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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Friday, April 16, 2021

आत्मघाती भीड़तंत्र (दैनिक ट्रिब्यून)

देश में प्रतिदिन दो लाख से अधिक नये संक्रमितों का सामने आना महामारी की गंभीरता को दर्शा रहा है। इस बार के बदले हुए वायरस की गति न केवल तेज है बल्कि घातक भी है। चौंकाने वाली बात यह है कि प्रतिदिन एक लाख से दो लाख लोगों के संक्रमित होने में महज दस दिन लगे। चिंता की बात यह कि इस बार संक्रमित होने वालों में युवा व बच्चे ज्यादा हैं। खासकर तीस से चालीस वर्ष आयु वर्ग की संख्या, जिनकी अधिक जनसंख्या के चलते सामाजिक सक्रियता ज्यादा है।

 इन डरावने आंकड़ों के बीच हरिद्वार में चल रहे कुंभ में कोरोना नियमों का उल्लंघन करती लाखों लोगों की भीड़ विचलित करती है। मंगलवार के शाही स्नान में बताते हैं कि चौदह लाख लोगों ने स्नान किया। सोचकर डर लगता है कि जब देश के विभिन्न राज्यों से आये तीर्थयात्री अपने घरों व शहरों को लौटेंगे तो उसके बाद क्या स्थिति होगी। कुंभ क्षेत्र में हो रही जांच में हजारों की संख्या में संक्रमित तीर्थयात्री सामने आये हैं, जिनमें आम लोग ही नहीं, अखाड़ों के नामी संत-महंत भी शामिल हैं जो किसी तरह भी मास्क लगाने को तैयार नहीं हैं और शारीरिक दूरी का परहेज भी नहीं कर रहे हैं। देश में व्याप्त कोरोना संकट के बीच सार्वजनिक स्थलों पर ऐसा व्यवहार विचलित करने वाला है और भीड़ की सामूहिक चेतना पर सवाल उठाता है। उस पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह का बेतुका बयान सामने आता है कि गंगा मैया की कृपा से कोरोना नहीं होगा।

 इससे पहले भी उनके कई बचकाने बयान सामने आ चुके हैं और जांच रिपोर्ट के बगैर कुंभ आने के फैसले के बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट ने तीर्थयात्रियों के लिये जांच रिपोर्ट लाना अनिवार्य किया था। निस्संदेह, हरिद्वार प्रशासन के लिये कुंभ का प्रबंधन एक टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। प्रशासन अखाड़ों और संतों को समझाने का प्रयास कर रहा है कि इस चुनौतीपूर्ण समय में कुंभ के शेष पर्वों को टाल दिया जाये। यह स्थिति एक विवेकशील समाज के लिये असहज स्थिति पैदा करती है। सामूहिक विवेक पर सवालिया निशान लगाती है।


कमोबेश यही स्थिति देश के चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों को लेकर भी पैदा हुई। तीन राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश में तो जैसे-तैसे चुनाव संपन्न हो गये हैं, लेकिन रणक्षेत्र बने पश्चिम बंगाल में बाकी चार चरणों का चुनाव शासन प्रशासन के लिये गले की हड्डी बना हुआ है। यह मांग की जा रही थी कि शेष चार चरणों का मतदान विकट परिस्थितियों को देखते हुए एक ही चरण में करा दिया जाये। लेकिन चुनाव आयोग ने ऐसी किसी संभावना से इनकार किया है। 

निस्संदेह, ऐसे फैसलों को राजनीति गहरे तक प्रभावित करती है और राजनीतिक दलों के नफा-नुकसान को ध्यान में रखकर ऐसे निर्णय लिये जाते हैं। बहरहाल, चुनाव रैलियों, रोड शो और लंबे जनसंपर्क अभियान के बाद इन राज्यों में कोरोना संक्रमण में अप्रत्याशित वृद्धि सामने आयी है, जो कि डराने वाली है। नेता तो चुनाव जीत-हार के निकल जायेंगे, लेकिन इन इलाकों की जनता को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। जिस सिस्टम की पहले ही सांसें उखड़ी हुई हैं वो क्या समाज को चिकित्सा सहायता उपलब्ध करा पायेगा? जिन राज्यों में कोरोना का कहर ज्यादा है, वहां मरीजों की बेबसी विचलित करने वाली है। आक्सीजन का संकट और जीवन रक्षक दवाओं की कालाबाजारी व्यथित करती है। 

सवाल यह है कि जब देश की स्वतंत्रता को सात दशक पूरे हो चुके हैं तो हम जनता में यह विवेक क्यों पैदा नहीं कर पाये कि वह भीड़तंत्र का शिकार न बने। क्यों उसे राजनीतिक रैलियों और धार्मिक आयोजनों की भीड़ का हिस्सा बनना अपनी जान की कीमत से ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है? क्यों वह देश के संक्रमण हालात से अनभिज्ञ बना हुआ है, जबकि हमारा चिकित्सातंत्र पहले से ही डॉयलिसिस पर चल रहा है। आखिर हमारे समाज में ऐसा प्रगतिशील नेतृत्व क्यों पैदा न हो पाया जो लोगों को राजनेताओं से इतर जीवन रक्षक तर्कशील सलाह दे सके और उसका अमल सुनिश्चित करा सके ताकि भीड़तंत्र आत्मघाती साबित न हो।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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वक्त का फैसला (दैनिक ट्रिब्यून)

प्रधानमंत्री और शिक्षामंत्री व शिक्षा अधिकारियों की महत्वपूर्ण बैठक के बाद केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद की चार मई से होने वाली दसवीं की परीक्षा रद्द करने और बारहवीं की परीक्षा स्थगित करने का फैसला निस्संदेह वक्त की मांग थी। ऐसे में जब देश में आधिकारिक रूप से कोरोना संक्रमण के मामले प्रतिदिन 1.8 लाख तक पहुंचने लगे हैं तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। देश में छात्र-छात्राएं कुछ समय से परीक्षाएं स्थगित करने की मुहिम सोशल मीडिया के माध्यम से चला रहे थे। पूरे देश में लाखों छात्रों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया और अदालत जाने की बात भी कर रहे थे। इसी बीच कुछ राजनेताओं ने भी मुद्दे को लपक कर बयानबाजी शुरू कर दी थी। कहा जा रहा था कि देश में लाखों विद्यार्थियों व शिक्षकों तथा शिक्षणोत्तर कर्मियों के एक साथ आने से देश कोरोना का हॉट स्पॉट बन जायेगा। निस्संदेह, परीक्षा रद्द होना या स्थगित होना सही मायनों में छात्रों में शैक्षिक गुणवत्ता विकास के हिसाब से उचित नहीं है, लेकिन वक्त की जरूरत के हिसाब से यही फैसला बनता था। परीक्षाएं किसी भी छात्र के जीवन में उसकी साल भर की मेहनत और ज्ञान का मूल्यांकन तो करती हैं, कई मानवीय गुणों का विकास भी करती हैं। यह भी तय है कि निकट भविष्य में बिना परीक्षा उत्तीर्ण किये गये छात्र-छात्राओं को जीवनपर्यंत कहा जा सकता है कि बिना परीक्षा के ऊपरी कक्षा में पहुंचे। फिर उन विद्यार्थियों को भी निराशा हुई होगी जो सौ में सौ अंक लाने के लिये जीतोड़ मेहनत कर रहे होंगे। बहरहाल, शिक्षा मंत्रालय ने ऐसे छात्रों को विकल्प देने का निर्णय किया है जो छात्र उत्तीर्ण होने के इन मानकों से संतुष्ट नहीं होंगे उन्हें स्थिति सामान्य होने पर परीक्षा देने का अवसर दिया जायेगा ताकि वे अपनी मेहनत को अंकों में बदल सकें। निस्संदेह, केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद देश के लाखों छात्रों व उनके अभिभावकों तथा शिक्षकों ने संकट की इस घड़ी में राहत की सांस ली होगी। इन खबरों के बीच कि कोरोना का नया वैरिएंट छोटी उम्र के बच्चों को भी तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रहा है।


बहरहाल, प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री की उपस्थिति में हुई बैठक में निर्णय लिया गया कि दसवीं की परीक्षा रद्द होने के बाद सीबीएसई के मानकों के आधार पर तय मापदंड के अनुरूप आंतरिक मूल्यांकन करके छात्रों के परीक्षा परिणाम घोषित कर दिये जायेंगे। साथ ही बारहवीं की परीक्षा का अगला कार्यक्रम तब की स्थिति के अनुरूप एक जून को बताया जायेगा। साथ ही परीक्षा कार्यक्रम की जानकारी परीक्षा से पंद्रह दिन पहले तब के हालात के अनुरूप दी दी जायेगी। दरअसल, इससे पहले महाराष्ट्र, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश व छत्तीसगढ़ आदि राज्यों ने दसवीं व बारहवीं की परीक्षाएं कोरोना संकट के चलते आगे के लिये टाल दी थीं। बहरहाल, यह पहला मौका है कि केंद्रीय माध्यमिक परिषद की दसवीं की बोर्ड परीक्षा को पूरी तरह रद्द किया गया है। बुधवार की बैठक में इससे पहले ऑनलाइन परीक्षा व अन्य विकल्पों पर भी विचार किया गया था। साथ ही विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम तैयार करने के प्रारूप पर भी विचार किया गया; जिसके मानक सीबीएसई तैयार करेगी, जिसके आधार पर परीक्षा परिणाम तैयार होगा। बहरहाल, इस निर्णय के बाद जहां छात्र अगली कक्षा में जाने के साथ ही भविष्य की तैयारी में जुट सकेंगे, वहीं स्कूलों में भी ग्यारहवीं कक्षा की शुरुआत करने को लेकर उत्पन्न दुविधा को दूर किया जा सकेगा। कम से कम ऑनलाइन पढ़ाई के माध्यम से उन्हें ग्यारहवीं की पढ़ाई जारी रखने का अवसर समय पर मिल सकेगा। निस्संदेह किसी छात्र-छात्रा के जीवन में दसवीं व बारहवीं की परीक्षा एक मानक पड़ाव जैसे होते हैं, लेकिन मौजूदा संकट में इससे बेहतर विकल्प शायद ही संभव हो पाता। अब शिक्षकों और अभिभावकों का भी दायित्व बनता है कि मौजूदा संकट खत्म होने के बाद आगे की पढ़ाई की बुनियाद मजबूत करने की दिशा में गंभीर पहल करें।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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लड़ाई को मजबूती (दैनिक ट्रिब्यून)

ऐसे वक्त में जब देश में रोज कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा डेढ़ लाख से अधिक पहुंच रहा है, टीकाकरण ही इससे मुकाबले का अंतिम हथियार नजर आता है। जब तक हम अपनी बड़ी आबादी के लिये टीकाकरण का लक्ष्य पूरा नहीं कर लेते, हम निश्चित नहीं हो सकते कि हमने लड़ाई जीत ली है। ऐसे में देश में कोवैक्सीन व कोविशील्ड के बूते लड़ी जा रही लड़ाई को और मजबूती मिलने की उम्मीद तब बढ़ गई जब केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रक संगठन ने रूसी वैक्सीन स्पूतनिक को आपातकालीन उपयोग के लिये मंजूरी दे दी। दुनिया की बहुचर्चित चिकित्सा विज्ञान पत्रिका ‘द लैंसेंट’ के अनुसार अंतिम चरण के ट्रायल के नतीजों में स्पूतनिक को कोरोना के विरुद्ध 92 प्रतिशत मामलों में सुरक्षा प्रदान करने वाला पाया गया है। देश में कोरोना वायरस की घातक होती लहर के बीच केंद्र सरकार ने इस तीसरी वैक्सीन को इमरजेन्सी उपयोग की अनुमति दी है। हाल के दिनों में कई राज्यों ने वैक्सीन की कमी की शिकायत की थी। इसके चलते कई केंद्रों में टीकाकरण का कार्य बाधित हुआ था। निश्चय ही यह हमारे टीकाकरण अभियान के लिये चिंता की बात है। इतना तो तय है कि सवा अरब वाले देश की जरूरतों के मुताबिक न तो टीके का उत्पादन हो पाया है और न ही उस गति से टीकाकरण हो सका है। विपक्षी दल कोरोना टीके के निर्यात और सद्भाव के लिये टीके दिये जाने की नीति को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। हालांकि, केंद्र सरकार ने मार्च से कोविशील्ड के निर्यात पर अस्थायी तौर पर रोक लगा रखी है। अब तक देश में दस करोड़ से अधिक लोगों को फिलहाल वैक्सीन दी जा चुकी है। दरअसल, यह जरूरी भी था क्योंकि अब भारत 1.35 करोड़ से अधिक लोगों के संक्रमित होने से दुनिया में संक्रमण की दृष्टि से दूसरे नंबर पर पहुंच गया है।


दरअसल, कोरोना संक्रमण से लड़ाई के क्रम में भारत सरकार ने प्राथमिकताओं के आधार पर जुलाई माह तक 25 करोड़ लोगों को टीका लगाने का लक्ष्य रखा है। ऐसे में इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये टीकाकरण अभियान को तेज करने की जरूरत है। जरूरत टीका उत्पादन में तेजी लाने और अन्य वैक्सीनों को उपयोग में लाने की भी है। ऐसे में रूस के गैमालेया इंस्टीट्यूट द्वारा विकसित वैक्सीन इस अभियान में मददगार हो सकती है। इस वैक्सीन की विशेषता यह भी है कि इसे दो डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान में संगृहीत किया जा सकता है। अत: भारत जैसे जलवायु वाले देश में इसका भंडारण और आपूर्ति सुविधाजनक रहेगी। इसके लिये रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड ने वैक्सीन की पिचहत्तर करोड़ से अधिक खुराक के उत्पादन के लिये भारतीय दवा उत्पादक कंपनियों से समझौता किया है। यह समझौता मुख्यत: डॉ. रेड्डीज लैब के साथ किया है। दो खुराकों में लगने वाली इस वैक्सीन की दूसरी खुराक 21 दिन बाद दी जाती है। निश्चित रूप से ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका द्वारा सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के जरिये भारत में प्रतिमाह बनायी जा रही छह करोड़ से ज्यादा वैक्सीन के साथ स्पूतनिक की आमद कोरोना के खिलाफ हमारी लड़ाई को मजबूती देगी। इस वैक्सीन के कारगर होने के कारण रूस समेत दुनिया के साठ देशों में इस वैक्सीन का उपयोग किया जा रहा है। यद्यपि भारत में इस वैक्सीन के उपयोग होने में कुछ हफ्तों का समय लग सकता है। भारत बायोटेक ने भी देश में इसके चार संयंत्रों के जरिये इस साल के अंत तक सत्तर करोड़ खुराक बनाने का लक्ष्य रखा है। वहीं दूसरी ओर भारत में कई अन्य वैक्सीनों पर काम चल रहा है, जो अभी विभिन्न चरणों में हैं। इनमें अहमदाबाद की जाइडस-कैडिला कंपनी की जाइकोव-डी, हैदराबाद की बायोलॉजिकल-ई की अमेरिकी वि.वि. के सहयोग से बनने वाली वैक्सीन, एचजीसीओ-19 तथा भारत बायोटेक भी नाक से दी जाने वाली एक वैक्सीन पर काम कर रही है। साथ ही सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भी अमेरिकी कंपनी नोवावैक्स के साथ मिलकर एक और वैक्सीन पर काम कर रही है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Saturday, April 10, 2021

वैक्सीनेशन की चुनौती (दैनिक ट्रिब्यून)

ऐसे वक्त में जब देश में कोरोना संकट की दूसरी लहर गंभीर स्थिति पैदा कर रही है, वैक्सीन ही अंतिम कारगर उपाय नजर आता है। शुक्रवार को संक्रमितों का आंकड़ा 1.30 लाख पार कर जाना चिंता बढ़ाने वाला है। ऐसे में बचाव के परंपरागत उपायों के साथ टीकाकरण अभियान को गति देने की जरूरत है ताकि देश लॉकडाउन जैसे उपायों से परहेज कर सके। पिछली बार सख्ती से जहां देश की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ा था, वहीं एक बड़ी आबादी को शहरों से गांवों की ओर विस्थापित होना पड़ा था। बड़े पैमाने पर रोजगार का संकट भी पैदा हुआ था। बहरहाल,नयी चुनौती के बीच दिल्ली, महाराष्ट्र और पंजाब समेत कई राज्यों ने रात्रि कर्फ्यू जैसे उपायों को अपनाना शुरू कर भी दिया है। आंशिक बंदी, कन्टेनमेंट जोन बनाने और सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगायी जा रही है। ऐसे में टीकाकरण अभियान लक्षित वर्ग विशेष व आयु वर्ग के हिसाब से देश में चल रहा है। स्वास्थ्यकर्मियों, फ्रंटलाइन वर्करों, साठ साल से अधिक आयु वर्ग के लोगों को टीकाकरण का लाभ देने के बाद अब 45 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों को टीका लगाने का कार्य शुरू हो चुका है। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि 45 आयु वर्ग से नीचे के लोगों को भी कोरोना अपना शिकार बनाता रहा है, जिसके लिये भी टीकाकरण की जरूरत महसूस की जा रही है। दरअसल, टीकाकरण अभियान की विसंगतियों को दूर करके इस अभियान में तेजी लाने की जरूरत है। वैक्सीन आपूर्ति को लेकर गैर भाजपा शासित राज्यों की शिकायतों के बाद आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला भी जारी है। वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी को अनुचित बताते हैं और कहते हैं कि पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन की आपूर्ति की जा रही है। उनका मानना है कि ऐसी बयानबाजी से जहां लोगों का मनोबल प्रभावित होता है, वहीं देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर प्रतिकूल असर पड़ता है।


वहीं दिल्ली सरकार के सभी वर्ग के लोगों के लिये वैक्सीनेशन शुरू करने के सुझाव के बाबत केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि अब तक लक्षित समूहों का टीकाकरण का लक्ष्य पूरा न करने वाले राज्य सबके लिये टीकाकरण की मांग कर रहे हैं, जो कि तार्किक नहीं है। निस्संदेह ऐसा कोई टकराव कोरोना के खिलाफ हमारी लड़ाई कमजोर ही करेगा। बहरहाल, कोरोना संकट की भयावहता को देखते हुए कोविड-19 की वैक्सीनों का उत्पादन बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है। दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन उत्पादक कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने वैक्सीन उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिये तीन हजार करोड़ रुपये के अनुदान की मांग की है। निस्संदेह ऐसे मुश्किल वक्त में जीवन रक्षक उद्यम के लिये खजाना खोलने में केंद्र को संकोच नहीं करना चाहिए। प्रयोग की जा रही दो वैक्सीनों के अलावा अन्य वैक्सीनों के उत्पादन पर भी विचार होना चाहिए। इसी क्रम में रूसी वैक्सीन स्पुतनिक को भी आपातकालीन उपयोग के लिये उत्पादन हेतु अनुमति दिये जाने की जरूरत है। इस बाबत रूसी निवेश के जरिये भारतीय कंपनियों के साथ देश में वैक्सीन उत्पादन के लिये करार किया गया है। इस मुहिम के सिरे चढ़ने से वैक्सीनेशन अभियान में तेजी आयेगी। दरअसल, अंतर्राष्ट्रीय अनुबंधों के चलते सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को वैक्सीन की सप्लाई में तेजी लाने में दिक्कत आ रही है। उसका कहना है कि अमेरिका व यूरोपीय देशों द्वारा वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के निर्यात पर रोक लगाने से उत्पादन प्रभावित हुआ है। वहीं अंतर्राष्ट्रीय कोवैक्स कार्यक्रम के तहत वैक्सीन देने के लिये सीरम इंस्टीट्यूट कानूनी रूप से बाध्यकारी है। उसे ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन्स एंड इम्युनाइजेशन के तहत विकासशील मुल्कों को वैक्सीन देनी ही होगी। वहीं मांग की जा रही है कि देश में कोरोना संक्रमितों के आंकड़ों में तेजी के बाद वैक्सीन डिप्लोमैसी बंद की जानी चाहिए और पहले घरेलू जरूरतों को पूरा किया जाना चाहिए। वैसे पिछले माह संसद में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री आश्वासन दे चुके हैं कि भारतीयों की कीमत पर वैक्सीन का निर्यात नहीं किया जायेगा। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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किसानों को एमएसपी का सीधा लाभ (दैनिक ट्रिब्यून)

किसानों को उनकी उपज का सीधा लाभ पहुंचाने की केंद्र सरकार की डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी योजना कृषि क्षेत्र में एक अभिनव पहल है; जिसके दूरगामी सार्थक परिणाम हो सकते हैं, जिसको लेकर पंजाब सरकार दुविधा में है और इस कदम का विरोध कर रही है। उसे आशंका है कि इससे दशकों पूर्व से स्थापित विपणन व्यवस्था में व्यवधान आ सकता है। निस्संदेह इस कदम को किसानों के दूरगामी हितों के नजरिये से देखना चाहिए। इसे राजनीतिक व चुनावी समीकरणों के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। डीबीटी प्रणाली ने विभिन्न लोककल्याण योजनाओं में सार्थक परिणाम दिये हैं और बिचौलियों की लूट पर लगाम लगाया है। पंजाब सरकार की दलील रही है कि इस बदलाव से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ेगा। दलील है कि दशकों से आढ़ती या कमीशन एजेंट किसानों को सरकारी या निजी एजेंसियों द्वारा इसकी खरीद के लिये मंडी में फसल आवक से लेकर विक्रय के कई चरणों में मदद करते हैं। ये बिचौलिए कृषि से जुड़े सामान की खरीद के लिये उन्हें धन भी उपलब्ध कराते हैं। निस्संदेह किसानों को यह आर्थिक मदद बेहद ऊंची ब्याज दरों में मिलती है। दरअसल, फसल की खरीद करते समय आढ़ती पहले अपना हिसाब चुकता कर लेते हैं। किसान अपनी सालभर की खून-पसीने की कमाई का एक हिस्सा ही घर ले जा पाते हैं। इन विसंगतियों से किसानों को सुरक्षा देने के मकसद से राजग सरकार ने डीबीटी योजना को क्रियान्वित करने का मन बनाया है। पंजाब की कृषि उत्पाद खरीद में आढ़तियों-कमीशन एजेंटों की कितनी बड़ी भूमिका है, यह इनकी संख्या और सक्रियता से पता चलता है। पूरे पंजाब में करीब 47000 पंजीकृत आढ़ती हैं जो किसान की उपज के विक्रय पर अपनी सेवाओं के बदले कमीशन के रूप में 1,500 करोड़ रुपये सालाना कमाते हैं।


विडंबना यह है कि देश में किसानों के नाम पर राजनीति तो खूब होती रही है लेकिन किसान हितों के लिये दूरगामी योजनाओं पर काम नहीं हुआ। उसे तात्कालिक व अस्थायी लाभों के नाम पर स्थायी लाभों से वंचित रखने का प्रयास किया गया। उसे महज वोट के रूप में उपयोग तो किया गया लेकिन उसे जागरूक और विवेकशील करने का प्रयास नहीं किया गया। यही वजह है कि इस अभिनव पहल के बाद लाभार्थी किसान तो जागरूक नहीं हुआ, लेकिन आढ़ती लॉबी इसके खिलाफ सक्रिय हो गई। राजनीतिक-आर्थिक लाभ के लिये राजनेता भी उनकी भाषा बोलने लगे। दरअसल, डीबीटी प्रणाली की शुरुआत कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार ने वर्ष 2013 में की थी। इसके जरिये विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों को पहुंचाना था ताकि बिचौलियों-दलालों की भूमिका खत्म की जा सके। मकसद यह है कि योजनाओं के लाभार्थियों के खाते में बिना रिश्वत दिये पूरी रकम पहुंच सके। इस योजना का मकसद धोखाधड़ी रोकना भी था। राजग सरकार ने इसे विस्तार ही दिया है और किसानों को एमएसपी का सीधा भुगतान किसानों के खाते में करने की पहल की है। अंतिम उद्देश्य व्यवस्था में सुधार करना ही है ताकि खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। केंद्र सरकार के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए। निस्संदेह, पंजाब-हरियाणा, जो हरित क्रांति का नेतृत्व करते हैं, में खरीद की एक मजबूत व विश्वसनीय प्रणाली वर्षों के प्रयासों से स्थापित हुई है जो किसानों तथा देश के लोगों को लाभान्वित करती है। मगर ऐसा मजबूत ढांचा उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे अन्न उत्पादक राज्यों में स्थापित नहीं हो पाया है। यही वजह है कि इन राज्यों के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर अपनी फसल बेचने को मजबूर होना पड़ता है। किसानों को दूसरे राज्यों में अपनी फसल ऊंचे दामों पर बेचने के लिये अनुचित तरीकों व बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी उन्हें न्यायसंगत दाम नहीं मिल पाता। निस्संदेह डीबीटी प्रणाली लागू होने से ऐसे तमाम किसानों को इसका लाभ मिल सकेगा। इससे जहां उत्पादकों को सीधा भुगतान होगा, वहीं बाजार व्यवस्था नियंत्रित रहने से देश के उपभोक्ताओं को उचित लाभ मिल सकेगा।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Saturday, April 3, 2021

पाक का यू-टर्न (दैनिक ट्रिब्यून)

भारत विरोध की फसल काटने वाले पाक हुक्मरानों को आखिर 24 घंटे में ही आंतरिक दबाव के चलते आवश्यक वस्तुओं के आयात करने के फैसले को वापस लेना पड़ा। दशकों से यह सिलसिला चला आ रहा है कि दोनों देशों के बीच पैदा होने वाली तल्खी के बाद व्यापार संबंध, क्रिकेट, पर्यटन आदि पर गाज गिरती रही है, जिसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया मान लेना चाहिए। जो राजनीतिक निर्णयों में भी झलकती है। जब बुधवार को कैबिनेट की आर्थिक समन्वय समिति की बैठक में पाकिस्तान के वित्तमंत्री अजहर द्वारा भारत से चीनी व कपास आयात करने का फैसला लिया गया तो लगा था कि दोनों देशों के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलेगी। इस फैसले को बेहतर संबंध बनाने की दिशा में उठाया गया तार्किक कदम माना जाने लगा था। आजादी के बाद हुए विभाजन ने कई ऐसे मुद्दों को जन्म दिया, जो लगातार सुलगते रहते हैं, जिसके चलते भारत विरोध की धारणा को लगातार पाक हुक्मरानों द्वारा सींचा जाता रहा है। यही वजह है कि भारत से व्यापार संबंध फिर से कायम करने के प्रयासों का विपक्षी दलों व कट्टरपंथी समूहों द्वारा मुखर विरोध किया जाने लगा, जिसके चलते 24 घंटे के भीतर ही पाकिस्तान के संघीय मंत्रिमंडल ने बिना कोई ठोस वजह बताये ईसीसी के फैसले को पलट दिया। इसे विदेशी मामलों के जानकार इस्लामी कट्टरपंथियों की जीत बता रहे हैं जो भारत-पाक में बेहतर रिश्तों की उम्मीद को बंधक बनाये हुए हैं। इनके द्वारा भारत शासित मुस्लिम बहुल कश्मीर का मुद्दा प्रमुख रूप से उठाया जाता रहा है। वे इस उपमहाद्वीप में शांति के प्रयासों को पलीता लगाते रहते हैं। भारत-पाक में रिश्तों के सामान्य बनाने की दिशा में उठाये गये हालिया कदमों पर यू-टर्न लेने के बाबत कहा गया कि जब तक कश्मीर का बदला गया दर्जा बहाल नहीं होगा, तब तक कारोबारी रिश्तों का सामान्य होना संभव नहीं होगा।


यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करके उसे केंद्रशासित प्रदेश बनाये जाने के बाद पाक प्रधानमंत्री इमरान खान संयुक्त राष्ट्र से लेकर इस्लामिक संगठनों में भारत के खिलाफ आग उगलते रहे हैं। वे बाकायदा वर्ष 2019 से भारत के खिलाफ एक धार्मिक युद्ध छेड़ने की कवायद में जुटे रहे हैं। पाकिस्तान दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पत्र लिखकर व्यक्त की गई सद्भावना के बाद इमरान खान ने पिछले हफ्ते रचनात्मक और परिणाम उन्मुख संवाद के लिये अनुकूल वातावरण बनाये जाने पर बल दिया था। वास्तव में दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध बनाने के प्रयासों की शुरुआत तब हुई जब दोनों देशों के सैन्य संचालन महानिदेशकों द्वारा संघर्ष विराम की घोषणा करने वाला संयुक्त बयान जारी किया गया था। यह प्रयास लंबे समय से एलओसी व अन्य क्षेत्रों में जारी संघर्ष को टालने के कदम के रूप में देखा गया। इतना ही नहीं, गत 18 मार्च को इस्लामाबाद सिक्योरिटी डायलॉग के पहले सत्र में पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों की उम्मीद जगायी थी। उन्होंने पड़ोसी और क्षेत्रीय देशों के आंतरिक मामलों में किसी तरह का हस्तक्षेप न करने का वायदा किया था। उसके बाद अब दोनों देशों के बीच व्यापार बहाली के प्रयासों पर यू-टर्न लेने ने कई सवालों को जन्म दिया है। निस्संदेह पाकिस्तानी नीतियों को देखते हुए यह प्रकरण ज्यादा नहीं चौंकाता। ऐसे यू-टर्न कई बार देखने को मिले हैं। पाकिस्तान का इतिहास वार्ता, विश्वासघात, आतंकवाद और फिर वार्ता की तरफ बढ़ने का रहा है। इसलिये हालिया यू-टर्न को बड़े अप्रत्याशित घटनाक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पाक सरकार के फैसले कट्टरपंथियों और सेना के दबाव से विगत में भी प्रभावित होते रहे हैं जो भारत विरोध की मनोग्रंथि पर आधारित होते हैं। लेकिन एक बात तय है कि जब तक पाक के हुक्मरान अपने फैसलों में लचीलापन और प्रगतिशीलता नहीं दिखाते, तब तक पाकिस्तान की तरक्की संभव नहीं है। क्षेत्रीय शांति के लिये भी यह एक अनिवार्य शर्त है। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Friday, April 2, 2021

गर्मी के तेवर (दैनिक ट्रिबयून)

इसे कुदरत का खेल कहें या जलवायु परिवर्तन की चुनौती कि ठंड खत्म होते-होते तेज गर्मी ने दस्तक दे दी। मौसम की यह तल्खी आम लोगों की चिंताएं बढ़ाने वाली है। यूं तो मौसम के चक्र में बदलाव आना प्रकृति का सामान्य नियम है, लेकिन उसकी तीव्रता मुश्किलें बढ़ाने वाली होती है। होली के दौरान मौसम में आया अचानक बदलाव ऐसी ही असहजता पैदा कर गया। होली वाले दिन देश की राजधानी में पारे का 76 साल का रिकॉर्ड तोड़ना वाकई हैरान करने वाला रहा। चौंकाने वाली बात यह रही कि यह तापमान औसत तापमान से आठ डिग्री अधिक रहा, जिसे 40.1 डिग्री सेल्सियस मापा गया। दरअसल, मौसम में धीरे-धीरे होने वाला बदलाव इतना नहीं अखरता, जितना कि अचानक बढ़ने वाला तापमान अखरता है, जो कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी हानिकारक साबित हो सकता है। तापमान में आई इस तेजी के साथ ही दिल्ली में धूलभरी आंधी ने लोगों की मुश्किलें भी बढ़ायी। बहरहाल, तापमान में आई यह तेजी इस बात का संकेत भी माना जा सकता है कि आने वाले महीनों में मौसम की तल्खी का लोगों को सामना करना पड़ सकता है। यह लोगों में एक सवाल भी पैदा कर रहा है कि मई-जून में क्या स्थिति होगी। स्वाभाविक रूप से मार्च में तापमान का चालीस डिग्री से ऊपर चला जाना चिंता का सबब है। दरअसल, मौसम में आया यह बदलाव कम-ज्यादा पूरे देश में महसूस किया जा रहा है। राजस्थान, ओडिशा, गुजरात तथा हरियाणा आदि राज्यों के कुछ इलाकों में गर्मी की तपिश ज्यादा महसूस की जा रही है, जो कमोबेश असामान्य स्थिति की ओर इशारा करती है। इसे तकनीकी भाषा में लू के करीब माना जा सकता है। निस्संदेह मार्च के माह में ऐसी स्थिति स्वाभाविक ही चिंता का विषय है। कोरोना संकट से जूझ रहे देश में तापमान में आया अप्रत्याशित बदलाव कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलें बढ़ा सकता है। फिर मौसम के बदलाव के साथ होने वाली बीमारियों के फैलने की आशंका बनी रहती है।


ऐसे में सरकारों और आम लोगों के स्तर पर मौसम की तल्खी से निपटने के लिये पर्याप्त तैयारियां करनी होंगी। ग्लोबल वार्मिंग के चलते पूरी दुनिया में मौसम के मिजाज में जिस तेजी से बदलाव आ रहा है, उसकी चुनौती से मुकाबले के लिये हमें तैयार रहना होगा। शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी। दरअसल, मानव जीवन में पिछले कुछ दशकों में जो कृत्रिमता आई है उसने मौसम में बदलाव को मुश्किल के रूप में देखा है। आम तौर पर हमारी जीवन शैली जितनी प्रकृति के करीब होगी, उसमें आने वाले बदलावों को हम उतनी सहजता के साथ स्वीकार कर सकेंगे। विडंबना यह है कि मौसम की तल्खी के साथ पूरी दुनिया में बाजार जुड़ गया है, जो मौसम के बदलाव को भयावह रूप में प्रस्तुत करके कारोबार करता है। कहीं न कहीं मीडिया का भी दोष है जो मौसम की तल्खी को एक बड़ी खबर के रूप में पेश करता है, जिससे आम लोगों में कई तरह की चिंताएं पैदा हो जाती हैं। दरअसल, हमें मौसम के बदलाव के साथ जीना सीखना चाहिए। मौसम के तल्ख बदलाव जहां सरकारों को विकास योजनाओं को पर्यावरण के अनुकूल बनाने हेतु विचार करने का मौका देते हैं, वहीं आम लोगों को भी चेताते हैं कि पर्यावरण रक्षा का संकल्प लें। प्रकृति के साथ सदियों पुराना सद्भाव हमें मौसम की तल्खी से बचा सकता है। साथ ही हमें हमारे पुरखों से हासिल मौसम की तल्खी से निपटने के उपायों पर गौर करना होगा। खान-पान की प्रकृति का भी ध्यान रखना होगा। हमें अपनी खाद्य शृंखला में भी मौसम की चुनौती का मुकाबला करने वाले आहार-व्यवहार को शामिल करना होगा। यानी मौसम में आ रहे बदलावों को एक सत्य मानकर उसी के अनुरूप अपना जीवन ढालने की जरूरत है। इस दिशा में चिकित्सकों और वैज्ञानिकों को बेहतर काम करके मानवता की रक्षा का संकल्प लेना होगा। साथ ही पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन के संकटों को देखते हुए सरकार व नागरिक स्तर पर रचनात्मक पहल करनी होगी। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिबयून।

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Thursday, April 1, 2021

अशोभनीय कृत्य (दैनिक ट्रिब्यून)

पंजाब में अबोहर के विधायक अरुण नारंग के साथ जिस तरह दुर्व्यवहार और हमला हुआ, वह निस्संदेह निंदनीय कृत्य ही कहा जायेगा। राज्य के शीर्ष नेतृत्व द्वारा अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के निर्देश देना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन वास्तव में ठोस कार्रवाई होती नजर भी आनी चाहिए। ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से संदेश जाना चाहिए कि राज्य में संकुचित लक्ष्यों के लिये अराजकता किसी भी सीमा पर बर्दाश्त नहीं की जायेगी। दल विशेष के नेताओं पर हमला करके राज्य में सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का कोई भी प्रयास सफल होने नहीं देना चाहिए। निस्संदेह किसान आंदोलन को समाज के हर वर्ग का समर्थन मिला है। इस तरह के हमले और जनप्रतिनिधि के कपड़े फाड़े जाने से आंदोलन की साख को आंच आती है। इस तरह के उपद्रव व हिंसक कृत्य से आंदोलन समाज में स्वीकार्यता का भाव खो सकता है। बीते सप्ताह मलोट में जो कुछ हुआ उसने सभ्य व्यवहार के सभी मानदंडों को रौंदा है। इस हमले में कौन लोग शामिल थे, उनका पता लगाकर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। अन्यथा इस तरह की घटनाओं के दूरगामी घातक परिणाम हो सकते हैं। एक जनप्रतिनिधि के साथ अपमानजनक व्यवहार शर्म की बात है। विरोध करना अपनी जगह है और खुंदक निकालना गंभीर बात है। खेती के लिये लाये गये केंद्र सरकार के कानूनों का विरोध अपनी जगह है, लेकिन उसके लिये पार्टी के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना कतई ही लोकतांत्रिक व्यवहार नहीं कहा जा सकता। ऐसी कटुता का प्रभाव देश के अन्य भागों में भी नजर आ सकता है। अतीत में पंजाब ने सामाजिक स्तर पर जो कटुता देखी है, उसे फिर से सिर उठाने का मौका नहीं दिया जाना चाहिए। कोशिश हो कि यह विभाजन सामाजिक व सांप्रदायिक स्तर पर न होने पाये। पंजाब के भविष्य के लिये ऐसे मतभेदों व मनभेदों को यथाशीघ्र दूर करना चाहिए। अन्यथा हम अराजक तत्वों के मंसूबों को ही हवा देंगे।


राज्य के जिम्मेदार लोगों को राज्य में बेहतर माहौल बनाने के लिये सर्वदलीय बैठक बुलाकर इस मुद्दे के व्यापक परिप्रेक्ष्य में इस तनाव को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। निस्संदेह विरोध करना हर व्यक्ति का लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इसके लिये हिंसा का सहारा लेना और ऐसे असंसदीय तरीकों से आक्रोश व्यक्त करना, जो किसी के लिये शारीरिक रूप से जोखिम पैदा करे, तो उस कृत्य की निंदा होनी चाहिए। निस्संदेह, दिल्ली की सीमा पर कृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रहे किसानों की मांग की तार्किकता हो सकती है, किसानों से बातचीत में आये गतिरोध को दूर करने की आवश्यकता भी है, लेकिन इस बात के लिये कानून हाथ में लेने का किसी को अधिकार नहीं होना चाहिए। इस तरह के घटनाक्रम से किसानों के प्रति सहानुभूति के बजाय आक्रोश का भाव पैदा हो सकता है। निस्संदेह लंबे आंदोलन के बाद सफलता न मिलने पर कुछ संगठनों में निराशा का भाव पैदा हो सकता है, लेकिन यह निराशा गैरकानूनी कृत्यों का सहारा लेने से दूर नहीं होगी। लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए अहिंसा अनिवार्य शर्त है। वहीं दूसरी ओर घटना के कई दिनों बाद भी हमलावरों की गिरफ्तारी न हो पाना चिंता का विषय है। वह भी तब जब राज्यपाल ने मामले की कार्रवाई रिपोर्ट भी मांगी है। भाजपा के नेता आरोप लगाते रहे हैं कि पुलिस राजनीतिक दबाव में काम कर रही है और उन्हें न्याय की उम्मीद कम ही है। दरअसल, भाजपा नेताओं पर हमले का यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले भी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समेत कई नेताओं पर हमले हो चुके हैं। भाजपा के कई कार्यक्रमों में तोड़फोड़ भी हुई है। हर बार पुलिस की कार्रवाई निराशाजनक रही है, जिससे अराजक तत्वों के हौसले ही बुलंद हुए हैं। अब लोगों की निगाह विधायक नारंग मामले पर केंद्रित है कि पुलिस कितनी ईमानदारी से काम करती है। राज्य में कानून का राज भी नजर आना चाहिए। पुलिस की भूमिका पर सवाल उठना चिंताजनक है। इससे राज्य में अराजकतावादियों को हवा मिलना स्वाभाविक है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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रिश्तों की नई इबारत (दैनिक ट्रिब्यून)

कोरोना संकट के दौर में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी द्वारा अपनी पहली विदेश यात्रा के रूप में बांग्लादेश को चुनना दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय और वैश्विक संबंधों के महत्व को दर्शाता है। निस्संदेह इस यात्रा के जहां कूटनीतिक व सांस्कृतिक लक्ष्य थे, वहीं इसके घरेलू राजनीतिक निहितार्थ भी थे। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक घमासान के बीच लक्षित समुदाय को प्रभावित करना भी मकसद बताया जाता है। बहरहाल यह मौका बांग्लादेश की आजादी की स्वर्ण जयंती का था। इससे जुड़े कार्यक्रमों में भारत की मुख्य भागीदारी बनती भी थी क्योंकि बांग्लादेश की आजादी के लिये जितना खून बांग्लादेशियों ने बहाया, उससे कम भारतीय जवानों व नागरिकों ने भी नहीं बहाया। एक मायने में बांग्लादेश की आजादी से हमारा गहरा रक्त संबंध भी है। यही वजह है कि चीन-पाक की नापाक जुगलबंदी और सांस्कृतिक-धार्मिक रिश्तों वाले नेपाल ने जब-तब भारत को आंख दिखाने की कोशिश की, लेकिन बांग्लादेश ने कभी भारत विरोधी तेवर नहीं दिखाये जो दोनों देशों के गहरे रिश्तों को ही दर्शाता है। निश्चय ही कोविड संकट के दौर में दोनों देशों की करीबी न केवल क्षेत्रीय विकास के लिये जरूरी है बल्कि क्षेत्र में निरंतर बदल रहे कूटनीतिक समीकरणों के लिहाज से भी जरूरी है। हाल के दिनों में बांग्लादेश ने पूरी दुनिया को अपनी कामयाबी से चौंकाया है। कभी हड़ताल, गरीबी, बेकारी, सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक अस्थिरता के लिये पहचाने जाने वाले बांग्लादेश ने कोरोना संकट में न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को बचाया बल्कि तेज विकास दर भी हासिल की। रेडीमेड वस्त्रों के निर्यात में आज उसने अपनी पहचान बनायी है। दुनिया के खुशहाल देशों की सूची में उसकी उपस्थिति पूरे परिदृश्य की गवाही देती है। हालांकि, इसके बावजूद हाल के दिनों में चीन ने जिस तेजी से बांग्लादेश की बड़ी परियोजनाओं में निवेश के जरिये घुसपैठ करके बंदरगाहों के निर्माण तक पहुंच बनायी है, वह भारत के लिये चिंता की बात है। वह बंगाल की खाड़ी तक अपनी दखल बनाने की कवायद में जुटा है।


बहरहाल, इसके बावजूद प्रधानमंत्री की बांग्लादेश यात्रा से पूर्व बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना के विदेशी मामलों के सलाहकार ने स्पष्ट किया था कि उनका देश अपने सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी भारत की कीमत पर चीन से रिश्ते कायम करने में यकीन नहीं रखता। बांग्लादेश की कोशिश होगी कि चीन से संबंध कायम करते वक्त उसका भारत पर प्रतिकूल असर न पड़े। निस्संदेह बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में भारत के महत्वपूर्ण योगदान को इस देश ने कभी भुलाया नहीं है। यही वजह है कि बंगबंधु शेख मुजीब-उर-रहमान की जन्मशती और आजादी की स्वर्णजयंती के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में भारत के प्रधानमंत्री मौजूद थे। इतना ही नहीं 21वीं सदी में दोनों देशों के साझा लक्ष्यों को हासिल करने के लिये भी इस यात्रा के दौरान व्यापार, ऊर्जा, स्वास्थ्य और विकासात्मक सहयोग के लिये बातचीत हुई और दोनों देशों के सहयोग के क्षेत्रों को लेकर पांच सहमति पत्रों पर भी हस्ताक्षर किये गये। साथ ही तीस्ता नदी समेत उन तमाम विवाद के मुद्दों को आपसी सहमति से सुलझाने पर सहमति भी बनी। ढाका से न्यू जलपाईगुड़ी को जोड़ने वाली यात्री ट्रेन को हरी झंडी मिलना इस बात का प्रतीक है कि दोनों देश नागरिकों के तौर पर भी करीब आ रहे हैं। वहीं कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री की इस यात्रा के घरेलू राजनीतिक निहितार्थ भी रहे हैं। दरअसल, प्रधानमंत्री द्वारा यात्रा के दौरान प्रसिद्ध शक्तिपीठ जेशोरेश्वरी काली मंदिर और मतुआ समुदाय के ओराकांड़ी स्थित मंदिर में पूजा-अर्चना को बंगाल के चुनाव के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। बताया जाता है कि मतुआ समुदाय पश्चिम बंगाल की दर्जनों सीटों पर प्रभाव डालता है। ये समुदाय बांग्लादेश से आकर पश्चिम बंगाल में बसा था। बहरहाल, प्रधानमंत्री की बांग्लादेश यात्रा दोनों देशों के संबंधों में एक दौर की शुरुआत कही जा सकती है जो क्षेत्रीय व वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में ही नहीं, विकास की साझी यात्रा में खासी मददगार साबित होगी जो दोनों देशों की एक जैसी चुनौतियों के मुकाबले में भी सहायक हो सकती है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Friday, March 26, 2021

आफत से राहत (दैनिक ट्रिब्यून)

कोरोना संकटकाल के दौरान कर्जदारों की किस्तों की वापसी के स्थगन और ब्याज पर ब्याज के मामले में शीर्ष अदालत का फैसला जहां सरकार व बैंकों के लिये राहतकारी है, वहीं कर्जदाताओं को भी कुछ सुकून जरूरत देता है। दरअसल, कोरोना संकट में लॉकडाउन के बाद उपजी विषम परिस्थितियों से जूझते कर्जदारों को सरकार ने इतनी राहत दी थी कि वे आर्थिक संकट के चलते अपनी किस्तों के भुगतान को तीन महीने के लिये टाल सकते हैं, लेकिन बाद में उन्हें इसका ब्याज भी देना होगा। कालांतर कोरोना संकट की बढ़ती चुनौती के बाद यह अवधि अगस्त, 2020 तक बढ़ा दी गई। 


लेकिन कर्जदाता खस्ता आर्थिक स्थिति और रोजगार संकट की दुहाई देकर यह अवधि बढ़ाने की मांग करते रहे। वहीं बैंकों ने निर्धारित अवधि के बाद न केवल कर्ज और ब्याज की वसूली शुरू की बल्कि वे कर्जदारों से चक्रवृद्धि ब्याज  भी वसूलने लगे, जिससे उपभोक्ताओं में आक्रोश पैदा हो गया है। मामला शीर्ष अदालत में भी पहुंचा। हालांकि, शीर्ष अदालत पहले भी कह चुकी थी कि ब्याज पर ब्याज नहीं वसूला जा सकता। 

लेकिन अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया था। सभी पक्ष अपने-अपने लिए राहत की उम्मीद लगाये बैठे थे। सरकार की कोशिश थी कि कर्ज व ब्याज की वापसी सुचारु रूप से शुरू हो। बैंक भी यही उम्मीद लगा रहे थे। वहीं कर्जदार कोरोना संकट की दूसरी लहर के बीच चाह रहे थे कि किस्त वापसी हेतु स्थगन की अवधि बढ़े। निस्संदेह, आर्थिकी का चक्र सरकार, बैंक व कर्जदारों की सामूहिक भूमिका से पूरा होता है। कर्जदार अपना कर्ज-ब्याज लौटाते हैं तो बैंकों में आया पैसा नये ऋण देने और जमाकर्ताओं के ब्याज चुकाने के काम आता है। यह आर्थिक चक्र सुचारु रूप से चलता रहे इसके लिये जरूरी है कि समय पर उस कर्ज की वापसी हो, जिसमें कोरोना संकट के दौरान व्यवधान आ गया था। निस्संदेह इसे अब लंबे समय तक टाला जाना संभव भी नहीं था।


बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला बैंकिंग व्यवस्था को सुचारु बनाने की तरफ बढ़ा कदम ही है। जिसके बाद कर्जदारों की किस्तें नियमित होंगी और वे निर्धारित ब्याज चुकाएंगे। वहीं दूसरी ओर बैंकों को पूंजी संकट से उबरने में मदद मिलेगी। लेकिन वे कर्जदारों से चक्रवृद्धि ब्याज नहीं वसूल पायेंगे। सही भी है लॉकडाउन के दौरान देश की अर्थव्यवस्था मुश्किल संकटों से गुजरी है। करोड़ों लोगों के रोजगारों का संकुचन हुआ। लाखों लोगों की नौकरी गई। काम-धंधे बंद हुए। तमाम छोटे-बड़े उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए। 


अर्थव्यवस्था का चक्र तभी पूरा हो पाता है जब कहीं कड़ी न टूटी हो। जाहिरा तौर पर लघु-मझौले उद्योग से लेकर छोटे कारोबारी बैंकों से ऋण लेकर अपने कारोबार को चलाते हैं। जब बाजार बंद हुए तो उनका काम-धंधा चौपट हुआ। जब कारोबार ही नहीं हुआ तो आय कहां से होती। आय नहीं थी तो कर्ज कहां से चुकाते। निश्चय ही उस दौरान कर्ज वापसी का स्थगन बड़ी आबादी के लिये राहत बनकर आया। साल की शुरुआत में अर्थव्यवस्था के पटरी के तरफ लौटने से उम्मीदें जगी थी कि अब स्थितियां सामान्य हो जायेंगी, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर की दस्तक ने चुनौतियां बढ़ा दी। लगता है हमें कुछ और समय कोरोना की चुनौती से जूझना होगा। इसे न्यू नॉर्मल मानकर आगे बढ़ना है। अर्थव्यवस्था ने गति न पकड़ी तो कोरोना से ज्यादा आर्थिक संकट और गरीबी मार देगी। 


हमारे यहां रोज कमाकर रोज खाने वालों का बड़ा वर्ग है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को सामान्य स्थिति की ओर ले जाने के लिये आर्थिक की रक्तवाहनियों में पूंजी प्रवाह जरूरी है। इस आलोक में शीर्ष अदालत का फैसला राहतकारी ही कहा जायेगा, जिससे बैंकों को तो संकट से उबरने में मदद मिलेगी ही, साथ ही बैंक अपनी मनमानी करते हुए ब्याज पर ब्याज नहीं वसूल पायेंगे। माना देश के सामने अब कोरोना संकट की दूसरी लहर की चुनौती है, लेकिन नहीं लगता कि सरकारें लॉकडाउन जैसे सख्त कदमों का सहारा लेंगी। अब वक्त आ गया है कि जान के साथ जहान को भी हमें प्राथमिकता देनी है। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Thursday, March 25, 2021

कोरोना का कहर (दैनिक ट्रिब्यून)

मार्च के महीने में कोरोना का तेजी से फैलाव देश की चिंता बढ़ाने वाला है। बीते साल इन्हीं दिनों कोरोना संक्रमण में तेजी आई थी और देश ने दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन झेला था, जिसकी टीस अभी भी बाकी है। उस सख्ती से हमारी अर्थव्यवस्था की जो गत बनी, वह अभी भी सामान्य होने के लिये हिचकोले खा रही है। यह ठीक है कि कोरोना संक्रमण में तेजी का असर पूरी दुनिया में देखा जा रहा है, लेकिन चिंता की बात यह है कि कोरोना वायरस लगातार रूपांतरण करते हुए हमारी चिंता बढ़ा रहा है। देश के 18 राज्यों में कोरोना वायरस का एक डबल म्यूटेंट वैरिएंट मिला है जो इम्यून सिस्टम से बचकर तेजी से संक्रमण को बढ़ाता है। अभी इस बात का अध्ययन सामने नहीं आया है कि हाल ही में कोरोना संक्रमण में तेजी क्या इसी वैरिएंट की वजह से है। बताया जाता है कि स्वास्थ्य मंत्रालय की दस नेशनल लैब्स एक समूह ने अलग-अलग वैरिएंट की जीनोम सिक्वेंसिंग के बाद चौंकाने वाले खुलासे किये हैं। देश में एकत्र दस हजार से अधिक सैंपल का टेस्ट करने के बाद 771 अलग-अलग वैरिएंट को पकड़ा है, जिसमें 736 ब्रिटेन कोरोना वायरस वाले वैरिएंट हैं, वहीं 34 सैंपल साउथ अफ्रीका  और एक सैंपल ब्राजील वाला है। ये सैंपल उन लोगों के थे जो विदेश यात्रा करके आये या लोग उनके संपर्क में आये। लेकिन यह वैरिएंट पिछले साल के वायरस के मुकाबले तेजी से म्यूटेट कर रहा है। इन पर इम्यूनिटी का असर भी नहीं हो रहा है। हालांकि, स्वास्थ्य मंत्रालय कह रहा है कि स्वेदशी वैक्सीन कोवैक्सीन नये वैरिएंट में भी कामयाब है। देश में रोज सामने आने वाले संक्रमण के मामले पचास हजार के करीब पहुंचना हमारी चिंता का विषय होना चाहिए, जिसको लेकर प्रभावित राज्यों में बचाव के  उपाय सख्त किये गये हैं। पंजाब समेत कई राज्यों में रात का कर्फ्यू लगाया गया है। निस्संदेह, ऐसे हालात में बचाव ही बड़े उपचार की भूमिका निभा सकता है। 


निस्संदेह, कोरोना संक्रमण में तेजी आई है, मगर  सकारात्मक पक्ष यह है कि अब हमारे पास इसके उपचार के लिये कई तरह की वैक्सीन उपलब्ध हैं। वे भी स्वदेश निर्मित हैं। इसके बावजूद हमें पिछले साल सख्त लॉकडाउन की दिक्कतों और करोड़ों लोगों के रोजी-रोटी के संकट को महसूस करना चाहिए। तभी महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में संक्रमण की विकट स्थिति को देखते हुए चेताया है कि लोगों को यदि दूसरे लॉकडाउन से बचना है तो कोविड-19 से जुड़े प्रोटोकॉल का पालन करना चाहिए। कमोबेश यही स्थिति देश के अन्य राज्यों में भी है, जिसमें मास्क पहनना, सामाजिक दूरी, बार-बार हाथ धोना आदि शामिल हैं। वैक्सीन भले ही हमें भीतर से मजबूती देती है, लेकिन बाहरी सावधानी हमें उसके बावजूद बनाये रखनी है। यदि लोग सामाजिक जिम्मेदारी को नहीं निभाते तो कानूनन उन्हें ऐसा करने के लिये बाध्य करना चाहिए। निस्संदेह, चुनावी राज्यों में स्थिति विकट हो सकती है। केरल व तमिलनाडु में संक्रमण में तेजी चिंता बढ़ाने वाली है। भले ही चुनाव है लेकिन सार्वजनिक आयोजनों में अधिक सावधानी की जरूरत है और राजनीतिक दल देश को मुश्किल स्थिति डालने वाली स्थिति से बचने के लिये अपने समर्थकों को प्रेरित करें। अन्यथा भारत मुश्किलों से हासिल सफलता को गंवा भी सकता है। सरकार ने 45 साल से अधिक उम्र के सामान्य लोगों को एक अप्रैल से टीका लगाने की अनुमति देकर सार्थक पहल की है। सरकार को देश के कामकाजी वर्ग को प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीन देनी चाहिए ताकि देश की अर्थव्यवस्था कोरोना संकट के प्रभावों से उबर सके। तभी हम दूसरी लहर के संकट का मजबूती से मुकाबला कर सकेंगे। निस्संदेह एक साल बाद फिर हम उसी मोड़ पर आ गये हैं, जहां तमाम तरह की चिंताएं थीं। यह उत्साहवर्धक जरूर है कि हम पांच करोड़ लोगों को टीके की पहली डोज दे चुके हैं। मगर सवा अरब के देश में यह संख्या कम है। ऐसे में कोविड नियमों का सख्ती से पालन करना ही सबसे बड़ी देशभक्ति है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Wednesday, March 24, 2021

समृद्धि का जोड़ (दैनिक ट्रिब्यून)

सोमवार को विश्व जल दिवस सही मायनों में तब सार्थक हुआ जब देश नदी जोड़ो अभियान को मूर्त रूप देने की दिशा में आगे बढ़ गया। नदी जल प्रबंधन की दिशा में इस बदलावकारी सोच को संबल देने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी को दिया जाता है। उनकी संकल्पना को साकार करती राष्ट्रीय महत्व की केन-बेतवा नदियों को जोड़ने वाली परियोजना के समझौते के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वर्चुअल उपस्थिति में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री, उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने हस्ताक्षर किये। करार को ऐतिहासिक बताते हुए प्रधानमंत्री ने इस परियोजना को समूचे बुंदेलखंड के सुनहरी भविष्य की भाग्यरेखा बताया। 


निस्संदेह इस परियोजना के अस्तित्व में आने से जहां लाखों हेक्टेयर में सिंचाई हो सकेगी, वहीं प्यासे बुंदेलखंड की प्यास भी बुझेगी। जहां प्रगति के द्वार खुलेंगे, वहीं क्षेत्र से लोगों का पलायन रुकेगा, जो आने वाली पीढ़ियों की दुश्वारियों का अंत करेगी। समाज व सरकार की सक्रिय भागीदारी योजना के क्रियान्वयन में तेजी लायेगी। इस परियोजना से जहां दोनों राज्यों के अंतर्गत आने वाले बुंदेलखंड के 10.62 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई संभव होगी, वहीं 62 लाख घरों को पेयजल उपलब्ध कराया जा सकेगा। इसके अलावा मध्य प्रदेश के पन्ना जनपद में केन नदी पर एक बांध  भी बनाया जायेगा, जिससे करीब 221 किलोमीटर लिंक नहर भी निकाली जायेगी, जो झांसी के निकट बेतवा नदी को जल उपलब्ध करायेगी। इस लिंक नहर के जरिये उन बांधों को भी पानी उपलब्ध कराया जा सकेगा, जो बरसात के बाद भी जल उपलब्ध करा सकेंगे।  दरअसल, यूपीए सरकार के दौरान 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश में समझौता हुआ था, लेकिन सत्ताधीशों की उदासीनता से योजना सिरे नहीं चढ़ सकी। जल शक्ति मंत्रालय की कोशिश है कि जलवहन प्रणाली के माध्यम से मानसून अवधि में जल का संग्रहण करके गैर मानसून अवधि में पानी का उपयोग किया जा सके। 


यह विडंबना ही है कि देश की आजादी के सात दशक बाद भी हम हर व्यक्ति तक पेयजल नहीं पहुंचा सके। विडंबना यह भी है कि राज्य सरकारों की प्राथमिकता में जल संसाधनों का संरक्षण व संवर्धन शामिल ही नहीं रहा है। जीवन का यह आवश्यक अवयव कभी चुनावी एजेंडे का हिस्सा बन ही नहीं पाया। हम जल अपव्यय रोकने और कुशल जल प्रबंधन में कामयाब नहीं रहे हैं। यही वजह है कि देश में जल संग्रहण के परंपरागत स्रोत खात्मे की कगार पर हैं। इन स्रोतों से जुड़ी भूमि पर माफिया द्वारा दशकों से कब्जा किया जा रहा है। तभी लगातार गिरते भू-जल स्तर के चलते वर्षा के जल के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। विश्व जल दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा ‘कैच द रेन’ अभियान की घोषणा की गई। संयुक्त राष्ट्र के संगठन व देश का नीति आयोग जल संकट के जिस खतरे से आगाह करते रहे हैं, यह अभियान उसी दिशा में कदम है। निस्संदेह इस अभियान का महज प्रतीकात्मक महत्व ही नहीं है, बल्कि यह हमारी जल संरक्षण की सार्थक पहल है। 


कोशिश है कि भारत जैसे देश, जहां लंबे समय तक मानसून सक्रिय रहता है, में बारिश का पानी यूं ही बर्बाद न हो और बाढ़-सूखे की विभीषिका को टाला जा सके। केंद्र सरकार का ग्रामीण इलाकों में वर्ष 2024 तक हर घर तक नल का लक्ष्य इसी दिशा में बढ़े कदम का परिचायक है। लगातार बढ़ते भूजल संकट के चलते इस तरह की अभिनव पहल महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री द्वारा मनरेगा के मद का सारा पैसा जल संरक्षण में खर्च करने की घोषणा एक महत्वपूर्ण कदम है।  इससे जहां मनरेगा की उत्पादकता में वृद्धि होगी, वहीं जल संरक्षण के लक्ष्य समय रहते हासिल हो सकेंगे। इससे पानी के परंपरागत जल स्रोतों की सफाई व संरक्षण के काम में तेजी आयेगी। स्थानीय निकाय इसमें रचनात्मक भूमिका निभाकर लक्ष्यों को हासिल करने में मदद कर सकते हैं। निश्चय ही बेहतर जल प्रबंधन तथा पानी का अपव्यय रोक कर हम जलसंकट को दूर कर सकते हैं।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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सहज न्याय हेतु (दैनिक ट्रिब्यून)

राजग सरकार की कोशिश है कि देश में आईएएस और आईपीएस जैसी सेवाओं की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा यानी एआईजेएस आरंभ की जाये। सरकार का विश्वास है यह प्रयास न्याय प्रदान करने की समग्र प्रणाली हेतु महत्वपूर्ण साबित होगा। हाल ही में राज्यसभा में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि यह सेवा अखिल भारतीय योग्यता चयन प्रणाली के माध्यम से नयी योग्य विधिक प्रतिभाओं के चयन में सक्षम होगी। साथ ही इससे सामाजिक समावेश के मुद्दे का हल भी निकलेगा। मंशा यही है कि इस प्रक्रिया के जरिये पिछड़े और वंचित समाज के लोगों की न्यायिक व्यवस्था में भागीदारी बढ़ सकेगी। दरअसल, विगत में भी ऐसी कोशिश हुई थी लेकिन विरोध व असहमति के चलते इसे मूर्त रूप नहीं दिया जा सका। सरकार की कोशिश हो कि सभी हितधारकों को साथ लेकर आगे बढ़ा जाये। वास्तव में मोदी सरकार अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के विचार को गंभीरता से ले रही है, जिसका उल्लेख पिछले दिनों राज्यसभा में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने किया। आम धारणा रही है कि इस विचार को क्रियान्वित करने के लिये संविधान संशोधन की अावश्यकता होगी। इसके विपरीत, संविधान के अनुच्छेद 312(1) में किसी अखिल भारतीय सेवा को स्थापित करने का प्रावधान है, जिसके जरिये एआईजेएस के विचार को अंतिम रूप दिया जा सकता है,  जिसके अंतर्गत राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव का पारित होना आवश्यक है, जिसके बाद संसद को एआईजेएस को मूर्तरूप देने वाला कानून बनाना होगा। हालांकि, विगत में सरकार के ऐसे प्रयासों का कई उच्च न्यायालयों व राज्यों ने विरोध भी किया था। उनकी सोच थी कि यह विचार संघवाद के विरुद्ध जायेगा। यही वजह है कि कानून मंत्री ने उच्च न्यायालयों समेत सभी हितधारकों से एआईजेएस के मुद्दे पर परंपरागत विरोध का परित्याग करने का आग्रह किया ताकि भविष्य में इस विचार को अमलीजामा पहनाने में मदद मिल सके।


दरअसल, विगत में जजों के चयन के लिये अखिल भारतीय सिस्टम बनाने हेतु व्यापक प्रस्ताव तैयार किया गया था। नवंबर, 2012 में सचिवों की एक समिति ने प्रस्ताव को मंजूरी भी दी थी। इतना ही नहीं इस प्रस्ताव को अप्रैल, 2013 में संपन्न हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों तथा मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के प्रस्तावित एजेंडे में शामिल किया गया था। तब सहमति बनी कि व्यापक मंथन के बाद इस प्रस्ताव पर राज्य सरकारों व हाईकोर्टों के विचार मांगे जायें। लेकिन इस विचार पर सहमति नहीं बन सकी। जहां कुछ राज्य सरकारें व उच्च न्यायालय प्रस्ताव के पक्ष में थे तो कुछ विरोध में। कुछ पक्ष केंद्र के प्रस्ताव में बदलाव लाने के पक्षधर थे। फिर वर्ष 2015 में राज्य सरकारों तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के सम्मेलन के विषयों में इसे शामिल किया गया। दरअसल, असहमति की एक वजह यह भी रही कि कुछ पक्षों द्वारा जिला न्यायाधीशों के खाली पदों में नियुक्ति हेतु वर्तमान चयन प्रक्रिया को अधिक व्यावहारिक बनाने की बात कही गई, जिसका निर्णय का अधिकार उच्च न्यायालयों को दिया गया। इसके बावजूद केंद्र सरकार मुद्दे पर सहमति बनाने हेतु प्रयासरत रही है। दरअसल, वर्ष 1987 में लॉ कमीशन की एक रिपोर्ट कहती है कि देश में प्रति दस लाख आबादी पर पचास जजों की नियुक्ति होनी चाहिए, जो उस समय दस थी और वर्तमान में बीस है। लेकिन अन्य देशों के मुकाबले यह बहुत कम है। जहां अमेरिका में प्रति दस लाख आबादी पर 107 तो ब्रिटेन में 51 न्यायाधीश नियुक्त हैं। इस साल जनवरी में अधीनस्थ न्यायपालिका में स्वीकृत 24,247 पदों के मुकाबले जजों की संख्या 19138 थी। यानी पांच हजार जजों के पद रिक्त थे। वहीं राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के अनुसार भारत के विभिन्न जिला व तालुका न्यायालयों में 3.81 करोड़ वाद लंबित थे, जिसमें एक लाख से अधिक मामले तीस साल से लंबित हैं। बीते माह कुल 14.8 लाख मामले दर्ज किये गये। वर्ष 2012 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया कि अगले तीस सालों में वादों की संख्या 15 करोड़ तक पहुंच जायेगी, जिसके लिये 75 हजार जजों की जरूरत होगी  जो इस बाबत निर्णायक फैसला लेने की गंभीरता को दर्शाता है। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Monday, March 22, 2021

संवेदनहीन तंत्र (दैनिक ट्रिब्यून)

देश की शीर्ष अदालत की इस चिंता से सहमत हुआ जा सकता है कि आधार कार्ड से न जुड़े होने की वजह से तीन करोड़ राशन कार्ड रद्द करना एक गंभीर मामला है। निस्संदेह देश में कोरोना संकट के दौरान लॉकडाउन लगने तथा इससे उपजे रोजगार के संकट के दौरान राशन कार्ड रद्द होने से करोड़ों जिंदगियों की त्रासदी और बढ़ गई होगी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस. ए. बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ का कहना था कि राशन कार्ड के आधार से लिंक न हो पाने को विरोधात्मक मामले के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इस बाबत नाराजगी जताते हुए अदालत ने केंद्र तथा राज्य सरकारों से इस बाबत चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। दरअसल, 9 दिसंबर, 2019 में भी शीर्ष अदालत ने वैध आधार कार्ड न होने पर राशन आपूर्ति से वंचित किये जाने के फलस्वरूप भूख से होने वाली मौतों की बाबत सभी राज्यों से जवाब मांगा था। ऐसे ही मामले में झारखंड की याचिकाकर्ता कोयली देवी का कहना था कि 28 सितंबर, 2018 में उसकी बेटी संतोषी की भूखे रहने के कारण मौत हो गई थी। दरअसल, अदालत कोयली देवी की याचिका पर ही सुनवाई कर रही थी। अदालत ने प्रकरण के भूख से जुड़े होने के कारण मामले पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। निस्संदेह तंत्र द्वारा आये दिन दिखायी जाने वाली संवेदनहीनता हमारी चिंता का विषय भी होनी चाहिए। सरकारी फरमानों को जारी करते हुए ऐसे मामलों में वंचित व कमजोर वर्ग के प्रति मानवीय दृषि्टकोण अपनाये जाने की जरूरत है। 


दरअसल, संवेदनहीन अधिकारी आनन-फानन में सरकारी फरमानों के क्रियान्वयन का आदेश तो दे देते हैं लेकिन वंचित तबके की मुश्किलें नहीं देखते। वे जमीनी हकीकत और लोगों की मुश्किलों के प्रति उदार रवैया नहीं अपनाते। उनकी तरफ से सरकारी लक्ष्यों को पूरा करने का समय निर्धारित करके कह दिया जाता है कि अमुक समय तक इन्हें पूरा कर लें अन्यथा उनको मिलने वाली सुविधाओं से वंचित कर दिया जायेगा। देश में अशिक्षित-गरीब आबादी का बड़ा हिस्सा तकनीकी बदलावों का अनुपालन सहजता से नहीं कर पाता। देश के दूरदराज इलाकों में तो यह समस्या  और भी जटिल है। कोरोना संकट में कई स्थानों पर इंटरनेट सुविधाओं के अभाव में गरीबों को राशन लेने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा क्योंकि उनका राशनकार्ड आधार कार्ड से लिंक नहीं हो पाता था।  ऐसे में उस गरीब तबके की दुश्वारियों को समझा जा सकता है, जिनका जीवन राशन से मिलने वाले अनाज पर ही निर्भर करता है। खासकर कोरोना संकट के चलते लगे लॉकडाउन और लाखों लोगों के रोजगार छिनने के बाद तो स्थिति ज्यादा विकट हो गई होगी। सरकार को ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए जो समय रहते सरकारी निर्देशों के अनुपालन के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर कर सके। निस्संदेह, सभी अधिकारों में जीने का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है। एक लोकतांत्रिक देश में कोशिश होनी चाहिए कि सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन में किन्हीं औपचारिकताओं के चलते किसी का चूल्हा न बुझे। तंत्र को वंचित समाज के प्रति इस बाबत उदार रवैया अपनाना चाहिए। यह कल्याणकारी राज्य के लिये अपरिहार्य  शर्त भी है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Saturday, March 20, 2021

संपत्ति क्षति वसूली ( दैनिक ट्रब्यून)



निस्संदेह, लोकतंत्र में अपनी आवाज सत्ताधीशों तक पहुंचाने में आंदोलनों की निर्णायक भूमिका होती है। जब सत्ताधीश जनसरोकारों के प्रति संवेदनशील व्यवहार नहीं करते तो क्षुब्ध नागरिक विरोध प्रदर्शन के विभिन्न माध्यमों से सरकारों व प्रशासन पर दबाव बनाते हैं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान चलाये गये निर्णायक आंदोलनों ने ही फिरंगियों को देश छोड़ने को बाध्य किया था। लेकिन यदि आंदोलन के नाम पर निजी व सरकारी संपत्ति को सुनियोजित तरीके से क्षति पहुंचायी जाती है तो इन्हें लोकतांत्रिक आंदोलन नहीं कहा जा सकता। नागरिकों व सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले आंदोलनों के नेतृत्व की जवाबदेही तय करनी जरूरी भी है। अन्यथा आये दिन होने वाले आंदोलनों से समाज व सरकार की संपत्ति को नुकसान का सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा। हाल के वर्षों में हरियाणा में एक धार्मिक गुरु के समर्थकों तथा जातीय अस्मिता के एक आंदोलन ने करोड़ों रुपये की निजी व सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया था। शायद इसी के मद्देनजर हरियाणा सरकार ने बृहस्पतिवार को विधानसभा में संपत्ति क्षति वसूली विधेयक-2021 पारित कर दिया, जिसमें उपद्रवियों से भारी-भरकम जुर्माने व जेल की सजा का प्रावधान है। हालांकि, इस विधेयक को पारित करने में विपक्षी कांग्रेस के तीखे विरोध का सामना सरकार को करना पड़ा। विपक्ष की दलील है कि सरकार ये कानून किसान आंदोलन के चलते ला रही है। निस्संदेह राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह कानून अस्तित्व में आ ही जायेगा। उल्लेखनीय है कि सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान हुए उपद्रव में सरकारी व निजी संपत्ति को हुई भारी क्षति को देखते हुए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने सख्त रवैया दिखाया था। बाकायदा उपद्रवियों के पोस्टर सार्वजनिक स्थलों पर लगाये गये थे। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार संपत्ति क्षति की वसूली का कानून लेकर आई थी, जिसके अध्ययन के बाद खट्टर सरकार यह विधेयक लाई, जो उत्तर प्रदेश के कानून के मुकाबले ज्यादा सख्त होगा। यही वजह है कि विपक्षी दल इस विधेयक को लोकतांत्रिक आंदोलन के विरोध में उठाया गया कदम बताकर विरोध कर रहे हैं।


दरअसल, हरियाणा के संपत्ति क्षति वसूली विधेयक-2021 में कुछ सख्त प्रावधान शामिल किये गये हैं। अब आंदोलन करने वाले नेता यह दलील नहीं दे सकेंगे कि उनका आंदोलन तो शांतिपूर्ण था और बाहरी तत्वों ने हिंसा करके संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। नये विधेयक में इस बात का भी प्रावधान है कि आंदोलन के दौरान हुई हिंसा करने वालों को ही नहीं, आंदोलनकारियों का नेतृत्व करने वालों से भी नुकसान की भरपाई की जायेगी। इस बाबत सरकार एक ट्रिब्यूनल का भी गठन करेगी, जिसमें चीफ जस्टिस के परामर्श से किसी सेवानिवृत्त वरिष्ठ जज को ट्रिब्यूनल का चेयरमैन बनाया जायेगा। निस्संदेह इस कदम से मुआवजे के निर्धारण को न्यायसंगत व पारदर्शी बनाया जा सकेगा। ट्रिब्यूनल द्वारा संपत्ति को हुए नुकसान के बाबत मुआवजे के लिये आवेदन मांगे जाने पर 21 दिन के भीतर आवेदन करना होगा। ट्रिब्यूनल दस करोड़ तक के मुआवजे का निर्धारण कर सकेगा। इतना ही नहीं, जुर्माना न देने पर ब्याज समेत जुर्माना वसूला जायेगा तथा इसके लिये खाते सील होंगे और संपत्ति कुर्क की जा सकेगी। इतना ही नहीं, यदि आंदोलन के दौरान कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने पर सुरक्षा बलों को बुलाया जाता है तो उसका खर्च भी आंदोलनकारियों से वसूला जायेगा। वहीं कुछ विपक्षी दलों का मानना है कि ऐसे कानून बनने से लोकतंत्र में प्रतिरोध की आवाज कुंद होगी। ऐसे में कैसे विपक्षी दल अपनी आवाज को बुलंद कर पायेंगे। यदि असामाजिक तत्व व उपद्रवी शांतिपूर्ण आंदोलन में आकर हिंसा करते हैं तो आंदोलन के आयोजकों से जुर्माना वसूलना अनुचित होगा। उनका मानना है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों का दमन निरंकुश सत्ताएं न कर सकें, इसके लिये कानून बनाने से पहले व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत थी।  इसके बावजूद आंदोलनों के नाम पर आये दिन होने वाली आगजनी व हिंसा पर लगाम लगाने के लिये सख्त कानूनों की अावश्यकता महसूस की ही जा रही थी। कोशिश होनी चाहिए कि ऐसे कानून के जरिये दोषी बचें नहीं और निर्दोष लोगों को कानून के दंड का शिकार न होना पड़े।

सौजन्य - दैनिक ट्रब्यून।

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Friday, March 19, 2021

दवाई संग कड़ाई (दैनिक ट्रिब्यून)

कुछ दिन पहले तक कोरोना संक्रमण में लगातार आ रही गिरावट से लापरवाह हुए लोग यह भूल गये थे कि यह पलटवार भी कर सकता है। हाल ही के दिनों में हररोज जिस संख्या में संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं, उसने देश की चिंता को बढ़ाया ही है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री को मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलानी पड़ी ताकि एक बार फिर से कोरोना के खिलाफ देशव्यापी युद्ध और सतर्कता शुरू की जाये। निस्संदेह, कोरोना संक्रमण की वापसी चौंकाने और डराने वाली है। कहीं न कहीं तंत्र के स्तर पर ढिलाई और सार्वजनिक जीवन में उपजी लापरवाही इसके मूल में है। क्रिकेट स्टेडियमों में उमड़ी भीड़, धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों में शारीरिक दूरी और मास्क के बिना लोगों की उपस्थिति पहले ही चिंता के संकेत दे रही थी। विडंबना यह भी है कि चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश में चुनावी सभाओं और रोड शो में जिस तरह से भीड़ उमड़ रही है उसे चिंता के तौर पर देखा जाना चाहिए। राजनीतिक रैलियों में तो लापरवाही है ही, शासन-प्रशासन के स्तर पर जो सख्ताई पहले दिखायी दी गई थी, उसमें भी ढील आई है। विडंबना यह भी है कि कोरोना काल में मास्क लगाने, सैनिटाइजर का उपयोग और शारीरिक दूरी की जो हमने आदत डाली थी, उससे हम किनारा करने लगे थे। छोटे शहरों और कस्बों-गांवों की तो स्थिति और विकट है। यही वजह है कि बुधवार को मुख्यमंत्रियों की बैठक में प्रधानमंत्री को विशेष रूप से कहना पड़ा कि गांवों को संक्रमण से बचाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए, यदि गांवों में संक्रमण बढ़ा तो उसे रोक पाना तंत्र के बूते की भी बात नहीं होगी। इन हालात में राज्य सरकारों को नियमों व बचाव के उपायों के अनुपालन के लिये प्रशासन के स्तर पर सख्ती दिखानी होगी। साथ ही आम लोगों के स्तर तक जागरूकता अभियान में तेजी लानी होगी। चिंता की बात यह है बीते मार्च के जैसे ही हालात पैदा होने लगे हैं।


निस्संदेह अगले कुछ वर्षों के लिये सुरक्षा की दृष्टि से सतर्कता को सामान्य जीवन का हिस्सा मान लेना चाहिए। यानी बचाव के उपायों को अपनी आदत में शुमार कर लेना चाहिए। साथ ही वक्त की नजाकत है कि टीकाकरण अभियान में भी तेजी लायी जाये। जहां कुछ लोगों को अभी तक वैक्सीन का इंतजार है वहीं लापरवाही से तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में बड़ी मात्रा में वैक्सीन खराब हो गई, जिसकी चिंता प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों की बैठक में जतायी है। यह विडंबना है कि  अग्रिम मोर्चे का एक वर्ग टीकाकरण को लेकर शंकित है और टीका लगाने से बचता नजर आया है।  सरकारों का भी दायित्व बनता है कि ऐसी तमाम आशंकाओं का निवारण करके टीकाकरण अभियान में तेजी लायी जाये। यह अच्छी बात है कि हमारे देश में टीकाकरण अभियान तेजी से चल रहा है और हम तेजी के मामले में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर हैं। यह भी कि भारतीय वैक्सीन के किसी तरह के विशेष नकारात्मक प्रभाव भी सामने नहीं आये हैं। निस्संदेह कोरोना वैक्सीन समय से हासिल करने से कोरोना योद्धाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है। तभी मुख्यमंत्रियों की बैठक में प्रधानमंत्री ने देशवासियों से कहा कि घबरायें नहीं और दवाई के साथ कड़ाई की नीति पर चलते हुए हमें कोरोना संक्रमण की नई लहर का मुकाबला करना है। यदि सुरक्षा उपायों में हमने फिर लापरवाही की तो कोरोना लगातार शिकंजा कसता चला जायेगा। रोज कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा पैंतीस हजार के ऊपर पहुंचना और मरने वालों की संख्या में वृद्धि बता रही है कि आने वाला समय चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। अध्ययन करने की जरूरत है कि क्यों महाराष्ट्र में कुल संक्रमितों की संख्या देश के मुकाबले साठ फीसदी है। क्यों फिर से लॉकडाउन और नाइट कर्फ्यू की जरूरत पड़ने लगी है। यह देशवासियों की सजगता पर निर्भर करेगा कि बीते साल जैसे सख्त उपायों को दोहराने की जरूरत न पड़े। देश की अर्थव्यवस्था पहले ही संकट के दौर से उबरने की कोशिश में है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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हड़ताल की ताल (दैनिक ट्रिब्यून)

कोरोना संकट से चरमराती अर्थव्यवस्था के बीच दो दिन की हड़ताल के साथ लगातार पांच दिन सरकारी बैंकों में कामकाज बंद रहना देश की आर्थिकी और उपभोक्ता हितों के नजरिये से कतई तार्किक नहीं है। मोदी सरकार ने बजट सत्र के दौरान ही संकेत दे दिया था कि देश में इस साल दो सरकारी बैंकों और एक जनरल इंश्योरेंस कंपनी का निजीकरण किया जायेगा। अत: देश के लाखों बैंक कर्मचारियों में भय का वातावरण पैदा होना स्वाभाविक था, जिसके चलते सोमवार-मंगलवार को देश के बड़े बैंक कर्मचारी संगठन ‘यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन’ ने हड़ताल का आह्वान किया था। इसमें नौ बैंकों के अधिकारी व कर्मचारी संगठनों के करीब दस लाख कर्मचारियों ने भाग लिया। दरअसल, सरकार ने यह तो कहा है कि दो बैंकों का निजीकरण किया जायेगा, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि किन दो बैंकों का होगा। सो सभी कर्मचारी नौकरी पर लटकती तलवार से आशंकित हैं। वे यह भी जानते हैं कि यदि कर्मचारियों के स्तर पर विरोध नहीं हुआ तो बैंकों के निजीकरण की प्रक्रिया में तेजी आ सकती है। दरअसल, पहले ही आईडीबीआई के निजीकरण की प्रक्रिया चल रही है और इसमें बड़ी अंशधारक एलआईसी अपनी हिस्सेदारी बेचने की बात पहले ही कह चुकी है। एक समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में से किन्हीं दो बैंकों का निजीकरण हो सकता है, जिससे स्वाभाविक रूप से इन बैंकों के एक लाख तीस हजार कर्मचारियों में बेचैनी होना स्वाभाविक है। अन्य बैंकों के कर्मचारी और अधिकारी भी इनके समर्थन में सड़कों पर उतरे हैं, जिन्होंने सरकार को यह चेताने की कोशिश की है कि बैंकों के निजीकरण की राह उतनी आसान भी नहीं है, जितनी सरकार सोच रही है। आंदोलनकारी इस आंदोलन को लंबा खींचने के मूड में नजर आ रहे हैं, जिससे उपभोक्ताओं की मुश्किलें  भी बढ़ती दिख रही हैं। 


दूसरी ओर लगता नहीं कि सरकार की ओर से हड़ताली कर्मचारियों को मनाने की कोई गंभीर कोशिश हुई है। तीन दौर की वार्ताएं जरूर विफल हुई हैं। जब मुद्दे का राजनीतिकरण हुआ और आंदोलनकारियों के समर्थन में राजनेताओं के ट्वीट आये तब मीडिया के जरिये सरकार की ओर से वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपनी बात कही। राहुल गांधी का कहना था कि सरकार लाभ का निजीकरण और हानि का राष्ट्रीयकरण कर रही है। इस पर निर्मला सीतारमण का कहना था कि यूपीए सरकार ने एक परिवार की भलाई के लिये भ्रष्टाचार का राष्ट्रीयकरण किया और करदाताओं के पैसे का निजीकरण किया। जहां इंदिरा गांधी के समय बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, वहीं यूपीए के समय बैंकों में घाटे का राष्ट्रीयकरण हुआ। साथ ही वित्तमंत्री ने कहा कि प्रस्तावित प्रक्रिया में सभी बैंकों का निजीकरण नहीं होगा, जिन बैंकों का होगा उनके कर्मचारियों के हितों की रक्षा की जायेगी। दरअसल, 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से ही कहा जाता रहा है कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बात को जोर देकर कहा है जो बताता है कि सरकार निजीकरण के तरफ बढ़ चली है। वहीं पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने निजीकरण के प्रयासों पर संदेह जताते हुए कहा है कि यदि ये बैंक कॉर्पोरेट घरानों को बेचे जाते हैं तो यह एक बड़ी गलती होगी। वहीं विदेशी बैंकों को बेचा जाना राजनीतिक गलती होगी। यदि किसी निजी बैंक का मालिक अपनी कंपनी के लिये ऋण लेता है तो उसे पकड़ने का तंत्र हमारे पास नहीं है। वे सुझाव देते हैं कि बैंकों के बोर्ड में पेशेवर लोग लाएं, उन्हें सीईओ को नियुक्त करने व हटाने का अधिकार हो। तब सरकार का नियंत्रण हटा लिया जाये। वाकई हर बीमारी का समाधान निजीकरण में नहीं है। बहरहाल, सरकार को बैंक कर्मचारियों का विश्वास भी हासिल करना चाहिए। साथ ही बैंकों को भी अपनी कार्यशैली में बदलते वक्त के अनुरूप बदलाव करना होगा।

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Thursday, March 18, 2021

हड़ताल की ताल ( दैनिक ट्रिब्यून)

कोरोना संकट से चरमराती अर्थव्यवस्था के बीच दो दिन की हड़ताल के साथ लगातार पांच दिन सरकारी बैंकों में कामकाज बंद रहना देश की आर्थिकी और उपभोक्ता हितों के नजरिये से कतई तार्किक नहीं है। मोदी सरकार ने बजट सत्र के दौरान ही संकेत दे दिया था कि देश में इस साल दो सरकारी बैंकों और एक जनरल इंश्योरेंस कंपनी का निजीकरण किया जायेगा। अत: देश के लाखों बैंक कर्मचारियों में भय का वातावरण पैदा होना स्वाभाविक था, जिसके चलते सोमवार-मंगलवार को देश के बड़े बैंक कर्मचारी संगठन ‘यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन’ ने हड़ताल का आह्वान किया था। इसमें नौ बैंकों के अधिकारी व कर्मचारी संगठनों के करीब दस लाख कर्मचारियों ने भाग लिया। 


दरअसल, सरकार ने यह तो कहा है कि दो बैंकों का निजीकरण किया जायेगा, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि किन दो बैंकों का होगा। सो सभी कर्मचारी नौकरी पर लटकती तलवार से आशंकित हैं। वे यह भी जानते हैं कि यदि कर्मचारियों के स्तर पर विरोध नहीं हुआ तो बैंकों के निजीकरण की प्रक्रिया में तेजी आ सकती है। दरअसल, पहले ही आईडीबीआई के निजीकरण की प्रक्रिया चल रही है और इसमें बड़ी अंशधारक एलआईसी अपनी हिस्सेदारी बेचने की बात पहले ही कह चुकी है। एक समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में से किन्हीं दो बैंकों का निजीकरण हो सकता है, जिससे स्वाभाविक रूप से इन बैंकों के एक लाख तीस हजार कर्मचारियों में बेचैनी होना स्वाभाविक है। अन्य बैंकों के कर्मचारी और अधिकारी भी इनके समर्थन में सड़कों पर उतरे हैं, जिन्होंने सरकार को यह चेताने की कोशिश की है कि बैंकों के निजीकरण की राह उतनी आसान भी नहीं है, जितनी सरकार सोच रही है। आंदोलनकारी इस आंदोलन को लंबा खींचने के मूड में नजर आ रहे हैं, जिससे उपभोक्ताओं की मुश्किलें  भी बढ़ती दिख रही हैं। 


दूसरी ओर लगता नहीं कि सरकार की ओर से हड़ताली कर्मचारियों को मनाने की कोई गंभीर कोशिश हुई है। तीन दौर की वार्ताएं जरूर विफल हुई हैं। जब मुद्दे का राजनीतिकरण हुआ और आंदोलनकारियों के समर्थन में राजनेताओं के ट्वीट आये तब मीडिया के जरिये सरकार की ओर से वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपनी बात कही। राहुल गांधी का कहना था कि सरकार लाभ का निजीकरण और हानि का राष्ट्रीयकरण कर रही है। इस पर निर्मला सीतारमण का कहना था कि यूपीए सरकार ने एक परिवार की भलाई के लिये भ्रष्टाचार का राष्ट्रीयकरण किया और करदाताओं के पैसे का निजीकरण किया। जहां इंदिरा गांधी के समय बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, वहीं यूपीए के समय बैंकों में घाटे का राष्ट्रीयकरण हुआ। साथ ही वित्तमंत्री ने कहा कि प्रस्तावित प्रक्रिया में सभी बैंकों का निजीकरण नहीं होगा, जिन बैंकों का होगा उनके कर्मचारियों के हितों की रक्षा की जायेगी। दरअसल, 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से ही कहा जाता रहा है कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बात को जोर देकर कहा है जो बताता है कि सरकार निजीकरण के तरफ बढ़ चली है। वहीं पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने निजीकरण के प्रयासों पर संदेह जताते हुए कहा है कि यदि ये बैंक कॉर्पोरेट घरानों को बेचे जाते हैं तो यह एक बड़ी गलती होगी। 


वहीं विदेशी बैंकों को बेचा जाना राजनीतिक गलती होगी। यदि किसी निजी बैंक का मालिक अपनी कंपनी के लिये ऋण लेता है तो उसे पकड़ने का तंत्र हमारे पास नहीं है। वे सुझाव देते हैं कि बैंकों के बोर्ड में पेशेवर लोग लाएं, उन्हें सीईओ को नियुक्त करने व हटाने का अधिकार हो। तब सरकार का नियंत्रण हटा लिया जाये। वाकई हर बीमारी का समाधान निजीकरण में नहीं है। बहरहाल, सरकार को बैंक कर्मचारियों का विश्वास भी हासिल करना चाहिए। साथ ही बैंकों को भी अपनी कार्यशैली में बदलते वक्त के अनुरूप बदलाव करना होगा।


सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Wednesday, March 17, 2021

बाटला की हकीकत ( दैनिक ट्रिब्यून)

बहुचर्चित बाटला हाउस मामले में इंडियन मुजाहिदीन आतंकी आरिज खान को मौत की सजा के साथ मामला तार्किक परिणति तक पहुंचा है। इस मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक प्रलाप सामने आया था। पूरे देश में हंगामा खड़ा किया गया। तमाम सियासी दांव-पेच खेले गये थे। मुठभेड़ को फर्जी बताया गया था। 


सपा के कई दिग्गज नेताओं और तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने इसके विरोध में आयोजित कार्यक्रम का मंच साझा किया था। दावा किया था कि यदि मुठभेड़ सच साबित हुई तो वे राजनीति छोड़ देंगी। दिल्ली पुलिस को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा गया कि समुदाय विशेष के युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है। वोट बैंक के लिये सियासी रोटी सेंकने वाले नेताओं ने जांबाज इंस्पेक्टर की शहादत को भी नकारा। अब उसके परिजनों ने न्याय मिलने की बात कही है। 

निस्संदेह फैसला कांग्रेस समेत उन राजनीतिक दलों के लिये सबक है जो तथ्यों को नकार कर पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठा रहे थे। निस्संदेह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। सोमवार को दिल्ली की साकेत कोर्ट ने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की हत्या के लिये आरिज खान को दोषी करार दिया। अदालत ने अभियुक्त पर ग्यारह लाख का जुर्माना भी लगाया, जिसमें से दस लाख रुपये शहीद के परिवार को देने के निर्देश दिये गये हैं। 


दरअसल, दिल्ली पुलिस ने आतंकी आरिज के लिये यह कहकर फांसी की सजा मांगी थी कि यह महज हत्या का ही मामला नहीं वरन न्याय की रक्षा करने वाले कानून के रक्षक की हत्या का भी मामला है। कोर्ट ने माना भी कि आरिज समाज के लिये ही नहीं, राष्ट्र के लिये भी खतरा है। वह प्रशिक्षित आतंकवादी है और उसके सुधरने की उम्मीद नहीं है। आरिज और उसके साथी अन्य राज्यों में बम धमाकों से निर्दोष लोगों की हत्याएं करने की वजह से रहम के हकदार नहीं हैं। 


दरअसल, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 13 सिंतबर, 2008 में बम धमाकों की एक शृंखला में 39 लोग मारे गये थे। करोल बाग, ग्रेटर कैलाश, कनाट प्लेस व इंडिया गेट आदि पांच जगह हुए धमाकों के अलावा तीन जिंदा बम भी बरामद हुए थे। धमाकों से दिल्ली के दहलने के बाद अपराधियों की तलाश में 19 सितंबर, 2008 को बाटला हाउस के एक फ्लैट पर पुलिस ने दबिश दी थी। पुलिस दल की आतंकवादियों से मुठभेड़ में दो संदिग्ध आतंकी मारे गये थे। पकड़े गये एक आतंकी शहजाद को 2013 में उम्रकैद की सजा सुनायी गई थी। तब के भगोड़े आरिज खान को 2018 में भारत-नेपाल सीमा से गिरफ्तार किया गया। घटना के करीब बारह साल बाद फैसला आने से पीड़ित पक्ष ने इसे न्याय की जीत बताया है। वहीं इस मुद्दे पर लंबे चले राजनीतिक विवाद का भी पटाक्षेप हुआ है। अब केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस पर हमलावर है। वह ममता बनर्जी के उस कथन कि यदि मुठभेड़ सच निकली तो राजनीति से संन्यास ले लेंगी, के बाबत वचन निभाने की बात कर रही है। दरअसल, सपा व तृणमूल कांग्रेस ही नहीं, कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह व सलमान खुर्शीद ने भी मोर्चा खोला था। आजमगढ़ से लेकर दिल्ली में जंतर-मंतर तक प्रदर्शन किये गये थे। इसके बावजूद कि इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पड़ताल के बाद दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट दी गई थी। यह भी कि बाटला हाउस से जुड़े आतंकवादियों के नाम कालांतर अहमदाबाद, फैजाबाद, जयपुर तथा सूरत के बम धमाकों से जुड़े पाये गये थे। बहरहाल, हालिया फैसले ने तुष्टीकरण की राजनीति को ही बेनकाब किया है। बचाव पक्ष ने मामले में हाईकोर्ट जाने की बात कही है। साकेत कोर्ट ने भी फैसले की प्रति हाईकोर्ट को भेजी है क्योंकि निचली अदालत फांसी की सजा तो दे सकती है, मगर अमल हाईकोर्ट की पुष्टि के बाद ही होता है। बहरहाल, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया के बीच यह फैसला कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाने वाला है। 


सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Tuesday, March 16, 2021

संग्राम के आयाम (दैनिक ट्रिब्यून)

दस मार्च को हुए हादसे में तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के चोटिल होने की घटना को पार्टी ने राजनीतिक हमला बताया था। अब पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के आधार पर चुनाव आयोग ने हमले के आरोपों को खारिज किया है। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से घटना का राजनीतिक लाभ उठाने की पुरजोर कोशिशें जारी हैं। इस घटना ने जहां भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति बदलने के लिये बाध्य किया है, वहीं टीएमसी को आक्रामक होने का मौका दे दिया है। पार्टी ने कुछ समय पहले चुनाव आयोग द्वारा डीजीपी का तबादला करने को हादसा होने की वजह तक बता दिया। आरोप लगाये कि आयोग केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहा है। चुनाव आयोग ने इसे संवैधानिक संस्था की छवि खराब करने की कोशिश बताते हुए निंदा की है। बहरहाल, नंदीग्राम की घटना हमला हो या हादसा, इस घटना के जरिये ममता बनर्जी ने अपनी जुझारू छवि को पुख्ता करने की कोशिश जरूर की है। वैसी ही छवि, जिसके बूते वे कम्युनिस्ट सरकार से जूझीं, कांग्रेस से निकलकर नई पार्टी बनायी और 34 साल से सत्ता पर काबिज कम्युनिस्ट सरकार को उखाड़कर दस साल पश्चिम बंगाल पर राज किया। नब्बे के दशक में सीपीएम के युवा नेता के द्वारा लाठी से हमला करने के बाद वह जैसे सिर पर पट्टी बांधकर सड़कों पर उतरी थीं, उस छवि ने उन्हें घर-घर लोकप्रिय बना दिया था। ऐसे ही कई आंदोलनों व विपक्षी दलों के कथित हमलों के बाद वह अपनी जुझारू छवि बनाने में कामयाब रही थी। इसी तरह सिंगुर में अधिग्रहण विरोधी आंदोलन और नंदीग्राम के संघर्ष में वह दमखम के साथ जूझती नजर आईं। बुधवार की चोट के बाद उन्होंने इस कवायद को दोहराने की कोशिश की, जिसने पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा-दशा को किसी सीमा तक प्रभावित भी किया। घटना के बाद भाजपा दुविधा में नजर आई और उसके नेता तृणमूल कांग्रेस पर आक्रामक हमलों से बचते नजर आये। 


निस्संदेह, भाजपा ने सुनियोजित तरीके से पश्चिम बंगाल में राजनीतिक परिदृश्य बदलने के लिये आक्रामक रणनीति का सहारा लिया। इस घटनाक्रम ने भाजपा को रणनीति में बदलाव के लिये बाध्य किया। यह चुनौती तृणमूल कांग्रेस से निकलकर भाजपा में शामिल व नंदीग्राम से ममता के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले शुभेंदु अधिकारी की भी है। यद्यपि राज्य भाजपा के नेता इसे ममता की नौटंकी करार दे रहे हैं लेकिन मौके की नजाकत को भांपते हुए तल्खी से बच रहे हैं। संभव है कि हमले के प्रकरण में ज्यादा टीका-टिप्पणी करने से इसलिये बचा जा रहा हो ताकि टीएमसी को सहानुभूित के चलते लाभ न मिल जाये। भाजपा की रणनीति में बदलाव को इस तरह भी देखा जा सकता है कि उसने बाबुल सुप्रियो, लाकेट चटर्जी समेत अपने चार सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ने के लिये उतारा है। वहीं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं कि जिस नंदीग्राम आंदोलन के जरिये ममता सत्ता में आई थी, वहां जमीन खिसकते देख भावनात्मक दोहन के लिये यह दांव चला गया है। ममता के घोर विरोधी माने जाने वाले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने भी इस घटनाक्रम को पाखंड बताया है। बहरहाल, घटना के बाद जिस तरह टीएमसी कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन, राजमार्गों व रेलवे ट्रेक पर आंदोलन किया, उससे लगता है कि पार्टी मुद्दे को भुनाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखेगी। निस्संदेह इस घटनाक्रम ने चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव होने के बावजूद पश्चिम बंगाल को राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया। बहरहाल, यह भारतीय लोकतंत्र की विडंबना ही है कि पश्चिम बंगाल में दो कार्यकालों का हिसाब दिये जाने के मौके पर तृणमूल कांग्रेस भावनात्मक मुद्दों को आगे करके चुनाव लड़ रही है। राज्य के वास्तविक मुद्दे हाशिये पर चले गये हैं। विडंबना ही है कि जब मतदाताओं के पास सरकारों का हिसाब-किताब मांगने का वक्त होता है तब नेता अपनी चतुराई से आभासी मुद्दों के बूते उन्हें जमीनी हकीकत से दूर ले जाने में कामयाब हो जाते हैं जो हमारी व्यवस्था की विफलता ही कही जायेगी।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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