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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Friday, January 15, 2021

सभ्यता की कसौटी (दैनिक ट्रिब्यून)

निस्संदेह किसी सभ्य समाज में किसी भी किस्म के नस्लवाद का का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। खासकर खेल की दुनिया में तो कतई नहीं, जो मनुष्य के उदात्त जीवन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। आज 21वीं सदी में किसी समाज के लिये ऐसी सोच का होना शर्मनाक है। पिछले दिनों सिडनी में भारत व आस्ट्रेलिया के बीच तीसरे टेस्ट मैच के दौरान जो कुछ भी अप्रिय घटा, वह बताने वाला था कि खुद को सभ्य बताने वाले विकसित देशों के कुछ लोग आज भी मानसिक दुराग्रहों से मुक्त नहीं हो पाये हैं।  निस्संदेह दर्शक दीर्घा में अच्छे खेल को प्रोत्साहन देने वाले क्रिकेट प्रशंसक भी होंगे लेकिन कुछ बिगड़ैलों ने जिस तरह से भारतीय खिलाड़ियों को लेकर नस्लवादी टिप्पणियां कीं, वह दुखद ही कही जायेंगी। कहीं न कहीं ऐसे लोग विपक्षी टीम का मनोबल गिराने का कुत्सित प्रयास ही करते हैं ताकि खिलाड़ियों की मानसिक एकाग्रता भंग करके अपनी टीम को बढ़त दिलायी जा सके। ऐसी अभद्रता कई खिलाड़ियों को फिल्डिंग के दौरान सहनी पड़ी। नस्लभेदी टिप्पणी करने वाले अपनी टीम के प्रति इतनी उम्मीदें पाले होते हैं कि हर मैच में अपनी टीम को जीतता देखना चाहते हैं जो कि किसी भी खेल में संभव नहीं है। यही मानसिक ग्रंथि उन्हें विपक्षी टीम के खिलाफ अनाप-शनाप बकने को उकसाती है। विडंबना यह है कि इन असामाजिक तत्वों ने दूसरा मैच खेल रहे मोहम्मद सिराज और जसप्रीत बुमराह को निशाना बनाया, जो आस्ट्रेलिया टीम को चुनौती दे रहे थे। कहीं न कहीं ऐसी कुत्सित कोशिशें विपक्षी टीम की जीत की कोशिशों की लय को भंग करने के ही मकसद से की जाती हैं। हालांकि खिलाड़ियों द्वारा टीम कप्तान को विकट स्थिति की जानकारी देने और मैच अधिकारियों द्वारा कार्रवाई के बाद बदतमीज दर्शकों को स्टेडियम से बाहर का रास्ता दिखाया गया, लेकिन ऐसी कड़वाहट इतनी जल्दी कहां दूर होती है।  उसकी कसक लंबे समय तक बनी रहती है।


हालांकि, क्रिकेट आस्ट्रेलिया ने इस घटनाक्रम पर खेद जताया है। यह अच्छी बात है कि ऐसी कुत्सित मानसिकता को संस्थागत संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। मामले की पड़ताल की जा रही है। विगत में खिलाड़ी, आप्रवासी भारतीय व अल्पकालिक प्रवास पर गये लोग शिकायत करते रहे हैं कि कुछ आस्ट्रेलियाई नस्लवादी व्यवहार करते हैं। हालांकि, आस्ट्रेलिया में ऐसे अपशब्दों को प्रतिबंधित किया गया है और आस्ट्रेलिया एक बहुसांस्कृतिक देश के रूप में देखा जाता रहा है।  श्वेत आस्ट्रेलिया की नीति को 1970 के दशक में अलविदा कह दिया गया था। पिछले दशकों में बड़ी संख्या में अश्वेत बड़े शहरों का हिस्सा बने हैं। लेकिन इसके बावजूद एक तबका इसे स्वीकृति प्रदान और सभी लोगों को अपने समाज में आत्मसात‍् नहीं कर पा रहा है। खासकर जब खेल की बात आती है तो वे आक्रामक राष्ट्रवादी बन जाते हैं। खेल अधिकारियों ने दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करके सकारात्मक संदेश ही दिया है। लेकिन इसके बावजूद कई सवाल अनुत्तरित ही हैं कि सभ्यता के विकास क्रम में ऐसी संकीर्ण सोच के लोग क्यों नस्लवाद का पोषण करते हैं। अवांछित पूर्वाग्रहों से ग्रस्त ऐसे लोग सामुदायिक पहचान के जरिये अपने अतीत के वर्चस्व से आत्ममुग्ध रहते हैं। यह ठीक है कि विकसित समाजों ने ऐसी धारणा को दूर करने में खासी कामयाबी पायी है। लेकिन इसके बावजूद नस्लभेदी पूर्वाग्रहों का विद्यमान रहना हैरानी का ही विषय है।  ऐसी दुर्भावना का पाया जाना किसी भी सभ्य समाज के लिये शर्म की बात है। खासकर दूसरे देश से खेल जैसे उत्कृष्ट मानवीय व्यवहार का हिस्सा बनने वाले खिलाड़ियों के साथ ऐसा व्यवहार किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकता। संस्थागत स्तर पर तो ऐसी सोच को पनपने का किसी भी हाल में मौका नहीं देना चाहिए। ऐसी सोच को दूर करने के लिये सकारात्मक सामाजिक प्रशिक्षण दिये जाने की भी जरूरत है ताकि उनमें आलोचनात्मक विवेक पैदा किया जा सके। तभी वे सभ्य होने की कसौटी पर खरे उतर सकेंगे। मानव के भीतर मानव के लिये संवेदना जगाना जरूरी है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Thursday, January 14, 2021

टीकाकरण में पारदर्शिता (दैनिक ट्रिब्यून)

निस्संदेह भारत में कोरोना संक्रमण के ग्राफ में लगातार आ रही गिरावट सुखद ही है। इसके बावजूद यह मानकर चलना चाहिए कि यह संकट अभी टला नहीं है। अमेरिका व यूरोप में वायरस के बदले हुए स्ट्रेन ने नये सिरे से दस्तक दी है। बहरहाल, यह खबर उत्साहवर्धक है कि 16 जनवरी से देश में टीकाकरण अभियान विधिवत‍् शुरू हो रहा है। इससे पहले दो चरण में ड्राई रन के जरिये देश के तमाम भागों में टीकाकरण का पूर्वाभ्यास किया गया ताकि इसके क्रियान्वयन में कोई दिक्कत न आये। शोध-अनुसंधान से हासिल वैक्सीन इस महामारी से मुकाबले के लिए सुरक्षा कवच उपलब्ध कराती है। शुुरुआती चरण में देश के तीस करोड़ लोगों को टीकाकरण लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसे दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान कहा जा रहा है। देश के तमाम लोगों की निगाहें उन केंद्रों पर लगी हैं, जहां से टीकाकरण अभियान की शुरुआत होगी। इसी बीच चिंता यह भी जताई जा रही है कि कुछ लोग बारी से पहले इसे हासिल करने के लिए तिकड़में भिड़ा रहे हैं। ये वे लोग हैं जो अपने पद, राजनीतिक पहुंच व आर्थिक रसूख का इस्तेमाल करके पहले वैक्सीन हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं। वे लोग, जो लाइन तोड़कर लाभ उठाना अपना विशेषाधिकार समझते हैं। यह होड़ उन लोगों के अधिकारों का अतिक्रमण करेगी जिन्हें वैक्सीन पहले मिलनी चाहिए। हालांकि, प्रधानमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि इसमें पारदर्शिता बरती जायेगी और जनप्रतिनिधियों का नंबर बाद में आयेगा। महामारी के वायरस ने अपना शिकंजा कसने में अमीर-गरीब का फर्क न करके मानवता का विनम्र सबक ही सिखाया है। यही वजह है कि दुनिया के पचास देशों ने वैक्सीनेशन के लिये सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र को अधिकृत किया है। साथ ही लाभार्थियों की प्राथमिकता सूची का सख्त अनुपालन सुनिश्चित किया है  ताकि मुनाफाखोरी के लिये टीकाकरण से खिलवाड़ न हो। अन्यथा अमेरिका जैसे देश में वैक्सीन में विसंगतियां सामने आई हैं।   


सरकार ने टीकाकरण के परिवहन, कोल्ड स्टोरेज, वितरण व निगरानी को लेकर व्यापक तैयारियां की हैं ताकि टीका सुरक्षित ढंग से जरूरतमंदों तक पहुंच सके। पहले चरण में तीन करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों तथा फ्रंटलाइन वर्करों को टीका लगाया जायेगा। फिर गंभीर रोगों से ग्रस्त, संक्रमण के उच्चे जोखिम वाले लोगों व पचास वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को टीका लगाया जायेगा। शुरुआत में तीस करोड़ लोगों के टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है। यह भी जरूरी होगा कि टीके की दोनों खुराक मिलनी सुनिश्चित की जाये। निस्संदेह जिस तरह देश ने कोरोना संकट को झेला है, एक करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हुए हैं तथा डेढ़ लाख लोगों ने जीवन खोया है, इससे बचाव का अंतिम उपाय टीकाकरण ही है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चुनावी बूथ जैसी रणनीति बनाने और वैक्सीन को लेकर अफवाहों पर अंकुश लगाने की अपील की है। राजनीति व धर्म के आधार पर वैक्सीन को लेकर कुप्रचार किया जाता रहा है। ऐसे लोगों पर नकेल कसना जरूरी है। यह देश के लिये सुखद है कि वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत से हासिल दो वैक्सीनों की आपातकालीन प्रयोग के लिये अनुमति मिल चुकी है। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका के भारतीय संस्करण कोविशील्ड और पूर्ण रूप से भारतीय वैक्सीन कोवैक्सीन को अनुमति दी है।  कोरोना संकट के दौरान जिस तरह प्रधानमंत्री की अपीलों को राज्यों ने गंभीरता से लिया, उम्मीद है कि टीकाकरण में भी वही प्रतिबद्धता नजर आयेगी।  केंद्र सरकार ने टीकाकरण में प्राथमिकता उन लोगों को दी है जो संकट के समय डटकर खड़े रहे। टीकाकरण कार्यक्रम के लिये साढ़े चार लाख कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया है।  निस्संदेह हम समय पर इस महामारी को हराने में कामयाब हो सकेंगे। यह अच्छी बात है कि भारत में दो वैक्सीन उपलब्ध हैं और वह भी दुनिया में सबसे कम कीमत पर। यही वजह है कि दुनिया के विकासशील और गरीब मुल्क बड़ी उम्मीदों से भारत की तरफ देख रहे हैं।  

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Monday, January 11, 2021

पाक की नूरा कुश्ती (दैनिक ट्रिब्यून)

ऐसे वक्त में जब पाकिस्तान की आतंकवाद पोषण की नीतियों पर निगाह रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय नियामक संस्था की फरवरी में बैठक होने जा रही है, पाक कुख्यात आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई का नाटक कर रहा है। मुंबई हमले के मास्टर माइंड और जम्मू-कश्मीर में आतंक फैलाने वाले संगठन लश्कर-ए-तैयबा के अगु‍आ जकी-उर-रहमान लखवी को हाल ही में गिरफ्तार किया गया है। उसे संयुक्त राष्ट्र ने 2008 में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया था। लखवी पर आतंकियों को धन-सहायता उपलब्ध कराने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। पाक की एक अदालत ने आतंकवाद के वित्तपोषण के मामले में लखवी को पंद्रह साल जेल की सजा सुनायी है। यह विडंबना ही है कि एफएटीएफ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की बैठकों से पहले पाक इसी तरह के प्रपंच आंख में धूल झोंकने के लिए करता है। इसी तरह एक अन्य कुख्यात आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर के खिलाफ भी आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी किये गये हैं। निस्संदेह पाक सरकार फरवरी में वित्तीय कार्रवाई कार्यबल यानी एफएटीएफ तथा इससे पहले इसकी एशिया प्रशांत संयुक्त समूह इकाई की बैठक के मद्देनजर यह कार्रवाई का नाटक कर रहा है, जिसकी भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए इसे नाटक बताते हुए कहा है कि महत्वपूर्ण बैठकों से पहले पाक ऐसी ही हरकत करता रहा है।

दरअसल, पाक सरकार ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकवादियों के खिलाफ कभी भी ठोस कार्रवाई नहीं की है। प्रतिबंधित आतंकी संगठन गाहे-बगाहे भारत के खिलाफ सार्वजनिक मंचों से विषवमन करके अपने मंसूबों को अंजाम देते रहते हैं। पाक के सरकारी प्रतिष्ठान भी भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं। विश्व बिरादरी का दायित्व बनता है कि पाक की जवाबदेही तय की जाये ताकि पाक में सक्रिय सभी आतंकी संगठनों, उनके बुनियादी ढांचे तथा आतंकी सरगनाओं के खिलाफ ठोस कार्रवाई हो सके। दरअसल, पाक एफएटीएफ द्वारा घोषित ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिये छटपटा रहा है, जिसमें चीन उसकी खुली मदद कर रहा है। उसी कड़ी में लखवी की गिरफ्तारी का यह ढोंग सामने आ रहा है। दरअसल, पाक को यह डर भी सता रहा है कि एफएटीएफ द्वारा निर्धारित सूची पूरी न कर पाने से कहीं वह काली सूची में न दर्ज हो जाये। यदि ऐसा होता है तो पहले से चरमराई पाक की अर्थव्यवस्था चौपट हो जायेगी। पाक में विदेशी निवेश और मदद के सभी रास्ते बंद हो जायेंगे। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में भी एफएटीएफ की बैठक से ठीक पहले कुख्यात आतंकवादी सरगना हाफिज सईद को गिरफ्तार किया गया था। बीते वर्ष अक्तूबर में एफएटीएफ की बैठक में कार्रवाई योजना को अंतिम रूप देने के लिये पाक को तीन माह का समय दिया गया था और यह निर्धारित अवधि का तीसरा महीना है, जिसमें से छह लक्ष्य अभी बाकी हैं।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Saturday, January 9, 2021

दुनिया में सबसे पुराना लोकतंत्र होने का दंभ भरते हुए पूरी दुनिया को लोकतांत्रिक नसीहतें देने वाले अमेरिका में बुधवार को जो कुछ घटा, उसने इस देश के लोकतंत्र की साख को धूमिल ही किया। अमेरिकी लोकतंत्र में नाटकीय राजनीति के प्रतीक राष्ट्रपति ट्रंप ने हठधर्मिता दिखाकर अपने समर्थकों को चुनाव परिणामों को लेकर जैसा भ्रमित किया, उसकी परिणति कैपिटल हिल पर हमले के रूप में हुई। वह भी उस वक्त जब अमेरिकी संसद जो बाइडन व कमला हैरिस के राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति चुने जाने पर मोहर लगा रही थी।  भले ही अमेरिकी लोग इस घटनाक्रम को तीसरी दुनिया की अराजक लोकतांत्रिक गतिविधियों की पुनरावृत्ति बता रहे हैं लेकिन यह घटनाक्रम अमेरिकी समाज में गहरे होते विभाजन को दर्शाता है। अब चाहे संसद की कार्यवाही वाले दिन ट्रंप द्वारा अपने समर्थकों की रैली बुलाने और उन्हें उकसाने के आरोप लग रहे हों, लेकिन हकीकत में यह घटनाक्रम गहरे तक विभाजित अमेरिकी समाज की हकीकत को बताता है। राष्ट्रपति चुनाव से पहले पुलिस की निर्ममता के विरोध में उपजे अश्वेत आंदोलन की हिंसा ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा और बताया कि अमेरिकी लोकतंत्र में सब कुछ ठीकठाक नहीं है। वहीं बुधवार को हुई घटना को श्वेत अस्मिता के प्रतीक बताये जाने वाले ट्रंप की पराजय को न पचा पाने की परिणति ही कहा जा रहा है। अमेरिकी संसद की सुरक्षा में सेना के बजाय पुलिस को लगाया जाना,  फिर पुलिस का सुरक्षा घेरा टूटना तथा हमलावरों के प्रति उदार व्यवहार किये जाने को लेकर अमेरिका में बहस छिड़ी है। कहा जा रहा है कि यदि अश्वेत ऐसा करते तो क्या सुरक्षा बलों की ऐसी ही सीमित प्रतिक्रिया होती? अमेरिकी समाज में पिछले चार साल में जो सामाजिक विभाजन गहराया है, उसकी आक्रामक अभिव्यक्ति को कैपिटल हिल पर हुए हमले के रूप में देखा गया है।

बहरहाल, बुधवार के घटनाक्रम के बावजूद भले ही डोनाल्ड ट्रंप ने अनौपचारिक रूप से अपनी पराजय स्वीकार करते हुए सत्ता हस्तांतरण के लिये सहमति जता दी हो, लेकिन तब तक दुनियाभर में अमेरिकी लोकतंत्र की छीछालेदर हो चुकी थी। जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर अमेरिका दुनियाभर के लोकतंत्रों को नसीहतें देता रहा, उसका तिलिस्म अब दरक चुका है। अब अमेरिका में दलीलें दी जा रही हैं कि यहां जो कुछ घटा, वह तीसरी दुनिया के लोकतंत्रों के समानांतर ही है। यानी विकासशील देशों में जहां चुनाव से पहले जीत के दावे किये जाते रहे हैं और हार के बाद सत्ता छोड़ने में ना-नकुर की जाती रही है। जहां संवैधानिक संस्थाओं को नकार कर सत्ता हासिल करने का उपक्रम चलता रहता है। ऐसा करके लोकतंत्र का दंभ भरने वाले अमेरिकी भूल जाते हैं कि पिछले चार साल में लोकतांत्रिक व जीवन मूल्यों की रक्षा के लिये स्थापित संस्थाओं से ट्रंप लगातार  खिलवाड़ करते रहे। उन्होंने अपने समर्थकों के मन में कल्पित तथ्यों के बूते यह बात बैठाने में सफलता पायी कि चुनाव में धांधली हुई है। जबकि हकीकत में इस बात का कोई प्रमाण अब तक वे दे नहीं पाये हैं। सही मायनो में अमेरिकी समाज में विभाजन का सच पूरी दुनिया के सामने अनावृत्त हुआ है। अब भले ही भारी-भरकम शब्दों के जरिये उसे छिपाने का असफल प्रयास किया जा रहा हो। निश्चित रूप से सत्ता हस्तांतरण से पहले हुआ उपद्रव अमेरिकी लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला है जो दुनिया में सुनी जाने वाली अमेरिकी आवाज को कमजोर बनायेगा। सवाल अमेरिकी समाज पर भी उठेगा कि कैसे उसने प्रॉपर्टी के कारोबारी अरबपति को अमेरिकी लोकतंत्र की बागडोर श्वेत अस्मिता को बरकरार रखने के लिये सौंपी। निस्संदेह मंदी और कोरोना संकट की विभीषिका से जूझ रहे अमेरिका के आत्मबल को इस घटनाक्रम से गहरी ठेस पहुंचेगी, जिससे उबरने में उसे लंबा वक्त लगेगा। आने वाला समय नये राष्ट्रपति जो बाइडेन के लिये खासा चुनौती भरा होने वाला है। उनके सत्ता हस्तांतरण का रास्ता तो साफ हो गया है मगर विभाजित अमेरिकी समाज को एकजुट करना और कोरोना संकट से उबरकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना आसान नहीं होगा। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Friday, January 8, 2021

हैवानियत की हद (दैनिक ट्रिब्यून)

देश के अंतर्मन को झिंझोड़ती उत्तर प्रदेश के बदायूं की घटना ने एक बार फिर निर्भया कांड की याद दिला दी। मंदिर गई पचास वर्षीय महिला की पोस्टमार्टम रिपोर्ट रोंगटे खड़ी करने वाली है। रिपोर्ट हैवानियत की गवाही देती है। इससे पहले पुजारी महिला के कुएं में गिरकर घायल होने की बात करके पुलिस-प्रशासन को गुमराह करता रहा लेकिन पुलिस ने जिस तरह प्राथमिक स्तर पर कोताही बरती और परिजनों के कहने के बाद दूसरे दिन घटनास्थल पर पहुंची और घटना को गैंगरेप व हत्या मानने से  इनकार करती रही, वह शर्मनाक है। यद्यपि योगी सरकार अपराधियों के प्रति शून्य सहिष्णुता का दावा करती रहती है लेकिन निचले स्तर के पुलिस वाले उसके दावों को पलीता लगाते रहते हैं। देर से ही सही, बदायूं के उघैती थाना के प्रभारी को निलंबित करके पुलिस की छवि को हुई क्षति को कम करने का प्रयास हुआ। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्रूरता की पुष्टि होने के बाद गैंगरेप और हत्या का मामला दर्ज किया गया है। मामले के दो अभियुक्त गिरफ्तार हुए हैं मगर मुख्य अभियुक्त अब तक फरार है। एक बार फिर इनसानियत शर्मसार हुई। यह घटना हमारी आस्था को भी खंडित करने वाली है कि मंदिर में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। इससे समाज का यह विश्वास खंडित होता है कि धार्मिक स्थल शुचिता और सुरक्षा के पर्याय हैं। समाज को अब यह तय करना होगा कि ऐसी आपराधिक सोच के लोग धर्म का चोगा पहनाकर अपनी आपराधिक प्रवृत्तियों को अंजाम न दे सकें। यह भी तथ्य सामने आता है कि कामांध लोगों की शिकार किसी भी उम्र की महिलाएं हो सकती हैं। निस्संदेह जहां यह कानून व्यवस्था की विफलता का मामला है, वहीं आस्था और विश्वास को खंडित करने का भी वाकया है। कानून का भय अपराधी मनोवृत्ति के लोगों में न होना कानून-व्यवस्था के औचित्य पर सवालिया निशान लगाता है, जिसके बाबत सत्ताधीशों को गंभीरता से सोचना होगा।


निस्संदेह बदायूं की हैवानियत हर संवेदनशील व्यक्ति के मन को लंबे समय तक उद्वेलित करती रहेगी क्योंकि इसमें आस्था स्थल की शुचिता को तार-तार किया गया है। यह भी कि इस अपराध को अंजाम देने वालों में ईश्वरीय और कानूनी मर्यादाओं का कोई भय नहीं रहा। जो इनसानियत से भी भरोसा उठाने वाली घटना है। घटनाक्रम सरकार व स्थानीय प्रशासन को सचेत करता है कि धर्मस्थलों में सदाचार व नैतिक व्यवहार सुनिश्चित किया जाये। सवाल पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी उठता है कि निचले स्तर के पुलिसकर्मियों को पीड़ितों के प्रति संवेदनशील व्यवहार के लिये प्रशिक्षित किया जाये। जहां यौन हिंसा रोकने के लिये बने सख्त कानूनों के सही ढंग से क्रियान्वयन का प्रश्न है वहीं निचले दर्जे के अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने का भी प्रश्न है। पुलिस की ऐसी ही संवेदनहीनता हाथरस कांड में भी नजर आई थी। सवाल यह भी है कि ऐसे मुद्दे जघन्य अपराधों के वक्त ही क्यों उठते हैं। बहरहाल, महिलाओं को सशक्त करने की भी जरूरत है ताकि वे ऐसी साजिशों के खिलाफ प्रतिरोध कर सकें। शहरों ही नहीं, गांव-देहात में भी ऐसी पहल हो और ऐसी योजनाएं सिर्फ कागजों में ही नहीं, धरातल पर आकार लेती नजर आयें। अधिकारियों को ऐसे मामलों को समझने और पीड़ितों के प्रति संवेदनशील व्यवहार के लिये प्रशिक्षित करने की सख्त जरूरत है। साथ ही शासन-प्रशासन की तरफ से अपराधियों को सख्त संदेश जाना चाहिए कि हैवानियत को अंजाम देने वाले लोगों को सख्त सजा समय से पहले दी जायेगी, जिससे अपराधियों में कानून तोड़ने के प्रति भय पैदा हो सकेगा। तभी हम आदर्श सामाजिक व्यवस्था की ओर उन्मुख हो सकते हैं। सवाल योगी सरकार पर भी है कि बड़े अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा करने के बावजूद अखबारों के पन्ने जघन्य अपराधों की खबरों से क्यों पटे हुए हैं। लखीमपुर खीरी, बुलंदशहर, हाथरस, बदायूं की घटनाओं के अलावा कानपुर के बहुचर्चित संजीत यादव अपहरण व हत्या कांड में पुलिस की नाकामी क्यों सामने आई है। संगठित अपराधों पर नियंत्रण के दावों के बीच जघन्य अपराध थम क्यों नहीं रहे हैं। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Thursday, January 7, 2021

नये भवन की राह (दैनिक ट्रिब्यून)

आखिरकार मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी और बहुचर्चित नये संसद भवन यानी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को शीर्ष अदालत से हरी झंडी मिल ही गई। हालांकि, नये भवन के लिये भूमि पूजन पहले ही हो चुका है लेकिन निर्माण और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को लेकर दायर याचिकाओं के चलते निर्माण कार्य विधिवत रूप से प्रारंभ नहीं हो सका था। उम्मीद की जानी चाहिए कि लोकतंत्र के इस सबसे बड़े मंदिर की गरिमा की दृष्टि से इससे जुड़े विवादों का अब पटाक्षेप हो जाना चाहिए। बशर्ते सरकार का व्यवहार भी आलोचनाओं के प्रति संवेदनशील हो, जिससे निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप इसका निर्माण हो सके। अन्य बातें सामान्य रहें तो नये संसद भवन के निर्माण का लक्ष्य अगस्त-2022 तक रखा गया है जब देश आजादी की हीरक जयंती मना रहा होगा। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बैंच ने दो:एक के बहुमत से इसके निर्माण से जुड़ी बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया। दरअसल भूमि उपयोग के परिवर्तन को लेकर दिसंबर, 2019 की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं में दलील दी गई थी कि अधिसूचना ने खुले और हरियाली के स्थानों से लोगों को वंचित करके नागरिक जीवन के अधिकारों का उल्लंघन किया है। साथ ही पारदर्शिता की कमी के चलते निर्माण और पर्यावरण कानूनों के अतिक्रमण का भी आरोप लगाया गया था। कई राजनीतिक दल कोविड संकट में चरमराई अर्थव्यवस्था में इस भव्य परियोजना पर होने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठाते रहे हैं। पर्यावरण चिंताओं से सहमति जताते हुए शीर्ष अदालत ने सरकार को स्मॉग टावर लगाने के भी निर्देश दिये हैं ताकि प्रदूषण की चिंताओं को दूर किया जा सके। साथ ही पर्यावरण व वन मंत्रालय के कायदे-कानूनों के अनुपालन की भी बात कही गई है। ऐसे ही कई अन्य मुद्दों को लेकर विपक्षी नेताओं ने इस बाबत आयोजित कार्यक्रम से खुद को अलग रखा था। अब जब अदालत से इसके निर्माण को मंजूरी मिल गई है तो सरकार को सभी राजनीतिक दलों को साथ लेकर उनकी चिंताओं को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

सरकार का दावा है कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट मौजूदा संसद भवन की कमियों को दूर करेगा। मसलन अपर्याप्त स्थान, संरचनात्मक कमजोरियां और सुरक्षात्मक चिंताएं। सरकार कहती है कि विभिन्न मंत्रालयों के भवनों के लिये जो किराया दिया जाता है और अन्य सुविधाओं के चलते प्रति वर्ष एक हजार करोड़ रुपये की बचत होगी। इसके बावजूद इस राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट को लेकर राजनीतिक दलों की सहमति अपरिहार्य है क्योंकि यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है और इसमें हर राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व होगा। बहरहाल, भवन के प्रक्रियागत व पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर न्यायालय द्वारा निर्देश दिये जाने के उपरांत इसके निर्माण में गति आयेगी। इसमें दो राय नहीं कि लगभग एक सदी के बाद परिपक्व और विस्तारित लोकतंत्र में लोकतांत्रिक गतिविधियों के सुचारु ढंग से संचालन के लिये नये भवन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। निस्संदेह, इस भवन से आजादी के बाद देश के जनमानस के गहरे अहसास जुड़े रहे हैं, जो लोकतांत्रिक गरिमा का भी प्रतीक रहा है। इस भवन का निर्माण परतंत्र भारत में हुआ था, जो स्वतंत्र भारत में समृद्ध लोकतंत्र की जरूरतों को पूरा करने में अपनी सीमाओं से बंधा नजर आ रहा था। इसके विस्तार व मरम्मत आदि की भी एक सीमा रही है। यह भी जरूरी था कि यह बदलती जरूरतों के अनुरूप हो। 21वीं सदी में परिसीमन आदि से यदि चुने प्रतिनिधियों की संख्या में वृद्धि हो तो किसी तरह की परेशानी न हो। साथ ही हाईटैक होती दुनिया में बेहतर तकनीक से संसद भवन का समृद्ध होना भी जरूरी है। सवाल मौजूदा जरूरतों का ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की आकांक्षाओं के अनुरूप भी इसे तैयार करने की जरूरत है, जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर भी खरा उतरे। साथ ही ध्यान रखा जाये कि नये भवन का वास्तु कुछ ऐसा हो कि नयी दिल्ली की भवन संस्कृति के बीच यह नया भवन अलग-थलग नजर न आये। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Wednesday, January 6, 2021

अब बर्ड फ्लू (दैनिक ट्रिब्यून)

ऐसे वक्त में जब देश कोरोना वायरस के संक्रमण से उबरने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा था, बर्ड फ्लू की दस्तक ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। यूं तो बर्ड फ्लू के मामले विगत में भी सामने आते रहे हैं, लेकिन इस नये स्ट्रैन को चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। इसकी वजह यह है कि यह वायरस पक्षियों के साथ जानवरों व मनुष्यों को भी संक्रमित कर सकता है। यदि मनुष्य पक्षियों या पोल्ट्री पक्षियों के संपर्क में आता है तो संक्रमित होने की गुंजाइश बनी रह सकती है। शुरुआती दौर में राजस्थान में बड़ी संख्या में कौवों व प्रवासी पक्षियों के मरने के समाचार सामने आये थे, जिनकी जांच में वायरस होने की पुष्टि हुई है। ऐसे मामले केरल में भी सामने आये और बड़ी संख्या में मुर्गियों-बतख तथा अन्य पालतू पक्षियों को मारने के आदेश दिये गये हैं। इसी तरह हिमाचल में प्रवासी पक्षियों के मरने की खबरों के बाद नमूनों की जांच के बाद बर्ड फ्लू फैलने की पुष्टि हुई है। दरअसल, हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के पोंग बांध की झील क्षेत्र में मृत पाये गये प्रवासी पक्षियों में बर्ड फ्लू होने की पुष्टि हुई है। मध्य प्रदेश में भी बर्ड फ्लू के मामले प्रकाश में आने के समाचार हैं, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि राजस्थान के सीमावर्ती जिलों से मध्य प्रदेश में वायरस का फैलाव हुआ है।  हरियाणा में पंचकूला के निकट स्थित पोल्ट्री फार्मों में मृत मुर्गियों के नमूने जांच के लिये भेजे गये हैं। यहां भी पोल्ट्री पक्षियों के मरने की बात कही जा रही थी। यूं तो अधिक सर्दी में भी पक्षियों के मरने की खबरें आती हैं, ऐसे में हर मौत को बर्ड फ्लू नहीं कहा सकता है, लेकिन शुरुआती जांच में कई जगह बर्ड फ्लू फैलने के संकेत मिले हैं। कुछ मृत पक्षियों के नमूने जालंधर स्थित आरडीडीएल भेजे गये हैं। 

शुरुआती दौर में राजस्थान में भी बड़ी संख्या में कौवों, बगुलों और अन्य पक्षियों की मौत के मामले सामने आये हैं। झालावाड़ के मृत पक्षियों के नमूनों को भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान भेजा गया था, जिसमें बर्ड फ्लू की पुष्टि हुई। बताया जा रहा है कि केरल के कोट्टायम और अलप्पुझा जिलों में बर्ड फ्लू के मामले सामने आने तथा सैकड़ों बतखों के मरने पर एक निर्धारित दायरे के पक्षियों व पालतू पक्षियों को मारने के आदेश दिये गये हैं। बताया जा रहा है कि नया वायरस पहले के मुकाबले ज्यादा घातक हो सकता है और मनुष्य को भी चपेट में लेने की आशंका बनी हुई है। वहीं बरेली स्िथत भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में मृत पक्षियों के नमूनों की जांच में बर्ड फ्लू की पुष्टि हुई है। वैसे भोपाल स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज ऐसे मामलों की जांच के लिये नोडल इकाई है, जहां मार्च के बाद कोरोना वायरस पर शोध किया जा रहा है। ऐसे में सलाह दी जा रही है कि मुर्गी, बतख, मछली और इनसे जुड़े उत्पादों, मसलन अंडे व मांस के सेवन से परहेज किया जाये। कुछ इलाकों में इन उत्पादों की बिक्री पर भी रोक लगाई गई है। ऐसे में कोशिश की जा रही है कि संक्रमित इलाकों के पक्षियों का सुरक्षित तरीके से निस्तारण किया जाये। असली संकट तब पैदा होगा जब वायरस मनुष्य तक पहुंचेगा। संबंधित विभागों को अलर्ट रहने को कहा गया है। दरअसल यह वायरस भी नाक, कान व मुंह से सांस के जरिये मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। इससे पहले देश में कई बार इस वायरस ने दस्तक दी है। केरल में वर्ष 2016 में बर्ड फ्लू के मामले प्रकाश में आये थे। लेकिन पहले एच5एन1 वायरस के मुकाबले नया स्ट्रैन ज्यादा तेजी से फैलने वाला बताया जा रहा है। अच्छी बात यह है कि संक्रमण होने पर उपचार के लिये जरूरी दवाएं उपलब्ध हैं।  इस संक्रमण के होने पर नाक बहने, सांस लेने में दिक्कत होने, उल्टी होने का अहसास, कफ बने रहने और गले में सूजन, मांसपेशियों में दर्द तथा सिर व पेट के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत रहती है। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून। 

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Tuesday, January 5, 2021

वित्तीय अनुशासन से ही सुधरेगी आर्थिकी ( दैनिक ट्रिब्यून)

भरत झुनझुनवाला


वित्तमंत्री को आगामी बजट में तय करना है कि वे सरकार के घाटे की भरपाई कैसे करेंगी? इस वर्ष कोविड संकट के चलते सरकार का वित्तीय घाटा देश के जीडीपी का 3.5 प्रतिशत से बढ़कर 7 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है। घाटा बढ़ना स्वाभाविक है। बीते कई वर्षों से सरकार लगातार आयकर, जीएसटी और आयात कर की दरों में कटौती करती आ रही है। यह कटौती सार्थक होती यदि साथ-साथ अर्थव्यवस्था में गति आती। जैसे हल्का भोजन करने से शरीर में तेजी आती है लेकिन कटौती के कारण सरकार के राजस्व में उलटा गिरावट आई है।


अर्थव्यवस्था के मंद पड़े रहने के कारण राजस्व में भी गिरावट आयी है। सरकार का घाटा तेजी से बढ़ रहा है। जैसे व्यक्ति हल्का भोजन करे लेकिन प्रदूषित क्षेत्र में रिहायश करे तो हल्का भोजन निष्प्रभावी हो जाता है। राजस्व में गिरावट की यह परिस्थिति ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकती। उसी तरह जैसे ऋण लेकर घी पीने की प्रक्रिया ज्यादा दिन तक नहीं चलती है। चार्वाक के सिद्धांत ‘ऋणं कृत्वा घृतम‍् पिवेत’ से काम नहीं चलेगा। अंततः सरकार को अपने उन खर्चों को कम करना होगा जो उत्पादक नहीं हैं। जैसे मूर्तियां बनाना।


बीते वर्षों में सरकार ने आयकर में बड़ी कम्पनियों और छोटे करदाताओं सभी को कुछ न कुछ छूट दी है। अपेक्षा थी कि आयकर की दर में कटौती होने के कारण आयकरदाताओं के हाथ में ज्यादा रकम बचेगी और वे बाजार से माल अधिक मात्रा में खरीदेंगे और खपत अधिक करेंगे। साथ-साथ बड़े उद्योगों के हाथ में ज्यादा रकम बचेगी और वे ज्यादा निवेश करेंगे। इस प्रकार बाजार में खपत और निवेश का सुचक्र स्थापित हो जाएगा। इस सुचक्र के स्थापित होने से पुनः सरकार को अधिक मात्रा में आयकर मिल जाएगा। आयकर की दर को घटाने से अर्थव्यवस्था गति पकड़ लेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। कारण यह है कि आयकर मुख्यतः देश का समृद्ध वर्ग अदा करता है। यदि सरकार ने इस वर्ग को आयकर में 100 रुपये की छूट दी तो हम मान सकते हैं कि 50 रुपया वे बचत करेंगे। इस रकम का निवेश वे शेयर बाजार, विदेश में अथवा सोना खरीदने में करेंगे। शेष 50 रुपये यदि वे खपत में लगाते हैं तो हम मान सकते हैं कि इसमें से 25 रुपये विदेशी माल खरीदने में, विदेश यात्रा करने में अथवा बच्चों को विदेश में पढ़ने को भेजने में लगायेंगे। इस प्रकार 25 रुपया विदेश चला जायेगा।


अंत में केवल 25 रुपये की देश के बाजार में मांग उत्पन्न होगी। सरकार का घाटा 100 रुपये बढ़ेगा जबकी बाजार में मांग 25 रुपये की बढ़ेगी। न्यून मात्रा में मांग उत्पन्न होने से निवेशकों की निवेश करने की रुचि नहीं बनेगी। इस हानिप्रद नीति को अपनाने के कारण समृद्ध वर्ग के करदाताओं के हाथ में रकम बची लेकिन वह रकम बाजार में न आकर या तो बैंकों में जमा हो गई अथवा विदेशों में चली गयी। इसलिए टैक्स की दरों में कटौती के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था कोविड संकट आने के पहले से ही मंद पड़ी हुई है और इसमें गति नहीं आ रही है। कोविड ने इसे और पस्त कर दिया है।


टैक्स में कटौती करने का दूसरा पक्ष घाटे की भरपाई का है। सरकार के खर्च बढ़ते जा रहे हैं लेकिन टैक्स में छूट देने से राजस्व में कटौती हो रही है। इसलिए सरकार का घाटा बढ़ रहा है। इस घाटे की भरपाई सरकार बाजार से ऋण लेकर पूरी करती है। इसी घाटे को वित्तीय घाटा कहा जाता है। जैसा ऊपर बताया गया है कि इस चालू वर्ष 2020-21 में यह घाटा जीडीपी का 3.5 प्रतिशत से बढ़कर 7 प्रतिशत होने को है। यह बढ़ता वित्तीय घाटा 1 या 2 वर्ष के लिए सहन किया जा सकता है। जैसे दुकानदार बैंक से ऋण लेकर यदि अपने शोरूम का नवीनीकरण करे और उसकी बिक्री बढ़ जाये तो एक या दो वर्ष के अंदर वह अतिरिक्त बिक्री से हुई अतिरिक्त आय से लिए गये ऋण का भुगतान कर सकता है। लेकिन यदि वह ऋण लेकर शोरूम का नवीनीकरण करे और बिक्री पूर्ववत रहे तो वह ऋण के बोझ से दबता जाता है, ब्याज का बोझ बढ़ता जाता है, उसकी आय घटती जाती है और अंततः उसका दीवाला निकल सकता है।


हाल ही में कुछ जानकारों ने बताया कि दुकानदारों ने बैंक से ऋण लेते समय जो पोस्ट डेटेड चेक दे रखे थे, वे उनका भी भुगतान नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि उनकी आय दबाव में है। कुछ अपने व्यक्तिगत खर्चों में कटौती करके बैंकों को कुछ रकम की अदायगी कर रहे हैं। बैंक की वसूली हो भी जाये तो भी दुकानदार की आय कम हो रही है, वह बाजार से कम माल खरीद रहा है और बाजार में मांग कम उत्पन्न हो रही है। अर्थव्यवस्था मंद पड़ी हुई है। ऋण लेना हानिप्रद होता है, यदि उसके अनुसार कारोबार में वृद्धि और मुनाफा न हो। आज देश की यही परिस्थिति है। सरकार ऋण लेती जा रही है लेकिन अर्थव्यवस्था मंद पड़ी हुई है।


ऐसे में वित्त मंत्री के सामने चुनौती है। उत्तरोत्तर ऋण लेकर वे अर्थव्यवस्था को नहीं सम्भाल पाएंगी। उन्हें सख्त कदम उठाने पड़ेंगे। पहला कदम सरकारी घाटे को कम करने का उठाना होगा। मूर्तियां बनाने और सरकारी कर्मियों को बोनस देने पर विराम लगाना चाहिए। बल्कि कर्मियों के वेतन में 50 प्रतिशत की कटौती करनी चाहिए। हाल ही में मुजफ्फरनगर के एक व्यापारी ने बताया कि उनका व्यापार कोविड पूर्व की स्थिति से अब आधे पर वापस लौटा है। उनकी आय पूर्व से आधी हो गयी है। यही हाल लगभग देश के अधिकांश कारोबारियों का है। इसलिए जब सेवित की आय में 50 प्रतिशत की कटौती हो गयी है तो सेवकों की आय में भी उसी अनुपात में 50 प्रतिशत की कटौती करना उचित दिखता है। ऐसा करने से सरकार का घाटा घटेगा। समय क्रम में जब अर्थव्यवस्था पुनः ठीक हो जाये तो सेवकों के वेतन पूर्ववत किये जा सकते हैं। इनकी नियुक्ति जनता की सेवा के लिए की गयी है। जब सेवित मर रहा है तो सेवक को लड्डू खिलाने का क्या प्रयोजन है?


आगामी बजट में सरकार को आयकर में और कटौती नहीं करनी चाहिए। बल्कि आयकर में वृद्धि करनी चाहिए। इससे समृद्ध वर्ग पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा लेकिन इनकी खपत में ज्यादा कटौती नहीं होगी। जीएसटी की दर में कटौती करनी चाहिए क्योंकि इससे आम आदमी को राहत मिलेगी और बाजार में मांग बढ़ेगी। आयात कर में भी वृद्धि करनी चाहिए, जिससे कि आयातित माल देश में न आये और घरेलू उद्योगों का विस्तार और समृद्धि हो। यदि वित्तमंत्री आयकर और आयात कर बढ़ाकर जीएसटी को कम करें तो अर्थव्यवस्था पुनः कुछ अंश तक पटरी पर आ सकती है।


लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई बाधित ( दैनिक ट्रिब्यून)

अनूप भटनागर


कोविड-19 महामारी से उत्पन्न परिस्थितियों की वजह 2020 में अनुच्छेद 370 के अनेक प्रावधान खत्म करने, नागरिकता संशोधन कानून की संवैधानिकता, महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के लिए आरक्षण जैसे अनेक महत्वपूर्ण मसलों पर न्यायपालिका को विचार करने का अवसर नहीं मिला। इसी बीच, किसानों के आन्दोलन से उत्पन्न स्थिति और विवादास्पद तीन कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती का मामला भी न्यायालय के विचारार्थ आ गया है।


देश में कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर न्यायपालिका ने 16 मार्च, 2020 से मुकदमों की सुनवाई सीमित कर दी थी। वैसे तो यह व्यवस्था शुरू होने से पहले ही कुछ न्यायाधीशों के अस्वस्थ हो जाने के कारण उच्चतम न्यायालय में तमाम महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई का कार्यक्रम गडमड हो गया था।


बहरहाल, संक्रमण के बाद से शीर्ष अदालत में सिर्फ ‘अत्यावश्यक महत्व के’ चुनींदा मुकदमों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई का सिलसिला शुरू हुआ था। धीरे-धीरे इन मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ की संख्या बढ़ी लेकिन इसके बावजूद सार्वजनिक महत्व के अनेक मुकदमों पर सुनवाई नहीं हो सकी। इसकी वजह यह है कि इनमें से कई मामलों पर पांच या इससे ज्यादा सदस्यों वाली संविधान पीठ को विचार करना था जो कोविड-19 के दौर में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के लिए व्यावहारिक नहीं हो पा रहा था।


इस अप्रत्याशित संकट की वजह से सबरीमला मंदिर व मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और दाउदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतने से संबंधित प्रकरण, संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान खत्म करने, नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं, हिंसा के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले आरोपियों के नाम-चित्र चौराहों पर लगाने जैसे मामलों की सुनवाई अधर में लटक गयी थी।


प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने सबरीमला मंदिर और मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाउदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतने और पारसी समुदाय से बाहर विवाह करने वाली स्त्री को किसी परिजन के अंतिम संस्कार से जुड़ी पवित्र अग्नि के अज्ञारी कार्यक्रम में शामिल होने से वंचित करने सहित कई धार्मिक मुद्दों से जुड़े सात सवालों पर 17 फरवरी को सुनवाई शुरू की थी। लेकिन कोरोना संकट की वजह से यह अधर में लटक गया।


इस संविधान पीठ में शामिल न्यायमूर्ति आर. भानुमति सेवानिवृत्त हो चुकी हैं और प्रधान न्यायाधीश बोबडे का कार्यकाल भी 23 अप्रैल तक ही है। ऐसी स्थिति में इन मामलों पर निकट भविष्य में सुनवाई शुरू होने की संभावना कम ही लगती है। प्रधान न्यायाधीश ने पांच मार्च को कहा था कि धार्मिक मुद्दों से संबंधित मामलों की सुनवाई के बाद ही नागरिकता संशोधन कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई होगी।


दूसरी ओर, दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश न्यायमूर्ति एनवी रमण की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने संबंधी अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों के साथ ही अनुच्छेद 35ए को समाप्त करने के केन्द्र के फैसले के खिलाफ मामले विचाराधीन थे। इन मामलों की सुनवाई के लिए पहले गठित हुई संविधान पीठ को नये सिरे से गठित करने की आवश्यकता होगी।


मराठा समुदाय के लिए शिक्षा और रोजगार में आरक्षण का प्रावधान करने संबंधी महाराष्ट्र ने 2018 में कानून बनाया था। लेकिन इस कानून की वैधता को लेकर उठे विवाद के कारण इस पर अंतरिम रोक लगी हुई है, जिस वजह से इसका लाभ जनता तक नहीं पहुंच रहा है।


मराठा आरक्षण के मामले में पांच सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा 25 जनवरी से सुनवाई शुरू होने की उम्मीद है। न्यायालय ने नौ दिसंबर को इस मामले को 25 जनवरी के लिए सूचीबद्ध किया है।


देश में 27 सितंबर से तीन कृषि कानूनों को लागू किये जाने के बाद से ही किसान आंदोलनरत हैं। इन कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर न्यायालय ने 12 अक्तूबर को केन्द्र को नोटिस जारी किया था।


इसी बीच, किसानों की घेराबंदी से एक नया अध्याय शुरू हो गया था। इस घेराबंदी से अवरुद्ध रास्तों से किसानों को हटाने के लिए दायर याचिका पर न्यायालय ने 17 दिसंबर को स्पष्ट कर दिया था कि सभी पक्षों को सुने बगैर कोई आदेश नहीं दिया जायेगा। हां, न्यायालय ने लंबित मामले में विभिन्न किसान यूनियनों को भी प्रतिवादी बनाने की अनुमति दी थी। न्यायालय ने 17 दिसंबर को किसानों के अहिंसक विरोध प्रदर्शन का अधिकार स्वीकार करते हुए सुझाव दिया था कि केन्द्र फिलहाल इन तीन विवादास्पद कानूनों पर अमल स्थगित कर दे क्योंकि वह इस गतिरोध को दूर करने के इरादे से कृषि विशेषज्ञों की एक ‘निष्पक्ष और स्वतंत्र’ समिति गठित करने पर विचार कर रहा है।


उच्चतम न्यायालय में पिछले साल मार्च से ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मुकदमों की सुनवाई हो रही है और मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए निकट भविष्य में प्रत्यक्ष सुनवाई की संभावना कम ही नजर आ रही है। इसके बावजूद, उम्मीद है कि न्यायालय महत्वपूर्ण तथा संवेनशील मुद्दों पर शीघ्र सुनवाई करके इन पर अपनी सुविचारित व्यवस्था देगा।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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जीवन बदलने वाले चमत्कारी शब्द ( दैनिक ट्रिब्यून)

रेनू सैनी


नया वर्ष दस्तक दे चुका है। जाने वाला वर्ष आम वर्षों से बेहद अलग रहा। कोरोना जैसी महामारी ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। 2020 को विदा करने के साथ ही हर व्यक्ति ने दिल से यही दुआ की कि वर्ष 2021 में विश्व कोरोना मुक्त हो जाए। लोग नव वर्ष के आगमन की खुशी में नये-नये संकल्प ले रहे हैं। कोई वजन कम करने का संकल्प ले रहा है, कोई सुबह जल्दी उठने का, कोई नियमित व्यायाम करने का तो कोई अच्छा पद प्राप्त करने का।


हालांकि यह भी सच है कि इनमें से कइयों के संकल्प नये साल के पन्द्रह दिन होते ही गायब होने लगेंगे और पहले की तरह ही दिनचर्या चलने लगेगी। आपने इस वर्ष क्या संकल्प लिया? अगर आपने इस वर्ष का संकल्प चुन लिया है तो बधाई, पर हां अपने उस संकल्प को कमज़ोर मत होने दीजिएगा, उसे पूरा कीजिएगा। आपके संकल्पों को पूरा करने में शब्दों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। तो चलिए जान लें कि किन शब्दों का प्रयोग करके अपने सपनों को पूरा करके नये साल को अधिक सफल बनाया जा सकता है।


कई बार लोग अपने सुझावों और आदेशों का पालन न होने पर बेहद कठोर रणनीति अपना लेते हैं। इसी कारण उनके शत्रु बनते देर नहीं लगती। शत्रु संकल्पों को पूरा करने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। इस साल कठोर बनने के बजाय शब्दों का प्रयोग कर लचीला बनना सीखें। सकारात्मक और रचनात्मक नीति हर विपरीत परिस्थिति को सहेज देती है। यह बेहद कारगर नीति है।


एक बार अलबामा यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध फुटबॉल कोच पॉल बियर ब्रायन्ट से पूछा गया कि चैम्पियन फुटबॉल टीम बनाने के लिए किस चीज की सबसे अधिक आवश्यकता होती है? उन्होंने कहा, ‘मैं अरकांसस का किसान हूं। मैंने यह सीख लिया है कि टीम को इकट्ठा कैसे रखा जाता है। किस तरह कुछ लोगों को ऊपर उठाया जाता है, बाकियों को कैसे शांत किया जाता है, जब तक कि आखिरकार उनके दिल एक सुर में न धड़कने लगें-एक टीम। मैं बस उन्हें तीन चीज करने के लिए कहता हूं :- अगर कोई चीज खराब हुई है, ‘तो मैंने की है।’ -अगर कोई चीज आधी अच्छी हुई है, तो हमने की है। -अगर कोई चीज सचमुच अच्छी हुई है, तो आपने की है।’ ब्रायन्ट का मानना था कि ये सचमुच शक्तिदायक शब्द हैं।


सकारात्मक शब्दों की ताकत को आज विश्व के कोने-कोने में जाना जाता है। यह बात वास्तव में सत्य है कि आप ब्रह्माण्ड से जो भी मांगोगे, वह आपको किसी भी तरह से मिलेगा। इसलिए शब्दों में सकारात्मकता, सच्चाई, निष्कपटता और मेहनत का झलकना जरूरी है। अटलांटा के एक डिपार्टमेंटल स्टोर में एक साइनबोर्ड लगा हुआ था। उस साइनबोर्ड में लिखा था :- अंग्रेजी भाषा के छह सबसे महत्वपूर्ण शब्द हैं : मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूं। पांच सबसे महत्वपूर्ण शब्द हैं : ‘आपने बेहतरीन काम किया है।’ चार सबसे महत्वपूर्ण शब्द हैं, ‘आपकी राय क्या है?’ तीन सबसे महत्वपूर्ण शब्द हैं, ‘अगर आप चाहें।’ दो सबसे महत्वपूर्ण शब्द, ‘आपको धन्यवाद।’ एक सबसे महत्वपूर्ण शब्द, ‘हम।’ सबसे कम महत्वपूर्ण शब्द, ‘मैं।’


सकारात्मक सोच में यदि लचीले शब्द डाल दिए जाएं तो फिर लोहा भी टूट जाता है। इसलिए अपने शब्दों पर गौर करें और उन्हें बदलने का प्रयत्न करें। यदि आपके शब्दों से लोग नाराज हो जाते हैं, आपके काम बिगड़ जाते हैं तो तुरंत लचीले शब्दों को अपने जीवन में लाने का प्रयत्न करें। हर स्थिति में मतभेद से कार्य बिगड़ जाते हैं, इसलिए मतभेद के बजाय सहमति एवं मन मिलाने का प्रयत्न करें। प्रतिरोध के बजाय खुले दिमाग वाला बनने का प्रयत्न करें। उपरोक्त एक से लेकर छह शब्द बेहद शक्तिशाली, खुली सोच वाले और सकारात्मक हैं। इनका प्रयोग करना आरंभ करें। कुछ ही समय बाद आपको यह ज्ञात हो जाएगा कि ‘बिना टूटे झुकने’ और ‘बिना हारे प्रेम करने’ का क्या अर्थ होता है। एक फ्रांसीसी सूक्ति है कि ‘महत्वपूर्ण यह नहीं है कि आप क्या कहते हैं, महत्वपूर्ण तो यह है कि आप किस तरह कहते हैं।’


आप जिन शब्दों को लगातार बोलते हैं, वही आपकी किस्मत बनाते या बिगाड़ते हैं। किस्मत ऊपर से नहीं बनती बल्कि आपके शब्दों के चयन से बनती है। अनेक विवाद केवल शब्दों के हेर फेर से पनपते हैं और हैरानी की बात यह है कि अनेक विवादों का अंत भी केवल समझदारी भरे शब्दों का चयन करके ही किया जा सकता है। समझदारी भरे छह शब्द आपके सामने हैं। आप इस नव वर्ष पर उनका प्रयोग करने की आदत डालें। धीरे-धीरे ये शब्द कुछ ही समय में आपकी किस्मत, व्यक्तित्व, कामयाबी सबको बदल देंगे।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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अब ज़िंदगी की लय को गतिमान कीजिए ( दैनिक ट्रिब्यून)

सुरेश सेठ


बीते वर्ष में एक ही दृढ़ता पूरे देश ने दिखाई कि कोरोना की महामारी के भीषण प्रकोप में न आत्मबल टूटा, न जूझने की भावना। यही जिजीविषा अब नये वर्ष में हमें दिखानी होगी। किसान आंदोलन से संतुष्ट करके धरती-पुत्र अपने खेतों को लौटें और गिरावट की राह पर चलता हुआ उद्योग और व्यवसाय क्षेत्र बल पकड़े, यही इस नये वर्ष की जिजीविषा की भावना होनी चाहिए। उम्मीद है कि देशभर में कोरोना से मुकाबले के लिए एक अभूतपूर्व टीकाकरण अभियान चलाया जा सकेगा ताकि जिंदगी अपने सामान्य धरातल पर आ सके।


यह विलोम बात है कि ब्रिटेन से नये स्ट्रेन वाला कोरोना भी विश्व के आठ देशों के साथ भारत में दस्तक दे रहा है। भारत में उतरे ब्रिटेन से आए कुछ यात्रियों में इसके चिन्ह पाए गए हैं लेकिन इस बात की दिलासा ले लें कि अब टीका आ गया है, जो परिचित कोरोना वायरस और उसके नये तेवर पर भी प्रभावी होगा और इस तरह देश खुलेगा, और नये वर्ष में एक नयी कार्य संस्कृति का जन्म होगा। भारत में न मांग की कमी है और न मेहनत की पर इस सुषुप्त मांग को जागृत करना है। मेहनत का उचित इस्तेमाल करना है।


इस समय स्थिति यह है कि चाहे शेयर बाजार ने, कोरोना के टीके की आमद से सामान्य जिंदगी हो जाने की उम्मीद में, फिर शिखर छू लिया है लेकिन आम निवेशक हतोत्साहित है। बाजार बेजार हैं और पूंजी अभी भी देश के नये निवेश स्थलों में आने से हिचकिचा रही है। इसलिए अब एक अजब जिजीविषा के साथ देश का हर नागरिक आगे बढ़े। नये वर्ष में पुराने आर्थिक रोग खत्म हो जाएं। विकास दर बढ़ेगी और इसके लिए सरकार, समाज और जनता को अतिरिक्त प्रयास करना होगा। यू.एन. की रिपोर्ट में कहा है कि दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी एशिया विकास के प्रति बहुत लचीला है, इसलिए अगले वर्ष में भारत का विदेशी निवेश घटने के स्थान पर फिर बढ़ने लगेगा और अब इसके 20 प्रतिशत तक बढ़ने की उम्मीद है।


लेकिन यह भी सच है कि इसके साथ पिछले साल की लम्बी कोरोना पीड़ित अवधि में बेरोजगारी की दर बुलंदियों को छूने लगी। इसलिए अब नये वर्ष में केवल उत्पादन बढ़ाने से ही बात नहीं बनेगी, उपभोग या मांग को भी बढ़ाना होगा। तब अर्थव्यवस्था कोविड पूर्व दिनों में आ सकेगी जब लॉकडाउन नहीं हुआ था। इस लॉकडाउन में करोड़ों लोगों ने अपना रोजगार और जीने का सहारा खो दिया। इसीलिए अब आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना का नारा नये वर्ष में दिया गया है। सरकार ने घोषणा की है कि जून तक 50-60 लाख नयी नौकरियां औपचारिक क्षेत्र में पैदा कर दी जाएंगी। यह एक सही घोषणा है लेकिन इसके साथ ही अर्थशास्त्रियों का एक सुझाव भी है कि 140 करोड़ लोगों में सीधे 5000 रुपये तक के कैश वाउचर प्रति व्यक्ति बांट दिए जाएं और इससे पैदा होने वाले घाटे के बजट को 7 प्रतिशत ब्याज वाले 30 वर्षीय बांड्स को इश्यू करके पूरा किया जाए। इससे मांग सीधे बढ़ जाएगी।


लेकिन अगर यह न भी हो सके तो आम आदमी के रोजगार और आय के प्रति एक उदार दृष्टिकोण अपनाकर मांग बढ़ाई जा सकती है। सरकार की नीति यह होनी चाहिए कि किसानों को संतुष्ट करने के साथ सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को भी आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए ताकि इस नये वर्ष में बेकारों को रोजगार मिले और छोटे उद्यमियों को कमाई। नये वर्ष की चुनौतियों के लिए जूझने के वास्ते एक नये दृष्टिबोध का विकास भी हो।


नया वर्ष शुरू हो गया। आम आदमी, निवेशक और उद्यमी और व्यवसायी अभी तक कोविड के सदमे से बाहर नहीं आए। कोविड के नये स्ट्रेन ने उन्हें और भी डरा दिया है। एक ही उम्मीद है कि कोरोना की दवाई मिल गई है, जो शीघ्र ही भारतीय अर्थव्यवस्था को निर्बाध गति से बढ़ने का मौका देगी। देश का माहौल सामान्य हो जाएगा। लेकिन सबसे पहला प्रश्न यह है कि अगर हम तरक्की के रास्ते पर चल निकलते हैं तो क्या उखड़ी हुई श्रम शक्ति जो अब नगरों से गांवों की ओर पनाह लेने के लिए चली गई है, वापस आ जाएगी या उसे समय लगेगा? क्योंकि इस श्रम शक्ति को उनके गांव-घरों के आसपास कृषि आधारित छोटे उद्योगों में खपा दिया जाए, यह एक लम्बे समय की कार्ययोजना हो सकती है, तात्कालिक नहीं। फिलहाल नये वर्ष का विजन यह होना चाहिए कि देश में जहां जो अवरुद्ध है, उसे फिर से गतिमान किया जाए। इसके लिए आर्थिक उदारता के साथ-साथ सरकारी प्रोत्साहन की बहुत आवश्यकता है। यह प्रोत्साहन उचित कर छूटों और उत्साही अनुदान राहतों से पैदा किया जा सकता है।


इस समय कोरोना वायरस के प्रभाव के कारण भारत के उत्पादकों के लिए बेचने की अंतर्राष्ट्रीय मंडियां सिकुड़ गई हैं और उत्पादन की प्राथमिकताएं भी बदल रही हैं। सामान्य जिंदगी को उचित पटरी पर लाने के लिए सबसे पहले तो भारत के आम आदमी के लिए रोजी-रोटी की उचित व्यवस्था करनी होगी। मंदी के बादल तो कोविड महामारी से पहले ही देश पर छाने लगे थे। इसलिए निवेशकों, उत्पादकों और किसानों का भरोसा उचित पूंजी आपूर्ति के साथ फिर से अर्थतंत्र के कारगर हो जाने में पैदा हो। जो क्षेत्र बंद पड़े हैं, उन्हें फिर से खोलना है। पर्यटन क्षेत्र, मनोरंजन क्षेत्र और उसके अंतर्गत चलने वाले सिनेमा, होटल, रेस्तरां फिर से अपनी लय में चलने लगें और साथ ही साथ नौजवानों में उच्छृंखलता और अवसाद को कम करने के लिए उन्हें फिर से शिक्षा की सार्थकता से आश्वस्त किया जाए।


जल्दी से जल्दी देश के शिक्षालयों को खोला जाए और नौजवानों की शक्ति के इस्तेमाल के सब उत्पादक रास्ते फिर शुरू हों। बेशक पिछले वर्ष की कोरोना महामारी ने देश के आर्थिक और सामाजिक मानचित्र को बदल दिया है। कीमतों ने अकल्पनीय ऊंचाइयों को छुआ है। बेकारी ने भी अपनी हदें पार कर दी हैं। जितनी जल्दी नये वर्ष में जिंदगी सामान्य हो सके, उतनी जल्दी भारत की अर्थव्यवस्था पर जो कुठाराघात हुआ है, उससे उभरा जा सकता है। इस दिशा में प्रधानमंत्री के दो नये नारे देश का आत्मनिर्भर बनना और दवाई के साथ कड़ाई भी बहुत कारगर हो सकते हैं लेकिन देखना होगा कि यह केवल नारे ही न रह जाएं।


लेखक साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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सब्सिडी, सब सीढ़ी और किसान ( दैनिक ट्रिब्यून)

रमेश जोशी


चाय का गिलास उठाते हुए तोताराम बोला— मास्टर, तू है बड़ा कंजूस। इस समय दिल्ली के बोर्डरों पर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि अलग-अलग राज्यों से आए हुए किसान बिना किसी जाति-धर्म के भेदभाव के सबको चाय के साथ आलू-गोभी के पकोड़े खिला-खा रहे हैं। कह रहे हैं मोदी जी आएंगे तो उन्हें भी खिलाएंगे लंगर। गुरु के बन्दे हैं बड़े दिलवाले।


हमने कहा— मोदी जी ने एक बार ‘पकोड़ा-प्रोफेशन’ की चर्चा भी तो की थी। यदि इन्हें खुद को ही पकोड़े खाने होते तो इस सर्दी में घर छोड़कर क्यों आते? वहीं रजाई में घुसे-घुसे ही खा लेते। लगता है दिल्ली में पकोड़ों का मार्किट तलाशने आए हैं। तेरे ख्याल से इनके दिल्ली आने का क्या कारण हो सकता है ?


बोला— ये सब्सिडी के लिए आए हैं।


हमने कहा—सबको सीढ़ी नहीं मिल सकती। कुछ ही भाग्यशाली लोग होते हैं, जिनको मिल जाती है। वे छत पर पहुंचते ही सीढ़ी को निर्देशक मंडल में बैठा देते हैं, मतलब बरामदे में रखवा देते हैं ताकि कोई और छत पर न आ सके। रावण ने भी सोचा था, आकाश को सीढ़ी लगा दूंगा लेकिन संभव नहीं हुआ।


बोला—या तो तेरी अंग्रेजी कमजोर या फिर मोबाइल पर बात करते-करते कान ख़राब हो गए हैं। मैं ‘सब सीढ़ी’ नहीं ‘सब्सिडी’ कह रहा हूं। इसका मतलब होता है—सहायता, समर्थन। वह मदद, जिससे व्यक्ति किसी काम को घाटा उठाये बिना चालू रख सके।


हमने कहा— एक ही बात है। हमारी देवनागरी लिपि एक सम्पूर्ण और वैज्ञानिक लिपि है, रोमन में ‘ढ़’ लिख सकने की क्षमता नहीं है इसलिए वे ‘ढ़ी’ की जगह ‘डी’ लिखते और बोलते हैं। अर्थ और भाव में कोई अंतर नहीं है। दोनों ही प्राप्त करने वाले को ऊंचा उठा देते हैं। जैसे संसद में ‘माननीयों’ को खाने में सब्सिडी दी जाती है। परिवार सहित आजीवन मुफ्त चिकित्सा, यात्रा सुविधा, पद पर रहते हुए आय कर नहीं लगता, मकान, बिजली, पानी मुफ्त। किसान तो केवल अपने उत्पाद पर ही थोड़ी सी मेहनत की कमाई चाहता है। मुफ्त कुछ नहीं चाहता।


बोला—यह तो किसान की अनुचित मांग है। राम, कृष्ण, शक, हूण, मुग़ल, अंग्रेज, फ्रांसीसी, पुर्तगाली किसी के ज़माने में सब्सिडी का ज़िक्र नहीं मिलता। यह सब देश के नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी द्वारा 1966 में लागू ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ की कांग्रेसी खुराफात है। इसने किसानों की आदत ख़राब कर दी। अनाप-शनाप अनाज उपजा कर हमारे सिर आकर खड़े हो जाते हैं। लो, खरीदो। अरे, भाई अनाज ही खरीदते रहेंगे क्या?


बड़े भाग सत्ता-धन पावा


सब्सिडी में व्यर्थ नसावा।


कुछ ढंग का काम भी करने दोगे या नहीं?


हमने कहा—अन्न को तो ब्रह्म कहा गया है। उसके बिना तो जीवन ही संभव नहीं। इससे ज्यादा ढंग का काम और क्या हो सकता है?


बोला—बस, भकोसते रहो रोटियां ही रोटियां। अरे, किसी में अकल हो, समझ हो और बड़ा दिल हो तो बहुत से काम हैं जैसे विश्व की सबसे ऊंची मूर्तियों और लाखों दीयों का रिकार्ड बनाना और रफाल, रोमियो हेलीकॉप्टर खरीदना, बुलेट ट्रेन शुरू करना, संसद का नया भवन बनवाना, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए साढ़े आठ हजार करोड़ के अमेरिका के राष्ट्रपति जैसे दो बोइंग 777 विमान खरीदना आदि।


जनता की मत सुनो इसे तो ऐसे ही रोने-धोने की आदत है। थोड़ी देर में चुप हो जाएगी। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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ऐसे तो इक्कीस न बनना भाई ( दैनिक ट्रिब्यून)

सहीराम

इक्कीसजी आपका स्वागत है। अगर स्वागत नहीं भी होता तो भी आप पधार ही जाते। भाई आप समय हैं। आप किसी के रोके थोड़े ही रुकने वाले हैं कि किसी ने बैरीकेड खड़े कर दिए, पानी की बौछार कर दी, लाठीचार्ज कर दिया, तमाम नकारात्मक विश्लेषण देकर बदनाम कर दिया और आप रुक गए। आपको तो आना ही था। रुके तो खैर किसान भी नहीं, जिनके खिलाफ यह सब किया गया, कहा गया। वे भी दिल्ली पहुंच ही गए और सीमाओं पर आकर डट गए।


लेकिन जिस कड़कड़ाती ठंड में, शीत लहर में वे खुले आसमान के नीचे बैठे हैं, उन पर तुम सरकार की तरह बेरुखी दिखाना। हालांकि, तुम कोई सरकार नहीं हो कि तुम से शिकायत की जाए कि भैया उनका पिज्जा तो तुम्हें दिख गया, उनकी रजाइयां तो तुम्हें दिख गयीं, लंगर का भोज तो तुम्हें दिख गया, पर कड़कड़ाती ठंड में किसानों की मौत क्यों न दिखी, आत्महत्या का दर्द क्यों न दिखा, जमीन छिन जाने पर उनका शंकामय भविष्य क्यों न दिखा। सरकार कहती है कि वह संवेदनशील है। खैर, इतने संवेदनशील तुम न बनना कि कहने लगो कि ठंड में ठिठुरना तो उनका शौक है।


भैया तुम इक्कीस हो तो ऐसा इक्कीस न बनना कि जैसे बीस ने जुल्म ढाए कि उससे भी इक्कीस जुल्म तुम ढहाने लगो। वे जुल्म तुम्हें याद दिलाना उचित रहेगा जो बीस ने लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों ने झेले। बेचारे पुलिस की दाब-धौंस, मारपीट और अपमान सहते हुए सैकड़ों मील पैदल चलते गांवों में पहुंच थे। मकान मालिक से लेकर पुलिस तथा अधिकारी तक उन्हें दुत्कार रहे थे, जब अच्छे भले खाने-कमाने वाले लोग कतारों में खाना मांगकर खा रहे थे। ऐसा जुल्म करने में कहीं इक्कीस मत बन जाना। और भैया तुम सरकार की तरह आपदा को अवसर में बदलने की कोशिश भी मत करना। वैसे भी न तो तुम्हें सरकारी कंपनियां बेचनी हैं, न मालिकों के हक में मजदूरों का पक्ष लेने वाले कानून बदलने हैं, न निजीकरण करना है और न ही किसानों का खेती-किसानी से मोह भंग करवाने का तुम्हारा कोई इरादा होगा क्योंकि तुम कोई सरकार नहीं हो।


फिर भी यह गुजारिश करना उचित रहेगा कि मजदूरों को ऐसी स्थिति में मत डालना कि उन्हें पेट भरने के लिए आठ की बजाय बारह घंटे काम करना पड़े, किसानों को अपने हकों के लिए महीनों तक ठंड के बावजूद सड़कों पर सोना पड़े, युवाओं को बेरोजगार रहना पड़े, छात्रों से इतनी ज्यादा फीस वसूली जाए कि वे पढ़ाई छोड़ने को ही मजबूर हो जाएं। तुम इक्कीस हो तो स्नेहशील माता-पिता जैसे इक्कीस होना, कल्याणकारी राज की तरह इक्कीस होना और गरीब को पालने वाले ईश्वर की तरह इक्कीस होना।

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सहमति को तार्किक परिणति तक ले जाना जरूरी ( दैनिक ट्रिब्यून)

 कृष्ण प्रताप सिंह


शुक्र है कि लम्बे गतिरोध के बाद गत बुधवार को किसानों और केन्द्र सरकार के बीच शुरू हुई वार्ता फिर से गतिरोध की शिकार नहीं हुई और किसी भी पक्ष ने उसके नतीजों को लेकर असंतोष नहीं जताया। सरकार की मानें तो पांच घंटे से ज्यादा चली इस वार्ता में उसने इलेक्ट्रीसिटी अमेंडमेंट बिल और पराली जलाने पर भारी जुर्माने के कानून को लेकर किसानों के असंतोष का शमन कर उनके साथ सहमति बनाने का आधा रास्ता तय कर लिया है। इसके विपरीत कई किसान नेताओं का कहना है कि अभी तो विवाद के हाथी की पूंछ भर बाहर निकली है और उसके भीमकाय शरीर का निकलना बाकी है।


दूसरी ओर स्वतंत्र प्रेक्षक कह रहे हैं कि सरकार जिसे पचास प्रतिशत सहमति बता रही है, उसकी असली परीक्षा आगामी चार जनवरी को ही होगी, जब दोनों पक्ष किसानों के लिए परेशानकुन तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने व न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी देने के मुद्दों पर बात करेंगे। अभी सरकार न ताे न्यूनतम समर्थन मूल्य का कानून बनाने को राजी दिखाई दे रही है, न उक्त कृषि कानूनों को वापस लेने को ही, जबकि किसानों का कहना है कि वे उन्हें वापस लेने के तरीकों पर ही बात करेंगे और महज कुछ संशोधनों के सरकार के प्रस्ताव को मानकर अपना आन्दोलन खत्म नहीं करेंगे। साफ है कि अभी दोनों पक्षों को लम्बा रास्ता तय करना है।


लेकिन इस सिलसिले में कम से कम इतनी अच्छी बात तो हुई ही है कि सरकार ने थोड़ा लचीला रुख प्रदर्शित किया है, जिससे दोनों पक्षों के बीच विभिन्न कारणों से जमी आ रही अविश्वास की बर्फ थोड़ी पिघली है। वार्ता के इससे पहले के दौर में खिन्न किसानों ने सरकार का भोजन स्वीकार करने से साफ-साफ इनकार कर दिया था, लेकिन इस बार उन्होंने न सिर्फ अपने भोजन में सरकारी वार्ताकारों को शामिल किया, बल्कि खुद भी सरकार की चाय पी। इतना ही नहीं, अपना प्रस्तावित ट्रैक्टर मार्च भी वार्ता के अगले दौर तक के लिए स्थगित कर दिया है। लेकिन अभी बात ‘वेल बिगिन इज हॉफ डन’ की स्थिति में है और उम्मीद बनी हुई है कि जो बात अभी ‘न पूरी तरह बनी और न बिगड़ी’ की हालत में है, चार जनवरी को पूरी तरह बन जायेगी।


प्रसंगवश, बुधवार की वार्ता के लिए किसानों ने अपना एजेंडा पहले ही तय कर दिया था ताकि सरकार के लिए बहुत इधर-उधर करके उसे निरर्थक करने की गुंजाइश बचे ही नहीं। उनके एजेंडे के अनुसार सरकार पर्यावरण सम्बन्धी कानून औऱ बिजली बिल को लेकर उनकी बात मानने को पूरी तरह तैयार हो गई है, तो न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर अपना रुख थोड़ा नरम किया है। अब सारा पेच इसी पर फंसा है कि सरकार विवादित कृषि कानूनों को वापस नहीं लेना चाहती। हां, उसका यह प्रस्ताव अपनी जगह है कि किसानों की इस सम्बन्धी मांग पर विचार के लिए एक समिति बना दी जाये। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी ऐसी एक समिति बनाने की बात कही गई थी और सरकार को सुझाया गया था कि उस समिति की सिफारिशों के आने तक इन कानूनों पर अमल रोक दे। लेकिन सरकार ने ऐसा करना गवारा नहीं किया। ऐसे में चार जनवरी की वार्ता का नतीजा स्वाभाविक ही इसी पर निर्भर करेगा कि किसानों के साथ सौहार्द का जो वातावरण बना है, उसे पूर्ण विश्वास तक पहुंचाने के लिए सरकार अपना अड़ियल रवैया छोड़ने तैयार होगी या नहीं?


नहीं तैयार होगी तो यही माना जायेगा कि वह वार्ता नहीं कर रही, समय बिताने और आन्दोलित किसानों को थकाने व उनका हौसला तोड़ने की चालाकी बरत रही है। ऐसा करके वह यही सिद्ध करेगी कि उनका दिन-रात राजधानी की सड़कों पर बैठे रहना विरोधी दलों की राजनीति से प्रेरित या कि उनका शगल है।


उसके पास मौका है कि वह आगे उनकी क्षमता को नजरअंदाज करने की गलती न दोहराये और समझे कि उनकी मांगों को मानकर वह न उनसे छोटी हो जायेगी, न उनके सामने झुकी हुई दिखेगी और न प्रधानमंत्री का इकबाल कम होगा, जिसका उनके कई ‘शुभचिन्तक’ अंदेशा जता रहे हैं। इसके उलट किसानों की मांगें मानने का अर्थ होगा कि सरकार ने देश के अन्नदाताओं का सम्मान करते हुए वह गलती सुधार ली, जो उनसे पूछे बिना उनकी तथाकथित बेहतरी के नाम पर तीन कानून बनाकर की थी।


मध्य प्रदेश में एक कॉरपोरेट कंपनी ने 22 किसानों के साथ दो करोड़ का करार कर उन्हें जो चेक दिया, वह बाउंस हो गया। ऐसे में केन्द्र सरकार से पूछा ही जाना चाहिए कि क्या वह इसकी गारंटी दे सकती है कि इन कानूनों के रहते किसानों से ऐसी ठगी आगे नहीं होगी? अगर नहीं तो वह किसानों से उनका रहा-सहा सुरक्षा चक्र भी क्यों छीन रही है? बेहतर होगा कि चार जनवरी की वार्ता में वह मेज के उस तरफ आकर निर्णय ले, जहां से किसानों की मुश्किलें, एतराज और नजरिया उसे साफ समझ आए।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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दूरगामी रणनीति ( दैनिक ट्रिब्यून)

कोरोना संकट से त्रस्त दुनिया को महामारी से उबारने के साथ ही उन उपायों को करने की भी जरूरत है जो भविष्य में किसी भी ऐसी नयी चुनौती से मुकाबले के लिये स्थायी तंत्र उपलब्ध करा सके। सवाल सिर्फ कोरोना का ही नहीं है, भविष्य में आने वाली नयी महामारियों का भी है। मौजूदा संकट से सबक लेकर भविष्य की रणनीति तैयार करने की जरूरत है। बीते रविवार जिनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन की बैठक में डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अधनोम ने दुनिया के देशों से आह्वान किया कि हमें भविष्य की महामारियों के मुकाबले तथा दुनिया को स्वस्थ बनाने के लिये सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में अधिक से अधिक निवेश करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इतिहास बताता है कि यह पहली महामारी नहीं होगी। महामारी हमारे जीवन का सत्य तथ्य है। उन्होंने कहा कि साल में एक दिन ऐसा होना चाहिए, जिसमें हम भविष्य की महामारियों से निपटने के प्रयासों पर चिंतन करें। निस्संदेह मौजूदा संकट से सबक लेकर हमें भविष्य की रणनीतियां तैयार करनी चाहिए, जिसमें सरकारों व समाज की रचनात्मक भूमिका हो सकती है। हमें यह सुनिश्चित करना है कि हमारी आने वाली पीढ़ी ऐसी महामारियों का मुकाबला करने में सक्षम बने। बच्चों को एक सुरक्षित दुनिया विरासत में मिले। डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने बताया कि महामारी रोकने और उससे जुड़ी तैयारी के महत्व को रेखांकित करने हेतु वर्ष में एक दिवस जागरूकता के लिये निर्धारित किया गया है, जिसमें मानवता के कल्याण से जुड़े विमर्श में दुनिया के सभी देशों की भागीदारी होगी। इसी मकसद से संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी कहा कि दुनिया में सत्रह लाख से अधिक लोगों की मौत के साथ ही दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाएं तबाह हो चुकी हैं, जिसने आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर बनाने की जरूरत बतायी है। 


डब्ल्यूएचओ की इस बैठक में कहा गया है कि मौजूदा संकट से मुकाबले के लिये पैसा पानी की तरह बहाने के बजाय स्थायी व दूरगामी नीतियों पर बल दिया जाना चाहिए। एक स्थायी तंत्र विकसित होना चाहिए जो भविष्य की आपदाओं को समय रहते नियंत्रित करने में सहायक हो। निस्संदेह यह अंतिम महामारी नहीं है, भविष्य में ऐसी चुनौतियां नये रूप में हमारे सामने आ सकती हैं।  मानव को उन कारकों पर भी विचार करना होगा जो महामारी के विस्तार को आधारभूमि उपलब्ध कराती हैं। यह संकट हमारे लिये चुनौती के साथ एक बड़ा सबक भी है जो हमारे खानपान-जीवन व्यवहार तथा आर्थिक नीतियों के निर्धारण से जुड़े पहलुओं पर प्रकाश डालता है। मनुष्य के साथ ही वन्यजीवों के कल्याण तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के प्रयासों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। दरअसल, इनके प्रभावों से मानव स्वास्थ्य भी जुड़ा है। स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों को समग्र दृष्टि से देखने की जरूरत है। यदि हम सिर्फ एक महामारी पर तमाम पैसा बहा देंगे तो अन्य रोगों से लड़ने की हमारी तैयारी बाधित होगी। इस दौर में दुनिया में अशांति व अस्थिरता से जूझ रहे देशों में महिलाओं व बच्चों के टीकाकरण के कार्यक्रम बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। संकट ने इस लड़ाई को कमजोर किया है। अभी इन इलाकों में कोरोना वैक्सीन लगाने का अभियान भी चलाया जाना है। लंबे समय से भय व असुरक्षा के माहौल में जी रही दुनिया के जीवन को सामान्य बनाने के लिये ऐसे ही रचनात्मक अभियान चलाये जाने की जरूरत है।  निस्संदेह कोरोना काल के अनुभव हमें भविष्य की ऐसी चुनौतियों से मुकाबले के लिये आधारभूमि उपलब्ध करायेंगे। विडंबना यह है कि हम एक महामारी के खत्म होते ही ऐसी नयी चुनौती के बारे में सोचना छोड़ देते हैं जो एक अदूरदर्शी सोच है। दरअसल, कोई भी महामारी मनुष्य के स्वास्थ्य, जीवों तथा धरती के अंतरंग रिश्तों के  असंतुलन को भी उजागर करती है। कुल मिलाकर प्रकृति से बेहतर रिश्ते बनाने की जरूरत है। यह धरती को रहने लायक बनाने के लिये अनिवार्य शर्त भी है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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ठंड की तल्खी ( दैनिक ट्रिब्यून)

अब इसे ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों का असर कहें या मौसम की तल्खी कि रक्त जमाती सर्दी ने कहर बरपाना शुरू कर दिया है। पहाड़ी इलाके बर्फ की सफेद चादर में लिपटे हैं, पारा ऋणात्मक हुआ है, वहीं मैदानी इलाके भीषण शीतलहर की चपेट में हैं। पारा लुढ़कने की स्थिति में मैदानी इलाके कांप रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा गरीब तबके पर इसकी मार पड़ रही है। मौसम विभाग के मानकों में मैदानी इलाकों की भीषण ठंड का निर्धारण न्यूनतम तापमान के दस डिग्री से नीचे जाने तथा अधिकतम तापमान में साढ़े छह डिग्री सेल्सियस तक की गिरावट दर्ज होने पर होता है। उत्तर भारत में दिल्ली, हरियाणा-पंजाब तथा राजस्थान के कुछ इलाकों में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। दरअसल, तापमान में यह असमान्य गिरावट सेहत के लिये घातक मानी जाती है, जिसके अनुरूप शरीर को ढलने में वक्त लगता है। कोरोना संकट में यह स्थिति चिंताजनक है। साथ ही अन्य वायरसों के प्रसार का खतरा भी बढ़ जाता है। दरअसल, तापमान में अप्रत्याशित गिरावट से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से वायरसों का संक्रमण शरीर में तेजी से होता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि बूढ़े-बुजर्गों तथा बीमार लोगों का खास ध्यान रखा जाये। विषम स्थिति में एक अभिभावक होने के नाते लंबे समय से खुले आसमान तले आंदोलनरत किसानों के बारे में भी सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए।

निस्संदेह, पर्वतीय इलाकों में बर्फबारी के बाद मैदानी इलाकों में शीतलहर सामान्य घटना है, लेकिन इस बार मौसम के व्यवहार में अप्रत्याशित परिवर्तन देखने को मिल रहा। जहां एक ओर तापमान में गिरावट असमान है वहीं असामान्य भी है। तापमान तेजी से गोता लगा रहा है। तापमान में गिरावट के रिकॉर्ड बन रहे हैं। एक ओर सर्द हवाएं जन-जीवन में कर्फ्यू लगा रही हैं, वहीं कोहरे के चलते यातायात बाधित है। चुनौती कोरोना संकट के कारण बड़ी है। बड़ी संख्या में रैन-बसेरे बनाये जाने की जरूरत है क्योंकि सोशल डिस्टेंसिंग का भी ख्याल रखना है। आम तौर पर बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन व अस्पताल के पास रैन-बसेरे बनाये जाते थे। लेकिन ये स्थान पूरी तरह खुले नहीं है, अत: गरीब लोग कम नजर आ रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि गरीबी कम हो गई है। उनका दायरा बड़ा हो गया है। उनकी देखभाल हेतु स्थानीय प्रशासन व निकायों को आगे आना होगा। उनका संवेदनशील व्यवहार कई जानें बचा सकता है। समाज की भी कोशिश हो कि ठंड से पहले कोई भूख से न मरे। इस बीच मौसम विभाग ने ठंड की तीव्रता को देखते हुए चेतावनी जारी की है कि साल के अंतिम तीन दिनों में पश्चिमी विक्षोभ के कारण कंपाने वाली सर्दी पड़ेगी। ऐसे में नये साल के जश्न में शराब के सेवन से बचें क्योंकि शीतलहर से कई तरह के फ्लू फैल सकते हैं। इस दौरान शराब पीने से शरीर और ठंडा तथा जानलेवा हो सकता है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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आत्मघाती लापरवाही ( दैनिक ट्रिब्यून)

ऐसे वक्त में जब देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या और पीड़ितों की मौत के आंकड़ों में गिरावट दर्ज की जा रही थी, ब्रिटेन में कोरोना वायरस के रूप बदलने के घटनाक्रम ने हमारी चिंता बढ़ा दी है। चिंता की वजह यह है कि ब्रिटेन से आये तमाम लोग बिना कोरोना जांच के अपने गंतव्य स्थलों को निकल गये। अब सोया तंत्र उन लोगों की तलाश में लगा है जो ब्रिटेन से आने के बाद नहीं मिल रहे हैं। ये हर देशवासी की गहरी चिंता का विषय है क्योंकि ब्रिटेन में कोरोना वायरस के नये स्ट्रेन ने दुनिया को चौंकाया है। जो पहले वायरस के मुकाबले सत्तर फीसदी अधिक तेजी से फैलता है। हालांकि अभी कोई वैज्ञानिक अध्ययन सामने नहीं  आया है कि नया वायरस पहले की तुलना में कितना अधिक घातक है और इस पर वैक्सीन कितनी प्रभावी होगी। फिर भी हमारी चिंता का विषय यह है कि यदि ब्रिटेन से आये किसी व्यक्ति से यह संक्रमण भारत में फैलता है तो अब तक की सारी मेहनत पर पानी फिर जायेगा। भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में इस संक्रमण को रोक पाना बड़ी चुनौती है। भारत में जनसंख्या का घनत्व ब्रिटेन समेत अन्य देशों के मुकाबले बहुत ज्यादा है जो संक्रमण के तेजी से फैलने की जमीन तैयार करता है। इसके बावजूद प्रवासी भारतीयों के देश लौटने पर बरती गई लापरवाही हमारे तंत्र की कोताही को भी उजागर करती है, जो सांप निकलने के बाद लाठी पीटने की संस्कृति में रमा हुआ है। ब्रिटेन में कोरोना वायरस के नये स्ट्रेन के सामने आने की बात काफी समय से अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में तैर रही थी। ब्रिटेन ने भी इस महामारी के विस्तार की बात को कुछ विलंब से स्वीकार किया। लेकिन हमारे नीति-नियंता बेसुध रहे। जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत अन्य लोग ब्रिटेन से आने वाली फ्लाइटों पर रोक लगाने की मांग करने लगे, तब जाकर इस बाबत फैसला लिया गया। तब तक देर हो चुकी थी। 


निस्संदेह, एक नागरिक के रूप में भी हम समाज के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन में चूकते हैं। बहुत संभव है कि ब्रिटेन में सामने आया नया स्ट्रेन घातक हो सकता है। ऐसे में ब्रिटेन से आने वाले लोगों को ईमानदारी से सरकारी एजेंसियों को सूचित करना चाहिए था और वे कोरोना जांच के लिये आगे आते। लेकिन अब भी ऐसा नहीं हुआ और पहले भी ऐसा नहीं हुआ था। यह तथ्य सर्वविदित है कि चीन में संक्रमण फैलने के बाद वुहान से आने वाले देसी-विदेशी नागरिकों की जांच में लापरवाही बरती गई थी। यदि समय रहते कार्रवाई की गई होती तो शायद देश को इतनी बड़ी कीमत न चुकानी पड़ती। संक्रमितों का आंकड़ा एक करोड़ पार करना और मृतकों की संख्या एक लाख से ऊपर जाना इस आपराधिक लापरवाही की ही देन है। यूरोप व एशिया के कई देशों में शुरुआती दौर की सतर्कता से संक्रमण पर काबू पाने में सफलता पाई गई है। जिस देश में चिकित्सा तंत्र पहले ही चरमराया हो, वहां एक महामारी से जूझना बड़ी चुनौती साबित हुआ है। वहीं एक नागरिक के तौर पर हमारा गैर जिम्मेदाराना व्यवहार भी संक्रमण के विस्तार का कारक रहा है। विदेशों से आने वाले लोगों की चूक तो जगजाहिर रही है लेकिन देश में नागरिकों का आत्मकेंद्रित रवैया घातक साबित हुआ है जो बताता है कि सात दशक की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हम वह सोच पूर्णत: विकसित नहीं कर पाये हैं, जो सामाजिक सरोकारों के प्रति स्वत: स्फूर्त प्रतिबद्धता की ललक पैदा कर सके। देश में लॉकडाउन खुलने के बाद नागरिकों के सार्वजनिक व्यवहार में कोताही की बानगी लगातार नजर आ रही है। सार्वजनिक स्थलों में मास्क और शारीरिक दूरी की अनिवार्य शर्त टूटती नजर आ रही है। राजनीतिक रैलियों, रोड शो के अलावा विभिन्न संगठनों के आंदोलनों ने सार्वजनिक जीवन के अनुशासन को बार-बार भंग किया है। निस्संदेह तंत्र की सीमाएं और महामारी की चुनौती बड़ी है, मगर एक नागरिक के रूप में यदि हम अपनी जवाबदेही का ईमानदारी से पालन करें तो हम हर लड़ाई जीत सकते हैं।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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उम्मीदों का सवेरा ( दैनिक ट्रिब्यून)

फिर एक नये साल ने दस्तक दी है। यह समय का अनवरत चक्र है। महत्वपूर्ण यह है कि हमने बीते वक्त में विषम परिस्थितियों का कितने आत्मविश्वास के साथ मुकाबला किया और उनसे क्या सीखा। निस्संदेह, एक सदी के बाद दुनिया पर कहर बरपाती महामारी ने विकास का पहिया थाम दिया। जीवन पर संकट बड़ा था लेकिन इस संकट ने हमें जीवनशैली की विसंगतियों और कुदरत से इनसानी रिश्तों पर पुनर्विचार करने का अवसर भी दिया। यह भी बताया कि परमाणु शक्ति संपन्न और अंतरिक्ष विजय का दंभ पाले देशों को एक अदृश्य विषाणु ने लाचार कर दिया। महाशक्ति का दंभ भरने वाले देश इस विषाणु हमले में घुटनों पर आ गये लेकिन संकट के बाद ही नयी संरचना सामने आती है। जीवन की नयी कोंपलें उगती हैं। संकटों में तपकर इनसान मजबूत होता है। लेकिन इस संकट ने हमें हमारे खानपान, रहन-सहन और सामाजिक व्यवहार के कृत्रिम रूप का अहसास कराया। यह अहसास कराया कि बड़ी कोठी-बंगले और बड़ी-बड़ी कारों से बढ़कर जीवन में कुछ और भी महत्वपूर्ण है। यह भी कि जब सेहत का धन होता है तो बाकी धन बेकार हो जाते हैं। इस संकट में धनाढ्य लोग भी लाचार नजर आये। हमें इस मुश्किल समय को एक सबक के रूप में लेना चाहिए। पारिवारिक संस्था के महत्व को समझना चाहिए। हमें अपनी आवश्यकताओं की प्राथमिकता के बारे में सोचना चाहिए। इस दौरान विलासिता की चीजें और बाह्य आडंबर के तमाम साधन महज कागज के फूल ही साबित हुए। हमारी जीवनशैली से हासिल प्रतिरक्षा क्षमता ही मददगार बनी। इस चुनौती ने हमें बचत की महत्ता बतायी। यह बताया कि कैसे संकट के समय खून के रिश्ते भी विमुख हो जाते हैं और कैसे  अनजान व बेगाने लोग तारणहार बन जाते हैं। यह भी कि मुश्किल वक्त में अपना घर ही सब कुछ होता है। दशकों बाद यह समय आया जब परिवार के लोग सबसे अधिक समय साथ रह सके। एक-दूसरे को समझ सके।


ऐसा भी नहीं है कि यह संकट अंतिम है। आने वाले समय में हमें कई ऐसी चुनौतियों के लिये तैयार रहना चाहिए। यह संकट सरकारों के लिये भी सबक है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनायें। वहीं व्यक्ति के लिये सबक है कि जितना हो सके, प्रकृति के सान्निध्य में अपनी जीवनशैली विकसित करे। इस संकट में जब आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था असहाय नजर आई तो भारत की परंपरागत चिकित्सा प्रणाली जीवनदायिनी साबित हुई। योग और आयुर्वेद हमारा सुरक्षा कवच बना।  हमारी रसोई दवाखाना बनी। कैलेंडर का बदलना यह संदेश देता है कि बीते सबकों के आलोक में नये जीवन की शुरुआत की जाये। नये संकल्पों को हकीकत में बदलने का प्रयास करें। बीते वक्त पर मंथन करें और नये लक्ष्य निर्धारित करें। यह जानते हुए कि हर समय एक जैसा नहीं रहता। पहले वाला समय नहीं रहा तो यह भी नहीं रहेगा। कुदरत अपनी चाल चलती रहेगी। संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है बल्कि नये रूप में चुनौती दे रहा है। कुछ चीजें तो हमारे जीवन में हमेशा के लिये बदल जायेंगी। जिसे नये सिरे से सामान्य कहकर परिभाषित किया जायेगा। कुछ वर्जनाएं कुछ आने वाले वर्षों तक जीवन का हिस्सा बनी रहेंगी। जरूरत इस बात की होगी कि हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक रहे। जीवन में उल्लास व उमंग का अभाव न हो। कुछ बंदिशें हों मगर तीज-त्योहारों के देश में पर्व का उल्लास कम न हो। यह हमारी सोच पर निर्भर करता है। यदि हम हर परिस्थिति में सकारात्मक रहते हैं तो समस्या का समाधान भी जल्दी हो जाता है। संकट मनुष्य को मनुष्यता के दायित्वों का भी अहसास करा गया है। समाज के अंतिम व्यक्ति के अहसासों से जुड़ने के लिये प्रेरित कर गया है। मनुष्य व प्रकृति के रिश्तों को नये सिरे से परिभाषित करने का संदेश दे गया है कि प्रकृति के रौद्र के सामने आज भी इनसान बौना है। कुदरत से सामंजस्य व वन्यजीवों का संरक्षण हमारे सुखद जीवन की आधारशिला है। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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अभियान का पूर्वाभ्यास ( दैनिक ट्रिब्यून)

यह केंद्र सरकार की सार्थक पहल ही कही जायेगी कि किसी वैक्सीन को आपातकालीन उपयोग की अनुमति मिलने से पहले ही देश के विभिन्न भागों में इसे लगाने की तैयारी का पूर्वाभ्यास किया गया। निस्संदेह जब देश वैक्सीनेशन अभियान के करीब पहुंच ही गया है तो सघन आबादी वाले विशाल देश में इस अभियान से जुड़े तमाम पहलुओं का आकलन जरूरी हो जाता है। अच्छी बात है कि देश में कोरोना संक्रमण का ग्राफ लगातार गिर रहा है और मृत्यु दर में कमी आई है। लेकिन चूक की किसी भी गुंजाइश को नहीं स्वीकारा जा सकता। वह भी ऐसे वक्त में जब कोरोना वायरस ने रूप बदलकर ब्रिटेन व अन्य यूरोपीय देशों को फिर से भयभीत किया है। बहरहाल, वैक्सीन लगाने का पूर्वाभ्यास और उससे जुड़ी तैयारियों की निगरानी अच्छी पहल है, जिसके तहत देश के चार राज्यों के आठ जिलों में वैक्सीन लगाने की तैयारी का अभ्यास किया गया। निस्संदेह, इस दौरान जो खामियां नजर आएंगी, उनके निराकरण से आने वाले समय में टीकाकरण अभियान को सुचारु रूप से चलाने में मदद मिलेगी। भौगोलिक विविधताओं व भिन्न जनसंख्या घनत्व वाले देश में टीकाकरण अभियान बेहतर ढंग से चलाना बड़ी चुनौती है। यह सुखद है कि अभियान के लिये उत्तर से पंजाब, पूर्व से असम, दक्षिण से आंध्र तथा पश्चिम भारत से गुजरात के दो-दो जिलों का चयन किया गया है। यूं तो भारत ने पोलियो समेत कई टीकाकरण अभियानों को सफलतापूर्वक चलाया है और इसके लिये कारगर तंत्र विकसित किया है  लेकिन एक शताब्दी के बाद आयी कोरोना जैसी महामारी एक नयी चुनौती है, जिसके लिये एक कारगर तंत्र बेहद जरूरी है, जबकि देश का सार्वजनिक चिकित्सा तंत्र खस्ताहाल में है, जिसकी बानगी कोरोना से लड़ाई के दौरान सामने आई। निस्संदेह, यह करोड़ों जिंदगियां बचाने का प्रश्न भी है। वैक्सीन के अनुकूल वातावरण-तापमान उपलब्ध कराने के साथ ही उसका न्यायसंगत वितरण भी जरूरी है।


निस्संदेह इस अभियान को तार्किक परिणति तक पहुंचाने हेतु चिकित्सा-पुलिस विभाग के साथ ही जिला प्रशासन व कई अन्य विभागों से बेहतर तालमेल जरूरी है, जिसमें फ्रंट लाइन वर्कर्स के अलावा नागरिकों का सहयोग भी जरूरी होगा। टीकाकरण में कौन-सी बाधाएं आ सकती हैं और उनसे कैसे निपटा जायेगा, इसका अभ्यास जरूरी था। खासकर देश के पिछड़े इलाकों में जहां चिकित्सा तंत्र कमजोर है वहां विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इसमें वैक्सीन के अनुकूल तापमान में भंडारण की अपरिहार्य शर्त भी शामिल है। जिसके लिये पर्याप्त प्रशिक्षण वैक्सीन संग्रहण करने व लगाने वाले लोगों को दिया जाना भी जरूरी है ताकि जब वैक्सीन के आपातकालीन उपयोग को मंजूरी मिले तो तुरंत लोगों को इसका लाभ मिल सके। इसमें राज्य सरकारों की भी सक्रिय भागीदारी जरूरी है। जैसा कि कहा जा रहा है कि पहले चरण में तीस करोड़ लोगों को वैक्सीन दी जायेगी, जिसमें तीन करोड़ सुरक्षाकर्मी तथा स्वास्थ्यकर्मी व कम रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले बीमार तथा पचास वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति के शामिल होंगे। लेकिन इस अभियान से जुड़े भ्रमों को भी दूर करना होगा क्योंकि कई राज्य मुफ्त में वैक्सीन देने की बात कर रहे हैं। इस बीच चिंता की बात यह है कि ब्रिटेन में सामने आया वायरस का नया स्ट्रैन भारत में दस्तक दे चुका है। तंत्र की चूक से ब्रिटेन से भारत आये छह लोगों में नये संक्रमण के वाहक वायरस पाये गये हैं। एक बार हम फिर चूके हैं। ब्रिटेन में कोरोना वायरस के नये वैरियंट मिलने को हमने गंभीरता से नहीं लिया। नये स्ट्रैन के अधिक संक्रामक होने के बाद हमें ब्रिटेन व यूरोप से आने वाले लोगों को लेकर अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए थी। एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन से नवंबर और दिसंबर के बीच कोई तैंतीस हजार लोग भारत आये, जिनमें सौ से अधिक लोग कोरोना संक्रमित पाये गये। नये स्ट्रैन से संक्रमित लोगों को अलग रखा गया है और उनके संपर्क में आये लोगों को क्वारंटीन किया गया है। ऐसे लोगों को पहले ही ट्रैक किया जाना चाहिए था। 

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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जीत की मिठास ( दैनिक ट्रिब्यून)

हाल ही में एडिलेड टेस्ट में भारतीय टेस्ट क्रिकेट इतिहास के न्यूनतम स्कोर पर धराशायी होने वाली टीम इतनी जल्दी हार से उबरकर आस्ट्रेलिया को उसकी तेज पिचों पर मात दे देगी, इसकी उम्मीद शायद क्रिकेट पंडितों को भी नहीं होगी। वह भी तब जब टीम के नियमित कप्तान विराट कोहली पारिवारिक कारणों से मैदान में नहीं थे और टीम के प्रमुख गेंदबाज मोहम्मद शमी चोटिल होने के कारण टीम से बाहर थे। शमी की ही तेज गेंदबाजी की बदौलत पिछली बार भारत ने विराट कोहली के नेतृत्व में आस्ट्रेलिया की जमीन पर शृंखला जीती थी। यह सुखद है कि अजिंक्य रहाणे की कप्तानी में उस टीम ने यह मैच शानदार ढंग से जीता जो एडिलेड टेस्ट में 36 रन पर सिमट गई थी। निस्संदेह रहाणे के रणबांकुरों ने नये साल से पहले भारतीय क्रिकेटरों को जश्न मनाने का एक और मौका दे दिया। बिना शक, यह जीत कई मायनो में महत्वपूर्ण रही। आस्ट्रेलिया की टीम अपनी तेज विकेटों पर खेल रही थी, उनके तेज गेंदबाज खासी धार रखते हैं, उनकी बल्लेबाजी भी गंभीरता से भरी रही है, जिसमें स्मिथ व मारनस जैसे खिलाड़ी शुमार हैं। लेकिन अजिंक्य रहाणे ने न केवल बेहतर कप्तान की पारी खेली बल्कि एक आदर्श टीम की कल्पना को भी साकार किया। पहली पारी में उनके 112 बहुमूल्य रनों ने टीम में उत्साह भर दिया और यह बढ़त दूसरी पारी में आसान जीत का आधार बनी। इतना ही नहीं, जब रवींद्र जडेजा की चूक से वे रन आउट हुए तो उन्होंने जडेजा का मनोबल बढ़ाया ताकि गुस्से से उसका स्वाभाविक खेल बाधित न हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने गेंदबाजों की पसंद से फील्डिंग सजायी और मनमाफिक विकेट हासिल किये। खिलाड़ियों का मैच की परिस्थिति के हिसाब से उपयोग करना ही एक सफल कप्तान की कामयाबी मानी जाती है। भारतीय टीम की चुस्त-दुरुस्त फील्डिंग भी जीत में मददगार बनी। वहीं आस्ट्रेलिया की कमजोर फील्डिंग उनकी हार की वजह बनी क्योंकि दोनों पारियों में टीम ने आठ कैच छोड़े।


मेलबर्न में खेले गये दूसरे क्रिकेट मैच में नये खिलाड़ियों की शानदार शुरुआत भी टीम इंडिया के लिये नयी उम्मीद जगाने वाली बनी। शुभमन गिल की शुरुआत भी भारत के लिये शुभदायक रही। आस्ट्रेलिया के तेज गेंदबाजों के अनुकूल पिचों पर पहली पारी में 45 और दूसरी पारी में 35 रन बनाना भारत के लिये शुभ ही रहा। वहीं पहला मैच खेल रहे मोहम्मद सिराज ने मोहम्मद शमी के चोटिल होने से टीम में खाली हुई जगह को भरने का सार्थक प्रयास किया। पूरी लाइन और लैंथ के साथ गेंदबाजी करते हुए सिराज ने पहली पारी में दो और दूसरी पारी में तीन विकेट लेकर टीम में अपनी जगह की दावेदारी जता दी। इस मैच में रवींद्र जडेजा की हरफनमौला पारी भी याद की जायेगी। पहली पारी में 57 रन बनाकर रहाणे के साथ शानदार 121 रनों की साझेदारी करने वाले जडेजा ने दूसरी पारी के लिये जीत की आधारशिला रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इतना ही नहीं, मैच में उन्होंने दोनों पारियों में तीन विकेट भी हासिल किये। इन प्रतिभाओं के बेहतर इस्तेमाल से अजिंक्य रहाणे टीम को जीत की दहलीज तक पहुंचाने में कामयाब रहे। खिलाड़ियों ने मैच भी जीता और क्रिकेट प्रेमियों का दिल भी जीता। अन्यथा क्रिकेट प्रेमी कयास लगा रहे थे कि आस्ट्रेलिया की तेज पिचों पर तेज गेंदबाजों के सामने कुल 36 रन पर ढेर होने वाले शेर नियमित कप्तान और मुख्य बल्लेबाज व मुख्य गेंदबाज की अनुपस्थिति में कहीं फिर आस्ट्रेलिया के सामने पस्त न हो जायें। लेकिन कुशल कप्तान अजिंक्य रहाणे ने जीत का नया मुहावरा रच दिया। यह सुखद संयोग है कि उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ने लगातार तीसरी जीत हासिल की है जो यह बताती है कि भारतीय टीम सिर्फ बड़े नामों की ही मोहताज नहीं है। टीम के छुपे रुस्तम कभी भी मैच की दिशा-दशा बदलने में सक्षम हैं। निस्संदेह आस्ट्रेलिया की जमीन पर आस्ट्रेलिया को हराकर रहाणे की टीम ने चार मैचों की शृंखला में न केवल बराबरी हासिल कर ली बल्कि शृंखला का रोमांच भी बरकरार रखा है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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