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Editorials : असुरक्षित बेटियां

हाथरस, होशियारपुर से लेकर बल्लभगढ़ तक बेटियों के साथ क्रूरता की हदें पार करती घटनाओं ने पूरे देश के अंतर्मन को झिंझोड़ा है। इन घटनाओं के अलावा भी बेटियों के साथ यौन हिंसा की घटनाओं का अंतहीन सिलसिला जारी है। यह बात अलग है कि ये घटनाएं राजनीतिक निहितार्थों के अभाव और मीडिया की चूक के कारण राष्ट्रीय परिदृश्य में विमर्श का हिस्सा नहीं बन पातीं। 

सोमवार को बल्लभगढ़ में बी.कॉम. अंतिम वर्ष की छात्रा के अपहरण की असफल कोशिश के बाद दिनदहाड़े हुई हत्या कानून व्यवस्था के प्रति अपराधियों के बेखौफ होने को दर्शाती है। यह घटना जहां अपराधी के निरंकुश व्यवहार को दर्शाती है, वहीं पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करती है। छात्रा के अपहरण की कोशिश दो वर्ष पूर्व भी हुई थी। यदि इस मामले में सख्त कार्रवाई होती तो शायद छात्रा आज जिंदा होती। उस पर हरियाणा के गृहमंत्री का संवेदनहीन बयान कि पुलिस के द्वारा व्यक्तिगत सुरक्षा कर पाना संभव नहीं है।


 शासन-प्रशासन का संवैधानिक दायित्व बनता है कि व्यक्ति विशेष के जीवन पर आने वाले किसी भी खतरे से उसकी रक्षा की जाये। खासकर लड़कियों की शिक्षण संस्थाओं के बाहर तो सुरक्षा इंतजाम ऐसे होने चाहिए कि बेटियां सिरफिरे आशिकों से अपनी रक्षा करने में सक्षम हो सकें। सवाल समाज में पनप रही आपराधिक मनोवृत्ति का भी है कि क्यों और कैसे पथभ्रष्ट युवा हाथरस, होशियारपुर और बल्लभगढ़ जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं और बेकसूर बेटियों को उनकी क्रूरता का शिकार बनना पड़ रहा है। 

हाल ही में आये एक सर्वेक्षण में इस बात का खुलासा हुआ था कि समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित हो रही है। अभिभावक अब बेटियों के परिवार में आने का स्वागत कर रहे हैं और बिना किसी भेदभाव के उनका बेहतर ढंग से भरणपोषण कर रहे हैं। लेकिन बेटियों के प्रति लगातार बढ़ रहे अपराधों से उनका उत्साह कम हो सकता है। इन आशंकाओं को दूर करना शासन-प्रशासन का दायित्व बनता है।


दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने हाथरस में यौन हिंसा की शिकार हुई युवती को न्याय दिलाने की दिशा में सार्थक पहल की है। मंगलवार को शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि हाथरस कांड मामले में सीबीआई की जांच की निगरानी इलाहाबाद हाईकोर्ट करेगा। हाईकोर्ट मामले की जांच के बाद फिर तय करेगा कि केस का स्थानांतरण उत्तर प्रदेश से दिल्ली किया जाये या नहीं। साथ ही पीड़िता के परिजनों व गवाहों की सुरक्षा पर भी उच्च न्यायालय ध्यान देगा। 

दरअसल, इस सारे प्रकरण में प्रदेश सरकार की कारगुजारियों के मद्देनजर पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी कि मामले का ट्रायल दिल्ली में हो। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. ए. बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने एक जनहित याचिका व वकीलों की ओर से दायर हस्तक्षेप याचिकाओं पर पंद्रह अक्तूबर को अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था। आशंका जतायी जा रही थी कि उत्तर प्रदेश में निष्पक्ष सुनवाई की संभावना कम है। जांच को बाधित करने के आरोप लगाये गये थे। ऐसी आशंकाएं 14 सितबंर को यौन हिंसा की शिकार युवती के शव का आनन-फानन में परिवार की गैर मौजूदगी में रात में अंतिम संस्कार करने के बाद जतायी जा रही थी। दरअसल, इस सारे प्रकरण से उत्तर प्रदेश पुलिस व शासन सवालों के घेरे में आ गया था।

 इस मामले में भारी राजनीतिक विरोध के बाद योगी सरकार ने मामले की जांच पहले एसआईटी को सौंपी थी और बाद में जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की गई। मामले में राजनीतिक विरोध और पीड़ित परिवार की आशंकाओं के बीच अदालत ने मामले में हस्तक्षेप किया। 

इससे पूर्व योगी सरकार की ओर से शीर्ष अदालत में दायर हलफनामे में कहा गया था कि पीड़ित परिवार और गवाहों को तीन स्तरीय सुरक्षा प्रदान की गई है। बहरहाल, बेटियों के खिलाफ होने वाली हिंसा को रोकने के लिये पुलिस-प्रशासन को संवेदनशील व जवाबदेह बनाने की जरूरत है। वहीं समाज को भी मंथन करना होगा कि युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट होने से कैसे बचाया जाये।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Editorials : कर्जदारों की दीवाली, कोर्ट के दखल पर सरकार ने दी राहत

सुप्रीम कोर्ट द्वारा लोन मोरेटोरियम मामले में दबाव बनाने के बाद केंद्र सरकार ने कहा है कि तयशुदा ऋण खातों वाले कर्जदार ब्याज में छूट ले सकते हैं। दरअसल, कोरोना संकट के चलते एक मार्च से 31 अगस्त तक की अवधि तक ईएमआई भरने में रियायत लेने वालों के ऋण पर चक्रवृद्धि ब्याज वसूले जाने से उपभोक्ता खफा थे। इस बाबत कई याचिकाएं शीर्ष अदालत में दाखिल की गई थीं। 

जिस पर सख्ती दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनुचित बताया था। गत 14 अक्तूबर को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सरकार से इस मामले पर शीघ्र फैसला लेने का निर्देश देते हुए कहा था कि लोगों की दीवाली आपके हाथों में है। अब वित्त मंत्रालय ने यह फैसला लिया है और 21 अक्तूबर को हुई कैबिनेट की बैठक में इसे हरी झंडी दी गई। इसके तहत दो करोड़ तक के विभिन्न तरह के कर्ज की ईएमआई पर ब्याज माफी की घोषणा की गई है। किस्त भुगतान में मोहलत न लेकर नियमित ईएमआई भरने वालों को भी इसका लाभ मिलेगा। 

बताया जा रहा है कि इस फैसले से सरकारी खजाने पर 6500 करोड़ का बोझ पड़ने का अनुमान है। दरअसल, सरकार ने यह फैसला दो नवंबर को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से ठीक पहले लिया। निस्संदेह केंद्र सरकार द्वारा दाखिल एफिडेविट से ऋण लेने वाले एक बड़े वर्ग को त्योहार के मौसम में एक बड़ी सौगात मिलेगी। यह इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि कोरोना संकट के चलते बड़े तबके के आय स्रोतों का संकुचन हुआ है और बड़ी संख्या में लोगों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है। 

बड़ा कर्मचारी तबका ऐसा भी है, जिसके वेतन में कटौती के चलते उसे ईएमआई चुकाने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में ब्याज पर ब्याज चुकाना उसके लिये बेहद मुश्किल काम था। निस्संदेह न्यायिक सक्रियता की इस लाभ को लोगों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका रही।

सरकार द्वारा दाखिल शपथ पत्र में कहा गया है कि चक्रवृद्धि ब्याज और सामान्य ब्याज के अंतर को पांच नवंबर तक ऋण लेने वालों के खाते में जमा करा दिया जायेगा। यह लाभ केवल एक मार्च से इकत्तीस अगस्त 2020 के बीच की अवधि के लिये दिया जा सकेगा। सरकार ने कहा है कि जिन कर्जदारों ने केंद्रीय बैंक द्वारा 27 मार्च को घोषित भुगतान छूट का पूर्णत: व आंशिक विकल्प चुना हो या नहीं, दोनों इस राहत के पात्र होंगे। निस्संदेह सरकार ने यह फैसला दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए कर्जदारों की स्थिति तथा अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों को दृष्टिगत रखते हुए लिया है। दरअसल, शीर्ष अदालत ने कोरोना संकट से प्रभावित लोगों की स्थिति को महसूस करते हुए व त्योहारी मौसम में इस बाबत सरकार से शीघ्र सर्कुलर जारी करने को कहा था। जिसके बाद सरकार ने विश्वास दिलाया था कि वह खुद बैंकों को ब्याज चुकाएगी।


 सरकार के इस फैसले से अब दो करोड़ तक के एम.एस.एम.ई, ऑटो, आवास, शिक्षा समेत आठ सेक्टर के ऋण पर लगाये गये चक्रवृद्धि ब्याज को माफ किया जाएगा। इसके साथ ही क्रेडिट कार्ड बकाया पर भी ये ब्याज नहीं वसूले जायेंगे। दरअसल, सरकार के इस कदम को बाजार में मांग बढ़ाने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है ताकि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से बाजार को गति मिले। निस्संदेह पर्व शृंखला के मौके पर चक्रवृद्धि ब्याज के दुश्चक्र से राहत मिलना कर्जदारों के लिये बड़ी राहत है। ऐसे वक्त में जब लॉकडाउन की वजह से वाणिज्यिक और औद्योगिक गतिविधियां बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं, कर्मचारियों तक को वेतन देने के लाले पड़े हों, चक्रवृद्धि ब्याज थोपना न्यायसंगत नहीं था। 

साथ ही ऐसे उद्यम, जिन्होंने कर्ज लेकर कारोबार बढ़ाना चाहा था, उनके सामने किस्त चुकाने का भी संकट खड़ा हो गया था। कारोबार की शृखंला टूटने से कई कारोबार तालाबंदी के दौरान बंद हो गये, लेकिन बैंकों का ब्याज और चक्रवृद्धि ब्याज लगातार बढ़ता गया। उनके लिये निस्संदेह यह राहतकारी है।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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चौतरफा संकट : अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट मंदी का संकेत


ऐसे समय में जब पिछले कुछ दिनों में पूरी दुनिया के मुकाबले सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा देश में सामने आ रहा है, विकास दर का ऋणात्मक हो जाना गंभीर आर्थिक संकट का पर्याय है। वित्तीय वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के आंकड़ों मेें देश की विकास दर -23.9 गिर जाना स्तब्धकारी है। वर्ष 2019-20 में इस तिमाही में विकास दर 5.2 फीसदी रही थी। देश में मौजूदा पीढ़ी के लोगों ने शायद ही कभी इतनी बड़ी गिरावट देखी हो। मगर, विडंबना यह है कि इस बीच कोरोना संक्रमण की दूसरी वेव हमारे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयासों को बड़ी चोट दे रही है। कहा जा रहा था कि जुलाई में अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है, लेकिन कोरोना के कहर के बीच फिलहाल तुरंत समाधान की कोई गुंजाइश नजर भी नहीं आती। निस्संदेह यह स्थिति मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। कहा जा रहा है कि कोरोना संकट के चलते अचानक घोषित सख्त लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को बुरी तरह झकझोरा है। भारत जैसे देश में जहां जीडीपी में सर्विस सेक्टर का योगदान साठ फीसदी है, वहां करोड़ों लोगों ने रोजगार खोये हैं। अकेले टूरिज्म इंडस्ट्री में तीन से चार करोड़ नौकरियां गई हैं। जानकारों का मानना है कि सामाजिक जीवन को नियंत्रित करने के लिए तो लॉकडाउन की जरूरत थी लेकिन देश की आर्थिक गतिविधियों को पूरी तरह से बंद नहीं किया जाना चाहिए था। जीडीपी का ऋणात्मक हो जाने का आंकड़ा ऐसे समय पर आया है जब देश में अनलॉक चार की प्रक्रिया शुरू हो रही है और कुछ क्षेत्रों को फिर से खोला जा रहा है। हालांकि, लॉकडाउन के परिणामों से केंद्र सरकार पहले से ही वाकिफ थी। यही वजह है कि राज्यों से लॉकडाउन लगाने का अधिकार वापस ले लिया गया था और केवल कंटेनमेंट जोन में ही लॉकडाउन लगाने की इजाजत दी गई ताकि आर्थिक गतिविधियों में और व्यवधान न आने पाये।


अधिकांश रेटिंग एजेंसियां व आर्थिक विशेषज्ञ देश की जीडीपी में गिरावट का अनुमान लगा रहे थे, लेकिन इतनी बड़ी गिरावट का अंदेशा नहीं था। निस्संदेह जीडीपी के आंकड़े मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका है और विपक्ष को धारदार हमले का मौका देते हैं। जीडीपी के आंकड़े आने से पहले ही कांग्रेस की तरफ से वीडियो जारी करके मोदी सरकार पर बड़ा हमला बोला गया था। उधर, जीडीपी आंकड़े आने से पहले सोमवार को शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई। शायद बाजार को अनुमान था कि अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट दर्ज होने वाली है। दरअसल, जीएसटी के कलेक्शन में आई भारी गिरावट पहले ही संकेत दे रही थी कि जीडीपी के आंकड़ों में बड़ी गिरावट आ सकती है, लेकिन इतनी बड़ी गिरावट का आकलन नहीं था। कभी देश में दो अंकों में विकास दर पहुंचने की बात कही जाती थी, अब यह ऋणात्मक रूप से दो अंकों तक जा पहुंची है, जिसके भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दूरगामी नकारात्मक परिणाम होंगे, जिससे उबरने में देश को लंबा वक्त लग सकता है। वह भी ऐसे दौर में जब कोरोना संकट और गहरा होता जा रहा है। हालांकि, सरकार को भी इस बात का अहसास था कि देश की जीडीपी में बड़ी गिरावट दर्ज हो सकती है। उसने कुछ कदम इस दिशा में उठाये भी, मगर स्थितियां इतनी विकट हो चुकी थीं कि धरातल पर उनका प्रभाव नजर नहीं आया। निस्संदेह इस बड़े संकट से उबरने के लिये केंद्र सरकार को युद्ध स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है। यह अच्छी बात है कि इस दौरान कृषि क्षेत्र ने बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे यह विश्वास बना है कि देश को खाद्यान्न संकट से नहीं जूझना पड़ेगा। बहरहाल, जीडीपी के पहले तिमाही के निराशाजनक आंकड़े आर्थिक मंदी का भी संकेत है, जिससे आम आदमी के जीवन पर खासा प्रतिकूल असर पड़ सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि तीसरी तिमाही तक जीडीपी में धनात्मक वृद्धि देखने को मिलेगी।


सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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राहत को आर्थिक तुष्टीकरण बनाना अनुचित : Dainik Tribune Editorial

गुरबचन जगत
तीस जून को सरकार ने हमारे गरीब भाई-बहनों को कोविड-19 महामारी के दृष्टिगत और कुछ महीने राशन सामग्री जारी रखने की घोषणा की है। जाहिर है यह मात्रा बहुत बड़ी है। उक्त निर्णय भली नीयत के साथ जनता को राहत देने वाला है। विश्वास है कि केंद्र सरकार की इस घोषणा के बाद गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी इसका अनुसरण करेंगे। पिछले कई सालों में कोई भी मौका बनने पर मुफ्त राहत सामग्री देने का चलन पैदा हो गया है, फिर चाहे अवसर प्राकृतिक आपदा का हो या चुनाव का, यहां तक कि किसी विशेष समस्या के बिना भी घोषणा कर दी जाती है। नतीजतन अब जब कभी भी कुछ घटित होता है तो लोगों की ओर से पैसे, अन्न-दाल इत्यादि के लिए मांग होनी शुरू हो जाती है। देखना यह है कि इसमें जरूरतमंदों के हाथ में वास्तव में कितना पहुंचता है? आपदा के समय राहत देना एकदम न्यायोचित है लेकिन इसे आर्थिक तुष्टीकरण की नीति बनाना सही नहीं है।
राहत किस किस्म की हो और कब, इस पर विचार होना चाहिए। आपात स्थिति बनने पर जहां हमारी सरकारों का ध्यान आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को न्यूनतम जरूरत का दाल-चावल देने पर लगा होता है वहीं पश्चिमी जगत में सरकारें बेरोजगारों और प्रभावित हुए व्यवसायियों के हाथ में गुजारे लायक पैसा बना रहे, इस पर अपना ध्यान केंद्रित करती हैं। कोविड-19 महामारी के कारण किए गए निष्ठुर लॉकडाउन ने हमारी आर्थिकी को करारा झटका दिया है और मंतव्य संभालने में नाकामयाबी से अर्थव्यवस्था को दुबारा पटरी पर लाने के लिए बहुत ज्यादा प्रयास करने पड़ेंगे। हमारे सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली मात्र 1 प्रतिशत की कमी से ही असंख्य परिवार गरीबी की गर्त में और नीचे धंस जाएंगे। मौजूदा चोट पहले से कमजोर पड़ी अर्थव्यवस्था के समय में पड़ी है। 

बृहद सवाल पर आएं तो जब कोई आपदा न हो तब खैरात बांटना क्यों जरूरी होता है? यह कृत्य हमारी नीतियों में बड़े बदलाव का हिस्सा बन गया है और राजनेताओं को जब कभी जनता को पुचकारना हो या चुनावों में वोट बटोरने हों तो मुफ्त चीजों की घोषणा कर देते हैं। देश के आर्थिक परिदृश्य में सार्थक सुधार करने की बजाय नेताओं के लिए यह पत्ता खेलना ज्यादा आसान होता है। पिछले 72 सालों के दौरान हम ऐसा कारगर कृषि-औद्योगिक ढांचा बनाने में विफल रहे हैं जो देशवासियों के लिए रोजगार और विकास सुनिश्चित कर सके। मुद्दा चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा का हो या विकास एवं रोजगार का, हम एक राष्ट्रीय नीति बनाने में असफल रहे हैं। हम अपनी बजट प्रक्रिया को जरूरत से ज्यादा महत्व देते हैं जबकि बजट का काम केवल विभागों को धन का प्रावधान करना है। विगत में हमने पंचवर्षीय योजनाएं बनाई हैं, मिश्रित अर्थव्यवस्था का प्रयोग किया है। इस दौरान विपक्षी दल निजी क्षेत्र को और ज्यादा भूमिका देने की मांग करते रहे जबकि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का ‘द बॉम्बे क्लब’ यानी कुछ बहुत बड़े सरमाएदारों का समूह देश के मुख्य क्षेत्रों पर बने अपने एकाधिकार से खुश था।
वर्ष 2014 में नई सरकार के गठन के साथ लगा था कि आखिर देश में निजीकरण के दिन आ गए हैं। हालांकि इसे लागू करने वालों को अंदाजा नहीं था कि यहां भी मायूसी मिलने वाली है, क्योंकि आरंभिक शोरगुल के बाद समाजोन्मुखी आर्थिक नीतियां फिर से अपनानी पड़ीं और धरातल पर विशेष बदलाव नहीं हुए सिवाय इसके कि ‘बॉम्बे क्लब’ की जगह धीमे से एक अन्य कुलीन गुट को स्थापित कर दिया गया, जिसने सरकार की मदद से देश के टेलीकॉम, सौर ऊर्जा, तेल, बिजली, दृश्य एवं प्रिंट मीडिया इत्यादि क्षेत्रों में लगभग एकाधिकार बना लिया है। तो आज हम जहां हैं वहां पाते हैं कि एक ओर समाजवाद की बात करने वाले और कुलीन गुट है, जिसके साथ एक मजबूत केंद्रीकृत सरकार है तो दूसरी ओर वह जनता है जो आम स्थितियों में भी आर्थिक मदद और वस्तु रूपी खैरात की आस रखती है। चुनावों से पहले तो इसमें अतिरिक्त दरकार जुड़ जाती है।

हम इस खैरात संस्कृति को कैसे बदल सकते हैं? इसके लिए नए संस्थागत उपाय किए जाएं और मौजूदा व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए। प्रगति के लिए सबसे मूलभूत जरूरत है अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण एवं शहरी विकास तंत्र और एक ऐसी न्याय व्यवस्था जो यथेष्ठ समय में फैसले दे सके। आज याचिकाकर्ता को अदालती फैसले के लिए अंतहीन इंतजार करना पड़ता है, लिहाजा हमारा न्यायिक ढांचा ऐसा बनकर रह गया है, जिसमें अंतर्निहित अक्षमता की पैठ हो चुकी है, इस तरह तो हमारी अर्थव्यवस्था आधुनिक बनने से रही। समयबद्ध कानूनी फैसले होने चाहिए, न कि मुकदमे एक अदालत से दूसरी में फुदकते फिरें, तभी कहते हैं ‘देर से मिला न्याय… अन्याय’ है।
आज देश के ग्रामीण अंचल में प्रभावी शिक्षा तंत्र लगभग कहने भर का है, खासकर उत्तर और मध्य भारत में, गोकि शिक्षा के मामले में दक्षिण भारत के विद्यालयों और कॉलेजों की स्थिति बेहतर है। अगर अमेरिका की सिलिकॉन वैली, अंतरिक्ष क्षेत्र और आईवी लीग यूनिवर्सिटियों में कार्यरत भारतीयों की संख्या को देखें, तो पाते हैं कि उनमें बहुत बड़ी संख्या में विशेषज्ञ दक्षिण भारत से आते हैं और उनमें लगभग सभी विदेशों में बसे हुए हैं। यही स्थिति कॉलेज और विश्वविद्यालयों में भी देखने को मिलती है जहां दक्षिण भारतीय आगे हैं। अनुसंधान एवं विकास पर हमारे उद्योग और विश्वविद्यालय ज्यादा समय और धन नहीं लगाते। समाज में कारगर स्वास्थ्य तंत्र एक बहुत बड़ी जरूरत है और हालिया घटनाक्रम ने सिद्ध कर दिया है कि मानव संसाधनों और ढांचागत सुविधाओं की कितनी बड़ी कमी है। वहन योग्य स्वास्थ्य देखभाल सभी नागरिकों को उपलब्ध होनी चाहिए, खासकर उनको जो समाज के निचले तबके में हैं।
गरीबी के निचले पायदान के लोगों का कहना है कि यदि अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मयस्सर हों तो हमारे बच्चे भी इस गुरबत से निकल सकते हैं। इसीलिए निजी सुख तजकर वे अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। जिनकी माली हालत अच्छी है, वे अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ने भेज देते हैं। अगर हम शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्या से सही ढंग से निपट पाएं तो हम अपनी बहुत बड़ी अलामत यानी अनियंत्रित ढंग से बढ़ती आबादी पर लगाम लगा सकते हैं। लेकिन आज की तारीख में कोई भी राजनीतिक दल इस पर सख्ती से काम करने को राजी नहीं है। हालांकि अगर पढ़े-लिखे वर्ग पर नजर दौड़ाएं तो पाते हैं कि ज्यादातर परिवारों में एक या दो ही बच्चे हैं। इससे बच्चे को अच्छी शिक्षा और व्यावसायिक दर्जा पाने में खुद-ब-खुद आसानी हो जाती है। अगर हम इस समस्या पर आज से काम करना शुरू करें तब भी नतीजे आने में दो दशक लग जाएंगे।
औद्योगिक क्षेत्र को फिर से सरकारी उपक्रम बनाने की बजाय मैदान को निजी क्षेत्र के लिए खुला छोड़ देना चाहिए और नए उद्यमियों को मदद देने के अलावा एकाधिकार बनाने पर रोक लगानी होगी। युवा भारतीय उद्यमियों को आगे आने का मौका देना होगा और उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए ताकि वे अपना भविष्य विदेशों की बजाय देश में बनाना पसंद करें। स्थापित उद्योग-धंधा लंबे समय तक चलता है और इसमें विस्तार भी होता है। लेकिन इस क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाई जाए।
कृषि से आय को इतना आकर्षक बनाया जाए ताकि युवा खेती तजने की बजाय करना पसंद करें। फसल चक्र को क्षेत्रीय जरूरतों और मंडी के हिसाब से बनाया जाए। नई कृषि नीति को लेकर किसानों में बहुत-सी आशंकाएं पैदा हो गई हैं और उन्हें डर है कि सरकारी एजेंसियां खरीद करने मंडी में नहीं आएंगी और कृषक व्यापारियों के रहमोकरम पर छूट जाएगा। मूल्य निर्धारण का मुद्दा ऐसा है जो किसान के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण है।
बिना जायज कारण मुफ्त की खैरात देने की प्रथा बंद होनी चाहिए। मदद केवल आपदा के समय दी जाए, दान में मिली सहायता संस्थागत व्यवस्थाओं के जरिए मिलने वाले संबल, जैसे कि उद्योग, कृषि विकास, तकनीक, शिक्षा और स्वास्थ्य का विकल्प नहीं हो सकती। जरूरी हुआ तो वृद्धि एवं विकास पर राष्ट्रीय नीति बनाने हेतु संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए। वैसे भी संसद की संस्थागत विधि को दरकिनार किया जा रहा है। अब संसद में बाकायदा बहस के बाद कानून बनाकर लागू करने की बजाय अध्यादेशों से काम चलाया जा रहा है।

लेखक यूपीएससी के अध्यक्ष एवं मणिपुर के राज्यपाल रहे हैं।
सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।
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खेती पर किसान का नियंत्रण बना रहे, अनुबंध कृषि की विसंगतियां : Dainik Tribune Editorial


राजेन्द्र चौधरी

जून, 2020 में जब देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा था, तब भारत सरकार ने खेती में तीन बड़े कानूनी बदलाव अध्यादेश जारी करके कर दिए क्योंकि देर सवेर ये अध्यादेश संसद में पारित करने के लिए रखे जायेंगे, इसलिए इन पर पुनर्विचार करने का अभी भी एक मौका बाकी है।
सब से महत्वपूर्ण है अनुबंध खेती अध्यादेश। आमतौर पर अनुबंध खेती का मतलब है कि बुआई के समय ही बिक्री का सौदा हो जाता है ताकि किसान को भाव की चिंता न रहे। परन्तु सरकार द्वारा पारित कानून में अनुबंध की परिभाषा को बिक्री तक सीमित न करके, सभी किस्म के कृषि कार्यों को शामिल किया गया है। इस तरह से परोक्ष रूप में कम्पनियों द्वारा किसान से ज़मीन लेकर खुद खेती करने की राह भी खोल दी है। धारा 2 एच II के अनुसार कम्पनी किसान को किसान द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के लिए भुगतान करेगी। यानी किसान अपनी उपज की बिक्री न करके अपनी ज़मीन और अपने श्रम का भुगतान पायेगा।
आज़ादी की लड़ाई के समय से यह मांग रही है कि खेती पर किसान का नियंत्रण रहे, न कि व्यापारियों का। इसलिए आज़ादी के बाद किसी व्यक्ति द्वारा रखी जाने वाली कृषि भूमि की अधिकतम सीमा तय कर दी गई। इससे पहले छोटू राम के काल में यह कानून बनाया गया था कि गैर-कृषक या साहूकार खेत और खेती के औजारों पर कब्ज़ा नहीं ले सकता। इन कानूनों का उद्देश्य यही था कि खेती पर चंद लोगों का अधिकार न होकर यह आम लोगों की आजीविका का साधन रहे। कोरोना काल ने इस नीति की ज़रूरत को फिर से रेखांकित किया है। अनुबंध पर खेती कानून ग्रामीण इलाकों के इस अंतिम सहारे को छीनने का क़ानून है।
नए कानून को बनाने वाले भी इस बदलाव की भयावहता को जानते हैं। इसलिए इसे इसके असली नाम ‘कम्पनियों द्वारा खेती’ का नाम न देकर अनुबंध खेती का रूप दिया है। एक ओर धारा 8-ए में कहा गया है कि इस कानून के तहत ज़मीन को पट्टे पर नहीं लिया जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर धारा 8-बी में भूमि पर कम्पनी द्वारा किये स्थाई चिनाई, भवन निर्माण या ज़मीन में बदलाव इत्यादि का ज़िक्र है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि ज़मीन अनुबंध की अवधि के दौरान अनुबंध करने वाले के नियंत्रण में है। यानी कि खेती किसान नहीं, अनुबंध करने वाला कर रहा है।
अन्य दो कानूनी बदलावों द्वारा सरकार ने कृषि क्षेत्र से नियमन, विशेष तौर पर मंडी कानून को बहुत हद तक ख़त्म कर दिया है। कई बार किसान भी यह सवाल उठाते हैं कि सरकार क्यों फसलों के मूल्य तय करती है। ऊपरी तौर पर यह बात ठीक भी प्रतीत होती है पर वास्तव में यह ठीक नहीं है। सरकार तो न्यूनतम बिक्री मूल्य निर्धारित करती है। कृषि में सरकारी नियमन कृषि की प्रकृति के कारण है। एक तो बुनियादी ज़रूरत होने के कारण भोजन की मांग में कीमत या आय बढ़ने पर ज्यादा बदलाव नहीं होता और दूसरा मौसम पर निर्भरता के कारण कृषि उत्पाद में बहुत ज्यादा बदलाव होते हैं। आपूर्ति में बहुत ज्यादा बदलाव और मांग का बेलचीला होने का परिणाम यह होता है कि अगर बाज़ार के भरोसे छोड़ दिया जाए तो कृषि की कीमतों में बहुत ज्यादा बदलाव होते हैं। ऐसा न किसान के हित में होता है और न ग्राहक के हित में। जब फसल नष्ट होने के कारण कीमतें बढ़ती हैं तो जिस किसान की फसल ही नष्ट हो गई, उसको कोई फायदा नहीं होता और जब अच्छी पैदावार के कारण कीमतें इतनी घट जाती हैं कि खड़ी फसल की जुताई करनी पड़ती है तो भी किसान को कोई फायदा नहीं होता। इसलिए ही दुनिया भर में सरकारें कृषि बाज़ार का नियमन करती हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि कृषि मंडी की वर्तमान व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत है। अभी भी सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य सभी जिंसों में और सभी इलाकों में नहीं मिलता, और ऐसा सरकार खुद मानती है। मंडी में किसानों को और भी कई तरह की दिक्कतें आती हैं, पर इसका इलाज़ कृषि मंडी नियमन को ख़त्म करने में नहीं है। इसका उपाय है मंडी कमेटी को किसानों के प्रति जवाबदेह बनाया जाए; उस में सभी हितधारकों के चुने हुए प्रतिनिधि हों, जैसा कि अब भी कानूनी प्रावधान है। अगर नियमन के बावज़ूद छोटे छोटे व्यापारियों और आढ़तियों से सरकार किसानों को नहीं बचा सकती, सरकारी खरीद का भी पैसा सीधे किसानों के खातों में नहीं पहुंचा सकती, तो अब जब बड़ी-बड़ी दैत्याकार वाली विशाल देशी-विदेशी कम्पनियां बिना किसी सरकारी नियंत्रण या नियमन के किसान का माल खरीदने लगेंगी तो फिर किसान को कौन बचाएगा?
जब संपन्न किसान अनाज मंडी से बाहर चला जाएगा, तो सरकारी स्कूलों की तरह अनाज मंडियां भी बंद होने लग जायेंगी, और फिर छोटे, आम किसान के लिए कोई राह नहीं बचेगी।
सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।
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एकता की कवायद में उजागर अंतर्विरोध

राजकुमार सिंह
संसद के बजट सत्र से पहले विपक्षी एकजुटता का संदेश देने के लिए आयोजित बैठक अंतर्विरोधों को ही उजागर कर गयी। संसद के शीतकालीन सत्र से ही नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और नेशनल रजिस्टर ऑफ पापुलेशन (एनआरपी) के विरोध में देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन चल रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया समेत कुछ राज्यों के विश्वविद्यालय परिसरों में भी इन मुद्दों पर छात्रों का मुखर विरोध सामने आया है। कहीं-कहीं यह विरोध हिंसक भी हुआ है तो जवाब में पुलिसिया दमन की शिकायतें भी सामने आयी हैं। कहना नहीं होगा कि नागरिकता की पहचान से जुड़ी उपरोक्त तीनों प्रक्रियाओं पर केंद्र सरकार और उसकी अगुअा भाजपा को घेरे जाने के जवाब में दूसरी ओर से समर्थन में भी सुर मुखर हुए हैं और प्रदर्शन भी। देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में शुमार जेएनयू में नकाबपोश हिंसा के मूल में तो कारण फीस वृद्धि और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया जैसे मुद्दे रहे हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की सक्रियता के बाद वहां भी नागरिकता-निवासियों की पहचान से जुड़े केंद्र की भाजपानीत राजग सरकार के तीनों फैसले भी एजेंडे पर आ गये हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक ही था कि विपक्षी दल संसद के बजट सत्र में सरकार को इन विवादों समेत तमाम मुद्दों पर घेरने की कवायद करें। आर्थिक मंदी, बढ़ती बेरोजगारी और बेलगाम महंगाई जैसी चुनौतियों को भी ध्यान में रखें तो कहा जा सकता है कि मोदी सरकार अपने शासनकाल के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा सोमवार को दिल्ली में बुलायी गयी विपक्षी दलों की बैठक इसी विपक्षी एकजुटता का संदेश देने की कवायद का हिस्सा थी। बेशक इस बैठक में 15 दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया, लेकिन उससे बड़ी खबर यह रही कि तृणमूल कांग्रेस, सपा, बसपा, द्रमुक, टीडीपी, आप और शिवसेना सरीखे महत्वपूर्ण दल इससे दूर ही रहे। इन दलों ने अलग-अलग कारणों से बैठक से दूर रहने के संकेत दिये हैं, पर कुल मिलाकर जो संदेश गया है, वह विपक्षी अंतर्विरोंधों का ही है।
मसलन, बसपा सुप्रीमो मायावती ने राजस्थान में अपने दल के छह विधायकों को कांग्रेस द्वारा तोड़ लिये जाने के विरोध में बैठक में न आने की बात कही। अशोक गहलोत सरकार को किसी संभावित संकट से बचाने के लिए राजस्थान में बहुमत बढ़ाने की कांग्रेस की बेचैनी समझी जा सकती है, लेकिन गैर भाजपाई खेमे के दलों में ही सेंधमारी से परस्पर विश्वास बढ़ने के बजाय घटेगा ही, यह समझ पाना मुश्किल नहीं होना चाहिए। पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में, सपा से अप्रत्याशित गठबंधन की बदौलत ही सही, बसपा अब भी उत्तर प्रदेश में तो कांग्रेस से बहुत बड़ी पार्टी है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश सरीखे पड़ोसी राज्यों में भी उसका (सीमित ही सही) जनाधार है। निश्चय ही भाजपा के विरुद्ध लड़ाई में वह कांग्रेस की असरदार सहयोगी साबित हो सकती है, लेकिन राजस्थान सरीखी सेंधमारी के चलते तो वह सहयोग संभव नहीं। बेशक मायावती भारतीय राजनीति के अविश्वसनीय किरदारों में से एक है, लेकिन तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद अपने परंपरागत जनाधार पर उनकी बरकरार पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हां, मुंह इस सच से भी नहीं मोड़ा जा सकता कि खासकर उत्तर प्रदेश में मायावती कतई नहीं चाहेंगी कि कांग्रेस फिर से अपने पैरों पर खड़ी हो पाये। कारण भी बहुत साफ है कि बसपा जिस दलित-मुस्लिम जनाधार पर खड़ी है, वह दशकों तक कांग्रेस का परंपरागत जनाधार रहा है। अगर कांग्रेस मजबूत होती दिखी तो बदलते परिदृश्य में, खासकर अल्पसंख्यक मतदाताओं का मन बदलने में देर नहीं लगेगी, और मात्र दलित वोट बैंक के बल पर मायावती की बड़ी राजनीति संभव नहीं।
दरअसल कांग्रेस-सपा के खट्टे-मीठे रिश्तों के मूल में भी यही जटिल राजनीतिक समीकरण है। सपा का मुख्य जनाधार मंडल से मुखर हुआ अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी रहा है, जिसमें से अब मुख्यत: यादव ही उसके पास बचे हैं, जो अल्पसंख्यक मतदाताओं के साथ मिल अनेक सीटों पर विजयी समीकरण बनाते हैं। सपा को भी यही डर है कि मजबूत कांग्रेस मुस्लिम मतों को आकर्षित कर सकती है, जिसका परिणाम सपा की कमजोरी के रूप में आयेगा। ऐसे में भाजपा-विरोध के मुद्दे पर एकमत होते हुए भी कांग्रेस-सपा-बसपा का एक साथ आ पाना शायद ही कभी संभव हो पाये। अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की बात करें। इसमें दो राय नहीं कि लगातार दूसरे लोकसभा चुनाव में दिल्ली में आम आदमी पार्टी के शून्य पर सिमट जाने के बाद वहां के मुख्यमंत्री एवं पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल के मौन हो जाने पर ममता ही केंद्र सरकार, उसकी नीतियों और भाजपा की सबसे मुखर आक्रामक आलोचक रह गयी हैं। पश्चिम बंगाल में वह जिस तरह घूम-घूम कर एनआरसी और सीएए के विरोध में धरना-प्रदर्शन कर रही हैं, वैसा कोई दूसरा विरोधी दल नहीं कर पा रहा। इसके बावजूद इन्हीं मुद्दों पर सोनिया द्वारा आयोजित बैठक में खुद आना तो दूर, अपना प्रतिनिधि तक भेजना जरूरी नहीं समझा, तो जाहिर है कि मामला नीतियों से ज्यादा नेतृत्व का भी है। मूलत: कांग्रेसी ममता ने लंबे समय तक आलाकमान के दरबारियों से अपमानित होने के बाद अपनी अलग पार्टी बनायी और लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार, तीन दशक से भी ज्यादा समय से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज वाम मोर्चा को बेदखल कर सरकार भी बनायी। पिछले साल लोकसभा चुनाव तक कहा जा रहा था कि ममता सरीखे वरिष्ठ नेता राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार नहीं कर सकते, लेकिन इस बार तो वह सोनिया गांधी द्वारा बुलायी गयी बैठक में भी नहीं आई। इसके निहितार्थ कांग्रेस को समझने होंगे।
हालांकि विशुद्ध सत्ता केंद्रित हो गयी भारतीय राजनीति में विचारधारा, नीति, सिद्धांत अब लगभग अप्रासंगिक होकर रह गये हैं, लेकिन फिर भी एक हद तक माना जा सकता है कि आप और अरविंद केजरीवाल शायद ही कभी भाजपा के साथ खड़े हों। इसके बावजूद वह भी सोनिया की बैठक में नहीं आये। याद रहे कि यह वही केजरीवाल हैं जो पिछले साल लोकसभा चुनाव में दिल्ली में और फिर विधानसभा चुनाव में हरियाणा में कांग्रेस से गठबंधन के लिए आतुर थे। अब अगर सहमति वाले मुद्दों पर भी वह कांग्रेस के साथ नहीं खड़े दिखना चाहते तो उसके मूल में भी चुनावी राजनीति ही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में एक माह से भी कम समय रह गया है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगातार हार के बावजूद भाजपा एक बार फिर सत्ता की दावेदारी के साथ चुनाव मैदान में उतर रही है। बेशक केजरीवाल ने दिल्ली की सत्ता कांग्रेस से ही छीनी थी, लेकिन चुनावी समीकरण बताते हैं कि त्रिकोणीय मुकाबला ही आप के लिए फायदेमंद रहेगा। आप और कांग्रेस का वोट बैंक एक जैसा ही है, लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन का प्रयोग बताता है कि जरूरी नहीं कि एक का वोट बैंक दूसरे को ट्रांसफर हो जाये। हां, यह अवश्य हो सकता है कि एक-दूसरे से एलर्जी रखने वाला वोट तीसरे को ट्रांसफर हो जाये। दिल्ली में आप की सत्ता में वापसी का रास्ता तभी खुलता है, जब कांग्रेस मजबूती से चुनाव लड़कर अपना जनाधार बढ़ाये। पिछले साल लोकसभा चुनावों में पस्त होने और आंध्र प्रदेश की सत्ता भी गंवा बैठने से पहले टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू भी खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कटु आलोचक रहे हैं, लेकिन वह भी बैठक में नहीं आये। राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के शिकार नायडू बदली परिस्थितियों में भी कांग्रेस से क्यों दूर रहे—समझना जरूरी है। महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने वाली शिवसेना ने हालांकि संदेश न मिलने को बैठक में अनुपस्थिति का कारण बताया है, लेकिन कांग्रेस को यह समझना होगा कि सावरकर सरीखे मुद्दों पर अवांछित टिप्पणियों से अपने ही मित्र दल की मुश्किलें बढ़ाना दूरदर्शी राजनीति नहीं है। द्रमुक की नाराजगी भी तमिलनाडु के कुछ कांग्रेसी नेताओं के व्यवहार को लेकर है। जाहिर है,कांग्रेस विपक्षी एकता की धुरी तो बनना चाहती है, पर वैसा परिपक्व आचरण-व्यवहार नहीं कर पा रही जबकि वह खुद अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है।
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