Ad

Showing posts with label Business Standard. Show all posts
Showing posts with label Business Standard. Show all posts

भारतीय, राष्ट्रवादी और मुस्लिम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

शेखर गुप्ता
भारतीय गणराज्य को मशहूर लेखिका-सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती रॉय का शुक्रगुजार होना चाहिए। उन्होंने अकेले अपने बूते पर देश को सशस्त्र माओवादी बगावत से बचाया।

ऐसा तब हुआ जब उन्होंने देश के माओवादियों को 'बंदूक वाले गांधीवादी' करार दिया। यह ऐसा उद्धरण था जो लंबे समय तक जिंदा रहेगा। इसने माओवादियों के पीडि़त होने को लेकर रही-सही सहानुभूति भी समाप्त कर दी। मार्केटिंग जगत का एक पुराना सच यह है कि झूठ सबसे तेजी से गिरता है। आप एक साथ गांधीवादी और माओवादी नहीं हो सकते। दिल्ली में बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित मेरे कार्यस्थल से 15 मिनट की दूरी पर या कहें एक मेट्रो स्टेशन भर की दूरी पर स्थित 17वीं सदी की जामा मस्जिद की सीढिय़ों पर शुक्रवार को जो हजारों मुस्लिम एकत्रित थे, उन्हें देखते हुए मैं सोच रहा था कि अरुंधती इन्हें क्या नाम देतीं?

इन मुस्लिमों का 'पहनावा' मुस्लिमों जैसा है। मुझे यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री ने अभी हाल में कहा है कि लोग जो कपड़े पहनते हैं उनसे उनके इरादों का पता लग जाता है। ये तिरंगे, संविधान और बाबा साहेब आंबेडकर और कुछेक तो महात्मा गांधी की तस्वीरों से 'लैस' थे। वे 'जन गण मन' और हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। वाम-उदारवादी विश्वदृष्टि के अनुसार राष्ट्रवाद के आक्रामक प्रतीकों यानी राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का प्रदर्शन तो बहुसंख्यक राष्ट्रवाद का ही अतिरंजित प्रतीक है और यह अंध राष्ट्रवाद की दिशा में अंतिम कदम है।

क्या होता है जब गणतंत्र का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह अपनी सबसे पवित्र मस्जिद की सीढिय़ों पर एकत्रित होकर कहता है कि वे सबसे पहले भारतीय हैं, वे संविधान, देश के ध्वज और राष्ट्रगान में आस्था रखते हैं और इस विचार को खारिज करते हैं कि कोई इस गणराज्य को नए सिरे से परिकल्पित कर सकता है चाहे उसे कितना भी बड़ा बहुमत क्यों न हासिल हो। देश में आए बदलाव को समझने के लिए गहराई से सोचना होगा। मुस्लिम भारतीय देशभक्ति पर बहुसंख्यकों के प्राथमिक दावे को प्रश्नांकित कर रहे हैं। यह काफी कुछ वैसा ही है जैसा ब्रिटेन में चार दशक पहले नस्लवाद के उभार के बाद प्रवासी (जिनमें अच्छे खासे भारतीय थे) कहा करते थे: चाहे कुछ भी हो हम यहीं रहने वाले हैं।

उनसे कोई लड़ नहीं सकता। उनके ऊपर गोली चलाने की कोई वजह नहीं है। देश बदल चुका है। आज की भाषा में कहा जा सकता है: मेरा देश बदल गया है, मित्रों। आप उन्हें सीएसएस और एनआरसी के बीच, नागरिक और शरणार्थी के बीच का भेद भी नहीं समझा जा सकते। आप पहले ही काफी कुछ कह चुके हैं, खासतौर पर 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए। आपने दो चीजें हासिल करने के लिए यह कदम उठाया।

एक, असम में एनआरसी में फंसे बंगाली हिंदुओं को बचाना और बंगाली मुस्लिमों को निकालना। दूसरा, पश्चिम बंगाल के हिंदुओं को इसे दोहराने के वादे से बहलाना। असम में एक आग बुझाने और पश्चिम बंगाल में दूसरी लगाने के क्रम में आपने दिल्ली में आग लगा दी। जामा मस्जिद राष्ट्रपति भवन से महज 7 किलोमीटर की दूरी पर है। वहां धारा 144 लगी थी और उसकी अवमानना कौन और कैसे कर रहा था?

कपड़े जिसमें टोपियां, बुरका, हिजाब और हरा रंग शामिल हैं, मुस्लिमों की सबसे बड़ी पहचान रही हैं। उनके मजहबी नारों को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। ऐसी ही एक पहचान उन दो युवा महिलाओं में से एक के फेसबुक पन्ने से उठाई गई जो अपने एक पुरुष मित्र को बचाने के लिए ढाल बन गई थीं। इससे यह नतीजा निकाल कर प्रचारित किया गया कि वे राष्ट्रवाद या धर्मनिरपेक्षता के प्रति किसी प्रतिबद्धता से नहीं बल्कि कट्टर इस्लाम से प्रेरित हैं। नाराज मुस्लिमों के इससे भी कठोर प्रतीक रहे हैं। मसलन एके-47, आरडीएक्स, कई मुजाहिदीन और लश्कर, अलकायदा और आईएसआईएस आदि। उन क्रोधित मुस्लिमों से लडऩा और उन्हें परास्त करना आसान है। हाल ही में जयपुर की एक अदालत ने ऐसे चार लोगों को सिलसिलेवार धमाकों के इल्जाम में मौत की सजा सुनाई। करीब तीन दशक से असल चिंता यह रही है कि यदि मुस्लिम वाकई हताश होकर आतंक की राह पर गए तो क्या होगा?

सिमी से लेकर इंडियन मुजाहिदीन तक छोटे समूहों ने इस धारणा की पुष्टि की है। यहां तक कि डॉ. मनमोहन सिंह जैसे उदार और दूरदर्शी व्यक्ति ने 2009 में कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में वरिष्ठ पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा था कि मुस्लिमों को विशेष तरजीह देने की शिकायत कर रहे लोगों को समझना चाहिए कि यदि देश की कुल मुस्लिम आबादी का एक फीसदी भी यह सोच लेता है कि भारत में भविष्य नहीं है तो देश शासन करने लायक नहीं रह जाएगा। वह संप्रग का दौर था जहां मुस्लिमों के प्रति इसलिए उदारता जरूरी थी कि कहीं वे गलत राह न पकड़ लें।

फिर भी कुछ मुस्लिम उस राह पर गए। संप्रग उनसे उतनी ही कड़ाई से निपटा जितना शायद आज राजग करे। बाटला हाउस मुठभेड़ इसकी बानगी है। आज इन तथ्यों की कई तरह की व्याख्या हो सकती है। परंतु निष्कर्ष एक ही होगा। एक पक्ष मुस्लिमों के प्रति अफसोस के साथ संतुष्ट करना चाहता है ताकि वे राष्ट्र विरोधी न हों। दूसरा एक आंख के बदले दोनों आंखें चाहता है। बल्कि वह बहुसंख्यक वर्ग से जवाबी आतंकी बचाव भी चाहता है। दोनों ही मुस्लिमों को संदेह से देखते हैं। भारतीय मुस्लिमों की एक अन्य नकारात्मक बात उनके धार्मिक नेता- जामा मस्जिद के बुखारी, मदनी और वे दाढ़ी वाले जो चैनलों पर आकर हास्यास्पद फतवों का बचाव करते दिखते हैं।

इनकी तादाद बहुत ज्यादा है। आपको हमेशा कोई न कोई बुखारी या मदनी किसी न किसी मुद्दे पर राय देते दिख जाएंगे। बाबरी-अयोध्या निर्णय को ही देखिए या बुखारी का यह कहना कि सीएए-एनआरसी मुस्लिमों के लिए खतरा नहीं है। परंतु वह उस मस्जिद की सीढिय़ों पर एकत्रित हजारों लोगों से यह बात कहने का साहस नहीं कर सकते जिसके वह संरक्षक हैं।

हो सकता है सबकुछ एकदम बेहतरीन न हो लेकिन आज इन नकारात्मक छवियों को चुनौती मिल रही है। कलमा की जगह 'जन गण मन', हरे झंडे की जगह तिरंगा, काबा के बजाय आंबेडकर और गांधी की तस्वीरें तथा हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे सुनाई दे रहे हैं। एक चीज जो नहीं बदली है, वह हैं कपड़े। जैसा हमने पहले कहा, ये मुस्लिमों के पहनावे वाले मुस्लिम हैं। वे हमें याद दिला रहे हैं किसी भारतीय के पहनावे और उसकी देशभक्ति में कोई विरोधाभास नहीं है। या एक नागरिक के रूप में उनसे संविधान की अपेक्षाओं पर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। एक बड़ी रूढि़ टूट रही है।

जो लोग भारतीय मुस्लिमों को 'सभ्यताओं के संघर्ष' के चश्मे से देखते हैं वे बड़ी गलती कर रहे हैं। सन 1947 में भारतीय मुस्लिमों का एक बड़ा हिस्सा जिन्ना के साथ अपने नए मुल्क पाकिस्तान चला गया। जिन्ना के बाद के 72 वर्षों में उन्होंने किसी मुस्लिम को अपना नेता नहीं माना। उन्होंने हमेशा गैर मुस्लिम पर यकीन किया।

अभी भी बहुत कुछ शेष है क्योंकि हर कोई उतना संयत और समझदार नहीं है जितना कि जामा मस्जिद की सीढिय़ों पर एकत्रित लोग। जामा मस्जिद से सटे पुरानी दिल्ली के दरियागंज में कारें जलाई गईं। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात हर जगह हिंसक तत्त्व सक्रिय हैं। पश्चिम बंगाल हिंसा के मुहाने पर है। परंतु इनमें से कोई उस बदलाव को ढक नहीं सकता जो भारतीय मुस्लिमों ने दिल्ली में दिखाया है। वे नए भारतीय मुस्लिमों के उभार का संकेत दे रहे हैं। वे मुस्लिम दिखने से नहीं डरते और न ही अपने राष्ट्रवाद का प्रदर्शन करने से। वे संविधान, भारतीय ध्वज, राष्ट्रगान, आंबेडकर और गांधी के साथ हिंदुस्तान जिंदाबाद का नारा लगाते हुए अपनी लड़ाई जारी रखना चाहते हैं। ऐसे समय में शायर राहत इंदौरी का शेर प्राय: दोहराया जा रहा है: सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है। वह यकीनन मुस्करा रहे होंगे।
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
Share:

एक सांख्यिकीय संस्थान का दम तोड़ रहा वजूद (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सुनील के सिन्हा
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की भारत में बेरोजगारी की स्थिति पर तैयार रिपोर्ट जारी न होने से उठे विवाद और राष्ट्रीय सांख्यिकीय संगठन (एनएसओ) की घरेलू उपभोग पर तैयार रिपोर्ट लीक होने से संबंधित विवादों से भारतीय सांख्यिकीय प्रणाली की विश्वसनीयता गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। ऐसे वक्त में यह बेहद जरूरी है कि एनएसएसओ के कामकाज पर एक नजर डाली जाए। भारतीय सांख्यिकीय प्रणाली का विकास हमारी बेहद विशाल एवं विकेंद्रित अर्थव्यवस्था के बारे में विभिन्न मसलों से संबंधित आंकड़े जुटाने के लिए किया गया था। इस प्रणाली की प्रभावी उपलब्धियों के बावजूद आंकड़ों की गुणवत्ता को लेकर चिंताएं बढ़ती रही हैं। आंकड़ों का संग्रह, सारिणीकरण और उनकी व्याख्या की समस्याएं दूर करने के लिए 1961 में भारतीय सांख्यिकी सेवा (आईएसएस) का गठन किया गया। फिर रंगराजन आयोग की अनुशंसाओं के मुताबिक 12 जुलाई, 2006 को राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग वजूद में आया।

एनएसएसओ को अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं से संबंधित घरेलू एवं उद्यम जगत से जुड़े व्यापक सर्वेक्षण करने का जिम्मा दिया गया। सरकार ने दिवंगत प्रोफेसर पी सी महालनोबिस की सलाह पर एनएसएसओ का गठन 1950 में किया था। महालनोबिस उस समय नेहरू मंत्रिमंडल के सांख्यिकी सलाहकार थे। राष्ट्रीय आय समिति ने राष्ट्रीय आय के कुल जोड़ की गणना के लिए उपलब्ध सांख्यिकी आंकड़ों में बड़ी खामियां पाई थीं। इन कमियों को दूर करना ही एनएसएसओ का मुख्य मकसद था। अप्रैल 1961 में सांख्यिकी विभाग का गठन किया गया और एनएसएसओ इसका अंग बना दिया गया। अक्टूबर 1999 में एनएसएसओ सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय में एक संबद्ध कार्यालय बन गया।

एनएसएसओ ने अपने सर्वेक्षण अभियान की शुरुआत अक्टूबर 1950 से मार्च 1951 के दौरान ग्रामीण इलाकों में विभिन्न मुद्दों के बारे में पड़ताल से की थी। दसवें दौर का सर्वेक्षण होने तक एनएसएसओ पूरी तरह व्यवस्थित हो चुका था। संसद में 1959 में अधिनियम पारित होने के बाद भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई) को भी वैधानिक दर्जा मिल गया। इसकी आम स्वीकृति इससे पता चलती है कि सरकारी संगठन एवं स्वायत्त संस्थान जरूरी आंकड़े जुटाने के लिए एनएसएस की सर्वे पद्धति में रुचि दिखाते थे।

सांख्यिकी मंत्रालय के एक प्रशासकीय आदेश के मुताबिक मई 2019 में एनएसएसओ को केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के साथ मिलाकर नया संगठन एनएसओ बना दिया गया। हालांकि एनएसएसओ के चार प्रकोष्ठ यथावत बने रहे। लेकिन ऐसा लगता है कि एनएसएसओ को विश्लेषणात्मक रिपोर्ट पेश करने को लेकर पहले जो थोड़ी-बहुत स्वायत्तता हासिल थी, अब वह क्षीण हो गई है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अब भी कार्य-समूह एवं तकनीकी समितियां और राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग (एनएससी) मौजूद हैं, लेकिन उनकी मौजूदा भूमिका विशुद्ध रूप से तकनीकी ही हैं। एनएसएसओ की कुछ हालिया रिपोर्ट जारी होने के पहले मीडिया में लीक होने के बाद कई तरह के आरोप लगाए गए थे।

अगले साल एनएसएसओ 70 साल पुराना संगठन हो जाएगा। भारतीय सांख्यिकीय प्रणाली का एक शुभचिंतक होने और खुद इस व्यवस्था का 37 वर्षों तक हिस्सा रहने वाले शख्स के नाते मैं आंकड़ों की गुणवत्ता सुधारने के लिए कुछ सुझाव रख रहा हूं:

सत्ता पर काबिज सरकार को आंकड़ा संग्रह का काम प्राथमिकता में रखना चाहिए और संक्षिप्त अवधि की अनुबंधित नियुक्तियों से परहेज करना चाहिए। आंकड़े जुटाने के काम में लगे नियमित कर्मचारियों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि किए जाने से रोजगार अवसर भी बढ़ेंगे। अधिक स्वायत्तता के लिए एनएसएसओ को सांख्यिकीय आयोग के मातहत रखा जाना चाहिए। इसके अलावा सांख्यिकीय आयोग को कानूनी रूप से अधिक सशक्त भी बनाया जाना चाहिए।

आंकड़े जुटाने के काम में लगे कर्मचारियों को मौजूदा समय की अधीनस्थ सांख्यिकीय सेवा का अंग होना चाहिए।

अधीनस्थ सांख्यिकीय सेवा का नाम बदलकर सहयोगी सांख्यिकीय सेवा कर दिया जाना चाहिए। इसमें डेटा संग्राहकों को भी जगह दी जानी चाहिए।

डेटा संग्राहकों की संख्या एनएसएसओ द्वारा किए जाने वाले सर्वेक्षण के नमूना आकार के आधार पर तय की जा सकती है। उन्हें उन राज्यों में तैनात करना चाहिए जहां के वे निवासी हों और वहां की स्थानीय भाषा से भी परिचित हों।

एनएसएसओ दरों, अनुपात एवं प्रतिशत के संदर्भ में पैमानों का आकलन करता रहा है लिहाजा एनएसएस के हालिया सर्वेक्षणों का मौजूदा नमूना आकार बुनियादी मानकों के बारे में विश्वसनीय अनुमान देने के लिए पर्याप्त है।

एनएसएसओ को अब पैनल नमूना दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जैसा कि भारत के महापंजीयक (आरजीआई) में नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) के लिए किया जा रहा है। नमूना डिजाइन में इस तरह का बदलाव लाने के लिए कुछ तकनीकी पहलुओं पर भी गौर करने की जरूरत पड़ सकती है।

एनएसओ के सर्वे डिजाइन एवं शोध प्रभाग (एसडीआरडी) के लिए अनुसंधान पर अधिक ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अभी तक वे बुनियादी तौर पर सर्वे सूची के डिजाइन, सारिणीकरण योजना, क्षेत्र में तैनात कर्मचारियों के लिए दिशानिर्देश जारी करने, प्रशिक्षण और संग्रहीत आंकड़ों पर आधारित विश्लेषणात्मक रिपोर्ट तैयार करने में ही लगे हुए हैं। उन्हें यूनिट स्तरीय डेटा पर आधारित अधिक विश्लेषणात्मक अध्ययन करना चाहिए।

एनएसओ के फील्ड ऑपरेशन प्रभाग को अपने कर्मचारियों के प्रशिक्षण, पर्यवेक्षण एवं औचक निगरानी के अलावा पर्यवेक्षकों की यात्रा डायरी के विश्लेषण पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

(लेखक एनएसएसओ के पूर्व महानिदेशक एवं सीईओ हैं)
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
Share:

अलग-अलग रुख (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन
अर्थव्यवस्था को लेकर अलग-अलग रुख अपनाया जा रहा है और सत्ताधारी दल की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं इतनी ज्यादा हैं कि उनकी अनदेखी करनी संभव नहीं है। नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के आरंभ से ही यह स्पष्ट रहा है कि सरकार के लिए राजनीति अर्थव्यवस्था से ऊपर है। ऐसा 2014 में मोदी के लंबे चौड़े भाषण के बावजूद था। आज यह कहीं अधिक स्पष्ट है: अर्थव्यवस्था की महत्ता आज राजनीतिक संबद्धता के बुनियादी नियमों से भी कमतर रह गई है जहां संघ परिवार के लंबे समय से चले आ रहे नारों को अमली जामा पहनाया जा रहा है। आप दलील दे सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनावी जनादेश हासिल किया है। जब इंदिरा गांधी राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रही थीं। तब जनादेश और बड़ा था। इसके चलते ही उन्होंने वाम रुझान वाली आर्थिक नीति अपनाते हुए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीयकरण किया, प्रतिबंधात्मक श्रम कानून बनाए और तथा ऐसे ही अन्य कानून पारित किए। उन्होंने भू-कानूनों को भी कड़ा किया। अर्थव्यवस्था आज तक राजनीति को दी गई उस वरीयता की कीमत चुका रही है। क्या इतिहास अपने आपको दोहराएगा?

बड़े बदलाव टुकड़ों में नहीं आते हैं और फिलहाल काफी कुछ छिटपुट तरीके से हो रहा है। यह सब उस नई बहस का हिस्सा हो सकता है जिसमें राष्ट्रीय नागरिक पंजी द्वारा संभावित अशांति भी शामिल है। भाजपा चाहे जितनी दबदबे वाली पार्टी बन गई हो, घरेलू राजनीतिक हालात दर्शाते हैं कि केंद्र और राज्य के स्तर पर तस्वीर एकदम विरोधाभासी है। भाजपा के लिए चुनौतियां लगातार बरकरार हैं। हिंदुत्व के एजेंडे के साथ हिंदी प्रदेश में जीत सुनिश्चित करने के उसके प्रयास ने उसे तमाम तरह की अल्पसंख्यक आबादी के सामने ला खड़ा किया है। इसके परिणाम का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। पूर्वोत्तर में इनर लाइन जैसी परिवर्ती व्यवस्था अब स्थायी स्वरूप ले रही है और इसका विस्तार हो रहा है। इससे देश नये तरीके से बंट रहा है। असम में नये सिरे से समस्या शुरू हो गई है जबकि कश्मीर में आम जनता लगातार पांचवें महीने तमाम प्रतिबंधों से गुजर रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो पश्चिम के उदार लोकतांत्रिक देशों ने जिन वजहों से अधिनायकवादी चीन पर भारत को तवज्जो दी थी और उसके साथ आपसी रिश्ते कायम किए उन पर भी अब सवालिया निशान लग गए हैं।

अमेरिका और यूरोप में आलोचना की जा रही है जो आगे और बढ़ेगी। पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में प्रतिक्रिया नजर भी आने लगी है। कमजोर भारतीय अर्थव्यवस्था के चलते चीन से मिल रही चुनौती का सामना करना मुश्किल होता जाएगा, क्योंकि उसने भारत की तरह अपनी गति नहीं खोई है। दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था के नाते भारत आकर्षक बाजार बना रहेगा लेकिन उसने जो गति खो दी उसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर आएगा। आर्थिक कूटनीति के मामले में हालात उलट गए हैं जिससे हम अप्रभावित नहीं रह सकते। सन 2020 में अर्थव्यवस्था में कुछ हद तक सुधार की अपेक्षा की जा सकती है लेकिन तत्काल पहले जैसी तेज आर्थिक वृद्धि हासिल करने की राह में बड़ी बाधाएं हैं। वित्तीय क्षेत्र की दिक्कतें कायम हैं और छोटे और मझोले उपक्रम संघर्षरत हैं। कृषि के मोर्चे पर दिक्कत है और निर्यातक मुद्रा नीति के कारण परेशानी में हैं। वृहद आर्थिक मोर्चे पर बात करें तो राजकोषीय स्थिति बुरी है क्योंकि केंद्र अपने बिल तक चुकाने की स्थिति में नहीं है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)में कुछ बुनियादी समस्या हैं जो कर के मोर्चे पर भी दिक्कतदेह बनी हुई हैं। चुनाव पूर्व कर दरों में कमी ने हालात और खराब किए।

मौद्रिक नीति की अपनी सीमाएं हैं और बहुत अधिक गुंजाइश नजर नहीं आ रही। जीएसटी राजस्व में कमी के कारण सरकार की निजी बेहतरी की प्रतिबद्धताएं अब मुश्किल में हैं। इनमें चुनाव पूर्व किसानों को धन राशि देने का वादा भी शामिल है। इन वादों पर अमल अपने साथ राजकोषीय फिसलन लाएगा और इसके लिए ऋण लेना पड़ सकता है जो जीडीपी के अनुपात में सरकारी कर्ज में इजाफा करेगा। परिवहन के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश से भी अपेक्षित प्रतिफल नहीं मिला जबकि बिजली क्षेत्र में अव्यवहार्यता बरकरार है। भाजपा की राजनीतिक दबदबे और संबद्धता के नियमों का पुनर्लेखन बताता है कि उसकी प्राथमिकताएं कितनी गलत हैं। ऐसे में शायद वापसी मुश्किल हो जाए। अनुमान यह है कि अगले आम चुनाव से पहले आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी लेकिन अगर मौजूदा दिशा नहीं बदली गई तो ऐसे अनुमान गलत साबित होंगे। सरकार को इस पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
Share:

तीन ऐसे खतरनाक मिथक जिनसे बना रहा आशावाद (बिजनेस स्टैंडर्ड)

मिहिर शर्मा
मंदी के इस दौर में मौजूदा सरकार जो कदम उठा रही है उन्हें देखकर लगता है कि वह वाकई अपने ही प्रोपगंडा पर यकीन करती है। कुछ लोगों की आशंका है कि असहज करने वाले आंकड़े छिपाने और निवेशकों तथा मतदाताओं के समक्ष गुलाबी तस्वीर पेश करने की उसकी प्रवृत्ति बताती है कि सरकार निजी तौर पर सोचती कुछ है और सार्वजनिक रूप से बताती कुछ और है। परंतु यह गलत हुआ तो? यदि सरकार वाकई अपनी इन बातों पर यकीन करती हो तो? इससे सरकार की आकलन और विश्लेषण क्षमताओं पर कुछ सवाल उठते हैं लेकिन यह उसे छल के आरोप से बरी करता है।


सन 2014 से ऐसे आशावादी लोगों की कमी नहीं रही जो अर्थव्यवस्था को लेकर कम नकारात्मक सोच रखने की मांग करते रहे हैं। अब जबकि फिलहाल के लिए ऐसी अधिकांश आवाजें खामोश हो चुकी हैं तो उन्हें संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए और पूछा जाना चाहिए कि किसी को ऐसे भ्रमित कैसे किया जा सकता है। दरअसल तीन मिथक हैं जिन्होंने हमें इस स्थिति तक पहुंचाया।

पहला मिथक: यह धारणा कि वर्ष 2012-13 का संकट समाप्त हो चुका है। नीतिगत पंगुता के उस दौर को याद कीजिए। उस वक्त ज्यादातर लोग मानते थे कि संप्रग सरकार पंगु थी और उसकी नीति निर्माण क्षमता और राजनीतिक पूंजी की कमी ने अर्थव्यवस्था को ठप कर दिया, निवेश में धीमापन आया और वृद्धि में गिरावट आई। ऐसे में जब 2014 में बहुमत की सरकार आई तो लगा कि संकट हल हो जाएगा। परंतु यह सोचना गलत था। सन 2012-13 का संकट किसी एक सरकार की नीतिगत पंगुता का संकट नहीं था। यह सरकारी मशीनरी की नाकामी का संकट था। नियमन इतने मजबूत नहीं थे कि वृद्धि और पारदर्शिता दोनों हासिल हो सकें, विवाद निस्तारण व्यवस्था कमजोर थी जिससे पूंजी दांव पर लग गई थी। निजी क्षेत्र के प्रतिफल को प्रभावित करने वाले सरकारी कदमों के कारण अतिरिक्त सतर्कता की स्थिति बन गई थी। इस दिशा में ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता जैसे कुछ कदम उठाए गए। परंतु संकट की बुनियादी वजहों का निराकरण नहीं किया जा सका। हम उसी संकट का परिणाम झेल रहे हैं।

दूसरा मिथक: यह धारणा कि भारी-भरकम सरकारी निवेश वृद्धि के लिए पर्याप्त है। यह विचार भी तमाम गलत धारणाओं से उपजा इनमें से एक थी चीन के मॉडल को गलत ढंग से समझना। सच यह है कि बेहतर बुनियादी ढांचा तभी मायने रखता है जब निजी क्षेत्र को उसका उपयोग फायदेमंद लगे। ऐसी बुनियादी परियोजनाओं की सार्वजनिक फंडिंग तभी काम आती है जब निजी क्षेत्र नई परियोजनाओं में निवेश कर अतिरिक्त बुनियादी ढांचे तैयार करता है। चीन की अर्थव्यवस्था राज्य संचालित है। वहां निजी निवेश को आसानी से ऐसा करने को कहा जा सकता है। भारत में इसकी संभावना कम है। खासकर तब जब निजी क्षेत्र के पास फंड की कमी हो। निजी क्षेत्र की दिक्कतों मसलन अतिरिक्त क्षमता, कर्ज के बोझ, कर आंतक और कड़े नियमन को दूर किए बिना बुनियादी क्षेत्र में निवेश की अपेक्षा बेमानी है। ऐसे में राज्य का निवेश अपेक्षित नहीं था। यदि कोई ट्रक खरीदना नहीं चाहता या परिवहन के लिए वस्तुएं ही नहीं हैं तो राजमार्ग निर्माण का कोई मतलब नहीं है।

तीसरा मिथक: अतृप्त भारतीय घरेलू मांग का विचार। हमने कई ऐसे वर्ष देखे हैं जब मांग वृद्धि का सहयोग करती दिखी। परंतु यह एक लोकलुभावन नीति का उत्पाद थी जिसने अस्थायी रूप से आय वृद्धि, घरेलू ऋण विस्तार का सहयोग किया। वहीं खाद्य और ईंधन मुद्रास्फीति में ढांचागत कमी ने आपूर्ति क्षेत्र पर सकारात्मक असर डाला। इनमें से कोई कारक स्थायी नहीं है। ऐसे में अनकही अपेक्षा यह थी कि मांग में तब तक तेजी बनी रहेगी जब तक कि निजी क्षेत्र में क्षमता का पूरा इस्तेमाल सुनिश्चित नहीं हो जाता और निवेश को नए सिरे से गति नहीं मिल जाती। परंतु ऐसा लगता है कि यदि ऐसा संभव था तब भी मांग उस सीमा तक नहीं पहुंच सकी। निजी क्षेत्र ऋण की कमी से जूझ रहा है लेकिन उसे उन निवेश परियोजनाओं की धन के लिए पैसे की जरूरत भी महसूस नहीं हो रही है जो अचानक आकर्षक प्रतीत होने लगी हैं। दिक्कत यह है कि देश की उपभोक्ता आधारित अर्थव्यवस्था के आकार और उसके घटक को लेकर जरूरत से ज्यादा विश्वास किया जा रहा था। ऐसी अर्थव्यवस्था जो विकास की हमारे जैसी अवस्था में हो वह निवेश और वृद्धि के लिए केवल घरेलू मांग पर निर्भर नहीं रह सकती। चीन ने वृद्धि का जो चमत्कार किया है या उससे पहले पूर्वी एशिया के देशों में जो हुआ उसकी वास्तविक व्याख्या यह है कि घरेलू आपूर्ति प्रतिक्रिया घरेलू के बजाय वैश्विक मांग से संबद्ध रही। दूसरे शब्दों में भारत को कारोबारी देश बनना होगा। शायद सरकार का यह सोचना सही है कि घरेलू उद्योग को व्यापारिक प्रभावों से बचाया जाए लेकिन यदि ऐसा है तो पहले दिन से सरकार का प्रयास यह होना चाहिए था कि भारतीय विकास को विश्व बाजार तक पहुंच बनानी चाहिए, बस चुनिंदा घरेलू उद्योगों को अस्थायी संरक्षण देना चाहिए। खेद की बात है कि सरकार की दृष्टि केवल घरेलू मांग और उद्योग पर केंद्रित है। विश्व बाजार उसकी नजर से ओझल है। यानी सतत मांग की कमी के कारण निजी क्षेत्र में अतिरिक्त क्षमता की समस्या बनी रहेगी।

परंतु यदि मध्यम अवधि में ऐसा आशावादी रुख रखना है तो यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या नकारात्मकता के इन स्रोतों को समाप्त किया जा सकता है? प्रशासनिक और कारक बाजार के ढांचागत सुधार की मदद से ही 2012-13 के संकट से उबरा जा सकता है। निजी क्षेत्र के सहयोग के साथ सरकारी व्यय की गुणवत्ता सुधारनी होगी, ऐसा करके ही सरकार के पूंजीगत व्यय की मदद से उत्पादकता और वृद्धि में सुधार किया जा सकता है और अतिरिक्त क्षमता का इस्तेमाल और निवेश परियोजनाओं की कमी दूर की जा सकती है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो नकारात्मकता के बरकरार रहने की पर्याप्त वजह है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
Share:

अर्थव्यवस्था की स्थिति और सरकार का रुख (बिजनेस स्टैंडर्ड)

देवाशिष बसु
देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्घि दर इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में गिरकर 4.5 फीसदी रह गई। पूरे वर्ष के लिए यह अधिक से अधिक 5 फीसदी रहेगी। आम आदमी को यह समझ नहीं आ रहा कि पांच वर्ष से अधिक समय से देश पर विकास पुरुष का शासन होने के बावजूद वृद्घि दर 7.5 फीसदी से गिरकर 4.5 फीसदी कैसे रह गई। मायूसी की स्थिति है लेकिन इस अप्रत्याशित स्थिति को लेकर कोई आधिकारिक आर्थिक दलील सुनने को नहीं मिली जो हालात को स्पष्ट कर सके। अब जरूर सरकार की ओर से आर्थिक दलील सुनने को मिल रही हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन विवेक देवराय ने पत्रिका 'ओपन' में एक आलेख लिखकर मंदी के बारे में स्पष्टीकरण दिया है। उनकी मुख्य दलीलें इस प्रकार हैं।

1. हम अभी भी वृद्घि हासिल कर रहे हैं, प्रसन्न रहिए: भारत दुनिया की सबसे तेज विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। मेरा (उनका नहीं) मानना है कि लोग बिना मंदी को महसूस किए मंदी की बात करते हैं। परिभाषा की बात करें तो लगातार दो तिमाहियों में जीडीपी में कमी आने पर ऐसा कहा जा सकता है। यह सच है लेकिन देवराय अनुमान बनाम हकीकत की बात पर चूक जाते हैं। लोगों ने मतदान बेहतरी के लिए दिया था या बदतरी के लिए? सन 2014 में क्या वाकई उन्होंने उम्मीद की होगी कि मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल के बाद 5 फीसदी की वृद्घि दर मिलेगी।

2. मुद्रास्फीति कम है, प्रसन्न रहिए: चूंकि जीडीपी के आंकड़ों का मुद्रास्फीति के साथ समायोजन किया जाता है इसलिए यदि मुद्रास्फीति 3 फीसदी है तो वर्ष की नॉमिनल वृद्घि 8 फीसदी होगी। वर्ष 2014 के बाद से सरकार की प्रमुख उपलब्धियों की बात करें तो मुद्रास्फीति में कमी इनमें प्रमुख है। लेकिन इसकी अधिक सराहना नहीं होती। वह कहते हैं कि मुद्रास्फीति गरीबों को अधिक प्रभावित करती है। वह याद दिलाते हैं कि यदि वास्तविक वृद्घि दर 5 फीसदी, मुद्रास्फीति 10 फीसदी और सांकेतिक वृद्घि दर 15 फीसदी होती तो हालत ज्यादा खराब होती।

यहां कई बातें हैं। कम मुद्रास्फीति कम समेकित मांग के कारण है। यह स्वतंत्र चर नहीं है क्योंकि मोदी सरकार के विभिन्न कदम वृद्घि और मुद्रास्फीति में इस गिरावट के लिए उत्तरदायी हैं। यह एक अनचाहा परिणाम है। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मुद्रास्फीति को कम करके गरीबों को राहत देना सरकार का नीतिगत लक्ष्य था। हकीकत में मोदी सरकार का सबसे बड़ा वादा किसानों की आय दोगुनी करने का था। चूंकि देश कोई बड़ा कृषि निर्यातक नहीं है इसलिए इससे भारी खाद्य मुद्रास्फीति उभरती।

3. कमजोर वैश्विक कारोबार का दोष है सरकार का नहीं: देवराय कहते हैं कि जीडीपी वृद्घि का कम से कम 3 फीसदी निर्यात से आता है। यदि निर्यात वृद्घि समाप्त हो जाएगी तो जीडीपी वृद्घि दर 6 फीसदी पर सिमट जाएगी। देवराय के मुताबिक निर्यात को तीन कारक प्रभावित करते हैं: वैश्विक मांग, वैश्विक आपूर्ति और विनिमय दर। इनमें से पहले के बारे में सरकार कुछ नहीं कर सकती और तीसरे में भी उसका मामूली दखल है। जहां तक आपूर्ति की बात है तो सरकार ने लॉजिस्टिक्स में सुधार के उपाय अपनाए हैं। यानी कुल मिलाकर विशुद्घ निर्यात सीमित बना रहेगा।

यदि यह सब जमीनी घटनाक्रम की तुलना में बहुत असंबद्घ और अकादमिक प्रतीत हो रहा है तो वाकई ऐसा है। सन 2010 में विश्व के वस्त्र निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 36.6 फीसदी थी जो 2018 में घटकर 31.8 फीसदी रह गई क्योंकि श्रम की लागत बढ़ी और तमाम ढांचागत बदलाव देखने को मिले। इसका लाभ वियतनाम और बांग्लादेश को मिला जिनकी हिस्सेदारी क्रमश: 2.9 फीसदी से बढ़कर 6.2 फीसदी और 4.2 फीसदी से बढ़कर 6.4 फीसदी हो गई। जबकि भारत की हिस्सेदारी 3.3 फीसदी से गिरकर 3.2 फीसदी रह गई। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि भारत में कारोबार करने की छोटी मोटी लागत बहुत अधिक है। इसके लिए केंद्र और राज्य दोनों उत्तरदायी हैं। इसे ढांचागत सुधारों की मदद से हल किया जा सकता है लेकिन देवराय के अनुसार यह दलील बेतुकी है। अगले बिंदु पर गौर कीजिए।

4. ढांचागत बनाम चक्रीय की बहस बेमानी है: देवराय लिखते हैं कि संकट की प्रकृति के ढांचागत या चक्रीय होने को लेकर एक बहस चल रही है जो बेमानी है। यह बेमानी क्यों है? क्योंकि उनके मुताबिक सरकार असहाय है। वह मानते हैं कि ढांचागत बदलाव का अर्थ केवल निजीकरण और श्रम एवं भूमि कानूनों में बदलाव है। वह कहते हैं कि निजीकरण एक प्रक्रिया है जिसमें हड़बड़ी नहीं की जा सकती। विधायी बदलाव आवश्यक हैं जो संसद ही कर सकती है। जबकि सर्वाधिक मूल्यवान परिसंपत्ति यानी भूमि पर प्राय: राज्य सरकारों का आधिपत्य है। इसे केंद्र सरकार नहीं बेच सकती।

देवराय कहते हैं कि भूमि और श्रम आंशिक रूप से राज्य का मसला हैं और भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 ने भूमि की लागत बढ़ाई और बुनियादी परियोजनाओं को पूरा करना कठिन कर दिया। उनके मुताबिक देश की वृद्घि दर में राज्यों के क्रियाकलाप का भी पूरा असर होता है और अकेले केंद्र सरकार ज्यादा कुछ नहीं कर सकती। सच तो यह है कि ढांचागत सुधारों का निजीकरण, भूमि या श्रम से ज्यादा लेनादेना नहीं होता। इसका संबंध निजी उद्यमों के दायरे के विस्तार तथा उनको प्रतिस्पर्धी और उत्पादक बनाने की इजाजत से अधिक है। इसकी शुरुआत कारोबार करने की छिटपुट लागत खत्म करने और राज्यों में भ्रष्टाचार के समापन से होनी चाहिए। वर्ष 2015 में एक आलेख में मैंने पूछा था कि आखिर भाजपा के इकलौते वोट जुटाऊ नेता (जो राज्यों के चुनाव में भी पार्टी के लिए वोट जुटाते हैं) प्रधानमंत्री मोदी भाजपा के शासन वाले राज्यो के साथ तालमेल करके हमें क्यों नहीं दिखाते कि राज्य स्तर पर किन सुधारों को अंजाम दिया जा सकता है?

कुल मिलाकर देवराय के मुताबिक 5 फीसदी की वृद्घि दर में दिक्कत की कोई बात नहीं। यह 6 फीसदी तक हो सकती है और अभी जो 'साफ-सफाई' चल रही है वह अर्थव्यवस्था को अधिक औपचारिक और किफायती बनाएगी। परंतु ऐसा रातोरात नहीं होगा। देवराय की बातें इस बारे में बहुत उपयोगी हैं कि आप इस सरकार से मंदी को लेकर क्या कदम उठाने की उम्मीद कर सकते हैं? आखिर हम सभी यह बात जानना चाहते हैं। इसका सीधा उत्तर है: कुछ खास नहीं।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
Share:
Copyright © संपादकीय : Editorials- For IAS, PCS, Banking, Railway, SSC and Other Exams | Powered by Blogger Design by ronangelo | Blogger Theme by NewBloggerThemes.com