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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Friday, February 26, 2021

सेहतमंद देश का लक्ष्य: सेहतमंद नागरिक देश की एक बड़ी पूंजी होती है, स्वास्थ्य की चिंता प्राथमिकता के आधार पर की जानी चाहिए (दैनिक जागरण)

हमारे नीति-नियंताओं को इससे अवगत होना चाहिए कि मिलावटी अथवा मानकों की अनदेखी कर तैयार किए जाने वाले खाद्य पदार्थ देश को सेहतमंद बनाने के लक्ष्य में एक बड़ी बाधा हैं। यह बाधा दूर करने के लिए कोई अभियान छेड़ा जाना चाहिए।


स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कोरोना संक्रमण का डटकर मुकाबला करने के बाद सेहत के मोर्चे पर भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहने की जो जरूरत जताई, उसे पूरा करने के लिए सभी को आगे आना होगा। यह सही है कि देश कोरोना संकट का सही तरह सामना कर रहा है, लेकिन केवल इससे ही यह साबित नहीं हो जाता कि सेहत के मोर्चे पर सब कुछ ठीक है। इसी तरह इस बार बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए अधिक धन के आवंटन से भी यह सुनिश्चित नहीं होता कि देश को सेहतमंद बनाने का अभियान आसानी से पूरा हो जाएगा। लोगों को सेहतमंद बनाने के लिए मोदी सरकार बीमारियों को रोकने और गरीबों को सस्ता एवं प्रभावी इलाज देने समेत जिन कई मोर्चों पर काम कर रही है, उनमें राज्य सरकारों की भी सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए और साथ ही निजी क्षेत्र की भी। यह समझने की भी जरूरत है कि स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए अभी बहुत कुछ करना शेष है। लोगों के स्वास्थ्य की चिंता इसलिए प्राथमिकता के आधार पर की जानी चाहिए, क्योंकि सेहतमंद नागरिक किसी भी देश के लिए एक बड़ी पूंजी होते हैं।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Monday, January 11, 2021

कृषि कानूनों और किसान आंदोलन पर केंद्र सरकार के तौर-तरीकों पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी (दैनिक जागरण)

यह बिल्कुल भी ठीक नहीं होगा कि वे पहले की तरह रास्ते रोककर बैठे रहें और इसके चलते दिल्ली-एनसीआर के लोग तंग होते रहें। सुप्रीम कोर्ट को किसानों के साथ-साथ उनके धरने से त्रस्त हो रहे आम लोगों का भी ध्यान रखना चाहिए।

कृषि कानूनों के साथ-साथ किसानों के आंदोलन पर विचार-विमर्श कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के तौर-तरीकों पर नाराजगी जताते हुए एक बार फिर वही संकेत दिए, जो उसकी ओर से कुछ समय पहले भी दिए गए थे। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं कि वह कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाने और इन कानूनों की समीक्षा के लिए समिति गठित करने जैसे कदम उठाएगा या नहीं? उसका फैसला जो भी हो, लेकिन उसे कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए, जिससे लोगों को यह संदेश जाए कि वे सड़कों पर उतर कर किसी कानून पर अमल रोक सकते हैं। यदि ऐसा कोई संदेश गया तो दिल्ली आए दिन वैसे ही धरना-प्रदर्शनों से घिरी रहेगी, जैसे बीते लगभग 45 दिनों से घिरी हुई है। नि:संदेह सुप्रीम कोर्ट को संसद से पारित कानूनों की वैधानिकता परखने का अधिकार है, लेकिन यह ठीक नहीं होगा कि वह उनकी समीक्षा के लिए समितियों का गठन करने लगे। न्यायपालिका को ऐसी किसी नई परंपरा की शुरुआत नहीं करनी चाहिए, जिससे विधायिका और कार्यपालिका के फैसलों की विसंगतियों को दूर करने के नाम पर उनके अधिकारों में कटौती होती हुए दिखे। सुप्रीम कोर्ट को इसकी अनदेखी भी नहीं करनी चाहिए कि खुद सरकार कृषि कानूनों की कथित खामियों को दूर करने के लिए एक समिति गठित करने की पेशकश कर चुकी है।


सुप्रीम कोर्ट ने किसान आंदोलन को लेकर यह टिप्पणी भी की कि यदि कुछ गलत हो गया तो उसके जिम्मेदार हम सब होंगे। उसने यह भी कहा कि हम नहीं चाहते कि हमारे हाथ किसी के खून से रंगे हों। निश्चित रूप से कोई भी ऐसा नहीं चाहेगा, लेकिन क्या इसे विस्मृत कर दिया जाए कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में रास्ता रोककर जो धरना दिया जा रहा था, उसमें उसने हस्तक्षेप किया था और उसका कोई नतीजा नहीं निकला। उलटे यह धरना दिल्ली में भीषण दंगों की वजह बना। किसी को सुप्रीम कोर्ट को यह स्मरण कराना चाहिए कि उसने शाहीन बाग में धरना दे रहे लोगों को समझाने-बुझाने के लिए वार्ताकार नियुक्त कर कुल मिलाकर उन तत्वों का मनोबल ही बढ़ाया, जो रास्ते से हटने को तैयार नहीं थे। इस बार ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के साथ यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसानों का धरना वास्तव में शांतिपूर्ण तरीके से हो। यह बिल्कुल भी ठीक नहीं होगा कि वे पहले की तरह रास्ते रोककर बैठे रहें और इसके चलते दिल्ली-एनसीआर के लोग तंग होते रहें। सुप्रीम कोर्ट को किसानों के साथ-साथ उनके धरने से त्रस्त हो रहे आम लोगों का भी ध्यान रखना चाहिए।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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कोविड-19 रोधी वैक्सीन: टीकाकरण का देशव्यापी अभियान पूरी दुनिया के लिए नजीर बनना चाहिए (दैनिक जागरण)

टीकाकरण अभियान के संचालन में दलगत राजनीतिक हितों को आड़े नहीं आने दिया जाएगा।  टीकाकरण अभियान का सफल संचालन न केवल महामारी को परास्त करने में सहायक बनेगा बल्कि वह भारत की साम‌र्थ्य का परिचायक भी साबित होगा। इससे बेहतर और कुछ नहीं कि इस अभियान को इस तरह चलाया जाए कि वह पूरी दुनिया के लिए नजीर बने।

महामारी कोविड-19 रोधी वैक्सीन लगाने की तैयारियों को अंतिम रूप देने के बीच प्रधानमंत्री की मुख्यमंत्रियों से होने वाली बातचीत से यही संदेश निकलना चाहिए कि इस देशव्यापी अभियान में केंद्र और राज्यों के आपसी सहयोग में कोई कसर नहीं उठा रखी जाएगी। ऐसा कोई संदेश तभी निकलेगा, जब इस अभियान के संचालन में दलगत राजनीतिक हितों को आड़े नहीं आने दिया जाएगा। यह शुभ संकेत नहीं कि जहां कुछ विपक्षी नेताओं ने वैक्सीन को लेकर लोगों को गुमराह करने वाले बयान दिए, वहीं कुछ ने उन्हें मंजूरी देने की प्रक्रिया को लेकर गैर जरूरी सवाल खड़े किए। ये सवाल खड़े करते समय इसकी अनदेखी ही की गई कि आखिर कोई सरकार ऐसा काम क्यों करेगी, जिससे उसकी साख को चोट पहुंचे? हालांकि यह पहले से स्पष्ट है कि चिकित्सकों, स्वास्थ्य कíमयों समेत कोरोना संक्रमण का आगे बढ़कर मुकाबला करने वाले करीब तीन करोड़ लोगों को मुफ्त वैक्सीन लगाई जाएगी, फिर भी कुछ मुख्यमंत्री यह चाह रहे हैं कि संपूर्ण टीकाकरण अभियान मुफ्त हो। सभी को मुफ्त वैक्सीन लगाने की मांग सुविचारित नहीं कही जा सकती।


यह तो समझ आता है कि निर्धन तबके और खासकर गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों को मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध कराई जाए, लेकिन यह ठीक नहीं होगा कि जो आíथक रूप से समर्थ हैं, उन्हें भी मुफ्त में यह सुविधा उपलब्ध कराई जाए। जो सक्षम हैं, कम से कम उनसे लागत मूल्य तो लिया ही जाना चाहिए। इससे सरकारी खजाने पर बोझ भी नहीं पड़ेगा और निर्धन तबके के ज्यादा से ज्यादा लोगों के मुफ्त टीकाकरण में मदद भी मिलेगी। जब राज्य सरकारें इससे अच्छी तरह परिचित हैं कि कोरोना संकट के चलते सरकारी कोष पर दबाव है तब फिर इसका कोई औचित्य नहीं कि समर्थ लोगों को भी मुफ्त वैक्सीन लगाने की मांग की जाए। कहना कठिन है कि सभी को मुफ्त वैक्सीन लगाने की मांग पर क्या फैसला होगा, लेकिन उचित यही है कि इस मांग पर जोर देने के बजाय स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत बनाने पर ध्यान दिया जाए। आवश्यकता इसकी भी है कि टीकाकरण अभियान के दौरान केंद्र और राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करें कि उनके विभिन्न विभागों में हर स्तर पर तालमेल न केवल कायम होगा, बल्कि वह नजर भी आएगा। ऐसा इसलिए होना चाहिए, क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान है। पूरी दुनिया की निगाहें इस अभियान पर होंगी। इस अभियान का सफल संचालन न केवल महामारी को परास्त करने में सहायक बनेगा, बल्कि वह भारत की साम‌र्थ्य का परिचायक भी साबित होगा। इससे बेहतर और कुछ नहीं कि इस अभियान को इस तरह चलाया जाए कि वह पूरी दुनिया के लिए नजीर बने।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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एफएटीएफ की आंखों में धूल झोंकता पाक: आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करना, सुस्त कोर्ट सजा सुनाने लगा (दैनिक जागरण)

भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसके लिए आगाह करे कि पाकिस्तान आतंकियों के खिलाफ दिखावटी कार्रवाई करके पहले की तरह उसकी आंखों में धूल झोंकने में लगा हुआ है। विश्व समुदाय को इसके आवश्यक प्रमाण भी उपलब्ध कराए जाने चाहिए।


यदि आतंकियों को पालने-पोसने वाला कोई देश अचानक उनके खिलाफ कार्रवाई करना शुरू कर दे और वहां की सुस्त अदालतें उन्हें सजा सुनाने लगें तो उसके इरादों पर संदेह होना स्वाभाविक है। इस पर यकीन करना कठिन है कि पाकिस्तान ने सचमुच आतंकियों पर लगाम लगाने का मन बना लिया है और हाफिज सईद, जकीउर रहमान लखवी के बाद एक अन्य आतंकी सरगना मसूद अजहर को जेल भेजने की तैयारी उसके नेक इरादों का परिचायक है। ऐसे किसी नतीजे पर बिल्कुल भी नहीं पहुंचा जा सकता, क्योंकि वह तो अंतररराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से आतंकी फंडिंग पर निगाह रखने वाली संस्था एफएटीएफ की आंखों में धूल झोंकने के इरादे से यह सब कर रहा है। इसकी पुष्टि इससे होती है कि हाफिज सईद एवं जकीउर रहमान लखवी को आतंकवाद के गंभीर मामलों और खासकर भारत में आतंकी हमले कराने के आरोप में जेल नहीं भेजा गया। इन दोनों को आतंकियों की फंडिंग करने के आरोप में सजा सुनाई गई है। यही काम मसूद अजहर के मामले में किया जाए तो हैरानी नहीं। यह वही खूंखार आतंकी है, जिसने भारत में कई बड़े आतंकी हमले कराए हैं और जिस पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पाबंदी लगने में इसलिए देर हुई, क्योंकि चीन ने अपनी अंतरराष्ट्रीय साख की अनदेखी कर उसकी ढाल बनना पसंद किया था। एक तथ्य यह भी है कि भारत ने जब-जब उसके खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही, पाकिस्तान से यही जवाब मिला कि वह तो उसके यहां है ही नहीं।


फिलहाल यह कहना कठिन है कि मसूद अजहर की गिरफ्तारी के अदालती आदेश पर अमल होने के बाद उसे सजा सुनाई जाती है या नहीं? यदि सईद और लखवी की तरह उसे भी सजा सुना दी जाए तो भी इसका अंदेशा है कि कुछ समय बाद और विशेष रूप से एफएटीएफ की कार्रवाई का खतरा टल जाने के उपरांत ऊंची अदालतें उसे बेगुनाह करार दें। यही सुविधा सईद और लखवी को भी मिल सकती है। वैसे भी पाकिस्तान में ऐसा होता रहा है। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब सिंध हाईकोर्ट ने अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल के हत्यारों को बेगुनाह करार दिया था। केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि पहले सईद और फिर लखवी को सजा सुनाए जाने पर भारत ने यह सवाल उठाया कि उन्हें मुंबई हमले की साचिश रचने और उसे अंजाम देने के जुर्म में कब सजा दी जाएगी? आवश्यक यह भी है कि भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसके लिए आगाह करे कि पाकिस्तान आतंकियों के खिलाफ दिखावटी कार्रवाई करके पहले की तरह उसकी आंखों में धूल झोंकने में लगा हुआ है। विश्व समुदाय को इसके आवश्यक प्रमाण भी उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Saturday, January 9, 2021

एफएटीएफ की आंखों में धूल झोंकता पाक: आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करना, सुस्त कोर्ट सजा सुनाने लगा (दैनिक जागरण)

भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसके लिए आगाह करे कि पाकिस्तान आतंकियों के खिलाफ दिखावटी कार्रवाई करके पहले की तरह उसकी आंखों में धूल झोंकने में लगा हुआ है। विश्व समुदाय को इसके आवश्यक प्रमाण भी उपलब्ध कराए जाने चाहिए।


यदि आतंकियों को पालने-पोसने वाला कोई देश अचानक उनके खिलाफ कार्रवाई करना शुरू कर दे और वहां की सुस्त अदालतें उन्हें सजा सुनाने लगें तो उसके इरादों पर संदेह होना स्वाभाविक है। इस पर यकीन करना कठिन है कि पाकिस्तान ने सचमुच आतंकियों पर लगाम लगाने का मन बना लिया है और हाफिज सईद, जकीउर रहमान लखवी के बाद एक अन्य आतंकी सरगना मसूद अजहर को जेल भेजने की तैयारी उसके नेक इरादों का परिचायक है। ऐसे किसी नतीजे पर बिल्कुल भी नहीं पहुंचा जा सकता, क्योंकि वह तो अंतररराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से आतंकी फंडिंग पर निगाह रखने वाली संस्था एफएटीएफ की आंखों में धूल झोंकने के इरादे से यह सब कर रहा है। इसकी पुष्टि इससे होती है कि हाफिज सईद एवं जकीउर रहमान लखवी को आतंकवाद के गंभीर मामलों और खासकर भारत में आतंकी हमले कराने के आरोप में जेल नहीं भेजा गया। इन दोनों को आतंकियों की फंडिंग करने के आरोप में सजा सुनाई गई है। यही काम मसूद अजहर के मामले में किया जाए तो हैरानी नहीं। यह वही खूंखार आतंकी है, जिसने भारत में कई बड़े आतंकी हमले कराए हैं और जिस पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पाबंदी लगने में इसलिए देर हुई, क्योंकि चीन ने अपनी अंतरराष्ट्रीय साख की अनदेखी कर उसकी ढाल बनना पसंद किया था। एक तथ्य यह भी है कि भारत ने जब-जब उसके खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही, पाकिस्तान से यही जवाब मिला कि वह तो उसके यहां है ही नहीं।

फिलहाल यह कहना कठिन है कि मसूद अजहर की गिरफ्तारी के अदालती आदेश पर अमल होने के बाद उसे सजा सुनाई जाती है या नहीं? यदि सईद और लखवी की तरह उसे भी सजा सुना दी जाए तो भी इसका अंदेशा है कि कुछ समय बाद और विशेष रूप से एफएटीएफ की कार्रवाई का खतरा टल जाने के उपरांत ऊंची अदालतें उसे बेगुनाह करार दें। यही सुविधा सईद और लखवी को भी मिल सकती है। वैसे भी पाकिस्तान में ऐसा होता रहा है। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब सिंध हाईकोर्ट ने अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल के हत्यारों को बेगुनाह करार दिया था। केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि पहले सईद और फिर लखवी को सजा सुनाए जाने पर भारत ने यह सवाल उठाया कि उन्हें मुंबई हमले की साचिश रचने और उसे अंजाम देने के जुर्म में कब सजा दी जाएगी? आवश्यक यह भी है कि भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसके लिए आगाह करे कि पाकिस्तान आतंकियों के खिलाफ दिखावटी कार्रवाई करके पहले की तरह उसकी आंखों में धूल झोंकने में लगा हुआ है। विश्व समुदाय को इसके आवश्यक प्रमाण भी उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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नए कृषि कानून वापस लिए जाने को लेकर सरकार और किसान नेताओं के बीच वार्ता एक बार फिर रही नाकाम (दैनिक जागरण)

किसान नेता जिस तरह दिल्ली-एनसीआर की जनता को परेशान करने वाले तौर-तरीकों के प्रति ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं उससे यह नहीं लगता कि अगले दौर की बातचीत से कुछ हासिल होगा। जहां सरकार नरमी दिखा रही है वहीं किसान नेता जिद पर अड़े हुए हैं।


इस पर हैरत नहीं कि केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच की वार्ता एक बार फिर नाकाम रही। इसके आसार तभी उभर आए थे, जब पिछली बार की बातचीत के बाद किसान नेताओं ने ट्रैक्टर रैली की रिहर्सल करने का फैसला किया था। उन्होंने यह तय कर रखा है कि वे गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकालेंगे। यह और कुछ नहीं लोगों को तंग करने, अपनी ताकत का बेजा प्रदर्शन करने और उसके जरिये सरकार पर दबाव बनाने की तैयारी है। यह अच्छा है कि किसान नेताओं की तमाम धमकियों के बाद भी सरकार कृषि कानूनों को वापस लेने की उनकी बेजा मांग न मानने पर अडिग है। उसे आगे भी अडिग रहना चाहिए, क्योंकि किसान नेता खुली हठर्धिमता दिखा रहे हैं। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि उन्हेंं वे राजनीतिक और गैर राजनीतिक तत्व शह दे रहे हैं, जो मोदी सरकार का राजनीतिक रूप से मुकाबला करने में सक्षम नहीं। ऐसे तत्वों के शह-समर्थन के जरिये किसान नेताओं का इरादा सरकार को झुकाने का है, न कि किसानों के हित की रक्षा करना। इसीलिए वे कृषि कानूनों की उन तथाकथित खामियों पर चर्चा करने से बच रहे हैं, जिनकी आड़ लेकर उनकी वापसी की मांग कर रहे हैं।

 

जहां सरकार नरमी दिखा रही है, वहीं किसान नेता जिद पर अड़े हुए हैं। वे एक ही रट लगाए हैं कि कृषि कानून वापस लिए जाएं। वे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे देश भर के किसानों ने उन्हेंं यह तय करने का कानूनी अधिकार दे दिया है कि कौन से कानून बने रहने चाहिए और कौन हटने चाहिए? यह विचित्र व्यवहार तब किया जा रहा है, जब तमाम किसान संगठन कृषि कानूनों का समर्थन कर रहे हैं। दिल्ली में डेरा डाले किसान नेता कृषि कानूनों का समर्थन करने वाले संगठनों को तो फर्जी बताने में लगे हुए हैं, लेकिन खुद यह देखने को तैयार नहीं कि उन्हेंं अधिकांश राज्यों के किसानों का समर्थन हासिल नहीं। ये किसान नेता जबरन नीति-नियंता बनने की जो कोशिश कर रहे हैं, वह न तो न्यायसंगत है और न ही लोकतंत्र की मर्यादा के अनुकूल। किसी मसले पर दो पक्षों के बीच का गतिरोध तभी टूटता है, जब दोनों पक्ष नरमी दिखाते हैं। किसान नेता नरमी दिखाने से तो इन्कार कर ही रहे हैं, यह भी जता रहे हैं कि वे जो कह रहे, वही सही है और सरकार को उसे चुपचाप मान लेना चाहिए। वे जिस तरह दिल्ली-एनसीआर की जनता को परेशान करने वाले तौर-तरीकों के प्रति ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं, उससे यह नहीं लगता कि अगले दौर की बातचीत से कुछ हासिल होगा।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Friday, January 8, 2021

अमेरिकी संसद की शर्मसार कर देने वाली घटना, इससे तमाम कमजोरियों की भी खुलती है पोल (दैनिक जागरण)

यह किसी से छिपा नहीं कि राष्ट्रपति चुनाव के पहले ही अमेरिकी समाज के बीच एक खाई बन गई थी। पुलिस की बेजा सख्ती के खिलाफ अश्वेत समुदाय के आक्रोश प्रदर्शन के दौरान यह साफ दिखने लगी थी।


दुनिया भर को लोकतंत्र का उपदेश देने और यहां तक कि कई बार अन्य देशों में लोकतांत्रिक तौर-तरीकों को थोपने की कोशिश करने वाले अमेरिका में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया के दौरान जैसा उपद्रव संसद के बाहर और भीतर हुआ, वह उसे शर्मसार करने के साथ ही उसकी तमाम कमजोरियों की पोल भी खोलता है। इसमें संदेह नहीं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ही अपने उन समर्थकों को उकसाया, जिन्होंने संसद में घुसकर अराजकता फैलाई, लेकिन सवाल है कि आखिर दुनिया के सबसे सशक्त लोकतांत्रिक देश का राष्ट्रपति चुनाव नतीजों को इस तरह अस्वीकार करने में सक्षम कैसे हुआ?


यह संभव हुआ खामियों और जटिलताओं से भरी चुनाव प्रक्रिया के कारण। अब तो अमेरिका को यह समझ आना चाहिए कि उसे अपनी चुनाव प्रणाली को दुरुस्त करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही उसे समाज को बांटने वाली राजनीति से तौबा करने की भी आवश्यकता है। यह किसी से छिपा नहीं कि राष्ट्रपति चुनाव के पहले ही अमेरिकी समाज के बीच एक खाई बन गई थी। पुलिस की बेजा सख्ती के खिलाफ अश्वेत समुदाय के आक्रोश प्रदर्शन के दौरान यह साफ दिखने लगी थी। चुनावों के दौरान इस खाई को और चौड़ी करने का ही काम किया गया।

भले ही संसद में हिंसा के बाद ट्रंप ने हथियार डाल दिए हों और शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता हस्तांतरण के लिए सहमत हो गए हों, लेकिन संसद में जो अनर्थ हुआ, उससे अमेरिका की प्रतिष्ठा को तगड़ी चोट पहुंची है। जब अमेरिका तमाम आंतरिक समस्याओं से घिरा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे चीन की ओर से गंभीर चुनौती मिल रही है, तब सत्ता संभालने जा रहे जो बाइडन की चुनौतियां कहीं अधिक बढ़ने वाली हैं। पता नहीं वह इन चुनौतियों का सामना कैसे करेंगे, लेकिन अमेरिका में जो कुछ हुआ, उससे उसके साथ-साथ दुनिया को भी सबक सीखने की जरूरत है।

पहला सबक इस बुनियादी बात को समझने का है कि असहमति अराजकता का पर्याय नहीं होती। ट्रंप चुनाव नतीजों से अपनी असहमति को अराजकता की हद तक ले गए। यदि वह चौतरफा निंदा से घिर गए हैं तो इसके लिए अपने अलावा अन्य किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते।


ट्रंप के अलोकतांत्रिक रवैये के साथ ही इसकी भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि हाल के समय में अमेरिका में कई ऐसे आंदोलन हुए हैं, जिनमें असहमति और अराजकता के बीच का अंतर खत्म होते दिखा है। दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी ऐसे तत्व हैं, जो असहमति के बहाने अराजकता को हवा देने और उसे जायज ठहराने का काम करते रहते हैं। उनसे न केवल सावधान रहना होगा, बल्कि उन्हें हतोत्साहित भी करना होगा।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Thursday, January 7, 2021

नए कृषि कानूनों को लेकर किसान नेताओं के अड़ियल रवैये के चलते बातचीत से मामला सुलझने के आसार कम (दैनिक जागरण)

किसान नेता किसानों को बहकाने से बाज नहीं आ रहे इसलिए सरकार को उनके खिलाफ सख्ती बरतने के लिए तैयार रहना चाहिए। करीब 40 दिनों से किसानों के दिल्ली के प्रमुख रास्तों पर बैठे होने के कारण लाखों लोग परेशान हैं।


किसान आंदोलन जारी रहने पर सुप्रीम कोर्ट का चिंतित होना स्वाभाविक है। हालांकि उसने बातचीत से मामले को सुलझाने की अपेक्षा व्यक्त की है, लेकिन ऐसा होने के आसार कम ही हैं और इसका कारण है किसान नेताओं का अड़ियल रवैया। वे इसके बावजूद जिद पर अड़े हैं कि केंद्र सरकार कृषि कानूनों में संशोधन को तैयार है। सुप्रीम कोर्ट को ऐसे तथ्यों से परिचित होना चाहिए कि पिछली बार की बातचीत में सरकार ने जैसे ही कृषि कानूनों के विभिन्न हिस्सों पर चर्चा की पेशकश की, वैसे ही किसान नेताओं ने यह जिद पकड़ ली कि इन कानूनों की वापसी से कम उन्हें और कुछ मंजूर नहीं। वे सरकार की कोई दलील सुनने को तैयार नहीं हुए। क्या यह अजीब नहीं कि सरकार तो कृषि कानूनों की कथित खामियों पर विचार करने को तैयार है, लेकिन किसान संगठन ही इससे पीछे हट रहे हैं? इसका सीधा मतलब है कि उनका इरादा किसानों की समस्याओं का समाधान करना नहीं, बल्कि सरकार को नीचा दिखाना है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को दिल्ली लाकर बैठाने वाले किसान नेता सरकार से बातचीत के दौरान केवल अड़ियल रवैये का ही परिचय नहीं दे रहे, बल्कि वे धमकी भरी भाषा का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। पहले उन्होंने सरकार पर दबाव बनाने के लिए गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में ट्रैक्टर परेड निकालने की धमकी दी, फिर उसकी रिहर्सल के नाम पर लोगों को तंग करने का फैसला किया। यह एक किस्म की ब्लैकमेलिंग ही है।


करीब 40 दिनों से किसानों के दिल्ली के प्रमुख रास्तों पर बैठे होने के कारण लाखों लोग परेशान हैं, लेकिन किसान नेताओं की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। इन नेताओं ने झूठ का सहारा लेकर कृषि कानूनों के खिलाफ जिस तरह मोर्चा खोल दिया है, उससे ऐसा लगता है कि पहले हालात बेहतर थे, लेकिन यह सच नहीं और इसीलिए किसानों की समस्याओं की ओर ध्यान आर्किषत किया जाता था। नए कृषि कानूनों के जरिये किसानों की समस्याओं को दूर करने का ही काम किया गया है। यह हैरान करता है कि एक वक्त जो दल और किसान संगठन ऐसे ही कानूनों की वकालत करते थे, वे अब किसानों को बरगलाने में लगे हुए हैं। उनकी ओर से यह झूठ फैलाया जा रहा है कि नए कानूनों से किसानों की जमीनें छिन जाएंगी और असली फायदा तो मोदी के मित्र उद्यमियों को होगा। क्या यह वही तरीका नहीं, जो नक्सली संगठन आदिवासियों को बरगलाने के लिए इस्तेमाल करते हैं? चूंकि किसान नेता किसानों को बहकाने से बाज नहीं आ रहे इसलिए सरकार को उनके खिलाफ सख्ती बरतने के लिए तैयार रहना चाहिए।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Wednesday, January 6, 2021

सेंट्रल विस्टा परियोजना को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी, नए संसद भवन के निर्माण की सियासी बाधाएं हुईं दूर (दैनिक जागरण)

आशा है सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सेंट्रल विस्टा परियोजना का काम तेजी से आगे बढ़ेगा और वह तय समय में पूरा होगा। नए संसद भवन की आवश्यकता इसलिए थी कि मौजूदा संसद भवन भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं था।

नए संसद भवन के निर्माण से संबंधित सेंट्रल विस्टा परियोजना को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी से यही सिद्ध हुआ कि इस प्रोजेक्ट को लेकर जताई जा रही आपत्तियों में कोई दम नहीं था और उसे रोकने के लिए दायर की गईं याचिकाएं संकीर्ण इरादों से प्रेरित थीं। कायदे से ऐसी याचिकाओं पर गौर ही नहीं किया जाना चाहिए, अन्यथा सरकार के हर फैसले के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाने की प्रवृत्ति को और बल ही मिलेगा। यह ठीक नहीं कि बीते कुछ समय से सरकार के प्रत्येक निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाने लगी है। सेंट्रल विस्टा परियोजना के खिलाफ एक नहीं, कई याचिकाएं दायर की गईं। किसी में पर्यावरण से संबंधित सवाल उठाए गए, किसी में भूमि उपयोग संबंधी और किसी में यह कहा गया कि नए संसद भवन की कोई आवश्यकता ही नहीं। इन याचिकाओं के अलावा कई विपक्षी दलों ने अनावश्यक आपत्तियां उठाईं। इनमें वह कांग्रेस भी शामिल रही, जिसने सत्ता में रहते समय खुद ही नए संसद भवन के निर्माण की जरूरत जताई थी। कुछ लोग ऐसे भी थे जो संसद भवन के आसपास बनी उन इमारतों को विरासत का दर्जा देने में जुट गए थे, जिन्हें किसी भी लिहाज से यह दर्जा नहीं दिया जा सकता।

सेंट्रल विस्टा परियोजना को लेकर राजनीतिक दलों के अलावा कुछ पूर्व नौकरशाहों ने भी महज विरोध के लिए विरोध जताने का काम किया था। हैरत नहीं कि अब वे यह कहकर अपने को सही ठहराने की कोशिश करें कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के एक सदस्य ने बहुमत से दिए गए फैसले के विपरीत राय व्यक्त की। जो भी हो, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि बहुमत से दिया गया फैसला अलग राय व्यक्त करने वाले न्यायाधीश के निष्कर्षों की काट ही करता है। आशा है सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सेंट्रल विस्टा परियोजना का काम तेजी से आगे बढ़ेगा और वह तय समय में पूरा होगा। नए संसद भवन की आवश्यकता केवल इसलिए नहीं थी कि वह पुराना पड़ चुका था, बल्कि इसलिए भी थी कि मौजूदा संसद भवन भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं था। एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि नए संसद भवन के निर्माण से उस पैसे की बचत भी होगी, जो फिलहाल अलग-अलग इमारतों में चल रहे विभिन्न मंत्रालयों के रखरखाव में खर्च होते हैं। नया संसद भवन कार्य संस्कृति सुधारने में भी सहायक साबित होगा। अच्छा हो कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद इस बुनियादी बात को समझा जाए कि समय के साथ परिवर्तन आवश्यक होता है और इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए कुछ नया निर्मित करना पड़ता है।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Tuesday, January 5, 2021

कांग्रेस की उद्यमशीलता पर चोट और उद्यमियों को खलनायक के तौर पर पेश करने की गंदी राजनीति (दैनिक जागरण)

जिस रिलायंस जियो इंफोकॉम के चलते देश में डिजिटल क्रांति आई और जिसकी वजह से दुनिया में सबसे सस्ती दरों पर डाटा उपलब्ध है उसके खिलाफ खुली अराजकता दिखा रहे तत्वों पर लगाम नहीं लगाई जा रही है।


किसान आंदोलन की आड़ में किस तरह छल-कपट का सहारा लेकर अफवाहों को हवा दी जा रही है, इसका प्रमाण है रिलायंस इंडस्ट्रीज की ओर से जारी यह स्पष्टीकरण कि उसका अथवा उसकी किसी सहायक कंपनी का न तो अनुबंध खेती से कोई लेना-देना है और न ही अनाज की सीधी खरीद से। यह स्पष्टीकरण इसलिए जारी किया गया, क्योंकि एक अर्से से विभिन्न किसान संगठनों की ओर से यह शरारत भरा दुष्प्रचार किया जा रहा है कि नए कृषि कानूनों का सबसे अधिक लाभ अंबानी और अदाणी को मिलने वाला है। इस दुष्प्रचार से यह स्वत: साबित हो जाता है कि अपनी मांगों को लेकर अड़ियल रवैया अपनाए किसान संगठन किसानों को बरगलाने के लिए झूठ का सहारा लेने में भी संकोच नहीं कर रहे हैं। इससे भी शर्मनाक यह है कि इस दुष्प्रचार में विपक्षी दल और खासकर कांग्रेस भी बढ़-चढ़कर भाग ले रही है। यह और कुछ नहीं, संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के फेर में राष्ट्रीय हितों को क्षति पहुंचाने वाली राजनीति है।

यह किसी से छिपा नहीं कि राहुल गांधी किस तरह कभी अंबानी-अदाणी के खिलाफ सस्ती जुमलेबाजी करते हैं और कभी इस झूठ को दोहराते हैं कि मोदी सरकार केवल अपने तीन-चार उद्योगपति मित्रों के लिए काम कर रही है। वह एक झूठ को सौ बार बोलकर उसे सच साबित करने के फार्मूले पर चलते दिख रहे हैं। यह उद्यमशीलता पर खतरनाक प्रहार ही नहीं, बल्कि उद्यमियों को खलनायक के तौर पर पेश करने की गंदी राजनीति भी है। वास्तव में यह वही शरारत भरी राजनीति है, जिसके जरिये वामपंथी दलों ने कोलकाता से लेकर कानपुर तक उद्योग-धंधों को चौपट करने का काम किया। यह एक विडंबना ही है कि जहां रिलायंस इंडस्ट्रीज को अपने खिलाफ जारी झूठे अभियान पर स्पष्टीकरण जारी करने को विवश होना पड़ा, वहीं उसकी सहायक कंपनी जियो इंफोकॉम को इसके लिए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी कि उसके मोबाइल टावरों को तोड़फोड़ से बचाया जाए। उसे किसान आंदोलन की आड़ में हो रही इस तोड़फोड़ के खिलाफ अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाना पड़ा, क्योंकि पंजाब सरकार उपद्रवी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करने में ढिलाई का परिचय दे रही है। ध्यान रहे कि कृषि कानूनों के खिलाफ सबसे पहले किसानों को सड़क पर उतारने का काम पंजाब में हुआ और उसमें राज्य सरकार की भी भूमिका रही। इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि जिस रिलायंस जियो इंफोकॉम के चलते देश में डिजिटल क्रांति आई और जिसकी वजह से दुनिया में सबसे सस्ती दरों पर डाटा उपलब्ध है, उसके खिलाफ खुली अराजकता दिखा रहे तत्वों पर लगाम नहीं लगाई जा रही है।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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सरकार के साथ आज की वार्ता नतीजे पर पहुंचने के लिए किसान नेताओं को छोड़ना होगा अड़ियल रवैया (दैनिक जागरण)

किसान संगठनों के रवैये को देखते हुए इसके आसार कम ही हैं कि केंद्र सरकार के साथ होने वाली आज की बातचीत किसी नतीजे पर पहुंचेगी। कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग अनावश्यक जिद के अलावा और कुछ नहीं।

किसान संगठनों के रवैये को देखते हुए इसके आसार कम ही हैं कि केंद्र सरकार के साथ होने वाली आज की बातचीत किसी नतीजे पर पहुंचेगी और उनका धरना खत्म होगा, फिर भी इसकी उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसा ही हो। यह उम्मीद तभी पूरी हो सकती है, जब किसान नेता अपनी यह जिद छोड़ेंगे कि तीनों नए कृषि कानूनों को वापस लिया जाए। यह मांग इसलिए हर्गिज नहीं मानी जानी चाहिए, क्योंकि एक तो इससे देश-दुनिया को गलत संदेश जाएगा और दूसरे, भीड़तंत्र के जरिये लोकतंत्र को झुकाने की अराजक प्रवृत्ति को बल मिलेगा। इन कानूनों की वापसी होने पर कल को कोई अन्य समूह-संगठन लोगों को दिल्ली में जमाकर यह मांग कर सकता है कि अमुक-अमुक कानून खत्म किया जाए। कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग इसलिए अनावश्यक जिद के अलावा और कुछ नहीं, क्योंकि सरकार उनमें संशोधन के लिए तैयार है। विडंबना यह है कि इसके बावजूद किसान नेता न केवल अड़ियल रवैया अपनाए हुए हैं, बल्कि सरकार पर यह तोहमत भी मढ़ रहे हैं कि वह लचीले रुख का परिचय नहीं दे रही है। इतना ही नहीं, वे तरह-तरह की धमकियां भी दे रहें। वे कभी सड़कों को जाम करने और कभी 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकालने की धमकी दे रहे हैं।

 किसान नेता यह तो रेखांकित कर रहे हैं कि धरने पर बैठे किसान दिल्ली की सर्दी में ठिठुर रहे हैं, लेकिन इसकी अनदेखी कर रहे हैं कि उनके कारण राजधानी और आसपास के लोगों को किस तरह परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। लोगों को तंगकर अपनी मांग मनवाने की चेष्टा जोर-जबरदस्ती के अलावा और कुछ नहीं। यह सही है कि कई विपक्षी दल और खासकर कांग्रेस एवं वामपंथी समूह किसान संगठनों को उकसाने में लगे हुए हैं, लेकिन उनका मकसद किसानों का हित साधना नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को नीचा दिखाना है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कुछ समय पहले कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, आम आदमी पार्टी और यहां तक कि कई किसान संगठन वैसे ही कानूनों की वकालत कर रहे थे, जैसे मोदी सरकार ने बनाए हैं। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि नए कृषि कानून अनाज बिक्री की पुरानी व्यवस्था खत्म नहीं करते, बल्कि वे किसानों को एक नया विकल्प उपलब्ध कराते हैं। इसी तरह वे अनुबंध खेती का भी विकल्प दे रहे हैं। यदि किसी को अनाज बिक्री की नई व्यवस्था और अनुबंध खेती रास नहीं आती तो वह उसे न अपनाने के लिए स्वतंत्र है। आखिर किसी भी क्षेत्र में कुछ और विकल्पों की उपलब्धता समस्या कैसे बन सकती है और वह भी तब जब पुराने विकल्प खत्म न किए गए हों? 

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अखिलेश की सेहत पर सस्ती राजनीति: वैक्सीन को किसी दल विशेष की दवा करार देकर लोगों को गुमराह न करें (दैनिक जागरण)

पता नहीं अखिलेश यादव ने किस इरादे से वैक्सीन को लेकर बेतुका बयान दिया लेकिन यदि उनके निशाने पर मुस्लिम समाज है तो उन्हें पता होना चाहिए कि एक तो वह जागरूक हो चुका है और दूसरे कई इस्लामी देशों में टीकाकरण का कार्यक्रम शुरू हो चुका है।

इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि जिस दिन कोरोना वायरस से उपजी महामारी कोविड-19 रोधी वैक्सीन लगाए जाने के लिए देश भर में पूर्वाभ्यास हो रहा था, उसी दिन सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने यह गैर जिम्मेदाराना बयान दिया कि वह वैक्सीन नहीं लगवाने वाले, क्योंकि वह भाजपा की है और उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यह व्यर्थ का बयान केवल सेहत को लेकर की जाने वाली सस्ती राजनीति ही नहीं, बल्कि उन वैज्ञानिकों का अपमान भी है, जिन्होंने अथक मेहनत से वैक्सीन तैयार की है। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि अखिलेश यादव ने यह बयान इस तथ्य से भली तरह परिचित होने के बाद भी किसी संकीर्ण राजनीतिक इरादे के तहत जानबूझकर दिया कि देश में जो वैक्सीन तैयार हो रही हैं, उनका भाजपा से कोई लेना-देना नहीं। नि:संदेह अखिलेश या उनकी जैसी सोच वाले लोगों को यह अधिकार है कि वे वैक्सीन लगवाने से इन्कार दें, लेकिन इसका कहीं कोई मतलब नहीं कि वे उसे किसी दल विशेष की दवा करार देकर लोगों को गुमराह करें। आपत्तिजनक केवल यह नहीं कि उन्होंने वैक्सीन को भाजपा की करार दिया, बल्कि यह भी है कि उसके प्रति अविश्वास जताकर लोगों के मन में संदेह पैदा करने का काम किया। उनका बयान पोलियो उन्मूलन अभियान के समय उन दकियानूसी लोगों के बयानों की याद दिला रहा है, जिन्होंने भोले-भाले और अशिक्षित लोगों को गुमराह करने का काम किया था।

क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकती है कि जिन युवा एवं शिक्षित नेताओं से समाज को दिशा दिखाने और उसे जागरूक करने की अपेक्षा की जाती है, वे ठीक इसके उलट काम कर रहे हैं? अखिलेश यादव के बयान से यही पता चलता है कि राजनीतिक उल्लू सीधा करने के फेर में कोई किस हद तक जा सकता है। यदि वह वैक्सीन बनाने वाले वैज्ञानिकों की प्रशंसा में दो शब्द नहीं कह सकते थे और टीकाकरण अभियान की तैयारियों पर कुछ नहीं कहना चाहते थे तो कम से कम उन्हें लोगों के मन में शक के बीज पैदा करने का काम तो नहीं ही करना चाहिए था। चूंकि देश पोलियो उन्मूलन अभियान वाले दौर से आगे बढ़ चुका है इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि खुद समाजवादी पार्टी के समर्थक भी अखिलेश यादव के बयान पर गौर नहीं करेंगे। पता नहीं अखिलेश यादव ने किस इरादे से वैक्सीन को लेकर बेतुका बयान दिया, लेकिन यदि उनके निशाने पर मुस्लिम समाज है तो उन्हें यह पता होना चाहिए कि एक तो वह जागरूक हो चुका है और दूसरे, कई इस्लामी देशों में भी टीकाकरण का कार्यक्रम शुरू हो चुका है।

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टीकाकरण अभियान: 'कोविशील्ड' कोविड-19 रोधी वैक्सीन के इस्तेमाल की सिफारिश नए साल का तोहफा (दैनिक जागरण)

चिंता की बात यह है कि ब्रिटेन से आए कई लोग इधर-उधर छिप गए हैं। यह खुद के साथ औरों को भी जोखिम में डालने वाली हरकत है। ऐसे गैर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्ती बरती जानी चाहिए।


सीरम इंस्टीट्यूट की कोविशील्ड नामक कोविड-19 रोधी वैक्सीन के इस्तेमाल की सिफारिश यही बताती है कि अब उसकी मंजूरी की औपचारिकता ही शेष है। आशा की जा रही है कि टीकाकरण का देशव्यापी अभ्यास पूरा होने के साथ ही उसके अमल का विवरण भी सामने आ जाएगा। नि:संदेह यह विवरण राहत की एक बड़ी खबर और नए साल के तोहफे की तरह होगा, क्योंकि वैक्सीन का बेसब्री से इंतजार हो रहा है। यह बेसब्री इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि अमेरिका, ब्रिटेन समेत कई देशों में टीकाकरण शुरू हो गया है। अच्छी बात यह है कि सीरम इंस्टीट्यूट के साथ-साथ अन्य कंपनियों की भी वैक्सीन मंजूरी के इंतजार में हैं। इन्हें भी मंजूरी मिलने से टीकाकरण के अभियान को गति देने में मदद मिलेगी। इसे गति देने की जरूरत भी होगी, क्योंकि पहले चरण में ही 30 करोड़ लोगों के टीकाकरण का लक्ष्य है। चूंकि यह एक बड़ी संख्या है इसलिए यह स्वाभाविक है कि इन सभी को वैक्सीन लगाने में समय लगेगा। 

टीकाकरण अभियान सही तरह से चले और पात्र लोग ही बिना किसी परेशानी और गफलत के उससे लाभान्वित हों, इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ सभी संबंधित विभागों को गंभीरता का परिचय देना होगा। ऐसा कोई अभियान तभी सफल हो सकता है, जब उसमें शामिल लोग हर स्तर पर तालमेल कायम करेंगे। उम्मीद है कि ऐसा ही होगा और यह अभियान एक मिसाल बनेगा। इस उम्मीद के बाद भी कुछ समय तक धैर्य धारण करने और कोरोना के संक्रमण से बचे रहने के लिए जरूरी सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी, क्योंकि वैक्सीन की दूसरी खुराक के उपरांत ही लोगों का शरीर कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने की क्षमता से लैस हो पाएगा। साफ है कि यह मानकर नहीं चला जाना चाहिए कि टीकाकरण शुरू होते ही महामारी से पीछा छूट जाएगा। नि:संदेह उसका असर कम होना शुरू हो जाएगा, लेकिन उससे मुक्ति पाने में समय लग सकता है। टीकाकरण शुरू होने के बाद भी सतर्कता का परिचय देने की आवश्यकता इसलिए भी होगी, क्योंकि कोरोना वायरस के उस बदले हुए रूप ने भारत में भी दस्तक दे दी है, जिसने ब्रिटेन में चिंताजनक स्थितियां पैदा कर दी हैं। अपने देश में अभी तक कोरोना वायरस के इस बदले हुए रूप से ग्रस्त लोगों की संख्या 30 के करीब पहुंच गई है। हालांकि यह बहुत घातक नहीं है, लेकिन उसका संक्रमण कहीं तेजी से फैलता है। चिंता की बात यह है कि ब्रिटेन से आए कई लोग इधर-उधर छिप गए हैं। यह खुद के साथ औरों को भी जोखिम में डालने वाली हरकत है। ऐसे गैर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्ती बरती जानी चाहिए।

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साल 2021 में सकारात्मकता को मिलेगा बल और हर तरह की चुनौतियों से पार पाने का मार्ग होगा प्रशस्त (दैनिक जागरण)

देश की तमाम समस्याओं के मूल में यह नकारात्मकता ही है। वैसे तो यह हर कहीं नजर आती है लेकिन आज यदि कोई क्षेत्र इससे सबसे अधिक ग्रस्त है तो वह है राजनीति। इस नकारात्मकता का एकमात्र उपचार है शुभ संकल्प और सबके कल्याण की भावना।


नववर्ष के आगमन के साथ ही देश-दुनिया ने एक नए कालखंड में प्रवेश कर लिया है। ऐसे अवसर न केवल एक नई उम्मीद जगाते हैं, बल्कि सकारात्मक भाव का संचार भी करते हैं। महामारी कोविड-19 से आक्रांत दुनिया को इस भाव से भरने की कहीं अधिक आवश्यकता है। सौभाग्य से इस आवश्यकता की पूर्ति हो रही है और इसमें सहायक बन रही है कोविड-19 रोधी वैक्सीन। इस वैक्सीन की उपलब्धता का दायरा जैसे-जैसे बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे यह आशा भी बलवती होती जा रही है कि आखिरकार इस महामारी से मुक्ति पा ली जाएगी। अच्छी बात यह है कि अगले एक-दो दिन में यह तय हो जाएगा कि भारत में वैक्सीन लगने का कार्यक्रम कब से शुरू होगा?

यह एक बड़ा कार्यक्रम होगा, क्योंकि पहले चरण में ही 30 करोड़ लोगों के टीकाकरण की तैयारी है। यह तैयारी अंतिम चरण में होने के बाद भी अभी सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि एक तो कोरोना संक्रमण से मुक्ति नहीं मिली है और दूसरे, उसके बदले हुए रूप ने भारत में भी दस्तक दे दी है। नि:संदेह यह एक चुनौती अवश्य है, लेकिन बीते हुए बरस ने कोरोना के संक्रमण और उससे उपजी तमाम समस्याओं का सामना करने की जो संकल्पशक्ति प्रदान की है, वह हमारा संबल बननी चाहिए।


भारत ने तमाम विपरीत परिस्थितियों में कोरोना के कहर का जिस तरह सामना किया है, वह एक मिसाल है। इस मिसाल को अन्य क्षेत्रों में भी कायम करने और इस तरह देश को नए शिखर की ओर ले जाने की जरूरत है। नि:संदेह इस जरूरत की पूर्ति तब होगी, जब जीवन के हर क्षेत्र में संयम और अनुशासन के साथ परिपक्वता का भी परिचय दिया जाएगा।


इससे ही सकारात्मकता को बल मिलेगा और हर तरह की चुनौतियों से पार पाने का मार्ग प्रशस्त होगा। यह मार्ग तब और प्रशस्त होगा, जब हर कोई शांति एवं सद्भाव के वातावरण को निर्मित करने में अपना सहयोग देगा। इसके लिए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है कि नकारात्मकता का परित्याग किया जाए।


देश की तमाम समस्याओं के मूल में यह नकारात्मकता ही है। वैसे तो यह हर कहीं नजर आती है, लेकिन आज यदि कोई क्षेत्र इससे सबसे अधिक ग्रस्त है तो वह है राजनीति। इस नकारात्मकता का एकमात्र उपचार है शुभ संकल्प और सबके कल्याण की भावना।


यह समझने की जरूरत है कि इस नकारात्मकता ने ही उस सकारात्मकता और तार्किकता के लिए स्थान कम किया है, जिसके बिना कोई समाज या देश आगे नहीं बढ़ सकता। नववर्ष का आगमन इसके लिए सबसे शुभ अवसर है कि हम सब सकारात्मकता की शक्ति को समझें और उससे लैस भी हों।

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किसान हित के नाम पर अराजकता भरा आंदोलन: लोग हो रहे परेशान, राष्ट्रीय संपदा को किया जा रहा नष्ट (दैनिक जागरण)

किसान हित के नाम पर दिल्ली में प्रमुख रास्तों की नाकेबंदी के बाद पंजाब में जिस तरह मोबाइल टावरों पर हमले का सिलसिला कायम हुआ थमने का नाम नहीं ले रहा उससे यह संदेह और गहराता है कि इस आंदोलन के पीछे शरारती तत्व भी हैं।


किसान हित के नाम पर दिल्ली में प्रमुख रास्तों की नाकेबंदी के बाद पंजाब में जिस तरह मोबाइल टावरों पर हमले का सिलसिला कायम हुआ और वह थमने का नाम नहीं ले रहा, उससे यह संदेह और गहराता है कि इस आंदोलन के पीछे शरारती तत्व भी हैं। यह संभवत: पहला किसान आंदोलन है, जिसके जरिये लोगों को जानबूझकर तंग करने के साथ ही राष्ट्रीय संपदा को नष्ट करने का काम किया जा रहा है। यह साधारण बात नहीं कि पंजाब में एक-एक करके करीब डेढ़ हजार मोबाइल टावर नष्ट कर दिए गए या फिर उनकी बिजली आपूर्ति बाधित कर दी गई और राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। जब उसके इस रवैये पर सवाल उठे तो मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने पहले तो मोबाइल टावरों को निशाना न बनाने की अपील की और फिर चेतावनी देने की औपचारिकता निभाई। यह चेतावनी कितनी दिखावटी है, इसका पता इससे चलता है कि उपद्रवी तत्वों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। पुलिस की निष्क्रियता की शिकायत खुद रिलायंस जियो ने की है।

नि:संदेह यह समझ आता है कि पंजाब सरकार अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने के लिए किसान आंदोलन को हर तरह से समर्थन दे रही है और यह भी किसी से छिपा नहीं कि उसने किस तरह उन किसानों के खिलाफ कुछ नहीं किया जो रेल पटरियों पर जा बैठे थे, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह उपद्रवी तत्वों से मुंह फेर ले। यदि सत्ता में बैठे लोग संकीर्ण स्वार्थो के फेर में राजधर्म की इस तरह खुली अनदेखी करेंगे तो केवल अराजकता को ही बल नहीं मिलेगा, बल्कि अन्य तरह के भी अनर्थ होंगे। पंजाब में रिलायंस जियो के मोबाइल टावर उस शरारत भरे दुष्प्रचार के चलते निशाना बनाए जा रहे हैं, जिसके तहत यह कहा जा रहा कि नए कृषि कानूनों से असली फायदा तो अंबानी और अदाणी को होने वाला है। अंबानी-अदाणी के खिलाफ आग उगलने का काम खुद राहुल गांधी की ओर से किया गया। इसके बाद यह सुनियोजित दुष्प्रचार इस तथ्य के बाद भी शुरू हो गया कि न तो अंबानी की कंपनियां किसानों से सीधे अनाज खरीदती हैं और न ही अदाणी की। यह भी एक दुष्प्रचार ही है कि नए कृषि कानून लागू हो जाने के बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था तो खत्म हो ही जाएगी, किसानों की जमीनें भी छिन जाएंगी। चूंकि इस दुष्प्रचार में वे भी शामिल हैं, जो खुद को किसान नेता बताते हैं, इसलिए उनके इरादों पर संदेह होता है। क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकती है कि किसान नेता ही किसानों को गुमराह करें?

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Thursday, December 24, 2020

किसानों का अड़ियल रवैया: संसद से पारित कानूनों की वापसी की जिद पकड़ना अराजकता को खुला निमंत्रण (दैनिक जागरण)

मीडिया बेजा दलीलें पेश करने में जुट गया है कि किसानों का भरोसा हासिल करने के लिए सरकार को कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करनी चाहिए। सरकार के साथ-साथ संसद को भी चुनौती देने की कोशिश हो रही है।

केंद्र सरकार के बातचीत के प्रस्ताव पर तथाकथित संयुक्त किसान मोर्चे की ओर से यह कहना अड़ियलपन के अलावा और कुछ नहीं कि पहले कृषि कानूनों को वापस लिया जाए। आखिर मुट्ठी भर किसान नेता यह फरमान देने वाले होते कौन हैं कि सरकार संसद से पारित कानूनों को वापस ले ले? सड़क पर आ बैठे लोगों की ओर से संसद से पारित कानूनों की वापसी की जिद पकड़ना तो अराजकता को खुला निमंत्रण है। यदि कल को कोई अन्य समूह-संगठन दस-बीस हजार लोगों को लेकर दिल्ली में डेरा डाल दे और किसी कानून को वापस लेने की मांग करने लगे तो क्या उसे भी मान लिया जाना चाहिए? यदि हां तो फिर संसद और सरकार की साख का क्या होगा? यदि नहीं तो फिर किसान नेताओं की कृषि कानूनों की वापसी की मांग को क्यों माना जाए और वह भी तब जब उनमें से कुछ को तो किसान नेता भी नहीं कहा जा सकता। आखिर किस आधार पर इन किसान नेताओं ने यह समझ लिया कि वे सारे देश के किसानों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और वे जो कह रहे हैं, वही समस्त किसानों की चाहत है?

किसान नेताओं के अड़ियलपन की एक और निशानी यह है कि वे कृषि कानूनों में संशोधन पर सहमत सरकार पर तो कठोर रवैया अपनाने का आरोप मढ़ रहे हैं, लेकिन यह देखने से इन्कार कर रहे हैं कि वे खुद किस तरह उसे न केवल हुक्म देने में लगे हुए हैं, बल्कि रास्ते और रेल मार्ग रोक देने की धमकियां भी दे रहे हैं। आखिर यह एक किस्म की ब्लैकमेलिंग नहीं तो और क्या है? हमारे आम किसान न तो इस तरह के आचरण के लिए जाने जाते हैं और न वे ऐसा कुछ करते हैं। दिल्ली में डेरा डाले किसान संगठनों ने सरकार के नरम रुख के बाद भी जिस तरह टकराव वाला रवैया अपना लिया है, उससे यही लगता है कि उनका मकसद किसानों की समस्याओं का समाधान करना नहीं, बल्कि किसी तरह मोदी सरकार को नीचा दिखाना है। इस अंदेशे का एक अन्य कारण इन किसान संगठनों को वामपंथी एवं अतिवादी गुटों के साथ-साथ उन राजनीतिक दलों की ओर से उकसाया जाना भी है, जो इस सरकार के प्रति बैर भाव से भरे हुए हैं। अब तो इसी भाव से भरा मीडिया का एक हिस्सा भी किसान संगठनों को हवा देने और ऐसी बेजा दलीलें पेश करने में जुट गया है कि किसानों का भरोसा हासिल करने के लिए सरकार को कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करनी चाहिए। साफ है कि सरकार के साथ-साथ संसद को भी चुनौती देने की कोशिश हो रही है।

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जम्मू-कश्मीर डीडीसी चुनाव: लोगों का बढ़-चढ़कर भाग लेना देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दर्शाता है पूरा भरोसा (दैनिक जागरण)

ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे राज्य की जनता को यह आभास हो कि जिला विकास परिषद के निर्वाचित सदस्यों के जरिये उनकी समस्याओं का समाधान कहीं अधिक आसानी से होने लगा है। इससे लोगों का लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति भरोसा और बढ़ेगा।


जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद के चुनाव नतीजों का यदि कोई सबसे उल्लेखनीय पक्ष है तो यही कि उनके जरिये इस केंद्र शासित प्रांत के लोगों की लोकतंत्र के प्रति आस्था प्रदर्शित हुई। इसकी एक झलक इन चुनावों के दौरान दर्ज किए गए मतदान प्रतिशत से भी मिली थी। उस कश्मीर घाटी में भी ठीक-ठाक मतदान हुआ था, जहां के बारे में यह माहौल बनाया जा रहा था कि अनुच्छेद 370 और 35-ए खत्म किए जाने के कारण लोग इन चुनावों से दूर रहना पसंद कर सकते हैं। ऐसा कुछ नहीं हुआ। जम्मू की तरह कश्मीर की जनता ने भी इन चुनावों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर यही साबित किया कि उनका भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पूरा भरोसा है। शायद लोगों के इसी रुख को भांपकर गुपकार गठबंधन वाले दलों और खासकर इस गठजोड़ की अगुआई कर रहे नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने इन चुनावों में भाग लेने का फैसला किया, जबकि पहले वे भड़काऊ बयानबाजी करने के साथ उनके बहिष्कार की बात कर रहे थे।


हो सकता है कि जिला विकास परिषद के चुनाव नतीजों के बाद गुपकार गठबंधन के नेता नए सिरे से अनुच्छेद 370 की वापसी की अपनी मांग पर जोर दें, लेकिन बेहतर होगा कि वे इस जमीनी हकीकत से दो-चार हों कि ऐसा कभी नहीं होने वाला। इसलिए नहीं होने वाला, क्योंकि यह अस्थायी अनुच्छेद विभाजनकारी होने के साथ ही राष्ट्रीय एकता में बाधक भी था। इसके अतिरिक्त यह अलगाववाद को हवा देने के साथ-साथ कश्मीरियत को नष्ट-भ्रष्ट करने का भी काम कर रहा था। गुपकार गठबंधन को इसकी भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि उसके तमाम नकारात्मक प्रचार के बाद भी घाटी में भाजपा अपनी जड़ें जमाने में सफल रही। अच्छा होगा कि गुपकार गठबंधन के नेता इस मुगालते से बाहर आएं कि कश्मीर उनकी निजी जागीर है। जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद चुनावों का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि कुछ समय पहले पंचायत चुनावों के समय घाटी में कई स्थानों पर एक से अधिक प्रत्याशी ही नहीं थे। इस बार ऐसी स्थिति नहीं दिखी।


इन चुनावों ने यह भी संकेत दिया है कि विधानसभा चुनावों के लिए भी तैयारी की जा सकती है, लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि जम्मू-कश्मीर में त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली सशक्त बने। ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे राज्य की जनता को यह आभास हो कि जिला विकास परिषद के निर्वाचित सदस्यों के जरिये उनकी समस्याओं का समाधान कहीं अधिक आसानी से होने लगा है। इससे लोगों का लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति भरोसा और बढ़ेगा। जब ऐसा होगा तो अलगाववादी ताकतें स्वत: कमजोर होंगी।

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Wednesday, December 23, 2020

जम्मू-कश्मीर डीडीसी चुनाव: लोगों का बढ़-चढ़कर भाग लेना देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दर्शाता है पूरा भरोसा ( दैनिक जागरण)

ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे राज्य की जनता को यह आभास हो कि जिला विकास परिषद के निर्वाचित सदस्यों के जरिये उनकी समस्याओं का समाधान कहीं अधिक आसानी से होने लगा है। इससे लोगों का लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति भरोसा और बढ़ेगा।


जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद के चुनाव नतीजों का यदि कोई सबसे उल्लेखनीय पक्ष है तो यही कि उनके जरिये इस केंद्र शासित प्रांत के लोगों की लोकतंत्र के प्रति आस्था प्रदर्शित हुई। इसकी एक झलक इन चुनावों के दौरान दर्ज किए गए मतदान प्रतिशत से भी मिली थी। उस कश्मीर घाटी में भी ठीक-ठाक मतदान हुआ था, जहां के बारे में यह माहौल बनाया जा रहा था कि अनुच्छेद 370 और 35-ए खत्म किए जाने के कारण लोग इन चुनावों से दूर रहना पसंद कर सकते हैं। ऐसा कुछ नहीं हुआ। जम्मू की तरह कश्मीर की जनता ने भी इन चुनावों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर यही साबित किया कि उनका भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पूरा भरोसा है। शायद लोगों के इसी रुख को भांपकर गुपकार गठबंधन वाले दलों और खासकर इस गठजोड़ की अगुआई कर रहे नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने इन चुनावों में भाग लेने का फैसला किया, जबकि पहले वे भड़काऊ बयानबाजी करने के साथ उनके बहिष्कार की बात कर रहे थे।


हो सकता है कि जिला विकास परिषद के चुनाव नतीजों के बाद गुपकार गठबंधन के नेता नए सिरे से अनुच्छेद 370 की वापसी की अपनी मांग पर जोर दें, लेकिन बेहतर होगा कि वे इस जमीनी हकीकत से दो-चार हों कि ऐसा कभी नहीं होने वाला। इसलिए नहीं होने वाला, क्योंकि यह अस्थायी अनुच्छेद विभाजनकारी होने के साथ ही राष्ट्रीय एकता में बाधक भी था। इसके अतिरिक्त यह अलगाववाद को हवा देने के साथ-साथ कश्मीरियत को नष्ट-भ्रष्ट करने का भी काम कर रहा था। गुपकार गठबंधन को इसकी भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि उसके तमाम नकारात्मक प्रचार के बाद भी घाटी में भाजपा अपनी जड़ें जमाने में सफल रही। अच्छा होगा कि गुपकार गठबंधन के नेता इस मुगालते से बाहर आएं कि कश्मीर उनकी निजी जागीर है। जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद चुनावों का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि कुछ समय पहले पंचायत चुनावों के समय घाटी में कई स्थानों पर एक से अधिक प्रत्याशी ही नहीं थे। इस बार ऐसी स्थिति नहीं दिखी।


इन चुनावों ने यह भी संकेत दिया है कि विधानसभा चुनावों के लिए भी तैयारी की जा सकती है, लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि जम्मू-कश्मीर में त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली सशक्त बने। ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे राज्य की जनता को यह आभास हो कि जिला विकास परिषद के निर्वाचित सदस्यों के जरिये उनकी समस्याओं का समाधान कहीं अधिक आसानी से होने लगा है। इससे लोगों का लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति भरोसा और बढ़ेगा। जब ऐसा होगा तो अलगाववादी ताकतें स्वत: कमजोर होंगी।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Tuesday, December 22, 2020

वायरस की नई चुनौती: ब्रिटेन में फैले कोरोना वायरस के नए रूप से पूरी दुनिया में मचा हड़कंप, भारत ने रोकी उड़ानें ( दैनिक जागरण)

ब्रिटेन में कोरोना वायरस के एक अलग रूप ने जिस तेजी के साथ लोगों को संक्रमित करना शुरू किया उसके चलते वहां हड़कंप मचना और उसका असर दुनिया भर में नजर आना स्वाभाविक है। ब्रिटेन में फैले कोरोना वायरस के इस नए रूप से चिंता इसलिए और अधिक बढ़ गई है, क्योंकि फिलहाल उसकी रोकथाम का कोई उपाय नहीं दिख रहा है। इस पर आश्चर्य नहीं कि ब्रिटेन में कोरोना वायरस के एक नए रूप के सक्रिय होने की सूचना मिलते ही एक के बाद एक देशों ने वहां के लिए अपनी उड़ानें रोक दीं। भारत सरकार ने भी ऐसा ही फैसला लिया। वर्तमान परिस्थितियों में यह बिल्कुल सही फैसला है। उचित तो यह होगा कि बीते कुछ दिनों में ब्रिटेन से आए लोगों के स्वास्थ्य की निगरानी की जाए। इसके अतिरिक्त डेनमार्क, नीदरलैंड आदि यूरोपीय देशों से आने वालों की सेहत का भी गहन परीक्षण किया जाए, क्योंकि माना जा रहा है कि ब्रिटेन में कोरोना वायरस के जिस नए रूप ने सिर उठा लिया है वह इन देशों में भी पहुंच गया है।


वास्तव में भारत को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। इस क्रम में यह भी होना चाहिए कि बाहर से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के यात्रा विवरण को अच्छी तरह खंगाला जाए, क्योंकि यह संभव है कि वह कुछ दिन पहले ब्रिटेन गया हो। ऐसी सतर्कता इसके बावजूद बरती जानी चाहिए कि अभी यह पता नहीं कि ब्रिटेन में कोरोना वायरस का जो बदला हुआ रूप दिखा है वह कितना घातक है। फिलहाल तो यही अपने आप में बर्ड़ी ंचता की बात है कि यह कहीं अधिक तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है और इसके बारे में कुछ पता नहीं कि उस पर वैक्सीन असर करेगी या नहीं? ब्रिटेन से सबक लेते हुए भारत के स्वास्थ्य तंत्र को इसके लिए चौकस रहना चाहिए कि देश के किसी हिस्से में कोरोना वायरस अपना रूप बदलकर सक्रिय न होने पाए, क्योंकि वायरस खुद में बदलाव करते रहते हैं और वे मूल वायरस से कहीं अधिक घातक साबित हो जाते हैं। नि:संदेह चौकसी का परिचय आम लोगों को भी देना होगा, क्योंकि भले ही पिछले कुछ दिनों से कोरोना मरीजों की संख्या घट रही हो, लेकिन अभी इसके प्रति सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता कि भारत कोरोना की दूसरी लहर से बचा रहेगा। जब तक कोरोना संक्रमण न्यूनतम स्तर तक न पहुंच जाए तब तक शासन-प्रशासन के साथ-साथ आम लोगों को भी सावधानी का परिचय देना चाहिए। यह ठीक नहीं कि बार-बार के आग्रह और अनुरोध के बावजूद लोग मास्क का इस्तेमाल करने और शारीरिक दूरी बनाए रखने के प्रति अपेक्षित सतर्कता नहीं बरत रहे हैं।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Monday, December 21, 2020

समाधान जरूरी है (राष्ट्रीय सहारा)

इसमें दो राय नहीं है कि देश में किसानों की हालत लगातार खराब हुई है। गत ७३ वर्षों में उनकी स्थिति सुधारने के लिए अगर कोई प्रयास किए गए हैं तो उसका फायदा नहीं हुआ है। किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने के लिए २००४ में तब की सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया था। ‘नेशनल कमीशन अन फार्मर्स' को ‘स्वामीनाथन आयोग' के नाम से भी जाना जाता है।


इस आयोग ने पांच रिपोर्ट दी हैं। अंतिम व पांचवीं रिपोर्ट चार अक्टूबर‚ २००६ को दी गई थी। इस रिपोर्ट की सिफारिशें आज तक लागू नहीं की जा सकी हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि नये कृषि कानून किसानों के हक में हैं। इसलिए किसानों की मांग न होते हुए भी‚ सरकार ने अचानक बिना घोषित तैयारी के जल्दबाजी में तीन कृषि कानून पास कर दिए। संसद में इन पर चर्चा नहीं होना और इन्हें पास किए जाने का तरीका विवादास्पद रहा। पर सरकार इन कानूनों के आलोचकों को भ्रमित बता रही है‚ जबकि दूसरी ओर विपक्षी दल इसे नोटबंदी की तरह ही जल्दीबाजी में बनाया गया कानून कह कर सरकार से इस पर संसद में बहस की मांग कर रहे हैं। उनका आरोप है कि इस बहस से बचने के लिए ही सरकार ने संसद का शीतकालीन सत्र कोविड के बहाने रद्द किया है‚ जबकि बिहार‚ हैदराबाद चुनावों व सिंघु सीमा पर जमी किसानों की भारी भीड़ कोविड के भय को आईना दिखा रही है। किसानों‚ सरकार व विपक्ष के बीच ऐसे अविश्वास के माहौल में अगर बातचीत नहीं होगी तो समस्या का हल निकलने की संभावना नहीं दिखती है। 


 उधर कुछ राजनैतिक कार्यकर्ताओं द्वारा किसानों को खालिस्तानी और न जाने क्या–क्या कहा जा रहा है‚ जबकि आंदोलनकारी सरकार पर पूंजीपतियों के हित में काम करने का आरोप लगा रहे हैं। सवाæच्च न्यायालय ने भी किसानों के आंदोलन के हक को संवैधानिक बताते हुए सरकार को वार्ता जारी रखने का निर्देश दिया है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर व रेल मंत्री पीयूष गोयल‚ यहां तक की गृह मंत्री अमित शाह तक किसानों से वार्ता कर चुके हैं पर अभी तक हल नहीं निकला है। अब तो किसान बात करने को भी तैयार नहीं हैं। तो बीच का रास्ता निकालना मुश्किल है। पर कोशिशें जारी हैं। यह दिलचस्प है कि उत्पादन कम होना खेती की समस्या की नहीं है। अगर ऐसा होता तो उसे उत्पादन बढ़ाकर ठीक किया जा सकता था। 


 हरित क्रांति के बाद देश में अनाज का पर्याप्त उत्पादन हो रहा है और इस मामले में हम आत्मनिर्भर हैं। पर खेती करने वाले किसान आत्मनिर्भर नहीं हैं। जरूरत उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की है और इसके लिए उन्हें उत्पाद का वाजिब मूल्य मिलना जरूरी है। अभी तक यह न्यूनतम समर्थन मूल्य से सुनिश्चित किया जाता था। पर नये कानून में इसका प्रावधान नहीं है। हालांकि सरकार कह रही है कि वह व्यवस्था बनी रहेगी। विरोध और विवाद का मुद्दा यही है और यह सरकार की साख तथा भरोसे से भी जुड़ा है। 


 वैसे‚ यह समझने वाली बात है कि किसान को जरूरत न्यूनतम समर्थन मूल्य की है न कि कहीं भी बेचने की आजादी। किसान खराब होने वाली अपनी फसल लेकर बाजार में घूमे भी तो खरीदने वाला उसे उचित कीमत नहीं देगा क्योंकि वह जानता है कि पैदावार कुछ दिन में खराब हो जाएगा और किसान की मजबूरी है कि वह उसे जो कीमत मिल रही है उसपर बेचे। कोई भी खरीदार इसका लाभ उठाएगा और यही किसान की समस्या है। न्यूनतम समर्थन मूल्य आसान उपाय है। दूसरा उपाय यह हो सकता था कि किसानों की पैदावार को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था हो और वह सही समय पर अपनी उपज सही मूल्य पर (सही बाजार में) बेच पाए। पर खुले ट्रक या ट्रैक्टर पर किसानों की ज्यादातर फसल कुछ दिन में बेकार हो जाती है। इसलिए किसानों को करपोरेट की तरह एमआरपी यानी अधिकतम खुदरा मूल्य की सुविधा नहीं मिलती है बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुविधा थी जो अब खत्म होती लग रही है। ऐसे में उनका परेशान होना वाजिब है। 


 समस्या इतनी ही नहीं है। न्यूनतम समर्थन मूल्य जब जरूरी है और उसे खत्म किया जा रहा है तो यह कौन बताए और कौन सुनेगा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य भी लागत और आवश्यक मुनाफे के लिहाज से कम होता है और इसे बढ़ाने की जरूरत है पर अभी तो उसकी बात ही नहीं हो रही है। पूरी व्यवस्था ही उलट–पुलट हो गई लगती है। यह दिलचस्प है कि एक तरफ सरकार किसानों को नकद आर्थिक सहायता दे रही है और दूसरी ओर उसे सरकार की नीति का विरोध करने वाले किसान संपन्न नजर आ रहे हैं। इसे खूब प्रचारित किया जा रहा है। आम जनता को यह बताने की कोशिश की जा रही है कि सरकार का विरोध करने वाले गरीब‚ परेशान या प्रभावित नहीं हैं और जो गरीब‚ परेशान या प्रभावित हैं वे नकद सहायता से खुश हैं। 


 अव्वल तो यह वास्तविकता नहीं हो सकती है पर हो भी तो स्थायी समाधान नहीं है। यह अनवरत नहीं चलता रह सकता है कि किसान सब्सिडी से काम चलाएं। कुछ उपाय तो किया ही जाना चाहिए। और अगर इतने बड़े आंदोलन से भी इस जरूरत को नहीं महसूस किया गया है तो यह चिंता की बात है। जैसा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि कृषि बिल के हर बिंदु पर सरकार और किसानों के बीच खुले मन से विमर्श होना चाहिए जिससे‚ अगर कोई भ्रम है तो वो दूर हो जाए और अगर कानून गलत बन गया है तो उसका संशोधन हो जाए। इसलिए दोनों पक्षों के बीच वार्ता होना बहुत जरूरी है।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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