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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Wednesday, May 5, 2021

लॉकडाउन का वक्त ( दैनिक ट्रिब्यून)

देश में कोरोना संक्रमण जिस तेजी से फैल रहा है और देश में ऑक्सीजन संकट व चिकित्सा सुविधाओं का जो हाल है, उसे देखते हुए अदालत, विशेषज्ञ व उद्योग जगत भी लॉकडाउन लगाने पर जोर दे रहा है। निस्संदेह स्थिति नियंत्रण से बाहर है। लॉकडाउन के समय का उपयोग ऑक्सीजन उत्पादन बढ़ाने व आपूर्ति तथा मरीजों के लिये चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में होना चाहिए। साथ ही इस समय का उपयोग वैक्सीन उत्पादन बढ़ाने व टीकाकरण अभियान में तेजी लाने के लिये भी किया जा सकता है। लेकिन पिछले साल के दो माह के सख्त लॉकडाउन के दुष्प्रभावों से सहमी केंद्र सरकार फूंक-फूंककर कदम बढ़ा रही है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने कहा भी था कि लॉकडाउन को अंतिम विकल्प के रूप में अपनाया जाना चाहिए। लेकिन संसाधनों की कमी और संक्रमण की भयावहता को देखते हुए कुछ राज्य पंद्रह दिन, सप्ताह, तीन दिन या सप्ताहांत का लॉकडाउन लागू कर चुके हैं। महाराष्ट्र में संक्रमण की भयावहता के बीच लगाये गये लॉकडाउन के अच्छे परिणाम देखे गये हैं। ऐसे में साफ है कि लॉकडाउन का वास्तविक फायदा तभी है जब पूरे देश में केंद्र व राज्यों के समन्वय से इस दिशा में कदम उठाया जाये। यही वजह कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने ऑक्सीजन, आवश्यक दवाओं तथा वैक्सीनेशन नीति के प्रोटोकॉल की समीक्षा के साथ ही केंद्र व राज्यों को लॉकडाउन लगाने की सलाह दी। हालांकि, इससे पहले जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को राज्य के पांच जिलों में लॉकडाउन लगाने के आदेश दिये तो राज्य सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले पर रोक लगा दी थी। यद्यपि योगी सरकार ने इसके बाद सप्ताहांत लॉकडाउन की अवधि में वृद्धि की थी। हाल के दिनों में हरियाणा में एक सप्ताह, पंजाब सरकार ने पंद्रह मई तक बंदिशें तथा ओडिशा सरकार ने दो सप्ताह का लॉकडाउन लगाया है। हालांकि, इस बार का लॉकडाउन पिछले साल की तरह सख्त नहीं है।


निस्संदेह देश के विभिन्न राज्यों में कोरोना संक्रमण में जिस तरह तेजी आई है और अस्पतालों में जगह न मिलने व ऑक्सीजन की कमी से जिस तरह से लोग मर रहे हैं, भविष्य की तैयारी के लिये लॉकडाउन अपरिहार्य माना जाने लगा है। भारत ही नहीं, विदेशी विशेषज्ञ भी मौजूदा संकट में लॉकडाउन को उपयोगी मान रहे हैं। अमेरिका में बाइडन प्रशासन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार एंथनी फाउची का सुझाव था कि भारत को वायरस के संचरण को रोकने के लिये कुछ सप्ताह का लॉकडाउन लगाना चाहिए। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस अवधि का उपयोग चिकित्सा सुविधाओं को जुटाने तथा वैक्सीनेशन कार्यक्रम में तेजी लाने के लिये किया जाना चाहिए। लेकिन एक चिंता उन लोगों की भी है, जिनको पिछले साल सख्त लॉकडाउन लगाने पर सबसे ज्यादा भुगतना पड़ा था। रोज कमाकर खाने वाले वर्ग की चिंता भी इसमें शामिल है। उस वर्ग की भी जो लाखों की संख्या में अपने गांवों को पलायन कर गया था, जिसके चलते गांवों में भी संक्रमण में तेजी आई थी। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच को कहना पड़ा कि हमारी चिंता समाज के वंचित वर्ग के सामाजिक व आर्थिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर है। सरकार को पहले इस वर्ग को सहायता पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। यही वह वर्ग था जिसे लॉकडाउन शब्द से भय होने लगा था। लेकिन देश के जो हालात हैं उसमें लॉकडाउन को अंतिम विकल्प के रूप में प्रयोग माना जा रहा है। यही वजह है कि उद्योग जगत की प्रतिनिधि संस्था सीआईआई ने देश में संक्रमण के विस्तार को नियंत्रित करने के लिये आर्थिक गतिविधियों में कटौती तथा सख्त कदम उठाये जाने की मांग की है। निश्चिय ही अब केंद्र सरकार को पिछले लॉकडाउन के दुष्प्रभावों से सबक लेकर संक्रमण के चक्र को तोड़ने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन सरकार को लॉकडाउन लगाने से पहले कमजोर वर्ग के लोगों को व्यापक राहत देने का कार्यक्रम लागू करना चाहिए। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Tuesday, May 4, 2021

भारतीय राज्य की नाकामी ( दैनिक ट्रिब्यून)

देश में कोविड संकट के बीच अपनों की जान बचाने को रोते-बिलखते और दर-दर की ठोकर खाते लोगों की पीड़ा को देश की अदालतों ने संवेदनशील ढंग से महसूस किया है और सत्ताधीशों को आड़े हाथों लिया है। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता के बीच लोगों के जीवन रक्षक साधनों के अभाव में होने वाली मौतों को भारतीय राज्य के रूप में विफलता बताया है। अदालत ने कहा कि राज्य का दायित्व है कि वह व्यक्ति के जीवन के मौलिक अधिकार की रक्षा करे। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-12 के अनुसार राज्य के अवयवों के रूप में केंद्र व राज्य सरकारें, संसद, राज्य विधानसभाएं और स्थानीय निकाय आते हैं। लेकिन इस संकट की घड़ी में एक आम आदमी को राहत पहुंचाने में राज्य तंत्र विफल ही साबित हुआ है। हाल ही में दिल्ली व अन्य राज्यों में कोविड मरीजों की मौत की घटनाओं ने इस विफलता की पुष्टि ही की है। न्यायमूर्ति विपिन सांघी और रेखा पल्ली को एक ऐसे मरीज की मौत की पीड़ा ने उद्वेलित किया, जिसने अपने लिये आईसीयू बेड की मांग की थी, लेकिन ऑक्सीजन की प्रतीक्षा में दम तोड़ दिया। विडंबना ही है कि पूरे देश से बड़ी संख्या में कोविड मरीजों की ऑक्सीजन न मिलने से मौत होने की खबरें लगातार आ रही हैं जो तंत्र की आपराधिक लापरवाही को ही उजागर करती है। यह हमारे स्वास्थ्य सिस्टम की ही विफलता नहीं है, राज्य संस्था की भी विफलता है कि मरीज प्राणवायु की तलाश में मारे-मारे घूम रहे हैं और कहीं से उनकी मदद नहीं हो पा रही है। कोरोना उपचार में काम आने वाली दवाओं के वितरण में कोताही और कालाबाजारी का बोलबाला लोगों की मुसीबत बढ़ा रहा है। केंद्र व राज्य सरकारों से पूछा जाए कि पिछले एक साल से अधिक समय से देश को अपनी गिरफ्त में लेने वाले कोरोना संकट से निपटने के लिये समय रहते कदम क्यों नहीं उठाये गये।


हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी कोविड संकट के दौर में केंद्र की कोताही पर कई सख्त टिप्पणियां की और इस संकट से राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाकर जूझने को कहा। शीर्ष अदालत में न्यायमूर्ति डी.वी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव व ‍ रवींद्र भट की पीठ ने सख्ती दिखाते हुए कहा कि अपनी मुश्किलों को सोशल मीडिया के जरिये व्यक्त करने वाले लोगों पर किसी कार्रवाई के प्रयास को न्यायालय की अवमानना माना जायेगा। उन्होंने कुछ राज्य सरकारों के ऐसे लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की मंशा पर सवाल उठाये और कहा कि राज्यों की विफलता से उपजे आक्रोश को इससे हवा मिलेगी। कोर्ट ने चेताया कि सरकार व पुलिस नागरिकों को अपने दुख-दर्द सोशल मीडिया पर साझा करने के लिये दंडित करने का प्रयास न करे। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्यों मरीजों को दवा व ऑक्सीजन के लिये दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। इसको लेकर शासन-प्रशासन को परिपक्व व्यवहार करने की जरूरत है। सरकार को संक्रमण में काम आने वाली दवाओं के आयात व वितरण को नियंत्रित करना चाहिए। साथ ही चेताया कि सूचना क्रांति के दौर में सोशल मीडिया पर लगाम लगाई तो फिर अफवाहों को ही बल मिलेगा। दूसरी तरफ प्रशासन व पुलिस के निचले स्तर पर ऐसे अधिकारों का दुरुपयोग आम लोगों के उत्पीड़न में भी किया जा सकता है। शासन-प्रशासन सख्ती का उपयोग करके अपनी नाकामी पर पर्दा डालने के बजाय जनता से सूचना हासिल कर व्यवस्था सुधारने का प्रयास करे। अदालत ने माना कि संकट के दौरान सोशल मीडिया के जरिये सहायता व सूचना का समांतर तंत्र विकसित हुआ है जो एक मायने में प्रशासन का सहयोग ही कर रहा है। शासन-प्रशासन को 21वीं सदी के सूचना युग में 19वीं सदी के तौर तरीकों से समस्या से नहीं निपटना चाहिए। दरअसल, जनता को विश्वास में लेने से समस्या का समाधान तलाशने में मदद मिलेगी। विश्वास कायम होने से संकट से निपटने में आसानी होगी। जनता व सरकार का सहयोग ही समाधान निकालेगा। लोग तकलीफ में हैं, जिसे संवेदनशील ढंग से ही दूर किया जाना चाहिए।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Monday, May 3, 2021

बंगाल में हुआ खेला, चुनाव परिणामों के गहरे निहितार्थ ( दैनिक ट्रिब्यून)

पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित विधानसभा चुनावों में भाजपा द्वारा अपने तमाम संसाधन झोंकने के बाद ‘दो सौ पार’ के नारे को ममता बनर्जी ने लपक लिया। उन्होंने ‘खेला होबा’ यानी खेल होगा का नारा सच में कर दिखाया है। ‘आशोल परिवर्तन’ के नारे को राज्य के मतदाताओं को समझाने में सफल रही। देश के चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश में आये परिणाम हाल के चुनाव सर्वेक्षणों के अनुरूप ही रहे। तमिलनाडु में डीएमके की वापसी की उम्मीद थी। केरल में एलडीएफ का पलड़ा पहले ही भारी था। असम में भाजपा की जीत दोहराने की बात सामने आ रही थी, कमोबेश भाजपा को उम्मीद से ज्यादा ही मिला। पुड्डुचेरी में भाजपा का चुनावी गणित सिरे चढ़ा है। लेकिन विधानसभा चुनावों मे हॉट स्पाट बने पश्चिम बंगाल ने शेष राज्यों के चुनाव परिणामों को पार्श्व में डाल दिया। निस्संदेह पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम भाजपा की महत्वाकांक्षाओं को झटका है। कह सकते हैं कि वर्ष 2016 में तीन सीट जीतने वाली भाजपा का सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरना उसकी उपलब्धि है। भले ही भाजपा पश्चिम बंगाल के किले को हासिल न कर पाई हो, मगर हाल के चुनाव में हर राज्य में उसका कद बढ़ा ही है। वैसे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने चुनाव अभियान में बंगाल के स्थानीय नेताओं को तरजीह न देकर बड़ी चूक की है। पार्टी राज्य की जमीनी हकीकत समझने में विफल रही।


दरअसल, पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा भले ही अपने लक्षित वर्ग का ध्रुवीकरण न कर पायी, लेकिन वहीं ममता की रणनीति ने अल्पसंख्यक मतों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण कर दिया। साथ ही भाजपा के ध्रुवीकरण की कोशिशों में सेंध लगा दी। जहां भाजपा का शीर्ष नेतृत्व टीएमसी सुप्रीमो पर हमलावार रहा, वहीं ममता बनर्जी राज्य में निर्णायक महिला मतदाताओं को समझा गयी कि एक महिला मुख्यमंत्री को निशाना बनाया जा रहा है। चोट लगने की सहानुभूति को वोटों में तब्दील करने में भी सफल रही। जहां भाजपा के नेता हवाई जहाज-हेलीकॉप्टरों से चुनावी रैलियों में पहुंच रहे थे, वहीं पूरा चुनाव ममता बनर्जी ने व्हीलचेयर के जरिये करके सहानुभूति बटोरी। सही मायनों में ममता भाजपा के हिंदुत्व के खिलाफ बंगाली उपराष्ट्रवाद भुनाने में कामयाब हुई। हिंदीभाषी भाजपा नेताओं को लगातार वह बाहरी बताती रही। वहीं दूसरी ओर केरल में भी मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने हर पांच साल में बदलाव की परंपरा को किनारा करके फिर सत्ता की चाबी हासिल कर ली। कोरोना संकट में उन्होंने बहुत योजनाबद्ध ढंग से काम किया। जनता को जो विश्वास दिलाया, उसको हकीकत में बदला। कोरोना संक्रमण की जांच, उपचार, राहत और मेडिकल ऑक्सीजन के मुद्दे पर वे अव्वल रहे। वही तमिलनाडु में पहली बार बड़े कद्दावर राजनेताओं की अनुपस्थिति में लड़े गये चुनाव में स्टालिन को करुणानिधि की विरासत का लाभ मिला। एआईएडीएमके में वर्चस्व की लड़ाई मतदाताओं में विश्वास जगाने में विफल रही। असम में भाजपा की प्रभावी जीत में जहां पार्टी संगठन और रणनीति का योगदान मिला, वहीं स्थानीय मजबूत छत्रपों ने उसमें बड़ी भूमिका निभायी।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Saturday, May 1, 2021

आपदा से फायदा (दैनिक ट्रिब्यून)

जिस कोरोना संकट को लेकर देश बेफिक्र हो गया था, उसने ज्यादा ताकत से पलटवार करके सारी व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर दिया है। पहले से लचर चिकित्सा व्यवस्था चरमरा कर रह गई है। अस्पतालों में बेड, दवाइयां और वेंटिलेटर नहीं हैं। एक तो नई महामारी का कोई कारगर इलाज नहीं है, दूसरा इस बीमारी में काम आने वाली तमाम जरूरी दवाइयां बाजार से गायब हो गई हैं। देश के लाखों लोग कातर निगाहों से शासन-प्रशासन की ओर देख रहे हैं कि कोई तो राह निकले। सरकार का व्यवस्था पर नियंत्रण कमजोर होता दिख रहा है। हमारे पास न तो पर्याप्त मेडिकल ऑक्सीजन की उपलब्धता है और न ही उपलब्ध ऑक्सीजन को अस्पतालों तक पहुंचाने की कारगर व्यवस्था। इस महामारी में किसी हद तक शुरुआती दौर के उपचार में कारगर बताये जा रहे रेमडेसिविर इंजेक्शन के नाम पर भारी कालाबाजारी की जा रही है। जीवन के संकट से जूझ रहे मरीजों से इनके मुंहमांगे दाम वसूले जा रहे हैं। मरीजों से पचास हजार से लेकर एक लाख तक की कीमत वसूले जाने की शिकायतें मिल रही हैं। देश में दवाइयों और इंजेक्शनों के तमाम जमाखोर सक्रिय हो गये हैं। इस जमाखोरी पर रोक लगाने की कोशिशें सफल होती नजर नहीं आ रही हैं। संकट में पड़े अपनों का जीवन बचाने के लिये लोग कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। इसी आतुरता का फायदा उठाने के लिये आपदा में अवसर ढूंढ़ने वाले मनमाने दाम वसूल रहे हैं। हद तो तब हो गई जब कई जगह जीवनरक्षक इंजेक्शनों की जगह नकली इंजेक्शन तैयार करने की खबरें आ रही हैं। इस मामले में कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं। कालाबाजारी के इस गोरखधंधों में कुछ दवा निर्माताओं और डॉक्टरों तक की गिरफ्तारी हुई हैं। लेकिन इस कालाबाजारी पर पूरी तरह रोक लगाने की कोशिशें सफल होती नजर नहीं आती। ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसी कालाबाजारी पर नियंत्रण करने वाले विभागों व पुलिस को इंसानियत के ऐसे दुश्मनों की कारगुजारियों की भनक न हो। मगर, समय रहते ठोस कार्रवाई होती नजर नहीं आती।


विडंबना देखिये कि दिल्ली में ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदने गये एक मरीज को कुछ लोगों ने अग्निशमन में काम आने वाले सिलेंडर बेच दिए। महिला की शिकायत के बाद दो युवकों की गिरफ्तारी हुई। कुछ इंसान चंद रुपयों के लालच में किस हद तक गिर जाते हैं कि संकट में फंसे लोगों के जीवन से खिलवाड़ पर उतारू हो जाते हैं। जाहिर-सी बात है कि महामारी का जो विकराल रूप हमारे सामने है, उसमें ऑक्सीजन और दवाओं की किल्लत स्वाभाविक है। यह पहली बार है कि मरीजों को जीवनदायिनी मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत इतनी बड़ी मात्रा पर हुई हो। दरअसल, मांग व आपूर्ति के संतुलन से चीजों की उपलब्धता होती है। बताया जा रहा है कि रेमडेसिविर इंजेक्शन की मांग सितंबर के बाद जनवरी तक न के बराबर हो गई थी, इसलिए कंपनियों ने इसका उत्पादन बंद कर दिया था। अब अचानक महामारी के फैलने के बाद मांग बढ़ने से इसकी पूर्ति नहीं हो पा रही है, जिससे इसकी कालाबाजारी लगातार बढ़ती जा रही है। हालांकि, सरकार ने इसके इंजेक्शन का उत्पादन तेज करने के निर्देश दिये हैं, लेकिन आपूर्ति बढ़ने में कुछ वक्त लग जाता है। दरअसल, एक वजह यह भी कि कोरोना ने गांव-देहात की तरफ जब से पैर पसारने शुरू किये, लोकल डॉक्टर स्थिति समझे बिना ही यह इंजेक्शन मरीजों को लाने के लिये कह रहे हैं, जिससे इसकी मांग अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। अब विदेशों से भी यह इंजेक्शन देश में पहुंचने वाला है, शायद उससे भी इसकी ब्लैक मार्केंटिंग पर अंकुश लग सकेगा। बहरहाल, भारत में तेजी से महामारी का दायरा बढ़ता जा रहा है, दवाओं व ऑक्सीजन की कालाबाजारी अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। निस्संदेह यह संकट जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है। ऐसे में सरकारों को दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी होगी। कालाबाजारी करने वाले तत्वों पर सख्ती की भी जरूरत है। साथ ही संकट को देखते हुए तमाम चिकित्सा संसाधन जुटाने की जरूरत है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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आपदा से फायदा ( दैनिक ट्रिब्यून)

जिस कोरोना संकट को लेकर देश बेफिक्र हो गया था, उसने ज्यादा ताकत से पलटवार करके सारी व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर दिया है। पहले से लचर चिकित्सा व्यवस्था चरमरा कर रह गई है। अस्पतालों में बेड, दवाइयां और वेंटिलेटर नहीं हैं। एक तो नई महामारी का कोई कारगर इलाज नहीं है, दूसरा इस बीमारी में काम आने वाली तमाम जरूरी दवाइयां बाजार से गायब हो गई हैं। देश के लाखों लोग कातर निगाहों से शासन-प्रशासन की ओर देख रहे हैं कि कोई तो राह निकले। सरकार का व्यवस्था पर नियंत्रण कमजोर होता दिख रहा है। हमारे पास न तो पर्याप्त मेडिकल ऑक्सीजन की उपलब्धता है और न ही उपलब्ध ऑक्सीजन को अस्पतालों तक पहुंचाने की कारगर व्यवस्था। इस महामारी में किसी हद तक शुरुआती दौर के उपचार में कारगर बताये जा रहे रेमडेसिविर इंजेक्शन के नाम पर भारी कालाबाजारी की जा रही है। जीवन के संकट से जूझ रहे मरीजों से इनके मुंहमांगे दाम वसूले जा रहे हैं। मरीजों से पचास हजार से लेकर एक लाख तक की कीमत वसूले जाने की शिकायतें मिल रही हैं। देश में दवाइयों और इंजेक्शनों के तमाम जमाखोर सक्रिय हो गये हैं। इस जमाखोरी पर रोक लगाने की कोशिशें सफल होती नजर नहीं आ रही हैं। संकट में पड़े अपनों का जीवन बचाने के लिये लोग कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। इसी आतुरता का फायदा उठाने के लिये आपदा में अवसर ढूंढ़ने वाले मनमाने दाम वसूल रहे हैं। हद तो तब हो गई जब कई जगह जीवनरक्षक इंजेक्शनों की जगह नकली इंजेक्शन तैयार करने की खबरें आ रही हैं। इस मामले में कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं। कालाबाजारी के इस गोरखधंधों में कुछ दवा निर्माताओं और डॉक्टरों तक की गिरफ्तारी हुई हैं। लेकिन इस कालाबाजारी पर पूरी तरह रोक लगाने की कोशिशें सफल होती नजर नहीं आती। ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसी कालाबाजारी पर नियंत्रण करने वाले विभागों व पुलिस को इंसानियत के ऐसे दुश्मनों की कारगुजारियों की भनक न हो। मगर, समय रहते ठोस कार्रवाई होती नजर नहीं आती।


विडंबना देखिये कि दिल्ली में ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदने गये एक मरीज को कुछ लोगों ने अग्निशमन में काम आने वाले सिलेंडर बेच दिए। महिला की शिकायत के बाद दो युवकों की गिरफ्तारी हुई। कुछ इंसान चंद रुपयों के लालच में किस हद तक गिर जाते हैं कि संकट में फंसे लोगों के जीवन से खिलवाड़ पर उतारू हो जाते हैं। जाहिर-सी बात है कि महामारी का जो विकराल रूप हमारे सामने है, उसमें ऑक्सीजन और दवाओं की किल्लत स्वाभाविक है। यह पहली बार है कि मरीजों को जीवनदायिनी मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत इतनी बड़ी मात्रा पर हुई हो। दरअसल, मांग व आपूर्ति के संतुलन से चीजों की उपलब्धता होती है। बताया जा रहा है कि रेमडेसिविर इंजेक्शन की मांग सितंबर के बाद जनवरी तक न के बराबर हो गई थी, इसलिए कंपनियों ने इसका उत्पादन बंद कर दिया था। अब अचानक महामारी के फैलने के बाद मांग बढ़ने से इसकी पूर्ति नहीं हो पा रही है, जिससे इसकी कालाबाजारी लगातार बढ़ती जा रही है। हालांकि, सरकार ने इसके इंजेक्शन का उत्पादन तेज करने के निर्देश दिये हैं, लेकिन आपूर्ति बढ़ने में कुछ वक्त लग जाता है। दरअसल, एक वजह यह भी कि कोरोना ने गांव-देहात की तरफ जब से पैर पसारने शुरू किये, लोकल डॉक्टर स्थिति समझे बिना ही यह इंजेक्शन मरीजों को लाने के लिये कह रहे हैं, जिससे इसकी मांग अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। अब विदेशों से भी यह इंजेक्शन देश में पहुंचने वाला है, शायद उससे भी इसकी ब्लैक मार्केंटिंग पर अंकुश लग सकेगा। बहरहाल, भारत में तेजी से महामारी का दायरा बढ़ता जा रहा है, दवाओं व ऑक्सीजन की कालाबाजारी अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। निस्संदेह यह संकट जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है। ऐसे में सरकारों को दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी होगी। कालाबाजारी करने वाले तत्वों पर सख्ती की भी जरूरत है। साथ ही संकट को देखते हुए तमाम चिकित्सा संसाधन जुटाने की जरूरत है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Friday, April 30, 2021

अंधेरे में उजास की आस (दैनिक ट्रिब्यून)

जब बृहस्पतिवार को पूरे देश में पौने चार लाख नये संक्रमितों के मामले सामने आए और साढ़े तीन हजार से अधिक लोगों की मौत हुई, देश में कोरोना संकट की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। तंत्र की संवेदनहीनता देखिये कि इस भयानक होते संकट के बीच पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव जारी था । डरे-सहमे चुनाव कर्मियों के हुजूम के चुनाव सामग्री एकत्र करने के चित्र अखबारों में प्रकाशित हुए। इसी बीच टीकाकरण के तीसरे चरण के लिये ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन में भारी उत्साह बताता है कि देश का जनमानस इस संकट में वैक्सीन को ही अंतिम सुरक्षा उपाय के रूप में देख रहा है। पहले ही दिन सवा करोड़ से अधिक नामांकन होना इसी बात का संकेत है। हालांकि देश में पहले दो चरणों में पंद्रह करोड़ लोगों द्वारा वैक्सीन करवाया जा चुका है लेकिन देश की आबादी के अनुपात में यह काफी नहीं है। यहां सवाल यह भी है कि 18 साल से अधिक उम्र के लोगों को टीका लगाने के लिये क्या वैक्सीन उपलब्ध है? क्या देश की दो वैक्सीन कंपनियां समय से पहले इतने टीके उपलब्ध करा पायेंगी? धीरे-धीरे देश में यह धारणा बलवती होने लगी है कि फिलहाल टीकाकरण ही कोरोना का अंतिम सुरक्षा कवच है। लेकिन तेजी से फैलते संक्रमण के बीच टीकाकरण केंद्रों का सुरक्षित होना भी एक चुनौती है। इस दौरान टीका लगाने की गति में कमी आई है। वहीं महाराष्ट्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने कह दिया है कि टीकों की उपलब्धता न होने से वे एक मई से 18 साल से अधिक की उम्र के लोगों को टीका देने में समर्थ नहीं हैं। राजस्थान ने इस वर्ग के लिये सवा तीन करोड़ खुराक की बुकिंग कराई है, लेकिन सीरम इंस्टीट्यूट का कहना है कि वह मई मध्य तक ही ये टीके उपलब्ध करा पायेगा। लॉकडाउन से गुजर रहे महाराष्ट्र ने भी बारह करोड़ खुराक की मांग की है।


सरकार ने पिछले दिनों विदेशी टीकों के लिये भी दरवाजे खोले हैं, लेकिन इससे भी मौजूदा जरूरतें पूरी नहीं होती। जाहिर है ऐसे में देश की दोनों वैक्सीन निर्माता कंपनियों को युद्धस्तर पर टीकों का उत्पादन करना होगा। यह अच्छी बात है कि सीरम इंस्टीट्यूट के टीके के लिये जरूरी कच्चे माल की आपूर्ति पर अमेरिका ने रोक हटा दी है। ऐसे में जरूरी है कि संकट की स्थिति को देखते हुए देश में उपलब्ध टीका निर्माण क्षमता का उपयोग करके अन्य कंपनियों से भी सहयोग किया जाना चाहिए। साथ ही जो अन्य टीके अंतिम चरण में हैं, उन्हें स्वीकृति की जटिल प्रक्रिया से राहत देने का प्रयास करना चाहिए। यह इसीलिये भी जरूरी है कि कुछ राज्यों ने तीसरे चरण के टीकाकरण को टीकों की आपूर्ति में कमी और अनुपलब्धता के चलते टालने का मन बनाया है। इस बीच एक अच्छी खबर यह है कि अमेरिका के शीर्ष संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. फाउची ने कहा है कि भारत में बनी कोवैक्सीन भारत में कहर बरपा रहे नये वेरिएंट बी.1.617 के खिलाफ असरदार है। उन्होंने कहा कि भारत में जिन लोगों ने यह वैक्सीन ली है, उनके विश्लेषण में पाया गया है कि कोवैक्सीन ज्यादा असरदार है। इस मुहिम के बावजूद एक दुखद पहलू यह है कि देश में राजनीतिक नेतृत्व इस संकट की घड़ी में एकजुट नहीं है और क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के लिये निर्लज्ज राजनीति का प्रदर्शन कर रहा है जो राजनेताओं की संवेदनहीनता को ही उजागर करता है। यह एक हकीकत है कि देश का स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा चरमरा चुका है। जो बताता है कि संकट की भयावहता को राजनीतिक नेतृत्व ने गंभीरता से नहीं लिया और उनकी प्राथमिकता चुनावों तक ही सीमित रही है। ऐसे वक्त में जब दुनिया के तमाम मुल्क भारत में कोविड संक्रमितों की मदद के लिये आगे आ रहे हैं, भारतीय राजनीति के क्षत्रप राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में लगे हैं। पंजाब में आसन्न चुनाव के लिये सत्तारूढ़ दल के दिग्गजों के बीच टकराव की खबरें हाल ही मीडिया में सुर्खियां बनती रहीं जबकि संकट की घड़ी में उनकी प्राथमिकता महामारी के पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने की होनी चाहिए।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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आयोग की गैर जिम्मेदारी, सत्ता और दलों की भी तय हो जवाबदेही (दैनिक ट्रिब्यून)

मद्रास हाईकोर्ट की इस टिप्पणी ने पूरे देश का ध्यान खींचा है कि कोरोना की दूसरी लहर का विस्फोट चुनाव आयोग की लापरवाही का नतीजा है और उसके अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए। अदालत का मानना था कि आयोग अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने में विफल रहा है, जिसके चलते चुनाव प्रचार के दौरान कोरोना प्रोटोकॉल का जमकर उल्लंघन हुआ है। इस अराजकता को रोकने में आयोग नाकाम रहा है। दरअसल, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश संजीब बनर्जी और जस्टिस कुमार राममूर्ति की पीठ का मानना था कि यह आयोग की संस्थागत विफलता है और वह अपनी जिम्मेदारी को निभाने में विफल रहा है। उसने अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं किया। इसमें दो राय नहीं कि पश्चिम बंगाल के चुनाव अभियान में जिस तरह की भीड़ जुटी और जैसे भारी-भरकम रोड शो किये गये, उसने पूरे देश को हैरान किया। लोग इस तरह के कुतुर्क देने लगे कि जब पश्चिम बंगाल की भीड़ को बिना मास्क व शारीरिक दूरी के कुछ नहीं हो रहा है तो हमें क्या होगा। विडंबना यह रही कि राजनेता और स्टार प्रचारक भी बिना मास्क के नजर आये। कोर्ट ने यहां तक कहा कि यदि आयोग ने कोविड प्रोटोकॉल का कोई ब्लूप्रिंट नहीं बनाया तो दो मई की मतगणना को भी रोका जा सकता है। हालांकि, इसके बाद आयोग ने सक्रियता दिखाते हुए निर्णय लिया है कि मतगणना के बाद विजयी प्रत्याशियों के जुलूस आदि प्रदर्शन पर रोक रहेगी। लेकिन यह कार्रवाई आयोग की साख पर उठे सवालों के बाद ज्यादा प्रभावी नजर नहीं आ रही है। आयोग की यह घोषणा पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम व केंद्रशासित प्रदेश पुड्डुचेरी के दो मई को आने वाले चुनाव परिणामों पर लागू रहेगी। मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी के जवाब में आयोग ने कहा है कि आयोग ने कोरोना संकट के दौरान बिहार के चुनाव को कोविड प्रोटोकॉल के साथ सफलतापूर्वक आयोजित किया। पश्चिम बंगाल में यही प्रोटोकॉल लागू है। विभिन्न राज्यों में हुए चुनावों में सुरक्षा के उपाय किये गये हैं और बाद में चुनाव प्रचार अभियान को नियंत्रित किया गया।


वहीं मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चेताया कि हम कोरोना संकट को देखते हुए मूकदर्शक नहीं बने रह सकते। अदालत ने केंद्र से पूछा कि इस महासंकट से निपटने का उसका क्या राष्ट्रीय प्लान है। अदालत ने पूछा कि केंद्रीय संसाधनों का कैसे इस्तेमाल किया जा रहा है। मसलन पैरामिलिट्री डॉक्टर्स और सैन्य सुविधाओं का कैसे प्रयोग किया जा रहा है। अदालत का मानना था कि उच्च न्यायालयों को राज्यों के हालात की निगरानी करनी चाहिए, लेकिन शीर्ष अदालत चुप नहीं बैठ सकती। हमारा कार्य राज्यों के बीच समन्वय करना है। सरकार को इस संकट में अन्य बलों का इस्तेमाल करना चाहिए। वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की ओर से पक्ष रखा कि सरकार पूरी सतर्कता के साथ स्थिति को संभालने का प्रयास कर रही है। बहरहाल,  इसके बावजूद देश में मंथन जारी है कि क्या वाकई चुनावी रैलियों से संक्रमण की दर बढ़ी है या यह डबल वैरिएंट की देन है। हालांकि, दोनों को लेकर कोई प्रामाणिक अध्ययन सामने नहीं आये, लेकिन यह विचार आम लोगों के जेहन में जरूर तैर रहा है। इसके अलावा बेतहाशा बढ़ते संक्रमण के मूल में लचर भारतीय चिकित्सा तंत्र की भी भूमिका है। वहीं आम धारणा है कि राजनेताओं ने भी जिम्मेदारी का परिचय नहीं दिया और बेझिझक भीड़भाड़ वाली बड़ी रैलियां आयोजित की। दरअसल, सितंबर में संक्रमण दर में जो कमी आई थी, वह फरवरी में फिर ग्राफ उठाने लगी।  फिर रैलियों में तो न तो मास्क नजर आये और न ही शारीरिक दूरी। नेता भी कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते नजर नहीं आये। जिसके बाद चुनाव आयोग ने 22 अप्रैल को चुनावी रैलियों पर रोक  भी लगायी। निस्संदेह चुनावी राज्यों में संक्रमण दर में वृद्धि देखी गई  लेकिन वहीं दलील दी जा रही है कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों में तो चुनाव नहीं थे, वहां रिकॉर्ड संक्रमण की क्या वजह है? 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Thursday, April 29, 2021

त्रासदी का आंकड़ा (दैनिक ट्रिब्यून)

यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि देश में कोविड-19 संक्रमण से मरने वालों की संख्या सरकारी आंकड़ों के हिसाब से दो लाख पार कर गई है। किसी भी देश के लिये इतनी बड़ी जनशक्ति का अवसान वाकई पीड़ादायक है। हालांकि सरकारी आंकड़ों को लेकर सवाल उठाने वाले स्वतंत्र पर्यवेक्षक संख्या को इससे ज्यादा बताते हैं, लेकिन आंकड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है और हमारी विवशता को ही जाहिर करता है। यह हमारे नीति-नियंताओं पर सवाल खड़ा करता है। बताता है कि हम ऐसा स्वास्थ्य तंत्र विकसित नहीं कर पाये हैं जो अनमोल जिंदगियां बचाने का काम कर सके। निश्चय ही सदियों की गुलामी और साम्राज्यवादी ताकतों के अन्यायपूर्ण दोहन से मुक्त होकर हम अपनी आजादी की हीरक जयंती मनाने की दहलीज पर जा पहुंचे हैं, लेकिन देश में स्वास्थ्य विषयक आंकड़े विकासशील देशों की सूची में शर्मसार करने वाले हैं। जनमानस के रूप में भी हम समाज में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा नहीं कर पाये हैं। न ही जनता को इतना विवेकशील बना पाये हैं कि वे राजनेताओं के घोषणापत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राथमिक दर्जा दिला सकें। राजनीतिक दलों ने भी कभी स्वास्थ्य सेवाओं को इतना बजट ही नहीं दिया कि देश में मजबूत स्वास्थ्य तंंत्र विकसित हो सके। हमारा चिकित्सा तंत्र सामान्य दिनों में ही पर्याप्त चिकित्सा हर मरीज को देने में विफल रहा है। दवाओं-चिकित्सा सुविधाओं की किल्लत से लेकर डाक्टरों व स्वास्थ्य कर्मियों की कमी से सरकारी अस्पताल जूझते रहे हैं। तो ऐसे में ये उम्मीद करना बेमानी ही था कि एक  अज्ञात संक्रामक रोग के खिलाफ हम मजबूती से लड़ सकें। अस्पतालों के बाहर बेड और ऑक्सीजन पाने के लिये तड़पते मरीज और बदहवास तीमारदार इस बेबसी को ही दर्शाते हैं। निस्संदेह, कोरोना से मरने वालों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जो पहले से ही कई घातक रोगों से जूझ रहे थे। लेकिन ऑक्सीजन की कमी से लोगों का मरना हमारी शर्मनाक विफलता को दर्शाता है।


इस हताशा व निराशा के बीच उम्मीद की किरण यह है कि हमने देश में स्वदेशी वैक्सीन कोवैक्सीन तैयार कर ली और कोविशील्ड का उत्पादन देश में कर रहे हैं। इस महामारी में यदि हमें विदेशी वैक्सीन पर निर्भर रहना पड़ता तो सवा अरब के देश के क्या हालात होते, अंदाजा लगाया जा सकता है। अब रूस की स्पूतनिक समेत कई अन्य वैक्सीनों के रास्ते भी खुले हैं। हम अब तक दुनिया में सबसे तेज गति से पंद्रह करोड़ वैक्सीन लगा चुके हैं। ऐसे वक्त में जब इस महामारी का कोई इलाज नहीं है, वैक्सीन ही हमारा उद्धार कर सकती है। दो चरणों का सफल टीकाकरण हुआ, जिसमें पहले स्वास्थ्य कर्मियों और साठ साल से अधिक के लोगों को और दूसरे चरण में 45 साल से अधिक के लोगों का टीकाकरण किया गया। अब एक मई से देश में 18 वर्ष से अधिक के लोगों को टीका लगाने का काम शुरू हो जायेगा। इसके पंजीकरण का काम बुधवार से शुरू हो गया। इस चरण में अब राज्य सरकारें, निजी अस्पताल और टीकाकरण केंद्र वैक्सीन निर्माता कंपनियों से सीधे वैक्सीन खरीद सकेंगे। यहां तक कि कंपनियां अपने स्टॉक का पचास फीसदी केंद्र को व पचास फीसदी बाकी राज्यों व निजी अस्पतालों को दे सकेंगी। कोविशील्ड खुले बाजार में कुछ माह के बाद उपलब्ध  हो सकेगी। सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बॉयोटेक ने केंद्र, राज्यों व निजी अस्पतालों के लिये वैक्सीन की अलग-अलग कीमतें निर्धारित की हैं, जिसको लेकर कहा जा रहा है कि एक देश में अलग-अलग दरें क्यों निर्धारित की जा रही हैं, जबकि वैक्सीन देश के लोगों को ही मिलनी है। सीरम ने कहा है कि मौजूदा ऑर्डर पूरा होने के बाद कंपनी केंद्र को भी राज्यों की दर पर ही वैक्सीन देगी। वहीं भारत बॉयोटेक पहली कीमत पर केंद्र को वैक्सीन उपलब्ध करायेगी। हालांकि, यह राज्यों का अधिकार है कि वे नागरिकों को किस कीमत पर वैक्सीन उपलब्ध कराते हैं। कुछ राज्यों ने मुफ्त वैक्सीन देने की बात कही है। केंद्र ने वैक्सीन निर्माता कंपनियों को साढ़े चार हजार करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध कराने की घोषणा की है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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