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Opinion : वृहद आर्थिक परिस्थितियों की नहीं होनी चाहिए अनदेखी

मिहिर शर्मा  

सन 2020 कतई 2008 जैसा नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था जिस संकट से गुजर रही है वह वित्तीय संकट नहीं बल्कि जन स्वास्थ्य संकट है जो अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। दोनों वर्षों में इकलौती समानता यह है कि अर्थव्यवस्था की हालत एकदम खस्ता है। सन 2008 में ऐसा वित्तीय तंत्र ध्वस्त होने के कारण हुआ था और 2020 में मांग में अस्थायी कमी के कारण।


परंतु 2021 का घटनाक्रम 2009 से एकदम अलग होगा क्योंकि वजह एकदम अलग हैं। कुछ मायनों में 2008 में वास्तविक अर्थव्यवस्था मजबूत थी, केवल वित्तीय क्षेत्र में दिक्कत थी जिसके चलते पूंजी का गलत आवंटन हुआ और दुनिया भर में असंतुलन फैला। सन 2020 में वास्तविक अर्थव्यवस्था दबाव में है। ऐसे में मौद्रिक उपायों की मदद से समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता है। हमने 2008 के बाद सीखा कि बेशुमार मौद्रिक तरलता दिक्कतें पैदा कर सकती है। इससे परिसंपत्ति कीमतों में मुद्रास्फीति आती है, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रवाह प्रभावित होता है और असमानता बढ़ती है।


भारत के लिए प्रासंगिक एक अंतर यह भी है कि सरकारों की वृहद आर्थिक स्थिति, खासकर उभरते बाजारों वाले देशों की स्थिति प्रभावित हुई है। विकसित देश कम से कम फिलहाल वृहद आर्थिक हकीकत की अनदेखी करने की स्थिति में हैं। वे घाटा बढऩे दे सकते हैं और कर्ज का वित्तीय स्थिरता और मुद्रास्फीति पर असर पडऩे से बच सकते हैं। कम से कम अल्पावधि से मध्यम अवधि में वे ऐसा कर सकते हैं। परंतु उभरते बाजारों को यह सुविधा नहीं है। जीडीपी की तुलना में अधिक सार्वजनिक ऋण उनके लिए समस्या बन सकता है। भारत जैसे देश के लिए तब और अब में अंतर तीन मामलों में है। पहला राजकोषीय स्थिति, दूसरा मुद्रास्फीति और तीसरा चीन।


राजकोषीय स्थिति की बात करें तो 2008-09 को घाटे और कर्ज के लिए याद किया जाता है। राजकोषीय घाटा दोगुना से अधिक बढ़कर जीडीपी के 3.1 फीसदी से 6.5 फीसदी हो गया। इसमें संकटकालीन खर्च के अलावा चुनाव पूर्व घोषणाएं और वेतन आयोग शामिल था। टीकाकारों ने उस समय भी इस पर काफी बातें कही थीं। केयर रेटिंग द्वारा इस बार घाटा और बढ़कर जीडीपी के 9 फीसदी के बराबर रहने की बात कही गई है। जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तो कई लोग सवाल करेंगे कि वर्ष 2019-20 में घाटा जीडीपी के 4.6 फीसदी के बराबर क्यों था? यह फरवरी में बजट में तय 3.8 फीसदी के लक्ष्य से भी खराब रहा। यह ऐसी राजकोषीय स्थिति है जिसने सरकार को राहत और प्रोत्साहन व्यय के मामले में भी सतर्क कर दिया है।


संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के 2007-08 के कार्यकाल की तुलना में राजकोषीय हालात खराब हो सकते हैं लेकिन मुद्रास्फीति के मोर्चे पर हालात बेहतर हैं। मई-जून 2008 में संकट के तुरंत पहले उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति 7 से 9 फीसदी के बीच थी। जुलाई 2008 में थोक मूल्य महंगाई 12 फीसदी थी। इसके लिए रिजर्व बैंक ने वैश्विक जिंस कीमतों, कमजोर कृषि उपज और मजबूत मांग को वजह बताया था। आज उपभोक्ता मूल्य महंगाई 7 फीसदी के आसपास है लेकिन रिजर्व बैंक को यह अस्थायी लग रही है। काफी संभावना है कि मुद्रास्फीति के अनुमान 2008 की तुलना में स्थायी रूप से कम हो चुके हैं।


उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में 2008 की तुलना में कमतर मुद्रास्फीति ने विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों को यह अवसर प्रदान किया कि वे अधिक आक्रामक प्रति चक्रीय मौद्रिक नीति अपनाएं। इसमें ऐसे अपारंपरिक उपाय अपनाना शामिल है जो केवल समृद्ध देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा अपनाए जाते हैं। भारत में रिजर्व बैंक खामोशी से सरकारी प्रतिभूतियों के बाजार और उच्च श्रेणी के कॉर्पोरेट ऋण का आंशिक समर्थन कर सकता है। उसे यह भरोसा मुद्रास्फीति के प्रबंधन की क्षमता से मिला है।


मौजूदा दौर और 2008 में एक अंतर चीन का भी है। उसने वित्तीय संकट के बाद वाले वर्षों की तरह इस बार ऐसा कोई बड़ा प्रोत्साहन नहीं दिया है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की मदद करे। भारत के नजरिये से यह मिलाजुला आशीर्वाद है। वैश्विक मांग कमजोर है लेकिन अहम बात यह है कि जिंस कीमतों का भी कोई चक्र नहीं है। 2008 के बाद चीन ने मांग बढ़ाने के लिए जो उपाय किए थे उनसे ऐसा चक्र उत्पन्न हुआ था। यह इस तथ्य के बावजूद है कि चीन महामारी के आर्थिक झटकों से अपेक्षाकृत सुरक्षित है। सन 2008 के उलट भारत इस बार सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक है। कई विश्लेषण बताते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था में जो गिरावट आई है वह वैश्विक वृद्धि में एक फीसदी तक की कमी करने में सक्षम है। जबकि 2008 के वित्तीय संकट के बाद वाले वर्ष में इसने वैश्विक वृद्धि में 0.5 फीसदी का योगदान किया था। 2020 में एक अंतर यह भी हो सकता है कि वैश्विक पूंजी उभरते देशों के बजाय चीन का रुख करे। 2008 के संकट के बाद उभरते बाजारों में पूंजी की आवक 5 फीसदी बढ़ी थी।


जब संकट आता है तो यह विचार करने का वक्त होता है कि क्या ठीक से किया गया और आपातकाल में कौन सा काम अलग तरह से किया जाना चाहिए था? इस मामले में भारत ने भले ही निवेश का बेहतर केंद्र होने का दावा किया हो लेकिन यह स्पष्ट है कि वह गहराई, स्थिरता और प्रतिफल के मामले में चीन के आसपास भी नहीं है।


मुद्रास्फीति और घाटे के मामले में सबक और स्पष्ट है। मुद्रास्फीति को लक्षित करने की दिशा में कष्टकारी बदलाव ने देश को बुरे समय के लिए कुछ मौद्रिक गुंजाइश प्रदान की। इस बीच सरकार अच्छे वर्षों में अर्थव्यवस्था के राजकोषीय पक्ष का सही ढंग से प्रबंधन नहीं कर पाई जिसका खमियाजा अब उठाना पड़ रहा है। पिछले संकट के समय सरकार की राजकोषीय स्थिति उतनी बुरी नहीं थी जितनी मौजूदा संकट के समय वर्तमान सरकार की है। राजकोषीय मोर्चे पर मेहनत की कमी, बेहतर वर्षों में कड़े निर्णय लेने की अनिच्छा बुरे वर्षों में भारी पड़ती है।


सौजन्य - बिजनेस स्टेंडर्ड।

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सार्वजनिक संसाधनों की नीलामी और मुनाफा

नितिन देसाई  

नीलामी के सिद्धांत ने सन 1996 के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री विलियम विकरे के जमाने से ही अर्थशास्त्रियों का काफी ध्यान आकृष्ट किया है। विकरे ने सन 1961 में इस विषय पर एक अहम आलेख लिखा था। गत सप्ताह सन 2020 का आर्थिक विज्ञान का स्वरिजेस रिक्सबैंक पुरस्कार (इसे अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के समकक्ष माना जाता है) पॉल आर मिलग्रॉम और स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के उनके पीएचडी सुपरवाइजर रॉबर्ट बी विल्सन को दिया गया। इन्होंने भी नीलामी के सिद्धांत में कई योगदान दिए हैं लेकिन उन्हें अमेरिका में संघीय संचार आयोग के नीलामी के तरीकों में नवाचार का डिजाइन तैयार करने के लिए जाना जाता है। इसे साइमल्टेनस मल्टिपल राउंड ऑक्शन (एसएमआरए) कहा जाता है।

खुली नीलामी के दो तरीके हैं-एक तरीका वह है जहां नीलामी तब समाप्त होती है जब एक को छोड़कर शेष बोलीकर्ता बाहर हो जाते हैं और नीलामी सबसे बड़ी बोली लगाने वाले के नाम हो जाती है। दूसरे तरीके में नीलामी करने वाला एक तयशुदा कीमत से शुरू करता है और उसे तब तक कम करता है जब तक कि पहली स्वीकृति हासिल नहीं हो जाती। सीलबंद नीलामी के भी दो तरीके होते हैं जहां सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बोली हासिल होती है या फिर दूसरी सर्वोच्च बोली का भी विकल्प होता है। इनके नतीजे भी खुली नीलामी जैसे ही होते हैं।


एसएमआरए मॉडल इससे कई मायनों में अलग है। पहली बात, इसमें तमाम पारस्परिक निर्भरता वाली चीजें शामिल होती हैं, मसलन अर्हताप्राप्त बोलीकर्ताओं की समांतर बोली के लिए दूरसंचार स्पेक्ट्रम का भौगोलिक वितरण। दूसरा, बोली कई दौर में पूरी होती है और बोलीकर्ता सभी प्रतिभागियों को बोली से अवगत कराता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक किसी वस्तु के लिए कोई नई बोली नहीं लगती। तीसरा, बोली वस्तु दर वस्तु समाप्त नहीं होती बल्कि तब तक खुली रहती है जब तक समस्त वस्तुएं समाप्त नहीं हो जातीं। चौथा, बोलीकर्ताओं को प्रतीक्षा का तरीका अपनाने से रोकने के लिए यह व्यवस्था होनी चाहिए कि वे नई बोली लगाएं या किसी ऐसी वस्तु की ऊंची बोली पर कायम रहें जहां नई बोली लगनी बंद हो गई हों। जब कोई पारस्परिक निर्भरता वाली वस्तु पेशकश पर हो तो इसका अर्थ यह होता है कि कोई व्यक्ति जो किसी वस्तु को गंवा रहा हो वह किसी ऐसी वस्तु के लिए बोली लगा दे जहां बोली ठहर गई हो। यानी यदि कोई व्यक्ति अगर महाराष्ट्र और मुंबई क्षेत्र का स्पेक्ट्रम चाहता है वह अगर मुंबई का स्पेक्ट्रम गंवा रहा है तो वह गुजरात के स्पेक्ट्रम के लिए बोली लगा सकता है। बाद के कुछ चर ऐसे भी हैं जो विभिन्न वस्तुओं के मिश्रण के लिए बोली की इजाजत देकर लिंकेज को आसान बनाते हैं।


भारत में एसएमआरए पद्धति का पहला इस्तेमाल 2010 में 3जी नीलामी में किया गया था जब 22 दूरसंचार सर्किल में तीन-चार जेनरिक लाइसेंस समांतर बोली के लिए रखे गए। यह प्रक्रिया 34 दिनों तक और 183 दौर में चली और इससे 670 अरब रुपये का राजस्व हासिल हुआ। नीलामी के लिए प्रस्तुत सभी उत्पाद आरक्षित मूल्य से ऊपर बिके। बहरहाल, 2012 से 2016 के बीच दूरसंचार स्पेक्ट्रम की पांच एसएमआरए नीलामी उतनी सफल नहीं रहीं। इतना ही नहीं एक व्यापक मान्यता यह है कि दूरसंचार कंपनियों द्वारा चुकाए गए उच्च मूल्य ने उनकी व्यवहार्यता पर असर डाला है।


संसाधनों की सीलबंद बोली अधिक आम है। देश में तेल खनन को लेकर नीलामी प्रक्रिया अपनाई गई और उन कंपनियों को ब्लॉक आवंटन किया गया जो सरकार को अधिकतम गैस और तेल देने का वादा कर रहे थे। अभी हाल ही में बिना खनन वाले या कम खनन वाले ब्लॉक का आवंटन उन कंपनियों को किया जा रहा है जो अधिकतम खनन करने को राजी हैं। सरकारी राजस्व पर इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि खनन लाइसेंस का वास्तविक क्रियान्वयन किस तरह होता है। वाणिज्यिक कोल ब्लॉक के लिए पहली सीलबंद बोली वाली नीलामी हाल ही में की गई। इसके लिए 38 कोयला खदानों में राजस्व साझेदारी की व्यवस्था तय की गई। इनमें से 15 के लिए कोई बोली नहीं लगी। यहां भी सार्वजनिक राजस्व पर प्रभाव क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।


क्या ऐसी नीलामी सबसे बेहतर है जहां सार्वजनिक राजस्व सर्वाधिक हो? सर्वोच्च न्यायालय ने 2जी और कोयला खनन लाइसेंस मामले में कहा कि खुली नीलामी ही इसका इकलौता विधिक तरीका है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय में एक स्पष्टीकरण में कहा, 'नीलामी राजस्व बढ़ाने का सबसे बेहतर तरीका हो सकती है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि राजस्व में इजाफा ही इकलौता सार्वजनिक लक्ष्य हो।' न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 39(ब) के तहत प्राकृतिक संसाधनों के वितरण में साझा बेहतरी ही एकमात्र कारक होना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि अनिवार्य नीलामी आर्थिक दलीलों के साथ विरोधाभासी हो सकता है। विभिन्न संसाधनों के साथ भिन्न प्रकार के बरताव की आवश्यकता हो सकती है। परंतु जो भी वैकल्पिक तरीका हो उसे निष्पक्ष, तार्किक, गैर भेदभावकारी, पारदर्शी, पूर्वग्रहमुक्त और बिना पक्षपात का होना चाहिए ताकि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और समतापूर्ण व्यवहार को प्राथमिकता दी जा सके।


चुनिंदा मामलों में यह संभव है कि साझा बेहतरी को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक संसाधनों पर अधिकतम प्रतिफल हासिल करना उपयुक्त हो परंतु वैकल्पिक तरीकों पर भी विचार किया जाना चाहिए। हालिया तेल खनन नीलामी में ऐसा किया भी गया।


सर्वोच्च न्यायालय ने 2012 में जो प्रतिक्रिया दी थी उसका यही अर्थ है कि अधिकतम राजस्व हासिल करने का कोई भी विकल्प नियम आधारित होना चाहिए और उसमें मनमाने निर्णयों की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। ताकि भ्रष्टाचार या विकृत पूंजीवाद की कोई भी आशंका दूर की जा सके। यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। खुली नीलामी प्रक्रिया ऐसी ही होती है। इसकी शर्तें ऐसी होनी चाहिए जो बोलीकर्ताओं के लिए भी एकदम निष्पक्ष हों। उदाहरण के लिए शहरी भूमि की नीलामी की बोली की प्रक्रिया में बोलीकर्ता द्वारा सस्ते आवास की तादाद या इसके लिए जमीन की पेशकश, तयशुदा आरक्षित मूल्य पर जमीन हासिल करने की वजह बन सकती है। वास्तविक चुनौती यह है कि साझा बेहतरी को ऐसे परिभाषित किया जाए कि उसे मापा जा सके और जो उन संसाधनों के लिए प्रासंगिक हो जिन्हें निजी कंपनियों या व्यक्तियों को हस्तांतरित किया जाना है।


सार्वजनिक संसाधनों की नीलामी स्वागतयोग्य है क्योंकि इसने पारदर्शिता सुनिश्चित की है और भ्रष्टाचार की आशंका कम हुई है। परंतु नीलामी का डिजाइन ऐसा होना चाहिए कि वह संविधान की भावना के अनुरूप साझा बेहतरी के काम आए और जिसमें छेड़छाड़ या बदलाव से बचाव की पूरी गुंजाइश मौजूद हो।


सौजन्य - बिजनेस स्टेंडर्ड।

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Editorials : क्षेत्रीय हितों का ध्यान

अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर की द्विपक्षीय रक्षा सहयोग संबंधी तीसरी 2+2 वार्ता में भारत के लिए अवसर भी हैं और जोखिम भी। यह बैठक उस समय हो रही है जब लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ पांच महीनों से तनाव बना हुआ है। अमेरिका के लिए यह बैठक एशिया में चीन के खिलाफ अमेरिकी नेतृत्व वाली रणनीतिक साझेदारी के गति पकडऩे का मामला है। पॉम्पिओ की इस यात्रा में मालदीव, श्रीलंका और इंडोनेशिया भी शामिल हैं। उन्होंने कभी नहीं छिपाया कि उनकी सरकार 'चीन की कम्युनिस्ट पार्टी' की धमकियों का मुकाबला करने के रास्ते तलाश रही है। यह बैठक दोनों देशों के बीच बीते डेढ़ दशक से चली आ रही करीबी के साथ निरंतरता में है। इस दौरान एजेंडे में एक अहम बात है मूलभूत विनिमय एवं सहयोग समझौते (बीईसीए) पर हस्ताक्षर। यह उन चार बुनियादी समझौतों में से अंतिम है जो रक्षा रिश्तों में गहराई लाने से संबंधित हैं। बीईसीए भारतीय सेना को अमेरिका के स्थलीय, समुद्री और हवाई डेटा तो मुहैया कराएंगे ही, साथ ही अमेरिकी रक्षा विभाग के सैटेलाइट नेटवर्क की बदौलत भारत लंबी दूरी की चुनिंदा मिसाइल शक्तियों में भी शामिल हो जाएगा।

परंतु हकीकत यह है कि यह चर्चा अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के एक सप्ताह पहले हो रही है। चुनाव के नतीजे दोनों देशों के रिश्तों में तब्दीली ला सकते हैं। हालांकि अब यह तय हो चुका है कि चीन और अमेरिका का तनाव बना रहेगा, भले ही अमेरिका में किसी भी दल का राष्ट्रपति हो। ऐसे में एक सहयोगी के रूप में भारत की भूमिका काफी हद तक अमेरिका के साथ उसके रिश्तों पर निर्भर करेगी। यदि डॉनल्ड ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति बने रहते हैं तो चीन के साथ चल रहे तनाव में भारत एक अहम साझेदार बना रहेगा। पॉम्पिओ ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के भारत के दावे को समर्थन दिया है और भारत तथा ईरान के बीच के संयुक्त उपक्रम वाले चाबहार बंदरगाह को को प्रतिबंधों से छूट देने की इच्छा जताई है। यह बात ट्रंप प्रशासन के लिए भारत के महत्त्व को साबित करती है।


यदि बड़े कारोबारी घरानों के समर्थन वाले जो बाइडन जीतते हैं तो माना जा सकता है कि वह चीन के साथ कारोबारी तनाव कम करेंगे।  भारत की बात करें तो उसे भी एच1बी वीजा व्यवस्था में ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाई गई कड़ाई से मुक्ति मिल सकती है। परंतु बाइडन बराक ओबामा के ईरान के साथ परमाणु समझौते और प्रशांत पार साझेदारी को नए सिरे से शुरू कर सकते हैं। ट्रंप ने इन दोनों को नकार दिया। बहरहाल यदि ऐसा हुआ तो संतुलन भारत से दूर हो जाएगा। बाइडन ने भारत को मित्र जरूर बताया है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका में जिस तरह ट्रंप की वकालत की वह डेमोक्रेट प्रशासन में पैठ कमजोर करेगा।


बहरहाल भारत को महाशक्ति के साथ गठजोड़ से परे अपनी क्षेत्रीय पहचान मजबूत करने की दिशा में काम करना होगा। ऑस्ट्रेलिया को नवंबर में मालाबार कवायद के लिए आमंत्रित करना हिंद महासागर और हिंद प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बेहतर होगा। भारत ने नवंबर में शांघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन की शासन प्रमुखों की परिषद की मेजबानी की बात कही है जो चीनी आक्रामकता के बीच कूटनीतिक परिपक्वता का उदाहरण है। मोदी सरकार के कार्यकाल में नेपाल के साथ रिश्ते अवश्य खराब हुए हैं। श्रीलंका के साथ शुरुआती करीबी भी कमजोर पड़ी क्योंकि भारत ने श्रीलंका के कर्ज राहत के अनुरोध पर देरी की। वहीं नागरिकता संशोधन अधिनियम के मसले पर बांग्लादेश के साथ तनाव बढ़ा है। भारत अमेरिका के साथ करीबी का फायदा उठाकर पाकिस्तान पर आतंकी समूहों का समर्थन रोकने का दबाव भी नहीं बना पाया है। भारत को पड़ोसियों पर भी नजर डालने की जरूरत है।


सौजन्य - बिजनेस स्टेंडर्ड।

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Opinion : गलत चीज को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश

ए के भट्टाचार्य 

हालिया मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि केंद्र सरकार अपने वित्त पर कोविड-19 महामारी के दुष्प्रभावों के मद्देनजर राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम की समीक्षा कर रही है। ऐसा ही एक विचाराधीन प्रस्ताव राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को एक अंक में सीमित रखने के बजाय एक लचीले दायरे में रखने का है।

इस महीने के अंत में 15वें वित्त आयोग की अंतिम रिपोर्ट आने वाली है। आयोग की भी सोच यही है कि राजकोषीय घाटे का एक दायरा तय करने के विचार का वक्त आ गया है। लिहाजा उम्मीद यही है कि तीन महीने बाद पेश होने वाले वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में राजकोषीय घाटा लक्ष्य का एक आंकड़ा देने के बजाय एक दायरा तय कर दिया जाए। अर्थव्यवस्था के नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक प्रतिशत के रूप में यह आंकड़ा पेश किया जाता है।


अधिकांश देशों की तरह भारत ने हमेशा ही राजकोषीय घाटे का लक्ष्य एक अंक का ही रखा है। एफआरबीएम अधिनियम लागू होने के बाद केंद्र सरकार को तय राजकोषीय घाटा लक्ष्यों के मुताबिक चलना जरूरी था। वर्ष 2018 में इस कानून को संशोधित किए जाने के बाद कुछ खास परिस्थितियों में लक्ष्य से 0.5 फीसदी अंक विचलन की अनुमति दे दी गई।


कुछ साल पहले इस पर चर्चा हो रही थी कि सरकार के राजकोषीय मजबूती लक्ष्यों को क्या इसके ऋण स्तर से जोड़ा जाना चाहिए? लेकिन केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटे को अपना प्राथमिक लक्ष्य बनाने का फैसला किया। राजकोषीय घाटे के पैमाने से सरकार के प्रदर्शन को आंकने की प्रवृत्ति में गत 10 वर्षों में कुछ नरमी आई है। मसलन, चार मौकों पर वास्तविक राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष के शुरू में निर्धारित लक्ष्य से अधिक निकला। तीन वर्षों में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल किया गया जबकि तीन बार ये लक्ष्य से बेहतर रहे।


हालांकि इन 10 वर्षों में राजकोषीय समेकन का रास्ता थोड़ा बेहतर रहा। वर्ष 2010-11 में जीडीपी के 4.9 फीसदी रहा राजकोषीय घाटा वर्ष 2011-12 में बढ़कर 5.9 फीसदी हो गया था। लेकिन बाद के लगातार सात वर्षों में केंद्र सरकार का घाटा लगातार नीचे ही आता गया है। इस गिरावट का बड़ा कारण तेल कीमतों में आई कमी और इस क्षेत्र से सरकार का मोटा राजस्व वसूलना था। लेकिन बीते एक साल में राजकोषीय घाटे का पथ एक बार फिर से चिंताजनक दिशा में जाता दिख रहा है। वर्ष 2018-19 में 3.4 फीसदी रहा राजकोषीय घाटा 2019-20 में 4.6 फीसदी हो गया।


वित्त वर्ष 2020-21 में बने हालात से कोई भी अनजान नहीं है। इसका मतलब है कि इस साल राजकोषीय समेकन लक्ष्य से कम रहेगा। वर्ष 2020-21 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 3.5 फीसदी तय किया गया था लेकिन सरकार के राजस्व में बड़ी गिरावट आने से इसका व्यय बोझ भी बजट अनुमानों से अधिक ही रहेगा। सरकार ने इस साल 4 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त उधारी की योजना पहले ही बनाई हुई है, लिहाजा इस साल राजकोषीय घाटे के बजट अनुमान से काफी अधिक रहने के आसार हैं।


ध्यान रहे कि एक तीव्र राजकोषीय ह्रास के इस संदर्भ में ही लचीले दायरा-उन्मुख घाटा लक्ष्यों का विचार पेश किया गया है। सरकार के राजकोषीय समेकन प्रयासों को परखने की नई व्यवस्था बनाने से सार्वजनिक विमर्श को एक दायरा-केंद्रित लक्ष्य निर्धारण की तरफ ले जाने में मदद मिलनी चाहिए। राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 3 फीसदी तय करने और उसमें 0.2 फीसदी विचलन की गुंजाइश का विचार पिछले दो वर्षों में हुई तीव्र राजकोषीय फिसलन से कहीं बड़ी घटना होगी। अगले साल फिसलन होने पर विमर्श आसानी पर इस पर केंद्रित हो सकता है कि 5 फीसदी की सीमा भी नहीं छुई गई है। फिर भी नीति विश्लेषकों एवं रेटिंग एजेंसियों के नजरिये से देखें तो 3 फीसदी घाटे का लक्ष्य रखा जाएगा जिसे सरकार हासिल करना चाहती है। उसी समय यह दलील भी दी जाएगी कि घाटा राजकोषीय समेकन की राह में निर्दिष्ट व्यापक दायरे के भीतर ही सीमित है। वर्ष 2021-22 में 3.3 फीसदी या 2022-23 में 3.1 फीसदी का राजकोषीय घाटा लक्ष्य हासिल करने में बहुत दिक्कत नहीं आएगी। सरकार के हालिया मध्यम-अवधि राजकोषीय नीति-सह-राजकोषीय नीति रणनीति वक्तव्य में यह अनुमान जताया गया है।


लिहाजा दायरा-उन्मुख लचीला घाटा लक्ष्य तय करने की तरफ बढऩे का वक्त इस विचार से कहीं ज्यादा अहम है। सिद्धांत रूप में यह एक अनुकरणीय विचार है। लेकिन लागू होने के समय के चलते आलोचक इस बदलाव को एक भुलावे और राजकोषीय समेकन की चुनौतियों से ध्यान भटकाने की कोशिश के रूप में देख सकते हैं। यह बदलाव पिछले वर्षों में राजकोषीय मोर्चे पर सरकार के प्रदर्शन की तुलना को भी थोड़ा मुश्किल बना देगा। आखिर आप अगले साल के दायरा-उन्मुख लक्ष्य की तुलना बीते वर्षों के तय लक्ष्यों एवं उनके अनुपालन से कैसे कर सकते हैं?


15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एन के सिंह ने कहा है कि एक संख्या के बजाय एक दायरे को लक्ष्य बनाना अधिक मुफीद है क्योंकि यह मौद्रिक नीति लक्ष्यों के साथ संगति में होगा और इससे 'कम लेखांकन इंजीनियरिंग' की जरूरत होगी। वर्ष 2016 से मौद्रिक नीति समीक्षाओं को 4 फीसदी की खुदरा मुद्रास्फीति लक्ष्य प्राप्ति से जोड़ा जा चुका है जिसमें इधर या उधर 2 फीसदी अंक के विचलन की अनुमति है। लचीले खुदरा मुद्रास्फीति लक्ष्य- निर्धारण ने मौद्रिक नीति के मामले में निश्चित रूप से काम किया है। मुद्रास्फीति एवं राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तय करने में जिस तरह से एकरूपता सुनिश्चित की गई है वह सिद्धांत रूप में एक बढिय़ा विचार है, भले ही इस निर्णय का समय समस्या पैदा कर सकता है। लेकिन क्या इससे लेखांकन इंजीनियरिंग में भी कमी आएगी?


केंद्र सरकार की राजकोषीय फिसलन पैदा करने वाली प्रमुख समस्या एक साल में जुटाए जा सकने वाले राजस्व एकत्रीकरण का सटीक अनुमान लगा पाने में इसकी असफलता है। पिछले 10 बजटों में से छह में सरकार का वास्तविक शुद्ध कर संग्रह इसके प्रारंभिक अनुमान से 4-18 फीसदी तक कम रहा है। पिछले 10 में से सात वर्षों में राजकोषीय फिसलन दर्ज की गई और गैर-कर राजस्व 3 से लेकर 33 फीसदी तक कम रहा। विनिवेश प्रक्रिया के संदर्भ में पिछले 10 में सात साल फिसलन रही और राजस्व न्यूनता 14 फीसदी से लेकर 55 फीसदी तक रही।


यह सच है कि राजस्व संग्रह का बढ़ा-चढ़ाकर अनुमान लगाने की समस्या गत दो वर्षों में और भी बढ़ी है और इस साल के हालात देखते हुए स्थिति और बिगडऩे की ही आशंका है। लेकिन इस समस्या का जन्म हाल ही में नहीं हुआ है। कई वर्षों से राजस्व संग्रह का अधिक अनुमान लगाने की वजह से सरकार राजकोषीय मजबूती की राह पर चलने में असफल रही है। राजस्व व्यय को काबू में रख पाने की इसकी क्षमता सीमित रही है। पूंजीगत व्यय में की गई कटौती का बहुत कम प्रभाव रहा है क्योंकि सरकार के कुल खर्च में पूंजीगत व्यय का हिस्सा 13-14 फीसदी के निम्न स्तर पर ही रहा है।


इस तरह बजट पेश करते समय राजस्व आकलन को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की एक स्पष्ट प्रवृत्ति रही है। इसे यह दिखाने के लिए किया जाता है कि राजकोषीय घाटा लक्ष्य एफआरबीएम अधिनियम के अनुरूप है। इसके अलावा यह सरकार की छवि राजकोषीय रूप से सक्षम दिखाने में भी मददगार होता है। अगर दायरा-उन्मुख राजकोषीय घाटा लक्ष्य निर्धारण का मकसद लेखांकन इंजीनियरिंग में कमी लाना है तो राजस्व पूर्वानुमान की कवायद को अधिक सटीक एवं वास्तविक बनाने से अधिक तीव्र एवं टिकाऊ परिणाम निकलने चाहिए। फिर घाटे को एक दायरे में लक्षित करने की जरूरत भी नहीं रह जाएगी। सरकार अपने राजकोषीय घाटा लक्ष्य को एक अंक में ही निर्धारित करने की मौजूदा परंपरा जारी रख सकती है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Editorials : गैर जिम्मेदाराना वादे

राजनेताओं के लिए चुनाव के समय अतिरंजित वादे करना कोई नई बात नहीं है। परंतु राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के तेजस्वी यादव जो बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व भी कर रहे हैं, वह इसे ऐसे स्तर पर ले गए हैं जिसे पूरी तरह गैर जिम्मेदाराना कहा जा सकता है। यादव ने प्रदेश में 10 लाख सरकारी नौकरी देने का वादा किया है जो बिहार में सरकारी कर्मचारियों की मौजूदा तादाद के तीन गुने से अधिक है। इस समय प्रदेश में 3,10,000 सरकारी कर्मचारी हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने पहले इसका मखौल उड़ाया और बाद में 19 लाख नौकरियों का वादा कर दिया। हालांकि उसने इन सभी नौकरियों के सरकारी होने की बात नहीं कही। यह सच है कि कुछ राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में अत्यंत कम आबादी के बावजूद सरकारी कर्मचारी बहुत अधिक हैं। मिसाल के तौर पर जम्मू कश्मीर की आबादी बिहार की आबादी के आठवें हिस्से के बराबर है लेकिन वहां 4.80 लाख सरकारी कर्मचारी हैं।

यह बात ध्यान देने वाली है कि लोकलुभावन वादों में कर्ज माफी के वादे भी बड़ी तादाद में सरकारी नौकरी देने के वादे से बेहतर हैं क्योंकि कर्ज माफी एक बार करनी होती है जबकि सरकारी नौकरी में इजाफा प्रदेश के राजकोष पर हर वर्ष बोझ डालेगा जबकि उसके पास स्वयं सीमित संसाधन हैं।


राजद ने किसानों की कर्ज माफी का वादा भी किया है। बिहार इस स्थिति में नहीं है कि वह ऐसे लोकप्रिय कदमों का बोझ उठा सके। राज्य के पास आंतरिक संसाधन बहुत कम हैं और वह केंद्र से होने वाले हस्तांतरण पर बहुत हद तक निर्भर करता है। हाल के वर्षों में राज्य के कुल व्यय में केंद्र से होने वाले हस्तांतरण की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत तक रही है। इसके करीब केवल महाराष्ट्र है जहां यह हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत थी।


बहरहाल, ऐसी तमाम वजह हैं जिनके चलते प्रदेश में रोजगार देने के वादे की अलग अपील है। बिहार में बेरोजगारी का औसत राष्ट्रीय औसत की तुलना में खराब है और श्रम शक्ति भागीदारी दर देश में सबसे कम है। श्रम शक्ति भागीदारी में कमी बताती है कि लोगों को राज्य में रोजगार मिलने की आशा नहीं है। इसके अलावा कोविड-19 महामारी के कारण लगे लॉकडाउन के चलते भी बड़ी तादाद में प्रवासी श्रमिक प्रदेश में लौट आए। इस बात ने भी इस विषय को महत्त्वपूर्ण बना दिया।


इसमें दो राय नहीं कि बिहार को अपनी बढ़ती आबादी के लिए रोजगार सृजित करने की आवश्यकता है। क्योंकि इस श्रम शक्ति को मजबूरन देश के अन्य हिस्सों में पलायन करना पड़ता है। यह पलायन कई बार बुनियादी शारीरिक श्रम के कामों के लिए होता है। परंतु सरकारी नौकरी (जिन्हें सरकार वहन करने की हालत में नहीं) से बेरोजगारी की समस्या दूर नहीं होगी। बिहार के शासन और बुनियादी ढांचे में सुधार की आवश्यकता है। इससे निजी निवेश जुटाने और रोजगार के अवसर तैयार करने में मदद मिलेगी।


लोकलुभावन नीतियां संसाधनों को स्थायी रूप से उत्पादकता व्यय से दूर कर सकती हैं। ऐसे में राज्य में विकास और कठिन हो जाएगा। सन 2018-19 में बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का बमुश्किल 33 प्रतिशत थी। बहरहाल रोजगार का वादा लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करने की कवायद भर है क्योंकि विभिन्न सर्वेक्षणों के आधार पर यादव जानते हैं कि उनके जीतने और सरकार बनाने की संभावना बहुत कम है। उन्हें पता है कि उन्हें यह वादा पूरा करना ही नहीं पड़ेगा। हां, इससे उनकी वोट हिस्सेदारी और सीटों की तादाद अवश्य सुधर सकती है। शायद वह इसी सीमित लक्ष्य के साथ काम कर रहे हों। परंतु राजग ने चुनावी समय में गैर जिम्मेदाराना वादों के मानक को और ऊंचा कर दिया है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Editorials: प्रतिभूतियों की धोखाधड़ी ही है कंपनी की धोखाधड़ी

सोमशेखर सुंदरेशन 

इसे सामने आने में 28 वर्षों का बहुत लंबा वक्त लगा है लेकिन अब यह आ चुका है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने धोखाधड़ी एवं अनुचित व्यापार कार्य प्रणालियों के नियमन में संशोधन कर सूचीबद्ध कंपनियों के खाते में जालसाजी को भी एक कपटपूर्ण कृत्य घोषित कर दिया है।

नियमों में संशोधन कर यह स्पष्ट किया गया है कि 'प्रतिभूतियों की सूचीबद्धता वाली किसी भी कंपनी की परिसंपत्ति या आय को किसी दूसरे खाते में डालने या दुरुपयोग के किसी भी कृत्य' को प्रतिभूति बाजार में धोखाधड़ी, साजिशपूर्ण एवं अनुचित व्यापार कार्य माना जाएगा। इसी तरह ऐसी कंपनी के खातों या वित्तीय विवरण में हेरफेर करने की कोई भी कोशिश या विवरणों को छिपाने की कोशिश को भी इसी श्रेणी में शामिल माना जाएगा।


यहां तक का सफर काफी दिलचस्प रहा है। बाजार नियामक की पहले यह मान्यता थी कि बाजार में खरीदे-बेचे जा रहे उत्पादों के विनिर्माताओं पर उसका कोई अधिकार-क्षेत्र नहीं है और उसका केवल बाजार में लेनदेन वाले उत्पाद पर ही नियंत्रण है। इस नजरिये की वजह से यह बयान सामने आया कि सेबी का खातों में गड़बड़ी करने वाली कंपनियों पर कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं है। इसकी वजह से पूरी तरह मनमाने ढंग से चुनने की आदत बन गई। सेबी अपनी इच्छा होने पर यह दलील देता था कि उसका इन पर कोई अधिकार-क्षेत्र नहीं है। कभी-कभार वह कहता था कि वित्तीय जानकारी एवं खातों में किसी भी गड़बड़ी का बाजार में कारोबार पर असर पड़ता है लिहाजा सेबी को इस पर कार्रवाई करने का अधिकार है।


बंबई उच्च न्यायालय के समक्ष एक अजीब स्थिति आई थी जब एक ही न्यायाधीश के समक्ष सेबी ने दो मामले में विरोधाभासी रुख दिखाया था। सेबी ने एक मामले में अपने शपथ-पत्र में कहा था कि उसका खातों में गड़बड़ी पर कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं है जबकि दूसरे मामले में उसने शपथपत्र में कहा था कि कंपनी के खातों से दूसरी जगह भेजी गई रकम को वापस लाने के लिए कंपनी एवं उसके प्रवर्तकों को निर्देश देने का उसका आदेश पूरी तरह उसके अधिकार-क्षेत्र में आता है। असल में, एक ही मामले में अंतर्निहित विरोधाभास भी देखने को मिला था। सत्यम घोटाले में सेबी ने वैध ऑडिटरों के कार्य की गुणवत्ता को अपने अधिकार-क्षेत्र के भीतर कार्रवाई लायक बताया था। लेकिन उसने खाते में धोखाधड़ी के लिए उस कंपनी के प्रवर्तकों एवं प्रबंधन के खिलाफ कदम नहीं उठाया था। उसने सिर्फ फर्जीवाड़े के दौरान प्रवर्तकों के प्रतिभूतियों कारोबार पर ही कार्रवाई की।


वजूद में आने के बाद से ही सेबी ने शेयर दलालों, मर्चेंट बैंकरों, म्युचुअल फंड और प्रतिभूति लेनदेन करने वाले बाजार मध्यवर्तियों के नियमन के लिए कायदे-कानून बनाए हैं। लेकिन उसने प्रतिभूति जारी करने वाली कंपनियों का नियमन करने वाले नियम बनाने से परहेज ही रखा। ऐसा नहीं है कि सेबी शेयर जारी करने वाली कंपनियों के लिए शर्तें नहीं तय करता था लेकिन ये दिशानिर्देश की शक्ल में होती थीं न कि नियम।


नियम 'अधीनस्थ कानून' होते हैं जो संसद द्वारा प्रदत्त अधिकरण बनाते हैं। भारतीय गणराज्य की सर्वोच्च कानून निर्मात्री संस्था होने से संसद नियम बनाने की शक्ति अधिकरणों को सौंप सकती है। नियम बनने के बाद उन्हें संसद के पटल पर रखने की जरूरत होती है। फिर वे मूल कानून के साथ अपनी विधिक हैसियत रखने वाले कानून का अविभाज्य हिस्सा बन जाते हैं। शेयर जारी करने वाली कंपनियों पर अधिकार-क्षेत्र नहीं होने की सोच होने से सेबी ने 'खुलासे एवं निवेशक संरक्षण' से संबंधित दिशानिर्देश ही बनाए ताकि एक प्रतिभूति पेशकश में किए जाने वाले खुलासों का निर्धारण किया जा सके। दिशानिर्देशों को संसद द्वारा बनाए गए कानून का दर्जा नहीं होने से उनकी संसदीय समीक्षा नहीं की जाती है और न ही उनकी अहमियत नियमों की तरह होती है।


जहां खुलासा एवं निवेशक संरक्षण दिशानिर्देश शेयर जारी करने के समय के जरूरी खुलासों का नियमन करते हैं वहीं अविरल खुलासे जारीकर्ता एवं स्टॉक एक्सचेंज के बीच होने वाले 'सूचीबद्धता समझौता' में ही देनी होती थी। वर्ष 1995 तक 'सूचीबद्धता समझौता' शब्दावली का संसद के बनाए किसी भी कानून में कोई भी जिक्र नहीं था। फिर प्रतिभूति अनुबंध (नियमन) अधिनियम 1956 को संशोधन कर यह प्रावधान किया गया कि स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध एक कंपनी को उस एक्सचेंज के साथ हुए सूचीबद्धता करार का पालन करना चाहिए। विभिन्न कंपनियों का नियंत्रण अलग शब्दावलियों से होता था जो सूचीबद्धता के समय हस्ताक्षर के लिए जरूरी समझौते के अनुपालन की स्थिति पर निर्भर करता था। समझौता लागू होते समय उसमें उल्लिखित प्रावधानों का जिक्र सेबी के एक मॉडल सूचीबद्धता समझौते में किया गया था लेकिन वह भी किसी नियामकीय प्रावधान के बाहर ही था।


आखिरकार इन दिशानिर्देशों को महज एक दशक पहले पूंजी से जुड़े मुद्दों को देखने वाले नियमों में कूटबद्ध किया गया। सूचीबद्धता समझौते की जरूरतों को तो सिर्फ पांच साल पहले सूचीबद्धता दायित्वों संबंधी नियमों के रूप में संकलित किया गया। यह सब होते समय भी सेबी एक कंपनी के लेखांकन में धांधली और फंड की हेराफेरी से जुड़े मामलों में अपनी इच्छा से नरम-गरम रुख अपनाता था। सेबी के भीतर एक फॉरेंसिक लेखांकन प्रकोष्ठ गठित किया गया, कंपनियों को पत्र भेजा जाता था और ऑडिट समितियों को संदिग्ध हेराफेरी की पड़ताल करने को कहा जाने लगा। लेकिन उसमें एक वैधानिक प्रतिबद्धता नहीं थी कि धोखाधड़ी के बारे में पता चलने पर सेबी वास्तव में कार्रवाई जरूर करेगा।


लेकिन अब वह तमाम अनिश्चितता खत्म हो गई है। पूंजी बाजार के नियामक के तौर पर सेबी अब खातों में गड़बड़ी से जुड़े मामलों में कार्रवाई करने को लेकर चुनिंदा रवैया नहीं अपना सकता है।


(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)

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Editorials: भारत-अमेरिका की करीबी और चीन की आक्रामकता

शेखर गुप्ता  

अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर का भारत दौरा इस सप्ताह शुरू हो रहा है। ऐसी 2+2 चर्चाएं पिछले कुछ समय से चल रही हैं। व्यापार के मोर्चे पर चाहे जो दिक्कतें आई हों, भारत और अमेरिका के सामरिक रिश्ते तेजी से विकसित हुए हैं। ऐसे में इस बातचीत में क्या खास है?


दरअसल यह वार्ता अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के बमुश्किल एक सप्ताह पहले हो रही है। इस महामारी के बीच आखिर अमेरिकी प्रशासन के दो अत्यंत अहम सदस्य भारत क्यों आ रहे हैं? क्या केवल 2+2 संवाद प्रक्रिया ही इसकी वजह है?


अहम सवाल यह भी है कि भारत दोनों के साथ करीबी क्यों बढ़ा रहा है जबकि यह भी पता नहीं कि सप्ताह भर बाद राष्ट्रपति चुनाव में कौन जीतेगा? वैसे तमाम सर्वेक्षण यही कह रहे हैं कि डॉनल्ड ट्रंप की हार के आसार अधिक हैं। सामान्य परिस्थितियों में भारत ऐसे में प्रतीक्षा करना उचित समझता।


परंतु यह सामान्य समय नहीं है। केवल इसलिए नहीं कि चीन लद्दाख में छह माह पुराने धरने से पीछे हटने को तैयार नहीं है। वह भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है लेकिन अमेरिका के लिए वह शीर्ष विदेशी और सामरिक नीति प्राथमिकता नहीं है।


परंतु तस्वीर इस बात से बदल जाती है कि चीन न केवल अमेरिका बल्कि दुनिया के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों के लिए अहम सामरिक चिंता का विषय बना हुआ है। इसमें ब्रिटेन  समेत पूरा यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं।


अरब मुल्क भले कुछ न कह रहे हों लेकिन ईरान और चीन की करीबी को वे भयातुर होकर देख रहे हैं। पाकिस्तान और चीन के रिश्ते जगजाहिर हैं और अब वह निर्णायक रूप से तुर्की के पक्ष में होता जा रहा है। यहां तक कि उसके विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से सऊदी अरब की आलोचना की।


शी चिनफिंग के नेतृत्व में चीन ने पूर्व, पश्चिम और दक्षिण में घबराहट पैदा कर दी है। उत्तर में उसे क्षेत्रीय स्तर पर स्वीकार लिया गया है। रूस शायद चीन का इकलौता ताकतवर और करीबी सहयोगी है। हम पाकिस्तान को इस सूची में नहीं रख रहे क्योंकि उसका रिश्ता सहयोग से अधिक निर्भरता का है।


रूस चीन को ईंधन की आपूर्ति करता है और ऐसा करके उसे मलक्का जलडमरूमध्य के खतरों से भी बचाता है। दोनों के सैन्य रिश्ते भी मजबूत हो रहे हैं। रूस के पास तकनीक और औद्योगिक आधार है। चीन के पास बड़ी सेना है जिसे इनकी जरूरत है। उसके पास धन भी है। परिणामस्वरूप चीन की सेना और रूस के उद्योग जगत के बीच एक नया सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ उभरता दिख रहा है।


ध्यान रहे भारतीय वायुसेना को भी यह मानकर चलना है कि उसे लद्दाख क्षेत्र में रूस में बनी एस-400 और एस-300 मिसाइल प्रणाली की चुनौती का सामना करना है। भारत की एस-400 प्रणाली 2022 के पहले शुरू नहीं हो सकेगी। यह एक जटिल सामरिक हकीकत है। पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के रूप में चीन की सरपरस्ती में पहले ही दो ऐसी परमाणु शक्तियां मौजूद हैं जिनका कोई भरोसा नहीं है। रूस भी उसका साथी है। इस क्षेत्र में भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया ही संतुलनकारी शक्तियां हैं जिन पर काफी दबाव है। ताइवान को धमकाया जा रहा है जबकि हॉन्गकॉन्ग को कब्जे में लिया जा चुका है। ऐसे में अमेरिकी नेतृत्व वाला गठजोड़ चिंतित है। वैश्विक उथलपुथल वाले इस वर्ष में चीन इकलौता देश है जिसकी अर्थव्यवस्था प्रगति करेगी।


यह बात उसे अमेरिका में द्विपक्षीय चिंता का विषय बनाती है। ट्रंप और बाइडन शायद एक ही बात पर सहमत होंगे कि आखिर चीन से ज्यादा कड़ाई से कौन निपटेगा?


गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में क्रोधित भगवान राम सभी रिश्तों के लिए एक सूत्र देते हैं फिर चाहे वह किसी व्यक्ति के साथ हो या किसी देश के साथ-भय बिन होत न प्रीति। शायद यह बात उन्होंने अपनी ताकत का अहसास कराने के लिए कही हो लेकिन इसका उलटा भी सच है।


उदाहरण के लिए कोई भी शायद यह कहने से पीछे नहीं हटता कि भारत-अमेरिका संपर्क क्वाड को लेकर तेजी ऑस्टे्रलिया की मालाबार नौसैनिक कवायद में वापसी आदि का ताल्लुुक चीन से नहीं है लेकिन अमेरिकी उप विदेश मंत्री स्टीफन ई बेगन जैसे व्यक्ति ने सप्ताह भर पहले भारत में यह कहने से गुरेज नहीं किया कि चीन तमाम देशों के लिए कठिनाई पेश कर रहा है लेकिन उसके बारे में चर्चा करने से गुरेज किया जा रहा है।


यह चीन का भय ही है जो इन तमाम देशों को एक साथ ला रहा है और इस दौरान तमाम कूटनीतिक बहाने बेमानी हैं। बल्कि मैं तो इन्हें चीन पीडि़त समाज भी कहता हूं। यही हकीकत है। चीन ने इन देशों में खलबली मचा दी है। यही कारण है कि पॉम्पिओ भारत के बाद श्रीलंका और मालदीव जा रहे हैं।


इस बदलाव को देखते हुए हैं देश के सामरिक विद्वानों की व्याख्याएं भी पढ़ता रहता हूं। सी राजा मोहन ने 25 अगस्त को द इंडियन एक्सप्रेस में लिखा कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की बहुचर्चित परिभाषा किस प्रकार बदल गई है। वह कहते हैं कि सन 1990 के दशक में शीतयुद्ध के बाद एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था बनी। उस वक्त भारत के लिए रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ था अपने रणनीतिक हितों और राजनीतिक स्वतंत्रता को अमेरिका जैसी रसूखदार ताकत से आजाद रखना। यह अहम था क्योंकि क्लिंटन के दोनों कार्यकाल के दौरान चाहे जो मतभेद रहे हों लेकिन उनके लोग भारत-पाकिस्तान को दुनिया की सबसे खतरनाक जगह मानते थे जहां परमाणु जंग का खतरा था। उन्हें यह भी लगता था कि वे कश्मीर मसले को हल करने में मदद कर सकते हैं। भारत ने सामरिक संतुलन कायम करने के लिए रूस से पुराना रिश्ता दोबारा शुरू किया और चीन की ओर हाथ बढ़ाया।


आज रणनीतिक स्वायत्तता की परिभाषा कहीं अधिक तीक्ष्ण है: अब इसका अर्थ है भारत की क्षेत्रीय अखंडता संप्रभुता और क्षेत्रीय कद को मिल रही चीनी चुनौती को दूर करना। मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सिंगापुर में 2018 के शांग्री-ला संवाद में दिया गया भाषण भी याद आ रहा है जहां उन्होंने रणनीतिक स्वायत्तता की एकदम अलग पारंपरिक परिभाषा दी थी। उन्होंने कहा कि भारत अपनी राह खुद बनाएगा और बड़ी शक्तियों को एक और प्रतिस्पर्धा से बचना चाहिए। यह भारतीय विदेश विभाग के पुराने नजरिये की वापसी थी। आज शायद प्रधानमंत्री वह बात न दोहराएं।


दूसरे हैं ध्रुव जयशंकर जो अमेरिकी थिंकटैंक ओआरएफ सेंटर के प्रमुख हैं। उन्होंने 'फस्र्टपोस्ट' को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर 'तालमुडिक बहसों' का अंत हो चुका है। आप यह सवाल कर सकते हैं कि अपनी परिभाषा में उन्होंने वैदिक या शास्त्रार्थ परंपरा के बजाय यहूदी शब्द क्यों चुना लेकिन संदेश स्पष्ट है। रणनीतिक नीतियां सर्वोच्च राष्ट्रीय हितों से तय होती हैं न कि पुरानी याद या पाखंड से।


जब कोई शीतयुद्ध चल रहा होता है या नया शीतयुद्ध शुरू होता है तब भारत निरपेक्ष नहीं रह सकता। मैं जानता हूं कि यह पढ़कर नेहरू और इंदिरा के तमाम समर्थक नाराज हो सकते हैं लेकिन मैं उन दोनों को इसलिए भी पसंद करता हूं कि वे कभी पक्षधरता में पीछे नहीं हटे। बात बस यह है कि सन 1962 के बाद नेहरू ने अमेरिका को बहुत देरी से चुना जब उनका पराभव हो रहा था। उनकी बेटी ने सोवियत संघ को तरजीह दी। उनके नेतृत्व में कम से कम 1969 और 1977 के बीच और फिर 1980 से 1984 के बीच भारत गुटनिरपेक्ष नहीं था। वह रूस की सहयोगी थीं क्योंकि वह राष्ट्र हित में काम कर रही थीं।


आज भी वैसा ही चयन किया गया है। भारत दो दशक से उस दिशा में बढ़ रहा है और अमेरिका ने भी उत्साह दिखाया है। परमाणु संधि के बाद कुछ बाधा अवश्य आई जब कांग्रेस आलाकमान की थकान जाहिर थी और तत्कालीन रक्षा मंत्री ए के एंटनी जोखिम लेने से इतना अधिक बचते थे कि मालाबार कवायद तक अपना जज्बा खो बैठी थी।


अब वैसी कोई हिचक नहीं है। भारत और अमेरिका ने निर्णय ले लिया है। नजदीकी चरम पर है। दोनों देशों में खासकर अमेरिका में मामला द्विपक्षीय है। वहां एक सप्ताह के भीतर बदलाव देखने को मिल सकता है। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के एक सप्ताह पहले भारत में उक्त 2+2 बैठक हो रही है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Editorials: संतुलन आवश्यक

पुनर्गठित मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की पहली बैठक में कई अहम मुद्दे उठाए गए और नीतिगत बहस के दायरे का विस्तार किया गया। देश की आर्थिक स्थिति फिलहाल अन्य बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों की तुलना में अधिक जटिल है। मुद्रास्फीति पिछले कई महीनों से केंद्रीय बैंक के तय दायरे से ऊपर है और निकट भविष्य में भी उसके ऊपर ही बने रहने की आशंका है क्योंकि चालू वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था में 10 फीसदी की गिरावट आने की आशंका है। उच्च मुद्रास्फीति के कारण दरें तय करने वाली समिति ब्याज दरों में और कमी नहीं कर पा रही है जिससे आर्थिक गतिविधियों को अपेक्षित मदद नहीं मिल पा रही है। इस संदर्भ में एमपीसी के सदस्यों के नजरिये और अधिक अहम हो गए।

दिलचस्प बात यह है कि गत सप्ताह जारी बैठक के संक्षिप्त ब्योरों के मुताबिक नवनियुक्त सदस्य जयनाथ वर्मा ने नीतिगत प्रस्ताव की भाषा से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि यदि एमपीसी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करती है जिनके अर्थ वही नहीं हैं जो कहे जा रहे हैं तो इससे उसकी विश्वसनीयता को धक्का लग सकता है। समिति में यह क्षमता होनी चाहिए कि मुद्रास्फीति का झटका लगने की स्थिति में वह आक्रामक तरीके से प्रतिक्रिया दे सके। उन्होंने यह भी कहा कि नीतिगत प्रस्ताव में छह माह के जिस औपचारिक निर्देशन की बात कही गई वह भी अपर्याप्त है। एक विश्वसनीय नीति मुद्रास्फीति के जोखिम को कम करेगी और प्राप्ति वक्र के तीव्र ढलान को कम करेगी। लंबी अवधि की ऊंची दरें न केवल अर्थव्यवस्था में निवेश को प्रभावित करेंगी बल्कि वे ऋण बाजार में विदेशी फंड को भी आकर्षित करेंगी और वास्तविक प्रभावी विनिमय दर को बढ़ाएंगी।


डॉ. वर्मा द्वारा दी जा रही दलीलों पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है और उन पर बहस होनी चाहिए। यह भी ध्यान देने लायक है कि लंबी अवधि के प्रतिफल भी राजकोषीय नीति की गुणवत्ता से प्रभावित हैं। समकक्ष देशों में भारत का बजट घाटा सर्वाधिक में से एक है। इस वर्ष इसमें और अधिक इजाफा होने की आशंका है। आंतरिक समिति के सदस्य मृदुल सागर ने इस मसले को रेखांकित किया कि उच्च शासकीय ऋण के कारण प्राप्ति वक्र की गिरावट अनुमानित मुद्रास्फीति या वृद्धि से संबंधित नहीं है। वित्तीय बाजार और केंद्रीय बैंक दोनों को मध्यम अवधि में राजकोषीय विस्तार के संभावित असर को भी ध्यान में रखना होगा। बहरहाल दरें तय करने वाली समिति के लिए तात्कालिक चिंता है मुद्रास्फीति की प्रकृति। एमपीसी मुद्रास्फीति में मौजूदा इजाफे को अस्थायी मानती है और उसका मानना है कि आपूर्ति में सुधार होने के साथ ही दरों में कमी आएगी क्योंकि अर्थव्यवस्था अब खुलने लगी है। रिजर्व बैंक का अनुमान है कि अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में मुद्रास्फीति घटकर 4.3 फीसदी रह जाएगी।


बहरहाल, इस अनुमानित मार्ग को लेकर भी जोखिम हो सकते हैं। उदाहरण के लिए आरबीआई के डिप्टी गवर्नर माइकल पात्रा ने कहा था कि ईंधन और खाद्य कीमतों के कारण लगा आपूर्ति क्षेत्र का झटका चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में मुद्रास्फीति में हुए विस्तार के 71 फीसदी के लिए उत्तरदायी है। एक ओर जहां कुल आपूर्ति सहज हो रही है वहीं खाद्य कीमतों में इजाफा, खासतौर सब्जियों की बढ़ती कीमत चिंता का विषय हो सकती है। इसके अलावा व्यवस्था में भारी पैमाने पर नकदी डाली गई है और नीतिगत ध्यान वृद्धि को मदद देने पर केंद्रित है जो उचित भी है। इसका भी निकट से मध्यम अवधि में मुद्रास्फीति के अनुमानों पर असर हो सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में मुद्रास्फीति की स्थिति को देखते हुए केंद्रीय बैंक को अपने नीतिगत रुख का प्रभावी ढंग से संचार करना होगा। मुद्रास्फीति के परिदृश्य को देखें तो निकट भविष्य में नीतिगत दरों में कटौती की संभावना नहीं है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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श्रम कानून संबंधी मुकदमों के राह की बड़ी अड़चन

एम जे एंटनी 

कोविड महामारी की शुरुआत के पहले भी हम सरकारी अस्पतालों के बरामदों में पड़े मरीजों के समुचित इलाज के अभाव में मर जाने की खबरें सुनते रहते थे। इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय के गलियारों में रखी आलमारियों में भी पुराने मामलों की फाइलों का ढेर लगा हुआ है। कुछ दशकों के बाद वे या तो बेकार हो जाती हैं या उन्हें कानूनी प्रतिनिधि विरासत में ले लेते हैं या उनकी अपने आप अप्राकृतिक मौत हो जाती है। श्रम कानूनों संबंधी मुकदमों के मामले में तो यह काफी हद तक सच है। सर्वोच्च न्यायालय के पिछले दो महीनों में सुनाए गए 80 फैसलों में से केवल एक मामला ही श्रम कानून से संबद्ध था। इस बीच सरकारें सुस्थापित श्रम कानूनों को कमतर करने वाले कानून जल्दबाजी में बनाती रही हैं।


वर्ष 1997 से ही लंबित कई मामले मुख्य न्यायाधीश द्वारा समुचित पीठ गठित होने का इंतजार कर रहे हैं। इनमें से 15 मामलों को खुद सर्वोच्च न्यायालय ने वर्गीकृत किया हुआ है। ये मामले श्रमिक संगठनों, बर्खास्तगी, छंटनी, अनुबंध नियुक्ति, भविष्य निधि, ग्रैच्युटी, कारखाना अधिनियम और कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम से संबंधित हैं। अकेले कर्मचारियों को नौकरी से हटाने के ही करीब 180 मामले लंबित हैं जिनमें से सबसे ताजा मामला 2001 का है। हमें यह बात ध्यान में रखनी होगी कि ये मामले सर्वोच्च न्यायालय पहुंचने के पहले भी कई अदालतों के चक्कर काट चुके हैं। कई अपीलों को बड़े पीठों के सुपुर्द किया जा चुका है। इसके साथ ही उच्च न्यायालयों में ऐसे मामले बड़े पीठों को सौंपे जाने की घटनाएं भी जोड़ लीजिए।


जब सर्वोच्च न्यायालय लंबे समय तक किसी मामले में स्थिति स्पष्ट करने में नाकाम रहता है तो न्यायाधीश भी उलझन में रहते हैं। वर्ष 1978 में सर्वोच्च न्यायालय ने बेंगलूरु जलापूर्ति मामले में औद्योगिक विवाद अधिनियम में 'उद्योग' की उदार व्याख्या दी थी। बाद के न्यायाधीशों को लगा कि उद्योग की यह परिभाषा काफी व्यापक है, लिहाजा वर्ष 2005 में इस मामले को पुनरीक्षण के लिए नौ न्यायाधीशों के पीठ को भेज दिया गया। लेकिन वृहद पीठ ने अभी तक इस मामले की सुनवाई ही नहीं की है।


दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस स्थिति को लेकर हाल ही में कुछ सख्त टिप्पणियां की हैं। जब पेटेंट कार्यालय ने इस कानून का हवाला देते हुए कुछ कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया तो मामला सामने आया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, 'इस वक्त तक बेंगलूरु जलापूर्ति मामला मौलिक रूप से अछूता रहा है। न्यायिक पुनरीक्षण के  तूफानों से अभी तक बचता आ रहा इस फैसले से निश्चित रूप से उच्च न्यायालय आबद्ध है।' सर्वोच्च न्यायालय के 1978 के फैसले को आधार बनाते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि पेटेंट कार्यालय एक उद्योग है। धर्मार्थ संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और दूसरी इकाइयों को यह जानने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से अंतिम फैसले का इंतजार करना होता है कि वे उद्योग की श्रेणी में आते हैं या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय और नीचे की अदालतों के फैसलों में भी शायद इसे गलत रूप में समझ लिया गया है। न्यायिक निष्क्रियता की वजह से अपना मुकदमा हार जाने वाले वादियों की खराब किस्मत ही इसके लिए जिम्मेदार है।


ऐसी समस्या कई दूसरे श्रम मामलों में भी बनी हुई है। इस साल की शुरुआत में अदालत ने श्रम कानूनों से जुड़े कुछ सवाल बड़े पीठों को भेजे थे। सर्वोच्च न्यायालय के एक पीठ ने अस्थायी एवं दैनिक कामगारों को नियमित करने के 2015 के अपने फैसले पर ही नए सिरे से गौर करने का फैसला किया। उसे लगा था कि उसके पुराने फैसले श्रम अदालतों की शक्ति के प्रति सामंजस्यपूर्ण नहीं है। यह आदेश चार उच्च न्यायालयों के दिए फैसलों के खिलाफ दायर अपीलों पर पारित किया गया। शीर्ष अदालत में नौकरी स्थायी करने की मांग वाली अपीलों की भरमार होती है लेकिन इस मसले पर बीते दशकों में अलग-अलग आदेश पारित होते रहे हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या में अस्पष्टता होने से ऐसा हुआ।


जब नए श्रम कानून लागू हो चुके हैं तो इन याचिकाओं में उठाए गए तमाम मुद्दे अप्रासंगिक या महज बौद्धिक विमर्श का मुद्दा बनकर रह जाएंगे। हालांकि अपने मामले की पैरवी करने वाले मुवक्किल यही दलील देंगे कि उनकी याचिकाओं का निपटारा घटना के समय मौजूद रहे कानून के मुताबिक ही किया जाए। यह कानून के पश्चवर्ती प्रभाव को लेकर कई बहसों को जन्म देगा। अदालत को पुराने एवं नए श्रम कानूनों के बीच सामंजस्य बिठाना होगा।


नए श्रम कानूनों में 44 पुराने श्रम कानूनों को समाहित किया गया है लेकिन इन्हें आगे चलकर संवैधानिक अदालतों से भी पार पाना होगा। केंद्र सरकार ने पिछले महीने जल्दबाजी में तीन श्रम संहिताओं को पारित कराया था। उस समय विपक्ष संसदीय कार्यवाही में शामिल नहीं था और इन विधेयकों के प्रावधानों की समुचित विवेचना नहीं हुई। गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों की सरकार ने मौजूदा श्रम कानूनों में ढील देने वाली कुछ अधिसूचनाएं जारी कर नियोक्ताओं को राहत देने की कोशिश की थी। लेकिन शीर्ष अदालत ने गुजरात सरकार की अधिसूचना यह कहते हुए खारिज कर दी कि यह कामगारों के जीवन के अधिकार एवं बेगार श्रम के विरुद्ध हासिल अधिकार का निरादर करता है।


ऐसा लगता है कि हाल के समय में सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक एवं मानवाधिकार मुद्दों से निपटते समय अपनी महिमा कुछ हद तक खो दी है। उस संदर्भ में देखें तो श्रम कानूनों पर इसके निर्णयों का विश्लेषण घिसा-पिटा ही होगा। यह शीर्ष अदालत का तीसरा बड़ा परीक्षण साबित होगा।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।


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अक्टूबर में कमजोर रहा देश का श्रम बाजार

महेश व्यास

कोविड-19 महामारी से अस्त-व्यस्त हुई भारत की अर्थव्यवस्था के दोबारा पटरी पर लौटने की रफ्तार ढीली होती दिख रही है। सीएमआईई के कंज्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्वे से आए श्रम बाजार के आंकड़ों के अनुसार मई में आर्थिक गतिविधियों में तेजी दिखी थी और जून में रफ्तार और तेज हो गई थी। यह सिलसिला जुलाई में भी जारी रहा। हालांकि इसके बाद अगस्त और सितंबर में मामला सुस्त पड़ गया। अब ऐसा लगने लगा है कि अक्टूबर में हालात और बिगड़ सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में श्रम बाजार की परिस्थितियों का आकलन रोजगार दर से किया जाता है। यह काम करने लायक कुल आबादी और रोजगार में लगे लोगों का अनुपात होता है।

वित्त वर्ष 2019-20 में रोजगार दर 39.4 प्रतिशत थी। यह अप्रैल 2020 में कम होकर 27.2 प्रतिशत रह गई, लेकिन बाद में 300 आधार अंक के सुधार के साथ यह मई में 30.2 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई। जून में रोजगार दर में शानदार सुधार हुआ और यह 600 आधार अंक की तेजी के साथ 36.2 प्रतिशत हो गई। जुलाई में रोजगार दर में 140 आधार अंक की और तेजी आई और यह 37.6 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई। अगस्त में इसमें सुस्ती आनी शुरू हो गई जब यह कम होकर 37.5 प्रतिशत रह गई। सितंबर में इसमें 38 आधार अंक का मामूली सुधार हुआ। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि 2019-20 में औसत रोजगार दर में सुधार आने से पहले ही इसमें सुस्ती आनी शुरू हो गई थी। अक्टूबर में रोजगार के आंकड़े खस्ताहाल दिख रहे हैं। इस महीने के पहले तीन सप्ताहों में रोजगार दर सितंबर की 38 प्रतिशत की तुलना में कमजोर रही। अक्टूबर के पहले तीन सप्ताहों में यह दर क्रमश: 37.6 प्रतिशत, 37.5 प्रतिशत और 37.9 प्रतिशत रही।


रोजगार दर में आ रही गिरावट थामना किसी चुनौती से कम नहीं है। रोजगार दर स्थिर रहे केवल इसके लिए ही अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त रोजगार सृजन की दरकार होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो काम करने वाले लोगों की संख्या में इजाफे के अनुसार ही बाजार में रोजगार उपलब्ध होना चाहिए। रोजगार फिलहाल जहां है वहां से इसमें कमी नहीं आने देना चाहिए। इसकी वजह यह है कि काम करने वाले युवाओं की आबादी स्वाभाविक तौर पर बढ़ती रहती है और इसी अनुपात में रोजगार सृजन की भी आवश्यकता होती है। पिछले चार वर्षों के दौरान प्रत्येक वर्ष रोजगार दर में गिरावट आई है। इसकी वजह यह है कि रोजगार के अतिरिक्त अवसर सृजित नहीं हो पाए हैं।


अक्टूबर 2020 के पहले तीन सप्ताहों में रोजगार दर में गिरावट आने की मुख्य वजह ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार दर में आई गिरावट है। सितंबर में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार दर 39.8 प्रतिशत थी। लॉकडाउन के बाद यह अपने सर्वोच्च स्तर पर थी और वर्ष 2019-20 की 40.7 प्रतिशत के मुकाबले बहुत कम नहीं थी। हालांकि ऐसा लगने लगा है कि ग्रामीण क्षेत्र 40 प्रतिशत या इससे अधिक रोजगार बरकरार रखने में सफल नहीं रहे हैं। 6 सितंबर को समाप्त हुए सप्ताह में साप्ताहिक रोजगार दर 39.9 प्रतिशत रही थी, लेकिन इसके बाद इसमें गिरावट आई है। 4 अक्टूबर को समाप्त हुए सप्ताह में रोजगार दर कम होकर 39 प्रतिशत रह गई और 11 अक्टूबर को समाप्त हुए सप्ताह में यह और फिसलकर 38.8 प्रतिशत रह गई। यह 18 अक्टूबर को समाप्त हुए सप्ताह में सुधरकर 39.5 प्रतिशत हो गई। हालांकि सितंबर की औसत दर के मुकाबले यह तब भी कम रही। अक्टूबर के पहले तीन सप्ताहों में औसत रोजगार दर 39.1 प्रतिशत रही।


अक्टूबर में रोजगार दर में कमी थोड़ी हैरान करने वाली जरूर है। इस महीने खरीफ फसलों की कटाई अपने चरम पर होती है। फसलों की बुआई चार महीनों तक चलती रहती है, लेकिन ज्यादातर फसलों की कटाई अक्टूबर में ही होती है। विभिन्न फसलों के विकास की अवधि अलग-अलग होती है, लेकिन कपास और गन्ना छोड़कर ज्यादातर फसलें अक्टूबर में काटी जाती हैं। ऐसा संभव है कि अक्टूबर में मनरेगा योजना के तहत रोजगार में कमी आई होगी। 19 अक्टूबर तक इस योजना के तहत 5.85 करोड़ व्यक्ति दिन (एक दिन में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या को रोजगार दिवसों से गुना करने के बाद प्राप्त आंकड़ा) रोजगार सृजित हुए। अक्टूबर 2019 में पूरी अवधि में 13.8 करोड़ व्यक्ति-दिन रोजगार मुहैया कराए गए थे। हालांकि इन आंकड़े में अक्सर संशोधन होते रहते हैं, इसलिए इन्हें लेकर फिलहाल किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता है। वैसे अंतर काफी बड़ा है। अक्टूबर 2019 में औसत व्यक्ति-दिन रोजगार का आंकड़ा 44.7 लाख था। अक्टूबर 2020 के पहले 19 दिनों में यह मात्र 30.8 लाख रहा, यानी 31 प्रतिशत कम रहा। चूंकि, पूरे देश में रोजगार दर में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान अधिक होता है, इसलिए इसमें और गिरावट नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।


ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में कमी जरूर आई, लेकिन शहरी क्षेत्रों में अक्टूबर 2020 में इसमें सुधार दिखा। सितंबर में देश के शहरी क्षेत्रों में रोजगार दर 34.4 प्रतिशत थी। इससे पहले सितंबर में शहरी क्षेत्रों में रोजगार में तेज गिरावट आई थी, अक्टूबर में आंकड़े बिल्कुल अलग और उत्साह जगाने वाले रहे। शहरी क्षेत्रों में रोजगार दर 34.4 प्रतिशत थी और वर्ष 2019-20 की औसत 36.9 प्रतिशत दर के मुकाबले 254 अंक कम रही। अक्टूबर के पहली तीन सप्ताहों में शहरी क्षेत्रों में औसत रोजगार दर 34.8 प्रतिशत थी। हालांकि यह भी 2019-20 के स्तर से लगभग 200 आधार अंक कम था।


ग्रमीण भारत में रोजगार दर में गिरावट और शहरी क्षेत्रों में इसका लगातार निचले स्तर पर बना रहना देश के श्रम बाजार में सुधार में कमजोरी को दर्शाता है। 2020-21 और 2019-20 के समान महीने में मासिक रोजगार दर में अंतर अगस्त 2020 तक कम रहा। उस समय अंतर महज 182 आधार अंक रह गया था। लेकिन सितंबर में यह बढ़कर 254 अंक हो गया। अक्टूबर में यह अंतर और बढ़ सकता था।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।


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भारत में नीति-निर्माण का सत्ता से जुड़ा मनोरोग

कनिका दत्ता

राजनीतिक दलों के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि वे सत्ता में होने पर प्रतिष्ठान का बचाव करने लगते हैं और विपक्ष में जाने पर निर्दयी दुश्मन बन जाते हैं। देश के दो बड़े राष्ट्रीय दलों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस को भी यह रूपांतरण जद में लेता रहता है। पिछले तीन दशकों में दोनों दलों ने एक-दूसरे की नीतियों के विरोध को अपने आप में एक साध्य बनाया हुआ है, भले ही इससे कुछ हासिल न होता हो।

मसलन, संसद में अनुशासन के झंडाबरदार माने जाने वाले नेता विपक्ष में होने पर असभ्य एवं बाधक प्रदर्शनकारी की भूमिका में आ जाते हैं जो कार्यवाही के दौरान कागजात फाडऩे लगते हैं और सदन के आसन की तरफ दौडऩे लगते हैं। हाल ही में राज्यसभा में हमें यह नजारा खूब दिखा। नब्बे के पूरे दशक में भाजपा स्वदेशी की प्रबल समर्थक हुआ करती थी लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के दूसरे कार्यकाल में वह आर्थिक सुधारों की समर्थक बन गई जिसे कारोबारी जगत का समर्थन भी मिला। इस बीच आर्थिक उदारीकरण की पैरोकार रही कांग्रेस सोनिया गांधी के नेतृत्व में गरीबों एवं वंचितों की पार्टी बन गई।


सत्ता से उपजने वाली इस मानसिक व्याधि का मतलब है कि हरेक दल को संसद में हासिल बहुमत ही तय करता है कि सभी नीतियां सही हैं। वर्ष 2020 के मध्य के कुछ महीनों में यह फिर नजर आया। इस साल मई में नरेंद्र मोदी की सरकार को उसी कार्यक्रम पर आश्रित होना पड़ा जिसे उन्होंने कभी 'कांग्रेस की अगुआई वाली संप्रग सरकार की नाकामी का प्रतीक' बताया था। वह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) थी जो महामारी के दौरान लगे सख्त लॉकडाउन में बढ़ती रोजगारी से निपटने के लिए सरकार का सहारा बनी। वित्त मंत्री ने लॉकडाउन में अपने गांव लौटने वाले प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने के लिए मनरेगा के तहत 40,000 करोड़ रुपये आवंटित किए।


मोदी ने वर्ष 2005 में गुजरात का मुख्यमंत्री रहते समय कृषि कार्य एवं निर्माण उद्योगों के साथ सहानुभूति जताई थी। उन उद्योगों का कहना था कि मनरेगा की वजह से उनके पास कामगारों की कमी होने लगी है। मोदी ने ऐसा कानून लाने के लिए संप्रग सरकार की आलोचना भी की थी। वहीं वर्ष 2015 में मोदी ने प्रधानमंत्री के तौर पर कारोबार एवं मध्य वर्ग से परे अपनी पहचान बनाने के लिए किसी भी दूसरे चालाक नेता की तरह अपना रुख बदल लिया और कहा कि वह मनरेगा को बेहतर रूप देकर बरकरार रखेंगे।


अब भी संप्रग सरकार की इस प्रतिनिधि योजना के साथ भाजपा का असहज नाता है। शोधों से पता चला है कि मनरेगा ने ग्रामीण इलाकों में गरीबी कम करने में एक बड़ी भूमिका निभाई है। कृषि मंत्री ने 2019 में संसद में कहा था कि मोदी सरकार मनरेगा को खत्म करना चाहती है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते असंतोष को देखते हुए मोदी सरकार ने उस साल और इस साल भी मनरेगा का खूब सहारा लिया। सोनिया गांधी ने इस अवसर का बखूबी इस्तेमाल किया, खासकर उस समय जब गांव लौट रहे प्रवासी मजदूरों को संभाल पाने में सरकार की नाकामी उजागर हो रही थी। सोनिया ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक लेख लिखकर प्रधानमंत्री से अनुरोध किया था कि प्रवासियों की मदद के लिए मनरेगा का खुलकर इस्तेमाल किया जाए।


राजनीति का मकसद अगर वाकई में गरीबों या किसी भी वंचित भारतीय की मदद करना ही था तो फिर कांग्रेस पार्टी को पिछले महीने संसद में पारित हुए कृषि सुधार विधेयकों की इस कदर मुखालफत नहीं करनी चाहिए थी। किसी भी कांग्रेसी नेता ने यह नहीं बताया है कि खुद उसके 2019 चुनाव घोषणापत्र में दर्ज इसी तरह की नीति भाजपा की सरकार द्वारा लागू किए जाने पर अब इतनी खराब कैसे हो गई है? कुछ नेताओं की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था खत्म हो जाने की शिकायत भी निर्मूल साबित हुई है।


सभी नीतियों की तरह इस नीति के भी कुछ दुष्प्रभाव होंगे, जैसा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने मनरेगा के परिचालन में हो रही धांधलियों का खुलासा भी किया है। लेकिन बहुत पहले ही अपनी उपयोगिता खत्म कर चुकी एकल खरीदार व्यवस्था में बदलाव की समझ को लेकर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए और कांग्रेस को इसका स्वागत करना चाहिए।


अगर भाजपा के विरोध के लिए कांग्रेस को एक सटीक नीति की तलाश थी तो नए श्रम कानूनों में इसकी गुंजाइश मौजूद है। छोटी अवधि के अनुबंध और कामगारों के फायदे एवं मजदूर ठेकेदारों के लिए शर्तों में ढील देने के कदम सिद्धांत रूप में अच्छे हो सकते हैं लेकिन सामूहिक मोलभाव को थोक स्तर पर कमजोर करते हैं और नए श्रम कानूनों में अंतर्निहित श्रम अधिकार तो निश्चित रूप से चिंता का विषय हैं। मसलन, अगर नियोक्ता या श्रमिक ठेकेदार अनुबंध शर्तों से मुकर जाते हैं या सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करते हैं तो श्रमिकों को राहत देने वाले संस्थागत उपाय क्या हैं? फिर भी इस सुधार पर गहरी चुप्पी छाई हुई है। सच तो यह है कि असंगठित क्षेत्र के विशाल कार्यबल को संगठित करने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है और सांगठनिक जोश की कमी से जूझ रही 134 साल पुरानी पार्टी के लिए यह एक वजह हो सकती है।


याद रहे कि कांग्रेस ने देशभक्ति की बाहुबली शैली वाली अभिव्यक्ति ( सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट हवाई हमला) पर प्रधानमंत्री मोदी को खुलकर बधाई दी थी। इन दोनों मौकों पर कई मुश्किल सवाल पूछे जाने चाहिए थे लेकिन कोई भी नेता राष्ट्रीय सुरक्षा और खासकर पाकिस्तान से जुड़े सरकारी फैसलों पर सवाल नहीं उठाता है।


बहरहाल जमीनों के मालिकाना ब्योरे को दुरुस्त कर डिजिटल रूप देने के लिए हाल ही में शुरू की गई 'स्वामित्व' योजना सहयोग का एक अनूठा अवसर लेकर आई है। इस योजना का प्रयोग भाजपा के शासन वाले छह राज्यों में शुरू हुआ है। कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र में भी राज्य सरकारों के साथ मिलकर भूमि स्वामित्व एवं बंटाई दस्तावेजों को डिजिटल करने की बात कही गई थी। लेकिन इसका श्रेय भाजपा के खाते में जाने के बाद क्या कांग्रेस इस चुनावी वादे को पूरा करने की शिद्दत से कोशिश करेगी?


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श्रम-रोजगार- भारत को सालाना कितनी नौकरियों की दरकार?

महेश व्यास

अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि भारत को हर साल कितनी नौकरियां पैदा करने की जरूरत है? इस सवाल के कई कारण हैं। पहला, परंपरागत अर्थशास्त्र बताता है कि अगर एक अर्थव्यवस्था बढऩे की इच्छा रखती है तो उसे अधिक श्रम को उत्पादक नौकरियों में लगाना होगा। दूसरा, भारत के पास विशाल एवं बढ़ती हुई युवा आबादी होने से उन्हें बढिय़ा नौकरियां मुहैया कराने से जीवन में एक बार मिलने वाला जनांकिकी लाभांश भुनाया जा सकता है।

तीसरा, अगर इस विशाल एवं युवा आबादी को रोजगार नहीं मिलता है तो वे अशांत हो सकते हैं और एक सीमा से अधिक होने पर वह असंतोष सामाजिक अस्थिरता का भी सबब बन सकता है। चौथा, भारत में श्रम भागीदारी दर बेहद कम है और रोजगार दर भी कम है। वैश्विक मानकों की तुलना में भारत में कामकाजी उम्र वाली आबादी का एक बेहद छोटा हिस्सा ही काम कर रहा है या काम करने की इच्छा रखता है। तेजी से बढ़ती हुई विशाल अर्थव्यवस्था के तौर पर भारत की छवि के लिए यह अटपटा है।


यह उन कारणों की कोई विस्तृत सूची नहीं है कि भारत को हर साल कितने रोजगार पैदा करने चाहिए? इसके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।


पहला कारण इस लिहाज से प्राथमिक है कि आर्थिक वृद्धि होने पर वस्तुओं एवं सेवाओं का अधिक उत्पादन होता है और इसके लिए तार्किक रूप से अधिक श्रम नियोजन एवं पूंजी की जरूरत होनी चाहिए। ऐसा तभी किया जा सकता है जब अधिक रोजगार पैदा किए जाएं और अधिक लोगों को रोजगार मिले। लेकिन भारत की वृद्धि के इस किस्से की एक पुरानी एवं मशहूर पहेली यह है कि वृद्धि तो दशकों से होती आ रही है लेकिन शुद्ध रूप में इसकी वजह से कोई नया रोजगार नहीं पैदा हो रहा है।


वर्ष 1993-94 से लेकर 2011-12 के दौरान वास्तविक सकल मूल्य-वद्र्धन (जीवीए) सालाना 6.5 फीसदी रहा था। आधिकारिक आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए संतोष मेहरोत्रा ने रोजगार के बारे में यह अनुमान लगाया है कि इस अवधि में सालाना रोजगार वृद्धि महज 1.3 फीसदी ही रही। इसी तरह 2011-12 से लेकर 2017-18 के दौरान वास्तविक जीवीए भले ही 6.9 फीसदी वार्षिक रहा लेकिन इस दौरान रोजगार में तो गिरावट ही आ गई। सीएमआईई के सर्वे की मानें तो वर्ष 2016-17 और 2019-20 के दौरान 5.5 फीसदी की वार्षिक वृद्धि होने के बावजूद इस अवधि में रोजगार में फिर गिरावट आई।


साफ है कि बीते तीन दशकों में औसतन 5 फीसदी से अधिक दर से वास्तविक आर्थिक वृद्धि करने के बावजूद भारत की रोजगार वृद्धि 1 फीसदी से भी कम रही है। पिछले आठ वर्षों में भारत इसी दर से वृद्धि करता रहा है और इस दौरान उसके कार्यबल में सिकुडऩ आई है। इस तरह हम रोजगार-रहित वृद्धि से कम रोजगार वाली वृद्धि की तरफ बढ़े हैं।


इसके बावजूद विश्व बैंक की दक्षिण एशिया इकनॉमिक फोकस स्प्रिंग 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को अपनी मौजूदा रोजगार दर को बरकरार रखने के लिए हर साल 80 लाख रोजगार पैदा करने होंगे। इसके लिए उसे अपनी आर्थिक वृद्धि को मौजूदा स्तर से ऊंचा उठाना होगा। भारत ने वर्ष 2016-17 से ही इस जरूरी संख्या का आधा रोजगार भी नहीं पैदा किया है। जहां तक रोजगार दर का सवाल है तो वह गिरती ही जा रही है। हर साल 80 लाख रोजगार का सृजन भारत के लिए एक मोटा आकलन ही है।


कामकाजी उम्र वाली आबादी (15 साल से अधिक उम्र के लोग) में हर महीने करीब 20 लाख की बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि इनमें से सभी लोग रोजगार की तलाश में नहीं लगते हैं। औसत कार्यबल भागीदारी दर 42 फीसदी के करीब है। इस तरह यह माना जा सकता है कि कामकाजी उम्र वाली आबादी में शामिल होने वाले 20 लाख नव-प्रवेशियों में से 42 फीसदी लोग हर महीने रोजगार की तलाश में होंगे। इस तरह हर महीने 8.4 लाख और साल भर में करीब 1 करोड़ नए रोजगार की दरकार होती है। अगर हम स्वीकार्य बेरोजगारी दर को 10 फीसदी मान लें तो भी भारत को सालाना 90 लाख रोजगार अवसरों की जरूरत पड़ेगी।


यहां पर चर्चा बेहद कम रोजगार दर होते हुए भी कार्यबल में शामिल नए लोगों के मुद्दे पर हो रही है। वर्ष 2019-20 तक भारत में काम करने के ख्वाहिशमंद करीब 4.5 करोड़ बेरोजगार लोग थे। इनमें से 3.3 करोड़ लोग पूरी शिद्दत से काम की तलाश में जुटे हुए थे लेकिन उन्हें नाकामी ही मिल रही थी जबकि बाकी 1.2 करोड़ लोग प्रच्छन्न बेरोजगारी के शिकार थे। कुल 4.5 करोड़ बेरोजगारों में से 3.1 करोड़ लोगों की उम्र 30 साल से कम थी।


ऐसे में असली चुनौती श्रम भागीदारी एवं रोजगार दरों में बढ़ोतरी की है। युवा आबादी की बढ़ती संख्या के बावजूद नए रोजगार पैदा कर पाने में भारत की नाकामी को देखते हुए इन दरों में वृद्धि की कोई भी चर्चा बेमानी ही लगती है। तात्कालिक चिंता यह होनी चाहिए कि इन दरों में गिरावट न आए। पिछले चार वर्षों में श्रम भागीदारी दर 46 फीसदी से गिरकर 2019-20 में 43 फीसदी पर आ गई। वर्ष 2020-21 के मध्य तक यह और भी गिरावट के साथ 41 फीसदी से भी नीचे आ गई है। वहीं रोजगार दर 43 फीसदी से गिरकर 2019-20 में 39 फीसदी पर आ गई थी और सितंबर 2020 तक इसका आंकड़ा 38 फीसदी पर खिसक चुका है।


रोजगार दर को फिर से वर्ष 2016-17 के 43 फीसदी स्तर पर ले जाने के लिए भारत को आज 5 करोड़ नए रोजगार की जरूरत होगी। भारत में हालिया इतिहास को देखें तो यही लगता है कि भारत सालाना 80-90 लाख रोजगार ही पैदा कर सकता है। हालांकि अगले कुछ दशकों में भारत की युवा आबादी कम होने लगेगी जिससे घटती रोजगार दर की समस्या भी दूर हो सकती है। लेकिन हम जनांकिकी लाभांश का अवसर हमेशा के लिए गंवा देंगे।

(लेखक सीएमआईई के प्रबंध निदेशक एवं सीईओ हैं)

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श्रम-रोजगार : कोरोनाकाल में अगस्त तक 2.1 करोड़ वेतनभोगी हुए बेरोजगार

महेश व्यास  



भारत में लॉकडाउन के दौरान वेतनभोगी कर्मचारियों के रोजगार पर मार पडऩे का सिलसिला जारी है। इन पांच महीनों में रोजगार गंवाने वालों में सबसे बड़ी संख्या वेतनभोगी कर्मचारियों की है। दूसरे तरह के रोजगार कमोबेश शुरुआती झटकों से उबरने में सफल रहे हैं और कुछ श्रेणियों के रोजगार में तो बढ़ोतरी भी हुई है लेकिन रोजगार गंवाने वाले वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। आर्थिक वृद्धि के साथ या उद्यमिता में वृद्धि की स्थिति में भी वेतनभोगी रोजगार हमेशा नहीं बढ़ता है। लेकिन मौजूदा आर्थिक विपदा में सबसे ज्यादा मार इस पर ही पड़ रही है।

एक रोजगार को सामान्यत: वेतनभोगी तब माना जाता है जब किसी व्यक्ति को एक संगठन नियमित आधार पर काम पर नियुक्त करता है और नियमित अवधि पर उसे वेतन देता है। भारत में यह अंतराल एक महीने का होता है। यह नियोक्ता सरकार हो सकती है या किसी भी आकार का निजी क्षेत्र का उद्यम या फिर गैर-सरकारी संगठन। वैसे भारत के लोग सबसे ज्यादा सरकारी नौकरियों को पसंद करते हैं। ये सभी मोटे तौर पर औपचारिक क्षेत्र की वेतनभोगी नौकरियां हैं। हालांकि वेतनभोगी रोजगार का दायरा इसके आगे भी है। घरों में काम करने वालों को भी मासिक वेतन दिया जाता है। लिहाजा घरेलू नौकर, रसोइया, ड्राइवर, माली और चौकीदार भी वेतनभोगी कर्मचारी की श्रेणी में आएंगे, बशर्ते उन्हें तय समय पर तय वेतन दिया जाता हो। लेकिन इस तरह के रोजगार अमूमन अनौपचारिक क्षेत्र में आते हैं। सभी तरह के वेतनभोगी रोजगार की संख्या भारत के कुल रोजगार का 21-22 फीसदी है। वेतन पाने वालों से अधिक संख्या किसानों की है और उनसे भी कहीं अधिक दिहाड़ी मजदूर हैं। अगर किसानों एवं दिहाड़ी मजदूरों को एक साथ जोड़ दें तो वे भारत की कुल कामकाजी जनसंख्या का करीब दो-तिहाई हो जाते हैं।


कामकाजी आबादी की यह संरचना सबसे तेजी से बढ़ रही प्रमुख अर्थव्यवस्था कहे जाने वाले देश के लिए बहुत मुनासिब नहीं है। भारत की तीव्र वृद्धि के बावजूद वेतनभोगी रोजगार का अनुपात धीमी गति से बढ़ रहा है। वर्ष 2016-17 में 21.2 फीसदी पर रहा अनुपात 2017-18 में 21.6 फीसदी हो गया और उसके अगले साल यह 21.9 फीसदी दर्ज किया गया। इस अवधि में वास्तविक सकल मूल्य संवद्र्धन (जीवीए) सालाना 6-8 फीसदी की दर से बढ़ा। फिर 2019-20 में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 4 फीसदी पर आने के बीच वेतनभोगी कर्मियों का अनुपात गिरकर 21.3 फीसदी रह गया।


पिछले वर्षों में भारत की समुचित आर्थिक वृद्धि के बावजूद वेतनभोगी नौकरियों में आया यह ठहराव अकेली नाकामी नहीं है। यह भी अटपटा ही है कि उद्यमशीलता में तीव्र वृद्धि होने के बावजूद वेतनभोगी नौकरियां उस अनुपात में नहीं बढ़ी हैं। वर्ष 2016-17 में उद्यम में मिलने वाला रोजगार कुल रोजगार का 13 फीसदी था। वर्ष 2017-18 में यह अनुपात बढ़कर 15 फीसदी हो गया और अगले दो वर्षों में यह क्रमश: 17 फीसदी और 19 फीसदी रहा है।  उद्यमियों की संख्या में वृद्धि के अनुपात में वेतनभोगी रोजगार नहीं बढ़ा है। वर्ष 2016-17 में उद्यमियों की संख्या 5.4 करोड़ थी जो 2019-20 में बढ़कर 7.8 करोड़ हो गई। लेकिन इस दौरान वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या 8.6 करोड़ पर ही स्थिर बनी रही। उद्यमियों की संख्या बढऩे के बावजूद वेतनभोगी नौकरियों की संख्या में वृद्धि न होना सहज ज्ञान के उलट है। ऐसा होने की एक वजह यह है कि इनमें से अधिकतर उद्यमी स्वरोजगार में लगे हैं और वे किसी दूसरे को काम पर नहीं रख रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि वे बहुत छोटे स्तर के उद्यमी हैं।


सरकार ने तो यह संकल्पना रखी है कि लोगों को रोजगार मांगने के बजाय रोजगार देने वाला बनना चाहिए। यह मकसद पूरी तरह हासिल होता हुआ नहीं नजर आ रहा है। उद्यमिता रोजगार सृजन का तरीका होने के बजाय अक्सर बेरोजगारी के चंगुल से बचने की एक सायास कोशिश होती है। भारत 2016-17 के बाद से जिस तरह की उद्यमशीलता का उभार देख रहा है, वह वेतनभोगी रोजगार पैदा करने वाली नहीं दिख रही है।


महामारी पर काबू पाने के लिए देश भर में लगाए गए लॉकडाउन के दौरान बेरोजगार हुए लोगों के लिए कृषि अंतिम शरणस्थली रही है। अगस्त 2020 तक कृषि क्षेत्र में रोजगार 1.4 करोड़ बढ़ गया। वर्ष 2019-20 में कृषि क्षेत्र में 11.1 करोड़ लोग लगे हुए थे। लॉकडाउन में उद्यमी के तौर पर रोजगार भी शुरू में घटा था लेकिन अगस्त आने तक यह संख्या करीब 70 लाख बढ़ गई। इसके पहले 7.8 करोड़ लोग उद्यमशील गतिविधियों में संलिप्त थे।


लॉकडाउन का ज्यादा नुकसान तो वेतनभोगी कर्मियों एवं दिहाड़ी मजदूरों को उठाना पड़ा। दिहाड़ी मजदूरी सबसे ज्यादा अप्रैल में प्रभावित हुई थी। उस महीने बेरोजगार हुए 12.1 करोड़ लोगों में से 9.1 करोड़ दिहाड़ी मजदूर ही थे। लेकिन अगस्त तक दिहाड़ी मजदूरों की हालत काफी हद तक सुधर गई। वर्ष 2019-20 के 12.8 करोड़ दिहाड़ी रोजगार के बरक्स अब केवल 1.1 करोड़ दिहाड़ी रोजगार का ही नुकसान रह गया है। वहीं अगस्त आने तक सर्वाधिक असर वेतनभोगी रोजगार पर पड़ा है। अप्रैल में बेरोजगार हुए कुल 12.1 करोड़ लोगों में से वेतनभोगी तबका सबसे कम था। लेकिन अगस्त में वेतनभोगी नौकरियों में आई गिरावट कृषि एवं उद्यमी रोजगार में सुधरी स्थिति पर भारी पड़ी है।


अगस्त के अंत तक करीब 2.1 करोड़ वेतनभोगी कर्मचारी नौकरी गंवा चुके हैं। वर्ष 2019-20 में वेतनभोगी रोजगार की संख्या 8.6 करोड़ थी लेकिन अगस्त 2020 में यह संख्या 6.5 करोड़ ही रह गई है। नौकरियों में आई 2.1 करोड़ की गिरावट सभी तरह के रोजगारों में आई सबसे बड़ी गिरावट है। जुलाई में करीब 48 लाख वेतनभोगी बेरोजगार हुए थे और अगस्त में 33 लाख अन्य लोगों की नौकरियां चली गईं।  ऐसा नहीं है कि नौकरियां गंवाने वालों में केवल सहयोगी स्टाफ के लोग ही शामिल हैं। चोट काफी गहरी है और इसकी चपेट में औद्योगिक कामगारों के साथ-साथ दफ्तरों में बैठने वाले भी शामिल हैं।

(लेखक सीएमआईई के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी हैं)

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जापान में नेतृत्व परिवर्तन और भारत-जापान रिश्ते (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम सरन



शिंजो आबे ने बतौर जापानी प्रधानमंत्री आठ वर्ष का असाधारण कार्यकाल पूरा करने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस दौरान वह सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले जापानी प्रधानमंत्री बने। जापान में उन्हें ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा जिसने विस्तारवादी मौद्रिक नीति, लचीली राजस्व नीति और उत्पादकता बढ़ाने एवं वृद्धि बहाल करने वाले ढांचागत सुधारों के साथ अधिक अग्रसोची आर्थिक नीति तैयार की।

शायद वह ये सब नहीं हासिल कर पाते लेकिन जापान के लंबे समय तक चले आर्थिक ठहराव ने इसका अवसर प्रदान किया। कोविड-19 महामारी ने जापान की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका दिया और अब इसमें सुधार के लिए शायद उसकी आवश्यकता पड़ेगी जिसे 'आबेनॉमिक्स' का नाम दिया गया। ऐसे में आशा की जानी चाहिए कि आबे की आर्थिक विरासत बरकरार रहेगी।


आबे के कार्यकाल में जापान एशिया और उसके बाहर कम लचीली शक्ति के रूप में उभरा। उन्होंने ऐसे क्षेत्र में अपने देश की हैसियत मजबूत की जहां चीन की ताकत तेजी से बढ़ रही थी।


उन्हें एक तनी हुई रस्सी पर चलना था जहां एक तरफ चीन था जिसके साथ जापान की अर्थव्यवस्था बहुत गहराई से जुड़ी हुई थी और दूसरी ओर अमेरिका था जिसके चीन के साथ तीव्र मतभेद थे लेकिन वह जापान समेत अपने ही सहयोगियों के साथ एक हद तक अप्रत्याशित और अस्थिर व्यवहार करने वाला था। आबे इन नाजुक हालात को संभालने में कामयाब रहे। परंतु कोविड-19 के बाद की बंटी हुई दुनिया में हालात और कठिन हो जाएंगे, ध्रुवीकरण बढ़ेगा और छोटी और बड़ी तमाम अर्थव्यवस्थाएं संरक्षणवाद की शरण में जाएंगी। आबे ने इस बदले आर्थिक माहौल से निपटने के क्रम में जापान को अपेक्षाकृत बेहतर परिस्थिति में छोड़ा है। उनके ही नेतृत्व में प्रशांत पार साझेदारी जैसा बड़ा क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौता बच सका जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने समझौते से दूरी बना ली थी। जापान क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) में भी शामिल है जिसमें 10 आसियान देश, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, ऑस्टे्रलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं। भारत ने बातचीत के अंतिम चरण में आरसेप वार्ता से दूरी बनाकर जापान तथा अन्य आरसेप साझेदारों को निराश किया। भारत की चिंता यह थी कि चीन भारतीय बाजारों को सस्ती चीजों से पाट देगा। ऐसे में जापान एशिया की उभरती अर्थव्यवस्था और व्यापार ढांचे को आकार देने में अहम भूमिका निभाएगा।


 इसका अर्थ यह हुआ कि टोक्यो में बनने वाली नई सरकार अमेरिका के उस रुख का साथ शायद ही दे जो चीन की अर्थव्यवस्था को अलग थलग करने का हामी है। हालांकि वह अपने बाह्य आर्थिक हितों को चीन पर अत्यधिक निर्भरता से परे और अधिक विविधतापूर्ण बनाएगा। भारत के नीति निर्माताओं को इसकी सराहना करनी चाहिए क्योंकि यहां ऐसी अतिरंजित धारणा है कि जापान की पूंजी चीन से बाहर निकलना चाहती है और भारत उनके लिए एक वैकल्पिक केंद्र है। आबे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर अत्यधिक सतर्क थे और उन्होंने जापानी उद्योग और व्यापार जगत को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे भारत को विकल्प के तौर पर देखें। भारत ने उन्हें निराश किया और बीते कुछ वर्षों में चीन में जापान की रुचि बढ़ी। आबे के उत्तराधिकारी शायद इस क्षेत्र में कूटनयिक और सुरक्षा भूमिका में विस्तार और सक्रियता को लेकर उतनी रुचि न रखें।


भारत के साथ साझेदारी को लेकर रुचि भी कम हो सकती है। जब भारत ने चीन की बेल्ट और रोड पहल (बीआरआई) में शामिल होने से इनकार किया था तब जापान ने भी दूरी बरती थी। बहरहाल, फिलहाल जापान बीआरआई परियोजनाओं में चीन के साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों कर रहा है। सन 2016 में जोरशोर से घोषित भारत-जापान-अफ्रीका कॉरिडोर परियोजना अब कहीं नजर नहीं आ रही। भारत-जापान सामरिक साझेदारी का आर्थिक स्तंभ कमजोर है और आबे के बाद यह और कमजोर हो सकता है।


आबे के कार्यकाल में सबसे अधिक सुधार भारत-जापान सुरक्षा रिश्तों में हुआ। अगस्त 2007 में बतौर प्रधानमंत्री उनके पहले और छोटे कार्यकाल की भारत यात्रा के दौरान आबे ने दो सागरों के मेल की बात कही थी जो बाद में मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र की अवधारणा बनी। उन्होंने हिंद प्रशांत क्षेत्र में लोकतांत्रिक देशों के नए शक्ति संतुलन की संभावना पहचान ली थी। उनकी पहल पर ही भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मनीला में 2007 में बैठक की लेकिन अमेरिका ने बाद में ईरान और उत्तर कोरिया के परमाणु मसले पर चीन और रूस का समर्थन गंवाने के डर से ऐसा नहीं होने दिया। सन 2017 में आबे ने भारत को सहमत कर इसमें नई जान फूंकी क्योंकि वह सुरक्षा साझेदार के रूप में भारत की भूमिका को लेकर आश्वस्त थे। अब दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री साल में दो-दो बार मिलते हैं और आपसी सहयोग बढ़ा है। दोनों देशों के बीच अगली बैठक में रक्षा सुविधाओं को लेकर द्विपक्षीय अधिग्रहण और क्रॉस सर्विसिंग समझौता होने की आशा है। यह कहना होगा कि आबे के कार्यकाल में दोनों देशों के सुरक्षा रिश्ते तेजी से विकसित हुए। देखना होगा कि टोक्यो का नया सत्ता प्रतिष्ठान उसी ऊर्जा और उत्साह से काम करता है या नहीं। सन 2017 के भारत-जापान नाभिकीय समझौते में आबे की व्यक्तिगत भूमिका को भी कम नहीं आंकना चाहिए। भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौते के बाद यही सबसे मजबूत समझौता है। परंतु कम ही लोगों को मालूम होगा कि आबे ने भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में रियायत दिलाई थी। सन 2007 में मैं विशेष दूत के रूप में टोक्यो गया था और तत्कालीन जापानी विदेश मंत्री तारो असो से मुलाकात की थी। औपचारिक बैठक में उन्होंने अधिकारियों द्वारा दिया गया अपेक्षाकृत कड़ा और हतोत्साहित करने वाला वक्तव्य पढ़ा। बहरहाल उन्होंने लिफ्ट में मुझसे कहा कि मैं भारतीय प्रधानमंत्री को जापानी प्रधानमंत्री आबे का यह संदेश दे दूं कि एनएसजी में जापान भारत का समर्थन करेगा। इसने हमारी बहुत मदद की।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आबे के बीच भी काफी करीबी रिश्ता रहा जिससे दोनों देशों की सामरिक साझेदारी को गति मिली। यह स्पष्ट नहीं है कि आबे का उत्तराधिकारी कौन होगा लेकिन भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह नए नेता के साथ जल्द से जल्द तालमेल कायम करे। भारत और जापान का रिश्ता भारत के आर्थिक और सुरक्षा हितों की दृष्टि से अहम है।


(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर के सीनियर फेलो हैं)

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पर्यावरण संरक्षण (बिजनेस स्टैंडर्ड)



औद्योगिक एवं बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) को लेकर सरकार की मसौदा अधिसूचना की जिस कदर आलोचना हुई है, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इसमें सबकुछ ठीक नहीं है। मसौदे को सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए प्रस्तुत करने वाले पर्यावरण मंत्रालय को करीब 20 लाख आपत्तियां मिली हैं और अभी इनका सिलसिला जारी है। अंशधारकों का कहना है कि उन्हें अधिसूचना की बारीकियों का अध्ययन करने के लिए और अधिक समय चाहिए। ध्यान देने वाली बात यह है कि पर्यावरण कार्यकर्ता ही इस पर हमलावर नहीं हैं बल्कि कई छात्र, वैज्ञानिक, राजनेता, राज्य सरकारें और यहां तक कि स्थायित्व वाले पर्यावरण को लेकर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिवेदक ने भी इस अधिसूचना में खामियां पाई हैं।

एक सामान्य आपत्ति यह है कि विकास परियोजनाओं को मंजूरी देने वाले मानकों में प्रस्तावित बदलाव, पर्यावरण संरक्षण और मानव सुरक्षा के बजाय कारोबारी सुगमता को अधिक महत्त्व देता प्रतीत होते हैं। अनिवार्य सार्वजनिक मशविरे (ग्राम सभाओं की सहमति) की मौजूदा व्यवस्था को परियोजनाओं के एक बड़े हिस्से के लिए समाप्त किया जा रहा है। इतना ही नहीं कुछ प्रकार की गतिविधियों को या तो ईआईए की जवाबदेही से मुक्त करने का प्रस्ताव है या प्रथम दृष्टया भारी दुर्घटना की आशंका होने के बावजूद उनके लिए मामूली निगरानी की व्यवस्था प्रस्तावित है। रेड और ऑरेंज श्रेणी में वर्गीकृत 25 से अधिक उद्योगों को ए श्रेणी (इसके लिए विशेषज्ञों का कड़ा आकलन आवश्यक है) से हटाकर बी1 और बी2 श्रेणी में डाला जा सकता है। इन दोनों श्रेणियों में पर्यावरण प्रभाव आकलन के लिए सार्वजनिक मशविरे की बाध्यता समाप्त कर दी गई है। इसमें कई नुकसानदेह रसायन प्रसंस्करण और तेजाब बनाने वाले संयंत्र शामिल हैं। यह साफ तौर पर आंध्र प्रदेश में हाल में घटी एलजी पॉलिमर गैस रिसाव जैसी त्रासदियों को आमंत्रण है। उस घटना में 12 लोगों की जान गई थी और अनेक घायल हो गए थे। असम के बागजान में गैस से लगी आग भी ऐसी ही घटना थी जो दो सप्ताह तक भड़की रही और लोगों को बड़े पैमाने पर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना पड़ा।


परियोजना तैयार होने के बाद मंजूरी देने संबंधी प्रावधानों पर भी विवाद है। यह प्रावधान ऐसी कई विवादित परियोजनाओं की राह खोल देगा जो बिना जरूरी मंजूरी के बन गई हैं। इसके अलावा इससे जानबूझकर देनदारी में चूक करने वालों को भी प्रोत्साहन मिलेगा। केंद्र द्वारा बिना मानक वर्गीकरण के सामरिक घोषित की गई परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक मशविरा या सूचना प्रसारित करने की जरूरत को खत्म करने का प्रस्ताव भी ऐसा ही है। इससे परियोजनाओं के वर्गीकरण में मनमानेपन की गुंजाइश बनेगी। आश्चर्य नहीं कि करीब 500 वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और विभिन्न आईआईटी के शिक्षकों एवं विद्वानों ने पर्यावरण मंत्री को खुला पत्र लिखकर इस मसौदे पर चेतावनी दी है। उन्होंने अधिसूचना वापस लेने की मांग की है और कहा है कि यह देश के पर्यावास और पर्यावरण की सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं है।


ऐसे विरोध को देखते हुए बेहतर यही होगा कि पर्यावरण मंत्रालय खुले दिमाग से अधिसूचना की समीक्षा करे। इस दौरान आपत्तियों और अहम सुझावों पर भी ध्यान देना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि परियोजनाओं को मंजूरी की प्रक्रिया तेज करना जरूरी है लेकिन पर्यावरण संरक्षण और लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। विश्व पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (2018) में भारत 180 देशों में 177 वें स्थान पर था। इससे अधिक गिरावट ठीक नहीं। ऐसे में वक्त आ गया है कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के विरोधाभासी मुद्दों के बीच संतुलन साधा जाए। इस दौरान दोनों को तवज्जो देनी होगी। यह काम कठिन है लेकिन और कोई विकल्प भी नहीं है।

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नौकरी गंवाने का सिलसिला जारी रहने के आसार

महेश व्यास



अगस्त के साप्ताहिक आंकड़ों से ऐसा संकेत मिलता है कि इस महीने में कामगारों की हालत काफी बिगड़ी है। सभी तीनों मापदंडों- श्रम भागीदारी दर, बेरोजगारी दर और रोजगार दर में गिरावट दर्ज की गई है। अप्रैल की तीव्र गिरावट के बाद अगले तीन महीनों में लगातार रोजगार की संख्या बढ़ी थी लेकिन अगस्त का महीना रोजगार में गिरावट के संकेत दे रहा है।

श्रम भागीदारी दर (एलपीआर) 30 अगस्त को समाप्त सप्ताह में गिरकर 39.5 फीसदी पर आ गई जो मध्य जून के बाद का निम्नतम स्तर है। लॉकडाउन की शुरुआत होने के पहले मार्च में एलपीआर 42-43 फीसदी पर थी। वित्त वर्ष 2019-20 में औसत एलपीआर 42.7 फीसदी थी। लेकिन अप्रैल में आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह ठप रहने से यह नाटकीय रूप से गिरकर 35.6 फीसदी रह गई। हालांकि उसके बाद से इसमें सुधार देखा गया। मई में यह थोड़े सुधार के साथ 38.2 फीसदी और जून में 40.3 फीसदी पर पहुंच गई। लेकिन जून के आखिर में यह सुस्त पडऩे लगी और जुलाई के महीने में इसका असर भी दिखा। जुलाई में एलपीआर मामूली सुधार के साथ 40.7 फीसदी दर्ज की गई।


अगस्त में सिर्फ एक हफ्ते की असामान्य बढ़त को छोड़कर बाकी समय एलपीआर में गिरावट ही रही है। 30 अगस्त तक 30 दिनों का गतिमान माध्य 40.7 फीसदी रहा। संभावना है कि अगस्त का एलपीआर जुलाई के स्तर से थोड़ा कम ही रहेगा या फिर उसी स्तर पर टिका रह सकता है। जुलाई स्तर की तुलना में इसमें सुधार की संभावना तो नहीं ही दिख रही है।


अगस्त में बेरोजगारी दर के भी जुलाई के 7.5 फीसदी स्तर से कम होने के आसार कम ही हैं। बेरोजगारी दर के साप्ताहिक आंकड़ों में अगस्त में कुछ हद तक उठापटक रही है। पहले दो हफ्तों में बेरोजगारी दर क्रमश: 8.7 फीसदी और 9.1 फीसदी रही। तीसरे हफ्ते में यह 7.5 फीसदी पर आ गई लेकिन अंतिम हफ्ते में फिर से 8.1 फीसदी की ऊंचाई पर जा पहुंची। इस तरह अगस्त में औसत बेरोजगारी दर 8.3 फीसदी रही है। अगस्त में बेरोजगारी दर का 30 दिनों का गतिमान माध्य भी 8.3 फीसदी ही है।


बेरोजगारी दर के ये आंकड़े जुलाई 2020 में दर्ज 7.4 फीसदी के स्तर से खासे अधिक हैं। इस तरह पूरी आशंका है कि अगस्त में निम्न श्रम भागीदारी दर के साथ-साथ बढ़ी हुई बेरोजगारी दर की दोहरी मार पड़ी है।


इसका परिणाम रोजगार दर में गिरावट के रूप में सामने आया है। रोजगार दर भारत जैसे देश के लिए श्रम बाजार का सबसे अहम संकेतक है। यह बेरोजगारी दर से भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। बेरोजगारी दर का आशय रोजगार करने के इच्छुक लेकिन रोजगार पाने में असमर्थ लोगों के अनुपात से है। यह अनुपात काम करने के इच्छुक लोगों की संख्या रूपी विभाजक पर निर्भर करता है। बेरोजगारी दर इस विभाजक में होने वाले बदलाव के बारे में कुछ भी बताने में असमर्थ होती है। भारत में समस्या यह है कि बहुत कम लोग ही वास्तव में काम करने के इच्छुक हैं।


अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के मॉडल पर आधारित अनुमानों के मुताबिक वर्ष 2019 में वैश्विक रोजगार दर 57 फीसदी थी। उसी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में रोजगार दर 47 फीसदी रही थी। पश्चिम एशिया के बाहर के बाहर महज तुर्की, इटली, ग्रीस एवं दक्षिण अफ्रीका की ही हालत भारत से खराब रही थी।


भारतीय अर्थव्यवस्था पर निगरानी रखने वाली संस्था सीएमआईई के सीपीएचएस के मुताबिक 2019-20 में भारत की रोजगार दर आईएलओ के अनुमानों से कहीं अधिक खराब थी। इसने 39.4 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था। आईएलओ के आंकड़े सरकारी आंकड़ों पर निर्भर होते हैं और रोजगार को परिभाषित करने में काफी नरम होते हैं। वहीं सीएमआईई के अनुमान अधिक सख्त, कम मनमाने एवं मन को सुकून देने वाले होते हैं।


रोजगार दर हमें वास्तव में काम में लगी कामकाजी उम्र वाली जनसंख्या के अनुपात के बारे में बताती है। यह अनुपात 30 अगस्त को समाप्त सप्ताह में गिरकर 36.3 फीसदी पर आ गया। इसके पहले के दस हफ्तों में यह सबसे कम रोजगार दर है। इन दस हफ्तों में औसत रोजगार दर 37.7 फीसदी रही और इसका दायरा 36.9 फीसदी से लेकर 38.4 फीसदी रहा। अगस्त के अंतिम हफ्ते में रोजगार दर के 36.3 फीसदी पर आना चिंताजनक है। यह आर्थिक गतिविधियों के पटरी पर लौटने की प्रक्रिया में थकान आने का संकेत देता है। हमने जून में भी रोजगार दर का सुधार बंद हो जाने पर इस बारे में चिंता व्यक्त की थी। अब हमें इसकी फिक्र  है कि कहीं रोजगार दर में फिसलन तो नहीं है।


अगस्त में रोजगार दर का 30 दिवसीय गतिमान माध्य महीने की शुरुआत से ही गिरावट पर रहा। 30 अगस्त आने तक यह 37.3 फीसदी पर आ गया। अगर अगस्त के आंकड़े इसी स्तर पर बंद होते हैं तो इसका मतलब यही होगा कि जुलाई की तुलना में अगस्त में रोजगार घटे हैं।


साप्ताहिक अनुमानों के औसत आंकड़े के बजाय मासिक अनुमान कहीं अधिक ठोस होते हैं। इसकी वजह यह है कि मासिक अनुमान गैर-प्रतिक्रिया के हिसाब से समायोजित होते हैं। लेकिन अगर गैर-प्रतिक्रिया का वितरण भौगोलिक रूप से समान है तो पूरी संभावना है कि साप्ताहिक अनुमानों का औसत मासिक अनुमानों का एक वाजिब संकेतक है।


ऐसी स्थिति में हमें जुलाई 2020 की तुलना में अगस्त में 35 लाख रोजगारों की गिरावट देखने को मिल सकती है। मई के बाद से रोजगार में कमी का यह पहला मौका होगा और इससे 2019-20 में औसत रोजगार के बीच फासला बढ़कर 1.4 करोड़ हो जाएगा।

(लेखक सीएमआईई के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी हैं)

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कोविड-19 ने बदला शोध का तरीका?

प्रसेनजित दत्ता 



संकट बड़े बदलावों की शुरुआत की वजह बन सकते हैं। कोविड-19 महामारी के उपचार की तलाश ने भी औषधियों और टीकों को लेकर दुनिया भर में होने वाले शोध, चिकित्सकीय परीक्षण और औषधि उत्पादन के तरीके में नाटकीय बदलाव किया है। समय की कमी के चलते पुराने प्रतिद्वंद्वियों के बीच भी साझेदारी और गठजोड़ हुए हैं, सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच अप्रत्याशित स्तर का सहयोग देखने को मिला है और टीका बनने के पहले ही उसके उत्पादन के लिए क्षमताएं विकसित की जा चुकी हैं। इसके कारण औषधि शोध कंपनियों की प्राथमिकताओं में भी बदलाव आया है क्योंकि उन्होंने अन्य शोध परियोजनाओं को छोड़कर कोविड-19 के निदान को प्राथमिकता दी है। अपनी उत्पादन क्षमता की वजह से भारत भी इन सब बातों के केंद्र में है लेकिन चिकित्सकीय शोध और टीका बनाने में भी उसकी भूमिका कम अहमियत नहीं रखती।

सामान्य तौर पर किसी नए टीके या औषधि को बाजार में आने में 10 वर्ष या उससे अधिक समय लगता है। कोविड के मामले में शोधकर्ता, औषधि निर्माता कंपनियां तथा नियामक आदि इस समय को यथासंभव कम करने का प्रयास कर रही हैं। यह बात कई बड़े नवाचारों की वजह बन रही है। इसके चलते कुछ जल्दबाजी भी की गई है जो आज भले ही जरूरी हो लेकिन अगर लंबे समय तक कायम रखा गया तो यह खतरनाक साबित हो सकता है। जब हम वैश्विक औषधि उद्योग के महामारी का हल तलाशने के तरीकों पर नजर डालते हैं तो भी प्रश्न उठते हैं। इनमें से दो सवालों का संबंध मरीजों पर असर से है जबकि एक प्रश्न भारतीय औषधि उद्योग के भविष्य से ताल्लुक रखता है।


पहला सवाल यह है कि औषधि निर्माण को लेकर होने वाले शोध, चिकित्सकीय परीक्षण और उत्पादन को लेकर आज जो कुछ हो रहा है वह अस्थायी व्यवस्था है या यह जारी रहेगी? दूसरा, कोविड-19 के कारण फंड और शोधकर्ताओं के रूप में संसाधनों की संक्रामक बीमारी का निदान खोजने में अत्यधिक आवश्यकता पड़ी है। क्या इस बीमारी की दवा आ जाने या इससे बचाव का टीका बन जाने के बाद भी ये संसाधन इसी तरह आसानी से सुलभ रहेंगे? आखिर में तीसरा सवाल: क्या भारत भविष्य में भी इसमें अहम भूमिका निभाता रहेगा या वह केवल एक वैश्विक औषधि निर्माण केंद्र बनकर रह जाएगा?


कुछ बदलावों और उनके निहितार्थों पर नजर डालते हैं। कोविड-19 को लेकर जो वैश्विक प्रतिक्रिया हुई उसके फलस्वरूप बड़ी तादाद में साझेदारियां, गठजोड़ और वैश्विक समूहों का निर्माण देखने को मिला। ऐंटीबॉडी, टीका तथा अन्य तरह के शोध के लिए इनमें रोज इजाफा ही हो रहा है। भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया जैसी टीका निर्माता से लेकर सिप्ला और वॉकहार्ट जैसी औषधि कंपनियों तक सभी बड़ी-छोटी कंपनियों ने बीते कुछ महीनों में साझेदारियां की हैं या वे बड़े-छोटे समूहों का हिस्सा बनी हैं।


बुनियादी विचार यही है कि शोध के कुछ हिस्सों को बांटकर अलग-अलग जगहों पर समांतर ढंग से विकसित किया जाए ताकि समय की बचत हो सके। यही कारण है कि पारंपरिक दवा निर्माता, टीका शोधकर्ता, विश्वविद्यालयों के विभाग, जैव प्रौद्योगिकी फर्म, जेनोमिक उपक्रम और कृत्रिम मेधा क्षेत्र की स्टार्ट अप दूर होकर भी साथ मिलकर काम कर रहे हैं। शोध के आंकड़े जो कभी जबरदस्त निगरानी में रहते थे उन्हें अब सार्वजनिक मंच पर रखा गया है ताकि दुनिया भर के वैज्ञानिक उनका लाभ ले सकें।


एक और बड़ा बदलाव चिकित्सकीय शोध के तरीके में देखा जा रहा है। चूंकि पारंपरिक तरीके से अस्पताल में चिकित्सकीय परीक्षण किए जाने से प्रतिभागियों को वायरस से और प्रभावित होने का खतरा रहता है इसलिए आभासी चिकित्सकीय परीक्षणों पर जोर बढ़ा है। आभासी परीक्षण नए नहीं हैं लेकिन अब इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है। प्रतिभागियों तक दवा पहुंचाई जाती है और उनकी प्रगति और उन पर होने वाले असर पर दूर से डिजिटल तरीके से निगरानी रखी जाती है।


ये बदलाव अच्छे हैं लेकिन इसमें बुरी बात यह है कि आपात स्थिति के कारण दुनिया भर के नियामक अपेक्षाकृत कम अवधि के चिकित्सकीय परीक्षण के लिए मान गए हैं और सीमित आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं और इसी के आधार पर आपात इस्तेमाल के लिए औषधियों को मंजूरी दी जा रही है जबकि उनका दीर्घकालिक चिकित्सकीय परीक्षण जारी रहेगा। यह उस समय देखने को मिला जब अमेरिका के संघीय औषधि प्रशासन ने रेमडेसिविर के आपात इस्तेमाल की इजाजत दे दी जबकि अभी इसके व्यापक प्रभाव का अध्ययन चल रहा है। सोचने वाली बात यही है कि औषधि नियामक ने फिलहाल जो रास्ता खोला है क्या वे उसे बंद कर सकते हैं।


इस बीच चूंकि दुनिया के विभिन्न देशों और अस्पतालों आदि में कोविड-19 के मरीजों की भरमार है इसलिए अनेक अन्य बीमारियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा पा रहा। इनमें डायबिटीज से लेकर कैंसर और टीबी से लेकर मलेरिया तथा डेंगू जैसी बीमारियां शामिल हैं। चूंकि बहुत बड़े पैमाने पर धन और संसाधन शोध कार्यों में लगाया जा रहा है इसलिए अन्य बीमारियों पर शोध को तवज्जो नहीं मिल पा रही। अतीत में कई पर्यवेक्षक कह चुके हैं कि संक्रामक बीमारियों से संबंधित शोध के साथ औषधि कंपनियां सौतेला व्यवहार करती रही हैं। बहरहाल अब बात एकदम उलट हो चुकी है।


कोविड-19 पर जितना ध्यान दिया जा रहा है और उसके लिए दवाएं और टीका बनाने में जो संसाधन लगाया जा रहा है वह करीब दो से चार साल तक जारी रहेगा। ऐसा इसलिए किसी को नहीं लगता कि शुरुआती टीके या दवाएं कोई चमत्कार करेंगी। ये बस फौरी उपाय होंगे। शोध तब तक जारी रहेगा जब तक कि बेहतर दवाएं और टीके नहीं बन जाते। लेकिन उसके बाद बेहतर यही होगा औषधि उद्योग और सरकारें बीमारियों पर शोध तथा ऐंटी वायरल और ऐंटीबायोटिक पर शोध में संतुलन कायम करें।


भविष्य में भारत की क्या भूमिका होगी? पश्चिमी देश व्यापक तौर पर भारत को उत्पादन केंद्र और चिकित्सकीय परीक्षण की बेहतर जगह तथा बड़ा बाजार मानते हैं। परंतु कोविड-19 शोध में भारतीय कंपनियां और सरकारी शोधकर्ता नई औषधियों और संभावित टीके पर काम कर रहे हैं। पारंपरिक तौर पर भारतीय कंपनियों की नई औषधि या टीका बनाने की कोई पहचान नहीं है। कोविड-19 एक अवसर हो सकता है इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने का।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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संपादकीय : कोविड से नुकसान




देश में कोविड-19 संक्रमण के मामलों में दिन प्रतिदिन इजाफा हो रहा है और उनके स्थिर होने का कोई संकेत नहीं हैं। भारत ने गत सप्ताह 40 लाख का आंकड़ा पार कर लिया और रविवार को एक दिन में 90,000 से अधिक मामले सामने आए। अब दुनिया में कोविड संक्रमण के कुल सक्रिय मामलों के 12 फीसदी भारत में हैं और कुल मौतों में उसकी हिस्सेदारी 8 फीसदी है। संक्रमण के मामलों में भारत किसी भी समय ब्राजील को पीछे छोड़कर विश्व में दूसरा सर्वाधिक संक्रमित देश बन सकता है। हालांकि आबादी के अनुपात में मृत्यु के मामले कम हैं लेकिन पंाच महीने पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि संक्रमण इस कदर होगा। यदि जांच बढ़ाई गई तो और बुरे हालात सामने आएंगे। केरल और कुछ हद तक दिल्ली में पहले सफलता हासिल हुई थी लेकिन वहां संक्रमण का दूसरा दौर जारी है।

अब जबकि लोगों की आजीविका बचाने के लिए लॉकडाउन लगातार खोला जा रहा है तो टीका बनाना और उसे जल्द से जल्द पूरी आबादी तक पहुंचाना ही संक्रमण को रोकने का इकलौता तरीका है। यह बहुत बड़ा काम है। जैसा कि नंदन नीलेकणी ने इस समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में कहा भी कि एक अरब की आबादी का आधार नामांकन करने में पांच वर्ष लगे लेकिन टीकाकरण जल्दी किया जा सकता है। टीका लगाने वालों का ऑनलाइन प्रशिक्षण और प्रमाणन किया जा सकता है। इस पूरी कवायद में तकनीक की अहम भूमिका होगी। बहरहाल, टीका बनने में अभी भी वक्त  है और यह स्पष्ट नहीं है कि देश में टीके की जल्द उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी। परंतु सरकार को पूरी तैयारी रखनी होगी।


इस बीच अर्थव्यवस्था पर इसका असर पहले लगाए गए अनुमानों से कहीं अधिक होगा। क्योंकि स्थानीय स्तर पर लगने वाले लॉकडाउन उत्पादन शृंखला को प्रभावित करेंगे और सुधार की प्रक्रिया धीमी होगी। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 24 फीसदी गिरी। उत्पादन में गिरावट अनुमान से अधिक थी। अधिकांश विश्लेषक अब पूरे वर्ष के अनुमान में कमी कर रहे हैं। कार बिक्री और पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स जैसे तीव्र संकेतकों में सुधार हुआ है लेकिन अभी यह देखना है कि क्या यह सुधार बरकरार रहता है। संक्रमण में निरंतर इजाफा मांग और आपूर्ति दोनों को बाधित करेगा। आपूर्ति क्षेत्र के झटके ने मुद्रास्फीति को बढ़ाया है और यह रुख आने वाले महीनों में भी बरकरार रह सकता है। परिणामस्वरूप केंद्रीय बैंक इस स्थिति में नहीं होगा कि वह नीतिगत दरों में कमी करके आर्थिक गतिविधियों की सहायता कर सके। इतना ही नहीं दोहरी बैलेंस शीट की समस्या और बढ़ेगी। रिजर्व बैंक ने ऋण के एकबारगी पुनर्गठन की इजाजत दी है। परंतु सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण पर स्पष्टता नहीं है।


ऐसे हालात में मौद्रिक और राजकोषीय प्राधिकार से यही आशा होगी कि वह कुछ रचनात्मक उपाय लेकर आए। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का मसला नई चुनौतियों का एक उदाहरण है। केंद्र सरकार ने राज्यों से अनुशंसा की है कि वे उधारी लेकर जीएसटी में हुई कमी पूरी करें। इसे उपकर बढ़ाकर चुकाया जा सकता है। परंतु कई राज्यों ने इससे इनकार कर दिया है। इसके अलावा व्यापक पैमाने पर दिवालिया होने की घटनाएं रोकने और गरीबों को खपत समर्थन मुहैया कराना जरूरी होगा। सरकार को अपने दायित्व निभाने और अर्थव्यवस्था की मदद करने के लिए ज्यादा संसाधनों की आवश्यकता होगी। ऐसे में उसे जल्दी ही व्यय का संशोधित खाका तैयार करना होगा और अतिरिक्त फंड जुटाने के तरीके तलाश करने होंगे। उधर शिक्षा के क्षेत्र में एक वर्ष का जाया होना तय है। कुल मिलाकर बुरी खबरों का चौतरफा सिलसिला चल रहा है और इनका अंत भी नजर नहीं आ रहा।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कोविड और अर्थव्यवस्था आपस में जुड़े हैं?

नीलकंठ मिश्रा 



देश में कोविड-19 महामारी के शिकार लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है लेकिन आर्थिक गतिविधियों के अधिकांश सूचकांकों में बहुत धीमा सुधार देखने को मिल रहा है। सुधार की गति में नाटकीय धीमापन आया है लेकिन सुधार नजर आ रहा है। केंद्र की ओर से कानूनों में रियायत दी गई है लेकिन देश के कई राज्यों तथा इलाकों में स्थानीय स्तर पर लॉकडाउन अभी तक लगाया जा रहा है। इन हालात में भी निरंतर सुधार होता दिख रहा है। सवाल यह है कि क्या अर्थव्यवस्था ने स्वयं को वायरस से असंबद्ध कर लिया है?


देश में रोज कोविड के रोज नए सामने आने वाले मामलोंं की गति धीमी पड़ी है लेकिन बीमारी के प्रसार के बारे में जानकारी जुटाने में इस बात की कोई खास प्रासंगिकता नहीं है: देश के कई बड़े शहरों में कराए गए सीरो अध्ययन से पता चला है कि संक्रमण का स्तर जाहिर स्तर से 20 से 50 गुना तक अधिक है। इस अध्ययन में लोगों के रक्त में कोविड ऐंटीबॉडी की मौजूदगी देखी जाती है। यदि रक्त में यह ऐंटीबॉडी मौजूद है तो उक्त व्यक्ति कोविड से संक्रमित हो चुका है। इन अध्ययन में जिस तादाद में मामले सामने आ रहे हैं उससे यही पता चलता है कि जांच की मौजूदा प्रणाली में कई संक्रमण पकड़े नहीं जा रहे। इससे रोज सामने आ रहे नए मामलों की प्रासंगिकता ही समाप्त हो रही है। सीरो अध्ययन के माध्यम से महामारी के भौगोलिक प्रसार को अवश्य चित्रित किया जा सकता है। परंतु कई राज्यों और जिलों में सकारात्मक जांच नतीजों के अनुपात को देखते हुए उक्त नतीजों में भी खामी होने की पूरी संभावना है क्योंकि सकारात्मक मामले कहीं बहुत अधिक हैं तो कहीं कम।


कोविड-19 से देश में रोज 900 से 1,000 लोगों की मौत हो रही है। यह स्तर काफी अधिक है लेकिन देश में कुल मौतों मेंं इसका योगदान केवल 4 फीसदी है। चिंता इस बात को लेकर भी है कि कोविड से होने वाली मौतों का आंकड़ा कम करके बताया जा रहा है। हालांकि यह समस्या केवल भारत में नहीं है। सीरो अध्ययन बताता है कि संक्रमण से होने वाली मौत के मामले एक प्रतिशत के भी दसवें हिस्से से कम हैं। ध्यान रहे कि कोई भी संक्रमण तभी दर्ज किया जाता है जब मरीज जांच में सकारात्मक निकलता है।


दिल्ली, मुंबई और पुणे जैसे शहरों में आबादी का 30 से 50 फीसदी पहले ही संक्रमित है और वहां संक्रमण के दर्ज मामलों में भी निरंतर कमी आ रही है। दिल्ली में नए मामलों और कोविड से होने वाली मौतों के मामले कम होने के बाद आशा की जा रही थी कि भले ही महामारी पर नियंत्रण हमारी समग्र प्रशासनिक क्षमताओं से परे नजर आ रहा हो लेकिन शायद कुछ महीनों में यह महामारी स्वयं समाप्त हो जाए। ऐसे में भले ही कई जिलों में रोज 100 से अधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं लेकिन यह प्राकृतिक रूप से समाप्त हो जाएगी। महामारी से होने वाली मौतें भी पहले जताई गई आशंका से बहुत कम रही हैं।


परंतु सच्चाई तो यह है कि जब कोई महामारी सही मायनों में समाप्त होती है तो पीडि़तों के आंकड़े स्थिर नहीं रहते बल्कि उनमें गिरावट आती है। अमेरिका का न्यूयॉर्क शहर या ब्राजील का मानाउस कस्बा इसके उदाहरण हैं। मुंबई में समुचित जांच के अभाव और उच्च संक्रमण अनुपात के बाद हमने यह अध्ययन किया कि ऐसे कितने बेड इस्तेमाल में हैं जहां ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ रही है। मई और जून में इनमें इजाफा हुआ लेकिन जुलाई में यह 6,300 पर स्थिर हो गया। उसके पश्चात गिरावट आने लगी। हालांकि कई सप्ताह तक आंकड़ा 5,400 के नीचे नहीं आया। इसी प्रकार पुणे में सीरो अध्ययन में 50 फीसदी संक्रमण की बात कहे जाने के बावजूद नए मामले और मौत के आंकड़े निरंतर बढ़ रहे हैं।


वायरस को लेकर हमारी समझ बढऩे के साथ-साथ वैश्विक और स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों में दोबारा संक्रमण के मामले सामने आए हैं। कुछ लोग तो छह सप्ताह के भीतर दोबारा संक्रमित हो गए। राष्ट्रीय व्याधि नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के एक अध्ययन से भी पता चला हैकि पहले संक्रमित रह चुके 208 में से 97 लोगों के शरीर में कोरोना के ऐंटीबॉडी नहीं मिले। शायद ऐसा इसलिए हुआ कि कुछ लोगों में तात्कालिक ऐंटीबॉडी विकसित हुईं या फिर शायद वायरस के कई स्वरूप हैं। इससे सामूहिक प्रतिरोध की अवधारणा को भी नुकसान पहुंचा है और विकसित हो रहे टीकों को लेकर भी सवाल उठे हैं। अब हम महामारी के प्राकृतिक रूप से समाप्त होने की बात भी नहीं कर सकते। हमें टीके के बनने तक महामारी के साथ ही जीना होगा। अब संपर्क का पता लगाकर प्रसार रोकने का विकल्प समाप्त हो चुका है। इसका अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?


ऐसी आर्थिक गतिविधियां जिनमें बंद माहौल में लोग एक दूसरे के संपर्क में आते हैं उनमें अभी कुछ महीनों तक रोक रह सकती है। विद्यालय तथा रेस्तरां ऐसी ही जगह हैं। हालांकि सरकार ज्यादा से ज्यादा गतिविधियां शुरू करना चाहती है। मॉल खुल गए हैं लेकिन खाली पड़े हैं जबकि ई-कॉमर्स कंपनियों के कारोबार में दोगुना इजाफा हुआ है। लोगों का डर जाने मेंं अभी वक्त लगेगा।


आबादी का एक बड़ा हिस्सा यूं भी बाहर निकलेगा। कुछ लोग जोखिम लेने की आदत के चलते तो कुछ आजीविका कमाने के लिए और कुछ अन्य लॉकडाउन से बोर होकर बाहर निकलेंगे। परंतु आर्थिक हालत सामान्य होने के लिए जरूरी है कि बड़े पैमाने पर आबादी घरों से निकले।


जून तिमाही मेंं सकल घरेलू उत्पाद में भारी गिरावट आई। इस बीच निजी क्षेत्र का खपत और व्यय रुझान दोबारा सुधार की दिशा में अग्रसर होगा ऐसा अनुमान है। परंतु कारोबारियों और उद्यमियों के नैसर्गिक उत्साह को देखते हुए कहा जा सकता है कि सरकार की ओर से राजकोषीय और नीतिगत कदमों की मदद से मजबूत आर्थिक वृद्धि की दिशा में प्रतिबद्धता देखने को मिलेगी। आने वाले समय में यह कारोबारियों में उत्साह पैदा करने का काम करेगी। ऐसा होने पर उस नुकसान की भरपाई की जा सकती है जो टीका न बनने के कारण महामारी के कारण आर्थिक गतिविधियों को हो रहा है।

(लेखक क्रेडिट सुइस के एशिया-प्रशांत रणनीति सह-प्रमुख एवं भारत रणनीतिकार हैं)


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न्यूनतम सरकार, शासकीय सेवकों के कामकाज की समीक्षा को लेकर नए दिशानिर्देश जारी


मोदी सरकार ने शासकीय सेवकों के कामकाज की समीक्षा को लेकर नए दिशानिर्देश जारी करने के साथ ही अफसरशाही को और अधिक सक्षम तथा सुसंगत बनाने की कोशिश तेज कर दी है। इसके मुताबिक उन कर्मचारियों के कामकाज की समीक्षा की जाएगी जो 50 से 55 आयु वर्ग के हों या 30 वर्ष की सेवा अवधि पूरी कर चुके हों। ऐसे जो अधिकारी भ्रष्ट या अक्षम पाए जाएंगे उन्हें सेवानिवृत्ति लेनी होगी। ये नियम केंद्रीय सिविल सर्विसेज (पेंशन) नियम 1972 के फंडामेंटल रूल 56(जे) में पहले से मौजूद थे। जून 2019 में 27 वरिष्ठ कर अधिकारियों को भ्रष्टाचार के कारण इसी नियम के तहत जबरन सेवानिवृत्त किया गया था। इसके अलावा राजस्व सेवा के 22 अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया था और केंद्रीय सचिवालय सेवा के 284 अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के लिए छांटा गया था। यह पहला मौका था जब इस नियम का इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। अपने ताजा परिपत्र में सरकार इस प्रक्रिया को नियमित कर रही है। इसके लिए लक्षित समूह के अफसरशाहों का एक रजिस्टर तैयार किया जा रहा है और उनकी त्रैमासिक समीक्षा की जा रही है।


नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद यह अफसरशाही को तीसरा संगठनात्मक झटका है। सबसे पहले 2016 में शासकीय सेवकों के लिए सालाना गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) के अलावा कॉर्पोरेट शैली में मूल्यांकन की व्यवस्था की गई थी। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि एसीआर को प्राय: निष्प्रभावी माना जाता था। दूसरे कदम में सन 2018 और 2019 के दौरान अफसरशाही में संयुक्त सचिव, निदेशक और उपसचिव स्तर के पदों को सेवा से बाहर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों के लिए खोल दिया गया। अब 'मिशन कर्मयोगी' पहल के तहत अफसरशाही को और अधिक रचनात्मक, सक्रिय, पेशेवर और तकनीक संपन्न बनाने के लिए एक परिषद का गठन किया जा रहा है जिसमें मंत्रीगण, मुख्यमंत्री  और मानव संसाधन विशेषज्ञ शामिल हैं तथा जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री के पास है। इसके अलावा 'क्षमता निर्माण आयोग' के गठन की बात भी कही गई है। एक साथ देखें तो इन घटनाओं ने अफसरशाही के मजबूत ढांचे को झटका दिया है लेकिन छह वर्ष में 20 लाख से अधिक कर्मचरियों में से करीब 300 पर कार्रवाई करने से यही पता चलता है कि इस दिशा में बहुत सक्रियता नहीं दिखाई गई। अफसरशाही को आराम की नौकरी माना जाता है और इसके लिए अधिक मजबूत आकलन प्रक्रिया अपनाने की जरूरत लंबित थी लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कदम मोदी के न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन  या सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेंगे?


नीति में उम्र वाला हिस्सा शायद ठीक नहीं। तीन दशक के अनुभव वाले अफसरशाह अनमोल अनुभव और जानकारी से लैस होते हैं। भ्रष्ट और अक्षम लोगों को जरूर निकाला जाना चाहिए लेकिन यह स्पष्ट नहीं है यह नीति युवा अधिकारियों पर क्यों नहीं लागू होनी चाहिए। भारत जैसे देश में अफसरशाही और कार्यपालिका का रिश्ता उलझाऊ है ऐसे में किफायत के मानक अलग-अलग हो सकते हैं। ईमानदार अधिकारियों के दंडात्मक तबादले और अफसरशाही के कामकाज में राजनीतिक बाधाओं से हम सभी वाकिफ हैं। तीसरा, एक पुरानी समस्या यह भी है कि अफसरशाहों को अतीत में लिए गए निर्णयों के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है। यह अफसरशाहों के पूरी क्षमता से काम करने की राह में बड़ा रोड़ा है। कांग्रेस सरकार के दौर में कोयला ब्लॉक आवंटन के मामले में और सन 2000 के दशक के आरंभ में पहली भाजपानीत सरकार के कार्यकाल में निजीकरण के दौरान ऐसा देखने को मिला। इस इतिहास को देखते हुए यह अहम है कि उम्रदराज और काम न करने वाले अधिकारियों को हटाना राजनीतिक बदले की कवायद न बन जाए। 'मिशन कर्मयोगी' में इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।


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