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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Monday, March 8, 2021

सौ दिन की टीस (दैनिक ट्रिब्यून)

केंद्र सरकार के नये तीन कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ दिल्ली की दहलीज पर आंदोलनरत किसानों ने आंदोलन के सौवें दिन कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेस वे पर चक्का जाम कर अपना विरोध जताया। यह विडंबना ही है कि कोरोना संकट और विषम मौसम की परिस्िथतियों में किसान आंदोलनरत हैं। निस्संदेह न राज हठ जायज है, न किसान हठ। सरकार की कई दौर की बातचीत, सुप्रीम कोर्ट के प्रस्ताव तथा डेढ़ साल तक कृषि कानूनों को स्थगित करने के सरकार के प्रस्ताव को आंदोलनरत किसानों ने स्वीकार नहीं किया। बहरहाल, बीच का रास्ता निकालने की जरूरत है। थोड़ी और उदारता सरकार को भी दिखानी चाहिए और किसानों को भी सरकार के आश्वासनों पर विश्वास करते हुए बातचीत के जरिये किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। सरकार के स्तर पर यह कमी मानी जानी चाहिए कि जिस किसान के हित के लिये कृषि सुधारों की पहल की गई, कम से कम उसकी समझ में सुधार के निहितार्थ आने चाहिए थे। निस्संदेह किसान आंदोलन के साथ कुछ राजनीतिक दल, किसानों के मुद्दों पर राजनीति करने वाले संगठन भी सक्रिय हैं, जिसको लेकर सरकार की कुछ आशंकाएं भी हैं। लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में किसी आंदोलन का इतना लंबे समय तक चलना किसी के भी हित में नहीं कहा जा सकता। कतिपय संगठन और कुछ देश इस मुद्दे को भारत के विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।


निस्संदेह, किसानों की अपनी समस्याएं हैं और उन्हें किसान के संदर्भों में नहीं देखा गया। किसान को एक वोट की तरह इस्तेमाल किया गया। किसानों को लोकलुभावने नारों से तो भरमाया गया लेकिन भविष्य की चुनौतियों के मद्देनजर प्रगति में किसान की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की गई। स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू करने में भी तमाम तरह के किंतु-परंतु होते रहे हैं। कृषि से जुड़े अंतर्विरोध यह भी हैं कि गेहूं-चावल को एमएसपी के दायरे में लाने से इन्हीं फसलों को किसान तरजीह देने लगे। बफर स्टॉक बढ़ने और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अन्न का उत्पादन बढ़ने तथा उत्पादन के मुकाबले खपत कम होने से भी सरकार के सामने एक ही तरह के अन्न उत्पादन की समस्याएं सामने आईं। सरकार नये प्रयासों से उन्हीं समस्याओं के समाधान तलाशने का दावा कर रही है। ऐसा भी नहीं है कि कृषि सुधारों को सिरे से खारिज कर दिया जाये। आईएमएफ, अमेरिका समेत कई संगठनों ने सुधारों की सकारात्मकता पर बात की है। लेकिन सवाल यही है कि क्यों सरकार इन लाभों के बाबत किसानों का विश्वास हासिल करने में चूकी है। बहरहाल, यह समय राज हठ और किसान हठ से ऊपर उठने का है। किसान हित भी देखा जाये और देश हित भी। कम से कम संवाद की प्रक्रिया तो शुरू होनी चाहिए, इस कथन के बाबत कि सरकार एक कॉल की दूरी पर तैयार है।  किसान आंदोलन का लंबा खिंचना न तो किसानों के हित में है और न ही देश के हित में। यह गतिरोध को खत्म करने का वक्त है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Wednesday, March 3, 2021

जहरीली शराब बेचने पर मृत्युदंड (दैनिक ट्रिब्यून)

ऐसा कोई साल नहीं जाता जब देश में जहरीली-मिलावटी शराब पीने से सैकड़ों लोग न मरते हों। कईयों की आंख की रोशनी चली जाती है और कुछ जीवनभर के लिये अभिशप्त जीवन जीने को बाध्य हो जाते हैं। विडंबना है कि इन हादसों का शिकार गरीब व मजदूर तबका ही होता है। हादसा होने पर तो सरकार व पुिलस सख्ती करते नजर आते हैं। कुछ गिरफ्तारियां होती हैं, कुछ शराब की भट्टियां नष्ट की जाती हैं, लेकिन फिर जहरीली शराब का कारोबार बदस्तूर शुरू हो जाता है। ऐसा संभव नहीं कि जिन लोगों की जिम्मेदारी इस जहरीले कारोबार को रोकने की होती है, उनकी व पुलिस की जानकारी के बिना यह जहरीला धंधा फल-फूल सके। सिस्टम में लगे घुन को दूर करने की ईमानदार कोशिशें होती नजर नहीं आतीं। बहरहाल अब पंजाब सरकार ने इस दिशा में कदम उठाते हुए आबकारी अधिनियम में कड़े प्रावधान जोड़े हैं। अब पंजाब में अवैध व मिलावटी शराब बेचने से हुई मौतों के लिये दोषियों को उम्रकैद से लेकर मृत्युदंड तक की सजा दी जा सकेगी। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह की अध्यक्षता में कैबिनेट की मीटिंग में लिये गये फैसले के अनुसार पंजाब एक्साइज अधिनियम में संशोधन के बाद अदालतों को धारा 61-ए के तहत कार्रवाई करने का अधिकार होगा तथा धारा 61 व 63 में संशोधन किया जायेगा। इसके लिये मौजूदा बजट सत्र के दौरान बिल लाया जायेगा। अवैध व मिलावटी शराब का व्यवसाय अब गैर जमानती अपराध होगा। दरअसल, बीते वर्ष  जुलाई में गुरदासपुर, अमृतसर व तरनतारन में जहरीली शराब से सौ से अधिक मौतों के बाद राज्य में आबकारी कानून सख्त करने की मांग उठी थी। सरकार उसी दिशा में आगे बढ़ी है। अब धारा 61-ए के तहत जहरीली शराब से मौत की पुष्टि होने पर अदालत निर्माता व विक्रेता को पीड़ित परिवार को पांच लाख तथा गंभीर क्षति होने पर तीन लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दे सकती है।


सरकार के प्रस्तावित प्रावधानों में जहरीली शराब से मौत होने पर दोषी को उम्रकैद से लेकर मृत्युदंड तक की सजा और बीस लाख तक का जुर्माना हो सकता है। अपाहिज होने पर छह साल की सजा और दस लाख तक का जुर्माना हो सकता है। वहीं गंभीर नुकसान पर दोषी को एक साल तक की कैद और पांच लाख तक का जुर्माना हो सकता है। नुकसान न भी हुआ हो मगर मिलावटी शराब का आरोप साबित होने पर छह माह की कैद और ढाई लाख तक का जुर्माना हो सकता है। यदि मिलावटी शराब लाइसेंसशुदा ठेके पर बेची जाती है तो मुआवजा देने की जिम्मेदारी लाइसेंसधारक की होगी। जब तक आरोपी अदालत द्वारा तय जुर्माना नहीं देता तब तक वह कोई अपील भी दायर नहीं कर सकता। दरअसल, यह रोग केवल पंजाब का ही नहीं है। देश के विभिन्न भागों से जहरीली मौत से मरने की खबरें लगातार आती रहती हैं। गत नवंबर में सोनीपत व पानीपत में जहरीली शराब से 31 लोगों की मौत हो गई थी। हरियाणा सरकार ने जांच के लिये विशेष दल भी बनाया था, लेकिन समस्या की गहराई तक पहुंचने की कवायद किस हद तक सफल रही, कहना मुश्किल है। जरूरत इस कारोबार के फलने-फूलने के कारण और इसके स्रोत का पता लगाने की है।  इस साल जनवरी में मध्य प्रदेश के मुरैना में जहरीली शराब से बीस से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। राजस्थान के भरतपुर से भी ऐसे मामले सामने आये। आखिर जहरीली शराब के तांडव व मौतों के कोहराम के बावजूद सरकारें सतर्क क्यों नहीं होतीं। क्यों इस कारोबार व तस्करी पर रोक नहीं लगती। वर्ष 2019 फरवरी में यूपी व उत्तराखंड के चार जनपदों में जहरीली शराब से सौ से अधिक लोगों की मौत हुई थी। उ.प्र. सरकार ने भी तब आबकारी अधिनियम में संशोधन किया था। आम धारणा है कि यह खेल नेताओं, अफसरों व शराब माफिया की मिलीभगत के नहीं चल सकता। वैसे भी हादसों में पुलिस-प्रशासन के अधिकारी तो बदलते हैं मगर आबकारी विभाग के अधिकारियों पर कम ही कार्रवाई होती है। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Monday, March 1, 2021

आंतरिक लोकतंत्र (दैनिक ट्रिब्यून)

जम्मू-कश्मीर की शीतल वादियों से शनिवार को असंतुष्ट कांग्रेसी दिग्गजों के तीखे बयानों की तपिश दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक महसूस हुई। तर्क वही थे कि कांग्रेस कमजोर हो रही है, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र जरूरी है और हम से ही कांग्रेस मजबूत होगी। हालांकि, सीधे-तौर पर राहुल-सोनिया पर वार नहीं थे, लेकिन कांग्रेस द्वारा बनाये संगठन गांधी ग्लोबल फैमिली के शांति सम्मेलन के स्वर कांग्रेस पार्टी को अशांत करने वाले थे। कांग्रेसी दिग्गज गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व में उनके गृह राज्य में हुए सम्मेलन की पृष्ठभूमि में राज्यसभा से सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें फिर से मौका न दिये जाने की कसक महसूस हुई। नेताओं का कहना था कि उनके अनुभव का लाभ पार्टी उठाए। कहा गया कि लगातार कमजोर हो रही पार्टी को मजबूत बनाये जाने की जरूरत है। कहा जा रहा है कि चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनावों की घोषणा के ठीक बाद इस तरह की कवायद क्या पार्टी को चपत नहीं लगायेगी? यही वजह है कि इस कार्यक्रम के बाद पार्टी की ओर से कहा गया कि कांग्रेस कमजोर होने जैसी बात अनुचित है और इन अनुभवी नेताओं को विधानसभा चुनाव अभियान में सहयोग करना चाहिए। वहीं राजनीतिक पंडित इसे पार्टी के खिलाफ लड़ाई का शखंनाद मान रहे हैं। कहा जा रहा है कि अन्य राज्यों में ऐसे ही कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे। मुहिम को तेज करने के संकेत हैं।


बहरहाल, इन दिग्गज कांग्रेसियों की मुहिम को लेकर भी सवाल उठाये जा रहे हैं। सवाल है कि क्या कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का संकट अभी पैदा हुआ या यह दशकों से जारी अनवरत प्रक्रिया रही है? जिस वंशवाद के खिलाफ ये नेता मुखर हैं क्या उसे सींचने में इनका योगदान नहीं रहा है? पार्टी में महत्वपूर्ण पदों, मंत्रालयों व राज्यों में बड़े पदों पर रहे इन नेताओं ने वंशवाद और आंतरिक लोकतंत्र का मुद्दा तब क्यों नहीं उठाया? पार्टी ने भी एक दिग्गज नेता के सात बार सांसद रहने की बात कही। जहां तक पार्टी के कमजोर होने का सवाल है तो मोदी उदय के बाद से ही ग्राफ गिरने लगा था, यह कोई तात्कालिक घटना भी नहीं है। बहरहाल, राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे हैं कि इस मुखर विरोध के गहरे निहितार्थ भी हो सकते हैं। गुलाम नबी आजादी की विदाई के वक्त उनके सम्मान में संसद में कसीदे पढ़े गये थे। अश्रुओं का आदान-प्रदान भी हुआ। इन कांग्रेसी नेताओं की भगवा पगड़ियों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। फिर रविवार को भी गुलाम नबी आजाद ने प्रधानमंत्री की तरीफ की है कि वे जैसे हैं वैसा दिखते हैं और कुछ छिपाते नहीं हैं। वहीं कहा कि वे राज्यसभा से सेवानिवृत्त हुए हैं राजनीति से नहीं। वैसे भी विरोध की यह चिंगारी गुलाम नबी आजाद को राज्यसभा का कार्यकाल पूरा होने पर दोबारा मौका न दिये जाने के बाद ही भड़की है, जिसे ये नेता असंतुष्टों के खिलाफ पार्टी की कार्रवाई के रूप में देख रहे हैं।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Sunday, January 31, 2021

विकास की रफ्तार, हर तबके को मिले तरक्की की छांव (दैनिक ट्रिब्यून)

भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के उम्मीद भरे संकेत मिले हैं। कहना जल्दबाजी होगी कि देश कोरोना संकट से पहले की अवस्था में शीघ्र पहुंच जायेगा, लेकिन देश-विदेश की वित्तीय निगरानी करने वाली संस्थाएं और एजेंसियां संकेत दे रही हैं कि देश आने वाले वित्तीय वर्ष में तेज आर्थिक रफ्तार पकड़ेगा। पिछले दिनों आरबीआई प्रमुख ने कहा था कि अर्थव्यवस्था महामारी के दौर से निकल रही है और जीडीपी पटरी पर लौटने को है। मंगलवार को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारतीय आर्थिकी का उत्साहजनक आकलन प्रस्तुत किया कि वर्ष 2022 में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 11.5 रहेगी। साथ ही यह भी कि दो अंकों वाली यह दुनिया की एकमात्र अर्थव्यवस्था होगी। यह आकलन कुछ समय पहले 8.8 फीसदी किया गया था। जाहिर है भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से पटरी पर लौट रही है। निस्संदेह यह आकलन देश की उम्मीद बढ़ाने वाला है लेकिन इसके बावजूद यह प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि हम महामारी के प्रभाव को दूर करने वाले लक्ष्यों को किस हद तक पूरा कर पाते हैं। यह अच्छी बात कि देश की अर्थव्यवस्था उम्मीद से बेहतर परिणाम देगी, लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि उत्साहवर्धक विकास की किरण हर आम आदमी तक भी पहुंचे। यानी विकास समाज में तेजी से बढ़ रही असमानता की खाई को भी दूर करे। हाल ही में जारी ऑक्सफैम की रिपोर्ट ने बताया था कि कोरोना संकट के दौरान जहां देश के उद्योग धंधे और विभिन्न क्षेत्र रोजगार के संकट से जूझ रहे थे, तमाम लोगों के रोजगार छिने व वेतन में कटौती की गई तो उसी दौरान देश के शीर्ष धनाढ्य वर्ग की आय में पैंतीस फीसदी की वृद्धि हुई जो हमारे विकास की विसंगति को दर्शाता है कि जहां देश का बड़ा तबका लॉकडाउन के दंश झेल रहा था तो एक वर्ग संकट में मालामाल हो रहा था।


अब देश की निगाहें सोमवार को पेश होने वाले बजट पर टिकी हैं। जाहिर है सरकार की प्राथमिकता उद्योग व कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने की होगी ताकि रोजगार के अवसर बढ़ें और निर्यात को गति मिल सके। निस्संदेह जब देश के नागरिकों की क्रय शक्ति बढ़ेगी तो मांग व खपत का चक्र बढ़ सकेगा, जिससे अर्थव्यवस्था से मंदी का साया दूर हो सकेगा। कोरोना संकट के जख्मों से उबर रहे देश में नये बजट से उम्मीद की जायेगी कि विकास का लाभ हर वर्ग को मिले। यानी अर्थव्यवस्था में उत्साहवर्धक विकास का लाभ समाज में विषमता की खाई को भी दूर करे। उम्मीद की जा रही है कि अनलॉक की प्रक्रिया के दौरान केंद्र सरकार के वित्तीय व मौद्रिक उपायों का असर अर्थव्यवस्था पर जल्दी नजर आये। निस्संदेह महामारी ने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोरा है। अब देखना है कि कुशल वित्तीय प्रशासन से हम इस संकट से कितनी जल्दी उबर पाते हैं। भारत जैसी विकासोन्मुख अर्थव्यवस्था में निवेश की अपार संभावनाएं हैं। इस दौरान विदेशी निवेश बढ़ा भी है। यह भी देखना होगा कि आत्मनिर्भर भारत की मुिहम में हम किस हद तक सफल हो पाते हैं। यह अच्छी बात है कि देश कोविड की महामारी से धीरे-धीरे मुक्त हो रहा है। देश में निर्मित दो वैक्सीनों की सफलता और सफल टीकाकरण अभियान ने देश में आत्मविश्वास जगाया है। यह आत्मविश्वास अंतत: अर्थव्यवस्था के तेज विकास में सहायक बनेगा। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि कोरोना संकट के दौरान कृषि क्षेत्र ने बेहतर परिणाम दिये। ऐसे में इस क्षेत्र के तेज विकास हेतु निवेश को बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। बेहतर मानसून और रबी फसल की बेहतर उम्मीदें कृषि क्षेत्र में नये विश्वास को जगा रही हैं। सरकार की कोशिश हो कि कृषि सुधार कानूनों को लेकर जो देशव्यापी अविश्वास पैदा हुआ है, उसे दूर किया जाये।  उम्मीद है कि सरकार आगामी बजट में कृषि क्षेत्र के लिये विशेष सौगात लेकर आयेगी। उसकी प्राथमिकता कोरोना संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित सेवा क्षेत्र और एमएसएमई को उबारने की होगी। बैंकों के क्रेडिट डिमांड में बढ़ोतरी भी अच्छा संकेत है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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जवाबदेही का लोकतंत्र, जिम्मेदारी में निहित गणतंत्र की समृद्धि (दैनिक ट्रिब्यून)

निस्संदेह राजपथ पर गणतंत्र दिवस समारोह का भव्य आयोजन हमारी आर्थिक, सामरिक, वैज्ञानिक और सामाजिक तरक्की का जीवंत चित्र उकेरता है। यह पर्व जहां हमारे सत्ताधीशों को जवाबदेही का सबक देता है, वहीं नागरिकों से जिम्मेदार व्यवहार की उम्मीद भी करता है। यह भी कि स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से अस्तित्व में आया गणतंत्र सिर्फ अधिकारों के लिये ही नहीं है, कर्तव्यों के लिये भी जिम्मेदारी तय करता है। यह पर्व हमें आत्ममंथन का मौका भी देता है कि हम सात दशक के लोकतंत्र में उन लक्ष्यों को हासिल कर पाये हैं जो आजादी के परवानों के सपने थे। वहीं सत्ताधीशों के लिये भी मंथन का मौका कि क्यों हमारे साथ आजाद हुए देश हमसे अधिक तरक्की कर बैठे। हमारे नीति-नियंताओं से कहां चूक हुई। क्या हम समाज में आर्थिक आजादी के लक्ष्यों को हासिल कर पाये हैं? लैंगिक समानता समाज में प्रतिष्ठित हुई है? समतामूलक समाज के लक्ष्य हासिल हो पाये हैं? सही मायनों में भारतीय लोकतंत्र संविधान के आलोक में वाकई समृद्ध हुआ है? यह भी कि 26 जनवरी, 1950 को घोषित लोकतांत्रिक संप्रभुता और गणतांत्रिक व्यवस्था क्या वाकई इन मूल्यों का लाभ आम आदमी को पहुंचा पा रही है? क्या हम असहमति के स्वरों को सम्मान दे पा रहे हैं? एक नागरिक के रूप में हम सही जनप्रतिनिधियों का चयन कर पा रहे हैं? क्यों अब भी हम  अपने प्रतिनिधि के चुनाव में शतप्रतिशत मतदान नहीं कर पाते? गणतंत्र का पर्व साल में एक-दो विशेष दिनों पर मनाकर हमारे कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाती है। निस्संदेह जहां सत्ताधीशों की जवाबदेही तय है, वहीं लोकतंत्र की छोटी इकाई के रूप में हमारी भी जिम्मेदारी होती है कि बहुमत के नाम पर सत्ता निरंकुश न हो जाये। बहुमत की आवाज अल्पमत की आवाज को न दबा दे। हमें वक्त की मार्गदर्शक आवाज का अनुसरण करना चाहिए। यह सुखद ही है कि हम देश में महामारी के संकट से सुनियोजित तरीके से उबरे हैं। वैज्ञानिकों के प्रयास से देश में निर्मित वैक्सीनों से देशवासियों का आत्मबल बढ़ा है।


इस बार देश का गणतंत्र दिवस समारोह कई मायनों में अलग होगा। कोरोना संकट की छाया सीमित उपस्थिति और जवानों व कलाकारों के मुंह पर मास्क के रूप में नजर आयेगी। पहली बार परेड में बांग्लादेश का सैनिक दस्ता शामिल होगा। भारत की सैन्य, तकनीकी, वैज्ञानिक उन्नति के साथ दुनिया का सर्वोत्तम लड़ाकू विमान राफेल राजपथ पर गरजेगा। नारी शक्ति के रूप में महिला फाइटर पायलट विमान उड़ाती नजर आयेंगी। केंद्रशासित प्रदेश के रूप में लद्दाख की झांकी पहली बार नजर आयेगी। वहीं अदालत में विवाद के पटाक्षेप के बाद परेड में राममंदिर के प्रारूप की झांकी होने के विशिष्ट मायने होंगे। बहरहाल, आयोजन के साथ देश व सरकार की चिंता इस दिन आयोजित होने वाली किसानों की ट्रैक्टर रैली भी होगी। निस्संदेह होना तो यह सुखद संयोग ही चाहिए था कि राजपथ पर जवान और बाहरी रोड पर किसान।  लेकिन आंदोलन के तेवर और विभिन्न राजनीतिक दलों की आकांक्षाओं की पूर्ति अप्रत्याशित घटनाक्रम का भी विस्तार कर सकती है। काश! ऐसा ही हो जैसा किसान संगठन के नेता कह रहे हैं कि हम दिल्ली जीतने नहीं, दिल जीतने आ रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि गणतंत्र दिवस समारोह निर्विघ्न रूप से गरिमा हासिल करेंगे। लेकिन इसके बावजूद लोकतंत्र में असहमति के स्वरों को सम्मान देने की परंपरा को आंच नहीं आनी चाहिए। संभव है कि केंद्र सरकार अच्छी नीयत के साथ सुधार की पहल कर रही हो, मगर इतना तय है कि वह अपने तर्कों से आंदोलनकारियों को सहमत नहीं कर पायी है। असहमति के सुरों के राजनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं लेकिन लोकतंत्र में हर असहमत आवाज को भी तरजीह दी जानी चाहिए। शीर्ष अदालत भी कह चुकी है कि विरोध करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। लेकिन यह विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून-व्यवस्था का सम्मान करते ही किया जाना चाहिए। दूसरे नागरिकों के अधिकारों का अतिक्रमण भी न हो। उम्मीद की जानी चािहए कि पर्व अपनी गरिमा के साथ शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होगा।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Saturday, January 30, 2021

समतामूलक समाज की स्थापना का संकल्प (दैनिक ट्रिब्यून)

ज्ञाानेन्द्र रावत


समूचे विश्व में गांधीजी ही एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिन पर सबसे ज्यादा लिखा गया है, आज भी लिखा और बोला जा रहा है। यही नहीं, उनका महत्व भी महसूस किया जा रहा है। हम गांधीजी को राष्ट्रपिता कहते हैं और राष्ट्र के महान नेता के रूप में उनका सम्मान करते हैं। रेजिनाॅल्ड सोरेन्सन के शब्दों में ‘विश्व में बीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े और महान व्यक्तित्व थे गांधीजी।’


गांधीजी ने सामाजिक विषमताओं यथा-अस्पृश्यता, सांप्रदायिकता, रंगभेद नीति, नर-नारी असमानता आदि पर गहरा असंतोष प्रकट किया और इसको समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यहां तक कि इसके खात्मे हेतु खुद को समर्पित कर दिया। जाति प्रथा को उन्होंने वर्ण-व्यवस्था के हिमायती होेने के बावजूद अनुचित ठहराया। अस्पृश्यता निवारण हेतु उन्होंने अपने सिद्धांत और व्यवहार द्वारा जबरदस्त प्रहार किए। उनका मानना था कि अछूत एक जुदा वर्ग है-हिन्दू धर्म के माथे पर लगा हुआ कलंक है। जात-पात रुकावट है, पाप नहीं। अछूतपन तो पाप है, सख्त जुर्म है। हिन्दू धर्म इस बड़े पाप को समय रहते नहीं मार डालेगा तो उसकी कीमत चुकानी होगी।


गांधीजी ने रंग के आधार पर भेदभाव को अमानवीय बताया। अपने जीवनकाल में दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने रंगभेद की नीति का प्रबल विरोध किया। नर-नारी समानता के वह प्रबल पक्षधर थे, समर्थक थे। उनका दृढ़ मत था कि नारी पुरुष की गुलाम नहीं, अर्धांगिनी है, सहधर्मिणी है, उसे मित्र समझना चाहिए। शोषण रहित समाज की स्थापना के पक्षधर गांधीजी सामंतशाही को अनुचित और अन्यायपूर्ण मानते थे। वे धार्मिक थे, इसीलिए राजनीति में धर्म की प्रतिष्ठा चाहते थे। इसी भावना को साकार रूप देने के उद्देश्य से उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। दरअसल वे संत, महात्मा और समाज सुधारक पहले थे, उसके बाद राजनीतिक दार्शनिक। वे दिन-रात भूखों-नंगों की सेवा में लगे रहते थे, वे स्वयं आश्रम में रहते थे, हरिजन बस्ती में निवास करते थे, सादा भोजन करते, सीमित पहन कर रहते थे। सच तो यह है कि उन्होंने तन-मन से अपने को गरीबों के सांचे में ढाल लिया था।


एक महान ऋषि की भांति वे हमेशा सच्चाई, अहिंसा, ईमानदारी और बंधुता के रास्ते पर चले। उन्होंने अपना सब कुछ यहां तक कि अपने प्रिय से प्रियजनों का परित्याग कर दिया लेकिन सत्य और अहिंसा का साथ कभी नहीं छोड़ा। सही मायने में वे बहुत बड़े दृष्टा, ऋषि, योद्धा और कवि थे जो चिंतन की घड़ियों को क्रियाओं से तौलते थे। उनकी वाणी में लोकजीवन की करुणा के स्वर पुरुषार्थ के संकेत बनकर फूट पड़ते थे।


देश की वंचित पीढ़ी के प्रति उनके अंतःकरण में पुकार उठती थी। उनकी दृष्टि में दरिद्रनारायण का उत्थान ही देश का उत्थान था। उनकी शक्ति का उत्स इन्हीं गरीबों-दीन-दुखियों में था। उनके पास न सत्ता थी, न सेना लेकिन उनकी बात राजाज्ञा की तरह मानी जाती थी और समूचा देश धर्माधीश के आदेश की भांति सिर झुकाकर उसे स्वीकार करता था। कवि ने उनके व्यक्तित्व के संदर्भ में ठीक ही लिखा है -ओ फकीर, सम्राट बना तू सिर पर लेकिन ताज नहीं। ओ भिक्षुक, तू भूप बना पर, वसुधा, वैभव राज नहीं। ऐसे ही महामानव थे गांधीजी।


गंाधीजी सत्याग्रह का हथियार विदेशी अंग्रेजी सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करने के पक्षधर थे । वास्तव में मामला तो विदेशी सरकार को निकालकर स्वराज स्थापित करना था। गांधीजी धर्म स्थानों में अछूतों के प्रवेश के लिए धरना देने या सत्याग्रह करने के पक्षधर नहीं थे। उनका मानना था कि सवर्ण हिन्दुओं को हृदय परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जाये तभी बदलाव संभव है। लेकिन विडम्बना है कि आज गांधीजी को दलित केवल उनको ब्राह्मणवादी बताने के लिये और उनका विरोध करने के लिए ही याद करते हैं। जबकि हकीकत में गांधीजी के जीवनकाल में ही उनका सबसे ज्यादा विरोध सनातन धर्मियों ने ही किया था। कारण वे अस्पृश्यता को हिंदू समाज का सबसे बड़ा कलंक मानते थे। यही नहीं, इसके निवारण के लिए वे अपने ढंग से कठिन संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने इस तबके की उपेक्षा को ‘राष्ट्रीय पाप’ की संज्ञा दी थी। ऐसा कहने वाले वे पहले व्यक्ति थे।


लेकिन आज के नेता इसे कलंक न मानकर इसे राजनैतिक मुद्दा बनाकर सामाजिक वायुमंडल को न केवल प्रदूषित कर रहे हैं बल्कि संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को बिगाड़ने का काम कर रहे हैं। ऐसे संकट की घड़ी में गांधीजी जैसे महामानव की जरूरत है जो ऐसे नेताओं को सुबुद्धि दे सके और इस देश को चुनौतियों से बचाया जा सके।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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नये बजट में सरकार की चुनौतियां (दैनिक ट्रिब्यून)

जयंतीलाल भंडारी



एक फरवरी, 2021 को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले वर्ष 2021-22 के बजट के समक्ष सात बड़ी चुनौतियां हैं। एक, कोविड-19 से निर्मित अप्रत्याशित आर्थिक सुस्ती का मुकाबला करने और विभिन्न वर्गों को राहत देने के लिए व्यय बढ़ाना। दो, रोजगार के नये अवसर पैदा करना। तीन, तेजी से घटे हुए निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए आकर्षक प्रावधान करना। चार, बैंकों में लगातार बढ़ते हुए एनपीए को नियंत्रित करना और क्रेडिट सपोर्ट को जारी रखना। पांच, महंगाई पर नियंत्रण रखना। छह, नयी मांग का निर्माण करना और सात, कोरोना वायरस से बचाव के लिए टीकाकरण एवं अन्य स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च में वृद्धि करना।


ऐसे में वित्तमंत्री वर्ष 2021-22 के बजट में राजकोषीय घाटे (फिजिकल डेफिसिट) का नया खाका पेश करती हुई दिखाई दे सकती हैं। गौरतलब है कि सरकार ने चालू वित्त वर्ष 2020-21 में राजकोषीय घाटे को 3.5 प्रतिशत सीमित करने का लक्ष्य रखा था। कोरोना महामारी के कारण जीडीपी में संकुचन और राजस्व संग्रह तथा व्यय के बीच बढ़ते हुए अंतर के कारण राजकोषीय घाटा बढ़कर 7 से 8 प्रतिशत के बीच पहुंच सकता है। यह घाटा आगामी वित्त वर्ष में बढ़ने की पूरी संभावनाएं रखता है।


पिछले दिनों 7 जनवरी को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा वित्त वर्ष 2020-21 की पूरी अवधि के लिए आर्थिक विकास दर के जो अनुमान जारी किए हैं, उनके अनुसार चालू वित्त वर्ष में विकास दर की गिरावट 7.7 प्रतिशत पर सिमटने की बात कही गई है। यदि हम पिछले वर्ष 2020 की ओर देखें तो एक ओर देश में कोरोना वायरस के संकट से उद्योग कारोबार की बढ़ती मुश्किलों के मद्देनजर सरकार की आमदनी तेजी से घटी वहीं दूसरी ओर आर्थिक एवं रोजगार चुनौतियों के बीच कोविड-19 के संकट से चरमराती देश की अर्थव्यवस्था के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत वर्ष 2020 में सरकार ने एक के बाद एक 29.87 लाख करोड़ की राहतों के एेलान किए, जिनके कारण सरकार के व्यय तेजी से बढ़ते गए। स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि चालू वित्त वर्ष में एक ओर सरकार की आमदनी में बड़ी कमी आई, वहीं दूसरी ओर व्यय तेजी से बढ़े हैं।


स्थिति यह है कि कोविड-19 की अप्रत्याशित आर्थिक चुनौतियों के कारण चालू वित्त वर्ष 2020-21 के तहत कर संग्रह और सरकारी संस्थाओं के विनिवेश से मिलने वाली प्राप्तियां बजट अनुमान से करीब 7 लाख करोड़ रुपये कम रह सकती हैं। वित्त वर्ष 2020-21 के बजट में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से करीब 24.23 लाख करोड़ रुपये और विनिवेश से करीब 2.10 लाख करोड़ रुपये आने का अनुमान था। इस प्रकार कुल करीब 26.33 लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिलने का अनुमान प्रस्तुत किया गया था। अब सरकार द्वारा प्रस्तुत किए गए संशोधित अनुमान के मुताबिक कुल मिलाकर करीब 19.33 लाख करोड़ रुपये या चालू वित्त वर्ष के बजट अनुमान से 26.58 फीसदी कम राजस्व मिल सकता है।


उल्लेखनीय है कि एयर इंडिया, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) तथा भारतीय कंटेनर निगम लिमिटेड (कॉनकॉर) की बिक्री प्रक्रिया पूरी नहीं होने से केंद्र को वित्त वर्ष 2020-21 के अंत में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के विनिवेश से मिलने वाली अनुमानित रकम प्राप्त नहीं हो पाई है। निवेश से सरकार को करीब 40 से 50 हजार करोड़ रुपये की ही आय प्राप्त हो पाई है। ऐसे में आमदनी में कमी के बावजूद कोविड-19 के कारण वित्त वर्ष 2020-21 में राजकोषीय घाटे की चिंता न करके सरकार द्वारा देश को कोविड-19 की आर्थिक महात्रासदी से बाहर निकालने के लिए जो रणनीतिक कदम उठाए गए, वे लाभप्रद रहे हैं।


अब आगामी एक फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का आगामी बजट अर्थव्यवस्था के संकुचन वाले दौर से गुजरने के बीच पेश किया जाने वाला है। संकुचन के बाद पेश हुए बजटों में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के जिस तरह भारी प्रोत्साहन दिए गए थे, इस बार कोविड-19 के बाद संकुचित अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए और अधिक भारी प्रोत्साहन आगामी वित्त वर्ष के बजट में दिखाई दे सकते हैं।


ऐसे में नये वित्तीय वर्ष 2021-22 के बजट के तहत सरकार द्वारा कोविड-19 की चुनौतियों के बीच राजकोषीय घाटे की चिंता न करते हुए विकास की डगर पर आगे बढ़ने के प्रावधान सुनिश्चित किए जा सकते हैं। वित्तमंत्री प्रमुखतया खेती और किसानों को लाभान्वित करते हुए दिखाई दे सकती हैं। वित्तमंत्री द्वारा ग्रामीण क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के उपायों के साथ-साथ कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के विकास के माध्यम से बेरोजगारी और गरीबी को दूर करने वाले कामों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। वित्तमंत्री द्वारा कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) में नया जीवन फूंकने के कदम उठाए जा सकते हैं।


देश के शेयर बाजार को आगामी वित्त वर्ष 2021-22 के बजट से तेजी से बढ़ने के प्रोत्साहन मिल सकते हैं। विगत यद्यपि 21 जनवरी को बंबई स्टॉक एक्सचेंज के सेंसेक्स ने 50,000 अंकों की स्वर्णिम ऐतिहासिक ऊंचाई को छू लिया और फिर इसमें कुछ गिरावट भी आई है। अब सेंसेक्स के 50 हजार पर बने रहने और शेयर बाजार को भारतीय उद्योग-कारोबार के लिए पूंजी का खुला भंडार बनाने के लिए आगामी आम बजट प्रभावी भूमिका निभा सकता है। बजट में शेयर और म्यूचुअल फंड पर लगने वाले लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) को हटाया जा सकता है।


नये बजट के तहत पर्यटन उद्योग, होटल उद्योग, देशव्यापी टीकाकरण अभियान, स्वास्थ्य, शिक्षा और कौशल विकास जैसे विभिन्न आवश्यक क्षेत्रों के साथ-साथ रोजगार वृद्धि के लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए बड़े बजट आवंटन दिखाई दे सकते हैं। नये बजट में डिजिटल भुगतान के लिए भी नये प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं। इनके अलावा देश के छोटे आयकरदाताओं, नौकरीपेशा (सैलरीड) और मध्य वर्ग के अधिकांश लोगों को लाभान्वित करने के लिए आयकर की छूट की सीमा को दोगुना करके 5 लाख रुपए तक किया जा सकता है।


निस्संदेह पूरा देश कोविड-19 से निर्मित विभिन्न आर्थिक चुनौतियों से राहत पाने की आस में नये बजट की ओर टकटकी लगाकर देख रहा है। ऐसे में वित्तमंत्री सीतारमण 1 फरवरी को राजकोषीय घाटे की फिक्र न करते हुए अपने वादे के अनुसार चमकीले आर्थिक प्रोत्साहनों से सजे-धजे वर्ष 2021-22 के नये बजट से अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए आगे बढ़ती हुई दिखाई दे सकती हैं।


निश्चित रूप से कोविड-19 के बीच अप्रत्याशित सुस्ती के दौर से अर्थव्यवस्था को निकालने, रोजगार अवसरों को बढ़ाने, निवेश के लिए प्रोत्साहन देने तथा विभिन्न वर्गों को राहत देने के लिए बड़े बजट आवंटनों के कारण राजकोषीय घाटे को पांच प्रतिशत तक विस्तारित किया जाना चिंताजनक नहीं माना जाएगा। राजकोषीय घाटे के आकार में वृद्धि उपयुक्त ही कही जाएगी। इससे एक ओर आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ेगी, जिससे नयी मांग का निर्माण होगा और उद्योग-कारोबार की गतिशीलता बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर बढ़े हुए सार्वजनिक व्यय और सार्वजनिक निवेश से बुनियादी ढांचे को मजबूती मिलेगी।


लेखक ख्यात अर्थशास्त्री हैं।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Friday, January 29, 2021

महामारी से उपजे जख्मों पर मरहम लगाएं (दैनिक ट्रिब्यून)

सुषमा रामचंद्रन


स्वतंत्र भारत के इतिहास में आगामी बजट पहला ऐसा होगा जो वैश्विक महामारी की छाया के दौरान पेश किया जाएगा। यह बात सच नहीं है, क्योंकि विगत में बड़ी वैश्विक घटनाओं के बीच बजट पेश किए गए हैं, मसलन वर्ष 2008 की वैश्विक महामंदी के समय। लेकिन शायद यह पहली मर्तबा है कि सरकार किसी वैश्विक अथवा घरेलू घटनाक्रम से प्रभावित हुई आर्थिकी की बजाय एक महामारी से डांवांडोल हुई व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए बजट पेश करेगी। अतएव इस साल के बजट का उत्सुकता से इंतजार है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी लोग सरकार से उदार वित्तीय राहत पाने की उम्मीद कर रहे थे, ठीक उसी तरह हमारे यहां भी नागरिकों को मौजूदा संकट से उबारने वाली वित्तीय योजनाओं का इंतजार है। बहरहाल, अमेरिका के विशाल स्रोतों के मुकाबले भारत एक उभरती हुई आर्थिकी वाला देश है, जिसकी मौजूदा वित्तीय वर्ष में बहुत कम कराधान उगाही हो पाई है।


इसके बावजूद, यह समय है जब वित्त मंत्री पिछले साल की गई घोषणाओं को पूरा करने में अपनी थैली का मुंह ढीला करें। तब उन्होंने कहा था कि राहत देने हेतु सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1 प्रतिशत से अधिक धन रखा जाएगा। कई क्षेत्रों को विशेष ध्यान की दरकार है। पहला है छोटा उद्यमी तबका। लघु और मध्यम इकाइयों के लिए जो पैकेज पिछले साल घोषित किया गया था, वह उन कंपनियों को उबारने में नितांत नाकाफी है, जिनकी आमदनी महामारी काल में मारी गई और अपने कर्मचारियों को पूरी तनख्वाह तक देना मुहाल है या वह जो लॉकडाउन के बाद फिर से अपना कामकाज शुरू करने में असमर्थ हैं। देश में आज जो कुछ भी वित्तीय पुनरुत्थान देखने को मिल रहा है, वह अधिकांशतः उन बड़े कॉर्पोरेट्स से आने वाले कराधान से है, जिनके पास महामारी काल से पैदा हुई तंगी सहन करने को संसाधन थे। सेवा-क्षेत्र, खासकर होटल और छोटे रेस्तरां चलाने वालों को बहुत मार पड़ी है और अभी भी जारी है। इस क्षेत्र के अंतर्गत लाखों-लाख छोटे उद्यमी हैं, जिनके पास आगे पक्के या कच्चे तौर पर कामगार काम करते थे। आकलन है कि समूचे लघु और मध्यम व्यापारिक क्षेत्र में लगभग 1.1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ था, लेकिन उनमें से अधिकांश या तो बंद पड़े हैं या फिर कर्मियों की संख्या घटानी पड़ी है। कोई हैरानी नहीं कि सीएमआईई का आंकड़ा यह तस्दीक करता है कि दिखाई पड़ने वाले आर्थिक पुनरुत्थान के बावजूद पिछले कुछ महीनों में सबसे ज्यादा नौकरियां गई हैं।


पिछले साल घोषित किए गए ऋण पैकेज ने भले ही कुछ छोटे व्यापारों की सहायता की हो, परंतु जो रोजगार एकदम सूक्ष्म वर्ग और असंगठित क्षेत्र में आते हैं, उनकी पूरी तरह अनदेखी हुई है। औद्योगिक संगठनों का कहना है कि जो इकाइयां नयी योजना के तहत राहत के लिए नया ऋण लेना चाह रही हैं, उन्हें बाबूडम से पैदा होने वाली मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। एक ज्यादा अर्थपूर्ण राहत पैकेज दिए जाने की जरूरत है ताकि उस क्षेत्र को फिर से खड़ा किया जा सके, जिससे देश के सकल घरेलू उत्पाद का 30 फीसदी हिस्सा आता है।


यह बात एकदम साफ है कि बिना राहत पैकेज दिए आर्थिकी का पुनरुत्थान तभी संभव है जब सब लोगों की कोविड वायरस के प्रति सामूहिक रोग-प्रतिरोधात्मकता बन जाए। एक सफल वैक्सीन अभियान होने का मतलब है देश की आर्थिकी को पुनः पटरी पर लाने हेतु सबसे बड़ा प्रोत्साहन। जितना जल्द लोगों में यह भरोसा बनेगा कि संक्रमण के डर के बिना बाहर निकलना सुरक्षित है, उससे स्वतः मांग बढ़ेगी और औद्योगिक विकास में इजाफा होगा। जहां एक ओर यह कहा जा रहा है कि देश में वैक्सीन अभियान सही ढंग से चल निकला है और वैक्सीन उत्पादन में हमारा देश सबसे बड़ा केंद्र होने की वजह इसकी मात्रा पर्याप्त रहेगी, तथापि स्वास्थ्य क्षेत्र में सब कुछ सही नहीं है।


कोविड महामारी ने देश के स्वास्थ्य तंत्र की जर्जरता को उजागर कर दिया है, खासकर कस्बों और ग्रामीण इलाकों में। शोचनीय तथ्य तो यह है कि देश अपने सकल घरेलू उत्पाद का केवल 1.5 प्रतिशत ही स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च करता है। नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल कबूल करते हैं कि यह किसी भी मानकों से कम है। जहां चीन में यह दर 5 प्रतिशत है वहीं यूरोप में 7 से 8 फीसदी है। नतीजतन, दवा निर्माण में अग्रणी गिने जाने का दम भरने वाले देश की हकीकत यह है कि आम आदमी को न्यूनतम सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं ही उपलब्ध हैं। बजट बनाते समय फिर से ध्यान विकास के बुनियादी अवयवों की ओर दिया जाना चाहिए। इसके लिए तरजीहों में एक सबसे ज्यादा ख्याल पहली कतार के मुख्य स्वास्थ्य योद्धाओं यानी आशा वर्करों का होना चाहिए। मौजूदा महामारी में ऐसी सूचनाएं आई हैं कि इन कर्मियों को अपने पल्ले से दस्ताने, मास्क और सैनेटाइज़र खरीदने पड़े हैं। संक्रमित व्यक्तियों की संपर्क-कड़ी ढूंढ़ने में लगे इन योद्धाओं को पर्याप्त मात्रा में सुरक्षा उपकरण तक उपलब्ध नहीं थे, न ही परीक्षण करने में उन्हें कोई तरजीह दी गई अथवा फीस माफी दी गई। पूरी महामारी के दौरान छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति में स्वास्थ्य संबंधी काम में जोखिम उठाने वाले इन महत्वपूर्ण लोगों के लिए कम से कम इतना तो किया जा सकता था।


बजट बनाते वक्त ध्यान देने योग्य तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र शिक्षा हो। यहां भी, सकल घरेलू उत्पाद का केवल 2.8 प्रतिशत ही खर्च किया जाता है। यह भी ऐसा क्षेत्र है, जिसकी कमियां महामारी काल ने उघेड़ दी है। ऑनलाइन शिक्षा देने की जरूरतों ने उजागर किया कि ज्यादातर बच्चों के पास डिजिटल शिक्षा प्राप्त करने के संसाधन नहीं हैं। हालांकि भारत को एक सॉफ्टवेयर महाशक्ति कहा जाता है, किंतु अधिकांश स्कूली छात्रों के पास शिक्षा प्राप्ति हेतु न तो मोबाइल फोन, टेलीविजन अथवा लैपटॉप थे। पौष्टिकता स्रोत के लिए गरीब बच्चों की स्कूलों में मिलने वाले मिड-डे भोजन पर निर्भरता किस कदर है, यह बात तब सामने आई जब विद्यालय बंद होने पर उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ता दिखाई दे रहा है।


संभव है वर्ष 2021-22 का बजट उम्मीद से ज्यादा राजकोषीय घाटे के साथ बंद हो और बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को प्रोत्साहन देना इसकी मजबूरी हो सकती है। लेकिन समय आ गया है कि छोटे काम-धंधों पर भी उतना ही ध्यान दिया जाए, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों को नौकरी मिलती है और जिंदा रहने के लिए उनकी बांह पकड़ने का काम ज्यादा से ज्यादा किया जाए। कोविड त्रासदी ने दर्शा दिया है कि आपातकाल से निपटने को देश का स्वास्थ्य सेवा तंत्र नाकाफी है। इसने यह भी उजागर कर दिया है कि अगर आम आदमी को न्यूनतम प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल देनी है तो उससे पहले इस काम को अंजाम देने वाले कर्मियों को विगत के मुकाबले कहीं ज्यादा मदद देने की जरूरत है। शिक्षा की बात करें, तो यदि डिजिटल पाट न भरा गया तो वंचित बच्चों की पूरी एक पीढ़ी बेकार जाएगी।


लेखिका आर्थिक मामलों की वरिष्ठ पत्रकार हैं।


सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Thursday, January 28, 2021

विकास के दावों के बीच गरीबी का दंश (दैनिक ट्रिब्यून)

लक्ष्मीकांता चावला


भारत की स्वतंत्रता के बाद देश एकदम विभाजन की पीड़ा के साथ बेहद मुश्किल स्थिति में था। पहले दो दशक तो उसे संभालने-बसाने, रोटी का प्रबंध करने तथा शरणार्थियों को छत देने में ही लग गए। इसके बाद कभी हमने सुना गरीबी मिटाएंगे, कभी यह सुना कि देश का बहुत विकास हो रहा है या देश विकसित हो गया है, पर सत्य क्या है, इसे वही जानते हैं जो ठंडी सर्द रातों में किसी फुटपाथ पर सोते और वहीं जीवन व्यतीत कर देते हैं। 


यह ठीक है कि देश में पिछले 74 वर्षों में बहुत विकास हुआ। हम विश्व पटल पर छा गए। रक्षा के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर हैं और अब कोरोना से लड़ने और कोरोना वैक्सीन बनाकर दुनिया को यह संजीवनी बांटने में भी हम सक्षम हो गए। यह एक नया कीर्तिमान है, पर हमारी विडंबना यह है कि अभी भी देश में करोड़ों लोग भूखे, नीली छत के नीचे पड़े हैं, फिर भी सत्तापक्ष का कोई भी वक्ता-प्रवक्ता पिछली आधी शताब्दी से देश की जनता को विश्वास दिलाता है कि भारत पूरी तरह विकसित हो गया। अब रोटी-कपड़े का कोई संकट नहीं। रोजगार भी मिलता है और भूखे पेट सोने के लिए हिंदुस्तान में कोई भी विवश नहीं। 


यद्यपि सरकारी तंत्र समय-समय पर यह जानकारी भी देता रहता है कि आज भी देश के करोड़ों लोग भूखे पेट आकाश के नीचे फुटपाथ पर या कहीं भी सड़क के किनारे सोते हैं। सर्दी-गर्मी का कहर भी सहन करते हैं। भारत सरकार ने स्वयं स्वीकार किया है कि कोरोना लॉकडाउन के दिनों में अस्सी करोड़ गरीबों को मुफ्त अनाज दिया गया अर्थात‍् अस्सी करोड़ भारतीय अभी भी बहुत गरीब हैं। अभी ताजा घटना है। गुजरात के सूरत महानगर में फुटपाथ पर सोये राजस्थान से मजदूरी करने गए 15 मजदूर बेकाबू ट्रक से कुचले गए। इस घटना ने देश के विकास की पोल तो खोल ही दी, यह भी बता दिया कि आज भी पेट की आग बुझाने के लिए देश के लाखों लोग एक प्रांत से दूसरे प्रांत में रोटी जुटाने के लिए जाते हैं। 


इसी विकास का वीभत्स दृश्य लॉकडाउन के दिनों में भी दिखा, जब भूख और बेकारी से सताए हजारों लोग सिर पर बोझ, गोद में बच्चे उठाए पैदल ही अपने-अपने गांवों की तरफ चले। कितना हृदयविदारक दृश्य रहा होगा जब भूख और थकान से हारकर रेल ट्रैक पर ही लोग सो गए और 16 लोग रेलगाड़ी के नीचे कुचले गए। जिन्होंने यह देखा और जिन्हें सहना पड़ा, वे ही वास्तव में इसकी पीड़ा समझते हैं। 


देश का बचपन भी भूख से त्रस्त है। अभी ताजा समाचार है। जालंधर में बिहार से लाए चालीस बच्चे पकड़े गए, जो किसी फार्म हाउस में मजदूरी करते हैं। अपराधी बच्चों को लाने वाला है तो साथ ही वे रईस भी तो हैं जो जानते हुए भी इन बच्चों को काम पर लगाते हैं। वेतन कितना देते होंगे, इसकी तो चर्चा ही व्यर्थ है। वर्षों पहले हम स्कूलों-कालेजों में भाषणों के नाम पर एक ही बात कहते थे, जिस देश का बचपन भूखा है, उस देश की जवानी क्या होगी, पर बचपन तो आज तक भी भूखा है। पूरे देश के चौक-चौराहों में दर्जनों बच्चे भीख मांगने वाले या थोड़ा सामान बेचकर रोटी कमाने वाले मिल जाते हैं। 


सरकारों से बार-बार पूछा कि ये बच्चे कहां से आ गए? क्या यह सच नहीं कि देश में लापता बच्चों की भी संख्या लाखों में है, जो आज तक परिवार को मिले नहीं। वह मानव तस्करी का शिकार हो गए। उनके अंग निकाल कर बेचे गए या बेटियां वेश्यावृत्ति में धकेल दी गईं। आवश्यक यह है कि चुनाव के दिनों में वोट बटोरने के लिए केवल लुभावने नारे, मुफ्तखोरी के सब्जबाग न दिखाए जाएं। इन नारों के जंजाल में फंसे आमजन, अति गरीब व्यक्ति कुछ दिन चुनावों में प्राप्त आश्वासनों एवं थोड़े नोटों से चार दिन तो चांदनी मना लेंगे, उसके बाद वही भूख, फुटपाथ और शोषण की चक्की में पिसते रहेंगे। वैसे यह तभी संभव है जब देश के सभी राजनीतिक दलों के नेता, सत्तापति स्वयं सरकारी साधनों का अपने सुख के लिए दुरुपयोग न करें। जनता के लिए सदुपयोग करें।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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आशंका को भांप जीवन रक्षा का अनुभव (दैनिक ट्रिब्यून)

गुरबचन जगत



आज मैं जम्मू-कश्मीर के अपने कार्यकाल के दौरान हुई घटनाओं को फिर से ताजा करना चाहूंगा, जब 1990 के दशक के आखिरी सालों में मेरी नियुक्ति बतौर पुलिस महानिदेशक रही थी। जब भी सूबे में कोई बड़ी आतंकी वारदात होती थी तो आमतौर पर मैं घटनास्थल का मुआयना करने जाता था। चूंकि जम्मू-कश्मीर में भौगोलिक स्थितियों की वजह से सड़क मार्ग से यात्रा में समय बहुत लगता है, लिहाजा कम समय में दूरदराज इलाकों में पहुंचने के लिए ज्यादातर दौरा राज्य सरकार के हेलीकॉप्टर से होता था। दूसरे, हेलीकॉप्टर द्वारा यात्रा करने से मार्गों पर सुरक्षा कारणों से जवानों की तैनाती करने की जरूरत काफी कम पड़ती है और साथ ही जोखिम भी काफी घट जाता है। एक मर्तबा राजौरी के पास गांव में काफी जघन्य घटना हुई थी और मैंने वहां जाने के लिए हेलीकॉप्टर लिया। मेरे स्टाफ अफसर साथ थे और गांव हेलीपैड से कुछ दूरी पर था। हम गांव पहुंचे और ग्रामीणों से बातचीत की। साथ में स्थानीय थाने के कर्मी भी थे जो हमसे पहले ही वहां पहुंच चुके थे। राजौरी जाते वक्त मैंने अपने स्टाफ अफसर से कहा कि गांव के दौरे के उपरांत राजौरी पुलिस लाइंस में मेरी मुलाकात स्थानीय अफसरों से रखी जाए।


सोच थी कि स्थानीय कानून एवं व्यवस्था के बारे में विचार-विमर्श हो सके। हेलीपैड पुलिस लाइंस से सटा हुआ था, लेकिन जब वापसी पर हम वहां की ओर बढ़ने लगे, तब मैंने अचानक अपने स्टाफ अफसर से कहा कि बैठक मुलतवी की जाए और अब हम सीधे हेलीपैड जाएंगे। हालांकि उक्त अफसर ने सनद करवाया कि अफसरान बैठक स्थल पर पहुंच चुके हैं और वार्ता करने में चंद मिनट ही लगेंगे लेकिन मैं अपनी बात पर कायम रहा और हम लोग सीधे हेलीपैड की ओर निकल लिए। अभी हमारा हेलीकॉप्टर ऊपर उठा ही था कि पुलिस लाइंस की दिशा से एक जोरदार धमाके की आवाज सुनाई दी। पता चला कि ठीक उसी दफ्तर में बम फटा है जहां हमारी बैठक होनी थी और वह भी उस कुर्सी के पास जहां मुझे बैठना था! खुशकिस्मती से चूंकि सारे अफसरान अगवानी हेतु बाहर हमारा इंतजार कर थे, इसलिए कोई हताहत नहीं हुआ, लिहाजा मौका मुआयना करने को दुबारा लैंड करने की जरूरत नहीं पड़ी। साथ ही, जैसा कि अपने अनुभवों से हमने सीखा है, हो सकता है मेरी मौजूदगी पाकर एक और धमाका करने की संभावना बढ़ जाती है। तो क्या यह संयोग मात्र था? क्या किसी छठी इंद्री का काम था या कोई दैवीय चमत्कार? आप इसे कुछ भी कहें, लेकिन बहुत से पुलिस अधिकारियों और सशस्त्र बलों के कर्मियों को भी वही अनुभव होता है जो मेरे साथ हुआ। अब जबकि मैंने यह किस्सा बता डाला है और इसके बाद वाली घटनाएं आगे और बताऊंगा ताकि मेरे पाठकों को इल्म हो सके कि किसी अशांत इलाके में काम करना क्या होता है, जहां हिंसा और बाद वाला क्रूर मंजर देखना एक स्थाई पहलू होता है। यह भी कि कैसे जिंदा रहने और कामयाब होने के लिए इनसान के अंदर पेशेवराना और आशंका की सहज प्रवृत्ति होना, दोनों ही जरूरी हैं।


जम्मू-कश्मीर में बतौर पुलिस महानिदेशक मेरी नियुक्ति पंजाब कैडर से हुई थी और मुझे केंद्रीय गृह मंत्रालय की अनुशंसा और तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला की पूरी सहमति के बाद भेजा गया था। पहले ही दिन से मुख्यमंत्री ने मुझे भरोसा दिया था कि वे पुलिस विभाग के अंदरूनी कामकाज में दखलअंदाजी करना नहीं चाहेंगे और उनकी भूमिका केवल पुलिस तंत्र संबंधी सुधारों और आधुनिकीकरण करने तक सीमित रहेगी। हमारा ध्येय था जम्मू-कश्मीर पुलिस की पुनर्संरचना करना और इसको सूबे में चल रहे छद्म युद्ध एवं आतंकवाद से लड़ने में समर्थ बनाना। इसके लिए हमें केंद्रीय गृह मंत्रालय का भी पूरा समर्थन प्राप्त था। चीजों को अन्य पहलुओं से समझाने के लिए कहूं तो 1990 के दशक के आखिरी सालों में जम्मू-कश्मीर एक युद्ध भूमि की तरह था, जिसकी परिणति कारगिल युद्ध में हुई थी। मुख्यमंत्री ने अपना वचन निभाते हुए न तो खुद और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य ने कभी पुलिस के कामकाज में दखलअंदाजी की। हालांकि, जब बात उनके मंत्रियों और विधायकों की करूं तो इसकी रोचक कहानी अलग से आगे है क्योंकि मैं बाहरी राज्य से गया था और उनके लिए अनजाना था, लिहाजा वे कभी मेरे पास काम लेकर नहीं आए और कभी-कभार कोई आया भी तो मैंने नहीं नवाजा था। इस बात को लेकर उन्होंने मुख्यमंत्री पर भारी दबाव बना रखा था, लेकिन ज्यादातर समय वे चीजों को वक्त रहते पहले ही संभाल लेते थे। 


एक दिन जब मैं दफ्तर में काम कर रहा था तो मुझे मुख्यमंत्री कार्यालय से संदेश आया कि वे मुझसे तुरंत मिलना चाहते हैं। चूंकि मैं जानता था वह उस वक्त मंत्रिमंडल की बैठक ले रहे थे तो मैंने उत्तर दिया कि सभा समाप्ति के बाद मिल लूंगा। परंतु मुझे तुरंत उसी कमरे में जाकर मिलने का निर्देश मिला, जहां वे बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। इससे मुझे खटका हुआ। वहां पहुंचकर जैसे ही मैं अंदर घुसा तो माहौल में काफी रूखापन और तल्खी महसूस की। मुख्यमंत्री की मुखमुद्रा एकदम गंभीर थी, मुझे बैठने को कहा। जिन लोगों को यह बात पता नहीं है, तो बता दूं कि डॉ. अब्दुल्ला का अंदाज काफी नाटकीय है और जैसा माहौल वे चाहते हैं, वैसा बना लेते हैं। उन्होंने अपने मंत्रियों पर भरपूर नजर डालते हुए बताया कि मैं ही पुलिस महानिदेशक हूं और बेहतर होगा कि वे अपनी शिकायतें उनसे करने की बजाय सीधे मुझको सुना दें। बस फिर क्या था, भरे बैठे मंत्रियों ने अपनी भड़ास निकालनी शुरू कर दी, लेकिन अधिकांश दुखड़े पुलिस में विभिन्न स्तरों पर हुई भर्ती, नियुक्तियों और बदलियों को लेकर थे। कुछ समय तक यह सब चलता रहा, मुख्यमंत्री ने मेरी ओर देखा और उनको उत्तर देने को कहा। संक्षेप में मैंने अपने जवाब में उन्हें बताया कि भर्तियां पारदर्शी ढंग से हुई हैं और तथ्य तो यह है सरहदी इलाके में कुछ जवानों की भर्ती मेरे हाथों हुई है और हर कोई इससे खुश है (सिवाय मंत्री और विधायकों के)। जाहिर है, पुलिस भर्ती में किसी मंत्री-विधायक या अन्य माननीयों का कोई कोटा नहीं होता। जहां तक नियुक्ति और बदली की बात है तो यह पूर्णत: काबिलियत पर निर्भर है और जो लड़ाई हम फिलवक्त लड़ रहे हैं, उसमें दखलअंदाजी के लिए कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। आतंकवाद विरोधी लड़ाई लड़ने में सबसे मुख्य अवयव होता है सही जगह पर सही अफसर का होना। इन अफसरान से अपेक्षा होती है कि वे हिम्मतवान, दूरंदेशी, रणनीति के माहिर, चतुर योजनाकार और सबसे अहम है उनके पास नेतृत्व का गुण होना। एक ऐसा मुखिया जो अगुवाई करने में खुद सबसे आगे रहे। जिन्हें लगाया गया है, उन्हें स्वयं मैंने और वरिष्ठ अफसरान की टीम ने पूरी तरह जांच-परख कर नियुक्त किया है, हम उन्हें हिदायतें देते हैं और कार्यभूमि में खुलकर काम करने को पूरा समर्थन भी। मुख्यमंत्री को तो पहले ही यह सब मालूम था और इसकी सार्थकता भी और हमें उनका समर्थन भी प्राप्त था।


खैर, बैठक की बात पर फिर से आते हैं, मुख्यमंत्री तब अपनी काबीना से मुखातिब हुए और उन्होंने समझाने वाले अंदाज में कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इनको बतौर पुलिस महानिदेशक विशेष रूप से भेजा है और अगर आप लोगों की दखलअंदाजी के चलते असफल होते हैं तो इनका क्या है, कार्यभार से मुक्त होकर चले जाएंगे लेकिन सारा दोष तब आप पर आएगा। हां, यदि आप लोग बाहरी दबाव नहीं डालेंगे और महानिदेशक विफल रहते हैं तो फिर सारा जिम्मा इन महाशय और केंद्रीय गृह मंत्रालय का होगा। इसके बाद कमरे में सूई गिरे तो आवाज न आए जैसी शांति हो गई और किसी ने आगे बहस नहीं की। अंत में मुख्यमंत्री मेरी ओर मुड़े और कहा कि मैं बैठक से जा सकता हूं, लेकिन परिणाम मिलने की आस लिए हूं। मैं कमरे से बाहर उनकी नफासत का पूरी तरह कायल होकर निकला था कि किस तरह बड़े अच्छे ढंग से उन्होंने स्थिति को संभाला था। 


आज की तारीख में जम्मू-कश्मीर की कर्मभूमि पर नये पात्र हैं। एक पुरानी कहावत है–‘राष्ट्रों का इतिहास वस्तुतः युद्धों का इतिहास होता है।’ इनसान की फितरत अपनी इच्छा दूसरों पर थोपने की और नक्शे पर लकीरें खींचने की रही है। जम्मू-कश्मीर ने इतिहास में कई राजा-महाराजा देखे हैं, अफगानों के बाद मुगलों ने सदियों तक राज किया और इसके अंतिम दिनों वाला युग अत्यंत बर्बरता के लिए याद किया जाता है। सिख राज ने इस इलाके को अफगानों से मुक्त करवाया और वह लघु काल अपेक्षाकृत शांति वाला रहा था, इसके बाद अंग्रेजों की सरपरस्ती में डोगरा राज कायम हुआ था। वर्ष 1947 में कश्मीर के राजा ने सूबे का भारतीय गणराज्य में विलय कर दिया था। इस धरती ने वक्त के साथ बहुत से सुल्तान-राजा देखे हैं। लेकिन याद रहेगी तो उनकी, जिन्होंने सहृदयता, सुशासन, समृद्धि वाला निजाम चलाया था या फिर वह वक्त जो अत्यंत क्रूर था। इतिहास ऐसे ही दर्ज करता है और लोग पढ़कर याद करते हैं। इस बीच हमारी ऐसी पीढ़ियां बड़ी हुई हैं, जिन्होंने कभी कश्मीर के खूबसूरत बागीचों और झीलों का नज़ारा नहीं देखा... वह शालीमार, निशात, चश्मा शाही... वह भव्य डल-वूलर और नागिन झीलें... वह जिंदादिल जिंदगानी जो इन जगहों से जुड़ी थी, जहां सैलानी बाजारों में उमड़ते थे और व्यापार फलता-फूलता था... इतिहास के पन्ने और बस यादें। मेरी बात कहें तो मुझे उन कद्दावरों के साथ काम करने का मौका मिला –जो वाकई इनसान थे, बखूबी जानते थे कि खुद क्या हैं और गणतंत्र की रक्षार्थ क्या करना होगा।


लेखक मणिपुर के राज्यपाल, 

संघ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर में पुलिस महानिदेशक रहे हैं।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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दिल में उतरने के बाद दिल से उतरना (दैनिक ट्रिब्यून)

शमीम शर्मा


72वें गणतंत्र दिवस पर पूरा देश जब गा रहा था—बोलो मेरे संग जय हिन्द-जय हिन्द और तभी अचानक गुलामी पर विजय के प्रतीक लालकिले को पूरे देश ने हाईजैक होते हुए देखा। सभी भारतीयों के लिये जानना अभी बाकी है कि यह शर्मनाक घटना तमाशा था या जुलूस या साजिश?


बचपन से आज तक हमने गणतंत्र दिवस पर परेड का कई-कई बार अवलोकन किया है और कला व संस्कृति से लेकर अपनी सेना की कदम ताल एवं देश की विकास गाथा पर गर्व अनुभव किया है। उड़ते विमानों के करतबों को देख दांतों तले अंगुली दबाई है और अविरल तालियां बजाई हैं। परन्तु यह कभी कल्पना में भी नहीं था कि जब एक तरफ राफेल और तेजस जैसे विमान हमारा सीना चौड़ा कर रहे थे तो दूसरी तरफ खेती में क्रान्ति का बिगुल बजाने वाला ट्रैक्टर हमारा सीना चीर रहा होगा। मानो ट्रैक्टरों की फौज हमारे संविधान के सीने पर मंूग दल रही हो।


विविध राज्यों के नृत्यों के साथ-साथ हुड़दंगियों की अराजकता का नंगा नाच भी देखना पड़ा। कानून के परखच्चे उड़ाकर इस गणतंत्र दिवस पर कुछ सिरफिरों ने अपनी आज़ादी की ऐसी झांकी निकाली, जिसे देख हर भारतीय की आत्मा क्रंदन करती प्रतीत हो रही है। हिंसात्मक हंगामा कर राष्ट्रीयता की आबरू को उपद्रवी मुट्ठीभर लोगों ने अपनी मुट्ठी मंे कर लिया। अब ऐसे लोगों के विरुद्ध मुट्ठी तानने की सख्त जरूरत है। 


यह कैसी आजादी है कि अपने अधिकार के संघर्ष के लिए हिंसा का रुख अपनाया जाये और देश की राजधानी में त्रासदीपूर्ण उत्पात की भयावहता से लोगों को आतंकित किया जाये। भय की जो तस्वीर दिल्ली के लोगों ने इस बार देखी, वह पीड़ादायक है। सारा तंत्र ठप हो गया। सारे इंतज़ाम धरे रह गये। आश्चर्य है कि लाखों लोग एक आन्दोलन की वजह से घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं और दूसरी तरफ उपद्रवी लोग सड़कों पर आकर फैसले करने की योजना बना रहे हैं। दिल में उतरने वाला किसान आन्दोलन अब दिल से उतर रहा है। 

 

एक बर की बात है अक नत्थू सांग का प्रोग्राम देखण गया। बार-बार वो एक्के बात बोल्लै था—ना भाई आज तो सुआद कोनी आया, सुआद कोनी आया। या बात सुणकै उसके धोरै बैठे सुरजे के कान पकण नै होगे तो वो छोह मैं बोल्या-रै झकोई! न्यूं बता तन्नैं क्यूकर सुआद आवैगा। नत्थू बोल्या—भाई सुआद आवैगा जै लट्ठ बाज ज्यैं, ढोल फूट ज्यैं, तम्बू टूट ज्यैं अर मैं कहूं- भाइयो बैठ ज्यो, बैठ ज्यो।


सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Wednesday, January 27, 2021

उजला आर्थिक परिदृश्य, राष्ट्रपति का लोकतंत्र की गरिमा पर बल (दैनिक ट्रिब्यून)

राष्ट्रपति के बजट अभिभाषण के साथ आखिरकार बजट सत्र की शुरुआत हो गई। राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में लाल किले की घटना को दुखद बताते हुए कहा कि संविधान जहां अभिव्यक्ति की आजादी देता है और अभिव्यक्ति का सम्मान करता है, वहीं कानून के पालन की जरूरत को भी बताता है। कृषि सुधारों को दशकों से देश की जरूरत बताते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने समय-समय पर इन सुधारों का समर्थन भी किया है। राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि सरकार इन कानूनों को लेकर सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों का पालन करेगी। वहीं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने विश्वास जताया कि सरकार द्वारा चलाये जा रहे आत्मनिर्भर अभियान से खेती को मजबूती मिलेगी। साथ ही कहा कि सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप न्यूनतम समर्थन मूल्य में डेढ़ गुना वृद्धि की है। दूसरी ओर सरकार एमएसपी पर अनाज की रिकॉर्ड खरीदारी भी कर रही है। आधुनिक सिंचाई तकनीकों का जिक्र करते हुए उन्होंने माइक्रो इरिगेशन तकनीक से किसानों को होने वाले लाभ‍ों का जिक्र भी किया। उन्होंने एलएसी पर भारतीय सैनिकों के पराक्रम को सराहा और गलवान में सैनिकों के बलिदान का भी जिक्र किया। हालांकि, कृषि सुधार कानूनों के विरोध में कांग्रेस समेत तमाम प्रमुख राजनीतिक दलों ने बजट सत्र की शुरुआत में राष्ट्रपति के संबोधन का बहिष्कार किया। विरोध करने वाले दलों में सपा, राजद, शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस, माकपा,भाकपा, बसपा, अकाली दल व आम आदमी पार्टी शामिल रहे। इन राजनीतिक दलों का आरोप था कि पिछले सत्र में तीन कृषि कानूनों को पारित करने में पूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। वहीं सत्तारूढ़ दल का कहना  था कि राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख हैं, उनका राजनीतिक कारणों से विरोध करना अनुचित है। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि कृषि सुधार कानूनों और गणतंत्र दिवस पर लाल किले की घटना पर विपक्ष बजट सत्र में आक्रामक तेवर दिखाने के मूड में है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आगामी एक फरवरी को आम बजट पेश करेंगी।


इससे पहले शुक्रवार को वित्त मंत्री ने लोकसभा में बजट से पहले आर्थिक सर्वे पेश करके भावी अर्थव्यवस्था की तस्वीर दिखाने की कोशिश की। दरअसल, हर साल पेश किये जाने वाले आर्थिक सर्वे को आर्थिकी पर आधिकारिक रपट माना जाता है, जिसमें जहां देश की वर्तमान अार्थिक स्थिति से अवगत कराया जाता है वहीं आगामी नीतियों व चुनौतियां का जिक्र होता है। जिसमें देश के विभिन्न क्षेत्रों की आर्थिक प्रगति का भी मूल्यांकन होता है। साथ ही सुधारों का खाका भी नजर आता है। हाल में कई अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों तथा आईएमएफ द्वारा अगले वित्तीय वर्ष में भारत को दुिनया की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था बताये जाने से सरकार भी खासी उत्साहित है, जिसकी ध्वनि आर्थिक सर्वे में भी नजर आई है। निस्संदेह लॉकडाउन के बाद देश की अर्थव्यवस्था ने जिस तेजी से गोता लगाया था, उसके मुकाबले आर्थिकी की सेहत तेजी से सुधरना उम्मीद जगाने वाला है। वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जहां 23.9 फीसदी की गिरावट देखी गई थी, वहीं दूसरी तिमाही में गिरावट अनुमान से कम ऋणात्मक रूप से 7.5 रही, जिसके पूरे वित्तीय वर्ष में ऋणात्मक रूप से 7.7 रहने का अनुमान है। आर्थिक सर्वेक्षण में देश की जीडीपी ग्यारह प्रतिशत से अधिक होने का अनुमान सरकार जता रही है। संकेत दिये जा रहे हैं कि सरकार बजट में जीडीपी का तीन फीसदी स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च करने का प्रावधान कर सकती है। बहरहाल, देश की अर्थव्यवस्था को कोविड संकट से पूर्व की अवस्था  में आने में कुछ और वर्ष लगने के अनुमान हैं। यह भी एक हकीकत है कि राजकोषीय घाटा में कोरोना संकट से निपटने के उपायों के चलते वृद्धि हुई है। वहीं दूसरी ओर सरकार के करों और विनिवेश के लक्ष्य पूरे नहीं हो पाये हैं। लेकिन इसके बावजूद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने हेतु क्रय शक्ति बढ़ाना तथा मांग व आपूर्ति में संतुलन कायम करना भी सरकार की प्राथमिकता होगी।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Thursday, January 21, 2021

अप्रिय व अशोभनीय, अब संयम से राह तलाशी जाये (दैनिक ट्रिब्यून)

लगभग दो माह से दिल्ली की सीमाओं पर शांतिपूर्ण ढंग से चल रहे किसान आंदोलन के क्रम में मंगलवार को निकाली गई ट्रैक्टर रैली का हिंसक रूप लेना दुखद घटना ही है। राष्ट्रीय पर्व पर इस घटनाक्रम ने देशवासियों को व्यथित किया है। सवाल उठ रहे हैं कि शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा आंदोलन अराजक तत्वों के हाथों में कैसे चला गया, जिसने राष्ट्रीय पर्व व राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा को ठेस पहुंचाई। यह साल महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का शताब्दी वर्ष है, जो मालाबार में हिंसा के खिलाफ उभरा था। कालांतर फरवरी, 1922 में चौरी-चौरा की घटना 22 भारतीय पुलिसकर्मियों की हत्या की वजह बनी, जिसके चलते महात्मा गांधी को यह आंदोलन खत्म करने के लिये बाध्य होना पड़ा। इस आंदोलन को देशव्यापी समर्थन मिला था। इसके बावजूद भारतीयों के  खिलाफ भारतीयों की हिंसा की प्रवृत्ति को बढ़ावा न मिले, आंदोलन को स्थागित कर दिया गया था। निस्संदेह देश में कोई भी लोकप्रिय आंदोलन तभी सफल हो सकता है जब यह देशवासियों के प्रति दुर्भावना और हिंसा में तबदील न हो। अब चाहे यह प्रतिक्रिया आम आदमी के खिलाफ हो या वर्दी पहने लोगों के खिलाफ। हमने मंगलवार को गणतंत्र दिवस पर दिल्ली की सड़कों पर हिंसा, झड़पों व अराजकता का जो मंजर देखा, उसने किसान आंदोलन की शांतिपूर्ण मुहिम को क्षति ही पहुंचाई है। निस्संदेह इसने आंदोलन के मकसद की शुचिता को दागदार ही किया है। सही मायनो में तीन कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ जारी आंदोलन ने देश में व्यापक जनसमर्थन हासिल किया था। उस हासिल पर इस घटनाक्रम से नकारात्मक असर ही पड़ा है। इससे किसान नेताओं की छवि पर आंच आई है। सवाल है कि जब बड़ी मशक्कत से ट्रैक्टर रैली के आयोजन को मंजूरी मिली थी तो यह आंदोलन अपने उद्देश्य से कैसे भटक गया। निस्संदेह यह किसानों और पुलिस के बीच हुए समझौते का उल्लंघन ही है। दो माह से किसान जिस धैर्य व संयम से अपना आंदोलन सफलतापूर्वक चला रहे थे, उस छवि को मंगलवार के घटनाक्रम से नुकसान ही पहुंचेगा।


निस्संदेह, लालकिले में हुए उपद्रव ने किसान आंदोलन और इसके नेताओं की छवि को खराब ही किया है। आंदोलन में जिन सिद्धांतों का अनुपालन किया जाता रहा है, यह उससे भटकने की ही स्थिति है। यदि प्रदर्शनकारियों ने अनुकरणीय संयम दिखाया होता और दिल्ली पुलिस से निर्धारित रूट पर ही ट्रैक्टर रैली आयोजित करने के वचन का पालन किया होता तो निश्चित ही अप्रिय घटनाक्रम को टाला जा सकता था। सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बड़े किसान नेता नयी पीढ़ी को काबू रखने में विफल क्यों रहे। आखिर ट्रैक्टर रैली उनके हाथ से कैसे निकल गई। सवाल पुलिस और खुफिया एजेंसियों की कार्यशैली और क्षमताओं पर भी उठे हैं कि क्यों उन्हें इतने बड़े उपद्रव की जानकारी समय रहते नहीं मिली। कैसे उपद्रवकारी पुलिस का चक्रव्यूह तोड़कर लालकिले में राष्ट्रीय प्रतीकों से खिलवाड़ करने के खतरनाक मंसूबों को अंजाम देने में सफल रहे, जिससे हर स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज फहराये जाने वाली प्राचीर की पवित्रता भंग हुई। आखिर असामाजिक तत्व लालकिले पर सुरक्षा चक्र को भेद कर अपने मंसूबे हासिल करने में कैसे सफल हो गये? ऐसे तमाम सवालों को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। यह भी कि ये तत्व कौन थे, इन्हें किसने उकसाया? किसान नेताओं और सुरक्षा एजेंसियों को इनके मंसूबों की भनक क्यों नहीं लगी। ऐसे तमाम सवाल परेशान करते हैं। ऐसे हालात में किसान नेताओं को सरकार द्वारा कृषि सुधार कानूनों को निर्धारित अवधि तक स्थगित करने के प्रस्ताव पर विचार करना चाहिए, जिससे तल्खी कम की जा सके। अब भी किसान लंबे समय तक कानूनों के निलंबन की मांग कर सकते हैं। अगर फिर भी सरकार अपनी बात से हटती है तो किसान फिर से आंदोलन करने के लिये स्वतंत्र हैं। जरूरत इस बात की भी है कि आंदोलन को लेकर उपजी कटुता व उत्तेजना को शांत करने का प्रयास किया जाये, जिससे अराजक तत्वों को फिर से शह न मिल सके। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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सुलगती कीमतें, पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में बेतहाशा तेजी (दैनिक ट्रिब्यून)

देश  के कई स्थानों पर पेट्रोल के दामों का उच्चतम स्तर को छूते हुए सौ रुपये के करीब तक पहुंचना उपभोक्ताओं की बेचैनी बढ़ाना वाला है। यह मुश्किल समय है। लॉकडाउन के बाद अनलॉक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी बाजार-कारोबार अभी रवानगी नहीं पकड़ सके हैं। आम व्यक्ति की आय कोरोना संकट से बुरी तरह प्रभावित हुई है। लाखों लोगों की नौकरियां चली गई हैं या उनकी आय का संकुचन हुआ है। ऐसे में नये साल में पेट्रोल व डीजल के दामों में कई बार हुई वृद्धि परेशान करती है। डीजल के दामों में तेजी ढुलाई भाड़े में वृद्धि करती है, जिसका सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। हाल के दिनों में आम उपभोग की वस्तुओं की कीमत में तेजी मुश्किल बढ़ाने वाली साबित हो रही है। यह वृद्धि जहां अनाज व दालों में नजर आ रही है, वहीं सब्जियों के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि देखी जा रही है। सरकार इस महंगाई को आर्थिकी को गति देने हेतु उत्पादकों व किसानों के लिये जरूरी बता रही है। देखना होगा, क्या वास्तव में उन्हें इसका लाभ मिल रहा है? केंद्रीय बैंक की तरफ से भी महंगाई रोकने हेतु मौद्रिक उपाय होते नजर नहीं आये। सवाल है कि जब क्रय शक्ति में तेजी से गिरावट आई हो तो क्या महंगाई आर्थिकी को विस्तार देने में सहायक साबित हो सकती है? देश में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम उसकी लागत से तीन गुना अधिक हो चुके हैं, जिसमें उत्पाद शुल्क व राज्यों के टैक्सों की भी भूमिका है।


दरअसल, कोरोना संकट से जूझ रही सरकार के आय के स्रोत भी सिकुड़े हैं। वहीं विकास योजनाओं हेतु उसे अतिरिक्त धन की जरूरत होती है। नये कर लगाना इस मुश्किल दौर में संभव नहीं है, ऐसे में सरकार पेट्रोलियम पदार्थों से होने वाले मुनाफे को बड़े आय स्रोत के रूप में देख रही है। लॉकडाउन के दौरान मई में पेट्रोल पर भारी ड्यूटी बढ़ाई गई थी, उसे कम नहीं किया गया है। उसके बावजूद कीमतों में लगातार वृद्धि जारी है। राज्यों के वैट आदि कीमत में शामिल होने से विभिन्न राज्यों में पेट्रोल व डीजल के दामों में अलग तरीके से वृद्धि होती है। ऐसे में कच्चे तेलों में मामूली वृद्धि के बाद सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां कीमतों में संशोधन कर देती हैं। वैसे भी जब दुनिया में कच्चे तेल के दामों में अप्रत्याशित कमी आई तो सरकार ने उपभोक्ताओं को उसका लाभ नहीं दिया। अब जब दुनिया की आर्थिकी रवानगी पकड़ रही है तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल के अंतर्राष्ट्रीय दामों में कमी की गुंजाइश कम ही नजर आती है। ऐसे में उत्पाद शुल्क में कटौती के बिना पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में कमी संभव नहीं है, क्योंकि पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 32 रुपये से अधिक बतायी जाती है। फिर भी सरकार इनके दामों में राहत देने की दिशा में गंभीर नजर नहीं आती। आखिर पेट्रोल-डीजल की कीमतें कहां जाकर थमेंगी?

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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चमक और कसक, बाजार की उछाल आर्थिकी में भी नजर आये (दैनिक ट्रिब्यून)

बीते बृहस्पतिवार का दिन बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हुआ। तकरीबन डेढ़ सदी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि इसके संवेदी सूचकांक ने पचास हजार के मनोवैज्ञानिक स्तर को छू लिया। यद्यपि दिन के अंत में कुछ गिरावट भी दर्ज की गई। दलाल स्ट्रीट ने इस ऊंचाई का जश्न भी मनाया लेकिन एक आम आदमी को यह सवाल जरूर कचोटता है कि शेयर बाजार कुलांचे भर रहा है और अर्थव्यवस्था कोरोना संकट से लड़खड़ाने के बाद चलनी ही शुरू हुई है। अर्थव्यवस्था का सिमटना और बाजार का उछाल लेना उसे तार्किक नजर नहीं आता। मार्च में लॉकडाउन लगने के बाद बाजार में तेज गिरावट और तेज उछाल आम आदमी को असमंजस में डालती है। इसके बावजूद यह हकीकत है कि बीते दस महीने में शेयर बाजार के सूचकांक में दुगनी वृद्धि हुई है और बीते साल शेयर बाजार के निवेशकों ने पंद्रह फीसदी का लाभ लिया। जाहिर है कोरोना संकट के दौर में किसी अन्य क्षेत्र में शायद ही निवेश का ऐसा प्रतिफल मिला हो। लेकिन इसके बावजूद सवाल वही है कि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था का आईना क्यों नहीं है। ऐसा नहीं है कि ऐसा भारत में ही हो रहा है। यह वैश्विक रुझान है और अमेरिका समेत कुछ अन्य देशों की अर्थव्यवस्था में भी ऐसा ही रुझान देखने को मिल रहा है। कुछ अर्थशास्त्री बताते हैं कि अर्थव्यवस्था के संकुचन के बावजूद शेयर बाजार में उछाल के मूल में बाजार में नकदी की तरलता का अधिक होना है। दरअसल, एक हकीकत यह भी है कि बाजार अर्थव्यवस्था को भविष्य के नजरिये से देखता है। निवेशक की नजर भविष्य में अर्थव्यवस्था के रुझान पर होती है। वहीं आम आदमी की नजर अर्थव्यवस्था में उत्पादन और रोजगार की स्थिति पर होती है। दरअसल, शेयर बाजार की तुलना कार चलाने से की जाती है, जिसमें चालक की नजर दूर से आने वाले वाहन पर होती है। वह यह नहीं देख पाता कि सड़क में कहां गड्ढे हैं। 


वास्तव में विश्वव्यापी शेयर बाजार में उछाल के तात्कालिक कारण भी रहे हैं। हाल ही में अमेरिका में चुनाव के बाद जो बाइडेन के सत्ता संभालने के बाद विश्वास बढ़ा कि विदेश नीति बेहतर होने से अब शांति कायम होगी। दूसरे, बाइडेन ने 19 खरब डालर के राहत पैकेज की घोषणा की है, जिससे बाजार संवेदनशील हुआ है। राहत पैकेज से डॉलर कमजोर होगा, जिसका लाभ उभरती अर्थव्यवस्थाओं को होगा।  ऊंची ब्याज दर निवेशकों को भारत खींच लाती है। एक अन्य कारण यह भी कि कोरोना संकट के बाद ग्लोबल सेंट्रल बैंक ने बड़ी मात्रा में वैश्विक अर्थव्यवस्था में पैसा डाला, जिसका लाभ भारतीय शेयर बाजार को भी मिला। वहीं बड़ी अर्थव्यवस्थाएं महामारी से निपटने के लिये आर्थिक पैकेज दे रही हैं, जिससे बाजार में तरलता आने से शेयर बाजार में रौनक आई है। एक महत्वपूर्ण घटक यह भी है कि कोरोना संकट के दौरान वैश्विक शेयर बाजार से जुड़ी ऐसी कंपनियों में बहार आई जो अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधि चेहरा नहीं हैं। उनकी आय अन्य सैकड़ों कंपनियों के बराबर रही। भारत के संदर्भ में देखें तो अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने की उम्मीद में शेयर बाजार में उछाल है। दूसरे सरकार द्वारा जो संरचनात्मक सुधार किये थे, उसका असर अब अर्थव्यवस्था पर दिखायी देने लगा है। वहीं बीते दस महीने में स्टॉक मार्केट में एक करोड़ नये खाते खोला जाना बता रहा है कि नयी पीढ़ी शेयर बाजार को बेहतर निवेश विकल्प के रूप देख रही है। वह प्रॉपर्टी व बैंकों में निवेश करने के बजाय तेज लाभ की राह शेयर बाजार में देख रही है। वहीं अब नये बजट की उम्मीदों ने बाजार की संवेदनशीलता को बढ़ाया है। बाजार को भरोसा है कि सरकार कमजोर क्षेत्रों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ज्यादा पैसा डालेगी, जिससे आर्थिकी में सकारात्मक बदलाव नजर आयेगा। निस्संदेह शेयर बाजार मुनाफे की आकांक्षा और आशंकाओं से गहरे तक प्रभावित होता है। यही वजह है कि वैश्विक शेयर बाजार में शुक्रवार को आई गिरावट ने भारतीय शेयर बाजार को भी झटका दिया।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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कांटों का ताज, बाइडेन के सामने चुनौतियों का अंबार (दैनिक ट्रिब्यून)

अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के रूप में जो बाइडेन के शपथ ग्रहण के दौरान कर्फ्यू और भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती बता गई कि उनके लिये आने वाले दिन चुनौती भरे हैं। विवादित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही सत्ता से बाहर हो गये हों लेकिन वे एक ऐसा विभाजित अमेरिका पीछे छोड़ गये हैं, जिसका मुकाबला बाइडेन सरकार को करना पड़ेगा। सही मायनो में उनके लिये राष्ट्रपति पद कांटों के ताज जैसा है। घरेलू स्तर पर चुनौतियों के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें न केवल अमेरिका की विश्व शक्ति वाली प्रतिष्ठा की बहाली करनी है बल्कि ट्रंप प्रशासन द्वारा उलझाये गये चीन, कोरिया और ईरान जैसे विवादित मसलों से भी जूझना है। कोरोना संकट से सबसे अधिक संक्रमण और मौतों का शिकार अमेरिका को होना पड़ा है। ट्रंप प्रशासन द्वारा महामारी से मुकाबले में की गई लापरवाही के बाद अमेरिका आज बेरोजगारी और उद्योग-धंधों के चौपट होने से बेजार है। बहरहाल, विभाजित अमेरिका को एकजुट करना उनकी प्राथमिक चुनौती है। शपथ ग्रहण के बाद पहले संबोधन में उन्होंने व्हाइट सुप्रीमेसी खत्म करने की बात तक कही। उन्होंने कहा कि यह अमेरिका का दिन है, लोकतंत्र का दिन है व उम्मीदों का दिन है। अमेरिकी लोकतंत्र की चिंताओं को जाहिर करते हुए उन्होंने कहा है कि लोकतंत्र कीमती है, लोकतंत्र नाजुक है मगर लोकतंत्र कायम है। हाल में कैपिटल बिल्डिंग में अमेरिका को शर्मसार करने वाली घटना का जिक्र भी उन्होंने किया। उन्होंने कहा कि अब इस पवित्र जगह पर एक राष्ट्र के रूप में एक साथ हैं। उन्होंने सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण को अमेरिका की लोकतंत्र की परंपरा का विस्तार बताया। उन्होंने अमेरिका के लोगों को चेताया कि बिना एकता के शांति नहीं हो सकती। एकता ही आगे का रास्ता है। साथ ही अश्वेत कमला हैरिस के चयन को परिभाषित किया कि जिस देश में 108 साल पहले महिलाओं को वोट डालने से रोका गया था, वहां एक अश्वेत उपराष्ट्रपति बनी है।


जैसी उम्मीद थी कि राष्ट्रपति बनते ही बाइडेन ने डोनाल्ड ट्रंप के कई विवादित फैसलों को पलटकर अमेरिका की छवि को सुधारने का प्रयास किया। राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठते ही बाइडेन ने पेरिस जलवायु समझौते में अमेरिका की वापसी की है। कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई को तेज करते हुए एक फैसले पर हस्ताक्षर किये हैं, जिसमें मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग को अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही ट्रंप सरकार के विवादित फैसले मुस्लिम ट्रैवल बैन को खत्म कर दिया गया, जिसके तहत कुछ मुस्लिम व अफ्रीकी देशों के लोगों के अमेरिका आने पर रोक लगी थी। बाइडेन ने मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने के फैसले को पलटते हुए इसके लिये फंडिंग पर रोक लगा दी। साथ ही विवादित कीस्टोन एक्सएल पाइपलाइन के विस्तार को भी रोक दिया, जो उनका चुनावी वायदा भी था। वहीं ग्लोबल वार्मिंग के लिये खतरा बने अमेजन वनों की कटाई के लिये ब्राजील के राष्ट्रपति बोल्सोनारो को जवाबदेह ठहराने की बात कही। इसके लिये फंडिंग जुटाने की भी उन्होंने बात कही। जहां तक बाइडेन सरकार के दौरान भारत व अमेरिकी संबंधों का सवाल है तो उनका विस्तार अपेक्षित है। भारत के लोग कमला देवी हैरिस के उपराष्ट्रपति बनने तथा बाइडेन प्रशासन में भारतीय मूल के बीस लोगों की महत्वपूर्ण भूमिकाओं को लेकर उत्साहित हैं। उभरती अर्थव्यवस्था और सामरिक समीकरणों के चलते दोनों देशों में बेहतर संबंधों की उम्मीद की जा रही है। हाल के दिनों में सुरक्षा व रक्षा मामलों को लेकर दोनों देशों में कई महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं। कई बड़े रक्षा सौदे अमेरिका की जरूरत हैं। रक्षा मंत्री के लिये नामंकित लॉयड ऑस्टिन ने कहा भी है कि बाइडेन प्रशासन की प्राथमिकता भारत व अमेरिका में रक्षा साझेदारी बढ़ाना होगा। साझेदारी व सहयोग को मजबूत किया जायेगा ताकि अमेरिका व भारत के सैन्य हित सुरक्षित रह सकें, जिसमें क्वॉड सुरक्षा वार्ता और अन्य बहुपक्षीय कार्यक्रमों की भूमिका रहेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि बाइडेन के नेतृत्व में अमेरिका फिर विश्व नेतृत्व की भूमिका में आ सकेगा।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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सुरक्षा का भरोसा, चिकित्सा बिरादरी की पहल प्रेरित करेगी (दैनिक ट्रिब्यून)

कोरोना संकट प्रसार के एक साल के भीतर भारत में टीकाकरण अभियान की सफल शुरुआत एक उपलब्धि ही मानी जानी चाहिए। महत्वपूर्ण यह  भी कि स्वीकृत दोनों वैक्सीनों का निर्माण भारत में ही किया गया है जो न केवल देश की अर्थव्यवस्था के नजरिये से बेहतर है बल्कि उपचार भी भारतीय परिवेश के अनुरूप हो सकेगा। निस्संदेह सवा अरब के देश के लिये टीकाकरण अभियान चलाना एक चुनौती है, जिसमें देश की सरकार और पूरा तंत्र जुड़ा है। ऐसे में यदि टीकाकरण के प्रभावों को लेकर कुछ शिकायतें आती हैं तो उसे सकारात्मक तरीके से देखा जाना चाहिए। दरअसल, एलोपैथी की तमाम दवाओं के साइड इफेक्ट सामने आते हैं। फिर कोरोना की वैक्सीन तो रिकॉर्ड समय में तैयार हुई है, ऐसे में कुछ साइड इफेक्ट की गुंजाइश तो रहती है। लेकिन देश में 16 जनवरी से शुरू हुए टीकाकरण अभियान में कोई बड़े नकारात्मक प्रभाव देखने में नहीं आये। जहां कुछ नुकसान हुआ है, वह अन्य कारणों से हुआ है। उत्साहजनक बात यह है कि ऐसा प्रभाव अमेरिकी फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन के मुकाबले बेहद कम है। निस्संदेह कोरोना संक्रमण का प्रभाव लोगों पर उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता के अनुरूप कम-ज्यादा हुआ है। एेसे में कोरोना संक्रमण रोकने के लिये लगाये गये टीके का प्रभाव भी अलग-अलग व्यक्ति में उसकी इम्यूनिटी के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। यही वजह है कि भारत बायोटेक ने अब फैक्टशीट जारी करके लोगों को आगाह किया है कि किन वजहों से कोवैक्सीन के दुष्प्रभाव सामने आ सकते हैं। उसके अनुसार एलर्जी पीड़ित, बुखार व ब्लीडिंग डिसऑर्डर, खून पतला करने के लिये दवा लेने वाले तथा इम्यूनिटी बढ़ाने के लिये दवा लेने वालों को कोवैक्सीन न लगवायें। साथ ही गर्भवती महिलाओं व स्तनपान कराने वाली महिलाओं को  भी मना किया गया है। ऐसे में चिकित्सा बिरादरी को टीकाकरण अभियान में सक्रिय भागीदारी करके जनता में टीके के प्रति भरोसा जगाना चाहिए। यदि वे टीकाकरण से परहेज करेंगे तो आम लोगों को टीकाकरण के लिये कैसे प्रेरित किया जा सकता है। यही वजह है कि एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया और नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी.के. पॉल ने टीका लगवाकर सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया है।


बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि टीकाकरण के दौरान दुष्प्रभावों से निपटने में कोई कमी-पेशी रखी गई हो। इसको लेकर तमाम तैयारियां भी की गई हैं। दरअसल, गंभीर बात तब होती है जब दुष्प्रभावों के बाद व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती कराना पड़े। ऐसे केस गिने-चुने ही आये हैं और उन्हें कुछ समय के बाद डिस्चार्ज भी कर दिया गया। इसके बावजूद टीकाकरण के प्रति उत्साह दिखाने वाले लोगों की सेहत की रक्षा का अंतिम दायित्व सरकार का ही होना चाहिए। साथ ही जो नकारात्मक प्रभाव सामने आते हैं, उसकी जानकारी लोगों को दी जानी चाहिए। इस तरह टीकाकरण अभियान में पारदर्शिता से लोगों का इसके प्रति भरोसा बढ़ेगा, जिससे हम दुनिया के इस सबसे बड़े टीकाकरण अभियान को सफल बना पायेंगे। भारत का इतिहास रहा है कि हम एक दिन में करोड़ की संख्या तक टीके महिला और बच्चों को लगा चुके हैं। देश न केवल दुनिया का सबसे बड़ा टीका निर्माता है बल्कि देश में टीकाकरण की देखी-परखी व्यवस्था भी है। यही वजह है कि जब विकसित देशों में वैक्सीन एकत्र करके आत्मकेंद्रित होने की होड़ है, भारत के टीका बनाने और टीकाकरण कार्यक्रम की सफल शुरुआत से तमाम विकासशील व गरीब देशों में खासा उत्साह है और वे बड़ी उम्मीद से भारत की ओर देख रहे हैं। बहरहाल, यदि टीकाकरण के बीच कोई नकारात्मक पहलू सामने आता है तो चिकित्सीय तरीकों से पड़ताल करके सूचना माध्यमों के जरिये लोगों को सूचित किया जाये, अन्यथा ऐसे में निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा अफवाहें फैलाने में देर नहीं लगती। वैसे जो भी साइड इफेक्ट सामने आये हैं, उनमें अधिकांश में हल्का बुखार, सिरदर्द और जी मिचलाने की शिकायतें हैं। इसके बावजूद सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि टीका लगवाना स्वैच्छिक है। साथ ही कोविड-19 से बचाव के तौर-तरीके अपनाना अभी भी जरूरी हैं।

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Friday, January 15, 2021

सभ्यता की कसौटी (दैनिक ट्रिब्यून)

निस्संदेह किसी सभ्य समाज में किसी भी किस्म के नस्लवाद का का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। खासकर खेल की दुनिया में तो कतई नहीं, जो मनुष्य के उदात्त जीवन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। आज 21वीं सदी में किसी समाज के लिये ऐसी सोच का होना शर्मनाक है। पिछले दिनों सिडनी में भारत व आस्ट्रेलिया के बीच तीसरे टेस्ट मैच के दौरान जो कुछ भी अप्रिय घटा, वह बताने वाला था कि खुद को सभ्य बताने वाले विकसित देशों के कुछ लोग आज भी मानसिक दुराग्रहों से मुक्त नहीं हो पाये हैं।  निस्संदेह दर्शक दीर्घा में अच्छे खेल को प्रोत्साहन देने वाले क्रिकेट प्रशंसक भी होंगे लेकिन कुछ बिगड़ैलों ने जिस तरह से भारतीय खिलाड़ियों को लेकर नस्लवादी टिप्पणियां कीं, वह दुखद ही कही जायेंगी। कहीं न कहीं ऐसे लोग विपक्षी टीम का मनोबल गिराने का कुत्सित प्रयास ही करते हैं ताकि खिलाड़ियों की मानसिक एकाग्रता भंग करके अपनी टीम को बढ़त दिलायी जा सके। ऐसी अभद्रता कई खिलाड़ियों को फिल्डिंग के दौरान सहनी पड़ी। नस्लभेदी टिप्पणी करने वाले अपनी टीम के प्रति इतनी उम्मीदें पाले होते हैं कि हर मैच में अपनी टीम को जीतता देखना चाहते हैं जो कि किसी भी खेल में संभव नहीं है। यही मानसिक ग्रंथि उन्हें विपक्षी टीम के खिलाफ अनाप-शनाप बकने को उकसाती है। विडंबना यह है कि इन असामाजिक तत्वों ने दूसरा मैच खेल रहे मोहम्मद सिराज और जसप्रीत बुमराह को निशाना बनाया, जो आस्ट्रेलिया टीम को चुनौती दे रहे थे। कहीं न कहीं ऐसी कुत्सित कोशिशें विपक्षी टीम की जीत की कोशिशों की लय को भंग करने के ही मकसद से की जाती हैं। हालांकि खिलाड़ियों द्वारा टीम कप्तान को विकट स्थिति की जानकारी देने और मैच अधिकारियों द्वारा कार्रवाई के बाद बदतमीज दर्शकों को स्टेडियम से बाहर का रास्ता दिखाया गया, लेकिन ऐसी कड़वाहट इतनी जल्दी कहां दूर होती है।  उसकी कसक लंबे समय तक बनी रहती है।


हालांकि, क्रिकेट आस्ट्रेलिया ने इस घटनाक्रम पर खेद जताया है। यह अच्छी बात है कि ऐसी कुत्सित मानसिकता को संस्थागत संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। मामले की पड़ताल की जा रही है। विगत में खिलाड़ी, आप्रवासी भारतीय व अल्पकालिक प्रवास पर गये लोग शिकायत करते रहे हैं कि कुछ आस्ट्रेलियाई नस्लवादी व्यवहार करते हैं। हालांकि, आस्ट्रेलिया में ऐसे अपशब्दों को प्रतिबंधित किया गया है और आस्ट्रेलिया एक बहुसांस्कृतिक देश के रूप में देखा जाता रहा है।  श्वेत आस्ट्रेलिया की नीति को 1970 के दशक में अलविदा कह दिया गया था। पिछले दशकों में बड़ी संख्या में अश्वेत बड़े शहरों का हिस्सा बने हैं। लेकिन इसके बावजूद एक तबका इसे स्वीकृति प्रदान और सभी लोगों को अपने समाज में आत्मसात‍् नहीं कर पा रहा है। खासकर जब खेल की बात आती है तो वे आक्रामक राष्ट्रवादी बन जाते हैं। खेल अधिकारियों ने दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करके सकारात्मक संदेश ही दिया है। लेकिन इसके बावजूद कई सवाल अनुत्तरित ही हैं कि सभ्यता के विकास क्रम में ऐसी संकीर्ण सोच के लोग क्यों नस्लवाद का पोषण करते हैं। अवांछित पूर्वाग्रहों से ग्रस्त ऐसे लोग सामुदायिक पहचान के जरिये अपने अतीत के वर्चस्व से आत्ममुग्ध रहते हैं। यह ठीक है कि विकसित समाजों ने ऐसी धारणा को दूर करने में खासी कामयाबी पायी है। लेकिन इसके बावजूद नस्लभेदी पूर्वाग्रहों का विद्यमान रहना हैरानी का ही विषय है।  ऐसी दुर्भावना का पाया जाना किसी भी सभ्य समाज के लिये शर्म की बात है। खासकर दूसरे देश से खेल जैसे उत्कृष्ट मानवीय व्यवहार का हिस्सा बनने वाले खिलाड़ियों के साथ ऐसा व्यवहार किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकता। संस्थागत स्तर पर तो ऐसी सोच को पनपने का किसी भी हाल में मौका नहीं देना चाहिए। ऐसी सोच को दूर करने के लिये सकारात्मक सामाजिक प्रशिक्षण दिये जाने की भी जरूरत है ताकि उनमें आलोचनात्मक विवेक पैदा किया जा सके। तभी वे सभ्य होने की कसौटी पर खरे उतर सकेंगे। मानव के भीतर मानव के लिये संवेदना जगाना जरूरी है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Thursday, January 14, 2021

टीकाकरण में पारदर्शिता (दैनिक ट्रिब्यून)

निस्संदेह भारत में कोरोना संक्रमण के ग्राफ में लगातार आ रही गिरावट सुखद ही है। इसके बावजूद यह मानकर चलना चाहिए कि यह संकट अभी टला नहीं है। अमेरिका व यूरोप में वायरस के बदले हुए स्ट्रेन ने नये सिरे से दस्तक दी है। बहरहाल, यह खबर उत्साहवर्धक है कि 16 जनवरी से देश में टीकाकरण अभियान विधिवत‍् शुरू हो रहा है। इससे पहले दो चरण में ड्राई रन के जरिये देश के तमाम भागों में टीकाकरण का पूर्वाभ्यास किया गया ताकि इसके क्रियान्वयन में कोई दिक्कत न आये। शोध-अनुसंधान से हासिल वैक्सीन इस महामारी से मुकाबले के लिए सुरक्षा कवच उपलब्ध कराती है। शुुरुआती चरण में देश के तीस करोड़ लोगों को टीकाकरण लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसे दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान कहा जा रहा है। देश के तमाम लोगों की निगाहें उन केंद्रों पर लगी हैं, जहां से टीकाकरण अभियान की शुरुआत होगी। इसी बीच चिंता यह भी जताई जा रही है कि कुछ लोग बारी से पहले इसे हासिल करने के लिए तिकड़में भिड़ा रहे हैं। ये वे लोग हैं जो अपने पद, राजनीतिक पहुंच व आर्थिक रसूख का इस्तेमाल करके पहले वैक्सीन हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं। वे लोग, जो लाइन तोड़कर लाभ उठाना अपना विशेषाधिकार समझते हैं। यह होड़ उन लोगों के अधिकारों का अतिक्रमण करेगी जिन्हें वैक्सीन पहले मिलनी चाहिए। हालांकि, प्रधानमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि इसमें पारदर्शिता बरती जायेगी और जनप्रतिनिधियों का नंबर बाद में आयेगा। महामारी के वायरस ने अपना शिकंजा कसने में अमीर-गरीब का फर्क न करके मानवता का विनम्र सबक ही सिखाया है। यही वजह है कि दुनिया के पचास देशों ने वैक्सीनेशन के लिये सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र को अधिकृत किया है। साथ ही लाभार्थियों की प्राथमिकता सूची का सख्त अनुपालन सुनिश्चित किया है  ताकि मुनाफाखोरी के लिये टीकाकरण से खिलवाड़ न हो। अन्यथा अमेरिका जैसे देश में वैक्सीन में विसंगतियां सामने आई हैं।   


सरकार ने टीकाकरण के परिवहन, कोल्ड स्टोरेज, वितरण व निगरानी को लेकर व्यापक तैयारियां की हैं ताकि टीका सुरक्षित ढंग से जरूरतमंदों तक पहुंच सके। पहले चरण में तीन करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों तथा फ्रंटलाइन वर्करों को टीका लगाया जायेगा। फिर गंभीर रोगों से ग्रस्त, संक्रमण के उच्चे जोखिम वाले लोगों व पचास वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को टीका लगाया जायेगा। शुरुआत में तीस करोड़ लोगों के टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है। यह भी जरूरी होगा कि टीके की दोनों खुराक मिलनी सुनिश्चित की जाये। निस्संदेह जिस तरह देश ने कोरोना संकट को झेला है, एक करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हुए हैं तथा डेढ़ लाख लोगों ने जीवन खोया है, इससे बचाव का अंतिम उपाय टीकाकरण ही है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चुनावी बूथ जैसी रणनीति बनाने और वैक्सीन को लेकर अफवाहों पर अंकुश लगाने की अपील की है। राजनीति व धर्म के आधार पर वैक्सीन को लेकर कुप्रचार किया जाता रहा है। ऐसे लोगों पर नकेल कसना जरूरी है। यह देश के लिये सुखद है कि वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत से हासिल दो वैक्सीनों की आपातकालीन प्रयोग के लिये अनुमति मिल चुकी है। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका के भारतीय संस्करण कोविशील्ड और पूर्ण रूप से भारतीय वैक्सीन कोवैक्सीन को अनुमति दी है।  कोरोना संकट के दौरान जिस तरह प्रधानमंत्री की अपीलों को राज्यों ने गंभीरता से लिया, उम्मीद है कि टीकाकरण में भी वही प्रतिबद्धता नजर आयेगी।  केंद्र सरकार ने टीकाकरण में प्राथमिकता उन लोगों को दी है जो संकट के समय डटकर खड़े रहे। टीकाकरण कार्यक्रम के लिये साढ़े चार लाख कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया है।  निस्संदेह हम समय पर इस महामारी को हराने में कामयाब हो सकेंगे। यह अच्छी बात है कि भारत में दो वैक्सीन उपलब्ध हैं और वह भी दुनिया में सबसे कम कीमत पर। यही वजह है कि दुनिया के विकासशील और गरीब मुल्क बड़ी उम्मीदों से भारत की तरफ देख रहे हैं।  

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Monday, January 11, 2021

पाक की नूरा कुश्ती (दैनिक ट्रिब्यून)

ऐसे वक्त में जब पाकिस्तान की आतंकवाद पोषण की नीतियों पर निगाह रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय नियामक संस्था की फरवरी में बैठक होने जा रही है, पाक कुख्यात आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई का नाटक कर रहा है। मुंबई हमले के मास्टर माइंड और जम्मू-कश्मीर में आतंक फैलाने वाले संगठन लश्कर-ए-तैयबा के अगु‍आ जकी-उर-रहमान लखवी को हाल ही में गिरफ्तार किया गया है। उसे संयुक्त राष्ट्र ने 2008 में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया था। लखवी पर आतंकियों को धन-सहायता उपलब्ध कराने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। पाक की एक अदालत ने आतंकवाद के वित्तपोषण के मामले में लखवी को पंद्रह साल जेल की सजा सुनायी है। यह विडंबना ही है कि एफएटीएफ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की बैठकों से पहले पाक इसी तरह के प्रपंच आंख में धूल झोंकने के लिए करता है। इसी तरह एक अन्य कुख्यात आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर के खिलाफ भी आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी किये गये हैं। निस्संदेह पाक सरकार फरवरी में वित्तीय कार्रवाई कार्यबल यानी एफएटीएफ तथा इससे पहले इसकी एशिया प्रशांत संयुक्त समूह इकाई की बैठक के मद्देनजर यह कार्रवाई का नाटक कर रहा है, जिसकी भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए इसे नाटक बताते हुए कहा है कि महत्वपूर्ण बैठकों से पहले पाक ऐसी ही हरकत करता रहा है।

दरअसल, पाक सरकार ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकवादियों के खिलाफ कभी भी ठोस कार्रवाई नहीं की है। प्रतिबंधित आतंकी संगठन गाहे-बगाहे भारत के खिलाफ सार्वजनिक मंचों से विषवमन करके अपने मंसूबों को अंजाम देते रहते हैं। पाक के सरकारी प्रतिष्ठान भी भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं। विश्व बिरादरी का दायित्व बनता है कि पाक की जवाबदेही तय की जाये ताकि पाक में सक्रिय सभी आतंकी संगठनों, उनके बुनियादी ढांचे तथा आतंकी सरगनाओं के खिलाफ ठोस कार्रवाई हो सके। दरअसल, पाक एफएटीएफ द्वारा घोषित ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिये छटपटा रहा है, जिसमें चीन उसकी खुली मदद कर रहा है। उसी कड़ी में लखवी की गिरफ्तारी का यह ढोंग सामने आ रहा है। दरअसल, पाक को यह डर भी सता रहा है कि एफएटीएफ द्वारा निर्धारित सूची पूरी न कर पाने से कहीं वह काली सूची में न दर्ज हो जाये। यदि ऐसा होता है तो पहले से चरमराई पाक की अर्थव्यवस्था चौपट हो जायेगी। पाक में विदेशी निवेश और मदद के सभी रास्ते बंद हो जायेंगे। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में भी एफएटीएफ की बैठक से ठीक पहले कुख्यात आतंकवादी सरगना हाफिज सईद को गिरफ्तार किया गया था। बीते वर्ष अक्तूबर में एफएटीएफ की बैठक में कार्रवाई योजना को अंतिम रूप देने के लिये पाक को तीन माह का समय दिया गया था और यह निर्धारित अवधि का तीसरा महीना है, जिसमें से छह लक्ष्य अभी बाकी हैं।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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