तथा नर्सों के बारे में भी सोच लीजिए (पंजाब केसरी)

कोरोना की दूसरी लहर से इस समय सारा देश बेहाल है अगर आपके कोरोना वायरस टैस्ट करवाने की लाइन में 20,000 लोग आपसे आगे हों, अगर टैस्ट की रिपोर्ट 14 घंटों की बजाय कम से कम 2 दिन में आए, इलाज के लिए दवाइयों, आक्सीजन

कोरोना की दूसरी लहर से इस समय सारा देश बेहाल है अगर आपके कोरोना वायरस टैस्ट करवाने की लाइन में 20,000 लोग आपसे आगे हों, अगर टैस्ट की रिपोर्ट 14 घंटों की बजाय कम से कम 2 दिन में आए, इलाज के लिए दवाइयों, आक्सीजन उपकरणों, बैड्स और वैंटीलेटर की भी कमी हो तो निश्चित रूप से दिखाई देने वाली कहानी का एक और पक्ष बेहद गंभीर होगा। संक्रमण के लगातार बढ़ते आंकड़ों के चलते अनेक राज्य किसी न किसी रूप में कफ्र्यू तथा लॉकडाऊन लगाने के लिए मजबूर हो चुके हैं। 

कोरोना से ग्रस्त गम्भीर मरीजों की जान बचाने वाली ‘रेमडेसिविर’ तथा ‘टोसिलीजुमाब’ जैसी दवाइयों की भारी किल्लत के बीच सोशल मीडिया इन्हें उपलब्ध करवाने वालों की मदद की गुहार से भर चुका है। इसके बावजूद लोग कोरोना को लेकर उतने गम्भीर नहीं हैं जितना उन्हें होना चाहिए था। स्थिति की गम्भीरता का पता इसी बात से चल रहा है कि देश के अधिकतर बड़े शहरों की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। 

पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर से निपटने के लिए डाक्टरों तथा चिकित्सा जगत से जुड़े अन्य लोगों की शारीरिक रूप से तैयारी बेहतर होने के बावजूद सबसे अधिक ङ्क्षचता की बात यह है कि दूसरी लहर में डॉक्टरों तथा चिकित्सा जगत से जुड़े अन्य लोगों का भी हाल खराब होने लगा है। 

पहली बार की तरह उनके पास मास्क से लेकर पी.पी.ई. किटों जैसे साजो-सामान की कमी नहीं है। अधिकतर डॉक्टर, नर्सों तथा अन्य मैडीकल स्टाफ को वैक्सीन भी दी जा चुकी है परंतु इस सबके बावजूद एक साल तक कोरोना से लड़ते हुए वे शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुके हैं। गत वर्ष मार्च में जब कोरोना ने भारत में पैर पसारने शुरू किए थे उसके बाद इस वर्ष जनवरी-फरवरी में ही कुछ समय तक उन्हें थोड़ी राहत नसीब हुई जब कोरोना के मामलों की संख्या में काफी कमी आ गई थी परंतु आज की तारीख में दूसरी लहर के चरम की ओर बढऩे के बीच उनसे यह अपेक्षा करना बेमानी होगा कि उनके हौसले भी पहले की तरह मजबूत रहें। 

कोरोना की दूसरी लहर से बुरी तरह प्रभावित भारत की वित्तीय राजधानी मुम्बई के एक अस्पताल के ‘डा. लांसलोट पिंटो’ साल भर से कोरोना मरीजों के इलाज में व्यस्त रहे हैं। जनवरी में जब मामले कुछ कम हुए तो उन्हें लगा कि वह अपने परिवार के साथ अब कुछ चैन का समय गुजार सकेंगे परंतु अप्रैल आते-आते हालात पहले साल से भी बदतर हो गए जब प्रतिदिन कोरोना संक्रमण के मामलों ने देश में पहले 1 लाख और कुछ ही दिन बाद 2 लाख के आंकड़े को पार कर लिया। डा. पिंटो के अनुसार उनकी टीम में से कोई भी इस हालत के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है। वह कहते हैं, ‘‘हम जो भी कर सकते हैं कर रहे हैं परंतु अब हममें पिछले वर्ष जैसी मानसिक शक्ति नहीं है।’’ 

दिल्ली का हाल भी कुछ अच्छा नहीं है। वहां के भी लगभग सभी निजी अस्पताल भर चुके हैं। गुरुग्राम के एक अस्पताल की डा. रेशमा तिवारी बसु के अनुसार दूसरी लहर अप्रत्याशित नहीं है क्योंकि इसके बारे में पहले से अंदेशा था परंतु इस बात से बहुत निराशा है कि लोग भूल चुके हैं कि महामारी अभी खत्म नहीं हुई है। अस्पतालों के बाहर जीवन सामान्य सा प्रतीत होता है रेस्तरां और नाइट क्लब खचाखच भरे हैं, बाजारों में भीड़ है, लम्बी शादियां, अनगिनत चुनावी रैलियों में लोगों की भीड़, कुंभ मेले में लाखों की गिनती में शामिल लोगों को अपने जीवन को खतरे में डालने का अधिकार तो है लेकिन दूसरों को नहीं। डा. यतिन मेहता इस पर क्रोधित हैं। उनके अनुसार भारत ने जनवरी तथा फरवरी में मिले मौके को हाथों से फिसल जाने दिया। उस अवधि को ‘टेस्टिंग’ व ‘ट्रेसिंग’ के साथ-साथ वैक्सीनेशन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए था परंतु ऐसा नहीं किया गया। 

केरल राज्य के एर्नाकुलम मैडीकल कालेज की नर्स विद्या विजयन का कहना है कि अब हम पहली लहर से भी कहीं अधिक खतरनाक दूसरी लहर का सामना कर रहे हैं। वह कहती हैं कि लोगों को याद रखना चाहिए कि हैल्थकेयर वर्कर्स अपनी क्षमता से अधिक थक चुके हैं। अन्य चिकित्सा विशेषज्ञों की तरह उन्हें भी यही लगता है कि पता नहीं इस तरह कब तक वे काम कर सकेंगे परंतु इतना तय है कि दूसरी लहर हैल्थ वर्कर्स से लेकर सम्पूर्ण चिकित्सा व्यवस्था के लिए परीक्षा साबित होगी। उनके अनुसार,‘‘चिकित्सा कर्मियों की मानसिक सेहत पर इस समय किसी का ध्यान नहीं है।

जरा सोच कर देखिए कि जो भी काम आप करते हैं, उसे आपको दिन के 24 घंटे, सप्ताह के सातों दिन, वह भी आम से 100 गुणा अधिक दबाव में करना पड़े तो आपका क्या हाल होगा- जब कोरोना की दूसरी लहर अपने चरम पर होगी तो हर डॉक्टर, नर्स तथा हैल्थकेयर वर्कर का यही हाल होगा।’’ ऐसी सभी बातों को देखते हुए हमें सभी सावधानियां और उपायों को अपनाना होगा क्योंकि कोरोना से पार पाना अभी आसान नहीं। मुझे मशहूर शायर फैज अहमद फैज के शे’र की चंद पंक्तियां याद आ रही हैं : 


अभी चिराग-ए-सरे रह को कुछ खबर ही नहीं
अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई,
नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई,
चले चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आई।

सौजन्य - पंजाब केसरी।
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आज के ‘तनावपूर्ण माहौल में’‘प्रेम और सद्भाव के रौशन चिराग’ (पंजाब केसरी)

जहां एक ओर देश में कोरोना महामारी के बीच भी जाति और धर्म के नाम पर कुछ लोग नफरत फैला कर अपने कृत्यों से देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं वहीं अनेक स्थानों पर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के सदस्य भाईचारे और सद्भाव के अनुकरणीय उदाहरण

जहां एक ओर देश में कोरोना महामारी के बीच भी जाति और धर्म के नाम पर कुछ लोग नफरत फैला कर अपने कृत्यों से देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं वहीं अनेक स्थानों पर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के सदस्य भाईचारे और सद्भाव के अनुकरणीय उदाहरण भी पेश कर रहे हैं : 

* 15 जनवरी को राजस्थान के ‘प्रतापगढ़’ में एक मस्जिद के उद्घाटन के अवसर पर हिन्दू और मुस्लिम धर्मगुरुओं को आमंत्रित करके स्टेज पर बिठाया गया। सभी धर्मों की शिक्षाओं के बारे में प्रवचन दिए गए और भारत माता की जय के नारे लगाए गए। 
* 19 मार्च को गाजियाबाद में एक गरीब मुसलमान बच्चे की पिटाई का वीडियो वायरल होने के बाद उसकी सहायता के लिए सोशल मीडिया पर अपील की गई तो बड़ी संख्या में लोगों ने पैसे भेजे। सबसे ज्यादा रकम देने वाले दानी सज्जन हिन्दू थे।

* 22 मार्च को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के ‘बारा’ गांव के रहने वाले शेर अली नामक मुस्लिम व्यक्ति ने एक अनाथ हिन्दू युवक पप्पू का विवाह एक हिन्दू युवती से करवाया। चार वर्ष की आयु में अनाथ हो गए पप्पू को शेर अली ने गोद लेकर पाला था जो अब 20 वर्ष का हो गया है। 
शेर अली ने खुद उसके सिर पर सेहरा बांधा, धूमधाम से बारात निकाली, बैंड-बाजा बजवाया और हिन्दू रीति से उसकी शादी करवाने के अलावा गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर आगे का जीवन बिताने के लिए एक मकान भी बनवाकर दिया।
* 23 मार्च को बिहार के ‘आरा’ में वेद प्रकाश नामक अध्यापक ने प्रसव पीड़ा से जूझ रही मुस्लिम महिला को खून की जरूरत का पता चलने पर फौरन अस्पताल पहुंच कर खून देकर उसकी जान बचाई। 
* 03 अप्रैल को मध्य प्रदेश में ‘विदिशा’ जिले के ‘शेरपुर’ गांव में जब कुछ मुसलमान किसान मस्जिद में नमाज पढ़ रहे थे, तभी नफीस खान नामक एक किसान के खेत से शुरू होकर आग तेज हवा के चलते आसपास के खेतों में फैलने लगी जहां गेहूं की पकी फसल की कटाई चल रही थी। इसका पता चलने पर राहुल केवट के नेतृत्व में हिंदू युवकों का एक समूह आगे आया और जान जोखिम में डाल कर आग को फैलने से रोक कर लगभग 300 बीघा क्षेत्र में खड़ी गेहूं की फसल को जलने से बचाया। 

* 07 अप्रैल को मध्य प्रदेश के गुना जिले के ‘मृगवास’ कस्बे में रहने वाले युसूफ खान के बेटे इरफान की शादी थी। इस अवसर के लिए छपवाए निमंत्रण पत्र पर उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल पेश की।
उन्होंने कार्ड के एक ओर ‘श्रीगणेशाय नम:’ के साथ भगवान गणेश का चित्र छपवा कर इसके नीचे लिखा ‘‘ईश्वर अल्ला के नाम से हर काम का आगाज करता हूं, उन्हीं पर है भरोसा उन्हीं पर नाज करता हूं।’’ निमंत्रण पत्र के दूसरी ओर उन्होंने मुसलमानों का शुभ सूचक अंक ‘786’ अंकित किया। 
* 11 अप्रैल को केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने सबरीमाला मंदिर में पहुंच कर भगवान अयप्पा के दर्शन किए। 
* 12 अप्रैल को बिहार के दरभंगा जिले में एक कलियुगी बेटे ने अपने पिता की कोरोना वायरस से मौत के बाद उसका शव लेने से इंकार कर दिया तो मुस्लिम भाइयों ने हिन्दू रीति से उसका अंतिम संस्कार करवाया। 
* साम्प्रदायिक सौहार्द की एक अन्य मिसाल कानपुर की डा. माहे तलत सिद्दीकी नामक एक मुस्लिम अध्यापिका ने ‘राम चरित मानस’ की चौपाइयों का उर्दू में अनुवाद करके पेश की है। 

* 14 अप्रैल को राजस्थान में उदयपुर के रहने वाले अकील मंसूर नामक युवक ने गंभीर रूप से बीमार निर्मला और अलका नामक 2 कोरोना पीड़ित महिलाओं की जान बचाने के लिए रमजान के महीने में रोजा तोड़ कर अपना प्लाज्मा उन्हें डोनेट किया जिससे दोनों महिलाओं की जान बच गई।
* 16 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के कारण जी.एम.सी. जम्मू के आई.सी.यू. में उपचाराधीन दीपक कुमार नामक युवक के इलाज के लिए डोडा जिले के मुसलमान भाईचारे के सदस्यों ने जुम्मे की नमाज के बाद चंदा एकत्रित किया। 

उक्त उदाहरणों से स्पष्टï है कि भले ही कुछ लोग जाति, धर्म के नाम पर समाज में घृणा फैलाते हों पर इसी समाज में ऐसे लोग भी हैं जिनकी बदौलत देश और समाज में परस्पर प्रेमपूर्वक मिल-जुल कर रहने की भावना जिंदा है। जब तक भाईचारे और सद्भाव के ये बंधन कायम रहेंगे, हमारे देश की ओर कोई टेढ़ी आंख से देखने का साहस नहीं कर सकता।—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।
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वृद्धि में बाधा (प्रभात खबर)

कोरोना महामारी की दूसरी लहर भयावह विभीषिका में बदल रही है. इसे नियंत्रित करने के लिए जरूरी पाबंदियां लगायी जा रही हैं. हालांकि पिछले साल की तरह व्यापक लॉकडाउन नहीं लगाया गया है, लेकिन रात व सप्ताहांत के कर्फ्यू, सीमित आवाजाही और कई तरह के कारोबारों पर अस्थायी रोक से आर्थिक गतिविधियों में संकुचन आ रहा है. अनेक जगहों पर कुछ दिनों के लिए लॉकडाउन भी लगाया जा रहा है.



कोरोना वायरस के तेज संक्रमण को देखते हुए यह कह पाना मुश्किल है कि स्थिति कब तक सामान्य होगी. पिछले साल के आखिरी महीनों में पाबंदियों के हटाने के साथ ही कारोबार और कामकाज बहुत हद तक पहले की तरह होने लगे थे. उस वजह से बीते वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों में ऋणात्मक हो चुके वृद्धि दर को बढ़ाया जा सका था. उस बढ़त के आधार पर यह अनुमान लगाया गया था कि चालू वित्त वर्ष में विकास दर दो अंकों में रहेगी और अगले वित्त वर्ष में यह दर 2019-20 के स्तर पर आ जायेगी.



लेकिन महामारी की दूसरी लहर से उस उम्मीद पर पानी फिर सकता है. अब विश्व बैंक का आकलन है कि 2021-22 के वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7.5 से लेकर 12.5 प्रतिशत के दायरे में रह सकती है. इससे स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था को लेकर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गयी है. इस दायरे में आंकड़ा क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम कितनी जल्दी महामारी पर काबू करेंगे क्योंकि सभी अनुमानों का आधार यह भरोसा था कि देश को दूसरी लहर का सामना नहीं करना पड़ेगा.


मांग और उत्पादन घटने के कारण बेरोजगारी दर भी बढ़ने लगी है. ऐसे में एक बड़ी उम्मीद मॉनसून से है, जिसके इस साल सामान्य रहने की आशा है और सूखे की कोई आशंका दूर-दूर तक नहीं है. अच्छी बारिश से फसलों की बुवाई अधिक होगी, जिससे ग्रामीण आमदनी में बढ़ोतरी होगी. समुचित उपज से खाद्य मुद्रास्फीति को भी नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी. उल्लेखनीय है कि पिछले साल लॉकडाउन में और बाद में बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों के निर्यात से अर्थव्यवस्था को बहुत सहारा मिला था.


अनाज के भरे भंडारों की वजह से करोड़ों गरीब परिवारों को मुफ्त या सस्ता राशन मुहैया कराया जा सका था. पिछले साल अनेक चरणों में केंद्र सरकार द्वारा घोषित वित्तीय राहत, छूट, कल्याण कार्यक्रमों आदि से भी आर्थिकी को मदद मिली थी. यह भी ध्यान रखना होगा कि कृषि क्षेत्र से अपेक्षाओं पर खाद्य पदार्थों के वैश्विक मूल्यों का भी असर होगा तथा सरकारी व्यय की भी इसमें बड़ी भूमिका होगी. यही कारण है कि कृषि समेत विभिन्न क्षेत्रों को सरकारी मदद उपलब्ध कराने की मांग उठने लगी है. मौजूदा स्थिति में कुछ बजट प्रावधानों को फौरी तौर पर लागू करने की जरूरत पड़ सकती है. फिलहाल हमारा पूरा जोर बचाव के उपायों और टीकाकरण बढ़ाने पर होना चाहिए.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी (प्रभात खबर)

By सुशांत सरीन 

 

अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी का अनुमान तो बहुत समय से था, लेकिन बाइडेन प्रशासन के आने के बाद से यह लगभग स्पष्ट हो गया था कि सेना अधिक देर तक नहीं रहेगी. यह निर्णय बहुत सोच-समझ कर लिया गया है कि अफगानिस्तान से निकल जाना बेहतर है क्योंकि वहां रहने का उनका उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा था. उनके सामने यह बिल्कुल साफ था कि कुछ साल और रुकने से अफगानिस्तान की आंतरिक लड़ाई का कोई और नतीजा नहीं निकलेगा.



अगर कोई नतीजा निकालना होता, तो वह दस साल पहले ही सामने आ जाता. अब अमेरिका की कोशिश यही रहेगी कि कोई भी छोटा-मोटा, ऐसा-वैसा राजनीतिक समझौता हो जाए और उसके बाद वह निकल जायेगा. अगर कोई समझौता नहीं होता है, तो वे अगले कुछ सालों तक अफगानिस्तान सरकार की कुछ मदद करते रहेंगे, कुछ सैन्य और आर्थिक सहायता देते रहेंगे. ऐसा ही रुख अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों का होगा. यदि अफगानिस्तान में लड़ाई जारी रहती है, तो अमेरिका का उससे कोई सरोकार नहीं होगा.



बहरहाल, अमेरिका तो अफगानिस्तान से निकल जायेगा, लेकिन इस इलाके के देशों के लिए मामला उलझ सकता है. अगर वहां अस्थिरता बरकरार रहती है, उसका असर हमारे देश पर भी जरूर होगा. यह असर सीधे तौर पर नहीं होगा क्योंकि अफगानिस्तान से हमारी सीमा नहीं लगती है. हमारे ऊपर जो भी असर होगा, वह पाकिस्तान के जरिये ही होगा, चाहे वह नशीले पदार्थों की तस्करी हो, आतंकी गुट हों या अवैध रूप से हथियारों को भेजना हो. पाकिस्तान को अफगानिस्तान के रूप में ऐसी जगह फिर मिल जायेगी, जहां वह अपने लोगों को रख सकता है, उन्हें संरक्षण दे सकता है और खुद अपने हाथ पाक-साफ दिखा सकता है.


उस दौर के असर पंजाब पर पड़े, जो दुबारा अब फिर नजर आने लगे हैं. कश्मीर प्रभावित हुआ. एक असर यह इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवाद की बढ़त के रूप में हुआ. इससे पूरी दुनिया प्रभावित हुई. इसकी जड़ें तो अफगानिस्तान में ही हैं. आज भी भारत समेत समूची दुनिया कट्टरपंथ और आतंकवाद की लहर की चपेट में है. वह लहर थमी नहीं है.अगर अफगानिस्तान में निकट भविष्य में तालिबान सत्ता पर काबिज होता है, तो हमें ऐसी कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि स्थितियां बेहतर होंगी.


यदि इस बात में सच्चाई है कि तालिबान पाकिस्तान के पिछलग्गू है और उसका एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के इशारों पर काम करता है, तो यह मानना बेवकूफी होगी कि वह पाकिस्तान की नीति और नीयत के खिलाफ कुछ करेगा और भारत से सहयोग बढ़ाने की कोशिश करेगा. जहां तक भारत की बात है, तो आगे के बारे में अभी कहना मुश्किल है.


भारत का रवैया अभी तक यही रहा है कि हम अफगानिस्तान के लोगों के साथ हैं और हमारी जो परियोजनाएं हैं, वे देश की भलाई के लिए हैं. हमारी सभी परियोजनाएं अफगानियों की जरूरत और उनकी मांग के अनुसार हैं. अन्य देश अभी तक खुद फैसला करते रहे हैं कि अफगानिस्तान के लिए क्या अच्छा है, क्या नहीं. भारत के इसी रवैये को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने हालिया बयान में दुहराया है. जहां तक विदेश मंत्री के संयुक्त अरब अमीरात में पाकिस्तानी प्रतिनिधियों से मिलने या संवाद करने का सवाल है, तो इस बारे में अटकलें लगायी जा रही हैं.


कूटनीतिक परिदृश्य में अक्सर ऐसा होता है कि कोई देश दो देशों के बीच संदेश के आदान-प्रदान या बातचीत का माहौल बनाने में सहयोगी की भूमिका निभाता है. संयुक्त अरब अमीरात अधिक-से-अधिक यही योगदान कर सकता है. लेकिन उनके एक राजनयिक की टिप्पणी से यह भ्रम फैला है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संयुक्त अरब अमीरात मध्यस्थता कर सकता है. भारत की नीति स्पष्ट रही है कि कश्मीर या किसी अन्य मसले पर पाकिस्तान से बातचीत द्विपक्षीय होगी, उसमें किसी देश की मध्यस्थता का सवाल ही पैदा नहीं होता.


यदि संयुक्त अरब अमीरात को मध्यस्थता का मौका दिया जाता है, तो यह इस नीति का घोर उल्लंघन होगा. मुझे नहीं लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार किसी भी हाल में ऐसा कोई भी कदम उठायेगी. अधिक-से-अधिक यह हो सकता है कि संयुक्त अरब अमीरात दोनों देशों को एक मेज पर बैठाने में योगदान करे.


दशकों से जारी युद्ध और आतंक से तबाह अफगानिस्तान का पुनर्निर्माण संभव है, लेकिन अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद की परिस्थितियों के बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी कह पाना संभव नहीं है. हमें कथित शांति प्रक्रिया और संभावित समझौते से भी अधिक उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. निकट भविष्य में अफगानिस्तान में चीन की भूमिका भी हो सकती है, संभवत: होगी भी. अभी एक खबर आयी है कि चीन अपने सैनिकों को वहां भेज सकता है, जो शांति सैनिक होंगे. पर इस खबर पर भी पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता है. यह भी देखना होगा कि चीनी सैनिकों को लेकर तालिबान का क्या रवैया होगा.

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इस कठिन दौर से भी जल्द उबरेंगे (प्रभात खबर)

By आशुतोष चतुर्वेदी 

 

हम सब के लिए यह कठिनतम दौर है. हम जिंदगी के ऐसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी. हालात बेहद चिंताजनक हैं. कुछ राज्यों में चिंता विशेष रूप से ज्यादा है, लेकिन कोई भी राज्य संतुष्ट होकर नहीं बैठ सकता है. वायरस बहुत सक्रिय है और इसने पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. जब हम सोच रहे थे कि हमने वायरस को नियंत्रित करने के तरीके ढूंढ लिए हैं, तो यह वापस आ गया है.


इस दौर में यदि आप किसी अस्पताल में जाएं, तो वहां की स्थिति आपको हिला देगी. अस्पतालों में बिस्तर, वेंटिलेटर और रेमडेसिविर जैसी जीवनरक्षक दवाओं की कमी है. भर्ती होने के लिए मरीजों की लंबी कतार है. हमारे डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी हर मरीज की जान बचाने की हरसंभव कोशिश करते नजर आ रहे हैं. यह सही है कि ऐसे हालात थोड़े समय तक ही रहने वाले हैं और जल्द इस पर काबू पा लिया जाएगा.



लेकिन मन खट्टा हो जाता है जब इस तरह की खबरें सामने आती हैं कि आपदा की इस घड़ी में ऑक्सीजन सिलिंडर गायब हैं और मुनाफा कमाने के लिए उसकी कीमत बढ़ा दी गयी है. इसी तरह कोरोना संक्रमण में रेमडेसिविर इंजेक्शन बहुत कारगर साबित हो रहा है. उसकी उपलब्धता पर संकट है और खबरें हैं कि इसकी कालाबाजारी हो रही हैं. यह हम सबके लिये बेहद कठिन दौर है और सभ्य समाज से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जाती है.


ऐसी उम्मीद थी कि संकट की इस घड़ी में हम कंधे से कंधा मिलाकर एक दूसरे के काम आयेंगे. इसमें दो राय नहीं है कि कोरोना जाएगा लेकिन जाते-जाते हमारे जीवन में अनेक घाव छोड़ जाएगा. हमारे अनेक करीबी जिंदगी के इस सफर में हमारे साथ नहीं होंगे. लेकिन चंद लोगों के इस व्यवहार ने स्पष्ट कर दिया है कि सभ्य व चेतन समाज रूप में हमारी यात्रा अभी अधूरी है.


कोरोना ने पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में भी तेजी से अपने पांव पसारे हैं. इस शनिवार को तो काले दिन के रूप में याद किया जाएगा. इस दिन भारत में कोरोना वायरस के एक दिन में सबसे अधिक मामले ढाई लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए. शनिवार को एक ही दिन में लगभग 1500 लोगों को हमने खो दिया. हालात की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई शहरों से श्मशान घाटों पर अंतिम संस्कार के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा था.


इसके पहले देश में एक दिन में सबसे ज्यादा मौतें 15 सितंबर, 2020 को दर्ज की गयीं थीं. उस दिन 1284 लोगों को कोरोना के कारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. पिछली बार कोरोना मरीजों की संख्या किसी भी दिन दो लाख को पार नहीं कर पाई थी. इस बार कोरोना की रफ्तार और मारक क्षमता दोनों दोगुनी है.


जानी-मानी विज्ञान पत्रिका लांसेट जर्नल में प्रकाशित हुए एक अध्ययन में कहा गया है कि देश में जल्द ही देश में हर दिन औसतन 1750 मरीजों की मौत हो सकती है. यह संख्या बढ़कर जून के पहले सप्ताह में दो हजार से अधिक तक पहुंचने की आशंका है. रिपोर्ट के अनुसार इस बार कोरोना की मार देश के मझोले और छोटे शहरों पर अधिक है. रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरी लहर पहली लहर से ज्यादा खतरनाक है. इस दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है. रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि देश में टीकाकरण की रफ्तार तेज करने की जरूरत है और सभी वयस्क लोगों को जल्द से जल्द टीका लगाया जाना चाहिए.


रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन जैसे कड़े कदम नुकसानदायक साबित हो सकते हैं और इनसे बचा जाना चाहिए. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार भी कोरोना के लगभग 80 प्रतिशत मामले 10 राज्यों से हैं जिनमें महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल शामिल हैं.


महाराष्ट्र में 15 दिनों के लिए सभी जिलों में लॉकडाउन है. छत्तीसगढ़ में 20 जिलों और मध्य प्रदेश में 15 जिलों में लॉकडाउन है. दिल्ली, चंडीगढ़, राजस्थान और ओडिशा में 10 जिलों के शहरी क्षेत्रों में वीकेंड कर्फ्यू है. उत्तर प्रदेश ने रविवार को राज्यव्यापी कर्फ्यू है. कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, जम्मू और कश्मीर और ओडिशा में रात का कर्फ्यू लगाया गया है.


राहत की बात जरूर है कि हमारे देश में लोग तेजी से स्वस्थ भी हो रहे हैं. कई अन्य देशों की तुलना में स्वस्थ होने की दर भारत में बेहतर है. लेकिन यह बात सभी को स्पष्ट होनी चाहिए कि यह लड़ाई लंबी चलनी है. इस मामले में जरा सी भी लापरवाही न केवल आपको बल्कि आपके परिवार और पूरे समाज को संकट में डाल सकती है.

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उच्च शिक्षा : विश्वविद्यालय सिखाएं ही नहीं, खुद सीखें भी (पत्रिका)

संजय शर्मा, सहायक प्रोफेसर, डॉ. हरीसिंह गौर, केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर

दुनिया में विश्वविद्यालयों की स्थापना का इतिहास इस बात को दिखाता है कि इन्हें एक विशिष्ट उद्देश्य के तहत स्थापित किया गया। विश्वविद्यालय भौगोलिक सीमाओं और धार्मिक विश्वासों से परे सम्पूर्ण मानवता का पथ-प्रदर्शन करने की भूमिका निभाते हैं। इन ज्ञान केन्द्रों को स्थापित करने का एक अनिवार्य उद्देश्य यह भी होता है कि यह सीखने-सिखाने की परम्पराओं और गतिविधियों को समृद्ध करेंगे। सिखाने के अपने उद्देश्यों में वे आमतौर पर अधिक सक्रिय होते हैं, किन्तु सीखने की संचेतना और प्रक्रिया के संदर्भ में भारतीय विश्वविद्यालय न तो सक्रिय दिखाई पड़ते हैं और न ही इनके भीतर इस तरह की कोई पहल दिखाई पड़ती है। अधिकतर भारतीय विश्वविद्यालयों ने अपने ऐतिहासिक स्थापना के समय से ही दूसरे विश्वविद्यालयों से सीखने को कभी महत्त्व नहीं दिया, जिसका असर यह हुआ कि आज ये विश्वविद्यालय वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान के संकट से जूझ रहे हैं।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की बात करें, तो हम यह पाते हंै कि पिछले नौ सौ वर्षों में इस संस्थान ने स्वयं को आत्मनिर्भर बनाते हुए एक शैक्षिक नेतृत्वकर्ता के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग (2021) के अनुसार यह संस्थान पिछले पांच वर्षों से दुनिया का सिरमौर बना हुआ है । ब्रिटेन की आर्थिक उन्नति के संदर्भ में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की बात करें तो यह विश्वविद्यालय प्रतिवर्ष स्थानीय अर्थव्यवस्था में 2.3 बिलियन पाउंड का योगदान देता है। यहां के लगभग 91 प्रतिशत विद्यार्थी स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करने के छह माह के भीतर ही रोजगार से जुड़ जाते हैं। वैश्विक स्तर पर इस विश्वविद्यालय की पहचान के पीछे विश्वविद्यालय से सम्बद्ध अनुषंगी महाविद्यालयों, शोध केंद्रों आदि में अकादमिक, शोध कार्यों तथा उनके समाज-उपयोगी व्यावहारिक अनुभवों से समय-समय पर स्वयं को परिमार्जित करते रहने की सोच है।

यहां यह बात गौरतलब है कि भारत में विश्वविद्यालय एक दूसरे से आपस में सीखते हों, इसका कोई दस्तावेजी और आनुभविक साक्ष्य नहीं मिलता है। यही कारण है कि हमारे यहां बाकी उन्नत राष्ट्रों की तुलना में विरासतीय परम्परा के ऐसे ज्ञान केन्द्रों का अभाव है, जिन्हें आदर्श मान कर कोई संस्थागत मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सके। आश्चर्यजनक रूप से आज भी भारत के अधिकतर विश्वविद्यालय अपने एकाकी चरित्र को ही जी रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे विश्वविद्यालयों में दूसरे श्रेष्ठ संस्थाओं से जुड़ कर परस्पर सीखने की संरचनाओं, प्रक्रियाओं एवं अवसरों को महत्त्व नहीं दिया जाता है। अधिकतर विश्वविद्यालयों के पास स्व-मूल्यांकन की कोई व्यवस्थित, ज्ञानात्मक एवं संरचनात्मक दृष्टि नहीं है, ताकि वेे अपने उत्तरोत्तर विकास के लक्ष्य को सदैव अपने सामने रख सकें। देश में कुछ ऐसे भी विश्वविद्यालय हैं, जिनके पास अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केन्द्रों में पढ़े शिक्षक मौजूद हैं, किन्तु संस्थानों में मौजूद संरचनात्मक जड़ता, बौद्धिक पदानुक्रम एवं सीखने की संस्कृति के अभाव के कारण उनका रचनात्मक उपयोग संभव नहीं हो पा रहा है। इस संदर्भ में विश्वविद्यालयों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे एक दूसरे से सीखते हुए स्वयं को समृद्ध, नवाचारी और जीवंत बनाए रखें।

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नेपाली कांग्रेस की सरकार बनाने की पहल शुभ संकेत (पत्रिका)

के.एस. तोमर, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक

नेपाल भगवान पशुपतिनाथ की भूमि है। मानवमात्र के लिए वह कल्याणकारी, परम दयालु और शांति प्रदानकर्ता हैं, पर राजनीतिक उथल-पुथल ने इस आध्यात्मिक देश के लोगों को निराशा की ओर धकेल दिया है। वह भी ऐसे वक्त, जब महामारी हर गुजरते दिन के साथ भयावह रूप लेती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2018 में पशुपतिनाथ मंदिर और मुक्तिनाथ मंदिर जाकर पूजा-अर्चना कर दोनों देशों के लोगों के जीवन में शांति, प्रगति और समृद्धि की कामना की थी। उनका विश्वास था कि दोनों देशों के सदियों पुराने संबंध और मजबूत होंगे, पर भारत को तब झटका लगा जब कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली वहां की सरकार ने चीन समर्थक कट्टर नीति अपना ली। कम्युनिस्ट सरकार के प्रधानमंत्री के.पी. ओली ने नया नक्शा खींचते हुए दोनों देशों के संबंधों को खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

उधर, ओली ने अवैध रूप से पिछले वर्ष 20 दिसम्बर को संसद भंग कर दी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी 2021 को अंसंवैधानिक करार देते हुए उन्हें 7 मार्च को संसद में बहुमत साबित करने का आदेश दिया। हालांकि, शीर्ष कोर्ट के एक अन्य आदेश, जिसमें सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के धड़ों के एकीकरण को रद्द कर दिया गया था, के कारण बहुमत साबित करना स्थगित कर दिया गया।

इस फैसले से सत्तारूढ़ एनसीपी को एक और झटका लगा। दरअसल, आम चुनाव से पहले ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन-यूएमएल और पुष्प कमल दहल प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) ने चुनावी गठबंधन किया था। ओली फरवरी 2018 में माओवादी सेंटर के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए। दोनों दलों ने मई 2018 में अपने विलय की घोषणा करते हुए नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी नाम से नया दल बनाया। कोर्ट ने आदेश दिया था कि दोनों धड़ों को अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए चुनाव आयोग में जाना चाहिए। इसका मतलब है कि 275 सदस्यों वाली संसद में ओली के पास 121 और दहल के पास 53 सांसद रह जाएंगे। इस अस्थिर परिदृश्य में मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने कम्युनिस्ट पार्टी (दहल के नेतृत्व वाली माओवादी सेंटर) और समाजबादी पार्टी की मदद से वैकल्पिक सरकार बनाने
का फैसला किया है, जिसके लिए बहुमत के जादुई आंकड़े 135 तक पहुंचना मुश्किल नहीं होगा। इससे नेपाली लोगों में आशा का किरण प्रतिबिंबित हुई है।

नेपाली कांग्रेस की यह पहल कामयाब होती है, तो यह भारत के लिए शुभ संकेत होगा। ठीक इसी तरह समाजबादी पार्टी के भी संबंध भारत के साथ मधुर हैं। इसी ने 2015 में मधेशियों के संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए अपनी सरकार को बाध्य किया था। विश्लेषकों का मानना है कि प्रचंड गुट, ओली सरकार से समर्थन वापस लेगा और नेपाली कांग्रेस से हाथ मिला लेगा। उधर, एक ओर चीन ओली को बचाने के लिए खुले रूप से अपने राजदूत होउ यांकी के जरिए नेपाल के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है, तो दूसरी तरफ प्रचंड की सिफारिश पर उन्हीं के दल के सदस्य चार मंत्रियों के पार्टी में न लौटने पर संसद सदस्यता खत्म कर दी गई थी। हालांकि ये सदस्य अगले छह माह के लिए मंत्री पद पर बने रहेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब भी तीनों दल साझा न्यूनतम कार्यक्रम का प्रयास करेंगे, ओली को इस्तीफा देना पड़ जाएगा। तब गेंद राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी के पाले में आ जाएगी, जो सांसदों की संख्या के मद्देनजर वैकल्पिक सरकार की संभावनाएं तलाशेंगी।

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वियना वार्ता के बहाने शक्ति संतुलन का नया ताना-बाना (पत्रिका)

सुरेश यादव, (अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)

नतांज परमाणु केन्द्र पर हमले के बाद ईरान ने इस संयंत्र में यूरेनियम का साठ फीसदी तक संवर्धन शुरू कर दिया है। ईरान के इस फैसले ने यह प्रमाणित कर दिया कि दुनिया में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। वियना में विश्व शक्तियां अमरीका की ईरान न्यूक्लियर डील में वापसी के लिए प्रयासरत हैं, पर अमरीकी प्रतिबंधों की मार झेल रहे ईरान के साठ फीसदी संवर्धन के फैसले ने साझा प्रयासों के अर्थ को कम किया है।

विगत एक दशक से रेडियोधर्मी पदार्थ यूरेनियम के दुरुपयोग के लिए चर्चा में रहे ईरान ने 10 अप्रैल को अपने राष्ट्रीय परमाणु तकनीक दिवस के अवसर पर नतांज स्थित भूमिगत परमाणु संयंत्र में स्थापित अत्याधुनिक 164 आइआर-6 व 30 आइआर-5 सेंट्रीफ्यूज मशीनों के उद्घाटन समारोह की नुमाइश कर अपने इरादे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष स्पष्ट कर दिए थे। इसके अगले ही दिन पावर ग्रिड में आई खामी के कारण संयंत्र को ब्लैकआउट का सामना करना पड़ा और आइआर-1 सेंट्रीफ्यूज मशीनें क्षतिग्रस्त हो गईं। ईरान ने इस घटना को नाभिकीय आतंकवाद करार दिया और अपने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी इजरायल को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया।

बेशक इजरायल ने अब तक इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली, पर अमरीकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन से मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया कि परमाणु समझौते को रोकने के लिए उनके बस में जो भी होगा वह करेंगे। बीते वर्ष जुलाई में इसी संयंत्र में विस्फोट से आगजनी, स्टक्सनेट साइबर हमला और शीर्ष परमाणु वैज्ञानिकों की हत्याओं में इजरायल की कथित संलिप्तता के चलते इस ताजा साइबर हमले को लेकर भी इजरायली इंटेलीजेंस एजेंसी मोसाद पर उंगली उठना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

परमाणु शक्ति बनने का ख्वाब देख रहा ईरान अपने महत्त्वपूर्ण परमाणु संवर्धन केन्द्र नतांज की सुरक्षा करने में विफल रहा है। घटना के बाद आइएईए के निरीक्षक दल ने नतांज का दौरा किया और बताया कि ईरान ने यूरेनियम के संवर्धन को साठ फीसदी तक करने की तैयारी लगभग पूरी कर ली है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि परमाणु कार्यक्रम की तैयारी के मुताबिक ईरान एक वर्ष मे ही 'वेपन ग्रेड' का शुद्ध यूरेनियम एकत्रित कर सकता है। ईरान की इस तरह की तैयारी ने षड्यंत्र की उन संभावनाओं को जन्म दे दिया है जिसमें हमले की आड़ में अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते की सभी शर्तों-मर्यादाओं को बेझिझक तोड़ा जा सके। ईरानी राष्ट्रपति ने भी घटना के महज तीन दिन बाद ही तेजी से संवर्धन शुरू करने के फैसले को इजरायल की 'दुष्टता' का जवाब करार दिया।

भले ही पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के परमाणु समझौते से मई 2018 में बाहर होने और ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने से ईरानी अर्थव्यवस्था मुश्किल में आ गई है, पर ईरान को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर चीन के रूप में एक बेहतरीन विकल्प मिल गया है। ईरान ने चीन के साथ पिछले माह तेहरान में 400 बिलियन डॉलर की 25 वर्षीय 'कॉम्प्रिहेन्सिव स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप' कर मध्य-पूर्व में पश्चिमी गुट को चिंता में डाल दिया है।

बहरहाल, जो बाइडन को ईरानी विदेश मंत्री जावेद जरीफ की 'नो आल्टरनेटिव, नो मच टाइम' की थ्योरी पर समय रहते विचार करना चाहिए। ईरान के इरादे बताते हैं कि वह जल्द नई परमाणु शक्ति बनकर उभरेगा, तो उसे इजरायल की चुनौती का भी सामना करना होगा। इस बीच जिस तरह रूस ने खुलकर ईरान का समर्थन किया है, जाहिर है कि चीन-ईरान-रूस का त्रिकोण क्षेत्र में संतुलन का नया अध्याय लिखेगा।

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बीस साल लम्बी जंग के बाद भी खतरे बरकरार (पत्रिका)

बीस साल लम्बे महायुद्ध के बाद अफगानिस्तान से अमरीका और मित्र देशों की फौज की वापसी का ऐलान हो गया है। फौज हटाने की अटकलें कई साल से चल रही थीं। बाइडन प्रशासन इसे जमीनी हकीकत में तब्दील कर रहा है। ऐलान के मुताबिक फौज की वापसी 1 मई से शुरू होगी। यह प्रक्रिया 9/11 की बीसवीं बरसी यानी 11 सितम्बर तक पूरी हो जाएगी। बीस साल पहले अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने 'दहशतगर्दी के खिलाफ जंग' का ऐलान करते हुए अपनी फौज अफगानिस्तान भेजी थी, तब अमरीका ने भी शायद कल्पना नहीं की होगी कि यह जंग इतनी लम्बी चलेगी। उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

तालिबान के सर्वोच्च कमांडर मुल्ला उमर का यह कथन काफी हद तक सही साबित हुआ कि 'दुनियाभर की घडिय़ां अमरीकियों के पास हैं, लेकिन वक्त हमारे साथ है।' तालिबान के खिलाफ इस जंग में अमरीका को अपने 2,400 फौजी गंवाने पड़े। अब तक वह 150 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर चुका है। अब जबकि फौज की वापसी पर फैसला हो चुका है, अमरीका के पास गिनाने के लिए कई उपलब्धियां हैं। यह कि ओसामा बिन लादेन मारा गया, सामूहिक रक्षा जिम्मेदारियों के लिए नाटो देशों को एकजुट किया, पाकिस्तान को तटस्थ रहना सिखाया, आतंकी नेटवर्क को तहस-नहस किया, सऊदी अरब और तालिबान के रिश्तों के तार काटे आदि।

इन तथाकथित उपलब्धियों से इतर गौर किया जाए, तो अफगानिस्तान में हालात बद से बदतर हुए हैं। इस देश में सभ्यता सदियों से अवनति की ओर लुढ़कने को अभिशप्त है। उन्नीसवीं सदी में वहां रूस और ब्रिटेन ने 'बड़ा खेल' खेला। फिर 1979 में सोवियत फौज ने काबुल में दाखिल होकर खून-खराबा मचाया। तभी से अफगानिस्तान जंग के मैदान में तब्दील होने लगा था। रही-सही कसर मध्ययुगीन कल्पना लोक में जीने वाले तालिबान ने पूरी कर दी, जिसने अफीम और सूखे मेवे उगलने वाली जमीन पर उन्मादी जिहादियों की प्रयोगशालाएं खड़ी कर दी। बीस साल लम्बे महायुद्ध के बावजूद इन प्रयोगशालाओं का पूरी तरह सफाया नहीं हुआ है। भारत समेत दूसरे दक्षिण एशियाई देशों की चिंता का यह सबसे बड़ा सबब है।

अमरीकी फौज जब तक अफगानिस्तान में थी, तालिबान गुफाओं में दुबका हुआ था। फौज हटने के बाद उसके फिर सक्रिय होने का खतरा मंडरा रहा है। भारत के लिए इस लिहाज से यह बड़ा खतरा है कि तालिबान उसके खिलाफ जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा सरीखे आतंकी संगठनों की मदद करता रहा है। भारतीय संसद पर हमला करने वाले जैश के आतंकियों ने तालिबान से प्रशिक्षण हासिल किया था। तालिबान को हद में रखने के लिए भारत को पड़ोसी देशों के साथ मिलकर कूटनीतिक अभियान शुरू कर देना चाहिए। अफगानिस्तान में राजनीतिक स्थिरता और शांति बहाली के लिए भी भारत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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आधी आबादी: वैचारिक शक्ति के मामले में पुरुषों से कमजोर नहीं हैं महिलाएं (पत्रिका)

ज्योति सिडाना, समाजशास्त्री

प्रसिद्ध नारीवादी वर्जिनिया वुल्फ ने अपनी एक चर्चित पुस्तक में लिखा था कि महिला का अपना खुद का कमरा/ स्पेस होना चाहिए, जहां वह स्वयं को इतना स्वतंत्र अनुभव करे कि वह खुद को काल्पनिक एवं गैर-काल्पनिक (फिक्शन एवं नॉन-फिक्शन) दोनों रूपों में देख सके। जिस तरह काल्पनिक लेखन करते समय हम स्वतंत्र होकर जो मन में आता है वह लिखते हैं और अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हैं, ठीक उसी प्रकार निजी स्पेस में महिला को बिना किसी भय के हर स्तर की उड़ान भरने की स्वतंत्रता प्राप्त करनी चाहिए, ताकि उसकी सूक्ष्म और वृहद् स्तर की बौद्धिकता प्रतिबिंबित हो सके। वुल्फ तर्क देती हैं कि महिलाओं की कथा साहित्य लेखन में कम उपस्थिति का कारण उनमे प्रतिभा की अनुपस्थिति की बजाय अवसर की कमी का परिणाम है।

महिलाओं को सिर्फ शरीर के रूप में ही देखा जाता है। इसी वजह से महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अपराध की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। उसके पास ज्ञान, अर्थतंत्र, शक्ति, विचार और राजनीतिक समझ भी है, लेकिन इसकी हमेशा से उपेक्षा की जाती रही है। समाज में अनगिनत ऐसे उदाहरण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि महिलाओं की इन सभी क्षेत्रों में सक्रिय सहभागिता रही है। मुश्किल यह है कि समाज उसके शरीर को केंद्र में रखकर इन सभी प्रक्रियाओं में उसकी सहभागिता और योगदान को हाशिए पर धकेल देता है। ऐसा नहीं है कि प्राचीनकाल से अब तक महिलाओं की स्थिति में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया हो, परन्तु यह भी सच है कि महिलाओं के प्रति पुरुष समाज की मानसिकता में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया।

एक समतामूलक और लैंगिक विभेद मुक्त समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है कि किसी एक जेंडर का किसी दूसरे जेंडर पर प्रभुत्व स्थापित न हो। दोनों में कोई एक दूसरे से श्रेष्ठ या अधीनस्थ नहीं है, अपितु समान है। महिलाओं के प्रति समाज की सोच को बदलना होगा। महिलाओं की प्रतिभा को कम करके आंकना, उन्हें परिवार तक सीमित रखने का तर्क देना, उन्हें केवल शरीर के रूप में स्वीकारना, यह मानना कि उनमें निर्णय लेने की क्षमता का अभाव होता है, कुछ ऐसे पक्ष हैं जो उन्हें भय मुक्त होकर अपनी अस्मिता को स्थापित करने से रोकते हैं। इसलिए उसे एक सुरक्षित समाज बनाने के लिए इन सब बाधाओं को समाप्त कर सशक्तीकरण का रास्ता तलाशना है।

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Sunday, April 18, 2021

यदा यदाहि... (पत्रिका)

- गुलाब कोठारी

समय आ गया है भीतर के कृष्ण को जगाने का। हर व्यक्ति के भीतर बैठा है:-

'ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' (गीता 18/61)
उसने मानव जाति को आश्वासन भी दिया है:-
'परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥' (गीता 4/8)

आज केवल भारत में ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में मानव जीवन चरमरा उठा है। त्राहि-त्राहि मच रही है। भविष्य के संकेत सुख का आश्वासन भी नहीं दे रहे। कोरोना का असुर किसी भी दूसरी महामारी से बड़ा होता जा रहा है। पहले अपना परिचय दे गया था। हमने हल्के में लिया और मान बैठे कि भगा दिया साऽऽऽले को। निकल पड़े सड़कों पर, बेधड़क होकर-मानो 'हम चौड़े, सड़कें छोटी।'

अहंकार की सीमा नहीं होती। यही बुद्धिजीवियों की पहचान होती है। हरिद्वार में महाकुंभ की घोषणा कर दी। दक्षिण-पूर्व के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव घोषित कर दिए। हर तरफ मानो संक्रमितों की बाढ़ आ गई। स्थान कम पड़ गए; डॉक्टर, अस्पताल और ऑक्सीजन कम पड़ गए। केवल वैक्सीन के भरोसे इतना बड़ा झंझावत कैसे नियंत्रण में आएगा? श्मशानों की स्थिति दिनों-दिन वीभत्स होती जा रही है। न प्रशासन ने कुंभ रोका, न ही मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनावों को। सबको अपनी-अपनी मूंछ का सवाल बड़ा लग रहा है। मरे कोई, इनकी बला से।

ऐसा नहीं है कि प्राकृतिक आपदा पहले कभी न आई हो। अकाल तो राजस्थान की मुख्य पहचान रहा है। बाढ़ देश के कई प्रदेशों (असम-बिहार जैसे) में हर साल ताण्डव करती आई है। भूकम्प के झटके भी धरती को हिलाते रहे हैं। फिर भी आज के कोरोना का वातावरण भिन्न है। मानो इंसान का इंसान से मिलना अपराध हो गया। बिना चुनाव लड़े हर व्यक्ति अपने बाड़े में बन्द रहने को मजबूर हो रहा है। एक-एक करके शहरों में लॉकडाउन या कफ्र्यू लगने शुरू हो गए। उद्योग फिर से बन्द हो रहे हैं, पलायन का ज्वार चढऩे लगा है। स्कूलें बंद, बच्चे टीवी पर। कार्यालयों पर इस बार बड़ी और लम्बी अवधि की गाज गिरने वाली है। कोरोना की दूसरी लहर, पहली लहर से अधिक प्राणलेवा साबित हो रही है। असर भी लम्बे काल तक दिखाई पड़ रहा है। शास्त्रों में सुनते आए हैं कि कलियुग के बाद प्रलय आती है। यदि हम नहीं जागे और सरकारों के भरोसे बैठै रहे, तो आ भी सकती है।

कभी नहीं! हर्गिज नहीं आने देंगे। इस बार विश्व को दिखा देंगे कि आज भी भारत विश्व गुरु है-कल भी रहेगा। हमें 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का नारा दोहरा देना है। यह आपातकाल भयंकर है तो हम भी कम नहीं हैं। हर व्यक्ति, हर समाज को इस युद्ध में अपनी पहचान मिटाकर माटी का कर्ज चुकाने के लिए कूद पडऩा है। 'सामूहिक सेवा, घर-घर सेवा', 'नर सेवा ही नारायण सेवा', 'परहित सरिस धर्म नहीं भाई...।' ऐसे कई उद्घोष याद हैं हमको। कोरोना के दो मुख्य निर्देश हैं-मास्क लगाओ, दूरी बनाकर रखो। जिस प्रकार हवा में रोग फैल रहा है, दूरियां भी कितनी कारगर होंगी? सरकारें तो इससे ज्यादा कारगर नहीं होने वाली। इनको तो जीत के जुलूस निकालने दें। हमें तो अपनी रक्षा स्वयं करनी है। अपने बूते पर। 'पत्रिका' के भरोसे। चौबीस घंटे, चौबीस कैरेट के विश्वास के साथ। कई तरह की बाधाएं आने वाली हैं। सरकारें अपना काम करें। हमें तो कोरोना से जंग की कमान अपने हाथ में ले लेनी है। पलायन करने वालों के साथ पिछली बार क्या हुआ था, याद होगा।

हर व्यक्ति कोरोना-कर्मवीर बन जाए। जरूरी सामग्री और जरूरी सूचना पहुंचने में रुकावट न आए। अपने-अपने मोहल्ले के प्रत्येक घर में तन-मन-धन से मदद पहुंचानी है। जरा चूके, तो घर वाले भी शत्रु साबित हो सकते हैं। कोरोना की लड़ाई भी आजादी की लड़ाई से कम नहीं, जहां हर व्यक्ति अपने घर में कैद है।

आज देश में 2-2 लाख लोग प्रतिदिन संक्रमित हो रहे हैं। संक्रमितों की मौत का आंकड़ा भी चिंता पैदा कर रहा है। पिछले चौबीस घंटों में ही 1341 जनों की मौत हो गईं। कहीं ऑक्सीजन की कमी की शिकायतें आ रहीं हैं तो कहीं वैक्सीन की। महाराष्ट्र में तो जैसे सरकारी इंतजामों की परीक्षा हो रही है। कल तक चौबीस घंटे में वहां नए संक्रमित 64 हजार के करीब थे। प्रदेशों में भी संक्रमण और मौतों के रोज नए कीर्तिमान बनते दिख रहे हैं। राजस्थान में तो एक्टिव केस 50 हजार के पार हो चुके हैं। इधर केन्द्र सरकार का दावा है कि12 करोड़ पात्र लोगों को टीका लग चुका है। लेकिन टीके की यह रफ्तार क्या संक्रमण की शृंखला को जल्दी ही तोड़ पाएगी? चुनाव परिणामों के बाद यह आंकड़ा कहां पहुंचेगा, कहा नहीं जा सकता। दो दिन पहले के ही आंकड़े बता रहे हैं कि एक पखवाड़े में ही चुनाव वाले राज्य, पश्चिम बंगाल में 420 फीसदी, असम में 532 फीसदी, तमिलनाडु में 159 फीसदी, केरल में 103 फीसदी व पुड्डुचेरी में कोरोना संक्रमण के165 फीसदी केस बढ़ गए। इन राज्यों में मौतों में भी औसतन 45 फीसदी का इजाफा हुआ।

सत्ता के मतवाले आज भी लाखों लोगों की जानें चुनाव में झौंककर सत्ता के गीत गा रहे हैं। कोई कानून उनको रोकने में सक्षम दिखाई नहीं देता। जैसे अपराधियों को चुनाव लडऩे से रोकने वाला कोई नहीं है। लोगों को कोरोना से बचाने की तस्वीर भी देश के सामने स्पष्ट है। हमको ही अपने जीवन को बचाने के लिए मिल-जुलकर संघर्ष करना पड़ेगा। कहते हैं कि-आप मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता। गड़ जाओ जमीन में-बांट दो छाया और फल समाज को-पेड़ बनकर। विश्व में यह चमत्कार केवल भारत में ही देखा जाता है। कर दिखाओ, इस बार भी। पत्रिका साथ-साथ है, गांव-गांव है।

सौजन्य - पत्रिका।
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Saturday, April 17, 2021

चीन का चेहरा (जनसत्ता)

पिछले करीब साल भर से लद्दाख क्षेत्र में भारत और चीन के बीच जैसी खींचतान चल रही है, वह जगजाहिर है। इस बीच चीन ने जैसी हरकतें की हैं, वह भी छिपी नहीं है। जब भी भारत ने सख्त रुख अख्तियार किया और विश्व जनमत इससे सहमत होता दिखा तब चीन ने दिखावे के लिए अपने कदम पीछे हटाने की बात की। लेकिन जैसे ही उसके रुख को हालात बदलने के तौर पर देखा जाने लगा, चीन ने फिर अपना असली चेहरा दिखाना शुरू कर दिया। उदाहरण के तौर पर हाल ही में यह खबर आई थी कि चीन ने पूर्वी लद्दाख के विवादित क्षेत्र से अपने सैनिकों को वापस बुलाना शुरू कर दिया है। लेकिन अब एक बार फिर उसने जिस तरह की अकड़ दिखाई है, उससे यह साफ है कि उस पर फिलहाल भरोसा करना मुश्किल है। विडंबना यह है कि ग्यारहवें दौर की सैन्य वार्ता के बाद भी इन इलाकों से संघर्ष को खत्म करने में कोई मदद नहीं मिली। अब उसने पूर्वी लद्दाख में हॉट स्प्रिंग्स, गोगरा और देपसांग के संघर्ष वाले क्षेत्रों में सैनिकों को पीछे हटाने से से इनकार कर दिया है। सवाल है कि उसके इस ताजा रुख को कैसे देखा जाएगा!

गौरतलब है कि पूर्वी लद्दाख के हॉट स्प्रिंग और गोगरा इलाकों से चीन के सैनिकों की वापसी का काम पिछले साल जुलाई में शुरू हो गया था, लेकिन तब वह पूरा नहीं हो सका। मगर घटनाक्रम जिस दिशा में जा रहे थे, उससे यह उम्मीद जरूर बंधी थी कि चीन के अड़ियल रवैये की वजह से इस क्षेत्र में जिस तरह की जटिलता खड़ी हो रही है, उसमें समाधान का रास्ता निकलेगा। मगर हालत यह है कि आज भी इस क्षेत्र में कम से कम तीन ठिकानों पर भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। सही है कि दोनों तरफ से सैनिकों की तादाद कोई बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन कूटनीतिक दृष्टि से देखें तो सिर्फ इतने भर से बहुत सारी चीजें तय होने लगती हैं।


दरअसल, इन क्षेत्रों पर अपनी मौजूदगी का महत्त्व चीन को मालूम है। इनसे उसे गोगरा, हॉट स्प्रिंग और कोंगका ला इलाके में तैनात अपने सैनिकों के लिए रसद और दूसरी सुविधाएं पहुंचाने में मदद मिलती है। इसी तरह देपसांग पर नजर रखना भी वह इसलिए जरूरी मानता है कि वहां भारत ने अपना रणनीतिक ठिकाना बना रखा है।


बीती फरवरी में इस मसले पर चीन और भारत के बीच सहमति बनी भी थी कि पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के बीच के इलाके को फिर से ‘नो मैन्स लैंड’ के रूप में बहाल कर दिया जाएगा। लेकिन उसके ताजा रुख से उसकी असलियत को समझा जा सकता है। चीन के इस रवैये से उन आशंकाओं को ही पुष्टि मिलती है जिसमें पैंगोंग सो झील क्षेत्र से चीनी सैनिकों के पीछे हटने से खतरा कम होने के बावजूद उस पर भरोसा करने में सावधानी बरतने की बात कही गई थी। सवाल है कि आखिर चीन अपने इस तरह के रुख से क्या हासिल करना चाहता है।

हालांकि ऐसे तमाम मौके सामने आते रहे हैं, जब यही साबित हुआ कि उस पर पूरी तरह भरोसा करना जोखिम का काम है। फिर भी पड़ोसी देश और रणनीतिक लिहाज से महत्त्वपूर्ण होने के चलते भारत के लिए अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। इसलिए भारत ने अब तक वार्ता का दरवाजा खुला रखा है और अब भी चीन से यही उम्मीद की जा रही है कि वह निर्धारित ठिकानों से अपनी सेना को वापस बुला ले। संभवत: चीन को भी इस बात का अंदाजा हो कि अगर उसने अपनी चाल नहीं बदली तो आने वाले वक्त में कैसे हालात पैदा हो सकते हैं।

सौजन्य - जनसत्ता।
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सहारा टीकों का (जनसत्ता)

विदेशी टीकों को मंजूरी देने की प्रक्रिया में सरकार ने जो बदलाव किया है, वक्त को देखते हुए उसे उचित ही कहा जाएगा। अब तय यह हुआ है कि विदेशी टीकों को मंजूरी-नामंजूरी का फैसला तीन दिन में होगा। इस फैसले के पीछे मकसद यही लगता है कि दुनिया की प्रमुख टीका निर्माता कंपनियां भारत आएं और उत्पादन शुरू करें। इस समय भारत सहित दुनिया भर में टीकों की मांग तेजी से बढ़ रही है। देश में ही रोजाना करोड़ों टीके चाहिए। ऐसे में उत्पादन बढ़ाए बिना टीकों की पूर्ति संभव नहीं हो सकती। और उत्पादन तभी बढ़ेगा जब ज्यादा से ज्यादा कंपनियां बाजार में मौजूद हों। सिर्फ एक दो कंपनियों के सहारे यह काम संभव नहीं है। दुनिया की कई बड़ी कंपनियों ने कोरोना टीके बना लिए हैं और उन्हें अमेरिका, यूरोपीय संघ के देशों सहित कई देशों ने अपने यहां आपात इस्तेमाल की मंजूरी भी दे दी है। हाल में भारत ने रूस में बने टीके स्पूतनिक को मंजूरी दी थी। कई और कंपनियों के टीके भी भारत आने की तैयारी में हैं।

किसी भी देश में विदेशी टीके और उसके परीक्षण को मंजूरी देने की प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल होती है। इसके बाद ही वह उस देश में टीके का परीक्षण किया जा सकता है। सरकार ने जो नए नियम बनाए हैं, उनके तहत अब कोई भी विदेशी टीका निर्माता कंपनी अपनी भारतीय इकाई या एजेंट के जरिए सीधे केंद्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन के समक्ष अर्जी लगा सकेगी। इस पर तीन दिन में हां या ना का फैसला हो जाएगा। अगर मंजूरी मिल गई तो उस कंपनी को प्रमाणपत्र और आयात लाइसेंस भी तत्काल दे दिए जाएंगे। इसके बाद कंपनी को तीस दिन के भीतर नैदानिक परीक्षण भी शुरू करने होंगे। अभी तक होता यह था कि इस प्रक्रिया में महीनों लग जाते थे। विदेशी टीका निर्माता कंपनी को आपात इस्तेमाल की मंजूरी से पूर्व अलग-अलग हिस्सों में आबादी पर इसका परीक्षण भी करना अनिवार्य था। लेकिन फिलहाल टीकों की बढ़ती मांग को देखते हुए यह बंदिश ढीली कर दी गई है।

अब आपात इस्तेमाल के साथ ही यह परीक्षण भी चलता रहेगा। अगर टीके इसमें खरे साबित हुए तो केंद्रीय औषधि प्राधिकार इन्हें औपचारिक रूप से हरी झंडी देगा और फिर ये कंपनियां किसी भी भारतीय साझीदार के साथ मिल कर उत्पादन कर सकेंगी। गौरतलब है कि शुरू में आपात इस्तेमाल के लिए कोविशील्ड और कोवैक्सीन के साथ फाइजर ने भी आवेदन किया था, लेकिन बाद में फाइजर ने अर्जी वापस ले ली थी।


यह तो सही है कि विदेशी कंपनियों के आने से टीकों की तात्कालिक कमी एक हद तक दूर करने में मदद मिलेगी। हालांकि ये टीके कितने कारगर, कितने सुरक्षित और कितने मंहगे-सस्ते होंगे, इस पर आगे भी सोचना पड़ेगा। खून में थक्के बनने की शिकायतों के बाद अमेरिका ने ही जॉनसन एंड जॉनसन के टीके पर प्रतिबंध लगा दिया। कई यूरोपीय देशों में भी कुछ टीकों के इस्तेमाल को रोक दिए जाने की खबरें चिंता पैदा करती हैं। इसलिए भारत में जो भी विदेशी टीका पहले सौ लोगों को दिया जाएगा, उन पर सात दिन निगरानी रखनी पड़ेगी।


टीका पूरी तरह सुरक्षित पाए जाने पर ही उसे मंजूरी मिलेगी। और रही बात टीके के महंगे-सस्ते होने की तो यह भी कोई छोटा मसला नहीं है। महंगा टीका हर आदमी के बूते में नहीं होगा। हाल फिलहाल टीका ही इकलौता उपाय दिख रहा है। लेकिन याद रखना चाहिए कि इस वक्त ज्यादातर टीकों को आपात मंजूरी ही मिली है, ऐसे में पक्के तौर पर इनके सुरक्षित होने का दावा फिलहाल कोई नहीं कर सकता।

सौजन्य - जनसत्ता।
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अफगानिस्तान: शांति की राह में रोड़े कम नहीं (अमर उजाला)

कुलदीप तलवार  

अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन पद संभालने के बाद से अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए भरपूर कोशिशें कर रहे हैं। बाइडन ओबामा के दौर में उप राष्ट्रपति थे, उनका मानना रहा है कि अमेरिका व नाटो सैनिकों को अफगानिस्तान से निकल जाना चाहिए। वह अब भी अपने इरादे पर कायम है। लेकिन अफगानिस्तान के मौजूदा हालात को देखते हुए और अमेरिकी हितों को नजर में रखकर पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने तालिबान के साथ पहली मई तक सैनिकों को निकालने का समझौता कर लिया था, उस पर वह अमल को तैयार नहीं है। ट्रंप अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को निकालने की जल्दबाजी में थे। 



लेकिन बाइडन काफी सतर्क हैं, फूंक-फंककर कदम बढ़ा रहे हैं। उन्हें अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने पहले ही आगाह कर दिया था कि अफगानिस्तान में सत्ता के बंटवारे से समझौते से पहले अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से बाहर निकाला गया, तो तालिबान सारे देश पर कब्जा कर लेंगे। बाइडन दूसरे देशों को साथ, जो अफगानिस्तान में शांति चाहते हैं, लेकर चल रहे हैं। वह नाटो को मजबूत करना चाह रहे हैं। जबकि ट्रंप नाटो गठबंधन में तनाव का शिकार रहे। ऐसा लगता है कि बाइडन पाकिस्तान को अपना सहयोगी नहीं समझते। इसलिए उन्होंने रक्षामंत्री आस्टिन को पिछले दिनों पाकिस्तान नहीं भेजा, जबकि उन्हें भारत और अफगानिस्तान भेजा गया। ताकि अफगानिस्तान में हिंसा के खात्मे और शांति बहाली के लिए गहन विमर्श किया जाए और हालात को सुधारने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान उसके लिए सामरिक महत्व का देश नहीं रह गया। ट्रंप उससे धोखा खाते रहे और पाकिस्तान को तालिबान से समझौता कराने में मददगार समझते रहे। 



गरज ये कि बाइडन का काम करने का रवैया ट्रंप से बिल्कुल अलग है। वह अफगानिस्तान में हिंसा को खत्म करने व शांति बहाली के लिए वहां से अमेरिकी सैनिकों को अभी निकाल नहीं रहे। निस्संदेह गरीब अफगानियों के लिए यह एक राहत की बात है। तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि अफगानिस्तान में शांति बहाली के रास्ते में सभी पक्षों-तालिबान, अफगान सरकार व शांति चाहने वाले देशों में गंभीर मतभेद हैं। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी कह रहे हैं कि वह शांति बहाली के लिए देश में नए चुनाव कराने को तैयार हैं, पर मिली-जुली सरकार के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि देश में तब्दीली केवल लोकतांत्रिक तरीके से हो सकती है। 


ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में बेशक अफगानिस्तान और उससे जुड़ी चिंताओं को रेखांकित किया गया, पर जो देश इस सम्मेलन में शामिल थे अधिकांश का मानना था कि अगर भारत अफगानिस्तान में बड़ा रोल अदा करना चाहता है, तो उसे ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी भी संभालनी होगी। यानी भारत को अफगानिस्तान में सेना की तैनाती भी करनी होगी। जबकि अबतक भारत की सरकारें इसे नकारती रही हैं। भारत का मानना है कि अफगानिस्तान में पहले हिंसा खत्म होनी चाहिए और वहां पाकिस्तान की भूमिका सीमित करके ही शांति कायम हो सकती है। दरअसल बाइडन प्रशासन भी इस बात को अच्छी तरह समझ गया है। पर्दे के पीछे पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई तालिबान को ताकत दे रही है। एक तरह से तालिबान आईएसआई के लिए अफगान सरकार के खिलाफ भाड़े पर युद्ध कर रहा है। इधर रूस व अमेरिकी संबंधों में दिन-ब-दिन कशीदगी बढ़ती जा रही है। अगले कुछ समय में रूस अमेरिका को अफगानिस्तान से निकालने का फैसला ले सकता है। 


तालिबान पहले ही बाइडन को धमकी दे चुके कि वह अमेरिकी सेना को जल्दी ही वहां से निकाल लें, वरना वे हमले तेज कर देंगे। अफगानिस्तान में रूस भारत को उपयोगी नहीं मानता, जबकि भारत का वहां बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। उसकी नजरों में भारत और अमेरिका की घनिष्ठता भी खटक रही है। वर्ष 2019 की तुलना में 2020 में नागरिकों की मौत के बारे में ही 45 फीसदी की वृद्धि है। इस साल भी हालत बेहतर नहीं हुई। यही कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान में अभी शांति बहाली मुश्किल नजर आ रही है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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कोरोना वायरस: मास्क से दूरी, आखिर हम जिम्मेदार कब बनेंगे (अमर उजाला)

सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत  

पिछले छह दिनों से लगातार भारत में एक लाख से ज्यादा कोरोना पॉजिटिव मामले दर्ज किए गए हैं, जो अमेरिका के बाद इसे दुनिया का दूसरा सर्वाधिक कोविड संक्रमित राष्ट्र बनाता है। यह गर्व करने लायक स्थिति नहीं है! ऐसा क्यों हुआ, यह समझने के लिए रॉकेट विज्ञान का विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं। हम जानते हैं कि क्या किया जा सकता है, पर कुछ सरल और प्रभावी उपाय करने में हम अनिच्छुक लगते हैं। हम जीतने की अथक इच्छा से ग्रस्त राजनेताओं की अनदेखी कर सकते हैं, क्योंकि उनकी रैलियों में आने वाले हजारों समर्थकों में कुछेक सौ अगर संक्रमित हो जाते हैं, तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। राजनेतागण अपने चुनावी भाषणों की शुरुआत इस एक पंक्ति के साथ क्यों नहीं कर सकते, 'इससे पहले कि मैं अपना भाषण शुरू करूं, आप अपने चेहरे पर मास्क लगा लीजिए।

अगर आपके पास मास्क नहीं है, तो कृपया अपने मुंह और नाक को गमछे या अंगोछे से ढक लीजिए।' यदि पार्टियां रैलियों के आयोजन पर करोड़ों रुपये खर्च कर सकती हैं, तो वे रैली के आयोजन स्थल पर मुफ्त मास्क भी वितरित कर सकती हैं। वे अपने आयोजकों और समर्थकों को सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने के लिए क्यों नहीं कह सकतीं? फिर इहलोक और परलोक में हमारे भाग्य के रखवाले भी हैं, जो इस जन्म के सभी पापों को धोने तथा अगले जन्म की बेहतरी के लिए लाखों श्रद्धालुओं को पवित्र डुबकी लगाने के लिए आमंत्रित करते हैं, लेकिन मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल उनके मन में भी नहीं आता। 

मगर पढ़े-लिखे शहरी युवाओं को क्या कहा जाए? वे प्रधानमंत्री से लेकर सभी नामचीन हस्तियों को मास्क लगाने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील करते हुए टीवी पर देखते हैं, ताकि संक्रमण रोकने में मदद मिले। पर वे इन अपीलों की अवहेलना करते दिखते हैं। वे दिल्ली जैसे महानगर में कोविड संक्रमण के प्रसार में सहायक हैं। हमारे नेता जनसांख्यिकीय लाभांश का बखान करते हुए कभी नहीं थकते और बताते हैं कि 65 फीसदी भारतीय 35 वर्ष से कम आयु के हैं। पर अगर युवा राष्ट्रीय संकट के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाते और मास्क लगाने व सोशल डिस्टेंसिंग के पालन की अवहेलना करते हैं, तो उन्हें कल्पनाशील तरीके से संदेश देना चाहिए। हमें उन्हें दूसरों को खतरे में डालने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।


मैं दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 में रहता हूं। यदि कोई शाम सात बजे पास के सिक्का प्लाजा (खाने की छोटी-सी जगह और फास्ट फूड चेन की दुकान) जाए, तो वहां 18 से 25 वर्ष के करीब 300 युवाओं की भीड़ होती है, जिनमें से 90 फीसदी बिना मास्क लगाए होते हैं। आप कॉलेज जाने वाली दर्जनों लड़कियों को धूम्रपान कर विद्रोही भावना प्रकट करते देख सकते हैं, पर मास्क लगाने में उनकी भी दिलचस्पी नहीं होती। यदि आप उस समूह में से किसी को मास्क लगाने की सलाह देने की हिम्मत करते हैं, तो वह इतने गंदे तरीके और आक्रामकता के साथ देखेगा, मानो आपको दूर जाने के लिए कह रहा हो। वे अपेक्षाकृत अच्छे कपड़े पहने होते हैं, घंटों वहां बैठकर खाते-पीते हैं और अपने इस्तेमाल किए हुए प्लेट और ग्लास टेबिल पर ही छोड़ देते हैं! यह कितनी अनुशासनहीन और गैर-जिम्मेदार युवा पीढ़ी है! 


सहयोग अपार्टमेंट की बगल में एक डीडीए पार्क है-विवेकानंद पार्क। वहां सुबह छह से दस बजे के बीच करीब दो हजार लोग मार्निंग वॉक करने आते हैं, जिनमें से 90 फीसदी लोग बिना मास्क के होते हैं। आप बीस वर्ष से कम उम्र के दर्जनों लोगों को बगैर मास्क लगाए कोर्ट में बैंडमिंटन खेलते हुए देख सकते हैं। इसके अलावा 60 से 70 की उम्र के बुजुर्गों को बिना मास्क पहने आप जोर-जोर से राम-राम एक, राम-राम दो गाते हुए सुन सकते हैं। माइक्रोस्कोप से देखने पर भी न तो आपको पूरे पार्क में कहीं फूल दिखेंगे और न ही पांच वर्ष से चल रहे स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद चालू स्थिति में कोई शौचालय। हममें से अधिकांश ऐसे गैर-जिम्मेदार नागरिक क्यों हैं? क्या हममें कुछ आत्म अनुशासन, नागरिक भावना और अपने साथी नागरिकों की भलाई के विचार नहीं हैं?


अगर लेफ्टिनेंट गवर्नर (एलजी) दिल्ली के मुख्य प्रशासक हैं, जैसा कि अदालतों ने कहा है, तो वह कोविड-19 से लड़ाई में सबसे आगे क्यों नहीं हैं? पुलिस उनके अधीन है, तो वह शाम के समय सिक्का प्लाजा जैसी जगहों पर दो-तीन पुलिसकर्मियों को क्यों नहीं भेज सकते, जो मौके पर ही बिना मास्क पहने लोगों को जुर्माना लगाएं। जो जुर्माना नहीं देते, उन्हें शर्मिंदा करना चाहिए। इस तरह से लोगों को मास्क पहनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। डीडीए पार्क भी एलजी के अधिकार क्षेत्र में है, तो वह बिना मास्क लगाए लोगों के पार्क में प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाते हैं? नियम का उल्लंघन करने वाले को मौके पर ही दंडित किया जाना चाहिए। खान मार्केट में मास्क के बगैर ग्राहकों को दुकानों में प्रवेश की इजाजत नहीं है। हर दुकान के बाहर स्टैंड पर सैनिटाइजर लगा हुआ है, जिसे पैरों से चलाया जाता है, जो दुकान में प्रवेश से पहले ग्राहकों को सैनिटाइज किया जाना सुनिश्चित करता है। इसे सभी शॉपिंग क्षेत्र में अनिवार्य किया जाना चाहिए।


पिछले हफ्ते से रात के दस बजे से सुबह के छह बजे तक लगाया जा रहा रात्रि कर्फ्यू खानापूर्ति का उदाहरण है। यह प्राइम टाइम टीवी समाचार की सुर्खियां बनता है, चिकित्सीय आपातकालीन स्थिति का सामना कर रहे नागरिकों के लिए असुविधा का कारण बनता है, लेकिन कोविड के प्रसार को रोकने में कोई योगदान नहीं करता, क्योंकि कोरोना महामारी प्रसार के लिए दस बजे रात्रि तक की प्रतीक्षा नहीं करती। मोहल्ला क्लिनिक, डिस्पेंसरी और सरकारी व निजी अस्पतालों के जरिये 21 साल से ऊपर के सभी लोगों के टीकाकरण से दिल्ली में कोविड के मामलों में बढ़ोतरी पर लगाम लगाया जा सकता है। कोविड वैक्सीन लगाने के लिए आरडब्ल्यूए की मदद से विभिन्न आवासीय परिसरों में शिविरों का आयोजन करके सबको टीका लगाना सबसे आसान तरीका है। टीकाकरण को युद्ध स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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कोविड की वापसी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन 

गत वर्ष इस समय स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता कोविड-19 वायरस के कारण होने वाले संक्रमण के दोगुना होने की दर की पड़ताल कर रहे थे। यानी यह परख रहे थे कि देश में संक्रमण के मामलों के दोगुना होने में कितना वक्त लग रहा है। इस दर के अनुसार ही यह अनुमान लगाया गया कि देश में कोविड   संक्रमण के नए मामले कब स्थिर हो रहे हैं। सितंबर में यह संख्या 100,000 रोजाना के उच्चतम स्तर पर पहुंची और फिर घटकर 10,000 रोजाना के स्तर पर आ गई।

अन्य देशों में संक्रमण की दूसरी और तीसरी लहर आई लेकिन भारत विजेता के भाव में आ गया। अब जरा कोविड संक्रमण के दोगुना होने की मौजूदा दर पर विचार करें। मामलों के 20,000 से 40,000 होने में आठ दिन लगे, 80,000 होने में 14 दिन और वहां से 1.60 लाख होने में महज 10 दिन का समय लगा। अब ये चौथी बार दोगुने होने वाले हैं। अस्पतालों में बिस्तर, वेंटिलेटर और ऑक्सीजन की कमी को देखते हुए भविष्य डरावना लग रहा है। भगवान न करे लेकिन अगर मामले दोगुने होने की दर यूं ही बरकरार रही और मई के मध्य तक यदि रोजाना 6 लाख नये मामले सामने आने लगे तो क्या होगा? ऐसे में व्यवस्था चरमराना तय है।


यदि ऐसा हुआ तो देश इस महामारी के इतिहास में ही एक अतुलनीय पीड़ा का साक्षी बनेगा। बड़े पैमाने पर लॉकडाउन की वापसी होगी। गत वर्ष अचानक लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन से कुछ सबक लिया जाए तो इस वर्ष शायद बहुत बुरी स्थिति से बचा जा सकता है। गत वर्ष तो कुछ ही जिलों में संक्रमण के बावजूद पूरा देश बंद कर दिया गया था। इसके लिए सरकारों और नियोक्ताओं को कर्मचारियों को भरोसेमंद तरीके से उनके कार्यस्थल या आवास पर रुकने की व्यवस्था करनी होगी। लेकिन हर नियोक्ता इतना सक्षम नहीं होगा इसलिए अपने घर लौटने वालों को परिवहन मुहैया कराया जाए। नागरिक समाज और स्वयंसेवकों को मदद के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। आदर्श स्थिति में तो लॉकडाउन बढऩे के पहले ऐसा किया जाना चाहिए लेकिन समय की कमी है।


आलोचना से बचते हुए सरकार ने टीका आपूर्ति का प्रयास किया है लेकिन एक टीका निर्माता द्वारा वित्तीय सहायता मांगे जाने पर सरकार ने कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। जबकि अन्य देशों में ऐसी मदद की जा रही है। टीकों पर से मूल्य नियंत्रण समाप्त करना होगा और कीमतें नए सिरे से तय करनी होंगी। टीका निर्माताओं को अधिक उत्पादन करने का प्रोत्साहन मिलना चाहिए। कम कीमतें हतोत्साहित कर सकती हैं। इस मोर्चे पर अब जो भी किया जाए लेकिन टीकाकरण की गति बढ़ाकर अब महामारी की दूसरी लहर को नहीं रोका जा सकता। ऐसे में चिकित्सा सुविधाओं को तेजी से बढ़ाना होगा। पहले भी ऐसा किया जा चुका है और बहुत बड़े पैमाने पर यह दोबारा करना होगा।


अब सहज आर्थिक सुधार का अनुमान भी सवालों के घेरे में है क्योंकि उत्पादन शृंखला पुन: बाधित है। कई कंपनियां और कारोबारी क्षेत्र पहले ही परेशानियों का सामना कर रहे थे और नए झटके से वे मुसीबत में पड़ सकते हैं। यदि स्थायी नुकसान से बचना है तो वित्तीय मदद, ऋण में सहायता और गत वर्ष घोषित किए गए अन्य उपाय दोहराने पड़ सकते हैं। खपत बढ़ाने के लिए दी जाने वाली सहायता बढ़ानी होगी। केवल कंपनियों को ही नहीं बल्कि आम लोगों को भी मदद की आवश्यकता है। इस वर्ष का राजस्व घाटा और सार्वजनिक ऋण बढ़ाए बिना काम नहीं चलेगा। आपदा के कुप्रबंधन की कीमत इस रूप में चुकानी होगी।


सर्वे बताते हैं कि स्कूली शिक्षा, साक्षरता और नामांकन आदि को बहुत अधिक नुकसान पहुंचा है। परंतु छात्रों का अकादमिक वर्ष बरबाद न हो इसका हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए। शायद महामारी के धीमा पडऩे तक बोर्ड परीक्षाएं न हों। वे शायद गर्मियों के आखिर में हो सकती हैं। ऐसे में छुट्टियां कम करनी होंगी और आगामी अकादमिक सत्र को समायोजित करना होगा।


इन सभी मोर्चों पर सरकार को वास्तविक निदान तलाशने होंगे, बजाय कि 'टीका उत्सव' जैसे आयोजन करके संकट का मजाक उड़ाया जाए। ऐसे उत्सव में टीकाकरण की दर कम ही हुई। राज्य सरकारों को मृतकों के आंकड़ों से छेड़छाड़ बंद करनी चाहिए। यदि संकट से निपटना है तो उसके वास्तविक स्वरूप और आकार को समझना होगा। हमने 'इवेंट आयोजन' की मानसिकता कई बार देख ली: बालकनी से थाली बजाना, बिजली बंद करके रात नौ बजे नौ मिनट मोमबत्ती जलाना, अस्पतालों पर हेलीकॉप्टरों से पुष्प वर्षा करना वगैरह। इस बीच कुंभ मेला और चुनावी रैलियों जैसे भीड़ भाड़ वाले आयोजनों में संक्रमण रोकने का काम भगवान पर छोड़ दिया गया। समय हाथ से निकल रहा है। अब गंभीर होने की जरूरत है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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भविष्य के लिए चीन का सपना (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम सरन 

चीन ने अपनी 14वीं पंचवर्षीय परियोजना (2020-25) और दूरगामी उद्देश्यों (2020-2035) की सूची जारी की है। ये दोनों दस्तावेज वह राह दिखाते हैं जिस पर चलने के लिए चीन प्रतिबद्ध है और उसे इतिहास का एक नया युग बताता है। वर्ष 2035 आने तक चीन को समाजवादी आधुनिकीकरण का लक्ष्य हासिल हो जाने की उम्मीद है जो उसे 2049 तक एक विकसित आधुनिक राष्ट्र बनने के अगले बड़े लक्ष्य की ओर प्रेरित करेगा। वर्ष 2049 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के सौ साल भी पूरे होंगे।

चीन का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2020 की तुलना में 2035 तक दोगुना हो जाने की बात कही गई है। भले ही जीडीपी वृद्धि का कोई लक्ष्य तय नहीं किया गया है लेकिन यह सालाना 5-6 फीसदी जरूर होगा। पंचवर्षीय योजना परिपत्र में कहा गया है कि चीन मात्रात्मक वृद्धि के बजाय गुणवत्तापरक वृद्धि का लक्ष्य लेकर चलेगा और इसके लिए नवाचार विकास रणनीति के केंद्र  में रहेगा। शोध एवं विकास (आरऐंडडी) व्यय सालाना 7 फीसदी की दर से बढऩे की बात कही गई है जिसमें बड़ा हिस्सा बुनियादी शोध का होगा।


हाल के वर्षों में चीन ने अपने विनिर्माण क्षेत्र की तुलना में सेवा क्षेत्र के तीव्र विकास पर अधिक जोर दिया है। लेकिन 14वीं पंचवर्षीय योजना फिर से विनिर्माण को केंद्र में लाने की बात करती है ताकि इसका हिस्सा बुनियादी रूप से स्थिर बना रहे। कोविड महामारी के दौरान सेमी-कंडक्टर जैसे महत्त्वपूर्ण उत्पादों की आपूर्ति में खड़ी हुई बाधाओं ने यह सोच पैदा की होगी। इसके अलावा सामरिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित लक्ष्यों की प्राप्ति पर भी चीन का विशेष जोर है।


योजना का मूल मुद्दा दोहरा मुद्राचलन है जिसमें मुख्य जोर घरेलू मांग एवं आपूर्ति पर है। विदेश व्यापार एवं निवेश प्रवाह की शक्ल में बाहरी मुद्रा चलन से घरेलू आर्थिक लचीलापन बहाल होने और आयात पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है।


योजना और उद्देश्यों के ये दस्तावेज राष्ट्रपति शी चिनफिंग की तरफ से दिए गए अहम मार्गदर्शन को भी परिलक्षित करते हैं। अप्रैल 2020 में संपन्न केंद्रीय आर्थिक एवं वित्तीय कार्य सम्मेलन में चिनफिंग ने औद्योगिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र, सुरक्षित, विश्वसनीय एवं काबू की जा सकने वाली आपूर्ति शृंखलाएं बनाने का आह्वान किया था। उन्होंने महत्त्वपूर्ण उत्पादों के लिए कम-से-कम एक वैकल्पिक स्रोत तक पहुंच भी सुनिश्चित करने को कहा था। उनके इस आह्वान में सामरिक एवं भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य भी निहित था। उन्होंने चीन से विनिर्माण को दूसरी जगह ले जाने को लेकर डाले जा रहे दबाव के बरक्स चीन पर दुनिया की मौजूदा निर्भरता का इस्तेमाल करने को कहा था। उन्होंने वैश्विक संसाधनों को चीनी बाजार की तरफ आकर्षित करने और चीन पर वैश्विक निर्भरता बढ़ाने की भी बात कही थी।


इस संदर्भ में बाह्य क्षेत्र को क्या काम सौंपा गया है? पंचवर्षीय योजना उस वास्तविकता को दर्शाती है कि पश्चिमी देशों से उन्नत एवं संवेदनशील तकनीकों तक पहुंच हासिल कर पाना अधिक मुश्किल हो चुका है लेकिन बुनियादी शोध में साझेदारी एवं गठजोड़ कर पाना अब भी मुमकिन है। बुनियादी शोध की चाह में भागीदारियां करना और विदेशों में शोध केंद्र स्थापित करने पर जोर दिया गया है। अनुकूल वीजा शर्तों एवं स्थायी निवास की पेशकश के जरिये चीन विदेशी विद्वानों एवं शोधकर्ताओं को आकर्षित करने की सोच रखता है। उसके साथ बौद्धिक संपदा संरक्षण कानून को अधिक सख्त बनाकर चीन के बनाए उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों को सुरक्षित रखने की भी तैयारी है। चीन ने तेज रफ्तार ट्रेन, दूरसंचार एवं बिजली उपकरणों में उच्च प्रौद्योगिकी का खूब इस्तेमाल किया है।


न्य-नागरिक समेकन (एमसीएफ) को बढ़ावा देने की पहल में भी सामरिक पहलू झलकता है जो नवाचार-केंद्रित वृद्धि के मकसद से अविभाज्य रूप से जुड़ा है। रक्षा क्षेत्र के लिए इस योजना में सूचनांकन से बौद्धिकीकरण की तरफ जाने की बात की गई है। इसमें आगे चलकर कृत्रिम मेधा (एआई), मशीन लर्निंग एवं क्वांटम कंप्यूटिंग को भी समाहित करने का उल्लेख है ताकि चीन की सेना अपनी क्षमताओं से आगे निकल सके और अमेरिका से पेश आ रही मौजूदा चुनौतियों का मुकाबला कर सके। पश्चिमी प्रशांत महासागर के विवादास्पद समुद्री क्षेत्र में चीन एआई एवं संबद्ध तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए निगरानी, पता लगाने, लक्ष्य तय करने एवं निशाना लगाने की क्षमताएं हासिल कर सकता है। इन क्षमताओं की प्राप्ति चीन के नागरिक एवं सैन्य दोनों क्षेत्रों के लिए मददगार औद्योगिक आधार के सामान्य तकनीकी उन्नयन का एक हिस्सा होगी।


चीन की सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों को इस बदलाव की अगुआई करने का जिम्मा सौंपा गया है लेकिन निजी क्षेत्र से भी अंशदान देने की अपेक्षा है। निजी कंपनियां सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों के साथ साझेदारी के लिए प्रोत्साहित हो सकती हैं। सैन्य-नागरिक समेकन पश्चिमी एवं जापानी हाइटेक कंपनियों के लिए बड़ी दुविधा पैदा करेगा क्योंकि यह परखने का कोई आधार नहीं हो सकता है कि तकनीक का हस्तांतरण सैन्य उपयोग से होगा या नहीं। चिनफिंग को लगता है कि चीन के विशाल बाजार का लोभ उच्च तकनीकों के आने की राह प्रशस्त करेगा।


चीन का लक्ष्य तकनीकी सक्षमता के साथ  उत्पादन संयंत्रों का जखीरा खड़ा करना है ताकि जरूरत पडऩे पर उनका इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सैन्य मकसद पूरा करने में भी किया जा सके। मसलन, शोध एवं विकास, मानव संसाधन एवं क्षमता निर्माण, एयरपोर्ट या उपग्रह प्रणाली जैसे खास तरह के ढांचागत आधार जैसे सारे पहलू सैन्य-नागरिक समेकन के दावेदार हो सकते हैं। इस तरह वर्ष 2049 तक एक विश्व-स्तरीय सेना बनाने के लक्ष्य चीन के एक आधुनिक एवं विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प से पूरी तरह मेल खाता है। यह पूर्ण सैन्य तैनाती की संकल्पना से मेल खाती है जिसे दशकों पहले माओत्से तुंग ने पीपुल्स वॉर में आजमाया था। शायद हम चिनफिंग के रूप में माओ के एक समकालिक संस्करण का उभार देख रहे हैं।


पंचवर्षीय योजना एवं दूरगामी उद्देश्य चीन के व्यापक एवं महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों को पूरा करने से प्रेरित हैं। चिनफिंग इन लक्ष्यों को चीनी स्वप्न कहते हैं। वर्ष 2049 की ओर जाने वाला रास्ता चीन के लिए 1978 से अब तक के तेज एवं प्रभावी वृद्धि की राह से अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। आर्थिक एवं वित्तीय कार्य सम्मेलन में चिनफिंग की टिप्पणी उस विन-विन फॉर्मूले को नहीं दर्शाती है जिसकी वकालत वह अक्सर करते रहते हैं। इसका ताल्लुुक इससे है कि चीन की आधुनिक कारोबारी रणनीति अपने कारोबारी साझेदारों, विरोधियों एवं दोस्तों की कीमत पर किस तरह चीन की ताकत बढ़ा सकती है। चीन के लिए आर्थिक विनिमय का मकसद आपसी लाभ वाली वैश्विक अंतर्निर्भरता न होकर खुद पर वैश्विक निर्भरता को बढ़ाना है ताकि एक हथियार के तौर पर भी उसका इस्तेमाल किया जा सके। ऑस्ट्रेलिया जैसे व्यापारिक साझेदारों के खिलाफ उठाए गए दंडात्मक वाणिज्यिक कदम चीन को पीछे ले जाएंगे और दुनिया भर में चीन की मंशा को लेकर सतर्कता का भाव पैदा होगा। जर्मनी के राजनेता बिस्मार्क ने गठजोड़ों के दु:स्वप्न के बारे में कहा था कि एक बड़ी एवं उभरती हुई ताकत इसकी बाधा से ग्रस्त होती है। यह चीनी स्वप्न को भंग भी कर सकता है।


(लेखक पूर्व विदेश सचिव एवं सीपीआर के सीनियर फेलो हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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