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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Saturday, January 23, 2021

पुदुच्चेरी की दिलचस्प राजनीति और नारायणसामी की भूमिका (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस 

एक वक्त था जब कांग्रेस नेता और पुदुच्चेरी के वर्तमान मुख्यमंत्री वी नारायणसामी को उनके नारंगी बालों की वजह से बहुत दूर से पहचाना जा सकता था। अब उनकी जगह काले बालों ने ले ली है। हां, गंभीरता दिखाने के लिए बीच-बीच में कुछ भूरे-सफेद बाल भी हैं। बहरहाल, पुदुच्चेरी (और तमिलनाडु) में आगामी अप्रैल-मई में आम चुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों में नारायणसामी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

इस महीने के आरंभ में संकट को टालने के लिए ही नारायणसामी ने अपने कांग्रेस सहयोगियों के साथ खुली सड़क पर सितारों के नीचे रात बिताई। अवसर था पुदुच्चेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का। वही किरण बेदी जिन्हें नारायणसामी दुष्ट आत्मा तक बता चुके हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि कांग्रेस की चुनावी साझेदार द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) इस विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं थी। पार्टी ने केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ कांग्रेस सरकार के बुलाए विधानसभा के विशेष सत्र में भी हिस्सा नहीं लिया। वह यह दबाव बना रही है कि कांग्रेस अपने दम पर अकेले विधानसभा चुनाव लड़े। सत्ताविरोधी माहौल को देखते हुए नारायणसामी चुनावी मुद्दे की तलाश में हैं। किरण बेदी ने शायद उन्हें यह अवसर प्रदान किया है।


अन्य दावेदारों की बात करें तो ए नमशिवायम को सरकार में शामिल कर लिया गया और पूर्व मुख्यमंत्री वी वैद्यलिंगम लोकसभा में चले गए। ऐसे में कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने पार्टी में अपने विरोधियों को शांत कर लिया है लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या है द्रमुक का प्रबंधन करना। यह वह दल है जिसे कांग्रेस अपना सहयोगी मानती है। सन 2016 के विधानसभा चुनाव में इस गठजोड़ को 56 फीसदी मत मिले थे।


परंतु इस बार द्रमुक की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं। द्रमुक सांसद एस जगतरक्षकन, जो पुदुच्चेरी के प्रभारी रहे हैं, उन्होंने पिछले दिनों एक बैठक के बाद कहा कि उनकी पार्टी सभी 30 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और सारी सीटें जीतेगी। उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि वह नाकाम होते हैं तो उसी मंच पर आत्महत्या कर लेंगे। जाहिर है अगर द्रमुक जीतती है तो वह मुख्यमंत्री हो सकते हैं।


मौजूदा विधानसभा में द्रमुक के तीन विधायक हैं जबकि कांग्रेस के 15 विधायक। पड़ोसी राज्य तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (एआईएडीएमके) के पास चार सीटें हैं जबकि कांग्रेस से अलग होकर बनी अखिल भारतीय एनआर कांग्रेस के पास सात सीटें हैं। विधानसभा में 30 सीटे हैं। पुदुच्चेरी में 23, कारैक्काल में 5 तथा माहे और यनम मेंं एक-एक सीट है। ये सभी सीटें बहुत छोटे आकार की हैं जहां कुल मतदाता 15,000 से 30,000 के बीच हैं।


सन 2016 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सभी 30 सीटों पर अपने दम पर लड़ी थी लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। कांग्रेस ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 15 पर जीत हासिल हुई थी। द्रमुक नौ सीटों पर लड़ी और उसे दो पर जीत हासिल हुई। एआईएडीएमके ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे चार पर जीत हासिल हुई। एआईएनआर कांग्रेस ने सभी 30 सीटों पर प्रत्याशी उतारे और आठ पर जीती।


अधिकांश मौकों पर यही देखने को मिला है कि तमिलनाडु में जीतने वाला गठबंधन ही पुदुच्चेरी में जीतता है और परिणाम कमोबेश एक समान होते हैं। परंतु 2016 में यह रुझान उलट गया: हालांकि एआईएडीएमके को तमिलनाडु में जीत मिली और उसने सरकार भी बनाई लेकिन पुदुच्चेरी में कांग्रेस-द्रमुक गठजोड़ सत्ता में आया। इस बार गठबंधन टूटने की कोई वजह नहीं है केवल जगतरक्षकन की महत्त्वाकांक्षा ही आड़े आ रही है।


नारायणसामी पुरानी शैली के कांग्रेसी राजनेता हैं। वह शांत और समझदार हैं। सन 2016 में वह विधानसभा के सदस्य तक नहीं थे लेकिन वह चुने गए और उन्होंने पांच वर्ष तक पार्टी को एकजुट रखा। राजीव गांधी उन्हें पुदुच्चेरी से दिल्ली ले गए थे। वह महज 31 वर्ष की उम्र में राज्य सभा के सदस्य बने। एसएस आहलूवालिया, रत्नाकर पांडेय और सुरेश पचौरी के साथ वह संसद में राजीव के उस दस्ते का हिस्सा थे जिसे शोर मचाने वाला माना जाता था। नरसिंह राव के दौर में वह संसदीय दल के नेता बने। वह पहली बार तब सुर्खियों में आए जब राव के निर्देश पर सन 1996 में उन्होंने संयुक्त मोर्चा सरकार को कांग्रेस का समर्थन पत्र देने में देरी की। नतीजा यह हुआ कि अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। राव को आशा थी कि वाजपेयी की विफलता के बाद राष्ट्रपति उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे। नारायणसामी उस बड़े खेल में एक छोटा हिस्सा थे।


नारायणसामी की सबसे बड़ी प्रतिभा सतर्कता से पेशकदमी करने की है। उन्हें सभी पसंद करते हैं। उनके जीवन की शुरुआत गुलाम नबी आजाद और ऑस्कर फर्नांडिस जैसे लोगों को रिपोर्ट करने से हुई। अब वह उनसे आगे निकल चुके हैं। अहमद पटेल के साथ उनके बहुत खास रिश्ते थे। जब राहुल गांधी केवल सांसद थे तब नारायणसामी उनके आवास पर नियमित मुलाकात के लिए जाते थे।


हाल ही में सी-वोटर-एबीपी के एक पोल में कहा गया कि पुदुच्चेरी में कांग्रेस की सत्ता में वापसी मुश्किल है। कारण केवल यह नहीं है कि द्रमुक के साथ गठजोड़ टूट रहा है बल्कि राजग की बढ़ती लोकप्रियता भी इसकी वजह है। यहां राजग में भाजपा के साथ एआईएडीएमके और एआईएनआर कांग्रेस भी शामिल हैं। यदि द्रमुक कांग्रेस के साथ गठबंधन से बाहर होती है तो राजग को सत्ता में आने से रोकना मुश्किल नजर आता है। बहरहाल, अभी काफी समय बाकी है और नारायणसामी बालों को रंगीन रखें या काला, उन्हें कमतर नहीं आंका जाना चाहिए।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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ब्रॉडबैंड का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए जरूरी कदम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम पोनप्पा 

गत माह कैबिनेट ने देश भर में वाई-फाई कवरेज का विस्तार करने और ब्रॉडबैंड इंटरनेट की पहुंच और उसका इस्तेमाल बढ़ाने के लिए नीति घोषित की है। इस नीति में उल्लेख किया गया है कि कैसे विशिष्ट प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सार्वजनिक वाई-फाई हॉटस्पॉट नेटवर्क की स्थापना की जा सकती है और ब्रॉडबैंड इंटरनेट को उपयोगकर्ताओं को बेचा जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट में इसे काफी उत्साह के साथ दर्ज किया गया। हालांकि कई बार इसे लेकर भ्रामक रिपोर्टिंग भी की गई। जाहिर है दूरसंचार सेवा प्रदाताओं और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं ने इसका कड़ा विरोध किया है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि ऐसा करना उनके लाइसेंसशुदा अधिकारों का अतिक्रमण होगा। उनकी यह दलील सही प्रतीत होती है कि वे भी ऐसी ही शर्तों पर वाई-फाई हॉटस्पॉट विकसित कर सकते हैं क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में इस बात की अनदेखी कर दी गई है कि उन्होंने पहले ही इन लाइसेंस के लिए भारी धनराशि का भुगतान किया है।


नई नीति के तहत कोई भी व्यक्ति या उद्यम बिना लाइसेंस के सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें सरकार को कोई शुल्क भी नहीं चुकाना पड़ा। अब तक केवल लाइसेंसधारी दूरसंचार कंपनियां और आईएसपी ही ऐसा कर सकते थे और वे इसके लिए बाकायदा लाइसेंस शुल्क चुकाते थे। दूरसंचार कंपनियों को तो स्पेक्ट्रम भी खरीदना होता था। यही कारण है कि बिना सरकारी शुल्क के वाई-फाई सस्ता प्रतीत होता है। नई नीति के कुछ पहलू स्पष्ट नहीं हैं। उदाहरण के लिए मौजूदा कानून इंटरनेट सेवाओं को उपभोक्ताओं को दोबारा बेचने की इजाजत देते हैं या नहीं (पहले इस पर प्रतिबंध था) या फिर यह छोटे कारोबारों के लिए वाणिज्यिक रूप से कैसे व्यवहार्य होगा। दूसरे शब्दों में यदि सस्ती सेल्युलर सेवाओं तक पहुंच सुलभ होगी तो भला कोई भुगतान क्यों करेगा? एक सवाल यह भी है कि क्या रुचि होने पर गूगल, फेसबुक, एमेजॉन आदि विदेशी कंपनियों को यह इजाजत होगी कि वे संचार सेवाओं में निवेश कर सकें। खासतौर पर कॉर्पोरेट और सघन वाणिज्यिक क्षेत्रों में। इसके अलावा क्या रुचि रखने वाली भारतीय कंपनियों को ऐसा करने दिया जाएगा। इन सवालों के जवाब आवश्यक हैं।


सर्वव्यापी ब्रॉडबैंड इंटरनेट की सबसे बड़ी आवश्यकता है उच्च क्षमता वाले विश्वसनीय संचार की। यदि डेटा के प्रवाह की समुचित व्यवस्था नहीं की गई तो इसकी उपलब्धता और पहुंच बहुत सीमित रहेगी। नीतिगत बदलाव का पूरा ध्यान अंतिम उपभोक्ता पर केंद्रित है जबकि हमारी समस्याएं फाइबर कोर या सबनेटवर्क तक विस्तारित हैं। फाइबर से ग्राहक के घर तक या ग्राम पंचायत से गांव तक का मध्यम स्तर का लिंक भी नदारद है। भारतीय दूरसंचार विकास सोसाइटी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश गांव ग्राम पंचायत से 5-10 किलोमीटर के दायरे में हों।


ब्रॉडबैंड पहुंच में सुधार की आवश्यकता को स्वीकार करना होगा। इस दिशा में एक कदम यह हो सकता है कि संचार शृंखला में मौजूद कमियों को दूर किया जाए। इसमें वितरण और तकनीकी क्षेत्र की कमियां भी शामिल हैं। डिजिटल संचार का सबसे बुनियादी तत्त्व है संचार। ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा आपूर्ति की बात करें तो कहां किस तरह की आवश्यकता है, इसे लेकर योजना और क्रियान्वयन में कमी देखने को मिल रही है। ऐसा कुछ हद तक इसलिए है क्योंकि बाजार की अपेक्षा स्वसंगठित तंत्र की है जो हर जगह मौजूद नहीं है।


मध्य मील के लिए वायरलेस सेवाएं काफी करीब हैं क्योंकि स्पेक्ट्रम उपलब्ध है लेकिन भारत में उसकी इजाजत नहीं है। यह वह स्थान है जो प्रमुख नेटवर्क को स्थानीय नेटवर्क से जोड़ता है। ऐसा आंशिक तौर पर इसलिए है क्योंकि कुछ बैंड को अलग-अलग तरीके से बरतने को लेकर विवाद है। उदाहरण के लिए खुला वाई-फाई या दूरसंचार कंपनियों की सीमित पहुंच या प्रसारण या फिर केवल 4जी आदि। दूरसंचार विभाग के मुताबिक केवल लाइसेंस वाले सेवा प्रदाताओं को इन बैंड तक अबाध पहुंच की जरूरत होगी।


दूसरा पहलू विचार और सलाह-मशविरे से संबंधित है क्योंकि यहां मामला नई नीति के साथ विरोधाभास का है और एकदम अलग नीति की मांग करता है। इसके बावजूद यह अहम है क्योंकि ऐसी अहम बुनियादी सेवा में स्थिरता बरकरार रखना आवश्यक है जो जीवन, कामकाज, शिक्षा, मनोरंजन, सरकार और सुरक्षा समेत तमाम पहलुओं को प्रभावित करती है या उनसे संबंध रखती है। इसी प्रकार फिलहाल जब दुनिया महामारी से जूझ रही है और फंसी हुई परिसंपत्ति बड़ी बाधा बनी हुई है तब हमें न्यूनतम उथलपुथल के साथ उपयोग बढ़ाने की जरूरत है। क्या बेहतर नहीं होगा कि दूरसंचार कंपनियों और आईएसपी से सरकारी शुल्क समाप्त कर दिया जाए और इस क्षेत्र के लाइसेंसधारक सेवाप्रदाताओं को भी आगे बढऩे का अवसर दिया जाए? ऐसा इसलिए भी कि उनके पास बाजार में स्थापित पहुंच है, क्षमता है और अनुभव है। इससे जरूरी समय पर स्थिरता कायम रखने में मदद मिलेगी। सेवाप्रदाताओं के पास यह अधिकार है और वे विस्तार के अवसर का भी लाभ उठाना चाहेंगे। लेकिन ऐसा तभी होगा जब उन्हें संसाधन और प्रोत्साहन मिले। संसाधन के रूप में वह राशि काम आ सकती है जो लाइसेंस शुल्क नहीं चुकाने से बचेगी। सभी सरकारी शुल्क और लाइसेंस शुल्क समाप्त कर दिए जाने चाहिए। ऐसे में न केवल सेवा प्रदाता कई शहरी इलाकों में हॉटस्पॉट में निवेश करेंगे बल्कि संचार सेवा उद्योग में नई तेजी भी देखने को मिलेगी।


निष्पक्ष तरीके से देखा जाए तो सेवा प्रदाता पहले ही लाइसेंस शुल्क चुका चुके हैं और वे स्पेक्ट्रम की नीलामी की कीमत भी दे चुके हैं। ऐसे में सरकारी शुल्क इन कंपनियों के राजस्व का 30 फीसदी हो जाता है। उन्हें आयकर अलग से चुकाना होता है। 2जी घोटाले ने इस क्षेत्र की गति पूरी तरह समाप्त कर दी थी क्योंकि कुछ के खिलाफ जुर्माने ने पूरे उद्योग को भयभीत किया। स्पेक्ट्रम महंगा हो गया और उपकरणों की लागत भी बढ़ी। इन बातों का असर राजस्व पर पड़ा। परिणामस्वरूप उपभोक्ता कई सुविधाओं से वंचित हैं और उत्पादकता पर असर पड़ा है।


यदि ऐसा हो गया तो संविदा भंग के मामलों का जोखिम भी समाप्त हो जाएगा। हालांकि अतीत से प्रभावी कर की समस्या को समाप्त करना शेष रहेगा। 5जी तथा स्पेक्ट्रम का प्रबंधन करने के लिए भी रुख में व्यापक बदलाव करने होंगे। इन बदलावों के कारण उत्पन्न अंतर जिसे नई नीति कवर करती है, उसके लिए ग्रामीण इलाकों में सामुदायिक वाई-फाई नेटवर्क की आवश्यकता होगी क्योंकि शायद वे वाणिज्यिक रूप से कम आकर्षक हों और सहयोगी व्यवस्था के अभाव में उनका निर्माण और संचालन करना मुश्किल होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार को प्रोत्साहन की जरूरत होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन  

देश की विनिर्माण गाथा की विफलता को लेकर नीति निर्माता चिंतित हैं। आत्मनिर्भर भारत जैसी पहल इसकी अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति है क्योंकि यह मान लिया गया है कि बिना व्यापारिक और शुल्क संबंधी संरक्षण के देश, विनिर्माण क्षेत्र के विकास में सक्षम नहीं है। एक बार इस दिशा में बढऩे के बाद कारोबारी लॉबियां नीतियों को और अधिक संरक्षणवादी बनाने का दबाव बनाने लगेंगी। यह हो भी रहा है। उत्पादन से संबंधित प्रोत्साहन कार्यक्रम के अधीन आने वाली कंपनियां और अधिक केंद्रित लक्ष्यों की मांग कर रही हैं और कह रही हैं कि अधिक तादाद में क्षेत्रों को संरक्षण कार्यक्रम में शामिल किया जाए।


शायद अब यह स्वीकार करने का वक्त आ गया है कि भारत पूर्वी एशियाई देशों की निर्यात आधारित विनिर्माण गाथा को दोहराने नहीं जा रहा। वह शायद बांग्लादेश जैसा प्रदर्शन भी नहीं कर पाए। जैसा कि सन 2012 से हमारा आधिकारिक लक्ष्य भी है, यदि देश विनिर्माण को जीडीपी के बढ़े घटक के रूप में तैयार करता है तो यह घरेलू बाजार पर आधारित होगा और इसकी लागत भी अधिक होगी। वह लागत घरेलू उपभोक्ताओं को वहन करनी होगी जबकि अर्थव्यवस्था प्रमुख कारोबारी समूहों से बाहर रहेगा और निर्यात के मोर्चे पर नुकसान उठाएगा।


इसकी भरपाई सेवा क्षेत्र से होगी। दुनिया भर में सेवा व्यापार तीसरा सबसे बड़ा व्यापार है। भारत में यह अनुपात लगभग दोगुना यानी 60 प्रतिशत है। यदि श्रम निर्यात के कारण देश में आने वाले धन को शामिल किया जाए तो यह शायद और अधिक होगा। यह पूंजी की आवक के बजाय सेवा निर्यात से होने वाली आय है। बीते पांच वर्ष में देश के निर्यात में पारंपरिक सेवा निर्यात की भी अहम हिस्सेदारी रही है। वाणिज्यिक निर्यात की हिस्सेदारी आधी से कम रह गई है। भारत जैसी विकास अवस्था वाली अर्थव्यवस्था के लिए यह अत्यंत विशिष्ट बात होगी। इससे रुपया भी उस स्तर तक बढ़ेगा जहां विनिर्माण निर्यात बहुत महंगा हो जाएगा।


यह पसंद आए या नहीं लेकिन सेवा क्षेत्र मूल्यवद्र्धन का वह क्षेत्र है जिसके सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी तुलनात्मक लाभ तथा अन्य कौशल का लाभ उठाना होगा। देश में स्थित उपक्रम चाहे वे देसी हों या विदेशी उन्हें उनकी तकनीकी सेवा संबंधी विशेषज्ञता के कारण न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था का सेवा केंद्र बनाना होगा बल्कि नए क्षेत्रों मसलन कृत्रिम मेधा और डेटा आदि के रचनात्मक क्षेत्र में भी विशेषज्ञता हासिल करनी होगी। हमें चिप निर्माण के बजाय चिप डिजाइन करना होगा। इस क्षेत्र में अभी ताइवान, अमेरिका और कोरिया का एकाधिकार है। इसी तरह हमें विमान इंजन बनाने के बजाय उसका डिजाइन तैयार करना होगा।


भारत पहले ही उपभोक्ताओं के डिजिटलीकरण की तेज गति के साथ दुनिया को अपनी क्षमता दिखा चुका है। मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट ने इसका उल्लेख सबसे बड़े और तेज बढऩे वालों में किया। प्रति मोबाइल उपभोक्ता औसत डेटा खपत भी चीन से अधिक और कोरिया के समान है। यह जियो जैसी कंपनियों के कारण संभव हुआ क्योंकि उन्होंने सस्ता डेटा दिया। इसके अलावा कम लागत पर तत्काल भुगतान का बुनियादी ढांचा तैयार हुआ और देश में खुदरा डिजिटल भुगतान सालाना 50 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में जहां एक मंच पर एक करोड़ से अधिक उद्यम मौजूद हैं, उसे तकनीकी क्षमता मुहैया कराई गई। 1.2 अरब लोगों के पंजीयन के साथ डिजिटल पहचान व्यवस्था कायम की गई। सरकारी योजनाओं का प्रत्यक्ष लाभ दिलाने के लिए सॉफ्टवेयर पैकेज तैयार किया गया। इन मंचों का इस्तेमाल करके कई कारोबार खड़े किए गए। देश में बड़ी तादाद में यूनिकॉर्न (स्टार्टअप जिनका कारोबार 100 करोड़ डॉलर से अधिक हो) होने की यह भी एक वजह है। मूल्यांकन में उछाल अभी शुरू ही हुआ है क्योंकि निवेशक  पैसा लगा रहे हैं। औद्योगिक संगठन नैसकॉम का कहना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था 10 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है। उसका कहना है कि हर पांचवीं स्टार्टअप वैज्ञानिक या अभियांत्रिकी संबंधी चुनौतियों के हल पर केंद्रित है और यह सबसे तेज विकसित होने वाला हिस्सा है। बड़े उद्यमों को डेटा विश्लेषण मुहैया कराया जा रहा है और पहली स्टार्ट अप विदेशी बाजारों में प्रवेश कर चुकी है। उत्पादकता में व्यापक सुधार हो सकता है। यदि समुचित विपणन नीतियां तैयार की गईं तो कृषि क्षेत्र की आय में भी सुधार हो सकता है। बिचौलियों की कीमत पर उत्पादक का मूल्यवर्धन करके ऐसा किया जा सकता है।


इस मॉडल पर बनी अर्थव्यवस्था में कुशल-अकुशल कर्मियों की तुलना में पेशेवर कामगार बढ़ेंगे। इससे कम शिक्षित तबके को नुकसान होगा क्योंकि उसका जीवन अनिश्चित होगा। संपत्ति अधिक संकेंद्रित होगी। वित्त मंत्री के लिए अंतिम स्तर पर वित्तीय हस्तांतरण अपरिहार्य हो जाएगा। यदि शीर्ष पर संकेंद्रित संपत्ति पर कर नहीं लगाया गया तो यह फंडिंग मुश्किल होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Friday, January 22, 2021

भविष्य की ओर (बिजनेस स्टैंडर्ड)

अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के शपथ-ग्रहण समारोह का विवादों एवं शोर-शराबे से मुक्त होना यह आभास देता है कि दुनिया की इकलौती महाशक्ति में हालात सामान्य होने लगे हैं। दो हफ्ते पहले सत्ता पर कब्जा जमाने की पिछले राष्ट्रपति की कोशिश के मद्देनजर ऐसी सोच भ्रामक हो सकती है। इस नए अमेरिका का सौम्य रूप देश की पहली अश्वेत एवं दक्षिण एशियाई महिला उपराष्ट्रपति के तौर पर कमला हैरिस के शपथ में भी दिखा। नए राष्ट्रपति जोसेफ बाइडन ने खतरे की आशंका के बावजूद शपथग्रहण समारोह परंपरा के अनुरूप खुली जगह पर आयोजित कर स्थिति सामान्य होने का संदेश देने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने अपने जज्बाती भाषण में अमेरिका के समक्ष पेश आने वाली चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने चुनाव नतीजों पर मुहर लगाने के लिए गत 6 जनवरी को बुलाई गई कांग्रेस की बैठक के दौरान 'कैपिटल हिल' पर धावा बोलने की नाकाम कोशिश का परोक्ष जिक्र करते हुए कहा, 'लोकतंत्र जिंदा बच गया है।' भले ही बाइडन या मंच पर मौजूद किसी दूसरे शख्स ने 45वें राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का नाम नहीं लिया लेकिन परंपरा को धता बताते हुए शपथग्रहण समारोह से दूर रहने वाले ट्रंप का साया चारों तरफ नजर आया।


बाइडन ने अपने पूर्ववर्ती की विभाजनकारी विरासत का खुलकर जिक्र  किया। उन्होंने नस्ली इंसाफ को आवाज देने और राजनीतिक अतिवाद, श्वेत श्रेष्ठता एवं घरेलू आतंकवाद को परास्त करने की भी बात कही। उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रमुख चुनावी वादों पर अमल करने की बात भी कही जिनमें पेरिस जलवायु समझौते का फिर से हिस्सा बनना और कम कठोर आव्रजन नीति भी शामिल है। लेकिन उन्होंने अपना एजेंडा महान अमेरिकी स्वप्न के हिस्से के तौर पर पेश करने की कोशिश की जिसे सिर्फ एकजुट देश में ही हासिल किया जा सकता है। उन्होंने एकता की अपील करने के साथ यह कहते हुए असहमति की सीमा भी तय कर दी कि, 'वह लोकतंत्र है। वह अमेरिका है। हमारे गणतंत्र की सुरक्षा दीवारों के भीतर शांतिपूर्ण तरीके से असहमति जताने का अधिकार शायद इस देश की सबसे बड़ी ताकत है।' उन्होंने कोविड-19 संकट से निपटने के ट्रंप के क्रूर तरीकों से भी खुद को अलग करते हुए महामारी में मरे 4 लाख अमेरिकी नागरिकों की याद में कुछ पलों का मौन रखा।


बाइडन ने कार्यकाल के पहले ही दिन 17 कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए। इनमें से कई आदेश एच1बी वीजा समेत आव्रजन, किफायती स्वास्थ्य देखभाल, पर्यावरण, रोजगार एवं अर्थव्यवस्था पर ट्रंप की कट्टर नीतियों को पलटने वाले भी हैं। लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी एवं रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं के बीच समारोह में नजर आई गर्मजोशी एवं हल्के-फुल्के अंदाज को बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। बाइडन का सीनेट में कई दशकों के अपने कार्यकाल के दौरान विरोधी दल के साथ भी बढिय़ा संबंध रहा है लेकिन ट्रंप को रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों में तगड़ा समर्थन हासिल है और 6 जनवरी की निर्णायक मंजूरी के समय यह नजर भी आया था। भले ही डेमोक्रेट सांसदों के पास दोनों सदनों का नियंत्रण है लेकिन प्रतिनिधि सभा में उसे मामूली बढ़त ही हासिल है।


ट्रंप पर महाभियोग सुनवाई करना सीनेट का शुरुआती काम होगा। उसका नतीजा बाइडन के कार्यकाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण की सीमा तय करेगा और वैश्विक राजनीति के लिए भी उसके कई अहम संकेत होंगे। मुख्यत: अमेरिकी अवाम पर केंद्रित अपने उद्घाटन भाषण में बाइडन ने यूरोप एवं एशिया के अपने सहयोगी देशों को भी भरोसा दिलाया। ट्रंप ने अमेरिका को एक गैर-भरोसेमंद सहयोगी के तौर पर पेश करने के साथ ही दुनिया भर में व्हाइट हाउस की साख गिराने वाले तमाम काम किए हैं। इस निचले स्तर से अमेरिका को फिर से महान राष्ट्र बनाने के लिए अमेरिका के सबसे उम्रदराज राष्ट्रपति को बहुत कुछ करना होगा।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कोविड टीकाकरण शुरू होने के बाद न्याय क्षेत्र का परिदृश्य? (बिजनेस स्टैंडर्ड)

एम जे एंटनी  

कोरोनावायरस के कारण जो अनिश्चितता पैदा हुई, उसके चलते महीनों तक अर्थशास्त्रियों, चुनाव नतीजों का पूर्वानुमान जताने वालों और भविष्य बताने वालों को खूब तवज्जो मिली। यह बात तो निश्चित है कि निकट भविष्य में हालात सुधरने वाले नहीं हैं और उनकी मांग बरकरार रहेगी। इस संदर्भ में न्यायपालिका की बात करें तो वह अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहेगी। यह अच्छा होगा या बुरा, वह बाद की बात है। उदाहरण के लिए यह निश्चित है कि तीन महीनों में सर्वोच्च न्यायालय को नया मुख्य न्यायाधीश मिलेगा और शायद एक ऐसा दौर आएगा जहां परेशानियां कम होंगी।


लॉकडाउन के 11 महीने बाद धीरे-धीरे अदालतों में भौतिक रूप से कामकाज आरंभ हो जाएगा। मुंबई और उत्तराखंड जैसे कुछ उच्च न्यायालय पहले ही इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। अधिकांश अदालतों ने आभासी सुनवाई के साथ काम करना सीख लिया है। हालांकि पिछले सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीश सुनवाई में तकनीकी बाधाओं से इतने नाराज हुए कि उन्होंने अपने आदेश में भी इसे दर्ज किया।


गत वर्ष मार्च में लॉकडाउन के बाद विधिक पेशे के एक बड़े तबके और वादियों ने यह पाया कि आभासी अदालतें लाभदायक हैं और उन्हें व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। अधिवक्ता एक ही दिन दुनिया की कई अदालतों में बहस कर सकते हैं और वादियों को समय और पैसा खर्च करके अदालतों में नहीं पहुंचना होता है। ऐसे में एक सुरक्षित पूर्वानुमान यह है कि सामान्य अदालतों के साथ-साथ आभासी अदालतें भी बरकरार रहेंगी।


अदालतों और पंचाटों ने महामारी के दौरान यथास्थिति बरकरार रखने और स्थगन आदेश जैसे अंतरिम आदेश देना जारी रखा। उन्होंने प्रतिबंधात्मक नियमों को भी शिथिल किया था। अब वे धीरे-धीरे मानकों को ऊंचा कर रहे हैं, जैसा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गत सप्ताह किया। दूसरी ओर जिन लोगों को नियमों की शिथिलता का लाभ मिला उनके इर्दगिर्द घेरा अब तंग होगा।


अतीत के प्रदर्शन पर नजर डालें तो यह माना जा सकता है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बजट न्यायपालिका के लिए बहुत मामूली खुशियां लेकर आएगा। न्यायाधीश लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि अदालतों और न्यायालयों का बुनियादी ढांचा फंड की कमी से जूझ रहा है। न्यायपालिका को दशकों से 2 फीसदी की हिस्सेदारी मिल रही है। चूंकि वीडियो कॉन्फ्रेंस और लाइव स्ट्रीमिंग में अधिक निवेश की आवश्यकता है इसलिए हालात का खराब से खराब होना तय है। ऐसे में एक और बात बिल्कुल तय है कि सैकड़ों कैदी बिना जमानत या परीक्षण के जेलों में बंद रहेंगे। देश की जेलों में क्षमता से 14 प्रतिशत अधिक कैदी बंद हैं। हर तीन में से दो कैदी परीक्षणाधीन हैं। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय का वह हालिया आदेश भी फलीभूत नहीं हो पाएगा जिसमें उसने कहा है कि सांसदों और विधायकों (कुल 4,442) के ऊपर चल रहे आपराधिक प्रकरणों को छह महीने में निपटाया जाए। इसके अलावा यह अनुमान भी उचित ही जताया जा सकता है कि लॉकडाउन के महीनों के दौरान सामने नहीं आए मामले अब तेजी से उभरेंगे।


इस बात की काफी संभावना है कि सर्वोच्च न्यायालय में सरकार को जीत मिलने का सिलसिला जारी रहेगा। अयोध्या, आधार, जम्मू कश्मीर में संचार सेवाओं को ठप करना और सेंट्रल विस्टा परियोजना आदि इस बात का संकेत हैं। अनुच्छेद 370 का प्रश्न, चुनावी बॉन्ड और नोटबंदी आदि मामले भी ऐसा ही संकेत देते हैं। देश के इतिहास मेंं इससे पहले कभी न्यायाधीशों से इतने संवेदनशील मामलों का निर्णय करने को नहीं कहा गया। मिसाल के तौर पर कश्मीर (140 याचिकाएं लंबित), नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, आरक्षण में आरक्षण, लव जिहाद आदि इसके उदाहरण हैं। उच्च न्यायालयों के समक्ष सुर्खियों वाले मामलों का पेश होना जारी रहेगा। न्यायिक निर्णयों में मानवाधिकारों को लेकर बातें लंबी होती जाएंगी, हालांकि याचिकाओं में राहत मिलने की आशा कम है।


सरकार को मिलने वाले न्यायिक लाभ ने एक नया रुझान शुरू किया है जिसमें सामान्य लोगों ने न्यायाधीशों के बारे में अपनी राय बनानी शुरू कर दी है। इसका असर न्यायपालिका को लेकर लोगों के मन में बनी पारंपरिक छवि और आदर को नुकसान पहुंचाया है। इससे पहले न्यायाधीशों की आलोचना कानूनविदों और ऐसे टीकाकारों तक सीमित थी जो भाषा के इस्तेमाल में सावधानी बरतते थे। अब तो कार्टून बनाने वाले और ट्विटर पर भी उनकी आलोचना शुरू हो गई है। आने वाले सप्ताह में उनमें से कुछ को न्यायिक अवमानना के लिए न्यायालय में हाजिर भी होना पड़ेगा। आशा करनी चाहिए कि न्यायाधीश और महान्यायवादी हंसी-मजाक को लेकर भी लक्ष्मण रेखा तय करेंगे।


कुल मिलाकर देखा जाए तो देश उच्च न्यायपालिका में बदलाव की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बनने के वरीयता क्रम में शीर्ष पर मौजूद न्यायमूर्ति एन वी रमण ने हाल ही में कहा कि एक न्यायमूर्ति को निर्भीक, साहसी और दबाव का सामना करने में सक्षम होना चाहिए। अब यह उन निर्भर होगा कि वे जनता के मन में बनी गलत धारणाओं को खत्म करें।  जनता चाहती है कि सर्वोच्च न्यायालय एक बार फिर महान बने।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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हकीकत से बेखबर नए कृषि कानून (बिजनेस स्टैंडर्ड)

नितिन देसाई  

कृषि उत्पादों के विपणन से संबंधित नए कानून खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों एवं खुदरा चेन कंपनियों के लिए किसानों से सीधे संपर्क साधना आसान बनाने के मकसद से बनाए गए लगते हैं। आक्रोशित किसान भारी विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ये कानून उनके हित में नहीं हैं। हालांकि कई अर्थशास्त्री इनके समर्थन में खड़े दिखे हैं। उनका मानना है कि मुक्त बाजार-आधारित व्यवस्था होने से कृषि उत्पादों की कीमतें मांग-आपूर्ति संतुलन को बेहतर ढंग से परिलक्षित करेंगी और फसलों के पैटर्न में अधिक तार्किकता आएगी।

लेकिन इस दलील में वितरणकारी आयाम को नजरअंदाज कर दिया गया है। कृषि विपणन प्रणालियां ऐसी होनी चाहिए कि उत्पादक एवं उपभोक्ता दोनों के ही लिए वाजिब कीमतें हों और बिचौलियों को साधारण मुनाफा ही मिले। राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिहाज से भी यह समरूप होना चाहिए। भारतीय संदर्भ में इसकी संभावना नहीं है कि कृषि उत्पादों में मुक्त बाजार होने से ऐसा हो पाएगा। इसकी वजह यह है कि कृषि उत्पादों का बाजार विनिर्मित उत्पादों के बाजार से काफी अलग है।


1.    कृषि बाजारों में विक्रेता लाखों की संख्या में हैं जबकि थोक खरीदारों की संख्या सीमित है। वहीं विनिर्मित उत्पादों के आम बाजार में खरीदारों की संख्या लाखों में है और विक्रेताओं की संख्या सीमित है।


2.    कृषि बाजारों में आपूर्ति फसली मौसम पर काफी निर्भर है जबकि मांग में इस मौसम के हिसाब से फर्क नहीं आता है। ऐसे में भंडारण की क्षमता रखने वाले बड़े खरीदारों को बढ़त मिल जाती है क्योंकि उनके पास अधिक खरीद के लिए वित्तीय संसाधन भी होते हैं।


3.    कृषि उत्पादों की मांग के वक्र में लोच नहीं होती है और इसमें तीखी ढलान भी होती है, लिहाजा बंपर फसल होने पर कीमतें तेजी से गिरती हैं। वहीं फसल कम होने पर मांग रहने से इनकी कीमतों में तेजी से उछाल भी आती है।


मांग एवं आपूर्ति के इस मौसमी पहलू में असंतुलन के चलते कृषि उत्पादों खासकर जल्दी खराब होने वाले खाद्य उत्पादों की कीमतों में साल भर में बड़ी उठापटक होती है। मार्च 2020 से पहले के 10 वर्षों के मासिक औसत पर नजर डालें तो उफान एवं गर्त के बीच मूल्य अंतर दिखाई देता है। सब्जियों के मामले में यह अंतर 23 फीसदी है और टमाटर, प्याज एवं आलू की कीमतों में यह फर्क क्रमश: 65.6 फीसदी, 40.4 फीसदी और 35.6 फीसदी तक देखने को मिला है। (स्रोत: भारत के प्रमुख आर्थिक संकेतकों में सीजन का असर, आरबीआई बुलेटिन, दिसंबर 2020)।


किसानों एवं थोक खरीदारों की बाजार ताकत में असंतुलन एक उपभोक्ता के चुकाए हुए मूल्य एवं उत्पादक को मिलने वाली कीमत के बीच के बड़े फासले से साफ नजर आता है। आरबीआई के सर्वे में यह फर्क 28 फीसदी से लेकर 78 फीसदी तक दिखा है। कृषि बाजारों में हस्तक्षेप न केवल विक्रेताओं बल्कि उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षित करने के लिए भी जरूरी है। (भारत में आपूर्ति शृंखला गतिकी एवं खाद्य मुद्रास्फीति, आरबीआई बुलेटिन, अक्टूबर 2019)।


मुक्त बाजारों से इतर देखें तो बुनियादी तौर पर हरेक कृषि उत्पाद बाजार के लिए तीन विकल्प मौजूद हैं...


- थोक खरीद एवं वितरण में सार्वजनिक क्षेत्र की सीधी एवं बड़ी भागीदारी


- निजी क्षेत्र के थोक विक्रेताओं एवं वितरकों पर निर्भरता के साथ ही जरूरी होने पर सार्वजनिक इकाइयां बाजार निगरानी एवं हस्तक्षेप भी करें। और


- किसानों की सहकारी समितियों या उत्पादक कंपनियों को उपभोक्ता तक वैल्यू चेन में हिस्सेदारी मिले।


वर्तमान में कृषि उत्पादों की सार्वजनिक खरीद कमोबेश धान एवं गेहूं तक ही सीमित है जो फसली उपज के कुल मूल्य का महज 23 फीसदी ही है। इसमें बड़ा हिस्सा पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश का है। हालांकि विकेंद्रीकरण की कोशिश से थोड़ा लाभ हुआ है और धान की सरकारी खरीद में ओडिशा, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ का भी हिस्सा बढ़ा है। विकेंद्रीकरण के सिद्धांत का विस्तार करते हुए गारंटी कीमत पर फसलों की खरीद में राज्यों को मदद देना भी विकल्प हो सकता है।


निजी खरीद पहले से ही खाद्य तेल, फल एवं सब्जियां, मसाले और कपास जैसी कई कृषि जिंसों की विपणन का प्रमुख जरिया बनी हुई है। यहां पर असली जरूरत कीमतों की बड़ी उठापटक वाले बाजारों में संगठित एवं नियमित दखल देने की है। आलू, प्याज एवं टमाटर जैसे उत्पादों के बाजार में तो यह बेहद जरूरी है।


न तो सार्वजनिक और न ही निजी खरीद का विकल्प किसानों को उपभोक्ता तक पहुंचने वाली वैल्यू चेन में हिस्सेदारी देता है। इस काम को केवल सहकारी समितियों एवं किसान उत्पादन कंपनियों के माध्यम से ही अंजाम दिया जा सकता है। यह तीसरा तरीका कृषि क्षेत्र का सबसे जरूरी काम पूरा कर सकता है जो कि किसानों को प्रमुख अनाजों के बजाय अधिक मूल्य वाली फसलों की खेती की तरफ प्रोत्साहित करने का है। देश में इन फसलों की मांग तेजी से बढ़ रही है।


दुग्ध सहकारी समितियों की भारतीय व्यवस्था इस तीसरे तरीके का बेहतरीन उदाहरण है। यह तीन स्तरों- खरीद के लिए ग्रामीण स्तरीय सहकारी समितियां, प्रसंस्करण के लिए जिला स्तरीय दुग्धपालक संगठन और दूध एवं दुग्ध उत्पादों के विपणन के लिए राज्य स्तरीय महासंघ पर काम करता है। यह ढांचा किसानों को समूची मूल्य शृंखला में हिस्सेदारी देता है। इसकी जड़ें गुजरात में खेडा के किसानों और एक एकाधिकारवादी निजी कंपनी के बीच 1940 के दशक में कीमतों को हुए टकराव में निहित हैं।


आज भारत दुनिया में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बन चुका है और डेरी क्षेत्र के कुल उत्पादन का मूल्य चावल एवं गेहूं के सम्मिलित मूल्य से करीब 50 फीसदी अधिक है। दूध की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन उपलब्धता 1968-69 के 112 ग्राम से बढ़कर 2018-19 में 394 ग्राम तक पहुंच चुकी है। दूध एवं दुग्ध उत्पादों का बाजार स्थिर है जो बदलते मौसम के साथ कीमतों में पडऩे वाले महज 0.6 फीसदी फर्क से जाहिर भी होता है। दुग्ध सहकारी समितियां एवं उनके राज्य स्तरीय महासंघ (गुजरात का अमूल एक स्थापित ब्रांड बन चुका है) आज बाजार के अगुआ हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तुलना में प्रसंस्कृत दुग्ध उत्पादों के बाजार की बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं।


भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए कोई भी एक विकल्प आदर्श नहीं हो सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र की खरीद करने वाली एजेंसियां, निजी क्षेत्र के थोक विक्रेता खरीदार और सहकारी एवं किसान उत्पादक कंपनियों तीनों की ही जरूरत है। सार्वजनिक खरीद व्यवस्था फसली पैटर्न में बदलाव या तकनीकी उन्नति के मकसद से हरेक राज्य में कीमत की गारंटी देने के लिए अलग-अलग रूपों में चलाई जा सकती है। जल्द खराब होने वाले उत्पादों के लिए सहकारी समितियों या किसान उत्पादक कंपनियों को बढ़ावा दिया जा सकता है ताकि प्रसंस्करण कर कचरे को कम किया जा सके। निजी थोक विक्रेता अभी की तरह बाकी क्षेत्रों में काम जारी रख सकते हैं।


तीनों विकल्पों की प्रासंगिकता का मतलब है कि केंद्र को यह मानना होगा कि कृषि उत्पादों के विपणन का तरीका संविधान एवं व्यावहारिक कारणों से राज्यों पर ही छोड़ देना चाहिए। भारत में कृषि अर्थशास्त्र की विविधताओं को ध्यान में रखते हुए ऐसा करना जरूरी भी है।


केंद्र कृषि उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधी नीति के मामले में प्रभावी भूमिका निभा सकता है। हालांकि इस मामले में उसका अब तक का प्रदर्शन बहुत उत्साह नहीं जगाता है। वह कई बार निर्यात पाबंदियों में ढील देने या आयात को मंजूरी देने में गलती कर जाता है। कृषि उत्पादों में मुक्त व्यापार बंदिशों वाले मौजूदा वैश्विक परिवेश में मुमकिन नहीं दिखता है। लेकिन ऐसी नीति संभव है जो कृषि उत्पाद निर्यात के लिए मुक्त व्यापार की इजाजत दे और केवल अपवाद रूप में ही बंदिशें लगाए।


भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की विविधता दर्शाने वाली और छोटे किसानों एवं कम आय वाले उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते वाली कृषि विपणन व्यवस्था बनती है तो वह सक्षमता, समता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से कारगर भी होगी।



सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Thursday, January 21, 2021

कमियां बरकरार (बिजनेस स्टैंडर्ड)

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत को पांच वर्ष पूरे हो चुके हैं। मौजूदा सरकार की प्रमुख योजनाओं में से एक इस योजना में फरवरी 2020 में आमूलचूल बदलाव भी किया गया लेकिन अभी भी कई गड़बडिय़ां बरकरार हैं। योजना में कई ढांचागत और प्रक्रियागत कमियां हैं और कई विशिष्ट गुण होने के बावजूद ये कमियां किसानों के लिए इसकी उपयोगिता को प्रभावित करती हैं। इसकी विशिष्टताओं में सबसे प्रमुख है जोखिम का व्यापक कवरेज। फसल बुआई के पहले से लेकर फसल कटने के बाद उपज के नुकसान तक की कवरेज रबी के लिए कुल बीमित राशि के 1.5 फीसदी प्रीमियम पर तथा खरीफ की फसल के लिए 2 फीसदी प्रीमियम पर की जाती है। प्रीमियम की शेष राशि का भार केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सब्सिडी के रूप में वहन किया जाता है। दुनिया में दूसरी कोई ऐसी फसल बीमा योजना नहीं है जो इस मामले में पीएमएफबीवाई का मुकाबला कर सके। इस योजना को किसान कल्याण की अनिवार्य योजना के रूप में पीएम-किसान (इस योजना में हर भूधारक को तीन किस्तों में 6,000 रुपये मिलते हैं) के समकक्ष बताने के बावजूद किसान इसे लेकर आकर्षित नहीं हुए।


बहरहाल इन चिंताओं में भी काफी दम है कि पीएमएफबीवाई योजना के तहत मिलने वाला हर्जाना आमतौर पर बहुत कम होता है और बहुत देर से मिलता है। इसकी बुनियादी वजह यह है कि राज्य योजना को चलाने के क्रम में अपने दायित्व पूरे करने में अक्षम साबित हो रहे हैं। वे अक्सर प्रीमियम सब्सिडी में अपना हिस्सा काफी देरी से और किस्तों में जारी करते हैं। इससे बीमा कंपनियों को किसानों को समय पर भुगतान करने में दिक्कत होती है। फसल कटाई प्रयोग के जरिये उत्पादन नुकसान के आंकड़े तैयार करना और रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट इमेजिंग तकनीक के जरिये किया जाने वाला प्रमाणन भी राज्य का दायित्व है और इसमें भी असंगत तरीके से देरी होती है। इससे दावे निपटाने में दिक्कत आती है। बीमा कंपनियों को पीएमएफबीवाई के बदले हुए स्वरूप के तहत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आधारित आकलन के आधार पर दावों के निपटान की इजाजत है लेकिन यह व्यापक तौर पर अमल में नहीं लाया जा रहा है। इसके अलावा किसानों को 72 घंटे के भीतर बीमा कंपनियों को नुकसान की जानकारी देनी होती है। आमतौर पर किसी प्राकृतिक आपदा के बाद यही वह समय होता है जब किसानों को अपने खेतों में समय बिताना होता है ताकि वे फसल बचाने के लिए हरसंभव कदम उठा सकें। इसके अलावा किसानों को हर वर्ष अलग-अलग फसल के लिए अलग-अलग बीमा कंपनी से निपटना होता है। इससे बीमाकर्ताओं और उनके ग्राहकों के बीच ताल्लुकात नहीं बन पाते बल्कि एक तरह का अविश्वास उत्पन्न होता है जो बीमा कंपनियों के लिए नुकसानदेह होता है।


प्रथम दृष्ट्या ये बहुत छोटी बातें प्रतीत होती हैं लेकिन ये बीमा कंपनियों और किसानों दोनों के कामकाज में असहजता की वजह बनती हैं। कई कंपनियां जिन्होंने पहले भारी सरकारी सब्सिडी से आकर्षित होकर इस योजना के क्रियान्वयन में भागीदारी का विकल्प चुना था वे अब इससे दूरी बना चुकी हैं। इन मसलों को हल करना आवश्यक है ताकि इस योजना को किसानों के लिए एक ऐसी आकर्षक योजना के रूप में पेश किया जा सके जो सक्षम और किफायती ढंग से उनके जोखिम का संरक्षण करती है। इस हकीकत को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े कारकों के कारण जहां भारतीय कृषि धीरे-धीरे संकटपूर्ण होती जा रही है, वहीं जोत का आकार घटने के साथ किसानों की जोखिम उठाने की क्षमता भी कम हो रही है। ऐसे में सही मायनों में किसानों के अनुरूप पीएमएफबीवाई उनके लिए वरदान साबित होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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चीन की प्राथमिकताएंऔर भारत की स्थिति (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम सरन  

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के केंद्रीय आर्थिक कार्य सम्मेलन (सीईडब्ल्यूसी) की सालाना बैठक 16 से 18 दिसंबर तक आयोजित की गई। इसमें इस बात का व्यापक संकेत मिलता है कि चीन अपने आर्थिक हालात का आकलन कैसे करता है और चालू वर्ष में उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं। सन 2021 खासतौर पर महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ष सीपीसी की स्थापना की 100वीं वर्षगांठ वाला वर्ष भी है। यह 14वीं पंचवर्षीय योजना का पहला वर्ष भी है और इस दौरान न केवल कोविड-19 महामारी के नकारात्मक प्रभावों से उबरने की चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा बल्कि बाहरी राजनीतिक और आर्थिक माहौल में व्याप्त अनिश्चितता और उथलपुथल पर भी ध्यान देना होगा। पुरानी घोषणाओं के दोहराव के अलावा इस बात के भी स्पष्ट संकेत हैं कि चीन का नेतृत्व नए वर्ष में किन बातों को अपनी ताकत के रूप में देखता है और किन्हें कमजोरी के रूप में।

सीईडब्ल्यूसी की रिपोर्ट घरेलू मांग आधारित तथा निर्यात एवं निवेश आधारित अर्थव्यवस्था की बात कहती है। आदर्श स्थिति में ये सभी कारक एक दूसरे को ताकत प्रदान करते हैं। परंतु सीईडब्ल्यूसी का कहना है कि मौजूदा दौर में जब बाहरी स्तर पर इतनी अनिश्चितता है तब एक नए घटनाक्रम में घरेलू वितरण प्रभावी होगा। सरकारी स्वामित्व वाले उपक्रमों की भूमिका भविष्य में और मजबूत होगी और वे राष्ट्रीय सामरिक तकनीक को मजबूत करने और नवाचार को बढ़ावा देने में मददगार साबित होंगे। राष्ट्रीय सामरिक तकनीक ऐसी तकनीक हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम हैं। इनमें कृत्रिम मेधा, सेमीकंडक्टर और उच्च तकनीक वाले उद्योगों में काम आने वाले अन्य घटक शामिल हैं।


एक अन्य क्षेत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा काफी अहमियत रखती है और वह है औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाओं को नियंत्रित रखने की राज्य की स्वतंत्र क्षमता को मजबूत बनाना। विदेशी कंपनियों के नियंत्रण वाली विस्तारित आपूर्ति शृंखलाओं में केवल एक कड़ी बनने के बजाय चीन स्वयं की आपूर्ति शृंखलाओं का नेतृत्व करना पसंद करेगा। आर्थिक साझेदारों के कारण होने वाली उथलपुथल का शिकार होने की आशंका के बजाय वह ऐसी स्थिति में रहना चाहेगा जहां आपूर्ति शृंखलाओं में पारस्परिक निर्भरता हो ताकि इसका इस्तेमाल चीन के सुरक्षा हितों को बढ़ाने में किया जा सके। शी चिनफिंग ने एक अन्य संदर्भ में कहा कि चीन को सक्षम होना होगा ताकि अपने आर्थिक संपर्कों की राजनीतिक लागत अपने साझेदारों पर डाल सके। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दंडात्मक व्यापारिक कदमों के साथ वह ऐसा कर चुका है। आर्थिक पारस्परिक निर्भरता को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की इस कोशिश को समझना होगा और इसका प्रतिरोध करना होगा।


एक अन्य तत्त्व एकाधिकार विरोधी शमन और नियमविरुद्ध पूंजी विस्तार निरोध से ताल्लुक रखता है। यहां इशारा चीन के निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र की ओर है और यह सरकारी उपक्रमों को बढ़ावा देने का विपरीत पक्ष है। इस नीति को नियामकीय निगरानी के आलोक में तथा टेनसेंट तथा अलीबाबा जैसी अत्यधिक कामयाब हाई-टेक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ उठाए गए कदमों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके तेज विस्तार और चीन में उनके व्यापक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव को सीपीसी के प्रभुत्व को चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। भुगतान कारोबार से परे फिनटेक कारोबार में अलीबाबा के प्रवेश को भी चीन सरकार की सॉवरिन डिजिटल करेंसी तथा चीनी बैंकों को बिचौलिया बनाकर राष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था कायम करने के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाने लगा। वित्तीय स्थिरता को लेकर भी चिंता हो सकती है। एक दलील यह है कि निजी हाई टेक कंपनियों का आकार इतना बड़ा हो गया है कि अगर वे नाकाम हुए तो अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका लगेगा। परंतु राजनीतिक कारक भी महत्त्वपूर्ण हैं। संदेश एकदम स्पष्ट है: चीन के निजी क्षेत्र को सीपीसी के नेतृत्व और निगरानी में काम करना होगा। ऐसे में विदेशी उपक्रम चीन की निजी कंपनियों के साथ चाहे जो सौदा करें, चीन की सरकार और सीपीसी उसमें जरूर रुचि रखेगी।


सीईडबल्यूसी द्वारा चिह्नित एक अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्र खाद्य सुरक्षा एवं कृषि क्षेत्र को लेकर भी सुरक्षा चिंताएं हैं। चीन का कृषि उत्पादन उल्लेखनीय है लेकिन वह खाद्यान्न तथा अन्य कृषि उत्पादों मसलन सोयाबीन का सबसे बड़ा आयातक भी है। वह बीफ, पोर्क और पोल्ट्री उत्पादों का भी प्रमुख आयातक है। वर्ष 2014 से ही उसका सालाना खाद्यान्न आयात 10 करोड़ टन रहा है। सन 2020 में तो यह सन 2019 के आयात से 30 गुना अधिक रहा। आमतौर पर कीमतें स्थिर रहती हैं लेकिन इसके बावजूद खाद्य मुद्रास्फीति चिंता का विषय है। पोर्क की कीमत जो खासी संवेदनशील मानी जाती है, उसमें काफी इजाफा हुआ है क्योंकि आपूर्ति कमजोर रही है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता सूची में रखा गया है। उन्नत बीज और जेनेटिक शोध के माध्यम से उपज बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। अनाज भंडारण क्षमता बढ़ाने और कृषि भूमि को बरकरार रखने का प्रयास किया जा रहा है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 12 करोड़ हेक्टेयर का न्यूनतम रकबा सुनिश्चित करने की बात कही गई है। पुरानी नीतिगत घोषणाओं से भी कुछ बातें चुनी गई हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रतिबद्धता दोहराना शामिल है। इसके अलावा घरेलू मांग को बढ़ाना और स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं में खपत के जरिये सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इजाफा करना शामिल है।


हालांकि इस बात का कोई संकेत नहीं है कि सरकार घरेलू मांग बढ़ाने के लिए कोई प्रोत्साहन पैकेज देने जा रही है। स्थिर राजकोषीय नीति और विवेकपूर्ण मौद्रिक नीति पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस बात को लेकर संतुष्टि का भाव है कि चीन इकलौती अर्थव्यवस्था है जो 2020 में सकारात्मक रहेगी और 2021 में जिसके 8 फीसदी की दर से विकसित होने की आशा की जा रही है। किसी और अर्थव्यवस्था के साथ ऐसा नहीं है। चीन ने आपूर्ति क्षेत्र की बाधा उत्पन्न होने उनके चीन से दूरी बनाने की आशंकाओं को झूठा साबित कर दिया है। बल्कि इनके चालू रहने में चीन पर निर्भरता बढ़ी है। कम से कम पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के मामले में तो ऐसा ही है। चीन के आरसेप में साझेदार बनने तथा बेल्ट और रोड पहल को लगातार बढ़ावा देने के कारण एशिया और विश्व में वृद्धि के वाहक की उसकी भूमिका और मजबूत होगी। सीईडब्ल्यूसी ने यह भी दोहराया कि चीन प्रशांत पार साझेदारी के लिए व्यापक एवं प्रगतिशील समझौते का सदस्य बनना चाहता है। नए साल में चीन के दबदबे के बीच भारत को एशियाई आर्थिक जगत में अपनी जगह बनानी है। आत्मनिर्भर भारत को इस हकीकत से दो चार होना होगा।


(लेखक पूर्व विदेश सचिव एवं सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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