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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Saturday, January 23, 2021

पुदुच्चेरी की दिलचस्प राजनीति और नारायणसामी की भूमिका (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस 

एक वक्त था जब कांग्रेस नेता और पुदुच्चेरी के वर्तमान मुख्यमंत्री वी नारायणसामी को उनके नारंगी बालों की वजह से बहुत दूर से पहचाना जा सकता था। अब उनकी जगह काले बालों ने ले ली है। हां, गंभीरता दिखाने के लिए बीच-बीच में कुछ भूरे-सफेद बाल भी हैं। बहरहाल, पुदुच्चेरी (और तमिलनाडु) में आगामी अप्रैल-मई में आम चुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों में नारायणसामी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

इस महीने के आरंभ में संकट को टालने के लिए ही नारायणसामी ने अपने कांग्रेस सहयोगियों के साथ खुली सड़क पर सितारों के नीचे रात बिताई। अवसर था पुदुच्चेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का। वही किरण बेदी जिन्हें नारायणसामी दुष्ट आत्मा तक बता चुके हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि कांग्रेस की चुनावी साझेदार द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) इस विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं थी। पार्टी ने केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ कांग्रेस सरकार के बुलाए विधानसभा के विशेष सत्र में भी हिस्सा नहीं लिया। वह यह दबाव बना रही है कि कांग्रेस अपने दम पर अकेले विधानसभा चुनाव लड़े। सत्ताविरोधी माहौल को देखते हुए नारायणसामी चुनावी मुद्दे की तलाश में हैं। किरण बेदी ने शायद उन्हें यह अवसर प्रदान किया है।


अन्य दावेदारों की बात करें तो ए नमशिवायम को सरकार में शामिल कर लिया गया और पूर्व मुख्यमंत्री वी वैद्यलिंगम लोकसभा में चले गए। ऐसे में कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने पार्टी में अपने विरोधियों को शांत कर लिया है लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या है द्रमुक का प्रबंधन करना। यह वह दल है जिसे कांग्रेस अपना सहयोगी मानती है। सन 2016 के विधानसभा चुनाव में इस गठजोड़ को 56 फीसदी मत मिले थे।


परंतु इस बार द्रमुक की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं। द्रमुक सांसद एस जगतरक्षकन, जो पुदुच्चेरी के प्रभारी रहे हैं, उन्होंने पिछले दिनों एक बैठक के बाद कहा कि उनकी पार्टी सभी 30 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और सारी सीटें जीतेगी। उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि वह नाकाम होते हैं तो उसी मंच पर आत्महत्या कर लेंगे। जाहिर है अगर द्रमुक जीतती है तो वह मुख्यमंत्री हो सकते हैं।


मौजूदा विधानसभा में द्रमुक के तीन विधायक हैं जबकि कांग्रेस के 15 विधायक। पड़ोसी राज्य तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (एआईएडीएमके) के पास चार सीटें हैं जबकि कांग्रेस से अलग होकर बनी अखिल भारतीय एनआर कांग्रेस के पास सात सीटें हैं। विधानसभा में 30 सीटे हैं। पुदुच्चेरी में 23, कारैक्काल में 5 तथा माहे और यनम मेंं एक-एक सीट है। ये सभी सीटें बहुत छोटे आकार की हैं जहां कुल मतदाता 15,000 से 30,000 के बीच हैं।


सन 2016 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सभी 30 सीटों पर अपने दम पर लड़ी थी लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। कांग्रेस ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 15 पर जीत हासिल हुई थी। द्रमुक नौ सीटों पर लड़ी और उसे दो पर जीत हासिल हुई। एआईएडीएमके ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे चार पर जीत हासिल हुई। एआईएनआर कांग्रेस ने सभी 30 सीटों पर प्रत्याशी उतारे और आठ पर जीती।


अधिकांश मौकों पर यही देखने को मिला है कि तमिलनाडु में जीतने वाला गठबंधन ही पुदुच्चेरी में जीतता है और परिणाम कमोबेश एक समान होते हैं। परंतु 2016 में यह रुझान उलट गया: हालांकि एआईएडीएमके को तमिलनाडु में जीत मिली और उसने सरकार भी बनाई लेकिन पुदुच्चेरी में कांग्रेस-द्रमुक गठजोड़ सत्ता में आया। इस बार गठबंधन टूटने की कोई वजह नहीं है केवल जगतरक्षकन की महत्त्वाकांक्षा ही आड़े आ रही है।


नारायणसामी पुरानी शैली के कांग्रेसी राजनेता हैं। वह शांत और समझदार हैं। सन 2016 में वह विधानसभा के सदस्य तक नहीं थे लेकिन वह चुने गए और उन्होंने पांच वर्ष तक पार्टी को एकजुट रखा। राजीव गांधी उन्हें पुदुच्चेरी से दिल्ली ले गए थे। वह महज 31 वर्ष की उम्र में राज्य सभा के सदस्य बने। एसएस आहलूवालिया, रत्नाकर पांडेय और सुरेश पचौरी के साथ वह संसद में राजीव के उस दस्ते का हिस्सा थे जिसे शोर मचाने वाला माना जाता था। नरसिंह राव के दौर में वह संसदीय दल के नेता बने। वह पहली बार तब सुर्खियों में आए जब राव के निर्देश पर सन 1996 में उन्होंने संयुक्त मोर्चा सरकार को कांग्रेस का समर्थन पत्र देने में देरी की। नतीजा यह हुआ कि अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। राव को आशा थी कि वाजपेयी की विफलता के बाद राष्ट्रपति उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे। नारायणसामी उस बड़े खेल में एक छोटा हिस्सा थे।


नारायणसामी की सबसे बड़ी प्रतिभा सतर्कता से पेशकदमी करने की है। उन्हें सभी पसंद करते हैं। उनके जीवन की शुरुआत गुलाम नबी आजाद और ऑस्कर फर्नांडिस जैसे लोगों को रिपोर्ट करने से हुई। अब वह उनसे आगे निकल चुके हैं। अहमद पटेल के साथ उनके बहुत खास रिश्ते थे। जब राहुल गांधी केवल सांसद थे तब नारायणसामी उनके आवास पर नियमित मुलाकात के लिए जाते थे।


हाल ही में सी-वोटर-एबीपी के एक पोल में कहा गया कि पुदुच्चेरी में कांग्रेस की सत्ता में वापसी मुश्किल है। कारण केवल यह नहीं है कि द्रमुक के साथ गठजोड़ टूट रहा है बल्कि राजग की बढ़ती लोकप्रियता भी इसकी वजह है। यहां राजग में भाजपा के साथ एआईएडीएमके और एआईएनआर कांग्रेस भी शामिल हैं। यदि द्रमुक कांग्रेस के साथ गठबंधन से बाहर होती है तो राजग को सत्ता में आने से रोकना मुश्किल नजर आता है। बहरहाल, अभी काफी समय बाकी है और नारायणसामी बालों को रंगीन रखें या काला, उन्हें कमतर नहीं आंका जाना चाहिए।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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ब्रॉडबैंड का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए जरूरी कदम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम पोनप्पा 

गत माह कैबिनेट ने देश भर में वाई-फाई कवरेज का विस्तार करने और ब्रॉडबैंड इंटरनेट की पहुंच और उसका इस्तेमाल बढ़ाने के लिए नीति घोषित की है। इस नीति में उल्लेख किया गया है कि कैसे विशिष्ट प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सार्वजनिक वाई-फाई हॉटस्पॉट नेटवर्क की स्थापना की जा सकती है और ब्रॉडबैंड इंटरनेट को उपयोगकर्ताओं को बेचा जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट में इसे काफी उत्साह के साथ दर्ज किया गया। हालांकि कई बार इसे लेकर भ्रामक रिपोर्टिंग भी की गई। जाहिर है दूरसंचार सेवा प्रदाताओं और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं ने इसका कड़ा विरोध किया है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि ऐसा करना उनके लाइसेंसशुदा अधिकारों का अतिक्रमण होगा। उनकी यह दलील सही प्रतीत होती है कि वे भी ऐसी ही शर्तों पर वाई-फाई हॉटस्पॉट विकसित कर सकते हैं क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में इस बात की अनदेखी कर दी गई है कि उन्होंने पहले ही इन लाइसेंस के लिए भारी धनराशि का भुगतान किया है।


नई नीति के तहत कोई भी व्यक्ति या उद्यम बिना लाइसेंस के सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें सरकार को कोई शुल्क भी नहीं चुकाना पड़ा। अब तक केवल लाइसेंसधारी दूरसंचार कंपनियां और आईएसपी ही ऐसा कर सकते थे और वे इसके लिए बाकायदा लाइसेंस शुल्क चुकाते थे। दूरसंचार कंपनियों को तो स्पेक्ट्रम भी खरीदना होता था। यही कारण है कि बिना सरकारी शुल्क के वाई-फाई सस्ता प्रतीत होता है। नई नीति के कुछ पहलू स्पष्ट नहीं हैं। उदाहरण के लिए मौजूदा कानून इंटरनेट सेवाओं को उपभोक्ताओं को दोबारा बेचने की इजाजत देते हैं या नहीं (पहले इस पर प्रतिबंध था) या फिर यह छोटे कारोबारों के लिए वाणिज्यिक रूप से कैसे व्यवहार्य होगा। दूसरे शब्दों में यदि सस्ती सेल्युलर सेवाओं तक पहुंच सुलभ होगी तो भला कोई भुगतान क्यों करेगा? एक सवाल यह भी है कि क्या रुचि होने पर गूगल, फेसबुक, एमेजॉन आदि विदेशी कंपनियों को यह इजाजत होगी कि वे संचार सेवाओं में निवेश कर सकें। खासतौर पर कॉर्पोरेट और सघन वाणिज्यिक क्षेत्रों में। इसके अलावा क्या रुचि रखने वाली भारतीय कंपनियों को ऐसा करने दिया जाएगा। इन सवालों के जवाब आवश्यक हैं।


सर्वव्यापी ब्रॉडबैंड इंटरनेट की सबसे बड़ी आवश्यकता है उच्च क्षमता वाले विश्वसनीय संचार की। यदि डेटा के प्रवाह की समुचित व्यवस्था नहीं की गई तो इसकी उपलब्धता और पहुंच बहुत सीमित रहेगी। नीतिगत बदलाव का पूरा ध्यान अंतिम उपभोक्ता पर केंद्रित है जबकि हमारी समस्याएं फाइबर कोर या सबनेटवर्क तक विस्तारित हैं। फाइबर से ग्राहक के घर तक या ग्राम पंचायत से गांव तक का मध्यम स्तर का लिंक भी नदारद है। भारतीय दूरसंचार विकास सोसाइटी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश गांव ग्राम पंचायत से 5-10 किलोमीटर के दायरे में हों।


ब्रॉडबैंड पहुंच में सुधार की आवश्यकता को स्वीकार करना होगा। इस दिशा में एक कदम यह हो सकता है कि संचार शृंखला में मौजूद कमियों को दूर किया जाए। इसमें वितरण और तकनीकी क्षेत्र की कमियां भी शामिल हैं। डिजिटल संचार का सबसे बुनियादी तत्त्व है संचार। ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा आपूर्ति की बात करें तो कहां किस तरह की आवश्यकता है, इसे लेकर योजना और क्रियान्वयन में कमी देखने को मिल रही है। ऐसा कुछ हद तक इसलिए है क्योंकि बाजार की अपेक्षा स्वसंगठित तंत्र की है जो हर जगह मौजूद नहीं है।


मध्य मील के लिए वायरलेस सेवाएं काफी करीब हैं क्योंकि स्पेक्ट्रम उपलब्ध है लेकिन भारत में उसकी इजाजत नहीं है। यह वह स्थान है जो प्रमुख नेटवर्क को स्थानीय नेटवर्क से जोड़ता है। ऐसा आंशिक तौर पर इसलिए है क्योंकि कुछ बैंड को अलग-अलग तरीके से बरतने को लेकर विवाद है। उदाहरण के लिए खुला वाई-फाई या दूरसंचार कंपनियों की सीमित पहुंच या प्रसारण या फिर केवल 4जी आदि। दूरसंचार विभाग के मुताबिक केवल लाइसेंस वाले सेवा प्रदाताओं को इन बैंड तक अबाध पहुंच की जरूरत होगी।


दूसरा पहलू विचार और सलाह-मशविरे से संबंधित है क्योंकि यहां मामला नई नीति के साथ विरोधाभास का है और एकदम अलग नीति की मांग करता है। इसके बावजूद यह अहम है क्योंकि ऐसी अहम बुनियादी सेवा में स्थिरता बरकरार रखना आवश्यक है जो जीवन, कामकाज, शिक्षा, मनोरंजन, सरकार और सुरक्षा समेत तमाम पहलुओं को प्रभावित करती है या उनसे संबंध रखती है। इसी प्रकार फिलहाल जब दुनिया महामारी से जूझ रही है और फंसी हुई परिसंपत्ति बड़ी बाधा बनी हुई है तब हमें न्यूनतम उथलपुथल के साथ उपयोग बढ़ाने की जरूरत है। क्या बेहतर नहीं होगा कि दूरसंचार कंपनियों और आईएसपी से सरकारी शुल्क समाप्त कर दिया जाए और इस क्षेत्र के लाइसेंसधारक सेवाप्रदाताओं को भी आगे बढऩे का अवसर दिया जाए? ऐसा इसलिए भी कि उनके पास बाजार में स्थापित पहुंच है, क्षमता है और अनुभव है। इससे जरूरी समय पर स्थिरता कायम रखने में मदद मिलेगी। सेवाप्रदाताओं के पास यह अधिकार है और वे विस्तार के अवसर का भी लाभ उठाना चाहेंगे। लेकिन ऐसा तभी होगा जब उन्हें संसाधन और प्रोत्साहन मिले। संसाधन के रूप में वह राशि काम आ सकती है जो लाइसेंस शुल्क नहीं चुकाने से बचेगी। सभी सरकारी शुल्क और लाइसेंस शुल्क समाप्त कर दिए जाने चाहिए। ऐसे में न केवल सेवा प्रदाता कई शहरी इलाकों में हॉटस्पॉट में निवेश करेंगे बल्कि संचार सेवा उद्योग में नई तेजी भी देखने को मिलेगी।


निष्पक्ष तरीके से देखा जाए तो सेवा प्रदाता पहले ही लाइसेंस शुल्क चुका चुके हैं और वे स्पेक्ट्रम की नीलामी की कीमत भी दे चुके हैं। ऐसे में सरकारी शुल्क इन कंपनियों के राजस्व का 30 फीसदी हो जाता है। उन्हें आयकर अलग से चुकाना होता है। 2जी घोटाले ने इस क्षेत्र की गति पूरी तरह समाप्त कर दी थी क्योंकि कुछ के खिलाफ जुर्माने ने पूरे उद्योग को भयभीत किया। स्पेक्ट्रम महंगा हो गया और उपकरणों की लागत भी बढ़ी। इन बातों का असर राजस्व पर पड़ा। परिणामस्वरूप उपभोक्ता कई सुविधाओं से वंचित हैं और उत्पादकता पर असर पड़ा है।


यदि ऐसा हो गया तो संविदा भंग के मामलों का जोखिम भी समाप्त हो जाएगा। हालांकि अतीत से प्रभावी कर की समस्या को समाप्त करना शेष रहेगा। 5जी तथा स्पेक्ट्रम का प्रबंधन करने के लिए भी रुख में व्यापक बदलाव करने होंगे। इन बदलावों के कारण उत्पन्न अंतर जिसे नई नीति कवर करती है, उसके लिए ग्रामीण इलाकों में सामुदायिक वाई-फाई नेटवर्क की आवश्यकता होगी क्योंकि शायद वे वाणिज्यिक रूप से कम आकर्षक हों और सहयोगी व्यवस्था के अभाव में उनका निर्माण और संचालन करना मुश्किल होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार को प्रोत्साहन की जरूरत होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन  

देश की विनिर्माण गाथा की विफलता को लेकर नीति निर्माता चिंतित हैं। आत्मनिर्भर भारत जैसी पहल इसकी अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति है क्योंकि यह मान लिया गया है कि बिना व्यापारिक और शुल्क संबंधी संरक्षण के देश, विनिर्माण क्षेत्र के विकास में सक्षम नहीं है। एक बार इस दिशा में बढऩे के बाद कारोबारी लॉबियां नीतियों को और अधिक संरक्षणवादी बनाने का दबाव बनाने लगेंगी। यह हो भी रहा है। उत्पादन से संबंधित प्रोत्साहन कार्यक्रम के अधीन आने वाली कंपनियां और अधिक केंद्रित लक्ष्यों की मांग कर रही हैं और कह रही हैं कि अधिक तादाद में क्षेत्रों को संरक्षण कार्यक्रम में शामिल किया जाए।


शायद अब यह स्वीकार करने का वक्त आ गया है कि भारत पूर्वी एशियाई देशों की निर्यात आधारित विनिर्माण गाथा को दोहराने नहीं जा रहा। वह शायद बांग्लादेश जैसा प्रदर्शन भी नहीं कर पाए। जैसा कि सन 2012 से हमारा आधिकारिक लक्ष्य भी है, यदि देश विनिर्माण को जीडीपी के बढ़े घटक के रूप में तैयार करता है तो यह घरेलू बाजार पर आधारित होगा और इसकी लागत भी अधिक होगी। वह लागत घरेलू उपभोक्ताओं को वहन करनी होगी जबकि अर्थव्यवस्था प्रमुख कारोबारी समूहों से बाहर रहेगा और निर्यात के मोर्चे पर नुकसान उठाएगा।


इसकी भरपाई सेवा क्षेत्र से होगी। दुनिया भर में सेवा व्यापार तीसरा सबसे बड़ा व्यापार है। भारत में यह अनुपात लगभग दोगुना यानी 60 प्रतिशत है। यदि श्रम निर्यात के कारण देश में आने वाले धन को शामिल किया जाए तो यह शायद और अधिक होगा। यह पूंजी की आवक के बजाय सेवा निर्यात से होने वाली आय है। बीते पांच वर्ष में देश के निर्यात में पारंपरिक सेवा निर्यात की भी अहम हिस्सेदारी रही है। वाणिज्यिक निर्यात की हिस्सेदारी आधी से कम रह गई है। भारत जैसी विकास अवस्था वाली अर्थव्यवस्था के लिए यह अत्यंत विशिष्ट बात होगी। इससे रुपया भी उस स्तर तक बढ़ेगा जहां विनिर्माण निर्यात बहुत महंगा हो जाएगा।


यह पसंद आए या नहीं लेकिन सेवा क्षेत्र मूल्यवद्र्धन का वह क्षेत्र है जिसके सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी तुलनात्मक लाभ तथा अन्य कौशल का लाभ उठाना होगा। देश में स्थित उपक्रम चाहे वे देसी हों या विदेशी उन्हें उनकी तकनीकी सेवा संबंधी विशेषज्ञता के कारण न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था का सेवा केंद्र बनाना होगा बल्कि नए क्षेत्रों मसलन कृत्रिम मेधा और डेटा आदि के रचनात्मक क्षेत्र में भी विशेषज्ञता हासिल करनी होगी। हमें चिप निर्माण के बजाय चिप डिजाइन करना होगा। इस क्षेत्र में अभी ताइवान, अमेरिका और कोरिया का एकाधिकार है। इसी तरह हमें विमान इंजन बनाने के बजाय उसका डिजाइन तैयार करना होगा।


भारत पहले ही उपभोक्ताओं के डिजिटलीकरण की तेज गति के साथ दुनिया को अपनी क्षमता दिखा चुका है। मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट ने इसका उल्लेख सबसे बड़े और तेज बढऩे वालों में किया। प्रति मोबाइल उपभोक्ता औसत डेटा खपत भी चीन से अधिक और कोरिया के समान है। यह जियो जैसी कंपनियों के कारण संभव हुआ क्योंकि उन्होंने सस्ता डेटा दिया। इसके अलावा कम लागत पर तत्काल भुगतान का बुनियादी ढांचा तैयार हुआ और देश में खुदरा डिजिटल भुगतान सालाना 50 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में जहां एक मंच पर एक करोड़ से अधिक उद्यम मौजूद हैं, उसे तकनीकी क्षमता मुहैया कराई गई। 1.2 अरब लोगों के पंजीयन के साथ डिजिटल पहचान व्यवस्था कायम की गई। सरकारी योजनाओं का प्रत्यक्ष लाभ दिलाने के लिए सॉफ्टवेयर पैकेज तैयार किया गया। इन मंचों का इस्तेमाल करके कई कारोबार खड़े किए गए। देश में बड़ी तादाद में यूनिकॉर्न (स्टार्टअप जिनका कारोबार 100 करोड़ डॉलर से अधिक हो) होने की यह भी एक वजह है। मूल्यांकन में उछाल अभी शुरू ही हुआ है क्योंकि निवेशक  पैसा लगा रहे हैं। औद्योगिक संगठन नैसकॉम का कहना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था 10 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है। उसका कहना है कि हर पांचवीं स्टार्टअप वैज्ञानिक या अभियांत्रिकी संबंधी चुनौतियों के हल पर केंद्रित है और यह सबसे तेज विकसित होने वाला हिस्सा है। बड़े उद्यमों को डेटा विश्लेषण मुहैया कराया जा रहा है और पहली स्टार्ट अप विदेशी बाजारों में प्रवेश कर चुकी है। उत्पादकता में व्यापक सुधार हो सकता है। यदि समुचित विपणन नीतियां तैयार की गईं तो कृषि क्षेत्र की आय में भी सुधार हो सकता है। बिचौलियों की कीमत पर उत्पादक का मूल्यवर्धन करके ऐसा किया जा सकता है।


इस मॉडल पर बनी अर्थव्यवस्था में कुशल-अकुशल कर्मियों की तुलना में पेशेवर कामगार बढ़ेंगे। इससे कम शिक्षित तबके को नुकसान होगा क्योंकि उसका जीवन अनिश्चित होगा। संपत्ति अधिक संकेंद्रित होगी। वित्त मंत्री के लिए अंतिम स्तर पर वित्तीय हस्तांतरण अपरिहार्य हो जाएगा। यदि शीर्ष पर संकेंद्रित संपत्ति पर कर नहीं लगाया गया तो यह फंडिंग मुश्किल होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Friday, January 22, 2021

भविष्य की ओर (बिजनेस स्टैंडर्ड)

अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के शपथ-ग्रहण समारोह का विवादों एवं शोर-शराबे से मुक्त होना यह आभास देता है कि दुनिया की इकलौती महाशक्ति में हालात सामान्य होने लगे हैं। दो हफ्ते पहले सत्ता पर कब्जा जमाने की पिछले राष्ट्रपति की कोशिश के मद्देनजर ऐसी सोच भ्रामक हो सकती है। इस नए अमेरिका का सौम्य रूप देश की पहली अश्वेत एवं दक्षिण एशियाई महिला उपराष्ट्रपति के तौर पर कमला हैरिस के शपथ में भी दिखा। नए राष्ट्रपति जोसेफ बाइडन ने खतरे की आशंका के बावजूद शपथग्रहण समारोह परंपरा के अनुरूप खुली जगह पर आयोजित कर स्थिति सामान्य होने का संदेश देने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने अपने जज्बाती भाषण में अमेरिका के समक्ष पेश आने वाली चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने चुनाव नतीजों पर मुहर लगाने के लिए गत 6 जनवरी को बुलाई गई कांग्रेस की बैठक के दौरान 'कैपिटल हिल' पर धावा बोलने की नाकाम कोशिश का परोक्ष जिक्र करते हुए कहा, 'लोकतंत्र जिंदा बच गया है।' भले ही बाइडन या मंच पर मौजूद किसी दूसरे शख्स ने 45वें राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का नाम नहीं लिया लेकिन परंपरा को धता बताते हुए शपथग्रहण समारोह से दूर रहने वाले ट्रंप का साया चारों तरफ नजर आया।


बाइडन ने अपने पूर्ववर्ती की विभाजनकारी विरासत का खुलकर जिक्र  किया। उन्होंने नस्ली इंसाफ को आवाज देने और राजनीतिक अतिवाद, श्वेत श्रेष्ठता एवं घरेलू आतंकवाद को परास्त करने की भी बात कही। उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रमुख चुनावी वादों पर अमल करने की बात भी कही जिनमें पेरिस जलवायु समझौते का फिर से हिस्सा बनना और कम कठोर आव्रजन नीति भी शामिल है। लेकिन उन्होंने अपना एजेंडा महान अमेरिकी स्वप्न के हिस्से के तौर पर पेश करने की कोशिश की जिसे सिर्फ एकजुट देश में ही हासिल किया जा सकता है। उन्होंने एकता की अपील करने के साथ यह कहते हुए असहमति की सीमा भी तय कर दी कि, 'वह लोकतंत्र है। वह अमेरिका है। हमारे गणतंत्र की सुरक्षा दीवारों के भीतर शांतिपूर्ण तरीके से असहमति जताने का अधिकार शायद इस देश की सबसे बड़ी ताकत है।' उन्होंने कोविड-19 संकट से निपटने के ट्रंप के क्रूर तरीकों से भी खुद को अलग करते हुए महामारी में मरे 4 लाख अमेरिकी नागरिकों की याद में कुछ पलों का मौन रखा।


बाइडन ने कार्यकाल के पहले ही दिन 17 कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए। इनमें से कई आदेश एच1बी वीजा समेत आव्रजन, किफायती स्वास्थ्य देखभाल, पर्यावरण, रोजगार एवं अर्थव्यवस्था पर ट्रंप की कट्टर नीतियों को पलटने वाले भी हैं। लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी एवं रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं के बीच समारोह में नजर आई गर्मजोशी एवं हल्के-फुल्के अंदाज को बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। बाइडन का सीनेट में कई दशकों के अपने कार्यकाल के दौरान विरोधी दल के साथ भी बढिय़ा संबंध रहा है लेकिन ट्रंप को रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों में तगड़ा समर्थन हासिल है और 6 जनवरी की निर्णायक मंजूरी के समय यह नजर भी आया था। भले ही डेमोक्रेट सांसदों के पास दोनों सदनों का नियंत्रण है लेकिन प्रतिनिधि सभा में उसे मामूली बढ़त ही हासिल है।


ट्रंप पर महाभियोग सुनवाई करना सीनेट का शुरुआती काम होगा। उसका नतीजा बाइडन के कार्यकाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण की सीमा तय करेगा और वैश्विक राजनीति के लिए भी उसके कई अहम संकेत होंगे। मुख्यत: अमेरिकी अवाम पर केंद्रित अपने उद्घाटन भाषण में बाइडन ने यूरोप एवं एशिया के अपने सहयोगी देशों को भी भरोसा दिलाया। ट्रंप ने अमेरिका को एक गैर-भरोसेमंद सहयोगी के तौर पर पेश करने के साथ ही दुनिया भर में व्हाइट हाउस की साख गिराने वाले तमाम काम किए हैं। इस निचले स्तर से अमेरिका को फिर से महान राष्ट्र बनाने के लिए अमेरिका के सबसे उम्रदराज राष्ट्रपति को बहुत कुछ करना होगा।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कोविड टीकाकरण शुरू होने के बाद न्याय क्षेत्र का परिदृश्य? (बिजनेस स्टैंडर्ड)

एम जे एंटनी  

कोरोनावायरस के कारण जो अनिश्चितता पैदा हुई, उसके चलते महीनों तक अर्थशास्त्रियों, चुनाव नतीजों का पूर्वानुमान जताने वालों और भविष्य बताने वालों को खूब तवज्जो मिली। यह बात तो निश्चित है कि निकट भविष्य में हालात सुधरने वाले नहीं हैं और उनकी मांग बरकरार रहेगी। इस संदर्भ में न्यायपालिका की बात करें तो वह अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहेगी। यह अच्छा होगा या बुरा, वह बाद की बात है। उदाहरण के लिए यह निश्चित है कि तीन महीनों में सर्वोच्च न्यायालय को नया मुख्य न्यायाधीश मिलेगा और शायद एक ऐसा दौर आएगा जहां परेशानियां कम होंगी।


लॉकडाउन के 11 महीने बाद धीरे-धीरे अदालतों में भौतिक रूप से कामकाज आरंभ हो जाएगा। मुंबई और उत्तराखंड जैसे कुछ उच्च न्यायालय पहले ही इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। अधिकांश अदालतों ने आभासी सुनवाई के साथ काम करना सीख लिया है। हालांकि पिछले सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीश सुनवाई में तकनीकी बाधाओं से इतने नाराज हुए कि उन्होंने अपने आदेश में भी इसे दर्ज किया।


गत वर्ष मार्च में लॉकडाउन के बाद विधिक पेशे के एक बड़े तबके और वादियों ने यह पाया कि आभासी अदालतें लाभदायक हैं और उन्हें व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। अधिवक्ता एक ही दिन दुनिया की कई अदालतों में बहस कर सकते हैं और वादियों को समय और पैसा खर्च करके अदालतों में नहीं पहुंचना होता है। ऐसे में एक सुरक्षित पूर्वानुमान यह है कि सामान्य अदालतों के साथ-साथ आभासी अदालतें भी बरकरार रहेंगी।


अदालतों और पंचाटों ने महामारी के दौरान यथास्थिति बरकरार रखने और स्थगन आदेश जैसे अंतरिम आदेश देना जारी रखा। उन्होंने प्रतिबंधात्मक नियमों को भी शिथिल किया था। अब वे धीरे-धीरे मानकों को ऊंचा कर रहे हैं, जैसा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गत सप्ताह किया। दूसरी ओर जिन लोगों को नियमों की शिथिलता का लाभ मिला उनके इर्दगिर्द घेरा अब तंग होगा।


अतीत के प्रदर्शन पर नजर डालें तो यह माना जा सकता है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बजट न्यायपालिका के लिए बहुत मामूली खुशियां लेकर आएगा। न्यायाधीश लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि अदालतों और न्यायालयों का बुनियादी ढांचा फंड की कमी से जूझ रहा है। न्यायपालिका को दशकों से 2 फीसदी की हिस्सेदारी मिल रही है। चूंकि वीडियो कॉन्फ्रेंस और लाइव स्ट्रीमिंग में अधिक निवेश की आवश्यकता है इसलिए हालात का खराब से खराब होना तय है। ऐसे में एक और बात बिल्कुल तय है कि सैकड़ों कैदी बिना जमानत या परीक्षण के जेलों में बंद रहेंगे। देश की जेलों में क्षमता से 14 प्रतिशत अधिक कैदी बंद हैं। हर तीन में से दो कैदी परीक्षणाधीन हैं। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय का वह हालिया आदेश भी फलीभूत नहीं हो पाएगा जिसमें उसने कहा है कि सांसदों और विधायकों (कुल 4,442) के ऊपर चल रहे आपराधिक प्रकरणों को छह महीने में निपटाया जाए। इसके अलावा यह अनुमान भी उचित ही जताया जा सकता है कि लॉकडाउन के महीनों के दौरान सामने नहीं आए मामले अब तेजी से उभरेंगे।


इस बात की काफी संभावना है कि सर्वोच्च न्यायालय में सरकार को जीत मिलने का सिलसिला जारी रहेगा। अयोध्या, आधार, जम्मू कश्मीर में संचार सेवाओं को ठप करना और सेंट्रल विस्टा परियोजना आदि इस बात का संकेत हैं। अनुच्छेद 370 का प्रश्न, चुनावी बॉन्ड और नोटबंदी आदि मामले भी ऐसा ही संकेत देते हैं। देश के इतिहास मेंं इससे पहले कभी न्यायाधीशों से इतने संवेदनशील मामलों का निर्णय करने को नहीं कहा गया। मिसाल के तौर पर कश्मीर (140 याचिकाएं लंबित), नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, आरक्षण में आरक्षण, लव जिहाद आदि इसके उदाहरण हैं। उच्च न्यायालयों के समक्ष सुर्खियों वाले मामलों का पेश होना जारी रहेगा। न्यायिक निर्णयों में मानवाधिकारों को लेकर बातें लंबी होती जाएंगी, हालांकि याचिकाओं में राहत मिलने की आशा कम है।


सरकार को मिलने वाले न्यायिक लाभ ने एक नया रुझान शुरू किया है जिसमें सामान्य लोगों ने न्यायाधीशों के बारे में अपनी राय बनानी शुरू कर दी है। इसका असर न्यायपालिका को लेकर लोगों के मन में बनी पारंपरिक छवि और आदर को नुकसान पहुंचाया है। इससे पहले न्यायाधीशों की आलोचना कानूनविदों और ऐसे टीकाकारों तक सीमित थी जो भाषा के इस्तेमाल में सावधानी बरतते थे। अब तो कार्टून बनाने वाले और ट्विटर पर भी उनकी आलोचना शुरू हो गई है। आने वाले सप्ताह में उनमें से कुछ को न्यायिक अवमानना के लिए न्यायालय में हाजिर भी होना पड़ेगा। आशा करनी चाहिए कि न्यायाधीश और महान्यायवादी हंसी-मजाक को लेकर भी लक्ष्मण रेखा तय करेंगे।


कुल मिलाकर देखा जाए तो देश उच्च न्यायपालिका में बदलाव की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बनने के वरीयता क्रम में शीर्ष पर मौजूद न्यायमूर्ति एन वी रमण ने हाल ही में कहा कि एक न्यायमूर्ति को निर्भीक, साहसी और दबाव का सामना करने में सक्षम होना चाहिए। अब यह उन निर्भर होगा कि वे जनता के मन में बनी गलत धारणाओं को खत्म करें।  जनता चाहती है कि सर्वोच्च न्यायालय एक बार फिर महान बने।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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हकीकत से बेखबर नए कृषि कानून (बिजनेस स्टैंडर्ड)

नितिन देसाई  

कृषि उत्पादों के विपणन से संबंधित नए कानून खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों एवं खुदरा चेन कंपनियों के लिए किसानों से सीधे संपर्क साधना आसान बनाने के मकसद से बनाए गए लगते हैं। आक्रोशित किसान भारी विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ये कानून उनके हित में नहीं हैं। हालांकि कई अर्थशास्त्री इनके समर्थन में खड़े दिखे हैं। उनका मानना है कि मुक्त बाजार-आधारित व्यवस्था होने से कृषि उत्पादों की कीमतें मांग-आपूर्ति संतुलन को बेहतर ढंग से परिलक्षित करेंगी और फसलों के पैटर्न में अधिक तार्किकता आएगी।

लेकिन इस दलील में वितरणकारी आयाम को नजरअंदाज कर दिया गया है। कृषि विपणन प्रणालियां ऐसी होनी चाहिए कि उत्पादक एवं उपभोक्ता दोनों के ही लिए वाजिब कीमतें हों और बिचौलियों को साधारण मुनाफा ही मिले। राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिहाज से भी यह समरूप होना चाहिए। भारतीय संदर्भ में इसकी संभावना नहीं है कि कृषि उत्पादों में मुक्त बाजार होने से ऐसा हो पाएगा। इसकी वजह यह है कि कृषि उत्पादों का बाजार विनिर्मित उत्पादों के बाजार से काफी अलग है।


1.    कृषि बाजारों में विक्रेता लाखों की संख्या में हैं जबकि थोक खरीदारों की संख्या सीमित है। वहीं विनिर्मित उत्पादों के आम बाजार में खरीदारों की संख्या लाखों में है और विक्रेताओं की संख्या सीमित है।


2.    कृषि बाजारों में आपूर्ति फसली मौसम पर काफी निर्भर है जबकि मांग में इस मौसम के हिसाब से फर्क नहीं आता है। ऐसे में भंडारण की क्षमता रखने वाले बड़े खरीदारों को बढ़त मिल जाती है क्योंकि उनके पास अधिक खरीद के लिए वित्तीय संसाधन भी होते हैं।


3.    कृषि उत्पादों की मांग के वक्र में लोच नहीं होती है और इसमें तीखी ढलान भी होती है, लिहाजा बंपर फसल होने पर कीमतें तेजी से गिरती हैं। वहीं फसल कम होने पर मांग रहने से इनकी कीमतों में तेजी से उछाल भी आती है।


मांग एवं आपूर्ति के इस मौसमी पहलू में असंतुलन के चलते कृषि उत्पादों खासकर जल्दी खराब होने वाले खाद्य उत्पादों की कीमतों में साल भर में बड़ी उठापटक होती है। मार्च 2020 से पहले के 10 वर्षों के मासिक औसत पर नजर डालें तो उफान एवं गर्त के बीच मूल्य अंतर दिखाई देता है। सब्जियों के मामले में यह अंतर 23 फीसदी है और टमाटर, प्याज एवं आलू की कीमतों में यह फर्क क्रमश: 65.6 फीसदी, 40.4 फीसदी और 35.6 फीसदी तक देखने को मिला है। (स्रोत: भारत के प्रमुख आर्थिक संकेतकों में सीजन का असर, आरबीआई बुलेटिन, दिसंबर 2020)।


किसानों एवं थोक खरीदारों की बाजार ताकत में असंतुलन एक उपभोक्ता के चुकाए हुए मूल्य एवं उत्पादक को मिलने वाली कीमत के बीच के बड़े फासले से साफ नजर आता है। आरबीआई के सर्वे में यह फर्क 28 फीसदी से लेकर 78 फीसदी तक दिखा है। कृषि बाजारों में हस्तक्षेप न केवल विक्रेताओं बल्कि उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षित करने के लिए भी जरूरी है। (भारत में आपूर्ति शृंखला गतिकी एवं खाद्य मुद्रास्फीति, आरबीआई बुलेटिन, अक्टूबर 2019)।


मुक्त बाजारों से इतर देखें तो बुनियादी तौर पर हरेक कृषि उत्पाद बाजार के लिए तीन विकल्प मौजूद हैं...


- थोक खरीद एवं वितरण में सार्वजनिक क्षेत्र की सीधी एवं बड़ी भागीदारी


- निजी क्षेत्र के थोक विक्रेताओं एवं वितरकों पर निर्भरता के साथ ही जरूरी होने पर सार्वजनिक इकाइयां बाजार निगरानी एवं हस्तक्षेप भी करें। और


- किसानों की सहकारी समितियों या उत्पादक कंपनियों को उपभोक्ता तक वैल्यू चेन में हिस्सेदारी मिले।


वर्तमान में कृषि उत्पादों की सार्वजनिक खरीद कमोबेश धान एवं गेहूं तक ही सीमित है जो फसली उपज के कुल मूल्य का महज 23 फीसदी ही है। इसमें बड़ा हिस्सा पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश का है। हालांकि विकेंद्रीकरण की कोशिश से थोड़ा लाभ हुआ है और धान की सरकारी खरीद में ओडिशा, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ का भी हिस्सा बढ़ा है। विकेंद्रीकरण के सिद्धांत का विस्तार करते हुए गारंटी कीमत पर फसलों की खरीद में राज्यों को मदद देना भी विकल्प हो सकता है।


निजी खरीद पहले से ही खाद्य तेल, फल एवं सब्जियां, मसाले और कपास जैसी कई कृषि जिंसों की विपणन का प्रमुख जरिया बनी हुई है। यहां पर असली जरूरत कीमतों की बड़ी उठापटक वाले बाजारों में संगठित एवं नियमित दखल देने की है। आलू, प्याज एवं टमाटर जैसे उत्पादों के बाजार में तो यह बेहद जरूरी है।


न तो सार्वजनिक और न ही निजी खरीद का विकल्प किसानों को उपभोक्ता तक पहुंचने वाली वैल्यू चेन में हिस्सेदारी देता है। इस काम को केवल सहकारी समितियों एवं किसान उत्पादन कंपनियों के माध्यम से ही अंजाम दिया जा सकता है। यह तीसरा तरीका कृषि क्षेत्र का सबसे जरूरी काम पूरा कर सकता है जो कि किसानों को प्रमुख अनाजों के बजाय अधिक मूल्य वाली फसलों की खेती की तरफ प्रोत्साहित करने का है। देश में इन फसलों की मांग तेजी से बढ़ रही है।


दुग्ध सहकारी समितियों की भारतीय व्यवस्था इस तीसरे तरीके का बेहतरीन उदाहरण है। यह तीन स्तरों- खरीद के लिए ग्रामीण स्तरीय सहकारी समितियां, प्रसंस्करण के लिए जिला स्तरीय दुग्धपालक संगठन और दूध एवं दुग्ध उत्पादों के विपणन के लिए राज्य स्तरीय महासंघ पर काम करता है। यह ढांचा किसानों को समूची मूल्य शृंखला में हिस्सेदारी देता है। इसकी जड़ें गुजरात में खेडा के किसानों और एक एकाधिकारवादी निजी कंपनी के बीच 1940 के दशक में कीमतों को हुए टकराव में निहित हैं।


आज भारत दुनिया में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बन चुका है और डेरी क्षेत्र के कुल उत्पादन का मूल्य चावल एवं गेहूं के सम्मिलित मूल्य से करीब 50 फीसदी अधिक है। दूध की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन उपलब्धता 1968-69 के 112 ग्राम से बढ़कर 2018-19 में 394 ग्राम तक पहुंच चुकी है। दूध एवं दुग्ध उत्पादों का बाजार स्थिर है जो बदलते मौसम के साथ कीमतों में पडऩे वाले महज 0.6 फीसदी फर्क से जाहिर भी होता है। दुग्ध सहकारी समितियां एवं उनके राज्य स्तरीय महासंघ (गुजरात का अमूल एक स्थापित ब्रांड बन चुका है) आज बाजार के अगुआ हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तुलना में प्रसंस्कृत दुग्ध उत्पादों के बाजार की बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं।


भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए कोई भी एक विकल्प आदर्श नहीं हो सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र की खरीद करने वाली एजेंसियां, निजी क्षेत्र के थोक विक्रेता खरीदार और सहकारी एवं किसान उत्पादक कंपनियों तीनों की ही जरूरत है। सार्वजनिक खरीद व्यवस्था फसली पैटर्न में बदलाव या तकनीकी उन्नति के मकसद से हरेक राज्य में कीमत की गारंटी देने के लिए अलग-अलग रूपों में चलाई जा सकती है। जल्द खराब होने वाले उत्पादों के लिए सहकारी समितियों या किसान उत्पादक कंपनियों को बढ़ावा दिया जा सकता है ताकि प्रसंस्करण कर कचरे को कम किया जा सके। निजी थोक विक्रेता अभी की तरह बाकी क्षेत्रों में काम जारी रख सकते हैं।


तीनों विकल्पों की प्रासंगिकता का मतलब है कि केंद्र को यह मानना होगा कि कृषि उत्पादों के विपणन का तरीका संविधान एवं व्यावहारिक कारणों से राज्यों पर ही छोड़ देना चाहिए। भारत में कृषि अर्थशास्त्र की विविधताओं को ध्यान में रखते हुए ऐसा करना जरूरी भी है।


केंद्र कृषि उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधी नीति के मामले में प्रभावी भूमिका निभा सकता है। हालांकि इस मामले में उसका अब तक का प्रदर्शन बहुत उत्साह नहीं जगाता है। वह कई बार निर्यात पाबंदियों में ढील देने या आयात को मंजूरी देने में गलती कर जाता है। कृषि उत्पादों में मुक्त व्यापार बंदिशों वाले मौजूदा वैश्विक परिवेश में मुमकिन नहीं दिखता है। लेकिन ऐसी नीति संभव है जो कृषि उत्पाद निर्यात के लिए मुक्त व्यापार की इजाजत दे और केवल अपवाद रूप में ही बंदिशें लगाए।


भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की विविधता दर्शाने वाली और छोटे किसानों एवं कम आय वाले उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते वाली कृषि विपणन व्यवस्था बनती है तो वह सक्षमता, समता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से कारगर भी होगी।



सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Thursday, January 21, 2021

कमियां बरकरार (बिजनेस स्टैंडर्ड)

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत को पांच वर्ष पूरे हो चुके हैं। मौजूदा सरकार की प्रमुख योजनाओं में से एक इस योजना में फरवरी 2020 में आमूलचूल बदलाव भी किया गया लेकिन अभी भी कई गड़बडिय़ां बरकरार हैं। योजना में कई ढांचागत और प्रक्रियागत कमियां हैं और कई विशिष्ट गुण होने के बावजूद ये कमियां किसानों के लिए इसकी उपयोगिता को प्रभावित करती हैं। इसकी विशिष्टताओं में सबसे प्रमुख है जोखिम का व्यापक कवरेज। फसल बुआई के पहले से लेकर फसल कटने के बाद उपज के नुकसान तक की कवरेज रबी के लिए कुल बीमित राशि के 1.5 फीसदी प्रीमियम पर तथा खरीफ की फसल के लिए 2 फीसदी प्रीमियम पर की जाती है। प्रीमियम की शेष राशि का भार केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सब्सिडी के रूप में वहन किया जाता है। दुनिया में दूसरी कोई ऐसी फसल बीमा योजना नहीं है जो इस मामले में पीएमएफबीवाई का मुकाबला कर सके। इस योजना को किसान कल्याण की अनिवार्य योजना के रूप में पीएम-किसान (इस योजना में हर भूधारक को तीन किस्तों में 6,000 रुपये मिलते हैं) के समकक्ष बताने के बावजूद किसान इसे लेकर आकर्षित नहीं हुए।


बहरहाल इन चिंताओं में भी काफी दम है कि पीएमएफबीवाई योजना के तहत मिलने वाला हर्जाना आमतौर पर बहुत कम होता है और बहुत देर से मिलता है। इसकी बुनियादी वजह यह है कि राज्य योजना को चलाने के क्रम में अपने दायित्व पूरे करने में अक्षम साबित हो रहे हैं। वे अक्सर प्रीमियम सब्सिडी में अपना हिस्सा काफी देरी से और किस्तों में जारी करते हैं। इससे बीमा कंपनियों को किसानों को समय पर भुगतान करने में दिक्कत होती है। फसल कटाई प्रयोग के जरिये उत्पादन नुकसान के आंकड़े तैयार करना और रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट इमेजिंग तकनीक के जरिये किया जाने वाला प्रमाणन भी राज्य का दायित्व है और इसमें भी असंगत तरीके से देरी होती है। इससे दावे निपटाने में दिक्कत आती है। बीमा कंपनियों को पीएमएफबीवाई के बदले हुए स्वरूप के तहत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आधारित आकलन के आधार पर दावों के निपटान की इजाजत है लेकिन यह व्यापक तौर पर अमल में नहीं लाया जा रहा है। इसके अलावा किसानों को 72 घंटे के भीतर बीमा कंपनियों को नुकसान की जानकारी देनी होती है। आमतौर पर किसी प्राकृतिक आपदा के बाद यही वह समय होता है जब किसानों को अपने खेतों में समय बिताना होता है ताकि वे फसल बचाने के लिए हरसंभव कदम उठा सकें। इसके अलावा किसानों को हर वर्ष अलग-अलग फसल के लिए अलग-अलग बीमा कंपनी से निपटना होता है। इससे बीमाकर्ताओं और उनके ग्राहकों के बीच ताल्लुकात नहीं बन पाते बल्कि एक तरह का अविश्वास उत्पन्न होता है जो बीमा कंपनियों के लिए नुकसानदेह होता है।


प्रथम दृष्ट्या ये बहुत छोटी बातें प्रतीत होती हैं लेकिन ये बीमा कंपनियों और किसानों दोनों के कामकाज में असहजता की वजह बनती हैं। कई कंपनियां जिन्होंने पहले भारी सरकारी सब्सिडी से आकर्षित होकर इस योजना के क्रियान्वयन में भागीदारी का विकल्प चुना था वे अब इससे दूरी बना चुकी हैं। इन मसलों को हल करना आवश्यक है ताकि इस योजना को किसानों के लिए एक ऐसी आकर्षक योजना के रूप में पेश किया जा सके जो सक्षम और किफायती ढंग से उनके जोखिम का संरक्षण करती है। इस हकीकत को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े कारकों के कारण जहां भारतीय कृषि धीरे-धीरे संकटपूर्ण होती जा रही है, वहीं जोत का आकार घटने के साथ किसानों की जोखिम उठाने की क्षमता भी कम हो रही है। ऐसे में सही मायनों में किसानों के अनुरूप पीएमएफबीवाई उनके लिए वरदान साबित होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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चीन की प्राथमिकताएंऔर भारत की स्थिति (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम सरन  

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के केंद्रीय आर्थिक कार्य सम्मेलन (सीईडब्ल्यूसी) की सालाना बैठक 16 से 18 दिसंबर तक आयोजित की गई। इसमें इस बात का व्यापक संकेत मिलता है कि चीन अपने आर्थिक हालात का आकलन कैसे करता है और चालू वर्ष में उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं। सन 2021 खासतौर पर महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ष सीपीसी की स्थापना की 100वीं वर्षगांठ वाला वर्ष भी है। यह 14वीं पंचवर्षीय योजना का पहला वर्ष भी है और इस दौरान न केवल कोविड-19 महामारी के नकारात्मक प्रभावों से उबरने की चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा बल्कि बाहरी राजनीतिक और आर्थिक माहौल में व्याप्त अनिश्चितता और उथलपुथल पर भी ध्यान देना होगा। पुरानी घोषणाओं के दोहराव के अलावा इस बात के भी स्पष्ट संकेत हैं कि चीन का नेतृत्व नए वर्ष में किन बातों को अपनी ताकत के रूप में देखता है और किन्हें कमजोरी के रूप में।

सीईडब्ल्यूसी की रिपोर्ट घरेलू मांग आधारित तथा निर्यात एवं निवेश आधारित अर्थव्यवस्था की बात कहती है। आदर्श स्थिति में ये सभी कारक एक दूसरे को ताकत प्रदान करते हैं। परंतु सीईडब्ल्यूसी का कहना है कि मौजूदा दौर में जब बाहरी स्तर पर इतनी अनिश्चितता है तब एक नए घटनाक्रम में घरेलू वितरण प्रभावी होगा। सरकारी स्वामित्व वाले उपक्रमों की भूमिका भविष्य में और मजबूत होगी और वे राष्ट्रीय सामरिक तकनीक को मजबूत करने और नवाचार को बढ़ावा देने में मददगार साबित होंगे। राष्ट्रीय सामरिक तकनीक ऐसी तकनीक हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम हैं। इनमें कृत्रिम मेधा, सेमीकंडक्टर और उच्च तकनीक वाले उद्योगों में काम आने वाले अन्य घटक शामिल हैं।


एक अन्य क्षेत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा काफी अहमियत रखती है और वह है औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाओं को नियंत्रित रखने की राज्य की स्वतंत्र क्षमता को मजबूत बनाना। विदेशी कंपनियों के नियंत्रण वाली विस्तारित आपूर्ति शृंखलाओं में केवल एक कड़ी बनने के बजाय चीन स्वयं की आपूर्ति शृंखलाओं का नेतृत्व करना पसंद करेगा। आर्थिक साझेदारों के कारण होने वाली उथलपुथल का शिकार होने की आशंका के बजाय वह ऐसी स्थिति में रहना चाहेगा जहां आपूर्ति शृंखलाओं में पारस्परिक निर्भरता हो ताकि इसका इस्तेमाल चीन के सुरक्षा हितों को बढ़ाने में किया जा सके। शी चिनफिंग ने एक अन्य संदर्भ में कहा कि चीन को सक्षम होना होगा ताकि अपने आर्थिक संपर्कों की राजनीतिक लागत अपने साझेदारों पर डाल सके। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दंडात्मक व्यापारिक कदमों के साथ वह ऐसा कर चुका है। आर्थिक पारस्परिक निर्भरता को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की इस कोशिश को समझना होगा और इसका प्रतिरोध करना होगा।


एक अन्य तत्त्व एकाधिकार विरोधी शमन और नियमविरुद्ध पूंजी विस्तार निरोध से ताल्लुक रखता है। यहां इशारा चीन के निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र की ओर है और यह सरकारी उपक्रमों को बढ़ावा देने का विपरीत पक्ष है। इस नीति को नियामकीय निगरानी के आलोक में तथा टेनसेंट तथा अलीबाबा जैसी अत्यधिक कामयाब हाई-टेक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ उठाए गए कदमों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके तेज विस्तार और चीन में उनके व्यापक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव को सीपीसी के प्रभुत्व को चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। भुगतान कारोबार से परे फिनटेक कारोबार में अलीबाबा के प्रवेश को भी चीन सरकार की सॉवरिन डिजिटल करेंसी तथा चीनी बैंकों को बिचौलिया बनाकर राष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था कायम करने के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाने लगा। वित्तीय स्थिरता को लेकर भी चिंता हो सकती है। एक दलील यह है कि निजी हाई टेक कंपनियों का आकार इतना बड़ा हो गया है कि अगर वे नाकाम हुए तो अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका लगेगा। परंतु राजनीतिक कारक भी महत्त्वपूर्ण हैं। संदेश एकदम स्पष्ट है: चीन के निजी क्षेत्र को सीपीसी के नेतृत्व और निगरानी में काम करना होगा। ऐसे में विदेशी उपक्रम चीन की निजी कंपनियों के साथ चाहे जो सौदा करें, चीन की सरकार और सीपीसी उसमें जरूर रुचि रखेगी।


सीईडबल्यूसी द्वारा चिह्नित एक अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्र खाद्य सुरक्षा एवं कृषि क्षेत्र को लेकर भी सुरक्षा चिंताएं हैं। चीन का कृषि उत्पादन उल्लेखनीय है लेकिन वह खाद्यान्न तथा अन्य कृषि उत्पादों मसलन सोयाबीन का सबसे बड़ा आयातक भी है। वह बीफ, पोर्क और पोल्ट्री उत्पादों का भी प्रमुख आयातक है। वर्ष 2014 से ही उसका सालाना खाद्यान्न आयात 10 करोड़ टन रहा है। सन 2020 में तो यह सन 2019 के आयात से 30 गुना अधिक रहा। आमतौर पर कीमतें स्थिर रहती हैं लेकिन इसके बावजूद खाद्य मुद्रास्फीति चिंता का विषय है। पोर्क की कीमत जो खासी संवेदनशील मानी जाती है, उसमें काफी इजाफा हुआ है क्योंकि आपूर्ति कमजोर रही है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता सूची में रखा गया है। उन्नत बीज और जेनेटिक शोध के माध्यम से उपज बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। अनाज भंडारण क्षमता बढ़ाने और कृषि भूमि को बरकरार रखने का प्रयास किया जा रहा है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 12 करोड़ हेक्टेयर का न्यूनतम रकबा सुनिश्चित करने की बात कही गई है। पुरानी नीतिगत घोषणाओं से भी कुछ बातें चुनी गई हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रतिबद्धता दोहराना शामिल है। इसके अलावा घरेलू मांग को बढ़ाना और स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं में खपत के जरिये सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इजाफा करना शामिल है।


हालांकि इस बात का कोई संकेत नहीं है कि सरकार घरेलू मांग बढ़ाने के लिए कोई प्रोत्साहन पैकेज देने जा रही है। स्थिर राजकोषीय नीति और विवेकपूर्ण मौद्रिक नीति पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस बात को लेकर संतुष्टि का भाव है कि चीन इकलौती अर्थव्यवस्था है जो 2020 में सकारात्मक रहेगी और 2021 में जिसके 8 फीसदी की दर से विकसित होने की आशा की जा रही है। किसी और अर्थव्यवस्था के साथ ऐसा नहीं है। चीन ने आपूर्ति क्षेत्र की बाधा उत्पन्न होने उनके चीन से दूरी बनाने की आशंकाओं को झूठा साबित कर दिया है। बल्कि इनके चालू रहने में चीन पर निर्भरता बढ़ी है। कम से कम पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के मामले में तो ऐसा ही है। चीन के आरसेप में साझेदार बनने तथा बेल्ट और रोड पहल को लगातार बढ़ावा देने के कारण एशिया और विश्व में वृद्धि के वाहक की उसकी भूमिका और मजबूत होगी। सीईडब्ल्यूसी ने यह भी दोहराया कि चीन प्रशांत पार साझेदारी के लिए व्यापक एवं प्रगतिशील समझौते का सदस्य बनना चाहता है। नए साल में चीन के दबदबे के बीच भारत को एशियाई आर्थिक जगत में अपनी जगह बनानी है। आत्मनिर्भर भारत को इस हकीकत से दो चार होना होगा।


(लेखक पूर्व विदेश सचिव एवं सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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विनिर्माण में रोजगार की हानि कृषि और निर्माण ने संभाली (बिजनेस स्टैंडर्ड)

महेश व्यास  

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) ने विगत दिनों अपनी आर्थिक पूर्वानुमान सेवा में जारी कंज्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्वे (सीपीएचएस) से रोजगार के क्षेत्रवार आंकड़े जारी किए। ये आंकड़े मासिक और तिमाही आधार पर उपलब्ध कराए गए। हम तिमाही अनुमानों का इस्तेमाल करते हुए यह समझने का प्रयास करेंगे कि व्यापक क्षेत्रों और उद्योगों पर लॉकडाउन का क्या असर हुआ है।


कृषि क्षेत्र में 2016 से लेकर जून 2020 तिमाही के अंत तक रोजगार का आंकड़ा 14 करोड़ से 15 करोड़ के बीच रहा है। सन 2016 में ही सीपीएचएस ने रोजगार शृंखला की शुरुआत की थी। जून 2020 में समाप्त तिमाही लॉकडाउन की पहली तिमाही थी। यही वह तिमाही थी जब देश भर में लॉकडाउन के सबसे कड़े प्रावधान लागू किए गए थे। इस अवधि में कृषि क्षेत्र में रोजगार की कोई हानि नहीं हुई, बल्कि कृषि क्षेत्र के रोजगार पिछली तिमाही से भी बेहतर रहे और एक वर्ष पहले की समान अवधि की तुलना में भी बेहतर रहे।


सितंबर 2020 में समाप्त तिमाही में कृषि क्षेत्र के रोजगार 15.8 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ गए। जुलाई और अगस्त 2020 में 16 करोड़ का आंकड़ा पार करते हुए कृषि क्षेत्र के रोजगार उच्चतम स्तर पर रहे। सितंबर 2020 तिमाही में कृषि रोजगार ठीक एक वर्ष पहले वाली तिमाही की तुलना में 5.5 फीसदी अधिक रहे।


लॉकडाउन के दौरान कृषि रोजगार में इजाफा बताता है कि एक तो गैर कृषि क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम होने से लोगों ने उधर का रुख किया और दूसरा यह कि कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर बेहतर रहे। कृषि क्षेत्र में श्रमिकों की यह अतिरिक्त बढ़ोतरी बताती है कि सन 2020 में खरीफ सत्र में बुआई के रकबे में भी रिकॉर्ड इजाफा हुआ। खरीफ में बुआई रकबा 4.8 फीसदी बढ़ा।


दिसंबर 2020 में समाप्त तिमाही में कृषि क्षेत्र के रोजगार घटकर 1.54 करोड़ रह गए। जबकि पिछली तिमाही में यह आंकड़ा 1.58 करोड़ था। इसके बावजूद यह स्तर पिछले वर्ष की दिसंबर तिमाही से 3.5 फीसदी बेहतर था।


देश के कुल रोजगारों में कृषि की हिस्सेदारी 36 फीसदी है। सन 2016 से 2019 तक यह जहां 36 फीसदी रही, वहीं 2020 में यह बढ़कर करीब 40 फीसदी हो गई। सेवा क्षेत्र भी कुल रोजगार में 36 फीसदी का हिस्सेदार है। परंतु इसकी हिस्सेदारी बढ़ रही है। सन 2016 के 33 फीसदी से बढ़कर 2018, 2019 और 2020 में यह 38 फीसदी जा पहुंची।


सेवा क्षेत्र में रोजगारशुदा लोगों की तादाद 2017 के 14 करोड़ से बढ़कर मार्च 2020 तिमाही तक 15.7 करोड़ हो गई। परंतु कृषि के उलट लॉकडाउन में इसमें कमी आई। जून 2020 तिमाही में रोजगार घटकर 1.28 करोड़ रह गया। तब से इसमें सुधार हुआ लेकिन केवल आंशिक। सितंबर 2020 तिमाही में इस क्षेत्र में 1.46 करोड़ लोग रोजगारशुदा थे जबकि दिसंबर 2020 में यह आंकड़ा सुधरकर 14.8 करोड़ हुआ। यह स्तर मार्च 2020 या एक वर्ष पहले की तुलना में अब भी कम है। सेवा क्षेत्र के रोजगार का स्तर 2018 की किसी भी तिमाही से भी कम है।


खुदरा कारोबार, पर्यटन और यात्रा, शिक्षा और व्यक्तिगत गैर पेशेवर सेवाओं में रोजगार को जून 2020 तिमाही में भारी झटका लगा। खुदरा कारोबार सबसे अधिक नुकसान में रहे और यहां एक करोड़ लोगों ने रोजगार गंवा दिए। पर्यटन और यात्रा क्षेत्र में 55 लाख लोगों ने रोजगार गंवाए जबकि शिक्षा क्षेत्र में 53 लाख रोजगार का नुकसान हुआ। व्यक्तिगत गैर पेशेवर सेवा क्षेत्र में 25 लाख लोगों को रोजगार की क्षति हुई।


दिसंबर 2020 तिमाही तक शिक्षा को छोड़कर इनमें से अधिकांश सेवा क्षेत्रों में रोजगार बहाल होने लगे थे। शिक्षा क्षेत्र में रोजगार का जाना लगातार जारी है। दिसंबर 2020 में समाप्त तिमाही तक 59 लाख रोजगार गए। शिक्षा उद्योग में सन 2016-17 में 1.3 से 1.4 करोड़ रोजगार थे। ये 2018 और 2019 में बढ़कर 1.5 करोड़ हो गए। हालांकि 2019 के अंत तक इस क्षेत्र में कमजोरी नजर आने लगी और मार्च 2020 तिमाही में रोजगार गिरकर 1.45 करोड़ रह गए। जून और सितंबर 2020 तिमाही में इनकी तादाद और घटी और ये 97 लाख रह गए। दिसंबर 2020 तिमाही में शिक्षा क्षेत्र के रोजगार 91 लाख रहे।


सेवा क्षेत्र के अन्य सभी हिस्सों में रोजगार में सुधार लगभग पूरा हो चुका है। यात्रा एवं पर्यटन क्षेत्र में 2019-20 में 1.94 करोड़ लोगों के पास रोजगार था। जून 2020 तिमाही में गंभीर लॉकडाउन के दौरान इस क्षेत्र में रोजगार 55 लाख तक घटे लेकिन दिसंबर 2020 तिमाही में यहां 2.07 करोड़ लोग रोजगारशुदा थे यानी 2019-20 की तुलना में 13 लाख अधिक लोगों के पास रोजगार था। अन्य सेवा क्षेत्रों में भी सुधार हुआ। यही वजह है कि जून 2020 तिमाही में जहां सेवा क्षेत्र में 2.35 करोड़ रोजगार की हानि हुई, वहीं सितंबर तिमाही में यह गिरावट केवल 83 लाख और दिसंबर 2020 तिमाही में महज 55 लाख रह गई।


इसके विपरीत विनिर्माण क्षेत्र में गंवाए गए रोजगार में सुधार की गति धीमी रही है। सन 2019-20 में विनिर्माण क्षेत्र में 4 करोड़ रोजगार थे। पहली तिमाही में यह तादाद घटकर 2.46 करोड़ रह गई यानी 1.5 करोड़ लोगों के रोजगार छिन गए। दूसरी तिमाही में आंकड़ा सुधरकर 2.71 करोड़ हुआ और दिसंबर तिमाही में 2.88 करोड़। हालांकि 1.14 करोड़ के साथ अभी भी गिरावट का स्तर बहुत ज्यादा है। इससे भी अहम बात यह है कि औषधि क्षेत्र को छोड़कर हर बड़े विनिर्माण उद्योग में 2020-21 की तिमाहियों में 2019-20 की तिमाहियों की तुलना में कम लोग रोजगारशुदा रहे।


वास्तविक अचल संपत्ति और विनिर्माण उद्योग में तो रोजगार के मामले में सौ प्रतिशत सुधार हो चुका है। सन 2019-20 में इस उद्योग में 6.1 करोड़ लोगों के पास रोजगार थे। जून 2020 तिमाही में यह आंकड़ा गिरकर 2.8 करोड़ हुआ लेकिन दिसंबर 2020 तिमाही तक इसमें 3.3 करोड़ का सुधार हुआ और यह पुरानी स्थिति में आ गया। उच्च श्रम उत्पादकता वाले क्षेत्रों मसलन विनिर्माण आदि क्षेत्रों से रोजगार कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों मसलन कृषि और विनिर्माण में स्थानांतरित हुए।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Wednesday, January 20, 2021

तकनीक में प्रगति के लिए नजरिया बदलना जरूरी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

प्रसेनजित दत्ता  

पिछले कुछ वर्षों के दौरान तकनीक-राष्ट्रवाद (टेक्नो-नैशनलिज्म) पर अच्छी खासी चर्चा हुई है। दुनिया के हरेक हिस्से में आर्थिक विश्लेषक, नीति निर्धारक और नीतिगत विषयों पर मंथन करने वाले संस्थान इस बात पर बहस कर रहे हैं कि आखिर मोटे तौर पर दुनिया और खास तौर पर उनके देशों के लिए तकनीक-राष्ट्रवाद के क्या मायने हैं।


तकनीक-राष्ट्रवाद और तकनीक-वैश्वीकरण की परिभाषा इस बात पर निर्भर कर सकती है कि इसका इस्तेमाल कौन कर रहा है। मोटे तौर पर कहें तो तकनीक-वैश्वीकरण के तहत सामाजिक समस्याओं के समाधान के वास्ते एक साझे मंच पर सभी देशों और लोगों को लाने के लिए आपस में तकनीक एवं नवाचार का आदान-प्रदान होता है। दूसरी तरफ तकनीक-राष्ट्रवाद का सहारा लेकर राष्ट्र कुछ विशिष्ट तकनीक में अपनी श्रेष्ठता का इस्तेमाल कर वैश्विक व्यवस्था में आगे बढ़ते हैं और दूसरे देशों पर वर्चस्व स्थापित करते हैं।


हालांकि इन दोनों में कोई भी शब्द वैश्विक स्तर पर मौजूदा हालात का सटीक विश्लेषण नहीं करता है। वास्तव में दुनिया तकनीक हासिल करने की होड़ में पुराने विकसित राष्ट्रों के गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई में फंसी है। इसमें एक तरफ अमेरिका और दूसरी तरफ चीन एवं अन्य देश हैं। इस टकराव का मकसद नई तकनीकों-कृत्रिम मेधा, क्वांटम कंप्यूटिंग, रोबोटिक्स, मटीरियल साइंसेस, बायोटेक और इंटरनेट ऑफ थिंग्स सहित अन्य-पर प्रभुत्व स्थापित करना है। ये नई तकनीक भविष्य की दशा-दिशा तय करेगी। एक दशक पहले तक विकसित देश तकनीक के मोर्चे पर काफी अग्रणी समझे जाते थे और अन्य देश उनके पीछे आपस में सहयोगात्मक प्रतिस्पद्र्धा करते हुए आगे बढ़ते थे। कई खंडों में अमेरिका सबसे आगे था, यह अलग बात थी कि यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी कुछ खास क्षेत्रों में अपनी मजबूती रखते थे। तब चीन आर्थिक मोर्चे पर तेजी से प्रगति कर रहा था, लेकिन आधुनिक तकनीक के मामले में वह कम से कम पांच वर्ष पीछे समझा जाता था।


अब हालात बदल चुके हैं। ज्यादातर विश्लेषक चीन को कृत्रिम मेधा एवं डेटा एनालिटिक्स, जीन संवद्र्धन और यहां तक कि क्वांटम कंप्यूटिंग में अगर इन देशों से आगे नहीं तो कम से कम उनके बराबर जरूर समझ रहे हैं। हालांकि चीन जिस तरह से अपनी महत्त्वाकांक्षा का परिचय देता है और निजी कंपनियों के जरिये दोस्तों एवं प्रतिस्पद्र्धियों दोनों से चोरी-छुपे सूचनाएं एकत्र करता है वह पश्चिम देशों को परेशान करता है।


इन चिंताओं से एक दूसरे के खिलाफ प्रतिक्रियात्मक कदम उठाने की मुहिम शुरू हो गई है। अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने चीन की कंपनियों जैसे दूरसंचार उपकरण विनिर्माता हुआवे, वीडियो कैमरा बनाने वाली हाइकविजन और सोशल मीडिया कंपनी बाइटडांस को कुछ खास खंडों में कारोबार करने से रोक दिया है। पश्चिमी देशों की तकनीकी कंपनियों को चीन के साथ प्रमुख तकनीक साझा नहीं करने की सख्त हिदायत दी गई है। इसके जवाब में चीन भी उन खंडों में तकनीक का विकास जोर-शोर से कर रहा है, जहां यह पीछे चल रहा है। चिप निर्माण इनमें एक ऐसा ही खंड है।  


ज्यादातर विकासशील एवं पिछड़े देश इनमें किसी भी खेमे में नहीं आते हैं। इसकी वजह यह है कि वे तकनीक का इस्तेमाल करने वाले हैं, न कि इनका विकास और इन पर शोध करते हैं। नई तकनीक अपनाने के मामले में पिछले कुछ दशकों के दौरान ज्यादातर देश पश्चिमी देशों पर निर्भर रहे, लेकिन अब उनके पास चीन की तरफ रुख करने का विकल्प मौजूद है। चीन इन देशों को मदद करने और अपने उत्पाद एवं अपनी सेवाएं सस्ते दामों पर देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। इसके साथ ही इन देशों के लिए पसंदीदा तकनीक आपूर्तिकर्ता बनने के साथ ही उन्हें वित्तीय सहायता भी दे रहा है।


इस तरह, चौथी औद्योगिक क्रांति के मुहाने पर खड़ी दुनिया दो खेमों में बंटती जा रही है। इनमें एक खेमा उन देशों का है, जो नई तकनीक ईजाद कर रहे हैं। दूसरा खेमा उन देशों का है, जो नई तकनीक के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं।


इस खेल में आखिर भारत कहां खड़ा है? हाल तक यह पुराने विकसित देशों के साथ चीन से नई तकनीक ले रहा था। हाल में चीन के साथ तनाव बढऩे के बाद भारत अब आत्मनिर्भरता और तकनीक-राष्ट्रवाद पर जोर दे रहा है। भारत ने चीन के कई मोबाइल ऐप्लीकेशन पर भी पाबंदी लगा दी है और स्थानीय स्तर पर ही 5जी तकनीक का विकास करने की बात कह चुका है। इसी दौरान सरकार ने कृत्रिम मेधा और क्वांटम कंप्यूटिंग के लिए भी अपना दृष्टिकोण सार्वजनिक किया है। हालांकि इसमें थोड़ी देर लगेगी क्योंकि हुआवे, हाइकविजन और चीन की अन्य कंपनियों की भारत में बड़े पैमाने पर उपस्थिति है।


दरसअल मुद्दा यह है कि एक के बाद एक सरकारें दीर्घ अवधि के लक्ष्य के साथ एक स्पष्ट नीति वाली कार्य योजना समयसीमा एवं लक्ष्यों के साथ पेश करने में नाकाम रही हैं। पश्चिमी देशों में तकनीक विकास पर सरकारी विभाग (खासकर रक्षा में), निजी क्षेत्र और शोध करने वाले संस्थान एवं विश्वविद्यालय आपस में मिलकर काम करते हैं और निरंतर प्रगति करने के लिए एक दूसरे की उपलब्धियों का इस्तेमाल करते हैं।


चीन एक अलग ही ढांचे के साथ आगे बढ़ा। वहां सरकार ने संस्थानों और निजी कंपनियों दोनों जगहों पर तकनीक पर शोध की दशा-दिशा काफी हद तक तय की है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने सोवियत संघ (यूएसएसआर) का ढांचा अपनाया था और सरकारी विभागों को शोध एवं तकनीक विकास पर ध्यान देने के लिए कहा था। हालांकि इससे भारत को कुछ क्षेत्रों में खास किस्म की उपलब्धि हासिल करने में मदद जरूरी मिली, लेकिन पूरी दुनिया में तकनीक विकास के क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलाव के साथ चलने में विशेष मदद नहीं मिल पाई। 1970 और 1980 के बीच अर्थव्यवस्था जरूरत से अधिक बंद रहने से भारत तकनीक के इस्तेमाल के मामले में पिछड़ गया।  


1991 में आर्थिक सुधार शुरू होने के साथ सरकारों ने तकनीक विकास से अधिक आर्थिक समस्याओं पर ध्यान दिया। निजी क्षेत्र भी तकनीक स्वयं विकसित करने के बजाय इसे बाहर से मंगाने में व्यस्त था। हालांकि इस दौरान कुछ कंपनियों ने नए इस्तेमाल करने एवं उत्पादों के लिए नवाचार का इस्तेमाल जरूर किया। ऐसा नहीं है कि भारत आवश्यकता पडऩे पर अत्याधुनिक तकनीक विकसित नहीं कर सकता है। कुछ तकनीक तक पहुंच नहीं होने के बाद भारत ने संसाधन एवं विशेषज्ञता हासिल कर क्रायोजेनिक इंजन, नाभिकीय तकनीक और सुपर कंप्यूटर विकसित किए। हालांकि जहां तकनीक तक इसकी पहुंच आसानी से हो गई, वहां इसने दूसरे देशों के साथ प्रतिस्पद्र्धा करने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई।


अगर भारत तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने वाले देशों की फेहरिस्त से निकलना चाहता है तो अपना नजरिया बदलना होगा। केवल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अधिक रहने से वैश्विक तकनीक के मंच पर इसे जगह नहीं मिलेगी।


(लेखक बिज़नेस टुडे और बिज़नेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और संपादकीय सलाहकार संस्था प्रोजैइकव्यू के संस्थापक एवं संपादक हैं।)

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महामारी पर दिखाई समझदारी अब बजट में दिखाने की बारी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

मिहिर शर्मा  

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जल्दी ही वह बजट पेश करेंगी जिसे अनिवार्य तौर पर महामारी बजट के रूप में याद किया जाएगा। कम ही केंद्रीय बजट इतने कठिन हालात में पेश किए गए होंगे और जिनकी इस कदर प्रतीक्षा रही होगी। सीतारमण पर असंभव को संभव कर दिखाने का दबाव होगा: किसानों, उपभोक्ताओं, आम परिवारों और कंपनियों को राहत देना, खर्च और ऋण पर नियंत्रण करना तथा भारी गिरावट के बाद वृद्धि बहाल करना।


अब तक सरकार ने महामारी को लेकर समझदारी भरी प्रतिक्रिया दी है। कुछ अन्य देशों के उलट उसने समझा है कि स्वास्थ्य को लेकर आपात स्थिति के बीच मांग बढ़ाने की कोशिश का विपरीत असर हो सकता है। इसका फायदा हुआ और अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है। स्वाभाविक है कि लॉकडाउन और महामारी दीर्घकालिक नुकसान छोड़ जाएंगे। प्रश्न यह है कि सरकार इसे कैसे ठीक करेगी। तथ्य यह भी है कि इस नुकसान की प्रकृति को समझने में वक्त लगेगा। कई क्षेत्र और हित समूह जोर देंगे कि उन्हें राहत या प्रोत्साहन में प्राथमिकता दी जाए। ऐसी मांगों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।


यह सही है कि वित्त मंत्री ने कहा कि वह राजकोषीय घाटे को खुद को चिंतित नहीं करने देगी। उनका अर्थ शायद यह नहीं हो कि वह व्यय बढ़ाना चाहती हैं। व्यय बढ़ाना गलत होगा। व्यय बढ़ाकर जिस तरह मंदी से बाहर निकला जा सकता है वही तरीका महामारी में काम आए यह जरूरी नहीं। मंदी के दौर में भी भारत को इसकी कीमत दीर्घावधि में चुकानी पड़ी। सन 2008-09 के वित्तीय संकट से निपटने में जो चूक की गईं उनकी कीमत हमें अब तक चुकानी पड़ रही है। बैंकों की बैलेंस शीट इसका उदाहरण है।


व्यय बढ़ाने की चौतरफा उठती मांग के बीच उन्हें यह बात याद रखनी चाहिए। पिछली बार तत्कालीन वित्त मंत्री ने ऐसी मांग सुनने की गलती की थी। इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए। सरकार को निवेशकों, नागरिकों और करदाताओं के साथ चर्चा का विश्वसनीय रास्ता अपनाना चाहिए। सबसे पहले तो पूरी तरह पारदर्शी निजीकरण की ओर लौटना चाहिए। थोड़े बहुत विनिवेश का वक्त गया। निजीकरण से उत्पादकता में भी सुधार होता है। यह फंड के साथ-साथ वृद्धि हासिल करने का भी अच्छा जरिया है। दूसरा, सरकार को सारी उधारी पारदर्शी रखनी चाहिए। अधिक पारदर्शिता से घाटे को लेकर समझ बेहतर रहेगी। तीसरा, सरकार को वैश्विक पूंजी की आवक को प्राथमिकता देनी चाहिए। अब तक सरकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आंकड़ों से संतुष्ट रही है, हालांकि वह बड़ी परियोजनाओं और कंपनियों में आने वाली एकमुश्त आवक रही है। जरूरत यह है कि देश में आने वाली दीर्घावधि की विदेशी पूंजी सरकार का वित्तीय बोझ कम करे। फिलहाल, देश की वित्तीय बचत पर सरकार का एकाधिकार है। ऐसे में निजी क्षेत्र के लिए कुछ खास करने को नहीं है। देश में अधिक विदेशी पूंजी आम परिवारों की बचत पर निर्भरता कम करेगी। विदेशी पूंजी के इस चैनल के लिए तरीके हैं। उनमें से एक तरीका है विभिन्न परियोजनाओं को ग्रीन रेटिंग देना ताकि नए ईएसजी केंद्रित फंड आ सकें। दूसरा तरीका है नगर निकायों और सरकारी उपक्रमों में वैश्विक डेट बाजार का लाभ उठाने की क्षमता विकसित करना। तीसरा तरीका है, नए निजी नियंत्रण वाले विकास वित्त संस्थान जिनमें सरकार की आंशिक हिस्सेदारी होती है और जो विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित रहते हैं।


चौथा, सरकार को कल्याण व्यय पर नियंत्रण रखना चाहिए। दुनिया भर में महामारी के दौरान यह कठिन साबित हुआ है। खराब ढंग से लक्षित राहत को लोग व्यय नहीं करते उसकी बचत करते हैं। अमेरिका में ऐसा ही देखने को मिला। शहरी गरीबों पर केंद्रित नई योजनाएं घोषित की जा सकती हैं लेकिन उनके लिए प्रावधान करना होगा। यह मुश्किल है क्योंकि अर्थव्यवस्था अभी सामान्य नहीं हुई है। हमें नहीं पता कि महामारी के बाद सामान्य हालात कैसे होंगे।


पांचवां, पश्चिम के कृत्यों की अनदेखी करनी होगी। हाल ही में आरबीआई के एक पूर्व गवर्नर ने वित्त मंत्री को संबोधित एक आलेख में ऐसी सोच का जिक्र किया जिसका मानना है कि मुद्रास्फीति काल्पनिक है। मैं यह देखकर चकित हुआ, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि भारत में दुनिया की खराब बौद्धिक धाराओं से ज्ञान लेने की प्रवृत्ति अभी भी जारी है। आरबीआई के गवर्नर को यह जानना चाहिए कि यदि अमेरिका और जापान में उच्च व्यय, ऋण और घाटे के बावजूद मुद्रास्फीति की वापसी नहीं हुई है तो जरूरी नहीं कि भारत में भी ऐसा हो।


छठी बात, याद रहे कि संस्थान मायने रखते हैं। जब भारी आवक, उधारी और प्रोत्साहन की योजना बनानी हो तो इन फंड का ध्यान रखना होगा, इन्हें विनियमित करना होगा। यह अहम है। सरकारी व्यय के प्रबंधन और मुद्रास्फीति को लक्षित करने की बात करें तो आरबीआई की स्वतंत्रता एक बड़ी उपलब्धि है जिसे बरकरार रखना चाहिए। दीर्घावधि के वित्त के लिए अलग नियामकीय क्षमता विकसित करनी चाहिए।


आखिरी बात, निवेशकों के संरक्षण का वादा होना चाहिए। हमें समझना होगा कि अतीत से लागू विधानों पर हमारी निर्भरता और अंतरराष्ट्रीय पंचाटों में हमारा उलझना यह संकेत देता है कि भारत निवेश के लिए उपयुक्त देश नहीं है। इसका गलत असर होगा। लालची कर अधिकारियों की बात सुनकर नीति निर्माता कर राजस्व के चक्कर में बड़े निवेश को दूर कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम स्पष्ट प्रतिबद्धता जताएं कि अतीत से लागू विधान नहीं होंगे। हमें अंतरराष्ट्रीय पंचाटों के निर्णय भी स्वीकार करने की बात कहनी होगी। सरकार को निवेश संधियों की जांच करनी चाहिए ताकि निवेशकों के पास धीमी भारतीय कानून व्यवस्था का विकल्प हो।


वित्त मंत्री को इस अवसर का लाभ उठाते हुए देश में विकास संबंधी कार्यों के वित्त पोषण के लिए वैकल्पिक स्रोत तैयार करने चाहिए। उन्हें देश को निवेशकों के और अनुकूल बनाना चाहिए। यहां दो राह हैं और सरकार को सही रास्ता चुनना ही होगा।

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खराब विचार (बिजनेस स्टैंडर्ड)

कोविड-19 महामारी के कारण मची आर्थिक उथलपुथल के कारण बैंकिंग क्षेत्र के फंसे हुए कर्ज में इजाफा होना लाजिमी है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ताजातरीन वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार आधार परिदृश्य में सकल फंसा हुआ कर्ज अनुपात सितंबर 2020 के 7.5 फीसदी से बढ़कर इस वर्ष सितंबर तक 13.5 फीसदी हो सकता है। यदि वृहद आर्थिक हालात और खराब होते हैं तो यह अनुपात बिगड़ भी सकता है। सरकारी बैंकों के लिए तो यह पहले ही खराब है। रिपोर्ट के अनुसार आधार परिदृश्य में उनका सकल फंसा हुआ कर्ज सितंबर 2021 तक बढ़कर 16.2 फीसदी तक पहुंच सकता है। स्पष्ट है कि बैंकों की कमजोर बैलेंस शीट, खासकर सरकारी बैंकों की कमजोर स्थिति आर्थिक सुधार को प्रभावित करेगी। खबरों के मुताबिक बैंकिंग तंत्र की हालत देखते हुए सरकार एक बैड बैंक की स्थापना पर विचार कर रही है ताकि बैंकों की बैलेंस शीट सुधारी जा सके। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी हाल ही में कहा है कि केंद्रीय बैंक ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर सकता है।

यकीनन बैड बैंक की स्थापना का विचार नया नहीं है। बैंकिंग तंत्र बीते कई वर्षों से दबाव में है, ऐसे में बैड बैंक का प्रस्ताव बार-बार सर उठाता रहता है। कहा जा रहा है कि फंसे हुए कर्ज को बैड बैंक को स्थानांतरित करके बैंकों की बैलेंस शीट सुधारी जा सकती है। उसकी स्थापना ही ऐसी परिसंपत्तियों को निपटाने के लिए होनी है। बहरहाल, ऐसी कई वजह हैं जिनके कारण लगता है कि यह विचार हमारे देश में कारगर नहीं होगा। बल्कि इसके कारण हालात और बिगड़ सकते हैं क्योंकि निस्तारण प्रक्रिया में अनावश्यक देरी होगी। सरकारी बैंकों में फंसे हुए कर्ज का स्तर अधिक होने की एक वजह यह भी है कि वहां ऋण मानक सही नहीं हैं। बैड बैंक की स्थापना से बुनियादी समस्या हल नहीं होगी। इतना ही नहीं सरकारी क्षेत्र के बैंकर फंसे हुए कर्ज को चिह्नित करने से हिचकते हैं क्योंकि जांच एजेंसियों के समक्ष यह उनके खिलाफ जा सकता है। सरकार द्वारा स्थापित बैड बैंक के साथ भी यही समस्या आएगी।


इसके अलावा, बैड बैंक को स्थानांतरित परिसंपत्तियों का मूल्यांकन विवादित रहेगा। यदि परिसंपत्ति स्थानांतरण अपेक्षाकृत ऊंचे मूल्य पर हुआ तो इससे बैंकों को लेकर उचित आकलन को प्रोत्साहन घटेगा। बैड बैंक के अधिकारियों को भी शायद पेशेवर काम करने की पूरी छूट न मिले क्योंकि फंसे कर्ज का निस्तारण करने के लिए बड़ी धनराशि बट्टे खाते में डालनी होगी। विभिन्न क्षेत्रों में फंसे कर्ज से निपटने के लिए उचित प्रतिभाओं को जुटाना भी एक समस्या है। निजी क्षेत्र शायद भागीदारी का इच्छुक न हो क्योंकि वह सरकारी क्षेत्र के काम करने के तरीके को लेकर सहज नहीं। बैड बैंक की स्थापना और बैंकों की बैलेंस शीट में सुधार से राजकोषीय दबाव कम नहीं होगा। वाणिज्यिक बैंकों या बैड बैंक की परिसंपत्तियों को बट्टे खाते में डालने से सरकार को नुकसान होगा और पूंजी की आवश्यकता बढ़ेगी।


बैड बैंक का इस्तेमाल शायद केवल समस्या को टालने के लिए किया जाए। यह उन कमियों को दूर नहीं कर सकता जो कड़े निर्णयों के कारण सरकारी बैंकों में उपजी हैं। सरकारी बैंकों में व्यापक सुधार की जरूरत है ताकि वे बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें। जब तक ऐसा नहीं होता सरकारी बैंक सरकारी वित्त और आर्थिक वृद्धि दोनों पर बोझ बने रहेंगे। यदि सरकार ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) को मजबूत करे तो बेहतर होगा। इससे फंसे कर्ज वाली परिसंपत्तियों का निस्तारण जल्दी होगा। आईबीसी के निलंबन की अवधि बढ़ाने से कोई मदद नहीं मिलेगी। ऐसे में सरकार के लिए बेहतर होगा कि वह बैंकिंग क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं से निपटे। समस्या को एक संस्थान से दूसरे संस्थान में स्थानांतरित करने से हल नहीं निकलेगा।

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Tuesday, January 19, 2021

पर्दे के पीछे से जदयू अध्यक्ष की कुर्सी तक का सफर (बिजनेस स्टैंडर्ड)

आदिति फडणीस  

क्या आरसीपी सिंह को कभी अपने दलीय सहयोगी रहे प्रशांत किशोर की विदाई का अनचाहा लाभ मिला है? सियासी हलके में 'आरसीपी' के नाम से मशहूर इन शख्स को पिछले दिनों जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का अध्यक्ष बनाया गया है।


यूं तो भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) से इस्तीफा देकर कई लोग राजनीति में आए हैं जिनमें से कई लोग वरिष्ठ मंत्री तक बनाए गए हैं। लेकिन आरसीपी शायद ऐसे पहले पूर्व आईएएस अफसर हैं जो किसी अहम पार्टी के अध्यक्ष पद तक पहुंचने में सफल रहे हैं। उनके राजनीतिक उत्थान की एक दिलचस्प कहानी है जो अफसरशाही में करियर बिताने के बाद राजनीति का दामन थामने की मंशा रखने वाले किसी भी शख्स के लिए एक रोल मॉडल बन सकती है।


मूल रूप से उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी आरसीपी ने सेवानिवृत्त होने से पहले ही वर्ष 2010 में नौकरी से इस्तीफा दे दिया था और राजनीति का हिस्सा बन गए थे। लेकिन यह कदम अचानक ही नहीं उठाया गया था। उत्तर प्रदेश के समाजवादी नेता बेनी प्रसाद वर्मा ने आरसीपी का परिचय नीतीश से कराया था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद आईएएस परीक्षा में सफलता हासिल करने वाले आरसीपी एक आम बिहारी के लिए आदर्श शख्स नजर आते थे। नीतीश को वह शायद इसलिए भी पसंद आए कि दोनों कुर्मी बिरादरी से ही आते हैं। इसके अलावा नीतीश की तरह आरसीपी भी नालंदा जिले के मूल निवासी थे। वह सामाजिक रूप से पिछड़े तबके का हिस्सा होते हुए भी खुद को एक ऊंचे मुकाम तक पहुंचाने में सफल रहे थे।


जब नीतीश अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल एवं कृषि मंत्रालय का कामकाज देख रहे थे तो आरसीपी बतौर अफसर उनके साथ जुड़े। लेकिन वर्ष 2005 में नीतीश के बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद आरसीपी उनके प्रमुख सचिव के तौर पर तैनात होकर पटना चले गए।


वर्ष 2010 में आईएएस की नौकरी से इस्तीफा देने के बाद नीतीश ने आरसीपी को फौरन ही राज्यसभा भेज दिया। जल्द ही पटना में हर कोई यह जानने लगा कि नीतीश सरकार से कोई भी काम कराने के लिए आरसीपी से ही संपर्क साधना होगा। वहीं दिल्ली में भी वह जदयू की रणनीति एवं रुख तय करने लगे और भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों के लिए संपर्क का जरिया बन गए। वर्ष 2016 में राज्यसभा के लिए दूसरी बार चुने जाने के बाद जदयू ने उन्हें पार्टी संसदीय दल का नेता भी बना दिया तो एक तरह से साफ हो गया कि वह पार्टी के भीतर सत्ता की अहम धुरी बन चुके हैं। लेकिन इतने लंबे समय में भी वह कभी किसी संवाददाता को साक्षात्कार या बयान देते हुए नहीं नजर आए हैं। यह उनके चर्चा से दूर रहकर काम करने की शैली को दर्शाता है। साफ है कि वह पर्दे के पीछे रहकर काम करना पसंद करते रहे हैं।


लेकिन पटना में अचानक ही एक करिश्माई व्यक्ति की चर्चा जोर-शोर से होने लगी। उस शख्स का नाम प्रशांत किशोर था। ऐसी स्थिति में आरसीपी और चुनाव प्रबंधन के कुशल रणनीतिकार प्रशांत के बीच तनातनी होनी लाजिमी ही थी। प्रशांत ने 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू को जीत दिलवाने में अहम भूमिका निभाई थी। वैसे उसमें कुछ दूसरे कारकों का भी हाथ रहा था।


सितंबर 2018 में जदयू का प्राथमिक सदस्य बनने वाले प्रशांत को नीतीश ने कुछ हफ्तों में ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया था। तब लोकसभा के चुनाव ज्यादा दूर नहीं थे। सियासी हलके में नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) की भी चर्चा होने लगी थी जो बाद में जदयू के समर्थन से कानून भी बन गया।


प्रशांत किशोर का मानना था कि सीएबी जदयू के वैचारिक एवं चुनावी रुझान के खिलाफ है। उन्होंने अपनी राय खुलकर जाहिर भी कर दी। लेकिन जदयू एवं भाजपा के रिश्ते संभालने वाले आरसीपी को प्रशांत की यह साफगोई पसंद नहीं आई। उन्होंने नागरिकता कानून पर प्रशांत का बयान आते ही कहा, 'ये लोग कौन हैं? सांगठनिक ढांचे में उनका क्या योगदान है? उन्होंने कितने नए सदस्य बनाए हैं?'


जब नीतीश ने इस मसले पर जवाब-तलब किया तो प्रशांत किशोर को पक्ष रखना पड़ा। प्रशांत के ट्वीट ने जाहिर भी कर दिया कि उन्हें पार्टी से बाहर कराने में आरसीपी का ही हाथ रहा है। प्रशांत ने अपने ट्वीट में लिखा था, 'नीतीश कुमार, आपको किस वजह से और क्यों जदयू से मेरे जुड़ाव के बारे में झूठ बोलना पड़ा? मुझे अपने ही रंग में रंगने की आपने खराब कोशिश की है। और अगर आप सच कह रहे हैं तो इस पर कौन यकीन करेगा कि अमित शाह के कहने पर रखे गए शख्स की बात नहीं सुनने का साहस अब भी आपके भीतर है।' उनका इशारा इस ओर था कि आरसीपी अमित शाह के एजेंट हैं। निश्चित रूप से इसमें दम नहीं था लेकिन निशाना तो साधा जा चुका था। ऐसे में प्रशांत किशोर के पास जदयू से अलग होने के सिवाय कोई चारा नहीं रह गया था। वहीं आरसीपी लगातार पार्टी के भीतर मजबूत होते चले गए।


सवाल है कि अब आगे क्या होने वाला है? आरसीपी सिंह जदयू के नए अध्यक्ष बन चुके हैं। इसके क्या मायने हो सकते हैं? इसकी संभावना कम ही है कि वह महज बिचौलिया होने से कुछ अधिक की भूमिका में नजर आएंगे। फिर भी इसकी संभावना जरूर है कि आरसीपी के पार्टी अध्यक्ष रहते समय जदयू फिर से एक नए सियासी सफर पर निकलना चाहेगी। लेकिन निश्चित रूप से यह आरसीपी और जदयू दोनों के ही लिए एक नई शुरुआत है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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जिम्मेदार राजनीति ही बचाएगी असम में सूक्ष्म उधारी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

तमाल बंद्योपाध्याय  

असम विधानसभा ने आर्थिक रूप से कमजोर समूहों एवं व्यक्तियों को जबरन वसूली एवं अधिक ब्याज वाले कर्ज की मुश्किलों से बचाने के लिए असम सूक्ष्म वित्त संस्थान (धन उधारी नियमन) विधेयक 2020 को हाल ही में पारित कर दिया। राज्य में सूक्ष्म उधारी देने वाली एजेंसियों के नियमन के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बनाना भी इस कानून का मकसद है।

आखिर यह कानून बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? ऊपरी असम के डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, जोरहाट एवं शिवसागर जिलों के चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों का कर्ज में डूबे रहना और कुछ साहूकारों का वसूली के लिए जोर-जबरदस्ती वाले तौर-तरीके आजमाना इसका प्रमुख कारण है।

वर्ष 2019 में वामपंथी किसान संगठन किसान मुक्ति संग्राम समिति और छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने इस मुद्दे को उठाया था और इसे लेकर प्रदर्शन भी किया था। किसान मुक्ति संग्राम समिति के नेता अखिल गोगोई को दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शनों में भूमिका के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था और तब से वह कैद में ही हैं। लेकिन असम में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही राज्य सरकार ने इस मुद्दे को स्थानीय प्रदर्शनकारियों से अपने हाथ में लेने की कोशिश की है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने पहले ही चुनावी वादे के तौर पर किसान कर्ज माफी और महिलाओं को सूक्ष्म-वित्त ऋण देने की घोषणा की हुई है।


इस विधेयक की मुख्य बातें क्या हैं?

ठ्ठ कर्जदाताओं को ऋण पर वसूली जाने वाली ब्याज दरों और बकाया कर्ज की किस्तों एवं फंसे कर्ज की वसूली के बारे में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की तरफ से तय मानकों का पालन करना होगा।


(आरबीआई मानकों के तहत 500 करोड़ रुपये के ऋण पोर्टफोलियो वाला एक सूक्ष्म-वित्त संस्थान (एमएफआई) 10 फीसदी अंकों तक की ब्याज दर रख सकता है जबकि इससे छोटे आकार वाले एमएफआई के लिए तय ब्याज दर 12 फीसदी है। कर्ज पर ब्याज की दर आरबीआई द्वारा तिमाही आधार पर तय आधार दर के औसत के 2.75 गुना से अधिक नहीं होनी चाहिए। मौजूदा वक्त में आधार दर 7.96 फीसदी होने का मतलब है कि कोई भी एमएफआई 21.89 फीसदी से अधिक ब्याज नहीं वसूल सकता है। वैसे इन कर्जों पर ब्याज दर तय करने के लिए बैंक स्वतंत्र हैं।)


- एक उधारकर्ता को दो कर्जदाताओं से अधिक संस्थानों से कर्ज लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और अधिकतम कर्ज सीमा 1.25 लाख रुपये है। चाय बागान कर्मियों के लिए यह सीमा कम है। कई जरियों से कमाई करने वाले लोग 50,000 रुपये तक कर्ज ले सकते हैं जबकि अन्य के लिए यह सीमा 30,000 रुपये ही है।


- बाढ़ एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं के समय ब्याज के भुगतान पर न्यूनतम तीन महीनों का स्थगन जरूर दिया जाना चाहिए।

- कर्ज राशि में तीन अवयवों-ब्याज, प्रसंस्करण शुल्क एवं बीमा प्रीमियम का ध्यान रखा जाना चाहिए और सभी कर्ज गैर-जमानती होने चाहिए।


- सभी कर्जदाताओं को पारदर्शी तरीके से कर्ज देने एवं बकाया वसूली सुनिश्चित करने के लिए एक निष्पक्ष व्यवहार संहिता का अनुसरण करना चाहिए। कर्जदारों के संरक्षण एवं विवादों के निपटान के लिए राज्य हरेक जिले में एक फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन करना चाहता है।


इन प्रस्तावों को कोई भी चुनौती नहीं दे सकता है और असल में अधिकतर कर्जदाता पहले से ही इनका पालन कर रहे हैं। एमएफआई उद्योग ने पहली बार वर्ष 2006 में आचार संहिता तैयार की थी। आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में पैदा हुए एक संकट ने राज्य सरकार को उस समय की दो बड़े एमएफआई की 50 शाखाओं को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया था। ये एमएफआई ऊंची ब्याज दरें वसूल रहे थे और वसूली के लिए जोर-जबरदस्ती भी करते थे। वर्ष 2010 में आंध्र प्रदेश के एक कानून की वजह से करीब 65 लाख कर्जदारों ने 95 लाख सूक्ष्म ऋणों के पुनर्भुगतान में चूक कर दी जो कि पूरी दुनिया में किसी एक स्थान पर हुई सबसे बड़ी कर्ज चूक थी। इसके एक साल बाद इस आचार संहिता में कुछ बदलाव किए गए।


अंतरराष्ट्रीय वित्त कंपनी आईएफसी और लघु उद्योग विकास बैंक सिडबी भी अपने सुझावों के साथ सामने आए और आरबीआई से मान्यता-प्राप्त दो स्वनियामक निकायों एमएफआईएन और सा-धन ने इन्हें लागू किया था। इसे 2015 एवं 2019 में संशोधित किया गया ताकि सूक्ष्म कर्ज उद्योग के घटनाक्रम के साथ तालमेल बिठाया जा सके।


इसके अलावा सूक्ष्म-वित्त में सक्रिय यूनिवर्सल बैंकों, लघु वित्त बैंकों (एसएफबी) और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की बढ़ती हिस्सेदारी के बीच दोनों स्व-नियामक संगठनों ने 2019 में 'जिम्मेदार उधारी की एक संहिता' बनाई जो सभी सूक्ष्म उधारकर्ताओं के करने एवं नहीं करने लायक बिंदुओं को रेखांकित करता है।


फिर समस्या कहां पर है?


-असम विधेयक राज्य में कारोबार के लिए सभी कर्जदाताओं के स्थानीय स्तर पर पंजीकरण की सिफारिश करता है। अगर कोई देनदार गड़बड़ी की शिकायत करता है तो अधिकरण कर्जदाता को नोटिस जारी करने के बाद उसका पंजीकरण रद्द कर सकता है। कोई भी एमएफआई किसी बैंक से पहले ही उधार ले चुके शख्स को पंजीकरण अधिकरण की अनुमति के बगैर कर्ज नहीं दे सकेगा।


-इसके अलावा सभी ऋण पुनर्भुगतान ग्राम पंचायत के दफ्तर या पंजीकरण अधिकरण द्वारा अनुशंसित सार्वजनिक स्थल पर किए जाने चाहिए।


लेकिन कोई भी कर्जदाता इन दोनों प्रावधानों को पसंद नहीं करेगा। पहला प्रावधान उधार लेने की प्रक्रिया को अफसरशाही अड़चनों में उलझा देगा और दूसरे प्रावधान से कर्ज वसूली के सियासी मामला बन जाने की आशंका है। तमाम व्यावहारिक कारणों से यह विधेयक कर्जदाताओं के दोहरे नियमन की बात करता है जिनकी अनुशंसा आरबीआई एवं राज्य दोनों कर चुके हैं।


क्या असम सरकार इसे लागू कर सकती है? विधेयक को देखें तो उधारी के मानक एमएफआई, एनबीएफसी और कंपनी अधिनियम 2013 के तहत पंजीकृत किसी भी इकाई के लिए लागू होंगे। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) समेत तमाम सार्वजनिक बैंक कंपनी अधिनियम के दायरे में नहीं आते हैं, लिहाजा यह कानून उन पर लागू नहीं होगा। क्या ये मानक निजी क्षेत्र के बैंकों पर लागू होंगे जो बैंकिंग नियमन अधिनियम और आरबीआई अधिनियम के अलावा कंपनी अधिनियम से भी शासित होते हैं?


इसके बारे में कोई आखिरी नतीजा निकालने की कानूनी महारत मेरे पास नहीं है लेकिन यह एक जटिल मुद्दा है। पैसे उधार देना राज्य सूची का विषय है लेकिन बैंकों का नियमन केंद्रीय कानूनों से होता है। दोनों के बीच टकराव होने पर केंद्रीय कानून ही प्रभावी माने जाएंगे।


लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। मसलन, स्थानीय पंजीकरण इतने बेहिसाब नहीं होते क्योंकि एक राज्य की दुकानों या प्रतिष्ठानों में एक बैंक शाखा हो सकती है। लेकिन कारोबारी नियमों को लेकर केंद्रीय एवं राज्य के कानूनों में टकराव होने पर केंद्रीय कानून ही प्रभावी होना चाहिए। उस हिसाब से पंचायत दफ्तरों में कर्ज की किस्तों को जमा करने को चुनौती दी जा सकती है क्योंकि ऐसे दफ्तर निजी बैंकों के लिए कारोबार की जगह नहीं हैं। इससे एमएफआई भले न बच पाएं लेकिन नकद किस्त लेने से डिजिटल समावेशन की मुहिम को झटका लगेगा।


क्या असम विधेयक 2010 के आंध्र प्रदेश कानून को ही दोहराएगा जिसने एमएफआई उद्योग को लगभग खत्म ही कर दिया था? इसका जवाब है नहीं। वर्ष 2010 में  इस उद्योग का अधिकतम संकेंद्रण दक्षिणी राज्यों में ही था। उस समय आंध्र की हिस्सेदारी 25 फीसदी थी जबकि आज भी सूक्ष्म उधारी में असम का हिस्सा 5 फीसदी से भी कम है। राज्य में 23.18 लाख कर्जदारों ने 30 एमएफआई, 10 एनबीएफसी, 6 यूनिवर्सल बैंकों एवं 4 एसएफबी से कर्ज लिए हुए हैं। सितंबर में बकाया सूक्ष्म ऋण 11,087 करोड़ रुपये था जिसमें बैंकों की हिस्सेदारी 50 फीसदी से भी अधिक है। जिम्मेदार उधारी से यह संकट कम होगा, बशर्ते राज्य इसे चुनावों से पहले एक राजनीतिक मुद्दा न बनाए।


(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)

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भरोसे का अभाव (बिजनेस स्टैंडर्ड)

नागरिकता संशोधन कानून तथा कृषि विपणन कानूनों के खिलाफ विरोध, कोविड-19 टीके को लेकर संदेह तथा आर्थिक नीति को लेकर आंतरिक मतभेद की खबर बाहर आने जैसे तमाम मामले बताते हैं कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार अति आत्मविश्वास की शिकार है। यह संयोग भर नहीं कि सन 1984 के बाद लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी जीत हासिल होने के एक साल के भीतर ही सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। नौ दौर की वार्ता, तमाम रियायतों की घोषणा और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर समिति के गठन के बावजूद किसान प्रदर्शनकारियों का कड़ा रुख बताता है कि सरकार और शासितों के बीच मतभेद बहुत बढ़ चुके हैं।


कानूनों का इरादा भले ही सुधारवादी है लेकिन सरकार ने जिस तरह हड़बड़ी में इन कानूनों को पारित किया उससे उनके सारे लाभ पीछे छूट गए। पहले इन्हें अध्यादेश के रूप में पेश किया गया था। इसके पश्चात सरकार ने संसद में भारी बहुमत का लाभ उठाते हुए मॉनसून सत्र में इन्हें पारित कर दिया। कोविड-19 के कारण वैसे भी यह सत्र बहुत अल्पकालिक था और कानूनों पर अधिक बहस न हो सकी। बाद में किसानों ने राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं का घेराव किया तब सरकार ने दावा किया कि उसने कृषि क्षेत्र की लॉबीज के साथ व्यापक चर्चा के बाद कानून बनाए हैं।


इसके बाद उसने प्रमुख किसान नेताओं के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों को लगा दिया। अब कृषि मंत्रालय ने सूचना का अधिकार अधिनियम के अधीन एक आवेदन के उत्तर में स्वीकार किया है कि उसके पास ऐसी बातचीत का कोई रिकॉर्ड नहीं है। ऐसे उदाहरण सरकार में भरोसा बढ़ाने वाले नहीं हैं। सरकार की ओर से लगातार यह आश्वासन दिया गया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रहेगा। अनुबंधित कृषि के मामलों में अदालती सुनवाई की व्यवस्था देने के लिए कानूनों में संशोधन की बात कही गई लेकिन किसानों को सरकार की बातों पर विश्वास नहीं है।


भरोसे की यह कमी 2019 में भी सामने आई थी जब नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन हुए। पूर्वी दिल्ली का शाहीन बाग इसका प्रतीक बन गया था। आश्वासन दिया गया था कि मुस्लिमों को नागरिकता नहीं गंवानी होगी लेकिन सत्ताधारी दल तथा उसके तमाम अनुषंगी संगठनों की मुस्लिम विरोधी छवि के चलते इन आश्वासनों को तवज्जो नहीं मिली। दोनों प्रदर्शनों ने दिखाया कि सार्थक विपक्षी दल की अनुपस्थिति का यह अर्थ नहीं कि अपने हित दांव पर लगे होने पर भी नागरिक पहल नहीं करेंगे। कोविड-19 टीकाकरण अभियान के मामले में कई राज्यों का बहुत अधिक इच्छा नहीं दिखाना बताता है कि उन्हें भारत बायोटेक की कोवैक्सीन को मंजूरी दिए जाने पर भरोसा नहीं है।


इस टीके का तीसरे चरण का परीक्षण भी पूरा नहीं हुआ है। यह टीका तब लगाया जा रहा है जब टीका लगवाने वाला व्यक्ति एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करता है। जाहिर है आबादी का बड़ा हिस्सा ऐसे टीके पर भरोसा नहीं करेगा। केंद्रीय मानक औषधि नियंत्रण संस्थान ने विषय विशेषज्ञ समिति की बैठकों के ब्योरे जारी किए हैं जो बताते हैं समिति पहले कोवैक्सीन को लेकर सशंकित थी लेकिन बिना किसी स्पष्टीकरण के दो दिन बाद इसे मंजूरी दे दी गई। किसी सरकारी प्रतिनिधि ने इस विषय में स्थिति साफ नहीं की। विश्वास की कमी सरकार के भीतर भी घर कर गई है।


हवाई अड्डों पर अदाणी समूह के एकाधिकार को लेकर नीति आयोग और वित्त मंत्रालय के पूर्वग्रह के बारे में मीडिया में खबरें बाहर आना उस सरकार के लिए उल्लेखनीय है जिसने खुलकर और आक्रामक तरीके से मीडिया को नियंत्रित करने का प्रयास किया है। मोदी सरकार अभी भी लोकप्रिय हो सकती है लेकिन ये घटनाएं बताती हैं कि गैर राजनीतिक विपक्ष भी उतना ही ताकतवर हो सकता है जितना कि राजनीतिक विरोध।

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Monday, January 18, 2021

नए नियामकों की कामना में सतर्कता बरतना जरूरी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सोमशेखर सुंदरेशन 

एक केंद्रीय मंत्री का साक्षात्कार पिछले दिनों काफी चर्चा में रहा। उस साक्षात्कार में भविष्य के नीतिगत विचार और कानूनों की झलक मिलती है। मंत्री ने इस्पात और सीमेंट क्षेत्र की कीमतों में अनुचित इजाफे की शिकायत करते हुए कहा है कि इन दोनों क्षेत्रों के लिए अलग-अलग नियामक बनाकर इनके कारोबार का प्रबंधन किया जा सकता है और कारोबारियों की सांठगांठ से निपटा जा सकता है। कारोबारियों की ऐसी एकजुटता से निपटने के लिए प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के रूप में एक कानून है और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के रूप में इसके प्रवर्तन के लिए एक एजेंसी भी है। यदि धारणा ऐसी है कि यह कानून और आयोग अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सके हैं तो इसके उत्तर में पहले तो परीक्षण किया जाना चाहिए कि आखिर कमी कहां रह गई है। यदि कोई कमी हो तो उसे दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए। नए नियामक की मांग भारत में आजमाए जाने वाले चिरपरिचित फॉर्मूले की तरह है: आप मुझे समस्या दिखाइए और मैं एक कानून बना दूंगा, मुझे बाजार की समस्या दिखाइए और मैं नया नियामक बना दूंगा।


यदि पुराने अनुभवों से सबक लिया जाए तो किसी खास उद्योग के लिए नया क्षेत्रीय नियामक बनाने से प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचाने वाले आचरण से लडऩा मुश्किल होता है। कहा जाता है कि ये नियामक उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करेंगे। वैसे ही जैसे पूंजी बाजार नियामक का लक्ष्य निवेशकों की रक्षा का होता है और बीमा नियामक पॉलिसीधारकों की रक्षा करता है। उनके द्वारा नियमित किए जाने वाले संस्थान गलत प्रतिस्पर्धा से संरक्षित नहीं किए जाते। ऐसे में यदि क्षेत्र के बड़े कारोबारी एक साथ मिलकर ऐसी शर्तें तय कर देते हैं जो अन्य प्रतिस्पर्धियों के लिए पूरी तरह अव्यावहारिक हों तो उस स्थिति में इस बात की काफी संभावना है कि संरक्षितों के हित के लिए नवाचार करने के इच्छुक  कारोबारियों को ही निगरानी के दायरे में डालने की मांग की जाएगी। क्षेत्रवार नियामकों के साथ यह जोखिम रहा है कि वे अपने नियमों में कमजोर भाषा का इस्तेमाल करेंगे। मिसाल के तौर पर अच्छे आचरण और पेशेवर आचरण तथा व्यवस्थित प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की मांग। परंतु उनके पास ऐसे वक्तव्यों के अलावा करने को कुछ खास नहीं होता और वे व्यवस्थित रूप से संहिताबद्ध प्रतिस्पर्धा कानून का विकल्प नहीं बन पाते। जब भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, प्रतिस्पर्धा कानून के प्रवर्तन में शामिल हो जाता है तो विनियमित संस्थाओं की स्वाभाविक दलील यही होती है कि एक क्षेत्रीय नियामक है जो विशेषज्ञ है और पहले उसे इस मसले से निपटना चाहिए। प्रतिस्पर्धा आयोग को अक्सर अपने हाथ बांधने पड़ते हैं और नियम उल्लंघन के आरोपित क्षेत्रीय नियामक और प्रतिस्पर्धा आयोग के बीच टकराव की स्थिति निर्मित कर देते हैं जबकि कथित उल्लंघन वाला आचार जारी रहता है और उसका स्वरूप बदलता रहता है। दूरसंचार नियमों के उल्लंघन के एक कथित मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा निर्णय दिया जिसके अनचाहे परिणाम सामने आए। न्यायालय ने पाया कि उल्लंघन के आरोप दरअसल दूरसंचार नियमन के उल्लंघन के आरोप हैं। ऐसे में दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं, यह निर्णय भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग पर छोडऩे के बजाय यह उचित समझा गया कि पहले प्राधिकरण स्वयं यह जांच और आकलन कर ले कि कोई उल्लंघन हुआ है या नहीं। इसके बाद ही प्रतिस्पर्धा आयोग परिदृश्य में आए। यह बात तार्किक नजर आती है लेकिन इस निर्णय का यह अर्थ लगाया गया कि यह कर संबंधी कानून का प्रावधान होने के बावजूद एकदम अलग है।


अब यह एक नजीर बन गई है और जब भी प्रतिस्पर्धा आयोग किसी मामले की जांच करता है तो यह दलील दी जाती है कि जब एक क्षेत्रीय नियामक मौजूद है तो प्रतिस्पर्धा आयोग को तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि क्षेत्रीय नियामक इस मसले पर अंतिम निर्णय नहीं ले लेता। न्यायिक क्षेत्राधिकार की ऐसी चुनौतियों को अलग-अलग अदालतोंं में अलग-अलग स्तर पर सफलता मिली। क्षेत्रीय नियामकों के द्वारा अंतिम निर्णय लेने से मामला समाप्त नहीं होता। क्षेत्रीय नियामक के ऊपर की अपील पंचाट को भी इस पर एक नजर डालनी होती है। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय उस पंचाट की अपील पर एक नजर डालता है।


यदि प्रतिस्पर्धा आयोग को अंतिम अदालत के अपनी बात कह चुकने के बाद ही अपना प्राथमिक नजरिया बनाने की इजाजत होती तो इसका अर्थ यह है कि संसद द्वारा प्रतिस्पर्धा कानून के तहत दी गई रियायत बरकरार है। यानी प्रतिस्पर्धा कानून के तहत मिले संरक्षण काफी हद तक प्रभावी ढंग से समाप्त होते हैं। जिन क्षेत्रों में लाइसेंसशुदा नियामक नहीं बल्कि टैरिफ नियामक के रूप में सीमित नियमन है वे ऐसी दलील सामने रखने के लिए जाने जाते हैं जिनमें कहा जाता है कि क्षेत्रीय नियामक को उन मामलों में वरीयता हासिल है जहां प्रतिस्पर्धा आयोग ऐसे गलत आचरण की पड़ताल करता है जो शुल्क से संबंधित नहीं है। एक संभावना इससे भी अधिक खतरनाक है। यदि किसी को इस्पात या सीमेंट नियामक बनाना हो तो यह संभावना है कि ऐसे नियामक वित्तीय क्षेत्र के नियामकीय मॉडल पर काम करें। बल्कि सच तो यह है कि किसी भी नए नियामक को सेबी जैसा नियामक बनाना चलन में है। ऐसे मामलों में एक बार पंजीयन की शुरुआत होने के बाद निगरानी का पालन करना होगा। भला आचरण की जांच और कैसे होगी। ऐसे में कहा जा सकता है कि लाइसेंस और इंसपेक्टर राज की वापसी जैसी स्थितियां बनेंगी।


पहले से काम कर रहे विनिर्माताओं को यह रास आएगा। वे ऐसी नियामकीय व्यवस्था को लेकर पर्याप्त चिंताएं जता सकेंगे जिसमें प्रतिभागियों को लेकर कड़ाई न हो। इस प्रकार वे नए प्रतिभागियों की राह में प्रतिस्पर्धात्मक बाधाएं खड़ी करके उनकी राह रोक सकेंगे। ऐसे में इस तरह की इच्छा प्रकट करते वक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)

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न तो 'उड़ता' न ही 'पढ़ता' पंजाब (बिजनेस स्टैंडर्ड)

शेखर गुप्ता 

ग्रांड ट्रंक रोड पर दिल्ली की उत्तरी सीमा पर स्थित सिंघु नाम का गांव इन दिनों समाचारपत्रों की सबसे मशहूर डेटलाइन है। प्रदर्शनकारी किसानों ने वहां एक छोटा कस्बा बसा लिया है जिनमें पंजाब से आए किसानों की भरमार है। वहां पहुंचने वाले रिपोर्टरों और कैमरों को हर रोज नई-नई खबरें मिल जा रही हैं।


पिज्जा लंगर, मसाज कुर्सियां, स्पा, जिम, चलित शौचालय, कैंप में इस्तेमाल होने वाले बिस्तर, क्लिनिक, दवाओं की दुकानें और सबसे बढ़कर पुस्तकालय एवं पढऩे के कमरे तक की खबरें हैं। खबरों की कवरेज, दृश्यों, राजनीति एवं विवादों, तारीफों और उपहासजनक हंसी के इस हंगामे के बीच एक तस्वीर ने पिछले हफ्ते मेरा ध्यान खींचा। 'द प्रिंट' की युवा फोटोग्राफर मनीषा मंडल ने एक शानदार पल को कैमरे में कैद किया था। तीन महिलाएं किताबें पढऩे में इस कदर तल्लीन थीं कि उन्हें कैमरे की मौजूदगी का आभास तक नहीं हुआ। उनके ऊपर एक बोर्ड टंगा हुआ था।


मेरे लिए तो वह साइनबोर्ड एक अहम कहानी बयां करता है। उस साइनबोर्ड पर गुरमुखी एवं रोमन दोनों लिपियों में लिखा हुआ था- 'उड़ता पंजाब' नहीं, 'पढ़ता पंजाब'। इसका मतलब है कि पंजाब नशे की गिरफ्त में न होकर बौद्धिक रूप से समृद्ध है।  हिंदी फिल्मों में अधिक रुचि नहीं रखने वाले लोगों के लिए बता दूं कि 'उड़ता पंजाब' 2016 में आई एक फिल्म का नाम था जिसमें पंजाब पर तीखे व्यंग्य किए गए थे। कहने को तो वह फिल्म एक ब्लैक कॉमेडी थी लेकिन उसमें सियासत का भरपूर असर था।

पंजाब में कुछ महीने बाद चुनाव होने वाले थे। अकाली दल एवं भाजपा गठबंधन की सरकार काबिज थी। सामाजिक-आर्थिक विकास के किसी भी सूचकांक पर पंजाब बहुत अच्छी हालत में नहीं था और युवाओं के बीच नशे की बढ़ती लत बड़ी चिंता थी।  विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा नए प्रतिद्वंद्वी आम आदमी पार्टी (आप) ने भी नशे के मुद्दे को सत्ता तक पहुंचने का जरिया बनाना चाहा। उनका कहना था कि अकाली-भाजपा सरकार के दो कार्यकाल में पंजाब हेरोइन-स्मैक-कोकीन की गिरफ्त में आ गया। हर गांव की लगभग पूरी युवा आबादी नशे की शिकार हो चुकी थी। और सुखबीर सिंह बादल के साले समेत अकाली दल के कई नेताओं को ड्रग माफिया से जोड़ा जा रहा था। उस फिल्म में एक ऐसा किरदार भी था जो उस चर्चित साले की नकल था। फिल्म ने पंजाब को ऐसे रूप में पेश किया कि हर कोई या तो नशेड़ी है या बलात्कारी है या तस्कर है या नेता एवं पुलिस का होने पर उसमें ये सब कुछ है। फिल्म ने पूरे देश का ध्यान पंजाब की तरफ खींचा, लेकिन राज्य में कई लोगों को परेशानी भी हुई। हम मुश्किलों से घिरे हैं लेकिन वे ऐसी नहीं हैं। पंजाब में कितने लोग ऐसे हैं जो दिल्ली-मुंबई-गोवा के अमीर लड़कों की तरह क्लब या बार में कोकीन छोडि़ए, हेरोइन का नशा भी करने की हैसियत में हैं? यह फिल्म पंजाब में चुनाव के पहले आई थी। मतदाताओं ने अकाली-भाजपा गठबंधन को सत्ता से बाहर कर दिया लेकिन 'उड़ता पंजाब' की लहर पर सवार आप का भी हाथ नहीं थामा। आप ने उस चर्चित साले समेत सभी ड्रग माफिया को जेल भेजने का वादा किया था। बहरहाल समय बीतने के साथ उड़ता पंजाब का किस्सा मद्धम पड़ता गया। उस फिल्म ने पंजाब को बदनाम करने का काम किया। उस साले को सारी एजेंसियों ने पाक-साफ करार दिया और उसने कुछ सम्मानित समाचारपत्रों के खिलाफ मानहानि के मुकदमों में जीत भी हासिल की। इस लिहाज से सिंघु बॉर्डर पर दिखा वह साइनबोर्ड पंजाब की नकारात्मक छवि को तोडऩे की एक कोशिश है। पंजाब के लोग सिर्फ भांगड़ा करने में ही यकीन नहीं करते हैं। आप की सोच से कहीं अधिक हैं यहां के लोग। एकीकृत पंजाब में पले-बढ़े बच्चे के तौर पर मैं यही कहूंगा कि वर्ष 1966 में हुए विभाजन के बाद बने तीनों राज्यों में से कोई भी बहुत खराब हाल में नहीं था। न तो हमारे सारे युवा भांगड़ा एवं पॉप संगीत कार्यक्रमों में थिरकते रहते हैं और न ही हमारे बाप-चाचा आपकी थाली में रोटी-चावल पहुंचाने के लिए मेहनत करने के बजाय हेरोइन की तस्करी करते हैं। न ही वे अपने खेतों में काम करने बिहार से आने वाले गरीब मजदूरों को प्रताडि़त करते हैं और उनके घरों की जवान औरतों का सामूहिक बलात्कार एवं ट्रैफिकिंग करते हैं। उस फिल्म में ऐसी ही एक लड़की का किरदार आलिया भट्ट ने बखूबी निभाया था। लेकिन वह पंजाब एवं उसके लोगों को गलत ढंग से पेश करने की कोशिश थी।

पंजाब के ग्रामीण इलाकों में थोड़ा भी वक्त बिताने या सिंघु पर जुटे किसी भी शख्स से बात करने से आपको यह हकीकत पता चलेगी कि वे अपने खेतिहर मजदूरों का कितना ख्याल रखते हैं, और उनके बगैर उनका काम नहीं चल सकता है।  मैं इस पर थोड़ी गहराई से विचार करूं। क्या मुझे नहीं दिख रहा कि अपने राज्य को 'उड़ता पंजाब' बताने वाले लोग ही 'पढ़ता पंजाब' पर खुश हो रहे हैं? आप पार्टी प्रदर्शनकारियों को मुफ्त वाई-फाई एवं शौचालय देने के अलावा सियासी समर्थन भी दे रही है। राष्टï्रीय मौजूदगी वाले वामदल इस अभियान के हरावल दस्ता बने हुए हैं। इस समय कोई भी नशे की गिरफ्त की बात तक नहीं कर रहा है जबकि पंजाब में नशा अब भी एक हकीकत है। बीते चार साल में दलजीत दोसांझ के लिए ऐसे बदलाव को महसूस करने वाले कौन से बदलाव हुए हैं? क्या अमरिंदर सिंह की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने इतना अच्छा काम किया है? ऐसा दावा तो खुद अमरिंदर भी नहीं कर सकते हैं। पंजाब की नेक-दिल छवि का जश्न 'उड़ता पंजाब' के समय वाले लोग ही मना रहे हैं। पंजाब एवं पंजाबियों की कृषि कानूनों को लेकर अपनी आशंकाएं, अविश्वास एवं शिकायतें हैं। पंजाब खासकर इसकी गर्वीली सिख आबादी के मन में 'दिल्ली दरबार' के प्रति बादशाह औरंगजेब के समय से ही अदावत रही है। औरंगजेब ने सिखों के गुरु तेग बहादुर का सिर कलम करा दिया था जहां पर दिल्ली के चांदनी चौक में शीशगंज गुरद्वारा बना हुआ है। 19वीं सदी के मध्य में अंग्रेजों एवं सिखों के बीच कई लड़ाइयां भी हुईं। 20वीं सदी में दिल्ली दरबार के 'धक्का' के खिलाफ पंजाब में कई बार तीखे विरोध हुए। इसी बीच अकाली 1973 में बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब प्रस्ताव लेकर आए जिसमें संघवाद को अनुच्छेद की तर्ज पर नए सिरे से परिभाषित करने की बात कही गई थी।

इसके नतीजे काफी बुरे रहे। पंजाब के 1981 से लेकर 1993 के दौरान चरम पर रहे आतंकवाद के दौरान हजारों लोग मारे गए। इसी अवधि में पंजाब से प्रतिभा, पूंजी एवं उद्यमिता का भी पलायन हुआ। औपनिवेशिक काल में पूर्व का मैनचेस्टर कहे जाने वाले लुधियाना के अधिकांश उद्यमी परिवार बाहर चले गए। पंजाब कृषि पर निर्भर राज्य बनता गया जबकि बाकी देश तरक्की की राह पर चल पड़ा था। पंजाब 1991 से शुरू आर्थिक वृद्धि का फायदा उठाने से चूक गया।

पंजाब प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से देश का सबसे अमीर राज्य होने से अब भी लापरवाह था। लेकिन दूसरे राज्यों में उद्योग लग रहे थे और फासला घट रहा था। आखिरी बार 2002-03 में पंजाब अव्वल स्थान पर रहा था। आज के समय यह 13वें स्थान पर है। इसकी प्रति व्यक्ति आय राष्टï्रीय औसत से महज 15 फीसदी अधिक है। गोवा एवं सिक्किम जैसे छोटे राज्यों को छोडि़ए, अब तो पंजाब से ही अलग गठित राज्य हरियाणा (5वां) एवं हिमाचल प्रदेश (12वां) भी इससे आगे हैं। वैसे पंजाब इस बात को लेकर गर्व कर सकता है कि अब भी एक औसत पंजाबी एक बिहारी की तुलना में 3.5 गुना अधिक धनी है। लेकिन वह गोवा के निवासी की तुलना में एक-तिहाई पर भी है। और हरियाणवी बंदा तो एक पंजाबी से 50 फीसदी अधिक धनी है। अमरिंदर सिंह सरकार द्वारा मोंटेक सिंह आहलूवालिया की अध्यक्षता में गठित समिति के आंकड़े बताते हैं कि कृषि क्षेत्र में भी पंजाब पीछे छूट रहा है। वर्ष 2004-05 से लेकर 2019 के दौरान पंजाब की औसत कृषि विकास दर 2 फीसदी रही है जबकि बिहार में यह 4.8 फीसदी एवं उत्तर प्रदेश में 2.9 फीसदी है। हरियाणा एवं हिमाचल प्रदेश में यह क्रम


श: 3.8 एवं 2.7 फीसदी रही है। पहले से ही समृद्ध राज्यों में शुमार महाराष्टï्र में कृषि विकास दर 3.4 फीसदी रही है।  आंकड़े एक क्रूर तस्वीर पेश करते हैं। निश्चित रूप से एमएसपी एवं सब्सिडी को अगले कई वर्षों तक जारी रहना चाहिए। लेकिन पंजाब को फिर से अपनी उद्यमशीलता पर लौटना होगा। पंजाब को अपनी मांग एमएसपी तक सीमित रखने के बजाय भूमि उपयोग का जिक्र करना चाहिए। उस दिशा में हरियाणा भी आगे है जिसने अपने किसानों को लॉजिस्टिक एवं गोदामों के लिए अपनी जमीन किराये पर देने की मंजूरी दे दी है। पंजाब एवं इसके किसानों को आर्थिक आजादी, भूमि उपयोग की स्वतंत्रता की जरूरत है, न कि गेहूं-धान एमएसपी की। अगर पंजाब के लोग अब भी इसे नहीं समझ पाते हैं और तारीफ में डूब जाते हैं तो वे न ही उड़ता और न ही पढ़ता पंजाब रहेंगे बल्कि बॉलीवुड के ही मुहावरे में उनकी छवि 'फुकरा' पंजाब की हो जाएगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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बड़े प्रयास की जरूरत (बिजनेस स्टैंडर्ड)

देश में कोविड-19 के लिए व्यापक टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हो गया है। पहले चरण में स्वास्थ्य कर्मियों को प्राथमिकता दी जा रही है। पहले दिन ऐसे करीब दो लाख कर्मियों को टीका लगाया गया। हालांकि कार्यक्रम की निगरानी और टीकाकरण की जरूरत वाले लोगों के पंजीकरण के लिए बनाए गए डिजिटल प्लेटफॉर्म में दिक्कतें सामने आई हैं। अन्य देशों से इतर भारत ने शुरुआती टीके सबसे ज्यादा जोखिम वाले लोगों यानी बुजुर्गों के लिए नहीं रखे हैं। शायद इसकी वजह बुजुर्गों को चिह्नित करने में दिक्कतें हैं। वजह जो भी हो, लेकिन यह साफ है कि प्राथमिकता को लेकर विवाद जल्द पैदा होने के आसार हैं। पहले ही बहुत से क्षेत्र मांग कर रहे हैं कि उनके कर्मचारियों की 'आवश्यक' के रूप में गिनती हो और उन्हें प्राथमिकता में ऊपर रखा जाए। 

सरकार में यह लॉबीइंग दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन इसे संभावित माना जाना चाहिए। इस कतार की धक्का-मुक्की को कम करने का एकमात्र तरीका यह सुनिश्चित करना है कि जन टीकाकरण के लिए एक मजबूत निजी क्षेत्र का चैनल विकसित किया जाए। बहुत सी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के लिए टीके खरीदने और लगाने की मंशा जताई है। सरकार ने अभी इस पर कोई फैसला नहीं लिया है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन कंपनियों के प्रयासों को सहमति देने से सरकारी व्यवस्था पर दबाव घट जाएगा, टीकाकरण क्षमता में इजाफा होगा, लागत घटेगी और अर्थव्यवस्था जल्द सामान्य स्थिति में लौट पाएगी। सरकार को ज्यादा देरी नहीं करनी चाहिए और नियामक की मंजूरी मिलने के बाद सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और फाइजर को टीका खरीद के बड़े करार करने की मंजूरी देनी चाहिए। कंपनी सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) की धनराशि को टीकाकरण में इस्तेमाल करने की मंजूरी के आग्रहों को स्वीकार करना चाहिए।


कुल मिलाकर टीकाकरण कार्यक्रम के सरकार के रोडमैप को लेकर कुछ भ्रम बना हुआ है। किस चरण में कितने लोगों, कितनी प्राथमिकता और किसकी लागत पर टीकाकरण होगा? यह कार्यक्रम शुरू किया जा चुका है, लेकिन इन सवालों के अभी संतोषजनक जवाब नहीं आए हैं। अगले कुछ महीनों में तेजी से टीकाकरण और बुजुर्गों एवं पहले ही किसी बीमारी वाले लोगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। दुर्भाग्यवश सरकार ने वे कदम नहीं उठाए हैं, जो वह इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए उठा सकती थी। उदाहरण के लिए यह अभी तक टीका बनाने वाली कंपनियों को कानूनी सुरक्षा देने के वैश्विक कदमों का भी अनुसरण करने में नाकाम रही है ताकि उन्हें मामूली आधार पर मुकदमों से सुरक्षा दी जा सके। टीका विनिर्माताओं का कहना है कि यह तेजी से टीकाकरण के लिए जरूरी है और विनिर्माताओं के लिए हर्जाना वाजिब होना जरूरी है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बहुत से देश पहले ही आंशिक हर्जाने पर व्यय कर चुके हैं।


आखिर में, टीकों के प्रति लोगों के भरोसे से जुड़े सवालों को दूर करते रहना होगा। सरकार भारत बायोटेक के कोवैक्सीन टीके के मामले में लोगों को भरोसा दे पाने में नाकाम रही है जिसके तीसरा चरण का परीक्षण अभी पूरा नहीं हुआ है। संयोग की बात है कि एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफर्ड द्वारा विकसित टीके की तुलना में कोवैक्सीन टीके की उपलब्ध खुराकें कम हैं। फिर भी आशंकाओं को बने रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटकलों पर भरोसा करने को लेकर ठीक ही चेताया है। सरकार एवं उसके नियामकों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। टीकों के किसी भी प्रतिकूल असर की विधिवत एवं पारदर्शी जांच की जाए और टीके के सुरक्षित होने के बारे में नियमित सूचना दी जाए। सरकार नोटबंदी जैसे व्यापक अभियान पर देशव्यापी संकल्पशक्ति का आह्वान कर अपनी क्षमता दिखा चुकी है। कोविड टीकाकरण में उससे कमतर राजनीतिक पहल से बात नहीं बनेगी।

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Saturday, January 16, 2021

यूनिकॉर्न का बढ़ता बाजार (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन  

क्या देश का टेक्नोलॉजी स्टार्टअप क्षेत्र परिपक्व हो रहा है? इस प्रश्न को तीन या चार तरह से स्पष्ट किया जा सकता है। मूल्यांकन से शुरुआत करें तो क्या यूनिकॉर्न (ऐसी स्टार्टअप टेक कंपनियां जिनका मूल्यांकन एक अरब डॉलर या अधिक हो) को बाजार पूंजीकरण में सम्मानजनक राशि मिल रही है? वैश्विक यूनिकॉर्न रैंकिंग में भारत की क्या स्थिति है? क्या ये कारोबार किसी वेंचर कैपिटलिस्ट की नजर में चमकने के अलावा वास्तव में बढिय़ा कारोबार कर रहे हैं? दूसरे शब्दों में कहें तो क्या उनके पास पर्याप्त कर्मचारी और समुचित बिक्री राजस्व है जिसकी बदौलत वे कुछ फर्क ला सकें। आखिर में क्या वे मुनाफा कमा रही हैं? जवाब अलग-अलग होंगे। उदाहरण के लिए जैसा कि इस समाचार पत्र ने लिखा, भारत में अब 37 यूनिकॉर्न हैं। इनमें से 16 सन 2020 में इस सूची में आईं। वैश्विक रैंकिंग में अमेरिका और चीन के बाद यह तीसरा स्थान है। हम ब्रिटेन और जर्मनी से आगे हैं। यह अच्छा प्रदर्शन है लेकिन इस कहानी में एक पेच है: भारतीय उद्यमियों ने ज्यादा यूनिकॉर्न विदेशों में स्थापित कीं। हुरुन की वैश्विक यूनिकॉर्न सूची के मुताबिक इनकी तादाद 40 है। अमेरिका में सर्वाधिक मूल्य वाली शीर्ष छह फर्म टेक्रोलॉजी क्षेत्र की हैं। इस नजरिये से देखें तो देश की 37 स्वदेशी यूनिकॉर्न में से केवल तीन या चार को ही निफ्टी 50 में शामिल होने लायक माना जा सकता है, बशर्ते कि वे सूचीबद्ध होना चाहें। अंतर यह है कि अमेरिकी टेक्रोलॉजी स्टार्टअप ने वैश्विक मंच तैयार किए हैं, उन्नत तकनीक पेश की हैं और वैश्विक उत्पाद निर्मित किए हैं जबकि भारतीय कंपनियों ने वेब आधारित देसी बाजार की ताकत का लाभ लिया है।


इससे यह समझा जा सकता है कि आखिर क्यों देश की 37 यूनिकॉर्न का समेकित मूल्यांकन देश के शेयर बाजार के कुल मूल्यांकन का करीब 5 फीसदी है। यदि कोक, पेप्सी, हुंडई और कॉग्निजेंट जैसे अन्य कारोबारों को शामिल किया जाए जो भारत में सूचीबद्ध नहीं हैं लेकिन बाजार में अच्छी हिस्सेदारी रखते हैं तो इन यूनिकॉर्न का हिस्सा और कम हो जाएगा। सबसे बड़ी यूनिकॉर्न फ्लिपकार्ट का आकार रिलायंस के छठे हिस्से भी कम है। आप इसे दिए गए समय के हिसाब से छोटा या प्रभावी मान सकते हैं लेकिन असल बात यह है कि खेल अभी शुरू हुआ है।


बिक्री राजस्व और कर्मचारियों की बात करें तो बड़ी यूनिकॉर्न गंभीर माने जाने वाले आंकड़ों के आधे के करीब हैं। यह भी महामारी के बाद जबकि उसने कई डिजिटल कारोबारों को ई-कॉमर्स, एडटेक, फिनटेक और अन्य क्षेत्रों में अच्छी हिस्सेदारी हासिल करने में मदद की है। महामारी के पहले भी फ्लिपकार्ट ने सन 2019-20 में 36,400 करोड़ रुपये का राजस्व कमाया था। वह भी एक ऐसे देश में जहां संगठित खुदरा कारोबार अभी बहुत छोटा है। शिक्षा क्षेत्र में बैजूस का राजस्व फ्लिपकार्ट के दसवें हिस्से से भी कम है। मूल्यांकन की भी यही स्थिति है लेकिन अब वह मुनाफा कमा रही है और समय के साथ मार्जिन बेहतर होने की आशा है। अधिकांश यूनिकॉर्न अभी भी पैसा फूंक रही हैं और जीडीपी की दृष्टि से मूल्यह्रास की वजह हैं। परंतु एमेजॉन सन 2016 तक यानी स्थापना के दो दशक बाद तक मुनाफे में नहीं थी। अब उसका मुनाफा बढ़ रहा है। कुछ भारतीय यूनिकॉर्न की स्थिति भी बदल रही है। मूल्यांकन एक ऐसी परिसंपत्ति है जिसका इस्तेमाल कम मूल्यांकन वाले कारोबार के साथ विलय या उसके अधिग्रहण में किया जाता है। सन 2000 में एओएल और टाइम वार्नर का उदाहरण याद कीजिए।


प्रश्न यह है कि पैसे कौन कमा रहा है? बड़े निवेशक विदेशी हैं: जापान का सॉफ्टबैंक, चीन की अलीबाबा और अमेरिका की सिकोया आदि। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत में बड़ा वेंचर कैपिटल उद्योग नहीं है जो जोखिम ले सके। मुकेश अंबानी की रिलायंस अपवाद है। देश के स्थापित कारोबारी पारंपरिक कारोबार में उलझे रहे। रतन टाटा ने सेवानिवृत्ति के बाद स्टार्टअप में निवेश शुरू किया। उनके पोर्टफोलियो में पेटीएम और ओला के रूप में दो यूनिकॉर्न हैं जबकि टाटा समूह बिग बास्केट के अधिग्रहण पर निगाहें जमाए है।


ऐसे में अधिकांश कारोबारी संपत्ति निर्माण के खेल में आ रहे इस बदलाव में नुकसान उठाएंगे। रिलायंस और टाटा के अलावा वे बीते दो दशक की अहम घटनाओं: सॉफ्टवेयर और दूरसंचार का लाभ उठाने में भी नाकाम रहे। दूसरी ओर खुदरा निवेशकों को तब अवसर मिल सकता है जब ये यूनिकॉर्न बाजार में सूचीबद्ध होना शुरू होंगी। कुछ कंपनियां इसकी योजना बना रही हैं क्योंकि उन्हें मुनाफा नजर आ रहा है।

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हिंदुत्व के आईने में भाजपा की आर्थिक वृद्धि (बिजनेस स्टैंडर्ड)

कनिका दत्ता 

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शासन वाले दो राज्य हिंदुत्व के एजेंडे से मेल खाने वाले कानून लागू करने को लेकर बेहद ईमानदार रहे हैं। पहला राज्य उत्तर प्रदेश है जिसकी गिनती भारत में सबसे कम वृद्धि दर वाले राज्यों में होती है। दूसरा कर्नाटक है जो देश के सबसे तेज विकास वाले राज्यों में शामिल है। दोनों ही राज्य खुद को पार्टी की सामाजिक-आर्थिक आकांक्षाओं और अपने घोर भगवा सामाजिक एजेंडे के विरोधाभासों के बीच जूझते हुए पा सकते हैं।


उत्तर प्रदेश में हम 'लव जिहाद' के खिलाफ 'जबरन धर्मांतरण निषेध अध्यादेश' को लागू होते देख सकते हैं। हालांकि अन्य राज्यों ने भी अंतर-धार्मिक विवाहों पर रोक लगाई हुई है लेकिन उत्तर प्रदेश ने इस मानक को काफी ऊंचा उठा दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार का यह अध्यादेश विवाह के बाद होने वाले धर्मांतरण को आपराधिक करार देते हुए गैर-जमानती अपराध बनाता है जिसमें दोषी को छह महीने से लेकर तीन साल की सजा का प्रावधान रखा गया है। यह आरोपी पर ही खुद को निर्दोष साबित करने का जिम्मा डालता है जो कि हमारी न्याय प्रणाली में बड़े बदलाव की तरह है क्योंकि अब तक अपराध साबित न होने तक किसी को भी निर्दोष माना जाता रहा है।


इस अध्यादेश ने पुलिस और हिंदू समुदाय को हिंदू महिला एवं मुस्लिम पुरुष के बीच होने वाली किसी भी शादी में हस्तक्षेप करने का पूर्णाधिकार दे दिया है। 'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अध्यादेश आने के बाद समूचे राज्य में गिरफ्तार 51 लोगों से 49 मुस्लिम पुरुष जेल में बंद हैं। यहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के श्रम कानूनों को शिथिल कर आर्थिक वृद्धि तेज करने और औद्योगिक प्रस्तावों के अनुमोदन के लिए सिंगल-विंडो व्यवस्था लागू करने के ऐलान का भी जिक्र बनता है। उनकी नजर विनिर्माण क्षेत्र की नौकरियों पर है जहां बड़ी संख्या में लोग काम कर सकते हैं लेकिन वहां पर सामाजिक पूर्वग्रहों के चलते महिलाओं को मौके मिलने की संभावना सापेक्षिक रूप से कम होती है। लेकिन तेज आर्थिक क्रियाकलापों से संबद्ध गतिविधियों में भी विस्तार होता जिससे महिलाओं के लिए भी रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। गुरुग्राम महिलाओं के लिए गुणक प्रभाव का एक बढिय़ा उदाहरण है जहां न केवल आईटी एवं आईटीईएस क्षेत्र बल्कि लेखा, यात्रा, खानपान, घर की साज-संभाल, ब्यूटी पार्लर एवं संबंधित सेवाओं में भी महिलाओं के लिए अवसर बढ़े हैं।


लिहाजा उत्तर प्रदेश में विनिर्माण के विस्तार का मतलब होगा कि अधिक महिलाओं को कर्मचारी या कारोबारी के तौर पर आय के मौके मिलेंगे जो उन्हें सामाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता की दिशा में बढ़ा एक कदम होगा। लेकिन कामकाजी दुनिया में महिलाएं दूसरे धर्मों एवं जातियों के पुरुषों से भी मिलेंगी और वहां मां-बाप की बंदिशें भी नहीं होंगी। इस संपर्क से अंतर्धार्मिक एवं अंतर्जातीय शादियों को भी बढ़ावा मिल सकता है। वास्तव में, उदारीकरण के बाद ऐसी शादियों की संख्या में तेजी आई भी है।


उत्तर प्रदेश की हिंदू महिलाओं को इस स्थिति से बचाने का इकलौता तरीका यही है कि उन्हें दूसरे पुरुषों की नजर से बचाने के लिए घर पर ही रखा जाए। वैसे उत्तर प्रदेश की अधिकतर महिलाएं घरों पर ही रहती हैं। कोविड के पहले कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी शहरी एवं ग्रामीण दोनों जगह 10 फीसदी से कम थी। महामारी का प्रकोप फैलने के बाद यह गैर-बराबरी बढ़ी ही है।


भाजपा ने लोकसभा चुनाव के समय अपने घोषणापत्र में कहा था कि वह 'महिलाओं को राष्ट्र की प्रगति एवं समृद्धि में समान भागीदार एवं समान लाभार्थी बनाने को प्रतिबद्ध है।' पार्टी ने अगले पांच वर्षों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए रोडमैप लाने की भी बात कही थी। इसके अलावा भाजपा ने महिलाओं को बेहतर रोजगार अवसर देने के लिए उद्योगों एवं कंपनियों को प्रोत्साहित करने का वादा भी किया था। अगर हम मान लें कि आदित्यनाथ भी भाजपा के इस एजेंडे के सहभागी हैं तो उन्हें इसका अनुसरण करना होगा। लेकिन जब तक समाज में प्रतिकूल एवं एक्टिविस्ट रूप में 'लव जिहाद' की पैठ बनी रहती है तब तक हिंदू अभिभावक अपनी बेटियों को कामकाजी दुनिया में जाने के लिए शायद ही प्रोत्साहित होंगे क्योंकि वहां पर मुस्लिम पुरुषों के साथ संपर्क के जोखिम भी होंगे। यह देखना होगा कि उत्तर प्रदेश रोजगार संभावनाओं को पुरुषों तक सीमित रखकर कितनी तेजी से तरक्की कर सकता है?


उधर कर्नाटक ने पशु-वध निषेध एवं संरक्षण विधेयक पारित किया है जो दूसरे भाजपा-शासित राज्यों में बने कानूनों से अधिक सख्त है। यह गायों, बैलों एवं बछड़ों के अलावा 13 साल से कम आयु वाली भैंसों के वध को गैर-कानूनी बताता है और दोषी शख्स को 3-7 साल तक की सजा हो सकती है। पुलिस को संदेह के आधार पर भी तलाशी लेने का अधिकार दिया गया है।


हम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं हरियाणा में गोवध पर लगाई गई पाबंदी के घातक नतीजे पहले ही देख चुके हैं। आवारा मवेशियों ने खड़ी फसलें बरबाद कर दी। दुग्ध उत्पादन पर पड़े दीर्घकालिक असर को जल्द ही महसूस किया जाएगा। लेकिन मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने सकल राज्य घरेलू उत्पाद में कृषि हिस्सेदारी को 16 फीसदी से बढ़ाकर 30 फीसदी करने की बात कही है। कृषि आय में डेरी कारोबार की अहम भूमिका होने से यह देख पाना मुश्किल है कि दूध नहीं देने वाली गायों एवं भैंसों को वध के लिए नहीं बेचने पर येदियुरप्पा इस लक्ष्य को किस तरह हासिल कर पाएंगे? हाल ही में उत्तर कर्नाटक के गन्ना किसानों को बेहतर प्रतिफल के लिए डेरी व्यवसाय अपनाने को प्रोत्साहित किया गया था। लेकिन मौजूदा हालात में इसकी संभावना नहीं है। इस तरह मुख्यमंत्री और कृषि आय दोगुना करने के भाजपा के वादे को भी पूरा नहीं किया जा सकेगा।


आर्थिक प्रगति के लिए चौतरफा उदारीकरण की दरकार होती है। लेकिन लव जिहाद से लेकर आत्म-निर्भर अभियान तक हिंदुत्ववादी ताकतों को यह बुनियादी सच्चाई समझ में आनी अभी बाकी है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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