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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Wednesday, March 24, 2021

तुर्की: 'सुल्तान' एर्दोगन का एक और बर्बर फैसला (अमर उजाला)

राम यादव  

लड़कियों-महिलाओं की सुरक्षा दुनिया में हर सरकार के लिए अग्निपरीक्षा बन गई है। तब भी ऐसी कोई सरकार शायद ही मिलेगी, जो नारी-सुरक्षा के किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते पर बड़े उत्साह से हस्ताक्षर करने के दसवें साल में उसे बेशर्मी से ठुकरा दे। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन ने यही किया है। आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर उन्होंने कहा, 'औरत सबसे पहले मां है और बच्चे के लिए उसका घर है।' शायद वह यही कहना चाहते थे कि औरतों को घर पर ही रहना और बच्चों की देखभाल करना चाहिए, न कि नौकरी-धंधे के लिए घर से बाहर जाना चाहिए। मुश्किल से दस दिन बाद 19 मार्च की रात उन्होंने अध्यादेश जारी किया कि उनका देश महिलाओं की सुरक्षा-संबंधी 'इस्तांबुल कन्वेशन' से अपने आप को मुक्त कर रहा है। महिलाओं के साथ हिंसा की रोकथाम और ऐसी हिंसा से लड़ने का यह समझौता तुर्की के ही सबसे बड़े शहर इस्तांबुल में हुआ था। तुर्की ही पहला देश था, जिसने 11 मई, 2011 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। अब वही इससे मुकरने वाला पहला देश भी बन गया है। 



यह समझौता पांच मई, 1949 को लंदन में बनी 'यूरोपीय परिषद' के तत्वावधान में हुआ था। फ्रांस के श्त्रासबुर्ग में स्थित मुख्यालय वाली इस संस्था का मुख्य काम है यूरोपीय हित के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर बहस के लिए मंच प्रदान करना और आर्थिक-सामाजिक प्रगति हेतु उनके बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना। तुर्की सहित 47 देश इस संस्था के सदस्य हैं। 45 देशों तथा यूरोपीय संघ ने 'इस्तांबुल कन्वेशन' की विधिवत पुष्टि की है। तुर्की के क्षेत्रफल का तीन प्रतिशत और जनसंख्या का पांच प्रतिशत यूरोपीय महाद्वीप पर होने के कारण वह अपने आप को एक यूरोपीय देश बताने में बहुत गर्व महूसस करता है। कुल जनसंख्या है सवा आठ करोड़।



र्की की महिलाएं अपने साथ बढ़ते हुए दुराचारों और असुरक्षा के कारण पिछले दिनों जगह-जगह प्रदर्शन कर रही थीं। महिलाओं की सुरक्षा वाले 'इस्तांबुल कन्वेशन' को त्याग देने के समाचार के बाद उनके बीच और अधिक बेचैनी फैल गई है। ऐसे ही एक प्रदर्शन के समय इस्तांबुल की 50 वर्षीय सेमा ने जर्मन टेलीविजन चैनल 'एआरडी' से कहा,'पिछले दो वर्षों में मर्दों ने इतनी सारी औरतों को मार डाला है कि हमें अपने बचाव के लिए सड़कों पर उतरना ही पड़ा।' 'इस्तांबुल कन्वेशन'अपने ढंग का ऐसा पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जो हस्ताक्षरकर्ता देशों से कानून बनाकर, शिक्षा द्वारा तथा सामाजिक जागरूकता फैला कर महिलाओं को हर प्रकार की सुरक्षा प्रदान करने के लिए कहता है।


राष्ट्रपति एर्दोगन खुद इस्लामी रूढ़िवादी तो हैं ही, उनकी पार्टी 'एकेपी' के कई नेता व सांसद 'करेला नीम चढ़ा' से कम नहीं हैं। वे एर्दोगन पर दबाव डाल रहे थे कि 'इस्तांबुल कन्वेशन' का हिस्सा होना तुर्की जैसे एक इस्लामी देश के लिए शोभा नहीं देता। दो उदाहरण कि तुर्की का रंग-ढंग कैसा हैः जुलाई 2020 में तुर्की के मेन्तेसे जिले में पीनार ग्युल्तेकेन नाम की एक युवती का शव मिला। हत्यारे ने गला दबा कर उसे मार डाला था और शव को कूड़े के एक ड्रम में डाल कर जला दिया था। हत्यारा एक नाइट क्लब का 32 वर्षीय मालिक था। पुलिस से उसने कहा कि उसने पीनार को इसलिए मारा, क्योंकि वह उससे अलग होना चाहती थी। 


तुर्की के एशियाई हिस्से के एक गांव में 18 साल की एक युवती ईपेक एर की कब्र है। उसके एक दोस्त ने उसके साथ बलात्कार किया था। पुलिस ने बलात्कारी को पकड़ा तो सही, पर अदालत ने जल्द ही छोड़ दिया। निराश ईपेक एर ने आत्महत्या की कोशिश की, पर घायल होकर मृत्युपर्यंत कई सप्ताह अस्पताल में कराहती रही। तुर्की की विपक्षी पार्टियां कह रही हैं कि 'इस्तांबुल कन्वेशन' की संसद ने पुष्टि की थी। इसलिए केवल संसद ही उससे मुक्त होने की पुष्टि कर सकती है। विपक्षी पार्टियां कुछ भी कहें, तुर्की में होता वही है, जो तुर्की का सुल्तान बनने के महत्वाकांक्षी वहां के राष्ट्रपति जहांपनाह रजब तैयब एर्दोगन चाहते हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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पुराने वाहनों की कबाड़ नीति: अब आपकी कार का क्या होगा? (अमर उजाला)

नारायण कृष्णमूर्ति  

कई बजट घोषणाएं ऐसी होती हैं, जिसकी तस्वीर कुछ समय बाद ही स्पष्ट होती है। ऐसी ही एक घोषणा, जो इन दिनों सुर्खियों में है, वह है पुराने वाहनों की कबाड़ नीति। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने लोकसभा में बहुप्रतीक्षित वाहन कबाड़ नीति (व्हीकल स्क्रैप पॉलिसी) की घोषणा कर दी है। वाहनों का अल्पकालिक और सीमित जीवन चक्र राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के कार मालिकों के लिए चिंता का विषय था, जहां 10 वर्ष से अधिक पुराने डीजल वाहनों और 15 वर्ष से अधिक पुराने पेट्रोल वाहनों को चलाने पर प्रतिबंध है। यह कानून 2015 में लागू हुआ, हालांकि, देश के अन्य हिस्सों में ऐसी कोई सीमा नहीं है, कई वाहन मालिक एनसीआर के बाहर अपने पुराने वाहनों को पंजीकृत कराते हैं या परेशानी से बचने के लिए उन्हें बेच देते हैं। 


पिछले कुछ वर्षों से ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री पुराने वाहनों को कबाड़ बनाने की नीति (स्क्रैप पॉलिसी) लाने पर जोर डाल रही थी, ताकि वाहन मालिक तेजी से नए वाहन खरीदें। कोविड-19 से उपजी परिस्थितियों ने ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री पर भी दबाव बनाया है। वाहन निर्माता खरीदारों का एक नियमित प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए ऐसी नीति चाहते हैं, जो उनकी विनिर्माण क्षमता को सदा के लिए सुनिश्चित करे। इस स्क्रैप पॉलिसी से सरकार उम्मीद कर रही है कि ऑटोमोबाइल क्षेत्र में नियमित आर्थिक विकास होगा, जो जीडीपी में सीधे लगभग आठ फीसदी का योगदान करता है। यदि इसमें इसके सहायक खंडों, ईंधन, अन्य लोगों के बीच किराये आदि के माध्यम से परोक्ष प्रभावों को जोड़ें, तो इसका योगदान महत्वपूर्ण है। इसके अलावा ऑटोमोबाइल सेक्टर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से उच्च रोजगार प्रदान करने में योगदान देता है। पुराने वाहनों को कबाड़ बनाने की नीति (स्क्रैप पॉलिसी) इस क्षेत्र के लिए चमत्कार करेगी। 


स्क्रैप पॉलिसी के पक्ष में सरकार और ऑटोमोबाइल निर्माताओं की तरफ से एक तर्क दिया जाता है कि तकनीकी सुधार वाहनों को समय के साथ सुरक्षित और कुशल बनाते हैं। इसके अलावा, पुराने वाहन पुराने इंजन मानकों पर चलते हैं, जो सरकार द्वारा निर्धारित नए उत्सर्जन मानकों की तुलना में प्रदूषणकारी होते हैं। यह भी कहा जाता है कि स्क्रैप किए गए वाहन ऐसे कल-पुर्जे प्रदान करेंगे, जिनका उपयोग ऑटो इंडस्ट्री घटकों और पुर्जों के रिसाइक्लिंग को संभव बनाने के लिए कर सकते हैं। हालांकि इस तरह के इंटर-लिंकेज का कोई स्पष्ट संकेत नहीं है। भारतीय मध्यवर्ग के लिए घर खरीदने के बाद एक कार खरीदना सबसे  बड़ी आकांक्षा होती है। कार ऋण के आगमन के बाद उनमें से कई लोगों का यह सपना साकार हुआ है। मुझे वर्ष 2010 की एक फिल्म दो दूनी चार की याद आती है, जिसमें स्वर्गीय ऋषि कपूर एक शिक्षक के रूप में मुख्य भूमिका में थे, जिनकी आकांक्षा कार मालिक बनने की थी, यह पूरी फिल्म इसी कथानक के ईर्द-गिर्द घूमती है। अधिकांश भारतीय परिवार इसी तरह के हैं, वे एक ऐसी कार खरीदने की आकांक्षा रखते हैं, जो उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाती हो। वे सप्ताहांत पर परिवार की सैर के लिए कार का इस्तेमाल करते हैं और कम से कम काम पर जाने के लिए।


यह वर्ग सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों में काम करता हुआ पूरे भारत में पाया जा सकता है। जब कोई अपने वाहन के उपयोग  की गणना करे, तो बहुत संभव है कि उसे पता चले कि एक वर्ष में उसने 20,000 किलोमीटर के भीतर कई यात्राएं की हैं। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरॉनमेंट द्वारा देश के 14 बड़े शहरों में किए गए अध्ययन से यह रिपोर्ट सामने आई कि कारों द्वारा प्रति यात्रा में औसत आवागमन आठ किलोमीटर से कम होता है। अब आप पूरे भारत में इसी पद्धति को लागू करें, तो संभावना है कि औसत इस आंकड़े से बहुत कम होगा। पहली मारुति 800 कार का उदाहरण लें, जिसे 1983 में हरपाल सिंह को सौंपा गया था और डीआईए 6479 नंबर की पंजीकृत कार अगले 25 वर्षों तक पूरी तरह चालू स्थिति में थी, जिसे मारुति सुजुकी कंपनी ने 2008 में प्रदर्शित किया था। 


कार का जीवन लंबा था और हाल के वाहन मॉडल के साथ अपनी खास क्षमता के कारण यह कम से कम तीस वर्षों के लिए दीर्घायु होने का प्रतीक बन गया। इसके अलावा, बढ़ती ईंधन लागत की स्थिति में वाहन की दक्षता बढ़ाने के लिए कई वाहन मालिक सीएनजी पर चलाने के लिए अपनी कारों को परिवर्तित करके हाइब्रिड ईंधन मॉडल का उपयोग करने के लिए जाने जाते हैं। नई स्क्रैप पॉलिसी के अनुसार, व्यक्तिगत या निजी वाहनों का 20 साल में और वाणिज्यिक वाहनों का 15 साल में फिटनेस टेस्ट होगा। यदि कोई वाहन फिटनेस टेस्ट में नाकाम रहता है, तो उसे 'वाहन के जीवन का अंत' माना जाएगा। वाहन मालिकों को फिटनेस टेस्ट कराने और पंजीकरण को नवीनीकृत करने के बजाय पुराने वाहनों को स्क्रैप करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके लिए पुराने वाहनों के पंजीकरण को नवीनीकृत कराने का शुल्क बढ़ाया जाएगा। ऐसी संभावना है कि कई लोगों ने 20 साल के जीवन काल को ध्यान में रखते हुए वाहन खरीदा हो। दस या 15 वर्षों के भीतर अनिवार्य रूप से अपनी कीमती कारों को कबाड़ बनाकर नई कार खरीदने के लिए विवश होना 50 वर्ष की उम्र में जबरन सेवानिवृत्त होने जैसा है, जो मानते हैं कि उनकी सेवानिवृत्ति में दस साल बाकी हैं।


हालांकि पुराने वाहनों को स्क्रैप करने का विकल्प चुनने वाले वाहन मालिकों के लिए चार से छह फीसदी तक वाहन का स्क्रैप मूल्य देने की बात कही गई है। निजी वाहन मालिकों को रोड टैक्स में भी 25 फीसदी की छूट दी जाएगी तथा स्क्रैपिंग प्रमाण पत्र दिखाने पर वाहन निर्माताओं को नए वाहन की खरीद पर पांच फीसदी की छूट देने की सलाह दी गई है, लेकिन यह कितना  व्यावहारिक होगा, यह देखने वाली बात होगी। इस स्क्रैपिंग पालिसी से यह ध्वनित होता है कि इसमें इस वास्तविकता पर विचार नहीं किया गया है कि अधिकांश निजी कार मालिक अपने वाहन का इस्तेमाल कैसे करते हैं। समाज के विभिन्न तबकों के लिए  इस नीति को प्रभावी और लागत अनुकूल तरीके से लागू करने से पहले सभी पहलुओं पर विचार करना ज्यादा बेहतर होगा।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Tuesday, March 23, 2021

ढाई बिलांद की रस्सी...और रोडुमल बंजारा ने ऐसे तोड़ दिया दम (अमर उजाला)

अश्वनी शर्मा  

बीते सप्ताह रोडुमल बंजारा ने दम तोड़ दिया। वह खेतड़ी, राजस्थान में सड़क किनारे तम्बू डालकर रहता था। पिछले कुछ समय से बीमार था। कोई सहारा न था। न  बुढ़ापा पेंशन, न बीपीएल राशन कार्ड। कितने दफा जिला कलेक्टर से लेकर जयपुर में सामाजिक न्याय विभाग के कमिश्नर दफ्तर के चक्कर लगाए, आखिरकार भूख, गरीबी और लाचारी ने सांसें छीन ली। रोडुमल बंजारा, एक अदना-सा इंसान भले ही था, किंतु उसके पारखी हाथों ने न जाने कितने जोहड़, तालाब, टांके, गांव के रास्ते, नालियां ओर मकानों की नींव डाली थी। वह उन चंद बचे-खुचे बंजारों में था, जिसको जल संरचनाओं की समझ थी। रोडुमल से मेरा परिचय लॉकडाउन खुलने के बाद हुआ था। मैं फील्ड वर्क के लिए खेतड़ी के नजदीक गांवों- ढाणियों में घूम रहा था। वहां एक गांव में सड़क व उसके दोनों तरफ नालियों का निर्माण किया गया था। लेकिन उनका लेवल सही नहीं हुआ था। जगह-जगह पानी रुक गया था। जूनियर इंजीनियर से लेकर सारे विशेषज्ञ नाप-जोख में लगे थे। गांव के किसी व्यक्ति ने सलाह दी कि नजदीकी गांव में रोडुमल बंजारा का टोला है। जानकर आदमी है, उसे ले आओ। ना नुकर के बाद रोडुमल को लाया गया। 

रोडुमल बंजारा- उम्र करीब 75/80 वर्ष। मरियल-सी देह, पोपला मुंह, मोटी-मोटी आंखें, नाटा कद, कान में झालर-मुरकी, सर पर बड़ा रंगीन साफा, दो लांग की धोती बांधे। छोटी-छोटी डग भरता हुआ पहले पूरे रास्ते और नाली का मुआयना करके आया। मुआयने के बाद रोडुमल ने ढाई बिलांद (करीब अढ़ाई फीट) की रस्सी मंगवाई। उसने कहीं नाली से मिट्टी को निकलवाया, तो कहीं पर मिट्टी को डलवाया। करीब सुबह 10.30 बजे काम शुरू किया और शाम में पांच बजे उसने अपना काम कर दिया। उसने कहा कि नाली के छोर से पानी छोड़िए। ये तो कमाल हो गया पानी सरपट दौड़ता हुआ जोहड़ में पहुंच गया। अचंभे के मारे लोगों की आंखें फटी जा रही थी। गांव का सरपंच और इंजीनियर वगैरह मिलकर योजना बना रहे थे कि उसे गांव की चौपाल में सम्मानित करेंगे, कोई कह रहा था कि शाल ओढ़ाकर सम्मानित करेंगे। रोडुमल दूर बैठा बीड़ी पी रहा था। उसके माथे पर अजीब-सी मुस्कान थी। उसने नजदीक के घर से एक कट्टे में करीब 20 किलो अनाज लिया, सर पर रखा और वहां से निकल गया।


बंजारे का नाम सुनते ही हमारे जेहन में ऐसे लोगों की छवि उभरती है, जो गधों और ऊंटों पर अरबी कपड़े, मुल्तानी मिट्टी और नमक लादे फेरी लगा रहे हैं। बंजारे महज ये समान ही नहीं लाते थे, बल्कि उसके साथ वहां के विचार और परंपरा भी साथ लाते थे। इस तरह दो संस्कृति को जोड़ने के साथ आर्थिक तंत्र को मजबूती देने का काम किया करते। एक समय बंजारों की पूरी खेप/कारवां चला करता था, जिसमें ऊंट, गधे ओर बैल होते। साथ में बंजारे का पूरा टांडा (कुटुंब) रहता। ये पूरा कारवां जैसमलमेर, मुल्तान, सिंध से होता हुआ अरब देशों तक जाया करता था। चूंकि इनकी खेप में हजारों की संख्या में पशु रहते। इतनी बड़ी संख्या में मवेशियों ओर इंसानों के लिए पानी की व्यवस्था कैसे हो, इसके लिए जल संरचना निर्मित की गई। इनके द्वारा बनाई गई ये संरचनाएं तो कला की उत्कृष्टता के अनूठे नमूने हैं। हम एक घर का पानी ठीक से नहीं निकाल पाते और ये लोग तो पूरे गांव का पानी एक जगह एकत्रित करने के लिए संरचना बनाते, घर की नींव डालने से लेकर कुएं खोदने, बावड़ी निर्माण जैसे बारीक काम बहुत ही सूझ-बूझ के साथ संपन्न किया। जितना आसान आज रेगिस्तान में रहना लगता है, क्या यह इनके बिना मुमकिन हो पाता?


इन्हें किसी राज्य में ओबीसी, तो किसी में एससी और एसटी का दर्जा प्राप्त है। बंजारों के पास असीम संभावनाएं हैं। पर हम उनको पहचान देना तो दूर रहा, उनको समाप्त करने में लगे हुए हैं। इन समुदायों का ज्ञान किताबों में नहीं है, बल्कि इनके जीवन से जुड़ा है। केवल रोडुमल ही नहीं गया, बल्कि हमारे सदियों का ज्ञान, हमेशा के लिए उसके साथ चला गया।

सौजन्य - अमर उजाला।

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चीन में 'गरीबी हटाओ: यूएन और विश्व बैंक ने भी माना लोहा, ऐसे किया चमत्कार (अमर उजाला)

सुधींद्र कुलकर्णी  

वर्ष 2017 में मैं चीन की यात्रा पर उसके दक्षिणी प्रांत युन्नान में गया था, जिसके हमारे पूर्वोत्तर क्षेत्र से ऐतिहासिक संबंध हैं। मेरे साथ एक युवा, सुशिक्षित और स्पष्टवादी चीनी दुभाषिया और गाइड थे। जब मैंने उनसे उनके काम के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि जब मैं विदेशी मेहमानों को नहीं घुमाता, तब युन्नान सरकार के विदेशी संबंध विभाग में अनुवादक का काम करता हूं। पर साल में दो महीने के लिए मुझे दूर-दराज के गरीब गांवों में सरकार के गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के लिए भेजा जाता है। हैरान होकर मैंने पूछा, 'क्या आपको काम करना पसंद है?' उन्होंने जवाब दिया, 'निश्चय ही, चीन समृद्ध हो गया है, पर अब भी बहुत से लोग गरीब हैं। हमारे राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस दशक के अंत से पहले अति निर्धनता से छुटकारा पाने के चीन के संकल्प की घोषणा की है। इस मिशन पर काम करने के लिए प्रतिबद्ध, मेहनती और कार्य कुशल पार्टी कार्यकर्ताओं को भेजा जाता है।' 


उसके करीब चार साल बाद विगत 25 फरवरी को शी जिनपिंग ने, जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव भी हैं, घोषणा की कि गरीबी के खिलाफ अपनी लड़ाई में चीन ने पूर्णतः जीत हासिल की है। पिछले आठ वर्षों में बचे हुए सभी 10 करोड़ ग्रामीणों को अत्यधिक गरीबी से बाहर निकाला गया है तथा 1,30,000 गांवों को गरीबी सूची से हटा दिया गया है। देंग श्योपिंग द्वारा माओ त्से तुंग की कट्टर कम्युनिस्ट नीतियों से पीछा छुड़ाते हुए बाजार समर्थित नीतियां लागू करने के बाद से चीन ने अपनी 80 करोड़ जनता को गरीबी से बाहर निकाला है। 1980 के दशक में चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी 200 डॉलर से कम था, जो बांग्लादेश से भी नीचे था, पर आज चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी 10,000 डॉलर से अधिक है। विश्व बैंक ने भी माना है कि पिछले चार दशकों में चीन ने वैश्विक गरीबी में 70 प्रतिशत से अधिक की कमी की है। दूसरा कोई देश इतने कम समय में इतने लोगों को गरीबी से बाहर नहीं निकाल सका है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में एक लक्ष्य 2030 तक हर जगह से हर तरह की गरीबी को खत्म करना है। चीन ने निर्धारित समय से दस वर्ष पहले ही यह लक्ष्य पूरा कर लिया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने वैश्विक गरीबी में कमी के लिए इसे 'सबसे महत्वपूर्ण योगदान' कहकर चीन की सफलता को स्वीकार किया है। 



दुर्भाग्य से भारत की राजनीति और मीडिया में इस पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। पिछले साल वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गलवां घाटी में दुखद संघर्ष ने व्यापक रूप से चीन-विरोधी भावना पैदा की है। भारत के साथ अपने संबंधों में विश्वास बहाली के लिए चीन को निश्चित रूप से बहुत कुछ करना होगा। लेकिन विभिन्न मोर्चों पर चीन की सफलता के प्रति हमें अपनी आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। सत्ता संभालने के तुरंत बाद शी जिनपिंग ने गरीबी उन्मूलन को अपनी शीर्ष राजनीतिक प्राथमिकता में रखा। माओ के बाद अपनी शानदार आर्थिक विकास के बावजूद चीन आर्थिक विषमता से जूझता रहा। यहां तक कि आज भी आय का अंतर ज्यादा है। इसलिए निचले पायदान पर रहने वालों की जीवन स्थिति में सुधार एक ऐसे देश के लिए राष्ट्रीय आवश्यकता बन गया, जो खुद को समाजवादी कहता है और कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शासित है। इसके कम्युनिस्ट शासकों के लिए गरीबी का जारी रहना राजनीतिक रूप से अस्थिर करने वाला था, क्योंकि यह शासन करने की उसकी वैधता को कम करता।


जिनपिंग के लिए व्यक्तिगत रूप से गरीबी उन्मूलन अभियान का भावनात्मक और राजनीतिक, दोनों उद्देश्य है। बेशक वह राजकुमार माने जाते हैं, पर युवावस्था में उन्होंने भी गरीबी का अनुभव किया है। उनके पिता कम्युनिस्ट पार्टी की पहली पीढ़ी के शीर्ष नेता उप-प्रधानमंत्री थे। सांस्कृतिक क्रांति के दौरान माओ द्वारा उनके पिता को कैद करके जब सताया गया, तब शी को सात साल तक दूर-दराज के पहाड़ी गांव में गुफा में रहना पड़ा। जमीनी स्तर उन्होंने पिछड़ापन और लोगों की पीड़ा देखी थी। इसलिए राष्ट्रपति बनने पर गरीबी उन्मूलन उनका व्यक्तिगत जुनून बन गया। गरीबी उन्मूलन के लिए चीन ने जो तरीका अपनाया, उसमें भारत के लिए कुछ महत्वपूर्ण सबक हैं, हालांकि दोनों देशों की राजनीतिक एवं शासकीय स्थिति बिल्कुल भिन्न है। पहला सबक यह कि शीर्ष स्तर पर मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना परिवर्तन हासिल नहीं किया जा सकता, लोगों व सरकार के एकजुट प्रयास तथा अभिनव रणनीति से ही ऐसा संभव है। जिनपिंग ने कम्युनिस्ट पार्टी की पूरी ताकत जुटाई और सरकार ने दुनिया का सबसे बड़ा गरीबी उन्मूलन अभियान चलाया। 


खुद जिनपिंग ने करीब 80 जगहों की यात्राएं कीं, जिनमें से कई सुदूर गांवों की थीं। उनके वीडियो यूट्यूब पर देखे जा सकते हैं। यहां एक प्रासंगिक सवाल पूछा जा सकता है कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सात साल में कितने गांवों का दौरा किया है। चीन ने पिछले आठ वर्षों में 250 अरब डॉलर का निवेश गरीबी उन्मूलन पर किया। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि 30 लाख से ज्यादा पार्टी  कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं और सरकारी अधिकारियों को शहरों, कस्बों और गांवों में गरीबी से लड़ने के लिए भेजा गया। जिनपिंग गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम में भ्रष्टाचार खत्म करने के बारे में लगातार बोलते रहे और पार्टी ने हजारों अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी की। 


इस अभियान की सफलता में लक्षित गरीबी उन्मूलन रणनीति का काफी योगदान रहा। इसने न केवल गरीब गांवों की पहचान की, बल्कि गरीब परिवारों और व्यक्तियों को लक्षित किया। फिर डेटा एनालिटिक्स और अन्य डिजिटल तकनीकों का उपयोग करते हुए स्थानीय नेताओं को कृषि सुधार, स्थानीय और घर-आधारित उद्योगों,  सुनिश्चित निवेश और बाजार समर्थन, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और कौशल विकास पर आधारित कार्यक्रमों की योजना बनाने और लागू करने के लिए कहा गया। बेशक चीन लोकतांत्रिक देश नहीं है, जो उसकी सबसे बड़ी खामी है। फिर भी आधी सदी से कम समय में यह एक गरीब देश से दुनिया का दूसरा सबसे समृद्ध देश बन गया है। हम भारतीयों को उसकी यह सफलता स्वीकार करनी चाहिए। हमें उनसे सीखना चाहिए, जो गरीबी के खिलाफ हमारी लड़ाई में सबसे उपयुक्त हैं। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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Monday, March 22, 2021

कब टूटेगा यह अपवित्र गठजोड़: हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था आपराधिक तत्वों के घुसपैठ के कारण दूषित हो गई (अमर उजाला)

प्रकाश सिंह  

मुंबई पुलिस कमिश्नर के पद से हटाए गए परमबीर सिंह ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि राज्य के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने शीर्ष पुलिस अधिकारियों को हर महीने सौ करोड़ रुपये की उगाही का लक्ष्य दिया था। संभवतः यह देश में पहला मामला है, जब एक पुलिस महानिदेशक रैंक के अधिकारी ने किसी मौजूदा गृहमंत्री पर उगाही करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया है।



इससे यही संदेश जाता है कि शीर्ष स्तर के कुछ पुलिस अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं की कठपुतली बने रहते हैं। वास्तव में यह मामला बहुत गंभीर है। यह कहा जा सकता है कि जब पानी सिर के ऊपर से गुजर जाता है, तभी इस तरह की बातें सामने आती हैं, वरना बहुत-सी बातें दबी रहती हैं। नेता भी खाते रहते हैं, पुलिस अधिकारी भी खाते रहते हैं और नौकरशाही भी खाती रहती है। सबका धंधा चलता रहता है, देश की संपत्ति लुटती है, तो लुटती रहे। लेकिन अब देखाना होगा कि परमबीर सिंह ने कितना भेद उजागर किया और उनकी खुद की इसमें कितनी संलिप्तता थी, ये बातें तो जांच के बाद ही सामने आएंगी।



सबसे जो महत्वपूर्ण बात है, वह है पुलिस, राजनेता और नौकरशाही की मिलीभगत। दो दशक से ज्यादा समय हो गए हैं, इस विषय पर वोहरा कमेटी की एक रिपोर्ट आई थी। उस रिपोर्ट में वोहरा साहब ने बहुत ज्यादा नहीं लिखा था, लेकिन उसमें जो संलग्नक थे, उसमें डायरेक्टर इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट थी, डाइरेक्टर सीबीआई की रिपोर्ट थी और कुछ अन्य केंद्रीय जांच एजेंसियों की रिपोर्टें थीं। उन रिपोर्टों में बहुत महत्वपूर्ण तथ्य थे। उनमें लिखा था कि पुलिस, राजनेता और नौकरशाही की मिलीभगत राज्य की वर्तमान व्यवस्था को निष्प्रभावी कर देती है और एक समानांतर सरकार चलती है, जहां-जहां इस तरह का गठजोड़ है। उस रिपोर्ट पर संसद में काफी हंगामा हुआ था और सरकार ने एक नोडल कमेटी का गठन किया था, जिसका काम था कि वह समय-समय पर बैठक करके इस गठजोड़ को तोड़ने के लिए जो जरूरी कदम होंगे, उसके बारे में सरकार को बताएगी। लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ हुआ नहीं, और यह गठजोड़ जैसा का तैसा चल रहा है और चलता रहेगा। इसके टूटने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं।


इसकी एक मुख्य वजह है कि राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग ज्यादा आ गए हैं। अगर जनप्रतिनिधियों के ऊपर संगीन मामले दर्ज हों, तो राजनीतिक शुचिता या इस गठजोड़ को तोड़ने की कल्पना कैसे की जा सकती है! मैंने एक किताब पढ़ी थी, जिसमें बताया गया था कि राजनीतिक दल चुनाव में टिकट देने से पहले यह देखते हैं कि किस व्यक्ति के चुनाव जीतने की संभावना ज्यादा है। उस लेखक ने लिखा था कि हमारे शोध से यह बात सामने आई है कि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों में जीतने की संभावना ज्यादा होती है, क्योंकि वह साम-दाम-दंड-भेद का हथकंडा अपना कर अपने वोट बैंक को सुरक्षित कर लेता है। जबकि ईमानदार आदमी काम के बल पर वोट मांगता है। लेकिन आज का मतदाता इतना स्वार्थी हो गया है कि वह उन्हीं लोगों को वोट देता है, जो लंद-फंद करके उसके काम करे।


उसे प्रत्याशी की ईमानदारी से कोई लेना-देना नहीं होता है। इस तरह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था दूषित होती चली जा रही है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण अगर आप आज की तारीख में देखना चाहें, तो एक राज्य में एक व्यक्ति, जिसे जेल के भीतर होना चाहिए, वह मुख्यमंत्री बना बैठा है। उत्तर प्रदेश में भी कुछ मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में लूटपाट चलती रही है। खैर, इनके मामले अब दफना दिए गए हैं। ऐसे कई मामले अन्य प्रदेशों में भी अतीत में रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल ने आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने 60 पेज के अपने स्यूसाइड नोट में सुप्रीम कोर्ट के जजों और राजनेताओं के खिलाफ लिखा तथा सबकी पोल खोली। कहने का तात्पर्य यह है कि आज हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था आपराधिक तत्वों के घुसपैठ के कारण दूषित हो गई है और यही लोग सत्ता में हैं। सारी शक्ति इन्हीं के पास है। अगर आप इस अपवित्र गठजोड़ को तोड़ने की बात करेंगे, तो भला ये ऐसा कैसे होने देंगे!


इस गठजोड़ को तोड़ने के लिए कोई सकारात्मक पहल नहीं हो रही है। अभी उत्तर प्रदेश में विकास यादव का प्रकरण सामने आया था, उसमें भी यही बात थी। उसमें एक आईजी संलिप्त पाए गए थे, एक वरिष्ठ नौकरशाह का भी नाम आ रहा था। लेकिन सारे मामले को रफा-दफा कर दिया गया। विकास यादव जैसे दुर्दांत अपराधी राजनीतिक वरदहस्त मिलने पर ही खड़े होते हैं। हर प्रदेश में ऐसे गठजोड़ हैं। अब मुंबई का यह गठजोड़ सामने आया है। एक अधिकारी, जिसे पद से हटाया गया, उसका करियर खत्म हो गया, तो उसे लगा कि हम तो डूब ही गए, तो क्यों न दूसरे को भी डुबा दिया जाए। तब उसने ये सारी बातें खोली हैं।


चूंकि इन दिनों संस्थानों की विश्वसनीयता संदेह में है, ऐसे में किससे उम्मीद की जा सकती है! फिर भी इस मामले का सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेना चाहिए और किसी जज या ईमानदार अधिकारी को इसकी जांच की जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए। न्यायिक जांच तो सबसे बेहतर होती, लेकिन उसमें सालों-साल लग जाते हैं। इसलिए किसी ईमानदार अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए, ताकि दो-चार महीनों में वह इसकी रिपोर्ट दे दे।


पहले तो तथ्यों की जांच होनी चाहिए, लेकिन जांच से पहले जो बात समझ में आती है, वह यह कि मुंबई में यह अपवित्र गठजोड़ लंबे समय से भयंकर रूप से जारी है और उसमें शिवसेना लिप्त है, क्योंकि परमबीर सिंह ने कहा है कि मैंने मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री और राकांपा प्रमुख शरद पवार को बता दिया था, और ऐसा लगा कि मेरे बताने से पहले से ही उन्हें सब कुछ मालूम था। यानी पूरी महा विकास अघाड़ी सरकार पर आरोप लगाया गया है। लेकिन परमबीर सिंह की बात हम तब ज्यादा सम्मान से सुनते, जब वह पद पर रहते हुए इन भ्रष्टाचारों का खुलासा करते। लेकिन पद से हटाए जाने के बाद वह आरोप लगा रहे हैं, तो संदेह की सुई उन पर भी टिकती है। यदि पद पर रहते हुए उन्होंने इस मामले को सार्वजनिक किया होता, तो जनता में उनकी बड़ी इज्जत होती और शिवसेना के लिए मुंह छिपाना मुश्किल हो जाता।


सौजन्य - अमर उजाला।

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देसी ज्ञान से बचेगा पर्यावरण, जानें ऐसा क्यों कह रहे हैं राजेंद्र सिंह (अमर उजाला)

राजेंद्र सिंह  

आज की प्रचलित प्रौद्योगिकी ने विकास के नाम पर विस्थापन, बिगाड़ और विनाश किया है। प्राचीन काल में संवेदनशील,अहिंसक विज्ञान से ही भारत आगे बढ़ा था। प्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी को जब संवेदनशील विज्ञान के साथ समग्रता से जोड़कर रचना और निर्माण होता है, वही विस्थापन, विकृति और विनाश मुक्त स्थायी विकास होता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया में सदैव नित्य नूतन निर्माण होने से ही सनातन विकास बनता है। इसे ही हम नई अहिंसक प्रौद्योगिकी कह सकते हैं।

इसी से जलवायु परिवर्तन के संकट से मुक्ति मिल सकती है। ऐसी प्रौद्योगिकी का आधार भारतीय जनतंत्र से ही हो सकता है। भारतीयों का भगवान 'भ-भूमि, ग-गगन, व-वायु, अ-अग्नि और न-नीर' से रचा हुआ माना जाता है। आम लोग नीर-नारी-नदी को नारायण मानते हैं। यही भारतीय आस्था और पर्यावरण है। पर्यावरण विज्ञान संवेदनशील अहिंसक विज्ञान ही है। इसे आध्यात्मिक विज्ञान भी कह सकते हैं। आधुनिक विज्ञान तो केवल गणनाओं और समीकरणों के फेर में फंसकर संवेदना रहित विज्ञान की निर्मिति करता है। भारतीय ज्ञानतंत्र का ज्ञान-विज्ञान अनुभूति में आते-आते संवेदनशील और अहिंसक बन जाता है। आस्था के विज्ञान से ही अभी तक हमारे पर्यावरण का संरक्षण होता रहा है। जब से हमारे विज्ञान से संवेदना और आस्था गायब हुई है, तभी से जलवायु परिवर्तन का संकट और उससे जन्मी हिमालय की आपदाओं का चक्र भी बढ़ गया है। जाहिर है, समृद्धि केवल मानव के लिए होगी, तो प्रकृति और मानवीय रिश्तों में दूरी ही पैदा करेगी।



ऐसी स्थिति में खोजकर्ता एटम बम बनाएगा और तीसरा विश्वयुद्ध कराएगा। जब मानवीय संवेदना कायम रहती है, तो शोध करके आरोग्य रक्षक आयुर्वेद का चरक बनता है, जो जीवन को प्राकृतिक औषधियों से स्वस्थ रहने, ज्यादा जीने और प्राकृतिक संरक्षण का काम करके साझा भविष्य को समृद्ध करने के काम में डूबा रहेगा। वह मानव के स्वास्थ्य में बिगाड़ नहीं करेगा, बल्कि दोनों को स्वस्थ रखने की कामना और सद्भावना अपने शोध द्वारा करेगा। कभी हमारी दृष्टि समग्र दृष्टि थी। इस दृष्टि के कारण हम जितना बोलते थे, उतना ही अनुभव करते थे। अनुभव से शास्त्र बनते और गढ़े जाते थे। अगली पीढ़ी उन शास्त्रों का ही पालन करती थी। ये शास्त्र आज के विज्ञान से अलग नहीं थे। वही समयसिद्ध गहरे अनुभव थे।


आज के शास्त्र केवल कल्पना-गणना, क्रिया-प्रतिक्रिया से गढ़े जा रहे हैं। इसमें अनुभव तथा अनुभूति नहीं है। इसलिए कल जिस जंगल को काटकर खेती को बढ़ावा देने को क्रांतिकारी काम मान रहे थे, देश की जिन बावड़ियों तथा तालाबों के जल को रोग का भंडार मान उन्हें पाटने में करोड़ों रुपये खर्च कर रहे थे, आज उन्हीं तौर-तरीकों को संयुक्त राष्ट्र बैड प्रैक्टिस कह रहा है। भारत की प्रकृति की समझ में ऊर्जा थी। यही भारतीय ज्ञान दुनिया को 'वसुधैव कुटुम्बकम' कहकर एक करने वाली ऊर्जा से ओतप्रोत था। तभी तो हम जैसलमेर जैसे कम वर्षा वाले क्षेत्र को पुराने जमाने में ही आज के वाशिंगटन से बड़ा व्यापार केंद्र बना सके थे। लेकिन अब हमने ऊर्जा और शक्ति में फर्क करना छोड़ दिया, और शक्ति को ही ऊर्जा कहने लगे।


शक्ति निजी लाभ के रास्ते पर चलती है, जबकि ऊर्जा शुभ के साथ रास्ता बनाती है। इसलिए शक्ति विनाश और ऊर्जा सुरक्षा व समृद्धि प्रदान करती है। आज भू-जल भंडारों को उपयोगी बनाने के नाम पर भू-जल भंडारों में प्रदूषण और उन पर अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है। सृजन प्रक्रिया को रोककर आज पूरे ब्रह्मांड में प्रदूषण बढ़ रहा है। केवल प्राकृतिक प्रदूषण बढ़ा है, ऐसा ही नहीं है। हमारी शिक्षा ने मानवीय सभ्यता और सांस्कृतिक प्रदूषण को भी बुरी तरह बढ़ा दिया है। संवेदनशील विज्ञान ही हमें आज भी आगे बढ़ा सकता है। इसी रास्ते हम पूरी दुनिया को कुछ नया सिखा सकते हैं। यही आधुनिक दुनिया के प्राकृतिक संकट, जलवायु परिवर्तन का समाधान करने वाला विज्ञान सिद्ध हो सकता है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Saturday, March 20, 2021

World Sparrow Day: ओ री चिरैया, नन्हीं-सी चिड़िया...अंगना में फिर आजा रे (अमर उजाला)

ज्ञानेन्द्र रावत  

आज गौरय्या अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। यदि बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से संबद्ध रहे विख्यात पक्षी वैज्ञानिक आर. जे. रंजीत डैनियल,असद रफी रहमानी और एस. एच. याह्या की मानें, तो हमारी बदलती जीवन शैली और उनके आवासीय स्थानों के नष्ट हो जाने ने गौरैया को हमसे दूर करने में अहम भूमिका निभाई है। ग्रामीण अंचलों में यदा-कदा उसके दर्शन हो पाते हैं, लेकिन महानगरों में उसके दर्शन दुर्लभ हैं। बहुमंजिली इमारतों का इसमें अहम योगदान है। कारण, गौरैया 20 मीटर से अधिक उंचाई पर उड़ ही नहीं पाती। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ भी इसकी पुष्टि करता है। गौरतलब है कि गौरैया एक घरेलू चिड़िया है, जो सामान्यतः इंसानी रिहायश के आसपास ही रहना पसंद करती है। भारतीय उपमहाद्वीप में इसकी हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंध स्पैरो, डेड-सी या अफगान स्क्रब स्पैरो, यूरेशियन स्पैरो और रसेट या सिनेमन स्पैरो-ये छह प्रजातियां पाई जाती हैं। 

घरेलू गौरैया को छोड़कर अन्य सभी उप कटिबंधीय और समशीतोष्ण क्षेत्रों में पाई जाती हैं। खुद को परिस्थितियों के अनुकूल बना लेने वाली गौरैया की तादाद आज भारत  ही नहीं, यूरोप के कई बड़े देशों यथा-ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी में तेजी से घट रही है। नीदरलैंड में तो इसे दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में रखा गया है। गौरैया की घटती तादाद के पीछे खेतों में कीटनाशकों का छिड़काव भी प्रमुख कारण है। कीटनाशकों के चलते खेतों में छोटे-पतले कीट, जिन्हें आम भाषा में सुण्डी कहते हैं, जिन्हें गौरैया जन्म के समय अपने बच्चों को खिलाती है, वह अब उसे नहीं मिल पाते हैं। रंजीत डैनियल के अनुसार, गौरैया धूल स्नान करती है। यह उसकी आदत है। वह शाम को सोने से पहले जमीन में तश्तरी के आकार का एक गड्ढा खोदकर उसमें धूल से नहाती है। इससे उसके पंख साफ रहते हैं और उनमें रहने वाले कीट-परजीवी मर जाते हैं। कंक्रीटीकरण के चलते शहरों में उसे धूल नहीं मिल पाती। मानवीय गतिविधियों और रहन-सहन में हुए बदलावों के चलते उसे न तो शहरों में भोजन आसानी से मिल पाता है, न वह आधुनिक किस्म के मकानों में घोंसले बना पाती है। 

शहरों में बने मकानों में उसे भोजन ढूंढना बहुत मुश्किल होता है। शहरों में मिट्टी की ऊपरी सतह, जिसमें नरम शरीर वाले कीड़े रहते हैं, मलबे, कंक्रीट और डामर से ढंकी होने के कारण नहीं मिल पाते। यही कारण है कि गौरैया शहरों से दूर हो गई है और उसकी तादाद दिनोंदिन घटती जा रही है। ऐसा लगता है कि मानवीय जीवन से प्रेरित गौरैया के बिना आज घर का आंगन सूना है। हमारी घरेलू गौरैया यूरेशिया में पेड़ों पर पाई जाने वाली गौरैया से काफी मिलती है। देखा जाए, तो केवल छोटे कीड़े और बीजों के ऊपर निर्भर तकरीब 4.5 इंच से सात इंच के बीच लंबी और 13.4 ग्राम से 42 ग्राम के करीब वजन वाली घरेलू गौरैया कार्डेटा संघ और पक्षी वर्ग की चिड़िया है। इसका रंग भूरा-ग्रे, पूंछ छोटी और चोंच मजबूत होती है। हमारे देश में जहां तक इसकी तादाद का सवाल है, सरकार के पास इससे संबंधित कोई जानकारी नहीं है। 


आज सरकार में ऐसा कोई नेता नहीं है, जो पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील हो और उनके बारे में कुछ जानकारियां रखता हो, उन्हें पहचानता हो। इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपवाद थीं। एक बार भरतपुर प्रवास के दौरान उन्होंने केवलादेव पक्षी विहार में तकरीबन 80 चिड़ियों को उनके नाम से पहचान कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया था। देखा जाए, तो गौरैया को बचाने हेतु आज तक किए गए सभी प्रयास नाकाम साबित हुए हैं। केवल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाने से कुछ नहीं होने वाला। ‘हेल्प हाउस स्पैरो’ के नाम से समूचे विश्व में चलाए जा रहे अभियान को लेकर सरकार की बेरुखी चिंतनीय है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का तो यह राजकीय पक्षी है। दुख है कि इस बारे में सब मौन हैं। ऐसे हालात में गौरैया आने वाले समय में किताबों में ही रह जाएगी।

सौजन्य - अमर उजाला।

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टीकों के मूल्य नियंत्रण से कमजोर होगी पहुंच (बिजनेस स्टैंडर्ड)

अजय शाह  

देश में व्यापक टीकाकरण की शुरुआत हो चुकी है। निजी स्वास्थ्य सेवा कंपनियों को इसके लिए आम जनता तक पहुंचना होगा। आर्थिक नीति का एक बुनियादी तत्त्व यह है कि मूल्य नियंत्रण अच्छी तरह काम नहीं करता। यदि कीमत नियंत्रित की जाएगी तो इससे निजी क्षेत्र की पहुंच शहरों तक सिमट जाएगी। हमारा अनुभव एक समरूप समस्या का उदाहरण पेश करता है जहां देश के दूरदराज इलाकों तक पहुंच बनाने के लिए कीमतों का बाजार द्वारा निर्धारित होना आवश्यक है। सरकार को कम कदम उठाने चाहिए और बाजार को अपने तरीके से काम करते हुए समस्या से निपटने देना चाहिए। यदि हस्तक्षेप की इच्छा हो तो वैक्सीन वाउचर इसका सबसे अच्छा तरीका हैं।

फरवरी के अंत तक देश में दो करोड़ लोगों को टीका लग चुका था। यह संचारी रोग नियंत्रण की विजय है। इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि एक साल के भीरत एक नए वायरस से निपटने के लिए व्यापक तौर पर टीकाकरण आरंभ हो गया हो। सच तो यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी टीका निर्माता कंपनी भारत की एक निजी कंपनी है जिसका नाम है सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड। यह अब हर भारतीय के लिए गौरव का विषय है। टीकाकरण से न केवल बीमारी का बोझ कम करने में मदद मिलती है बल्कि टीका लगवा चुके लोग लंबा जीवन जीते हुए अर्थव्यवस्था और समाज में स्थिति सामान्य करने में मदद करते हैं।


यदि 15 लाख लोगों को रोजाना टीका लगाने की मौजूदा दर बरकरार रहती है तो एक अरब लोगों को टीका लगाने में 666 दिन लगेंगे। यदि गति तेज होती है तो और अच्छा होगा क्योंकि अर्थव्यवस्था की हालत सामान्य करने में हर दिन की कमी अहम है। टीकाकरण का मौजूदा कार्यक्रम शहरों में बड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित है। ऐसे में आगे चलकर गति धीमी हो सकती है।


देश की स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के हाथ में है। कोविड-19 के मामले में हर कदम पर यानी पीपीई किट, जांच, दवा आदि के क्षेत्र में हमने देखा कि कैसे काम करने की पूरी छूट मिलने पर निजी क्षेत्र ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। निजी औषधि कंपनियां, जांच लैब, चिकित्सक और अस्पताल आदि पूरे देश में हैं और वे टीकाकरण की दर को 10 गुना तक बढ़ा सकते हैं। कुछ लोग निजी क्षेत्र की कीमतों को लेकर चिंतित हैं और मूल्य नियंत्रण की बात भी चल रही है।


आर्थिक विचार की बुनियाद से हम जानते हैं कि मूल्य नियंत्रण कभी भी समस्या का हल नहीं होता है। ऊंची कीमतें अधिक उत्पादन को प्रोत्साहन देती हैं और खपत कम होती है। इसका उलटा भी इतना ही सच है। बाजार कमी को कीमतों में बदलाव की वजह बनाता है और कीमतों में उतार-चढ़ाव से लोगों के व्यवहार में परिवर्तन आता है। कीमतें एक प्रकार की सूचना प्रणाली हैं: कीमतों में उतार-चढ़ाव खरीदारों और विक्रेताओं को जो संदेश देता है, वे उसी के अनुसार व्यवहार करते हैं। यदि राज्य अपनी शक्ति का प्रयोग कर इन संकेतों को रोक देगा तो खरीदारों और विक्रेताओं दोनों को मुश्किल होगी। इससे समस्या को हल करना कठिन हो जाएगा। सन 1990 के दशक के आखिरी दिनों का एक किस्सा हमें टीकों के मूल्य नियंत्रण के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। भारत में डीमैट सिक्युरिटीज सेटलमेंट की शुरुआत 1990 के दशक के आखिर में हुई और एनएसडीएल ने बहुत कम कीमत पर इसकी थोक सेवा शुरू की। इसके बाद उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने वाली कई कंपनियां (डीपी) देश भर में लोगों को ये सेवाएं बेचती हैं।


सन 1990 के दशक के आखिर में कीमतों पर नियंत्रण का हो हल्ला था। ऐसे प्रस्ताव भी आए कि सरकार या एनएसडीएल को उस कीमत को नियंत्रित करना चाहिए जो डीपी ग्राहकों से वसूल करती हैं। यह भी कहा गया कि यदि कीमतों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो ये डीपी गरीबों और वंचितों के काम नहीं आएंगी।


एनएसडीएल में सीबी भावे तथा अन्य लोगों ने दलील दी कि डीपी के कारोबार में कोई नाकामी नहीं देखने को मिली। मुंबई जैसी जगहों पर डीपी सेवाओं की लागत कम थी क्योंकि वहां कुशल श्रमिकों का श्रम मूल्य अलग था, दूरसंचार और बिजली की व्यवस्था काफी विश्वसनीय थी। इसके अलावा वहां इनके ग्राहकों की तादाद भी काफी अधिक थी। यही वजह थी कि दक्षिण मुंबई में ग्राहकों द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत अनिवार्य तौर पर कम होनी ही थी। दूरदराज इलाकों में इन सेवाओं की लागत अधिक थी और ग्राहकों की तादाद भी काफी कम थी। ऐसे में वहां सेवा पहुंचाने की लागत भी अधिक थी। यदि मूल्य नियंत्रण किया जाता तो डीपी उन इलाकों में सेवा नहीं देने का निर्णय करतीं और डीपी सेवाएं शहरों तक सीमित रह जातीं।


दूरदराज इलाकों में यदि डीपी अधिक शुल्क वसूल करती हैं और बेहतर रिटर्न हासिल करती हैं तो इससे अन्य कंपनियों को प्रतिस्पर्धी कारोबार शुरू करने की प्रेरणा मिलती है क्योंकि वहां कारोबार में प्रवेश करने को लेकर कोई गतिरोध नहीं होता। निजी क्षेत्र नवाचार करता है और लागत कम करता है।


ऐसे में हस्तक्षेप न करने के अच्छे परिणाम सामने आते हैं। डीपी जो कीमत वसूल करती हैं उसे बाजार पर छोड़ दिया जाता है। प्रतिस्पर्धा पैदा होती है और तब कीमतों में स्वत: गिरावट भी आती है। कारोबारी दृष्टि से आसान माने जाने वाले शहरी इलाकों में प्रतिस्पर्धा ने मुनाफे को प्रभावित किया और डीपी को दूरदराज इलाकों में कारोबार करने का अवसर मिला और वे लाभान्वित हुईं।


यह कहानी हमें टीकों और मूल्य नियंत्रण के बारे में समझ विकसित करने में मदद करती है। निजी क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर टीकाकरण की क्षमता है। निजी व्यक्तियों के लिए किसी बड़े शहर के आवासीय परिसर में रविवार को शिविर लगाना आसान है। दूरदराज इलाकों में टीके को जरूरत के मुताबिक ठंडा रखना और कम आबादी वाले इलाकों में कुशल लोगों की सेवा पाना आसान नहीं है। यदि मूल्य नियंत्रण किया गया तो देश के ग्रामीण इलाकों को नुकसान होगा।


निजी क्षेत्र नवाचार करेगा। उदाहरण के लिए जॉनसनऐंडजॉनसन का एक खुराक वाला टीका एस्ट्राजेनेका के उस टीके से महंगा है जिसे अभी सीरम इंस्टीट्यूट बेच रही है। लेकिन दो खुराक वाले टीके की लागत और जटिलताएं अधिक हैं। खासकर दूरदराज इलाकों को देखें तो यकीनन ऐसा है। निजी क्षेत्र की कुछ स्वास्थ्य कंपनियों को शायद जॉनसनऐंडजॉनसन का टीका आयात करना और दूरदराज इलाकों में लगाना अनुकूल लगे।


सार्वजनिक नीति में कीमतों में हस्तक्षेप न करने की नीति पेशेवर क्षमता का प्रतीक है। यदि गरीबी की समस्या है तो टीके के लिए वाउचर जारी किए जा सकते हैं जहां सरकार टीका लगाने वाली कंपनियों को भुगतान करे।

(लेखक स्वतंत्र आर्थिक विश्लेषक हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Friday, March 19, 2021

सरकार के चार साल: अंत्योदय से सर्वोदय के पथ पर उत्तर प्रदेश (अमर उजाला)

योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश  

प्रकृति और परमात्मा की असीम अनुकंपा वाले उत्तर प्रदेश को 24 करोड़ जनाकांक्षाओं के अनुरूप सुरक्षित, समृद्ध और समुन्नत प्रदेश के रूप में वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करने का हमारा व्रत आज चार वर्ष पूर्ण कर रहा है। ये चार वर्ष अपरिमित चुनौतियों, अनंत संभावनाओं और आपके सपनों को यथार्थ में परिवर्तित करने के लिए समर्पित रहे हैं। 19 मार्च, 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने हमें 'सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास' का पाथेय प्रदान किया था। आज जब प्रदेश सरकार चार वर्ष पूरे कर रही है, तो मुझे व्यक्तिगत संतुष्टि है कि हम इसी लक्ष्य के अनुरूप अपनी नीतियों को क्रियान्वित करने में सफल रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कोरोना से उपजे आर्थिक संकट से उबरने के लिए 'आत्मनिर्भर भारत' का सपना देखा है। वह देश को 50 खरब डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनाने का महान लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। उत्तर प्रदेश इस लक्ष्य का संधान कर उनके स्वप्न को साकार करने में अग्रणी भूमिका निभाने की प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। जनसांख्यिकीय लाभांश की दृष्टि से उत्तर प्रदेश सर्वाधिक संभावनाओं वाला  राज्य है। आवश्यकता थी, तो बस इन संभावनाओं को समन्वित नीतियों और साफ नीयत के माध्यम से क्रियान्वित करने की। बीते चार वर्षों में हमारी कोशिश यही रही है। 



सरकार ने पूंजी निवेश की राह में आने वाली बाधाओं को चिह्नित किया और सिंगल विंडो प्रणाली के माध्यम से निवेश प्रक्रियाओं को सुगम बनाया। राज्य विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी सुविधाएं प्रदान करने की दिशा में  तेजी से आगे बढ़ा और अंतिम पंक्ति के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक शासन की योजनाओं व अन्य लाभों को पहुंचाया। चार साल में 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' की राष्ट्रीय रैंकिंग में 12 पायदान ऊपर उठकर नंबर दो पर आना कोई सरल कार्य नहीं था, पर हमने यह कर दिखाया। परिणामतः उत्तर प्रदेश आज राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के ग्रोथ इंजन की भूमिका में है। बुंदेलखंड में महिलाओं ने सतत प्रयास से दुग्ध उत्पादन में जिस प्रकार 46 करोड़ वार्षिक का टर्नओवर कर दो करोड़ रुपये का लाभ प्राप्त किया है, वह प्रेरणास्पद है। कोरोना काल में ही स्कूली बच्चों की यूनीफार्म सिलने का कार्य महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा कराया गया। 67 हजार समूह सदस्यों ने एक करोड़ 28 हजार स्कूल यूनीफार्म तैयार किए और उन्हें 100 करोड़ रुपये से अधिक की आमदनी हुई। ऐसे अनेक नवाचारी प्रयास 'आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश' के स्वप्न को साकार करने की आधारशिला बन रहे हैं। कहा भी जाता है 'उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः'।



विकास की राह पर आगे बढ़ता यह वही यूपी है, जहां महज चार साल में 40 लाख परिवारों को आवास मिला, एक करोड़ 38 लाख परिवारों को बिजली कनेक्शन मिला, हर गांव की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाया गया तथा गांव-गांव तक ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाने का कार्य युद्धस्तर पर जारी है। आज हम सबके निरंतर प्रयास से अंतरराज्यीय संपर्क को सुदृढ़ किया गया है। पांच एक्सप्रेस-वे विकास को रफ्तार देने के लिए तैयार हो रहे हैं, तो देश को रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए डिफेंस कॉरिडोर का निर्माण हो रहा है। ध्यान रखिए, यह वही यूपी है, जहां वर्ष 2015-16 में प्रति व्यक्ति आय मात्र 47,116 रुपये थी, जो आज बढ़कर 94,495 रुपये हो गई है। 2015-16 में 10.90  लाख करोड़ रुपये की जीडीपी वाला राज्य आज 21.73 लाख करोड़ रुपये की जीडीपी के साथ देश में दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था वाला राज्य बनकर उभरा है। यह है परिवर्तन। 


जल-जीवन मिशन के अंतर्गत हर घर नल योजना के तहत कार्य हो रहा है। बुंदेलखंड, विंध्य क्षेत्र और 30 हजार राजस्व ग्रामों में पाइप पेयजल की स्कीम लागू की जा रही है। हम आभारी हैं कि प्रधानमंत्री ने जल जीवन मिशन के तहत गांवों के साथ शहरों को भी जोड़ने के लिए केंद्रीय बजट में अपेक्षानुकूल व्यवस्था की है। सरकार बिना भेदभाव के सभी को योजनाओं का लाभ सुलभ करा रही है। मुसहर, थारू, वनटांगिया गांवों में उत्थान का सूर्योदय हुआ है। जापानी इनसेफलाइटिस और एईएस की बीमारी समाप्तप्राय हो चली है। कोरोना की विभीषिका से हमें अनेक अनुभव प्राप्त हुए। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए दूसरे प्रदेशों में गए छात्रों और उनके अभिभावकों की पीड़ा एक ऐसा ही अनुभव रहा। हमने पलायन की समस्या के स्थायी समाधान के लिए ‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ शुरू की। प्रतिभा और ऊर्जा से संपन्न प्रदेश के नौजवानों की मेधा राज्य और राष्ट्र के विकास में उपयोगी सिद्ध हों, इस उद्देश्य से प्रतियोगी परीक्षाओं की उत्कृष्ट तैयारी की व्यवस्था सुलभ कराने वाले अभिनव मंच ‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ की शुरुआत की गई है। मुझे आत्मिक संतुष्टि है कि इस योजना को प्रतियोगी छात्रों और अभिभावकों ने पूरे मन से स्वीकार किया है। 


आज का दौर नौजवानों के ‘जॉब सीकर’ नहीं, वरन 'जॉब जेनरेटर' बनने का है। इसे ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना आरंभ की गई। इसके अंतर्गत राज्य के युवाओं को स्वरोजगार प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा 25 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। इन प्रयासों ने युवाओं को संबल प्रदान करने में अपनी उपयोगिता सिद्ध की हैं। चार वर्ष पूर्व किसान की कर्जमाफी से वर्तमान सरकार की लोककल्याण की यात्रा प्रारंभ हुई थी। आज प्रदेश में किसान उन्नत तकनीक से जुड़कर कृषि विविधीकरण की ओर अग्रसर हो रहे हैं। पिछले चार वर्षों में नए उत्तर प्रदेश का सृजन हुआ है। हमारे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी इस बात को मानते हैं कि बीते चार वर्षों में एक भी ऐसी योजना नहीं शुरू हुई, जो जाति, धर्म, पंथ, मजहब के आधार पर विभेद करती हो। हां, हम तुष्टिकरण की नीति के अनुगामी नहीं हैं, यह स्पष्ट है। किसान,  नौजवान, महिला और गरीब वर्तमान सरकार की नीतियों के केंद्र में है। सरकार की नीति और नीयत साफ है और यही वजह है कि जनता सरकार के साथ है। राज्य वही है, संसाधन वही हैं, काम करने वाले भी वही हैं, बदली है तो बस कार्य-संस्कृति। यही प्रतिबद्धतापूर्ण, समर्पित भावना वाली पारदर्शी कार्य-संस्कृति इस नए उत्तर प्रदेश की पहचान है। 


सौजन्य - अमर उजाला।

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अकेलेपन से पैदा होती भयंकर समस्या: भारत में 20 करोड़ से ज्यादा लोग अवसाद के शिकार (अमर उजाला)

रंजना मिश्रा  

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, भारत में 20 करोड़ से ज्यादा लोग डिप्रेशन (अवसाद) सहित अन्य मानसिक बीमारियों के शिकार हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में काम करने वाले लगभग 42 प्रतिशत कर्मचारी डिप्रेशन और एंग्जाइटी (व्यग्रता) से पीड़ित हैं। डिप्रेशन और अकेलापन भारत सहित पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या बन गया है और इसे केवल समाज की जिम्मेदारी मानकर नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। अकेलेपन में घिरा हुआ व्यक्ति स्वयं अपने विनाश का कारण बन जाता है, वह जीवन के बारे में न सोच कर, मृत्यु के बारे में सोचने लगता है। अकेलेपन का शिकार व्यक्ति जीवन भर परेशान रहता है और उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, दुनिया भर के युवाओं की मौत की तीसरी सबसे बड़ी वजह आत्महत्या है और इसका सबसे बड़ा कारण अकेलापन ही है। यूं तो अकेलापन कहने को केवल एक शब्द है, लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते, किंतु हाल की स्थितियों को देखते हुए दुनिया भर के देशों ने अब इसे गंभीरता पूर्वक लेना शुरू कर दिया है। 



अकेलेपन का शिकार केवल वही व्यक्ति नहीं होते, जो समाज में अकेले रह रहे हों, बल्कि इसका शिकार कई बार ऐसे व्यक्ति भी होते हैं, जो भरे-पूरे परिवार, सगे-संबंधियों और मित्रों से घिरे हुए हों और इसके बावजूद स्वयं को अकेला अनुभव करते हों। रिपोर्टों से पता चला है कि कुंवारों की अपेक्षा शादीशुदा लोगों में अकेलेपन की समस्या 60 प्रतिशत तक ज्यादा होती है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की एक रिसर्च के मुताबिक, अकेलेपन की वजह से एक व्यक्ति की उम्र तेजी से घटती है और यह उतना ही खतरनाक है जितना कि एक दिन में 15 सिगरेट पीना। बड़ी-बड़ी समस्याओं से घिरे हुए व्यक्ति अक्सर अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं, महामारियों और युद्ध के समय भी लोगों के जीवन में अकेलेपन की असुरक्षा बढ़ जाती है। कोरोना काल में और विशेषकर लॉकडाउन के समय सभी ने इस अकेलेपन को महसूस किया, इस अवधि में लोगों के व्यवहार में अनेक बदलाव आए, उनमें गुस्सा, निराशा और घुटन बढ़ गई, ये भावनाएं ही व्यक्ति को अकेलेपन के अंधेरे में धकेल देती हैं।



अकेलेपन और एकांत में बहुत फर्क है, अकेलापन मन की वह अवस्था है, जिसे हम मानसिक बीमारी कह सकते हैं। जबकि एकांत व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास की अवस्था है। एकांत सृजन की जरूरत है, किंतु अकेलापन विनाश का कारण बनता है। हाल ही में जापान ने अकेलेपन को दूर करने के लिए एक मंत्रालय का गठन किया है, इसका नाम है 'मिनिस्ट्री ऑफ लोनलीनेस', वैसे तो जापानी लोग कर्मठ व ईमानदार माने जाते हैं, लेकिन अकेलापन उन्हें अंदर ही अंदर खोखला करता जा रहा है। जापान की जनसंख्या साढ़े बारह करोड़ है, इसमें करीब 63 लाख बुजुर्ग हैं और छह करोड़ से ज्यादा युवा हैं, यानी कुल जनसंख्या में पांच प्रतिशत बुजुर्ग हैं और पचास प्रतिशत युवा हैं। ये बुजुर्ग ही जापान की चिंता का विषय हैं, क्योंकि इनके पास इनके अकेलेपन को दूर करने के लिए कोई साथी नहीं रहता। लोग अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए रोबोट डॉग और रोबोट फ्रेंड्स का सहारा लेते हैं, किंतु उन्हें किसी जीवित साथी का साथ मुहैया नहीं होता। 


ऐसे में वर्ष 2020 में आत्महत्या के आंकड़ों को देखकर वहां की सरकार परेशान है। वर्ष 2020 में आत्महत्या के आंकड़े 2019 की अपेक्षा करीब चार प्रतिशत बढ़ गए, यानी वहां हर एक लाख नागरिकों में से 16 नागरिक आत्महत्या कर रहे थे और जांच में पाया गया कि इसकी सबसे बड़ी वजह अकेलापन है, तब वहां की सरकार ने इस मंत्रालय का गठन किया। वर्ष 2018 में ब्रिटेन ने भी इस प्रकार का एक मंत्रालय बनाया था, किंतु दो साल बाद पता चला कि इस मंत्रालय से ब्रिटेन के लोगों को कोई फायदा नहीं पहुंचा है। क्या अब समय आ गया है कि भारत में भी अकेलेपन के लिए एक मंत्रालय बनाया जाए, जैसे जापान में बनाया गया है, क्योंकि आत्महत्या जैसी गंभीर समस्या अब एक महामारी का रूप लेती जा रही है, जो देश के साथ-साथ पूरी दुनिया में फैल रही है। 

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Wednesday, March 17, 2021

आरक्षण का हुआ राजनीतिकरण, असमानता कायम रखने में बना सहायक (अमर उजाला)

सत्यनारायण सिंह  

सर्वोच्च अदालत ने महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण से संबंधित एक याचिका की सुनवाई के दौरान सभी राज्यों को नोटिस भेजकर सरकारी नौकरियों में आरक्षण की पचास फीसदी सीमा के संबंध में उनका दृष्टिकोण जानना चाहा है। शीर्ष अदालत यह देखना चाहती है कि क्या आरक्षण की सीमा पर पुनर्विचार किया जा सकता है। भारत में अदालतें विधि की सांविधानिकता का निर्णय कर सकती हैं। स्वतंत्रता के पश्चात संविधान सभा में ऐतिहासिक उद्देश्य प्रस्ताव 13 दिसंबर, 1946 पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पेश किया था, उसके अनुसार संघीय राज्य व्यवस्था की कल्पना के साथ प्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना, जिसमें राष्ट्रीय एकता, सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, परिस्थिति, अवसर कानून के समक्ष समानता, विचारधारा, अभिव्यक्ति, विश्वास व आस्था की स्वतंत्रता की गारंटी दी गई। अल्पसंख्यकों, पिछड़े जनजातीय क्षेत्रों और दलित तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षा उपाय रखे गए।



संविधान के अनुच्छेद 14 में भारतीय नागरिकों के लिए लोकतांत्रिक अधिकार एवं कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया है। समता के सिद्धांत की व्याख्या अनुच्छेद 15-16 व 29 में की गई है। समतावादी समाज की स्थापना हेतु परंपरागत असमानता पर आधारित व्यवस्था के परिवर्तन, छुआछूत की समाप्ति पर बल दिया गया है। महसूस किया गया कि असमान व्यक्तियों व वर्गों में समानता कायम नहीं हो सकती। इसके लिए 'कम्पनसेटरी डिस्क्रीमिनेशन' (हित-कर भेदभाव) की नीति स्वीकार की गई। समय-समय पर आरक्षण से संबंधित याचिकाओं पर सर्वोच्च अदालत ने विचार भी किया है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, टी. देवदाशन बनाम भारत सरकार, बालाजी बनाम मैसूर राज्य, एस. सी. चंद्र बनाम मैसूर राज्य, गोरखनाथ बनाम पंजाब सरकार, पेरियाकरूपन बनाम तमिलनाडू, जयश्री प्रसाद बनाम जम्मू-कश्मीर, अ. भा. शोषित कर्मचारी संघ बनाम भारत सरकार, इन्द्रा साहनी बनाम भारत सरकार, आदि महत्वपूर्ण मामलों में देश के प्रसिद्ध न्यायविदों ने पिछड़े नागरिकों को प्राथमिकता देने के लिए सामाजिक-आर्थिक अलगाव से कई शताब्दियों से वंचित वर्गों को विशेष अवसर, विशेष छूट, सामाजिक पिछड़ापन और शैक्षिक पिछड़ापन के मानदंड इत्यादि पर स्पष्ट राय दी है। 



मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय की वृहत पीठ ने इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार के मामले में महत्वपूर्ण सिद्धांत तय करते हुए स्पष्ट किया था कि संविधान निर्माताओं की मंशा के अनुरूप सामान्यता आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता। सरकारें संविधान निर्माताओं की मंशा के विरूद्ध आरक्षण देती रही हैं। अवैध कानून बनाती रही हैं। सरकारों ने उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अवहेलना की है। राजनीतिक दबाव बनाकर आरक्षण की सीमा बढ़ाने और आरक्षण के मूल सिद्धांत के विरूद्ध आर्थिक आधार (आय, संपत्ति) के आधार पर आरक्षण देने की कोशिशें जारी हैं।


अदालत को संविधान निर्माताओं की मंशा को ध्यान में रखकर आरक्षण पर गौर करना चाहिए। आज साधन साध्य हो गया है। आरक्षण का राजनीतिकरण हो गया है, जिससे आरक्षण असमानता कायम रखने में सहायक बन चुका है। आज भी तीनों आरक्षित वर्गों की सूची में आधी जातियां पिछड़ी हैं, उन्हें 70 वर्ष में एक प्रतिशत भी लाभ नहीं मिला। क्रीमीलेयर की सीमा इतनी बढ़ाई जा रही है, कि 'हितकर भेदभाव का यंत्र' भेदभाव, गरीबी, बेकारी भुखमरी, बेरोजगारी और कुपोषण बनाए रखने में ही सार्थक सिद्ध हो रहा है। इससे राजनीतिक आधार पर असमानता गहरी हो सकती है। असंतोष दूर करने के लिए आरक्षण के सवाल के जवाब जल्द तलाशने की जरूरत है। यह विडंबना ही है कि आरक्षण असमानता कायम रखने में सहायक बन चुका है।


( - लेखक राजस्थान के पूर्व आरएएस हैं।)

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नेपाल: क्या चुनाव ही है अंतिम विकल्प, ओली सत्ता में रहने को बेचैन (अमर उजाला)

के. एस. तोमर 

भगवान पशुपतिनाथ की भूमि होने के कारण नेपाल धार्मिक सद्भाव और मानव मन की शांति के लिए जाना जाता है, जो भारत और इस हिमालयी देश को युगों से एक सूत्र में बांधे हुए है, लेकिन खड्ग प्रसाद ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट सरकार के भारत विरोधी दृष्टिकोण ने इन संबंधों को खराब किया है। ओली ने आत्मघाती रास्ता अपनाया। अब वह सत्ता में बने रहने के लिए बेचैन हैं, जो कि सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी नेपाल (सीपीएन) की मान्यता खत्म करने के सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद संभव नहीं लग रहा है। एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में, नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के विलय को अवैध करार दिया है, जो दुर्घटनावश ओली के लिए वरदान साबित हो सकता है, भले कुछ ही समय के लिए। हालांकि ओली और प्रचंड नए नाम के साथ नए सिरे से विलय के लिए चुनाव आयोग के पास जा सकते हैं, पर ऐसी संभावना पहले ही खारिज हो चुकी है, क्योंकि दोनों गुट अलग हो चुके हैं, जिसके कारण नेपाल में पूरी तरह से अनिश्चितता का माहौल पैदा हो गया है।



जब ओली और प्रचंड ने मिलकर चुनाव लड़ा था, तो ओली के गुट को 121 और प्रचंड के गुट को निचले सदन में 53 सीटें मिली थीं। शीर्ष अदालत ने ओली को सरकार बचाने के लिए विश्वासमत हासिल करने के लिए कहा है, हालांकि सरकार ने बहुमत खो दिया है, लेकिन यदि ओली जोड़-तोड़ करके विश्वास मत हासिल कर लेते हैं, तो वह बच जाएंगे। किसी भी परिस्थिति में प्रचंड गुट ओली को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं करेगा, इसलिए दोनों गुटों को सर्वसम्मति से एक गैर विवादास्पद उम्मीदवार तैयार करना होगा, जो सरकार का नेतृत्व कर सके। ऐसे में चीन दोनों गुटों के नेताओं पर अपने बीच से एक नए नेता का चुनाव करने के लिए दबाव बना सकता है, जो सरकार का नेतृत्व कर सके। इसके अलावा एक वरिष्ठ नेता को चुनाव आयोग से पंजीकृत नए संगठन के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। एक समय लगा कि नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री माधव नेपाल एक स्वीकार्य उम्मीदवार हो सकते हैं, जो अभी प्रचंड का समर्थन कर रहे हैं, पर मूलतः वह ओली गुट के थे। पर एक तेज घटनाक्रम में ओली ने माधव नेपाल के समर्थकों को हटा दिया और स्टैंडिंग कमेटी में अपने वफादार 23 नेताओं को शामिल कर दिया। 



फिलहाल ओली नेपाली कांग्रेस से वार्ता कर रहे हैं, जिसके 23 सांसद हैं। अगर वे ओली का समर्थन करते हैं, तो सरकार बच जाएगी, क्योंकि 135 के बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए ओली को मात्र 15 सांसदों के समर्थन की जरूरत है। इस तरह से नेपाली कांग्रेस या राष्ट्रीय जनता पार्टी (जिसके दो निलंबित सांसदों को छोड़कर 32 सांसद हैं) के समर्थन से ओली 275 सदस्यीय सदन में बहुमत पा सकते हैं। ओली संसद में बहुमत पाने के लिए मंत्री पद का लोभ देकर जनता समाजवादी पार्टी को भी लुभा सकते हैं। वहीं प्रचंड गुट को बहुमत के लिए नेपाली कांग्रेस और जनता समाजवादी पार्टी, दोनों का समर्थन पाना होगा, तभी वह बहुमत के आंकड़े तक पहुंच पाएगा। पर यह तभी संभव है, जब दोनों पार्टियां ओली के खिलाफ हों। 


संकेतों को मुताबिक, नेपाली कांग्रेस ठहरकर परिस्थितियों को समझना चाहेगी, ताकि मौके का फायदा उठाया जा सके और वह किसी भी गुट का समर्थन करने के लिए राजी हो सकती है, जो उसे सरकार का नेतृत्व करने की अनुमति दे, जो भारत को अच्छा लगेगा। नेपाली कांग्रेस को भारत के करीब माना जाता है, जो कम्युनिस्ट सरकारों द्वारा अपनाई गई विरोधी नीतियों के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई है। ओली ने चीन के प्रति सहानुभूति दिखाई और भारत के साथ संबंधों को खत्म कर दिया, जबकि प्रचंड प्रधानमंत्री के रूप में ज्यादा चल नहीं पाए। नेपाली मीडिया के अनुसार, जनता समाजवादी पार्टी (मधेसी) अपने 32 सांसदों के साथ वैसी पार्टी को समर्थन दे सकती है, जो मधेसी नागरिकों के कल्याण से संबंधित मांगों को स्वीकार करेगी। अगर ओली ने पद छोड़ने से इन्कार कर दिया और प्रचंड नई सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं जुटा सके, तो 2023 में कार्यकाल पूरा करने से पहले ही देश में चुनाव कराने होंगे। प्रचंड ने ओली सरकार से अपने गुट के सातों मंत्रियों को वापस ले लिया है और नेपाली कांग्रेस तथा जनता समाजवादी पार्टी की मदद से वर्तमान अनिश्चितता को खत्म करने का फैसला लिया है। प्रचंड ने अपनी पार्टी के नाम से माओवादी सेंटर शब्द को भी हटाने का प्रस्ताव दिया है, ताकि माओवाद को पसंद न करने वाले देश के अन्य कम्युनिस्ट इसमें शामिल हो सकें। 


संकेतों के मुताबिक, जनता समाजवादी पार्टी नेपाली कांग्रेस को वैचारिक रूप से अपने निकट पाती है, इसलिए दोनों दलों ने ओली को हटाने और प्रचंड से गठजोड़ करने का मन बनाया है, जो उनके रुख के प्रति उत्सुक हैं और एक तंत्र व कार्य योजना तैयार करने के लिए राजी हैं, जो नई सरकार के संचालन की देखरेख करेगा। कथित रूप से जनता समाजवादी पार्टी ने नेपाली कांग्रेस के साथ बातचीत की है और साझा योजना तैयार की है। पर यह परिदृश्य तब बदल सकता है, जब हताश और निराश ओली प्रचंड गुट को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी को प्रधानमंत्री पद की पेशकश कर दें। अपने सीमित विकल्पों को देखते हुए प्रचंड कनिष्ठ सहयोगी के रूप में नेपाली कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने पर सहमत हो सकते हैं और राष्ट्रीय जनता पार्टी की मधेसी कल्याण से संबंधित मांगों को स्वीकार करने के बाद समर्थन की इच्छा जता सकते हैं। नेपाल के संविधान विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर ओली सदन में विश्वासमत पाने में विफल रहते हैं, तो राष्ट्रपति की भूमिका महत्व होगी। ऐसे में, वह दावेदारों को सांसदों के समर्थन की सूची सौंपने के लिए कहेंगी, जिन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने से पहले सत्यापित किया जाएगा। 


कूटनीति के मानदंडों को ध्यान में रखते हुए, विश्लेषकों का मानना है कि भारत को नई सरकार के गठन में वर्चस्व पाने के लिए नेपाली कांग्रेस की मदद करने के लिए विवेकपूर्वक प्रयास करना चाहिए, जो ओली को बचाने के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रहे चीन के लिए एक बड़ा झटका होगा, जिसने अदूरदर्शिता से दो देशों के संबंधों को नुकसान पहुंचाया। 

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Tuesday, March 16, 2021

कोरोना ने बिगाड़ी राज्यों की वित्तीय सेहत (अमर उजाला)

सतीश सिंह

बिहार, छतीसगढ़, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड ने हाल ही में बजट पेश किए हैं। इन राज्यों की मौजूदा वित्तीय स्थिति और उनके बजटीय प्रावधानों से साफ हो जाता है कि कोरोना ने राज्यों में आर्थिक संकट बढ़ाया है और इनकी आमदनी कम हुई है, जबकि खर्च बढ़ा है। इससे राजकोषीय घाटा बढ़ा है। इन राज्यों का राजकोषीय घाटा जीडीपी के परिप्रेक्ष्य में 4.5 प्रतिशत के स्तर तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि, पेश किए गए बजट यानी वित्त वर्ष 2021-22 के लिए जीडीपी के परिप्रेक्ष्य में औसत राजकोषीय घाटा 3.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान के अनुसार इन राज्यों का वित्तीय घाटा 5.8 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच सकता है, जबकि आगामी वित्त वर्ष में यह घटकर 5.0 लाख करोड़ रुपये रह सकता है। हालांकि सभी राज्यों की आर्थिक स्थिति पर कोरोना महामारी का प्रभाव एक समान नहीं पड़ा है। किसी राज्य में राजकोषीय घाटे का स्तर ज्यादा रहा है, तो किसी में कम। राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने वित्त वर्ष 2020-21 के लिए वास्तविक रूप में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 8.00 प्रतिशत संकुचन का अनुमान लगाया है, जबकि नॉमिनल आधार पर इसके 3.8 प्रतिशत संकुचित होने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि, वित्त वर्ष 2021-22 के लिए पेश किए गए केंद्रीय बजट में 14.4 प्रतिशत की दर से विकास होने का अनुमान लगाया गया है। 


कुछ राज्यों ने चालू वित्त वर्ष में, वित्त वर्ष 2019-2020 के मुकाबले नॉमिनल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का अनुमान उदारता से लगाया है, जिसका प्रभाव प्रति व्यक्ति जीएसडीपी पर दृष्टिगोचर हो रहा है। कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2020-21 में वित्त वर्ष 2019-20 की तुलना में प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में 10,000 रुपये से अधिक की वृद्धि हो सकती है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर वित्त वर्ष 2020-2021 में वित्त वर्ष 2019-2020 के बनिस्बत प्रति व्यक्ति जीडीपी में लगभग 7,200 रुपये की गिरावट दर्ज की जा सकती है। इस प्रकार, राज्यों के आंकड़ों और एनएसओ के आंकड़ों में कहीं-कहीं विरोधाभास परिलक्षित होता है। कोरोना काल में सीजीएसटी और एसजीएसटी से राज्यों की कमाई उम्मीद के अनुरूप नहीं रही है। सीजीएसटी और एसजीएसटी से होने वाली कमाई संशोधित बजटीय अनुमान से 21.2 प्रतिशत कम रही है। इतना ही नहीं, कच्चे तेल और उससे बने उत्पादों पर लगाए जाने वाले वैट और बिक्री कर से होने वाली कमाई भी बजटीय अनुमान से 14.7 प्रतिशत कम रही है। 


कमाई में हो रही कमी की भरपाई के लिए राज्यों ने खर्च में कटौती की है और उधारी का दामन थामा है। पूंजीगत खर्च में राज्यों द्वारा लगभग 11.3 प्रतिशत की कटौती की गई है। बावजूद इसके, वित्त वर्ष 2019-20 से वित्त वर्ष 2020-21 में इस मद में 6.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जिसे अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जा सकता है, क्योंकि पूंजीगत खर्च आमतौर पर आधारभूत संरचना को मजबूत करने के लिए किए जाते हैं, जिसकी फिलवक्त बहुत ज्यादा जरूरत है। कोरोना काल में केंद्र एवं राज्यों की सरकारों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में अनुसंधान एवं शोध के महत्व को अच्छी तरह से समझ लिया है। स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत बनाकर ही कोरोना वायरस या फिर इन जैसी अन्य आपदाओं से मुकाबला किया जा सकता है। इधर, भारतीय रिजर्व बैंक ने ‘राज्य वित्त-बजट 2020-21 का एक अध्ययन’ में अनुमान लगाया है कि आने वाले कुछ साल राज्यों के लिए बेहद ही चुनौतीपूर्ण रहेंगे। लिहाजा, राज्यों को प्रभावी रणनीतियों की मदद से खुद को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना होगा। 

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क्वाड की ताकत: चीन को दो टूक संदेश के आगे (अमर उजाला)

प्रदीप कुमार, वरिष्ठ पत्रकार  

अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया (क्वाड देश) के शासनाध्यक्षों में शिखर वार्ता इस संगठन के संक्षिप्त इतिहास में अहम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन का उल्लेखनीय अंश यह था, 'क्वाड का हमारा एजेंडा वैश्विक भलाई के लिए है; यह भारत के प्राचीन दर्शन 'वसुधैव कुटुंबकम' का विस्तार है। यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता का अहम स्तंभ है।' विदेश सचिव हर्ष शृंगला ने बात कुछ और आगे बढ़ाई, 'क्वाड देशों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वतंत्रता और खुलेपन, समृद्धि और सुरक्षा से प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।' बची-खुची बात जापान के प्रधानमंत्री योशिहीदे सूगा ने इस ट्वीट से पूरी कर दी, 'यथास्थिति को बदलने के लिए चीन की एकतरफा कोशिशों का मैंने विरोध किया।' कुल मिलाकर वार्ता का अंडर करेंट चीन-विरोधी रहा। 

शिखर वार्ता से पहले चीन ने मीठे-मीठे शब्दों में चेतावनी दी थी, 'क्षेत्रीय सहयोग की कोई भी व्यवस्था शांतिपूर्ण विकास की वर्तमान प्रवृत्ति के अनुरूप होनी चाहिए, न कि इसके विपरीत। आशा है कि भागीदार देश क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के अनरूप कदम उठाएंगे।' वार्ता के बाद चीन ने कहा कि भारत ब्रिक्स और एससीओ (शंघाई सहयोग संगठन) के लिए नकारात्मक साबित हो रहा है। चीन ने यह भी कहा, 'हमने फरवरी में कहा था कि भारत में ब्रिक्स सम्मेलन के लिए हम समर्थन करते हैं। ऐसा लगता है कि चीन की सद्भावना को समझने में भारत विफल रहा है। सच यह है कि भारत चीन के सामरिक ब्लैकमेल में लगा है।' बीजिंग से संदेश असंदिग्ध है : आने वाले दिनों में भारत के खिलाफ वह और खुलकर वैमनस्यपूर्ण हरकतें करेगा। क्वाड हो या न हो, चीन हर हाल में भारत-विरोधी रहेगा। 

भारत को रूस के रुख की चिंता होनी चाहिए। वार्ता के बाद मास्को से प्रतिक्रिया नहीं आई, पर रूसी विदेश मंत्री सर्जेई लावरोव के कुछ समय पहले के बयान की अनदेखी नहीं की जा सकती। भारत की कूटनीतिक बाध्यताओं को नजरंदाज करते हुए उन्होंने क्वाड पर कहा था, 'पश्चिमी ताकतें चीन-विरोधी खेल में भारत को घसीट रही हैं। इसके साथ ही पश्चिमी देश भारत के साथ रूस के घनिष्ठ सहकार और विशेष संबंधों पर भी बुरा असर डालने की हरकतें कर रहे हैं। सैनिक और तकनीकी सहयोग के लिए भारत पर अमेरिका के भारी दबाव का यही मकसद है।' उनकी टिप्पणी भारत के लिए अपमानजनक थी। रूसी विदेश मंत्री भूल गए कि भारत-सोवियत मैत्री संधि के सुनहरे दौर में भी दो प्रधानमंत्रियों, चरण सिंह और इंदिरा गांधी ने अफगानिस्तान में सोवियत सेना के प्रवेश की हिमायत करने से इन्कार कर दिया था। 

क्वाड को आगे बढ़ाना भारत की सामरिक आवश्यकता है। यह दंतविहीन होता, तो चीन और उसका सहयोगी रूस इसका खुला विरोध न करते। रूस को अलग-थलग करने की अमेरिका की नीति ने मास्को के सामने कोई विकल्प नहीं छोड़ा। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस लाचार था। अब रूस बहुत आगे जा चुका है। चीन की महत्वाकांक्षी योजनाओं से वह साइबेरिया क्षेत्र में अपने लिए खतरे जरूर महसूस कर रहा होगा। चीन से लगे रूस के सीमावर्ती इलाके में हान चीनियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसी परिस्थितियां तब पैदा होती रहती हैं, जब राष्ट्र बड़े खतरों का सामना करने के लिए छोटे खतरों पर जान-बूझकर ध्यान नहीं देते। रूस समझदार है, वह अपने हित में भारत के सामने ऐसे हालात पैदा नहीं करेगा। भारत के राष्ट्रीय हितों का तकाजा यह है कि वह क्वाड क्या, हर ऐसे संगठन और कूटनीतिक प्रयासों को सुदृढ़ करे, जिससे चीन पर लगाम लगती हो। निकट भविष्य में बहुत कुछ साबित होने जा रहा है। अफगानिस्तान में शांति के लिए अमेरिका ने जिस वार्ता का प्रस्ताव रखा है, उसमें भारत को निमंत्रित किया गया है। 

पर रूस के प्रस्ताव में भारत नहीं है। चीन अफगानिस्तान में घुसपैठ की फिराक में है। यही बात पाकिस्तान पर भी लागू होती है। उसे ‘सामरिक गहराई’ चाहिए, जिससे वह भारत के कारण वंचित हो चुका है। तालिबान की बेदखली के बाद भारत-अफगान सहयोग में गुणात्मक परिवर्तन आया है। अगर अफगानिस्तान में भारत की उपलब्धियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो उसकी गंभीर प्रतिक्रिया होगी। भारतीय सत्ता के विभिन्न अवयव अपने हितों की रक्षा में लगे हैं, पर रूस का अपना दूरगामी हित यह सुनिश्चित करने में है कि भारत के कूटनीतिक विकल्प सीमित न होने पाएं। क्वाड भारत के हितों को सिर्फ इस हद तक पूरा करता है कि चीन अपने ऊपर अंकुश लगता देख रहा है। चीन बेलगाम होता जाएगा, तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विश्व शांति खतरे में पड़ जाएगी और उसकी चपेट में आने से भारत भी नहीं बच पाएगा। पर भारत के लिए इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है हिंद महासागर। अंडमान द्वीप समूह और वहां स्थापित सामरिक कमान के अलावा भी भारत के हित दांव पर लगे हुए हैं। म्यांमार की समुद्री सीमा से लेकर श्रीलंका, मालदीव और मैडागास्कर तक निगाह रखने की मजबूरी है। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल से बाद में पूछा गया कि युद्ध के दौरान आपके लिए सबसे चिंताजनक मोड़ कब आया। उनका उत्तर था : जब जापानी नौसेना श्रीलंका के त्रिंकोमाली बंदरगाह की तरफ बढ़ रही थी। आज चीन वहीं जमा हुआ है। मालदीव में चीन और पाकिस्तान समर्थक सरकार बनते ही भारत की मुश्किलें बढ़ जाती हैं।

शीतयुद्ध के दौरान हिंद महासागर के विसैन्यीकरण में भारत अपना हित देखता था। आज हितों की परिभाषा बदल चुकी है। हिंद महासागर का बुरी तरह सैन्यीकरण हो चुका है। हान चीनियों का हिटलराना विस्तारवाद हिंद महासागर में लगातार बढ़ रहा है। हमारे लिए क्वाड-2 का अर्थ यह है कि भारत की पहुंच हिंद महासागर में स्थित अमेरिका के अभेद्य फौजी अड्डे दिएगोगार्शिया तक हो। पश्चिमी सेक्टर, पूर्वी सेक्टर और मध्य सेक्टर में सीमित रहकर चीनी हमलों का कारगर मुकाबला करना दिनोंदिन महंगा होता जाएगा। आक्रामकता  की असहनीय कीमत तो चीन को अदा करनी चाहिए। भारतीय कूटनीति का स्वर्ण युग तब शुरू होगा, जब प्रशांत महासागर से लेकर हिंद महासागर तक चीन की नींद उड़ने लगे।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Monday, March 15, 2021

राजनीति में नैतिकता: अच्छे और ईमानदार लोगों को लाने का कानूनी प्रावधान आवश्यक (अमर उजाला)

जगदीप एस छोकरृ


राजनीति में अच्छे और ईमानदार लोगों को लाने का कानूनी प्रावधान आवश्यक है। यह एक मुश्किल काम है। लेकिन देश और देश की राजनीति आसानी से सुधर नहीं सकती, उसके लिए मुश्किल काम करने ही पड़ेंगे।



देश की राजनीति में दलबदल का पहला और चकित करने वाला घटनाक्रम हरियाणा में सामने आया था, जब अक्तूबर, 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने पंद्रह दिन में तीन बार पार्टी बदली थी। इस कारण उस घटना का नाम ही 'आया राम गया राम' हो गया। दलबदल तब से चालू है। पिछले पांच साल में जिन सांसदों और विधायकों ने पार्टी बदली और दोबारा चुनाव लड़ा, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने हाल ही में इनके बारे में शोध किया।



उसमें पता चला है कि इस दौरान 443 सदस्यों ने दलबदल कानून तोड़े। इनमें से 170 (42 फीसदी) विधायकों ने कांग्रेस छोड़कर दूसरी पार्टियों में जाना उचित समझा, तो भाजपा के मात्र 18 विधायकों ने दूसरी पार्टियों का दामन थामा। जबकि 182 (45 फीसदी) विधायक अपनी पार्टी छोड़ भाजपा में गए। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि पिछले दिनों मध्य प्रदेश, मणिपुर, गोवा, अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक में पुरानी सरकार का गिरना और नई सरकार का गठन होना दलबदल के कारण ही हुआ। सांसद और विधायक इतनी जल्दी दल क्यों बदलते हैं? वैसे तो इसके बहुत कारण हो सकते हैं, पर सामान्य रूप से मंत्री बनने या धनराशि मिलने का प्रलोभन प्रमुख है।


इससे कई सवाल उत्पन्न होते हैं। पहले तो नवनिर्वाचित विधायकों के आत्मसम्मान पर शंका होती है। अक्सर इन्हें वातानुकूलित बसों या हवाई जहाज में बिठाकर महंगे रिजॉर्ट या होटलों में ले जाया जाता है और लगभग नजरबंद करके रखा जाता है। अब अमूमन हर विधानसभा चुनाव के बाद ऐसे दृश्य आम हैं। खुद विधायकों को भी नहीं महसूस होता कि इस तरह बंदी बनना उनके विवेक और परिपक्वता पर प्रश्नचिह्न है। किसी भी व्यक्ति, खासतौर से चुने हुए नेता के आत्मसम्मान को इस तरह के व्यवहार से घोर आपत्ति होनी चाहिए। लेकिन उनकी तस्वीरों और वीडियो क्लिप से दिखता है कि वे इस हालत में बहुत खुश हैं।


इसका यही अर्थ है कि हमारे विधायकों-सांसदों में परिपक्वता की कमी है। यह कहा जा सकता है कि राजनीति में नैतिकता खत्म ही हो गई है। राजनीति में आने वालों का एकमात्र उद्देश्य रुपये कमाना और संपत्ति बढ़ाना है। लॉ कमीशन ऑफ इंडिया ने 1999 में जारी अपनी एक रिपोर्ट में यह लिखा था कि 'सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ रहा है। ऐसा लगता है कि लोगों का राजनीति में आने का और चुनाव लड़ने का केवल एक ही कारण है कि वे रातोंरात धनवान हो जाएं।' राजनीति का अपराधीकरण भी नैतिकता के अभाव का एक प्रमुख कारण है। जब लोकसभा के 43 फीसदी सदस्यों के विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामले अदालतों में चल रहे हों, तब नैतिकता की आशा रखना अव्यावहारिक लगता है। हमारे राजनीतिक दलों के आंतरिक मामलों में लोकतांत्रिक सिद्धांतों का कोई स्थान नहीं है। हर राजनीतिक दल व्यक्ति विशेष, एक समूह या एक परिवार की मर्जी पर चलता है।


चुनावों में उम्मीदवारों का चयन भी इनकी मर्जी से होता है। उसमें कोई लोकतांत्रिक प्रावधान नहीं है। दलबदल को रोकने के लिए वर्ष 1985 में संविधान में 52वां संशोधन कर दल-बदल विरोधी कानून बनाया गया था। उसमें यह प्रावधान था कि अगर कोई सांसद या विधायक संसद या विधानसभा के सत्र में अपनी पार्टी की व्हिप के विपरीत मत दे, तो उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है। किसी दूसरे दल में शामिल होने पर भी उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। लेकिन इसमें एक ढील भी दी गई कि दो तिहाई या उससे ज्यादा सांसद या विधायक दलबदल करें, तो सदस्यता खत्म नहीं होगी। दलबदल कानून किस सांसद या विधायक पर लागू होगा या नहीं होगा, यह फैसला केवल संसद या विधानसभा के अध्यक्ष ही कर सकते हैं। दलबदल कानून बन गया और कुछ साल तक इसका थोड़ा-बहुत असर भी दिखाई पड़ा। लेकिन दो तिहाई वाले प्रावधान का नतीजा यह हुआ कि लोगों ने कहना शुरू किया कि विधायकों और सांसदों की थोक में तो खरीद-फरोख्त हो सकती है, फुटकर नहीं।


इस कानून से बचने की एक और अनूठी तरकीब निकाली गई। इसके तहत विधानसभा के अध्यक्ष इस बात का फैसला ही नहीं करते थे कि अमुक सदस्य ने इस कानून का उल्लंघन किया है या नहीं। बदलते समय के साथ यह कानून लगभग निरर्थक हो गया। वर्ष 2003 में 91वें संविधान संशोधन में कहा गया कि दलबदल के बाद सांसद या विधायक कोई लाभकारी पद धारण नहीं कर सकते। संशोधन में यह भी कहा गया कि प्रदेश सरकार में मंत्रियों की संख्या सदस्यों की कुल संख्या से 15 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती। इन संशोधनों की वजह से भी स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हुआ। इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ मूलभूत सुधारों की आवश्यकता है। पहली बात तो यह है कि सदस्यों के दल बदलने का फैसला संसद या विधानसभा अध्यक्ष के बजाय संसद के लिए राष्ट्रपति और विधानसभा के लिए राज्यपाल करें।


फैसला करने से पहले उन्हें चुनाव आयोग की सलाह लेनी चाहिए। एक कानून यह भी होना होना चाहिए कि राजनीतिक दलों का आंतरिक कामकाज कैसा होगा। यदि राजनीतिक दल आंतरिक रूप से लोकतांत्रिक नहीं होंगे, तो वे भला देश में लोकतांत्रिक प्रणाली कैसे चला सकेंगे? इस बारे में लॉ कमीशन ऑफ इंडिया की 1999 में जारी रिपोर्ट में विस्तारपूर्वक चर्चा है। सर्वोच्च न्यायालय ने 13 फरवरी, 2020 के अपने एक फैसले में कहा कि अगर राजनीतिक दल ऐसे व्यक्तियों को टिकट देते हैं, जिनके विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामले अदालतों में चल रहे हैं, तो दलों को इसके विस्तृत कारण बताने होंगे। शीर्ष अदालत ने तो यहां तक कहा है कि जिताऊ उम्मीदवार होना आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को टिकट देने का कारण नहीं हो सकता।


राजनीति में अच्छे और ईमानदार लोगों को लाने का कानूनी प्रावधान आवश्यक है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक दलों या राजनेताओं से यह उम्मीद नहीं की जा सकती। इसके लिए जनता, न्यायपालिका और मीडिया समूहों को एकजुट होकर राजनीतिक दलों को अपने ढांचे में सुधार लाने के लिए विवश करना होगा। यह एक मुश्किल काम है। लेकिन देश और देश की राजनीति आसानी से सुधर नहीं सकती, उसके लिए मुश्किल काम करने ही पड़ेंगे।


-लेखक आईआईएम, अहमदाबाद के सेवानिवृत्त डीन और एडीआर के संस्थापक सदस्य हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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पारंपरिक चिकित्सा को परखने की जरूरत (अमर उजाला)

अश्विनी शर्मा


हमारे यहां स्वास्थ्य क्षेत्र में चिकित्सकों की कमी, सस्ती सुलभ और गुणवत्तायुक्त स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच, उन पर भरोसा और उनकी कारगरता हमेशा से ही सवालों के घेरे में रही है। मेडिकल जर्नल लैंसेट के 2018 के एक अध्ययन के मुताबिक, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और लोगों तक उनकी पहुंच के मामले में भारत विश्व के 195 देशों में 145वें पायदान पर है। भारत 195 देशों की सूची में अपने पड़ोसी देश चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान से भी पीछे है।



विश्व आर्थिक मंच ने 2019 में कहा कि भारत स्वास्थ्य जीवन प्रत्याशा से संबंधित सूचकांक में काफी निराशाजनक है। भारत 141 देशों के सर्वे में 109 वें स्थान पर है। वहीं साल 2019 के वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा सूचकांक के अनुसार 195 देशों में भारत 57वें स्थान पर है।



भारत सरकार द्वारा गत 20 नवंबर को आयुष मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय औषधि परिषद की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि आयुर्वेद में स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई करने वाले डॉक्टर भी अब हड्डियों के ऑपरेशन के साथ आंख, नाक, कान व गले की सर्जरी कर सकेंगे। इस अधिनियम के द्वारा आयुष डॉक्टर को कुल 58 तरह की सर्जरी की अनुमति प्रदान की गई है। इस निर्णय को लेकर देश भर के डॉक्टर व स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच बहस छिड़ गई है।


लेकिन आयुष और एलोपैथिक की पूरी बहस में 'ट्रेडिशनल हीलर्स' कहीं नहीं हैं। ये हीलर्स ही हैं, जो नित नए नुस्खे खोजकर लाते हैं। जड़ी-बूटियों से इलाज की परंपरा पुरानी है, हालांकि इसके वैज्ञानिक आधार को लेकर भी बहस होते रहती है। भारत में आयुर्वेद का इतिहास 2,500 वर्ष पुराना है। सुश्रुत संहिता में शल्य व शालक्य क्रियाओं का वर्णन किया गया है। एलोपैथिक दवाओं का इतिहास 200 साल से भी कम का है। अपने देश में तो पहले मेडिकल कॉलेज की स्थापना ही 1835 में कोलकाता में हुई थी।


ये ट्रेडिशनल हीलर्स ही हैं, जो सदियों से अस्पताल व मरीज के बीच में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। राजस्थान के रेगिस्तान, बस्तर के जंगल व पहाड़ जैसे दुर्गम इलाकों में जहां दूर-दूर तक कोई डॉक्टर या दवा उपलब्ध नहीं होती, पारंपरिक इलाज ही आरंभिक तौर पर लोगों का सहारा बनता है। यदि कोई इमरजेंसी होती है, तो उसका प्राथमिक उपचार भी यही लोग करते हैं। रात्रि में दाई की भूमिका भी यही लोग निभाते हैं।


इन ट्रेडिशनल हीलर्स के तौर पर घुमंतू समुदायों में गोंड, चितोड़िया, पारधी, सिंगीवाल, बैदु, कलन्दर, भोपा, जोगी- सपेरा इत्यादि शामिल हैं। आदिवासी समुदायों में मुरिया, माड़िया, गोंड व भील प्रमुख हैं। हिमालयी राज्यों में लेप्चा, भूटिया ओर नेपाली समुदाय हीलिंग के काम से जुड़े हैं। इन समुदायों के नुस्खे भी खास हैं। वाद, वाधि से लेकर सेक्स की कमजोरी, गठिया बाय, वायरल इन्फेक्शन, बच्चे के जन्म पर पिलाई जाने वाली जन्म घुट्टी से लेकर बिच्छू और मधुमक्खी के काटने, पेट गैस, बदहजमी और एसिडिटी इत्यादि जैसी दर्जनों बीमारियों और जीवन में होने वाले तनावों का ये इलाज करते हैं। ये सारे समुदाय हिमालय क्षेत्र में हरिद्वार व सिक्किम के जंगल, छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश के जंगल, नीलगिरी की पहाड़ियों तथा रेगिस्तान के क्षेत्र तथा अरावली शृंखला से जड़ी-बूटियां एकत्रित करते हैं।


वन्य जीव संरक्षण अधिनियम-1972 आने के बाद इन समुदायों के जीव-जंतुओं के रखने पर रोक लग गई। मसलन, सिंगीवाल हिरण के सींगों से इलाज करते थे। जोगी सपेरा सांप रखते हैं, जड़ी बूटियों का उनका ज्ञान उसी से जुड़ा है। सांप रखने पर रोक लग गई है। हालांकि केंद्र सरकार ने 2006 के वनाधिकार अधिनियम में सुधार कर आदिवासी समुदायों को सीमित क्षेत्र में जंगल के उत्पाद लाने की अनुमति दी, लेकिन इसमें ऐसे घुमंतू समुदाय छूट गए, जिन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं मिला है। इसी तरह से मेडिकल प्रैक्टिशनर ऐक्ट,अस्पताल की स्थापना से संबंधित कानून और दवा अधिनियम का असर भी उन समुदायों पर पड़ा, जो पारंपरिक चिकित्सा पद्धति से इलाज करते थे और आजीविका का इंतजाम करते थे। 


दरअसल एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति का पूरा विमर्श ही इस बात पर टिका हुआ है कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धति पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि ट्रेडिशनल हीलिंग को वैज्ञानिक कसौटी पर कसा जाए, ताकि सदियों से प्रयोग में आ रही जड़ी- बूटियों व अन्य वनस्पतियों की उपयोगिता सिद्ध की जा सके। ट्रेडिशनल हीलर्स के दावों को परखने के लिए कोई नियामक क्यों नहीं बनाया जा सकता? कहने की जरूरत नहीं कि अंधविश्वास की इसमें कोई जगह नहीं हो सकती। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इन समुदायों की आजीविका भी इससे जुड़ी है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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संस्कृति के इस उपनयन संस्कार में हम (अमर उजाला)

गौतम चटर्जी 

इस साल के नोबेल भौतिक विज्ञानी रोजर पेनरोज की नई किताब का भारतीय संस्करण प्रकाशित हुआ है, द लार्ज, द स्मॉल ऐंड द ह्यूमन माइंड। शैडोज ऑफ द माइंड के बाद उन्हीं प्रश्नों पर संवाद करती यह उनकी अगली किताब है। इसी के साथ दिवंगत भौतिक शास्त्री डेविड बॉम की किताब भी आई है होलनेस ऐंड द इम्प्लीकेट ऑर्डर। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ काम कर भौतिक विज्ञान की दुनिया में एक नई दृष्टि देने वाले डेविड बॉम के जीवन का उत्तरार्ध जिद्दू कृष्णमूर्ति के साथ अर्थपूर्ण या रचनात्मक संवाद में बीता था। इसलिए उनके प्रयोगों और सिद्धांतों में दार्शनिक रहस्य की छाया भी मिलती है। उनका मुख्य शोध कहता है कि जो कुछ भी हमारे यथार्थ जीवन में घटता है, उससे पहले वह चेतना के एक अन्य स्तर पर घट चुका रहता है। इसे हम वस्तु जगत या वस्तुओं के यथार्थ जगत का छायालोक कह सकते हैं। ज्ञान के इस आलोक का यह वैज्ञानिक छायालोक हमें फिर पॉल डेविस, स्टीफन हॉकिंग और डेविड चाल्मर्स की स्थापनाओं में भी दिखता है। पेनरोज और डेविड बॉम की ये किताबें गणितीय भाषा में हमारे जीवन प्रश्नों और प्रकृति रहस्यों को नए छायालोक में देखती हैं। यह दृष्टि नई शती में नए छंग से संस्कारित हो रही हमारी जीवन शैली को प्रेरित और प्रतिकृत करती है। यह हमारी उस नई पीढ़ी का उपनयन संस्कार है, जिसके लिए शायद अभी वह तैयार नहीं है।

डिजिटल युग के बावजूद हमारी मेधावी युवा पीढ़ी अभी इस वैज्ञानिक संस्कार के लिए क्यों तैयार नहीं है, यह समझने की जरूरत है। नॉलेज और विज्डम, अंग्रेजी के इन दोनों शब्दों के लिए हम हिंदी में ज्ञान शब्द का ही प्रयोग करते हैं, जबकि नॉलेज का मतलब है जीवन और जगत का बाहरी ज्ञान या यथार्थ ज्ञान और विज्डम का अर्थ है सत्य या परम सत्य का ज्ञान। शिक्षा की भारतीय संहिता विद्यार्थी को यथार्थ ज्ञान के लिए तैयार करती है, जिसका एकमात्र उद्देश्य है रोजगार, अर्थ समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा। इस व्यवस्था में विज्डम और अच्छा व्यक्ति या योग्य विश्व नागरिक होने की कोई गुंजाइश नहीं है। यह सनातन और पारंपरिक विडंबना है कि जिस युवा को हम रोजगार के लिए तैयार करते हैं, उसी से हम अच्छे व्यक्ति की तरह व्यवहार की उम्मीद भी रखते हैं, क्योंकि हम शिक्षित होने के अर्थ को ज्ञानी और सुसंस्कृत और अच्छा मनुष्य के लिए भी प्रतिष्ठित कर चुके हैं, जो अब तक सिरे से गलत सिद्ध होता आ रहा है।

जबकि प्राचीन भारत और पूरे विश्व में ज्ञान के लिए युवा को पहले अच्छा होने के नैतिक दायित्व से परिचित कराया जाता था। वैदिक ऋषियों से लेकर सुकरात तक और लाओत्से तथा कन्फ्यूशियस से लेकर बुद्ध तक यही परंपरा मध्य काल तक दिखती है। आधुनिक भारत में इस शिक्षा व्यवस्था का निरंतर लोप होता चला गया। दर्शन का साथ लेकर चल रहे आधुनिक विज्ञानी युवाओं का नए ढंग से उपनयन संस्कार करने को शपथबद्ध हैं। उनके विज्ञान में क्वांटम भौतिकी के साथ बुद्ध भी हैं और वैदिक दृष्टि भी, सुकरात भी हैं और कान्ट और श्री अरविंद भी। वे शिक्षा को दोबारा विज्डम यानी अर्थ के ज्ञान की गरिमा और गौरव सौंपना चाह रहे हैं। वस्तु जगत को भ्रम कहने का साहस कभी विज्ञानी सोच भी नहीं सकता था। लेकिन श्रोडिंगर और हाइजेन्बर्ग जैसे क्वान्टम विज्ञानियों ने यह गैलीलियो साहस दिखाया। यह गैलीलियो साहस मनुष्य को सत्य की कसौटी पर देखने और दिखाने का उपनयन संस्कार है। इसी संस्कार का विस्तार हमें डेविड बॉम और पेनरोज में दिखता है।


भारतीय मानस में आदि शंकर का यह कथन सदियों से अंकित है कि यह संसार माया है। सांप और रस्सी के भ्रम का उनका रूपक भी भारतीय दर्शन साहित्य में प्रसिद्ध दृष्टि है। जेन और ताओ ऋषि भी यह कहते हैं कि ध्यान से पहले पहाड़ है, फिर पहाड़ नहीं है, ध्यान के बाद फिर पहाड़ है। कश्मीर के शैव ऋषि जैसे अभिनवगुप्त कहते हैं कि यह संसार उसी आत्मा की विभूति है, जिसे हम शिव कहते हैं। डेविड बॉम थिंग, थॉट और रियलिटी को लेकर यानी वस्तु, विचार और यथार्थ को लेकर मंथन करते हैं और उसके मूल अर्थ को निरुक्ति से लेकर बुद्ध देशनाओं तक देखने की कोशिश करते हैं।


सारांश यह हुआ कि संसार भ्रम नहीं, न ही रहस्य है, बल्कि एक ही संसार को लेकर जो असंख्य मन असंख्य संसार की रचना करते हैं, वे भ्रम हैं, यथार्थ की जगह छाया है। इस छायालोक के अंत से रियल थिंग या वस्तु का यथार्थ ज्ञान संभव है। यह अर्थ कान्ट की भाषा में उसी वस्तु में निहित है, जिसके रूप की छवि हमारे मन में अंकित है, जो एक समानांतर जगत की रचना कर चुकी है, जो ऐसी माया है, जिसके आवरण में सत्य छिप गया है। इस उपनयन संस्कार से अच्छा मनुष्य जीवन अवश्यंभावी है, जो भौतिक जीवन को वंचित करता नहीं, उल्टे वृहत्तर प्रकृति सत्य के संतुलन के साथ उसे संतुलित रखता है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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कट्टर दक्षिणपंथ और कट्टर वामपंथ, दोनों का एक ही लक्ष्य (अमर उजाला)

रामचंद्र गुहा 

मैं अग्रणी ब्रिटिश नारीवादी और शिक्षाविद् डोरा रसेल के संस्मरण पढ़ रहा हूं। इनका प्रकाशन तीन खंडों में किया गया था और मैंने अभी बस पहला खंड ही पूरा किया है। इसमें एडवार्डियान इंग्लैंड में उनकी परवरिश, कैम्ब्रिज में उनकी शिक्षा, लैंगिक समानता पर उनके दृष्टिकोण का विकास, उनके द्वारा स्थापित एक प्रायोगिक स्कूल और विद्वान तथा विवादास्पद दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल के साथ विवाह में बिताए वर्षों को समाहित किया गया है।


उनकी पीढ़ी के अन्य लोगों की तरह डोरा रसेल भी बोल्शेविक क्रांति से गहराई से प्रभावित थीं, जो कि तब हुई थी, जब उनकी उम्र बीस-बाइस साल की रही होगी। क्रांति के भड़कने के बाद उन्होंने रूस की यात्रा की, ताकि इसके प्रभाव का सीधा अध्ययन कर सकें। 1918-19 के दौरान रूस में उत्साही बोल्शेविकों के साथ बात करते हुए डोरा को मध्य युगीन ईसाई धर्मशास्त्रियों की याद आ गई, जिन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड का सपना देखा था, इस उम्मीद में कि इसकी रचना ईश्वर करेंगे। उन धार्मिक कल्पनाजीवियों की तरह, जैसा कि रसेल ने लिखा, 'ये लोग (रूस में) ब्रह्मांड के वास्तुकार 'ग्रेट क्लॉकमेकर' की नकल कर रहे हैं और जिस तरह से उसने ग्रहों की गति स्थापित की थी, ठीक उसी तरह से वे नए समाज के ब्लू प्रिंट की रचना करेंगे, जो कि औद्योगिक रणनीति पर आधारित होगा, जिसमें प्रत्येक पुरुष और स्त्री को काम मिलेगा और वे अपना योगदान देंगे। एक बार गति पकड़ लेने के बाद यह नई तर्कसंगत समाज व्यवस्था खुद से चलने लगेगी।' 



सोवियत रूस में बातचीत के दौरान डोरा रसेल बोल्शेविकों की भयानक मताधंता को देखकर प्रभावित और कुछ हद तक परेशान हुईं। उन्होंने लिखा, 'ऐसा दिखता है कि भविष्य के साम्यवादी राज्य की स्थापना के लिए साम्यवाद की शिक्षा अनिवार्य हो सकती है, लेकिन यह मुझे एक बुराई लगी, क्योंकि इसे रचनात्मकता के बजाय घृणा और उग्रवाद की अपील के साथ भावनात्मकता और उन्माद के जरिये किया जा रहा है। यह स्वतंत्र समझ पर रोक लगाता है और ऐसी पहल को ध्वस्त करता है।'


डोरा रसेल के एक दशक बाद कवि रवींद्रनाथ टैगोर सोवियत रूस की यात्रा पर गए। टैगोर दो हफ्ते के प्रवास के दौरान वहां स्कूलों और फैक्टरियों में गए और विभिन्न वर्गों के लोगों से बात की। लौटने से थोड़ा पहले टैगोर ने पार्टी के अखबार इजवेस्तिया को एक साक्षात्कार दिया। सोवियतों ने जिस अद्भुत सघनता के साथ शिक्षा का विस्तार किया, उसकी उन्होंने सराहना की, लेकिन साथ ही उन्होंने यह चेतावनी भी दी, 'मैं आपसे पूछना चाहूंगा ः क्या आप प्रशिक्षण में अपने लोगों के मन में उन लोगों के प्रति गुस्सा, वर्गीय घृणा और बदले की भावना को भड़का कर अपनी विचारधारा का भला कर रहे हैं, जो आपकी विचारधारा से साझा नहीं करते, जिन्हें आप अपने दुश्मन समझते हैं? यह सच है कि आपको बाधाओं से लड़ना होगा, आपको अज्ञानता और संवेदनहीनता से लड़ना होगा यहां तक कि निरंतर आने वाले प्रतिरोध से भी। आपके अनुसार आपका मिशन अपने खुद के राष्ट्र या खुद की पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी मानवता की बेहतरी के लिए है। लेकिन क्या जो लोग आपके लक्ष्य से सहमत नहीं हैं, वे मानवता के दायरे में नहीं आते?'


टैगोर के विचार से एक परिपक्व राजनीतिक व्यवस्था असहमति को स्वीकार करती है, जहां मन को स्वतंत्र होने की इजाजत हो। यदि दबाव बनाकर सारे विचार एक जैसे हो जाएं, तो यह न केवल अरुचिकर, बल्कि यांत्रिक नियमन से संचालित निर्जीव दुनिया बन जाएगी। यदि आपके पास ऐसा मिशन है जिसमें सारी मानवताएं समाहित हैं, तो फिर मत भिन्नता को स्वीकार कीजिए। बौद्धिक ताकतों के मुक्त प्रवाह तथा नैतिक प्रोत्साहन से विचार निरंतर बदलते रहते हैं और पुनः बदलते हैं। हिंसा, हिंसा और अंध मूर्खता का कारण बनती है। सत्य को स्वीकार करने के लिए मन की स्वतंत्रता जरूरी है; आतंक इसे निराशाजनक ढंग से नष्ट कर देता है।'


डोरा रसेल पर लौटते हैं। सोवियत रूस की यात्रा के कई साल बाद वह चीन गईं और वहां उन्होंने नौसिखुआ कम्युनिस्ट पार्टी से बात की। उनकी कट्टरता और उत्कंठा अपने रूसी कॉमरेड से कम नहीं थी। जनवरी, 1921 में बीजिंग से अपने एक मित्र को भेजे एक पत्र में डोरा ने टिप्पणी की कि 'विचारकों में साम्यवाद को सत्ता में लाने का दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन चीन और रूस दोनों जगह यह धर्म से कम नहीं है... धर्म के रूप में इसका लाभ यह हो सकता है कि राज्यों के निर्माण में धर्म लोगों को एक समुदाय के रूप में एकजुट रखते हैं और उनमें एक झुंड में रहने की भावना जगाते हैं।'


विशेष रूप से, जैसा कि हमारे अपने देश के समकालीन इतिहास से पता चलता है कि कट्टर दक्षिणपंथ कट्टर वामपंथ के साथ कई गुणों का साझा करता है। वे इस पर भी यकीन करते हैं कि साधन चाहे कुछ भी हो लक्ष्य ही अंतिम है, जैसे कि सत्तारूढ़ राजनेताओं को नौकरशाही और न्यायपालिका को नियंत्रित करना चाहिए, राज्य और सत्तारूढ़ दल के पास यह अधिकार हो कि वह नियंत्रित और निर्देशित कर सकें कि उपन्यास कैसे लिखे जाएं, गाने कैसे गाए जाएं, किन नारों को प्रोत्साहित किया जाए और किन्हें प्रतिबंधित किया जाए। कट्टर दक्षिणपंथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी नकारता है और अपने खुद के धर्म के रहस्यमय और अतार्किक तत्वों से निर्देशित होता है। फ्रेंच इतिहासकार फ्रैंकोइस फ्यूरे ने दक्षिणपंथी और वामपंथी निरंकुशता की समानताओं को खूबसूरती से अपनी किताब द पासिंग ऑफ एन इल्यूशन में दर्ज किया है। फ्यूरे ने लिखा, 'सोवियत लोगों की तरह ही नेशनल सोशलिस्ट लोग थे, उनसे बाहर हर व्यक्ति एंटीसोशल था। एकता का निरंतर जश्न मनाया जाता था और सार्वजनिक रूप से वैचारिक घोषणाओं में इसकी पुष्टि की जाती थी। इसका सर्वोच्च रूप था, इसके नेता फ्यूहरर की मनुष्येतर छवि। इस प्रकार जनता अनिवार्य और स्थायी रूप से पार्टी स्टेट का हिस्सा थी। इससे परे, केवल लोगों के दुश्मन थे, लेनिन के लिए इसका मतलब बूर्जुआ था और हिटलर के लिए यहूदी। हर समय लोग निगरानी में रहते थे और सत्ता शाश्वत थी।' फ्यूरे ने लिखा कि फासीवाद की तरह साम्यवाद को हिंसा और अनैतिक साधन मंजूर थे, बशर्ते कि वे राजनीतिक प्रभुत्व की ओर ले जाएं। लिहाजा लेनिन और हिटलर के लिए, 'आप अपने साथी नागरिकों को उसी तरह से मार सकते हैं, जिस तरह से युद्ध में शत्रु को। इसके लिए बस यह जरूरी है कि वे गलत वर्ग या विपक्षी दल के हों।'


फ्यूरे की किताब अंतर यूरोपीय युद्ध पर केंद्रित है, इसलिए इसमें लेनिन और हिटलर का जिक्र है। युद्धोतर एशिया का कोई भावी इतिहासकार चीन में साम्यवाद के उदय और भारत में सत्तावादी हिंदुत्व के उदय में समानताएं देख सकता है, खासतौर से माओ और मोदी की मनुष्येतर छवि में। वास्तव में फ्यूरे कभी भारत नहीं आए और संभव है कि उन्होंने इस देश के इतिहास के बारे में भी कम पढ़ा हो, लेकिन मैंने जिस अंश का जिक्र किया वह भारत के संबंध में पूर्वाभास-सा लगता है। माओ के अधीन साम्यवादी चीनियों की तरह मोदी के नेतृत्व में भाजपा एक पार्टी वाली व्यवस्था कायम करना चाहती है। इसके लिए महान और कभी गलती न करने वाले नेता की छवि गढ़ी गई है; विपक्षियों को भयभीत किया गया है और राष्ट्रविरोधी बताकर उनकी आलोचना की जाती है। एक अंतराल के बाद दावा किया जाता है कि प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश हो रही है। और सबसे दुखद है कि भारतीय मुस्लिमों को ठीक उसी तरह आतंकित किया जा रहा है, जैसा कि कम्युनिस्टों ने चीन में गैर हान समुदायों के साथ किया। दोनों ही पक्ष स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन कट्टर दक्षिणपंथ और कट्टर वामपंथ में काफी समानताएं हैं। डोरा रसेल की ऊपर दी गई पंक्तियों को याद करें और 'साम्यवाद' की जगह 'हिंदुत्व' रख दें, तो यह इस बात का स्पष्ट निरूपण होगा कि आरएसएस और भाजपा आज भारत में क्या करना चाहते हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Saturday, March 13, 2021

होम लोन की ब्याज दर घटकर 15 साल के निचले स्तर पर, क्या मंदी से उबर पाएगा रियल एस्टेट? (अमर उजाला)

नारायण कृष्णमूर्ति  

घर की खोज करते समय घर खरीदार सबसे ज्यादा विचार होम लोन की ब्याज दर पर करते हैं। पिछले एक साल में होम लोन की ब्याज दर घटकर 15 साल के निचले स्तर 6.6 फीसदी पर पहुंच गई है। ऐसी कम दरों पर, एक आकस्मिक पर्यवेक्षक के लिए भी होम लोन की ब्याज दरें आकर्षक लगती हैं। इसलिए घर खरीदने के इच्छुक लोगों के लिए कम ब्याज दर से लाभ उठाने का यह अच्छा समय हो सकता है। इसके अलावा प्रतिस्पर्धी बैंक और एचएफसी (हाउसिंग फाइनांस कॉरपोरेशंस) कर्ज लेने वालों को प्रोत्साहन की भी पेशकश करते हैं। उदाहरण के लिए, ऑनलाइन आवेदन करने वालों, पहली बार कर्ज लेने वालों और किफायती घर खरीदने वालों के लिए अतिरिक्त छूट की रणनीति अपनाई जाती है। हालांकि हम कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में अभूतपूर्व समय में जी रहे हैं, जिसने लोगों की आजीविका और वेतन को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसलिए कम ब्याज दरों का लाभ उठाने से पहले अपने सपनों के घर के लिए आंख मूंद कर कर्ज लेने से पहले संभावनाओं पर विचार करें। 



आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा अपनाई जा रही मौद्रिक नीतियों की बदौलत ब्याज दरें ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर पहुंच गई हैं और बचतकर्ताओं और पेंशनभोगियों के लिए भी सामान्य रूप से ब्याज दरें घट रही हैं। क्या यह दर और नीचे जाएगी? इसकी संभावना नहीं है, क्योंकि बढ़ती खुदरा मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक की बेंचमार्क ब्याज दर में कटौती करने की क्षमता को प्रभावित करेगी, यह देखते हुए कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति को लगभग चार प्रतिशत रखने का आदेश दिया गया है। इसलिए अगर आपने 15 साल की अवधि के लिए 30 लाख रुपये का होम लोन लिया है, तो नौ फीसदी ब्याज दर पर ईएमआई 30,500 रुपये होगी। यदि अन्य चीजें समान रहती हैं, तो आपकी ईएमआई वार्षिक 6.75 प्रतिशत की ब्याज दर पर लगभग 26,500 रुपये होगी। कुछ लोगों को 4,000 रुपये ज्यादा नहीं लग सकते हैं, लेकिन 15 साल की अवधि को देखते हुए यह उच्च ईएमआई की तुलना में लगभग 14 फीसदी बचत है। पर इसकी गारंटी नहीं है कि यह ब्याज दर ऋण की पूरी अवधि तक रहेगी, क्योंकि जब बेस रेट बढ़ना शुरू हो जाएगा, तो यह ब्याज दर भी बदल सकती है।



पुराने उधारकर्ता इस निम्न ब्याज दर से लाभ नहीं उठा सकते हैं, क्योंकि उनके ऋणों को फंड-आधारित उधार दर की सीमांत लागत (एमसीएलआर) के लिए बेंचमार्क किया गया था, जबकि नए ऋण पर ब्याज दरें एक्सटर्नल बेंचमार्क पर आधारित हैं, जो रेपो रेट है। घर केवल तभी खरीदें, जब आपको इसकी जरूरत हो और उसका कर्ज चुकाने की क्षमता हो। केवल उतना ही कर्ज लें, जितना आप चुका सकते हों और निश्चित रूप से सिर्फ इसलिए घर खरीदने के लिए अपना बजट न बढ़ाएं कि होम लोन सस्ता है। उदाहरण के लिए, इसी मामले में चूंकि आज आपको लगता है कि आप 30,500 रुपये ईएमआई का भुगतान कर सकते हैं, आपको अपना कर्ज नहीं बढ़ाना चाहिए, बल्कि इसके बदले कम उधार लेकर कम ईएमआई का लाभ उठाएं या शुरुआती वर्षों में अतिरिक्त उधार चुकाकर कर्ज ली गई पूंजी में कमी कर सकते हैं।


ये सलाह आपको उबाऊ लग सकती हैं, लेकिन उन कर्जदारों की दुर्दशा के बारे में सोचिए, जिन्होंने 2020 में लॉकडाउन के कारण वित्तीय कठिनाइयों का सामना किया और जो होम लोन की ईएमआई नहीं चुका सके। ऐसी स्थिति फिर से हो सकती है, यदि अर्थव्यवस्था अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ती है और वेतन बढ़ोतरी नहीं होती अथवा उसमें और कटौती हो जाती है। ऐसी परिस्थिति का सामना करने के बजाय, जहां ऋण चुकाना चुनौती है, आप अपने हित का ध्यान रखें। जैसे, आप इस तरह का घर खरीदें, जो रेडी टू मूव हो, ऐसा घर नहीं खरीदें, जिसमें आपको ईएमआई के साथ किराये का भी भुगतान करना पड़े। पुराने एमसीएलआर व्यवस्था के तहत कर्ज लेने वाले उधारकर्ता के लिए उससे बाहर निकलने का शुल्क चुकाकर नई ब्याज दरों में बदलाव करना समझदारी हो सकती है, जब तक लागत लाभ विश्लेषण ऐसा कदम उठाने के लिए उनके हित में होता है। लागत लाभ का मूल्यांकन किए बिना आंख मूंद कर एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में बदलाव नहीं करें और निश्चित रूप से ऐसा करना आपके कर्ज चुकाने की अवधि में विस्तार न करता हो। होम लोन स्वाभाविक रूप से संपत्ति निर्माण है, लेकिन हाल के दिनों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां चार-पांच साल की अवधि में किसी घर की कीमत नहीं बढ़ी है और सर्किल रेट भी कुछ इलाकों में घटी है। निश्चित रूप से घर की कीमत में उच्च वृद्धि अब अतीत की बात है, भविष्य में आवासीय अचल संपत्ति की कीमतों में भारी वृद्धि देखने की संभावना नहीं है। आवासीय रियल एस्टेट क्षेत्र में सुस्ती का अर्थव्यवस्था पर भी काफी असर पड़ता है, क्योंकि रियल एस्टेट एक ऐसा क्षेत्र है, जो संगठित एवं असंगठित दोनों क्षेत्रों में रोजगार देता है। इससे संबंधित क्षेत्रों के बारे में सोचें, जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर, सीमेंट, पेंट, स्टील फिक्सर्स, पाइप, बिजली के सामान आदि। 


कुछ वर्षों से रियल एस्टेट में मंदी के कारण बड़े शहरों में कई मकान बिना बिके हुए पड़े हैं, इसके साथ-साथ कई परियोजनाएं विभिन्न चरणों में अपूर्ण हैं। रियल स्टेट टैक्स और अन्य माध्यमों (बिजली, पानी व अन्य सुविधाएं) से सरकार को राजस्व प्रदान करता है। इसके अलावा, रियल एस्टेट के विकास से इलाके में स्कूलों, अस्पतालों और अन्य वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों का विकास होता है, जो अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाता है। इसलिए रियल एस्टेट में किसी भी मंदी का आर्थिक विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इससे मौजूदा ब्याज दर और अन्य आर्थिक कारकों पर भी असर पड़ता है। फिर से कम ब्याज दर पर लौटें, तो वर्ष 2016 के बीच जब  एक वर्ष का एसबीआई एमसीएलआर 9.15 फीसदी था, जो 2017 में घटकर 8 फीसदी रह गया और 2019 में 8.4 फीसदी तक बढ़ गया, और अब केवल 7 फीसदी से कम है। एक उधारकर्ता के रूप में यह ध्यान रखें कि गिरती ब्याज दरों का रुझान स्थायी नहीं है; अर्थव्यवस्था में बदलाव में कुछ ही तिमाहियों का समय लगता है, जिससे ब्याज दरों के रुझान में बदलाव हो जाता है और मूल्य में वृद्धि हो जाती है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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Friday, March 12, 2021

निचले स्तर पर पाकिस्तान की सियासत, संसद के बाहर ऐसा था नजारा (अमर उजाला)

मरिआना बाबर  

सीनेट के चुनाव के दौरान वित्त मंत्री हाफिज शेख की हार पर नेशनल एसेंबली में राजनीतिक अपमान झेलने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने विश्वास मत प्राप्त करने का फैसला किया। इमरान खान को कम से कम उनके पंद्रह सांसदों ने धोखा दिया, लेकिन अंततः वह विश्वास मत हासिल करने में सफल रहे। इससे पहले राजधानी इस्लामाबाद में सीनेट की एक सीट के लिए गुप्त मतदान के जरिये चुनाव हुआ, जिसमें निचले सदन में इमरान खान के अपने सदस्यों ने विपक्षी उम्मीदवार पूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को वोट दिया। इमरान खान को मिले इस सबसे गंभीर झटके के कई कारण बताए जाते हैं। पहला, हाफिज शेख अमेरिका में रहते हुए विश्व बैक के लिए काम कर रहे थे, जब उन्हें वतन लौटकर वित्त मंत्रालय में विशेष सहयोगी के रूप में काम करने के लिए कहा गया था। मंत्रिमंडल में शामिल लोगों सहित पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) पार्टी के कई सदस्यों ने इस पर नाराजगी जताई थी, क्योंकि पार्टी के किसी व्यक्ति को नामित करने के बजाय एक बाहरी व्यक्ति को बहुत महत्वपूर्ण कैबिनेट सीट दी गई थी। पीटीआई के कई सांसद प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से नाराज थे, क्योंकि उनकी अनदेखी की जा रही थी और कोई बैठक आयोजित नहीं की जा रही थी, जिससे कि वे अपने क्षेत्र की समस्याओं पर चर्चा कर सकें। 



नहीं भूलना चाहिए कि पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएलएन) ने एक बार फिर पंजाब में लोकप्रियता हासिल की है, जो उसका मजबूत गढ़ है, क्योंकि पंजाब की पीटीआई सरकार अपने वादे पूरे करने में विफल रही है। माना जा रहा है कि पीटीआई के जिन पंद्रह सांसदों ने यूसुफ रजा गिलानी को वोट देने का फैसला किया, उन्हें अगले चुनाव में पीएमएलएन से टिकट दिए जाने का आश्वासन दिया गया था। गिलानी बेशक पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सदस्य हैं, पर वह संयुक्त विपक्षी गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) के संयुक्त उम्मीदवार थे। एक तरफ इमरान खान जहां विश्वास मत जीतने के बाद अपने सदस्यों का शुक्रिया अदा कर रहे थे, वहीं संसद के बाहर बहुत गलत दृश्य देखने को मिल रहा था, जिसमें पीएमएलएन के कुछ सदस्यों ने, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी भी शामिल थे, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया था, जिसमें वे इमरान खान और उनकी सरकार की आलोचना कर रहे थे।



पीटीआई समर्थकों की भारी भीड़ अचानक उस क्षेत्र में आ गई, जो रेड जोन का हिस्सा है और जहां भीड़ को प्रदर्शन करने की इजाजत नहीं है। हैरानी की बात है कि राजधानी की पुलिस भी वहां नदारद थी। पीटीआई कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे विश्वास मत जीतने का जश्न मनाने के लिए इकट्ठा हुए हैं। जल्दी ही भीड़ ने नारे लगाना और कम संख्या में उपस्थित पीएमएलएन सांसदों को धक्का देना शुरू कर दिया। उनमें मरियम औरंगजेब भी थीं, जो पीएमएलएन की प्रवक्ता हैं। अचानक भीड़ में से किसी ने आकर उन्हें लात मारी, जबकि दूसरे ने उन्हें जोर से धक्का दिया। 


गौरतलब है कि इस पर मरियम ने बिल्कुल भी प्रतिक्रिया नहीं दी और बहादुरी से अपनी जगह पर खड़ी रहीं। लेकिन जब इस बात की जानकारी उनके सहयोगियों को मिली, तो उन्होंने भीड़ में से दो को पकड़ लिया और मारने-पीटने की कोशिश की, लेकिन वे भाग गए। संसद के निचले सदन में चल रही कार्यवाही रोककर अनियंत्रित भीड़ के फुटेज को टीवी पर लाइव दिखाया गया। हर कोई भयभीत था और सबने इस गुंडागर्दी की निंदा की और सोशल मीडिया ने सरकार की आलोचना शुरू कर दी। हैरानी की बात तो यह है कि विपक्षी सदस्यों के वहां से जाने के बाद मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों ने आकर अपने कार्यकर्ताओं को बधाई दी। अफसोसनाक तरीके से यह अब सत्तारूढ़ पीटीआई की संस्कृति ही बन गई है कि उसके कार्यकर्ता सार्वजनिक रूप से महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। सोशल मीडिया, खासकर ट्विटर पर पीटीआई

के ऐसे हजारों अनुयायी हैं, जिनका एकमात्र काम विरोधियों को गाली देना और उन्हें ट्रोल करना है।


पाकिस्तान की सियासत में यह असभ्य संस्कृति नई बात है। पीपीपी जैसी पुरानी पार्टियां हजारों अनुयायियों के साथ रैलियां और विरोध प्रदर्शन करती हैं और यह कहावत प्रसिद्ध हो गई है कि 'पीपीपी की शांतिपूर्ण रैलियों के दौरान किसी पेड़ की एक भी टहनी का नुकसान नहीं हुआ है।' इमरान खान और उनकी पार्टी के करीबी कार्यकर्ताओं ने कुछ साल पहले इस्लामाबाद में विरोध प्रदर्शन के दौरान नवाज शरीफ की सरकार के दौरान ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया था, जो आमतौर पर राजनेताओं द्वारा इस्तेमाल नहीं की जाती। इस हफ्ते उनके सूचना मंत्री फराज शिबली ने एक टीवी शो में यह कहकर लोगों को चौंका दिया कि सीनेट के नए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए होने वाले चुनाव में पार्टी जीतने के लिए हरसंभव हथकंडे का इस्तेमाल करेगी। उन्होंने कहा, 'सीनेट अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने के लिए हम हर दांव आजमाएंगे। यह संभव नहीं है कि विपक्ष को कानून तोड़ने की अनुमति दी जाए और हम नियम-कानूनों से बंधे रहें। ऐसा नहीं हो सकता कि सरकार ‘शरीफ’ बनकर कानून के मुताबिक हर काम करे।' किसी को याद नहीं होगा कि कभी किसी मौजूदा मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर कानून तोड़ने की बात कही हो। 


इमरान खान पर दबाव बढ़ रहा है, क्योंकि विपक्षी गठबंधन पीडीएम की लोकप्रियता बढ़ रही है और मौजूदा वित्त मंत्री की हार ने उन्हें और अधिक आत्मविश्वास दिया है। मरियम नवाज शरीफ और बिलावल भुट्टो जरदारी, दोनों लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे हैं। पीडीएम ने देश के हर कोने से लांग मार्च का एलान किया है, जिसके तहत वे 26 मार्च को इस्लामाबाद पहुंचेंगे और सरकार के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन करेंगे। अब तक सुरक्षा प्रतिष्ठान (सेना) इमरान खान के सबसे बड़े समर्थक रहे हैं और उनके समर्थन के कारण इमरान खान ने करीब तीन साल बिता दिए हैं। यह देखना होगा कि सीनेट के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में सुरक्षा प्रतिष्ठान तटस्थ रहता है या

सरकार के उम्मीवार की जीत सुनिश्चित कराता है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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