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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Monday, February 1, 2021

वृद्धि और राजस्व बढ़ाने पर बड़ा दांव (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आकाश प्रकाश  

बाजार ने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए पेश बजट पर शानदार प्रतिक्रिया दी है। बाजार यह देखते हुए फूला नहीं समाया कि सरकार ने बजट में कर बढ़ाने की कोई घोषणा नहीं की है। बाजार को लग रहा था कि सरकार अति धनाढ्य लोगों पर कुछ अधिभार लगा सकती है। वैसे तो यह अच्छा कदम है लेकिन इसका एक नुकसान यह है कि कर नहीं बढ़ाने से कुल व्यय में भी इजाफा (एक प्रतिशत से भी कम)नहीं हुआ है। यह अलग बात है कि सरकार ने वित्त वर्ष 2022 में नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 14.4 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान व्यक्त किया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कर नहीं बढ़ाने से अर्थव्यवस्था को समर्थन देने के लिए सरकार पर्याप्त व्यय नहीं कर पाएगी। वित्त मंत्री ने बजट में प्रत्यक्ष करों और जीएसटी में 22 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान जताया है और इनके साथ विनिवेश से प्राप्त 175,000 करोड़ रुपये की रकम का इस्तेमाल राजकोषीय घाटा 341,000 करोड़ रुपये कम करने में किया है। कुल मिलाकर सरकार ने वृद्धि दर और राजस्व में बढ़ोतरी को लेकर एक बड़ा दांव खेला है, लेकिन मेरे विचार से यह जोखिम लेना सही ही था। मुझे लगता है कि वित्त वर्ष 2022 में नॉमिनल जीडीपी की वृद्धि दर 14.4 प्रतिशत से संभवत: अधिक रहेगी और राजस्व की स्थिति उम्मीद से अधिक बेहतर रहेगी।  

कुल व्यय में कोई बढ़ोतरी नहीं किए जाने के बीच पूंजीगत व्यय के लिए बजट में प्रावधान 26 प्रतिशत बढ़ाकर 554,236 करोड़ रुपये किया गया है (पूंजीगत व्यय में 115,000 करोड़ रुपये इजाफा हुआ है)। पूंजीगत व्यय में यह बढ़ोतरी और ब्याज के मद में 116,801 करोड़ रुपये का प्रावधान सब्सिडी में नाटकीय कमी करने के बाद किया गया है। कोविड-19 को मात देने के लिए दिए कुछ प्रोत्साहन वापस लिए जाने के बाद वित्त वर्ष 2022 में सब्सिडी में 260,000 करोड़ रुपये तक कमी आने का अनुमान है।


करों में बढ़ोतरी करने और राजकोषीय स्थिति तेजी से मजबूत बनाने की दिशा में काम करने के बजाय वित्त मंत्री ने राजकोषीय घाटा सीमित करने की प्रक्रिया को राजस्व की स्थिति से जोड़ दिया है। अगर सरकार ने इस समय राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने पर अधिक जोर दिया होता तो इससे बाजार सहित निवेशकों के मनोबल पर बुरा असर होता। वित्त मंत्री की यह रणनीति वाजिब है और सरकार को इससे राजकोषीय मोर्चे पर हाथ और अधिक खोलने का विकल्प मिलता है। यह अच्छी बात है कि सरकार ने एफआरबीएम अधिनियम और रेटिंग एजेंसियों की परवाह  किए बिना एक खाका तैयार किया है।


संरचनात्मक स्तर पर निश्चित तौर पर कुछ सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। सरकार ने निजीकरण की दिशा में आगे बढऩे की दिशा में अपना रुख स्पष्ट कर दिया है और इसमें अब किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं दिख रही है। यह बात भी ईमानदारी से स्वीकार कर ली गई है कि हम राजस्व के लिए 2 करोड़ करदाताओं पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकते और हमें अधिक रकम का बंदोबस्त करने के लिए सरकारी परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी बेचनी होगी। इस संबंध में पहले भी कई घोषणाएं हुई थीं। सरकार के पास उपलब्ध जमीन बेच कर रकम जुटाने पर भी खासा जोर दिया गया है। हालांकि इसके लिए सरकार को क्रियान्वयन के मोर्चे पर काफी मुस्तैदी दिखानी होगी।


वित्तीय प्रणाली के लिए दो सार्वजनिक बैंकों एवं एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण का निर्णय काफी साहस भरा है। यह दिखाता है कि कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर मुश्किलें झेलने के बाद भी सरकार कठिन एवं चुनौतीपूर्ण समझे जाने वाले आर्थिक सुधारों से पीछे हटते नहीं दिखना चाहती है। अगर भारत को वास्तव में 7-8  प्रतिशत दर से आगे बढऩा है तो इसे ऋण आवंटन में 14-15 प्रतिशत वृद्धि को पूरा समर्थन देना होगा। सार्वजनिक बैंक कम से कम अपनी मौजूदा हालत में तो ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं। निजीकरण और सार्वजनिक बैंकों का आपस में विलय ही एक रास्ता दिख रहा है। अब लगता है कि सरकार ने यह बात पूरी तरह समझ ली है। सार्वजनिक बैंकों के फंसे कर्ज लेने के लिए परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी की स्थापना से बैंकों का बहीखाता साफ-सुथरा हो जाएगा और उन्हें दोबारा कर्ज आवंटन शुरू करने में मदद मिलेगी।  


बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा बढ़ाकर 74 प्रतिशत करने से इस क्षेत्र को नई पूंजी प्राप्त करने और कारोबार बढ़ाने में मदद मिलेगी। बुनियादी ढांचे के लिए दीर्घ अवधि की पूंजी मुहैया कराने में बीमा क्षेत्र अहम भूमिका निभा सकता है। इस क्षेत्र को अधिक से अधिक पूंजी हासिल करने और कारोबार आगे बढ़ाने की इजाजत देना एक स्वागत योग्य कदम है। 20,000 करोड़ रुपये की शुरुआती पूंजी के साथ ढांचागत क्षेत्र पर केंद्रित नए डेवलपमेंट फाइनैंस इंस्टीट्यूशन (डीएफआई) की स्थापना और अगले तीन वर्षों में इसका बहीखाता बढ़ाकर 500,000 करोड़ रुपये करना आक्रामक लेकिन जरूरी कदम है। क्रियान्वयन पर निश्चित तौर पर सबकी नजरें होंगी।


एक ही संहिता में ज्यादातर वित्तीय बाजार नियामकों को लाने से पारदर्शिता बढ़ेगी और कानूनों में भी निरंतरता बनी रहेगी। बजट में सरकार ने रीट और इन्विट ढांचों पर अधिक जोर देने की कोशिश की है। एफपीआई को इन इकाइयों द्वारा जारी बॉन्ड खरीदने की इजाजत दी गई है और टीडीएस नियम भी सरल बनाने की पहल की गई है। कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार की मदद के लिए एक स्थायी संस्थागत ढांचा तैयार करने की कोशिश की गई है और इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि आईएलऐंडएफएस जैसी घटनाएं दोबारा नहीं हों। बिजली वितरण क्षेत्र को उबारने के लिए बजट में अतिरिक्त 300,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि पूर्व में आई इसी तरह की योजना के मुकाबले यह अधिक कारगर होगा। कराधान के मोर्चे पर सरकार ने चीजें सरल बनाने की दिशा में अतिरिक्त प्रयास किए हैं। हालांकि  इस मोर्चे पर क्रियान्वयन कैसा रहेगा यह देखने वाली बात होगी।


हालांकि बाजार से 967,708 करोड़ रुपये उधारी लेने की आवश्यकता को देखते हुए बॉन्ड बाजार थोड़ा चिंतित जरूर दिख सकता है। यह एक बड़ा आंकड़ा है क्योंकि सरकार ने वित्त वर्ष 2021 में 535,000 करोड़ रुपये उधारी लेने का लक्ष्य रखा था। बॉन्ड पर प्रतिफल 16 आधार अंक तक बढ़ गया है। हालांकि इस वर्ष हम बाजार से 12,37,788 करोड़ रुपये उधार लेने में कामयाब रहे हैं, जिनमें लघु बचत का योगदान 480,000 करोड़ रुपये रहा है। आरबीआई को बॉन्ड बाजार की चिंताएं दूर करनी चाहिए। अच्छी बात यह रही कि डॉलर के मुकाबले रुपया स्थिर रहा।


कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि वित्त मंत्री ने अच्छा बजट पेश किया है। बाजार भी राहत महसूस कर रहा है। सरकार वृद्धि दर और परिसंपत्तियों की बिक्री पर बड़ा दांव लगा रही है। इसके साथ ही इसने आर्थिक सुधार जारी रखने की इच्छाशक्ति दिखाई है। शेयर निवेशकों को भी अधिक चिंतित नहीं होना चाहिए।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Thursday, January 28, 2021

सपनों की उड़ान भरने से पहले स्टार्टअप दें ध्यान (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्यामल मजूमदार 

'हाइक' की स्थापना के महज चार साल बाद अगस्त 2016 में केविन भारती मित्तल सफल स्टार्टअप के यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो गए थे। हाइक का मूल्यांकन 1.4 अरब डॉलर किए जाने के बाद मित्तल 17.4 करोड़ डॉलर का फंड जुटाने में सफल रहे। उस समय दुनिया की प्रतिक्रिया का अंदाजा लगाया जा सकता था। लोग यही कह रहे थे कि सुनील भारती मित्तल के बेटे ने महज 23 साल की उम्र में अपना अलग मुकाम बना लिया। मीडिया में उनकी खूब तारीफ की गई और वह स्टार्टअप की दुनिया के पोस्टर बॉय बन गए। वह देसी 'डेविड' थे जो आखिरकार व्हाट्सऐप जैसे 'गोलियथ' का मुकाबला कर पाए।


दुर्भाग्य से, इस परीकथा का अंत खुशनुमा नहीं रहा। हाइक हाल ही में बंद हो गया और ऐप स्टोर से गायब भी हो गया। एक हफ्ते पहले किए गए ट्वीट में मित्तल ने कहा था, 'भारत के पास खुद का मेसेंजर नहीं होगा, वैश्विक नेटवर्क प्रभाव काफी सशक्त हैं (जब तक भारत पश्चिमी कंपनियों पर प्रतिबंध नहीं लगाता है)।' पिछले एक-डेढ़ साल में मित्तल ने लगातार हाइक को सामाजिक एवं वर्चुअल-मोबाइल उत्पाद के तौर पर विविधकृत किया था। हालांकि मित्तल ने लिखा, 'उनकी कंपनी अपने सोशल मीडिया ऐप 'वाइब' के विकास और नए गेमिंग उत्पाद 'रश' पर काम करना जारी रखेगी।'


स्वदेश में विकसित भारत के पहले मेसेंजर ऐप को बनाए रख पाने में नाकामी के अलावा कड़वाहट इस वजह से भी बढ़ी है कि हाइक पर ताला उस समय लगा है जब व्हाट्सऐप की निजता संबंधी नई शर्तों को लेकर पैदा हुए विवाद के बाद सिग्नल एवं टेलीग्राम के लाखों नए ग्राहक बन गए हैं। लेकिन हाइक मेसेंजर के पतन को कौतूहल भरी नजर से नहीं देखा जा सकता है। पहले से ही ऐसे संकेत थे कि हाइक शुरुआती उफान के बाद रास्ता भटक गया था और किशोरवय उत्साह में इसने कई क्षेत्रों में घुसने की कोशिश की। खुद मित्तल ने भी जनवरी 2020 में लिखे एक ब्लॉग में इसे स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था, 'अपने फोकस को लेकर चुङ्क्षनदा रवैया रखो। संभावनाओं से भरी इस दुनिया में सही संभावनाओं वाली कुछ बातों पर फोकस रखना अहम है। इस तरह हम आधी जंग जीत जाते हैं।'


लेकिन इस हकीकत का अहसास होने में शायद देर हो चुकी थी। हाइक इसका सटीक उदाहरण हो सकता है कि एक कंपनी को अपना प्रमुख कार्य-क्षेत्र चिह्नित कर उस पर शिद्दत से डटे रहना चाहिए। दरअसल कम काम करो लेकिन बेहतर काम करो, न कि स्थापित वैश्विक मेसेंजर दिग्गजों के खिलाफ जंग का बिगुल फूंकने लगो। हरेक कंपनी को यह सबक बार-बार सीखना चाहिए। किसी भी कारोबार में निवेश करने वाले को पहले अपना असली कारोबार मजबूत करना चाहिए और फिर दूसरे क्षेत्रों में दस्तक देनी चाहिए। और जो कंपनी इस बुनियादी राह से भटक जाती है वह गुम हो जाती है। कंपनियों के पास एक सुपरिभाषित एवं मजबूती से वर्गीकृत मूल कारोबार होना चाहिए और उन्हें एक समय के भीतर अपने समर्पित प्रमुख ग्राहकों की नजरों में मूल्य भी बनाना चाहिए। तब जाकर उन्हें कारोबार के अन्य क्षेत्रों की तरफ रुख करना चाहिए।


इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि हाइक की शुरुआत जबरदस्त रही थी और चार वर्षों में ही 10 करोड़ से अधिक लोग उसका इस्तेमाल करने लगे थे। समस्या यह थी कि उसके बाद हाइक की वृद्धि स्थिर हो गई और 2018 से उपभोक्ता भी उससे छिटकने लगे। इससे कंपनी के वित्त पर दबाव बढऩे लगा। मित्तल शायद वीचैट की कामयाबी से प्रेरित रहे हों और उसके जटिल कारोबारी मॉडल का ही अनुसरण करना चाहते थे। वीचैट का 80 फीसदी से भी अधिक राजस्व गेम से आता है और बाकी हिस्सा ऑनलाइन विज्ञापन, मोबाइल भुगतान एवं स्टिकर जैसे उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री का होता है।


लिहाजा हाइक ने भी वही रास्ता अपनाया और अपने प्लेटफॉर्म पर गेम, मोबाइल वॉलेट एवं 20,000 से अधिक ऑनलाइन स्टिकर इक_ा कर लिए। लेकिन हाइक कभी भी वीचैट की कामयाबी नहीं दोहरा पाया क्योंकि वह एक बड़ा उपभोक्ता आधार नहीं खड़ा कर पाया जिसने आगे चलकर उसकी ब्रांड इमेज एवं प्रतिष्ठा को भी क्षतिग्रस्त किया और उसके मूल्यांकन में भी गिरावट आई।


हाइक खुद 'सुपर ऐप' के रूप में भी दिखना चाहता था। एक ऐसा ऐप जो चैट से आगे बढ़कर सेवाएं भी प्रदान करे। इसका समाचारों के लिए एक अलग इंटरफेस था जहां वह अलग वर्गों में छोटी संक्षिप्त खबरें परोसता था। उपयोगकर्ताओं को संदेश भेजने वाले चैटबोट भी थे- हाइक डेली प्रेरणादायी संदेश भेजता था जबकि जस्ट फॉर लॉफ्स चुटकुले एवं मीम्स भेजता था। यह सब कुछ युवाओं को आकर्षित करने के लिए था लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि हाइक ने अपने पैर कुछ ज्यादा फैला लिए और असली कारोबार से ध्यान भटक गया।


हाइक के खिलाफ जाने वाला दूसरा बिंदु 20 साल से कम उम्र वाली आबादी को लक्षित करना था। वह ग्राहक समूह उत्पाद एवं सेवाएं बेचने के नजरिये से आदर्श नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा तकनीक एवं समूची कारोबारी पारिस्थितिकी में तेजी से बदलाव आया और 2019 में मित्तल को अपना सुपर ऐप कारोबार समेटने और भुगतान प्लेटफॉर्म बंद करने की घोषणा करनी पड़ी। जल्द ही हाइक ने फिर से बुनियादी चीजों पर ध्यान देने का फैसला किया। उसने बेंगलूरु में अपना कार्यालय बंद करने के साथ कर्मचारियों को हटा दिया। लेकिन वह एक लंबे अंत की शुरुआत जैसी थी।


इस मामले से यही सबक लेना चाहिए कि निवेशक का पैसा लगा होने पर कारोबार दिखावे की उड़ान भरने वाला नहीं हो सकता है। बड़ी इंटरनेट कंपनियां अब भी ऐसा कर सकती हैं और वे अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा शोध एवं विकास पर खर्च करती हैं। पहले चरण की स्टार्टअप से कोई भी ऐसी उम्मीद नहीं करता है, लिहाजा हाइक को यह नहीं भूलना चाहिए कि एक स्टार्टअप की बुनियादी परिभाषा यही है कि उसे कुछ खास बातों पर केंद्रित रहना चाहिए ताकि संस्थापकों की मौलिक सक्षमता का कुछ फायदा उठा सके।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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नए साल में आर्थिक चुनौतियों का दायरा (बिजनेस स्टैंडर्ड)

अजय शाह  

महामारी के स्वास्थ्य पहलुओं से जुड़ी सुरंग के आखिर में अब रोशनी नजर आने लगी है। परंपरागत डेटा में कई मुश्किलें हैं लेकिन एक कायाकल्प को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। मसलन, मुंबई के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोविड की वजह से पहली मौत मार्च में हुई थी और 20 जून को 136 मौतों के साथ यह चरम पर पहुंच गया। अब यह आंकड़ा घटकर प्रतिदिन तीन मौतों पर आ चुका है। भारत में हरेक पड़ोस एवं समुदाय महामारी वक्रपर अलग मुकाम पर स्थित है लेकिन मोटे तौर पर हम महामारी के परवर्ती दौर में आ चुके हैं। लोगों के अपने घरों में रहने से शायद मौतों का आंकड़ा कम हुआ है लेकिन बात केवल इतनी ही नहीं है। आंकड़े दिखाते हैं कि कारोबारी गतिविधियों एवं रोजगार में अप्रैल के निम्नतम स्तर से खासा सुधार हुआ है।

हालांकि यह वक्त आर्थिक स्थिति बहाल होने की घोषणा का नहीं है। परिवारों की खपत अब भी महामारी से पहले के स्तर से काफी नीचे है। संपर्क सघन सेवाएं अभी तक पुराने स्तर पर नहीं पहुंच पाई हैं और उत्पादन के मद में पूंजी एवं श्रम के आवंटन की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। इसके अलावा परिवार अपने भविष्य को लेकर डरे हुए हैं और वे बचत पर अधिक जोर दे रहे हैं। इन्हें एक साथ रखें तो अर्थव्यवस्था में मांग की बड़ी कटौती हुई है। वृहद-अर्थशास्त्र के फीडबैक लूप सक्रिय हैं-जब परिवारों की मांग कम होती है तो कंपनियों को मिलने वाला राजस्व भी कम हो जाता है। इस वजह से कंपनियां अपने खर्च में कटौती करने लगती हैं जिससे परिवारों की आय भी प्रभावित होती है।


वर्ष 2020 के आर्थिक तनाव ने तनावग्रस्त ऋण अनुबंधों का एक जखीरा पैदा कर दिया है। कई कर्जदारों को ऋण स्थगन की छूट का फायदा उठाया है जो कुछ समय मदद करता है लेकिन आखिरकार उसका अंत होना ही है। भविष्य में कई कर्जदारों को कर्ज चुकाने में मुश्किलें पेश आएंगी। वित्तीय फर्मों में से कई कर्जदाताओं को बैलेंसशीट में तनाव का सामना करना होगा। इस तरह गैर-वित्तीय एवं वित्तीय फर्मों की चूक के मामले बढ़ेंगे।


हमें एक व्यवस्थित ढंग से इन चूकों की पहचान के लिए संस्थागत प्रणालियों की जरूरत होगी। हम 2016 से पहले की स्थिति में हैं जब गैर-वित्तीय फर्मों की चूक सामने आ रही थीं। वित्तीय फर्मों की चूक से निपटने के लिए कोई व्यवस्थागत संस्थागत ढांचा मौजूद नहीं है, वैसे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंक की नाकामी से निपटने के लिए बाजार-आधारित तरीकों में सुधार से दो बढिय़ा कामयाबी हासिल की हैं। वर्ष 2021 में वृहद-आर्थिक प्रदर्शन पर ये तीन समस्याएं छाई रहेंगी: परिवारों की मांग में बहाली, ऋण पुनर्भुगतान पर तनाव से जूझ रहे परिवार एवं गैर-वित्तीय फर्में और तनावग्रस्त वित्तीय फर्में।


दिसंबर 2020 में निजी क्षेत्र की 36 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं क्रियान्वयन के क्रम में थीं जो एक साल पहले के 38 लाख करोड़ रुपये की तुलना में कम है। लंबे समय तक गिरावट का रुख बने रहने के बीच यह स्थिति आई है जब नॉमिनल रुपये में शिखर मूल्य दिसंबर 2011 में देखा गया था। जहां अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा फल-फूल रहा है, वहीं कई गैर-वित्तीय फर्में इन तीन में से एक या अधिक समस्या का सामना जरूर कर रही है: हिचकोले खाती मांग, फर्म में वित्तीय तनाव और वित्त के आकलन में अवरोधक। अगर एक साथ देखें तो इसने निजी निवेश को कम करने का माहौल पैदा कर दिया है।


सार्वजनिक निवेश में खासी वृद्धि हुई है जिसमें ढांचागत क्षेत्र सबसे आगे है। दिसंबर 2011 में 34 लाख करोड़ रुपये की सरकारी परियोजनाएं क्रियान्वयन के दौर में थीं लेकिन दिसंबर 2020 में यह बढ़कर 83 लाख करोड़ रुपये हो गया था। यह ढांचागत क्षेत्र में निजी भागीदारी में आई कमी को दर्शाता है। लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि ढांचागत परिसंपत्ति एक साध्य को हासिल करने का साधन भर है। ढांचागत परिसंपत्तियों का उद्देश्य फर्मों में निजी निवेश के अनुकूल हालात पैदा करना है और ये फर्में परिवहन एवं संचार ढांचे का इस्तेमाल भी करेंगी। वर्ष 2020 तक ढांचागत अवरोध निजी फर्मों की सोच को आकार देने में कम महत्त्वपूर्ण थे। इसके अलावा सरकार-केंद्रित निवेश की पैसे को प्रदर्शन में तब्दील करने की क्षमता भी कम होती है।


श्रम बाजार के आंकड़े हमें व्यापक-आर्थिक हालात के बारे में अच्छी अंतर्दृष्टि देते हैं। दिसंबर 2020 में 42.75 करोड़ लोग रोजगार में लगे हुए थे जो एक साल पहले के 43.9 करोड़ से कम था। यह हालत जनवरी 2016 से ही रोजगार-प्राप्त लोगों की संख्या में जारी शिथिलता के दौरान की है। इस दौरान जनसंख्या वृद्धि ने कामकाजी उम्र के लोगों की तादाद बढ़ा दी है। इससे हमारी लोक नीति के समक्ष एक मौलिक चुनौती खड़ी हो गई है। तकरीबन सारे रोजगार निजी निवेश के असर में हैं, लिहाजा रोजगार की समस्या हल करने के लिए निजी निवेश की समस्या का समाधान खोजना होगा।


प्रमुख मुद्रास्फीति यानी सालाना उपभोक्ता मूल्य आधारित सूचकांक दिसंबर 2019 में बढ़ी थी और उसके बाद से ही लगातार असहज रूप से अधिक रही है। नवंबर 2020 में 6.93 फीसदी पर रही प्रमुख मुद्रास्फीति अब भी 2-6 फीसदी के मुद्रास्फीति दायरे से काफी अधिक ही है। लेकिन अर्थव्यवस्था में सुस्त मांग वाले परिवेश में मौद्रिक नीति समिति के ब्याज दर निर्धारण संबंधी निर्णय पर असहमत हो पाना मुश्किल है। यह मुमकिन है कि अर्थव्यवस्था के सामान्यीकरण का नतीजा आपूर्ति में सुधार के रूप में निकलेगा और मुद्रास्फीति फिर से निर्धारित दायरे में आ जाएगी।


यह 2021 के शुरुआत की वृहद-आर्थिक स्थिति है और 1 फरवरी को पेश होने वाले बजट की निर्माण प्रक्रिया में यह बात नजर भी आएगी। कर राजस्व में कटौती की जाएगी। समस्याओं की गंभीरता को परिवारों की मांग एवं निजी निवेश में आई गिरावट के संदर्भ में देखें तो सरकार का आकार छोटा है। सार्वजनिक वित्त की ठोस एवं रूढि़वादी रणनीति खर्च या घाटे में सावधानी बरतने का भाव पैदा करेंगे। इन गतिरोधों के बावजूद ऋण एवं सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में बढ़त का सिलसिला अधिक उधारी एवं कमजोर जीडीपी वृद्धि के मेल से जारी रहने के आसार हैं।


नीति-निर्माता निजी निवेश की समस्याएं जड़ से ही दूर कर अर्थव्यवस्था की रिकवरी में मदद कर सकते हैं। कई शोधकर्ताओं ने दिसंबर 2011 के शीर्ष मूल्य के बाद निजी निवेश की समस्याओं के बारे में हालिया वर्षों में लिखा है और बदले हुए हालात के बारे में ज्ञान का पूरा विकास हो चुका है। इन दीर्घकालिक मुद्दों के अतिरिक्त वित्तीय एवं गैर-वित्तीय फर्मों के लिए समाधान प्रारूप पर तात्कालिक दबाव है। तनावग्रस्त फर्मों के कर्ज समाधान से स्लेट का साफ कर सतत वृद्धि के लिए हालात पैदा करने में मदद मिलेगी ताकि हम समग्र बैलेंस शीट के बड़े हिस्से को स्वस्थ फर्मों में वापस ला सकें।


(लेखक स्वतंत्र आर्थिक विश्लेषक हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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बदलाव के संकेत (बिजनेस स्टैंडर्ड)

तीसरी तिमाही में अब तक घोषित 284 सूचीबद्ध कंपनियों के नतीजे कारोबारी जगत के प्रदर्शन को लेकर उत्साहित करने वाली तस्वीर पेश कर रहे हैं। सुधार की प्रक्रिया मजबूत हो रही है और इसमें नए क्षेत्रों की हिस्सेदारी बढ़ रही है। हालांकि कारोबारी मांग अभी भी अस्थिर है। अक्टूबर-दिसंबर 2019 की तुलना में इस अवधि में शुद्ध बिक्री में कोई खास बदलाव नहीं आया है लेकिन कम ब्याज लागत और कच्चे माल के कारण परिचालन लाभ 33 फीसदी बढ़ा है। कर पूर्व लाभ 88 फीसदी बढ़ा और कर पश्चात मुनाफा 93 फीसदी। बहरहाल बैंक, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों और रिफाइनरी जैसे अस्थिर क्षेत्रों को बाहर कर दिया जाए तो भी शेष कंपनियों की शुद्ध बिक्री 9.8 फीसदी बढ़ी है। जबकि परिचालन मुनाफा लगभग पहले जैसा रहा। कर पूर्व और कर पश्चात लाभ क्रमश: 51.5 और 50.1 फीसदी बढ़ा। कम आधार प्रभाव के बावजूद यह बेहतर है।

बैंकों को बाहर रखना समझदारी भरा है क्योंकि मुनाफे में उतार-चढ़ाव रह सकता है। यह बात 13 बैंकों के प्रादर्श के लिए खासतौर पर सही है। ऐक्सिस बैंक के कर पश्चात लाभ में कमी आई है जबकि येस बैंक और यूको बैंक 2019-20 के अतिशय नुकसान से बाहर आ चुके हैं। येस बैंक ने इस तिमाही में 147 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्शाया है जबकि एक वर्ष पहले वह 18,564 करोड़ रुपये के घाटे में था। यूको बैंक ने 35 करोड़ रुपये का लाभ कमाया जबकि गत वर्ष समान अवधि में वह 960 करोड़ रुपये के घाटे में था। बैकों को फंसे ऋण की रिपोर्टिंग के सहज मानकों से भी लाभ हुआ है और 7.8 फीसदी के साथ ऋण वृद्धि धीमी है। दूसरे क्षेत्रों की बात करें तो वाहनों के सहायक क्षेत्र में सुधार हुआ है। अब तक नतीजे घोषित करने वाली इकलौती बड़ी कंपनी बजाज ऑटो ने 29 फीसदी का कर पश्चात लाभ अर्जित किया है। पूंजीगत वस्तुओं की बिक्री 34 प्रतिशत बढ़ी है। रोजगार के क्षेत्र में अहमियत रखने वाले, वस्त्र क्षेत्र की 14 कंपनियों की बिक्री में 12 फीसदी और कर पश्चात लाभ में 200 फीसदी इजाफा हुआ।


सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के प्रदर्शन में स्थिरता जारी है। 26 सूचीबद्ध कंपनियों की बिक्री में 6.9 फीसदी और कर पश्चात लाभ में 17 फीसदी इजाफा हुआ है। इनमें अधिकांश बड़ी कंपनियां शामिल हैं। औषधि उद्योग की बिक्री 12 फीसदी और कर पश्चात लाभ 18.5 फीसदी बढ़ा है लेकिन किसी बड़ी कंपनी ने अब तक नतीजे घोषित नहीं किए हैं। दैनिक उपयोग की उपभोक्ता वस्तु कंपनियों में हिंदुस्तान यूनिलीवर और मैरिको जैसी दो ही बड़ी कंपनियों ने नतीजे घोषित किए हैं। हिंदुस्तान यूनिलीवर के कर पश्चात लाभ में 19 फीसदी और बिक्री में 20 फीसदी का सुधार हुआ है। सीमेंट, इस्पात और गैर लौह धातुओं के नतीजे भी बहुत अच्छे हैं। नतीजे घोषित करने वाली पांच सीमेंट कंपनियों की बिक्री 15.9 फीसदी और मुनाफा 130 फीसदी बढ़ा। इस्पात क्षेत्र की 16 कंपनियों को पिछले वर्ष समान अवधि में जहां 533 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था, वहीं इस वर्ष उन्हें 7,000 करोड़ रुपये का लाभ हुआ है। उनकी बिक्री 22 फीसदी बढ़ी है। गैर लौह धातुओं की बिक्री 25.5 फीसदी और कर पश्चात लाभ 34.7 फीसदी बढ़ा है। निश्चित रूप से चिंतित करने वाले कुछ संकेत भी हैं। उनमें पहला है अन्य आय में 23.6 फीसदी का इजाफा जो शायद स्थायी न हो। ऐसा एक अन्य संकेत जिंस चक्र में आए बदलाव में निहित है। यह बदलाव वैश्विक रुझानों की प्रतिक्रिया स्वरूप है और तेल शोधन क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। कुल मिलाकर अभी शुरुआती दिन हैं और आमतौर पर कमजोर प्रदर्शन वाली कंपनियां आखिरी दिनों में नतीजे घोषित करती हैं। चाहे जो भी हो शुरुआती संकेत तो कारोबारी जगत में सकारात्मक बदलाव के ही हैं।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Wednesday, January 27, 2021

बैंकिंग : बीता कल, आज और आने वाला कल (बिजनेस स्टैंडर्ड)

तमाल बंद्योपाध्याय 

वर्ष 2021 में आगे बढऩे से पहले हम पीछे मुड़कर यह देखते हैं कि इस शताब्दी के पहले दो दशक के दौरान भारत में बैंकिंग का विकास कैसा रहा है और आगे क्या उम्मीद की जाए। पहले दो दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि और महंगाई के स्तर से संदर्भ तय होना चाहिए। स्थिर कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पहले दशक में 6.28 फीसदी और दूसरे दशक में 6.66 फीसदी सालाना औसत दर से बढ़ा है। पहले दशक में औसत महंगाई 5.4 फीसदी थी, जो दूसरे दशक में बढ़कर 6.30 फीसदी पर पहुंच गई। भारतीय रिजर्व बैंक ने पहले दशक में अपनी दरों के फैसलों के लिए थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई को अपनाया। लेकिन जनवरी 2012 से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक या खुदरा महंगाई पर ध्यान दिया जाने लगा। मैं आकलनों के लिए कैलेंडर वर्ष का इस्तेमाल कर रहा हूं। अंतिम तिमाही के जीडीपी को शामिल नहीं किया गया है।

दिसंबर 2000 मे बैंकिंग प्रणाली की जमा राशि करीब 9.33 लाख करोड़ रुपये थी। इस समय कम से कम छह बैंकों का कुल जमा में बड़ा हिस्सा है। इस मामले में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) सबसे आगे है। दिसंबर 2010 तक उद्योग की जमाएं पांच गुना बढ़कर 48 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गईं। पिछले दशक के अंत तक यह बढ़कर 144.8 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच चुकी थीं, लेकिन वृद्धि दर में गिरावट आई है।


बैंकिंग प्रणाली के ऋण दिसंबर 2000 तक 4.98 लाख करोड़ रुपये थे, जो दिसंबर 2020 में बढ़कर 36.4 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गए। अब यह 105 लाख करोड़ रुपये से मामूली अधिक है। सदी के पहले दशक में बैंक जमाओं की चक्रवृद्धि सालाना वृद्धि दर 17.8 फीसदी थी, जो पिछले दशक में लुढ़ककर 11.7 फीसदी पर आ गई। इस अवधि के दौरान बैंक ऋण में गिरावट 22 फीसदी से फिसलकर 11.2 फीसदी पर आ गई।


ऐसा क्यों हुआ? फंसे ऋण (एनपीए) में लगातार बढ़ोतरी से। जब फंसे ऋण बढ़ते हैं तो बैंकों को इसके लिए अलग से धनराशि रखनी पड़ती है, जिससे उनकी पूंजी घटती है। अगर उनके पास पूंजी नहीं है तो वे ऋण नहीं दे सकते हैं। आरबीआई ने अधिक फंसे ऋण और अपर्याप्त पूंजी के कारण पिछले दशक में 11 बैंकों के नए ऋण देने पर रोक लगा दी थी। बैंकिंग प्रणाली का सकल एनपीए वित्त वर्ष 1994 में 19.5 फीसदी था, जो वर्ष 2001 में घटकर 11.4 फीसदी पर आ गया। वर्ष 2006 तक यह घटकर 3.3 फीसदी रह गया और अगले चार वर्षों यानी पहले दशक के अंत तक यह 2.2 फीसदी से 2.5 फीसदी के बीच बना रहा। लेकिन वर्ष 2013 तक एनपीए तीन फीसदी से आगे निकल गया और आरबीआई के 2015 में आस्ति गुणवत्ता समीक्षा करने के बाद वर्ष 2018 में 11.2 फीसदी पर पहुंच गया। आरबीआई की इस समीक्षा से बैंकों को अपने ऋण खातों को साफ-सुथरा बनाना पड़ा। वर्ष 2020 तक सकल एनपीए घटकर 8.5 फीसदी पर आ गया।  


प्रावधान के बाद शुद्ध एनपीए की वक्र रेखा समान है। शुद्ध एनपीए वर्ष 1995 में 10.7 फीसदी था, जो वर्ष 2001 में गिरकर 6.2 फीसदी पर आ गया। वर्ष 2006 से 2010 के बीच यह लगभग एक फीसदी रहा। इसके बाद वर्ष 2014 में बढ़कर दो फीसदी और वर्ष 2018 तक छह फीसदी हो गया। उद्योग के लिए तीन फीसदी शुद्ध एनपीए के साथ दशक समाप्त हुआ। आरबीआई की नीतिगत दर और बाजार दरों की दिशा कैसी रही? वहीं नकद आरक्षी अनुपात (सीआरआर) का स्तर क्या रहा? सीआरआर वर्ष 2001 में 8.25 फीसदी था। यह वर्ष 2003 में घटकर 4.5 फीसदी हो गया। मगर आरबीआई ने ओवरहीट बैंकिंग बाजार को नियंत्रित करने के लिए अगस्त, 2008 में सीआरआर बढ़ाकर 8.5 फीसदी कर दिया। लीमन ब्रदर्स होल्डिंग्स इंक के दिवालिया होने के बाद सीआरआर फिर से घटने लगा। यह इस समय तीन फीसदी है, जो उसका अब तक का सबसे निचला स्तर है। रीपो दर वर्ष 2001 में नौ फीसदी थी, जो वर्ष 2009 में 4.75 फीसदी तक गिरने के बाद पहले दशक के अंत में 6.25 फीसदी रही।  यह इस समय चार फीसदी के रिकॉर्ड निचले स्तर पर है।


बाजार दरों में दूसरे दशक के दौरान पहले दशक की तुलना में ज्यादा उतार-चढ़ाव रहा है। 91 दिन के ट्रेजरी बिल पर प्रतिफल पहले दशक में 3.15 फीसदी (सितंबर 2009) से 9.36 फीसदी (जुलाई 2008) के बीच रहा है। इसकी तुलना में दूसरे दशक में प्रतिफल 2.93 फीसदी (नवंबर 2020) से 12.02 फीसदी (अगस्त 2013) के बीच रहा। लंबी अवधि के प्रतिफल में पहले दशक के दौरान ज्यादा उतार-चढ़ाव रहा। 10 साल के ट्रेजरी बिलों पर प्रतिफल जनवरी 2001 में 10.91 फीसदी था, जो अक्टूबर 2003 में रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। पिछले दशक में इसका सबसे निचला स्तर मई 2020 में (5.72 फीसदी) और सबसे ऊंचा स्तर (9.47 फीसदी) अगस्त 2013 में रहा।


 जून 2000 में 65,340 बैंक शाखाएं थीं। यह आंकड़ा 2010 तक बढ़कर 92,335 और फिर 1,58,262 पर पहुंच गया। मार्च 2011 और मार्च 2020 के बीच एटीएम नेटवर्क 99,523 से बढ़कर 1,08,818 पर पहुंच गया।


पहले दशक की तरह दूसरे दशक में भी दो नए यूनिवर्सल बैंकों का जन्म हुआ। बैंकिंग क्षेत्र में दो तरह के नए बैंक- लघु वित्त बैंक और भुगतान बैंक आए हैं। हमारे यहां लगातार अत्यधिक नियंत्रित वित्तीय प्रणाली बनी हुई है, लेकिन प्रधानमंत्री जन धन योजना की बदौलत बैंकों की पहुंच में अहम बढ़ोतरी हुई है। प्रधानमंत्री जन धन योजना विश्व की सबसे महत्त्वाकांक्षी वित्तीय समावेशन पहल है, जिसे अगस्त 2014 में शुरू किया गया था। दिसंबर 2020 के मध्य तक इस योजना के तहत 41.2 करोड़ खाते खोले गए और 30.6 करोड़ डेबिट कार्ड जारी किए गए।


नए दशक में उपभोक्ताओं के लिए बहुत से विकल्प होने से बैंकिंग उद्योग को डिजिटल बनने या अपना वजूद खत्म करने में से किसी एक विकल्प को चुनना होगा।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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राजकोषीय उत्तरदायित्व का राजनीतिक अर्थशास्त्र (बिजनेस स्टैंडर्ड)

रथिन रॉय  

लंबे समय से राजकोषीय विवेक के पक्षधर रहे अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) भी अब विस्तारपरक राजकोषीय नीतियों की वकालत करने लगे हैं। कुछ टिप्पणीकार इसे राजकोषीय नियमों एवं राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून के खिलाफ पेश एक दलील के रूप में देखते हैं। वे अनजाने में ही बहुपक्षीय संस्थाओं द्वारा विकसित दो गलत युग्मों के फेर में फंस गए हैं जो उन्हें राजकोषीय नीति पर असर डालने में कुकी कटर जैसे साधारण काम की छूट देते हैं। ये दोहरे कारक है: (1) सरकारी ऋण को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक अनुपात के रूप में लगातार नहीं बढऩा चाहिए। अगर ऋण संवहनीयता विश्लेषण से पता चलता है तो सरकारों को राजकोषीय घाटे में कमी कर उधारी में कटौती करनी चाहिए। (2) सरकारों को 'कारोबारी चक्र' नीचे की ओर होने पर अधिक उधारी एवं अधिक खर्च करना चाहिए जबकि चक्र ऊपर होने पर उधारी एवं खर्च कम होना चाहिए।

कई सरकारें अपनी उधारी को परिभाषित करने वाले नियमों का एक मसौदा पेश करने को सही ठहराने के लिए इन युग्मकों को अपनाती रही हैं। भारत की प्रतिक्रिया अधिक सूझबूझ वाली रही है लेकिन इससे इनकार नहीं है कि राजकोषीय शिकारियों ने एक राजकोषीय उत्तरदायित्व ढांचे की वकालत करने में 'संवहनीयता' एवं 'आवर्ती-प्रतिकूलता' को प्रमुख प्रेरक के तौर पर पेश किया है। मैंने 13वें वित्त आयोग के आर्थिक सलाहकार एवं 2016 में गठित राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन समिति के सदस्य के तौर पर इसे खुद भी महसूस किया है। दोनों जगह उदारता दिखाते हुए मुझे राजकोषीय उत्तरदायित्व प्रारूप की वकालत के लिए एकदम अलग कारण पेश करने दिया गया। लेकिन इनसे राजकोषीय उत्तरदायित्व का रोडमैप परिभाषित नहीं हुआ, सिर्फ उसकी रूपरेखा तय हो सकी। यह खाका ऋण संवहनीयता एवं आवर्ती-प्रतिकूल व्यवहार की प्रमुख चिंताओं के साथ बनाया गया था।


सरकार की करारोपण, उधार लेने एवं खर्च करने की शक्तियों पर नियंत्रण एवं संतुलन रखने का मेरा पक्ष तीन तर्कों पर आधारित है। पहले एवं सबसे अहम तर्क को थोड़ा गलत समझा गया है। सेना एवं पुलिस की तरह राजकोषीय नीति भी राज्य की बाध्यकारी शक्ति का ही एक साधन है। आप पर कर न जमा करने के लिए जुर्माना लगाया जा सकता है, छापा मारा जा सकता है और जेल भी भेजा जा सकता है। इस तरह सरकार अगर वह उधार लेना चाहे तो उसका घरेलू बचत पर पहला दावा बनता है। लेकिन सरकार को इस निर्णय पर संसदीय अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती है कि वह क्या खर्च करे? व्यय के ऐसे फैसलों की गुणवत्ता एवं परिणाम करारोपण एवं उधार लेने की उसकी क्षमता पर कोई बंदिश नहीं लगाते हैं। यह एक अहम पहलू है जिसे नियंत्रण एवं संतुलन की एक व्यवस्था की दरकार है। इस तरह सैन्य नीति के बारे में सही बात राजकोषीय नीति के लिए भी सही है क्योंकि दोनों में ही संप्रभु की बाध्यकारी शक्ति का इस्तेमाल होता है। इस बाध्यकारी शक्ति के इस्तेमाल के पीछे का मकसद और सार्वजनिक हित ही इसके दुरुपयोग पर नियंत्रण एवं संतुलन साधते हैं। ऐसा नहीं होने पर नियमों एवं प्रक्रियाओं के एक ढांचे की जरूरत पड़ती है जो प्रभावी क्रियान्वयन के लिए साधन के तौर पर काम करे।


दूसरा तर्क यह है कि राजकोषीय पसंद अहम बातों खासकर असमानता पर असर डालती हैं। जब एक सरकार घरेलू स्तर पर उधारी जुटाती है तो वह बचत करने वाले लोगों से ही उधार लेती है। आप जितने अधिक धनी होंगे, उतना ही अधिक आप बचत करेंगे। जब उधार ली गई राशि को ढांचागत आधार तैयार करने में खर्च किया जाता है तो बचतकर्ता इस आधारभूत ढांचे से लाभान्वित होता है और इस ढांचे के निर्माण को वित्त मुहैया कराने के एवज में उसे ब्याज भी दिया जाता है। लेकिन उस समय यह सच नहीं होता है जब ढांचे के लिए वित्त का इंतजाम करारोपण या उपयोग शुल्क के जरिये किया जाता है। जब सरकारें विनिवेश करती हैं तो वे निवेश कर सकने वाले लोगों के ही दम पर ऐसा कर पाती हैं जो अमीर लोग ही होते हैं।


इस तरह उधारी एवं विनिवेश से असमानता बढ़ सकती है। इसकी भरपाई इस आकलन के जरिये की जा सकती है कि उधार लिए गए पैसे को किस पर खर्च किया जा रहा है? संभव है कि शुद्ध लाभ सकारात्मक होंगे लेकिन इसके लिए सरकारी व्यय के संयोजन एवं असरकारिता के आकलन की जरूरत है। अगर सरकार सिर्फ उपभोग खर्च को फंड करने के लिए उधार ले रही है तो इसे सही ठहरा पाना मुश्किल है। उधारी प्रक्रिया से बाहर रखे गए गरीबों को सब्सिडी देने का मतलब है कि अमीरों को सब्सिडी के लिए ही भुगतान किया जाता है। लेकिन ऐसी बात नहीं है क्योंकि सब्सिडी का इंतजाम कर राजस्व से किया जाता है।


उधार लेना या तो कर न लगाने का एक विकल्प है या फिर राज्य का आकार बढ़ाने का एक फैसला है। यह बचतकर्ताओं एवं परिसंपत्ति-धारकों को अपने संसाधनों के इस्तेमाल के लिए भुगतान कर किया जाता है। इन विकल्पों का इस्तेमाल नियंत्रण एवं संतुलन की एक व्यवस्था के जरिये क्रियान्वित किया जाना चाहिए जो परिचालन नियमों में परिवर्तित होता है। मसलन, 'सुनहरा नियम' कहता है कि सरकारों को उपभोग व्यय के लिए वित्त का इंतजाम राजस्व प्राप्तियों से करना चाहिए और सिर्फ निवेश के लिए ही उधार लेना चाहिए।


तीसरा कारण उस समय खास अहम हो जाता है जब सूचना का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया जाने लगता है। अमेरिका में घटित घटनाएं दिखाती हैं कि यह हथियार कितना घातक है और सबसे मजबूत संस्थान भी इसके दुरुपयोग एवं विनाश के लिए कितने जिम्मेदार हैं? जिम्मेदार राजकोषीय नीति के लिए जरूरी है कि राजस्व संग्रह, उधारी एवं व्यय के आकलन एवं पूर्वानुमान के लिए सरकार जिन सूचनाओं का इस्तेमाल करती है वह कितना सटीक एवं समग्र है? भारत में ऐसी सूचना दो साल की देरी से मिलती है। असल में अशुद्ध या अधूरी सूचना के गंभीर नतीजे हो सकते हैं। भारत के मामले में 2019 में भी मैं कह चुका हूं कि गैर-बजट उधारी के लिए गलत सूचना एवं तरीके के इस्तेमाल ने एक राजकोषीय संकट पैदा होने का भ्रम रचा जिससे सरकार महामारी के विनाशकारी प्रभावों से निपटने के लिए बेहद जरूरी होने पर भी विस्तारित राजकोषीय नीति का इस्तेमाल ठीक से नहीं कर पाई। तमाम बाध्यकारी साधनों की मदद से भ्रामक सूचना राजकोषीय स्थिति के बारे में एक अनचाही गुलाबी तस्वीर पेश कर सकती है और अपरिहार्य रूप से इसके बुरे नतीजे होंगे। पुलिस ज्यादती, सैन्य अभियानों की नाकामी और राजकोषीय तनाव में बढ़ोतरी होती है जब सूचना का अक्षम या भ्रामक इस्तेमाल होता है।


अर्थव्यवस्था को एक राजकोषीय योजना की जरूरत है और इसके लिए एक राजकोषीय जवाबदेही मसौदा चाहिए। एफआरबीएम का एक वाजिब मसौदा वित्त मंत्रियों के लिए महत्त्वपूर्ण है। इसके साथ ही मितव्ययिता एवं विस्तार जैसे निष्फल युग्मों का अनुकरण नहीं करना चाहिए। लेकिन नीति तैयार करने एवं क्रियान्वयन के लिए एक सांगठनिक ढांचा भी हो जिसका जोर 'कितना खर्च' के बजाय 'क्या खर्च हो रहा है' पर हो। आम चीज की तलाश में लगे किसी अकाउंटेंट या बहुपक्षीय एजेंसी के लिए नहीं लेकिन एक नीति-निर्माता के लिए यही तरीका है।


(लेखक ओडीआई, लंदन के प्रबंध निदेशक हैं। लेख में विचार व्यक्तिगत हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कमजोर होता वैश्विक कद (बिजनेस स्टैंडर्ड)

गणतंत्र दिवस के अवसर पर होने वाली टै्रक्टर रैली को लेकर उपजे उत्साह के दौरान इससे जुड़ी विडंबना पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ट्रैक्टर रैली का आयोजन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों ने किया है। दरअसल यह भी उन तमाम रियायतों में से एक है जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने संविधान से ली हैं। जिस तरह बिना बहस या मशविरे के तीन कृषि कानूनों को जल्दबाजी में पारित किया गया उसे देखकर यह तो नहीं कहा जा सकता है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐसा ही सोचा होगा। यह कार्यशैली सरकार की उस अवमानना को ही दर्शाती है जो इंदिरा गांधी द्वारा सन 1975 में किए गए दुर्भाग्यपूर्ण प्रयासों के बाद सांविधानिक प्रावधानों के प्रति नजर आ रही है। यह ध्यान देने वाली बात है कि संसदीय समितियों को भेजे जाने वाले विधेयकों की तादाद में उल्लेखनीय कमी आई है। पंद्रहवीं लोकसभा में ऐसे 68 विधेयक थे जो 16वीं लोकसभा में 24 हैं। सन 2020 में एक भी विधेयक संसदीय समितियों के समक्ष नहीं भेजा गया। इसके बावजूद बीते दो वर्षों में ऐसे कानून पारित किए गए जो काफी महत्त्वपूर्ण हैं। उदाहरण के लिए संविधान के अनुच्छेद 370 का खात्मा। इस कानून को बिना प्रभावितों यानी कश्मीरी लोगों से कोई सलाह-मशविरा किए आनन-फानन में पारित किया गया। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर भी इसका उदाहरण है जो लाखों लोगों को नागरिकता से वंचित कर सकता है।


कार्यपालिका और न्यायपालिका दो अन्य ऐसे संस्थान हैं जिनसे आशा की जाती है कि वे संविधान की रक्षा करेंगे लेकिन उनकी भूमिका भी काफी कमजोर नजर आई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है कि कार्यपालिका ने अध्यादेशों के जरिये शासन का रास्ता चुना। अध्यादेश वे अस्थायी कानून हैं जो संसद का सत्र न चलने की स्थिति में पारित किए जाते हैं। ये कार्यपालिका को महामारी या अन्य आपातकालीन परिस्थितियों में शीघ्रकदम उठाने की सुविधा देते हैं। सभी सरकारें कभी न कभी अध्यादेश का इस्तेमाल करती हैं लेकिन इस सरकार ने इनका इस्तेमाल कुछ ज्यादा ही किया है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में औसतन हर वर्ष 10 अध्यादेश पेश किए गए जो संप्रग के पहले और दूसरे कार्यकाल के औसतन 7.2 अध्यादेश प्रतिवर्ष से बहुत अधिक है।


संसद में भारी बहुमत के कारण हासिल यह असीमित कार्यकारी शक्ति  सुरक्षा बलों की ताकत में भी घर कर गई है। इस बात को इस बात से समझा जा सकता है कि भीमा-कोरेगांव मामले में मामूली प्रमाणों के आधार पर सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों को बिना जमानत के लंबे समय से जेल में डाल रखा गया है। मुस्लिम कॉमेडियन मुनव्वर फारुखी को ऐसे हिंदू विरोधी चुटकुलों के लिए जेल में बंद किया गया है जो उन्होंने सुनाए भी नहीं। किसी को भविष्य में होने वाले संभावित अपराध के लिए जेल में बंद करना कानून का सरासर उल्लंघन है। फारुखी एक उदाहरण है, केंद्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद हजारों लोगों को अवैध तरीके से बंदी बनाया गया है। उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय जिसके पास एक टीवी एंकर की गिरफ्तारी रोकने का समय था और जिसने कृषि कानूनों के मामले में स्वयं को असामान्य कार्यकारी शक्तियों से लैस कर लिया, उसने इन भारतीय नागरिकों के बंदी प्रत्यक्षीकरण के अधिकार के बचाव के लिए स्वत: संज्ञान नहीं लिया और न ही नागरिकता संशोधन अधिनियम की सांविधानिक स्थिति पर मनन किया।


लंबी अवधि में इस अनुदार राजनीति को सामूहिक संस्थागत समर्थन, स्वतंत्रता के बाद की बहुसांस्कृतिक धर्मनिरपेक्षता पर बनी सहमति को प्रतिस्थापित कर देगी। यह देश के लिए उचित नहीं। इसकी विश्व स्तर पर आलोचना हो रही है और देश का कद छोटा हो रहा है। वह भी ऐसे समय पर जब यह स्पष्ट है भारत कभी आक्रामक शक्ति नहीं बन सकता।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Saturday, January 23, 2021

पुदुच्चेरी की दिलचस्प राजनीति और नारायणसामी की भूमिका (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस 

एक वक्त था जब कांग्रेस नेता और पुदुच्चेरी के वर्तमान मुख्यमंत्री वी नारायणसामी को उनके नारंगी बालों की वजह से बहुत दूर से पहचाना जा सकता था। अब उनकी जगह काले बालों ने ले ली है। हां, गंभीरता दिखाने के लिए बीच-बीच में कुछ भूरे-सफेद बाल भी हैं। बहरहाल, पुदुच्चेरी (और तमिलनाडु) में आगामी अप्रैल-मई में आम चुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों में नारायणसामी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

इस महीने के आरंभ में संकट को टालने के लिए ही नारायणसामी ने अपने कांग्रेस सहयोगियों के साथ खुली सड़क पर सितारों के नीचे रात बिताई। अवसर था पुदुच्चेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का। वही किरण बेदी जिन्हें नारायणसामी दुष्ट आत्मा तक बता चुके हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि कांग्रेस की चुनावी साझेदार द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) इस विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं थी। पार्टी ने केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ कांग्रेस सरकार के बुलाए विधानसभा के विशेष सत्र में भी हिस्सा नहीं लिया। वह यह दबाव बना रही है कि कांग्रेस अपने दम पर अकेले विधानसभा चुनाव लड़े। सत्ताविरोधी माहौल को देखते हुए नारायणसामी चुनावी मुद्दे की तलाश में हैं। किरण बेदी ने शायद उन्हें यह अवसर प्रदान किया है।


अन्य दावेदारों की बात करें तो ए नमशिवायम को सरकार में शामिल कर लिया गया और पूर्व मुख्यमंत्री वी वैद्यलिंगम लोकसभा में चले गए। ऐसे में कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने पार्टी में अपने विरोधियों को शांत कर लिया है लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या है द्रमुक का प्रबंधन करना। यह वह दल है जिसे कांग्रेस अपना सहयोगी मानती है। सन 2016 के विधानसभा चुनाव में इस गठजोड़ को 56 फीसदी मत मिले थे।


परंतु इस बार द्रमुक की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं। द्रमुक सांसद एस जगतरक्षकन, जो पुदुच्चेरी के प्रभारी रहे हैं, उन्होंने पिछले दिनों एक बैठक के बाद कहा कि उनकी पार्टी सभी 30 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और सारी सीटें जीतेगी। उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि वह नाकाम होते हैं तो उसी मंच पर आत्महत्या कर लेंगे। जाहिर है अगर द्रमुक जीतती है तो वह मुख्यमंत्री हो सकते हैं।


मौजूदा विधानसभा में द्रमुक के तीन विधायक हैं जबकि कांग्रेस के 15 विधायक। पड़ोसी राज्य तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (एआईएडीएमके) के पास चार सीटें हैं जबकि कांग्रेस से अलग होकर बनी अखिल भारतीय एनआर कांग्रेस के पास सात सीटें हैं। विधानसभा में 30 सीटे हैं। पुदुच्चेरी में 23, कारैक्काल में 5 तथा माहे और यनम मेंं एक-एक सीट है। ये सभी सीटें बहुत छोटे आकार की हैं जहां कुल मतदाता 15,000 से 30,000 के बीच हैं।


सन 2016 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सभी 30 सीटों पर अपने दम पर लड़ी थी लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। कांग्रेस ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 15 पर जीत हासिल हुई थी। द्रमुक नौ सीटों पर लड़ी और उसे दो पर जीत हासिल हुई। एआईएडीएमके ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे चार पर जीत हासिल हुई। एआईएनआर कांग्रेस ने सभी 30 सीटों पर प्रत्याशी उतारे और आठ पर जीती।


अधिकांश मौकों पर यही देखने को मिला है कि तमिलनाडु में जीतने वाला गठबंधन ही पुदुच्चेरी में जीतता है और परिणाम कमोबेश एक समान होते हैं। परंतु 2016 में यह रुझान उलट गया: हालांकि एआईएडीएमके को तमिलनाडु में जीत मिली और उसने सरकार भी बनाई लेकिन पुदुच्चेरी में कांग्रेस-द्रमुक गठजोड़ सत्ता में आया। इस बार गठबंधन टूटने की कोई वजह नहीं है केवल जगतरक्षकन की महत्त्वाकांक्षा ही आड़े आ रही है।


नारायणसामी पुरानी शैली के कांग्रेसी राजनेता हैं। वह शांत और समझदार हैं। सन 2016 में वह विधानसभा के सदस्य तक नहीं थे लेकिन वह चुने गए और उन्होंने पांच वर्ष तक पार्टी को एकजुट रखा। राजीव गांधी उन्हें पुदुच्चेरी से दिल्ली ले गए थे। वह महज 31 वर्ष की उम्र में राज्य सभा के सदस्य बने। एसएस आहलूवालिया, रत्नाकर पांडेय और सुरेश पचौरी के साथ वह संसद में राजीव के उस दस्ते का हिस्सा थे जिसे शोर मचाने वाला माना जाता था। नरसिंह राव के दौर में वह संसदीय दल के नेता बने। वह पहली बार तब सुर्खियों में आए जब राव के निर्देश पर सन 1996 में उन्होंने संयुक्त मोर्चा सरकार को कांग्रेस का समर्थन पत्र देने में देरी की। नतीजा यह हुआ कि अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। राव को आशा थी कि वाजपेयी की विफलता के बाद राष्ट्रपति उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे। नारायणसामी उस बड़े खेल में एक छोटा हिस्सा थे।


नारायणसामी की सबसे बड़ी प्रतिभा सतर्कता से पेशकदमी करने की है। उन्हें सभी पसंद करते हैं। उनके जीवन की शुरुआत गुलाम नबी आजाद और ऑस्कर फर्नांडिस जैसे लोगों को रिपोर्ट करने से हुई। अब वह उनसे आगे निकल चुके हैं। अहमद पटेल के साथ उनके बहुत खास रिश्ते थे। जब राहुल गांधी केवल सांसद थे तब नारायणसामी उनके आवास पर नियमित मुलाकात के लिए जाते थे।


हाल ही में सी-वोटर-एबीपी के एक पोल में कहा गया कि पुदुच्चेरी में कांग्रेस की सत्ता में वापसी मुश्किल है। कारण केवल यह नहीं है कि द्रमुक के साथ गठजोड़ टूट रहा है बल्कि राजग की बढ़ती लोकप्रियता भी इसकी वजह है। यहां राजग में भाजपा के साथ एआईएडीएमके और एआईएनआर कांग्रेस भी शामिल हैं। यदि द्रमुक कांग्रेस के साथ गठबंधन से बाहर होती है तो राजग को सत्ता में आने से रोकना मुश्किल नजर आता है। बहरहाल, अभी काफी समय बाकी है और नारायणसामी बालों को रंगीन रखें या काला, उन्हें कमतर नहीं आंका जाना चाहिए।

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ब्रॉडबैंड का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए जरूरी कदम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम पोनप्पा 

गत माह कैबिनेट ने देश भर में वाई-फाई कवरेज का विस्तार करने और ब्रॉडबैंड इंटरनेट की पहुंच और उसका इस्तेमाल बढ़ाने के लिए नीति घोषित की है। इस नीति में उल्लेख किया गया है कि कैसे विशिष्ट प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सार्वजनिक वाई-फाई हॉटस्पॉट नेटवर्क की स्थापना की जा सकती है और ब्रॉडबैंड इंटरनेट को उपयोगकर्ताओं को बेचा जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट में इसे काफी उत्साह के साथ दर्ज किया गया। हालांकि कई बार इसे लेकर भ्रामक रिपोर्टिंग भी की गई। जाहिर है दूरसंचार सेवा प्रदाताओं और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं ने इसका कड़ा विरोध किया है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि ऐसा करना उनके लाइसेंसशुदा अधिकारों का अतिक्रमण होगा। उनकी यह दलील सही प्रतीत होती है कि वे भी ऐसी ही शर्तों पर वाई-फाई हॉटस्पॉट विकसित कर सकते हैं क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में इस बात की अनदेखी कर दी गई है कि उन्होंने पहले ही इन लाइसेंस के लिए भारी धनराशि का भुगतान किया है।


नई नीति के तहत कोई भी व्यक्ति या उद्यम बिना लाइसेंस के सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें सरकार को कोई शुल्क भी नहीं चुकाना पड़ा। अब तक केवल लाइसेंसधारी दूरसंचार कंपनियां और आईएसपी ही ऐसा कर सकते थे और वे इसके लिए बाकायदा लाइसेंस शुल्क चुकाते थे। दूरसंचार कंपनियों को तो स्पेक्ट्रम भी खरीदना होता था। यही कारण है कि बिना सरकारी शुल्क के वाई-फाई सस्ता प्रतीत होता है। नई नीति के कुछ पहलू स्पष्ट नहीं हैं। उदाहरण के लिए मौजूदा कानून इंटरनेट सेवाओं को उपभोक्ताओं को दोबारा बेचने की इजाजत देते हैं या नहीं (पहले इस पर प्रतिबंध था) या फिर यह छोटे कारोबारों के लिए वाणिज्यिक रूप से कैसे व्यवहार्य होगा। दूसरे शब्दों में यदि सस्ती सेल्युलर सेवाओं तक पहुंच सुलभ होगी तो भला कोई भुगतान क्यों करेगा? एक सवाल यह भी है कि क्या रुचि होने पर गूगल, फेसबुक, एमेजॉन आदि विदेशी कंपनियों को यह इजाजत होगी कि वे संचार सेवाओं में निवेश कर सकें। खासतौर पर कॉर्पोरेट और सघन वाणिज्यिक क्षेत्रों में। इसके अलावा क्या रुचि रखने वाली भारतीय कंपनियों को ऐसा करने दिया जाएगा। इन सवालों के जवाब आवश्यक हैं।


सर्वव्यापी ब्रॉडबैंड इंटरनेट की सबसे बड़ी आवश्यकता है उच्च क्षमता वाले विश्वसनीय संचार की। यदि डेटा के प्रवाह की समुचित व्यवस्था नहीं की गई तो इसकी उपलब्धता और पहुंच बहुत सीमित रहेगी। नीतिगत बदलाव का पूरा ध्यान अंतिम उपभोक्ता पर केंद्रित है जबकि हमारी समस्याएं फाइबर कोर या सबनेटवर्क तक विस्तारित हैं। फाइबर से ग्राहक के घर तक या ग्राम पंचायत से गांव तक का मध्यम स्तर का लिंक भी नदारद है। भारतीय दूरसंचार विकास सोसाइटी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश गांव ग्राम पंचायत से 5-10 किलोमीटर के दायरे में हों।


ब्रॉडबैंड पहुंच में सुधार की आवश्यकता को स्वीकार करना होगा। इस दिशा में एक कदम यह हो सकता है कि संचार शृंखला में मौजूद कमियों को दूर किया जाए। इसमें वितरण और तकनीकी क्षेत्र की कमियां भी शामिल हैं। डिजिटल संचार का सबसे बुनियादी तत्त्व है संचार। ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा आपूर्ति की बात करें तो कहां किस तरह की आवश्यकता है, इसे लेकर योजना और क्रियान्वयन में कमी देखने को मिल रही है। ऐसा कुछ हद तक इसलिए है क्योंकि बाजार की अपेक्षा स्वसंगठित तंत्र की है जो हर जगह मौजूद नहीं है।


मध्य मील के लिए वायरलेस सेवाएं काफी करीब हैं क्योंकि स्पेक्ट्रम उपलब्ध है लेकिन भारत में उसकी इजाजत नहीं है। यह वह स्थान है जो प्रमुख नेटवर्क को स्थानीय नेटवर्क से जोड़ता है। ऐसा आंशिक तौर पर इसलिए है क्योंकि कुछ बैंड को अलग-अलग तरीके से बरतने को लेकर विवाद है। उदाहरण के लिए खुला वाई-फाई या दूरसंचार कंपनियों की सीमित पहुंच या प्रसारण या फिर केवल 4जी आदि। दूरसंचार विभाग के मुताबिक केवल लाइसेंस वाले सेवा प्रदाताओं को इन बैंड तक अबाध पहुंच की जरूरत होगी।


दूसरा पहलू विचार और सलाह-मशविरे से संबंधित है क्योंकि यहां मामला नई नीति के साथ विरोधाभास का है और एकदम अलग नीति की मांग करता है। इसके बावजूद यह अहम है क्योंकि ऐसी अहम बुनियादी सेवा में स्थिरता बरकरार रखना आवश्यक है जो जीवन, कामकाज, शिक्षा, मनोरंजन, सरकार और सुरक्षा समेत तमाम पहलुओं को प्रभावित करती है या उनसे संबंध रखती है। इसी प्रकार फिलहाल जब दुनिया महामारी से जूझ रही है और फंसी हुई परिसंपत्ति बड़ी बाधा बनी हुई है तब हमें न्यूनतम उथलपुथल के साथ उपयोग बढ़ाने की जरूरत है। क्या बेहतर नहीं होगा कि दूरसंचार कंपनियों और आईएसपी से सरकारी शुल्क समाप्त कर दिया जाए और इस क्षेत्र के लाइसेंसधारक सेवाप्रदाताओं को भी आगे बढऩे का अवसर दिया जाए? ऐसा इसलिए भी कि उनके पास बाजार में स्थापित पहुंच है, क्षमता है और अनुभव है। इससे जरूरी समय पर स्थिरता कायम रखने में मदद मिलेगी। सेवाप्रदाताओं के पास यह अधिकार है और वे विस्तार के अवसर का भी लाभ उठाना चाहेंगे। लेकिन ऐसा तभी होगा जब उन्हें संसाधन और प्रोत्साहन मिले। संसाधन के रूप में वह राशि काम आ सकती है जो लाइसेंस शुल्क नहीं चुकाने से बचेगी। सभी सरकारी शुल्क और लाइसेंस शुल्क समाप्त कर दिए जाने चाहिए। ऐसे में न केवल सेवा प्रदाता कई शहरी इलाकों में हॉटस्पॉट में निवेश करेंगे बल्कि संचार सेवा उद्योग में नई तेजी भी देखने को मिलेगी।


निष्पक्ष तरीके से देखा जाए तो सेवा प्रदाता पहले ही लाइसेंस शुल्क चुका चुके हैं और वे स्पेक्ट्रम की नीलामी की कीमत भी दे चुके हैं। ऐसे में सरकारी शुल्क इन कंपनियों के राजस्व का 30 फीसदी हो जाता है। उन्हें आयकर अलग से चुकाना होता है। 2जी घोटाले ने इस क्षेत्र की गति पूरी तरह समाप्त कर दी थी क्योंकि कुछ के खिलाफ जुर्माने ने पूरे उद्योग को भयभीत किया। स्पेक्ट्रम महंगा हो गया और उपकरणों की लागत भी बढ़ी। इन बातों का असर राजस्व पर पड़ा। परिणामस्वरूप उपभोक्ता कई सुविधाओं से वंचित हैं और उत्पादकता पर असर पड़ा है।


यदि ऐसा हो गया तो संविदा भंग के मामलों का जोखिम भी समाप्त हो जाएगा। हालांकि अतीत से प्रभावी कर की समस्या को समाप्त करना शेष रहेगा। 5जी तथा स्पेक्ट्रम का प्रबंधन करने के लिए भी रुख में व्यापक बदलाव करने होंगे। इन बदलावों के कारण उत्पन्न अंतर जिसे नई नीति कवर करती है, उसके लिए ग्रामीण इलाकों में सामुदायिक वाई-फाई नेटवर्क की आवश्यकता होगी क्योंकि शायद वे वाणिज्यिक रूप से कम आकर्षक हों और सहयोगी व्यवस्था के अभाव में उनका निर्माण और संचालन करना मुश्किल होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार को प्रोत्साहन की जरूरत होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन  

देश की विनिर्माण गाथा की विफलता को लेकर नीति निर्माता चिंतित हैं। आत्मनिर्भर भारत जैसी पहल इसकी अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति है क्योंकि यह मान लिया गया है कि बिना व्यापारिक और शुल्क संबंधी संरक्षण के देश, विनिर्माण क्षेत्र के विकास में सक्षम नहीं है। एक बार इस दिशा में बढऩे के बाद कारोबारी लॉबियां नीतियों को और अधिक संरक्षणवादी बनाने का दबाव बनाने लगेंगी। यह हो भी रहा है। उत्पादन से संबंधित प्रोत्साहन कार्यक्रम के अधीन आने वाली कंपनियां और अधिक केंद्रित लक्ष्यों की मांग कर रही हैं और कह रही हैं कि अधिक तादाद में क्षेत्रों को संरक्षण कार्यक्रम में शामिल किया जाए।


शायद अब यह स्वीकार करने का वक्त आ गया है कि भारत पूर्वी एशियाई देशों की निर्यात आधारित विनिर्माण गाथा को दोहराने नहीं जा रहा। वह शायद बांग्लादेश जैसा प्रदर्शन भी नहीं कर पाए। जैसा कि सन 2012 से हमारा आधिकारिक लक्ष्य भी है, यदि देश विनिर्माण को जीडीपी के बढ़े घटक के रूप में तैयार करता है तो यह घरेलू बाजार पर आधारित होगा और इसकी लागत भी अधिक होगी। वह लागत घरेलू उपभोक्ताओं को वहन करनी होगी जबकि अर्थव्यवस्था प्रमुख कारोबारी समूहों से बाहर रहेगा और निर्यात के मोर्चे पर नुकसान उठाएगा।


इसकी भरपाई सेवा क्षेत्र से होगी। दुनिया भर में सेवा व्यापार तीसरा सबसे बड़ा व्यापार है। भारत में यह अनुपात लगभग दोगुना यानी 60 प्रतिशत है। यदि श्रम निर्यात के कारण देश में आने वाले धन को शामिल किया जाए तो यह शायद और अधिक होगा। यह पूंजी की आवक के बजाय सेवा निर्यात से होने वाली आय है। बीते पांच वर्ष में देश के निर्यात में पारंपरिक सेवा निर्यात की भी अहम हिस्सेदारी रही है। वाणिज्यिक निर्यात की हिस्सेदारी आधी से कम रह गई है। भारत जैसी विकास अवस्था वाली अर्थव्यवस्था के लिए यह अत्यंत विशिष्ट बात होगी। इससे रुपया भी उस स्तर तक बढ़ेगा जहां विनिर्माण निर्यात बहुत महंगा हो जाएगा।


यह पसंद आए या नहीं लेकिन सेवा क्षेत्र मूल्यवद्र्धन का वह क्षेत्र है जिसके सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी तुलनात्मक लाभ तथा अन्य कौशल का लाभ उठाना होगा। देश में स्थित उपक्रम चाहे वे देसी हों या विदेशी उन्हें उनकी तकनीकी सेवा संबंधी विशेषज्ञता के कारण न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था का सेवा केंद्र बनाना होगा बल्कि नए क्षेत्रों मसलन कृत्रिम मेधा और डेटा आदि के रचनात्मक क्षेत्र में भी विशेषज्ञता हासिल करनी होगी। हमें चिप निर्माण के बजाय चिप डिजाइन करना होगा। इस क्षेत्र में अभी ताइवान, अमेरिका और कोरिया का एकाधिकार है। इसी तरह हमें विमान इंजन बनाने के बजाय उसका डिजाइन तैयार करना होगा।


भारत पहले ही उपभोक्ताओं के डिजिटलीकरण की तेज गति के साथ दुनिया को अपनी क्षमता दिखा चुका है। मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट ने इसका उल्लेख सबसे बड़े और तेज बढऩे वालों में किया। प्रति मोबाइल उपभोक्ता औसत डेटा खपत भी चीन से अधिक और कोरिया के समान है। यह जियो जैसी कंपनियों के कारण संभव हुआ क्योंकि उन्होंने सस्ता डेटा दिया। इसके अलावा कम लागत पर तत्काल भुगतान का बुनियादी ढांचा तैयार हुआ और देश में खुदरा डिजिटल भुगतान सालाना 50 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में जहां एक मंच पर एक करोड़ से अधिक उद्यम मौजूद हैं, उसे तकनीकी क्षमता मुहैया कराई गई। 1.2 अरब लोगों के पंजीयन के साथ डिजिटल पहचान व्यवस्था कायम की गई। सरकारी योजनाओं का प्रत्यक्ष लाभ दिलाने के लिए सॉफ्टवेयर पैकेज तैयार किया गया। इन मंचों का इस्तेमाल करके कई कारोबार खड़े किए गए। देश में बड़ी तादाद में यूनिकॉर्न (स्टार्टअप जिनका कारोबार 100 करोड़ डॉलर से अधिक हो) होने की यह भी एक वजह है। मूल्यांकन में उछाल अभी शुरू ही हुआ है क्योंकि निवेशक  पैसा लगा रहे हैं। औद्योगिक संगठन नैसकॉम का कहना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था 10 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है। उसका कहना है कि हर पांचवीं स्टार्टअप वैज्ञानिक या अभियांत्रिकी संबंधी चुनौतियों के हल पर केंद्रित है और यह सबसे तेज विकसित होने वाला हिस्सा है। बड़े उद्यमों को डेटा विश्लेषण मुहैया कराया जा रहा है और पहली स्टार्ट अप विदेशी बाजारों में प्रवेश कर चुकी है। उत्पादकता में व्यापक सुधार हो सकता है। यदि समुचित विपणन नीतियां तैयार की गईं तो कृषि क्षेत्र की आय में भी सुधार हो सकता है। बिचौलियों की कीमत पर उत्पादक का मूल्यवर्धन करके ऐसा किया जा सकता है।


इस मॉडल पर बनी अर्थव्यवस्था में कुशल-अकुशल कर्मियों की तुलना में पेशेवर कामगार बढ़ेंगे। इससे कम शिक्षित तबके को नुकसान होगा क्योंकि उसका जीवन अनिश्चित होगा। संपत्ति अधिक संकेंद्रित होगी। वित्त मंत्री के लिए अंतिम स्तर पर वित्तीय हस्तांतरण अपरिहार्य हो जाएगा। यदि शीर्ष पर संकेंद्रित संपत्ति पर कर नहीं लगाया गया तो यह फंडिंग मुश्किल होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Friday, January 22, 2021

भविष्य की ओर (बिजनेस स्टैंडर्ड)

अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के शपथ-ग्रहण समारोह का विवादों एवं शोर-शराबे से मुक्त होना यह आभास देता है कि दुनिया की इकलौती महाशक्ति में हालात सामान्य होने लगे हैं। दो हफ्ते पहले सत्ता पर कब्जा जमाने की पिछले राष्ट्रपति की कोशिश के मद्देनजर ऐसी सोच भ्रामक हो सकती है। इस नए अमेरिका का सौम्य रूप देश की पहली अश्वेत एवं दक्षिण एशियाई महिला उपराष्ट्रपति के तौर पर कमला हैरिस के शपथ में भी दिखा। नए राष्ट्रपति जोसेफ बाइडन ने खतरे की आशंका के बावजूद शपथग्रहण समारोह परंपरा के अनुरूप खुली जगह पर आयोजित कर स्थिति सामान्य होने का संदेश देने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने अपने जज्बाती भाषण में अमेरिका के समक्ष पेश आने वाली चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने चुनाव नतीजों पर मुहर लगाने के लिए गत 6 जनवरी को बुलाई गई कांग्रेस की बैठक के दौरान 'कैपिटल हिल' पर धावा बोलने की नाकाम कोशिश का परोक्ष जिक्र करते हुए कहा, 'लोकतंत्र जिंदा बच गया है।' भले ही बाइडन या मंच पर मौजूद किसी दूसरे शख्स ने 45वें राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का नाम नहीं लिया लेकिन परंपरा को धता बताते हुए शपथग्रहण समारोह से दूर रहने वाले ट्रंप का साया चारों तरफ नजर आया।


बाइडन ने अपने पूर्ववर्ती की विभाजनकारी विरासत का खुलकर जिक्र  किया। उन्होंने नस्ली इंसाफ को आवाज देने और राजनीतिक अतिवाद, श्वेत श्रेष्ठता एवं घरेलू आतंकवाद को परास्त करने की भी बात कही। उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रमुख चुनावी वादों पर अमल करने की बात भी कही जिनमें पेरिस जलवायु समझौते का फिर से हिस्सा बनना और कम कठोर आव्रजन नीति भी शामिल है। लेकिन उन्होंने अपना एजेंडा महान अमेरिकी स्वप्न के हिस्से के तौर पर पेश करने की कोशिश की जिसे सिर्फ एकजुट देश में ही हासिल किया जा सकता है। उन्होंने एकता की अपील करने के साथ यह कहते हुए असहमति की सीमा भी तय कर दी कि, 'वह लोकतंत्र है। वह अमेरिका है। हमारे गणतंत्र की सुरक्षा दीवारों के भीतर शांतिपूर्ण तरीके से असहमति जताने का अधिकार शायद इस देश की सबसे बड़ी ताकत है।' उन्होंने कोविड-19 संकट से निपटने के ट्रंप के क्रूर तरीकों से भी खुद को अलग करते हुए महामारी में मरे 4 लाख अमेरिकी नागरिकों की याद में कुछ पलों का मौन रखा।


बाइडन ने कार्यकाल के पहले ही दिन 17 कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए। इनमें से कई आदेश एच1बी वीजा समेत आव्रजन, किफायती स्वास्थ्य देखभाल, पर्यावरण, रोजगार एवं अर्थव्यवस्था पर ट्रंप की कट्टर नीतियों को पलटने वाले भी हैं। लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी एवं रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं के बीच समारोह में नजर आई गर्मजोशी एवं हल्के-फुल्के अंदाज को बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। बाइडन का सीनेट में कई दशकों के अपने कार्यकाल के दौरान विरोधी दल के साथ भी बढिय़ा संबंध रहा है लेकिन ट्रंप को रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों में तगड़ा समर्थन हासिल है और 6 जनवरी की निर्णायक मंजूरी के समय यह नजर भी आया था। भले ही डेमोक्रेट सांसदों के पास दोनों सदनों का नियंत्रण है लेकिन प्रतिनिधि सभा में उसे मामूली बढ़त ही हासिल है।


ट्रंप पर महाभियोग सुनवाई करना सीनेट का शुरुआती काम होगा। उसका नतीजा बाइडन के कार्यकाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण की सीमा तय करेगा और वैश्विक राजनीति के लिए भी उसके कई अहम संकेत होंगे। मुख्यत: अमेरिकी अवाम पर केंद्रित अपने उद्घाटन भाषण में बाइडन ने यूरोप एवं एशिया के अपने सहयोगी देशों को भी भरोसा दिलाया। ट्रंप ने अमेरिका को एक गैर-भरोसेमंद सहयोगी के तौर पर पेश करने के साथ ही दुनिया भर में व्हाइट हाउस की साख गिराने वाले तमाम काम किए हैं। इस निचले स्तर से अमेरिका को फिर से महान राष्ट्र बनाने के लिए अमेरिका के सबसे उम्रदराज राष्ट्रपति को बहुत कुछ करना होगा।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कोविड टीकाकरण शुरू होने के बाद न्याय क्षेत्र का परिदृश्य? (बिजनेस स्टैंडर्ड)

एम जे एंटनी  

कोरोनावायरस के कारण जो अनिश्चितता पैदा हुई, उसके चलते महीनों तक अर्थशास्त्रियों, चुनाव नतीजों का पूर्वानुमान जताने वालों और भविष्य बताने वालों को खूब तवज्जो मिली। यह बात तो निश्चित है कि निकट भविष्य में हालात सुधरने वाले नहीं हैं और उनकी मांग बरकरार रहेगी। इस संदर्भ में न्यायपालिका की बात करें तो वह अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहेगी। यह अच्छा होगा या बुरा, वह बाद की बात है। उदाहरण के लिए यह निश्चित है कि तीन महीनों में सर्वोच्च न्यायालय को नया मुख्य न्यायाधीश मिलेगा और शायद एक ऐसा दौर आएगा जहां परेशानियां कम होंगी।


लॉकडाउन के 11 महीने बाद धीरे-धीरे अदालतों में भौतिक रूप से कामकाज आरंभ हो जाएगा। मुंबई और उत्तराखंड जैसे कुछ उच्च न्यायालय पहले ही इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। अधिकांश अदालतों ने आभासी सुनवाई के साथ काम करना सीख लिया है। हालांकि पिछले सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीश सुनवाई में तकनीकी बाधाओं से इतने नाराज हुए कि उन्होंने अपने आदेश में भी इसे दर्ज किया।


गत वर्ष मार्च में लॉकडाउन के बाद विधिक पेशे के एक बड़े तबके और वादियों ने यह पाया कि आभासी अदालतें लाभदायक हैं और उन्हें व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। अधिवक्ता एक ही दिन दुनिया की कई अदालतों में बहस कर सकते हैं और वादियों को समय और पैसा खर्च करके अदालतों में नहीं पहुंचना होता है। ऐसे में एक सुरक्षित पूर्वानुमान यह है कि सामान्य अदालतों के साथ-साथ आभासी अदालतें भी बरकरार रहेंगी।


अदालतों और पंचाटों ने महामारी के दौरान यथास्थिति बरकरार रखने और स्थगन आदेश जैसे अंतरिम आदेश देना जारी रखा। उन्होंने प्रतिबंधात्मक नियमों को भी शिथिल किया था। अब वे धीरे-धीरे मानकों को ऊंचा कर रहे हैं, जैसा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गत सप्ताह किया। दूसरी ओर जिन लोगों को नियमों की शिथिलता का लाभ मिला उनके इर्दगिर्द घेरा अब तंग होगा।


अतीत के प्रदर्शन पर नजर डालें तो यह माना जा सकता है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बजट न्यायपालिका के लिए बहुत मामूली खुशियां लेकर आएगा। न्यायाधीश लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि अदालतों और न्यायालयों का बुनियादी ढांचा फंड की कमी से जूझ रहा है। न्यायपालिका को दशकों से 2 फीसदी की हिस्सेदारी मिल रही है। चूंकि वीडियो कॉन्फ्रेंस और लाइव स्ट्रीमिंग में अधिक निवेश की आवश्यकता है इसलिए हालात का खराब से खराब होना तय है। ऐसे में एक और बात बिल्कुल तय है कि सैकड़ों कैदी बिना जमानत या परीक्षण के जेलों में बंद रहेंगे। देश की जेलों में क्षमता से 14 प्रतिशत अधिक कैदी बंद हैं। हर तीन में से दो कैदी परीक्षणाधीन हैं। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय का वह हालिया आदेश भी फलीभूत नहीं हो पाएगा जिसमें उसने कहा है कि सांसदों और विधायकों (कुल 4,442) के ऊपर चल रहे आपराधिक प्रकरणों को छह महीने में निपटाया जाए। इसके अलावा यह अनुमान भी उचित ही जताया जा सकता है कि लॉकडाउन के महीनों के दौरान सामने नहीं आए मामले अब तेजी से उभरेंगे।


इस बात की काफी संभावना है कि सर्वोच्च न्यायालय में सरकार को जीत मिलने का सिलसिला जारी रहेगा। अयोध्या, आधार, जम्मू कश्मीर में संचार सेवाओं को ठप करना और सेंट्रल विस्टा परियोजना आदि इस बात का संकेत हैं। अनुच्छेद 370 का प्रश्न, चुनावी बॉन्ड और नोटबंदी आदि मामले भी ऐसा ही संकेत देते हैं। देश के इतिहास मेंं इससे पहले कभी न्यायाधीशों से इतने संवेदनशील मामलों का निर्णय करने को नहीं कहा गया। मिसाल के तौर पर कश्मीर (140 याचिकाएं लंबित), नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, आरक्षण में आरक्षण, लव जिहाद आदि इसके उदाहरण हैं। उच्च न्यायालयों के समक्ष सुर्खियों वाले मामलों का पेश होना जारी रहेगा। न्यायिक निर्णयों में मानवाधिकारों को लेकर बातें लंबी होती जाएंगी, हालांकि याचिकाओं में राहत मिलने की आशा कम है।


सरकार को मिलने वाले न्यायिक लाभ ने एक नया रुझान शुरू किया है जिसमें सामान्य लोगों ने न्यायाधीशों के बारे में अपनी राय बनानी शुरू कर दी है। इसका असर न्यायपालिका को लेकर लोगों के मन में बनी पारंपरिक छवि और आदर को नुकसान पहुंचाया है। इससे पहले न्यायाधीशों की आलोचना कानूनविदों और ऐसे टीकाकारों तक सीमित थी जो भाषा के इस्तेमाल में सावधानी बरतते थे। अब तो कार्टून बनाने वाले और ट्विटर पर भी उनकी आलोचना शुरू हो गई है। आने वाले सप्ताह में उनमें से कुछ को न्यायिक अवमानना के लिए न्यायालय में हाजिर भी होना पड़ेगा। आशा करनी चाहिए कि न्यायाधीश और महान्यायवादी हंसी-मजाक को लेकर भी लक्ष्मण रेखा तय करेंगे।


कुल मिलाकर देखा जाए तो देश उच्च न्यायपालिका में बदलाव की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बनने के वरीयता क्रम में शीर्ष पर मौजूद न्यायमूर्ति एन वी रमण ने हाल ही में कहा कि एक न्यायमूर्ति को निर्भीक, साहसी और दबाव का सामना करने में सक्षम होना चाहिए। अब यह उन निर्भर होगा कि वे जनता के मन में बनी गलत धारणाओं को खत्म करें।  जनता चाहती है कि सर्वोच्च न्यायालय एक बार फिर महान बने।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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हकीकत से बेखबर नए कृषि कानून (बिजनेस स्टैंडर्ड)

नितिन देसाई  

कृषि उत्पादों के विपणन से संबंधित नए कानून खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों एवं खुदरा चेन कंपनियों के लिए किसानों से सीधे संपर्क साधना आसान बनाने के मकसद से बनाए गए लगते हैं। आक्रोशित किसान भारी विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ये कानून उनके हित में नहीं हैं। हालांकि कई अर्थशास्त्री इनके समर्थन में खड़े दिखे हैं। उनका मानना है कि मुक्त बाजार-आधारित व्यवस्था होने से कृषि उत्पादों की कीमतें मांग-आपूर्ति संतुलन को बेहतर ढंग से परिलक्षित करेंगी और फसलों के पैटर्न में अधिक तार्किकता आएगी।

लेकिन इस दलील में वितरणकारी आयाम को नजरअंदाज कर दिया गया है। कृषि विपणन प्रणालियां ऐसी होनी चाहिए कि उत्पादक एवं उपभोक्ता दोनों के ही लिए वाजिब कीमतें हों और बिचौलियों को साधारण मुनाफा ही मिले। राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिहाज से भी यह समरूप होना चाहिए। भारतीय संदर्भ में इसकी संभावना नहीं है कि कृषि उत्पादों में मुक्त बाजार होने से ऐसा हो पाएगा। इसकी वजह यह है कि कृषि उत्पादों का बाजार विनिर्मित उत्पादों के बाजार से काफी अलग है।


1.    कृषि बाजारों में विक्रेता लाखों की संख्या में हैं जबकि थोक खरीदारों की संख्या सीमित है। वहीं विनिर्मित उत्पादों के आम बाजार में खरीदारों की संख्या लाखों में है और विक्रेताओं की संख्या सीमित है।


2.    कृषि बाजारों में आपूर्ति फसली मौसम पर काफी निर्भर है जबकि मांग में इस मौसम के हिसाब से फर्क नहीं आता है। ऐसे में भंडारण की क्षमता रखने वाले बड़े खरीदारों को बढ़त मिल जाती है क्योंकि उनके पास अधिक खरीद के लिए वित्तीय संसाधन भी होते हैं।


3.    कृषि उत्पादों की मांग के वक्र में लोच नहीं होती है और इसमें तीखी ढलान भी होती है, लिहाजा बंपर फसल होने पर कीमतें तेजी से गिरती हैं। वहीं फसल कम होने पर मांग रहने से इनकी कीमतों में तेजी से उछाल भी आती है।


मांग एवं आपूर्ति के इस मौसमी पहलू में असंतुलन के चलते कृषि उत्पादों खासकर जल्दी खराब होने वाले खाद्य उत्पादों की कीमतों में साल भर में बड़ी उठापटक होती है। मार्च 2020 से पहले के 10 वर्षों के मासिक औसत पर नजर डालें तो उफान एवं गर्त के बीच मूल्य अंतर दिखाई देता है। सब्जियों के मामले में यह अंतर 23 फीसदी है और टमाटर, प्याज एवं आलू की कीमतों में यह फर्क क्रमश: 65.6 फीसदी, 40.4 फीसदी और 35.6 फीसदी तक देखने को मिला है। (स्रोत: भारत के प्रमुख आर्थिक संकेतकों में सीजन का असर, आरबीआई बुलेटिन, दिसंबर 2020)।


किसानों एवं थोक खरीदारों की बाजार ताकत में असंतुलन एक उपभोक्ता के चुकाए हुए मूल्य एवं उत्पादक को मिलने वाली कीमत के बीच के बड़े फासले से साफ नजर आता है। आरबीआई के सर्वे में यह फर्क 28 फीसदी से लेकर 78 फीसदी तक दिखा है। कृषि बाजारों में हस्तक्षेप न केवल विक्रेताओं बल्कि उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षित करने के लिए भी जरूरी है। (भारत में आपूर्ति शृंखला गतिकी एवं खाद्य मुद्रास्फीति, आरबीआई बुलेटिन, अक्टूबर 2019)।


मुक्त बाजारों से इतर देखें तो बुनियादी तौर पर हरेक कृषि उत्पाद बाजार के लिए तीन विकल्प मौजूद हैं...


- थोक खरीद एवं वितरण में सार्वजनिक क्षेत्र की सीधी एवं बड़ी भागीदारी


- निजी क्षेत्र के थोक विक्रेताओं एवं वितरकों पर निर्भरता के साथ ही जरूरी होने पर सार्वजनिक इकाइयां बाजार निगरानी एवं हस्तक्षेप भी करें। और


- किसानों की सहकारी समितियों या उत्पादक कंपनियों को उपभोक्ता तक वैल्यू चेन में हिस्सेदारी मिले।


वर्तमान में कृषि उत्पादों की सार्वजनिक खरीद कमोबेश धान एवं गेहूं तक ही सीमित है जो फसली उपज के कुल मूल्य का महज 23 फीसदी ही है। इसमें बड़ा हिस्सा पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश का है। हालांकि विकेंद्रीकरण की कोशिश से थोड़ा लाभ हुआ है और धान की सरकारी खरीद में ओडिशा, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ का भी हिस्सा बढ़ा है। विकेंद्रीकरण के सिद्धांत का विस्तार करते हुए गारंटी कीमत पर फसलों की खरीद में राज्यों को मदद देना भी विकल्प हो सकता है।


निजी खरीद पहले से ही खाद्य तेल, फल एवं सब्जियां, मसाले और कपास जैसी कई कृषि जिंसों की विपणन का प्रमुख जरिया बनी हुई है। यहां पर असली जरूरत कीमतों की बड़ी उठापटक वाले बाजारों में संगठित एवं नियमित दखल देने की है। आलू, प्याज एवं टमाटर जैसे उत्पादों के बाजार में तो यह बेहद जरूरी है।


न तो सार्वजनिक और न ही निजी खरीद का विकल्प किसानों को उपभोक्ता तक पहुंचने वाली वैल्यू चेन में हिस्सेदारी देता है। इस काम को केवल सहकारी समितियों एवं किसान उत्पादन कंपनियों के माध्यम से ही अंजाम दिया जा सकता है। यह तीसरा तरीका कृषि क्षेत्र का सबसे जरूरी काम पूरा कर सकता है जो कि किसानों को प्रमुख अनाजों के बजाय अधिक मूल्य वाली फसलों की खेती की तरफ प्रोत्साहित करने का है। देश में इन फसलों की मांग तेजी से बढ़ रही है।


दुग्ध सहकारी समितियों की भारतीय व्यवस्था इस तीसरे तरीके का बेहतरीन उदाहरण है। यह तीन स्तरों- खरीद के लिए ग्रामीण स्तरीय सहकारी समितियां, प्रसंस्करण के लिए जिला स्तरीय दुग्धपालक संगठन और दूध एवं दुग्ध उत्पादों के विपणन के लिए राज्य स्तरीय महासंघ पर काम करता है। यह ढांचा किसानों को समूची मूल्य शृंखला में हिस्सेदारी देता है। इसकी जड़ें गुजरात में खेडा के किसानों और एक एकाधिकारवादी निजी कंपनी के बीच 1940 के दशक में कीमतों को हुए टकराव में निहित हैं।


आज भारत दुनिया में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बन चुका है और डेरी क्षेत्र के कुल उत्पादन का मूल्य चावल एवं गेहूं के सम्मिलित मूल्य से करीब 50 फीसदी अधिक है। दूध की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन उपलब्धता 1968-69 के 112 ग्राम से बढ़कर 2018-19 में 394 ग्राम तक पहुंच चुकी है। दूध एवं दुग्ध उत्पादों का बाजार स्थिर है जो बदलते मौसम के साथ कीमतों में पडऩे वाले महज 0.6 फीसदी फर्क से जाहिर भी होता है। दुग्ध सहकारी समितियां एवं उनके राज्य स्तरीय महासंघ (गुजरात का अमूल एक स्थापित ब्रांड बन चुका है) आज बाजार के अगुआ हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तुलना में प्रसंस्कृत दुग्ध उत्पादों के बाजार की बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं।


भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए कोई भी एक विकल्प आदर्श नहीं हो सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र की खरीद करने वाली एजेंसियां, निजी क्षेत्र के थोक विक्रेता खरीदार और सहकारी एवं किसान उत्पादक कंपनियों तीनों की ही जरूरत है। सार्वजनिक खरीद व्यवस्था फसली पैटर्न में बदलाव या तकनीकी उन्नति के मकसद से हरेक राज्य में कीमत की गारंटी देने के लिए अलग-अलग रूपों में चलाई जा सकती है। जल्द खराब होने वाले उत्पादों के लिए सहकारी समितियों या किसान उत्पादक कंपनियों को बढ़ावा दिया जा सकता है ताकि प्रसंस्करण कर कचरे को कम किया जा सके। निजी थोक विक्रेता अभी की तरह बाकी क्षेत्रों में काम जारी रख सकते हैं।


तीनों विकल्पों की प्रासंगिकता का मतलब है कि केंद्र को यह मानना होगा कि कृषि उत्पादों के विपणन का तरीका संविधान एवं व्यावहारिक कारणों से राज्यों पर ही छोड़ देना चाहिए। भारत में कृषि अर्थशास्त्र की विविधताओं को ध्यान में रखते हुए ऐसा करना जरूरी भी है।


केंद्र कृषि उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधी नीति के मामले में प्रभावी भूमिका निभा सकता है। हालांकि इस मामले में उसका अब तक का प्रदर्शन बहुत उत्साह नहीं जगाता है। वह कई बार निर्यात पाबंदियों में ढील देने या आयात को मंजूरी देने में गलती कर जाता है। कृषि उत्पादों में मुक्त व्यापार बंदिशों वाले मौजूदा वैश्विक परिवेश में मुमकिन नहीं दिखता है। लेकिन ऐसी नीति संभव है जो कृषि उत्पाद निर्यात के लिए मुक्त व्यापार की इजाजत दे और केवल अपवाद रूप में ही बंदिशें लगाए।


भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की विविधता दर्शाने वाली और छोटे किसानों एवं कम आय वाले उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते वाली कृषि विपणन व्यवस्था बनती है तो वह सक्षमता, समता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से कारगर भी होगी।



सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Thursday, January 21, 2021

कमियां बरकरार (बिजनेस स्टैंडर्ड)

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत को पांच वर्ष पूरे हो चुके हैं। मौजूदा सरकार की प्रमुख योजनाओं में से एक इस योजना में फरवरी 2020 में आमूलचूल बदलाव भी किया गया लेकिन अभी भी कई गड़बडिय़ां बरकरार हैं। योजना में कई ढांचागत और प्रक्रियागत कमियां हैं और कई विशिष्ट गुण होने के बावजूद ये कमियां किसानों के लिए इसकी उपयोगिता को प्रभावित करती हैं। इसकी विशिष्टताओं में सबसे प्रमुख है जोखिम का व्यापक कवरेज। फसल बुआई के पहले से लेकर फसल कटने के बाद उपज के नुकसान तक की कवरेज रबी के लिए कुल बीमित राशि के 1.5 फीसदी प्रीमियम पर तथा खरीफ की फसल के लिए 2 फीसदी प्रीमियम पर की जाती है। प्रीमियम की शेष राशि का भार केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सब्सिडी के रूप में वहन किया जाता है। दुनिया में दूसरी कोई ऐसी फसल बीमा योजना नहीं है जो इस मामले में पीएमएफबीवाई का मुकाबला कर सके। इस योजना को किसान कल्याण की अनिवार्य योजना के रूप में पीएम-किसान (इस योजना में हर भूधारक को तीन किस्तों में 6,000 रुपये मिलते हैं) के समकक्ष बताने के बावजूद किसान इसे लेकर आकर्षित नहीं हुए।


बहरहाल इन चिंताओं में भी काफी दम है कि पीएमएफबीवाई योजना के तहत मिलने वाला हर्जाना आमतौर पर बहुत कम होता है और बहुत देर से मिलता है। इसकी बुनियादी वजह यह है कि राज्य योजना को चलाने के क्रम में अपने दायित्व पूरे करने में अक्षम साबित हो रहे हैं। वे अक्सर प्रीमियम सब्सिडी में अपना हिस्सा काफी देरी से और किस्तों में जारी करते हैं। इससे बीमा कंपनियों को किसानों को समय पर भुगतान करने में दिक्कत होती है। फसल कटाई प्रयोग के जरिये उत्पादन नुकसान के आंकड़े तैयार करना और रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट इमेजिंग तकनीक के जरिये किया जाने वाला प्रमाणन भी राज्य का दायित्व है और इसमें भी असंगत तरीके से देरी होती है। इससे दावे निपटाने में दिक्कत आती है। बीमा कंपनियों को पीएमएफबीवाई के बदले हुए स्वरूप के तहत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आधारित आकलन के आधार पर दावों के निपटान की इजाजत है लेकिन यह व्यापक तौर पर अमल में नहीं लाया जा रहा है। इसके अलावा किसानों को 72 घंटे के भीतर बीमा कंपनियों को नुकसान की जानकारी देनी होती है। आमतौर पर किसी प्राकृतिक आपदा के बाद यही वह समय होता है जब किसानों को अपने खेतों में समय बिताना होता है ताकि वे फसल बचाने के लिए हरसंभव कदम उठा सकें। इसके अलावा किसानों को हर वर्ष अलग-अलग फसल के लिए अलग-अलग बीमा कंपनी से निपटना होता है। इससे बीमाकर्ताओं और उनके ग्राहकों के बीच ताल्लुकात नहीं बन पाते बल्कि एक तरह का अविश्वास उत्पन्न होता है जो बीमा कंपनियों के लिए नुकसानदेह होता है।


प्रथम दृष्ट्या ये बहुत छोटी बातें प्रतीत होती हैं लेकिन ये बीमा कंपनियों और किसानों दोनों के कामकाज में असहजता की वजह बनती हैं। कई कंपनियां जिन्होंने पहले भारी सरकारी सब्सिडी से आकर्षित होकर इस योजना के क्रियान्वयन में भागीदारी का विकल्प चुना था वे अब इससे दूरी बना चुकी हैं। इन मसलों को हल करना आवश्यक है ताकि इस योजना को किसानों के लिए एक ऐसी आकर्षक योजना के रूप में पेश किया जा सके जो सक्षम और किफायती ढंग से उनके जोखिम का संरक्षण करती है। इस हकीकत को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े कारकों के कारण जहां भारतीय कृषि धीरे-धीरे संकटपूर्ण होती जा रही है, वहीं जोत का आकार घटने के साथ किसानों की जोखिम उठाने की क्षमता भी कम हो रही है। ऐसे में सही मायनों में किसानों के अनुरूप पीएमएफबीवाई उनके लिए वरदान साबित होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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चीन की प्राथमिकताएंऔर भारत की स्थिति (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम सरन  

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के केंद्रीय आर्थिक कार्य सम्मेलन (सीईडब्ल्यूसी) की सालाना बैठक 16 से 18 दिसंबर तक आयोजित की गई। इसमें इस बात का व्यापक संकेत मिलता है कि चीन अपने आर्थिक हालात का आकलन कैसे करता है और चालू वर्ष में उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं। सन 2021 खासतौर पर महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ष सीपीसी की स्थापना की 100वीं वर्षगांठ वाला वर्ष भी है। यह 14वीं पंचवर्षीय योजना का पहला वर्ष भी है और इस दौरान न केवल कोविड-19 महामारी के नकारात्मक प्रभावों से उबरने की चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा बल्कि बाहरी राजनीतिक और आर्थिक माहौल में व्याप्त अनिश्चितता और उथलपुथल पर भी ध्यान देना होगा। पुरानी घोषणाओं के दोहराव के अलावा इस बात के भी स्पष्ट संकेत हैं कि चीन का नेतृत्व नए वर्ष में किन बातों को अपनी ताकत के रूप में देखता है और किन्हें कमजोरी के रूप में।

सीईडब्ल्यूसी की रिपोर्ट घरेलू मांग आधारित तथा निर्यात एवं निवेश आधारित अर्थव्यवस्था की बात कहती है। आदर्श स्थिति में ये सभी कारक एक दूसरे को ताकत प्रदान करते हैं। परंतु सीईडब्ल्यूसी का कहना है कि मौजूदा दौर में जब बाहरी स्तर पर इतनी अनिश्चितता है तब एक नए घटनाक्रम में घरेलू वितरण प्रभावी होगा। सरकारी स्वामित्व वाले उपक्रमों की भूमिका भविष्य में और मजबूत होगी और वे राष्ट्रीय सामरिक तकनीक को मजबूत करने और नवाचार को बढ़ावा देने में मददगार साबित होंगे। राष्ट्रीय सामरिक तकनीक ऐसी तकनीक हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम हैं। इनमें कृत्रिम मेधा, सेमीकंडक्टर और उच्च तकनीक वाले उद्योगों में काम आने वाले अन्य घटक शामिल हैं।


एक अन्य क्षेत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा काफी अहमियत रखती है और वह है औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाओं को नियंत्रित रखने की राज्य की स्वतंत्र क्षमता को मजबूत बनाना। विदेशी कंपनियों के नियंत्रण वाली विस्तारित आपूर्ति शृंखलाओं में केवल एक कड़ी बनने के बजाय चीन स्वयं की आपूर्ति शृंखलाओं का नेतृत्व करना पसंद करेगा। आर्थिक साझेदारों के कारण होने वाली उथलपुथल का शिकार होने की आशंका के बजाय वह ऐसी स्थिति में रहना चाहेगा जहां आपूर्ति शृंखलाओं में पारस्परिक निर्भरता हो ताकि इसका इस्तेमाल चीन के सुरक्षा हितों को बढ़ाने में किया जा सके। शी चिनफिंग ने एक अन्य संदर्भ में कहा कि चीन को सक्षम होना होगा ताकि अपने आर्थिक संपर्कों की राजनीतिक लागत अपने साझेदारों पर डाल सके। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दंडात्मक व्यापारिक कदमों के साथ वह ऐसा कर चुका है। आर्थिक पारस्परिक निर्भरता को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की इस कोशिश को समझना होगा और इसका प्रतिरोध करना होगा।


एक अन्य तत्त्व एकाधिकार विरोधी शमन और नियमविरुद्ध पूंजी विस्तार निरोध से ताल्लुक रखता है। यहां इशारा चीन के निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र की ओर है और यह सरकारी उपक्रमों को बढ़ावा देने का विपरीत पक्ष है। इस नीति को नियामकीय निगरानी के आलोक में तथा टेनसेंट तथा अलीबाबा जैसी अत्यधिक कामयाब हाई-टेक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ उठाए गए कदमों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके तेज विस्तार और चीन में उनके व्यापक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव को सीपीसी के प्रभुत्व को चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। भुगतान कारोबार से परे फिनटेक कारोबार में अलीबाबा के प्रवेश को भी चीन सरकार की सॉवरिन डिजिटल करेंसी तथा चीनी बैंकों को बिचौलिया बनाकर राष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था कायम करने के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाने लगा। वित्तीय स्थिरता को लेकर भी चिंता हो सकती है। एक दलील यह है कि निजी हाई टेक कंपनियों का आकार इतना बड़ा हो गया है कि अगर वे नाकाम हुए तो अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका लगेगा। परंतु राजनीतिक कारक भी महत्त्वपूर्ण हैं। संदेश एकदम स्पष्ट है: चीन के निजी क्षेत्र को सीपीसी के नेतृत्व और निगरानी में काम करना होगा। ऐसे में विदेशी उपक्रम चीन की निजी कंपनियों के साथ चाहे जो सौदा करें, चीन की सरकार और सीपीसी उसमें जरूर रुचि रखेगी।


सीईडबल्यूसी द्वारा चिह्नित एक अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्र खाद्य सुरक्षा एवं कृषि क्षेत्र को लेकर भी सुरक्षा चिंताएं हैं। चीन का कृषि उत्पादन उल्लेखनीय है लेकिन वह खाद्यान्न तथा अन्य कृषि उत्पादों मसलन सोयाबीन का सबसे बड़ा आयातक भी है। वह बीफ, पोर्क और पोल्ट्री उत्पादों का भी प्रमुख आयातक है। वर्ष 2014 से ही उसका सालाना खाद्यान्न आयात 10 करोड़ टन रहा है। सन 2020 में तो यह सन 2019 के आयात से 30 गुना अधिक रहा। आमतौर पर कीमतें स्थिर रहती हैं लेकिन इसके बावजूद खाद्य मुद्रास्फीति चिंता का विषय है। पोर्क की कीमत जो खासी संवेदनशील मानी जाती है, उसमें काफी इजाफा हुआ है क्योंकि आपूर्ति कमजोर रही है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता सूची में रखा गया है। उन्नत बीज और जेनेटिक शोध के माध्यम से उपज बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। अनाज भंडारण क्षमता बढ़ाने और कृषि भूमि को बरकरार रखने का प्रयास किया जा रहा है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 12 करोड़ हेक्टेयर का न्यूनतम रकबा सुनिश्चित करने की बात कही गई है। पुरानी नीतिगत घोषणाओं से भी कुछ बातें चुनी गई हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रतिबद्धता दोहराना शामिल है। इसके अलावा घरेलू मांग को बढ़ाना और स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं में खपत के जरिये सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इजाफा करना शामिल है।


हालांकि इस बात का कोई संकेत नहीं है कि सरकार घरेलू मांग बढ़ाने के लिए कोई प्रोत्साहन पैकेज देने जा रही है। स्थिर राजकोषीय नीति और विवेकपूर्ण मौद्रिक नीति पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस बात को लेकर संतुष्टि का भाव है कि चीन इकलौती अर्थव्यवस्था है जो 2020 में सकारात्मक रहेगी और 2021 में जिसके 8 फीसदी की दर से विकसित होने की आशा की जा रही है। किसी और अर्थव्यवस्था के साथ ऐसा नहीं है। चीन ने आपूर्ति क्षेत्र की बाधा उत्पन्न होने उनके चीन से दूरी बनाने की आशंकाओं को झूठा साबित कर दिया है। बल्कि इनके चालू रहने में चीन पर निर्भरता बढ़ी है। कम से कम पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के मामले में तो ऐसा ही है। चीन के आरसेप में साझेदार बनने तथा बेल्ट और रोड पहल को लगातार बढ़ावा देने के कारण एशिया और विश्व में वृद्धि के वाहक की उसकी भूमिका और मजबूत होगी। सीईडब्ल्यूसी ने यह भी दोहराया कि चीन प्रशांत पार साझेदारी के लिए व्यापक एवं प्रगतिशील समझौते का सदस्य बनना चाहता है। नए साल में चीन के दबदबे के बीच भारत को एशियाई आर्थिक जगत में अपनी जगह बनानी है। आत्मनिर्भर भारत को इस हकीकत से दो चार होना होगा।


(लेखक पूर्व विदेश सचिव एवं सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)

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विनिर्माण में रोजगार की हानि कृषि और निर्माण ने संभाली (बिजनेस स्टैंडर्ड)

महेश व्यास  

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) ने विगत दिनों अपनी आर्थिक पूर्वानुमान सेवा में जारी कंज्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्वे (सीपीएचएस) से रोजगार के क्षेत्रवार आंकड़े जारी किए। ये आंकड़े मासिक और तिमाही आधार पर उपलब्ध कराए गए। हम तिमाही अनुमानों का इस्तेमाल करते हुए यह समझने का प्रयास करेंगे कि व्यापक क्षेत्रों और उद्योगों पर लॉकडाउन का क्या असर हुआ है।


कृषि क्षेत्र में 2016 से लेकर जून 2020 तिमाही के अंत तक रोजगार का आंकड़ा 14 करोड़ से 15 करोड़ के बीच रहा है। सन 2016 में ही सीपीएचएस ने रोजगार शृंखला की शुरुआत की थी। जून 2020 में समाप्त तिमाही लॉकडाउन की पहली तिमाही थी। यही वह तिमाही थी जब देश भर में लॉकडाउन के सबसे कड़े प्रावधान लागू किए गए थे। इस अवधि में कृषि क्षेत्र में रोजगार की कोई हानि नहीं हुई, बल्कि कृषि क्षेत्र के रोजगार पिछली तिमाही से भी बेहतर रहे और एक वर्ष पहले की समान अवधि की तुलना में भी बेहतर रहे।


सितंबर 2020 में समाप्त तिमाही में कृषि क्षेत्र के रोजगार 15.8 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ गए। जुलाई और अगस्त 2020 में 16 करोड़ का आंकड़ा पार करते हुए कृषि क्षेत्र के रोजगार उच्चतम स्तर पर रहे। सितंबर 2020 तिमाही में कृषि रोजगार ठीक एक वर्ष पहले वाली तिमाही की तुलना में 5.5 फीसदी अधिक रहे।


लॉकडाउन के दौरान कृषि रोजगार में इजाफा बताता है कि एक तो गैर कृषि क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम होने से लोगों ने उधर का रुख किया और दूसरा यह कि कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर बेहतर रहे। कृषि क्षेत्र में श्रमिकों की यह अतिरिक्त बढ़ोतरी बताती है कि सन 2020 में खरीफ सत्र में बुआई के रकबे में भी रिकॉर्ड इजाफा हुआ। खरीफ में बुआई रकबा 4.8 फीसदी बढ़ा।


दिसंबर 2020 में समाप्त तिमाही में कृषि क्षेत्र के रोजगार घटकर 1.54 करोड़ रह गए। जबकि पिछली तिमाही में यह आंकड़ा 1.58 करोड़ था। इसके बावजूद यह स्तर पिछले वर्ष की दिसंबर तिमाही से 3.5 फीसदी बेहतर था।


देश के कुल रोजगारों में कृषि की हिस्सेदारी 36 फीसदी है। सन 2016 से 2019 तक यह जहां 36 फीसदी रही, वहीं 2020 में यह बढ़कर करीब 40 फीसदी हो गई। सेवा क्षेत्र भी कुल रोजगार में 36 फीसदी का हिस्सेदार है। परंतु इसकी हिस्सेदारी बढ़ रही है। सन 2016 के 33 फीसदी से बढ़कर 2018, 2019 और 2020 में यह 38 फीसदी जा पहुंची।


सेवा क्षेत्र में रोजगारशुदा लोगों की तादाद 2017 के 14 करोड़ से बढ़कर मार्च 2020 तिमाही तक 15.7 करोड़ हो गई। परंतु कृषि के उलट लॉकडाउन में इसमें कमी आई। जून 2020 तिमाही में रोजगार घटकर 1.28 करोड़ रह गया। तब से इसमें सुधार हुआ लेकिन केवल आंशिक। सितंबर 2020 तिमाही में इस क्षेत्र में 1.46 करोड़ लोग रोजगारशुदा थे जबकि दिसंबर 2020 में यह आंकड़ा सुधरकर 14.8 करोड़ हुआ। यह स्तर मार्च 2020 या एक वर्ष पहले की तुलना में अब भी कम है। सेवा क्षेत्र के रोजगार का स्तर 2018 की किसी भी तिमाही से भी कम है।


खुदरा कारोबार, पर्यटन और यात्रा, शिक्षा और व्यक्तिगत गैर पेशेवर सेवाओं में रोजगार को जून 2020 तिमाही में भारी झटका लगा। खुदरा कारोबार सबसे अधिक नुकसान में रहे और यहां एक करोड़ लोगों ने रोजगार गंवा दिए। पर्यटन और यात्रा क्षेत्र में 55 लाख लोगों ने रोजगार गंवाए जबकि शिक्षा क्षेत्र में 53 लाख रोजगार का नुकसान हुआ। व्यक्तिगत गैर पेशेवर सेवा क्षेत्र में 25 लाख लोगों को रोजगार की क्षति हुई।


दिसंबर 2020 तिमाही तक शिक्षा को छोड़कर इनमें से अधिकांश सेवा क्षेत्रों में रोजगार बहाल होने लगे थे। शिक्षा क्षेत्र में रोजगार का जाना लगातार जारी है। दिसंबर 2020 में समाप्त तिमाही तक 59 लाख रोजगार गए। शिक्षा उद्योग में सन 2016-17 में 1.3 से 1.4 करोड़ रोजगार थे। ये 2018 और 2019 में बढ़कर 1.5 करोड़ हो गए। हालांकि 2019 के अंत तक इस क्षेत्र में कमजोरी नजर आने लगी और मार्च 2020 तिमाही में रोजगार गिरकर 1.45 करोड़ रह गए। जून और सितंबर 2020 तिमाही में इनकी तादाद और घटी और ये 97 लाख रह गए। दिसंबर 2020 तिमाही में शिक्षा क्षेत्र के रोजगार 91 लाख रहे।


सेवा क्षेत्र के अन्य सभी हिस्सों में रोजगार में सुधार लगभग पूरा हो चुका है। यात्रा एवं पर्यटन क्षेत्र में 2019-20 में 1.94 करोड़ लोगों के पास रोजगार था। जून 2020 तिमाही में गंभीर लॉकडाउन के दौरान इस क्षेत्र में रोजगार 55 लाख तक घटे लेकिन दिसंबर 2020 तिमाही में यहां 2.07 करोड़ लोग रोजगारशुदा थे यानी 2019-20 की तुलना में 13 लाख अधिक लोगों के पास रोजगार था। अन्य सेवा क्षेत्रों में भी सुधार हुआ। यही वजह है कि जून 2020 तिमाही में जहां सेवा क्षेत्र में 2.35 करोड़ रोजगार की हानि हुई, वहीं सितंबर तिमाही में यह गिरावट केवल 83 लाख और दिसंबर 2020 तिमाही में महज 55 लाख रह गई।


इसके विपरीत विनिर्माण क्षेत्र में गंवाए गए रोजगार में सुधार की गति धीमी रही है। सन 2019-20 में विनिर्माण क्षेत्र में 4 करोड़ रोजगार थे। पहली तिमाही में यह तादाद घटकर 2.46 करोड़ रह गई यानी 1.5 करोड़ लोगों के रोजगार छिन गए। दूसरी तिमाही में आंकड़ा सुधरकर 2.71 करोड़ हुआ और दिसंबर तिमाही में 2.88 करोड़। हालांकि 1.14 करोड़ के साथ अभी भी गिरावट का स्तर बहुत ज्यादा है। इससे भी अहम बात यह है कि औषधि क्षेत्र को छोड़कर हर बड़े विनिर्माण उद्योग में 2020-21 की तिमाहियों में 2019-20 की तिमाहियों की तुलना में कम लोग रोजगारशुदा रहे।


वास्तविक अचल संपत्ति और विनिर्माण उद्योग में तो रोजगार के मामले में सौ प्रतिशत सुधार हो चुका है। सन 2019-20 में इस उद्योग में 6.1 करोड़ लोगों के पास रोजगार थे। जून 2020 तिमाही में यह आंकड़ा गिरकर 2.8 करोड़ हुआ लेकिन दिसंबर 2020 तिमाही तक इसमें 3.3 करोड़ का सुधार हुआ और यह पुरानी स्थिति में आ गया। उच्च श्रम उत्पादकता वाले क्षेत्रों मसलन विनिर्माण आदि क्षेत्रों से रोजगार कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों मसलन कृषि और विनिर्माण में स्थानांतरित हुए।

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Wednesday, January 20, 2021

तकनीक में प्रगति के लिए नजरिया बदलना जरूरी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

प्रसेनजित दत्ता  

पिछले कुछ वर्षों के दौरान तकनीक-राष्ट्रवाद (टेक्नो-नैशनलिज्म) पर अच्छी खासी चर्चा हुई है। दुनिया के हरेक हिस्से में आर्थिक विश्लेषक, नीति निर्धारक और नीतिगत विषयों पर मंथन करने वाले संस्थान इस बात पर बहस कर रहे हैं कि आखिर मोटे तौर पर दुनिया और खास तौर पर उनके देशों के लिए तकनीक-राष्ट्रवाद के क्या मायने हैं।


तकनीक-राष्ट्रवाद और तकनीक-वैश्वीकरण की परिभाषा इस बात पर निर्भर कर सकती है कि इसका इस्तेमाल कौन कर रहा है। मोटे तौर पर कहें तो तकनीक-वैश्वीकरण के तहत सामाजिक समस्याओं के समाधान के वास्ते एक साझे मंच पर सभी देशों और लोगों को लाने के लिए आपस में तकनीक एवं नवाचार का आदान-प्रदान होता है। दूसरी तरफ तकनीक-राष्ट्रवाद का सहारा लेकर राष्ट्र कुछ विशिष्ट तकनीक में अपनी श्रेष्ठता का इस्तेमाल कर वैश्विक व्यवस्था में आगे बढ़ते हैं और दूसरे देशों पर वर्चस्व स्थापित करते हैं।


हालांकि इन दोनों में कोई भी शब्द वैश्विक स्तर पर मौजूदा हालात का सटीक विश्लेषण नहीं करता है। वास्तव में दुनिया तकनीक हासिल करने की होड़ में पुराने विकसित राष्ट्रों के गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई में फंसी है। इसमें एक तरफ अमेरिका और दूसरी तरफ चीन एवं अन्य देश हैं। इस टकराव का मकसद नई तकनीकों-कृत्रिम मेधा, क्वांटम कंप्यूटिंग, रोबोटिक्स, मटीरियल साइंसेस, बायोटेक और इंटरनेट ऑफ थिंग्स सहित अन्य-पर प्रभुत्व स्थापित करना है। ये नई तकनीक भविष्य की दशा-दिशा तय करेगी। एक दशक पहले तक विकसित देश तकनीक के मोर्चे पर काफी अग्रणी समझे जाते थे और अन्य देश उनके पीछे आपस में सहयोगात्मक प्रतिस्पद्र्धा करते हुए आगे बढ़ते थे। कई खंडों में अमेरिका सबसे आगे था, यह अलग बात थी कि यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी कुछ खास क्षेत्रों में अपनी मजबूती रखते थे। तब चीन आर्थिक मोर्चे पर तेजी से प्रगति कर रहा था, लेकिन आधुनिक तकनीक के मामले में वह कम से कम पांच वर्ष पीछे समझा जाता था।


अब हालात बदल चुके हैं। ज्यादातर विश्लेषक चीन को कृत्रिम मेधा एवं डेटा एनालिटिक्स, जीन संवद्र्धन और यहां तक कि क्वांटम कंप्यूटिंग में अगर इन देशों से आगे नहीं तो कम से कम उनके बराबर जरूर समझ रहे हैं। हालांकि चीन जिस तरह से अपनी महत्त्वाकांक्षा का परिचय देता है और निजी कंपनियों के जरिये दोस्तों एवं प्रतिस्पद्र्धियों दोनों से चोरी-छुपे सूचनाएं एकत्र करता है वह पश्चिम देशों को परेशान करता है।


इन चिंताओं से एक दूसरे के खिलाफ प्रतिक्रियात्मक कदम उठाने की मुहिम शुरू हो गई है। अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने चीन की कंपनियों जैसे दूरसंचार उपकरण विनिर्माता हुआवे, वीडियो कैमरा बनाने वाली हाइकविजन और सोशल मीडिया कंपनी बाइटडांस को कुछ खास खंडों में कारोबार करने से रोक दिया है। पश्चिमी देशों की तकनीकी कंपनियों को चीन के साथ प्रमुख तकनीक साझा नहीं करने की सख्त हिदायत दी गई है। इसके जवाब में चीन भी उन खंडों में तकनीक का विकास जोर-शोर से कर रहा है, जहां यह पीछे चल रहा है। चिप निर्माण इनमें एक ऐसा ही खंड है।  


ज्यादातर विकासशील एवं पिछड़े देश इनमें किसी भी खेमे में नहीं आते हैं। इसकी वजह यह है कि वे तकनीक का इस्तेमाल करने वाले हैं, न कि इनका विकास और इन पर शोध करते हैं। नई तकनीक अपनाने के मामले में पिछले कुछ दशकों के दौरान ज्यादातर देश पश्चिमी देशों पर निर्भर रहे, लेकिन अब उनके पास चीन की तरफ रुख करने का विकल्प मौजूद है। चीन इन देशों को मदद करने और अपने उत्पाद एवं अपनी सेवाएं सस्ते दामों पर देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। इसके साथ ही इन देशों के लिए पसंदीदा तकनीक आपूर्तिकर्ता बनने के साथ ही उन्हें वित्तीय सहायता भी दे रहा है।


इस तरह, चौथी औद्योगिक क्रांति के मुहाने पर खड़ी दुनिया दो खेमों में बंटती जा रही है। इनमें एक खेमा उन देशों का है, जो नई तकनीक ईजाद कर रहे हैं। दूसरा खेमा उन देशों का है, जो नई तकनीक के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं।


इस खेल में आखिर भारत कहां खड़ा है? हाल तक यह पुराने विकसित देशों के साथ चीन से नई तकनीक ले रहा था। हाल में चीन के साथ तनाव बढऩे के बाद भारत अब आत्मनिर्भरता और तकनीक-राष्ट्रवाद पर जोर दे रहा है। भारत ने चीन के कई मोबाइल ऐप्लीकेशन पर भी पाबंदी लगा दी है और स्थानीय स्तर पर ही 5जी तकनीक का विकास करने की बात कह चुका है। इसी दौरान सरकार ने कृत्रिम मेधा और क्वांटम कंप्यूटिंग के लिए भी अपना दृष्टिकोण सार्वजनिक किया है। हालांकि इसमें थोड़ी देर लगेगी क्योंकि हुआवे, हाइकविजन और चीन की अन्य कंपनियों की भारत में बड़े पैमाने पर उपस्थिति है।


दरसअल मुद्दा यह है कि एक के बाद एक सरकारें दीर्घ अवधि के लक्ष्य के साथ एक स्पष्ट नीति वाली कार्य योजना समयसीमा एवं लक्ष्यों के साथ पेश करने में नाकाम रही हैं। पश्चिमी देशों में तकनीक विकास पर सरकारी विभाग (खासकर रक्षा में), निजी क्षेत्र और शोध करने वाले संस्थान एवं विश्वविद्यालय आपस में मिलकर काम करते हैं और निरंतर प्रगति करने के लिए एक दूसरे की उपलब्धियों का इस्तेमाल करते हैं।


चीन एक अलग ही ढांचे के साथ आगे बढ़ा। वहां सरकार ने संस्थानों और निजी कंपनियों दोनों जगहों पर तकनीक पर शोध की दशा-दिशा काफी हद तक तय की है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने सोवियत संघ (यूएसएसआर) का ढांचा अपनाया था और सरकारी विभागों को शोध एवं तकनीक विकास पर ध्यान देने के लिए कहा था। हालांकि इससे भारत को कुछ क्षेत्रों में खास किस्म की उपलब्धि हासिल करने में मदद जरूरी मिली, लेकिन पूरी दुनिया में तकनीक विकास के क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलाव के साथ चलने में विशेष मदद नहीं मिल पाई। 1970 और 1980 के बीच अर्थव्यवस्था जरूरत से अधिक बंद रहने से भारत तकनीक के इस्तेमाल के मामले में पिछड़ गया।  


1991 में आर्थिक सुधार शुरू होने के साथ सरकारों ने तकनीक विकास से अधिक आर्थिक समस्याओं पर ध्यान दिया। निजी क्षेत्र भी तकनीक स्वयं विकसित करने के बजाय इसे बाहर से मंगाने में व्यस्त था। हालांकि इस दौरान कुछ कंपनियों ने नए इस्तेमाल करने एवं उत्पादों के लिए नवाचार का इस्तेमाल जरूर किया। ऐसा नहीं है कि भारत आवश्यकता पडऩे पर अत्याधुनिक तकनीक विकसित नहीं कर सकता है। कुछ तकनीक तक पहुंच नहीं होने के बाद भारत ने संसाधन एवं विशेषज्ञता हासिल कर क्रायोजेनिक इंजन, नाभिकीय तकनीक और सुपर कंप्यूटर विकसित किए। हालांकि जहां तकनीक तक इसकी पहुंच आसानी से हो गई, वहां इसने दूसरे देशों के साथ प्रतिस्पद्र्धा करने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई।


अगर भारत तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने वाले देशों की फेहरिस्त से निकलना चाहता है तो अपना नजरिया बदलना होगा। केवल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अधिक रहने से वैश्विक तकनीक के मंच पर इसे जगह नहीं मिलेगी।


(लेखक बिज़नेस टुडे और बिज़नेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और संपादकीय सलाहकार संस्था प्रोजैइकव्यू के संस्थापक एवं संपादक हैं।)

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महामारी पर दिखाई समझदारी अब बजट में दिखाने की बारी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

मिहिर शर्मा  

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जल्दी ही वह बजट पेश करेंगी जिसे अनिवार्य तौर पर महामारी बजट के रूप में याद किया जाएगा। कम ही केंद्रीय बजट इतने कठिन हालात में पेश किए गए होंगे और जिनकी इस कदर प्रतीक्षा रही होगी। सीतारमण पर असंभव को संभव कर दिखाने का दबाव होगा: किसानों, उपभोक्ताओं, आम परिवारों और कंपनियों को राहत देना, खर्च और ऋण पर नियंत्रण करना तथा भारी गिरावट के बाद वृद्धि बहाल करना।


अब तक सरकार ने महामारी को लेकर समझदारी भरी प्रतिक्रिया दी है। कुछ अन्य देशों के उलट उसने समझा है कि स्वास्थ्य को लेकर आपात स्थिति के बीच मांग बढ़ाने की कोशिश का विपरीत असर हो सकता है। इसका फायदा हुआ और अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है। स्वाभाविक है कि लॉकडाउन और महामारी दीर्घकालिक नुकसान छोड़ जाएंगे। प्रश्न यह है कि सरकार इसे कैसे ठीक करेगी। तथ्य यह भी है कि इस नुकसान की प्रकृति को समझने में वक्त लगेगा। कई क्षेत्र और हित समूह जोर देंगे कि उन्हें राहत या प्रोत्साहन में प्राथमिकता दी जाए। ऐसी मांगों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।


यह सही है कि वित्त मंत्री ने कहा कि वह राजकोषीय घाटे को खुद को चिंतित नहीं करने देगी। उनका अर्थ शायद यह नहीं हो कि वह व्यय बढ़ाना चाहती हैं। व्यय बढ़ाना गलत होगा। व्यय बढ़ाकर जिस तरह मंदी से बाहर निकला जा सकता है वही तरीका महामारी में काम आए यह जरूरी नहीं। मंदी के दौर में भी भारत को इसकी कीमत दीर्घावधि में चुकानी पड़ी। सन 2008-09 के वित्तीय संकट से निपटने में जो चूक की गईं उनकी कीमत हमें अब तक चुकानी पड़ रही है। बैंकों की बैलेंस शीट इसका उदाहरण है।


व्यय बढ़ाने की चौतरफा उठती मांग के बीच उन्हें यह बात याद रखनी चाहिए। पिछली बार तत्कालीन वित्त मंत्री ने ऐसी मांग सुनने की गलती की थी। इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए। सरकार को निवेशकों, नागरिकों और करदाताओं के साथ चर्चा का विश्वसनीय रास्ता अपनाना चाहिए। सबसे पहले तो पूरी तरह पारदर्शी निजीकरण की ओर लौटना चाहिए। थोड़े बहुत विनिवेश का वक्त गया। निजीकरण से उत्पादकता में भी सुधार होता है। यह फंड के साथ-साथ वृद्धि हासिल करने का भी अच्छा जरिया है। दूसरा, सरकार को सारी उधारी पारदर्शी रखनी चाहिए। अधिक पारदर्शिता से घाटे को लेकर समझ बेहतर रहेगी। तीसरा, सरकार को वैश्विक पूंजी की आवक को प्राथमिकता देनी चाहिए। अब तक सरकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आंकड़ों से संतुष्ट रही है, हालांकि वह बड़ी परियोजनाओं और कंपनियों में आने वाली एकमुश्त आवक रही है। जरूरत यह है कि देश में आने वाली दीर्घावधि की विदेशी पूंजी सरकार का वित्तीय बोझ कम करे। फिलहाल, देश की वित्तीय बचत पर सरकार का एकाधिकार है। ऐसे में निजी क्षेत्र के लिए कुछ खास करने को नहीं है। देश में अधिक विदेशी पूंजी आम परिवारों की बचत पर निर्भरता कम करेगी। विदेशी पूंजी के इस चैनल के लिए तरीके हैं। उनमें से एक तरीका है विभिन्न परियोजनाओं को ग्रीन रेटिंग देना ताकि नए ईएसजी केंद्रित फंड आ सकें। दूसरा तरीका है नगर निकायों और सरकारी उपक्रमों में वैश्विक डेट बाजार का लाभ उठाने की क्षमता विकसित करना। तीसरा तरीका है, नए निजी नियंत्रण वाले विकास वित्त संस्थान जिनमें सरकार की आंशिक हिस्सेदारी होती है और जो विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित रहते हैं।


चौथा, सरकार को कल्याण व्यय पर नियंत्रण रखना चाहिए। दुनिया भर में महामारी के दौरान यह कठिन साबित हुआ है। खराब ढंग से लक्षित राहत को लोग व्यय नहीं करते उसकी बचत करते हैं। अमेरिका में ऐसा ही देखने को मिला। शहरी गरीबों पर केंद्रित नई योजनाएं घोषित की जा सकती हैं लेकिन उनके लिए प्रावधान करना होगा। यह मुश्किल है क्योंकि अर्थव्यवस्था अभी सामान्य नहीं हुई है। हमें नहीं पता कि महामारी के बाद सामान्य हालात कैसे होंगे।


पांचवां, पश्चिम के कृत्यों की अनदेखी करनी होगी। हाल ही में आरबीआई के एक पूर्व गवर्नर ने वित्त मंत्री को संबोधित एक आलेख में ऐसी सोच का जिक्र किया जिसका मानना है कि मुद्रास्फीति काल्पनिक है। मैं यह देखकर चकित हुआ, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि भारत में दुनिया की खराब बौद्धिक धाराओं से ज्ञान लेने की प्रवृत्ति अभी भी जारी है। आरबीआई के गवर्नर को यह जानना चाहिए कि यदि अमेरिका और जापान में उच्च व्यय, ऋण और घाटे के बावजूद मुद्रास्फीति की वापसी नहीं हुई है तो जरूरी नहीं कि भारत में भी ऐसा हो।


छठी बात, याद रहे कि संस्थान मायने रखते हैं। जब भारी आवक, उधारी और प्रोत्साहन की योजना बनानी हो तो इन फंड का ध्यान रखना होगा, इन्हें विनियमित करना होगा। यह अहम है। सरकारी व्यय के प्रबंधन और मुद्रास्फीति को लक्षित करने की बात करें तो आरबीआई की स्वतंत्रता एक बड़ी उपलब्धि है जिसे बरकरार रखना चाहिए। दीर्घावधि के वित्त के लिए अलग नियामकीय क्षमता विकसित करनी चाहिए।


आखिरी बात, निवेशकों के संरक्षण का वादा होना चाहिए। हमें समझना होगा कि अतीत से लागू विधानों पर हमारी निर्भरता और अंतरराष्ट्रीय पंचाटों में हमारा उलझना यह संकेत देता है कि भारत निवेश के लिए उपयुक्त देश नहीं है। इसका गलत असर होगा। लालची कर अधिकारियों की बात सुनकर नीति निर्माता कर राजस्व के चक्कर में बड़े निवेश को दूर कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम स्पष्ट प्रतिबद्धता जताएं कि अतीत से लागू विधान नहीं होंगे। हमें अंतरराष्ट्रीय पंचाटों के निर्णय भी स्वीकार करने की बात कहनी होगी। सरकार को निवेश संधियों की जांच करनी चाहिए ताकि निवेशकों के पास धीमी भारतीय कानून व्यवस्था का विकल्प हो।


वित्त मंत्री को इस अवसर का लाभ उठाते हुए देश में विकास संबंधी कार्यों के वित्त पोषण के लिए वैकल्पिक स्रोत तैयार करने चाहिए। उन्हें देश को निवेशकों के और अनुकूल बनाना चाहिए। यहां दो राह हैं और सरकार को सही रास्ता चुनना ही होगा।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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खराब विचार (बिजनेस स्टैंडर्ड)

कोविड-19 महामारी के कारण मची आर्थिक उथलपुथल के कारण बैंकिंग क्षेत्र के फंसे हुए कर्ज में इजाफा होना लाजिमी है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ताजातरीन वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार आधार परिदृश्य में सकल फंसा हुआ कर्ज अनुपात सितंबर 2020 के 7.5 फीसदी से बढ़कर इस वर्ष सितंबर तक 13.5 फीसदी हो सकता है। यदि वृहद आर्थिक हालात और खराब होते हैं तो यह अनुपात बिगड़ भी सकता है। सरकारी बैंकों के लिए तो यह पहले ही खराब है। रिपोर्ट के अनुसार आधार परिदृश्य में उनका सकल फंसा हुआ कर्ज सितंबर 2021 तक बढ़कर 16.2 फीसदी तक पहुंच सकता है। स्पष्ट है कि बैंकों की कमजोर बैलेंस शीट, खासकर सरकारी बैंकों की कमजोर स्थिति आर्थिक सुधार को प्रभावित करेगी। खबरों के मुताबिक बैंकिंग तंत्र की हालत देखते हुए सरकार एक बैड बैंक की स्थापना पर विचार कर रही है ताकि बैंकों की बैलेंस शीट सुधारी जा सके। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी हाल ही में कहा है कि केंद्रीय बैंक ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर सकता है।

यकीनन बैड बैंक की स्थापना का विचार नया नहीं है। बैंकिंग तंत्र बीते कई वर्षों से दबाव में है, ऐसे में बैड बैंक का प्रस्ताव बार-बार सर उठाता रहता है। कहा जा रहा है कि फंसे हुए कर्ज को बैड बैंक को स्थानांतरित करके बैंकों की बैलेंस शीट सुधारी जा सकती है। उसकी स्थापना ही ऐसी परिसंपत्तियों को निपटाने के लिए होनी है। बहरहाल, ऐसी कई वजह हैं जिनके कारण लगता है कि यह विचार हमारे देश में कारगर नहीं होगा। बल्कि इसके कारण हालात और बिगड़ सकते हैं क्योंकि निस्तारण प्रक्रिया में अनावश्यक देरी होगी। सरकारी बैंकों में फंसे हुए कर्ज का स्तर अधिक होने की एक वजह यह भी है कि वहां ऋण मानक सही नहीं हैं। बैड बैंक की स्थापना से बुनियादी समस्या हल नहीं होगी। इतना ही नहीं सरकारी क्षेत्र के बैंकर फंसे हुए कर्ज को चिह्नित करने से हिचकते हैं क्योंकि जांच एजेंसियों के समक्ष यह उनके खिलाफ जा सकता है। सरकार द्वारा स्थापित बैड बैंक के साथ भी यही समस्या आएगी।


इसके अलावा, बैड बैंक को स्थानांतरित परिसंपत्तियों का मूल्यांकन विवादित रहेगा। यदि परिसंपत्ति स्थानांतरण अपेक्षाकृत ऊंचे मूल्य पर हुआ तो इससे बैंकों को लेकर उचित आकलन को प्रोत्साहन घटेगा। बैड बैंक के अधिकारियों को भी शायद पेशेवर काम करने की पूरी छूट न मिले क्योंकि फंसे कर्ज का निस्तारण करने के लिए बड़ी धनराशि बट्टे खाते में डालनी होगी। विभिन्न क्षेत्रों में फंसे कर्ज से निपटने के लिए उचित प्रतिभाओं को जुटाना भी एक समस्या है। निजी क्षेत्र शायद भागीदारी का इच्छुक न हो क्योंकि वह सरकारी क्षेत्र के काम करने के तरीके को लेकर सहज नहीं। बैड बैंक की स्थापना और बैंकों की बैलेंस शीट में सुधार से राजकोषीय दबाव कम नहीं होगा। वाणिज्यिक बैंकों या बैड बैंक की परिसंपत्तियों को बट्टे खाते में डालने से सरकार को नुकसान होगा और पूंजी की आवश्यकता बढ़ेगी।


बैड बैंक का इस्तेमाल शायद केवल समस्या को टालने के लिए किया जाए। यह उन कमियों को दूर नहीं कर सकता जो कड़े निर्णयों के कारण सरकारी बैंकों में उपजी हैं। सरकारी बैंकों में व्यापक सुधार की जरूरत है ताकि वे बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें। जब तक ऐसा नहीं होता सरकारी बैंक सरकारी वित्त और आर्थिक वृद्धि दोनों पर बोझ बने रहेंगे। यदि सरकार ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) को मजबूत करे तो बेहतर होगा। इससे फंसे कर्ज वाली परिसंपत्तियों का निस्तारण जल्दी होगा। आईबीसी के निलंबन की अवधि बढ़ाने से कोई मदद नहीं मिलेगी। ऐसे में सरकार के लिए बेहतर होगा कि वह बैंकिंग क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं से निपटे। समस्या को एक संस्थान से दूसरे संस्थान में स्थानांतरित करने से हल नहीं निकलेगा।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Tuesday, January 19, 2021

पर्दे के पीछे से जदयू अध्यक्ष की कुर्सी तक का सफर (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस  

क्या आरसीपी सिंह को कभी अपने दलीय सहयोगी रहे प्रशांत किशोर की विदाई का अनचाहा लाभ मिला है? सियासी हलके में 'आरसीपी' के नाम से मशहूर इन शख्स को पिछले दिनों जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का अध्यक्ष बनाया गया है।


यूं तो भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) से इस्तीफा देकर कई लोग राजनीति में आए हैं जिनमें से कई लोग वरिष्ठ मंत्री तक बनाए गए हैं। लेकिन आरसीपी शायद ऐसे पहले पूर्व आईएएस अफसर हैं जो किसी अहम पार्टी के अध्यक्ष पद तक पहुंचने में सफल रहे हैं। उनके राजनीतिक उत्थान की एक दिलचस्प कहानी है जो अफसरशाही में करियर बिताने के बाद राजनीति का दामन थामने की मंशा रखने वाले किसी भी शख्स के लिए एक रोल मॉडल बन सकती है।


मूल रूप से उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी आरसीपी ने सेवानिवृत्त होने से पहले ही वर्ष 2010 में नौकरी से इस्तीफा दे दिया था और राजनीति का हिस्सा बन गए थे। लेकिन यह कदम अचानक ही नहीं उठाया गया था। उत्तर प्रदेश के समाजवादी नेता बेनी प्रसाद वर्मा ने आरसीपी का परिचय नीतीश से कराया था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद आईएएस परीक्षा में सफलता हासिल करने वाले आरसीपी एक आम बिहारी के लिए आदर्श शख्स नजर आते थे। नीतीश को वह शायद इसलिए भी पसंद आए कि दोनों कुर्मी बिरादरी से ही आते हैं। इसके अलावा नीतीश की तरह आरसीपी भी नालंदा जिले के मूल निवासी थे। वह सामाजिक रूप से पिछड़े तबके का हिस्सा होते हुए भी खुद को एक ऊंचे मुकाम तक पहुंचाने में सफल रहे थे।


जब नीतीश अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल एवं कृषि मंत्रालय का कामकाज देख रहे थे तो आरसीपी बतौर अफसर उनके साथ जुड़े। लेकिन वर्ष 2005 में नीतीश के बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद आरसीपी उनके प्रमुख सचिव के तौर पर तैनात होकर पटना चले गए।


वर्ष 2010 में आईएएस की नौकरी से इस्तीफा देने के बाद नीतीश ने आरसीपी को फौरन ही राज्यसभा भेज दिया। जल्द ही पटना में हर कोई यह जानने लगा कि नीतीश सरकार से कोई भी काम कराने के लिए आरसीपी से ही संपर्क साधना होगा। वहीं दिल्ली में भी वह जदयू की रणनीति एवं रुख तय करने लगे और भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों के लिए संपर्क का जरिया बन गए। वर्ष 2016 में राज्यसभा के लिए दूसरी बार चुने जाने के बाद जदयू ने उन्हें पार्टी संसदीय दल का नेता भी बना दिया तो एक तरह से साफ हो गया कि वह पार्टी के भीतर सत्ता की अहम धुरी बन चुके हैं। लेकिन इतने लंबे समय में भी वह कभी किसी संवाददाता को साक्षात्कार या बयान देते हुए नहीं नजर आए हैं। यह उनके चर्चा से दूर रहकर काम करने की शैली को दर्शाता है। साफ है कि वह पर्दे के पीछे रहकर काम करना पसंद करते रहे हैं।


लेकिन पटना में अचानक ही एक करिश्माई व्यक्ति की चर्चा जोर-शोर से होने लगी। उस शख्स का नाम प्रशांत किशोर था। ऐसी स्थिति में आरसीपी और चुनाव प्रबंधन के कुशल रणनीतिकार प्रशांत के बीच तनातनी होनी लाजिमी ही थी। प्रशांत ने 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू को जीत दिलवाने में अहम भूमिका निभाई थी। वैसे उसमें कुछ दूसरे कारकों का भी हाथ रहा था।


सितंबर 2018 में जदयू का प्राथमिक सदस्य बनने वाले प्रशांत को नीतीश ने कुछ हफ्तों में ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया था। तब लोकसभा के चुनाव ज्यादा दूर नहीं थे। सियासी हलके में नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) की भी चर्चा होने लगी थी जो बाद में जदयू के समर्थन से कानून भी बन गया।


प्रशांत किशोर का मानना था कि सीएबी जदयू के वैचारिक एवं चुनावी रुझान के खिलाफ है। उन्होंने अपनी राय खुलकर जाहिर भी कर दी। लेकिन जदयू एवं भाजपा के रिश्ते संभालने वाले आरसीपी को प्रशांत की यह साफगोई पसंद नहीं आई। उन्होंने नागरिकता कानून पर प्रशांत का बयान आते ही कहा, 'ये लोग कौन हैं? सांगठनिक ढांचे में उनका क्या योगदान है? उन्होंने कितने नए सदस्य बनाए हैं?'


जब नीतीश ने इस मसले पर जवाब-तलब किया तो प्रशांत किशोर को पक्ष रखना पड़ा। प्रशांत के ट्वीट ने जाहिर भी कर दिया कि उन्हें पार्टी से बाहर कराने में आरसीपी का ही हाथ रहा है। प्रशांत ने अपने ट्वीट में लिखा था, 'नीतीश कुमार, आपको किस वजह से और क्यों जदयू से मेरे जुड़ाव के बारे में झूठ बोलना पड़ा? मुझे अपने ही रंग में रंगने की आपने खराब कोशिश की है। और अगर आप सच कह रहे हैं तो इस पर कौन यकीन करेगा कि अमित शाह के कहने पर रखे गए शख्स की बात नहीं सुनने का साहस अब भी आपके भीतर है।' उनका इशारा इस ओर था कि आरसीपी अमित शाह के एजेंट हैं। निश्चित रूप से इसमें दम नहीं था लेकिन निशाना तो साधा जा चुका था। ऐसे में प्रशांत किशोर के पास जदयू से अलग होने के सिवाय कोई चारा नहीं रह गया था। वहीं आरसीपी लगातार पार्टी के भीतर मजबूत होते चले गए।


सवाल है कि अब आगे क्या होने वाला है? आरसीपी सिंह जदयू के नए अध्यक्ष बन चुके हैं। इसके क्या मायने हो सकते हैं? इसकी संभावना कम ही है कि वह महज बिचौलिया होने से कुछ अधिक की भूमिका में नजर आएंगे। फिर भी इसकी संभावना जरूर है कि आरसीपी के पार्टी अध्यक्ष रहते समय जदयू फिर से एक नए सियासी सफर पर निकलना चाहेगी। लेकिन निश्चित रूप से यह आरसीपी और जदयू दोनों के ही लिए एक नई शुरुआत है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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