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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Saturday, April 17, 2021

कोविड की वापसी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन 

गत वर्ष इस समय स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता कोविड-19 वायरस के कारण होने वाले संक्रमण के दोगुना होने की दर की पड़ताल कर रहे थे। यानी यह परख रहे थे कि देश में संक्रमण के मामलों के दोगुना होने में कितना वक्त लग रहा है। इस दर के अनुसार ही यह अनुमान लगाया गया कि देश में कोविड   संक्रमण के नए मामले कब स्थिर हो रहे हैं। सितंबर में यह संख्या 100,000 रोजाना के उच्चतम स्तर पर पहुंची और फिर घटकर 10,000 रोजाना के स्तर पर आ गई।

अन्य देशों में संक्रमण की दूसरी और तीसरी लहर आई लेकिन भारत विजेता के भाव में आ गया। अब जरा कोविड संक्रमण के दोगुना होने की मौजूदा दर पर विचार करें। मामलों के 20,000 से 40,000 होने में आठ दिन लगे, 80,000 होने में 14 दिन और वहां से 1.60 लाख होने में महज 10 दिन का समय लगा। अब ये चौथी बार दोगुने होने वाले हैं। अस्पतालों में बिस्तर, वेंटिलेटर और ऑक्सीजन की कमी को देखते हुए भविष्य डरावना लग रहा है। भगवान न करे लेकिन अगर मामले दोगुने होने की दर यूं ही बरकरार रही और मई के मध्य तक यदि रोजाना 6 लाख नये मामले सामने आने लगे तो क्या होगा? ऐसे में व्यवस्था चरमराना तय है।


यदि ऐसा हुआ तो देश इस महामारी के इतिहास में ही एक अतुलनीय पीड़ा का साक्षी बनेगा। बड़े पैमाने पर लॉकडाउन की वापसी होगी। गत वर्ष अचानक लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन से कुछ सबक लिया जाए तो इस वर्ष शायद बहुत बुरी स्थिति से बचा जा सकता है। गत वर्ष तो कुछ ही जिलों में संक्रमण के बावजूद पूरा देश बंद कर दिया गया था। इसके लिए सरकारों और नियोक्ताओं को कर्मचारियों को भरोसेमंद तरीके से उनके कार्यस्थल या आवास पर रुकने की व्यवस्था करनी होगी। लेकिन हर नियोक्ता इतना सक्षम नहीं होगा इसलिए अपने घर लौटने वालों को परिवहन मुहैया कराया जाए। नागरिक समाज और स्वयंसेवकों को मदद के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। आदर्श स्थिति में तो लॉकडाउन बढऩे के पहले ऐसा किया जाना चाहिए लेकिन समय की कमी है।


आलोचना से बचते हुए सरकार ने टीका आपूर्ति का प्रयास किया है लेकिन एक टीका निर्माता द्वारा वित्तीय सहायता मांगे जाने पर सरकार ने कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। जबकि अन्य देशों में ऐसी मदद की जा रही है। टीकों पर से मूल्य नियंत्रण समाप्त करना होगा और कीमतें नए सिरे से तय करनी होंगी। टीका निर्माताओं को अधिक उत्पादन करने का प्रोत्साहन मिलना चाहिए। कम कीमतें हतोत्साहित कर सकती हैं। इस मोर्चे पर अब जो भी किया जाए लेकिन टीकाकरण की गति बढ़ाकर अब महामारी की दूसरी लहर को नहीं रोका जा सकता। ऐसे में चिकित्सा सुविधाओं को तेजी से बढ़ाना होगा। पहले भी ऐसा किया जा चुका है और बहुत बड़े पैमाने पर यह दोबारा करना होगा।


अब सहज आर्थिक सुधार का अनुमान भी सवालों के घेरे में है क्योंकि उत्पादन शृंखला पुन: बाधित है। कई कंपनियां और कारोबारी क्षेत्र पहले ही परेशानियों का सामना कर रहे थे और नए झटके से वे मुसीबत में पड़ सकते हैं। यदि स्थायी नुकसान से बचना है तो वित्तीय मदद, ऋण में सहायता और गत वर्ष घोषित किए गए अन्य उपाय दोहराने पड़ सकते हैं। खपत बढ़ाने के लिए दी जाने वाली सहायता बढ़ानी होगी। केवल कंपनियों को ही नहीं बल्कि आम लोगों को भी मदद की आवश्यकता है। इस वर्ष का राजस्व घाटा और सार्वजनिक ऋण बढ़ाए बिना काम नहीं चलेगा। आपदा के कुप्रबंधन की कीमत इस रूप में चुकानी होगी।


सर्वे बताते हैं कि स्कूली शिक्षा, साक्षरता और नामांकन आदि को बहुत अधिक नुकसान पहुंचा है। परंतु छात्रों का अकादमिक वर्ष बरबाद न हो इसका हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए। शायद महामारी के धीमा पडऩे तक बोर्ड परीक्षाएं न हों। वे शायद गर्मियों के आखिर में हो सकती हैं। ऐसे में छुट्टियां कम करनी होंगी और आगामी अकादमिक सत्र को समायोजित करना होगा।


इन सभी मोर्चों पर सरकार को वास्तविक निदान तलाशने होंगे, बजाय कि 'टीका उत्सव' जैसे आयोजन करके संकट का मजाक उड़ाया जाए। ऐसे उत्सव में टीकाकरण की दर कम ही हुई। राज्य सरकारों को मृतकों के आंकड़ों से छेड़छाड़ बंद करनी चाहिए। यदि संकट से निपटना है तो उसके वास्तविक स्वरूप और आकार को समझना होगा। हमने 'इवेंट आयोजन' की मानसिकता कई बार देख ली: बालकनी से थाली बजाना, बिजली बंद करके रात नौ बजे नौ मिनट मोमबत्ती जलाना, अस्पतालों पर हेलीकॉप्टरों से पुष्प वर्षा करना वगैरह। इस बीच कुंभ मेला और चुनावी रैलियों जैसे भीड़ भाड़ वाले आयोजनों में संक्रमण रोकने का काम भगवान पर छोड़ दिया गया। समय हाथ से निकल रहा है। अब गंभीर होने की जरूरत है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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भविष्य के लिए चीन का सपना (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम सरन 

चीन ने अपनी 14वीं पंचवर्षीय परियोजना (2020-25) और दूरगामी उद्देश्यों (2020-2035) की सूची जारी की है। ये दोनों दस्तावेज वह राह दिखाते हैं जिस पर चलने के लिए चीन प्रतिबद्ध है और उसे इतिहास का एक नया युग बताता है। वर्ष 2035 आने तक चीन को समाजवादी आधुनिकीकरण का लक्ष्य हासिल हो जाने की उम्मीद है जो उसे 2049 तक एक विकसित आधुनिक राष्ट्र बनने के अगले बड़े लक्ष्य की ओर प्रेरित करेगा। वर्ष 2049 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के सौ साल भी पूरे होंगे।

चीन का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2020 की तुलना में 2035 तक दोगुना हो जाने की बात कही गई है। भले ही जीडीपी वृद्धि का कोई लक्ष्य तय नहीं किया गया है लेकिन यह सालाना 5-6 फीसदी जरूर होगा। पंचवर्षीय योजना परिपत्र में कहा गया है कि चीन मात्रात्मक वृद्धि के बजाय गुणवत्तापरक वृद्धि का लक्ष्य लेकर चलेगा और इसके लिए नवाचार विकास रणनीति के केंद्र  में रहेगा। शोध एवं विकास (आरऐंडडी) व्यय सालाना 7 फीसदी की दर से बढऩे की बात कही गई है जिसमें बड़ा हिस्सा बुनियादी शोध का होगा।


हाल के वर्षों में चीन ने अपने विनिर्माण क्षेत्र की तुलना में सेवा क्षेत्र के तीव्र विकास पर अधिक जोर दिया है। लेकिन 14वीं पंचवर्षीय योजना फिर से विनिर्माण को केंद्र में लाने की बात करती है ताकि इसका हिस्सा बुनियादी रूप से स्थिर बना रहे। कोविड महामारी के दौरान सेमी-कंडक्टर जैसे महत्त्वपूर्ण उत्पादों की आपूर्ति में खड़ी हुई बाधाओं ने यह सोच पैदा की होगी। इसके अलावा सामरिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित लक्ष्यों की प्राप्ति पर भी चीन का विशेष जोर है।


योजना का मूल मुद्दा दोहरा मुद्राचलन है जिसमें मुख्य जोर घरेलू मांग एवं आपूर्ति पर है। विदेश व्यापार एवं निवेश प्रवाह की शक्ल में बाहरी मुद्रा चलन से घरेलू आर्थिक लचीलापन बहाल होने और आयात पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है।


योजना और उद्देश्यों के ये दस्तावेज राष्ट्रपति शी चिनफिंग की तरफ से दिए गए अहम मार्गदर्शन को भी परिलक्षित करते हैं। अप्रैल 2020 में संपन्न केंद्रीय आर्थिक एवं वित्तीय कार्य सम्मेलन में चिनफिंग ने औद्योगिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र, सुरक्षित, विश्वसनीय एवं काबू की जा सकने वाली आपूर्ति शृंखलाएं बनाने का आह्वान किया था। उन्होंने महत्त्वपूर्ण उत्पादों के लिए कम-से-कम एक वैकल्पिक स्रोत तक पहुंच भी सुनिश्चित करने को कहा था। उनके इस आह्वान में सामरिक एवं भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य भी निहित था। उन्होंने चीन से विनिर्माण को दूसरी जगह ले जाने को लेकर डाले जा रहे दबाव के बरक्स चीन पर दुनिया की मौजूदा निर्भरता का इस्तेमाल करने को कहा था। उन्होंने वैश्विक संसाधनों को चीनी बाजार की तरफ आकर्षित करने और चीन पर वैश्विक निर्भरता बढ़ाने की भी बात कही थी।


इस संदर्भ में बाह्य क्षेत्र को क्या काम सौंपा गया है? पंचवर्षीय योजना उस वास्तविकता को दर्शाती है कि पश्चिमी देशों से उन्नत एवं संवेदनशील तकनीकों तक पहुंच हासिल कर पाना अधिक मुश्किल हो चुका है लेकिन बुनियादी शोध में साझेदारी एवं गठजोड़ कर पाना अब भी मुमकिन है। बुनियादी शोध की चाह में भागीदारियां करना और विदेशों में शोध केंद्र स्थापित करने पर जोर दिया गया है। अनुकूल वीजा शर्तों एवं स्थायी निवास की पेशकश के जरिये चीन विदेशी विद्वानों एवं शोधकर्ताओं को आकर्षित करने की सोच रखता है। उसके साथ बौद्धिक संपदा संरक्षण कानून को अधिक सख्त बनाकर चीन के बनाए उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों को सुरक्षित रखने की भी तैयारी है। चीन ने तेज रफ्तार ट्रेन, दूरसंचार एवं बिजली उपकरणों में उच्च प्रौद्योगिकी का खूब इस्तेमाल किया है।


न्य-नागरिक समेकन (एमसीएफ) को बढ़ावा देने की पहल में भी सामरिक पहलू झलकता है जो नवाचार-केंद्रित वृद्धि के मकसद से अविभाज्य रूप से जुड़ा है। रक्षा क्षेत्र के लिए इस योजना में सूचनांकन से बौद्धिकीकरण की तरफ जाने की बात की गई है। इसमें आगे चलकर कृत्रिम मेधा (एआई), मशीन लर्निंग एवं क्वांटम कंप्यूटिंग को भी समाहित करने का उल्लेख है ताकि चीन की सेना अपनी क्षमताओं से आगे निकल सके और अमेरिका से पेश आ रही मौजूदा चुनौतियों का मुकाबला कर सके। पश्चिमी प्रशांत महासागर के विवादास्पद समुद्री क्षेत्र में चीन एआई एवं संबद्ध तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए निगरानी, पता लगाने, लक्ष्य तय करने एवं निशाना लगाने की क्षमताएं हासिल कर सकता है। इन क्षमताओं की प्राप्ति चीन के नागरिक एवं सैन्य दोनों क्षेत्रों के लिए मददगार औद्योगिक आधार के सामान्य तकनीकी उन्नयन का एक हिस्सा होगी।


चीन की सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों को इस बदलाव की अगुआई करने का जिम्मा सौंपा गया है लेकिन निजी क्षेत्र से भी अंशदान देने की अपेक्षा है। निजी कंपनियां सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों के साथ साझेदारी के लिए प्रोत्साहित हो सकती हैं। सैन्य-नागरिक समेकन पश्चिमी एवं जापानी हाइटेक कंपनियों के लिए बड़ी दुविधा पैदा करेगा क्योंकि यह परखने का कोई आधार नहीं हो सकता है कि तकनीक का हस्तांतरण सैन्य उपयोग से होगा या नहीं। चिनफिंग को लगता है कि चीन के विशाल बाजार का लोभ उच्च तकनीकों के आने की राह प्रशस्त करेगा।


चीन का लक्ष्य तकनीकी सक्षमता के साथ  उत्पादन संयंत्रों का जखीरा खड़ा करना है ताकि जरूरत पडऩे पर उनका इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सैन्य मकसद पूरा करने में भी किया जा सके। मसलन, शोध एवं विकास, मानव संसाधन एवं क्षमता निर्माण, एयरपोर्ट या उपग्रह प्रणाली जैसे खास तरह के ढांचागत आधार जैसे सारे पहलू सैन्य-नागरिक समेकन के दावेदार हो सकते हैं। इस तरह वर्ष 2049 तक एक विश्व-स्तरीय सेना बनाने के लक्ष्य चीन के एक आधुनिक एवं विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प से पूरी तरह मेल खाता है। यह पूर्ण सैन्य तैनाती की संकल्पना से मेल खाती है जिसे दशकों पहले माओत्से तुंग ने पीपुल्स वॉर में आजमाया था। शायद हम चिनफिंग के रूप में माओ के एक समकालिक संस्करण का उभार देख रहे हैं।


पंचवर्षीय योजना एवं दूरगामी उद्देश्य चीन के व्यापक एवं महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों को पूरा करने से प्रेरित हैं। चिनफिंग इन लक्ष्यों को चीनी स्वप्न कहते हैं। वर्ष 2049 की ओर जाने वाला रास्ता चीन के लिए 1978 से अब तक के तेज एवं प्रभावी वृद्धि की राह से अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। आर्थिक एवं वित्तीय कार्य सम्मेलन में चिनफिंग की टिप्पणी उस विन-विन फॉर्मूले को नहीं दर्शाती है जिसकी वकालत वह अक्सर करते रहते हैं। इसका ताल्लुुक इससे है कि चीन की आधुनिक कारोबारी रणनीति अपने कारोबारी साझेदारों, विरोधियों एवं दोस्तों की कीमत पर किस तरह चीन की ताकत बढ़ा सकती है। चीन के लिए आर्थिक विनिमय का मकसद आपसी लाभ वाली वैश्विक अंतर्निर्भरता न होकर खुद पर वैश्विक निर्भरता को बढ़ाना है ताकि एक हथियार के तौर पर भी उसका इस्तेमाल किया जा सके। ऑस्ट्रेलिया जैसे व्यापारिक साझेदारों के खिलाफ उठाए गए दंडात्मक वाणिज्यिक कदम चीन को पीछे ले जाएंगे और दुनिया भर में चीन की मंशा को लेकर सतर्कता का भाव पैदा होगा। जर्मनी के राजनेता बिस्मार्क ने गठजोड़ों के दु:स्वप्न के बारे में कहा था कि एक बड़ी एवं उभरती हुई ताकत इसकी बाधा से ग्रस्त होती है। यह चीनी स्वप्न को भंग भी कर सकता है।


(लेखक पूर्व विदेश सचिव एवं सीपीआर के सीनियर फेलो हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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भूपेश बघेल की मजबूती के लिए असम में कांग्रेस की जीत जरूरी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस  

आगामी 2 मई को पांच राज्यों की सरकारों के भविष्य के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की राजनीतिक तकदीर का निर्णय भी हो जाएगा। राज्य में बघेल को किसी मदद की जरूरत नहीं है। सन 2018 के विधानसभा चुनावों में पराजय के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) निष्क्रिय नजर आ रही है। उन चुनावों में भी पार्टी को 90 विधानसभा सीटों में महज 15 पर जीत मिली थी। पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर पार्टी के कामकाज में शामिल कर लिया गया। आंध्र प्रदेश के नेता और कांग्रेस से भाजपा में आए डी पुरंदेश्वरी और बिहार के बांकीपुर से चार बार के विधायक नितिन नवीन को केंद्र सरकार ने प्रदेश में अपनी आंख और कान बनाया है और वह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि आखिर पार्टी को कौन सी चीज परेशान कर रही है। लेकिन अभी यह काम चल ही रहा है।


आंतरिक तौर पर देखें तो बघेल के सामने कांग्रेस के भीतर कोई चुनौती नहीं है। वर्तमान में कांग्रेस की छत्तीसगढ़ इकाई आश्चर्यजनक रूप से एकजुट नजर आती है। पार्टी उतनी ही एकजुट है जितना कि कोई राजनीतिक दल हो सकता है। निश्चित तौर पर स्वास्थ्य और पंचायत राज मंत्री टीएस सिंहदेव यह मानते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री होना चाहिए था और वह बघेल को यह याद दिलाते रहते हैं कि कांग्रेस के घोषणापत्र में किए गए वादों को अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता। भले ही दोनों नेता इस बात से इनकार करें लेकिन वहां कुछ न कुछ समझ जरूर बनी है। मध्य प्रदेश में जहां कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई के कारण पार्टी को सरकार गंवानी पड़ी या राजस्थान में जहां अशोक गहलोत ने विधायकों को फुर्ती से संभाला ताकि पार्टी नेता सचिन पायलट उन्हें अपने साथ न ले जा सकें। परंतु छत्तीसगढ़ ऐसी तमाम समस्याओं से बचा रहा।


बघेल इस शांति का फायदा उठाकर अपना कद बड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। याद किया जाए तो हाल के दिनों में वह कांग्रेस के इकलौते ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्हें किसी दूसरे प्रदेश में चुनाव प्रभारी बनाया गया। उन्हें असम का चुनाव प्रभारी बनाया गया है। वह चुनाव में अपना सबकुछ झोंक रहे हैं। जब बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) की पार्टी को ज्यादा सीटें दी गईं तो इस बात से नाराज कांग्रेस नेता सुष्मिता देव को उन्होंने ही मनाया। इसके अलावा चुनाव प्रचार के लिए फंड जुटाने का काम भी उन्होंने ही किया। बल्कि इस महीने के आरंभ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वाम धड़े के चरमपंथियों के हमले के बाद असम का अपना दौर संक्षिप्त कर दिया और वह सुरक्षा बलों की कार्रवाई  के संयोजन के लिए दिल्ली लौट आए। लेकिन बघेल असम में चुनाव प्रचार समाप्त होने के बाद ही छत्तीसगढ़ लौटे। उन्होंने ऐसा तब किया जब 10 दिनों से यह खुफिया सूचना थी कि 2013 में झीरम घाटी (इस हमले में वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं समेत 30 लोग मारे गए थे) जैसे बड़े हमलों से संबंधित रहा माडवी हिड़मा (प्रतिबंधित भाकपा माओवादी का एक शीर्ष नेता) छत्तीसगढ़ में सक्रिय है। शासन प्रशासन की बात करें तो हालांकि कोविड-19 महामारी ने राज्य की हालत बेहाल कर रखी है लेकिन बघेल ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अपनी सरकार की आर्थिक नीति के केंद्र में रखा है। किसानों से गोबर खरीदने की उनकी सरकार की योजना के बाद उसके नरम हिंदुत्व को अपनाने की बातें कही जाने लगीं। गौधन न्याय योजना या जीएनवाई गत वर्ष जुलाई में शुरू की गई थी। तब से सरकार 1.40 लाख गोपालकों से गोबर खरीदकर 64 करोड़ रुपये की राशि उन्हें वितरित कर चुकी है। इसके बाद इस गोबर को 3,500 सरकारी गोशालाओं में ले जाया गया और उससे उर्वरक तथा अन्य उत्पाद बनाए गए। परंतु ग्रामीण अर्थव्यवस्था से तात्पर्य इससे कहीं अधिक है। यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) सुधार रमन सिंह की उपलब्धि थे तो वहीं बघेल के लिए यह काम अनाज खरीद के वादे ने किया है। छत्तीसगढ़ ने 2020-21 के खरीफ वितरण सत्र में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 92 लाख टन से अधिक धान खरीदा। छत्तीसगढ़ में कोई किसान एमएसपी की गारंटी नहीं मांग रहा है क्योंकि उन्हें पता है कि राज्य सरकार उनका अनाज खरीद ही लेगी।


बघेल के लिए असम चुनाव में जीत एक बड़ी चुनौती है। बघेल वही व्यक्ति हैं जिन्होंने राहुल गांधी को सलाह दी थी कि जोगी परिवार के सामने पार्टी को कड़ा रुख रखना चाहिए जबकि कहा यही जा रहा था कि अजित जोगी की पार्टी कांग्रेस के वोटों में सेंध लगाएगी। बघेल उस मौके पर भी सही साबित हुए। बघेल ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस के दिग्गज नेता चंदूलाल चंद्राकर के सहायक के रूप में की। उनका स्वतंत्र जनाधार कुछ खास नहीं था। अभी भी अगर वह अपने लिए बड़ी भूमिका की तलाश में हैं तो ऐसा केवल पार्टी आला कमान की वजह से हैं।


रमन सिंह के साथ उनके रिश्ते अत्यधिक खराब हैं। इसकी वजह है भाजपा की तत्कालीन सरकार द्वारा बघेल, उनकी पत्नी और उनकी मां के खिलाफ उनके गृह नगर और दुर्ग जिले के भिलाई शहर में 20 वर्ष पुराने भूखंड आवंटन मामले में मुकदमा दायर करना। सन 2017 में जब राज्य सरकार की आर्थिक अपराध शाखा ने मामला दर्ज किया था तब बघेल और उनका परिवार उसके कार्यालय में धरने पर बैठा। उन्होंने तत्काल गिरफ्तारी की मांग की। दोनों नेता एक मंच पर साथ आने से भी बचते हैं। यदि कांग्रेस को असम चुनाव में जीत मिलती है तो भूपेश बघेल का राष्ट्रीय स्तर पर भविष्य निश्चित है। लेकिन अगर वह हारते हैं तो टीएस सिंहदेव यकीनन और मुखर हो जाएंगे। ऐसे में छत्तीसगढ़ में स्थिरता बरकरार रखने के लिए असम में कांग्रेस की जीत जरूरी है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Friday, April 16, 2021

क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध नहीं हल (बिजनेस स्टैंडर्ड)

प्रसेनजित दत्ता 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास के मन में क्रिप्टोकरेंसी तथा वित्तीय स्थिरता पर उनके प्रभाव को लेकर तमाम चिंताएं हैं। हालांकि उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं बताया कि वह किस तरह की क्रिप्टोकरेंसी को लेकर चिंतित हैं लेकिन यह माना जा सकता है कि इसमें मूल बिटकॉइन, एथीरियम जैसे एल्टकॉइन जिनकी तादाद करीब 9,000 है और जो बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और आखिर में इनीशियल कॉइन ऑफरिंग (आईसीओ) भी शामिल हैं जिनका इस्तेमाल प्रौद्योगिकी कारोबार में अधिकांश कारोबारी प्रतीकात्मक राशि जारी करते समय करते हैं। चिंता स्टेबलकॉइन की श्रेणी की क्रिप्टो को लेकर है जो किसी खास संपत्ति या संपत्ति समूह की अस्थिरता कम करती हैं।

दुनिया के कई अन्य केंद्रीय बैंकों की तरह आरबीआई भी अपनी डिजिटल मुद्रा लाने के पक्ष में है। चीन पहले ही ऐसी मुद्रा निकाल चुका है जबकि अमेरिकी केंद्रीय बैंक अपना डिजिटल डॉलर लाने वाला है। यह देश की मुद्रा के डिजिटल प्रतिनिधित्व से अधिक कुछ नहीं है। यानी यह एक तरह से आधिकारिक मुद्रा का डिजिटल स्वरूप होगा।


क्रिप्टो को लेकर भारत सरकार भी आरबीआई के समान चिंतित है। खबरों के अनुसार उसकी योजना एक कानून बनाने की है जिसके जरिये हर प्रकार की क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा जबकि आरबीआई एक आधिकारिक डिजिटल मुद्रा जारी करेगा।


परंतु अगर हर प्रकार की निजी क्रिप्टोकरेंसी पर रोक  लगाई गई तो यह कुछ अवांछित वस्तुओं के साथ मूल्यवान वस्तुओं को नकारने जैसा होगा। इसकी जड़ें तकनीक तथा क्रिप्टोकरेंसी के पीछे के दर्शन की समझ न होने और मुद्रा शब्द का इस्तेमाल करने में निहित हैं जो पूरी तरह भ्रामक है।


पहली क्रिप्टोकरेंसी यानी बिटकॉइन समकक्षों में लेनदेन का एक ऐसा माध्यम थी जहां किसी केंद्रीय संस्थान की आवश्यकता नहीं थी बल्कि वह क्रिप्टोग्राफिक सबूत को एक साझा सार्वजनिक खाते में रखती थी। इसका निर्माण सातोषी नाकामोतो नामक छद्म नाम से किया गया था। अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि यह कोई व्यक्ति था या प्रोग्रामरों का साथ काम करने वाला समूह था। सातोषी नाकामोतो की पहचान अब तक गोपनीय है।


शुरुआत में बिटकॉइन अत्यधिक जानकारों की जिज्ञासा भर थी। सन 2010 में लास्जो हांसेज ने दो पिज्जा के लिए 10,000 बिटकॉइन चुकाए। बिटकॉइन और डॉलर के मौजूदा अंतर के हिसाब से देखें तो वर्तमान दरों में दो पिज्जा के लिए आधा अरब अमेरिकी डॉलर की राशि दी गई। बिटकॉइन के लोकप्रिय होने पर उसकी कीमत में उतार-चढ़ाव आता रहा। ज्यादातर अवसरों पर उसमें तेजी आई। जब टेस्ला के एलन मस्क ने एक अरब डॉलर मूल्य के बिटकॉइन खरीदे तो उसकी कीमत में जबरदस्त तेजी आई।


जोसेफ स्टिगलिट्ज, केनेथ रोजोफ और नॉरिएल रुबिनी समेत कई अर्थशास्त्रियों ने उनके खिलाफ चेतावनी दी है। बिल गेट्स भी ऐसे ही व्यक्तियों में शामिल हैं। इस बीच पृथ्वी और पर्यावरण को लेकर गंभीर लोग इस बात से चिंतित हैं कि क्रिप्टोकरेंसी तैयार करने या उसके लेनदेन की पुष्टि में बहुत अधिक बिजली की खपत होती है। कैंब्रिज के शोधकर्ताओं ने हाल ही में इस विषय में शोध किया और कहा कि फिलहाल बिटकॉइन में अर्जेंटीना जैसे देश से अधिक बिजली लगती है। केंद्रीय बैंकरों और सरकारों की चिंता है कि इनकी प्रकृति ऐसी है कि आपराधिक तत्त्व बड़े पैमाने पर पैसे के लेनदेन में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।


ये चिंताएं एक हद तक जायज हैं। दुनिया के वित्तीय ढांचे में बिना नियमन के बिना काम कर रही क्रिप्टोकरेंसी के अलावा भी अफरातफरी है। अगर क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल अपराधी कर सकते हैं तो वे तो सोने और चांदी का भी करते हैं। क्रिप्टो पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना और उनकी जगह केंद्रीय बैंक की डिजिटल करेंसी पेश करना समस्या का हल नहीं है।


केंद्रीय बैंक की डिजिटल करेंसी में भी उसी तरह उतार-चढ़ाव आएगा जिस तरह कागजी मुद्रा में आता है। विशुद्ध क्रिप्टोकरेंसी जो किसी से संबद्ध नहीं हैं उन्हें एक परिसंपत्ति वर्ग की तरह समझा जाना चाहिए जहां मूल्य निर्धारण व्यापक तौर पर इस बात से होता है कि इसकी उपलब्धता क्या है और खरीदार क्या कीमत चुकाना चाहता है। इस लिहाज से देखें तो यह किसी सार्वजनिक दीवार पर रंग  उड़ेलने जैसा है। ऐसा अगर किसी बड़े कलाकार ने किया है तो आप उसे  कलाकृति भी मान सकते हैं या फिर आप उसे एकदम बेकार उड़ेल हुए रंग भी कह सकते हैं। कोई इसकी क्या कीमत चुकाना चाहता है यह पूरी तरह खरीदार पर निर्भर है।


स्टेबलकॉइन का मामला एकदम अलग है। उनमें कुछ गुण तो बिल्कुल क्रिप्टोकरेंसी के हो सकते हैं और उनके पीछे केंद्रीय बैंक भी हो सकता है। परंतु वे भौतिक परिसंपत्ति के मूल्य से संबद्ध होती हैं। मान लीजिए कि एक स्टेबलकॉइन सोने से संबद्ध है तो वह किसी गोल्ड बॉन्ड जैसा ही होगा। बस उनको जारी करने और उनकी निगरानी में फर्क होगा।


विशुद्ध क्रिप्टोकरेंसी के नियमन का सही तरीका होगा एक व्यवस्थित प्रणाली और नियमन ढांचा तैयार करना जो जिंस अथवा वैकल्पिक निवेश श्रेणी के लिए उपयुक्त हो। इसके अलावा अधिकृत ब्रोकरों तथा आधिकारिक एक्सचेंजों को उनके मौजूदा मूल्य के आधार पर खरीद-बिक्री और उधारी लेने की इजाजत होनी चाहिए। बिटकॉइन या एथीरियम जैसी स्थापित क्रिप्टोकरेंसी के देश के भीतर लेनदेन की इजाजत होनी चाहिए और उनका इस्तेमाल केवल पंजीकृत ब्रोकरों और एक्सचेंज द्वारा किया जाए। लेनदेन और निस्तारण की सीमा तय की जानी चाहिए और उसकी निगरानी होनी चाहिए।


स्टेबलकॉइन के लिए अलग एक्सचेंज की आवश्यकता होगी।  शायद कमोडिटी एक्सचेंज जैसी किसी व्यवस्था की जरूरत होगी। दोनों मामलों में समुचित नियामकीय व्यवस्था और निस्तारण के तरीकों की आवश्यकता है।


सरकार को यह समझना होगा कि आज क्रिप्टोकरेंसी का वही महत्त्व है जो 17वीं सदी में शेयरों की थी। उनकी लंबे समय तक अनदेखी नहीं की जा सकती है।


(लेखक बिज़नेस टुडे और बिज़नेसवल्र्ड के पूर्व संपादक तथा संपादकीय सलाहकार वेबसाइट द प्रोसेक व्यू के संस्थापक, संपादक हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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अप्रैल की मौद्रिक नीति में साधा गया अच्छा संतुलन (बिजनेस स्टैंडर्ड)

तमाल बंद्योपाध्याय 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में गिरावट और भारत में कोविड महामारी की दूसरी लहर के कहर बरपाने की पृष्ठभूमि में पेश की गई है। मगर मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने वित्त वर्ष 2022 की पहली मौद्रिक नीति में बेहतर संतुलन साधा है।

आरबीआई का नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं करना और अपने रुख को उदार (जरूरत पडऩे पर दरों में कटौती) बनाए रखना आश्चर्यजनक नहीं है। एमपीसी के सभी छह सदस्यों का सर्वसम्मति से फैसला लेना भी विस्मयकारी नहीं है। लेकिन कुछ ऐसे कदम उठाए गए हैं, जो मुश्किल दौर में अर्थव्यवस्था की नैया पार लगाने और सरकार की उधारी लागत को नियंत्रित रखने के मामले में नए प्रयोग करने की शक्तिकांत दास की योग्यता को दर्शाते हैं। आरबीआई फरवरी तक लंबी अवधि के अनुमान जता रहा था ताकि वह जरूरत रहने तक अपना उदार रुख जारी रख सके। असल में उसने पिछले कुछ नीतिगत बयानों में समय-आधारित अग्रिम अनुमान दोहराए थे। उसने कहा था कि उदार रुख कम से कम चालू वित्त वर्ष (यानी 2020-21) और अगले वित्त वर्ष (यानी 2021-22) में जारी रहेगा।


हालांकि उस रुख को बरकरार रखा गया है, लेकिन उसमें सूक्ष्म लेकिन अहम बदलाव किया गया है। इस बार नीतिगत दस्तावेज में कहा गया है, 'जब तक निरंतर सुधार की संभावनाएं पुख्ता नहीं हो जातीं, तब तक मौद्रिक नीति का रुख उदार बना रहेगा। लेकिन साथ ही महंगाई के उभरते परिदृश्य पर कड़ी नजर रखी जाएगी।'


आरबीआई किसी समयावधि पर प्रतिबद्धता नहीं जता रहा है। लेकिन दास आर्थिक सुधार के संकेत पुख्ता होने पर मौद्रिक नीति को सख्त बनाना शुरू करेंगे।


आरबीआई ने बॉन्ड डीलरों के लिए मौजूदा नियमों को नए रूप में पेश किया है। उसने पिछले वित्त वर्ष में द्वितीयक बाजार से तथाकथित ओपन मार्केट ऑपरेशन (ओएमओ) के जरिये 3.13 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड खरीदे थे। यह खरीद नकदी की स्थितियों को मद्देनजर रखतेे हुए कई चरणों में की गई, जो नकदी आपूर्ति बढ़ाने का भारतीय संस्करण था। इस बार आरबीआई ने अग्रिम तरलता समर्थन की प्रतिबद्धता जताई है। केंद्रीय बैंक इसकी शुरुआत 2021-22 की पहली तिमाही में द्वितीयक बाजार से एक लाख करोड़ रुपये के बॉन्डों की खरीदारी के साथ करेगा। महंगाई लक्ष्य की ऊपरी सीमा पर है, लेकिन आरबीआई इस बिंदु पर अपने अनुमान को लेकर रूढि़वादी है। हालांकि वृद्धि में महामारी की नई लहर को नियंत्रित करने की भारत की क्षमता की अहम भूमिका रहेगी। इस सप्ताह 25,000 करोड़ रुपये की बॉन्ड खरीदारी से शुरुआत हो रही है। इस पहल का नाम 'द्वितीयक बाजार सरकारी प्रतिभूति अधिग्रहण कार्यक्रम' या जी-सैप 1.0 रखा गया है।


बैंकों के पुराने नकद आरक्षित अनुपात को 27 मार्च और 22 मई से दो चरणों में बहाल करने से बैंकों के खजाने से 1.5 लाख करोड़ रुपये निकल जाएंगे। जी-सैप इसे बेअसर कर देगा। इसका क्या असर पड़ा है? पिछले शुक्रवार को 10 साल के बॉन्ड का प्रतिफल कारोबारी सत्र में गिरकर छह फीसदी से नीचे 5.97 फीसदी पर आ गया, लेकिन 6.02 फीसदी पर बंद हुआ। यह अप्रैल में नया वित्त वर्ष शुरू होने के बाद करीब 18 आधार अंक फिसल चुका है।


आरबीआई ने अपनी संतुलन की नीति के तहत फैसला किया है कि वह लंबे समय तक परिवर्तनशील दर पर रिवर्स रीपो दर नीलामियां आयोजित करेगा, ताकि अतिरिक्त तरलता को सोखा जा सके, लेकिन दास ने मौद्रिक सख्ती की चिंताओं को दूर करते हुए प्रणाली में पर्याप्त नकदी का वादा किया है। ऐसी नीलामियों की राशि और अवधि का फैसला तरलता और वित्तीय स्थितियों के आधार पर लिया जाएगा, लेकिन यह आरबीआई के तरलता प्रबंधन कार्यों का हिस्सा है और इसे तरलता कम करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि नीति को लेकर बॉन्ड बाजार में उत्साह था, लेकिन मुद्रा नीति वाले दिन 1.5 फीसदी से अधिक फिसल गई। घरेलू और विदेशी बाजारों में बिकवाली हुई, जिससे तथाकथित कैरी पोजिशन की बिकवाली का संकेत मिलता है। कैरी कारोबारी बाजारों में निवेश के लिए सस्ती दरों पर उधार लेते हैं, जिनमें उन्हें शानदार कमाई हो सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो वे अमेरिका में उधारी लेकर भारत में निवेश कर रहे थे और कमाई कर रहे थे। वे ब्याज दरों में अंतर का फायदा उठा रहे थे। लेकिन उनके लिए मुद्रा का जोखिम रहता है क्योंकि वे आम तौर पर अपनी पोजिशनों की हेजिंग नहीं करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक कैरी पोजिशन का आकार फरवरी में 40 अरब डॉलर पर पहुंच गया। बिकवाली करने की वजह महंगाई बढऩे का डर हो सकता है। आरबीआई के पास 577 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है (यह जनवरी में 590 अरब डॉलर था) और भुगतान संतुलन के मोर्चे पर कोई चिंता नहीं है, इसलिए भारतीय केंद्रीय बैंक इस समय उत्साहित हो सकता है। पिछले साल स्थानीय मुद्रा में मजबूती से आरबीआई को बाजार से डॉलर खरीदने के लिए बाध्य होना पड़ा था, जिससे रुपये की तरलता बढ़ी थी। यह प्रत्येक डॉलर की खरीदारी के लिए उतनी ही राशि के रुपये प्रणाली में झोंकता है। आरबीआई के सहनशीलता के स्तर तक रुपये में गिरावट से वह तरलता का रास्ता बंद होगा।


आरबीआई ने 2020-21 की चौथी तिमाही में अपना महंगाई का अनुमान घटाकर पांच फीसदी कर दिया है। चालू वित्त वर्ष में पहली और दूसरी तिमाहियों के लिए अनुमान 5.2 फीसदी, तीसरी तिमाही में 4.4 फीसदी, चौथी तिमाही में 5.1 फीसदी है और जोखिम मुख्य रूप से संतुलित हैं। 2021-22 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 10.5 फीसदी पर अपरिवर्तित रखा गया है। ढांचागत स्तर पर यह अच्छी नीति है। लेकिन महंगाई का अनुमान वास्तविकता से थोड़ा कम नजर आता है। वहीं वृद्धि महामारी की नई लहर को नियंत्रित करने में भारत की क्षमता पर निर्भर करेगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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टीका आपूर्ति अहम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

देश में कोविड-19 संक्रमण के नए मामले रोजाना दो लाख का स्तर पार कर चुके हैं। संक्रमण गत वर्ष सितंबर के अपने उच्चतम स्तर को पीछे छोड़ चुका है। अब सरकार को टीकाकरण की प्रक्रिया तेज करने की आवश्यकता है। परंतु टीकों की उपलब्धता और आपूर्ति के क्षेत्र में पारदर्शिता और स्पष्टता बरतने के बजाय सरकार अस्पष्टता और भ्रम की स्थिति में दिख रही है। सरकार ने दावा किया है कि टीकों की कोई कमी नहीं है जबकि महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और अब दिल्ली से टीकों की कमी की शिकायत आ रही है। सामान्य गणित के आधार पर कहा जा सकता है कि टीकों की कमी है।

स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि उसने 14 अप्रैल तक राज्यों को कोविशील्ड और कोवैक्सीन की 13.1 करोड़ खुराक मुहैया कराईं। इनमें से 11.4 करोड़ खुराक लग चुकी हैं (इसमें बरबाद होने वाली खुराक भी शामिल हैं)। राज्यों के पास अभी 1.6 करोड़ खुराक शेष हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि टीकों की आपूर्ति के मामले में आपात स्थिति बन चुकी है। यदि रोज 40 लाख टीके लगते हैं तो भी चार दिन में राज्यों में टीके समाप्त हो जाएंगे। स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि अप्रैल के अंत तक दो करोड़ और खुराक राज्यों को मिल जाएंगी। परंतु यह आपूर्ति भी बस पांच दिन चलेगी। स्पष्ट है कि सरकार को आपूर्ति क्षेत्र की दिक्कतों से जल्द से जल्द निपटने की आवश्यकता है। जैसा कि केंद्र ने दावा किया है यदि राज्य टीके बरबाद कर रहे हैं तो उसे आरोप-प्रत्यारोप करने के बजाय इस समस्या से निपटना चाहिए। बरबादी कई कारणों से हो सकती है। टीका लगाने की तय मियाद समाप्त हो जाना, भंडारण की उचित व्यवस्था का न होना और बची खुराकों को नष्ट करने तक इसकी कई वजह हैं। इन कारणों की समुचित जांच करके तथा इन्हें हल करके हालात को बेहतर बनाया जा सकता है।


ऐसा करना बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार ने भले ही यह घोषणा कर दी है कि उसने अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, जापान और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मंजूर टीकों के आपात इस्तेमाल को मंजूरी देने की प्रक्रिया तेज कर दी है लेकिन इससे देश में टीकों का परिदृश्य जल्दी बदलता नहीं दिखता। कारण यह है कि इन देशों की टीका निर्माता कंपनियों को पहले वहां की सरकारों  के साथ टीका आपूर्ति की प्रतिबद्धता निभानी है जिन्होंने उन्हें अग्रिम भुगतान कर रखा है। उदाहरण के लिए फाइजर को जुलाई तक अमेरिका को 60 करोड़ खुराक और 2021 के अंत तक यूरोपीय संघ को 50 करोड़ खुराक की आपूर्ति करनी है। रूसी स्पूतनिक-वी पर आशाएं टिकी हैं जिसे शुरुआत में आयात किया जाएगा और डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज के माध्यम से बेचा जाएगा। यह टीका मई तक उपलब्ध होगा लेकिन अभी यह नहीं पता है कि इसकी कितनी खुराक आयात की जाएंगी। रूस ने छह भारतीय कंपनियों के साथ देश में उत्पादन का करार किया है लेकिन वह इस वर्ष के अंत तक ही शुरू हो पाएगा।


भारत सरकार ने दावा किया है कि रोजाना टीकों की खुराक लगाने के मामले में वह दुनिया में शीर्ष पर है लेकिन तथ्य यह है कि 24 जनवरी से अब तक देश में केवल 11.1 करोड़ लोगों को टीके लगे हैं और इनमें भी मात्र 1.4 करोड़ लोगों को टीके की दोनों खुराक लगी हैं जो आबादी का एक फीसदी है। यह स्पष्ट है कि दो टीका निर्माताओं के भरोसे रहने का निर्णय सही नहीं था।  इनमें से एक सरकार के साथ साझेदारी में टीका बना रहा और उसका उत्पादन काफी धीमा रहा है। सरकार को इस संकट से सार्थक ढंग से निपटना होगा। 'टीका उत्सव' जैसे नारे और जरूरतमंदों को टीका देने जैसी बातों की अब विश्वसनीयता नहीं बची क्योंकि यह स्पष्ट है कि न केवल हमारा देश बल्कि अर्थव्यवस्था भी एक गहरे संकट की ओर बढ़ रही है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Thursday, April 15, 2021

बदल रहा है देश का कारोबारी परिदृश्य (बिजनेस स्टैंडर्ड)

नीलकंठ मिश्रा 

बीते 15 वर्षों में दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियां और परिसंपत्ति निर्माण गैर सूचीबद्ध क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हुआ है। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक सकल घरेलू उत्पाद में अहम वृद्धि के बावजूद दुनिया भर में सूचीबद्ध कंपनियों का आंकड़ा 2006 से नहीं बदला है। जबकि इससे पहले के 20 वर्षों में इनकी तादाद दोगुनी बढ़ी थी।

इस अवधि के दौरान निजी इक्विटी से फंड की आवक बढ़ी और सौदों का आकार भी बढ़ा। अब तो बड़ी कंपनियों को भी बिना शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुए इक्विटी पूंजी मिल जा रही है। जबकि पहले कंपनियां अपेक्षाकृत शुरुआती चरण में ही सूचीबद्ध हो जाती थीं। इन दिनों अक्सर 50 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का फंड निजी तौर पर जुटाने की खबरें आम हैं।


देश में निजी इक्विटी के तेजी से बढऩे की जानकारी मिलने पर कुछ महीने पहले हमने ऐसी गैरसूचीबद्ध कंपनियों को चिह्नित करना शुरू किया जिनका मूल्यांकन एक अरब डॉलर से अधिक है। ऐसी टेक स्टार्टअप को यूनिकॉर्न के नाम से जाना जाता है। हम यह समझना चाहते थे कि ये कंपनियां अर्थव्यवस्था पर क्या असर डाल रही हैं। कुछ शोध संस्थाओं के अनुसार ऐसी कंपनियों की तादाद 35 थी तो वहीं हमें अनुमान था कि अगर अधिक सूक्ष्म तरीके से पड़ताल की जाए तो इस तादाद में कम से कम एक दर्जन का इजाफा होगा। चकित करने वाली बात है कि हमें ऐसी सौ कंपनियां मिलीं। वहीं हमारी रिपोर्ट जारी होने के बाद मिला अभिमत बताता है कि इसके बावजूद हमसे कुछ कंपनियों को गिनने में चूक हो गई।


अमेरिका और चीन में भारत से अधिक यूनिकॉर्न हैं लेकिन उनके यहां ऐसी सूचीबद्ध कंपनियां भी अधिक हैं जिनका बाजार पूंजीकरण एक अरब डॉलर से अधिक है। अमेरिका में ऐसी 2,825 और चीन में 2,126 कंपनियां हैं जबकि भारत में केवल 335। ऐसे में भारत की आर्थिक गति के लिए गैर सूचीबद्ध कंपनियां अधिक मायने रखती हैं।


हमने कुछ मानक तय करके कंपनियों का चयन शुरू किया और 50,000 ऐसी गैर सूचीबद्ध कंपनियों में से छंटनी शुरू की जिनका मुनाफा अधिक था और वृद्धि मजबूत थी। क्योंकि इसकी बदौलत ही वे पुनर्निवेश के लिए जरूरी नकदी जुटा सकेंगी और उन्हें अतिरिक्त वित्त की आवश्यकता नहीं होगी। इसी तरह घाटे में चल रही किसी कंपनी के मूल्य का बेहतर आकलन उनमें निवेश करने वाले फंड से भी लग सकता है। प्रक्रिया को सघन बनाने के लिए बड़ी निजी इक्विटी फर्मों के साथ विस्तृत चर्चा आवश्यक थी। इसके बाद हमने उन फर्म को निकाल दिया जो एक समय यूनिकॉर्न थीं लेकिन बाद में पिछड़ गईं या जो सूचीबद्ध कंपनियों, बहुराष्ट्रीय निकायों या प्रतिष्ठित कारोबारी समूहों की अनुषंगी हैं।


परिणामस्वरूप सामने आई सैकड़ों कंपनियों का क्षेत्रवार मिश्रण विविधता से भरा हुआ है। व्यापक अनुमान वाली ई-कॉमर्स, फिनटेक, शिक्षा और तकनीक (एजुटेक), खाद्य-आपूर्ति तथा मोबिलिटी कंपनियों के अलावा हमें सॉफ्टवेयर सेवा के रूप में(एसएएएस), गेमिंग, गैर बैंकिंग वित्तीय, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक, आधुनिक व्यापार, वितरण एवं लॉजिस्टिक्स, जैव प्रौद्योगिकी एवं औषधि जैसे तमाम क्षेत्र मिले। परिपक्व अर्थव्यवस्था वाले देशों में जहां सालाना वृद्धि दर एक अंक में हो, वहां तकनीक के सहारे ही यूनिकॉर्न बनने के लिए जरूरी वृद्धि हासिल हो सकती है।


भारत में जीडीपी वृद्धि लंबे समय से दो अंकों में है और उन क्षेत्रों में भी तेजी देखने को मिल सकती है जिनका दायरा बढ़ रहा है या जहां औपचारिकीकरण हो रहा है। ऐसे में हमारी सूची में कुछ कंपनियां आभूषण, वस्त्र और पैकेट बंद खाने जैसे पारंपरिक कारोबार जगत की भी हैं।


इनमें से दो तिहाई कंपनियां 2005 के बाद शुरू हुईं जबकि बीएसई 500 की केवल 63 कंपनियां इस सदी में शुरू हुईं जबकि 180 तो 1975 के पहले आरंभ हो गई थीं। यह एक अप्रत्याशित घटनाक्रम है जहां कंपनियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। निकट भविष्य में भले ही मूल्यांकन में उतार-चढ़ाव आ सकता है लेकिन हमारा मानना है कि हम अभी देश के कारोबारी परिदृश्य को नया आकार देने के मामले में शुरुआती चरण में हैं। किसी कंपनी को अपनी स्थापना के बाद यूनिकॉर्न में सात से 10 वर्ष लगते हैं और नई स्टार्टअप तथा वित्त पोषण ने बीते पांच साल में काफी गति पकड़ी है। ऐसे में अगले पांच से 10 वर्ष में ऐसी और कंपनियां सामने आ सकती हैं।


ऐसा होने की कई वजह हैं लेकिन सबसे अहम है निजी इक्विटी जो ज्यादातर मामलों में विदेशी है। प्रतिव्यक्ति आय के मामले में भारत दुनिया के पिछड़े देशों में शामिल है। इससे पहले भी एक आलेख में मैं चर्चा कर चुका हूं कि भारत विकास के जिस चरण में है वहां निजी पूंजी की आपूर्ति कम है। यह पूंजी बचतकर्ताओं के लिए अधिक जोखिमभरी भी होती है। मौजूदा विकसित देशों में से अधिकांश जब उभरते बाजार थे तब उन्होंने विदेशी पूंजी पर भरोसा किया। उदाहरण के लिए 19वीं सदी की पहली छमाही में अमेरिका को इंगलैंड, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे यूरोपीय देशों से मदद मिली। इसमें ज्यादातर डेट की शक्ल में था और इसने आर्थिक तेजी और गिरावट का चक्र शुरू किया। भारत में यह राशि इक्विटी के रूप में आ रही है और निजी इक्विटी की फंडिंग ने बीते दशक में हर वर्ष सार्वजनिक और बाजार से आने वाली फंडिंग को पीछे छोड़ा है। विश्व स्तर पर निजी इक्विटी फंडिंग में इजाफे ने इसमें मदद की है। भारत में भी यह स्तर बढ़ा है।


जोखिम भरी पूंजी की उपलब्धता के कारण कंपनियों का विकास सामान्य से तेज हुआ है। तेज उपलब्धि का इकलौता शेष विकल्प डेट की अधिकता है। यदि परियोजना सफल हुई तो मालिक अमीर होता है और अगर विफल हुई तो उसके साथ बैंक को भी नुकसान होता है। सन 1980 के दशक में भी भारतीय उद्योगपति तेजी से नई कंपनियां बना रहे थे। परंतु समस्त चुकता पूंजी में तीन चौथाई सरकारी कंपनियों में थी। सन 1991 में उदारवाद के आगमन तक प्रति निजी कंपनी पूंजी काफी कम थी। उस वक्त भी कुछ ही समूहों के पास नए कारोबार शुरू करने के लिए जोखिम पूंजी थी। निजी इक्विटी के आगमन के बाद पहली पीढ़ी के कारोबारियों ने जोखिम लेना शुरू किया। इससे देश का कारोबारी परिदृश्य बदलने लगा।

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भारतीय यूनिकॉर्न स्टार्टअप के मिथक और उनका जादू (बिजनेस स्टैंडर्ड)

निवेदिता मुखर्जी  

बीते सप्ताह का हर दिन स्टार्टअप की दुनिया के लिए सुखद और यादगार रहा। इस दौरान बहुत कम अंतराल में छह इंटरनेट आधारित कंपनियों ने यूनिकॉर्न का दर्जा प्राप्त किया। यानी इन कंपनियों का मूल्यांकन एक अरब डॉलर का स्तर पार कर गया। इस बात का जोरशोर से जश्न भी मनाया गया। इसमें यही संदेश निहित था कि आखिरकार भारत उस स्थिति में आ गया है जहां किसी निजी स्टार्टअप का एक अरब डॉलर का स्तर हासिल करना यदाकदा होने वाली घटना नहीं रह गई।


अमेरिकी एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म सीबी इनसाइट्स के डेटाबेस के मुताबिक अप्रैल 2021 तक दुनिया भर की 642 यूनिकॉर्न में से 29 भारत में स्थित हैं। वेंचर इंटेलिजेंस का एक और डेटा बताता है कि भारतीय यूनिकॉर्न की तादाद 47 है और इनमें इजाफा हो रहा है। आंकड़ों में यह अंतर यूनिकॉर्न की गणना के तरीके की वजह से है। एक अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन पर यूनिकॉर्न, 10 अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन पर डेकाक्रॉन और 100 अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन पर हेक्टोकॉर्न मानी जाती है और निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सी स्टार्टअप सूची में कब किस स्थान पर थी।


वैश्विक रैंकिंग की बात करें तो किसी स्टार्टअप का यूनिकॉर्न बनना यकीनन उसकी विकास गाथा की पुष्टि करता है लेकिन वहां यह बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। कारण यह कि वहां स्टार्टअप का मूल्यांकन कोई विशिष्ट बात नहीं है। यह किसी स्टार्टअप का सांकेतिक मूल्य है जो नकदी प्रवाह की उपलब्धता, महत्त्वाकांक्षा और फंडिंग के अहम संकेतकों के आकलन पर निर्भर है। चूंकि मूल्यांकन का राजस्व, मुनाफे या किसी अन्य पारंपरिक कारोबारी मानक से कोई लेनादेना नहीं इसलिए यह निवेशकों की भावना से अधिक संचालित है। स्टार्टअप जगत में निवेशक कई बार कंपनियों के सामने कड़े प्रदर्शन लक्ष्य भी रखते हैं। वहीं अन्य अवसरों पर वे चाहते हैं कि आंकड़े चाहे कुछ भी हों लेकिन ग्राहक कंपनी से जुड़े रहें।


कई ऐसे मामले सामने आए जहां उच्च मूल्यांकन के बावजूद स्टार्टअप नाकाम होती देखी गईं। सितारा संस्थापकों वाले संस्थान भी डूबने से नहीं बच पाए। फ्लिपकार्ट, हाउसिंग डॉट कॉम, स्नैपडील जैसी तमाम स्टार्टअप के बारे में सोचिए। चमकदार नाम वाले निवेशक जो स्टार्टअप को शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचने में मदद करते हैं, वे पूरे सफर के दौरान पूरी तरह नियंत्रण कायम रखते हैं। आमतौर पर संस्थापक निवेशक उस समय सार्वजनिक तौर पर चर्चा में आता है जब किसी स्टार्टअप की बिक्री होती है या उसे बेचने का प्रयास किया जाता है। फ्लिपकार्ट के मामले में कंपनी के सह-संस्थापक और देश में ई-कॉमर्स के पोस्टर बॉय आईआईटी से पढ़े सचिन बंसल को 2018 में अपना पद छोडऩा पड़ा जब टाइगर ग्लोबल मैनेजमेंट के ली फिक्सेल समेत निवेशकों के एक समूह ने बेंगलूरु की इस कंपनी की बहुलांश हिस्सेदारी 16 अरब डॉलर में वॉलमार्ट को बेचने का सौदा किया। सचिन बंसल ने बिन्नी बंसल के साथ मिलकर करीब 10 वर्ष पहले जिस कंपनी की स्थापना की थी, उस कंपनी की बोर्ड रूम वार्ता में सचिन बंसल के पास ज्यादा कुछ कहने का अधिकार ही नहीं था। सचिन अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते थे लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके। सौदे के बाद खिंची रस्मी तस्वीर में वे नदारद दिखते हैं। उन्होंने एक ट्वीट करके जानकारी दी कि वे अब फ्लिपकार्ट से अलग हैं। एक और मामला जो सुर्खियों में रहा वह था अचल संपत्ति क्षेत्र के सर्च पोर्टल हाउसिंग डॉट कॉम का।


इसके सह-संस्थापक और सीईओ राहुल यादव ने 2015 में प्रमुख निवेशक सिकोया कैपिटल के शैलेंद्र सिंह को ई-मेल भेजा। सार्वजनिक हुए इस मेल में तब 25 वर्ष के यादव (जिन्होंने आईआईटी की पढ़ाई अधूरी छोड़ दी), ने कहा कि अगर निवेशकों ने उनसे उलझना नहीं छोड़ा तो वह कंपनी छोड़ देंगे। लेकिन उन्होंने एक ऐसी पंक्ति लिखी जिसने उनका कंपनी से बाहर जाना सुनिश्चित कर दिया- यादव ने लिखा कि इसके साथ ही देश में सिकोया कैप के अंत की शुरुआत हो जाएगी। इसके बाद काफी कुछ घटा। यादव ने निवेशकों और बोर्ड सदस्यों के चर्चा के लिए नाकाबिल बताकर बोर्ड से इस्तीफा दिया, बाद में उन्होंने इस्तीफा वापस लिया और आखिरकार उन्हें कंपनी छोडऩी पड़ी।


देश में यूनिकॉर्न की तेजी से बढ़ती होड़ के बीच दो लोगों के उद्धरण ध्यान देने लायक हैं। फ्लिपकार्ट के बाद नवी टेक्रॉलजीज नामक फिनटेक कंपनी शुरू करने वाले सचिन बंसल और क्रेडिट कार्ड बिल भुगतान प्लेटफॉर्म क्रेड (जो हाल ही में यूनिकॉर्न बनी) के संस्थापक कुणाल शाह। सचिन ने कहा कि अधिकांश उद्यमी केवल उद्यम के प्रति लगाव के कारण काम करते हैं और संपत्ति केवल आंकड़े हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि वे कभी उसका उपभोग नहीं कर पाएंगे। शाह ने कहा कि यूनिकॉर्न का तमगा और उच्च मूल्यांकन आदि सब दिखावटी हैं और अहम है कंपनी का मुनाफा कमाना। उन्होंने कहा कि यूनिकॉर्न अंशधारकों के विश्वास और आशा का केंद्र हैं। सचिन भले ही देश के एक शुरुआती और अत्यंत सफल यूनिकॉर्न के संस्थापक होने के अनुभव से बोल रहे हों लेकिन शाह को उद्यमिता जगत में काफी समय हो गया है और उन्हें पता है कि यूनिकॉर्न की वास्तविक कीमत क्या है? शुरुआत में यूनिकॉर्न को लेकर घोषणाओं की गति भी धीमी थी। उदाहरण के लिए फ्लिपकार्ट के एक अरब डॉलर का जादुई आंकड़ा छूने की खबर 2013 में सामने आई जबकि वह एक साल पहले ही यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो चुकी थी। कंपनी के नए निवेशकों में से एक दक्षिण अफ्रीका के नैस्पर ने एक वर्ष पहले की गई अपनी आखिरी फंडिंग के आधार पर कंपनी का मूल्यांकन 1.04 अरब डॉलर किया था। यह अंशधारकों को दी जाने वाली वार्षिक रिपोर्ट का हिस्सा थी। इसमें कहा गया कि कंपनी ने फ्लिपकार्ट में 10 फीसदी हिस्सेदारी के लिए अगस्त 2012 में 10 करोड़ डॉलर का निवेश किया। जैसा कि कहा जाता है, शेष सब इतिहास है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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सुधार को नया खतरा (बिजनेस स्टैंडर्ड)

वर्ष 2020-21 में अप्रत्यक्ष कर संग्रह के प्रारंभिक आंकड़े केंद्र सरकार द्वारा बुधवार को जारी किए गए। आंकड़े बताते हैं कि बीते कुछ महीनों से अर्थव्यवस्था अपेक्षा से कहीं बेहतर गति से सुधर रही है। वर्ष के दौरान अप्रत्यक्ष कर संग्रह गत वर्ष के वास्तविक संग्रह की तुलना में 12.3 फीसदी बढ़ा। इसमें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और गैर जीएसटी कर शामिल हैं। शुद्ध अप्रत्यक्ष कर संग्रह 10.71 लाख करोड़ रुपय रहा जो संशोधित अनुमानों का 108.2 फीसदी था। केंद्र सरकार का जीएसटी संग्रह भी संशोधित अनुमान से 6 फीसदी अधिक था। हालांकि यह पिछले साल के संग्रह से करीब 8 फीसदी कम था।

राजस्व संग्रह में सुधार को पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क से भी मदद मिली। सीमा शुल्क संग्रह में 21 फीसदी का इजाफा देखा गया जबकि इस बीच आयात में कमी दर्ज की गई। यही कारण है कि कुल कर संग्रहण पिछले वर्ष से थोड़ा अधिक रहा। ऐसा प्रत्यक्ष कर में गिरावट के बावजूद हुआ। सरकार ने गत वर्ष पेट्रोलियम उत्पादों पर कर बढ़ाकर अच्छा किया था। इससे उसे कोविड-19 के कारण उपजी विसंगतियों को कम करने में मदद मिली। हालांकि गैर कर राजस्व के मोर्चे पर सरकार को दिक्कतों का सामना करना पड़ा। वर्ष 2020-21 के राजस्व घाटे का अंतिम आंकड़ा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 9.5 फीसदी के अनुमानित स्तर से कम रह सकता है। सरकार राजस्व के मोर्चे पर राहत की स्थिति में है। यह इस बात से भी स्पष्ट होता है कि उसने भारतीय खाद्य निगम द्वारा राष्ट्रीय अल्प बचत फंड से चाहे गए ऋण को मंजूर कर दिया। यह भी अच्छी बात है क्योंकि इससे बजट में पारदर्शिता बढ़ेगी।


परंतु कोविड संक्रमण के मामलों में तेज बढ़ोतरी ने जोखिम बढ़ा दिया है। देश में अब रोजाना कोविड-19 संक्रमण के 1.80 लाख से अधिक नए मामले सामने आ रहे हैं। विभिन्न राज्य सरकारें अलग-अलग तरह के प्रतिबंध लगा रही हैं ताकि वायरस का प्रसार रोका जा सके। मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र ने आवश्यक गतिविधियों के अलावा हर काम पर रोक लगा दी है। इसका असर मांग और आपूर्ति पर पडऩा लाजिमी है। यदि जल्दी मामलों में कमी आनी नहीं शुरू हुई तो अन्य राज्यों में भी ऐसे उपाय अपनाने होंगे। आने वाले सप्ताहों और महीनों में अगर प्रतिबंध बढ़े तो हालात और खराब हो सकते हैं। बहरहाल ध्यान देने वाली बात यह है कि नए प्रतिबंधों के कारण मांग प्रभावित होगी लेकिन सालाना आधार पर आर्थिक गतिविधि अब तक बेहतर नजर आ रही है। नीति निर्माताओं को इससे भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ऐसा कम आधार के कारण हो रहा है। गत वर्ष की तुलना में हालात इस बार अधिक चुनौतीपूर्ण हैं।


कोरोनावायरस की दूसरी लहर पहली से अधिक घातक है और इसे नियंत्रित करने में अधिक समय लग सकता है। कर संग्रह में सुधार के बावजूद सरकार की वित्तीय स्थिति पिछले साल से अधिक दबाव में है। देश का सार्वजनिक ऋण जीडीपी के 90 फीसदी के करीब पहुंचने का अनुमान है। परंतु सरकार को अभी भी वंचित वर्ग को मदद पहुंचानी होगी। प्रवासी श्रमिक एक बार फिर शहरों से गांवों की ओर पलायन करने लगे हैं। सरकार को ग्रामीण रोजगार योजना में आवंटन बढ़ाना चाहिए और हालात बिगडऩे पर नि:शुल्क अनाज वितरण शुरू करना चाहिए। भारतीय रिजर्व बैंक भी इस स्थिति में नहीं होगा कि कारोबारी जगत को और मदद पहुंचा सके। मार्च में मुद्रास्फीति की दर 5.5 फीसदी रही। आपूर्ति शृंखला की बाधा इसे ऊंचा बनाए रख सकती है और मौद्रिक नीति के लिए बाधा पैदा कर सकती है। टीकाकरण में तेजी ही इकलौता उपाय नजर आती है। सरकार को टीका निर्माताओं से बात कर आपूर्ति बढ़ानी चाहिए।

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Tuesday, April 13, 2021

कोरोनावायरस के समय में समुचित नीति निर्माण (बिजनेस स्टैंडर्ड)

देवांशु दत्ता 

कोविड-19 महामारी के कारण अब तक दुनिया में 30 लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इसने दुनिया की अर्थव्यवस्था को भी लगभग तबाह ही कर दिया है। यह सही है कि अब दुनिया भर में टीकाकरण शुरू हो चुका है लेकिन संकट है कि समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है। निश्चित तौर पर कोरोनावायरस के बदले हुए स्वरूप की यह लहर और कहीं अधिक खतरनाक हो सकती है।

अलग-अलग देशों ने इस चुनौती से निपटने के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाई है। ऐसे में यह देखना उचित होगा कि वे कौन से देश हैं जो महामारी से बेहतर तरीके से निपटने मेंं कामयाब रहे, कहां मौत के आंकड़े कम रखनेे में सफलता मिली, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई गईं और आर्थिक नुकसान कम करने में कामयाबी हाथ लगी? विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से इसे महामारी करार देने के एक वर्ष बाद हम इसका उदाहरण हैं। यह केवल अकादमिक बहस नहीं है: नीति निर्माताओं को मौजूदा हालात से निपटना होगा और उन्हें सन 2020 की सफलताओं और विफलताओं से सबक लेने की आवश्यकता है।


अपेक्षाकृत कम मौतों और बेहतर आर्थिक स्थिरता के साथ जर्मनी, न्यूजीलैंड, जापान, वियतनाम, ताइवान और दक्षिण कोरिया सन 2020 से अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से निपटने में कामयाब रहे। जबकि अमेरिका, ब्राजील, इटली, ब्रिटेन और रूस में मौत के आंकड़े भी अधिक रहे और आर्थिक संकट भी अन्य देशों की तुलना में अधिक रहा। मौत के मामलों में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब नहीं कहा जा सकता है। परंतु आर्थिक नुकसान के मामले में हम सबसे खराब प्रदर्शन वाले देशोंं में शुमार हैं। चीन में मौत तथा संक्रमितों के आंकड़ों के बारे में जान पाना कठिन है लेकिन वह अपने यहां आर्थिक गतिविधियों को ठीक रख पाने मेंकामयाब रहा है।


पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल के समाजशास्त्री माउरो गुइलेन ने एक पर्चा लिखा है, द पॉलिटिक्स ऑफ पैनडेमिक्स: डेमोक्रेसी, स्टेट कैपिसिटी ऐंड इकनॉमिक इनेक्विलिटी । इसमें 146 देशों में सन 1990 के बाद से संक्रामक रोगों और उनके प्रबंधन पर नजर डाली गई है।  


उन्होंने इन विषयों पर तीन अध्ययन किए। पहले में सन 1990 और 2019 के बीच संक्रामक रोगों की आवृत्ति और इनके घातक होने का अध्ययन किया गया है। दूसरे में कोविड-19 के दौरान सरकारों की ओर से लगाए गए लॉकडाउन की गति और उसकी गंभीरता का अध्ययन है। तीसरा अध्ययन शारीरिक  दूरी के मानकों के अनुपालन पर आधारित है।


गुइलेन कहते हैं, 'लोकतांत्रिक देशों में, गहरी पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता के विश्वास ने ऐसे रोगों की आवृत्ति और उनके घातक असर को सीमित किया है, इन्हें लेकर दी जाने वाली प्रतिक्रिया मेंं समय कम लगा है और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े उपायों को लेकर लोगों में अनुपालन की प्रवृत्ति बढ़ी है।'


खेद की बात यह है कि सालाना वैश्विक लोकतांत्रिक सूचकांक यह संकेत दे रहा है कि लोकतंत्र के स्तर मेंं गिरावट आ रही है। इससे अविश्वास का माहौल उत्पन्न हुआ है। इसका अर्थ यह है कि लोग शारीरिक दूरी का पालन करने, मास्क पहनने और टीका लगवाने से इनकार कर रहे हैं।


एक अधिक दिलचस्प नतीजा यह है कि सरकार के स्वरूपों से ज्यादा आर्थिक असमानता ने ऐसी बीमारियों के प्रभाव को बढ़ाया है और क्वारंटीन, शारीरिक दूरी आदि के व्यापक अनुपालन पर भी असर डाला है। कम आय वाले लोगों के लिए काम करना मजबूरी है। उन्हें मामूली लक्षणों की अनदेखी करना और जांच से बचना आसान लगता है क्योंकि वे काम नहीं छोड़ सकते। इतना ही नहीं कम आय का संबंध कमजोर पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं तक अपर्याप्त पहुंच और भीड़भाड़ वाले इलाकों में बिना साफ सफाई के रहने से भी है।


मजबूत सरकारी क्षमता और अच्छी नीति हमें खराब नतीजों से बचा सकती है और आय की असमानता में इजाफा भी रोक सकती है।


गुइलेन का मानना है कि लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी दोनों तरह के शासन जरूरी संसाधन और क्षमता के साथ-साथ आवश्यक संगठनात्मक ढांचा तैयार कर सकते हैं। कुछ भी हो, लोकतांत्रिक व्यवस्था हो अथवा नहीं लेकिन अगर असमानता अधिक हो तो परिणाम भी बुरे होते हैं।


यह दलील मजबूत नजर आती है। अमेरिका, भारत और ब्राजील तीनों में असमानता का स्तर बहुत अधिक है। भारत के मामले में दुखद बात यह है कि लॉकडाउन के कारण आय का अंतर काफी बढ़ गया क्योंकि लाखों लोगों को रोजगार गंवाना पड़ा।


अमेरिका इस मामले में खुशकिस्मत है क्योंकि वहां सत्ता परिवर्तन हो गया। इससे वहां अधिक बेहतर नीति लागू हुई। अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडन के नेतृत्व वाले नए सत्ता प्रतिष्ठान ने एक प्रभावशाली टीकाकरण कार्यक्रम की शुरुआत की और प्रोत्साहन के चेकों के माध्यम से राहत में इजाफा किया।


भारत में इस बात के प्रमाण हैं कि केंद्र सरकार ने टीकाकरण की प्रक्रिया को भी सहज तरीके से नहीं शुरू किया। अब राज्यों में टीकों की कमी हो गई है और केंद्र, राज्यों पर दोषारोपण कर रहा है। विभिन्न चरणों में चुनाव के आयोजन और असमय कुंभ मेले के लिए भी राजनीतिक कारण ही जिम्मेदार हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इनके कारण संक्रमण में बेतहाशा वृद्धि होना तय है।


आर्थिक मोर्चे पर मांग में जो भी सुधार हुआ है वह ईंधन पर भारी भरकम कर और सख्त वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के बावजूद हुआ है। सन 2020 में लगाए गए लॉकडाउन ने आर्थिक गतिविधियों को बुरी तरह प्रभावित किया था और अगर दोबारा लॉकडाउन लगता है कि निम्र आय वर्ग वाले लोग मजबूर हो जाएंगे कि वे या तो भूखों मरें या फिर कानून तोड़ें और संक्रमण का खतरा बढ़ाएं। यह देखा जाना है कि क्या यह सरकार टीकाकरण में सुधार कर एक बेहतर प्रोत्साहन योजना पेश कर पाती है या नहीं।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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राफेल खुलासे पर खामोशी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सन 2015 में हुए राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर नये सिरे से विवाद उत्पन्न हो गया है और सरकार को इस पर तत्काल विस्तार से अपनी बात रखने की जरूरत है। इस बार खुलासा फ्रांस की एक भ्रष्टाचार-निरोधक एजेंसी ने किया है। एजेंसी का दावा है कि दोनों देशों की सरकारों के बीच हुए इस सौदे में एक भारतीय बिचौलिये को 508,925 यूरो की राशि बतौर कमीशन प्रदान की गई। राफेल की निर्माता कंपनी दसॉ ने डेफसिस सॉल्युशंस के सुषेण गुप्ता को यह राशि चुकाई और इसका उल्लेख 'क्लाइंट को तोहफा' के रूप में किया। गुप्ता अगस्टावेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद सौदे में धनशोधन की जांच के दायरे में हैं। दसॉ के मुताबिक यह राशि गुप्ता से संबंधित भारतीय कंपनी द्वारा राफेल की 50 अनुकृतियां तैयार करने की एवज में किया गया आंशिक भुगतान थी। ऐसी कुछ अनुकृतियां वायु सेना प्रमुख के आवास के बाहर प्रदर्शित हैं लेकिन इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि उन्हें गुप्ता की कंपनी ने बनाया है। गुप्ता ने इन आरोपों को नकारा है। फ्रांसीसी कंपनी ने इन्हें भारतीय प्रवर्तन निदेशालय की गुप्ता से जुड़ी केस फाइल से हासिल किया जिसमें दावा किया गया है कि उन्होंने रक्षा मंत्रालय से अवैध तरीके से गोपनीय दस्तावेज हासिल किए ताकि बेहतर सौदेबाजी में फ्रांसीसी पक्ष की मदद की जा सके।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सरकार जो आमतौर पर स्वयं को आदर्श और ईमानदार बताती है, उसने इस विषय पर कोई विस्तृत स्पष्टीकरण तक नहीं दिया और न ही जांच का आदेश दिया। अब तक सरकार की इकलौती प्रतिक्रिया केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की ओर से तंज के रूप में सामने आई जिसमें उन्होंने अगस्टावेस्टलैंड सौदे में कांग्रेस के कथित रूप से शामिल होने की ओर इशारा किया। सरकार 2017 से ही इस सौदे को लेकर उठे सवालों पर किसी तरह की सफाई देने की अनिच्छुक दिखी है। सन 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने मोदी सरकार और फ्रांस सरकार के बीच 36 विमानों के सौदे की न्यायालय की निगरानी में जांच की मांग करने वाली कई जनहित याचिकाओं को ठुकरा दिया था। अपने निर्णय में उसने कहा था कि उसे उन प्रमाणों में कोई अनियमितता नहीं मिली है जो सरकार ने सीलबंद लिफाफे में उसके समक्ष पेश किए। यकीनन संविधान के रक्षक देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्याय का यह अनूठा तरीका था।


सन 2019 में उसने समीक्षा याचिका से संबंधित एक जनहित याचिका खारिज कर दी। यह याचिका तब दायर की गई थी जब मीडिया में खबर आई थी कि भारत की ओर से बातचीत करने वाली टीम के दो विषय विशेषज्ञों ने सौदे के अहम पहलुओं पर सवाल उठाए थे। तब सरकार ने कहा था कि लीक हुए दस्तावेज गोपनीय थे। न्यायालय ने वाद खारिज कर दिया था। परंतु समीक्षा याचिका खारिज करते हुए कहा गया कि वह अपने अनुच्छेद 32 के अधिकारों के तहत रक्षा अनुबंधों की सीमित निगरानी कर सकता है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी सौदे को साफ-सुथरा बताया। उसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि यह सौदा संप्रग सरकार द्वारा किए गए 126 विमानों के सौदे से 2.87 फीसदी सस्ता था। हालांकि सरकार का दावा 9 से 20 फीसदी सस्ता सौदा करने का था। ध्यान रहे संप्रग के सौदे को मोदी सरकार ने रद्द किया था। परंतु रक्षा मंत्रालय के कहने पर सीएजी की रिपोर्ट में कीमतों का उल्लेख नहीं किया गया। कहा गया कि यह सौदे की गोपनीयता की शर्त के चलते किया गया। ऐसे वक्त में जब सरकार की जांच एजेंसियां ममता बनर्जी और महाराष्ट्र में महाविकास आघाडी को लगातार जांच के दायरे में ले रही हैं तब सरकार राफेल सौदे पर कुछ भी कहने से बच रही है। यह बात अपने आप में बहुत कुछ कहती है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Monday, April 12, 2021

टीके से जुड़ी विफलता (बिजनेस स्टैंडर्ड)

महामारी की दूसरी लहर पूरे देश में जोर पकड़ रही है। संक्रमण के नये मामलों की तादाद रोजाना 1.50 लाख का स्तर पार कर चुकी है। सर्वाधिक प्रभावित महाराष्ट्र समेत कई राज्यों की शिकायत है कि टीकों की कमी हो गई है। इस बीच भारत ने टीकों का निर्यात भी रोक दिया है जिससे अन्य देशों में संकट उत्पन्न हो गया है। माना जा रहा था कि भारत पूरी दुनिया को टीका मुहैया कराएगा। सरकार ने वादा भी यही किया था। बीते महीने के दौरान भी यह बात बार-बार दोहराई गई। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय विभिन्न राज्य सरकारों पर दोषारोपण करने में समय गंवा रहा है। टीकाकरण मेंं यह देरी भारत सरकार के रस्मी अहंकार और निजी क्षेत्र को लेकर उसकी तिरस्कार की भावना से हो रही है।

टीके की प्रतीक्षा कर रहे हर भारतीय को सरकार से एक प्रश्न तो पूूछना ही चाहिए: आपके खरीद के ऑर्डर कहां हैं? अन्य देशों में सरकारों ने टीका निर्माताओं से संपर्क किया और उन्हें टीका खरीदने की गारंटी वाले ऑर्डर दिए। अमेरिका मेंं तो फाइजर के टीके के प्रभावी और सुरक्षित होने की पूरी जानकारी होने के पहले ही सरकार ने 10 करोड़ टीके खरीदने का ऑर्डर दे दिया था और 50 करोड़ अन्य टीकों की खरीद का विकल्प भी रखा था। यही प्रक्रिया अन्य कंपनियों के साथ दोहराई गई। यूरोप और अन्य देशों ने भी ऐसा ही किया। कई देशों ने भारतीय टीका निर्माता सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) को भी टीकों के ऑर्डर दिए। भारत सरकार ने क्या किया? उसने शुरुआती 10 करोड़ टीकों के लिए कीमत कम रखने को लेकर बातचीत की। इसके बाद ठहराव आ गया क्योंकि सरकार ने खरीद ऑर्डर पर हस्ताक्षर ही नहीं किए थे। आखिरकार एसआईआई को ऑर्डर मिला लेकिन केवल 1.1 करोड़ खुराक का। सरकार जितने टीके खरीदना और लगाना चाहती है उसके लिए भुगतान करने में उसे क्या दिक्कत है? अब यदि एसआईआई के पास पर्याप्त धनराशि नहीं है तो वह अचानक इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन कैसे बढ़ाएगी?


इसने सरकार की एक और विफलता को जन्म दिया और वह है सही समय पर पर्याप्त क्षमता तैयार करना। यह स्पष्ट नहीं है कि सन 2020 में भारत सरकार ने भारतीय टीका निर्माताओं को उत्पादन बढ़ाने में कोई आर्थिक मदद की या नहीं। बिल गेट्स फाउंडेशन जैसे स्रोतों से पैसा जरूर आया। राजनेता और अफसरशाह शायद यह सोचते रहे कि एसआईआई जैसी निजी कंपनियां सरकार का ही हिस्सा हैं। इस भीषण महामारी के अवसर पर सरकार टीका उत्पादन को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ सकती क्योंकि वह क्षमता बढ़ाने में निजी कंपनियों के साथ सहयोग नहीं करना चाहती।


सरकार की अंतिम विफलता है कीमत निर्धारण। एसआईआई के अदार पूनावाला ने बार-बार कहा है कि कंपनी भारत सरकार को शुरुआती 10 करोड़ टीके अत्यधिक रियायती दर पर देने को तैयार हुई क्योंकि उसे आशा थी कि इसके बाद उसे खुली बिक्री करने का अवसर मिलेगा और इससे आने वाली राशि का इस्तेमाल उत्पादन बढ़ाने के लिए जरूरी निवेश में किया जाएगा। यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार ने इस समझौते का मान रखा या नहीं।  यदि देश के शहरों में अस्पतालों में बिस्तर कम हैं तो इसलिए कि जिस समय संवेदनशील लोगों को टीके लगाए जाने थे वह समय गंवा दिया गया। भारत को गर्मियां अपर्याप्त टीकों के साथ बितानी होंगी क्योंकि सरकार अब तक यह नहीं समझ पाई है कि निजी उपक्रम कैसे काम करते हैं। नतीजा सामने है: अमेरिका ने जहां यह कहा है कि अगले दो सप्ताह में वहां सभी वयस्कों को टीके लगने शुरू हो जाएंगे, वहीं भारत अभी भी टीकाकरण के लिए 45 वर्ष की उम्र सीमा समाप्त करने को राजी नहीं है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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गड़े मुर्दे उखाड़ना यानी, त्रासदी को न्योता देना (बिजनेस स्टैंडर्ड)

शेखर गुप्ता 

जो लोग सोचते थे कि अयोध्या-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों का एकमत निर्णय आने के बाद देश के अन्य मंदिर-मस्जिद विवाद भी समाप्त हो जाएंगे, वे वाराणसी जिला अदालत के हालिया निर्णय से हिल गए होंगे। कहा जा सकता है कि भारतीय उपमहाद्वीप मध्यकालीन इतिहास के भूत इतनी जल्दी दफन होने वाले नहीं हैं।

न्यायाधीश आशुतोष तिवारी की अध्यक्षता वाली अदालत ने एक दीवानी मामले में यह अनुरोध स्वीकार कर लिया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) अध्ययन करके बताए कि क्या ज्ञानवापी मस्जिद मूल काशी-विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करके उसके ऊपर बनाई गई है। इस घटना ने अयोध्या-बाबरी मस्जिद मामले की याद दिला दी। इस बार शुरुआत न्यायालय ने की है।


मैं उन आशावादियों में से हूं जो यह मानते रहे कि अयोध्या के साथ ऐसे विवादों का अंत हो गया। भले ही उस फैसले से सब संतुष्ट नहीं थे लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने एकमत होकर निर्णय दिया था और सभी पक्ष उसका आदर करते दिखे। अब इस ताजा निर्णय को कैसे देखा जाए?


यदि आप मुझसे इस पर एक संपादकीय टिप्पणी लिखने को कहेंगे तो शायद मैं अच्छी तरह लिखे उस फैसले के एक हिस्से को उद्धृत करना चाहूंगा।


सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों ने सन 1991 के उस उपासना स्थल(विशेष प्रावधान) अधिनियम का हवाला दिया था जिसमें कहा गया था कि 15 अगस्त, 1947 को देश की स्वतंत्रता के समय जो भी पूजा स्थल हमें मिले, उनका संरक्षण किया जाएगा। कानून में अयोध्या को अपवाद बताया गया क्योंकि वह मामला पहले ही विवादित था। न्यायाधीश ने लिखा कि इसके अलावा कोई अपवाद नहीं था और न ही वैधानिक या संवैधानिक रूप से संभव था।


यदि हम सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से सीधे पैराग्राफ उठा लें तो हमारा संपादकीय कुछ इस तरह होगा। उपासना स्थल अधिनियम का हवाला देने के बाद न्यायालय ने भविष्य के लिए कानून निर्धारण करते हुए कहा, 'पीछे नहीं लौटना हमारे संविधान के मूल सिद्धांतों की एक बुनियादी विशेषता है और धर्मनिरपेक्षता भी इनमें से एक है।'


न्यायाधीश ने आगे लिखा, 'पीछे न लौटना हमारे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का एक विशिष्ट गुण है। संविधान हमारे इतिहास और राष्ट्र के भविष्य की बात करता है...हमें इतिहास का बोध होना चाहिए लेकिन हमें उसका सामना करते हुए आगे बढऩे की आवश्यकता है।' उस ऐतिहासिक निर्णय में न्यायाधीशों ने आगे कहा कि 15 अगस्त, 1947 को मिली आजादी घावों को भरने का अवसर थी।


इसके बाद न्यायाधीशों ने वापस उपासना स्थल अधिनियम के हवाले से जोर देकर कहा, 'संसद ने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि इतिहास या उसकी भूलों का इस्तेमाल, वर्तमान या भविष्य के दमन के लिए नहीं किया जाएगा।' अदालत के फैसले को तीन बिंदुओं में समझा जा सकता है:


1. विवादित अयोध्या मामले को छोड़कर 15 अगस्त सन 1947 को देश में मौजूद सभी धार्मिक स्थलों का संरक्षण किया जाएगा।


2. यदि भविष्य में संसद अपनी समझ का इस्तेमाल करते हुए इस कानून को हटाती है या संशोधित करती है तो यह निर्णय उसकी राह रोकेगा। न्यायाधीशों ने 'पीछे न लौटने' को हमारे धर्मनिरपेक्ष संविधान का मूल और उसकी बुनियादी विशेषताओं का अंग बताया जिन्हें संशोधित नहीं किया जा सकता है।


3. यह निर्णय पूरे देश, सरकार, राजनीतिक दलों और धार्मिक समूहों से आह्वान था कि वे अतीत को पीछे छोड़कर आगे बढ़ें।


इस निर्णय ने ही मुझ समेत तमाम लोगों को आश्वस्त किया कि ऐसे तमाम विवादों पर अब पूर्णविराम लग गया है। अयोध्या-बाबरी मस्जिद मामले के दौरान दो नारे खूब लगाए जाते थे, 'ये तो केवल झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है' और 'तीन नहीं हैं तीन हजार।'


पहले नारे में मथुरा और वाराणसी में मंदिरों के पास बनी मस्जिदों का जिक्र था तो दूसरा कहता था कि ऐसे एक दो नहीं बल्कि करीब तीन हजार मामले हैं जहां मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई है। नारे के मुताबिक उन सभी जगहों के लिए आंदोलन चलेगा।


सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद आशा थी कि ऐसे विचारों पर पूर्णविराम लग जाएगा। आदेश की भाषा और भावना भी यही थी। इससे हम जैसे लोगों को जो अयोध्या-बाबरी विवाद के दौरान विभाजनकारी और हिंसक दु:स्वप्न से भरे तीन दशकों से गुजरे थे, उन्हें लगा कि अब यह सब दोहराया नहीं जाएगा। वाराणसी की अदालत ने कानून की ऐसी व्याख्या की है जिस पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। इससे यह आशावाद भी धूमिल हुआ है। जाहिर है न्यायाधीश तिवारी ने या तो सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय पढ़ा नहीं है या फिर उसकी अपनी तरह से व्याख्या की है। कोई भी तार्किक न्यायाधीश या ऊपरी अदालत वाराणसी की अदालत के निर्णय को निरस्त कर देगी लेकिन कुछ सवाल तो उठते हैं।


पहला, अचानक यह बात कहां से उभरी? मथुरा मामले में भी अभी हाल ही में अदालत में अर्जी दी गई है। क्या ये कदम साझा इरादे के साथ उठाए जा रहे हैं? यदि हां तो क्या ऐसा करने वालों को विहिप, आरएसएस और भाजपा के उच्च पदस्थ लोगों का वरदहस्त प्राप्त है? आखिर में यदि वाकई ऐसा है और यदि उनका इरादा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की मूल भावना का मान नहीं रखने का है तो क्या वे किसी ऊपरी अदालत द्वारा इस आदेश को निरस्त करने के बाद भी मानेंगे?


ऐसा कुछ नहीं है जो मामले को अयोध्या आंदोलन की राह पर जाने से रोके। अब जबकि एक बार इसे आजमाया जा चुका है तो दूसरे प्रयोग में सदियां नहीं लगेंगी। इस मामले में बहुमत की चलेगी, भले ही इसके कारण एक और दशक या उससे ज्यादा समय तक खूनखराबा और उथलपुथल मची रहे। आखिर इतिहास की गलतियों को सुधारने के लिए कौन सी कीमत अधिक मानी जाएगी? 21वीं सदी के भारत में 16वीं और 17वीं सदी की लड़ाइयां दोबारा छेडऩा विनाश को न्योता देना है। यह हमारी आने वाली पीढिय़ों के भविष्य को बंधक बना लेगा।


इतिहास को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। यही कारण है कि इसका व्यापक पठन-पाठन होता है और यह इतना राजनीतिक विषय है। परंतु इतिहास की अपनी समझ के आधार पर भविष्य को प्रभावित करने वाले निर्णयों की आलोचना करना वैसा ही है जैसे किसी एक्सप्रेसवे पर सामने देखकर गाड़ी चलाने के बजाय पीछे देखने वाले शीशे पर नजर गड़ाकर वाहन चलाया जाए। ऐसे में दुर्घटना होनी तय है। इससे आपको भी नुकसान होगा और दूसरों को भी।


सुप्रसिद्ध स्तंभकर टॉम फ्रीडमैन की 2005 में आई पुस्तक 'द वल्र्ड इज फ्लैट' के जिन हिस्सों का सबसे अधिक उल्लेख किया जाता है उनमें कहा गया है कि उन देशों, कंपनियों और संगठनों के बेहतर प्रदर्शन करने की आशा है जो अपने सपनों और स्मृतियों में संतुलन बनाकर रखते हैं।


फ्रीडमैन कहते हैं, 'मुझे प्रसन्नता है कि आप 14वीं सदी में महान थे लेकिन वह तब की बात है और यह वर्तमान है। जो समाज सपनों से ज्यादा स्मृतियों में जीते हैं, वहां ज्यादातर लोग अतीत को देखने में वक्त गंवाते हैं। वे वर्तमान का लाभ लेने के बजाय अतीत में उलझे रहते हैं और वहीं अपना गौरव तलाशते हैं। वह अतीत भी प्राय: वास्तविक नहीं होता बल्कि काल्पनिक और महिमामंडित होता है। वे बेहतर भविष्य की कल्पना करने और उसके लिए प्रयास करने के बजाय अतीत से चिपके रहते हैं।'


अयोध्या मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय हमें इस दिशा की ओर यानी भविष्य की ओर ले जाता है। वाराणसी जिला अदालत और उसके निर्णय का स्वागत करने वाले हमें उलटी दिशा में मोडऩे का प्रलोभन दे रहे हैं। निर्णय हमें लेना है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' था देश में बड़ा फर्जीवाड़ा (बिजनेस स्टैंडर्ड)

मिहिर शर्मा 

दस साल पहले इसी महीने महाराष्ट्र के एक बहुत कम जाने-पहचाने कार्यकर्ता ने दिल्ली के जंतर मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया था। हजारे का प्रदर्शन बहुत ही कम समय में एक 'आंदोलन' में बदल गया। या यह कम से कम वह था, जिसमें अत्यंत उत्साही समर्थक मीडिया हमारा भरोसा चाहता था।

एक दशक बाद कृपया इस बात को स्वीकार करें कि भारत आपको ठगा गया। 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं, विशेष रूप से अरविंद केजरीवाल की महत्त्वाकांक्षाओं का एक जरिया था। यह मध्य वर्ग के लिए विरोध-प्रदर्शन में अभिनय करने का मंच था। यह सरकार को बदनाम करने और भारतीय जनता पार्टी को फिर से स्थापित करने का अभियान था।


यह उस समय भी पूरी तरह साफ था। हमेशा स्वार्थप्रेरित लोगों ने इसकी परवाह नहीं की। उन्होंने सरकार में विघ्न पैदा करने वाली हर चीज को सहमति दी। निराश भोले-भाले लोगों ने अपनी आंखें मूद लीं। इस तथाकथित आंदोलन के एक अग्रणी नेता प्रशांत भूषण ने हाल में 'दी वीक' को बताया, 'मैं इस चीज को करीब से नहीं देख रहा था कि कौन समर्थन दे रहा है और कैसे...मैं उस दौर को लेकर कह सकता हूं कि आरएसएस और भाजपा बहुत ही व्यवस्थित, संगठित और सोचे-समझे तरीके से आंदोलन को समर्थन दे रहे थे ताकि कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया जा सके... केजरीवाल को इस चीज का पता रहा होगा क्योंकि उन्होंने बहुत सोच-समझकर बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर का समर्थन लिया था, जो बाद में भाजपा से संबद्ध निकले।'


मीडिया भी काफी हद तक दोषी है। इसने इन आंदोलनों को अनवरत, अथक और अत्यधिक समर्थन देकर प्रचारित-प्रसारित किया। उस साल के मेरे नोट्स में लिखा है कि एक मौके पर हजारे ने 12 घंटे में 17 'विशेष' साक्षात्कार दिए। संप्र्रग-2 में मीडिया को बस एक ही खुमार था- ऐसी कहानी, जिसे विद्रोह, रंग दे बसंती, मध्य वर्ग बनाम राजनेता के दृष्टिकोण से पेश किया जा सके। यह जनता में विद्रोह की आग पैदा करना चाहता था और इसमें पूरी ताकत से घी भी झोंका।


एनडीटीवी के 'इंडियन ऑफ दी इयर 2011' में बरखा दत्त ने अरविंद केजरीवाल से पूछा कि क्या वह भारतीयों के दिलों में एक खास जगह बनाने में सफल रहे हैं और अगर हां तो कैसे। इस पर केजरीवाल ने यह दिखाने की कोशिश की कि वह अपने बलबूते इस मुकाम पर पहुंचे हैं और वह इस समझौतापरक मीडिया की देन नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वह यहां सवालों के जवाब देने के लिए नहीं बल्कि अपनी बातें रखने के लिए आए हैं। इसके बाद उन्होंने उपस्थित जनसमूह से कहा कि उन्होंने भारतीयों के साथ एक विशेष संपर्क सूत्र बनाया है और वही असली पुरस्कार विजेता हैं। मीडिया धोखेबाजी को सहारा देता है, धोखेबाज दावा करते हैं कि वह मीडिया से स्वतंत्र हैं, मीडिया लगातार धोखेबाजों को दिखाता है। वह लगातार वह काम कर रहा है, जो मीडिया ने उससे करने को कहा है।


हालांकि केजरीवाल एक तरीके से सही थे। पुरस्कार के असली हकदार तमाशबीन लोग ही थे। ऐसा लगता है कि उन सभी ने दृढ़ प्रण कर लिया था कि वे खुद को ठगा जाने और हंसी का पात्र बनाया जाने के बावजूद अपनी आंखों के सामने मौजूद सबूतों की अनदेखी करेंगे। यहां तक कि उस समय भी, जब मीडिया ने यह सुनिश्चित करने की पुरजोर कोशिश की कि अनशन का वास्तविक विजेता नरेंद्र मोदी है। एक मौके पर टाइम्स नाऊ के न्यूजआवर के पैनल में शामिल एक व्यक्ति ने केजरीवाल से मोदी के बारे में पूछने की कोशिश की। मगर शो के एंकर अर्णव गोस्वामी ने हस्तक्षेप करते हुए सवाल को काट दिया और कहा कि यहां मोदी नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की बात हो रही है।


भूषण ने कहा, 'यह सरकार भ्रष्टाचार, फासीवादी नीतियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के विनाश में कांग्रेस सरकार से बहुत अधिक खराब है। हमें बीते समय से सबक लेकर भविष्य को देखना चाहिए था।' क्या आप भी ऐसा सोचते हैं?


वर्ष 2021 में भारत को लोकलुभावनवाद मिला है, लेकिन यह वास्तविक है, इंडिया अगेंस्ट करप्शन जैसा फर्जी नहीं। हमारे यहां एक प्रणाली है, जिसमें हमने संप्रग के वर्षों मेें अदालतें, सीबीआई, सीएजी जैसे प्रत्येक नियंत्रण एवं संतुलन बनाए थे, उन्हें निष्प्रभावी कर दिया गया है और सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा बना दिया गया है। हमारे पास ऐसा मीडिया है जिसे डरा-धमकाकर शांत एवं सहमति देने को मजबूर कर दिया जा रहा है। हमारे यहां पक्षपात, हिंसा और डराने-धमकाने की घटनाएं हो रही हैं। लेकिन 2011 के हजारे के प्रशंसकों को इससे कोई आपत्ति नहीं है। यह 'आंदोलन' भ्रष्टाचार को लेकर नहीं था।


न्यायाधीशों, वामपंथी कार्यकर्ताओं, साहसी नियामकों और मीडिया के लिए कोई खेद नहीं है। ये वही लोग है, जिन्होंने वास्तव में लोकलुभावनवाद की जीत की मांग की थी।


एक दशक पहले के मुखर 'स्वतंत्र' नायक अगली सरकार द्वारा मुहैया कराए गए आरामदेह पदों पर बैठकर शांत हो गए हैं। इनमें विनोद राय जैसे लोग शामिल हैं। राय ऐसे ऑडिटर थे, जो ठीक से गणना नहीं कर सके। क्या आपको वह याद हैं? अब कौन 'काल्पनिक घाटे' के बारे में बात करता है? जो लोग वर्ष 2011 में अज्ञात और अपुष्ट भ्रष्टाचार को लेकर पूरे जोश से सामने आए थे, वे 2021 में उस समय ठंडे पड़ गए हैं, जब फ्रांस के मीडिया की खबरें राफेल सौदे को लेकर सवाल पैदा कर रही हैं। लेकिन ये वही लोग हैं, जिन्होंने संप्रग के दौरान देश को पूरी गंभीरता से कहा था कि पार्टी अध्यक्ष से कमजोर प्रधानमंत्री होना उदार लोकतंत्र की सबसे खराब चीज है। हम धीरे-धीरे अनुदार निरंकुशता की तरफ बढ़ रहे हैं। इंडिया अगेंस्ट करप्शन भारत में फर्जीवाड़ा था। लेकिन उसने एक अहम मकसद पूरा किया है। इसने यह खुलासा कर दिया है कि जिन लोगों ने इसका भरपूर समर्थन किया था, वे या तो ठगे गए लोग या समर्थक या हठी थे।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Saturday, April 10, 2021

प्रदर्शन की सार्थकता? ( बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन  

एक लोकप्रिय विरोध प्रदर्शन जो अखबारों की सुर्खियों से हट चुका है उसके विफल होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। दिल्ली के इर्दगिर्द किसानों की कम होती तादाद को देखिए। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में 20 माह की कड़ाई के सफल होने के संकेत हैं। हालांकि जब तक कड़ाई लागू है तब तक कोई अनुमान लगाना जोखिम भरा है लेकिन कुछ बातें निर्विवाद हैं। आखिरी बार आपने लोकपाल के बारे में कब सुना था? सन 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रदर्शनकर्ताओं की प्रमुख मांग यही थी। सोवियत संघ के पतन के बाद जब दुनिया की कई सरकारें संवेदनशील दौर से गुजर रही थीं तब कश्मीरी अलगाववादियों को लगा था कि उन्हें आसानी से जीत मिलेगी। उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि अगले तीन दशक में लोगों को भीषण प्रताडऩा से गुजरना होगा और उनकी स्वायत्तता भी छिन जाएगी।


हकीकत यह है कि राज्य सत्ता ने स्वयं को अधिक आक्रामक ढंग से प्रभावी बनाया है। यहां तक कि सड़कों पर होने वाले जनांदोलन भी एक के बाद एक विभिन्न देशों में नाकाम हो रहे हैं। म्यांमार, बेलारूस, चीन का हॉन्गकॉन्ग और रूस इसके उदाहरण हैं। इसकी तुलना सन 2000 से 2012 के बीच यूगोस्लाविया और यूक्रेन, जॉर्जिया और किर्गिजस्तान में कलर रिवॉल्यूशन (पूर्व सोवियत संघ के विभिन्न देशों में हुए आंदोलन) तथा अरब उभार से कीजिए जिसमें ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया और यमन में लंबे समय से काबिज सत्ताधारी उखाड़ फेंके गए। दुनिया के अन्य हिस्सों में व्यापक आंदोलन का भी यही हाल रहा। पूर्व सोवियत संघ के देशों में हुए आंदोलन मोटे तौर पर शांतिपूर्ण रहे लेकिन इसके बावजूद वहां चुनावी धोखाधड़ी के आरोपी अलोकप्रिय नेताओं को हटाने में कामयाबी मिली। परंतु अब म्यांमार में इसका उलट देखने को मिल रहा है जहां सेना ने हस्तक्षेप किया क्योंकि उसे चुनाव नतीजे रास नहीं आए। देश के प्रदर्शनकारी गोलियों का सामना करने को तैयार हैं। बेलारूस में 30,000 लोगों को हिरासत में लिया गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। राज्य की बर्बरता ने अलेक्सान्द्र लुकाशेंको जैसे शासकों को सत्ता में बने रहने में मदद की जबकि उनके पूर्ववर्ती 15 वर्ष पहले भाग खड़े हुए थे। यूगोस्लाविया में प्रतिबंध कारगर साबित हुए थे लेकिन ईरान और रूस उनसे बेअसर रहे। म्यांमार के पिछले और मौजूदा दोनों शासनों पर प्रतिबंध लगाए गए लेकिन दोनों ही अवसरों पर यह बेअसर रहे। कुछ देशों में इन बंदिशों ने प्रतिबंध लगाने वाली अर्थव्यवस्थाओं को भी नुकसान पहुंचाया है। शायद परिदृश्य में इस बदलाव को बदलते शक्ति संतुलन से समझा जा सकता है। एक संक्षिप्त एक ध्रुवीय समय में अमेरिकी प्रभाव ने केंद्रीय यूरोप और कॉकेशस के देशों में सत्ता परिवर्तन में मदद की। उस दौर में बर्लिन की दीवार ढही थी और रूस इस स्थिति में नहीं था कि अपने आसपास हालात नियंत्रित कर सके। अब ऐसा नहीं है। रूस और चीन यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अमेरिका समर्थित लोकतंत्र आंदोलन और व्यवस्था परिवर्तन दोहराए न जाएं। रूस ने विपक्षी नेता एलेक्सी नावन्ली को जेल में डाल दिया है और सीरिया में अमेरिका को रोक दिया है। तुर्की में रेचेप एर्दोआन पश्चिम को नाराज करते हैं लेकिन राष्ट्रपति पुतिन से उनके रिश्ते काफी मधुर हैं। बेलारूस में लुकाशेंको के सफल समर्थन के बाद पुतिन ने म्यांमार में भी दखल दिया है। उन्होंने किर्गिजस्तान में सत्ता परिवर्तन की राह बनाई और लीबिया में परोक्ष हस्तक्षेप किया। चीन भी अब हॉन्गकॉन्ग में अंब्रेला क्रांति (प्रदर्शनकारियों ने छातों का इस्तेमाल किया था) को बरदाश्त करने का इच्छुक नहीं दिखता। उसे शिनच्यांग में बरती गई कड़ाई को लेकर पश्चिम की प्रतिक्रियाओं की भी परवाह नहीं है।


क्रांति की शुरुआत करना, उसे राह दिखाने की तुलना में आसान है। यही कारण है कि कई जगह सत्ता परिवर्तन निरंकुश शासकों को हटाने वाले नागरिकों के लिए बेहतर नहीं साबित हुआ। किर्गिजस्तान में 2005 की ट्यूलिप क्रांति के बाद से हिंसा और अशांति बरकरार है। लीबिया की हालत खराब है, मिस्र में एक अधिनायकवादी शासक की जगह दूसरे ने ले ली है और यमन गृह युद्ध में उलझा है। सीरिया बरबाद हो चुका है, लेबनान का 2005 की सीडर क्रांति के बाद देश शासन लायक रह नहीं गया। यूक्रेन में विक्टर यानुकोविच को हटा दिया गया लेकिन वह सत्ता में वापस आए। यह बात और है कि उन्हें फिर हटा दिया गया। इतिहास बताता है कि क्रांति अपनी ही संतानों को खा जाती हैं। यदि आप विडंबना तलाश रहे हैं तो अजरबैजान प्रदर्शनकारियों को दूर रखने में कामयाब रहा जबकि पड़ोसी देश अर्मेनिया की सरकार 2018 में सत्ता से बेदखल कर दी गई। परंतु अजरबैजान ने हाल ही में अर्मेनिया के साथ एक छोटी लड़ाई में जीत हासिल की है। ऐसे में सवाल यह है कि कौन सा प्रदर्शन, कहां का लोकतंत्र, किसकी क्रांति और किस कीमत पर सफलता?

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कारोबारी मालिकों के बीच शक्ति विभाजन की शाश्वत समस्या ( बिजनेस स्टैंडर्ड)

कनिका दत्ता 

कारोबार मालिकों और पेशेवर प्रबंधन के बीच शक्तियों के बंटवारे का मसला भारतीय कारोबारी संचालन से जुड़ी बहसों का शाश्वत विषय है। बीते दिनों में दो अवसरों पर इसकी याद आई। पहला अवसर था अनीश शाह को महिंद्रा ऐंड महिंद्रा का सीईओ और प्रबंध निदेशक बनाया जाना। यह तब हुआ जब आनंद महिंद्रा ने वाहन से लेकर प्रौद्योगिकी क्षेत्र तक विस्तारित इस समूह के गैर कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका अपना ली। दूसरा मौका था बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के अध्यक्ष अजय त्यागी द्वारा यह याद दिलाया जाना कि शीर्ष 500 सूचीबद्ध कंपनियों में से अब तक केवल आधी कंपनियों ने उस आदेश का पालन किया है जिसमें सेबी ने कहा था कि 1 अप्रैल, 2022 तक अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक के पदों को अलग-अलग कर दिया जाए। त्यागी ने कहा कि वह अर्हताप्राप्त सूचीबद्ध कंपनियों से कह चुके हैं कि वे इस बदलाव के लिए पहले ही तैयारी कर लें।


सेबी ने कारोबारी संचालन पर कोटक समिति की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए इसके लिए 1 अप्रैल, 2020 की तारीख तय की थी लेकिन महामारी के कारण इसे आगे खिसकाया गया। सेबी के नियम से समिति की अनुशंसा में संशोधन किया गया जिसने कहा था कि 40 फीसदी सार्वजनिक अंशधारिता वाली हर सूचीबद्ध कंपनी को अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक का पद अलग रखना चाहिए। बाजार नियामक ने बाजार पूंजीकरण के हिसाब से शीर्ष 500 कंपनियों पर नियम लागू किया और कहा कि बोर्ड का अध्यक्ष एक गैर कार्यकारी निदेशक होगा और कंपनी अधिनियम की परिभाषा के तहत वह प्रबंध निदेशक और सीईओ का रिश्तेदार नहीं हो सकता।


कंपनियों को प्रवर्तकों के नियंत्रण से बाहर करने की दिशा में यह दिलचस्प प्रयास है। यह नियम सन 1992 में ब्रिटेन में कारोबारी संचालन पर बनी समिति पर आधारित है जिसे इसके अध्यक्ष सर एड्रियन कैडबरी के नाम पर कैडबरी कमेटी के नाम से जाना जाता है। रिपोर्ट को दुनिया भर में कारोबारी संचालन और प्रभावित कॉर्पोरेट संचालन ढांचे की बाइबल के रूप में जाना जाता है। त्यागी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में प्रवर्तक अत्यंत ताकतवर हैं। उन्होंने कहा कि यह नियम प्रवर्तकों की स्थिति कमजोर करने के बजाय कारोबारी संचालन में सुधार करेगा। उन्होंने कहा कि भूमिकाओं के अलग-अलग होने से एक व्यक्ति में अधिकारों का केंद्रीकरण कम होगा और हितों का टकराव नहीं होगा।


पहली बात सही है लेकिन दूसरा बिंदु भारतीय संदर्भ में खुला प्रश्न बना रहेगा। हितों में टकराव की दलील अंशधारकों के हित बनाम प्रवर्तक या मालिक के हित की बात बन जाएगी। इस दलील से हम यह मानकर चल रहे हैं कि स्वतंत्र प्रबंध निदेशक अंशधारकों का प्रतिनिधित्व करता है और उसके पास यह शक्ति है कि वह कंपनी को दबदबे वाले प्रवर्तक-अंशधारक से बचाए, भले ही वह गैर कार्यकारी क्षमता में काम कर रहा हो।


प्रबंध निदेशक की नियुक्ति प्राय: प्रवर्तक की मंजूरी से की जाती है, भले ही यह बोर्ड के माध्यम से की जाए। उदाहरण के लिए यह सोचने वाली बात है कि क्या बी मुत्तुरामन जो उस वक्त टाटा स्टील के प्रबंध निदेशक और उपाध्यक्ष थे, क्या वह अध्यक्ष रतन टाटा से यह कह सकते थे कि वह 2007 में कोरस स्टील के लिए बोली न लगाएं? जबकि कुछ विश्लेषक और यहां तक कि शेयर बाजार भी समझ रहा था कि यह एक गलत निर्णय है। सन 2016 में जब साइरस मिस्त्री ने इस निर्णय की तीखी आलोचना की थी तब मुत्तुरामन ने उस निर्णय को सुविचारित बताते हुए उसका जमकर बचाव किया। ध्यान रहे कि मुत्तुरामन के पूर्ववर्ती जे जे इरानी ने इस सौदे को एक आकांक्षापूर्ण गलती करार दिया था। यहां कॉर्पोरेट बोर्ड की भूमिका पर सवाल उठता है। बोर्ड की क्या आवश्यकता है? व्यापक सिद्धांत के मुताबिक तो प्रबंधन को उनकी विशेषज्ञता का लाभ दिलाने के अलावा यह अंशधारकों को सुरक्षित रखने का एक और जरिया है।  इसके बावजूद टाटा स्टील के बोर्ड जैसे ताकतवर बोर्ड ने कोरस के अधिग्रहण को मंजूरी दी। तथ्य तो यह है कि विभिन्न मामलों में बोर्ड अपनी भूमिका का निर्वहन करने में विफल रहे हैं। सन 2008 में सत्यम के मामले से लेकर 2012 में आईसीआईसीआई बैंक और 2018 में आईएलऐंडएफएस तक के उदाहरण बताते हैं कि आखिर क्यों अब स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका मजबूत करने पर इतना बल दिया जा रहा है। लेकिन यह भी बस मृगतृष्णा है। बोर्ड की नियुक्तियों को अंशधारक मंजूरी देते हैं लेकिन तथ्य यही है कि बोर्ड सदस्य अध्यक्ष या प्रबंध निदेशक के मित्र या सहयोगी होते हैं। क्या उनसे यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे अपनी नियुक्ति करने वाले प्रवर्तक या प्रबंध निदेशक की उपस्थिति में स्वतंत्र रूप से काम कर सकेंगे?


यही दलील ताकतवर पेशेवर सीईओ पर भी लागू होती है। आईसीआईसीआई बैंक बोर्ड ने चंदा कोछड़ द्वारा अपने पति के कारोबारी हितों के लिए ऋण देने से उत्पन्न हितों के टकराव में जिस अपारदर्शिता से काम किया वह एक उदाहरण है। इसी तरह आईएलऐंडएफएस का बोर्ड बुनियादी क्षेत्र की फाइनैंसिंग में रवि पार्थसारथि के खराब कार्य व्यवहार को लेकर बहुत जिज्ञासु नहीं दिखा। राणा कपूर के सौदों को लेकर येस बैंक बोर्ड का भी यही व्यवहार रहा। लार्सन ऐंड टुब्रो के ए एम नाइक उन पेशेवरों में से एक हैं जो कंपनी को रसूखदार अंशधारकों मसलन धीरूभाई अंबानी की रिलायंस और एवी बिड़ला समूह से बचाने में कामयाब रहे। इन दोनों ने एलऐंडटी का अधिग्रहण करने का प्रयास किया था। नाइक का उदाहरण बताता है कि नियम तभी अच्छे होते हैं जब उनका पालन करने वाले अच्छे हों। चाहे जो भी हो, सेबी ने जो कहा है उसका परीक्षण तब तक नहीं होगा जब तक बाजार पूंजीकरण की दृष्टि से देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज उसका पालन नहीं करती।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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टीकाकरण के लिए आंकड़ों की महत्ता ( बिजनेस स्टैंडर्ड)

अतनु विश्वास 

मेरी एक परिचित फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। वह उस समय काफी उत्साहित नजर आईं जब विश्वविद्यालय की ओर से उन्हें अपेक्षाकृत जल्दी कोविड टीके की एक खुराक मुहैया करा दी गई। हर देश को अपने सामाजिक-आर्थिक और जनांकीय ढांचे को देखते हुए टीकों की खरीद, वितरण और टीकाकरण संबंधी प्राथमिकता तय करनी होगी। भारत में यकीनन असाधारण पैमाने पर टीकाकरण हो रहा है। यह पोलियो टीकाकरण की तुलना में कई गुना बड़े पैमाने पर हो रहा है और विशेषज्ञों का मानना है कि देश में हर व्यक्ति को टीका सन 2024 तक ही लग पाएगा। अगर इस प्रक्रिया को तेज कर दिया जाए और कई कंपनियों के टीके उपलब्ध हों, तो भी टीकाकरण पूरा होने में वक्त लगेगा।

भारत में सरकार ने पहले ही टीकाकरण के शुरुआती दौर की रूपरेखा पेश कर दी है। सबसे पहले स्वास्थ्यकर्मियों को उसके बाद फ्रंटलाइन वर्कर्स तथा 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और उसके बाद 45 वर्ष से अधिक उम्र के अन्य बीमारी वाले लोगों को टीका लगाने की बात कही गई। एक अप्रैल से टीकाकरण 45 वर्ष से अधिक उम्र के हर व्यक्ति के लिए खोल दिया गया। जाहिर है टीकों के वितरण में समानता की नहीं बल्कि निष्पक्षता की आवश्यकता है और उसे कायम रखते हुए ही यह निर्धारित किया गया है कि किन लोगों को पहले टीका लगाने की आवश्यकता है। हालांकि इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है कि 45 वर्ष से कम उम्र के स्वस्थ लोगों को टीका कैसे लगेगा। क्या उन्हें यादृच्छिक ढंग से टीका लगेगा या फिर पंजीयन के क्रम में टीकाकरण किया जाएगा। या फिर उन्हें भी उनकी संवेदनशीलता के मुताबिक श्रेणीबद्ध किया जाएगा? जाहिर है टीकों के आवंटन के लिए समुचित वस्तुनिष्ठ तरीका अपनाया जाना उचित होगा।


पश्चिमी देशों में टीकाकरण की शुरुआत ब्रिटेन से हुई और 91 वर्ष की एक महिला को सबसे पहले टीका लगाया गया। दिलचस्प बात है कि जहां अधिकांश देशों ने अपने बुजुर्गों को सबसे पहले टीका लगाने का निर्णय लिया है, वहीं इंडोनेशिया ने सबसे पहले युवा और कामगार आबादी का टीकाकरण करने का निर्णय लिया। इसके लिए उसके पास अपनी दलील है। एक अहम बात यह है कि फिलहाल इंडोनेशिया के पास चीन की कंपनी सिनोवैक बायोटेक द्वारा निर्मित टीका ही है और बुजुर्गों पर उसके असर के बारे में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। चिकित्सकीय परीक्षण अभी जारी हैं और इंडोनेशिया की योजना 8-59 आयु वर्ग के 67 फीसदी लोगों को टीका लगाने की है। यह वह वर्ग है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्रिय है। इस बारे में कुछ भी कहना उपयुक्त नहीं है कि ऐसा टीकाकरण सही है या नहीं। किसी को नहीं पता कि आने वाले दिनों में हालात क्या रूप लेंगे। भारत जैसे देश में यह कतई आवश्यक नहीं है कि बुजुर्गों में संक्रमण का खतरा कम हो।


नेचर मेडिसन पत्रिका के दिसंबर अंक में एक आलेख प्रकाशित हुआ है जिसे जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय, मैरीलैंड विश्वविद्यालय और फिलाडेल्फिया के पॉलिसी मैप इंक के वैज्ञानिकों ने लिखा है। यह अमेरिका के संदर्भ में प्रभावी समुदाय स्तरीय जोखिम आधारित आकलन है। इसके लिए कुछ विशिष्ट सांख्यिकीय मॉडल इस्तेमाल किए गए जिनमें आबादी के ऐसे छोटे हिस्से का इस्तेमाल किया गया था जहां मौत के आंकड़े काफी अधिक रहे हों।


इन लेखकों ने वेब आधारित एक ऐसा कैलकुलेटर पेश किया जो अमेरिकी वयस्कों में कोविड-19 से मृत्यु के जोखिम का आकलन करता है। उन्होंने महामारी का पूर्वानुमान जताने वाले मॉडलों से सूचना ली ताकि किसी व्यक्ति के लिए जोखिम का आकलन किया जा सके। बल्कि उन्होंने सामुदायिक स्तर पर जोखिम का आकलन भी किया। यह कैलकुलेटर ऐसा है कि कोईभी व्यक्ति इसमें अपने जोखिम की जानकारी डालकर यह अनुमान प्राप्त कर सकता है कि उसके कोविड-19 से मृत्यु की क्या आशंका बनती है।


इस मॉडल से दिलचस्प परिणाम प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए 45 वर्ष का 5 फुट 8 इंच ऊंचा, काला या अफ्रीकी-अमेरिकी व्यक्ति जिसने कभी धूम्रपान न किया हो और जो फ्लोरिडा के ग्लेन सेंट मैरी टाउन में रहता हो उसके कोविड-19 से मरने की आशंका आम अमेरिकी आबादी की तुलना में 0.26 गुना होगी। यदि अन्य परिस्थितियों को स्थिर माना जाए तो 60 की उम्र में यही आशंका 1.4 गुना और 75 की उम्र में 7.1 गुना हो जाएगी। यदि 45 वर्ष का व्यक्ति धूम्रपान करता है और दिल की बीमारी से ग्रस्त है तथा उसे मधुमेह (नियंत्रित) हो तो जोखिम 0.69 गुना होगा। जबकि उसकी उम्र 75 वर्ष होने पर जोखिम 9.8 गुना हो जाएगा।


ऐसे में इस कैलकुलेटर के मुताबिक पहले जिन 10 फीसदी लोगों का टीकाकरण होना चाहिए वे बचे हुए लोगों में 10 फीसदी सर्वाधिक जोखिम वाले लोग हो सकते हैं। अगले 10 प्रतिशत लोगों में वे 10 प्रतिशत शामिल हो सकते हैं जो मृत्यु की आशंका में इसके बाद आते हैं। ऐसा मॉडल मृत्यु के जोखिम पर जोर देता है। जैसा कि हमने इंडोनेशिया के मामले में देखा, आर्थिक गतिविधियां भी टीकाकरण की प्रक्रिया में काफी महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं। खासतौर पर जब हालात सामान्य बनाने की जद्दोजहद चल रही हो। ऐसे में निष्पक्ष तरीका तो यही होगा कि मृत्यु की आशंका और अर्थव्यवस्था दोनों का ध्यान रखते हुए आकलन किया जाए। जोखिम आकलक में किसी व्यक्ति के पेशे के आधार पर आर्थिक महत्ता का आकलन किया जाना चाहिए। आर्थिक गतिविधियों और मृत्यु की आशंका को तवज्जो देने का मसला गंभीर है। इस विषय में निर्णय नीति निर्माताओं को ही करना चाहिए और मॉडल को अलग-अलग देश के हिसाब से दोबारा तैयार करना चाहिए। हकीकत यह है कि हर देश के लिए अलग मॉडल तैयार किया जाना चाहिए। इसके लिए कोविड-18 से संबंधित आंकड़ों, जनगणना के आंकड़ों और स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। कोविड-19 महामारी में आंकड़ों की बड़ी भूमिका यहां सामने आ सकती है।


(लेखक भारतीय सांख्यिकीय संस्थान कोलकाता में सांख्यिकी के प्रोफेसर हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Friday, April 9, 2021

प्रभावित न हों संबंध (बिजनेस स्टैंडर्ड)

भारत और सऊदी अरब के बीच कच्चे तेल की कीमतों को लेकर लंबे समय से चली आ रही असहमति हाल के सप्ताहों में खुलकर सामने आ गई। फरवरी में सऊदी अरब भारत को कच्चे तेल का निर्यात करने के मामले में शीर्ष चार देशों से बाहर हो गया और वहां से केवल 18 लाख टन तेल भारत आया। यानी फरवरी में इराक, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और नाइजीरिया ने सऊदी अरब की तुलना में भारत को अधिक तेल निर्यात किया। ऐसी खबरें भी सामने आई हैं कि भारत की सरकारी रिफाइनरी मई में सऊदी अरब से होने वाले तेल आयात में एक तिहाई से अधिक की कटौती करेंगी। आमतौर पर रिफाइनर हर महीने सऊदी अरब से 1.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल खरीदती हैं जो मई में घटकर 95 लाख बैरल रह जाएगा। भारत पहले ही पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) से उत्पादन कटौती को लेकर शिकायत कर चुका है। कटौती का उद्देश्य कच्चे तेल की कीमतों को कम से कम इतना बढ़ाना था जिस स्तर पर वह इन देशों को आर्थिक रूप से व्यावहारिक नजर आए। सऊदी अरब मनमाने ढंग से कहीं और अधिक कटौती की योजना बना चुका था।

हालांकि सऊदी अरब ने गत सप्ताह ओपेक बैठक में कहा कि वह कटौती को धीरे-धीरे कम होगा। भारत लगातार प्रयास कर रहा है कि कच्चे तेल के क्षेत्र में खाड़ी देशों पर उसकी निर्भरता कम हो जाए। ओपेक देशों, खासकर उसके अनाधिकारिक नेता सऊदी अरब और भारत के बीच लंबे विवाद की जड़ें एशियाई प्रीमियम की धारणा में निहित हैं जिसके तहत यह माना जाता है कि भारत, चीन, जापान और कोरिया जैसे एशियाई देशों को प्रति बैरल तेल के लिए यूरोप और उत्तरी अमेरिका के ग्राहकों की तुलना में से अधिक कीमत चुकानी चाहिए। भारत के पेट्रोलियम मंत्री छह वर्ष से ओपेक देशों के साथ यह मुद्दा उठा रहे हैं और उनका दावा है कि प्रति बैरल दो से तीन डॉलर प्रीमियम राशि वसूली जा रही है। इस विषय पर हुआ अकादमिक शोध इतने अंतर का समर्थन नहीं करता लेकिन यह भी संभव है कि ज्यादातर समय समूह उत्तरी अमेरिका और कुछ यूरोपीय उपभोक्ताओं को मामूली रियायत देता है। हाल ही में जब सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने अन्य बाजारों के लिए तेल के दाम कम किए और एशियाई देशों के लिए उसके दाम बढ़ाए तब भी भारत ने नाराजगी जताई थी। भारत के लिए दिक्कत यह है कि यदि वह ओपेक समूह से भिडऩा चाहता है तो उसे चीन और जापान समेत अन्य बड़े एशियाई आयातकों के साथ गठजोड़ बनाना होगा। इस दिशा में कुछ प्रयास किए गए हैं लेकिन साफ है कि बड़े एशियाई खरीदारों के बीच इतनी एकता नहीं है कि वे अभी ओपेक को प्रभावित कर सकें।


भारत सरकार को पेट्रोल और डीजल के ऊंचे दामों के लिए आलोचना का सामना करना पड़ रहा है और बढ़ते घाटे की भरपाई के लिए वह ईंधन करों पर निर्भर है। ऐसे में उसका यह सोचना स्वाभाविक है बड़ा और बढ़ती खपत वाला आयातक होने के नाते उसे उचित कीमत पर कच्चा तेल मिले। फिर भी अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या किसी अन्य मुल्क से निपटने के लिए ऐसा कूटनीतिक विवाद उचित है। विदेश नीति बनाने का काम पेट्रोलियम मंत्रालय का नहीं है। पाकिस्तान के प्रबंधन, आतंकवाद विरोधी सहयोग और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आवक जैसे मामलों में सऊदी अरब भारत का अहम साझेदार है। बड़ी तादाद में भारतीय प्रवासी भी वहां रहते हैं। उनके रोजगार से भारत को जरूरी विदेशी मुद्रा मिलती है। भारत और सऊदी अरब के व्यापक रिश्ते कीमतों को लेकर गैर कूटनीतिक लड़ाई से प्रभावित नहीं होने चाहिए।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कोविड 2.0 के दौर में जीएसटी वृद्धि (बिजनेस स्टैंडर्ड)

ए के भट्टाचार्य  

मार्च 2021 में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के मद में एकत्रित रकम ने सरकार के अलावा विश्लेषकों के बीच भी जश्न का माहौल पैदा कर दिया है। ऐसा होना पूरी तरह अप्रत्याशित भी नहीं है। वित्त वर्ष के अंतिम महीने में जीएसटी मद में एकत्रित 1.24 लाख करोड़ रुपये अब तक का सर्वाधिक मासिक संग्रह है। मार्च में कर राजस्व बढऩे का मतलब है कि एक महामारी वर्ष के लगातार छठे महीने में भी सरकार जीएसटी के तहत 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक राजस्व जमा करने में सफल रही है।

क्या इसका यह मतलब है कि ये जीएसटी आंकड़े उस आर्थिक बहाली की तस्दीक करते हैं जिसका इंतजार लंबे समय से हो रहा था? क्या इसका यह मतलब भी है कि जीएसटी संकलन व्यवस्था में तमाम खामियां दूर कर ली गई हैं? और आखिर में, क्या इससे केंद्र एवं राज्यों की सरकारें जीएसटी के दायरे में पेट्रोल एवं डीजल को लाने और कर दरों को तर्कसंगत बनाने के लिए प्रोत्साहित होंगी? इन सवालों के जवाब देने के किसी भी प्रयास के लिए जीएसटी कर संग्रह के बारे में गहरी समझ एवं विश्लेषणात्मक रवैये की जरूरत होगी।


पहला, यह स्वीकार करना महत्त्वपूर्ण है कि मार्च संग्रह के आंकड़े मार्च में ही संपन्न वस्तु एवं सेवा कर लेनदेन पर हुए कर भुगतान की तस्वीर नहीं पेश करते हैं। जीएसटी प्रणाली में करों का भुगतान अमूमन लेनदेन होने के एक महीने बाद होता है। यह रिटर्न जमा करने और रिफंड के समायोजन पर निर्भर करता है। लिहाजा यह मान लेना वाजिब है कि मार्च 2021 में अधिक कर राजस्व का दिखना फरवरी में संपन्न सौदों पर आधारित है। यह उस तरह का राजस्व उभार नहीं है जो किसी वित्त वर्ष के अंतिम महीने में नजर आता है।


मार्च के आंकड़ों से जीएसटी संग्रह में टिकाऊ तेजी बनी रहने के बारे में कोई भी फैसला करने के पहले मई के आंकड़े आने तक इंतजार करना चाहिए। लेकिन कोविड-19 संक्रमण फिर से बढऩे और उसकी वजह से आर्थिक गतिविधियों पर पाबंदियां लगने से ऐसे फैसले के लिए भी कुछ और महीनों तक इंतजार करना होगा।


मार्च 2021 के जीएसटी आंकड़ों को थोड़ी लंबी समयावधि के संदर्भ में रखे जाने की जरूरत है। मार्च 2021 में 1.24 लाख करोड़ रुपये का जीएसटी राजस्व मार्च 2020 की तुलना में 27 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है। और अगर आप मार्च 2021 के राजस्व की तुलना मार्च 2019 से करेंगे तो राजस्व में वृद्धि 16 फीसदी ही रह जाती है।


पहेली यहीं पर शुरू होती है। याद रखें कि आर्थिक गतिविधि की रफ्तार कोविड-19 महामारी फैलने के साथ मार्च 2020 के तीसरे हफ्ते से प्रभावित होना शुरू हुई थी। मार्च 2020 के जीएसटी आंकड़े एक महीने पहले हुए लेनदेन पर आधारित थे और उस समय आर्थिक गतिविधियां महामारी के दुष्प्रभाव से काफी हद तक मुक्त थीं। यह मानना तर्कसंगत होगा कि फरवरी 2020 की आर्थिक गतिविधियों से एक सुस्ती नजर आती थी और उस पर कोविड-19 का असर पडऩा बाकी था।


इस तरह मार्च 2021 में जीएसटी संग्रह की वृद्धि काफी हद तक असरदार नजर आती है। किसी भी स्थिति में 16 से 27 फीसदी तक की वृद्धि से हर किसी को खुश होना चाहिए, चाहे हालात जो हों। फिर भी कोरोना संक्रमण के मामले फिर से बढऩे की वजह से इसकी निश्चितता नहीं है कि वृद्धि में तेजी को अप्रैल 2021 या उसके परवर्ती महीनों में भी कायम रखा जा सकता है या नहीं।


वर्ष 2020-21, 2019-20 और 2018-19 में जीएसटी संग्रह के मासिक आंकड़ों पर करीबी नजर डालने से कई बातें पता चलती हैं। वर्ष 2019-20 में जीएसटी संग्रह भले ही कोविड के प्रतिकूल असर की चपेट में न रहा हो लेकिन समग्र राजस्व स्थिति आर्थिक सुस्ती के संकेत जरूर दे रही थी। वर्ष 2019-20 के साल में कुल जीएसटी संग्रह 2018-19 की तुलना में सिर्फ चार फीसदी ही बढ़ा था। माह-दर-माह आधार पर भी वर्ष 2019-20 में राजस्व वृद्धि पूरे साल में केवल एक बार ही दो अंकों में पहुंची थी और तीन महीनों में तो उसमें संकुचन ही देखा गया था।


यह नतीजा निकालना वाजिब है कि वर्ष 2019-20 में जीएसटी संग्रह वृद्धि कोविड-19 की वजह से सुस्त नहीं थी, बल्कि इसका कारण आर्थिक मंदी और दिसंबर 2018 में तमाम उत्पादों पर कर की दरों में कटौती करने का अनर्थकारी फैसला था। यह दोहरी मार से भी अधिक था। वर्ष 2019-20 में जीएसटी दरों में कटौती होने के अलावा आर्थिक मंदी के दौर में राजस्व संग्रह कम हुआ। संग्रह प्रक्रिया में उत्पन्न समस्याओं से भी संग्रह प्रभावित हुआ।


कोविड-19 महामारी के प्रसार से राजस्व संग्रह पर दबाव बढ़ा और वर्ष 2020-21 के पहले पांच महीनों में न केवल महामारी पर काबू पाने के लिए लगाए गए लॉकडाउन की मार पड़ी बल्कि दरों में कटौती और राजस्व संग्रह प्रक्रिया की खामियों ने भी मुश्किलें बढ़ाईं। असल में अप्रैल 2020 से लेकर अगस्त 2020 तक हर महीने में जीएसटी संग्रह कम होता गया।


जीएसटी संग्रह में वृद्धि का सिलसिला सितंबर के बाद ही शुरू हो सका। पहले तो यह बहुत अस्थिर था लेकिन दिसंबर से हालात बेहतर होने लगे। यह वृद्धि दो कारकों का नतीजा थी: आर्थिक गतिविधि की रफ्तार में क्रमिक वृद्धि और कर प्रशासन में हल्का सुधार। फर्जी बिलों की कड़ी निगरानी की जा रही थी। कर अधिकारियों ने वंचना को रोकने के लिए जीएसटी, आयकर एवं सीमा शुल्क विभागों से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए लेनदेन की निगरानी शुरू कर दी। जीएसटी संग्रह के लिए इस्तेमाल की जा रही तकनीक को भी उन्नत किया गया।


सवाल है कि जीएसटी संग्रह का भावी रुझान किस तरह का नजर आता है? कर प्रशासन में हुए सुधार आने वाले महीनों में जीएसटी संग्रह व्यवस्था के लिए लाभप्रद बने रहेंगे। लेकिन कोविड-19 मामले फिर से बढऩे से स्थिति थोड़ी बिगड़ सकती है। अहम सवाल यह है कि केंद्र एवं राज्यों की सरकारें क्या दिसंबर 2018 में की गई गलतियों को सुधारने के लिए सहमत होंगी? अगर वे जीएसटी परिषद की 31वीं बैठक में लिए गए फैसलों के दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए कर दरों को तर्कसंगत बनाने के सवाल पर गौर कर सकती हैं तो वर्ष 2021-22 में जीएसटी राजस्व में टिकाऊ वृद्धि को हासिल कर पाने की संभावना बन सकती है। इसकी शर्त बस यह है कि आर्थिक गतिविधि पर कोविड-19 के दुष्प्रभावों को काबू में रखा जाए।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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फंसे कर्ज से निपटने के लिए बैंक फिर कस रहे कमर (बिजनेस स्टैंडर्ड)

बैंकिंग साख

तमाल बंद्योपाध्याय 

कोविड-19 महामारी पसरने के बाद पिछले वर्ष कर्ज भुगतान में चूक करने वाले सभी लोगों के खिलाफ ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत कार्रवाई रोक दी गई थी। पहले सरकार ने सितंबर 2020 तक के लिए कार्रवाई रोकी और बाद में यह अवधि बढ़ाकर 24 मार्च, 2021 कर दी। अब दिवालिया न्यायालयों में ऋण शोधन अक्षमता प्रक्रिया जोर-शोर से चलेगी। हालांकि सरकार उन्हीं मामलों में यह कार्रवाई शुरू करेगी जिनमें भुगतान में चूक 1 करोड़ रुपये से अधिक हुई है। पहले यह सीमा 1 लाख रुपये थी। उन छोटे कारोबारों को राहत देने के लिए यह निर्णय किया गया है जो वित्तीय कठिनाइयों के कारण बैंकों को कर्ज लौटाने में अक्षम रहे हैं।


हालांकि परिसंपत्ति वर्गीकरण पर लगी रोक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उठा लिए जाने से बैंकों के बहीखातों पर बड़ा असर होगा। न्यायालय ने पिछले दिनों आदेश दिया था कि बैंक कर्ज की किस्तों की अदायगी से अस्थायी राहत (मॉरेटोरियम) की अवधि के दौरान ब्याज पर ब्याज नहीं वसूल सकते हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि बैंक अपनी परिसंपत्तियां आवश्यकता पडऩे पर गैर-निष्पादित परिसपंत्तियों (एनपीए) में वर्गीकृत कर सकते हैं।


कई ग्राहकों ने मॉरेटोरियम की मियाद बढ़ाए जाने की गुहार लगाई थी लेकिन न्यायालय ने कहा कि यह आर्थिक नीतियों से जुड़ा विषय है जिसे नीति-निर्धारकों एवं विशेषज्ञों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। उसने मॉरेटोरियम के दौरान ब्याज से पूर्ण छूट की मांग भी नहीं मानी और कहा कि बैंकों को भी अपने जमाकर्ताओं को ब्याज देना पड़ता है।


अब तक उन कर्जधारकों से छह महीने की अवधि के लिए ब्याज पर ब्याज नहीं लिया गया है जिन्होंने विभिन्न वित्तीय संस्थानों से 2 करोड़ रुपये तक के कर्ज लिए थे। कर्जधारकों ने विभिन्न उद्देश्यों से उधार लिए थे जिनमें लघु अवधि के ऋण, शिक्षा, आवास, उपभोक्ता वस्तु, वाहन, व्यक्तिगत एवं प्रकार के ऋण शामिल हैं। इनके ब्याज पर पर ब्याज माफ करने से वित्तीय क्षेत्र पर 6,500 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा, लेकिन सरकार ने इसे वहन करने का निर्णय लिया।


अब उच्चतम न्यायालय ने सभी आकार के ऋणों पर ब्याज पर ब्याज नहीं लेने का फरमान सुनाया है। जिन लोगों ने 2 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण लिए थे उन्हें भी ब्याज पर ब्याज का भुगतान नहीं करना होगा। बैंकों द्वारा आवंटित ऋणों में 2 करोड़ रुपये तक के ऋण की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है। 2 करोड़ रुपये से अधिक रकम के ऋणों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत है, लेकिन छोटे के आकार के ऋण के मुकाबले इन पर ब्याज कम है। जिन कर्जधारकों ने 2 करोड़ रुपये से अधिक आकार के ऋण लिए हैं बैंकों को उन्हें इस वित्त वर्ष की समाप्ति से पहले ब्याज पर ब्याज की रकम लौटानी थी। यह रकम तकरीबन 8,000 करोड़ रुपये होती है। बैंक एवं वित्तीय संस्थान सरकार से इस रकम की भरपाई चाहते हैं।


अगर सरकार मदद के लिए आगे आती है तो भी बैंकों के लिए चुनौतियां कम नहीं हैं। उन्हें वित्त वर्ष की समाप्ति से पहले दूसरी देनदारियों का निपटान भी करना था। जिस समय कर्जदाता ऋण की किस्त नहीं चुका रहे थे तब भी बैंक ऐसे ऋणों पर ब्याज दर्ज कर रहे थे क्योंकि कर्जधारक  डिफॉल्टर नहीं घोषित किए गए थे। अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने बैंकों को कर्जधारकों द्वारा किए जाने वाले भुगतान के आधार पर ऋण परिसंपत्तियों को वर्गीकृत करने की छूट दे दी है, बैंकों को ऐसे ऋणों की यथास्थिति बतानी होगी और उन्हें जमा ब्याज खाते से हटाने होंगे।


बैंकों को फंसी परिसंपत्तियों के लिए भी प्रावधान करने होंगे। ज्यादातर बैंक, खासकर बड़े आकार के निजी बैंक अपने बहीखाते पर किसी तरह के असर को कम करने के लिए प्रावधान कर चुके हैं। जिन ऋणों की किस्तें नहीं लौटाई गई हैं बैंक उन्हें आधिकारिक रूप से फंसी पंरिसपंत्तियां तो घोषित नहीं कर सकते लेकिन वे इनके लिए अपने स्तर से प्रावधान कर चुके हैं।


मार्च में बैंकों के फंसे ऋणों में कितना इजाफा हुआ होगा? यह रकम 1.2 लाख करोड़ रुपये से 2 लाख करोड़ रुपये के बीच हो सकती है। आखिर यह दायरा इतना बड़ा कैसे हो सकता है? फंसे ऋणों का वास्तविक आंकड़ा ऋणों के पुनर्गठन (भुगतान योजना में संशोधन) पर निर्भर करेगा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने के वी कामत की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। इस समिति ने कोविड-19 महामारी से सर्वाधिक प्रभावित 16 क्षेत्रों के ऋण पुनर्गठन के लिए कुछ दिशानिर्देशों की सिफारिश की थी। बैंकों को जून 2022 तक ऐसे ऋण का पुनर्गठन करना होगा।


बैंक ऐसे ऋण की पहचान कर रहे हैं जिनका पुनगर्ठन किया जाना है। मार्च अंत तक ऐसे ऋणों पर फंसी परिसंपत्ति होने का तमगा लग चुका है। अगर आरबीआई बैंकों को अगले तीन महीनों तक इन ऋणों को फंसी परिसंपत्ति घोषित नहीं करने की छूट देता है तो इनका आकार करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। अगर मार्च तक यह कवायद पूरी होने की स्थिति में यह आंकड़ा 2 लाख करोड़ रुपये तक  पहुंच सकता है।


ऋण का भुगतान रुकने की स्थिति में बैंकों को तत्काल कम से कम 15 प्रतिशत प्रावधान करना पड़ता है और शेष रकम के लिए अगले तीन वर्षों में प्रावधान करना पड़ता है। बैंकिंग उद्योग को 20,000 से 30,000 करोड़ रुपये के बीच प्रावधान करना पड़ सकता है।


अगर सरकार मॉरेटोरियम की अवधि में ब्याज पर जमा ब्याज का भुगतान कर्जधारकों को कर देती है और आरबीआई भी अपनी तरफ से मदद का हाथ बढ़ाता है तो बैंक फिलहाल कोविड-19 महामारी के असर से अपेक्षाकृत अधिक आसानी से निपट सकते हैं। ज्यादातर बैंकों ने इस झटके से उबरने के लिए बंदोबस्त कर रखे हैं। कुछ साल पहले के मुकाबले उनके बहीखाते भी तुलनात्मक रूप से मजबूत स्थिति में हैं।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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