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Saturday, January 23, 2021

Netaji Subhash Chandra Bose 125th Jayanti : हर भारतीय के हृदय में बसने वाले एक कालजयी नेता, पढ़ें सुभाषचंद्र बोस की जयंती पर गृहमंत्री अमित शाह का लेख (प्रभात खबर)

By अमित शाह, केंद्रीय गृह मंत्री 

 

Netaji Subhash Chandra Bose 125th Jayanti : आज सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जन्म जयंती के अवसर पर मैं उस वीर को प्रणाम करता हूं, जिन्होंने देशहित में अपने जीवन का सर्वस्व अर्पित करके, रक्त के कतरे-कतरे से इस देश को सिंचित किया है. मैं प्रणाम करता हूं, बंगजननी के उस गौरवशाली संतान को, जिसने समस्त भारत को अपना नेतृत्व दिया है, देश को स्वाधीन कराने के लिए उन्होंने पूरी दुनिया का भ्रमण किया. जिनका जीवन कोलकाता में शुरू हुआ व कालांतर में वह भारतीय राजनीति के शिखर पर पहुंचे व उसके बाद बर्लिन से शुरू करके सिंगापुर तक भारत माता के संतानों को लेकर उन्होंने देशहित में वृहद अभियान चलाया. उनका जीवन दर्शन भारत के युवा समाज के लिए आदर्श है, उनके जीवन युवा समाज के तन-मन को राष्ट्रवादी भावना से भर देता है.


उस समय भारत मे सर्वाधिक जरूरत थी एक सटीक योजना लेकर देश को आगे ले जाने की, इस विचार के आधुनिक भारत के सर्वप्रथम प्रस्तावक थे सुभाषचंद्र. 1938 के फरवरी महीने में हरिपुर कांग्रेस में उन्होंने राष्ट्रीय योजना का मुद्दा उठाया था. दिसंबर 1936 में, पहली राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया गया था. उसी वर्ष सुभाष ने वैज्ञानिक मेघनाद साहा को एक साक्षात्कार में कहा : मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यदि हमारी राष्ट्रीय सरकार बनती है, तो हमारा पहला काम राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन करना होगा. स्वातंत्र्योत्तर योजना आयोग उनकी विरासत है.


यह विचार सुभाषचंद्र के दिमाग में अपने छात्र जीवन में आया. 1921 में उन्होंने देशबंधु चित्तरंजन दास को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह सरकारी नौकरी नहीं चाहते हैं, अपितु राजनीति में शामिल होकर अपना योगदान करना चाहते हैं. इसके साथ ही उन्होंने संक्षिप्त, लेकिन स्पष्ट रूप से लिखा कि वह कांग्रेस के कार्यों में योजनाबद्ध कदम देखना चाहते हैं. आज के युवाओं के लिए राष्ट्र निर्माण के कार्य में सुभाषचंद्र के ये विचार आज भी प्रासंगिक हैं.


आजकल बहिरागत बोलने की बात शुरू हुई है. बहिरागत का मतलब अब तक लोग किसी दूर देश के व्यक्ति अथवा किसी घुसपैठिया को समझते थे. लेकिन देश के भिन्न अंश के लोगों को बहिरागत अथवा बाहरी बोलने की संकीर्ण क्षेत्रवाद सुभाषचंद्र के राज्य में शुरू करना दुर्भाग्यपूर्ण है. जिस राज्य ने भारत के लोगों में राष्ट्रवाद के विचार को पुनर्जीवित किया है, उसे 'वंदे मातरम' और जन-गण-मन राष्ट्र गान दिया, उस राज्य में ऐसी सोच बहुत दुखद व खतरनाक है. इस राज्य के लोगों के मुकुट में गहना, सुभाषचंद्र को तत्कालीन राष्ट्र की सबसे बड़ी संगठन इंडियन नेशनल कांग्रेस द्वारा अपना अध्यक्ष चुना गया था. लेकिन सुभाषचंद्र उनसे एक कदम आगे थे और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से परिचित थे.


 

दुनिया के विभिन्न देशों के मुक्ति संघर्षों के इतिहास का अध्ययन करते हुए, उन्होंने सोचा कि देश की स्वतंत्रता के हित में विदेशी गठबंधन की आवश्यकता हो सकती है. 1932 में नेताजी को इलाज के लिए वियना जाना पड़ा. वहां उनकी मुलाकात एक अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विठ्ठल भाई पटेल से हुई. भारत के ये दो देशभक्त नेता विदेश में भी राष्ट्र को स्वाधीन करने की चर्चा में व्यस्त रहे. वहां चर्चाओं में, उन्होंने महसूस किया कि देश की स्वतंत्रता के लिए विदेशी सहायता की आवश्यकता थी. उस समय बहुत कम भारतीय नेताओं ने इस तरह की अंतर्राष्ट्रीय सोच व्यक्त की थी. इसी अंतर्राष्ट्रीय सोच ने नेताजी सुभाष चंद्र को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक सशक्त कदम उठाने और सशस्त्र बलों के साथ देश को स्वतंत्र करने के लिए आगे बढ़ने की ताकत दी. नेताजी युवा समाज के एक वीर सैनिक थे. मन आज भी यह सोचकर प्रसन्न होता है कि एक उच्च शिक्षित सज्जन, ब्रिटिश सरकार की गिरफ्त से बचकर, ब्रिटिश पुलिस की नजरों से बचकर और पूरे भारत को पार करके अलग-अलग नामों से अफगानिस्तान पहुंचे और वहां से मध्य-पूर्व होते हुए यूरोप पहुंच गये.


भारत के युवाओं के मन में यह साहस, देशभक्ति हमेशा प्रज्ज्वलित रही है. केवल यह ही नहीं, कुछ साल बाद, जब उन्हें अहसास हुआ कि जर्मनी में बैठकर काम नहीं होगा, तो उन्होंने भारत के समीप दक्षिण-पूर्व एशिया जाना तय किया और इस क्रम में नेताजी ने एक और साहसिक अभियान चुना. तब द्वितीय विश्वयुद्ध का सबसे खूनी अध्याय चल रहा था. तत्कालीन भारत के विशिष्ट नेता सुभाषचंद्र तीन महीने से लगातार पनडुब्बी में जर्मनी से सिंगापुर जा रहे थे. इस खतरनाक यात्रा का विवरण आज भी रोम-रोम पुलकित कर देता है. आज भी, मुझे यह सोचकर गर्व होता है कि भारत की स्वतंत्रता की घोषणा से बहुत पहले, नेताजी अंडमान द्वीप समूह में स्वतंत्रता का राष्ट्रीय ध्वज फहरा रहे थे.


भारत की पूर्वी सीमा पर इंफाल में स्वतंत्रता का झंडा फहराया गया था. आजाद हिंद फौज की 75वीं वर्षगांठ पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था और भारत सरकार ने तय किया है कि अब से इस नायक को श्रद्धांजलि देने के लिए, सुभाषचंद्र का जन्मदिन 23 जनवरी को 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाया जायेगा. परंतु कांग्रेस और वामपंथी इस नायक के सम्मान पर ठेस पहुंचा रहे हैं. यह वे लोग हैं, जिन्होंने न नेताजी को तब सम्मान दिया और न ही आज देने के पक्षधर हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी, सुभाष बाबू के सपनों और विचारोंवाला एक सशक्त व आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए संकल्पित हैं.


आज, सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जयंती की उपलक्ष्य में, हम भारत मां के इस सुपुत्र के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धा व्यक्त करते हैं. बंगाल व समस्त भारत के लोग इस वीर सेनानी को सदैव याद रखेंगे. भारत के युवा आजाद हिंद फौज की वीरता से प्रेरित होंगे. नेताजी देश विरोधी ताकतों को खत्म करने के हमारे संघर्ष में सबसे आगे रहेंगे.


मैं अपनी श्रद्धा वाणी को कविगुरु के शब्दों में समाप्त करूंगा : 'सुभाषचंद्र,.... मैंने आपको राष्ट्र की साधना की शुरुआत से ही देखा है. आपने जो विचार प्रकाशित किये हैं, उसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है. आपकी शक्ति की कठिन परीक्षा, जेल, निर्वासन, अपार दुःख व गंभीर बीमारियों के मध्य हुई है, किसी भी कठिनाई ने आपको अपने पथ से नहीं हिलाया, अपितु आपके चिंतन को और विस्तृत किया है, आपकी दृष्टि को देश की सीमाओं से परे इतिहास के विस्तृत क्षेत्र तक ले जाने का काम किया है.


आपने विपत्तियों को भी अवसर में बदला है. आपने बाधाओं को एक स्वाभाविक क्रम बना दिया. यह सब संभव हुआ है, क्योंकि आपने किसी भी हार को अपनी नियति नहीं मानी. आपकी इस चारित्रिक शक्ति को बंगाल के हृदय में संचारित करने की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है. आपके विचारों की शक्ति से ही हम प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में बंगाल को पुनः सोनार बंगला बनाने के लिए संकल्पित हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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कोविड-19: आगे और कड़े कदम उठाने होंगे बाइडन को (पत्रिका)

लीना एस. वेन, विजिटिंग प्रोफेसर, मिल्केन इंस्टीट्यूट स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी

अमरीका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने कोविड-19 को लेकर जो रणनीति बनाई है, उसकी हर हाल में तारीफ की ही जानी चाहिए। उनकी रणनीति से पता चलता है कि वह देश को किस दिशा में ले जाना चाहेंगे। पदभार ग्रहण करने के चौबीस घंटे से भी कम समय में उन्होंने कोविड-19 से निपटने के लिए राष्ट्रीय रणनीति का मसौदा जारी कर दिया। महामारी से निपटने के लिए उन्होंने संघीय सरकार के नेतृत्व वाली भूमिका को दृढ़ता के साथ स्थापित किया है। पूर्व के ट्रंप प्रशासन ने इस महामारी से निपटने को लेकर अस्वीकार करने का, कमतर आंकने का और शर्तों से ओतप्रोत जो रुख अपनाया था, उसके यह ठीक विपरीत है। बाइडन की रणनीति व्यापक, विस्तृत है। मैं उनके मजबूत इरादों की कद्र करती हूं, लेकिन यह समय और भी आक्रामकता से काम करने का है।

आइए, बाइडन द्वारा उठाए गए पहले कदम से ही शुरुआत करते हैं। उन्होंने संघीय कार्यालयों में मास्क लगाने वाला पहला आदेश जारी किया है। उन्होंने अंतरराज्यीय यात्राओं के लिए भी मास्क जरूरी किया है। यह आदेश अमरीकियों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि नया प्रशासन जनस्वास्थ्य के निर्देशों का पालन करने के लिए तत्पर है। जबकि यह साफ है कि मास्क लगाना जीवन का कवच है, तो फिर बाइडन ने क्यों नहीं पूरे देश के लिए ऐसा आदेश जारी किया। कुछ लोगों का कहना है कि संघीय भवनों और अंतरराज्यीय व्यापार से परे किसी आदेश को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। पूरे राष्ट्र के लिए आदेश जारी करने का स्पष्ट संकेत होगा कि देश संकट में है। इस अधिकार का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि बाइडन मास्क की पूर्ति के लिए राजकीय कोष से जुड़े कई अधिकारों का इस्तेमाल करेंगे। इससे राज्यों के गवर्नर भी फैसला लेने को मजबूर होंगे।

कुछ और कदम भी उठाने चाहिए: बाइडन को चाहिए कि वे इनडोर सामाजिक कार्यक्रमों को नजरअंदाज करने के लिए अमरीकियों को प्रेरित करें और कड़ा आदेश जारी करें। अन्य देशों ने भी व्यापारिक बैठकों और घर से बाहर जाने पर रोक लगाई है, लॉकडाउन किया है। ब्रिटेन ने तो कम्युनिटी सदस्यों के एक-दूसरे से मिलने पर अर्थदंड लगाया है जो ट्रैफिक टिकट की तरह का है। महामारी के मोर्चे पर केवल एक ही रास्ता है - बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन। दस करोड़ लोगों का सौ दिनों में वैक्सीनेशन करने का मकसद अच्छा है, लेकिन यह काफी कम है। अऩुमान लगाइए - यदि दस लाख लोगों को प्रति व्यक्ति दो डोज की दर से टीके लगाए जाते हैं तो इसमें वर्ष 2022 तक का समय लग जाएगा।

बाइडन की टीम ने तेज गति और समानता वाली महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। हमें एक दिन में कम से कम पच्चीस लाख टीकाकरण करने की जरूरत है। पिछले हफ्ते तत्कालीन स्वास्थ्य सेवा सचिव एलेक्स अजार ने स्वीकार किया था कि वैक्सीन का कोई रिजर्व नहीं है। हो सकता है कि बाइडन की टीम को आपूर्ति की समस्याएं आएं। ऐसी हालत में उन्हें अमरीकियों को सब कुछ बता देना चाहिए। बाइडन को हमारे समय की सबसे बड़ी समस्या विरासत में मिली है। उनके पूर्ववर्ती की उपेक्षा से हालात और बदतर हुए हैं। बाइडन ने लोगों की अपेक्षाएं जागृत की हैं। इस समय बाइडन को और मजबूत होना चाहिए। यही आका ंक्षाएं ही सूर्य की नई किरणें हैं।

द वॉशिंग्टन पोस्ट

सौजन्य - पत्रिका।
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ट्विटर को क्यों रोक लगानी चाहिए ईरान के सर्वोच्च नेता के अकाउंट पर ? (पत्रिका)

मसीह अलीनेजाद (ईरानी पत्रकार, वॉइस ऑफ अमेरिका की पर्शियन सेवा के लिए टॉक शो 'टैब्लिट' का संचालन करती हैं।)

यूएस कैपिटल पर 6 जनवरी को हमले के चलते ट्विटर और फेसबुक ने पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के अकाउंट अपने-अपने प्लेटफॉर्म पर निलंबित कर दिए - शुरुआत में अस्थायी तौर पर। बाद में फेसबुक ने कहा कि इसका प्रतिबंध अनिश्चितकाल के लिए जारी रहेगा, जबकि ट्विटर ने प्रतिबंध को स्थायी करार दे दिया। अपने कदम के लिए ट्विटर ने वजह बताई - 'और हिंसा भड़कने का खतरा।' कितने ही ईरानी मानवाधिकार कार्यकर्ता अक्सर इस बात पर आश्चर्यचकित होते हैं कि इस्लामिक गणराज्य के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामनेई और अन्य सरकारी अधिकारियों ने 8 करोड़ 30 लाख ईरानी लोगों को ट्विटर पर प्रतिबंधित किया, जबकि वे खुद अपने झूठ का प्रचार करने के लिए लगातार सोशल प्लेटफॉर्म का पूरा इस्तेमाल करते आ रहे हैं - और वह भी बिना किसी चेतावनी के।

इस बात से तो यही कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया के मंच का रुख तानाशाहों के पक्ष में झुका हुआ रहता है। बीते अक्टूबर माह के दौरान सीनेट के सामने पेश हुए ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी ने कहा था कि खामनेई के यहूदी-विरोधी ट्वीट और इजरायल का नामोनिशान मिटाने के नारों से कंपनी के नियमों का उल्लंघन इसलिए नहीं होता क्योंकि ये 'कोरी धमकियां मात्र' हैं। डोर्सी ने दावा किया क्योंकि खामनेई के जुबानी हमले अपने नागरिकों के खिलाफ नहीं हैं, इसलिए वे स्वीकार्य हैं। यह कोरा झूठ है और इसमें दूरदर्शिता का अभाव है। नवंबर 2019 के विरोध प्रदर्शन इसका उदाहरण हैं, जब शासन ने कम से कम एक सप्ताह के लिए इंटरनेट बंद कर दिया था। इंटरनेट बहाल होने पर सामने आए वीडियो दिल दहला देने वाले थे।

अमरीकी नागरिकों को जिस तरह की लोकतांत्रिक संस्थाएं सुलभ हैं, ईरानी नागरिकों के लिए उनका अभाव है और उनके लिए सोशल मीडिया का मंच ही अपनी बात कहने का उपकरण है। अब समय आ गया है कि सोशल मीडिया कंपनियां तानाशाहों को नफरत फैलाने के लिए इन प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग करने से रोकें।

- द वॉशिंग्टन पोस्ट

सौजन्य - पत्रिका।
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चीन के मंसूबे (जनसत्ता)

गलवान घाटी विवाद की आंच अभी ठंडी भी नहीं पड़ी कि चीन ने अब अरुणाचल प्रदेश में मोर्चा खोल दिया है। अपना पुराना रवैया दोहराते हुए चीन ने कहा है कि तिब्बत के दक्षिणी हिस्से- जंगनान क्षेत्र जो कि भारत का अरुणाचल प्रदेश है, को लेकर उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है और वह अरुणाचल प्रदेश को कोई मान्यता नहीं देता। हाल में यह विवाद तब उठा जब अरुणाचल प्रदेश के सुबनसिरी जिले में सरी चू नदी के पास एक छोटा गांव बसा देने की चीनी साजिश का खुलासा हुआ। पिछले एक साल में चीन ने जिस गुपचुप तरीके से इस गांव को बसा लिया, वह उसकी पड़ोसी देशों की जमीन हड़पने की नीति का प्रमाण है।

हकीकत यह है कि सुबनसिरी जिले का यह इलाका वास्तविक नियंत्रण रेखा से सटा है और भारत के हिस्से में पड़ता है। लेकिन चीन ने इस पर कब्जा कर रखा है और इसे विवादित क्षेत्र बना रखा है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर इलाका विवादित है भी, तो फिर वह क्यों यहां अवैध निर्माण कर अशांति पैदा कर रहा है। यह इलाका सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से बहुत ही संवेदनशील है और यहां किसी भी तरह की चीनी गतिविधि उकसावे वाली कार्रवाई से कम नहीं है। जाहिर है, चीन भारत को घेरने के लिए नए रास्ते तलाश रहा है।

पिछले कुछ सालों में चीन ने अरुणाचल प्रदेश के सीमाई इलाकों में जिस तेजी से अपना जाल बिछाना शुरू किया है, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भविष्य में चीन इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज करेगा। इसी क्रम में तिब्बत की राजधानी ल्हासा से न्यांगची तक रेल लाइन बिछाने की परियोजना पर तेजी से किया है और यह रेल लाइन अरुणाचल प्रदेश के पास से गुजरती है। न्यांगची से लेकर ल्हासा तक चार सौ नौ किलोमीटर की सड़क वह पहले ही बना चुका है।

चीन का सारा जोर भारत से लगी साढ़े चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा पर जगह-जगह ऐसे निर्माण करना है जिससे सीमाई इलाकों में उसकी पहुंच आसान हो सके। इसीलिए अरुणाचल से लेकर डोकलाम और गलवान तक वह भारतीय सीमा क्षेत्र में पड़ने वाले इलाकों पर कब्जा करता जा रहा है और इन इलाकों को विवादित बना रहा है ताकि भारत इन इलाकों में अपनी पहुंच न बना सके।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद कोई नया तो है नहीं। चीन चाहता भी नहीं है कि सीमा विवाद कभी सुलझे। अगर एक बार सीमा विवाद सुलझ गया तो उसके विस्तारवादी मंसूबे पूरे कैसे होंगे! चीन का भारत के साथ ही नहीं, अपने सभी पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद है और हर देश के भू-भाग को उसने इसी तरह विवादित बना कर कब्जा रखा है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत का रुख शुरू से ही स्पष्ट रहा है कि यह भारत का अभिन्न हिस्सा है।

भारत के रक्षा मंत्रियों के अरुणाचल प्रदेश के सीमाई इलाकों के दौरों पर चीन आपत्ति करता रहा है। हालांकि अरुणाचल प्रदेश में उसकी गतिविधियों पर भारत पर नजर है। सामरिक महत्त्व और चीनी गतिविधियों को देखते हुए भारत ने भी अरुणाचल प्रदेश से सटे सीमाई इलाकों में सड़कों का जाल बिछाने और पुलों के निर्माण के निर्माण का काम जोरों पर है। लेकिन भारत को लेकर चीन जिस तरह की विरोधाभासी और संदेहास्पद कूटनीति अपनाए हुए है, उससे तो लग रहा है कि वह गलवान विवाद को हल करने की दिशा में बढ़ने की बजाय भारत को और बड़े जाल में फंसाने की साजिश रच रहा है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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लोन एप्स हैं डिजिटल मगरमच्छ, गोरखधंधे में चीनी गिरोह का हाथ (अमर उजाला)

विराग गुप्ता  

ट्रंप और चीन के कारनामों से यह साफ है कि जंग और राजनीति में सब कुछ जायज होता है। रुखसत होने से कुछ ही दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कोरोना के वैश्विक विस्तार के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराते हुए, संयुक्त राष्ट्र यानी यूएन से सख्त कार्रवाई की मांग की थी। ट्रंप के दावों की पुष्टि होना मुश्किल है, लेकिन यह बात निश्चित है कि कोरोना से उपजी


त्रासदी में चीनी गिद्ध सबसे बड़ा सुपर पावर बनने के लिए बेताब है। महामारी से भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई, जिसका असंगठित क्षेत्र और गरीबों को सबसे ज्यादा खामियाजा उठाना पड़ा। कोरोना काल में रोजगार और व्यापार खोने वाले आपदाग्रस्त लोगों की मदद के नाम पर, हजारों डिजिटल एप ने लाखों लोगों का सुख-चैन छीन लिया है। तेलंगाना पुलिस की शुरुआती जांच के अनुसार, लोन एप के गोरखधंधे में चीनियों का भी गिरोह काम कर रहा है।



लॉकडाउन के अंधेरे में पनपे इस कारोबार को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला डिजिटल लोन एप्स। देश में 100 करोड़ से ज्यादा मोबाइल हैं, जिनमें लोग फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे एप्स चलाते हैं। गूगल और एपल के प्लेटफॉर्म पर इस समय लगभग 47 लाख एप्स से हर तरह के कारोबार हो रहे हैं। एप्स और वेबसाइट आदि के लिए वर्ष 2000 में आईटी कानून बनने के बावजूद भारत में इनके रजिस्ट्रेशन, नियमन और टैक्सेशन के लिए अभी तक कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं बनी। देश में गरीबों की मदद के लिए हजारों योजनाएं चल रही हैं, लेकिन जरूरतमंदों को समय पर लोन देने के लिए शायद ही कोई बैंक आगे आता है, इसलिए बगैर कागज-पत्तर के झटपट लोन देने वाले इन एप्स का कारोबार खूब चल निकला। लोन एप्स ने ग्रामीण क्षेत्रों में कारोबार और वसूली के लिए पुणे, बंगलूरू, नोएडा, हैदराबाद और चेन्नई जैसे आईटी हब्स में अपने कॉल सेंटर खोल रखे हैं।


पूरे देश में चल रहे इस कारोबार का खुलासा तेलंगाना पुलिस ने किया। सिर्फ एक राज्य की पुलिस की जांच में लगभग 1.4 करोड़ लेन-देनों से 21 हजार करोड़ के कारोबार का खुलासा हो चुका है। लोन घोटाले की भारी रकम चीन और दूसरे देशों में ट्रांसफर होने के सबूत आने पर केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी आपराधिक मामला दर्ज कर लिया। इस घोटाले का दूसरा पक्ष वे पीड़ित और गरीब लोग हैं, जो इन लोन एप्स के शिकंजे में फंस कर बर्बाद हो गए। भारत में लगभग 80 करोड़ लोगों को कोरोना काल में सरकारी भोजन और अनाज की मदद मिली। उनमें से करोड़ों जरूरतमंदों ने बीमारी, पढ़ाई, शादी आदि के लिए नए जमाने के इन डिजिटल साहूकारों से भारी ब्याज दर पर छोटे-छोटे लोन ले लिए। बगैर वैध समझौते के हुए लोन के एवज में लाचार लोगों ने अपने मोबाइल डाटा और आधार आदि का विवरण इन सूदखोर कंपनियों के हवाले गिरवी रख दिया।


लोन के मूलधन के भुगतान के बावजूद भारी ब्याज को वापस करने में जब लोग फेल हो गए, तो इन कंपनियों ने ब्लैकमैलिंग के हथकंडे से कर्जदारों को पीड़ित करना शुरू कर दिया। लोन की रकम न चुका पाने के कारण ये एप लोन लेने वाले शख्स को धमकाने के साथ उसके रिश्तेदारों और जानकारों को फोन करके बदनाम करने लगे। फोटो के साथ छेड़खानी करके व्हाट्सएप में दुष्प्रचार, धमकी वाले कॉल और फर्जी कानूनी नोटिस भी कर्जदारों और उनके परिचितों को भेजी गईं। इन कंपनियों से लोन लेने वाले लोग कमजोर और गरीब वर्गों से आते हैं, जो इन डिजिटल प्लेटफॉर्म के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने से घबराते हैं। इसके अलावा छोटे कस्बों और शहरों में पुलिस का साइबर सेल भी नहीं होता। कुछ हजार लोन लेने वाले पीड़ित लोग राहत के लिए थकाऊ और महंगी अदालती व्यवस्था के पास भी नहीं जा पाए और कई ने प्रताड़ना से ऊब कर अपनी जान दे दी।


मनी लेंडिंग कानून के तहत राज्यों में लोन का कारोबार करने के लिए अलग-अलग नियम हैं, लेकिन रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार, बैंक और एनबीएफसी कंपनियां ही लोन का कारोबार कर सकती हैं। लोन एप्स का मर्ज जब पूरे देश में बढ़ गया, तो फिनटेक कंपनियों और ऑनलाइन लोन के कारोबार को नियमबद्ध करने के लिए रिजर्व बैंक ने एक समिति बना दी। लेकिन रिजर्व बैंक ने पिछले साल 24 जून, 2020 को जो आदेश जारी किया था, उस पर ही यदि ढंग से अमल किया जाए, तो लोन एप्स के डिजिटल गिरोह की कमर तोड़ी जा सकती है। रिजर्व बैंक के आदेश से साफ है कि डाटा के दुरुपयोग और कर्ज वसूली के लिए लोन एप्स द्वारा की जा रही डिजिटल पहलवानी गैर-कानूनी है। इस आदेश से यह भी स्पष्ट है कि बैंकों और एनबीएफसी कंपनियों की वेबसाइट में सभी डिजिटल लोन एप्स का पूरा विवरण हो, जिससे किसी भी गलत काम के लिए उन्हें भी जवाबदेह बनाया जा सके। रिजर्व बैंक के अनुसार, कर्ज देते समय ग्राहकों को लिखित स्वीकृति पत्र देना जरूरी है, जिसमें कानूनी सीमा के भीतर ब्याज दरों के विवरण के साथ बैंक और एनबीएफसी कंपनी का पूरा खुलासा जरूरी है। 


भारत में एप्स के माध्यम से लोन देने वाले ऑपरेटर्स अधिकांशतः गैरकानूनी तरीके से कारोबार कर रहे हैं और लोन वसूली के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हथकंडे तो पूरी तरह से आपराधिक हैं। इस मसले पर देशव्यापी गुस्सा बढ़ने के बाद गूगल ने अपने प्लेटफार्म से कुछ लोन एप्स को हटा दिया। लेकिन डिजिटल एप्स तो रक्त बीज की तरह व्यापक हैं, जो लोगों को ठगने के लिए मारीच की तरह रूप भी बदल लेते हैं। गूगल और एपल के प्ले स्टोर से बिक रहे इन एप्स की डेवलपर पॉलिसी में बैंक और एनबीएफसी कंपनियों का पूरा खुलासा नहीं होने से पूरी गफलत हो रही है।


गूगल और एपल प्ले स्टोर के माध्यम से भारत में कारोबार कर रहे हर लोन एप में रिजर्व बैंक की अनुमति प्राप्त बैंक और कंपनियों का पूरा विवरण आ जाए, तो ठगी करने वाले एप्स बेनकाब हो जाएंगे। इसलिए रिजर्व बैंक के नियमों को लागू करने के लिए गूगल और एपल जैसी बड़ी कंपनियों पर सरकार को दबाव बनाना होगा, तभी लोन एप्स के मगरमच्छों से आम जनता को मुक्ति मिलेगी।

सौजन्य - अमर उजाला।

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परीकथा-सी है नेताजी की कहानी, लगती रही हैं इस तरह की अटकलें (अमर उजाला)

शिशिर कुमार बोस 

(नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आज 125वां जन्मदिन है। उनके रहस्यमय ढंग से गायब होने के बारे में कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। उनके भतीजे शिशिर कुमार बोस ने अपनी पुस्तक 'सुभाष ऐंड शरत' में उन्हें याद किया है। पेश है, उसी पुस्तक के अंश- )

 

विस्तार

सुभाष चाचा के लापता होने की खबर उसी तरह फैलाई गई, जैसी हमने योजना बनाई थी। हमारी तरकीब प्रभावकारी थी और सरकार व पुलिस पूरी तरह भ्रम में थी। हमने सुना कि अधिकारियों ने 19 जनवरी (1941) को कलकत्ता से रवाना हुए एक जापानी जहाज का पता लगाया और उसकी तलाशी लेने के लिए उसे एक चीनी बंदरगाह की तरफ मोड़ दिया है! हालांकि, हमने यह भी सुना कि दिल्ली में केंद्रीय खुफिया ब्यूरो के आकाओं ने उन अफवाहों पर विश्वास नहीं किया, कि सुभाष चाचा ने  सांसारिक जीवन को त्याग दिया था और कहीं संन्यासी बन गए थे। सुभाष बोस का पता लगाने और उन्हें पकड़ने के लिए सभी सीमाओं और बंदरगाहों पर एक एहतियात संदेश भेजा गया। लेकिन जब तक पुलिस को लापता होने के बारे में पता चला, तब तक चाचा भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा पार कर काबुल जाने वाले आदिवासी इलाकों में घुस चुके थे।



कुछ समय बाद, आनंदबाजार पत्रिका के सुरेश मजूमदार ने पिता को एक जानकारी के बारे में बताया, जो उन्होंने दिल्ली के किसी स्रोत से सुनी थी। जाहिर है, कुछ दिनों बाद अखबारों में एक सनसनीखेज खुलासा हुआ कि ईस्ट इंडियन रेलवे के एक टिकट चेकर ने सुभाष चंद्र बोस की तरह दिखने वाले किसी व्यक्ति को देखा था। पुलिस ने उससे पूछताछ की। और श्री मजूमदार की जानकारी के अनुसार, उस व्यक्ति ने यात्री की पोशाक और भेष का जो विवरण दिया था, वह चाचा के मोहम्मद जियाउद्दीन के रूप वाले छद्म भेष से मिलता-जुलता था। एक शाम पिताजी ने मुझे बुलाकर मजूमदार के संदेश के बारे में कहा कि विवरण वास्तविकता के इतने करीब है कि लगता है, टिकट चेकर ने शायद सुभाष चाचा को देखा था। मैं उनकी बात से सहमत था और मुझे चिंता हुई।



इस बीच घर और बाहर, सुभाष चाचा के गायब होने के बारे में अटकलों की कोई सीमा नहीं थी। परिवार के कई सदस्य चुप थे, खासकर वे लोग, जो मानते थे कि चाचा का कोई राजनीतिक उद्देश्य था। मैं अपनी दादी का दिमाग कभी पढ़ नहीं पाया। मुझे लगता है कि वह गंभीर रूप से चिंतित थीं, लेकिन बाह्य तौर पर वह शांत थीं। हमारे डॉक्टर चाचा सुनील व्यावहारिक ढंग से सोचते थे। उन्हें डर था कि राजनीतिक रूप से पूरी तरह से अलग-थलग रहने के बाद, सुभाष ने हताशा से बाहर आने के लिए कुछ किया होगा। वह भारत में खुद को कैसे छिपाते? यहां तक कि छोटा बच्चा भी उन्हें जानता था। वहीं कुछ लोगों ने उनके संन्यास लेने की बात मान ली।


मेरी नानी धार्मिक महिला थीं। उन्होंने हमें बड़े यकीन के साथ बताया कि सुभाष एक दिन साधु के भेष में लौटेगा। यह सच है कि किशोर उम्र में सुभाष चाचा एक बार आध्यात्मिक गुरु की तलाश में घर से भाग गए थे। आजादी के दशकों बाद अनेक तरह की अफवाहें फैलीं कि सुभाष चाचा को साधुओं के भेष में देखा गया। हमारे पारिवारिक मित्र नृपेंद्र चंद्र मित्र ने सुना कि एक शाम दो सिख व्यक्ति सुभाष चाचा से मिलने आए और बाद में तीन पगड़ीधारी व्यक्ति एल्गिन रोड के घर से बाहर गए। मेरे चचेरे भाई गणेश ने एक बहुत रंगीन कहानी सुनाई, जो उसने सुनी थी। एक दिन देर रात एक लंबा, खूबसूरत आदमी गंगा के तट पर आया और नाविक से नदी के बीच में ले जाने के लिए कहा। उसने नाविक को काफी पैसे देने की बात कही, तो नाविक तैयार हो गया। जैसे ही नाव गहरे पानी में पहुंची, एक तेज आवाज सुनाई दी और एक पनडुब्बी सामने आई। उस लंबे व्यक्ति ने नाविक को पैसे थमाए और कूदकर पनडुब्बी में सवार हो गया। 


पनडुब्बी ने एक बार फिर तेज आवाज की और पानी में समा गई। एल्गिन रोड के घर को संग्रहालय में तब्दील करने के बाद पूरे भारत से लोग इसे तीर्थस्थान की तरह देखने आने लगे। एक बार मैंने सुना कि एक बूढ़ी महिला अपने छोटे पोते को बता रही थी कि कैसे सुभाष चाचा ने खुद को शरीरविहीन जीव में बदल लिया और कमरे की खिड़की के लोहे की सलाखों से निकलकर भागने के लिए सड़क पर उतर गए। सुभाष चाचा का दुस्साहसिक और उल्लेखनीय कारनामा यह था कि वह एक वास्तविक और प्रतिबद्ध क्रांतिकारी थे, जो कई परी कथाओं का विषय बन गए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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पुदुच्चेरी की दिलचस्प राजनीति और नारायणसामी की भूमिका (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस 

एक वक्त था जब कांग्रेस नेता और पुदुच्चेरी के वर्तमान मुख्यमंत्री वी नारायणसामी को उनके नारंगी बालों की वजह से बहुत दूर से पहचाना जा सकता था। अब उनकी जगह काले बालों ने ले ली है। हां, गंभीरता दिखाने के लिए बीच-बीच में कुछ भूरे-सफेद बाल भी हैं। बहरहाल, पुदुच्चेरी (और तमिलनाडु) में आगामी अप्रैल-मई में आम चुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों में नारायणसामी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

इस महीने के आरंभ में संकट को टालने के लिए ही नारायणसामी ने अपने कांग्रेस सहयोगियों के साथ खुली सड़क पर सितारों के नीचे रात बिताई। अवसर था पुदुच्चेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का। वही किरण बेदी जिन्हें नारायणसामी दुष्ट आत्मा तक बता चुके हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि कांग्रेस की चुनावी साझेदार द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) इस विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं थी। पार्टी ने केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ कांग्रेस सरकार के बुलाए विधानसभा के विशेष सत्र में भी हिस्सा नहीं लिया। वह यह दबाव बना रही है कि कांग्रेस अपने दम पर अकेले विधानसभा चुनाव लड़े। सत्ताविरोधी माहौल को देखते हुए नारायणसामी चुनावी मुद्दे की तलाश में हैं। किरण बेदी ने शायद उन्हें यह अवसर प्रदान किया है।


अन्य दावेदारों की बात करें तो ए नमशिवायम को सरकार में शामिल कर लिया गया और पूर्व मुख्यमंत्री वी वैद्यलिंगम लोकसभा में चले गए। ऐसे में कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने पार्टी में अपने विरोधियों को शांत कर लिया है लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या है द्रमुक का प्रबंधन करना। यह वह दल है जिसे कांग्रेस अपना सहयोगी मानती है। सन 2016 के विधानसभा चुनाव में इस गठजोड़ को 56 फीसदी मत मिले थे।


परंतु इस बार द्रमुक की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं। द्रमुक सांसद एस जगतरक्षकन, जो पुदुच्चेरी के प्रभारी रहे हैं, उन्होंने पिछले दिनों एक बैठक के बाद कहा कि उनकी पार्टी सभी 30 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और सारी सीटें जीतेगी। उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि वह नाकाम होते हैं तो उसी मंच पर आत्महत्या कर लेंगे। जाहिर है अगर द्रमुक जीतती है तो वह मुख्यमंत्री हो सकते हैं।


मौजूदा विधानसभा में द्रमुक के तीन विधायक हैं जबकि कांग्रेस के 15 विधायक। पड़ोसी राज्य तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (एआईएडीएमके) के पास चार सीटें हैं जबकि कांग्रेस से अलग होकर बनी अखिल भारतीय एनआर कांग्रेस के पास सात सीटें हैं। विधानसभा में 30 सीटे हैं। पुदुच्चेरी में 23, कारैक्काल में 5 तथा माहे और यनम मेंं एक-एक सीट है। ये सभी सीटें बहुत छोटे आकार की हैं जहां कुल मतदाता 15,000 से 30,000 के बीच हैं।


सन 2016 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सभी 30 सीटों पर अपने दम पर लड़ी थी लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। कांग्रेस ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 15 पर जीत हासिल हुई थी। द्रमुक नौ सीटों पर लड़ी और उसे दो पर जीत हासिल हुई। एआईएडीएमके ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे चार पर जीत हासिल हुई। एआईएनआर कांग्रेस ने सभी 30 सीटों पर प्रत्याशी उतारे और आठ पर जीती।


अधिकांश मौकों पर यही देखने को मिला है कि तमिलनाडु में जीतने वाला गठबंधन ही पुदुच्चेरी में जीतता है और परिणाम कमोबेश एक समान होते हैं। परंतु 2016 में यह रुझान उलट गया: हालांकि एआईएडीएमके को तमिलनाडु में जीत मिली और उसने सरकार भी बनाई लेकिन पुदुच्चेरी में कांग्रेस-द्रमुक गठजोड़ सत्ता में आया। इस बार गठबंधन टूटने की कोई वजह नहीं है केवल जगतरक्षकन की महत्त्वाकांक्षा ही आड़े आ रही है।


नारायणसामी पुरानी शैली के कांग्रेसी राजनेता हैं। वह शांत और समझदार हैं। सन 2016 में वह विधानसभा के सदस्य तक नहीं थे लेकिन वह चुने गए और उन्होंने पांच वर्ष तक पार्टी को एकजुट रखा। राजीव गांधी उन्हें पुदुच्चेरी से दिल्ली ले गए थे। वह महज 31 वर्ष की उम्र में राज्य सभा के सदस्य बने। एसएस आहलूवालिया, रत्नाकर पांडेय और सुरेश पचौरी के साथ वह संसद में राजीव के उस दस्ते का हिस्सा थे जिसे शोर मचाने वाला माना जाता था। नरसिंह राव के दौर में वह संसदीय दल के नेता बने। वह पहली बार तब सुर्खियों में आए जब राव के निर्देश पर सन 1996 में उन्होंने संयुक्त मोर्चा सरकार को कांग्रेस का समर्थन पत्र देने में देरी की। नतीजा यह हुआ कि अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। राव को आशा थी कि वाजपेयी की विफलता के बाद राष्ट्रपति उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे। नारायणसामी उस बड़े खेल में एक छोटा हिस्सा थे।


नारायणसामी की सबसे बड़ी प्रतिभा सतर्कता से पेशकदमी करने की है। उन्हें सभी पसंद करते हैं। उनके जीवन की शुरुआत गुलाम नबी आजाद और ऑस्कर फर्नांडिस जैसे लोगों को रिपोर्ट करने से हुई। अब वह उनसे आगे निकल चुके हैं। अहमद पटेल के साथ उनके बहुत खास रिश्ते थे। जब राहुल गांधी केवल सांसद थे तब नारायणसामी उनके आवास पर नियमित मुलाकात के लिए जाते थे।


हाल ही में सी-वोटर-एबीपी के एक पोल में कहा गया कि पुदुच्चेरी में कांग्रेस की सत्ता में वापसी मुश्किल है। कारण केवल यह नहीं है कि द्रमुक के साथ गठजोड़ टूट रहा है बल्कि राजग की बढ़ती लोकप्रियता भी इसकी वजह है। यहां राजग में भाजपा के साथ एआईएडीएमके और एआईएनआर कांग्रेस भी शामिल हैं। यदि द्रमुक कांग्रेस के साथ गठबंधन से बाहर होती है तो राजग को सत्ता में आने से रोकना मुश्किल नजर आता है। बहरहाल, अभी काफी समय बाकी है और नारायणसामी बालों को रंगीन रखें या काला, उन्हें कमतर नहीं आंका जाना चाहिए।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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ब्रॉडबैंड का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए जरूरी कदम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम पोनप्पा 

गत माह कैबिनेट ने देश भर में वाई-फाई कवरेज का विस्तार करने और ब्रॉडबैंड इंटरनेट की पहुंच और उसका इस्तेमाल बढ़ाने के लिए नीति घोषित की है। इस नीति में उल्लेख किया गया है कि कैसे विशिष्ट प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सार्वजनिक वाई-फाई हॉटस्पॉट नेटवर्क की स्थापना की जा सकती है और ब्रॉडबैंड इंटरनेट को उपयोगकर्ताओं को बेचा जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट में इसे काफी उत्साह के साथ दर्ज किया गया। हालांकि कई बार इसे लेकर भ्रामक रिपोर्टिंग भी की गई। जाहिर है दूरसंचार सेवा प्रदाताओं और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं ने इसका कड़ा विरोध किया है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि ऐसा करना उनके लाइसेंसशुदा अधिकारों का अतिक्रमण होगा। उनकी यह दलील सही प्रतीत होती है कि वे भी ऐसी ही शर्तों पर वाई-फाई हॉटस्पॉट विकसित कर सकते हैं क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में इस बात की अनदेखी कर दी गई है कि उन्होंने पहले ही इन लाइसेंस के लिए भारी धनराशि का भुगतान किया है।


नई नीति के तहत कोई भी व्यक्ति या उद्यम बिना लाइसेंस के सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें सरकार को कोई शुल्क भी नहीं चुकाना पड़ा। अब तक केवल लाइसेंसधारी दूरसंचार कंपनियां और आईएसपी ही ऐसा कर सकते थे और वे इसके लिए बाकायदा लाइसेंस शुल्क चुकाते थे। दूरसंचार कंपनियों को तो स्पेक्ट्रम भी खरीदना होता था। यही कारण है कि बिना सरकारी शुल्क के वाई-फाई सस्ता प्रतीत होता है। नई नीति के कुछ पहलू स्पष्ट नहीं हैं। उदाहरण के लिए मौजूदा कानून इंटरनेट सेवाओं को उपभोक्ताओं को दोबारा बेचने की इजाजत देते हैं या नहीं (पहले इस पर प्रतिबंध था) या फिर यह छोटे कारोबारों के लिए वाणिज्यिक रूप से कैसे व्यवहार्य होगा। दूसरे शब्दों में यदि सस्ती सेल्युलर सेवाओं तक पहुंच सुलभ होगी तो भला कोई भुगतान क्यों करेगा? एक सवाल यह भी है कि क्या रुचि होने पर गूगल, फेसबुक, एमेजॉन आदि विदेशी कंपनियों को यह इजाजत होगी कि वे संचार सेवाओं में निवेश कर सकें। खासतौर पर कॉर्पोरेट और सघन वाणिज्यिक क्षेत्रों में। इसके अलावा क्या रुचि रखने वाली भारतीय कंपनियों को ऐसा करने दिया जाएगा। इन सवालों के जवाब आवश्यक हैं।


सर्वव्यापी ब्रॉडबैंड इंटरनेट की सबसे बड़ी आवश्यकता है उच्च क्षमता वाले विश्वसनीय संचार की। यदि डेटा के प्रवाह की समुचित व्यवस्था नहीं की गई तो इसकी उपलब्धता और पहुंच बहुत सीमित रहेगी। नीतिगत बदलाव का पूरा ध्यान अंतिम उपभोक्ता पर केंद्रित है जबकि हमारी समस्याएं फाइबर कोर या सबनेटवर्क तक विस्तारित हैं। फाइबर से ग्राहक के घर तक या ग्राम पंचायत से गांव तक का मध्यम स्तर का लिंक भी नदारद है। भारतीय दूरसंचार विकास सोसाइटी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश गांव ग्राम पंचायत से 5-10 किलोमीटर के दायरे में हों।


ब्रॉडबैंड पहुंच में सुधार की आवश्यकता को स्वीकार करना होगा। इस दिशा में एक कदम यह हो सकता है कि संचार शृंखला में मौजूद कमियों को दूर किया जाए। इसमें वितरण और तकनीकी क्षेत्र की कमियां भी शामिल हैं। डिजिटल संचार का सबसे बुनियादी तत्त्व है संचार। ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा आपूर्ति की बात करें तो कहां किस तरह की आवश्यकता है, इसे लेकर योजना और क्रियान्वयन में कमी देखने को मिल रही है। ऐसा कुछ हद तक इसलिए है क्योंकि बाजार की अपेक्षा स्वसंगठित तंत्र की है जो हर जगह मौजूद नहीं है।


मध्य मील के लिए वायरलेस सेवाएं काफी करीब हैं क्योंकि स्पेक्ट्रम उपलब्ध है लेकिन भारत में उसकी इजाजत नहीं है। यह वह स्थान है जो प्रमुख नेटवर्क को स्थानीय नेटवर्क से जोड़ता है। ऐसा आंशिक तौर पर इसलिए है क्योंकि कुछ बैंड को अलग-अलग तरीके से बरतने को लेकर विवाद है। उदाहरण के लिए खुला वाई-फाई या दूरसंचार कंपनियों की सीमित पहुंच या प्रसारण या फिर केवल 4जी आदि। दूरसंचार विभाग के मुताबिक केवल लाइसेंस वाले सेवा प्रदाताओं को इन बैंड तक अबाध पहुंच की जरूरत होगी।


दूसरा पहलू विचार और सलाह-मशविरे से संबंधित है क्योंकि यहां मामला नई नीति के साथ विरोधाभास का है और एकदम अलग नीति की मांग करता है। इसके बावजूद यह अहम है क्योंकि ऐसी अहम बुनियादी सेवा में स्थिरता बरकरार रखना आवश्यक है जो जीवन, कामकाज, शिक्षा, मनोरंजन, सरकार और सुरक्षा समेत तमाम पहलुओं को प्रभावित करती है या उनसे संबंध रखती है। इसी प्रकार फिलहाल जब दुनिया महामारी से जूझ रही है और फंसी हुई परिसंपत्ति बड़ी बाधा बनी हुई है तब हमें न्यूनतम उथलपुथल के साथ उपयोग बढ़ाने की जरूरत है। क्या बेहतर नहीं होगा कि दूरसंचार कंपनियों और आईएसपी से सरकारी शुल्क समाप्त कर दिया जाए और इस क्षेत्र के लाइसेंसधारक सेवाप्रदाताओं को भी आगे बढऩे का अवसर दिया जाए? ऐसा इसलिए भी कि उनके पास बाजार में स्थापित पहुंच है, क्षमता है और अनुभव है। इससे जरूरी समय पर स्थिरता कायम रखने में मदद मिलेगी। सेवाप्रदाताओं के पास यह अधिकार है और वे विस्तार के अवसर का भी लाभ उठाना चाहेंगे। लेकिन ऐसा तभी होगा जब उन्हें संसाधन और प्रोत्साहन मिले। संसाधन के रूप में वह राशि काम आ सकती है जो लाइसेंस शुल्क नहीं चुकाने से बचेगी। सभी सरकारी शुल्क और लाइसेंस शुल्क समाप्त कर दिए जाने चाहिए। ऐसे में न केवल सेवा प्रदाता कई शहरी इलाकों में हॉटस्पॉट में निवेश करेंगे बल्कि संचार सेवा उद्योग में नई तेजी भी देखने को मिलेगी।


निष्पक्ष तरीके से देखा जाए तो सेवा प्रदाता पहले ही लाइसेंस शुल्क चुका चुके हैं और वे स्पेक्ट्रम की नीलामी की कीमत भी दे चुके हैं। ऐसे में सरकारी शुल्क इन कंपनियों के राजस्व का 30 फीसदी हो जाता है। उन्हें आयकर अलग से चुकाना होता है। 2जी घोटाले ने इस क्षेत्र की गति पूरी तरह समाप्त कर दी थी क्योंकि कुछ के खिलाफ जुर्माने ने पूरे उद्योग को भयभीत किया। स्पेक्ट्रम महंगा हो गया और उपकरणों की लागत भी बढ़ी। इन बातों का असर राजस्व पर पड़ा। परिणामस्वरूप उपभोक्ता कई सुविधाओं से वंचित हैं और उत्पादकता पर असर पड़ा है।


यदि ऐसा हो गया तो संविदा भंग के मामलों का जोखिम भी समाप्त हो जाएगा। हालांकि अतीत से प्रभावी कर की समस्या को समाप्त करना शेष रहेगा। 5जी तथा स्पेक्ट्रम का प्रबंधन करने के लिए भी रुख में व्यापक बदलाव करने होंगे। इन बदलावों के कारण उत्पन्न अंतर जिसे नई नीति कवर करती है, उसके लिए ग्रामीण इलाकों में सामुदायिक वाई-फाई नेटवर्क की आवश्यकता होगी क्योंकि शायद वे वाणिज्यिक रूप से कम आकर्षक हों और सहयोगी व्यवस्था के अभाव में उनका निर्माण और संचालन करना मुश्किल होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार को प्रोत्साहन की जरूरत होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन  

देश की विनिर्माण गाथा की विफलता को लेकर नीति निर्माता चिंतित हैं। आत्मनिर्भर भारत जैसी पहल इसकी अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति है क्योंकि यह मान लिया गया है कि बिना व्यापारिक और शुल्क संबंधी संरक्षण के देश, विनिर्माण क्षेत्र के विकास में सक्षम नहीं है। एक बार इस दिशा में बढऩे के बाद कारोबारी लॉबियां नीतियों को और अधिक संरक्षणवादी बनाने का दबाव बनाने लगेंगी। यह हो भी रहा है। उत्पादन से संबंधित प्रोत्साहन कार्यक्रम के अधीन आने वाली कंपनियां और अधिक केंद्रित लक्ष्यों की मांग कर रही हैं और कह रही हैं कि अधिक तादाद में क्षेत्रों को संरक्षण कार्यक्रम में शामिल किया जाए।


शायद अब यह स्वीकार करने का वक्त आ गया है कि भारत पूर्वी एशियाई देशों की निर्यात आधारित विनिर्माण गाथा को दोहराने नहीं जा रहा। वह शायद बांग्लादेश जैसा प्रदर्शन भी नहीं कर पाए। जैसा कि सन 2012 से हमारा आधिकारिक लक्ष्य भी है, यदि देश विनिर्माण को जीडीपी के बढ़े घटक के रूप में तैयार करता है तो यह घरेलू बाजार पर आधारित होगा और इसकी लागत भी अधिक होगी। वह लागत घरेलू उपभोक्ताओं को वहन करनी होगी जबकि अर्थव्यवस्था प्रमुख कारोबारी समूहों से बाहर रहेगा और निर्यात के मोर्चे पर नुकसान उठाएगा।


इसकी भरपाई सेवा क्षेत्र से होगी। दुनिया भर में सेवा व्यापार तीसरा सबसे बड़ा व्यापार है। भारत में यह अनुपात लगभग दोगुना यानी 60 प्रतिशत है। यदि श्रम निर्यात के कारण देश में आने वाले धन को शामिल किया जाए तो यह शायद और अधिक होगा। यह पूंजी की आवक के बजाय सेवा निर्यात से होने वाली आय है। बीते पांच वर्ष में देश के निर्यात में पारंपरिक सेवा निर्यात की भी अहम हिस्सेदारी रही है। वाणिज्यिक निर्यात की हिस्सेदारी आधी से कम रह गई है। भारत जैसी विकास अवस्था वाली अर्थव्यवस्था के लिए यह अत्यंत विशिष्ट बात होगी। इससे रुपया भी उस स्तर तक बढ़ेगा जहां विनिर्माण निर्यात बहुत महंगा हो जाएगा।


यह पसंद आए या नहीं लेकिन सेवा क्षेत्र मूल्यवद्र्धन का वह क्षेत्र है जिसके सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी तुलनात्मक लाभ तथा अन्य कौशल का लाभ उठाना होगा। देश में स्थित उपक्रम चाहे वे देसी हों या विदेशी उन्हें उनकी तकनीकी सेवा संबंधी विशेषज्ञता के कारण न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था का सेवा केंद्र बनाना होगा बल्कि नए क्षेत्रों मसलन कृत्रिम मेधा और डेटा आदि के रचनात्मक क्षेत्र में भी विशेषज्ञता हासिल करनी होगी। हमें चिप निर्माण के बजाय चिप डिजाइन करना होगा। इस क्षेत्र में अभी ताइवान, अमेरिका और कोरिया का एकाधिकार है। इसी तरह हमें विमान इंजन बनाने के बजाय उसका डिजाइन तैयार करना होगा।


भारत पहले ही उपभोक्ताओं के डिजिटलीकरण की तेज गति के साथ दुनिया को अपनी क्षमता दिखा चुका है। मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट ने इसका उल्लेख सबसे बड़े और तेज बढऩे वालों में किया। प्रति मोबाइल उपभोक्ता औसत डेटा खपत भी चीन से अधिक और कोरिया के समान है। यह जियो जैसी कंपनियों के कारण संभव हुआ क्योंकि उन्होंने सस्ता डेटा दिया। इसके अलावा कम लागत पर तत्काल भुगतान का बुनियादी ढांचा तैयार हुआ और देश में खुदरा डिजिटल भुगतान सालाना 50 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में जहां एक मंच पर एक करोड़ से अधिक उद्यम मौजूद हैं, उसे तकनीकी क्षमता मुहैया कराई गई। 1.2 अरब लोगों के पंजीयन के साथ डिजिटल पहचान व्यवस्था कायम की गई। सरकारी योजनाओं का प्रत्यक्ष लाभ दिलाने के लिए सॉफ्टवेयर पैकेज तैयार किया गया। इन मंचों का इस्तेमाल करके कई कारोबार खड़े किए गए। देश में बड़ी तादाद में यूनिकॉर्न (स्टार्टअप जिनका कारोबार 100 करोड़ डॉलर से अधिक हो) होने की यह भी एक वजह है। मूल्यांकन में उछाल अभी शुरू ही हुआ है क्योंकि निवेशक  पैसा लगा रहे हैं। औद्योगिक संगठन नैसकॉम का कहना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था 10 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है। उसका कहना है कि हर पांचवीं स्टार्टअप वैज्ञानिक या अभियांत्रिकी संबंधी चुनौतियों के हल पर केंद्रित है और यह सबसे तेज विकसित होने वाला हिस्सा है। बड़े उद्यमों को डेटा विश्लेषण मुहैया कराया जा रहा है और पहली स्टार्ट अप विदेशी बाजारों में प्रवेश कर चुकी है। उत्पादकता में व्यापक सुधार हो सकता है। यदि समुचित विपणन नीतियां तैयार की गईं तो कृषि क्षेत्र की आय में भी सुधार हो सकता है। बिचौलियों की कीमत पर उत्पादक का मूल्यवर्धन करके ऐसा किया जा सकता है।


इस मॉडल पर बनी अर्थव्यवस्था में कुशल-अकुशल कर्मियों की तुलना में पेशेवर कामगार बढ़ेंगे। इससे कम शिक्षित तबके को नुकसान होगा क्योंकि उसका जीवन अनिश्चित होगा। संपत्ति अधिक संकेंद्रित होगी। वित्त मंत्री के लिए अंतिम स्तर पर वित्तीय हस्तांतरण अपरिहार्य हो जाएगा। यदि शीर्ष पर संकेंद्रित संपत्ति पर कर नहीं लगाया गया तो यह फंडिंग मुश्किल होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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शेयरों में उछाल से मामूली सुकून (हिन्दुस्तान)

अरुण कुमार, अर्थशास्त्री 


कोरोना महमारी की वजह से पैदा हुए आर्थिक संकट से क्या हम तेजी से उबरने लगे हैं? गुरुवार को बंबई शेयर सूचकांक आश्चर्यजनक रूप से 50 हजार के आंकड़े के पार चला गया। अपने 145 साल के इतिहास में पहली बार बीएसई ने इस ऊंचाई को छुआ है। दूसरी तरफ, रिजर्व बैंक का मानना है कि देश की जीडीपी दर सकारात्मक होने के करीब है, और वित्त वर्ष 2020-21 की तीसरी तिमाही में यह बढ़कर 0.1 फीसदी हो सकती है। सरकार यह भी मान रही है कि चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था में 7.7 फीसदी की ही गिरावट हो सकती है, जो पहले 10 फीसदी आंकी गई थी। जाहिर है, ये आंकड़े किसी को भी सुकून दे सकते हैं। मगर इन्हीं आंकड़ों के आधार पर पूरी अर्थव्यवस्था को सेहतमंद बता देना भ्रम पैदा करने जैसा होगा। सबसे पहले बात शेयर बाजार की। यह लोगों की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है। अपने यहां अब भी महज तीन फीसदी आबादी इक्विटी म्यूचुअल फंड में पैसे लगाती है। इसकी तुलना यदि अमेरिका जैसे देश से करें, तो वहां शेयर बाजार में लगभग आधी आबादी निवेश करती है।  दिक्कत यह भी है कि अपने यहां 0.1 फीसदी कारोबारी ही पूरे शेयर बाजार पर हावी हैं। ये वे लोग हैं, जिनकी कंपनियां अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। जैसे कि तकनीक और प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनियां, एफएमसीजी यानी उपभोक्ता वस्तु बनाने वाली कंपनियां आदि। इसीलिए शेयर बाजार की इस उछाल को आम लोगों की आर्थिक तरक्की से नहीं जोड़ सकते। सेंसेक्स की इस तेजी की एक वजह और भी है। अब बैंक जैसे वित्तीय संस्थानों में ब्याज कम हो गए हैं। इनमें ब्याज दरें लगातार घटती गई हैं, जिसके कारण निवेशक नए विकल्प तलाश रहे हैं। रियल एस्टेट उनके निवेश का एक रास्ता जरूर था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उसमें भी मंदी छाई हुई है। अच्छी बात है कि कोरोना संकट को देखते हुए अमेरिका, यूरोप जैसे देशों के बाजार में वहां के केंद्रीय बैंकों ने तरलता बढ़ाई है। अपने यहां भी नौ लाख करोड़ रुपये की नकदी बाजार में आने की बात कही जा रही है। चूंकि बैंकों की हालत अभी खस्ता है और रियल एस्टेट से आमद कम, इसलिए स्वाभाविक ही शेयर बाजार की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा है।

जनवरी 2020 की तुलना में भी हमारी अर्थव्यवस्था अब भी लगभग 10 फीसदी कम है। लॉकडाउन हटने के बाद कुछ ही कंपनियां खुद को संभाल सकी हैं। विमानन उद्योग, पर्यटन उद्योग, होटल-रेस्तरां आदि की हालत तो अब भी खस्ता है। आकलन यह है कि ऐसी स्थिति अभी एक-डेढ़ साल तक बनी रहेगी। इसका सीधा मतलब है कि इतने दिनों तक बाजार में भी अनिश्चितता बनी रहेगी। उम्मीद जरूर कोरोना टीकाकरण अभियान से है, और माना जा रहा है कि जैसे-जैसे इसमें गति आती जाएगी, अर्थव्यवस्था में सुधार दिखने लगेंगे। मगर टीकाकरण की रफ्तार को देखकर यही कहा जा सकता है कि देश की 60 फीसदी आबादी को टीका लगने में एक साल का वक्त लग जाएगा। यानी बाजार अभी अनिश्चितता में फंसा रहेगा। ऐसे में, शेयर बाजार की यह तेजी इसलिए भी छलावा साबित हो सकती है, क्योंकि अब भी यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता कि कोविड-19 संक्रमण की नई लहर अपने यहां नहीं आएगी। कई देशों में कोरोना संक्रमण बढ़ने पर फिर से लॉकडाउन लगाया गया है। इसलिए जब तक हम ‘हर्ड इम्यूनिटी’ विकसित नहीं कर लेते, बाजार के स्थिर होने का दावा नहीं कर सकते। अपने यहां साल 2007 के दिसंबर में सेंसेक्स पहली बार 21 हजार के पार गया था। उस वक्त दुनिया भर में जबर्दस्त तेजी थी। मगर सब-प्राइम संकट की वजह से जब अमेरिका में प्रॉपर्टी बाजार का गुब्बार फूटा, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था डूब गई। हर देश के शेयर बाजार 50 फीसदी से भी ज्यादा गिर गए। अपने यहां भी तब सूचकांक घटकर 9,000 पर आ गया था। 1990 के दशक के हर्षद मेहता घोटाले ने भी आम लोगों की जमा-पूंजी को डूबा दिया था। इसीलिए शेयर बाजार को असल अर्थव्यवस्था से अलग माना जाता है।

रही बात सकल घरेलू उत्पाद की, तो इसके तिमाही आंकड़े लगातार अच्छी तस्वीर दिखा रहे हैं। यह वाजिब भी है। हमने अब अपने बाजार पूरी तरह से खोल दिए हैं। लॉकडाउन के दौरान देशव्यापी बंदी की जो स्थिति थी, वह अब पूरी तरह से खत्म हो गई है। ऐसे में, उत्पादन का बढ़ना बिल्कुल स्वाभाविक है, जिसका असर बाजार पर भी दिख रहा है और आंकड़ों में भी। मगर सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में मुख्यत: संगठित क्षेत्र को शामिल किया जाता है। इसमें कृषि को छोड़कर किसी असंगठित क्षेत्र की गिनती नहीं होती। हमारी अर्थव्यवस्था में 14 फीसदी हिस्सा कृषि का है, जबकि 31 प्रतिशत के करीब हिस्सेदारी गैर-कृषि असंगठित क्षेत्र की है। वित्तीय संस्थाएं यह मान बैठती हैं कि संगठित क्षेत्र की तरक्की के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र भी समान गति से आगे बढ़ते हैं। वास्तव में, यह सोच गलत है।

यदि असंगठित क्षेत्र को भी जीडीपी के आंकड़ों में शामिल कर लें, तो अब भी हमारी अर्थव्यवस्था नकारात्मक 10 फीसदी होगी और उसकी सालाना गिरावट निगेटिव 29 फीसदी। यह भी इस आधार पर अंदाजा लगाया गया है कि जनवरी में पांच फीसदी की गिरावट के बावजूद फरवरी में हमारी अर्थव्यवस्था साल 2019 के स्तर पर आ जाएगी। असंगठित क्षेत्रों की हालत कितनी बिगड़ी हुई है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक महीने पूर्व सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग की 20 फीसदी इकाइयां अपना कर्ज वापस करने में सक्षम नहीं थीं। इसका अर्थ है कि उनके पास पैसे नहीं हैं, जबकि असंगठित क्षेत्र की बुनियाद पर ही संगठित क्षेत्र आगे बढ़ सकता है। साफ है, दो महीने की तुलना में अभी जीडीपी दर बेशक ज्यादा है, लेकिन साल 2019 के बनिस्बत यह अब भी काफी कम है। लॉकडाउन के समय हमारे यहां उत्पादन में लगभग 75 फीसदी की गिरावट आई थी, और यह अब भी 10 फीसदी कम है। इसलिए अगले वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में हम अप्रत्याशित वृद्धि भी देख सकते हैं। लेकिन इसको अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर तो नहीं ही कहेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Friday, January 22, 2021

एकता का संदेश (प्रभात खबर)

ऐसे समय में जो बाइडेन ने राष्ट्रपति का पदभार संभाला है, जब अमेरिका कई समस्याओं से घिरा है तथा दुनिया में भी उसका प्रभाव कम हुआ है. चुनाव अभियान के दौरान और जीत के बाद वे इन चुनौतियों को रेखांकित करते रहे थे. बतौर राष्ट्रपति अपने पहले संबोधन में उन्होंने समाज और राजनीति में विभाजन को समाप्त कर सभी अमेरिकियों के राष्ट्रपति के रूप में काम करने का भरोसा दिलाया है.



उन्होंने महामारी की मुश्किल और लोगों की रोजी-रोटी पर इसके भयावह असर से भी देश को निकालने का वादा किया है. एक महाशक्ति होने के नाते वैश्विक राजनीति और आर्थिकी में अमेरिका के महत्व को भी बाइडेन ने स्पष्ट किया है. वैसे यह संबोधन एक औपचारिक संदेश था, लेकिन जब हम इसके संदर्भों को देखते हैं, तो यह एक ऐतिहासिक संदेश के रूप में स्थापित होता है.



एक पखवाड़े पहले अमेरिकी लोकतंत्र के केंद्र पर पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थकों का उत्पात हर उस संकट का प्रतीक है, जिससे अमेरिका आज जूझ रहा है. अश्वेत समुदाय और अवैध आप्रवासियों के विरुद्ध अमानवीय आचरण, उग्र श्वेत श्रेष्ठता का विस्तार तथा सत्ता प्रतिष्ठानों से लेकर समाज के बड़े हिस्से में हिंसा और विषमता को स्वाभाविक मानने की बढ़ती प्रवृत्ति जैसे कारकों ने देश को दो भागों में बांट दिया है. संबोधन का मुख्य स्वर इस बंटवारे को चिन्हित करना और इसे पाटने के लिए देश को एकजुट करना है.


अपने भाषण में उन्होंने ‘हम’ शब्द का सर्वाधिक प्रयोग किया है और राष्ट्रीय विभाजन को ‘असभ्य युद्ध’ की संज्ञा दी है. ‘हम’, ‘हमें’ और ‘हमारा’ जैसे सर्वाधिक प्रयुक्त शब्द जहां एकता का आह्वान करते हैं, वहीं कई बार बोले गये ‘मैं’ और ‘मेरा’ इंगित करते हैं कि बाइडेन देश का नेतृत्व करने के लिए कृतसंकल्प हैं तथा वे लोगों से भी उनके ऊपर भरोसा करने का निवेदन कर रहे हैं.


महामारी और ट्रंप प्रशासन की विफलताओं से अमेरिकी अर्थव्यवस्था बेहाल है. इसीलिए राष्ट्रपति के पहले संबोधन में संक्रमण की रोकथाम के साथ रोजगार और कारोबार चिंता प्राथमिकताओं में है. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान को लेकर हालिया अमेरिकी बेपरवाही से धरती बचाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को धक्का लगा है. इन समस्याओं से अमेरिका भी प्रभावित है.


बाइडेन के संबोधन में इस वैश्विक चुनौती का उल्लेख प्रमुखता से हुआ है और उन्होंने पहले ही दिन पेरिस जलवायु समझौते में अमेरिका के फिर से शामिल होने की घोषणा की है. यह शेष विश्व के लिए एक सकारात्मक पहल है. ‘अमेरिका फर्स्ट’ की ट्रंप नीति से देश को क्या फायदा हुआ, यह तो बहस की बात है, पर इस रवैये के कारण अपने मित्र देशों और दुनिया से अमेरिका के संबंध कमजोर हुए. बाइडेन ने इन संबंधों को प्राथमिकता देने की बात कही है, जो भारत व दक्षिण एशिया के लिए अच्छा संकेत है. बाइडेन की राह आसान तो नहीं होगी, पर संबोधन में उनके अनुभव और संकल्प स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होते हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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प्रशासनिक सुधारों का सही समय (प्रभात खबर)

By जीएन बाजपेयी 

 

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2020-21 के बजट के रूप में एक युगांतकारी- सदी का विशिष्ट- बजट प्रस्तुत करने के अपने इरादे को सार्वजनिक तौर से जाहिर किया है. नीतियों की घोषणा और संसाधनों के आवंटन के संदर्भ में इस बात का मतलब अपने-अपने ढंग से निकाला जा सकता है, परंतु व्यापक विचार-विमर्श ने उन्हें अर्थव्यवस्था के सभी पहलुओं से संबंधित ढेर सारे सलाह उपलब्ध कराये हैं, लेकिन यह भी है कि इनमें से अधिकांश सलाह करों में छूट, वित्तीय विवेक, भौतिक एवं सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर और उपभोग वृद्धि में संसाधनों के उदार आवंटन से संबंधित हैं.



वर्तमान राजनीतिक कार्यपालिका ने संरचनात्मक सुधारों से संबंधित उपादान उत्पादकता (फैक्टर प्रोडक्टिविटी) को कमोबेश पूरा कर लिया है. आशा है कि अनुभव से सीखते जाने की प्रक्रिया में भूमि, श्रम एवं पूंजी में सुधार तथा बेहतरी के प्रयास भी बरकरार रहेंगे. यदि आवंटन से जुड़ी कुशलता में बेहतरी आती है, तो संरचनात्मक सुधारों से अर्थव्यवस्था लाभान्वित होगी. संसाधनों की आवंटन की प्रभावोत्पादकता मध्यस्थता की गुणवत्ता से निर्धारित होती है. भारत में मध्यस्थ संस्थानों के कामकाज का रिकॉर्ड बहुत गौरवपूर्ण नहीं है.



कई वर्षों के कामकाज के दौरान हर एक संस्थान में ऐसे लोग पैदा हो जाते हैं, जो उत्पादकता या प्रदर्शन में बिना किसी समुचित योगदान के धन हासिल करने की कोशिश करते हैं. इसी तरह निहित स्वार्थ भी अस्तित्व में आ जाते हैं. राज्य के संगठन, कार्यपालिका की सहनशीलता और जनता के धैर्य के हिसाब से ऐसे तत्वों की संख्या बढ़ती रहती है.


स्वार्थी और धन बनाने पर आमादा तत्व अवरोध पैदा कर, बाड़ लगाकर और धन के गलत बहाव के लिए तंत्र में छेद बनाकर काम के पूरा होने या सेवा को सही जगह पहुंचने या उत्पादन की प्रक्रिया की अवधि बढ़ाते हैं और संसाधनों के समुचित आवंटन की क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं.


भारत ने विरासत में स्वतंत्रता से पहले के कुछ शासकीय संस्थानों को हासिल किया था, जिनमें न्यायपालिका और प्रशासन सबसे महत्वपूर्ण थे. जनसंख्या में बढ़ोतरी, राज्य के गठन में परिवर्तनों, अर्थव्यवस्था की संरचना तथा भारत के लोगों की आकांक्षाओं में बदलाव आदि के बावजूद इन संस्थानों में बहुत मामूली बदलाव ही हुए हैं. ऐसे में पूरी प्रणाली घुमावदार, मनमानीपूर्ण, निराशाजनक और बेमतलब हो चुकी है.


विश्व बैंक की वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, ठेकों को निर्धारित समय पर पूरा करने के मामले में दुनिया में भारत का स्थान 164वां है. पहली ही अदालत में किसी कंपनी के एक व्यावसायिक विवाद का निपटारा होने में औसतन 1445 दिन लग जाते हैं तथा इस कार्यवाही में विवादित मूल्य का 30 प्रतिशत खर्च हो जाता है.


संस्थाओं के स्वरूप में बदलाव, उनके कार्य क्षेत्र का पुनर्निर्धारण और कामकाज के तौर-तरीकों का पुनर्लेखन आज की प्राथमिक आवश्यकता है. बीते कुछ दशकों से प्रशासनिक सुधारों की मांग हो रही है. अनेक सरकारों ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए कामकाज में बेहतरी लाने की कोशिश की है, लेकिन सेवाओं को सही ढंग से प्रदान करने तथा लक्षित लोगों की संतुष्टि के मामले में बेहतरी में मामूली बढ़ोतरी ही हो सकी है.


वर्तमान सरकार ने भी प्रशासनिक आयोग की सिफारिशों तथा विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तावित परिवर्तनों पर ध्यान दिया है. राजस्व जिले की मौजूदा रूप-रेखा ब्रिटिश सरकार द्वारा मुख्य रूप से इसलिए बनायी गयी थी कि राजस्व की वसूली हो सके. यह कारण अब इतना अहम नहीं है कि जिला प्रशासन के कार्मिकों की इतनी बड़ी सेना रखी जाए. संस्था की क्षमता, संस्कृति और समन्वय उसी के इर्द-गिर्द बनायी गयी थी. इसलिए आज भी जिलाधिकारी या उपायुक्त ‘हुजूर’ बने हुए हैं.


जिलों और शहरों में प्रशासनिक तंत्र का आज जो प्रमुख उद्देश्य है, वह है विभिन्न नागरिक और कल्याण सेवाओं को मुहैया कराना तथा आर्थिक विकास को सहयोग देना. प्रशासन की अक्षमता और अकुशलता से समाज का असंतोष कभी-कभी अशालीन तरीकों के रूप में बाहर आता है. प्रणाली और प्रक्रिया में छोटे-मोटे बदलाव से संतोष को नहीं बढ़ाया जा सकता है.


ऐसी स्थिति में यदि सांस्थानिक रूप-रेखा और संरचना में पूरी तरह फेर-बदल संभव नहीं है, तो कम-से-कम उनकी दिशा का पुनर्निर्धारण करना तथा उन्हें उद्देश्य और अपेक्षित परिणाम से फिर जोड़ना अत्यावश्यक हो गया है. किसी संस्थान की कार्य क्षमता सूचना, प्रोत्साहन, दंड तथा उत्तरदायित्व से गुंथे अधिकार से निर्धारित होती है. हालांकि आयकर प्रशासन में दूरगामी बदलाव हुए हैं तथा सेवाओं के प्रदान करने में बेहतरी आयी है, लेकिन करदाताओं का भरोसा अभी भी पूरी तरह बहाल नहीं हुआ है, जिससे परिणामों पर बहुत गंभीर असर पड़ रहा है.


ऐसी ही स्थिति न्यायिक सेवाओं के साथ भी है. इस क्षेत्र में अनेक बदलाव की कोशिशें हुई हैं. इनमें से एक प्रयास अलग व्यावसायिक न्यायालयों और ट्रिब्यूनलों की स्थापना भी है. इसके बावजूद लोगों की मुश्किलें अब भी बर्दाश्त के बाहर हैं. यहां तक कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड जैसे बेहद व्यावहारिक कानून के डिजाइन ने भी मामूली मदद की है. यह एक चिंताजनक स्थिति है. इसके कारण बिल्कुल स्पष्ट हैं.


व्यवस्था की बनावट और कामकाज की प्रक्रियाएं पुरानी प्रकृति का ही अवतार हैं. निहित स्वार्थों तथा किसी भी तरह धन बनाने की जुगत में लगे लोग अब भी आराम से अपना काम कर रहे हैं. यदि न्याय देना उद्देश्य है, तो फिर ‘न्याय में देरी न्याय देने से इनकार है.' जब तक नये न्याय शास्त्र का निर्माण नहीं हो जाता है, तब तक पुराना न्याय शास्त्र और न्यायिक मनमानी अपनी प्रभुता नहीं चला सकते हैं. समानता के सिद्धांत से संचालित व्यवस्था में अपेक्षित परिणाम ही निर्धारक कारक होने चाहिए.


‘सदी का विशिष्ट बजट’ में ‘शासन के संस्थानों’ के पूरी तरह से फिर से रचने-गढ़ने का उद्देश्य समाहित होना चाहिए, जहां आम आदमी लाभों को ग्रहण करने में आगे रहे तथा साधन संपन्न लोगों को परिणामों के अपहरण की अनुमति नहीं होनी चाहिए.


ऐसा करना आज की सबसे अहम जरूरत है. यह सच है कि ऐसा एक साल में ही नहीं हो सकता है, लेकिन भविष्य के लिए एक कार्ययोजना बजट के दस्तावेज में स्पष्ट रूप से रेखांकित होनी चाहिए. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय जॉन एफ केनेडी ने एक अर्थपूर्ण बात कही थी कि ‘जब सूरज चमक रहा हो, तब छत की मरम्मत का समय होता है.’ इस महत्वपूर्ण युगांतकारी परिवर्तन को हमारी संसद के दोनों सदनों द्वारा स्वीकृति देने और इसके लिए समाज की एकचित्तता का यही समय है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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बड़े बदलाव के पुरोधा कर्पूरी ठाकुर (प्रभात खबर)

केसी त्यागी, पूर्व सांसद एवं प्रधान, महासचिव, जद (यू)

 

जननायक कर्पूरी ठाकुर का 24 जनवरी को जन्म दिवस है. देश इसे समता और स्वाभिमान दिवस के रूप में स्मरण करता है. बिहार के लगभग सभी राजनीतिक दल कार्यक्रमों और जनसभाओं का आयोजन करते हैं. रोचक है कि इसमें वे नेता एवं संगठन भी शामिल होते हैं, जो उनके जीवन-काल में उनके विचारों एवं कार्यक्रमों के विरोधी रहे. समता, जाति प्रथा का विनाश और स्वाभिमान से जीने की चाह का सपना सच में बदलने का प्रयास कर्पूरी ठाकुर द्वारा किया गया.



दुर्बल एवं साधनहीन लोगों में चेतना लाना, उन्हें संगठित करना और परिवर्तन का वाहक दस्ता बनाना असंभव जैसा कार्य है. विचारों की प्रखरता, अडिग विश्वास ने कर्पूरी जी को कभी विचलित नहीं होने दिया. डॉ आंबेडकर और कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण, विशेष अवसर का सिद्धांत, समता, जाति-विनाश की राजनीति का विरोध कर रहे संगठन एवं व्यक्तियों के समूह उनके जन्म-मृत्यु दिवस पर भव्य कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं.



कर्पूरी ठाकुर जिन विचारों और कार्यक्रमों को जमीन पर उतारने में समर्पित रहे, वे डॉ लोहिया द्वारा प्रतिपादित थे. गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति के जनक डॉ लोहिया बहुप्रयोगधर्मी थे. पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और मंत्रिमंडल में भी विभिन्न वर्गों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए डॉ लोहिया आजीवन प्रयासरत रहे. जब 1967 में डॉ लोहिया की मृत्यु हुई, उस समय बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, पंजाब समेत आधा दर्जन से अधिक प्रांतों में गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने.


सोशलिस्ट पार्टी के असर वाले राज्यों की बागडोर पिछड़े वर्ग के नेताओं के हाथ में रही. उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह, बिहार में कर्पूरी ठाकुर और हरियाणा में राव बीरेंदर सिंह पिछड़े वर्गों के स्थापित नेता थे. डॉ आंबेडकर 1942 में दलित एवं आदिवासी समूहों के लिए आरक्षण का प्रश्न उठा चुके थे, जो स्वतंत्र भारत में संभव हो सका. पिछड़े वर्गों की आधी से अधिक आबादी शिक्षा और नौकरी से दूर थी. स्वतंत्रता के बाद हिस्सेदारी को लेकर समय-समय पर आंदोलन भी होते रहे और आयोग भी गठित हुए.


पहला आयोग काका कालेलकर की अध्यक्षता में गठित हुआ, जिसने इन वर्गों की नगण्य हिस्सेदारी पर अफसोस जाहिर किया और आरक्षण लागू कर इन समूहों की हिस्सेदारी की जोरदार सिफारिश की. ये सिफारिशें लंबे समय तक धूल चाटती रहीं. निःसंदेह कांग्रेस पार्टी ऐसे किसी बड़े परिवर्तन की हिमायती नहीं रही. वर्ष 1967 के गैर-कांग्रेसी प्रयोग और 1977 में जनता पार्टी के गठन से परिस्थितियां बदलीं. उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव, बिहार में कर्पूरी ठाकुर, हरियाणा में चौधरी देवीलाल, पंजाब में प्रकाश सिंह बादल, उड़ीसा में नीलमणि राउत, गुजरात में बाबू भाई पटेल और बाद में महाराष्ट्र में शरद पवार किसान जातियों एवं पिछड़े वर्गों के मुख्यमंत्री बने.


कर्पूरी ठाकुर के सिर पर कांटों का ताज था. पार्टी के अंदर और बाहर निहित स्वार्थों के प्रतिनिधि मोर्चा लगाये हुए थे. 11 नवंबर, 1978 को बिहार विधानसभा में पिछड़ी जातियों के आरक्षण का प्रस्ताव आया, तो जनता पार्टी दो फाड़ हो गयी. कर्पूरी जी के कई साथी भी अपनी जाति समूहों के साथ चिपक गये. आरक्षण में आरक्षण का प्रस्ताव कई पिछड़ी जातियों के स्थापित नेताओं को भी नागवार गुजरा. जब अति पिछड़ों के लिए 12 प्रतिशत, सामान्य पिछड़ों के लिए आठ प्रतिशत, महिलाओं के लिए तीन प्रतिशत और सामान्य श्रेणी के लिए तीन प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गयी, तो कर्पूरी जी सबके निशाने पर आ गये. किसी ने उन्हें उत्तर भारत का पेरियार घोषित कर दिया, तो किसी ने उन्हें आंबेडकर. कुछ ने उन्हें महात्मा फुले और साहू जी महाराज का उत्तराधिकारी बताया. सामाजिक न्याय के इस संघर्ष में उनका मुख्यमंत्री पद चला गया, लेकिन वह शीर्षस्थ नेता के रूप में स्थापित हुए. आज वे हमारे बीच नहीं है, पर पूरे देश में कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण फार्मूले पर अमल हो रहा है.


सामान्य श्रेणी के लिए संविधान में आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी, लेकिन पहले बिहार में नीतीश सरकार ने सवर्ण आयोग गठित कर इन वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की. बाद में केंद्र की मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण को लागू किया. महिलाओं के आरक्षण की चर्चा पहली बार कर्पूरी फार्मूले में शामिल हुई. पिछले दिनों मोदी सरकार ने कर्पूरी फार्मूले पर अमल करने हेतु ‘कोटा के अंदर कोटा’ सिद्धांत को लागू करने के लिए जी रोहिणी आयोग का गठन किया है.


कुछ राज्यों में पहले से ही अति पिछड़े इन सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं. बिहार में कर्पूरी ठाकुर के मानस पुत्र नीतीश कुमार ने अत्यंत पिछड़ों के साथ-साथ महादलित आयोग के जरिये अत्यंत दुर्बल वर्गों के आर्थिक-सामाजिक सशक्तीकरण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है. आज किसी दल, व्यक्ति, समूह में इतना दम-खम नहीं है कि कर्पूरी फार्मूले का विरोध कर सके. सभी दलों, सभ्य समाज के प्रतिनिधि वर्ग को स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर को विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें भारतरत्न देने का आह्वान करना चाहिए, ताकि उनके अनुयायी गौरवान्वित महसूस कर सकें.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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बाइडन का भाषण, घायल अमरीकी मन पर मरहम (पत्रिका)

कुमार प्रशांत

राजनीतिक रूप से अत्यंत अप्रभावी, सामाजिक रूप से बेहद विछिन्न और आर्थिक रूप से लडख़ड़ाते अमरीका के 46वें राष्ट्रपति बनने के बाद कैपिटल हिल की ऐतिहासिक सीढिय़ों पर खड़े हो कर जो बाइडन ने जो कुछ कहा, वह ऐतिहासिक महत्त्व का है। क्यों? इसलिए कि अमरीका के इतिहास का ट्रंप-काल बीतने के बाद बाइडन को जो कुछ भी कहना था वह अपने अमरीका से ही कहना था, और ऐसे में वे जो भी कहते वह ऐतिहासिक ही हो सकता था। इसलिए तब खूब तालियां बजीं, जब बाइडन ने कहा कि यह अमरीका का दिन है, यह लोकतंत्र का दिन है। यह एकदम सामान्य-सा वाक्य था जो ऐतिहासिक लगने लगा, क्योंकि पिछले पांच सालों से अमरीका ऐसे वाक्य सुनना और गुनना भूल ही गया था। यह वाक्य घायल अमरीकी मन पर मरहम की तरह लगा।

लोकतंत्र है ही ऐसी दोधारी तलवार जो कलुष को काटती है, शुभ को चालना देती है। यह अलग बात है कि तमाम दुनिया में लोकतंत्र की आत्मा पर सत्ता के भूख की ऐसी गर्द पड़ी है कि वह खुली सांस नहीं ले पा रहा है। तंत्र ने उसका गला दबोच रखा है। हम पहले से जानते थे कि बाइडन, बराक ओबामा की तरह मंत्रमुग्ध कर देने वाले वक्ता नहीं हैं, बल्कि वह एक मेहनती राजनेता हैं। चूंकि अमरीका को ट्रंप से मुक्ति चाहिए थी, इसलिए भी इतिहास ने इस भूमिका के लिए बाइडन का कंधा चुना। ट्रंप बौद्धिक रूप से इतने सक्षम थे ही नहीं कि अपने देश की राजनीतिक व सांस्कृतिक विरासत को समुन्नत करने की स्वाभाविक व पदसिद्ध जिम्मेवारी को समझ पाते। इस जिम्मेवारी के निर्वहन में विफल कितने ही महानुभाव हमें इतिहास के कूड़ाघर में मिलते हैं। डंपिंग ग्राउंड केवल नगरपालिकाओं के पास नहीं होता, इतिहास के पास भी होता है।

शपथ ग्रहण करने के बाद बाइडन जब कहते हैं कि हम एक महान राष्ट्र हैं, हम अच्छे लोग हैं तब वह अमरीका के मन को ट्रंप के दौर की संकीर्णता से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं। जब उन्होंने कहा कि मैं सभी अमरीकियों का राष्ट्रपति हूं- सारे अमरीकियों का, हमें एक-दूसरे की इज्जत करनी होगी और यह सावधानी रखनी होगी कि सियासत ऐसी आग न बन जाए जो सबको जलाकर राख कर दे तो वह गहरे बंटे हुए अपने समाज के बीच पुल भी बना रहे थे और अमरीकियों को सत्ता व राजनीति की मर्यादा भी समझा रहे थे।

बाइडन ने अमरीकी सीमा के बाहर के लोगों से यानी दुनिया से सिर्फ इतना ही कहा कि हमें भविष्य की चुनौतियों से ही नहीं, आज की चुनौतियों से भी निबटना है। ट्रंप ने आज को ही तो इतना विद्रूप कर दिया है कि भविष्य की बातों का बहुत संदर्भ नहीं रह गया है। राष्ट्र को संबोधित करने की यह परंपरा अमरीका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन ने 30 अप्रेल 1789 को शुरू की थी। यह परंपरा और कुछ नहीं, राष्ट्र-मन को छूने और उसे उदात्त बनाने की कोशिश है। बाइडन के इस सामान्य भाषण में असामान्य था अनुभव की लकीरों से भरे उनके आयुवृद्ध चेहरे से झलकती ईमानदारी। वह जो कह रहे थे मन से कह रहे थे और अपने मन को अमरीका का मन बनाना चाहते थे। वहां शांति, धीरज व जिम्मेवारी के अहसास से भरा माहौल था।

उन्होंने गलती से भी ट्रंप का नाम नहीं लिया जैसे उस पूरे दौर को पोंछ डालना चाहते हों। चुनावी उथलापन, खोखली बयानबाजी, अपनी पीठ ठोकने और सीना दिखाने की कोई छिछोरी हरकत उन्होंने नहीं की। गीत-संगीत व संस्कृति का मोहक मेल था लेकिन कहीं चापलूसी और क्षुद्रता का लेश भी नहीं था। यह एक अच्छी शुरुआत थी। लेकिन बाइडन न भूल सकते हैं, न अमरीका उन्हें भूलने देगा कि भाषण का मंच समेटा जा चुका है। अब वह हैं और कठोर सच्चाइयों के सामने खुला उनका सीना है। इनका मुकाबला वह कैसे करते हैं और अमरीका का मानवीय चेहरा दीपित करते हैं, यह हम भी और दुनिया भी देखना चाहती है।

(गांधी शांति प्रतिष्ठान,दिल्ली के अध्यक्ष)

सौजन्य - पत्रिका।
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नवाचार: 'स्मार्ट' शहरों की नींव बनेगी लिडार तकनीक! (पत्रिका)

डैल्विन ब्राउन,
(इनोवेशंस रिपोर्टर)

भविष्य के शहरी समुदायों के निर्माण के लिए मोबिलिटी विश्लेषक, शहरी नियोजक और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कंपनियां लिजार तकनीक को अहम कड़ी की तरह देख रही हैं। उनका मानना है कि इस तकनीक का सहारा लेकर स्मार्ट शहरों की नींव रखी जा सकती है जहां ऑटोनमस वाहन, स्मार्ट घर और आधारभूत ढांचा आपसी तालमेल के साथ काम करते हैं। 'लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग' (लिडार), सेंसर आधारित तकनीक है और जब ट्रैफिक लाइट, पार्किंग स्थलों और अधिकांश वाहनों पर इसे लगा दिया जाता है तो तकनीक की मदद से शहर ऊर्जा और सुरक्षा का बेहतर प्रबंधन करने में सक्षम हो सकते हैं। यातायात अवरुद्ध होने की समस्या का निवारण भी इसकी मदद से संभव है।

हालांकि यह तकनीक बीती सदी के ७० के दशक से अस्तित्व में है, लेकिन इसे व्यापक इस्तेमाल के लिए बहुत महंगा और जटिल समझा जाता रहा है। दक्षिण कोरिया स्थित कम्प्यूटर विजन कंपनी सोल रोबोटिक्स के संस्थापक हानबिन ली के मुताबिक, 'अब तक ऐसा था, लेकिन अब नहीं है। कीमतें अब इतनी नीचे आ चुकी हैं कि आइफोन के नवीनतम मॉडल में भी यह तकनीक पाई जाती है। इस साल के वैश्विक तकनीक सम्मेलन सीईएस में पेश किए गए कई उत्पादों के केंद्र में यही तकनीक है।' फैक्ट्री, रिटेलर, ऑटोमेकर आदि के लिए लाइट व राडार डेटा का विश्लेषण करने वाली सॉफ्टवेर व हार्डवेयर सर्विस 'डिस्कवरी' को हाल ही सोल रोबोटिक्स ने लांच भी किया है। कंपनी इसे इस्तेमाल में आसान 'प्लग एंड प्ले' लिडार प्रणाली बता रही है, जिसके 3-डी सेंसर की मदद से कई तरह की संस्थाएं लाभान्वित हो सकती हैं।

साभार : द वाशिंगटन पोस्ट

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दुधारू विभाग (पत्रिका)

- भुवनेश जैन

कितने 'गर्व' की बात है कि राजस्थान पथ परिवहन निगम अपना खर्च चलाने के लिए 400 करोड़ रुपए का कर्ज लेने जा रहा है। इस उपलब्धि के लिए परिवहन मंत्री को तमगा दिया जाना चाहिए। शायद मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की राह पर चलते हुए राजस्थान में वे भी रोडवेज को समाप्त करने का 'श्रेय' हासिल कर लें।

राजस्थान में रोडवेज ही नहीं, पूरा परिवहन विभाग ही गर्त में जा रहा है। राजस्थान रोडवेज तो 15 साल से घाटे में है। सरकार के अनुदान के भरोसे किसी तरह गाड़ी चल रही है। ऋण का भार बढ़ता जा रहा है। इसे चुकाएगा कौन, इसकी चिन्ता किसी को नहीं है। आखिर में पैसा आम नागरिकों से ही वसूला जाएगा। रोडवेज में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है। हर माह औसतन 100 परिचालक बिना टिकट यात्री ले जाते पकड़े जाते हैं। परिचालक और डिपो मैनेजर की मिलीभगत के मामले भी पकड़े जा चुके हैं। पर ये अपने आकाओं की कृपा से फिर उसी सीट पर आ बैठते हैं। स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार की कमाई ऊपर तक जाती है। भ्रष्टाचार के मामले में एपीओ हुए अफसरों को वापस उसी सीट पर लगा दिया जाता है। बसों की खरीद में और बड़े घपले होते हैं।

हाल ही में चौंकाने वाली यह बात सामने आई कि राजस्थान रोडवेज की बसों से मिलती-जुलती अवैध बसें रोडवेज के रूटों पर चल रही हैं। रोडवेज की बसें उन रूटों से हटा ली गईं। क्या इतना बड़ा भ्रष्टाचार बिना ऊपरी संरक्षण के हो सकता है? परिवहन विभाग की हालत तो और भी ज्यादा खराब है। इंस्पेक्टर व बाबू एक सीट पर ज्यादा नहीं जम पाए, इसके लिए रोस्टर प्रणाली बनाई गई। यह दिखावा बनकर रह गई। निजी बसें और अन्य वाहन धड़ल्ले से बिना परमिट के चल रहे हैं। मंत्री स्तर पर यह निर्णय लिए जा रहे हैं कि कौन किस सीट पर बैठेगा। कमाई वाली सीटों की बोली भी ऊंची लगती है। पिछले साल भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने मासिक बंधी के आरोप में आठ दलालों और छह अफसरों को पकड़ा था। अब उन्हें भी वापस पोस्टिंग देने की कोशिश हो रही है। ऑटोमैटिक ड्राइविंग ट्रैक का काम निजी कंपनी को दे दिया गया और इसके लिए लाइसेंस फीस बढ़ा दी गई। फिर परिवहन विभाग की फौज किस काम के लिए है?

परिवहन विभाग में बार-बार रोडवेज के निजीकरण की चर्चा हो रही है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की तरह राजस्थान में भी बहुत से राजनेताओं की बसें चल रही हैं। ऐसे ही नेताओं ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में रोडवेज का बंटाधार करवाया है। एक-एक नेता की दो-दो सौ बसें चल रही हैं। जिन मार्गों पर यात्री भार कम होता है, वहां ये निजी बसें चलती ही नहीं। दूरस्थ गांव-कस्बों के हजारों यात्री परेशान हैं। दोनों प्रदेशों में सरकारों को ऐसे यात्रियों की तकलीफों से कोई मतलब नहीं है। कहने को तो लोकतंत्र में 'लोक' की तकलीफें दूर करने के दावे किए जाते हैं, पर बस माफियाओं से गठजोड़ जनता की पीड़ा पर भारी पड़ता है। चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस, परिवहन विभाग को दोनों पार्टियों ने अपने-अपने शासन में जम कर दुहा है। 'लोक कल्याण' के मुखौटे के पीछे जनता की लूट-खसोट राजनीतिक पार्टियों के चरित्र में शामिल हो चुकी है।

पानी रे पानी

समर्थन मूल्य या अवमूल्यन

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चीन को साधने के लिए भारत और यूएस साझेदारी अहम (पत्रिका)

विनय कौड़ा
(अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ)

अमरीका के राष्ट्रपति पद पर जो बाइडन के काबिज होने के मायने भारत के लिए क्या होंगे, इस सवाल के जवाब से पहले यह जानना अहम होगा कि हाल ही अमरीका ने 2018 के हिन्द प्रशांत सामरिक प्रारूप को गोपनीय दस्तावेज श्रेणी से बाहर कर दिया है। 2018 में तैयार किए गए इस दस्तावेज को लीक से हटकर महज दो साल बाद इसी माह ट्रंप-काल के अंतिम दिनों में जारी किया गया। दस्तावेज में चीन व हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को लेकर अमरीका के दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला गया है। इसके अनुसार, अमरीका की हिन्द-प्रशांत रणनीति इस क्षेत्र में उसके सहयोगी और साझेदारों से प्रभावित होगी, खास तौर पर भारत से। नई साझेदारी एवं विषय परक गठबंधन, मौजूदा विश्व सुरक्षा परिदृश्य की जरूरत है क्योंकि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच चतुर्भुजीय संवाद 'क्वाड' विकसित हो रहा है।

भारत के साथ संबंध सुदृढ़ कर उसे क्षेत्र में मुख्य भूमिका देकर अमरीका, चीन के साथ संतुलन कायम करने की कवायद शुरू कर चुका है। दस्तावेज में चीन के किसी आकस्मिक हमले से अपनी उत्तरी सीमाओं की रक्षा करने में भारत की क्षमताओं को तो रेखांकित किया ही गया है, यह भी कहा गया है कि भारत सतत रूप से दक्षिण एशियाई सुरक्षा के मुख्य संरक्षक की भूमिका निभा रहा है। भले ही चुनाव प्रचार के दौरान राष्ट्रपति जो बाइडन 'हिन्द-प्रशांत' शब्द-युग्म का इस्तेमाल करने से बचते दिखे हों, लेकिन शीर्ष अमरीकी कूटनीतिज्ञ कर्ट एम. कैम्पबेल को 'हिन्द-प्रशांत समन्वयक' नियुक्त करके जो बाइडन प्रशासन ने चीन के प्रति नीतियों को लेकर सहयोगियों व साझेदारों की आशंकाओं को निर्मूल करने का प्रयास ही किया है। महत्त्वपूर्ण है कि अमरीका के 'हिन्द-प्रशांत' शब्द-युग्म को तवज्जो देने के चलते भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कुछ देशों जैसे फ्रांस, जर्मनी और यूके को हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाने का प्रोत्साहन मिलता है। चीन के प्रति ट्रंप प्रशासन की नीतियों को पलटना बाइडन के लिए इसलिए भी मुश्किल है।

वर्ष 2020 में चीन व अमरीका के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा चरम पर रही। टिकटॉक और वीचैट को प्रतिबंधित करने का आदेश देते हुए ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी निर्णय के लिए भारत का उदाहरण भी दिया था। हालांकि चीन स्वयं को अमरीका के दबाव से मुक्त करने की कोशिश में लगा हुआ है। हाल ही चीन ने यूरोपीय संघ के साथ नए मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर भी किए हैं। भले ही चीन के लिए यह राहत की बात हो लेकिन अमरीका-चीन के बीच तकनीकी क्षेत्र में चल रहा संघर्ष 2021 में खत्म होता दिखाई नहीं देता। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया के थिंक टैंक के साथ विचार-विमर्श के दौरान हाल ही भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी कहा था कि भारत-चीन संबंध 'गंभीर रूप' से खराब हो चुके हैं और इनका फिर से सुधरना मुश्किल होगा। जैसे चीन अपनी सेना के आधुनिकीकरण पर बल दे रहा है, वैसे ही भारत को भी सीमा पर और समुद्र क्षेत्र में बहुआयामी खतरे को देखते हुए अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाने और अन्य महाशक्तियों की भांति दीर्घावधि नीति की परम्परा स्थापित करने की जरूरत है, जो फिलहाल चुनाव कार्यक्रमों व नौकरशाही के अनुरूप और काफी छोटी अवधि के लिए होती है।

बाइडन जानते हैं कि हालिया वर्षों में भारत के साथ संबंध प्रगाढ़ करने में अमरीका ने काफी निवेश किया है। हालांकि इसकी एक वजह चीन के बढ़ते प्रभुत्व से मुकाबला करना रही। भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की पैरवी अमरीका के साथ द्विपक्षीय संबंधों में रुकावट भी नहीं बनी। कारण, दोनों देशों के मौलिक सिद्धांतों में समानता है, जिसके बल पर भारत की अमरीका के साथ रणनीतिक साझेदारी सुदृढ़ हुई है। ऐसे में विश्व के ये दोनों देश ही हैं जो आज मिलकर चारों रणनीतिक चुनौतियों- भू-सामरिक, आर्थिक, तकनीकी और सुशासन- पर चीन की बढ़त को संतुलित करने में सक्षम हैं।

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अभिव्यक्ति के सामने (जनसत्ता)

हाल ही में डिजिटल माध्यम के एक मंच पर आई वेब शृंखला ‘तांडव’ पर विवाद अब भी थमने के आसार नहीं नजर आ रहे हैं। हालांकि इस शृंखला से उन दृश्यों को हटा दिया गया है, जिन्हें लेकर हंगामा चल रहा है। उसके निर्देशक ने इसके लिए माफी मांगी। इस मामले में निर्देशक और अन्य कुछ लोगों को अदालत से अग्रिम जमानत लेनी पड़ी। हालांकि इसके बाद भी कुछ संगठन सिरीज और उसके निर्माताओं के खिलाफ अदालत में जाने की बात कह रहे हैं।

गुरुवार को कई जगहों से इस मसले पर प्राथमिकी दर्ज कराने की खबरें आर्इं। बल्कि उत्तर प्रदेश की पुलिस सिरीज के निर्देशक और लेखक के घर पूछताछ के लिए पहुंची और नहीं मिलने पर नोटिस चिपका दिया। गौरतलब है कि ‘तांडव’ के कुछ दृश्यों को लेकर कुछ संगठनों ने यह आपत्ति जताई कि इससे उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंची है। इसके बाद कई अन्य संगठन भी इसमें कूद पड़े।

दरअसल, किसी फिल्म के कुछ दृश्यों से आस्था के आहत होने या धार्मिक भावना के चोट पहुंचने का यह कोई नया मामला नहीं है। लेकिन हर बार इस तरह के मौके पर यह सोचने की जरूरत महसूस होती है कि कला माध्यमों में किसी विषय की अभिव्यक्ति की सीमा क्या है और क्या उसे नियंत्रित किया जाना चाहिए। अगर किसी फिल्म में धार्मिक भावनाओं के आहत करने के मकसद से कोई दृश्य परोसा गया है तब उसकी व्याख्या होनी चाहिए और उसे उसके दर्शकों के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वे फिल्म के बारे में क्या राय रखते हैं।

इस तरह से कोई समाज अपनी लोकतांत्रिकता भी बचा लेता है और अपनी समझ को और ज्यादा स्पष्ट बनाता है। मगर विडंबना यह है कि इस तरह के विश्लेषण से गुजरने के बजाय कुछ संगठन सीधे ही आपत्ति और विरोध का झंडा उठा लेते हैं, हिंसक रुख अख्तियार कर लेते हैं और इस तरह विचार और विश्लेषण की किसी भी प्रक्रिया में लोगों के जाने की गुंजाइश खत्म कर देते हैं। जबकि यह प्रक्रिया किसी भी व्यक्ति और समाज को परिपक्व बनने में मददगार होती है।

बहरहाल, इस विवाद के बाद अब संभव है कि सरकार इस तर्क पर फिल्में और दूसरी सामग्री डिजिटल मंचों पर लोगों को मुहैया कराने वाले माध्यम में दखल दे कि किसी को अराजक तरीके से कोई चीज दिखाने की एक सीमा है। मगर सवाल है कि अगर यह रास्ता आगे बढ़ा तो नियंत्रण की यह सीमा कहां तक जा सकती है। जहां तक अदालत का सवाल है, तो करीब तीन दशक पहले ही एक फिल्म ‘ओरे ओरु ग्रामाथिले’ के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में अपना फैसला दिया था। अफसोस की बात यह है कि हमारा जो समाज अब तक अलग-अलग विचारों का संगम रहा है और यही हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती रही है, उसमें अब अभिव्यक्तियों के सामने कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

कला-माध्यमों में किसी विषय-वस्तु को संप्रेषित करने के लिए जिन बिंबों और प्रतीकों का सहारा लिया जाता है, उसका मकसद आमतौर पर आस्था या धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना नहीं होता है। लेकिन अगर कभी किसी को ऐसा महसूस होता भी है तो इसका सबसे बेहतर समाधान विवेक और समझदारी के साथ विषय पर बहस और विचार करना है। यह एक दीर्घकालिक विचार-प्रक्रिया की भी शुरुआत करता है। विडंबना यह है कि इसके बजाय बहुत सारी जरूरी बातें हंगामे और शोर में दब कर रह जाती हैं और उन पर लोगों को सोचने और अपने विवेक के आधार पर राय बनाने में मदद नहीं मिलती है।

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भरोसे की खातिर (जनसत्ता)

कोरोना का टीकाकरण शुरू हुआ तो लोगों में काफी उत्साह और भरोसा दिखा कि अब जल्दी ही इस संक्रमण के खतरे से मुक्ति मिल जाएगी। मगर जैसे-जैसे टीकाकरण आगे बढ़ने लगा, लोगों का उत्साह ठंडा पड़ता नजर आने लगा। टीकाकरण अभियान अपने लक्ष्य से काफी पीछे चल रहा है। जिन लोगों ने इसके लिए पंजीकरण कराया था, वे भी संशकित होकर पांव पीछे खींचने लगे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और मुख्यमंत्रियों का टीकाकरण के दूसरे चरण में आगे आना लोगों के डिगे भरोसे को फिर से बहाल करने में मददगार साबित हो सकता है।

हालांकि टीकाकरण शुरू होने के पहले ही कुछ लोगों ने इस पर एतराज जताना शुरू कर दिया था। कुछ राजनेताओं ने अंतिम परीक्षण से पहले लोगों को लगाए जाने पर सवाल उठाए थे। मगर चिकित्सक लगातार भरोसा दिलाते रहे कि इस टीके का दुष्प्रभाव बिल्कुल नहीं पड़ेगा। इसीलिए टीकाकरण के पहले दिन एम्स के निदेशक और सीरम इंस्टीट्यूट के मुखिया ने खुद टीका लगवाया, ताकि लोगों में भरोसा बन सके। मगर पहले ही दिन कुछ लोगों के अस्वस्थ होने की खबर आ गई। फिर कुछ चिकित्सकों ने चिट्ठी लिख कर विरोध जताया कि वे यह टीका नहीं लगवाएंगे। इन सबका लोगों के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

हालांकि टीकाकरण के पहले चरण में स्वास्थ्यकर्मियों और कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए अगली कतार में काम करने वाले लोगों को लगाया जा रहा है, पर उनमें भी इस टीकाकरण को लेकर भ्रम है। इस बीच कोवैक्सीन बनाने वाली संस्था भारत बायोटेक ने एक निर्देश जारी करते हुए कहा कि जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है या कोई बीमारी है, उन्हें यह टीका नहीं लगवाना चाहिए। उस निर्देश में विभिन्न रोगों की सूची भी दी गई। इस तरह लोगों में पैदा हुई आशंका भय में बदलती नजर आने लगी। स्वाभाविक ही इसका असर टीकाकरण पर पड़ा और यह अभियान अपने लक्ष्य से काफी पीछे चलना शुरू हो गया।

इस तरह टीकों की बर्बादी भी हो रही है, क्योंकि एक बार खुलने के बाद टीके देर तक नहीं रखे जा सकते। जाहिर है, इसे लेकर स्वास्थ्य विभाग और सरकार की चिंता बढ़ गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन बार-बार लोगों को आश्वस्त करते रहे हैं, फिर समझाया है कि टीका लगवाने को लेकर किसी प्रकार की झिझक नहीं होनी चाहिए। अब मुख्यमंत्रियों के साथ हुई बैठक में प्रधानमंत्री ने भी दूसरे चरण में खुद टीका लेने की घोषणा कर दी है, तो निस्संदेह इसका सकारात्मक संदेश जाएगा।

विपक्षी दलों के नेता और बहुत सारे आम लोग भी यह सवाल उठा रहे थे कि अगर कोरोना के टीके सुरक्षित हैं, तो पहले मंत्री और सांसद खुद क्यों नहीं लगवाते। कुछ देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने टीकाकरण के पहले ही दिन टीके लगवाए थे। अब ऐसे सवाल करने वालों के मन में शायद कोई शंका न रहे। यों भी प्रधानमंत्री की बातों का लोगों पर प्रभाव पड़ता है, उनके इस कदम से टीकाकरण अभियान को बल मिलेगा।

हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब किसी व्यापक टीकाकरण अभियान को लेकर लोगों के मन में शंका और भय देखा गया है। चेचक और पोलियो टीकों को लेकर भी शुरू में ऐसी ही भ्रांतियां बनी रही थीं। पोलियो की खुराक को लेकर बने भ्रमों को तोड़ने में लंबा समय लगा था। प्रधानमंत्री और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के इस दिशा में आगे बढ़ने से वह हिचक दूर होगी और स्वास्थ्यकर्मियों तथा आम लोगों का विश्वास बनेगा।

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हौसले की जीत (जनसत्ता)

वरना मैचों के पहले और उसके दौरान टीम की जो तस्वीर दिख रही थी, उसमें तमाम विश्लेषक इस तरह का निश्चित अंदाजा लगाने में नाकाम थे कि नतीजों में इतनी बड़ी उलट-फेर हो सकती है। खासतौर पर जब भारतीय टीम के कई अहम माने जाने वाले खिलाड़ी शृंखला के बीच में ही गंभीर रूप से चोटिल हो गए और विराट कोहली सिर्फ पहला टैस्ट खेलने के बाद छुट्टी लेकर स्वदेश लौट आए, तब यह आशंका खड़ी हुई कि अब मजबूत आस्ट्रेलियाई टीम की चुनौती का सामना कैसे किया जाएगा!

सच यह है कि जब दोनों टीमों के बीच टैस्ट मैचों की शुरुआत हुई थी, तब आस्ट्रेलिया की टीम ने इसे हल्के में लिया और शायद इसी का असर उनके प्रदर्शन पर पड़ा। अब स्थिति यह है कि आस्ट्रेलियाई टीम सहित सभी विश्लेषक भारतीय टीम की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। आस्ट्रेलिया में मीडिया ने भी भारत की शृंखला में 2-1 से जीत को ‘सबसे बेहतरीन वापसी के साथ मिली जीत’ कहा।

गौरतलब है कि एडिलेड मैच में टीम इंडिया के सभी खिलाड़ी टैस्ट इतिहास में अपने सबसे कम स्कोर यानी महज छत्तीस रन पर आउट हो गए थे और उसमें आस्ट्रेलियाई टीम हारी हुई बाजी जीत गई थी। अगर इसको उदाहरण माना जाए तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि भारतीय खिलाड़ियों की क्षमता और मनोबल को किस स्तर से देखा गया होगा।

लेकिन क्षमताओं की असली परीक्षा विपरीत हालात में होती है। चार मैचों की शृंखला में शुरुआत से ही भारतीय टीम जिन मुश्किलों से दो-चार थी, कई अहम खिलाड़ी चोट का सामना कर रहे थे और बाकी खिलाड़ियों को अनुभवहीन माना जा रहा था, उसमें खुश कर देने वाले किसी नतीजे उम्मीद कम थी। इसके अलावा, ब्रिसबेन के गाबा मैदान पर आखिरी टैस्ट में टीम के सामने एक दिन में तीन सौ रन बनाने का लक्ष्य था।

ऐसी स्थिति में ज्यादातर मौकों पर कोई टीम किसी तरह मैच को बराबरी पर खत्म कर लेने के मकसद से खेलती है। लेकिन भारतीय टीम ने चुनौती के इस मौके पर अपने हौसले का सहारा लिया, सामना किया, तीन सौ अट्ठाईस रन का पीछा किया और आखिरकार तीन विकेट से जीत दर्ज की। इस तरह पिछले बत्तीस सालों से ब्रिसबेन के गाबा मैदान पर आस्ट्रेलिया की अजेय बादशाहत भी टूट गई।

जाहिर है, टैस्ट मैचों के आम नतीजों के मुकाबले इस शृंखला की अहमियत भारत के लिए बेहद खास है। इसमें टीम इंडिया को जहां जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद सिराज, अश्विन, अजिंक्य रहाणे, उमेश यादव जैसे कई खिलाड़ियों ने भविष्य की उम्मीदों को लेकर आश्वस्त किया, वहीं इस मैच ने यह भी दर्ज किया कि हौसला साथ हो तो हार की हालत को भी जीत में तब्दील किया जा सकता है।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि आस्ट्रेलियाई टीम और वहां के मीडिया की ओर से कमतर करके आंकने के समांतर मैच के दौरान दर्शक दीर्घा की ओर से कई अवांछित और नस्लवादी टिप्पणियां खिलाड़ियों के मनोबल को तोड़ने के काफी थीं, मगर टीम इंडिया ने शायद इन्हीं प्रतिक्रियाओं को चुनौती के तौर पर लिया और इसका जवाब मैदान में देने का मन बनाया। यही वजह है कि आस्ट्रेलिया के कई वरिष्ठ खिलाड़ियों से लेकर वहां के मीडिया तक को भारतीय खिलाड़ियों के बारे में अपनी हड़बड़ी की धारणा के बरक्स तारीफ करनी पड़ी। अब यह उम्मीद स्वाभाविक है कि आने वाले दिनों में एक बार फिर विश्व क्रिकेट में भारतीय टीम अपनी चमक बिखेरेगी।

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