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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Wednesday, March 31, 2021

बॉन्ड पर नजर (बिजनेस स्टैंडर्ड)

भारत की सरकारी प्रतिभूतियों को एफटीएसई रसेल इमर्जिंग मार्केट्स गवर्नमेंट बॉन्ड इंडेक्स (ईएमजीबीआई) में शामिल किया जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो ऐसे समय में नए विदेशी फंड की आवक को प्रोत्साहन मिलेगा जब भारत सरकार राजकोषीय घाटे की भरपाई के लिए बड़े पैमाने पर ऋण ले रही है। एक बड़े वैश्विक सूचकांक में शामिल किए जाने से भारतीय बॉन्डों की विनिमय दर और उनका यील्ड कर्व (अलग-अलग समय पर परिपक्व होने वाले बॉन्ड की ब्याज दर) भी प्रभावित होगा। इससे बॉन्ड के द्वितीयक बाजार में भी नकदी की स्थिति सुधारने में मदद मिल सकती है। लंदन स्टॉक एक्सचेंज समूह की अनुषंगी एफटीएसई रसेल विश्व स्तर के कई मानक इक्विटी और तयशुदा आय सूचकांकों का प्रबंधन करती है। सोमवार को इस वित्तीय सेवा प्रदाता ने तयशुदा आय और इक्विटी के अपने अद्र्धवार्षिक देश स्तरीय वर्गीकरण में कहा कि सऊदी अरब के साथ भारत को भी ईएमजीबीआई में शामिल करने की निगरानी सूची में रखा है। सूचकांक का अगला अपडेट सितंबर 2021 में आएगा।

जब भी भारत को इसमें प्रवेश मिलेगा यह स्वत: सुनिश्चित हो जाएगा कि रुपये वाली ट्रेजरीज का ब्याज विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के एक नए सेट से तय होगा जो ईएमजीबीआई के पोर्टफोलियो पर नजर रखता है या उस सूचकांक का इस्तेमाल पोर्टफोलियो मानक के रूप में करता है। बालपार्क के अनुमान से सुझाव मिलता है कि भारत जैसे बड़े आकार का बाजार शामिल होने के पहले ही वर्ष आसानी से 10 अरब डॉलर की राशि जुटा सकता है और भविष्य में इसमें और इजाफा होगा। उच्च सरकारी उधारी के कारण बॉन्ड बाजार का प्रतिफल बढ़ रहा है। एफपीआई के बारे में अनुमान है कि वे समेकित बकाया सरकारी ऋण के प्रतिशत के रूप में आकलित भारतीय ऋण की निवेश सीमा को सहन कर जाएंगे। सन 2020-21 के लिए बकाया सरकारी प्रतिभूति भंडार और राज्य विकास ऋण के लिए क्रमश: 6 फीसदी और दो फीसदी की सीमा तय की गई थी। यह राशि लगभग 9.5 लाख करोड़ रुपये है। फिलहाल एफपीआई सीमा के भीतर हैं लेकिन नए बॉन्ड जारी होने पर इसमें इजाफा होता है। निश्चित तौर पर एफपीआई ने बीते तीन वित्त वर्ष में लगातार रुपये में ऋण की बिकवाली की है। सन 2017-18 में आखिरी बार उन्होंने 1.19 लाख करोड़ रुपये की खरीदारी की थी। सन 2020-21 में 20 मार्च तक एफपीआई ने 51,221 करोड़ रुपये के बॉन्ड बेचे थे जबकि 2019-20 में उन्होंने 48,710 करोड़ रुपये के बॉन्ड की बिक्री की थी।


ईएमजीबीआई में शामिल किए जाने को लेकर एफटीएसई के देश आधारित वर्गीकरण से संंबंधित सलाहकार समिति में चर्चा होगी। इसमें ऐसे बाजार प्रतिभागी शामिल होते हैं जिनके पास तकनीकी विशेषज्ञता और स्थानीय जानकारी होती है। समिति में शामिल करने का आकलन बाजार की गुणवत्ता (नियमन, निपटान परिदृश्य, निपटान मानक, डेरिवेटिव बाजार की मौजूदगी), बाजार का आकार, निरंतरता और पूर्वानुमेयता, लागत की सीमा, स्थिरता, बाजार पहुंच आदि के आधार पर किया जाता है। भारत अधिकांश मानकों पर खरा उतरेगा। सरकार की वित्तीय स्थिति तंग है और ऐसे में पूंजी की आवक अच्छी मानी जाएगी। इससे प्रतिफल और उधारी लागत कम करने में मदद मिलेगी। ऐसी आवक अत्यधिक नकदी वाले द्वितीयक बाजार को और गहरा करती है जो अच्छी बात है। इसके अलावा यह राशि लंबी अवधि तक टिकने वाली हो सकती है।


परंतु यदि एफपीआई की आवक बढ़ती है तो रिजर्व बैंक को रुपये को स्थिर रखने में मशक्कत करनी होगी। मुद्रा कीमतों में उतार-चढ़ाव व्यापार संतुलन के साथ एफपीआई के रुख को प्रभावित कर सकता है। विदेशी मुद्रा पर निर्भरता बढऩे का अर्थ यह भी है कि सरकार को उच्च राजकोषीय मानकों का पालन करना होगा। बाद की तारीख में बड़े पैमाने पर राशि की वापसी वित्तीय स्थिरता को जोखिम में डाल सकती है। सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि ऐसा जोखिम न पैदा हो।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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इंटरनेट आधारित तकनीकी परिवर्तन का हो सही प्रबंधन (बिजनेस स्टैंडर्ड)

अजित बालकृष्णन  

दुनिया भर के मीडिया में इस समय ऐसी खबरें भरी हुई हैं कि कैसे इंटरनेट कंपनियां आम नागरिकों की निजता में घुसपैठ करके भारी मुनाफा कमा रही हैं जबकि सरकारें असहाय होकर देख रही हैं।


निजता का मसला उस समय संकट के स्तर पर पहुंच गया जब यह पता चला कि एक सोशल मीडिया नेटवर्क पर अमेरिका के 8 करोड़ से अधिक मतदाताओं के प्रोफाइल का इस्तेमाल 2013 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों को प्रभावित करने में किया गया। उन चुनावों में डॉनल्ड ट्रंप को जीत मिली थी। इसी प्रकार लोगों का व्यक्तिगत डेटा, जिसका इस्तेमाल इंटरनेट वेबसाइटों द्वारा इंटरनेट सर्फिंग को बेहतर बनाने के लिए किया जाना चाहिए, वही डेटा इन लोगों के निर्णय लेने की क्षमता के लिए खतरा बनता नजर आने लगा।


इन बातों के बीच गौर करें तो क्या अतीत में हुई तकनीकी क्रांतियों के दौरान भी ऐसा कुछ हुआ है जिसने लोगों को इसी प्रकार चिंतित किया हो या फिर यह मानव समाज के लिए ऐसा पहला अवसर है?


इंटरनेट के साथ हमारा मौजूदा अनुभव यही बताता है कि यह इस बात का एक और उदाहरण भर है कि कैसे तकनीकें समाज में काम करती हैं। आज का इंटरनेट और 20वीं सदी के आरंभ की रासायनिक तकनीक इसका उदाहरण हैं। अतीत में समाज के किन तबकों को इन तकनीक से लाभ मिला और किनको नुकसान भुगतना पड़ा?


रासायनिक औद्योगिक क्रांति मानव समाज के लिए कई तरह के लाभ लेकर आई। इसके कारण सस्ते कृत्रिम उर्वरक और कीटनाशक बन सके जिन्होंने खाद्यान्न और सब्जियों के उत्पादन में नाटकीय इजाफा किया। इसके कारण कृत्रिम प्लास्टिक का उत्पादन शुरू हो सका जो कपड़े, फर्नीचर और मकानों की निर्माण सामग्री के लिए कपास, धातु, कांच और लकड़ी जैसे प्राकृतिक पदार्थों का सस्ता विकल्प था। इसने सस्ती औषधि का मार्ग प्रशस्त कर इंसानों को स्वस्थ जीवन जीने में मदद की।


परंतु इन तमाम लाभ के इतर जल्द ही प्रदूषण के रूप में इसका एक और पहलू हमारे सामने आया। सन 1962 में आई रशेल कारसन की पुस्तक 'साइलेंट स्प्रिंग' ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था। किताब में कीटनाशकों के इस्तेमाल के कारण पर्यावरण को हुए नुकसान की व्यापक जानकारी दी गई थी। उन्होंने बताया कि कैसे डीडीटी और अन्य कृत्रिम कीटनाशकों के कारण तमाम कीटों में प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो गई और प्रकृति का पर्यावास गड़बड़ा गया। इससे नए तरह के कीट सामने आने लगे।


रसायन उद्योग ने कारसन पर पलटवार किया। एक प्रमुख कंपनी के हवाले से कहा गया, 'यदि इंसानों ने मिस कारसन की शिक्षाओं का अनुसरण करना शुरू कर दिया तो हम जल्दी ही अंधकार युग में लौट जाएंगे और धरती पर एक बार फिर कीड़ों-मकोड़ों और बीमारियों का राज हो जाएगा।' बहरहाल, कारसन की किताब और इससे मचे हो हल्ले के कारण अमेरिका में डीडीटी के कृषि कार्य में इस्तेमाल पर देशव्यापी प्रतिबंध लगा और पर्यावरण को लेकर एक आंदोलन शुरू हुआ जिसने अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी को तथा अन्य देशों में ऐसे ही संस्थानों को जन्म दिया।


रासायनिक औद्योगिक क्रांति ने समाज पर तमाम अन्य सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव डाले। उदाहरण के लिए सन 1971 में जब मैं आईआईएम कोलकाता से स्नातक होने के बाद काम के लिए मुंबई (तत्कालीन बंबई) आया तो वहां सैकड़ों सूती कपड़ा मिलें फलफूल रही थीं। ये मिलें सबसे बड़ी नियोक्ता होने के साथ-साथ उस दौर की सबसे बड़ी विज्ञापनदाता थीं। उनके मालिक अक्सर अखबारों और पत्रिकाओं के पन्नों पर नजर आते थे।


परंतु एक दशक के भीतर ये मिलें बंद होने लगीं और अखबारों की सुर्खियों में श्रम संगठनों के नेताओं को खलनायक और मिल मालिकों को शोषक ठहराया जाने लगा। सन 1980 के दशक के अंत तक लगभग सभी कपड़ा मिलें बंद हो गईं। पर्यवेक्षकों को यह अंदाजा होने में एक दशक का वक्त लग गया कि दरअसल हुआ क्या था। वास्तव में साड़ी, कमीज और पैंट के लिए नायलॉन और पॉलिएस्टर जैसे कृत्रिम सामान की खोज और चलन बढऩे लगा था और यही कपड़ा मिलों के अंत की वजह बनी।


इन दिनों इंटरनेट क्रांति ऐसे ही सामाजिक बदलाव का सबब बन रही है। प्रबंधन सलाहकार कंपनी मैकिंजी ने तीन मजबूत रुझानों को रेखांकित किया है। मीडिया उद्योग ही वह उद्योग है जहां इंटरनेट तकनीक का प्रसार हुआ। इन तीन रुझानों में पहला है डिजिटलीकरण। इसके तहत अखबारों और पत्रिकाओं को अपने डिजिटल संस्करण पेश करने पड़े। दूसरा रुझान है विभक्त करना: इसकी शुरुआत रोजगार और विवाह के वर्गीकृत विज्ञापनों के अखबारों से अलग होकर एक स्वतंत्र ऑनलाइन कारोबार के रूप में खड़ा होने से हुई। तीसरा रुझान है बिचौलियों के समाप्त होने का। विभिन्न मीडिया हाउस जो अब तक डीलरों, वितरकों, केबल ऑपरेटरों, सिनेमा थिएटरों के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंचते थे वे अब इनके बिना सीधे उन तक पहुंच सकते हैं। इन तीनों रुझानों ने मीडिया के उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाया है। इसने उन्हें विविधता और सस्ती सेवाएं प्रदान कीं लेकिन निजता को खतरे की चिंताओं के बीच लंबे समय से स्थापित कारोबार और रोजगार को भी नष्ट किया।


हमने अब इन तीनोंं रुझानों को एक अन्य ऐसे क्षेत्र मेंं देखना शुरू कर दिया है जहां इंटरनेट का व्यापक असर है। वह है: वित्तीय सेवा क्षेत्र। डिजिटलीकरण के कारण नकदी और सिक्कों का इस्तेमाल काफी कम हो गया है। विशिष्ट भुगतान कंपनियां, कर्ज देने वाली कंपनियां और ब्रोकिंग कंपनियों की तादाद बढऩे से विभक्तीकरण में इजाफा हुआ है। क्या पारंपरिक बैंक जल्दी ही उसी तरह अप्रासंगिक होने लगेंगे जैसे एकीकृत मीडिया कंपनियां होने लगीं। क्या हमारी करीबी बैंक शाखाओं की स्थिति भी किताबों की दुकान या सिनेमा हॉल जैसी हो जाएगी?


इंटरनेट क्रांति की ये तीन ताकतें आगे किन उद्योगों को प्रभावित करेंगी? चिकित्सा सेवा? न्याय? क्या बतौर उपभोक्ता हमें यहां भी वैसा ही लाभ मिलेगा जैसा मीडिया के क्षेत्र में चयन बढऩे, आपूर्ति तेज होने और कीमतें कम होने से मिला? परंतु क्या यहां भी रोजगार जाने और स्थानीय चिकित्सक,अधिवक्ताओं और न्यायालयों की आश्वस्ति न मिलने जैसी दिक्कतें आएंगी?


रासायनिक उद्योग से जुड़ी क्रांति के आरंभिक दिनों की तरह मीडिया मेंं भी तमाम संघर्ष उभर सकते हैं लेकिन इस बार चिंता प्रदूषण की नहीं बल्कि निजता की होगी।


पुरानी तकनीकी क्रांतियोंं से हासिल ज्ञान हमें यह राह दिखाएगा कि इंटरनेट क्रांति का मानवता के हित में लाभ कैसे उठाया जा सकता है।


(लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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दिल्ली में अधूरे सपने की मौत या नई जंग का मुकाम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस 

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की दिल्ली इकाई के लिए हंगामा बस होने ही वाला है। दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले दिवंगत नेता मदन लाल खुराना की आत्मा शायद अपनी ही पार्टी के केंद्रीय नेताओं के हाथों दिल्ली सरकार की शक्तियों में कटौती होते देखकर बेचैन हो रही होगी। भाजपा के स्थानीय नेता सुधांशु मित्तल कहते हैं, 'हम लोगों ने ही दिल्ली को राज्य का दर्जा दिया था। लेकिन हर कदम का वक्त और जगह मुकर्रर होती है।'


इस बात से इनकार कर पाना मुश्किल है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (एनसीटीडी) संशोधन अधिनियम संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद भाजपा के गले में बंधा एक सियासी छल्ला साबित होने वाला है। दिल्ली की निर्वाचित सरकार की शक्तियों में कटौती और दिल्ली राज्य की स्वायत्तता सीमित करने वाला यह विधेयक आने वाले समय में भाजपा के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। गनीमत बस यह है कि दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने में अभी काफी वक्त है। हालांकि पार्टी तमाम आशंकाओं के साथ 2022 में होने वाले नगर निगम चुनावों की तैयारी में लग गई है। अगर हाल ही में हुए नगर निगम उपचुनावों को पैमाना मानें तो दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) का आकर्षण बरकरार है। मार्च के शुरू में हुए निगम उपचुनावों में आप ने पांच में से चार सीटों पर जीत हासिल की है। इनमें से एक उम्मीदवार बहुजन समाज पार्टी छोड़कर आप में शामिल हुआ था और फिर से रोहिणी-सी सीट से चुना गया है। वहीं आप ने कल्याणपुरी और त्रिलोकपुरी की अपनी सीट बरकरार रखी हैं। पार्टी ने शालीमार बाग (उत्तर) सीट भाजपा से छीन ली है। यह सीट महिलाओं के लिए आरक्षित है। दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष आदेश गुप्ता कहते हैं, ' शालीमार बाग सीट को गंवाना हमारे लिए आत्म-मंथन का विषय है। जल्द ही हम कमियों को दूर कर लेंगे और मुझे पूरा भरोसा है कि भाजपा अगले साल होने वाले तीनों नगर निगमों के चुनावों में जीत हासिल करेगी।'


लेकिन भाजपा के लिए यह काम उतना आसान नहीं होने जा रहा है। खासकर एनसीटीडी विधेयक के जरिये दिल्ली सरकार के अधिकारों में कटौती करने के बाद तो और भी मुश्किल होगा।


फिलहाल केंद्र एवं दिल्ली सरकार के संबंध राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम 1991 के जरिये परिभाषित होते हैं। इस अधिनियम की धारा 44 शासन के कामकाज से संबंधित है। केंद्र कहता है कि इस कानून के तहत कोई भी ऐसी ढांचागत व्यवस्था नहीं है जो इस धारा के तहत नियमों का समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित कर सके। इस कानून में इस पर भी कोई स्पष्टता नहीं है कि किन प्रस्तावों या मामलों में राज्य सरकार को आदेश जारी करने के लिए उप-राज्यपाल से विचार-विमर्श करना जरूरी है। फिर दिल्ली सरकार बनाम भारत संघ वाद में उच्चतम न्यायालय का वह आदेश भी है जिसमें कहा गया है कि उप-राज्यपाल मंत्रिमंडल की सलाह एवं मदद के जरिये काम करने के लिए बाध्य है और किसी भी रूप में वह स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकता है। सर्वोच्च अदालत का यह फैसला दिल्ली की आप सरकार के पक्ष में आया था।


संविधान के अनुच्छेद 239-एए का उपबंध 4 भी मामले को उलझाने का काम करता है। यह उपबंध दिल्ली के संदर्भ में कुछ खास प्रावधानों का उल्लेख करता है। इसमें कहा गया है कि उप-राज्यपाल एवं दिल्ली सरकार के बीच मतभेद पैदा होने की स्थिति में उप-राज्यपाल मामले को राष्ट्रपति की सलाह के लिए भेज सकता है और उस सलाह को बाध्यकारी माना जाएगा।


लेकिन संसद में हाल ही में पारित नए विधेयक में दिल्ली के उप-राज्यपाल को ही सरकार बताया गया है। यह परिभाषा दिल्ली में विधानसभा द्वारा पारित किसी भी कानून पर लागू होगी।


दूसरा, संशोधित अधिनियम की धारा 3 में कहा गया है कि उप-राज्यपाल की शक्तियों के बाहर रखी हुई कोई भी चीज उसी में सीमित मानी जाएगी। इसी तरह कानून बनाने के लिए दिल्ली विधानसभा को मिली शक्तियों के बाहर का कोई भी विषय अब उप-राज्यपाल में निहित होगा। नए कानून के जरिये 1991 के अधिनियम की धारा 33 में भी संशोधन किया गया है जो प्रक्रियागत नियमों का जिक्र करती है। इस बदलाव का नतीजा यह होगा कि दिल्ली विधानसभा अब प्रशासनिक कामकाज से जुड़े मामलों पर विचार करने या प्रशासन के संदर्भ में जांच के लिए अब खुद को या अपनी समितियों को सशक्त करने वाले नियम नहीं बना सकती है। इससे भी अहम यह है कि नए कानून के प्रावधान पश्चवर्ती प्रभाव से लागू होंगे। यानी विधानसभा की तमाम मौजूदा समितियां एक झटके में खत्म हो जाएंगी।


भाजपा अंदरखाने कहती है कि उसे दिल्ली सरकार के अधिकारों में कटौती का विचार पाकिस्तान के हालात को देखकर आया था। नवाज शरीफ के सत्ता में रहते समय इमरान खान की पार्टी समेत कई दलों के कार्यकर्ताओं ने राजधानी इस्लामाबाद के एक हिस्से पर नियंत्रण कर लिया था। भाजपा के एक नेता कहते हैं, 'हमें लगा कि अगर दिल्ली में ऐसा ही हो जाए तो क्या होगा? अरविंद केजरीवाल और उनके अराजकतावादी सहयोगी अगर अपनी अराजक राजनीति से देश की राजधानी को अस्थिर करने लगेंगे तो क्या होगा?' भाजपा यह याद दिलाने की कोशिश कर रही है कि कई देशों में राजधानी वाले शहर का शासन संघीय सरकार के पास है। भाजपा का आधिकारिक रुख यही है कि इस बदलाव के जरिये दिल्ली की शासकीय स्थिति में मौजूद अस्पष्टता दूर करने की कोशिश की गई है।


साफ है कि नया कानून भाजपा समेत सभी दलों को प्रभावित करेगा। एक नेता कहते हैं, 'दलीय हित का एक वक्त होता है। और फिर राष्ट्रीय हित का समय आता है। हमने पार्टी के हित पर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी है।' निश्चित है कि आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को शांत नहीं होने देगी। लेकिन नई शक्तियों से लैस होने के बाद उप-राज्यपाल भी चुप नहीं बैठेंगे। ऐसी स्थिति में आज नहीं तो कल एक जंग छिडऩी तय है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Saturday, March 27, 2021

बांग्लादेश : 50 वर्ष और आगे (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन 

बीते एक दशक में बांग्लादेश ने दक्षिण एशिया में बेहतरीन आर्थिक प्रदर्शन करने वाले देश के रूप में अपनी पहचान मजबूत की है। उसकी प्रतिव्यक्ति आय और आर्थिक वृद्धि दर भारत से तेज है, असमानता भारत से कम है और कुछ सामाजिक संकेतकों पर उसका प्रदर्शन हमसे बेहतर है। बतौर आजाद मुल्क उसके पास स्वर्ण जयंती का जश्न मनाने की पर्याप्त वजह है। सन 1971 से अबतक वहां जो बदलाव आया है उसे साफ महसूस किया जा सकता है। आजादी के बाद आरंभिक वर्षों में उसे देश के जीडीपी के सातवें हिस्से के बराबर विदेशी सहायता मिलती थी। अब यह दो फीसदी से भी कम रह गई है। अब वह किसिंजर के शब्दों वाला 'बास्केट केस' (कमजोर आर्थिक स्थिति वाला देश जो अपने कर्ज चुकाने की स्थिति में भी न हो) कतई नहीं रह गया है।


राजकोषीय घाटा, वाणिज्यिक व्यापार संतुलन और रोजगार (खासकर महिलाओं के मामले में) के क्षेत्र में बांग्लादेश भारत से बेहतर स्थिति में है। जीडीपी की तुलना में सार्वजनिक ऋण और निवेश के अनुपातों में भी वह भारत से अच्छी हालत में है। उसके जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी भी भारत से अधिक है। वर्ष 2011 से 2019 के बीच उसका वाणिज्यिक निर्यात 8.6 फीसदी की दर से बढ़ा जबकि भारत का महज 0.9 फीसदी की दर से।


बीते पांच दशक में बांग्लादेश का प्रदर्शन भारत से बेहतर तो रहा ही, उसने पाकिस्तान को भी हर मोर्चे पर बुरी तरह पीछे छोड़ दिया। फिर चाहे मामला जनांकीय (पाकिस्तान की आबादी अब काफी अधिक है) हो, आर्थिक हो, साामजिक संकेतकों का हो या लोकतांत्रिक मूल्यों का, बांग्लादेश हर क्षेत्र में आगे है। उदाहरण के लिए शिशु मृत्यु दर की बात करें तो पाकिस्तान के आंकड़े, बांग्लादेश से दोगुना हैं। सन 1971 में बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के समय आरोप यही था कि पंजाब के दबदबे वाले पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान को एक आंतरिक उपनिवेश बना दिया था, यह बात आगे चलकर प्रमाणित हुई।


अब बांग्लादेश के सामने नई चुनौतियां हैं। उसका दर्जा अल्पविकसित देश से विकासशील देश का हो चुका है और ऐसे में उसे व्यापार और शुल्क के क्षेत्र में मिल रहे लाभ गंवाने पड़ सकते हैं। पहली श्रेणी में उसे कई अमीर देशों के बाजार में शुल्क मुक्त और कोटा मुक्त पहुंच मिलती है। इनमें यूरोपीय संघ महत्त्वपूर्ण है। अब वह बांग्लादेश पर विकासशील देशों वाले मानक लागू करने की प्रक्रिया में है।


यानी बांग्लादेश से यूरोपीय संघ को होने वाले निर्यात पर नए शुल्क तो लगेंगे ही निर्यात में प्राथमिकता दिलाने वाले जनरलाज्ड सिस्टम ऑफ प्रिफरेंसेज (जीएसपी) में उसकी पहुंच भी सीमित होगी। बांग्लादेश के निर्यात का 60 फीसदी यूरोपीय संघ को जाता है और उसके कुल निर्यात में 80 फीसदी से अधिक कपड़ा और वस्त्र हैं। एक बाजार-एक उत्पाद की इस विशेषज्ञता के अपने जोखिम हैं और वृद्धि बरकरार रखने के लिए उसे यह निर्भरता कम करनी होगी।


मानव विकास सूचकांकों की बात करें तो उसने भारत को कई अहम सूचकांकों में पछाड़ा है लेकिन मामला एकतरफा नहीं है। कुछ क्षेत्रों में अंतर बहुत कम है और दोनों का प्रदर्शन वैश्विक औसत से बेहतर रहा है। भारत विद्यालयीन शिक्षा जैसे क्षेत्रों में थोड़ा बेहतर है जबकि स्वास्थ्य संकेतकों पर बांग्लादेश का प्रदर्शन अच्छा है। हालांकि असमानता के क्षेत्र में भारत की स्थिति खराब है लेकिन समस्त मानव विकास सूचकांक में भारत बेहतर है। परंतु आय संबंधी कारक को हटा दें तो बांग्लादेश बेहतर हो जाएगा। यदि आय वृद्धि के क्षेत्र में बांग्लादेश भारत को पीछे छोड़ता है तो वह समग्र मानव विकास सूचकांक पर भारत से आगे निकल जाएगा।


प्रवासियों का एक विवादित मुद्दा रह जाता है। भारत की दलील है कि बांग्लादेश ने अपने धार्मिक अल्पसंख्यकों (ज्यादातर हिंदुओं) के साथ उचित व्यवहार नहीं किया और वहां गैर मुस्लिमों की आबादी सन 1951 के 23.2 फीसदी से घटकर 2011 में 9.6 फीसदी रह गई। एक आरोप यह भी है कि बांग्लादेश के मुस्लिम भारत आते रहे हैं जिससे पश्चिम बंगाल और असम जैसे सीमावर्ती राज्यों की आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। पश्चिम बंगाल में 27 फीसदी और असम में करीब 38 फीसदी मुसलमान हैं।


परंतु दोनों आंकड़ों में विरोधाभास है। यदि हिंदुओं के बाहर जाने के कारण बांग्लादेश की आबादी में उनकी हिस्सेदारी कम हुई है तो ऐसा नहीं हो सकता कि मुस्लिमों के भारत में आने से सीमा के इस पार आबादी का धार्मिक मिश्रण इस प्रकार बदले। खासतौर पर इसलिए कि पश्चिम बंगाल और असम में आबादी की वृद्धि राष्ट्रीय औसत से कम रही है। सीमा के दोनों ओर जनांकीय मिश्रण में बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन इसे बेहतर या अधिक संपूर्णता से स्पष्ट करना जरूरी है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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नियामकीय जाल में न उलझ जाए किस्सागोई से जुड़ी रचनात्मकता (बिजनेस स्टैंडर्ड)

वनिता कोहली-खांडेकर  

बाल्तासार कोरमाकर की टेलीविजन सीरीज ट्रैप्ड की शुरुआत पूर्वी आइसलैंड के एक छोटे से कस्बे में एक धड़ के मिलने से होती है। इसके बाद ऐसे धड़ मिलने का सिलसिला शुरू होता है और बर्फीला तूफान कस्बे को देश के शेष हिस्सों से काट देता है। अब यह जवाबदेही विनम्र पुलिस प्रमुख आंद्री ओलाफसन और उनके सहयोगियों पर आती है कि वे चीजों का पता लगाएं। रक्त जमा देने वाली ठंडी हवाएं, बर्फबारी, यात्रियों के साथ फंसा हुआ एक पोत, बिजली गुल होना, सबकुछ फंसे होने के अहसास को मजबूत करता है। यह टेलीविजन धारावाहिक आपको अपने साथ बांध लेता है। दस वर्ष पहले इस बात की क्या संभावना थी कि आप आइसलैंड में बने धारावाहिक का लुत्फ ले पाते और आगे ऐसे अन्य धारावाहिक देख सकते? स्ट्रीमिंग वीडियो या ओटीटी हमें दुनिया भर के जो धारावाहिक देखने का अवसर देते हैं वह अभूतपूर्व है।


जिस तरह हम लोग कोलंबिया, स्पेन, जर्मनी, तुर्की और कोरिया से जुड़े शो और फिल्में देख रहे हैं उसी तरह दुनिया भर के लोग भारतीय धारावाहिकों और सीरीज का आनंद ले रहे हैं। पाताल लोक, मिर्जापुर, स्कैम 1992 आदि धारावाहिकों की जड़ें भारत में उतनी ही गहरी हैं जितनी कि हिंटरलैंड की वेल्स में या द मोटिव की स्पेन में। ये स्थानीय कहानियां हैं जिन्हें भारतीय किस्सागो भारतीय भाषाओं में कह रहे हैं। इन कहानियों की स्ट्रीमिंग इन्हें वैश्विक बना रही है। वह भी एक ऐसे अंदाज में जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। नेटफ्लिक्स या एमेजॉन प्राइम वीडियो पर जारी हर भारतीय शो दुनिया के 200 देशों में उपलब्ध है। इनमें से कई की समीक्षा दुनिया के शीर्ष अखबारों में प्रकाशित हो रही है। विदेशों में रिलीज हुईं बड़ी भारतीय फिल्मों मसलन फॉक्स स्टूडियो की माई नेम इज खान (2010) या डिज्नी की दंगल (2016) को भी ऐसी कवरेज नहीं मिली।


बीते दो वर्षों में रीमिक्स, सैक्रेड गेम्स, लस्ट स्टोरीज आदि को अंतरराष्ट्रीय ऐमी अवाड्र्स के लिए नामांकित किया गया था। गत वर्ष दिल्ली क्राइम को एक पुरस्कार मिला भी था।


ये तमाम बातें गत 25 फरवरी को भारत सरकार द्वारा अधिसूचित सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्थानों के लिए दिशा निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 को चिंता का कारण बनाती हैं। इन नियमों में ओटीटी दिशानिर्देश की बात करें तो वे लगभग वैसे ही हैं जैसे कि इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने सरकार को सुझाए थे। इनमें उम्र और विषयवस्तु को लेकर रेटिंग देने तथा पहुंच नियंत्रण के दिशानिर्देश हैं।


सबसे परेशान करने वाली है समस्या निवारण प्रणाली। इसमें नियामकों को भारी छूट दी गई है। इसमें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अंतर विभागीय समिति शामिल है। इससे एक रचनात्मक उद्योग को कितना नुकसान पहुंच सकता है टेलीविजन में देखा जा सकता है। एक दशक से अधिक वक्त से भारतीय टेलीविजन को शुल्क मुक्ति की नियामकीय उलझन में डाल दिया। इससे प्रयोग की गुंजाइश सीमित हो गई और विज्ञापनों पर निर्भर और मौद्रिक दृष्टिकोण से अत्यंत कमजोर विषयवस्तु वाले कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई। चूंकि स्ट्रीमिंग वीडियो में ऐसी कोई बाधा नहीं है इसलिए यहां किस्सागोई करने वालों को रचनात्मक स्वतंत्रता मिली। इससे इन्हें दर्शकों का प्यार मिला और वे चल निकले।


समस्या निवारण व्यवस्था के खिलाफ दो तगड़ी दलील हैं। पहली है निजी बनाम सार्वजनिक दर्शकों की। इंटरनेट आधारित प्लेटफॉर्म पर भुगतान करके देखने और बिना भुगतान देखने की दो व्यवस्थाएं हैं। इनमें नेटफ्लिक्स और हॉटस्टार पहले तथा मैक्स प्लेयर और यूट्यूब दूसरी श्रेणी में आते हैं। जिस सामग्री के लिए आप भुगतान करते हैं वह सार्वजनिक प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 19 (1) में उल्लिखित अभिव्यक्ति की आजादी का अपवाद लागू नहीं होता। एक अधिवक्ता के मुताबिक इसे देखते हुए आप निजी, व्यक्तिगत अधिकार का इस्तेमाल करते हैं। परंतु शुल्क मुक्त विषयवस्तु के साथ हालात बदल जाते हैं क्योंकि वह सार्वजनिक प्रदर्शन की वस्तु है। इस मामले में अपवाद का नियम लागू होता है।


दूसरा है कारोबार। कॉमस्कोर के मुताबिक करीब 40 करोड़ भारतीय ऐसे हैं जो फिलहाल उपलब्ध 60 ब्रांड में से किसी न किसी पर वीडियो देखते हैं। करीब 8,000 करोड़ रुपये का ओटीटी उद्योग दर्शकों और राजस्व दोनों मामलों में दो अंकों में बढ़ रहा है। मीडिया पार्टनर्स एशिया का अनुमान है कि ओटीटी कार्यक्रमों में निवेश 2017 के 1,690 करोड़ रुपये से दोगुना से अधिक बढ़कर 2019 में 4,320 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा था। सन 2020 के आंकड़े अभी नहीं आए हैं, हालांकि इसके 5,250 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।


हर बड़ा वैश्विक ओटीटी मंच कहानियों पर दो अरब डॉलर से 15 अरब डॉलर की राशि खर्च कर रहा है और भारत को इसमें बड़ा हिस्सा हासिल हो रहा है। इन कार्यक्रमों के दर्शक केवल भारत में ही नहीं बल्कि बाहर भी हैं। उदाहरण के लिए सन 2016 में भारत में आने के बाद से दुनिया के सबसे बड़े सबस्क्रिप्शन आधारित ओटीटी नेटफ्लिक्स ने भारत में 60 से अधिक कार्यक्रम बनाने की घोषणा की है। भारत कार्यक्रमों की दृष्टि से उसके सबसे बड़े बाजारों में से एक है।


तांडव, द सुटेबल बॉॅय तथा अन्य कार्यक्रमों को लेकर हुए विवाद के बाद संपूर्ण रचनात्मक क्षेत्र में चिंता का माहौल है। कई लेखक स्वीकार करते हैं कि वे खुद ही अपनी विषयवस्तु को लेकर सावधानी बरत रहे हैं या फिर उनसे कहा जा रहा है कि वे अपनी कल्पनाशीलता पर लगाम लगाएं। यदि भारतीय किस्सागो अपनी कहानियां नहीं कह पाएंगे तो यह उद्योग भी टेलीविजन की राह पर निकल जाएगा। उस स्थिति में हमारा आकर्षण और पूंजी आदि उन देशों में चले जाएंगे जहां कहानियां कहने की आजादी है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कोरोना के बावजूद नए तेवर से लैस (बिजनेस स्टैंडर्ड)

ए के भट्टाचार्य  

पिछले दो वर्षों में केंद्र सरकार की तरफ से पेश किए गए बजट में दो बुनियादी समस्याएं नजर आई हैं। पहली, बजट ने राजकोषीय घाटे के संदर्भ में सरकार की वास्तविक स्थिति को छिपाने की कोशिश की है। दूसरी, बजट ने सरकार की राजस्व प्राप्तियों के बारे में वास्तविकता से दूर लगने वाले पूर्वानुमान पेश किए हैं। इन दोनों समस्याओं ने सम्मिलित रूप से बजट में पेश आंकड़ों की शुचिता को चोट पहुंचाई है जिससे सजग एवं जिम्मेदार बजट-निर्माण से संबंधित सिद्धांतों का उपहास बना है।

ये समस्याएं हाल की उपज नहीं हैं लेकिन वर्ष 2018-19 और 2019-20 में ये अधिक गंभीर जरूर हुई हैं। इस पर नजर डालें कि बजट की राजकोषीय सशक्तीकरण उपलब्धियों को पिछले कुछ वर्षों में किस तरह गलत ढंग से पेश किया गया है। यहां पर दोषी वह प्रवृत्ति है जो गैर-बजट उधारियों का तरीका अपनाना पसंद करती है क्योंकि वह प्रमुख राजकोषीय घाटा आंकड़ों में नहीं झलकता है। इस तरह बजट से इतर उधारियों के आंकड़े (2016-17 के बाद से उपलब्ध) बताते हैं कि केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा पिछले कुछ वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आधे फीसदी से भी अधिक संकुचित हुआ है।


वर्ष 2016-17 और 2017-18 में हर साल बजट से इतर की उधारियां जीडीपी की 0.51 फीसदी थीं। वर्ष 2018-19 में यह उधारी बढ़कर जीडीपी का 0.89 फीसदी हो गई लेकिन फिर इसमें गिरावट आने लगी। वर्ष 2019-20 में बजट से इतर उधारी जीडीपी का 0.72 फीसदी रही जबकि 2020-21 में इसके 0.64 फीसदी रहने का अनुमान है। नए वित्त वर्ष में इसके जीडीपी का 0.13 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है। इस तरह की बजट से इतर उधारियों के जरिये राजकोषीय घाटे का असली आकार छिपाने की समस्या को अतीत में भी चिह्नित किया जा चुका है। असल में, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सरकार के प्रमुख राजकोषीय घाटा आंकड़े एवं वास्तविक स्थिति के बीच के फासले को दूर करने में प्रशंसनीय प्रयास किए हैं। उनके कार्यकाल में पेश किए गए तीनों बजट में इस आंकड़े में गिरावट देखने को मिली है और इस मोर्चे पर अधिक पारदर्शिता नजर आई है।


हालिया समय में बजट से जुड़ी दूसरी समस्या के बारे में बहुत कम चर्चा ही हुई है। इस समस्या के दो स्तर हैं। पहले स्तर पर, बजट में राजस्व प्राप्तियों के बारे में किए पूर्वानुमान एवं वास्तविक प्राप्तियों के बीच का फासला लगातार बढ़ता गया है। दूसरे स्तर पर, संशोधित राजस्व अनुमानों एवं वास्तविक प्राप्तियों का फासला भी बढ़ता गया है। इस तरह, केंद्र के शुद्ध कर संग्रह के वास्तविक आंकड़े 2011-12 से लगातार चार वर्षों तक बजट अनुमानों से 4-8 फीसदी तक कम रहे थे। इन चार में से तीन वर्षों  में बजट संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के समय पेश किए गए थे जबकि 2014-15 का बजट राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के समय पेश किया गया था। वर्ष 2015-16 से 2017-18 तक कर राजस्व का यह फासला नदारद रहा लेकिन 2018-19 एवं 2019-20 में फिर से नमूदार हो गया। इन दो वर्षों  में तो राजस्व प्राप्तियां अनुमान से काफी कम रहीं। वर्ष 2018-19 में 11 फीसदी और 2019-20 में 18 फीसदी का फासला रहा। यह बड़ी फिसलन थी और वित्त मंत्रालय में बैठकर ऐसे अनुमान जताने वालों के लिए बुरी खबर थी।


अधिक गंभीर फिसलन बीते दो वर्षों में सरकार के शुद्ध कर राजस्व संग्रह के संशोधित अनुमानों एवं वास्तविक प्राप्तियों के बीच बढ़ते फासले के संदर्भ में थी। वर्ष 2018-19 में शुद्ध कर राजस्व प्राप्ति 13.17 लाख करोड़ रुपये की थी जो संशोधित अनुमान में जताए गए आंकड़े से करीब 11 फीसदी कम था। वर्ष 2019-20 में भी यह समस्या बदस्तूर कायम रही। शुद्ध कर संग्रह का संशोधित अनुमान 15 लाख करोड़ रुपये था लेकिन वास्तविक प्राप्ति 10 फीसदी कम 13.57 लाख करोड़ रुपये रही।


यह दलील देना मुमकिन है कि बजट अनुमानों की तुलना में वास्तविक संग्रह में थोड़ी-बहुत कमी होना स्वीकार्य होना चाहिए। आखिर बजट अनुमान सिर्फ  आने वाले वर्षों में बने रहने वाले हालात पर आधारित पूर्वानुमान होते हैं। लेकिन शुद्ध कर संग्रह के संशोधित अनुमानों एवं वास्तविक प्राप्तियों के बीच बड़ा फर्क  होने को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है। संशोधित अनुमान वित्त वर्ष खत्म होने में दो महीना बाकी रहते समय पेश किए जाते हैं। अगर वास्तविक आंकड़े संशोधित अनुमानों से 10-11 फीसदी कम रहते हैं तो फिर वित्त मंत्रालय में काम करने वाली बजट टीम के तौर-तरीके में कुछ गंभीर खामी है।


पिछले दो वर्षों की घटनाओं के संदर्भ में कर राजस्व संग्रह अनुमानों से जुड़े हालिया घटनाक्रम उत्साहजनक हैं। निश्चित रूप से बजट में पेश राजस्व अनुमान पूरी तरह गलत हो गए जिसके लिए कोरोना संकट एवं लॉकडाउन भी जिम्मेदार रहा। बजट में जब 2020-21 के लिए संशोधित अनुमान जताए गए तो यह एकदम स्पष्ट हो गया। लेकिन अब बड़ी राहत है कि इन संशोधित अनुमानों की हालत पिछले दो वर्षों की तरह नहीं होगी।


वर्ष 2020-21 के लिए शुद्ध कर संग्रह का संशोधित अनुमान 13.44 लाख करोड़ रुपये रखा गया है जो 2019-20 के 13.57 लाख करोड़ रुपये से करीब एक फीसदी कम है। लेकिन सरकार के अस्थायी वास्तविक आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्त वर्ष के पहले 10 महीनों में शुद्ध कर राजस्व संग्रह 11 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जो 2019-20 की समान अवधि में इक_ा 9.98 करोड़ रुपये राजस्व से करीब 10 फीसदी अधिक है। इस साल के बाकी दो महीनों में 2.24 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व आना तुलनात्मक रूप से आसान होगा। ध्यान रहे कि 2019-20 के अंतिम दो महीनों में शुद्ध कर संग्रह करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये का था।


ऐसे में पूरी संभावना है कि 2020-21 में शुद्ध कर संग्रह की वास्तविक प्राप्ति बजट में पेश संशोधित अनुमानों से कहीं अधिक होगी। इस तरह वर्ष 2020-21 के पिछले दो वर्षों से जारी रुझान से अलग जाने के आसार हैं। प्रत्यक्ष कर संग्रह के बारे में आए नए आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। 15 मार्च तक के आंकड़े बताते हैं कि पूरे वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान को पहले ही हासिल किया जा चुका है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के तहत संग्रह भी अच्छी दर से बढ़ रहा है और संशोधित अनुमानों से कहीं भी कम नहीं होगा।


कोविड-19 संकट के दौर में शुद्ध कर संग्रह संबंधी संशोधित अनुमानों का सटीक रहना अपने-आप में उपलब्धि है। राजस्व आंकड़ों को कम करके दिखाने से अर्थव्यवस्था पर राजकोषीय घाटे का असर संभालने में सरकार को अतिरिक्त लाभ भी मिलता है। लेकिन वित्त मंत्रालय में सक्रिय नई टीम के दिए व्यापक संदेश को बमुश्किल नजरअंदाज किया जा सकता है। राजस्व आंकड़ों का अनुमान सही होना इस समय वित्त मंत्रालय में तैनात वरिष्ठ अधिकारियों की टीम में एक परिपक्वता और उद्देश्यपूर्ण सोच को दर्शाता है।


वित्त मंत्री जिस तरह बजट में पेश आंकड़ों और इसके नीतिगत निर्माण से निपट रही हैं, वह भी कम अहम नहीं है। राजकोषीय घाटे के असली आकार का स्पष्ट उद्गार  इस कायांतरण का केवल एक पहलू है। दूसरा बदलाव यह है कि वित्त मंत्री को बजट में पेश नीतिगत कदमों पर प्रधानमंत्री का पूर्ण समर्थन मिला है।


जब निर्मला सीतारमण ने अपनी नई निजीकरण नीति घोषित की तो इस पर गहरे संदेह थे कि इस कदम को भारतीय जनता पार्टी का पूरा राजनीतिक समर्थन है भी या नहीं। लेकिन जब निजीकरण पर उनके साहसिक कदमों का प्रधानमंत्री ने संसद के पटल पर खुलकर समर्थन किया तो ये सारे संदेह दूर हो गए। इस बदलाव ने भी बजट को नया तेवर और मजबूती दी है कि अर्थव्यवस्था कोविड महामारी की चुनौतियों से निपट सके।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Friday, March 26, 2021

आईबीसी की वापसी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सरकार ने ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के निलंबन की अवधि बुधवार को समाप्त होने के बाद उसे न बढ़ाकर अच्छा किया है। इससे इस संहिता का सामान्य कामकाज शुरू हो सकेगा। कोविड-19 के चलते कारोबारी ऋणशोधन अक्षमता निस्तारण की प्रक्रिया को मार्च 2020 में छह महीने के लिए निलंबित किया गया था। बाद में इसे दो बार तीन-तीन महीने के लिए बढ़ाया गया। विचार यह था कि कंपनियों को कोविड-19 के कारण बंद होने की स्थिति में संभावित डिफॉल्ट की वजह से ऋणशोधन प्रक्रिया में शामिल होने से बचाया जा सके। महीनों तक कंपनियों का कामकाज बंद होने से बेहतर से बेहतर कंपनी के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल हो सकता था। शुरुआती इरादा सही था और निलंबन को एक वर्ष तक नहीं बढ़ाना था। छोटी कंपनियों को मुश्किल से बचाने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा चुके हैं। सरकार ने ऋणशोधन प्रक्रिया शुरू करने के लिए देनदारी चूक की सीमा बढ़ाकर एक करोड़ रुपये कर दी है। आदर्श स्थिति तो यही होती कि आर्थिक गतिविधियों की शुरुआत के साथ ही यह प्रक्रिया शुरू कर दी जाती। कर्ज चुकाने को लेकर दी गई ऋण स्थगन की सुविधा अगस्त में समाप्त हो गई, हालांकि खातों को फंसे हुए कर्ज के रूप में वर्गीकृत करने की प्रक्रिया इस सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश आने तक रुकी रही। आईबीसी प्रक्रिया को एक वर्ष तक पूरी तरह स्थगित करने से उन कंपनियों को भी बचाव मिल गया जो शायद कोविड के कारण नहीं बल्कि अन्य वजहों से देनदारी में चूक जातीं। ऐसी कंपनियां केवल पूंजी फंसाने और बैंकिंग तंत्र में फंसा हुआ कर्ज बढ़ाने का काम करेंगी। यह समझना भी आवश्यक है कि कुछ कारोबार ऐसे हैं जो तमाम नियामकीय सहायता के बावजूद शायद इस झटके से उबर न सकें। तंत्र को ऐसे तमाम मामलों से निपटने की तैयारी रखनी चाहिए। हालात सामान्य होने के बाद आईबीसी की प्रक्रिया ही पूंजी किफायत सुधारने का सबसे बेहतर तरीका होगी। इससे सुधार की गति बढ़ेगी।

प्रक्रिया बहाल होने से कोविड से संबंधित दिक्कतों के कारण निस्तारण मामलों में तेजी आ सकती है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि तेजी बहुत अधिक नहीं होगी। चाहे जो भी हो अब ध्यान परिचालन मुद्दों पर स्थानांतरित होना चाहिए। सरकार को यह श्रेय जाता है कि उसने इस कानून के उचित उद्देश्य के लिए प्रयोग को लेकर समुचित सक्रियता दिखाई। अब उसे राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट (एनसीएलटी) की क्षमता बढ़ाने पर विचार करना चाहिए ताकि निस्तारण तेज हो सके। जैसा कि इस समाचार पत्र में प्रकाशित भी हुआ कि करीब 75 फीसदी मामले 270 दिन से अधिक पुराने हैं। यह भी स्पष्ट है कि बड़ी तादाद में मामलों की सुनवाई करने वाले पीठ अधिक समय लेते हैं। मसलन दिल्ली और मुंबई में निस्तारण की अवधि 475 दिन से अधिक है जबकि राष्ट्रीय औसत 440 दिन है। यदि अपील पंचाट और न्यायालयों द्वारा लिए जाने वाले समय को शामिल किया जाए तो यह अवधि बहुत अधिक बढ़ जाती है। सार्थक प्रभाव के लिए इस अवधि को कम करना जरूरी है। ताजा आर्थिक समीक्षा में भी एनसीएलटी के न्यायिक बुनियादी ढांचे में सुधार, डेट रिकवरी पंचाटों और अपील पंचाटों की जरूरत रेखांकित की गई है ताकि फंसे कर्ज का निस्तारण तेज हो सके।


निश्चित तौर पर ऋणशोधन निस्तारण ढांचे की मजबूती की जरूरत पर बहुत अधिक जोर नहीं दिया जा सकता। कर्जदाताओं द्वारा कर्ज का अनुशासन बरकरार रखने का यह सबसे बेहतर उपाय है। सरकारी बैंकों के दबदबे वाले भारतीय बैंकिंग तंत्र के लिए भी यह अहम है। सरकारी बैंकर अक्सर फंसे कर्ज के निपटान के अन्य तरीके अपनाने से हिचकते हैं क्योंकि उन्हें जांच एजेंसियों का खौफ रहता है। आरबीआई के मुताबिक बैंकिंग तंत्र का समूचा फंसा हुआ कर्ज सितंबर तक 13.5 फीसदी हो जाएगा। आईबीसी प्रक्रिया बैंकिंग व्यवस्था को तनाव से निपटने में मदद करेगी।

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पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार बंगाल में भाजपा के लिए मूल्यवान चेहरा (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस  

अशोक लाहिड़ी भारत के शुरुआती दौर के चुनावी विश्लेषकों में से एक  हैं। उन्होंने कई चुनावों में हार-जीत की कई भविष्यवाणियां की हैं। लेकिन क्या यह पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार, लोक नीति विश्लेषक, अर्थशास्त्री और सांख्यिकीविद् रहे 70 वर्षीय लाहिड़ी की प. बंगाल विधानसभा चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए काफी है?

वह उत्तर बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर जिले के बालूरघाट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार हैं। उन्हें अलीपुरद्वार से इसलिए हटा दिया गया क्योंकि पार्टी ने महसूस किया कि स्थानीय दावेदार और भाजपा महासचिव सुमन कांजीलाल की बातों में एक तर्क है जब उन्होंने और भाजपा के अन्य समर्थकों ने लाहिड़ी की उम्मीदवारी का विरोध किया था। लाहिड़ी अपने पक्ष में कोई दमदार तर्क नहीं दे सके जब उन्होंने मासूमियत और ईमानदारी से कहा कि वह बाल्यकाल में ही अलीपुरद्वार गए थे जिससे कांजीलाल का दावा मजबूत हुआ कि यह निर्वाचन क्षेत्र किसी 'बाहरी' व्यक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं चाहता है।


अगर भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिलता है तब भाजपा की कई सूचियों में वित्त मंत्री के पद के लिए लाहिड़ी का नाम सबसे ऊपर है। राज्य में आज अगर भाजपा के लिए कोई क्षेत्र सबसे सुरक्षित है तो वह उत्तर बंगाल है जिसमें दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुर द्वार, कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर जैसे जिले शामिल हैं। एक साथ यह क्षेत्र 294 सदस्यीय विधान सभा में 54 विधानसभा सीटों का योगदान देता है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उत्तर बंगाल की आठ में से सात सीटों पर जीत हासिल की थी।


लेकिन क्या लाहिड़ी वाकई इस क्षेत्र के लिए 'बाहरी' व्यक्ति हैं? उनके बचपन के दोस्त और सहकर्मी ओंकार गोस्वामी कहते हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। वह दावा करते हैं, 'अशोक बंगाली लड़का है।' लाहिड़ी का संबंध एक मध्यमवर्गीय परिवार से है और उन्हें वह सभी मूल्य सिखाए गए हैं जो ऐसे परिवारों में परवरिश के दौरान सिखाए जाते हैं, मतलब संस्कृति और धर्म के लिए समान भाव रखना, एक हिंदू होने की चेतना के साथ ही दूसरे समुदायों के प्रति सहिष्णुता का भाव होना आदि। पैसे के प्रति स्वस्थ आकांक्षा हो पर कोई अतिवादिता नहीं हो। उन्होंने बंगाल के मशहूर प्रेसीडेंसी कॉलेज में मशहूर लोगों के बेटे की तरह ही अपने जीवन की शुरुआत की और शोध करने तथा पढ़ाने के लिए दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से जुड़े और बाद में वह दिल्ली विश्वविद्यालय में रीडर के तौर पर जुड़े।


1980 के दशक में आर्थिक उदारीकरण को लेकर ज्यादा सक्रियता नहीं थी । लेकिन कहीं न कहीं सरकार के भीतर भी आधुनिक भारत के माध्यम से एक प्रायोगिक रास्ता अपनाने का अहसास था। कुछ बेहद प्रतिभाशाली लोग विदेश चले गए थे लेकिन उन्हें उन्होंने भारत लौटना चुना और वे व्यवस्था में अपना योगदान देने के लिए धैर्यपूर्वक इंतजार कर रहे थे। भारतीय बुद्धिजीवियों के एक समूह 'दि पॉलिसी ग्रुप' ने भारत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई लेकिन अफसरशाही की आत्ममुग्धता और मानसिक संकीर्णता से उन्हें निराशा भी हुई। उसी दौरान कंसल्टेंसी और थिंक टैंक-वाद का पहली बार उभार हुआ। प्रणय रॉय ने उस टीम का नेतृत्व किया जिसके लाहिड़ी एक अहम सदस्य थे और उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा मैक्रो-इकनोमेट्रिक मॉडल बनाया। टीम ने सरकार और कारोबार को समान रूप से नीतिगत सलाह की पेशकश की। भारत के लिए कंप्यूटर नए थे लेकिन यह टीम संसाधन के मूल्य को जानती थी। चाहे चुनावों का विश्लेषण करना हो या व्यापक स्तर पर नीतियों में हस्तक्षेप के नतीजों का अनुमान लगाना हो वे इसे पूरे आत्मविश्वास और ऊर्जा के साथ कर सकते थे।


लेकिन यह दौर लंबे समय तक नहीं चल पाया। चुनाव विश्लेषण के साथ ही रॉय को एनडीटीवी की मंजिल मिली। इसकी शुरुआत मशहूर शो 'दि वल्र्ड दिस वीक' से हुई। जब एनडीटीवी का संचालन हो रहा था तब पॉलिसी ग्रुप ने सहमति दी कि रॉय को टीम के अन्य सदस्यों की तुलना में अधिक प्रसारण का वक्त मिलना चाहिए। लाहिड़ी इस बात पर सहमत नहीं थे। उन्होंने पैसे कमाने का इरादा करते हुए भारत छोड़ दिया। हालांकि उनका इतने लंबे समय तक बाहर रहने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक ने उन्हें करीब एक दशक तक दूर रखा। उन्हें विदेश में ही बसने का विचार कभी नहीं भाया।


जब उनकी स्वदेश वापसी हुई तब वह राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान के निदेशक पद पर आसीन हुए। यह पूछे जाने पर कि मनमोहन सिंह की सरकार को सलाह देने वाले व्यक्ति भाजपा के लिए विधानसभा उम्मीदवार कैसे बन गए, इस सवाल पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता थोड़ा खीझ के साथ कहते हैं, 'लेकिन उनको मुख्य आर्थिक सलाहकार अटल बिहारी वाजपेयी ने बनाया था।' साल 2002 से 2007 तक उन्होंने मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में पहले जसवंत सिंह और फि र पी चिदंबरम के लिए काम किया। यह उनके विचारों में उदारता का भी एक परिणाम था। इसके बाद एडीबी में उनका एक कार्यकाल पूरा हुआ। माना जाता है कि 2014 में उन्होंने भाजपा के घोषणा पत्र में भी अपना योगदान दिया था, हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं की जा सकी है।


लाहिड़ी ने 2016 की नोटबंदी से हुई परेशानी को लेकर आलोचना की लेकिन उन्होंने कुल मिलाकर इस पर गोलमोल ही जवाब दिया मसलन 'समय ही बताएगा' आदि। भाजपा बंगाल में अपनी छवि को बेहतर करने की कोशिश कर रही है जिसमें बड़ी तादाद में तृणमूल कांग्रेस से आए लोगों को शामिल किया गया है जिन पर भाजपा पहले आरोप लगाती रही है। निश्चित तौर पर लाहिड़ी मूल्यवान चेहरा हैं। वह धाराप्रवाह बांग्ला बोलते हैं और उनकी हिंदी भी अच्छी है। अगर पार्टी उनके जैसे व्यक्ति को नहीं जिता सकती है तब पार्टी को बेहद अफसोस होना चाहिए।

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Thursday, March 25, 2021

टीका आपूर्ति में तेजी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

कोविड-19 संक्रमण के नए मामलों में बढ़ोतरी के बीच सरकार ने देश में टीकाकरण कार्यक्रम के लिए नए नियमों और कार्यक्रम की घोषणा की है। आगामी 1अप्रैल से हर वह वयस्क  व्यक्ति टीका लगवा सकेगा जिसका जन्म 1 जनवरी, 1977 के बाद हुआ है। यानी देश की आबादी का पांचवां हिस्सा टीकाकरण का पात्र होगा। पहले इस आयु समूह के लोग तभी टीका लगवा सकते थे जब उन्हें अन्य घातक बीमारियां हों। सरकार को आशा है कि इससे टीकाकरण कार्यक्रम तेज करने में मदद मिलेगी। अब तक टीके की पांच करोड़ खुराक दी जा चुकी हैं जबकि छह करोड़ खुराक निर्यात की गई हैं। टीकाकरण की धीमी गति समस्या पैदा कर सकती है क्योंकि देश में प्रवेश के मानकों के शिथिल होने के कारण 18 राज्यों में कोरोना के नए प्रकार आ चुके हैं। पंजाब जैसे राज्यों में हाल ही में संक्रमित पाए गए लोगों में कोरोना का जो जीनोम मिला है वह ब्रिटेन का तेज प्रसार वाला प्रारूप है। एक चिंता यह भी है कि महाराष्ट्र में कोविड के मामलों का तेज प्रसार देश में ही विकसित कोरोनावायरस की नई किस्म के कारण न हो रहा हो। प्रतिदिन होने वाला टीकाकरण कई बार 30 लाख का स्तर पार कर रहा है लेकिन अगर कम से कम शहरी इलाकों में जल्द हालात सामान्य करने हैं तो रोजाना कम से कम 50 लाख टीके लगाने होंगे।

टीकाकरण के लिए उम्र कम करना अच्छा कदम है लेकिन सवाल यह भी है कि क्या टीकों की आपूर्ति को देखते हुए नई व्यवस्था का प्रबंधन हो सकेगा। भारतीय टीका निर्माता पहले ही सऊदी अरब, मोरक्को और ब्रिटेन जैसे देशों को वादे के मुताबिक टीका उपलब्ध कराने में नाकाम रहे हैं। चिंता यह भी है कि टीकाकरण के नए कार्यक्रम की शुरुआत के बाद कहीं दूसरी खुराक तय समय में उपलब्ध कराने में दिक्कत न आए। ऐसे में बहुत संभव है कि सरकार का कोविशील्ड वैक्सीन की दूसरी खुराक लगाने की अवधि पहली खुराक के बाद आठ से 12 सप्ताह बाद करने का निर्णय केवल वैज्ञानिक कारणों से न हो। इसका संबंध टीके की उपलब्धता से भी हो सकता है। नियम में बदलाव के बाद टीके की मांग बढ़ेगी और सरकार को आपूर्ति बढ़ाने पर काम करना होगा।


टीके की आपूर्ति बढ़ाने के मामले में सरकार काफी कुछ कर सकती है। सबसे पहले, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ किए गए अनुबंध का दोबारा अवलोकन कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उसे हर खुराक पर इतना मार्जिन मिले कि वह न केवल टीके का उत्पादन बरकरार रखे बल्कि उसे बढ़ाने के लिए भी प्रोत्साहित हो। सरकार को यह भी जांचना चाहिए कि आखिर क्यों भारत बायोटेक का टीका पर्याप्त तादाद में तैयार नहीं हो रहा है। अब तक कोवैक्सीन की बहुत कम खुराक दी जा रही है। यदि जरूरत पड़े तो अमेरिका से सबक लिया जा सकता है जहां सरकार ने औषधि निर्माता कंपनी मर्क से कहा कि वह अपनी प्रतिस्पर्धी कंपनी फाइजर द्वारा निर्मित टीकों का उत्पादन करे ताकि फिलहाल लाइसेंसशुदा दोनों टीकों का उत्पादन किया जाए। अंत में फाइजर, स्पूतनिक-5 और जॉनसन ऐंड जॉनसन समेत दुनिया भर में मंजूरी प्राप्त टीकों को भी तेजी से मंजूरी दी जानी चाहिए ताकि वे निजी क्षेत्र के बाजार में उतर सकें। भारत टीकाकरण को लेकर पुराने नियमों और समयसीमा के साथ कोरोना की दूसरी लहर का सामना नहीं कर सकता। बतौर टीका निर्माता वह शेष विश्व के प्रति अपनी जवाबदेही के निर्वहन में भी पीछे नहीं रह सकता। इकलौता विकल्प यही है कि आपूर्ति बढ़ाने के लिए बाजार के संकेतों और सब्सिडी का इस्तेमाल  किया जाए।

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बैंक निजीकरण प्रक्रिया में कैसे मिलेगी सफलता (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टीटी राममोहन  

यह कहा जा सकता है कि अगले वित्त वर्ष में दो सरकारी बैंकों के निजीकरण की दिशा में आगे बढऩे के पहले बेहतर यही होगा कि बैंक संचालन से संबंधित पी जे नायक समिति (2014) के प्रस्तावों पर ध्यान दिया जाए।

समिति ने एक ऐसी बैंक होल्डिंग कंपनी का प्रस्ताव रखा था जिसे पेशेवर चलाएं। सरकारी बैंकों के शेयर इसे हस्तांतरित किए जाएं। ऐसा न होना था, न हुआ। बैंकिंग तंत्र के 60 फीसदी शेयर 'स्वतंत्र' पेशेवरों को हस्तांतरित करने के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता। यदि सरकार का इरादा इन बैंकों को स्वायत्तता देना चाहती है तो वह काम आज भी हो सकता है। यदि वह ऐसा नहीं करती तो बैंक होल्डिंग कंपनी बनाने का भी कोई फायदा नहीं।


सरकारी बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी 50 फीसदी से कम करके उनके वेतन भत्ते निजी क्षेत्र के समान बनाने का विचार भी काल्पनिक है। कोई सरकारी संस्थान निजी क्षेत्र के समान वेतन भत्ते नहीं दे सकता। सरकारी क्षेत्र बेहतर प्रोत्साहन अवश्य दे सकता है लेकिन ये कभी निजी क्षेत्र का मुकाबला नहीं कर सकते।


सरकारी और निजी क्षेत्र दो अलहदा कारोबारी मॉडल हैं। एक ऊंचा वेतन देता है, वहां पदोन्नति की संभावना ज्यादा होती है और काम का दबाव भी। जबकि दूसरा रोजगार की सुरक्षा, ढेरों चुनौतियां, बढिय़ा आवास और कम नकद वेतन देता है। यह मामला दो अलग जीवनशैलियों का है। दो मॉडलों में से चयन करना और उन्हें मिलाना हमें कहीं नहीं ले जाएगा।


यदि सरकारी बैंकों की तादाद कम करनी है तो बेहतर है उन बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। तब सरकार बैंक के प्रदर्शन के लिए जवाबदेह नहीं रह जाएगी। कुछ बैंकों के साथ प्रायोगिक शुरुआत करना उचित होगा। हमें ऐसे बैंकों के प्रदर्शन पर सावधानी से नजर रखनी होगी। अन्य बैंकों के निजीकरण के पहले तीन-चार साल प्रतीक्षा करनी चाहिए। दो सरकारी बैंकों   का निजीकरण भी बड़ी चुनौती है। बड़ा सवाल यह है कि सरकार ये बैंक किसे बेचेगी? देश में बड़े निजी बैंकों की अखिल भारतीय उपस्थिति है। वे शायद ही अलग कार्य संस्कृति और विरासत वाले सरकारी बैंक को लेना चाहें।


विदेशी बैंक हाल के वर्षों में भारत में अपना कारोबार कम कर रहे हैं। खासकर खुदरा कारोबार। ऐसे में देखना होगा कि रिजर्व बैंक के कड़े मानकों के अधीन कितने बैंक भारतीय बाजार में एक अनुषंगी तैयार करने की इच्छा रखते हैं। अब बचे संस्थागत विदेशी निवेशक। नायक समिति ने ऐक्सिस बैंक को सरकारी हिस्सेदारी 50 फीसदी से कम करने के आदर्श के रूप में पेश किया है। आज ऐक्सिस बैंक के सामने जो समस्याएं हैं उनकी अनदेखी कर दें तो बैंक ने जो सफलताएं हासिल की हैं वे केवल सरकार की अंशधारिता 50 फीसदी से कम करने की वजह से नहीं हैं। ऐक्सिस बैंक की शुरुआत यूटीआई बैंक के रूप में हुई थी जो एक सरकारी संस्था था। सरकार की अंशधारिता 50 फीसदी से कम होने के बाद भी एलआईसी तथा अन्य सरकारी संस्थाओं की इसमें अहम हिस्सेदारी रही और अब भी है। यूटीआई बैंक के निजीकरण के समय आकार बहुत छोटा था। आज सभी सरकारी बैंकों का आकार काफी बड़ा है।


हमें ऐसे निवेशक चाहिए जो निजी बैंक की सक्रिय निगरानी करें। ऐसे में निजी इक्विटी फर्म उचित विकल्प हैं। बैंक स्वामित्व की समीक्षा करने वाले आरबीआई के आंतरिक कार्य समूह ने अनुशंसा की है कि गैर प्रवर्तक अंशधारिता को बढ़ाकर 15 प्रतिशत किया जाए। इसका इरादा यकीनन निजी इक्विटी फर्म जैसे निवेशकों को अहम हिस्सेदारी सौंपना था। इसे बैंक निजीकरण की पूर्व शर्त के रूप में देखा जाना चाहिए।


कुछ अन्य उपायों को भी ऐसे ही देखना होगा। सरकारी और निजी बैंकों के समर्थन से परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी (एआरसी) की स्थापना का निर्णय भी ऐसा ही एक उपाय है। पहले यह प्रस्ताव परवान नहीं चढ़ सका क्योंकि यह स्पष्ट नहीं था कि आखिर क्यों सरकारी स्वामित्व वाली एआरसी बैंक समूह की तुलना में पुनर्गठन का काम बेहतर कैसे करेंगी? चीजें अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। इस तरह वे निजी क्षेत्र के लिए अधिक आकर्षक होंगी। निजी बैंकों को सरकारी कारोबार संभालने देने पर भी यही बात लागू होती है।


इसके बावजूद कई चुनौतियां बरकरार हैं। सरकारी हिस्सेदारी 50 फीसदी से कम करने का जमाकर्ताओं पर पडऩे वाला प्रभाव भी इसका उदाहरण है। सरकारी बैंकों के पास बहुत अधिक तादाद में सरकारी जमीन है, उससे निपटना एक अलग मसला है। इनमें बैंकों के मुख्यालय, क्षेत्रीय कार्यालय, प्रशिक्षण केंद्र और कर्मचारियों के आवास शामिल हैं। निजी निवेशक शायद इनके लिए पैसे न चुकाना चाहें। वे शाखाओं के नेटवर्क में अधिक रुचि रखेंगे। एयर इंडिया की तरह कुछ जमीन और इमारतों को स्पेशल पर्पज व्हीकल के हवाले करना उचित रहेगा।


निजी निवेशक शाखाओं को तार्किक बनाना चाहेंगे और कर्मचारियों की तादाद में कमी करना भी। मीडिया खबरों के अनुसार ऐसे कदम उठाए जाने हैं जिनमें निजीकृत किए जाने वाले सरकारी बैंकों के कुछ कर्मचारियों को अन्य बैकों में स्थानांतरित किया जाए। फंसे कर्ज का एक हिस्सा बही खातों से कम होने, कर्मचरियों की तादाद घटने और जमीन को स्पेशल पर्पज व्हीकल को स्थानांतरित करने से बैंक का मूल्यांकन आसान हो सकता है। परंतु इससे यह सुनिश्चित नहीं होता कि कोई विवाद नहीं होगा। अधिकांश सरकारी बैंकों का मूल्य उनके बहीखातों की तुलना में कम है। उचित मूल्यांकन के लिए प्रतिस्पर्धी नीलामी प्रक्रिया अपनानी होगी जहां ढेर सारे बोलीकर्ता हों। परंतु उपरोक्त वजहों से संभावित बोलीकर्ता बहुत कम हैं।


बैंक यूनियनों का विरोध एक और चुनौती है। बैंक यूनियन पहले ही दो दिवसीय हड़ताल कर चुके हैं। सरकार को कुछ ऐसे कदम उठाने चाहिए ताकि किसानों के साथ हुए विवाद जैसी स्थिति न बने। पहला, उसे बैंक यूनियनों को समझाना चाहिए कि सरकार की मंशा उन सरकारी बैंकों को मजबूत बनाने की है जिनका निजीकरण नहीं हुआ है। वह सरकारी क्षेत्र को खत्म करना नहीं चाहती। वह यूनियनों को आश्वस्त कर सकती है कि अगले तीन साल में सरकारी बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी 50 फीसदी से कम नहीं की जाएगी। दूसरा, उसे यूनियनों को आश्वस्त करना चाहिए कि निजीकृत बैंक में भी कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखा जाएगा।


तीसरा, सरकार को दो सरकारी बैंकों की बिक्री से मिली पूंजी का इस्तेमाल शेष बैंकों को बेहतर बनाने में करना चाहिए। कुछ सरकारी बैंकों में पूंजी बढ़ाने से उनका मूल्यांकन सुधरेगा और ऋण में इजाफा होगा। निजीकरण से हासिल राशि का निवेश बाकी बचे सरकारी बैंकों में करने से सरकार को कम समय में सकारात्मक नतीजे हासिल होंगे। बैंक निजीकरण के मसले पर यही सबसे बेहतर राह होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद कंपनियों का कीमत बढ़ाने का दांव (बिजनेस स्टैंडर्ड)

महेश व्यास 

कच्चे माल की लागत बढऩे से परेशान टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद विनिर्माता कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाने की दिशा में बढ़ती नजर आ रही हैं। स्टील, तांबा एवं एल्युमीनियम की कीमतों में जुलाई 2020 से ही लगातार बढ़त का रुख रहा है। पिछले सात महीनों में अधिकांश धातुओं की कीमतें 20 से लेकर 35 फीसदी तक बढ़ चुकी हैं। ऐसे में एयर कंडिशनर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और वाहन विनिर्माता अब कीमतें बढ़ाने के बारे में सोच रहे हैं।


अधिकांश उपभोक्ता उत्पादों की मांग भी कमजोर हुई है। ऐसे में कंपनियों को मौजूदा बाजार परिवेश मुश्किल दिख रहा है। क्योंकि वे अपना मार्जिन भी बनाए रखना चाहते हैं। जिंसों के भाव गिरने से सितंबर एवं दिसंबर की तिमाहियों में इन कंपनियों के मार्जिन बढ़े थे। लेकिन मौजूदा समय में अधिकांश जिंसों के भाव साल-भर पहले के अपने पुराने स्तर पर पहुंच चुके हैं। लिहाजा जिंसों के भाव चढऩे से टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद निर्माता कंपनियों का परेशान होना पूरी तरह ठीक भी नहीं है। लेकिन कीमतें तय करने का ताल्लुक न्याय से नहीं ही होता है। बाजार में खप सकने वाली चीजों के बारे में उठने वाले सवाल का जवाब मांग पक्ष से ही आना चाहिए। उपभोक्ता मांग परिवारों की आय एवं उपभोक्ता धारणा में परिलक्षित होती है।


उपभोक्ता धारणा में करीब साल भर पहले जबरदस्त गिरावट आई थी और अब भी यह पूरी तरह उबर नहीं पाई है। रोजगार परिदृश्य सबसे तेजी से सुधरा है लेकिन ऐसा निम्न आय स्तरों पर ही हुआ है। आय के बावजूद धारणाओं में सुधार बड़े मार्जिन से पीछे रहा है। अक्टूबर 2020 में रोजगार साल भर पहले की तुलना में सिर्फ 1.9 फीसदी ही कम था लेकिन औसत पारिवारिक आय 12 फीसदी तक गिर चुकी थी। आय में इस बड़ी गिरावट का प्रतिकूल प्रभाव उपभोग व्यय में करीब 20 फीसदी की तीव्र गिरावट के रूप में परिलक्षित होता है। ऐसे में अचंभे की बात नहीं है कि उपभोक्ता धारणा और भी बिगड़ चुकी थी। उपभोक्ता धारणा अक्टूबर 2020 में करीब 51 फीसदी तक गिर चुकी थी।


फरवरी 2021 तक उपभोक्ता धारणा में कुछ सुधार आया। फिर भी सालाना तुलना में इस धारणा में करीब 48 फीसदी की गिरावट थी। सच तो यह है कि उपभोक्ता धारणा में रिकवरी बहुत सुस्त रही है।


वाहन, एयर कंडिशनर, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन एवं अन्य टिकाऊ उत्पादों की मांग ऐसी खरीदारियों के वक्त के बारे में एक अमूर्त अहसास पर टिकी होती है। उपभोक्ता धारणा सूचकांक के पांच बिंदुओं में से एक इस घटक को सीधे तौर पर संबोधित है।


प्रतिभागियों से पूछा गया कि क्या साल भर पहले की तुलना में यह समय टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद खरीदने के लिए बेहतर है या खराब या फिर कोई अंतर नहीं है। करीब एक चौथाई प्रतिभागियों ने कहा कि लॉकडाउन से पहले का वक्त खरीद के लिए बढिय़ा था जबकि 55 फीसदी लोगों ने माना कि कोई फर्क नहीं है और बाकी 20 फीसदी लोगों का कहना था कि टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद खरीदने के लिए वक्त खराब है।


वहीं लॉकडाउन के दौरान टिकाऊ उपभोक्ता सामान खरीदने का आशावाद गिर गया और पांच फीसदी से भी कम प्रतिभागियों ने उसे खरीद के लिए बेहतर वक्त माना। लेकिन अक्टूबर 2020 में बेहतर वक्त मानने वाले प्रतिभागियों की तादाद 7.4 फीसदी रही। फिर जनवरी 2021 तक यह अनुपात 6.5 फीसदी से लेकर 7 फीसदी के बीच रहा। फरवरी 2021 में 5 फीसदी से भी कम लोगों ने माना कि टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों की खरीद के लिए बेहतर समय है। ऐसे में सवाल उठता है कि टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कंपनियों का कीमतें बढ़ाने के बारे में सोचना बाजार के बारे में क्या उनकी सही समझ को दर्शाता है?


इसका जवाब है पूरी तरह नहीं। फरवरी 2021 में उन परिवारों के भीतर टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों की खरीद का रुझान तेज देखा गया जिनकी सालाना औसत आय 10 लाख रुपये से अधिक है। टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों की मांग अधिक आय वाले परिवारों के पक्ष में झुकी दिखाई देती है। लेकिन यह बाजार बहुत छोटा होगा।


टिकाऊ उपभोक्ता सामान खरीदने की ओर परिवारों का झुकाव उनकी आय से निर्धारित होता है। इसका नतीजा यह होता है कि घर की आय बढऩे के साथ ही टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद खरीदने के लिए वक्त को बेहतर मानने वाले परिवारों का अनुपात अमूमन बढ़ जाता है। फरवरी 2021 में 1 लाख रुपये से कम आय वाले सिर्फ 1.6 फीसदी परिवारों ने ही इसे खरीदारी के लिए बेहतर वक्त माना। वहीं 1 लाख से 2 लाख रुपये की सालाना आय वाले परिवारों में यह अनुपात बढ़कर 3.7 फीसदी हो गया। जबकि 2 लाख से 10 लाख रुपये तक की सालाना आय वाले 7 फीसदी परिवारों ने इसे खरीद का बेहतर वक्त माना। उससे ऊपर के आय संवर्गों में यह अनुपात बहुत तेजी से बढ़ता गया।


साल भर में 10 लाख रुपये से अधिक आय वाले 12 फीसदी से अधिक परिवारों ने फरवरी 2020 की तुलना में फरवरी 2021 को टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों की खरीद के लिए बेहतर माना। इससे पहले के चार महीनों में इस आय वर्ग के सिर्फ सात फीसदी परिवारों ने ही बेहतर माना था।


टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कंपनियां सालाना 10 लाख रुपये से अधिक कमाने वाले परिवारों की धारणा में सुधार से लाभान्वित हो सकती हैं। यह संवर्ग पिछले दो महीनों में 5 लाख से 10 लाख रुपये की सालाना आय वाले परिवारों की उन्नत धारणा की जगह ले सकता है। इस तरह के करीब 15 फीसदी परिवार दिसंबर 2020 में टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों की खरीद को लेकर आशान्वित थे जबकि जनवरी 2021 में यह अनुपात 11 फीसदी था। लेकिन फरवरी 2021 में सात फीसदी से भी कम परिवार आशावादी रह गए।


निम्न आय वाले परिवारों की खरीद धारणा में सुधार होना भी महत्त्वपूर्ण है। ऐसा नहीं होने पर कंपनियां भारतीय उपभोक्ता बाजार की ऊंची कतार में बैठे गिनती के लोगों पर ही दांव खेलती रहेंगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Wednesday, March 24, 2021

समुचित निर्णय (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सर्वोच्च न्यायालय ने ऋण स्थगन की अवधि बढ़ाने और ब्याज भुगतान को पूरी तरह माफ करने से इनकार करके बैंकिंग व्यवस्था और सरकार दोनों को बड़ी राहत दी है। इतने बड़े पैमाने पर ब्याज की माफी बैंकिंग तंत्र पर बहुत भारी पड़ती और उसके व्यापक वृहद आर्थिक प्रभाव होते। इससे पहले सरकार ने न्यायालय के समक्ष कहा था कि यदि उसे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा महामारी के चलते घोषित छह माह के ऋण स्थगन की समूची अवधि का ब्याज माफ करने पर विचार करना पड़ा तो इसमें 6 लाख करोड़ रुपये की राशि गंवानी होगी। यदि बैंकों को यह बोझ उठाना पड़ता तो उनकी विशुद्ध संपत्ति का बड़ा हिस्सा इसी में चला जाता। ऐसे में अधिकांश बैंकों की हालत खस्ता हो जाती और उनके अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाता। गैर निष्पादित परिसंपत्ति यानी फंसे हुए कर्ज के वर्गीकरण पर लगी रोक को समाप्त करने से फंसे कर्ज में कुछ हद तक इजाफा होगा लेकिन इससे इस विषय पर लंबे समय से चली आ रही अनिश्चितता का अंत होगा।

इससे भी अहम बात यह है कि न्यायालय की भाषा और उसके तर्कों से भरोसा मजबूत होना चाहिए। उदाहरण के लिए उसने कहा कि वित्तीय और आर्थिक नीति के मसलों पर मशविरा देने का काम उसका नहीं है क्योंकि रिजर्व बैंक जैसे संस्थान इसमें पूरी तरह सक्षम हैं। यदि न्यायालय को लगता है कि आरबीआई के निर्देश अतार्किक हैं अथवा संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं तो वह उन्हें भी निरस्त कर सकता है। निर्णय में यह भी कहा गया कि अदालतें नीतिगत मसलों पर कार्यपालिका को सलाह नहीं दे सकतीं क्योंकि नीति बनाने का काम कार्यपालिका का ही है। ऋण स्थगन अवधि की ब्याज माफी के लिए न्यायालय ने कहा कि बैंकों को जमा पर ब्याज चुकाना होगा और महामारी के दौरान भी उनकी देनदारी भी बरकरार रही।


न्यायालय ने चक्रवृद्धि ब्याज पर अवश्य राहत दी। उसने तर्क दिया कि एक बार ऋण स्थगन किए जाने के बाद किस्त न चुकाए जाने को देनदारी में जानबूझकर चूक नहीं माना जा सकता। ऐसे में ब्याज पर ब्याज लेने या दंडस्वरूप ब्याज लेने का कोई अर्थ नहीं है। न्यायालय को इस बात की भी कोई उचित वजह नहीं मिली कि आखिर चक्रवृद्धि ब्याज संबंधी लाभ को केवल 2 करोड़ रुपये तक के ऋण तक सीमित क्यों रखा जाए? न्यायालय ने निर्देश दिया कि यदि बैंकों ने दंडस्वरूप अथवा चक्रवृद्धि ब्याज वसूल किया है तो उसे या तो वापस किया जाए या अगली किस्त में समायोजित किया जाए। कर्जदारों को राहत का असर बहुत मामूली होगा और उसे सरकार वहन करेगी।


रिजर्व बैंक ने कर्जदाताओं को इजाजत दी थी कि वे 1 मार्च से 31 मई के बीच की कर्ज की किस्तों का भुगतान के स्थगन को बढ़ा दें। कोशिश यह थी कि महामारी के दौरान कर्जदारों को राहत दी जा सके। आर्थिक गतिविधियां कमजोर होने के कारण ऋण स्थगन को 31 अगस्त तक बढ़ा दिया गया था। इस बीच सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दायर हुईं जिनमें कहा गया कि स्थगन अवधि को बढ़ाया जाए और इस दौरान लगने वाले ब्याज को माफ किया जाए, विभिन्न क्षेत्रों को राहत दी जाए और ऋण स्थगन अवधि के चक्रवृद्धि ब्याज को माफ किया जाए। आरबीआई के अनुमान के मुताबिक आधार परिदृश्य में भी बैंकिंग तंत्र का सकल फंसा हुआ कर्ज सितंबर तक 13.5 फीसदी हो सकता है। बैंकरों की दलील है कि महामारी का असर अनुमान से कमतर रहा है। वास्तविक तस्वीर अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही के बाद ही सामने आएगी। यह निर्णय भले ही कुछ देर से आया है लेकिन यह आर्थिक हालात सामान्य करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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एकसमान सूक्ष्म ऋण नियमन की दरकार (बिजनेस स्टैंडर्ड)

तमाल बंद्योपाध्याय 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने फरवरी के पहले सप्ताह में चालू वित्त वर्ष की आखिरी मौद्रिक नीति की घोषणा के दौरान सूक्ष्म वित्त क्षेत्र में सभी ऋणदाताओं के लिए एकसमान नियामकीय ढांचे की बात कही। इसके पीछे क्या वजह है? सूक्ष्म वित्त अब केवल सूक्ष्म वित्त संस्थानों (एमएफआई) का ही क्षेत्र नहीं रह गया है। ऐसी स्थिति करीब एक दशक पहले थी, जब एक दक्षिणी राज्य ने इस उद्योग की कथित ज्यादतियों पर अंकुश लगाने के लिए अक्टूबर 2010 में एक राज्य कानून बनाकर लगभग अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। जाने-माने चार्टर्ड अकाउंटेंट और आरबीआई के बोर्ड में सबसे लंबे समय निदेशक रहे वाईएच मालेगाम की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के बाद दिसंबर 2011 में उद्योग के नियमन के लिए नियम बनाए गए। अब इन नियमों पर फिर से विचार करने की वजह एक अन्य कानून है, जिसे एक पूर्वी राज्य ने सूक्ष्म ऋण को नियंत्रित करने के लिए लागू करने की हाल में चेतावनी दी है।

आरबीआई के दिसंबर 2011 के नियमों से एनबीएफसी-एमएफआई का जन्म हुआ। इनका अगले कुछ वर्षों में तब तक सूक्ष्म ऋण उद्योग में दबदबा बना रहा, जब ऐसी सबसे बड़ी कंपनी संपूर्ण बैंक बन गई और 10 लघु वित्त बैंकों को कारोबार स्थापित करने के लिए लाइसेंस मिल गया। इसके अलावा कुछ विशुद्ध एनबीएफसी भी हैं, जो अलाभकारी संस्थाओं और न्यासों के अलावा सूक्ष्म ऋण देती हैं। इनका उद्योग में मामूली हिस्सा है। सीधे शब्दों में कहें तो सूक्ष्म वित्त में मौजूदगी केवल एनबीएफसी-एमएफआई की ही नहीं रह गई है।  


अब इस चीज पर नजर डालते हैं कि कैसे पिछले एक दशक के दौरान इस कारोबार और ऋणदाताओं के स्वरूप में बदलाव आया है। ये आंकड़े बहुत से स्रोतों से जुटाए गए हैं, इसलिए ये वास्तविकता के नजदीक होने चाहिए। सूक्ष्म ऋण उद्योग मार्च 2010 में महज 22,544 करोड़ रुपये का था। आर्थिक संकट के बाद मार्च 2012 तक इसका आकार सिकुड़कर 17,262 करोड़ रुपये रह गया। मगर उसके बाद इसका पोर्टफोलियो बढ़ रहा है। दिसंबर, 2020 तक यह बढ़कर 2.33 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। सूक्ष्म कर्जदारों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। यह 2010 में करीब 2.7 करोड़ रुपये थी, जो अब 5.8 करोड़ से अधिक हो चुकी है। वहीं एनबीएफसी-एमएफआई की संख्या 264 से घटकर 202 रह गई है।


यहां कुछ और प्रासंगिक तथ्य दिए जा रहे हैं। एमएफआई कारोबार का दायरा वर्ष 2010 तक 25 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों और 375 जिलों तक सीमित था। इसने अब 37 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों और 600 जिलों में अपने पैर पसार लिए हैं। हालांकि शहरी कारोबार की हिस्सेदारी 27 फीसदी से घटकर 23 फीसदी पर आ गई है। वर्ष 2010 में अविभाजित आंध्र प्रदेश का एमएफआई कारोबार में सबसे अधिक हिस्सा था। उसके बाद कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और ओडिशा एमएफआई कारोबार के प्रमुख केंद्र (इसी क्रम में) थे। इन राज्यों का इस पूरे उद्योग में करीब तीन-चौथाई हिस्सा था। वर्ष 2020 तक पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर पहुंच गया और उसके बाद क्रमश: तमिलनाडु, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र हैं।


इस अवधि के दौरान ऋण का औसत आकार करीब चार गुना बढ़ गया है। यह मार्च 2010 में 9,766 रुपये था, जो मार्च 2020 में 36,904 रुपये हो गया है। उसके बाद यह घटकर (दिसंबर, 2020 में) 33,227 रुपये पर आ गया है। इस कारोबार में गैर-एनबीएफसी-एमएफआई का हिस्सा अब 68 फीसदी है, जो वर्ष 2010 में महज पांच फीसदी के आसपास था। एनबीएफसी-एमएफआई का हिस्सा 31 फीसदी है, जबकि अन्य की एक फीसदी हिस्सेदारी है। विभिन्न ऋणदाताओं का समूह एक ही ऋणी समूह को धन देता है। इसलिए यह तय है कि इसमें नियामकीय आर्बिट्राज होगा, जिससे ग्राहक अपनी क्षमता से अधिक कर्ज लेंगे।


अलग-अलग ऋणदाताओं के लिए नियमन कितने अलग-अलग हैं? एक ही ऋणी को दो से अधिक एनबीएफसी-एमएफआई ऋण नहीं दे सकती हैं और बैंकों समेत कुल ऋण की सीमा 1.25 लाख रुपये है। बैंकों के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं है। सूक्ष्म वित्त ऋणी के कर्ज की सीमा आरबीआई ने पहले ऋण के लिए 75,000 रुपये तय की है, जो बाद में 1,25,000 रुपये तक बढ़ सकती है। फिर यह सीमा केवल एनबीएफसी-एमएफआई के लिए है। बैंकों के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है।


इसके अलावा भी ऐसे बहुत से नियम हैं, जो इसे असमान मौकों वाला क्षेत्र बनाते हैं। एनबीएफसी-एमएफआई के लिए ऋण की कीमत और प्रोसेसिंग फीस का नियमन किया जाता है, जबकि बैंकों पर ऐसा कोई बंधन नहीं है। इसी तरह एनबीएफसी-एमएफआई को 85 फीसदी ऋण बिना संपत्ति गिरवी रखे देने पड़ते हैं। असल में संपूर्ण बैंकों के 40 फीसदी ऋण तथाकथित प्राथमिकता क्षेत्र या समाज के कमजोर वर्गों (जिसके घटक परिवर्तनशील हैं) को दिए जाने चाहिए। लघु वित्त बैंकों के लिए ऐसी सीमा और अधिक 85 फीसदी है। लेकिन सभी प्राथमिकता ऋण संपत्ति गिरवी रखे बिना नहीं दिए जाते हैं। आखिर में एनबीएफसी-एमएफआई के 30,000 रुपये से अधिक के ऋण के लिए दो साल की सीमा है, लेकिन अन्य बिचौलियों पर ऐसे कोई प्रतिबंध नहीं हैं।


जब वे एक ही वर्ग यानी समाज के सबसे निचले वर्ग की ऋण जरूरतों को पूरा कर रहे हैं तो इन विसंगतियों को दूर नहीं किया जाना चाहिए? सभी वित्तीय बिचौलियों के लिए सूक्ष्म ऋणों के नियम समान होने चाहिए, भले ही उनका स्वरूप कैसा भी हो। बैंक ऋण देने के लिए जमाएं जुटाते हैं लेकिन एनबीएफसी-एमएफआई अपने कारोबार के लिए बैंकों से धन मिलने पर निर्भर होती हैं। बैंक ऐसे बिचौलियों को ऋण देते हैं क्योंकि इन्हें ऋण देने से उन्हें प्राथमिकता क्षेत्र को ऋण के लक्ष्य को पूरा करने में मदद मिलती है, जिसे वे प्रत्यक्ष ऋणों के जरिये हासिल करने में आम तौर पर नाकाम रहते हैं।


इस समय तुलनात्मक रूप से बड़ी एनबीएफसी-एमएफआई अपने कर्जदारों से अपनी औसत कोष लागत से 10 फीसदी अधिक या पांच बैंकों की औसत आधार दर का 2.75 गुना, इनमें से जो कम हो, वसूल कर सकती हैं। आम तौर पर ऐसी एमएफआई को ऋण लेने के लिए कुछ धन सावधि जमा (ऋण का औसतन 10 फीसदी) के रूप में ऋणदाताओं के पास रखना होता है। ऐसी जमाओं पर आमदनी उससे काफी कम होती है, जो वे उस धन को ऋण के रूप में देकर कमा सकते थे। इस लागत का ऋण की कीमत में आकलन नहीं किया जाता है। इससे भी अहम बात यह है कि क्या ब्याज दर को तय करने में कोई तर्क है, जब हर्जाना इतना अधिक है?


ब्याज दर को बाजार के भरोसे छोड़ा जाना चाहिए। लेकिन ऋण के आकार और किसी ऋणी के ऋण लेने की संख्या को लेकर एकसमान नियम होने चाहिए ताकि उन्हें अत्यधिक कर्ज के बोझ से बचाया जा सके।


इसके अलावा आय सृजन ऋण देने के बजाय सूक्ष्म ऋणों को आजीविका ऋणों- स्वास्थ्य, शिक्षा एवं घर खरीदने के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। एनबीएफसी-एमएफआई को संपत्ति गिरवी रखकर 15 फीसदी से अधिक ऋण देने की मंजूरी दी जानी चाहिए ताकि अपने पोर्टफोलियो पर जोखिम कम कर सकें। विशेष रूप से ऐसे समय जब हर राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए ऋण माफी का इस्तेमाल करना चाहता है।


कृषि ऋण माफी एक परिचित पटकथा रही है, मगर असम एक कदम और आगे निकल गया है। सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष दोनों ने चुनावों से पहले ऋण माफी की घोषणा की है। यहआरबीआई के दायरे में नहीं है, लेकिन चुनाव आयोग को सभी राजनीतिक दलों के ऋण माफी के चुनावी वादे पर रोक लगानी चाहिए। अगर उनके दिल में गरीबों के लिए इतनी दया भावना है तो उन्हें ऋणदाताओं का कर्ज चुकाने में अपने पार्टी कोष का इस्तेमाल करना चाहिए।


(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ सलाहकार हैं।)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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संयुक्त राष्ट्र आयोग के प्रस्ताव के बाद भांग की बढ़ सकती है मांग (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सुरिंदर सूद 

मादक पदार्थों पर गठित संयुक्त राष्ट्र आयोग ने दिसंबर में एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कैनबिस यानी भांग को सर्वाधिक खतरनाक मादक पदार्थों की श्रेणी से हटा दिया गया। इसके बाद इस बहुपयोगी पौधे के लिए अपना खोया हुआ रुतबा हासिल करने का रास्ता साफ हो गया है। यह किसानों के लिए लाभदायक फसल होने के साथ ही प्रसंस्करण उद्योग के लिए कीमती कच्चे माल के रूप में भी इस्तेमाल हो सकता है। भारत ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था जहां मौज-मस्ती, खाने और वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए भांग उगाने और उसके सेवन का इतिहास रहा है। इसे धार्मिक मान्यता के साथ मादक पदार्थों की तुलना में कम नुकसानदायक नशे के तौर पर सामाजिक स्वीकृति भी मिली हुई है। कोकीन की तुलना में तो यह बहुत कम नुकसानदायक है।


फिर भी अमेरिका जैसे कुछ देशों के दबाव में भांग के उत्पादन पर रोक लगी हुई थी। भारतीय मादक पदार्थ एवं मानसिक उद्दीपक तत्त्व (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत इसे 1985 में प्रतिबंधित पदार्थों की सूची में रख दिया गया था। संशोधन के बाद राज्य सरकारों को मौज-मस्ती से इतर मकसद से भांग की नियंत्रित एवं विनियमित खेती की मंजूरी देने का अधिकार दे दिया गया था लेकिन तमाम राज्यों ने ऐसा नहीं किया।


विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सुझाव पर संयुक्त राष्ट्र ने भांग को हेरोइन एवं कोकीन जैसे अधिक नुकसानदायक एवं लत लगाने वाले पदार्थों से अलग कर दिया है। इस कदम ने भांग के औषधीय गुणों, औद्योगिक स्तर एवं खानपान में इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ा दी हैं। यह बदलाव भांग की खेती, अपने पास रखने, खरीद-बिक्री करने और मूल्य-संवद्र्धन को खुद ही अपराध-मुक्त कर देता है। भांग रखने के आरोपों के आधार पर प्रताडि़त या दंडित करने की आशंका भी कम हो गई है। हाल ही में हम एक बॉलीवुड अभिनेता की रहस्यमयी मौत के मामले में ऐसे आरोप देख चुके हैं। अब केंद्र को स्थानीय मादक पदार्थ अधिनियम पर ध्यान देकर उसका संशोधन करने की जरूरत है ताकि भांग के बारे में संयुक्त राष्ट्र संस्था के रुख में आए बदलाव को रेखांकित किया जा सके।


खासकर, भांग उत्पादकों एवं संभावित निवेशकों ने घरेलू एवं निर्यात बाजारों के क्षेत्र में विशाल अवसर की तलाश शुरू कर दी है। एक अमेरिकी सलाहकार फर्म के मुताबिक भांग का वैध बाजार वर्ष 2027 तक 3.6 अरब डॉलर हो सकता है जो 18 फीसदी से अधिक की वार्षिक वृद्धि दर्शाता है। इस दौरान भारत में भांग पर आधारित आयुर्वेदिक एवं चिकित्सकीय उत्पादों का बाजार भी बढ़कर 12-14 करोड़ डॉलर हो जाने का अनुमान है। हाल में कई स्टार्टअप एवं छोटी औद्योगिक इकाइयां इस संभावना के दोहन के लिए सामने आ चुकी हैं।


भारतीय भांग (कैनबिस इंडिका) और उसके यूरोपीय संस्करण हेम्प (कैनबिस सतिवा) मोटे तौर पर एक जैसे ही गुण रखते हैं लेकिन उनके रासायनिक संयोजन एवं उपयोग में हल्का अंतर होता है। इन दोनों ही किस्मों के पौधों में कीमती रेशा एवं बीज होते हैं लेकिन कैनबिस इंडिका दो अहम मादक तत्त्वों कैनबिनॉयड के मामले में अधिक समृद्ध है। टेट्रा-हाइड्रो-कैनबिनॉल (टीसीएच) के नाम से चर्चित पहला तत्त्व बुनियादी मनो-सक्रिय पदार्थ है जो उसका सेवन करने वाले को 'ऊंचा उडऩे' का अहसास दिलाता है। कैनबिडॉयल (सीबीडी) कहा जाने वाला दूसरा तत्त्व कम उद्दीपक होता है और अपने उपचारीय गुणों की वजह से दवाओं में उसका खूब इस्तेमाल होता है।


भांग की पत्तियों एवं फूलों को सूखाकर तैयार किया गया चूर्ण भारत में चरस, गांजा और भांग के नाम से जाने जाते हैं जबकि दूसरे देशों में इसे मारियुआना, वीड, पॉट या डोप का नाम दिया जाता है। असल में, चरस और गांजे का इस्तेमाल एक लोकप्रिय पेय 'भांग' बनाने में भी अक्सर होता है। ताजी पत्तियों एवं फूलों को मसलने से निकला रेसिन हशीश कहा जाता है। इन पौधों के तने में मौजूद रेशों का इस्तेमाल ग्रामीण कलाकार रस्सियां बनाने एवं कुछ उपयोगी हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करने में भी करते हैं।


भांग के पौधे के उपचारात्मक मूल्य को दर्शाने वाले साहित्य से पता चलता है कि यह ग्लूकोमा का इलाज कर सकता है, शरीर के अन्य हिस्सों में कैंसर का फैलाव रोक सकता है, अल्जाइमर रोग के बढऩे की रफ्तार धीमी करने में मददगार है। इसके अलावा यह तनाव कम करने और भोजन को ऊर्जा में तब्दील करने के लिए उपापचय तेज करने में भी मददगार माना गया है। कुछ अध्ययन दिमाग की रचनात्मक क्षमता में सुधार से भी इसका ताल्लुकजोड़ते हैं।


भांग के उम्दा किस्म के उत्पादों के लिए मशहूर हिमाचल प्रदेश इस औषधि की आर्थिक क्षमताओं के दोहन के लिए किसानों एवं उद्यमियों की मदद करने को आगे आया है। राज्य के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने 11 मार्च को बजट भाषण में कहा कि भांग की नियंत्रित खेती को जल्द ही कानूनी बनाया जाएगा। कुल्लू जिले में स्थित मलाणा घाटी हशीश की खास किस्म के लिए दुनिया भर में मशहूर है। भांग की पत्तियों को हाथों के बीच रगड़कर यह रेसिन तैयार की जाती है। भारत के भीतर और बाहर इसके ऊंचे दाम मिलते हैं। मलाणा रेसिन के उत्पादक इसके लिए भौगोलिक सूचक (जीआई) निशान दिए जाने की मांग कर रहे हैं ताकि उनके बौद्धिक संपदा अधिकारों को सुरक्षित रखा जा सके। लेकिन इसकी संभावना कम ही है कि ऐसे उत्प्रेरकों की पैदावार को सरकारी नीति के तौर पर प्रोत्साहित किया जाएगा। आधिकारिक तौर पर भांग की खेती को कानूनी मान्यता देने का मतलब यह भी होगा कि मौज-मस्ती से इतर कामों में इस पौधे के वाणिज्यिक इस्तेमाल को बढ़ावा मिले।


बहरहाल हिमाचल प्रदेश दूसरे राज्यों के लिए एक नजीर पेश कर रहा है। केंद्र सरकार को भी भांग के पुनर्वास के लिए एक अनुकूल कानूनी व्यवस्था बनाने की जरूरत है। ऐसा होने पर ही भांग किसानों के लिए कमाऊ फसल, शिल्पकारों एवं उद्यमियों के लिए कीमती कच्चे माल और सरकार के लिए राजस्व का स्रोत बन पाएगा।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Tuesday, March 23, 2021

एक वर्ष बाद (बिजनेस स्टैंडर्ड)

कोविड-19 वायरस के शुरुआती प्रसार को नियंत्रित करने के लिए एक वर्ष पहले जब भारत में देशव्यापी लॉकडाउन लगा था, तब देश के अधिकांश लोगों ने यही आशा की थी कि यह संकट कुछ सप्ताह या महीनों तक चलेगा। परंतु एक वर्ष बाद भी वायरस हमारे आसपास है। बल्कि कुछ राज्यों, खासकर महाराष्ट्र में तो नए संक्रमण के मामले नई ऊंचाई छू रहे हैं। इस बार संक्रमण की लहर से निपटना पिछले साल की तुलना में अधिक मुश्किल होगा। दिक्कत यह है कि महामारी ने लोगों को थका ही नहीं दिया है बल्कि अर्थव्यवस्था भी लॉकडाउन के बुरे असर से उबर नहीं सकी है। जाहिर है सरकारें दोबारा ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहतीं जिससे आर्थिक सुधार की प्रक्रिया ठप पड़ जाए।

आंकड़े सुधार को लेकर चिंता को और अधिक बढ़ाने वाले हैं। वृद्धि की बात की जाए तो इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में वृद्धि लॉकडाउन से प्रभावित पहली तिमाही की तुलना में बेहतर रही। तीसरी तिमाही में यानी अक्टूबर से दिसंबर के बीच तिमाही दर तिमाही सुधार हुआ लेकिन पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में यह सुधार बहुत नाम मात्र का था। यकीनन आने वाले महीनों में सालाना वृद्धि के आंकड़े सामने आएंगे और वे बेहतर ही होंगे लेकिन सरकार की चिंता होगी कि अर्थव्यवस्था अभी महामारी के पहले जैसी मजबूती नहीं हासिल कर सकी है।


यह भी स्पष्ट नहीं है कि महामारी के शुरुआती महीनों और लॉकडाउन ने कितना नुकसान किया है। दिल्ली सरकार ने 2020 के अंत में एक सर्वेक्षण किया था जिसके नतीजे हाल ही में सामने आए हैं। उनसे पता चलता है कि बेरोजगारी अब तक काफी अधिक है। सर्वेक्षण के मुताबिक लॉकडाउन लागू होने के छह महीने बाद यानी अक्टूबर-नवंबर 2020 में दिल्ली में बेरोजगारी दर करीब 28.5 फीसदी थी जबकि महामारी के पहले यह 11 फीसदी थी। ऐसा तब था जबकि अक्टूबर के पहले गतिविधियां सुधरनी शुरू हो गई थीं। रोजगार, आजीविका और आय को लेकर स्पष्ट और विश्वसनीय आंकड़ों के अभाव में ऐसे सर्वेक्षण ही नीति निर्माताओं को राह दिखा सकते हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अगर वाकई लॉकडाउन से प्रभावित लोगों की तादाद इतनी अधिक थी तो दिसंबर के बाद के महीनों में अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के बाद कितने लोगों को रोजगार मिला होगा और अगर नहीं मिला तो उनकी मदद के लिए क्या किया जा सकता है। लॉकडाउन ने देश की नई कल्याणकारी व्यवस्था की पोल खोल दी। उसके एक वर्ष बाद अब भी सरकार के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिससे महामारी से सर्वाधिक प्रभावित लोगों को गिना जा सके और उनकी पहचान की जा सके।


अंत में अर्थव्यवस्था और महामारी दोनों के लिए एकमात्र औषधि है टीकाकरण के प्रयासों को तेज करना। सरकार को कोवैक्सीन टीके का उत्पादन बढ़ाना चाहिए। रूसी टीके स्पूतनिक की निर्माता ने सोमवार को कहा कि उसने भारत में 20 करोड़ खुराक तैयार करने के लिए विर्को समूह के साथ समझौता किया है। जॉनसन ऐंड जॉनसन के टीके का अमेरिका में पहले ही व्यापक इस्तेमाल हो रहा है। हाल ही में क्वाड समूह की बैठक में टीके का भारत में उत्पादन करने को लेकर चर्चा हुई। सरकार को नियामकों से कहना चाहिए कि वह टीकों की मंजूरी की प्रक्रिया तेज करे और दुनिया की अन्य सरकारों की तरह उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उद्योग जगत में अतिरिक्त क्षमता शेष न रहे। यदि जरूरत पड़े तो औषधि निर्माता कंपनियों और टीका उत्पादकों के बीच गठजोड़ भी कराया जाए। महामारी की शुरुआत के एक वर्ष बाद टीके की व्यापक उपलब्धता ही एकमात्र उपाय है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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सिविल सेवा के कार्यपालक स्वरूप की जरूरत (बिजनेस स्टैंडर्ड)

 रथिन रॉय  

पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। गृह मंत्रालय ने अपने स्तर पर शुरू किए गए कार्यों को पूरी क्षमता से अंजाम दिया है। उसने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने और जम्मू, कश्मीर एवं लद्दाख क्षेत्रों के प्रशासनिक पुनर्गठन का काम पूरा किया है। गृह मंत्रालय ने देश में सख्त लॉकडाउन को भी लागू कराया है। इसने नागरिकता संशोधन अधिनियम को लागू करने से जुड़े व्यवधानों को भी दूर किया है। इसके अलावा इसने अपनी मनमर्जी से देश की अंदरूनी सीमाओं को सील करने के लिए पुलिसबलों को भी तैनात किया है।

स्वास्थ्य मंत्रालय अपनी पूरी क्षमता से टीकाकरण अभियान चलाने में लगा हुआ है। राष्ट्रीय सड़क नेटवर्क के विस्तार एवं नवीकरण संबंधी कार्यों को सड़क मंत्री बखूबी क्रियान्वित कराने में लगे हुए हैं। लेकिन दुर्भाग्य से वित्त मंत्रालय एवं अन्य आर्थिक मंत्रालयों के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है। भारत सरकार एक संरचनात्मक राजकोषीय संकट के दौर से गुजर रही है जिसे महामारी ने भले ही जन्म न दिया हो लेकिन उसे गंभीर जरूर बनाया है। वित्त मंत्रालय अपेक्षा के अनुरूप कर संग्रह कर पाने में लगातार नाकाम रहा है, प्रवर्तन निदेशालय के बहुचर्चित हाई-प्रोफाइल छापों के बावजूद। व्यापक कर सुधार के तौर पर पेश किए गए जीएसटी का क्रियान्वयन भी बहुत खराब रहा। यह अपनी आकांक्षा के अनुरूप सरकारी परिसंपत्तियों का विनिवेश कर पाने में भी नाकाम रहा है। बैंकिंग प्रणाली संरचनात्मक मुश्किलों में उलझी हुई है। सड़कों का निर्माण हो रहा है लेकिन भारत अपने एशियाई प्रतिस्पद्र्धियों की तुलना में अब भी लॉजिस्टिक के लिहाज से एक दु:स्वप्न ही बना हुआ है। व्यापार नीति संरक्षणवाद एवं निर्यात-उन्मुख प्रोत्साहनों के बीच उलझी हुई है। युवाओं को बड़ी मुस्तैदी दिखाते हुए जमानत दिए बगैर जेल में डाल दिया जाता है लेकिन उसी युवा को रोजगार एवं शिक्षा के अवसर प्रदान करने के मामले में यह काबिलियत नजर नहीं आती है। हम टीकाकरण कार्यक्रम अच्छी तरह चला रहे हैं लेकिन हमारी स्वास्थ्य प्रणाली बेहद खराब है। सरकार लोगों को पहले से अधिक एवं बेहतर सेवाएं देने की अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट गई है और उसका जोर बैंक खातों में प्रत्यक्ष नकद अंतरण पर कहीं अधिक है।


मेरी राय में इस विरोधाभास के दो रोचक कारण हैं। पहली वजह राजनीतिक पूंजी का सापेक्षिक निवेश है। एक आधुनिक अर्थव्यवस्था के निर्माण और एक अंतरिक्ष एवं नाभिकीय शक्ति के तौर पर मिली सफलता के पीछे काफी हद तक राजनीतिक पूंजी का निवेश भी शामिल रहा है। आज सरकार के प्रयासों को रेखांकित करने वाली आर्थिक विचारधारा अपरिपक्व है। उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 370 पर नजर आई वैचारिक स्पष्टता के उलट निजीकरण की कोशिशों के पीछे राजनीतिक पूंजी का निवेश नहीं दिखा है। इसका नतीजा यह हुआ है कि सरकार कर संग्रह में अपनी नाकामी को छिपाने के लिए ही अपनी परिसंपत्तियों को बेचने की कोशिश करती हुई दिख रही है। इस तरह निजीकरण प्रयासों को पूरा करना और उन्हें अंजाम तक पहुंचाने का रिकॉर्ड बहुत खराब है। भारत सरकार के इस प्रदर्शन की तुलना ब्रिटेन एवं अन्य देशों में किए गए निजीकरण से करें तो वहां पर यह मुहिम सिर्फ राजस्व जुटाने के लिए नहीं चलाई गई थी, उसके पीछे वैचारिक आधार थे।


दूसरा कारण सरकारी नीतियों को जमीन पर लागू करने वाली लोक सेवा की प्रकृति से जुड़ा है। औपनिवेशिक जड़ों वाली सिविल सेवाएं सरकारी नीतियों को लागू करने के इरादे से बनी ही हैं, सार्वजनिक सेवाएं देने के लिए नहीं। जब सेवा देना और आर्थिक गतिविधि का क्रियान्वयन किसी भी सरकार का प्रमुख काम बन जाता है तो यह जरूरी हो जाता है कि वह खुद को एक प्रशासनिक संस्थान की जगह एक कार्यकारी संस्थान के रूप में तब्दील कर ले। इसके पीछे कारण यह है कि सेवा देना और आर्थिक विकास जटिल काम हैं। लिहाजा एक कार्यकारी सिविल सेवा को जटिल समस्याओं से बचने के बजाय जटिलता से जूझने और जटिल समस्याओं को सरलीकृत करने की जरूरत होती है।


सरकार को भागीदारी की जरूरत होती है। सरकार को समान रूप से मनचाहे नतीजे पाने के लिए दूसरे हितधारकों के साथ मिलकर काम करना होगा। एक कार्यकारी सिविल सेवा प्रबंधन, सहयोगी रवैये और तकनीकी विशेषज्ञता के इस्तेमाल में पारंगत होती है। वहीं प्रशासकीय सिविल सेवा अपना काम पूरा करने के लिए बाध्यकारी ताकत का इस्तेमाल करती है। हितधारकों के साथ संबंध सहयोगपूर्ण न होकर पदानुक्रम पर आधारित होते हैं। उसमें कोई भी साझेदार नहीं होता है, केवल निवेदक, विरोधी एवं मातहत होते हैं।


प्रशासकीय सिविल सेवा कार्यपालक क्षमता एवं भागीदारी को अपनी शक्ति एवं प्रभाव के लिए खतरे के तौर पर देखती है। पिछले दिनों ब्रिटेन के वित्त मंत्री ने एक परिणामोन्मुख बजट पेश किया है जिसमें रिकवरी-उन्मुख मध्यम अवधि वाले वृहद-आर्थिक प्रारूप की ओर ले जाने वाली कर एवं राजस्व नीतियों पर जोर है। यह इसलिए मुमकिन हो पाया कि वर्ष 2010 में ब्रिटेन ने बजट दायित्व कार्यालय नाम की एक संस्था बनाई थी ताकि उसकी कार्यकारी राजकोषीय क्षमताओं को सुधारा जा सके। भारत के वित्त मंत्रालय ने उस तरह की संस्था (राष्ट्रीय राजकोषीय परिषद) नहीं बनाने दी क्योंकि वह इसे खुद की प्रशासनिक शक्ति में कमी लाने वाले के तौर पर देखता है। भारत में एक क्लासिक प्रशासकीय सिविल सेवा है। इसके अफसर एक सामान्यज्ञ प्रतियोगी परीक्षा के जरिये चुने जाते हैं और फिर उन्हें रैंक के आधार पर अलग-अलग काम सौंपे जाते हैं। विशेषज्ञ एवं तकनीकी सेवाओं के अधीनस्थ पेशेवर प्रशासकीय सूझबूझ में महारत रखते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर किए गए प्रयासों को छोड़ दें तो इस व्यवस्था में कार्यपालक क्षमता के लिए गुंजाइश ही बहुत कम है।


प्रशासकीय सिविल सेवा बाध्यकारी शक्ति के कुशल उपयोग की जरूरत वाले कार्यों को पूरा कर सकते हैं। यह चुनाव, टीकाकरण एवं सड़क निर्माण जैसे समयबद्ध प्रयासों को भी बेहतरीन ढंग से अंजाम देने में सक्षम है।


लेकिन असरदार स्वास्थ्य एवं शिक्षा प्रणाली, राजस्व सुधार, विनिवेश, बैंकिंग प्रणाली के प्रबंधन, लॉजिस्टिक सुविधाओं में सुधार जैसे कार्यों को पूरा कर पाना खासा जटिल काम है। इनके लिए सिविल सेवा को जटिलता को गले लगाने एवं उसके साथ सतत संयोजन की जरूरत है।


प्रशासक एक पैदा होते हुए हालात में प्रतिक्रिया देते हैं जबकि कार्यकारी वह स्थिति पैदा होने से जुड़ी घटनाओं को नियंत्रित करते हैं। इस कारण से सरकार सड़कें बनाने में तो सक्षम हो जाती है लेकिन लॉजिस्टिक सुविधा में सुधार नहीं हो पाता है, वह लोगों को टीके तो लगा देती है लेकिन एक कारगर स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं दे पाती है। यही वजह है कि गृह मंत्रालय काम पूरा करने में बेहतर है। प्रशासकीय दृष्टिकोण होने से गृह मंत्रालय अपना काम अंजाम देने में सफल रहता है क्योंकि इसमें बाध्यकारी शक्ति के इस्तेमाल और बड़े पैमाने पर तैनाती जैसे कदम शामिल होते हैं। इसमें किसी भागीदारी की जरूरत नहीं होती है। लेकिन वही रवैया वित्त मंत्रालय के लिए काम नहीं करता है क्योंकि इसके मामलों में जटिलता को स्वीकार करने, उनका सामना करने और दूसरे हितधारकों के साथ बराबर की साझेदारी में निपटारे की जरूरत होती है।


(लेखक ओडीआई, लंदन के प्रबंध निदेशक हैं। लेख में विचार व्यक्तिगत हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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महिलाओं की स्थिति के मामले में लगभग समान हैं भारत और चीन (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्यामल मजूमदार 

हमेशा की तरह गत 8 मार्च को भारत में भी एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। इस मौके पर हर कोई, हर किसी को यह सलाह देता नजर आया कि महिलाओं की स्थिति में सुधार कैसे लाया जाए। तमाम जगहों पर प्रकाशित ऐसे मशविरे एकदम वैसे ही थे जैसे पिछले वर्ष इस मौके पर जारी किए गए थे। परंतु ऐसे सर्वेक्षण एक उद्देश्य पूरा करते हैं: वे कम से कम हमें यह याद दिलाते हैं कि इतने वर्ष बाद भी हमारी चुनौतियां बरकरार हैं। विश्व आर्थिक मंच की सन 2020 की महिला-पुरुष (लैंगिक) अंतर संबंधी रिपोर्ट इनमें से कुछ चुनौतियों को रेखांकित करती है और उसके निष्कर्ष बहुत अधिक चिंतित करने वाले हैं।


रिपोर्ट में भारतीय समाज के बहुत बड़े हिस्से में महिलाओं की स्थिति को 'खतरनाक' करार दिया गया है। इनमें भी आर्थिक लैंगिक अंतर कहीं अधिक बड़ी चिंता का विषय है जहां भारत को 153 देशों में 149वें स्थान पर रखा गया है। श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी भी दुनिया में सबसे निचले स्तरों पर है और उनकी अर्जित आय पुरुषों की आय का 20 प्रतिशत है।


एक और चौंकाने वाला आंकड़़ा यह है कि भारत स्वास्थ्य और उत्तरजीविता उप सूचकांक में एकदम निचले पायदान पर है। भारत में जन्म के समय लिंगानुपात असामान्य रूप से खराब है और प्रति 100 बच्चों पर केवल 91 बच्चियां पैदा होती हैं। पाकिस्तान में यह अनुपात प्रत्येक 100 बच्चों पर 92 और चीन में केवल 90 है।


बांग्लादेश इस मामले में दक्षिण एशिया का बेहतरीन देश है। संपूर्ण सूचकांक में उसका स्थान 50वां है और वह भारत से करीब 60 स्थान ऊपर है। चीन भारत से महज छह स्थान ऊपर 106वें स्थान पर है। लैंगिक समानता के मामले में दोनों देशों में एक दूसरे से खराब प्रदर्शन करने की होड़ है। भारत इस बात से संतुष्ट हो सकता है कि वह राजनीतिक सशक्तीकरण के मामले में चीन (95वां स्थान) से बहुत बेहतर स्थिति में है। ऐसा लगता है कि चीन और भारत लैंगिक भेदभाव में एक जैसे हैं। दोनों देशों में कमोबेश यही प्रचलन है कि बेटे बुढ़ापे में अपने मां-बाप की देखभाल करेंगे जबकि बेटियां ब्याह करके अपने ससुराल चली जाएंगी। जब महिलाओं को समान अधिकार न मिलें और पितृसत्ता बहुत गहरे तक धंसी हो तो आश्चर्य नहीं कि इन दोनों देशों में मां-बाप लड़कियां नहीं चाहते।


समाज में अपेक्षाकृत वरीयता प्राप्त वर्ग की स्त्रियों में भी यह असमानता बरकरार है। कंपनी अधिनियम द्वारा सूचीबद्ध कंपनियों के लिए अपने निदेशक मंडल में कम से कम एक महिला को रखना अनिवार्य किए जाने के बाद भी देश में महज 8 फीसदी निदेशक महिला हैं। चीन में यह स्तर और कम है। इनकी जो तादाद दिखती भी है उसमें पारिवारिक रिश्तों की अहम भूमिका है।


किसी महिला को नेतृत्वकारी भूमिका में देखा जाना अभी भी दुर्लभ है। अपेक्षाकृत निचले या मझोले स्तर पर महिलाओं की नियुक्ति को प्राय: समझदारी भरा कदम माना जाता है लेकिन वरिष्ठ पदों पर महिलाएं प्राय: देखने को नहीं मिलतीं। तमाम कंपनियों में इस मामले में अभी भी सोच एक जैसी ही है। हालांकि कुछ अन्य वजह भी हैं। कनिष्ठ से मध्यम स्तर के पदों के प्रतिनिधित्व की बात करें तो भारत में इस श्रेणी में महिलाओं की तादाद सबसे तेजी से कम होती है। जबकि कुछ अन्य एशियाई देशों में यह गिरावट मध्यम से उच्च स्तर पर होने वाले स्थानांतरण में देखने को मिलती है। आंकड़े बताते हैं कि लगभग एक तिहाई महिला कर्मचारी तब तक दोबारा काम शुरू नहीं कर पातीं जब तक कि घर पर बच्चे की देखरेख करने के लिए कोई न हो।


ऐसा तब है जबकि इस बात के काफी प्रमाण हैं जो बताते हैं कि बोर्ड में अधिक महिलाओं का होना वित्तीय दृष्टि से भी बेहतर है। मैकिंजी की गत वर्ष आई रिपोर्ट में दिखाया गया कि जिन कंपनियों के बोर्ड में शीर्ष चौथाई लोगों में लैंगिक विविधता है, उनमें अपने अन्य समकक्षों को वित्तीय मामलों में पीछे छोडऩे की संभावना 28 फीसदी अधिक है। ऋण तक पहुंच, जमीन या वित्तीय उत्पादों की खरीद आदि के मामलों में महिलाओं की स्थिति अभी भी पुरुषों की तुलना में कमजोर है। जबकि यही वे क्षेत्र हैं जो महिलाओं को अपनी कंपनी शुरू करने या परिसंपत्ति प्रबंधन से आजीविका कमाने का अवसर देते हैं।


निश्चित तौर पर ऐसा भी नहीं है कि महिलाओं की बुरी स्थिति केवल भारत जैसे देश में ही है। प्रगति की मौजूदा दर का ध्यान रखें तो वैश्विक स्तर पर लैंगिक समानता हासिल करने में अभी 100 वर्ष का समय और लगेगा। वैश्विक श्रम शक्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी 39 प्रतिशत है। परंतु मई 2020 में कुल गंवाए गए रोजगार में उनकी हिस्सेदारी 54 प्रतिशत रही।


डब्ल्यूआईओएन चैनल द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि कई देशों में महिलाओं की स्थिति तो बहुत ज्यादा खराब है। कुछ देशों में महिलाओं को बुनियादी यौन और प्रजनन संबंधी अधिकार भी नहीं हैं। प्रजनन लायक उम्र की करीब 9 करोड़ महिलाएं ऐसे देशों में रहती हैं जहां गर्भपात पर रोक है। ईरान में महिलाओं को विदेश यात्रा के पहले पति से अनुमति लेनी होती है।


महिलाओं पर हिंसा की वारदात लगातार सामने आती हैं। विश्व स्तर पर हर घंटे पुरुषों के हाथों छह महिलाएं मारी जाती हैं। हर रोज दुनिया भर में 137 महिलाएं अपने साथी या किसी परिजन के हाथों जान गंवाती हैं। नाइजीरिया में पुरुषों को अपनी पत्नी को पीटने का कानूनी अधिकार है। कानून कहता है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी को सुधारने के लिए कोई काम करता है तो वह अपराध नहीं माना जाएगा।


पुरुषों की तुलना में महिलाएं 2.6 गुना घरेलू काम बिना वेतन के करती हैं। रोजगार में भी उनके पदोन्नति पाने की संभावना 18 फीसदी कम होती है। केवल छह ऐसे देश हैं जो महिलाओं और पुरुषों को समान कानूनी अधिकार देते हैं लेकिन 36 देशों में वैवाहिक बलात्कार को वैधता प्राप्त है। भारत भी इनमें से एक है।


आशा की जानी चाहिए कि अगले वर्ष 8 मार्च को ये आंकड़े कुछ बेहतर होंगे।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Monday, March 22, 2021

स्वाभिमान बनाम नि:शुल्क वितरण की राजनीति में उलझा तमिलनाडु (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस 

तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक ने कुछ दिन पहले जारी अपने चुनाव घोषणापत्र में राज्य के निवासियों को मुफ्त मकान और वॉशिंग मशीन देने के अलावा कॉलेज में पढऩे वाले युवाओं को एक साल तक 2 जीबी डेटा सेवा एवं केबल कनेक्शन मुफ्त देने का वादा किया है। और भी बहुत कुछ मुफ्त में देने की बात कही गई है।


विपक्षी दल द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) ने राज्य में महिला की अगुआई वाले हरेक परिवार को हर महीने 1,000 रुपये देने का वादा किया है। उसने कई विचार भी पेश किए हैं। मसलन, उसने मतदाताओं से तमिलनाडु के आत्म-सम्मान एवं स्वायत्तता के लिए लडऩे का वादा किया है। उसने कहा है कि सत्ता में आने पर वह उद्योगों में 75 फीसदी रोजगार तमिलों के लिए आरक्षित कर देगी, महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण बढ़ाकर 40 फीसदी करेगी और विभिन्न जाति समूहों के 215 लोगों को मंदिरों में पुजारी बनाएगी। द्रमुक ने शिक्षा को समवर्ती सूची से निकालकर राज्य सूची में डालने के लिए संविधान संशोधन की मुहिम चलाने की बात भी कही है। उसने केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति (एनईपी) को सामाजिक न्याय एवं तमिलों के खिलाफ बताते हुए इसे निरस्त करने का भी वादा किया है। इसके अलावा पार्टी ने तमिलनाडु की जरूरतों एवं आकांक्षा को पूरा करने वाली एक शिक्षा नीति का खाका खींचने के लिए शिक्षाविदों की एक समिति बनाने की भी बात कही है।


दूसरे शब्दों में कहें तो द्रमुक के सत्ता में आने पर 'एक राष्ट्र एक सबकुछ' का रवैया तमिलनाडु में नहीं लागू हो पाएगा। इस पार्टी को अब यह अहसास हो गया है कि जिंदगी में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता है।


द्रमुक ने अतीत से अपने पुराने ताल्लुक काफी हद तक तोड़ लिए हैं। एक राजनीतिक दल को कई बार ऐसा करना पड़ता है ताकि वह प्रासंगिक बना रहे। एम करुणानिधि के पार्टी प्रमुख रहते समय द्रमुक ने खुद को वक्त की जरूरतों के हिसाब से ढालते हुए बार-बार बदला था। अब पार्टी की कमान किसी और के हाथ में है। एम स्टालिन अपने पिता के मार्गदर्शन के बगैर पहला चुनाव लड़ रहे हैं। द्रमुक पिछले 10 वर्षों से सत्ता से दूर है। ऐसे में द्रमुक का यह घोषणापत्र पार्टी पर स्टालिन की छाप को दर्शाता है।


तमिलनाडु कल्याणवाद की राजनीति के लिए जाना जाता है। कई लोग तो इसे मुफ्त में चीजें देने का वादा कर चुनाव जीतने की राजनीति कहते रहे हैं। लेकिन यह उतना सरल भी नहीं है। द्रमुक 1967 में पहली बार तमिलनाडु की सत्ता में आई थी। लेकिन 1969 में अन्नादुरई के निधन के बाद करुणानिधि ने पार्टी एवं सरकार दोनों की कमान संभाली। द्रमुक का जन्म एक जनांदोलन से हुआ था। यह एक अनुशासित संगठन था और जिलों के प्रमुखों को काफी हद तक स्वायत्तता देता था। अगर आप सत्ता में बने रहना चाहते हैं तो आपको लोगों की बातें ध्यानपूर्वक सुननी होती हैं और उनकी अपेक्षाओं का भार उठाना होता है। द्रमुक ने यह काम दो तरह से किया। पहला, अपने जिला-स्तरीय नेताओं से मिले सुझावों पर अमल करते हुए इसने राज्य के शासकीय ढांचे में बदलाव किए और अफसरशाही के निचले स्तर एवं सामाजिक रूप से वंचित समूहों के लोगों को साथ जोड़ा। दूसरा, सरकार की नीतियों के जरिये आकांक्षा, अपेक्षा एवं चाहत के निचोड़ को एक सुसंगत एवं पहचाने जाने लायक रूप में ढाला जा सके।


इसका मतलब था कि झुग्गी बस्तियों को नियमित करने के बाद द्रमुक सरकार ने गरीबों के लिए आवासीय कार्यक्रम शुरू करने का ऐलान किया। सरकार ने मछुआरों, पुलिस कर्मचारियों एवं आदि द्रविड़ों के लिए मकान बनाए। तमिलनाडु में पहले से ही सरकार लोगों को एक रुपये किलो के भाव पर चावल दे रही थी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का दायरा बढ़ाने के लिए व्यवस्थागत प्रयास किए गए। वर्ष 1976 आते-आते समूचे राज्य में पीडीएस व्यवस्था लागू हो चुकी थी जिसमें लाभार्थियों को चावल, चीनी, केरोसिन तेल और गेहूं देने के साथ ही पोंगल के अवसर पर साडिय़ां एवं धोती भी दी जाती थी। ऐसा करना राजनीतिक रूप से ठीक नहीं था क्योंकि यह अनुदान के रूप में होता था। लेकिन किसी को भी शिकायत नहीं थी। शुद्ध परिणाम यह है कि इन वर्षों में विकास सूचकांकों में खासी वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 1970 और 1976 के दौरान प्रति व्यक्ति आय करीब 30 फीसदी बढ़ गई, साक्षरता दर 1971 के 39.5 फीसदी से बढ़कर 1981 की जनगणना में 54.4 फीसदी पर पहुंच गई। इसी तरह शिशु मृत्यु दर भी 1977 में 103 पर आ गई थी जबकि 1971 में यह 125 हुआ करती थी।


इस सबका यही मतलब है कि विचारों की राजनीति की गुंजाइश है। द्रमुक के विभाजन के बाद एम जी रामचंद्रन ने जब अन्नाद्रमुक बनाई तो लोकलुभावन राजनीति की जड़ें इतनी गहराई तक जा चुकी थीं कि उन्हें पानी देने के सिवाय कोई चारा नहीं था। ऐसा नहीं करने पर उन्हें सियासी उठापटक का सामना करना पड़ता। स्कूली बच्चों को दोपहर का भोजन देने की योजना एमजीआर के ही दिमाग की उपज थी। लेकिन यह शुरुआती दौर की बात है। हर नया चुनाव प्रतिस्पद्र्धी लोकलुभावनवाद को सामने लाता रहा, कभी-कभी तो वह एकदम बेतुका ही लगता था जैसे कि जयललिता की तरफ से मुफ्त बकरियां देने की योजना। भले ही यह योजना सुनने में अटपटी लगे लेकिन इसने लोगों को सशक्त बनाने के साथ ही उन्हें अन्नाद्रमुक के पाले में भी लाने का काम किया। लेकिन लोगों के दिमाग को उलझाए रखने की भी जरूरत होती है।


तमिल स्वाभिमान का विचार फिर से जोर पकडऩे लगा। 'ईलम' के गठन के लिए संघर्ष छिडऩे के साथ ही इसकी शुरुआत हुई। लेकिन अब वह दौर खत्म हो चुका है लिहाजा उसे 'दिल्ली के साम्राज्यवाद' का नारा उछालना पड़ा। यही वजह है कि द्रमुक घोषणापत्र में वह वादा भी है कि तमिलनाडु एक दिन एक स्वतंत्र गणतंत्र होगा। अगर चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों पर यकीन करें तो द्रमुक के सत्ता में लौटने की संभावना नजर आ रही है। ऐसा होने पर केंद्र सरकार को नजर रखनी होगी।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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पाकिस्तान के साथ शांति स्थापना की ठोस वजह (बिजनेस स्टैंडर्ड)

शेखर गुप्ता  

पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कमर अहमद बाजवा ने बीते गुरुवार को इस्लामाबाद सिक्युरिटी डायलाग में 13 मिनट का जो भाषण दिया, उस पर भारत के जानकार लोगों की पहली प्रतिक्रिया तो उबासी की ही रही होगी। वह बस यही कह रहे हैं कि भारत और पाकिस्तान को अपने अतीत को दफनाकर नई शुरुआत करनी चाहिए, शांति दोनों देशों के लिए जरूरी है ताकि वे अपनी अर्थव्यवस्था पर ध्यान दे सकें वगैरह...वगैरह। हर पाकिस्तानी नेता ने चाहे वह निर्वाचित हो या नहीं, कभी न कभी ऐसा ही कहा है। इसके बाद वे पीछे से वार करते हैं तो इसमें नया क्या है?


म्युचुअल फंड के विज्ञापनों में आने वाले स्पष्टीकरण से एक पंक्ति को लेकर उसे थोड़ा बदलकर कहें तो यदि अतीत भविष्य के बारे में कोई संकेत देता है तो पाकिस्तान के बारे में बात करना निरर्थक है। बेहतर है कि ज्यादा तादाद में स्नाइपर राइफल खरीदिए और नियंत्रण रेखा पर जमे रहिए। तो यह गतिरोध टूटेगा कैसे?


बमबारी करके उन्हें पाषाण युग में पहुंचाना समस्या का हल नहीं है। करगिल, ऑपरेशन पराक्रम और पुलवामा/बालाकोट के बाद हम यह जान चुके हैं। कड़ा रुख रखने वाले अमेरिकी सुरक्षा राजनयिक रिचर्ड आर्मिटेज जिन्होंने 9/11 के बाद इस धमकी के जरिये पाकिस्तान पर काबू किया था, वह जानते थे कि यह बड़बोलापन है। तब से 20 वर्षों तक अमेरिका ने अफगानिस्तान के बड़े हिस्से को बमबारी कर पाषाण युग में पहुंचा दिया। लेकिन अमेरिका हार कर लौट रहा है। सैन्य, कूटनयिक, राजनीतिक या आर्थिक रूप से कुछ भी ताकत से हासिल नहीं होगा। जैसा कि पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक ने पिछले दिनों मुझसे बातचीत में कहा भी कि आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर या अक्साई चिन को सैन्य बल से हासिल करना संभव नहीं है। जहां तक क्षमता का प्रश्न है ऐसा कोई भी प्रयास वैश्विक चिंता पैदा करेगा और बहुत जल्दी युद्ध विराम करना होगा। बहरहाल, ये मेरे शब्द हैं न कि उनके।


यहां से आगे क्या? और पहली बात तो यह कि हम यहां पहुंचे ही कैसे? पिछले महीने एक सुबह अचानक हमें दोनों पक्षों के सैन्य परिचालन महानिदेशकों (डीजएमओ) के समन्वय वाले वक्तव्य सुनने को मिले जिनमें कहा गया था कि वे 2003 के उस समझौते पर सहमत हैं जिसमें नियंत्रण रेखा पर शांति कायम रखने की बात कही गई थी। इसका अर्थ है एक दूसरे की चौकियों और गांवों पर बेतुके ढंग से गोलीबारी बंद करना। यह भड़ास निकालने से अधिक कुछ नहीं है।


इसके अलावा दोनों पक्षों के कमांडो शैली में काम करने वाले चैनलों को कुछ तस्वीरें जरूर मिल जाती थीं जिनका इस्तेमाल जीत के दावों के लिए किया जाता। परंतु सरकारों की तरह सेनाओं को भी सच पता है। कभी न कभी तो आगे बढऩा होता है।


यदि किसी को लगता है कि डीजीएमओ एक सुबह अचानक शांति बहाली की बात सोचने लगे तो यह सही नहीं है। इसी प्रकार अगर कोई यह सोचता है कि जनरल बाजवा का भाषण अचानक आया तो उसे भी यह समझना चाहिए कि परदे के पीछे महीनों नहीं तो कई सप्ताह से कुछ न कुछ चल रहा था।


पुराने और अनुभवी खुफिया, सामरिक तथा सैन्य तंत्र से कुछ कड़ी हिदायतें आई हैं। अगर एक और पाकिस्तानी जनरल अतीत को भुलाकर आगे बढऩे की बात कर रहा है तो इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ कि भारत अतीत को भुला दे और आगे बढ़े जबकि पाकिस्तान हमें नुकसान पहुंचाता रहे। जो लोग उम्र भर एक ही शत्रु से लड़ते रहे हैं उनके लिए यह भावना समझना आसान है। लेकिन जैसा कि हमने पहले कहा, सन 2021 में किसी देश के लिए यह संभव नहीं कि वह दूसरे को तबाह करके कुछ हासिल करे। खासतौर पर जब हमारे पड़ोस में मजबूत और प्रतिस्पर्धी राष्ट्रवाद वाले और परमाणु हथियार क्षमता संपन्न देश हों। यहां कोई भी अजरबैजान के लिए अर्मेनिया और रूस के लिए यूक्रेन जैसा नहीं बनना चाहता। इसके लिए कुछ रचनात्मक सोचना होगा।


शीतयुद्ध को समाप्त करने संबंधी वार्ता में रोनाल्ड रीगन ने मिखाइल गोर्बाचेफ के साथ एक प्रसिद्ध वाक्य का इस्तेमाल किया था: विश्वास करें लेकिन जांच भी कर लें। पाकिस्तान से निपटते समय हम इस वाक्य को पलट सकते हैं: अविश्वास करें और जांचें। इसका अर्थ यह है कि पाकिस्तान के सैन्य मुख्यालय रावलपिंडी के हर नए कदम को पूरी शंका से देखा जाए। यही कारण है कि हम जहां दिलों में शंका रखते हैं वही जनरल की बातों को समझने के लिए दिमाग का इस्तेमाल करते हैं। वही बातें जो ठेठ पंजाबी लहजे में कही गईं जो सीमा के दोनों ओर एक सा है।


उस लिखित भाषण में दो बातें स्पष्ट थीं। पहली, पड़ोस या क्षेत्र के किसी मुल्क के आंतरिक मसलों में हस्तक्षेप नहीं करने की प्रतिबद्धता। आप इसे मामूली बात कह सकते हैं लेकिन सावधानी से परखना जरूरी है। ऐसा भी नहीं है कि कोई हड़बड़ाकर पाकिस्तानी के उत्तरी क्षेत्र कमांडर को श्रीनगर के बादामी बाग कैंट में गोल्फ खेलने का न्योता दे रहा है।


दूसरी बात, वह कश्मीर का जिक्र करना नहीं भूले। लेकिन यहां भी एक दिक्कत है। उन्होंने कहा कि रिश्तों में प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि भारत अपने हिस्से वाले कश्मीर में किस हद तक बेहतर माहौल कायम करता है। रस्मी तौर पर कश्मीर का जिक्र करने के साथ भारत को वहां 5 अगस्त, 2019 के पहले वाली स्थिति बहाल करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के मुताबिक आत्मनिर्णय की व्यवस्था की याद दिलाई जा सकती थी।


क्या इसका अर्थ यह है कि पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर में 5 अगस्त, 2019 के पहले की स्थिति बहाल करने की जिद छोड़ दी है? जल्दी नतीजे पर मत पहुंचिए बल्कि इसे परखिए क्योंकि अगर हम सोचते हैं कि दो मोर्चों पर अजीब स्थिति में फंस गए हैं तो पाकिस्तान के लिए तो हालात और खराब हैं। बाजवा जिस जगह से देख रहे हैं, उन्हें पूर्व में मजबूत भारत नजर आ रहा है और पश्चिम में बदलता अफगानिस्तान और जटिल ईरान, उत्तर में वजन बढ़ाता चीन और अमेरिका जो अब सहयोगी नहीं रहा। हम इतिहास के ऐसे मोड़ पर हैं जहां अमेरिका और भारत सहयोगी हैं और क्वाड समूह के रूप में वे और करीब आ रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तानी बुर्जुआ वर्ग के अन्य लोगों की तरह बाजवा को भी निर्णय लेना पड़ा।


भारत के साथ शांति कायम करें या लड़ते रहें और चीन के सैन्य संरक्षण वाला आर्थिक उपनिवेश बन जाएं। याद रहे कि पाकिस्तानी सत्ताधारी वर्ग के तमाम लोगों के बच्चे, पैसा और संपत्तियां पश्चिमी देशों में हैं। यदि उनमें भारत के प्रति नफरत न हो तो उन्हें चीन के साथ कोई समानता नहीं दिखेगी। इतना ही नहीं यह ऐसे समय में हो रहा है जब खाड़ी देश भी उससे अलग हैं और अपना कर्ज वापस ले रहे हैं। यानी भारत के साथ शांति ही आगे की राह है।


भारत में हमें मानना होगा कि मोदी सरकार अपना नजरिया छिपा कर रखने में कामयाब है। सरकार में शामिल चंद लोगों के सिवा कोई इस बारे में कुछ नहीं जानता। परंतु अब हमारे पास इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि यह सरकार टकराव नहीं चाहती। सात वर्ष में और इस बीच पेश किए गए आठ बजट में रक्षा के लिए आवंटन या तो समान रहा या थोड़ा कम हुआ। यहां जंग की तैयारी नहीं चल रही। इसी तरह पठानकोट, उड़ी, पुलवामा, गलवान आदि घटनाएं हमें बताती हैं कि हम टकराव पैदा करना नहीं चाहते।


हम ऐसे नतीजे पर पहुंचते हैं जो कई को उकसा सकता है। मोदी सरकार युद्ध न करने की नीति बना सकती है क्योंकि वह ऐसा करने में सक्षम है। कमजोर सरकार होती तो वह पूर्वी लद्दाख में दबाव में होती और अतीत में पाकिस्तान पर इतना दबाव नहीं बना पाती। चीन से युद्ध न छेडऩे के लिए कई लोगों ने मोदी पर तंज किया और कहा कि भले ही नेहरू हार गए लेकिन वह लड़े तो। सन 1962 में नेहरू की सरकार आज की तुलना में बहुत कमजोर थी। उनके पास कोई विकल्प नहीं था। मोदी इस जाल में फंसने के लिहाज से बहुत मजबूत हैं। वह युद्ध नहीं शांति को तरजीह देंगे।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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बेमियादी बॉन्ड से जुड़े गतिरोध ने उजागर की नीतिगत खामियां (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सोमशेखर सुंदरेशन  

बैंकों द्वारा जारी किए जाने वाले पर्पेचुअल अथवा बेमियादी बॉन्ड से जुड़ी नीतियों में बदलाव को लेकर चल रही सार्वजनिक बहस, नीतिगत चयन और उनके क्रियान्वयन से जुड़े कई मुद्दों को रेखांकित करती है।


इस विषय पर काफी कुछ लिखा जा चुका है इसलिए इसे संक्षेप में देखते हुए आगे बढऩा उपयोगी होगा। बेमियादी बॉन्ड ऐसे बॉन्ड होते हैं जिनके पुनर्भुगतान की कोई तिथि नहीं होती। वे बेमियादी डेट हैं और शेयरों के समान है। बॉडी कॉर्पोरेट (विधिक अधिकारों और जवाबदेही वाली कंपनियों) की तरह बैंक भी कृत्रिम विधिक व्यक्ति होते हैं जिनका जीवन और उत्तराधिकार बेमियादी होते हैं। ऐसे बॉन्ड का कभी तय तारीख पर पुनर्भुगतान नहीं करना होता। बॉन्ड जारी करने वाले के पास पुनर्भुगतान के अधिकार के इस्तेमाल का विकल्प रहता है। हो सकता है कि इस विकल्प का कभी इस्तेमाल न किया जाए। ऐसे में इन बॉन्ड का मूल्यांकन करना आसान नहीं होता। खासतौर पर तब जब म्युचुअल फंड के जरिये आम बचत भी इनमें  लगी हो। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने इन बॉन्ड को जारी करने की तिथि से 100 वर्ष की अवधि में पुनर्भुगतान करने की बात निर्धारित की है। ऐसा करके ही वसूली के निर्धारित किसी डेट का वर्तमान मूल्यांकन भविष्य की किसी तिथि को ध्यान में रखकर किया जा सकता है।


हम यहां यह चर्चा नहीं करेंगे कि बेमियादी बॉन्ड के मूल्यांकन कैसे करें। प्रतिफल का आकलन करने और मूल्यांकन का निर्धारण करने के लिए सेबी ने जो बाहरी सीमा तय करने का इरादा जताया है वह सही है। 100 वर्ष पश्चात भुगतान लायक होने वाले डेट का मूल्यांकन निष्पक्ष तरीके से किया जा सकता है। पुनर्भुगतान की तय तारीख के बिना डेट मूल्यांकन को बाजार की कल्पना पर छोड़ देगा। इनके मूल्यांकन में उतार-चढ़ाव म्युचुअल फंड में निवेश करने वाले आम लोगों को गहरे तक प्रभावित कर सकता है क्योंकि वे ऐसे बॉन्ड में निवेश करते हैं।


बहरहाल बदलाव का प्रबंधन करते हुए यह याद रखना जरूरी है कि दवा कभी बीमारी से अधिक दर्द देने वाली नहीं होनी चाहिए। यदि समाज ने किसी दवा को खारिज कर दिया है तो वह मरीज को और अधिक दर्द पहुंचाएगी, भले ही वह कितनी भी अहम क्यों न हो। बॉन्ड पर 100 वर्ष की अवधि का अधिरोपण होने पर बॉन्ड का मूल्यांकन भी रातोरात बदल जाता है। बाजार अब तक बॉन्ड का जो मूल्यांकन कर रहा था और भविष्य में उसे जो मूल्यांकन करना होगा, दोनों का अंतर काफी मुश्किल खड़ी करने वाला होगा।


कहा जा रहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक बेहद नाराज है। हर समाचार पत्र ने यह खबर प्रमुखता से छापी कि भारत सरकार इस बदलाव को वापस लेना चाहती है। वित्तीय क्षेत्र के नियामकों के बीच सौहार्द बनाने के लिए वित्तीय स्थिरता एवं विकास परिषद (एफएसडीसी) का गठन किया गया था। इसके पीछे विचार था यह सुनिश्चित करना कि दोबारा किसी वित्त मंत्री को यह घोषणा नहीं करनी पड़े कि दो नियामक आपसी मतभेद को समुचित न्यायालय में जाकर निपटा सकते हैं। ऐसे गंभीर बदलाव के प्रबंधन के कई तरीके अपनाए जा सकते थे।


सबसे पहले एक महत्त्वपूर्ण विधान या इस प्रकृति का नीतिगत बदलाव लाने के पहले मशविरा होना चाहिए था। यह एक मान्य अवधारणा है जिसका पालन किया जाता है। नियामक इस बात के लिए अपनी सराहना करते हैं कि वे विधान बनाने के पहले मशविरा करते हैं लेकिन यह ऐसा नियम नहीं है जिसे टाला न जा सकता हो। ऐसे बड़े प्रस्तावित बदलाव को लेकर पूर्व मशविरा करने से इस समस्या को सामाजिक तौर पर चिह्नित करने में मदद मिलती और बिना अस्थिरता के स्वीकार्य हल भी सामने आते। चोरी चुपके किए जाने वाले सुधार इस बात को रेखांकित करते हैं कि व्यवस्था में स्वयं सुधार का भरोसा नहीं है।


दूसरा, भारत सरकार के पास यह सांविधिक अधिकार है कि वह हर आर्थिक विधान के मामले में नीतिगत मसलों पर नियामकों को निर्देश दे सके। ऐसी महत्त्वपूर्ण शक्ति की मौजूदगी ने यह सुनिश्चित किया कि इसका कभी इस्तेमाल नहीं करना पड़ा। इसकी उपलब्धता मात्र यह सुनिश्चित करती है कि कोई ऐसा नीतिगत बदलाव चर्चा के लिए पेश न किया जाए जो सरकार को पसंद नहीं हो। यह काफी हद तक वीटो अधिकार की तरह है। वीटो अधिकार का इस्तेमाल भले ही कभी न हुआ हो लेकिन यह अधिकार रखने वालों के साथ अग्रिम चर्चा की आशा रखी ही जाती है। ऐसे में यह चकित करने वाली बात है कि इस तरह के मुद्दे पर गतिरोध उत्पन्न हो गया है। जाहिर है बदलाव करने के पहले की गतिविधियों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकेगी।


तीसरा, एक बेमियादी बॉन्ड की मियाद तय करने जैसे नाटकीय बदलाव को पेश करते समय 'ग्रैंडफादरिंग' और 'ट्रांजिशन' के प्रावधानों के मिश्रण का इस्तेमाल करना चाहिए था। ग्रैंडफादरिंग प्रावधान का अर्थ होगा एक दोहरी व्यवस्था जहां 100 वर्ष की अवधि केवल उन्हीं बॉन्ड पर लागू होगी जो बदलाव के बाद जारी होंगे। ट्रांजिशनल यानी परिवर्ती प्रावधान मौजूदा बॉन्ड को भी यह सुविधा देगा कि वे (मान लेते हैं 18 महीने से 60 महीने की अवधि) 100 वर्ष अवधि वाले नए मानक के तहत मूल्यांकन को अपनाएं। यह सब तभी होगा, बशर्ते कि पूर्व में जारी बेमियादी बॉन्ड का खतरा इतना अधिक न हो कि ग्रैंडफादरिंग और ट्रांजिशन प्रावधान बदलाव को निरर्थक कर दें।


आम धारणा के विपरीत आर्थिक नीति काफी हद तक वैचारिकी और सिद्धांतों पर आधारित होते हैं, बजाय कि घोषित अनुभवजन्य वजह के। नियामकीय लड़ाइयों में अक्सर यह होता है कि एक कोने में बैठा जाए और सामने वाले पक्ष को जगह देने या उसे वैधता प्रदान करने को नकारा जाए। इस रुख के साथ टिकाऊ बदलाव दुष्प्राप्य रह सकता है। एक फतवा जारी करके किया गया बदलाव केवल तभी तक जारी रह सकता है जबतक कोई दूसरा विरोधाभासी फतवा न जारी हो जाए।

(लेखक स्वतंत्र अधिवक्ता हैं)


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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