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Saturday, November 28, 2020

नए कृषि कानूनों का बेजा विरोध: धरना-प्रदर्शन और सड़कें जाम करने बड़ी संख्या में दिल्ली आ डटे किसान (दैनिक जागरण)

 Bhupendra Singh

धरना-प्रदर्शन और सड़कें जाम करना अपनी बात कहने का तरीका नहीं हो सकता। जब केंद्र सरकार बार-बार यह कह रही है कि वह किसानों से बातचीत के लिए तैयार है तब उचित यही है कि अपनी आशंकाओं का समाधान वार्ता के जरिये ही किया जाए।


किसी को बरगलाने के कैसे नतीजे सामने आते हैं, इसका ताजा उदाहरण है दिल्ली में बड़ी संख्या में किसानों का आगमन। दिल्ली आ डटे ज्यादातर किसान पंजाब के हैं, जो वहां पहले से धरना-प्रदर्शन करने में लगे हुए थे। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि पंजाब के किसानों को उकसाकर पहले राज्य में आंदोलन के लिए उतारा गया और अब उन्हें दिल्ली भेज दिया गया है। समझना कठिन है कि हाल में संसद से पारित नए कृषि कानूनों से केवल पंजाब के किसानों को ही समस्या क्यों है? अगर नए कृषि कानून वास्तव में किसानों के लिए अहितकारी हैं तो फिर देश के अन्य हिस्सों के किसान पंजाब के किसानों की राह पर चलना पसंद क्यों नहीं कर रहे हैं? इस सवाल का एक जवाब यही है कि पंजाब के किसानों के आंदोलन के पीछे संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ हैं। किसानों को आगे कर राजनीतिक दल और आढ़तियों के संगठन अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में लगे हुए हैं।


हैरानी नहीं कि दिल्ली में कुछ वैसी ही स्थितियां देखने को मिलें जैसी नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ नजर आई थीं और शाहीन बाग इलाके में धरना देकर पूरे दिल्ली-एनसीआर की नाक में दम कर दिया गया था। नए कृषि कानूनों के विरोध में ऐसी स्थिति न बनने पाए, यह किसान संगठनों को भी सुनिश्चित करना होगा और साथ ही उन्हें समर्थन देने वाले किस्म-किस्म के संगठनों को भी और दिल्ली पुलिस को भी।


नए कृषि कानूनों के विरोध का औचित्य इसलिए नहीं बनता, क्योंकि अनाज खरीद की जो पुरानी व्यवस्था है उसमें कहीं कोई बदलाव नहीं किया गया है। नए कानूनों के जरिये एक वैकल्पिक व्यवस्था को आकार दिया गया है। यदि किसानों को पहले वाली व्यवस्था ठीक लगती है तो वे नए विकल्प के बजाय पुराने विकल्प को आजमाने के लिए स्वतंत्र हैं। बेहतर हो कि किसान संगठन यह देखें कि लगभग पूरे देश में किसानों को नए कानूनों से कहीं कोई समस्या नहीं है। उन्हें यह भी समझने की आवश्यकता है कि राजनीतिक दलों के बहकावे में आकर नए कृषि कानूनों का विरोध करके वे सबसे अधिक अपना ही अहित कर रहे हैं। उन्हें आढ़तियों के संगठनों के हाथों का खिलौना बनने के बजाय नई व्यवस्था के बारे में नीर-क्षीर ढंग से विचार करना चाहिए। वे यदि सुधार की राह पर चलने से इन्कार करेंगे तो अपने अतिरिक्त किसी अन्य को दोष नहीं दे सकते।

 

धरना-प्रदर्शन और सड़कें जाम करना अपनी बात कहने का तरीका नहीं हो सकता। जब केंद्र सरकार बार-बार यह कह रही है कि वह किसानों से बातचीत के लिए तैयार है तब उचित यही है कि अपनी आशंकाओं का समाधान वार्ता के जरिये ही किया जाए।


सौजन्य - दैनिक जागरण। 

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Friday, November 27, 2020

अफगानिस्तान में गहराती अनिश्चितता (दैनिक ट्रिब्यून)

जी. पार्थसारथी


अमेरिका अफगानिस्तान से अपनी फौज हटाने की तैयारी कर रहा है, तो उन परिस्थितियों का सिंहावलोकन जरूरी है, जिनकी वजह से सैन्य हस्तक्षेप करना पड़ा था। 9 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क और वाशिंगटन पर आतंकी हमला करने वाले अल-कायदा गुट का डेरा उस वक्त अफगानिस्तान में था। एक महीने के भीतर अमेरिका ने तालिबान के शासन वाले इलाके में आतंकी ठिकानों पर भारी हवाई बमबारी की, तत्पश्चात सेना उतार दी। तालिबान सरगना मुल्ला उमर, जो ओसामा बिन लादेन का मेजबान था, वह खुद समर्थकों समेत भागकर पाकिस्तान में जा छिपा था। तब से शुरू हुई लड़ाई आज 19 साल बाद भी जारी है। अमूनन 1 लाख 11 हजार अफगान और 4092 अमेरिकी सैनिक इसमें होम हो चुके हैं। हैरानी की बात है कि अमेरिका ने इस युद्ध में पाकिस्तान को एक मुख्य सहयोगी बताया था और खुलकर आर्थिक और सैन्य मदद की थी। पाकिस्तान ने इस मदद के बड़े भाग को जनजातीय क्षेत्र की पश्तून आबादी को ‘सबक सिखाने’ हेतु चलाए गए थल और वायुसेना अभियान में खर्च कर डाला। इसमें उत्तरी वजीरिस्तान और पाक-अफगान सीमांत क्षेत्र शामिल हैं।


अपनी यादों पर आधारित किताब ‘ए प्रॉमिस्ड लैंड’ में पूर्व राष्ट्रपति ओबामा ने 1-2 मई, 2012 की अफगानिस्तान यात्रा का जिक्र करते हुए वहां की परिस्थितियों के बारे लिखा है-‘एक बहुत सम्माननीय पूर्व सीआईए अधिकारी ने बताया था कि कैसे पाकिस्तानी सेना/आईएसआई न केवल पाक-अफगान सीमा के निकट स्थित क्वेटा में रह रहे तालिबान नेतृत्व की मौजूदगी में सहयोग कर रही है बल्कि अफगान सरकार को कमजोर करने के लिए अंदरखाते उनकी मदद भी कर रही है, साथ ही पाकिस्तान अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी भारत का प्रभाव अफगानिस्तान में सीमित करने के लिए भी ऐसा कर रहा है।’ ओबामा आगे लिखते हैं-‘अमेरिकी सरकार ने लंबे समय तक अपने इस कथित सहयोगी, जिसको खरबों डॉलर सैन्य और आर्थिक मदद में दिए थे, उसके दोहरे चरित्र को सहा है, इस जानकारी के बावजूद कि हिंसक अतिवादियों के साथ उसकी मिलीभगत है, और वह मुल्क जिसका रिकार्ड बतौर एक गैर जिम्मेवार परमाणु शस्त्र बनाने वाले देश का रहा हो, यह बात अमेरिकी विदेश नीति में विसंगतियों के बारे में बताती है।’ पाकिस्तान के इस दोहरे किरदार के बारे में पता होने के बावजूद ओबामा यहां बचाव की मुद्रा में दिखाई देते हैं, जब उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को एेबटाबाद में की गई अमेरिकी छापामार कार्रवाई में बिन लादेन को मार गिराने के बारे में औपचारिक रूप से बताया था तो लगता नहीं कि उन्होंने आतंकियों के मास्टमाइंड ओसामा को पाकिस्तान में सुरक्षित ठिकाना मुहैया करवाने को लेकर रोष प्रकट किया होगा, वह भी राजधानी इस्लामाबाद के पास स्थित छावनी से सटे उस इलाके में, जहां पाकिस्तानी डिफेंस एकेडमी स्थित है!


पाकिस्तान अब अजीब स्थिति में है। वहां सत्ता और फौज में हावी पंजाबियों को बलूचिस्तान में लगातार विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है, जहां प्रतिरोध और प्रदर्शनों को कुचलने के प्रयास असफल रहे हैं। पिछले कुछ दशकों से पश्तून बहुल खैबर पख्तूनवा प्रांत में भी विद्रोह का सामना कर पड़ रहा है, हालांकि पाकिस्तानी सेना में बड़ी संख्या में पश्तून हैं। 16 दिसंबर 2014 को तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के 6 बंदूकधारियों ने पेशावर स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल पर आतंकी हमला किया था। सभी आतंकी विदेशी मूल के थे, जिनमें 1 चेचन्या से, 3 अरबी और 2 अफगान थे। इन्होंने स्कूल में दाखिल होकर अध्यापकों और बच्चों पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी। कुल मिलाकर 149 लोग मारे गए थे, जिसमें 132 बच्चे थे, जिनकी उम्र 8 से 18 साल के बीच थी। तत्कालीन पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ ने इसका प्रतिकर्म करते हुए पाकिस्तानी थल और वायु सेना के जरिए उत्तरी वजीरिस्तान के जनजातीय इलाके पर भीषण बमबारी करवाई थी।


अल ज़ज़ीरा ने बताया था कि लगभग 10 लाख लोगों को अपने घर बार छोड़ना पड़ा, हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस कार्रवाई को अल-कायदा, तालिबान और इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उजबेकिस्तान की मौजूदगी को नेस्तनाबूद करने में ‘आखिरी धक्का’ बताया था, जिन्हें पिछले 14 सालों से वजीरिस्तानी जनता झेल रही थी। स्थानीय लोगों को अपनी घर वापसी की आस निकट भविष्य में कम ही है। हजारों घर और कामधंधे हवाई बमबारी और बुलडोजरों के जरिए मटियामेट कर दिए गए। दक्षिणी वजीरिस्तान में भी पाकिस्तानी सैनिकों ने वर्ष 2009 में बड़े पैमाने पर निर्मम कार्रवाई की थी। इसमें भी हजारों लोगों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा था। उत्तरी वजीरिस्तान में आईएसआई अपने चेले हक्कानी नेटवर्क के आतंकियों को अफगान सेना पर सीमापारीय हमले करने में भी मदद करती है।


अफगानिस्तान का बड़ा भूभाग तालिबान के कब्जे में है, जहां से वे राजधानी काबुल तक भी लगातार हमले करते रहते हैं। निवर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की मौजूदगी को 4500 से घटाकर 2500 करने के लिए दृढ़संकल्प थे, जबकि तालिबान अमेरिकियों द्वारा वांछित शांति स्थापना को तैयार नहीं है। खुद अफगान सरकार एकमत नहीं है। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अपने पूर्व डिप्टी अब्दुल्ला-अब्दुल्ला को दोहा में तालिबान से वार्ता करने को अधिकृत किया। उन्होंने हाल ही में पाकिस्तान और भारत की यात्रा की थी। आईएसआई दिखावा कर रही है कि वह अफगानिस्तान में शांति बनाने को तालिबान पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रही है। वास्तव में वह तालिबान को उकसा रही है ताकि समूचे अफगानिस्तान के ज्यादा से ज्यादा इलाके पर उनका कब्जा हो जाए। अमेरिका को इस बात पर राजी करना होगा कि अफगानिस्तान में तालिबान से निपटने हेतु सघन हवाई बमबारी फिर से शुरू करे।


यहां याद रखने की जरूरत है कि अधिकांश अफगान नागरिक पश्तून बहुल तालिबान और उसके गुरु आईएसआई को नापसंद करते हैं। अफगानिस्तान की गैर-पश्तून बहुसंख्यक आबादी ताजिक, हजारा, उजबेक, तुर्कमानी, बलूच और अन्य जातियों से मिलकर बनी है, जो कुल जनसंख्या का 59 प्रतिशत हैं, और इन लोगों ने अमेरिकी पदार्पण से पहले ‘नार्दन एलाएंज़’ के झंडे तले तालिबान के साथ लड़ाई लड़ी थी। अमेरिका को प्रेरित किया जाना चाहिए कि तमाम जनजातियों में एकता करवाकर संयुक्त मोर्चा बनवाए। अफगान सरकार के अलावा ऐसे नेता हैं, मसलन पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई और अब्दुल्ला-अब्दुल्ला, जो उक्त तालिबान-पाकिस्तानी सेना गठजोड़ के विरुद्ध विभिन्न जातियों के बीच एकता बनाने में ‘पुल’ का काम कर सकते हैं। अफगान लोग तालिबान का राज नहीं चाहते। पश्तूनों की एक बड़ी संख्या में यह बात बलवती है कि भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक राज के दौरान सीमा के तौर पर चिन्हित की गई डूरंड रेखा नाजायज थोपी गई है। लेखक को अपने एक पश्तून मित्र की बताई बात याद आ रही है, उसने कहा था कि अफगानिस्तान की वास्तविक रिवायती सीमा मौजूदा डूरंड रेखा न होकर सदियों से अटक नामक जगह पर बहते दरिया सिंधु नदी के किनारों से चिन्हित रही है।


लेखक पूर्व राजनयिक हैं।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Thursday, November 26, 2020

Editorial : जम्मू-कश्मीर में 25000 करोड़ का जमीन घोटाला, रोशनी एक्ट की आड़ में गुपकार गैंग' का चेहरा हुआ बेनकाब (दैनिक जागरण)

जम्मू-कश्मीर के रोशनी भूमि घोटाले में जिस तरह राज्य के कई बड़े नेताओं के सामने आए हैं उससे यही पता चलता है कि धांधली को शीर्ष स्तर पर संरक्षण मिला हुआ था। यह घोटाला करीब 25000 करोड़ रुपये का है।


जम्मू-कश्मीर के रोशनी भूमि घोटाले में जिस तरह राज्य के कई बड़े नेताओं के सामने आए हैं उससे यही पता चलता है कि धांधली को शीर्ष स्तर पर संरक्षण मिला हुआ था। इस संरक्षण के कारण ही इस पर हैरानी नहीं कि घोटाले में प्रमुख नेताओं के साथ-साथ नौकरशाह, व्यापारी एवं अन्य प्रभावशाली लोगों के भी नाम सामने आ रहे हैं। अभी तक के आकलन के अनुसार यह घोटाला करीब 25,000 करोड़ रुपये का है। इसका मतलब है कि जिन लोगों पर सरकारी संपत्ति की देखरेख की जिम्मेदारी थी उन्होंने ही उसकी लूट की। यह एक तरह से बाड़ खेत को खाए वाला मामला लगता है। इससे संतुष्ट नहीं हुआ सकता कि इस घोटाले में एक बड़ी संख्या में लोगों के नाम सामने आ गए हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई है, क्योंकि आवश्यकता इस बात की है कि घोटाले में शामिल लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई भी की जाए।


यह घोटाला सामने आने के बाद गुपकार गठजोड़ को गुपकार गैंग की संज्ञा देना उचित ही जान पड़ता है। जिस तरह नेशनल काफ्रेंस, पीडीपी और कांग्रेस ने सरकारी जमीनों की खुलकर बंदरबांट की और उसमें अपने रिश्तेदारों के साथ-साथ मित्रों और परिचितों को भी लाभान्वित किया उससे तो यही लगता है कि कहीं कोई रोकटोक नहीं थी और न ही किसी के मन में इसका भय था कि यदि कभी सच्चाई सामने आई तो क्या होगा।



रोशनी योजना में धांधली के जैसे तथ्य सामने आ रहे हैं वे यह भी बताते हैं कि कश्मीर केंद्रित राजनीतिक दलों ने संसाधनों को दोनों हाथों से मनमाने तरीके से लूटा। यह तो गनीमत रही कि मामला हाई कोर्ट के पास गया और उसने सीबीआइ को जांच के आदेश दिए अन्यथा हजारों करोड़ रुपये का यह घोटाला तो दबा ही रहता। आखिर यह तथ्य है कि हाई कोर्ट को पूर्व की जांच एजेंसियों को इसके लिए फटकार लगानी पड़ी कि उन्होंने अपना काम सही तरीके से नहीं किया। इस घोटाले ने इस आवश्यकता को नए सिरे से रेखांकित किया है कि सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की निगरानी की जरूरत है। इस जरूरत की पूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अलावा यह भी देखा जाना चाहिए कि कहीं इसी तरह के अन्य घोटाले तो अंजाम नहीं दिए गए।



यह घोटाला इसलिए कहीं अधिक लज्जाजनक है, क्योंकि रोशनी एक्ट कथित तौर पर गरीबों की भलाई करने के इरादे से लाया गया था, लेकिन जो नेता इस एक्ट को लाए उन्होंने गरीबों का हित करने के बजाय खुद का घर भरना शुरू कर दिया। विडंबना यह रही कि एक के बाद एक सरकारों ने इस घोटाले को रोकने के बजाय उसमें भागीदारी करना जरूरी समझा।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Editorial : आतंकवाद, नशे के कारोबार को बल देने वाली मनी लांड्रिंग पर अंकुश नहीं लग पाना एक बड़ी चुनौती (दैनिक जागरण)

काले धन को संरक्षित करने वाले देश केवल गरीब देशों के हितों को ही नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि मानवता के समक्ष मुश्किलें भी बढ़ाते हैं। भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन मुद्दों को तब तक उठाता रहे जब तक कि वांछित नतीजे सामने नहीं आ जाते।


यह अच्छा हुआ कि जी-20 के शिखर सम्मेलन में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी एफएटीएफ के प्रमुख ने इस पर जोर दिया कि मनी लांड्रिंग के मामले में और अधिक सख्ती दिखाने की जरूरत है। एफएटीएफ प्रमुख के इस कथन का सीधा मतलब है कि आतंकवाद, नशे के कारोबार, मानव तस्करी आदि को बल देने वाली मनी लांड्रिंग पर पर्याप्त अंकुश नहीं लग पा रहा है। यह स्थिति चिंताजनक है और एक ऐसे समय और भी जब आतंकवाद का खतरा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। भले ही एफएटीएफ प्रमुख ने मनी लांड्रिंग पर रोक लगाने के मामले में जी-20 देशों को उदाहरण पेश करने की बात कही हो, लेकिन सच तो यह है कि उदाहरण प्रस्तुत करने की जरूरत खुद इस संस्था को भी है।


कम से कम भारत तो इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि आतंकवाद को हर तरह से सहयोग-समर्थन और संरक्षण देने के बावजूद पाकिस्तान पर कठोर कार्रवाई करने के बजाय उसे बार-बार मोहलत दी जा रही है। मोहलत का यह सिलसिला एक तरह से आतंकवाद को पालने-पोसने वाले देशों के प्रति बरती जाने वाली लापरवाही है।


समस्या केवल यह नहीं है कि विश्व के प्रमुख देश मनी लांड्रिंग पर रोक के लिए अपेक्षित कदम नहीं उठा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट टैक्स संबंधी नियमों का उल्लंघन कर रही हैं। इस उल्लंघन के चलते भारत सरीखे देशों को अच्छा-खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है। हाल में एक अंतरराष्ट्रीय संस्था टैक्स जस्टिस नेटवर्क की रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि भारत को अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट टैक्स से जुड़े कानूनों के दुरुपयोग के कारण प्रति वर्ष लगभग 75,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। यह उचित नहीं है कि कॉरपोरेट टैक्स के मामले में अलग-अलग देशों के नियमों में विसंगति का फायदा कर चोरी के लिए उठाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसके खिलाफ न केवल एकजुट होना होगा, बल्कि प्रभावी उपाय करते दिखना भी होगा। यह ठीक है कि कर चोरी के ठिकाने माने जाने वाले देशों ने भारत की पहल पर अपने नियम-कानूनों में कुछ तब्दीली की है और सूचनाओं को साझा करने का सिलसिला भी तेज हुआ है, लेकिन इससे इन्कार नहीं कि अभी बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है।


यह समझने की आवश्यकता है कि काले धन को संरक्षित करने वाले देश केवल गरीब देशों के हितों को ही नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि मानवता के समक्ष मुश्किलें भी बढ़ाते हैं। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह न केवल जी-20, बल्कि अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन मुद्दों को तब तक उठाता रहे जब तक कि वांछित नतीजे सामने नहीं आ जाते।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Wednesday, November 18, 2020

Editorial : मोदी की आतंक के खिलाफ आवाज: आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों का संगठित तरीके से हो विरोध

 Bhupendra Singh

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की ओर से आतंकवाद के खिलाफ उठाई जा रही आवाज तभी अच्छे से सुनी जाएगी जब आतंकवाद के खिलाफ घरेलू मोर्चे पर एकजुटता दिखाने का कोई अवसर छोड़ा नहीं जाएगा।


भारतीय प्रधानमंत्री ने एक बार फिर आतंकवाद का मसला उठाया। इस बार उन्होंने यह मसला ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में उठाते हुए कहा कि आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों को दोषी ठहराया जाए और उनका संगठित तरीके से विरोध हो। नि:संदेह उनका संकेत पाकिस्तान की ओर था, लेकिन कहीं न कहीं चीन भी उनके निशाने पर था। चीन को निशाने पर लेने की आवश्यकता इसलिए थी, क्योंकि वह न केवल पाकिस्तान का अनुचित बचाव करता है, बल्कि उसके यहां के आतंकी सरगनाओं की ढाल भी बनता है। यदि पाकिस्तान किस्म-किस्म के आतंकी संगठनों का सबसे बड़ा गढ़ है तो उसकी तरफदारी करने में सबसे आगे रहने वाले देशों में चीन है।


आखिर कौन भूल सकता है कि चीन किस तरह बरसों तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आतंकी संगठन जैश-ए मुहम्मद के सरगना मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने की पहल का विरोध करता रहा? इसी आतंकी संगठन के दो सदस्य गत दिवस दिल्ली में गिरफ्तार किए गए। पुलवामा हमले के पीछे भी इसी आतंकी संगठन का हाथ था और इसके पहले के अन्य आतंकी हमलों में भी। इसमें कहीं कोई दोराय नहीं कि पाकिस्तान अब भी आतंकी संगठनों को पाल-पोस रहा है और चीन इसकी अनदेखी करने में लगा हुआ है।


हालांकि इस सच से कश्मीरी नेता भी भली तरह परिचित हैं कि चीन किस तरह पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखे हुए है और इसी कारण वह किस प्रकार कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद को हवा देने में लगा हुआ है, फिर भी वे उन नीतियों पर चलना पसंद कर रहे हैं, जो इन दोनों देशों को रास आती हैं अथवा उनके एजेंडे के अनुरूप हैं। इन दिनों जिस गुपकार गठबंधन की चर्चा है, वह और कुछ नहीं, बल्कि पाकिस्तान और चीन के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला राजनीतिक गठजोड़ है। इस गठजोड़ की मांगें कश्मीर में कलह पैदा करने वाली ही अधिक हैं।


यह अच्छा हुआ कि कांग्रेस ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसका गुपकार गठजोड़ से कोई लेना-देना नहीं, लेकिन यह समझना कठिन है कि उसने यह स्पष्टीकरण देने में इतने दिन क्यों खपा दिए? मात्र इस स्पष्टीकरण से काम चलने वाला नहीं है, क्योंकि उसके कुछ नेता वैसी ही बातें करने में लगे हुए हैं, जैसी गुपकार गठजोड़ के नेता कर रहे हैं। यह रवैया अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की ओर से आतंकवाद के खिलाफ उठाई जा रही आवाज को बल प्रदान करने वाला नहीं। हमारे राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज तभी अच्छे से सुनी जाएगी, जब आतंकवाद के खिलाफ घरेलू मोर्चे पर एकजुटता दिखाने का कोई अवसर छोड़ा नहीं जाएगा। 

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Tuesday, November 17, 2020

Editorial : मोदी की आतंक के खिलाफ आवाज: आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों का संगठित तरीके से हो विरोध

 Author: Bhupendra Singh

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की ओर से आतंकवाद के खिलाफ उठाई जा रही आवाज तभी अच्छे से सुनी जाएगी जब आतंकवाद के खिलाफ घरेलू मोर्चे पर एकजुटता दिखाने का कोई अवसर छोड़ा नहीं जाएगा।


भारतीय प्रधानमंत्री ने एक बार फिर आतंकवाद का मसला उठाया। इस बार उन्होंने यह मसला ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में उठाते हुए कहा कि आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों को दोषी ठहराया जाए और उनका संगठित तरीके से विरोध हो। नि:संदेह उनका संकेत पाकिस्तान की ओर था, लेकिन कहीं न कहीं चीन भी उनके निशाने पर था। चीन को निशाने पर लेने की आवश्यकता इसलिए थी, क्योंकि वह न केवल पाकिस्तान का अनुचित बचाव करता है, बल्कि उसके यहां के आतंकी सरगनाओं की ढाल भी बनता है। यदि पाकिस्तान किस्म-किस्म के आतंकी संगठनों का सबसे बड़ा गढ़ है तो उसकी तरफदारी करने में सबसे आगे रहने वाले देशों में चीन है।


आखिर कौन भूल सकता है कि चीन किस तरह बरसों तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आतंकी संगठन जैश-ए मुहम्मद के सरगना मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने की पहल का विरोध करता रहा? इसी आतंकी संगठन के दो सदस्य गत दिवस दिल्ली में गिरफ्तार किए गए। पुलवामा हमले के पीछे भी इसी आतंकी संगठन का हाथ था और इसके पहले के अन्य आतंकी हमलों में भी। इसमें कहीं कोई दोराय नहीं कि पाकिस्तान अब भी आतंकी संगठनों को पाल-पोस रहा है और चीन इसकी अनदेखी करने में लगा हुआ है।


हालांकि इस सच से कश्मीरी नेता भी भली तरह परिचित हैं कि चीन किस तरह पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखे हुए है और इसी कारण वह किस प्रकार कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद को हवा देने में लगा हुआ है, फिर भी वे उन नीतियों पर चलना पसंद कर रहे हैं, जो इन दोनों देशों को रास आती हैं अथवा उनके एजेंडे के अनुरूप हैं। इन दिनों जिस गुपकार गठबंधन की चर्चा है, वह और कुछ नहीं, बल्कि पाकिस्तान और चीन के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला राजनीतिक गठजोड़ है। इस गठजोड़ की मांगें कश्मीर में कलह पैदा करने वाली ही अधिक हैं।


यह अच्छा हुआ कि कांग्रेस ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसका गुपकार गठजोड़ से कोई लेना-देना नहीं, लेकिन यह समझना कठिन है कि उसने यह स्पष्टीकरण देने में इतने दिन क्यों खपा दिए? मात्र इस स्पष्टीकरण से काम चलने वाला नहीं है, क्योंकि उसके कुछ नेता वैसी ही बातें करने में लगे हुए हैं, जैसी गुपकार गठजोड़ के नेता कर रहे हैं। यह रवैया अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की ओर से आतंकवाद के खिलाफ उठाई जा रही आवाज को बल प्रदान करने वाला नहीं। हमारे राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज तभी अच्छे से सुनी जाएगी, जब आतंकवाद के खिलाफ घरेलू मोर्चे पर एकजुटता दिखाने का कोई अवसर छोड़ा नहीं जाएगा। 

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Monday, November 16, 2020

चीन के विस्तारवादी रवैये के चलते चीन के भागीदारी वाले संगठनों से बाहर रहने का भारत ने लिया अडिग फैसला

एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कारोबारी समझौते रीजनल कांप्रेहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप यानी आरसेप से बाहर रहने के अपने फैसले पर अडिग रहकर भारत ने यही स्पष्ट किया कि वह अपने आर्थिक हितों से समझौता करने के लिए तैयार नहीं। विस्तारवाद एक मानसिक विकृति है।


एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कारोबारी समझौते रीजनल कांप्रेहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप यानी आरसेप से बाहर रहने के अपने फैसले पर अडिग रहकर भारत ने यही स्पष्ट किया कि वह अपने आर्थिक हितों से समझौता करने के लिए तैयार नहीं। नि:संदेह चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड समेत आसियान के दस सदस्य देशों वाला आरसेप सबसे बड़ा कारोबारी समझौता है, लेकिन भारत इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि इसमें चीन का दबदबा है और अपने विस्तारवादी रवैये के कारण वह इस क्षेत्र के लिए ही नहीं, विश्व व्यवस्था के लिए भी खतरा बन गया है। उसके इसी रवैये को रेखांकित करते हुए विगत दिवस लोंगेवाला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ तौर पर कहा था कि विस्तारवाद एक मानसिक विकृति है।


एक ऐसे समय जब चीन अपनी विस्तारवादी प्रवृत्ति का परिचय हर क्षेत्र में दे रहा है, तब उसके प्रभुत्व वाले किसी कारोबारी समझौते में भागीदार बनना भारत के हित में नहीं हो सकता-इसलिए और भी नहीं कि एक तो इसका अंदेशा है कि चीन भारत को अपने उत्पादों से पाट सकता है और दूसरे, उसके साथ व्यापार घाटा अभी भी बहुत अधिक है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आर्थिक-व्यापारिक मामलों में चीन के मनमाने रवैये के कारण ही अमेरिका ने भी आरसेप से बाहर रहने का फैसला किया है।


चूंकि आरसेप समझौता 2022 में प्रभावी होना है और भारत को यह सुविधा हासिल है कि वह जब चाहे उसमें शामिल हो सकता है, इसलिए उसके पास अभी अवसर है, लेकिन इस मौके को भुनाने का फैसला तभी किया जाना चाहिए कि जब घरेलू आर्थिक-व्यापारिक हितों पर कोई विपरीत असर न पड़े। यह कहना कठिन है कि भविष्य में क्या सूरत बनेगी, लेकिन इसकी आवश्यकता तो बढ़ ही गई है कि भारत आरसेप और खासकर आसियान समूह के देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को अपने हितों के अनुरूप आकार देने के लिए सक्रिय हो। यदि इन देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को सही स्वरूप दिया जा सके तो ऐसी भी स्थिति बन सकती है कि भारत को आरसेप में शामिल होने की जरूरत ही न पड़े।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Opinion : दीवाली का आगमन कोरोना संकट को टालने में सहायक बने, इसके लिए रहना होगा सभी को सचेत और सक्रिय

दीपावली केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का ही पर्व नहीं हर किसी के सुख और समृद्धि की मंगल कामना का भी अनूठा आयोजन है। अनगिनत दीयों का प्रकाश कोने-कोने से अंधेरे को दूर भगाता है। दीपोत्सव सब मिलकर मनाते हैं।


कैसी भी परिस्थिति हो, पर्वों का आगमन उल्लास और उमंग का संचार करने के साथ मानव जीवन की एकरसता को तोड़ने में सहायक बनता है। दीपोत्सव जैसे सबसे बड़े पर्व से इसकी आशा और अधिक बढ़ जाती है। जन-जन को स्पंदित करने और अपनी परंपराओं से जुड़ने एवं उन्हें समृद्ध बनाने का अवसर प्रदान करने वाले ऐसे पर्व केवल जीवन की एकरसता को ही नहीं तोड़ते, बल्कि हर किसी के मन में आशाओं के दीप भी जलाते हैं। इस बार यह पर्व इसलिए भिन्न परिस्थिति में मनाना पड़ा रहा है, क्योंकि राष्ट्रीय जीवन की गति को बाधित करने वाला कोरोना संकट अभी टला नहीं है। दीपावली का आगमन इस संकट को टालने में सहायक बने, इसके लिए सभी को सचेत भी रहना होगा और सक्रिय भी। वास्तव में यही वह उपाय है, जिससे कोरोना रूपी अंधेरे को आसानी से परास्त किया जा सकता है। यह भी स्मरण रहे कि संकट केवल कोरोना के रूप में ही नहीं है। देश के एक हिस्से का प्रदूषित वायुमंडल भी एक बड़ा संकट है। ऐसे संकटों से तभी पार पाया जा सकता है, जब उनसे सामूहिक तौर पर निपटा जाएगा। जैसे दीपोत्सव सब मिलकर मनाते हैं, वैसे ही हमें राष्ट्रीय समस्याओं को दूर करने के लिए भी एकजुट होना होगा, क्योंकि किसी भी देश की समस्याओं का समाधान सबके सहयोग से ही संभव होता है।


जैसे अनगिनत दीयों का प्रकाश कोने-कोने से अंधेरे को दूर भगाता है, वैसे ही जन-जन का सहयोग भी राष्ट्र को उसकी हर समस्या से लड़ने की साम‌र्थ्य प्रदान करता है। अंधेरे से लड़ने और सुख-समृद्धि की ओर गतिशील होने की प्रेरणा देने वाले इस पर्व की उत्सवधर्मिता में कोई कमी नहीं आनी चाहिए, लेकिन इसी के साथ आवश्यक सतर्कता का परिचय देना भी समय की मांग है। इससे बेहतर और कुछ नहीं कि यह प्रकाश पर्व राष्ट्रीय जीवन के हर अंधेरे पक्ष को दूर करने की संकल्प शक्ति प्रदान करे।


दीपावली केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का ही पर्व नहीं, हर किसी के सुख और समृद्धि की मंगल कामना का भी अनूठा आयोजन है। इस मंगल कामना के साथ हमें समरसता का भी भाव न केवल जगाना होगा, बल्कि अपने कार्य-व्यवहार से उसे पुष्ट भी करना होगा, क्योंकि वही सबकी सुख-समृद्धि का मूल आधार है। इस आधार को सुशोभित करते हुए हमें प्रकृति की भी चिंता करनी होगी। इसलिए और भी अधिक, क्योंकि उसे संरक्षित करके ही हम अपनी तमाम समस्याओं से बचे रह सकते हैं। हमारे अन्य अनेक पर्वो की तरह दीपावली भी प्रकृति के परिवर्तनकारी रूप का ही संदेश देती है और इसका भी कि उसके संरक्षण में ही प्राणि मात्र का हित है।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Thursday, November 12, 2020

Editorial : बिहार जनादेश: बिहार में राजग को जीत मोदी का जादुई करिश्मा और नीतीश के विकास कार्यों के चलते मिली

राजग ने जीत हासिल की तो यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के असर और नीतीश कुमार के जनकल्याणकारी एवं विकास कार्यों के चलते संभव हुआ। बिहार के जनादेश ने बताया कि तेजस्वी यादव एक सक्षम नेता के तौर पर उभर सकते हैं।


जद-यू और भाजपा के लिए बिहार विधानसभा का जो चुनाव आसान नजर आ रहा था, वह यदि अंतिम क्षणों में कांटे के मुकाबले में तब्दील हो गया तो इसका कुछ श्रेय विपक्षी खेमे और खासकर कल तक नीतीश सरकार के साथ रही लोजपा को भी जाता है। भले ही लोजपा ने भाजपा के खिलाफ उम्मीदवार खड़े न किए हों, लेकिन उसके प्रत्याशियों ने जद-यू के प्रदर्शन को विशेष रूप से प्रभावित करने का काम किया। इस सबके बाद भी राजग ने जीत हासिल की तो यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के असर और नीतीश कुमार के जनकल्याणकारी एवं विकास कार्यों के चलते संभव हुआ।


नि:संदेह जद-यू को उम्मीद से कहीं कम सीटें मिलीं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि नीतीश सरकार सत्ता विरोधी प्रभाव का सामना कर रही थी। यदि भाजपा के सहयोग से उसने इस प्रभाव को सीमित करने में सफलता हासिल की तो यह एक उपलब्धि ही है। इसलिए और भी, क्योंकि नीतीश कुमार लगातार चौथी बार सत्ता संभालने जा रहे हैं। ऐसा चंद मुख्यमंत्री ही कर सके हैं। बिहार के जनादेश ने जहां यह बताया कि तेजस्वी यादव एक सक्षम नेता के तौर पर उभर सकते हैं, वहीं यह भी रेखांकित किया कि लोग लालू यादव के जंगलराज को भूले नहीं हैं।


बिहार के लोगों का राजनीतिक फैसला केवल राज्य तक ही सीमित नहीं है। यह फैसला राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डालने वाला है। इसलिए और भी, क्योंकि हाल में महाराष्ट्र और झारखंड में सत्ता गंवाने के बाद भाजपा बिहार में सरकार बचाने में न केवल सफल रही, बल्कि उसने पिछली बार के मुकाबले कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। वास्तव में इसी प्रदर्शन ने नीतीश कुमार की सत्ता सुरक्षित की। बिहार की जीत जद-यू को एक बड़ी राहत देने वाली है तो भाजपा का मनोबल बढ़ाने वाली। यह बढ़ा हुआ मनोबल कुछ समय बाद बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में वैसे ही अप्रत्याशित नतीजे दे सकता है, जैसे लोकसभा चुनाव के समय दिए थे। बिहार के चुनाव नतीजों के साथ मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कनार्टक आदि के उपचुनाव नतीजों की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए, जो भाजपा के पक्ष में गए।

 

ये नतीजे जहां भाजपा की राजनीतिक ताकत के साथ अपने प्रति लोगों के भरोसे को बयान कर रहे हैं, वहीं यह भी कि कांग्रेस किस तरह अपने नकारात्मक रवैये के कारण लगातार ढलान की ओर जा रही है। यदि बिहार में महागठबंधन कांटे की लड़ाई में पिछड़ गया तो कांग्रेस के कारण भी, जो कहीं अधिक सीटों पर लड़ने के बावजूद पिछली बार के प्रदर्शन से बहुत दूर रही। विडंबना यह है कि वह जरूरी सबक सीखने के लिए तैयार नहीं।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Editorial : प्रधानमंत्री मोदी की पाकिस्तान-चीन को नसीहत: एससीओ की मूल भावना का किया जा रहा उल्लंघन

मौजूदा हालात में उचित यह होगा कि भारत शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ और दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन यानी दक्षेस संगठनों से ज्यादा उम्मीदें लगाने के बजाय क्वॉड को और सशक्त करने में जुटे। पाकिस्तान और चीन निशाने पर हैं।


शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के शिखर सम्मेलन को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये संबोधित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिस तरह इस मंच पर द्विपक्षीय मसले उठाने की प्रवृत्ति को आड़े हाथ लेना पड़ा, उससे दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन यानी दक्षेस की याद आ जाना स्वाभाविक है। आज यदि दक्षेस एक निष्प्रभावी संगठन है तो पाकिस्तान के घोर नकारात्मक और गैर जिम्मेदाराना रवैये के कारण। यदि एससीओ के सदस्य देशों और खासकर पाकिस्तान एवं चीन ने अपना रुख-रवैया नहीं बदला तो यह संगठन भी दक्षेस की राह पर जा सकता है। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि पाकिस्तान ने चीन के इशारे पर ही एससीओ के मंच पर द्विपक्षीय मसले उठाने की कोशिश की होगी।


ऐसे में यह अच्छा हुआ कि भारतीय प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट करने में कोई संकोच नहीं किया कि एससीओ में बार-बार अनावश्यक रूप से द्विपक्षीय मुद्दे उठाकर इस संगठन की मूल भावना का उल्लंघन किया जा रहा है। इसी के साथ उन्होंने यह भी साफ किया कि एक-दूसरे की संप्रभुता और अखंडता का सम्मान किए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता। नि:संदेह उनकी इस टिप्पणी के निशाने पर भी पाकिस्तान और चीन ही थे। यह पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के हाव-भाव से भी स्पष्ट हुआ। यदि उन्हें भारतीय प्रधानमंत्री के समक्ष असहज होना पड़ा तो इसके लिए वे अपने अलावा अन्य किसी को दोष नहीं दे सकते।

 

भारत इसकी अनदेखी नहीं कर सकता और न ही उसे करना चाहिए कि चीन लद्दाख सीमा पर किस तरह यथास्थिति से छेड़छाड़ करने की कोशिश में है। चीन केवल भारत की ही अखंडता के लिए खतरे नहीं पैदा कर रहा है, बल्कि वह अपने अन्य पड़ोसी देशों के लिए भी सिरदर्द साबित हो रहा है। इनमें से कुछ एससीओ के भी सदस्य हैं। इन सदस्य देशों और खासकर रूस को इसके लिए अतिरिक्त सतर्क रहना होगा कि एससीओ चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के अड़ियल रवैये का शिकार न बनने पाए। चूंकि इसके आसार कम हैं कि चीन अपने अड़ियल रवैये का आसानी से परित्याग करेगा, इसलिए भारत को यह देखना होगा कि वह इस संगठन से कितनी उम्मीदें लगाए? यही बात एक अन्य संगठन ब्रिक्स पर भी लागू होती है, जिसमें भारत, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के अलावा चीन की भी भागीदारी है।


मौजूदा हालात में उचित यह होगा कि भारत इन दोनों संगठनों से ज्यादा उम्मीदें लगाने के बजाय क्वॉड को और सशक्त करने में जुटे। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि एक तो यह मूलत: लोकतांत्रिक देशों का संगठन है और दूसरे, संयुक्त राष्ट्र भी तेजी के साथ अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Editorial: पटाखे और प्रदूषण: उत्तर भारत में हवा और अधिक जहरीली न हो इसके चलते पटाखों की बिक्री पर लगी रोक

उत्तर भारत के कई हिस्सों में वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर को देखते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी ने दिल्ली-एनसीआर समेत प्रदूषित वायुमंडल वाले इलाकों में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने का फैसला करके समय रहते सही कदम उठाया है।


उत्तर भारत के कई हिस्सों में वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर को देखते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी ने दिल्ली-एनसीआर समेत प्रदूषित वायुमंडल वाले इलाकों में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने का फैसला करके इसलिए सही किया, क्योंकि अतीत का अनुभव यही बताता है कि दीपावली के बाद हवा और अधिक जहरीली हो जाती है। एनजीटी के इस फैसले से कुछ लोगों का असहमत होना और यह कहकर अपनी नाराजगी जताना स्वाभाविक है कि सबसे बड़े पर्व के उत्साह को बाधित करने वाला काम किया जा रहा है, लेकिन इस पर गौर करने की जरूरत है कि प्रदूषण की समस्या को गंभीर बनाने वाला काम करना यानी पटाखे चलाना कोई समझदारी नहीं। इस बार तो इसलिए भी पटाखों के इस्तेमाल से बचा जाना चाहिए, क्योंकि वायु प्रदूषण के चलते कोरोना संक्रमण का प्रकोप बढ़ने का अंदेशा है। इस अंदेशे की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। अच्छा होता कि एनजीटी का आदेश और पहले आ जाता, ताकि पटाखा बेचने वालों की ओर से इस तरह की शिकायत के लिए गुंजाइश नहीं रहती कि आखिर उनके नुकसान के लिए कौन जवाबदेह होगा?


कम से कम भविष्य में तो एनजीटी और साथ ही राज्य सरकारों को यह ध्यान रखना ही चाहिए कि पटाखों की बिक्री पर पाबंदी का फैसला समय रहते लिया जाए। इसके साथ ही इस पर भी गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है कि पटाखे वायु प्रदूषण बढ़ाने का काम अवश्य करते हैं, लेकिन वे इस समस्या की एकमात्र वजह नहीं हैं। वायु प्रदूषण के अन्य कारण हैं पराली यानी फसलों के अवशेष का दहन, सड़कों एवं निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल और वाहनों का उत्सर्जन। यदि इन सब कारणों का निदान नहीं होता और केवल पटाखों की बिक्री रोक दी जाती है तो कुछ खास हासिल होने वाला नहीं है। आखिर यह एक तथ्य है कि इन दिनों दिल्ली-एनसीआर समेत देश के अन्य हिस्सों में खतरनाक स्तर पार कर रहे वायु प्रदूषण में पटाखों की कोई भूमिका नहीं। यह घोर निराशाजनक है केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, उनके प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और सुप्रीम कोर्ट की तमाम सक्रियता के बाद भी इस बार पहले से कहीं अधिक पराली जली।


यह समझ से परे हैं कि पराली दहन के साथ-साथ वायु प्रदूषण के अन्य प्रमुख कारणों का निवारण करने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? हर किसी को पता है कि जब ट्रैफिक जाम के कारण वाहन रेंगते हुए चलते हैं तो उनका उत्सर्जन वायुमंडल में और अधिक जहर घोलने का काम करता है, लेकिन कोई नहीं जानता कि इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा है?

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Monday, November 9, 2020

Editorial : बाइडन के सामने घरेलू-अंतरराष्ट्रीय समस्याओं से निपटने की बड़ी चुनौती, भारत-यूएस संबंध होंगे और मजबूत

यह अच्छा हुआ कि राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद जो बाइडन ने खास तौर पर यह कहा कि वह अमेरिका को एकजुट करेंगे। उनकी ओर से ऐसा कोई संदेश दिया जाना इसलिए आवश्यक था, क्योंकि अमेरिका इसके पहले वैचारिक रूप से इतना अधिक विभाजित कभी नहीं दिखा। बाइडन की जीत यह बता रही है कि अमेरिकी जनता ने ट्रंप के मुकाबले उनसे अधिक उम्मीदें लगा रखी हैं, लेकिन सबसे शक्तिशाली देश का राष्ट्रपति होने के नाते शेष विश्व ने भी उनसे तमाम उम्मीदें लगा रखी हैं। वास्तव में उनके सामने जितनी बड़ी चुनौती घरेलू समस्याओं से निपटने की है, उतनी ही अंतरराष्ट्रीय समस्याओं से भी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती अड़ियल और अहंकारी चीन पर लगाम लगाने की है।


ईरान, तुर्की और उत्तर कोरिया के प्रति तो उनकी संभावित नीति का अनुमान लगाया जा सकता है, क्योंकि वह चुनाव प्रचार के दौरान इन देशों के बारे में अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं, लेकिन यह कहना कठिन है कि वह चीन के मामले में किस नीति पर चलेंगे? निगाह केवल इस पर ही नहीं होगी कि वह चीन के साथ अमेरिका के व्यापार विवाद को कैसे सुलझाते हैं, बल्कि इस पर भी होगी कि वह बीजिंग की विस्तारवादी नीति पर अंकुश लगाने के लिए क्या कारगर कदम उठाते हैं?

 

बाइडन की चीन नीति पर भारत की अतिरिक्त दिलचस्पी होना स्वाभाविक है, क्योंकि चीनी सेना अपने अतिक्रमणकारी रवैये से बाज नहीं आ रही है। बाइडन की ओर से अफगानिस्तान और पाकिस्तान को लेकर अपनाए जाने वाले रवैये में भी भारत की दिलचस्पी होगी। इसमें कोई दोराय नहीं कि ट्रंप ने अफगानिस्तान को तबाह करने वाले तालिबान से समझौता कर आतंक की अनदेखी ही की। उन्होंने तालिबान से समझौता करके जहां पाकिस्तान के मन की मुराद पूरी की, वहीं भारतीय हितों की उपेक्षा भी की। उम्मीद है कि बाइडन प्रशासन यह समझने में देर नहीं करेगा कि तालिबान को पालने वाला पाकिस्तान पहले की ही तरह आतंकवाद को समर्थन देने में लगा हुआ है।

जहां तक अमेरिका और भारत के आपसी संबंधों की बात है, इस पर लगभग सभी एकमत हैं कि दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत होंगे। इसकी एक वजह तो यह है कि ओबामा के दौर में उप राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने भारत से संबंध सुधारने की पहल की थी और दूसरी यह कि आज भारत को अमेरिका की जितनी जरूरत है, उतनी ही उसे भी भारत की। यह भी उल्लेखनीय है कि अब उप राष्ट्रपति कमला हैरिस होंगी, जो भारतीय-अफ्रीकी मूल की हैं। उनका उप राष्ट्रपति निर्वाचित होना अमेरिका के साथ-साथ वहां रह रहे भारतीय मूल के लोगों के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि है।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Editorial : एक देश-एक राशन कार्ड: करोड़ों फर्जी राशन कार्ड पीडीएस में व्याप्त भ्रष्टाचार की कहानी बयां करते हैं

बीते सात सालों में करीब साढ़े चार करोड़ फर्जी राशन कार्डो की पहचान किया जाना सार्वजनिक वितरण प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार की कहानी ही बयान करता है। ये फर्जी राशन कार्ड यह भी बता रहे हैं कि अपात्र लोगों द्वारा किस तरह पात्र लोगों के अधिकारों पर डाका डाला जा रहा था। इतनी बड़ी संख्या में फर्जी राशन कार्डों की पहचान तकनीक के इस्तेमाल और विशेषकर उन्हें आधार कार्ड से जोड़े जाने की प्रक्रिया से ही संभव हुई। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस प्रक्रिया को अपनाए जाने का कैसा विरोध किया गया था? यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं यह विरोध इसलिए तो नहीं किया जा रहा था कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये गरीबों को सस्ते दाम पर दिए जाने वाले अनाज की बंदरबाट होती रहे?


सच्चाई जो भी हो, यह एक तथ्य है कि कई राज्य सरकारों ने राशन कार्डों को आधार से जोड़े जाने की प्रक्रिया को गति देने में सहायक बनने के बजाय इस पर जोर दिया जाए कि ऐसा करने से बचा जाए। यह तो गनीमत रही कि सुप्रीम कोर्ट ने कल्याणकारी योजनाओं को आधार से जोड़े जाने को सही ठहराया, अन्यथा कुछ लोगों का बस चलता तो यह भी नहीं हो पाता। वास्तव में ऐसे ही लोगों के कारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार नहीं हो पा रहा था। 

यदि मोदी सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के लिए प्रतिबद्धता नहीं दिखाई होती तो शायद वह आज भी तमाम खामियों और भ्रष्टाचार से ग्रस्त होती। इस प्रणाली के तहत करीब 80 करोड़ राशन कार्ड धारकों को कहीं कम दाम पर अनाज उपलब्ध कराया जाता है। केंद्र सरकार ने हाल में एक देश-एक राशन कार्ड योजना इस उद्देश्य से शुरू की है कि गरीब लोग देश के किसी भी हिस्से में सस्ते दाम पर अनाज हासिल कर सकें, लेकिन कोई नहीं जानता कि सभी राज्य सरकारें इस योजना को अपनाने के लिए तत्परता क्यों नहीं दिखा रही हैं? एक ऐसे समय जब कोरोना संकट के कारण तमाम लोग शहरों से अपने गांव-घर लौटने को मजबूर हुए हैं, तब इसका कोई औचित्य नहीं कि कुछ राज्य इस योजना को लागू करने में हीलाहवाली का परिचय दें।


समझना कठिन है कि गरीबों के हितों की चिंता में दुबले होते रहने वाले राजनीतिक दल यह सुनिश्चित करना जरूरी क्यों नहीं समझ रहे कि जन कल्याण की एक जरूरी योजना पूरे देश में जल्द से जल्द से लागू हो? अच्छा होगा कि उन्हें यह भी समझ आ जाए कि जन कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ अन्य सरकारी कामकाज में तकनीक का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का एक कारगर उपाय है।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Editorial : वित्त मंत्रालय आम बजट से पहले उद्योग-व्यापार जगत को एक और पैकेज देने पर कर रहा है विचार

जीएसटी संग्रह में वृद्धि के साथ औद्योगिक उत्पादन की स्थिति बताने वाले इंडेक्स में आए उछाल के अलावा हाल में सामने आए अन्य अनेक आर्थिक संकेत यह बता रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था कोरोना के कहर से उबर रही है। इन संकेतों को देखते हुए कुछ लोग यह भी मानने लगे हैं कि अर्थव्यवस्था जल्द ही पटरी पर आ जाएगी। नि:संदेह ऐसा ही होने की उम्मीद की जानी चाहिए, लेकिन इसी के साथ इसकी अनदेखी करना भी ठीक नहीं कि किसी बड़े झटके के बाद अर्थव्यवस्था में यकायक उछाल आना स्वाभाविक है।


ऐसे में यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि अर्थव्यवस्था के सभी प्रमुख आधारों को वास्तविक मजबूती मिले और उनमें सुधार का सिलसिला त्योहारों के बाद भी कायम रहे। शायद यही सुनिश्चित करने के लिए वित्त मंत्रालय आम बजट से पहले उद्योग-व्यापार जगत को एक और पैकेज देने पर विचार कर रहा है। यह विचार-विमर्श स्वत: इस बात को इंगित करता है कि अर्थव्यवस्था को संकट के दौर से उबारने की जरूरत बनी हुई है।

 


नए पैकेज का मुख्य उद्देश्य शहरी इलाकों में मांग की स्थिति सुधारना बताया जा रहा है। अच्छा होगा कि यह पैकेज न केवल शहरी इलाकों में मांग बढ़ाए, बल्कि रोजगार के अवसर पैदा करने में भी सहायक बने। इस पर विशेष ध्यान देना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कोरोना संकट ने तमाम लोगों के रोजगार छीने हैं।


आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों के गति पकड़ने के बाद भी फिलहाल यह कहना कठिन है कि पहले जैसे हालात कब बनेंगे? इस सिलसिले में यह भी ध्यान रहे कि कोरोना संकट के दस्तक देने के पहले भी अर्थव्यवस्था सुस्ती का शिकार थी और कई क्षेत्र मांग में कमी का सामना कर रहे थे। वास्तव में इसी कारण जीडीपी में गिरावट देखने को मिल रही थी। केंद्र सरकार अभी तक उद्योग-व्यापार जगत को दो पैकेज दे चुकी है। तीसरे प्रस्तावित पैकेज के जरिये यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उद्योग-व्यापार जगत की समस्याओं का वास्तविक समाधान हो।



उद्योग-व्यापार जगत की समस्याओं के निदान के कदम उठाते समय यह भी देखा जाना चाहिए कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल देने के लिए कुछ और उपाय करने की आवश्यकता तो नहीं है? इसी तरह महंगाई को नियंत्रित करने पर भी ध्यान देना होगा। इस सबके अलावा इसे लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी कि कोरोना वायरस का संक्रमण फिर सिर न उठाने पाए। भले ही बीते कुछ समय से कोरोना मरीजों की संख्या में गिरावट देखने को मिल रही हो, लेकिन यह कोई शुभ संकेत नहीं कि देश के कुछ हिस्सों में कोरोना संक्रमण बढ़ता दिख रहा है। इनमें दिल्ली-एनसीआर भी है, जो औद्योगिक-व्यापारिक गतिविधियों का एक प्रमुख गढ़ है।



सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Editorial : सत्ता का दुरुपयोग: महाराष्ट्र सरकार ने बदले की भावना से अर्नब को गिरफ्तार कर कीं शर्मनाक की सारी हदें पार

कोई सरकार और उसकी पुलिस किसी के खिलाफ बदले की भावना के तहत कार्रवाई करने के लिए किस तरह सारी हदें पार कर सकती है, इसका शर्मनाक उदाहरण है रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी और इस दौरान उनके साथ की गई मारपीट। चूंकि महाराष्ट्र सरकार और पुलिस उन्हें सबक सिखाने पर आमादा थी, इसलिए एक पुराने मामले को नए सिरे से जांच के लिए खोला गया और फिर उन्हेंं एक अपराधी की तरह गिरफ्तार कर लिया गया। इस पुलिसिया कार्रवाई ने यही बताया कि सत्ता में बैठे लोग किसी के पीछे पड़ जाएं तो पुलिस भी उनकी निजी सेना की तरह काम करना पसंद करती है। यह किसी से छिपा नहीं कि महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस एक अर्से से अर्नब से खुन्नस खाए हुए है। वह उन्हेंं और उनके साथियों को हरसंभव तरीके से तंग करने में लगी हुई है। इसके लिए न तो छल-कपट का सहारा लेने में संकोच किया जा रहा है और न इसकी परवाह की जा रही है कि इससे सरकार के साथ पुलिस की भी फजीहत होगी।

 

अर्नब की गिरफ्तारी से ज्यादा आपत्तिजनक उसका तरीका है। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि जब कथित टीआरपी घोटाले से सरकार और पुलिस को मनमानी करने में मुश्किल हुई तो फिर बंद किए जा चुके पुराने मामले का सहारा लिया गया।


अर्नब जिस तरह की टीवी पत्रकारिता करते हैं, वह कुछ लोगों को पसंद नहीं। वास्तव में उनकी पत्रकारिता की शैली से तमाम लोगों की असहमति हो सकती है और है भी, लेकिन क्या इस कारण किसी सरकार को उन्हेंं प्रताड़ित करने का अधिकार मिल जाता है? यदि यही लोकतंत्र है तो फिर फासीवाद किसे कहते हैं? इस सवाल का जवाब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी न सही, कांग्रेस को अवश्य देना चाहिए, जो महाराष्ट्र की सत्ता में साझीदार है और आए दिन यह कहती रहती है कि देश में आपातकाल सी स्थिति है और बोलने की आजादी खतरे में पड़ गई है। महाराष्ट्र में सत्ता का नग्न दुरुपयोग तो आपातकाल की ही याद दिला रहा है।


यह देखना दयनीय ही नहीं, लज्जाजनक भी है कि अर्नब की गिरफ्तारी पर वामपंथियों, कथित उदारवादियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झंडा उठाने वाले या तो चुप्पी साध गए या फिर किंतु-परंतु की आड़ में उसे जायज ठहरा रहे हैं। ये वही लोग हैं जो अपने किसी साथी के खिलाफ एक रिपोर्ट भी दर्ज हो जाने पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं, लेकिन अब ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। समय ऐसे छद्म तत्वों की तटस्थता का अपराध लिखे या नहीं, उनके मौन की अनदेखी नहीं की जा सकती।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Editorial : यूरोप में आतंक की नई लहर: एक ही हिंसक विचारधारा की उपज, जिहादी आतंकवाद का साया गहराता जा रहा

फ्रांस में बर्बर आतंकी हमलों की ओर से दुनिया का ध्यान हटा भी नहीं था कि आस्ट्रिया की राजधानी वियना में आतंकियों ने धावा बोलकर यूरोप के साथ-साथ पूरी दुनिया को थर्रा दिया। पेरिस और नीस के बाद वियना के आतंकी हमले यही बता रहे हैं कि जिहादी आतंकवाद का साया गहराता जा रहा है। इन यूरोपीय शहरों में हुए आतंकी हमलों के बीच कनाडा के क्यूबेक प्रांत और अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के आतंकवादी हमलों की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि ये सब हमले एक ही हिंसक विचारधारा की उपज हैं। वियना में आतंकियों ने जिस तरह एक साथ कई स्थानों पर लोगों को निशाना बनाया, उससे मुंबई में हुए भीषण आतंकी हमले की याद आ जाना स्वाभाविक है।


वियना को निशाना बनाने वाले खूंखार आतंकी संगठन आइएस से कुप्रेरित बताए जा रहे हैं। इसका मतलब है कि भले ही सीरिया और इराक में इस आतंकी संगठन की कमर टूट गई हो, लेकिन उसके सहयोगी और हमदर्द दुनिया भर में फैल गए हैं। बीते वर्षों में दुनिया में तमाम आतंकी हमले ऐसे ही आतंकियों की ओर से किए गए, जो या ता आइएस से सीधे तौर पर जुड़े थे या फिर उससे कुप्रेरित थे। वियना में पुलिस की गोली का निशाना बने एक आतंकी के बारे में यह माना जा रहा है कि वह सीरिया जाने की फिराक में था और इसी कारण खुफिया एजेंसियों की निगाह में था।


आस्ट्रिया में आतंकी हमला इसलिए हैरान करता है, क्योंकि यह उन देशों में है जिसने सीरिया, इराक आदि देशों के शरर्णािथयों को उदार भाव से अपनाया। सच तो यह है कि वहां इन देशों के शरर्णािथयों को अपनाने की मुहिम भी चली थी। स्पष्ट है कि आइएस और अल-कायदा जैसे आतंकी संगठनों के लिए इस तरह की उदारता का कोई मूल्य नहीं। वे सारी दुनिया में खिलाफत कायम करने की सनक से ग्रस्त हैं। दुनिया को इस हिंसक सनक का सामना एकजुट होकर सख्ती के साथ करना होगा। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि विश्व भर में वियना में हुए आतंकी हमलों की निंदा हो रही है, क्योंकि तथ्य यह भी है कि अमेरिका अफगानिस्तान को तबाह करने में जुटे तालिबान से समझौते को अपनी कामयाबी मान रहा है तो पश्चिम में सेक्युलर और लिबरल तत्वों का एक वर्ग जिहादी आतंकवाद की गंभीरता को समझने के लिए तैयार नहीं।


यह शुभ संकेत नहीं कि दुनिया के अन्य देशों के साथ भारत में भी कुछ तत्वों ने फ्रांस के आतंकी हमलों को जायज ठहराया। यूरोप में आतंक की नई लहर के बीच ऐसे तत्वों से सावधान रहना होगा-न केवल सरकार को, बल्कि समाज को भी।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Wednesday, November 4, 2020

यूरोप में आतंक की नई लहर: एक ही हिंसक विचारधारा की उपज, जिहादी आतंकवाद का साया गहराता जा रहा

फ्रांस में बर्बर आतंकी हमलों की ओर से दुनिया का ध्यान हटा भी नहीं था कि आस्ट्रिया की राजधानी वियना में आतंकियों ने धावा बोलकर यूरोप के साथ-साथ पूरी दुनिया को थर्रा दिया। आतंकी हमले यही बता रहे हैं कि जिहादी आतंकवाद का साया गहराता जा रहा है।


फ्रांस में बर्बर आतंकी हमलों की ओर से दुनिया का ध्यान हटा भी नहीं था कि आस्ट्रिया की राजधानी वियना में आतंकियों ने धावा बोलकर यूरोप के साथ-साथ पूरी दुनिया को थर्रा दिया। पेरिस और नीस के बाद वियना के आतंकी हमले यही बता रहे हैं कि जिहादी आतंकवाद का साया गहराता जा रहा है। इन यूरोपीय शहरों में हुए आतंकी हमलों के बीच कनाडा के क्यूबेक प्रांत और अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के आतंकवादी हमलों की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि ये सब हमले एक ही हिंसक विचारधारा की उपज हैं। वियना में आतंकियों ने जिस तरह एक साथ कई स्थानों पर लोगों को निशाना बनाया, उससे मुंबई में हुए भीषण आतंकी हमले की याद आ जाना स्वाभाविक है।


वियना को निशाना बनाने वाले खूंखार आतंकी संगठन आइएस से कुप्रेरित बताए जा रहे हैं। इसका मतलब है कि भले ही सीरिया और इराक में इस आतंकी संगठन की कमर टूट गई हो, लेकिन उसके सहयोगी और हमदर्द दुनिया भर में फैल गए हैं। बीते वर्षों में दुनिया में तमाम आतंकी हमले ऐसे ही आतंकियों की ओर से किए गए, जो या ता आइएस से सीधे तौर पर जुड़े थे या फिर उससे कुप्रेरित थे। वियना में पुलिस की गोली का निशाना बने एक आतंकी के बारे में यह माना जा रहा है कि वह सीरिया जाने की फिराक में था और इसी कारण खुफिया एजेंसियों की निगाह में था।



आस्ट्रिया में आतंकी हमला इसलिए हैरान करता है, क्योंकि यह उन देशों में है जिसने सीरिया, इराक आदि देशों के शरर्णािथयों को उदार भाव से अपनाया। सच तो यह है कि वहां इन देशों के शरर्णािथयों को अपनाने की मुहिम भी चली थी। स्पष्ट है कि आइएस और अल-कायदा जैसे आतंकी संगठनों के लिए इस तरह की उदारता का कोई मूल्य नहीं। वे सारी दुनिया में खिलाफत कायम करने की सनक से ग्रस्त हैं। दुनिया को इस हिंसक सनक का सामना एकजुट होकर सख्ती के साथ करना होगा। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि विश्व भर में वियना में हुए आतंकी हमलों की निंदा हो रही है, क्योंकि तथ्य यह भी है कि अमेरिका अफगानिस्तान को तबाह करने में जुटे तालिबान से समझौते को अपनी कामयाबी मान रहा है तो पश्चिम में सेक्युलर और लिबरल तत्वों का एक वर्ग जिहादी आतंकवाद की गंभीरता को समझने के लिए तैयार नहीं।


यह शुभ संकेत नहीं कि दुनिया के अन्य देशों के साथ भारत में भी कुछ तत्वों ने फ्रांस के आतंकी हमलों को जायज ठहराया। यूरोप में आतंक की नई लहर के बीच ऐसे तत्वों से सावधान रहना होगा-न केवल सरकार को, बल्कि समाज को भी।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Tuesday, November 3, 2020

Opinion : पटाखों पर पाबंदी: दिवाली पर पटाखों की बिक्री पर पाबंदी लगाकर वायु प्रदूषण की समस्या का सही समाधान नहीं

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय समेत दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सरकारों से यह जो सवाल पूछा कि क्यों न सात से 30 नवंबर तक पटाखों के उपयोग को प्रतिबंधित कर दिया जाए, उस पर उन्हें सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए। ऐसी किसी पहल को उत्सवधर्मिता को हतोत्साहित करने की कोशिश के बजाय प्रदूषण से बचने के उपाय के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह सही है कि दिवाली पर पटाखे जलाने की परंपरा है और उनकी बिक्री पर पाबंदी से कुछ लोगों को शिकायत हो सकती है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि पटाखे प्रदूषण बढ़ाने का काम करते हैं। बीते कई वर्षों से यह देखने में आ रहा है कि दिवाली के दौरान पटाखों का इस्तेमाल वायुमंडल को और जहरीला बना देता है। आखिर जब अभी वायु प्रदूषण खतरनाक रूप ले चुका है, तब फिर इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है कि पटाखों के इस्तेमाल के बाद कैसी सूरत बनेगी?


इस बार तो पटाखों के उपयोग से इसलिए भी बचा जाना चाहिए, क्योंकि कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा अभी टला नहीं है। इससे किसी को अनजान नहीं होना चाहिए कि वायु प्रदूषण कोरोना वायरस से उपजी महामारी कोविड-19 के प्रकोप को बढ़ाने का काम कर सकता है। तथ्य यह भी है कि दिल्ली सरकार पटाखा विरोधी अभियान शुरू करने जा रही है और राजस्थान सरकार ने भी पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने का फैसला कर लिया है। पटाखों की बिक्री पर रोक को प्रभावी रूप देने की आवश्यकता है, क्योंकि बीते वर्षों में दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर पाबंदी के बाद भी उनकी खरीद-बिक्री देखने को मिली। इसका एक कारण यह था कि पर्यावरण के अनुकूल माने जाने वाले ग्रीन पटाखों की उपलब्धता का अभाव रहा। यदि पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए खतरा बनने वाले हानिकारक पटाखों को चलन से रोकना है तो ग्रीन पटाखों की उपलब्धता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इस दौरान यह भी देखा जाना चाहिए कि ग्रीन पटाखे पर्यावरण के अनुकूल ही हों।

नि:संदेह यह भी सुनिश्चित करने की जरूरत है कि केवल दिवाली के आसपास पटाखों की बिक्री पर पाबंदी लगाकर वायु प्रदूषण की विकराल होती समस्या का सही समाधान नहीं किया जा सकता। यह खेद की बात है कि तमाम प्रयासों के बाद भी पराली यानी फसलों के अवशेष जलाने के सिलसिले को नहीं रोका जा सका। इसी प्रकार वायु प्रदूषण को बढ़ाने वाले अन्य कारणों, जैसे सड़कों एवं निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल और ट्रैफिक जाम के चलते वाहनों के खतरनाक उत्सर्जन को नियंत्रित करने के भी कोई प्रभावी उपाय नहीं किए जा सके हैं।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Opinion : ईरान में भारतीय सहयोग वाली चाबहार बंदरगाह परियोजना पर कोई अड़ंगा नहीं लगाएगा अमेरिका

भारत और अमेरिका के विदेश एवं रक्षा मंत्रियों की हालिया बातचीत का यह नतीजा भी सामने आना एक शुभ संकेत है कि भारतीय सहयोग वाली चाबहार बंदरगाह परियोजना तेजी से आगे बढ़ेगी और उसे लेकर अमेरिकी प्रशासन कोई अड़ंगा नहीं लगाएगा। इसका मतलब है कि आखिरकार अमेरिका को यह समझ आ गया कि व्यापक उद्देश्यों वाली ईरान स्थित यह परियोजना न केवल भारत और अफगानिस्तान, बल्कि खुद उसके हित में है। इस परियोजना के आगे बढ़ने से अफगानिस्तान की पाकिस्तान पर निर्भरता कम करने के साथ वहां चीन के दखल को भी सीमित करने में मदद मिलेगी। दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के लिए जितना आवश्यक यह है कि पाकिस्तान पर लगाम लगाई जाए, उतना ही यह भी कि इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते असर को कम करने के हरसंभव उपाय किए जाएं।


उल्लेखनीय केवल यह नहीं है कि चाबहार बंदरगाह परियोजना के मामले में अमेरिका भारत के दृष्टिकोण से सहमत हुआ, बल्कि यह भी है कि दोनों देश रक्षा-सुरक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर राजी हुए। यह काम एक ऐसे समय हुआ, जब अमेरिका में चुनाव होने जा रहे हैं। इस कारण कई लोगों ने ऐसे सवाल खड़े किए कि जब अमेरिका चुनाव के मुहाने पर है, तब दोनों देशों के बीच विदेश एवं रक्षा मंत्री स्तर की वार्ता का क्या औचित्य? ऐसे सवालों का यही जवाब है कि दोनों देशों के संबंध अब इतने मजबूत हो गए हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला कि अमेरिकी सत्ता की बागडोर किस दल के हाथों में रहती है?


विदेश एवं रक्षा मंत्री स्तर की बातचीत के दौरान अमेरिका और भारत के बीच जो अनेक महत्वपूर्ण समझौते हुए, वे भारतीय हितों की पूíत करने और साथ ही चीन की ओर से पेश की जा रही चुनौती का जवाब देने में मददगार बनने वाले भी हैं। चीन केवल भारत ही नहीं, एशिया और यहां तक कि पूरी दुनिया के लिए चुनौती बन रहा है। वास्तव में वह विश्व व्यवस्था के लिए खतरा बन गया है। इस खतरे से निपटने के लिए समान सोच वाले देशों के लिए तेजी से आपसी सहयोग बढ़ाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। क्या इससे खराब बात और कोई हो सकती है कि चीन के अड़ियल रवैये के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद कोविड-19 महामारी को लेकर कोई गंभीर चर्चा नहीं कर सकी।


बदली हुई परिस्थितियों में यह भी जरूरी है कि भारत ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसी संस्थाओं के बजाय क्वॉड को अधिक प्राथमिकता दे। इससे ही उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना कद बढ़ाने में मदद मिलेगी और आज ऐसा करना समय की मांग भी है।



सौजन्य - दैनिक जागरण।

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Opinion : धार्मिक अतिवाद को खाद-पानी देने वाले पाक और तुर्की मजहब की आड़ में नफरत और उन्माद फैला रहे हैं

भारत ने मजहबी कट्टरता और जिहादी आतंकवाद से जूझ रहे फ्रांस के साथ एकजुटता प्रदर्शित कर इसलिए सही किया, क्योंकि पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश फ्रांस सरकार के रवैये से असहमति जताने के नाम पर धार्मिक अतिवाद को खाद-पानी देने का काम कर रहे हैं। मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मुहम्मद ने ट्विटर पर जिस तरह जहर उगला, उससे यही पता चलता है कि मजहब की आड़ में किस तरह नफरत और उन्माद फैलाने का काम किया जा रहा है। ट्विटर ने उनके जहरीले ट्वीट को तो हटा दिया, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उनके एकाउंट को बनाए रखा। यह रवैया मजहबी कट्टरता के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई को कमजोर करने वाला है।


इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि चाहे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान हों या तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन या फिर महातिर मुहम्मद, इनमें से किसी ने पेरिस में शिक्षक का गला काटने की खौफनाक घटना के खिलाफ तो कुछ नहीं कहा, लेकिन फ्रांसीसी उत्पादों के बहिष्कार की मांग को हवा देने के लिए आगे आ गए। ओसामा बिन लादेन को शहीद बताने वाले इमरान और चर्च को मस्जिद में बदलने वाले एर्दोगन जैसे नेता कभी भी इस्लाम के अमनपसंद रूप को उभारने में सहायक नहीं बन सकते।


नि:संदेह फ्रांस को अपने पंथनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा करने और उन पर प्रतिबद्ध रहने का अधिकार है, लेकिन उसे मुहम्मद साहब के व्यंग्यचित्र सार्वजनिक रूप से दिखाने जैसी गतिविधियों से बचना चाहिए। यह अतिवाद से लड़ने का सही तरीका नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि इस तरीके से असहमत होने के नाम पर कुछ और लोगों के सिर कलम कर दिए जाएं। फ्रांस में यही हुआ। यह आतंकवाद के अलावा और कुछ नहीं। यह गंभीर चिंता की बात है कि फ्रांस सरकार के रुख-रवैये के खिलाफ सड़कों पर उतर कर विरोध करने वाले निर्दोष-निहत्थे लोगों का सिर कलम करने की बर्बर घटनाओं की निंदा करना जरूरी नहीं समझ रहे हैं। यह और कुछ नहीं मजहबी कट्टरता के पक्ष में खड़ा होना ही है। ऐसे तत्वों से पूरी दुनिया को सावधान रहना होगा।


एक अर्से से यूरोप ही नहीं, पूरे पश्चिम में मुस्लिम समुदाय के बीच अतिवादी तत्व जिस तरह सिर उठा रहे हैं, उससे यह साफ है कि वे पश्चिमी जीवन मूल्यों से तालमेल बैठाने के बजाय अपनी सड़ी-गली मान्यताएं उन पर थोपना चाहते हैं। ऐसे तत्वों से समझौता नहीं किया जा सकता, लेकिन इसी के साथ मजहबी कट्टरता से निपटने के लिए उन तौर-तरीकों को भी अपनाने की जरूरत है, जो दुनिया को अमन की ओर ले जाएं। इस मामले में यूरोप न्यूजीलैंड से काफी कुछ सीख सकता है।


सौजन्य - दैनिक जागरण।

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