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Tuesday, January 19, 2021

लाभप्रद है शेयर बाजार की तेजी, सरकार को सेबी की भूमिका को और ज्यादा प्रभावी बनाना होगा (अमर उजाला)

जयंतीलाल भंडारी 

निस्संदेह नए वर्ष 2021 में जहां एक ओर देश के शेयर बाजार की नई ऊंचाइयां निवेशकों के लिए खुशी का कारण है, वहीं दूसरी ओर शेयर बाजार कोविड-19 से ध्वस्त देश की अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने में भी अहम भूमिका निभाते हुए दिखाई दे रहा है। शेयर बाजार भारतीय उद्योग-कारोबार सेक्टर के लिए नए उद्यमों को शुरू करने और चालू उद्यमों को पूरा करने के लिए धन की बौछार करते हुए भी दिखाई दे रहा है।


यह कोई छोटी बात नहीं है कि कोरोना वायरस के कारण बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का जो सेंसेक्स 23 मार्च, 2020 को 25,981 अंकों पर आ गया था, वह 14 जनवरी, 2021 को लगातार बढ़ते हुए 49,584 अंकों की ऊंचाई पर पहुंच गया। दुनिया भर के विकासशील देशों के शेयर बाजारों की तुलना में भारतीय शेयर बाजार की स्थिति शानदार दिखाई दे रही है। शेयर बाजार में आई तेजी की वजह से दशक में पहली बार भारत की सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से ज्यादा हो गया है।

14 जनवरी को इस लिहाज से बाजार पूंजीकरण और जीडीपी का अनुपात 100 फीसदी को पार करके 104 प्रतिशत हो गया। अमेरिका, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन, हांगकांग, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और स्विट्जरलैंड जैसे विकसित देशों में यह अनुपात 100 फीसदी से अधिक है। कोविड-19 की चुनौतियों के बीच भी शेयर बाजार के आगे बढ़ने के कई अहम कारण रहे हैं। वर्ष 2020 में एक के बाद एक कुल 29.87 लाख करोड़ रुपये की जो राहतें सुनिश्चित की गईं, उससे कोरोना काल में सरकार को उन सुधारों को आगे बढ़ाने का अवसर मिला, जो दशकों से लंबित थे। खासतौर से कोयला, कृषि, नागरिक विमानन, श्रम, रक्षा और विदेशी निवेश जैसे क्षेत्रों में किए गए जोरदार सुधारों से अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी है। पिछले साल भारत की आर्थिक संभावनाओं के लिए जो वैश्विक सर्वेक्षण प्रकाशित हुए, उनसे भी शेयर बाजार को बढ़त मिली।


नए वर्ष में शेयर बाजार के तेजी से आगे बढ़ने की संभावना है। भारत ने कोरोना वायरस के दो टीकों को मंजूरी दे दी है और दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान की शुरुआत हो गई है। भारत द्वारा कोविड-19 का रणनीतिपूर्वक सफल मुकाबला किए जाने से अर्थव्यवस्था गतिशील हो रही है। अमेरिका में नए राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ भारत के अच्छे संबंधों की संभावनाओं से भी निवेशकों की धारणा को बल मिला है। शेयर बाजार में जिस तरह लंबे समय से सुस्त पड़ी कंपनियों के शेयर की बिक्री कोविड-19 के बीच तेजी से बढ़ी है, उससे शेयर बाजार में चुनौती भी बढ़ गई हैं। बाजार पूंजीकरण और जीडीपी के अनुपात का 104 फीसदी हो जाना बता रहा है कि बाजार में तेजी से तरलता बढ़ी

है। अतएव इसका सबसे अधिक ध्यान रिटेल निवेशकों को रखना होगा।


ऐसे में शेयर बाजार में हर कदम फूंक-फूंककर रखना जरूरी है। शेयर बाजार में तेजी के साथ-साथ छोटे निवेशकों के हितों और उनकी पूंजी की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना भी जरूरी है। शेयर बाजार को प्रभावी व सुरक्षित बनाने के लिए लिस्टेड कंपनियों में गड़बड़ियां रोकने पर विश्वनाथन समिति ने सेबी को जो सिफारिशें सौंपी हैं, उनका क्रियान्वयन लाभप्रद होगा। चूंकि प्रतिभूतियों की मात्रा या कीमत में किसी भी तरह का हेरफेर बाजार में निवेशकों के विश्वास को हमेशा के लिए खत्म कर देता है। ऐसे में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा शेयर बाजार में हेरफेर से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।


सरकार को सेबी की भूमिका को और ज्यादा प्रभावी बनाना होगा। शेयर बाजारों में घोटाले रोकने के लिए डीमैट और पैन की व्यवस्था को और कारगर बनाना चाहिए। छोटे और ग्रामीण निवेशकों की दृष्टि से शेयर बाजार की प्रक्रिया को और सरल बनाया जाना जरूरी है। हम उम्मीद करें कि नए वर्ष में आगे बढ़ रहे शेयर बाजार की ओर सेबी की ऐसी सतर्क निगाहें लगातार बनी रहेंगी, जिनसे शेयर बाजार अनुचित व्यापार व्यवहार से बच सकेगा। उम्मीद यह भी है कि आगामी बजट में शेयर बाजार में निवेशकों के लिए नए कर प्रोत्साहन सुनिश्चित किए जाएंगे।

सौजन्य- अमर उजाला।

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Monday, January 18, 2021

शानदार शुरुआत से बना भरोसा, देश के टीका उत्पादकों ने निश्चित तौर पर हमें गर्वित किया (अमर उजाला)

पत्रलेखा चटर्जी  

जिस देश में कोविड-19 से मौत का आंकड़ा 1,51,000 तक पहुंच गया हो और जहां संक्रमितों की संख्या अमेरिका के बाद सबसे अधिक हो, वहां महामारी से निजात पाने के लिए टीकाकरण अभियान की शुरुआत एक स्वागतयोग्य कदम है। अपने देश में शनिवार को देश के हजारों केंद्रों पर टीकाकरण अभियान प्रारंभ हुआ, और आगामी गर्मी तक 30 करोड़ लोगों के टीकाकरण का लक्ष्य है। पहले दिन देश भर के 3,000 से अधिक केंद्रों पर तीन लाख स्वास्थ्यकर्मियों, सैनिकों तथा स्थानीय निकाय के कर्मचारियों के टीकाकरण का लक्ष्य था, जबकि 1,91,000 से अधिक लोगों ने टीका लगाया। अगले चरण में 50 साल से ऊपर के व्यक्तियों तथा विभिन्न बीमारियों से पीड़ित 50 से कम उम्र के लोगों को टीका लगाया जाएगा।


आगामी चरणों में टीकाकरण केंद्रों की संख्या भी बढ़ेगी। भारत का यह अभियान निस्संदेह दुनिया का सबसे विशाल और महत्वाकांक्षी टीकाकरण अभियान है। लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि कम कीमत पर भारी संख्या में वैक्सीन उत्पादन करने के मामले में भारत कोई नया देश नहीं है। सस्ते भारतीय टीके अनेक वर्षों से न सिर्फ लाखों भारतीयों के साथ-साथ अनेक विकासशील देशों के लोगों की भी जान बचाते रहे हैं, बल्कि देश में हर साल 30 करोड़ टीके 2.6 करोड़ नवजात शिशुओं तथा तीन करोड़ गर्भवती स्त्रियों की जान बचाते हैं।



क्या वैक्सीन से महामारी का अंत होगा? चूंकि एक साथ पूरे देश में टीकाकरण की शुरुआत हुई है, इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ आशान्वित हैं कि जल्दी ही महामारी पर अंकुश लगेगा। हालांकि टीकाकरण से महामारी का तत्काल खात्मा नहीं होगा। दुनिया भर में वायरस से संक्रमित होने के मामले जारी हैं और कुछ देशों में तो संक्रमण का आंकड़ा बढ़ भी रहा है। इसलिए टीका लगाने के बाद भी हमें मास्क लगाना होगा तथा हाथ धोते रहने होंगे। हमें यह भी जान लेना होगा कि टीका लगा लेने से तत्काल इम्युनिटी नहीं आएगी। जिन लोगों ने टीका लगाया है, उन्हें इसका एक और डोज लेना होगा और यह भी नहीं पता कि टीके से प्रतिरोधी क्षमता कितने समय तक बनी रहेगी।


देश में टीकाकरण के तहत दो वैक्सीनों का इस्तेमाल हो रहा है। दोनों टीकों का उत्पादन यहीं हुआ है, लेकिन दोनों को मंजूरी बहुत अलग परिस्थितियों में मिली है। इनमें से पहली वैक्सीन कोविशील्ड है, जिसे ब्रिटेन की एस्ट्राजेनेका और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने मिलकर तैयार किया है, और देश में इसका उत्पादन पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ने किया है। दूसरी वैक्सीन कोवाक्सिन है, जिसे हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक ने केंद्र सरकार के सहयोग से तैयार किया है, लेकिन इसके तीसरे चरण के ट्रायल का, जिसमें किसी टीके की

प्रभावोत्पादकता की जांच होती है, आंकड़ा अभी नहीं आया है। भारत बायोटेक ने ट्रायल के पहले दो चरणों के सुरक्षा तथा प्रतिरोधी क्षमता संबंधी आंकड़े पेश किए हैं तथा आने वाले दिनों में अपने टीके की प्रभावोत्पादकता संबंधी आंकड़े भी देगी। लेकिन स्वास्थ्य प्राधिकरण ने क्लिनिकल ट्रायल श्रेणी में आपातकालीन इस्तेमाल के लिए कोवाक्सिन को मंजूरी दी है। हालांकि इसके ट्रायल के दौरान अनियमितता के तथा भोपाल में ट्रायल के दौरान आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप लगे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि कोवाक्सिन बेहद कारगर वैक्सीन साबित हो सकती है, लेकिन जब तक इसकी प्रभावोत्पादकता से संबंधित आंकड़े नहीं मिलेंगे, तब तक प्रश्न तो खड़े होंगे ही।


चूंकि टीकाकरण अभियान अभी शुरू ही हुआ है, ऐसे में, आने वाले दिनों में पूरे देश पर नजर बनी रहेगी, क्योंकि पूरी दुनिया में यह सबसे बड़ा अभियान है। लिहाजा इस दौरान आने वाली चुनौतियों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। हालांकि शनिवार को महाराष्ट्र को छोड़कर, जहां सॉफ्टवेयर की समस्या के कारण टीकाकरण अभियान दो दिन के लिए रोक दिया गया है, बाकी देश में यह अभियान सफल रहा, लेकिन इस बारे में आने वाले दिनों में ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी। टीकाकरण अभियान की पहली चुनौती वस्तुतः दोनों ही टीकों के प्रति आम लोगों में भरोसा पैदा करने की होगी। हालांकि इंटरनेट पर वैक्सीन के बारे में काफी भ्रामक जानकारियां हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के भी कुछ जायज सवाल हैं।


ध्यान रखना चाहिए कि ये स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी वैक्सीन के खिलाफ नहीं हैं। उदाहरण के लिए, कोवाक्सिन का टीका लगाने वालों को एक सहमति पत्र दस्तखत करने के लिए दिया जा रहा है, जिसमें लिखा हुआ है कि इसकी चिकित्सकीय प्रभावोत्पादकता का आंकड़ा आना अभी बाकी है। चिकित्सकीय प्रभावोत्पादकता का अर्थ यह बताना है कि वैक्सीन बीमारी को रोकने में सक्षम है या नहीं, और अगर सक्षम है, तो किस हद तक?


टीकाकरण शुरू करने से पहले देश में कई बार ड्राई रन हो चुका है, इसके बावजूद जर्जर स्वास्थ्य ढांचे तथा बेहतर परिवहन व संपर्क सुविधा के अभाव में कई राज्यों में भविष्य में कुछ समस्याएं खड़ी हों, तो आश्चर्य नहीं। वैक्सीन कवरेज के मामले में भी देश में एकरूपता नहीं है। लाखों लोग टीके से वंचित रह जाते हैं। महामारी से पहले भी बच्चों के टीकाकरण के मोर्चे पर कमियां तो थीं ही। खासकर आदिवासी समुदाय में टीकाकरण का आंकड़ा चिंतनीय है, जहां 56 फीसदी नवजात शिशुओं को ही टीका लग पाता है। इसके अलावा कोविशील्ड तथा कोवाक्सिन का भंडारण हमेशा कम तामपान पर करना होगा, जबकि गर्मी का मौसम आने वाला है। हालांकि देश इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है।


टीकों के भंडारण के लिए 45,000  विशेष रेफ्रिजरेटर, 41,000 डीप फ्रीजर तथा 300 सोलर रेफ्रिजरेटर तैयार हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों ने टीकाकरण को अंजाम देने वाले दो लाख से अधिक कर्मचारियों को प्रशिक्षित भी किया है। देश के टीका उत्पादकों ने निश्चित तौर पर हमें गर्वित किया है। भूलना नहीं चाहिए कि भारत ने पोलियो के खिलाफ लड़ाई जीती है। लेकिन मौजूदा चुनौती की किसी से तुलना नहीं की जा सकती। अभी टीकाकरण देश में अनिवार्य नहीं है। इसलिए लोगों को वैक्सीन से संबंधित जायज सवाल पूछने देना चाहिए, ताकि सही जानकारी के आधार पर वे फैसला ले सकें। लोगों में भरोसा पैदा करने का यही तरीका है, जिसके बगैर स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी कोई भी सरकारी पहल सफल नहीं हो सकती।

सौजन्य- अमर उजाला।

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नए नियामकों की कामना में सतर्कता बरतना जरूरी (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सोमशेखर सुंदरेशन 

एक केंद्रीय मंत्री का साक्षात्कार पिछले दिनों काफी चर्चा में रहा। उस साक्षात्कार में भविष्य के नीतिगत विचार और कानूनों की झलक मिलती है। मंत्री ने इस्पात और सीमेंट क्षेत्र की कीमतों में अनुचित इजाफे की शिकायत करते हुए कहा है कि इन दोनों क्षेत्रों के लिए अलग-अलग नियामक बनाकर इनके कारोबार का प्रबंधन किया जा सकता है और कारोबारियों की सांठगांठ से निपटा जा सकता है। कारोबारियों की ऐसी एकजुटता से निपटने के लिए प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के रूप में एक कानून है और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के रूप में इसके प्रवर्तन के लिए एक एजेंसी भी है। यदि धारणा ऐसी है कि यह कानून और आयोग अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सके हैं तो इसके उत्तर में पहले तो परीक्षण किया जाना चाहिए कि आखिर कमी कहां रह गई है। यदि कोई कमी हो तो उसे दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए। नए नियामक की मांग भारत में आजमाए जाने वाले चिरपरिचित फॉर्मूले की तरह है: आप मुझे समस्या दिखाइए और मैं एक कानून बना दूंगा, मुझे बाजार की समस्या दिखाइए और मैं नया नियामक बना दूंगा।


यदि पुराने अनुभवों से सबक लिया जाए तो किसी खास उद्योग के लिए नया क्षेत्रीय नियामक बनाने से प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचाने वाले आचरण से लडऩा मुश्किल होता है। कहा जाता है कि ये नियामक उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करेंगे। वैसे ही जैसे पूंजी बाजार नियामक का लक्ष्य निवेशकों की रक्षा का होता है और बीमा नियामक पॉलिसीधारकों की रक्षा करता है। उनके द्वारा नियमित किए जाने वाले संस्थान गलत प्रतिस्पर्धा से संरक्षित नहीं किए जाते। ऐसे में यदि क्षेत्र के बड़े कारोबारी एक साथ मिलकर ऐसी शर्तें तय कर देते हैं जो अन्य प्रतिस्पर्धियों के लिए पूरी तरह अव्यावहारिक हों तो उस स्थिति में इस बात की काफी संभावना है कि संरक्षितों के हित के लिए नवाचार करने के इच्छुक  कारोबारियों को ही निगरानी के दायरे में डालने की मांग की जाएगी। क्षेत्रवार नियामकों के साथ यह जोखिम रहा है कि वे अपने नियमों में कमजोर भाषा का इस्तेमाल करेंगे। मिसाल के तौर पर अच्छे आचरण और पेशेवर आचरण तथा व्यवस्थित प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की मांग। परंतु उनके पास ऐसे वक्तव्यों के अलावा करने को कुछ खास नहीं होता और वे व्यवस्थित रूप से संहिताबद्ध प्रतिस्पर्धा कानून का विकल्प नहीं बन पाते। जब भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, प्रतिस्पर्धा कानून के प्रवर्तन में शामिल हो जाता है तो विनियमित संस्थाओं की स्वाभाविक दलील यही होती है कि एक क्षेत्रीय नियामक है जो विशेषज्ञ है और पहले उसे इस मसले से निपटना चाहिए। प्रतिस्पर्धा आयोग को अक्सर अपने हाथ बांधने पड़ते हैं और नियम उल्लंघन के आरोपित क्षेत्रीय नियामक और प्रतिस्पर्धा आयोग के बीच टकराव की स्थिति निर्मित कर देते हैं जबकि कथित उल्लंघन वाला आचार जारी रहता है और उसका स्वरूप बदलता रहता है। दूरसंचार नियमों के उल्लंघन के एक कथित मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा निर्णय दिया जिसके अनचाहे परिणाम सामने आए। न्यायालय ने पाया कि उल्लंघन के आरोप दरअसल दूरसंचार नियमन के उल्लंघन के आरोप हैं। ऐसे में दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं, यह निर्णय भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग पर छोडऩे के बजाय यह उचित समझा गया कि पहले प्राधिकरण स्वयं यह जांच और आकलन कर ले कि कोई उल्लंघन हुआ है या नहीं। इसके बाद ही प्रतिस्पर्धा आयोग परिदृश्य में आए। यह बात तार्किक नजर आती है लेकिन इस निर्णय का यह अर्थ लगाया गया कि यह कर संबंधी कानून का प्रावधान होने के बावजूद एकदम अलग है।


अब यह एक नजीर बन गई है और जब भी प्रतिस्पर्धा आयोग किसी मामले की जांच करता है तो यह दलील दी जाती है कि जब एक क्षेत्रीय नियामक मौजूद है तो प्रतिस्पर्धा आयोग को तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि क्षेत्रीय नियामक इस मसले पर अंतिम निर्णय नहीं ले लेता। न्यायिक क्षेत्राधिकार की ऐसी चुनौतियों को अलग-अलग अदालतोंं में अलग-अलग स्तर पर सफलता मिली। क्षेत्रीय नियामकों के द्वारा अंतिम निर्णय लेने से मामला समाप्त नहीं होता। क्षेत्रीय नियामक के ऊपर की अपील पंचाट को भी इस पर एक नजर डालनी होती है। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय उस पंचाट की अपील पर एक नजर डालता है।


यदि प्रतिस्पर्धा आयोग को अंतिम अदालत के अपनी बात कह चुकने के बाद ही अपना प्राथमिक नजरिया बनाने की इजाजत होती तो इसका अर्थ यह है कि संसद द्वारा प्रतिस्पर्धा कानून के तहत दी गई रियायत बरकरार है। यानी प्रतिस्पर्धा कानून के तहत मिले संरक्षण काफी हद तक प्रभावी ढंग से समाप्त होते हैं। जिन क्षेत्रों में लाइसेंसशुदा नियामक नहीं बल्कि टैरिफ नियामक के रूप में सीमित नियमन है वे ऐसी दलील सामने रखने के लिए जाने जाते हैं जिनमें कहा जाता है कि क्षेत्रीय नियामक को उन मामलों में वरीयता हासिल है जहां प्रतिस्पर्धा आयोग ऐसे गलत आचरण की पड़ताल करता है जो शुल्क से संबंधित नहीं है। एक संभावना इससे भी अधिक खतरनाक है। यदि किसी को इस्पात या सीमेंट नियामक बनाना हो तो यह संभावना है कि ऐसे नियामक वित्तीय क्षेत्र के नियामकीय मॉडल पर काम करें। बल्कि सच तो यह है कि किसी भी नए नियामक को सेबी जैसा नियामक बनाना चलन में है। ऐसे मामलों में एक बार पंजीयन की शुरुआत होने के बाद निगरानी का पालन करना होगा। भला आचरण की जांच और कैसे होगी। ऐसे में कहा जा सकता है कि लाइसेंस और इंसपेक्टर राज की वापसी जैसी स्थितियां बनेंगी।


पहले से काम कर रहे विनिर्माताओं को यह रास आएगा। वे ऐसी नियामकीय व्यवस्था को लेकर पर्याप्त चिंताएं जता सकेंगे जिसमें प्रतिभागियों को लेकर कड़ाई न हो। इस प्रकार वे नए प्रतिभागियों की राह में प्रतिस्पर्धात्मक बाधाएं खड़ी करके उनकी राह रोक सकेंगे। ऐसे में इस तरह की इच्छा प्रकट करते वक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Saturday, January 16, 2021

किसान आंदोलन चर्चा के केंद्र में, लेकिन हाशिये पर महिला किसान (अमर उजाला)

हेमलता म्हस्के  

इन दिनों देश में कृषि और किसान आंदोलन चर्चा के केंद्र में है, लेकिन इन चर्चाओं में महिला किसानों की बात हाशिये पर आ गई है। उनकी कोई सुधि भी नहीं लेता, जबकि खेती-किसानी में होने वाले हादसे और नुकसान की कीमत ज्यादातर महिला किसानों को ही चुकानी पड़ती है। ‘महिला किसान अधिकार मंच’ के मुताबिक, खेती-किसानी से जुड़े 75 फीसदी काम महिलाएं ही करती हैं, लेकिन उनके नाम पर केवल 12 फीसदी जमीन ही है। जब देश की आर्थिक रूप से सक्रिय 80 प्रतिशत महिलाएं खेती-किसानी में लगी हैं, तो जाहिर है, खेती-किसानी की जिम्मेदारी धीरे-धीरे महिला किसानों पर बढ़ती जा रही है। फिर भी उनकी अलग से न कोई पहचान है और न ही कोई श्रेणी तय की जा रही है। ऐसे में वे सरकारी सहयोग से भी वंचित हो रही हैं। 


किसान आंदोलन के दौरान कृषि कानूनों की बातें जोर-शोर से की जा रही हैं। हकीकत यह है कि पिछले सत्तर वर्षों में किसानों को उनकी जमीन पर टिकाए रखकर उनके समग्र विकास के लिए कोई पहल नहीं की गई। अनेक किसान आंदोलन हुए, खेती में कई नवाचार हुए, ‘हरित क्रांति’ भी हुई। कृषि के नाम पर कॉलेज-यूनिवर्सिटी खोले गए। देश अनाज के मामले में आत्मनिर्भर भी हो गया, लेकिन आए दिन किसान आत्महत्या कर रहे हैं। अपना वजूद बचाने के लिए उन्हें लंबे आंदोलन करने पड़ रहे हैं। उनकी उपेक्षा का आलम यह है कि सरकार कृषि कानून बनाती है, तो उनसे परामर्श लेना भी जरूरी नहीं समझती। अभी जब किसान आंदोलन कर रहे हैं, तो मौजूदा खेती-किसानी का काम महिलाओं के कंधे पर आ गया है। वे घरेलू काम के साथ खेती की देखभाल कर रही हैं और समय निकाल कर आंदोलनों में भी शरीक हो रही हैं। महिलाएं खेती-किसानी में बरसों से अपना योगदान देती आई हैं, लेकिन उनको हम कम करके आंकते हैं। 



संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, खेती-किसानी के क्षेत्र में 43 फीसदी महिलाओं का योगदान होता है, लेकिन महिलाएं किसान नहीं, मजदूर कही जाती हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, पूरे देश में छह करोड़ महिला किसान थीं, जबकि वास्तव में महिला किसानों की संख्या इससे कई गुना ज्यादा है। पिछले एक-दो दशकों में ग्रामीण युवा खेती-किसानी से कटते जा रहे हैं। उनका रुझान शहरों में जाकर नौकरी या व्यापार करने की ओर बढ़ता जा रहा है। नतीजतन खेती की जिम्मेदारी महिला किसानों के कंधों पर आती जा रही है। इसके अलावा, जिन मध्यम और सीमांत किसान परिवारों के पुरुष खेती छोड़कर दूसरे काम-धंधों से जुड़ रहे हैं, उनकी जगह भी महिलाएं ही खेती संभाल रही हैं। आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार की महिलाओं पर ही खेती की जिम्मेदारी आती है। इन सबके बावजूद उनका कोई सम्मान नहीं है। उन महिला किसानों को भी किसान का दर्जा नहीं मिलता, जिन्होंने अपने दम पर कृषि क्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले बेहतर मुकाम हासिल किया है। 


महिलाओं को किसान का दर्जा मिले, इसके लिए जनसंगठन ‘एकता परिषद’ की महिला कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रव्यापी जागरण यात्रा निकाली थी। अनेक प्रदर्शन भी किए। ‘एकता परिषद’ महिला किसानों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न परियोजनाओं का संचालन भी कर रही है। इसके पहले बिहार में ‘भूदान यज्ञ बोर्ड’ ने हजारों महिला किसानों को जमीन आवंटित कर उन्हें महिला किसान होने का एहसास कराया था। आजादी के बाद से अब तक महिला किसानों के नाम पर कोई योजना नहीं बनी है। योजना तो दूर, उनके वजूद की पहचान तक नहीं की जाती। वे लगातार उपेक्षा की शिकार होती रही हैं। अभी हाल में केंद्र सरकार ने ‘महिला किसान सशक्तीकरण योजना’ की शुरुआत की है। योजना के तहत 24 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में 84 परियोजनाओं के लिए 847 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। देश में खेती-किसानी से जुड़ी महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए शुरू की गई इस योजना के तहत महिला किसानों को खेती के लिए कर्ज के साथ खाद और सब्सिडी देने का प्रावधान है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार की इस योजना के बारे में ज्यादातर महिलाओं को जानकारी ही नहीं है। (सप्रेस)


सौजन्य - अमर उजाला।

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जिन्ना सेक्यूलर नहीं, दहशतजदा थे, इन बातों से मिलता है सबूत (अमर उजाला)

प्रदीप कुमार  

 

भारत के विभाजन और भारत-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास की अभी तक अनसुलझी गुत्थी यह रही है कि धर्म-आधारित दो राष्ट्रों के सिद्धांत पर लंबे समय तक चलने के बाद क्या मोहम्मद अली जिन्ना अगस्त 1947 से बिल्कुल नए रास्ते पर चलना चाहते थे। भारत और पाकिस्तान सहित कई विदेशी विचारकों का भी यह मत है कि जिन्ना एक सेक्यूलर निजाम की कल्पना कर रहे थे। 11 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा में जिन्ना के भाषण का शाब्दिक अर्थ निकाला जाए, तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। इस भाषण का सबसे महत्वपूर्ण अंश यह है, 'आप का ताल्लुक किसी भी मजहब, जाति या फिरके से हो, हुकूमत से उसका कोई वास्ता नहीं है। इस आदर्श पर चलें, तो समय के साथ पाएंगे कि हिंदू न हिंदू रहेगा और मुसलमान न मुसलमान; मजहबी मायने में नहीं, बल्कि राज्य के नागरिक के नाते राजनीतिक मायने में।' 


गौरतलब है, इस भाषण से कुछ अरसा पहले मनकी के पीर को लिखी चिट्ठी में जिन्ना ने भरोसा दिलाया था कि पाकिस्तान शरीयत के उसूलों पर चलेगा। देवबंद की 'मुश्तरका कौमियत' थिअरी से बगावत करने वाले मुट्ठी भर मौलानाओं को भी यही यकीन था। लेकिन 11 अगस्त के भाषण में शरीयत या इस्लाम का जिक्र नहीं आया। यह एक ऐतिहासिक यू टर्न का संकेत था। इसके तीसरे दिन पाकिस्तान संविधान सभा के उद्घाटन-भाषण में लार्ड माउंटबेटन ने कहा, 'मुगल सम्राट अकबर को किसी भी मुस्लिम हुकूमत का रोल मॉडल होना चाहिए।' जिन्ना ने फौरन खड़े होकर माउंटबेटन को टोकते हुए कहा, 'अकबर से 1,300 साल पहले पैगंबर मोहम्मद ने मिसाल पेश की थी।' उनका इशारा शायद मदीना की नव-स्थापित इस्लामी हुकूमत और अल्पसंख्यक यहूदियों के बीच हुए समझौते मीसाक-ए-मदीना की ओर था। 



पैगंबर से पहले सैकड़ों साल के इतिहास को देखें, तो मीसाक-ए-मदीना अंतर-धार्मिक संबंधों में एक नया अध्याय था। मगर यह इस्लामी और गैर-इस्लामी कौमों के बीच था, जिसके तहत यहूदियों को 'हिफाजती रकम' अदा करनी थी। यह अल्पकालिक करार और उसका हश्र जो हुआ, वह क्यों हुआ, इस पर चर्चा से विषयांतरण हो जाएगा। इसलिए इसे यहीं छोड़ते हुए, जिन्ना पर लौटते हैं। उनके 11 अगस्त के विचारों का वजूद सिर्फ तीन दिन का था। 14 को जिन्ना ने अपना असली चेहरा दिखा दिया। खान-पान और कुल व्यवहार में 'आधुनिक' जिन्ना 1,300 वर्षों में आ चुके फर्क को बखूबी समझते होंगे। क्या वह इशारा कर रहे थे कि मीसाक-ए-मदीना के बाद जो गति यहूदियों की हुई थी, अल्पसंख्यक, खासतौर से हिंदू उससे बच नहीं सकते? ताज्जुब नहीं, पाकिस्तान का हीरो अकबर नहीं, औरंगजेब बना। आखिर, महाबली अकबर को अपने शासनकाल में ही कट्टरपंथियों से चुनौतियां मिलने लगी थीं। 


पाकिस्तानी मूल के इतिहासकार, लाहौर स्थित गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर और कई प्रतिष्ठित पाकिस्तानी पत्रों के स्तंभकार प्रो. इश्तियाक अहमद ने अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक जिन्नाः हिज सक्सेसेज,फेलियर्स एंड रोल इन हिस्ट्री में 11 अगस्त के भाषण का पहली बार लीक से हटकर, नया विश्लेषण किया है। वह लिखते हैं, 'जिन्ना का बुनियादी मकसद भारत को यह भरोसा दिलाना था कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समान अधिकारों के साथ सुरक्षित रहेंगे, ताकि भारत में रह गए साढ़े तीन करोड़ मुसलमानों को खदेड़ा न जाए। तब तक पूर्वी पंजाब में मुसलमानों पर बड़े स्तर पर हमलों की रिपोर्टें आने लगी थीं; जिन्ना बहुत चिंतित थे कि पूर्वी पंजाब के बाहर भारत के अन्य हिस्सों में मुसलमानों पर हमले न होने लगे। जिन्ना को जरूर एहसास हुआ होगा कि बड़ी संख्या में भारत से मुसलमानों की आमद से पाकिस्तान चरमरा कर बैठ जाएगा। अतीत में आबादी की अदला-बदली के हिमायती जिन्ना अचानक इसे भूल गए।' 


क्या जिन्ना भारत-पाक दोस्ती और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए सोच पाने में सक्षम थे? प्रो. अहमद इस बिंदु पर पहुंचने को विवश करते हैं कि यह तो जिन्ना के डीएनए में ही नहीं था। कैंसर से ग्रस्त जिन्ना अपने ऊपर मंडरा रहे मौत के साये को देखने लगे थे। 11 सितंबर, 1948 को उनका इंतकाल हुआ। सितंबर 1947, में जिन्ना कई हफ्ते तक लाहौर में रहे। प्रो. अहमद बताते हैं कि जिन्ना कश्मीर पर चटपट हमला कर उसे पाकिस्तान में मिलाने की योजना बना रहे थे। महाराजा हरि सिंह की राय जानने का उनके पास धैर्य नहीं था। सत्ता हस्तांतरण अधिनियम को वह डस्टबिन में डाल चुके थे। पाकिस्तानी फौज और कबाइलियों ने अक्तूबर में कश्मीर पर हमला कर दिया। जिन्ना को लाहौर से कुछ मील दूर, मुस्लिम शरणार्थियों से खचाखच भरे वॉल्ट्न कैंप तक जाने की फुरसत नवंबर में मिली। इसी दौर में जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य नेता एक-एक मुस्लिम शरणार्थी शिविर में दौड़-दौड़ कर सुरक्षा का जायजा ले रहे थे। 


कायद-ए-आजम के आचरण के विपरीत, महात्मा गांधी की अपनी शहादत से कुछ घंटे पहले नेहरू और पटेल को हिदायत थी : हर हाल में मुसलमानों की हिफाजत करो। मुस्लिम लीग की राजनीति और पाकिस्तान आंदोलन की अवश्यंभावी गति यही थी कि पाकिस्तान की राज्य सत्ता आधुनिक, सेक्यूलर और गणतांत्रिक नहीं हो सकती। 1930 और 1940 में ही पाकिस्तान की सिंगल लेन तय हो चुकी थी, उस पर किसी और वाहन के चलने की गुंजाइश नहीं थी। पाकिस्तान टूटेगा, यह भी जिन्ना ने ही सुनिश्चित कर दिया था। जिन्ना 'प्रांतवाद' को बड़ी गंदी चीज मानते थे। पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और सरहदी सूबे को मिलाकर एक इकाई का गठन, 'निम्नस्तरीय बंगाली' आबादी वाले, पूर्वी पाकिस्तान के साथ बदसलूकी के साथ विघटन का बीजारोपण 1947 में ही हो गया था। भारत से नफरत के चलते ही पाकिस्तान के अमेरिका की गोदी में बैठ जाने का सिद्धांत भी जिन्ना ने ही प्रतिपादित किया था। प्रो अहमद की किताब का हर पेज नेहरू पर कीचड़ फेंकने के लिए जिन्ना के कसीदे पढ़ने की राजनीति की धज्जियां उड़ा देता है। 


सौजन्य - अमर उजाला।

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Friday, January 15, 2021

सामाजिक एजेंडे का हिस्सा बने पोषण (अमर उजाला)

आस्था कांत  

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-5, 2019-2020) की रिपोर्ट हाल ही में जारी की गई है, जिसमें 22 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में बाल कुपोषण सहित विभिन्न संकेतकों की तथ्यात्मक जानकारियां दी गई हैं। 2015-16 में किए गए एनएफएचएस के पिछले दौर के सर्वे की तुलना में बच्चों में अति पोषण तथा निम्न पोषण का रुझान देखना खतरे की घंटी जैसा है। कुछ संकेतकों में थोड़ा सुधार के साथ कुपोषण को लेकर यह दोहरा बोझ है। पांच वर्ष की उम्र तक के बच्चों में पोषण की स्थिति को मापने के मुख्य संकेतक नाटापन (उम्र के अनुपात में ऊंचाई), निर्बलता (ऊंचाई के अनुपात में कम वजन), कम वजन (उम्र के अनुपात में वजन) और अधिक वजन (बॉडी मास इंडेक्स) हैं। किसी भी रूप में कुपोषण अंततः कई तरह की सहरुग्णता का कारण बनता है और दीर्घकाल में इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पड़ते हैं। 


22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के आंकड़े दिखाते हैं कि एनएफएचएस-4 की तुलना में 13 राज्यों में बच्चों में नाटेपन, 12 राज्यों में निर्बलता और 16 राज्यों में कम वजन की समस्या बढ़ी है। वहीं 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बच्चों में अधिक वजन के मामले बढ़े हैं। बाल स्वास्थ्य के नजदीकी निर्धारकों में से एक मातृ पोषण है, जो गर्भावस्था के परिणामों को प्रभावित करता है और बदले में बाल स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। अध्ययन बताते हैं कि बच्चे के पोषण का संबंध सीधे मां की कद-काठी, वजन और हीमोग्लोबिन के स्तर से होता है। एनएफएचएस-5 के मुताबिक 22 में से 20 राज्यों में कम वजन वाली महिलाओं की संख्या में कमी आई है, हालांकि महिलाओं में अधिक वजन और मोटापे का रुझान बढ़ा है और कई राज्यों में इसके साथ ही मां में खून की कमी का उच्च स्तर खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है। 


बाल कुपोषण को प्रभावित करने वाले संबंधित संकेतकों में कुछ सुधार भी देखा गया है। पहले 1,000 दिन बच्चे के स्वास्थ्य को निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, जहां शुरुआत से स्तनपान बच्चे के पोषण का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत होता है। हालांकि स्तनपान में वृद्धि हुई है, जहां 16 राज्यों में मामूली सुधार देखा गया है, वहीं जन्म के तुरंत बाद से स्तनपान के स्तर का मिश्रित प्रदर्शन देखा गया। सभी 22 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में व्यवहार संबंधी प्रमुख संकेतकों में सुधार देखा गया है, जिनमें प्रसव पूर्व देखभाल (एएनसी), कम से कम सौ दिनों तक ऑयरन, फॉलिक एसिड की गोलियों का सेवन शामिल है। इससे पता चलता है कि केंद्र, राज्य, नागरिक समाज संगठनों और अन्य विकास सहयोगियों द्वारा विभिन्न हस्तक्षेप कार्यक्रमों ने अच्छी तरह से काम किया है। प्रसव पूर्व देखभाल से संबंधित संस्थाएं अन्य सेवाओं के लिए भी अच्छा मंच है, जहां गर्भनिरोधकों और बाल टीकाकरण से संबंधित जानकारियां दी जाती हैं। एनएफएचएस-4 की तुलना में 22 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में 12 से 23 महीने के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण में 80 फीसदी तक की वृद्धि देखी गई है।


इन सकारात्मक संकेतकों को मातृ-कल्याण के संकेतकों से जोड़ा जा सकता है, जैसे कि महिलाओं की 10 साल से अधिक की स्कूली शिक्षा और कम उम्र में होने वाले विवाह में कमी, जिनमें एनएफएचएस-5 में भी सुधार हुआ है। बच्चे के स्वास्थ्य के निर्धारण में सामाजिक-पारिस्थितिकी कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, सारे राज्यों में स्वच्छता सुविधाओं और पीने के पानी के स्रोत में 2015-16 की तुलना में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। एनएफएचएस-5 के निष्कर्ष दिखाते हैं कि भारत को लगातार विभिन्न कार्यक्रमों और नीतियों के जरिये पोषण को प्राथमिकता में रखना होगा। कोविड-19 के कारण आई बाधाओं ने भारत की स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ डाला है, जिसका असर कुपोषण के खिलाफ लड़ाई पर भी पड़ा है। 


(लेखिका हार्वर्ड टी एच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, इंडिया रिसर्च सेंटर में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं )  

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पुरानी पीढ़ी से अलग पाकिस्तानी युवा, जानिए क्यों ऐसा कह रही हैं मरिआना बाबर (अमर उजाला)

मरिआना बाबर  

दुनिया के कई हिस्सों के चिकित्सा विशेषज्ञ हैरान हैं कि पाकिस्तान कोविड-19 को काफी हद तक नियंत्रित करने में कैसे कामयाब रहा और यहां अब तक अन्य देशों जैसी तबाही नहीं देखी गई। इसका एक कारण यह बताया जा रहा है कि देश में 60 फीसदी से अधिक आबादी युवाओं की है, हालांकि इसकी कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं की गई है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 64 फीसदी युवाओं की उम्र 30 साल है और 29 फीसदी पाकिस्तानी 15 से 29 साल के हैं। कम से कम 2050 तक देश में जनसांख्यिकी का यही पैटर्न रहेगा। मेरी राय है कि देश के इन युवाओं का एक और सकारात्मक काम के पीछे योगदान है। यह काम पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों और समाज के भीतर चरमपंथी घटनाओं से संबंधित है। मुझे लगता है कि पाकिस्तानी युवाओं की वजह से ही यह संभव हो पाता है कि जैसे ही अल्पसंख्यकों के खिलाफ कोई घटना होती है, सोशल मीडिया पर इसकी निंदा करते हुए सरकार की कड़ी आलोचना की जाती है, नतीजतन स्थानीय सरकारें हमलावरों को गिरफ्तार और दंडित करने के लिए तुरंत कार्रवाई करती हैं। यह याद रखना होगा कि पाकिस्तान के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व और समाज के अन्य नेताओं का जन्म विभाजन के बाद हुआ है। वे पुरानी पीढ़ी की तरह, जो विभाजन से जुड़ी दुखद घटनाओं को आज भी नहीं भूल पाए हैं, अतीत का बोझ नहीं ढोते। 


ज्यादातर कैबिनेट मंत्री पचास साल या उससे कम उम्र के हैं तथा विभिन्न राजनीतिक दलों के नए नेता भी काफी युवा हैं। इतिहास में देखें, तो हर धर्म के पूजास्थलों को नष्ट किया गया है और पाकिस्तान समेत कई देशों में यह तांडव आज भी जारी है। जब मुझे पता चलता है कि किसी धर्म के पूजास्थल पर हमला किया गया है, तब व्यक्तिगत रूप से मुझे काफी दुख होता है, क्योंकि ये शांति और सहिष्णुता के स्थान हैं और किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। पिछले दिनों जब एक हिंदू मंदिर पर हमला हुआ, तो तुरंत ही प्रधानमंत्री इमरान खान, प्रधान न्यायाधीश और मानवाधिकार मंत्री डॉ शिरीन मजारी समेत कई मंत्रियों ने इसकी निंदा की। भीड़ को रोकने में विफल रहा स्थानीय प्रशासन अब जल्द से जल्द मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। तुरंत ही लाखों पाकिस्तानी युवा सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए और उन्होंने ट्वीट कर हमले की निंदा की तथा सरकार से तुरंत हालात पर अंकुश लगाने के लिए कहा। 


यह हमला प्रांतीय राजधानी पेशावर से करीब सौ किलोमीटर दूर करक शहर के एक मंदिर पर हुआ था, जहां श्री परमहंस जी महाराज की समाधि है। इमरान खान ने इस पर ट्वीट किया कि 'मैं अपने लोगों को चेतावनी देना चाहता हूं कि पाकिस्तान में किसी ने भी अगर हमारे गैर-मुस्लिम नागरिकों या उनके पूजा स्थलों को निशाना बनाया, तो उससे सख्ती से निपटा जाएगा। अल्पसंख्यक इस देश के समान नागरिक हैं।' धार्मिक मामलों के मंत्री और मानवाधिकार मंत्री ने भी ट्वीट कर भीड़ द्वारा हिंदू मंदिर को निशाना बनाने  की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि खैबर-पख्तुनख्वा सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दोषियों को न्याय के दायरे में लाया जाएगा। डॉ शिरीन मजारी ने ट्वीट किया, मानवाधिकार मंत्रालय भी इस पर कदम उठा रहा है। एक सरकार के रूप में हमारे सभी नागरिकों एवं उनके पूजा स्थलों की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है। 


आलोचना की शुरुआत सबसे पहले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से हुई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने घटना का स्वतः संज्ञान लिया और अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष, पुलिस महानिरीक्षक और खैबर पख्तुनख्वा के मुख्य सचिव को इस घटना के बारे में रिपोर्ट जमा करने का निर्देश भी दिया। प्रधान न्यायाधीश पाकिस्तान हिंदू परिषद के मुख्य संरक्षक डॉ रमेश कुमार से भी मिले। सुप्रीम कोर्ट ने खैबर-पख्तुनख्वा सरकार को निर्देश दिया कि वह विध्वंस के पीछे के प्रमुख संदिग्धों में से एक मौलवी शरीफ से राशि वसूल कर मंदिर का पुनर्निर्माण कराए। 


हिंदू समुदाय द्वारा मंदिर का विस्तार करने की खबर को मंदिर पर हमले की वजह बताया गया। अफवाह फैली कि हिंदू समुदाय उस जमीन पर भी कब्जा कर रहा है, जो उसकी नहीं है। दरअसल सरकार द्वारा हिंदुओं को इस्लामाबाद में एक नया मंदिर बनाने की अनुमति दिए जाने के हफ्तों बाद यह घटना घटी। शुरू में इसका विरोध हुआ, क्योंकि इस्लामाबाद में हिंदुओं की संख्या कम है। लेकिन सरकार ने कहा कि अगर वहां एक भी हिंदू है, तो उसे पूजा स्थल की जरूरत है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हमले तुरंत नहीं रुकेंगे, लेकिन कम से कम सरकार और जनता की तरफ से सख्त संदेश जरूर गया है कि ऐसी घटनाएं बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। तीन सौ हमलावरों में से मौलाना फजलुर रहमान की पार्टी जेयूआई-एफ के दो मौलानाओं को गिरफ्तार किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मंदिर आयोग का गठन किया है, जिसका पहला काम मुल्तान में प्रह्लादपुरी मंदिर का दौरा करना था, जो मंदिरों की स्थिति की समीक्षा और मूल्यांकन करने के शीर्ष आदेशों से संबंधित था। यह बहाउद्दीन जकारिया की मजार से सटा हुआ है। 


वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस का बदला लेने के तौर पर इस पर हमला किया गया था।  शोएब सदल की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित आयोग ने, जिसमें साकिब गिलानी और नेशनल एसेंबली के रमेश कुमार सदस्य हैं, प्रहलाद मंदिर क्षेत्र, इसकी देखरेख और पुनर्वास योजना के बारे में जानकारी इकट्ठा कर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है। नेशनल एसेंबली के सदस्य रमेश कुमार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आयोग का गठन अल्पसंख्यकों के लिए आशा की किरण था और संविधान ने पूरी तरह से अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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Thursday, January 14, 2021

कृषि कानून पर सुप्रीम कोर्ट की रास्ता तलाशने की कोशिश (अमर उजाला)

सुभाष कश्यप, लोकसभा के पूर्व महासचिव  

कृषि कानूनों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का संविधान से सीधे कोई लेना-देना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रहित और जनहित में स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश की है। उसने दोनों पक्षों की मदद की कोशिश है, ताकि गतिरोध टूटे। इससे किसानों, जिन्हें तथाकथित किसान कहना उचित होगा, को संतुष्टि मिल जाएगी कि तीनों कानून स्थगित कर दिए गए हैं और लोगों के घर लौटने से सरकार को भी राहत मिलेगी, और इस तरह स्थिति को सामान्य बनाने में मदद मिल सकती है। मेरे निजी विचार से, तो इसमें सुप्रीम कोर्ट की कोई भूमिका थी ही नहीं। 


संविधान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट तीन परिस्थितियों में केंद्रीय कानूनों के बारे में अख्तियार रखता है, पहला, संसद ने ऐसा कानून पारित किया हो, जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो; किसी ऐसे विषय पर जो राज्य का विषय हो और इस पर संसद कोई कानून बनाए, तो सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल दे सकता है। दूसरा, यदि किसी व्यक्ति के मूल अधिकार का उल्लंघन हुआ हो, तो वह सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है। तीसरा, किसी विषय पर केंद्र और राज्य के बीच झगड़ा हो, या कोई ऐसा कोई कानून बनाया गया हो, जिसमें केंद्र और राज्य के दृष्टिकोण भिन्न हों, तो यह विषय सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है। मगर मौजूदा तीनों कृषि कानूनों के मामले में ये तीनों ही बातें लागू नहीं होतीं। जहां तक मूल अधिकार के उल्लंघन की बात है, तो जो लोग धरने पर बैठे हैं, वे आम लोगों के मूल अधिकारों का हनन कर रहे हैं। उनके धरना-प्रदर्शन से शहर और गांव के लोगों को परेशानी हो रही है, क्योंकि सड़कें बंद कर दी गई हैं। आंदोलन कर रहे किसानों के मौलिक अधिकारों के हनन का तो सवाल ही नहीं उठा है। यह सवाल भी नहीं  उठा है कि केंद्र और राज्यों के बीच कृषि कानूनों को लेकर झगड़ा है।



अलबत्ता कृषि राज्य सूची में शामिल है, लेकिन जो कानून बनाए गए हैं, वे उन विषयों से संबंधित हैं जो केंद्र सूची में शामिल हैं या समवर्ती सूची में शामिल हैं, कानून मंत्रालय ने इसका बारीकी से परीक्षण किया था। मसलन, अंतर राज्यीय व्यापार, तो यह केंद्र का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इन कानूनों को लेकर ये तीन बातें नहीं कही हैं, यानी इसमें किसी तरह का सांविधानिक उल्लंघन नहीं हुआ है। यानी साफ है कि तीनों कृषि कानूनों से संबंधित मामले सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उसे मिले विशेषाधिकार का उपयोग किया है। इस अनुच्छेद के तहत सुप्रीम कोर्ट तथ्यों और परिस्थितियों के आधा र पर कोई आदेश पारित कर सकता है। 


मैं समझता हूं कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ परिस्थिति को शांत करने के लिए राष्ट्रहित में एक रास्ता ढूंढ़ने की कोशिश की है। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को उम्मीद थी कि इससे किसान भी मान जाएंगे, क्योंकि इससे तीनों कृषि कानून के अमल पर रोक लगाई जा रही है और सरकार को भी थोड़े समय के लिए चैन की सांस मिलेगी। उसने जो समिति बनाई है, वह यदि कोई रास्ता ढूंढ़ लेती और दोनों पक्ष राजी हो जाते, तो सुप्रीम कोर्ट को अपने अधिकार क्षेत्र से जुड़े दूसरे सवालों पर सर खपाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट कुछ ज्यादा आशावान था, क्योंकि तथाकथित किसानों की ओर से इस समिति को स्वीकार ही नहीं किया गया है। ऐसा लगता है कि किसानों के कथित प्रतिनिधि समाधान चाहते ही नहीं, उनकी दिलचस्पी राजनीति में अधिक दिखाई दे रही है। यह राजनीति मोदी और भाजपा विरोध की राजनीति है, आंदोलन स्थल पर लहराने वाले लाल झंडों से इसका अंदाजा होता है। वहां कथित तौर पर खालिस्तान के तत्व भी घुस आए हैं। समिति के सदस्यों के कृषि कानूनों के रुख को लेकर भी असहमतियां हैं। लेकिन मेरा मानना है कि यह धारणा की बात है। किसानों के प्रतिनिधि उन्हें सरकार के पक्षधर बताएंगे और समिति के सदस्य कहेंगे कि सरकार से उनका कुछ लेना-देना नहीं है। 


यह सवाल भी बार-बार उठाया जा रहा है कि तीनों कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर सरकार ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को आगे आना पड़ा। यह समझने की जरूरत है कि देश में संविधान सर्वोपरि है और उससे ऊपर हैं भारत के लोग। संविधान ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की स्थापना की और इन तीनों के अधिकार क्षेत्र स्पष्ट रूप से परिभाषित और परिसीमित किए गए। कोई भी सर्वोच्च नहीं है, न संसद, न कार्यपालिका और न ही सुप्रीम कोर्ट। कानून बनाने के क्षेत्र में संसद सर्वोच्च है, कानून और संविधान की व्याख्या करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च है और कानून पर अमल करने के बारे में कार्यपालिका सर्वोच्च है। हमारे यहां सांविधानिक शासन है, और सरकार संविधान के अनुसार चलती है। हमारे यहां लोकतंत्र है भीड़तंत्र नहीं। जनता के चुने हुए प्रतिनिधि कानून बनाते हैं। जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों ने कृषि कानून बनाए, इसलिए यह नहीं कह सकते कि सरकार गलत थी। उसे जनहित में जो उचित लगा वह उसने किया। संस्कृत के एक श्लोक का भावार्थ है, बहरा कौन है? जो अपने हित की बात भी न सुनता हो। 


मौजूदा गतिरोध को देखते हुए मैं एक आम आदमी की तरह सोचता हूं कि क्या इन कानूनों को राज्यों की सरकारों पर छोड़ दिया जाना चाहिए, हालांकि इसकी कानूनी स्थिति को देखना होगा। सरकार की ओर से कहा गया है कि सिर्फ दो राज्यों के लोग ही इसके विरुद्ध हैं, बाकी सारे राज्यों के लोग इसके पक्ष में हैं। अगर ऐसा है, तो क्या राजनीतिक प्रबंधन के तहत, जिन दो राज्यों के लोग ये कानून नहीं चाहते उन्हें छोड़कर बाकी राज्यों में इन्हें लागू किया जाए? इसके बाद जो अनुभव हो, उसके आधार पर ये दो राज्य भी फैसला ले सकते हैं। यानी एक रास्ता यह हो सकता है कि ये कानून राज्यों पर छोड़ दिए जाएं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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सुप्रीम कोर्ट के दखल से अब और उलझ गया किसानों का मसला (अमर उजाला)

अरुण कुमार, वरिष्ठ अर्थशास्त्री  

कृषि कानूनों पर सरकार और किसान संगठनों  की बातचीत के बीच सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद मामला और उलझ गया है। आंदोलनकारी किसानों को आशंका थी कि अदालत में जाने से चीजें उलझ जाएंगी। इन कृषि कानूनों के आर्थिक आधार को समझने की जरूरत है। सरकार के मुताबिक, ये कानून किसानों के हित में हैं, इससे उन्हें विकल्प मिलेंगे। कृषि क्षेत्र मुक्त व्यापार के दायरे में आ जाएगा। वास्तविकता यह है कि आर्थिक रूप से न तो कृषि क्षेत्र मुक्त बाजार बन सकता है, न ही छोटे किसानों को विकल्प मिल सकता है। इसकी वजह है कृषि उपज के बाजार का कार, जूता, टेक्सटाइल्स आदि के बाजारों से भिन्न होना। इन बाजारों में मूल्य निर्धारण व्यवस्था अलग होती है, जिसमें लागत मूल्य और बिक्री मूल्य के आधार पर लाभ मिलता है। जबकि कृषि क्षेत्र मांग और आपूर्ति पर निर्धारित होता है। देशभर के किसानों को कभी अच्छी, तो कभी खराब फसल का सामना करना पड़ता है। उसकी उपज का मूल्य बाजार निर्धारित करता है। फसल उत्पादन के लिए प्रतिवर्ष किसानों को उधार लेना पड़ता है। सेठ, साहूकार या ट्रेडर, जिससे वे उधार लेते हैं, फसल उन्हीं को बेचनी पड़ती है। अक्सर किसान यह कहते हैं कि उनको लाभ के बजाय घाटा हो रहा है। 


आर्थिक परिभाषा में कृषि क्षेत्र बाजार मुक्त नहीं, बल्कि किसान और सेठ, साहूकार और ट्रेडर के बीच आपस में जुड़ा हुआ बाजार है। सरकार कह रही है कि अब किसान अपनी फसल कहीं भी बेच सकते हैं। ऐसा फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि किसानों की स्थिति खराब है। उनको फसल उत्पादन के लिए उधार लेना ही पड़ेगा, और उन्हीं को बेचना पड़ेगा। हालांकि छोटे किसान एमएसपी का लाभ नहीं ले पाते। लेकिन एमएसपी बाजार में एक बेंचमार्क मूल्य बनाती है। और सेठ, साहूकार, ट्रेडर द्वारा फसल के मूल्य निर्धारण की एक सीमा तय हो जाती है। अगर यह बेंचमार्क मूल्य खत्म हुआ, तो नुकसान किसानों का ही है। हालांकि सरकार कह रही है कि वह एमएसपी या एपीएमसी खत्म नहीं कर रही। पर जब वैकल्पिक बाजार होगा, तो शुरुआत में किसानों को लुभावने अवसर दिए जाएंगे। 


जैसे-जैसे एपीएमसी निष्क्रिय होंगी, एमएसपी भी खत्म होगी। यह आर्थिक प्रक्रिया है, जो कुछ वर्षों में अपना असर दिखाएगी। कृषि बाजार में जब बड़े खिलाड़ी आएंगे, तो वे ट्रेडर से ही माल खरीदेंगे। कंपनियां पहले ट्रेडर को एक दाम देंगी, फिर ट्रेडर किसानों का दाम निर्धारित करेगा। इससे किसानों की हालत और खराब हो जाएगी। अनुबंिधत खेती के पेच छोटे किसानों कि समझ नहीं आते हैं। इससे उन पर दोहरी मार पड़ेगी। कनूनी दांव पेच में उन्हें उलझना पड़ेगा। बाजार शक्ति व पूंजी से चलता है। जो कमजोर होता है, वह पिस जाता है। ऑनलाइन टैक्सी सर्विस प्रदाता कंपनियों के परिणाम हम देख चुके हैं। कैसे छह रुपये प्रति किलोमीटर से अब वे पंद्रह रुपये प्रति किलोमीटर तक किराया ले रही हैं। संसद में ये कानून पारित हो गए, पर किसान कह रहे है कि नए कानूनों में उनकी राय नहीं मांगी गई। मसला यह है कि जब तक आप कर्ज बाजार, श्रम बाजार, भूमि बाजार और उपज बाजार को नहीं ठीक नहीं करेंगे, तब तक कृषि क्षेत्र मुक्त बाजार नहीं बन सकता।


अब सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बना दी। कमेटी के चारों सदस्य इन कानूनों के पक्ष में हैं। किसान शुरू से ही कह रहे थी कि हम किसी कमेटी के सामने नहीं जाएंगे, क्योंकि उनको पता था कि बात टल जाएगी। अदालत के सामने मामले को सुलझाने का यह एक बेहतर अवसर था, कि वह एक ऐसी कमेटी बनाती जिसमें निरपेक्ष लोग होते क्योंकि सरकार व किसान के बीच मामला अटक हुआ था। पर इसका उल्टा हो रहा है। आंदोलनकारी किसानों का कहना है कि जिस कानून में बुनियादी खामियां हों, उसमें क्या बदलाव हो सकता है? ऐसे में सरकार को किसानों से कहना चाहिए कि हम इन कानूनों को अभी रोकते हैं। किसानों से बात करते हैं, राज्यों से बात करते हैं, फिर एक नया अध्यादेश बनाते हैं। फिर इन कानूनों को वापस लेकर नए कानून को पारित करा लेते हैं। अगर सही तरीके से एक कमेटी गठित हो, जिसमें पक्ष, विपक्ष व कुछ निरपेक्ष लोग हों, तब एक समाधान निकल सकता है। क्योंकि कानून तो संसद में ही बनेगा, उसे कोई कमेटी या अदालत नहीं बना सकती।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Wednesday, January 13, 2021

फूलों की घाटी में बांस के अंगारे, एक चिंगारी इस सुंदर स्थान के लिए बन जाती है काल (अमर उजाला)

पंकज चतुर्वेदी 

पूर्वोत्तर ही नहीं, पूरे देश के सबसे खूबसूरत ट्रेकिंग इलाके और जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध और संवेदनशील दजुकू घाटी में 29 दिसंबर, 2020 से जो शोले भड़कने शुरू हुए, अभी भी शांत नहीं हो पा रहे हैं। 11 जनवरी, 2021 को जब आपदा प्रबंधन टीम ने यह सूचित किया कि अब कोई नई आग नहीं लग रही है, तब तक इस जंगल का 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जलकर राख हो चुका था। यह स्थान नगालैंड व मणिपुर की सीमा के करीब है। दस दिन बाद भी आग पूरी तरह शांत नहीं हुई है। यह सुरम्य घाटी दुनिया भर में केवल एकमात्र स्थान पर पाई जाने वाली दजुकू-लिली के फल के साथ अपने प्राकृतिक वातावरण, मौसमी फूलों और वनस्पतियों व जीवों के लिए जानी जाती है। गत दो दशकों के दौरान यहां यह दसवीं बड़ी आग है।


अप्रैल से सितंबर तक के मौसम में इस घाटी को ‘फूलों की घाटी’ कहा जाता है। वहीं पूरे साल यहां की घाटी व पहाड़ पर बौने बांस का साम्राज्य होता है। विदित हो बांस की यह प्रजाति पूर्वी हिमालय और उत्तर-पूर्वी भारत की दजुकू घाटी और आसपास की पहाड़ियों पर पाई जाती है। यह जंगल पूरी तरह से बौने बांस से ढके हैं, जो दूर से खुली घास के मैदान की तरह दिखाई देते हैं। प्रकृति  की यह अनमोल छटा ही यहां की बर्बादी का बड़ा कारण है। बांस का जंगल इतना घना है कि कई जगह एक मीटर में सौ से पांच सौ पौधे। इस मौसम में हवा चलने से ये आपस में टकराते हैं, जिससे उपजी एक चिंगारी इस सुंदर स्थान के लिए काल बन जाती है। दजुकू घाटी और आसपास की पहाड़ियों के प्राचीन जंगलों को जंगल की आग से बड़े पैमाने पर खतरा है। यहां की अनूठी जैव विविधता जड़मूल से नष्ट हो रही है और घने जंगल के जानवर आग के ताप व धुएं से परेशान होकर जब बाहर आते हैं, तो उनका टकराव या तो इंसान से होता है या फिर हैवान रूपी शिकारी से। 


इस जंगल में जब सबसे भयानक आग वर्ष 2006 में लगी थी, तो कोई 70 वर्ग किलोमीटर के इलाके में राख ही राख थी। यहां तक की जाज्फू पहाड़ी का खूबसूरत जंगल भी चपेट में आ गया था। उसके बाद जनवरी-2011, फरवरी-2012,  मार्च-2017 में भी जंगल में आग लगी। नवंबर -2018 में भी जंगल सुलगे थे। इस बार की आग मणिपुर के सेनापति जिले में भी फैल गई है और राज्य की सबसे ऊंची पर्वतीय चोटी ‘माउंड इसो’ का बहुत कुछ भस्म हो गया है। बीते दस दिनों से नगालैंड पुलिस, वन विभाग, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के साथ-साथ दक्षिणी अंगामी यूथ एसोसिएशन के सदस्य आग बुझाने में लगे है। भारतीय वायु सेना के एमआइ-15वी हेलीकाप्टर एक बार में 3,500 लीटर पानी लेकर छिड़काव कर रहे है। वहीं लगातार तेज हवा चलने से आग बेकाबू तो हो ही रही है, राहत कार्य भी प्रभावित हो रहा है। इस समय विभिन्न संस्थाओं के दो हजार लोग आग को फैलने से रोकने में लगे है। हालांकि नगा समाज इस आग को साजिश मान रहा है। कोरोना के चलते दक्षिणी अंगामी यूथ एसोसिएशन के सदस्यों ने इस घाटी में आम लोगों के आवागमन को गत वर्ष मार्च से ही बंद किया हुआ है। नवंबर, 2018 में मणिपुर और नगालैंड सरकार के बीच हुए एक समझौते के मुताबिक, इस घाटी में प्रवेश के दो ही रास्ते खुले हैं- एक मणिपुर से, दूसरा उनके अपने राज्य से। कोरोना के समय यहां किसी का भी प्रवेश पूरी तरह रोक दिया गया था, जो अब भी जारी है।


नगा लोगों को शक है कि आग जानबूझ कर लगाई गई है व उसके पीछे दूसरे राज्य की प्रतिद्वंद्वी जनजातियां हैं। फिलहाल तो राज्य सरकार की चिंता आग के विस्तार को रोकना है। लेकिन साल दर साल जिस तरह यहां आग लग रही है, वह अकेले उत्तर-पूर्व ही नहीं, भारत देश व हिमालय क्षेत्र के अन्य देशों के लिए बड़ा खतरा है। हालांकि भारत में तमिलनाडु से लेकर थाईलैंड तक तेजी से बढ़ते बांस और उसमें आग की घटनाओं पर नियंत्रण के लिए कई शोध हुए हैं व तकनीक भी उपलब्ध है। विडंबना है कि हमारे ये शोध पत्रिकाओं से आगे नहीं आ पाते। जंगलों की जैव विविधता पर मंडराते खतरे से उपजे कोरोना और उसके बाद पक्षियों की रहस्यमय मौत से हम सबक नहीं ले रहे और प्रकृति की अनमोल भेंट इतने प्यारे जंगलों को सहेजने के स्थायी उपाय नहीं कर पा रहे हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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क्या अमेरिकी प्रशासन ने ट्रंप की विनाशकारी लहर को कमतर करके नहीं आंका था? (अमर उजाला)

सुरेंद्र कुमार 

अमेरिकी सीनेट में बहुमत के नेता चक शूमर के शब्दों में, 'लोकतंत्र के मंदिर को अपवित्र कर दिया गया...छह जनवरी हाल के अमेरिकी इतिहास में एक काले दिन के रूप में जाना जाएगा।' उनकी भावनाएं लाखों अमेरिकी नागरिकों और दुनिया भर के अमेरिकी लोकतंत्र के प्रशंसकों की भावनाओं से मेल खाती हैं। कैपिटल भवन में चल रहे अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र में जिस तरह से ट्रंप के समर्थकों ने उत्पात मचाया, स्पीकर नैंसी पेलोसी के दफ्तर में तोड़फोड़ की, खिड़कियों को तोड़ा, अभूतपूर्व हिंसा की, जिसके कारण सांसदों एवं सीनेटरों को बाहर निकालना पड़ा, उसने लोकतांत्रिक दुनिया को भारी झटका दिया है। यह इतना विचित्र था कि कुछ देर के लिए लोकतंत्र और तानाशाही के बीच की पतली रेखा गायब हो गई। इस तरह की बर्बरता, हिंसा और अराजकता के दृश्य अक्सर अधिनायकवादी शासन में देखे जाते हैं, जहां हारने वाले नेता सत्ता में बने रहने के लिए सेना और टैंकों को बुलाते हैं। 1812 में युद्ध के दौरान ब्रिटिश द्वारा अमेरिकी कैपिटल को आखिरी बार नुकसान पहुंचाया गया था! पूर्व रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इसे 'काफी घिनौना' बताया। अन्य तीन जीवित पूर्व राष्ट्रपतियों-कार्टर, क्लिंटन और ओबामा ने भी कैपिटल पर हमले की कड़े शब्दों में निंदा की। निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि यह कोई 'विरोध' नहीं था, बल्कि 'विप्लव' था, जो 'देशद्रोह' पर आधारित था। 


लेकिन क्या यह वाकई अप्रत्याशित था? क्या अमेरिकी प्रशासन ने ट्रंप की विनाशकारी लहर को कमतर करके नहीं आंका था? क्या ट्रंप ने अपने इरादे को छिपाया था? नहीं। यहां तक कि प्रेसिडेंट डिबेट से पहले ही उन्होंने मीडिया से कहा था कि चुनाव में हार उन्हें स्वीकार्य नहीं होगी, क्योंकि वह मानते हैं कि जब तक चुनाव में धांधली नहीं होगी, वह हार नहीं सकते हैं। यह अटल आत्मविश्वास लोकतांत्रिक मूल्यों और लोकतांत्रिक संस्थानों में उनकी गहरी आस्था को प्रतिबिंबित नहीं करता है। वास्तव में यह एक संकीर्णतावादी राष्ट्रपति की जुनूनी आत्म-सच्चाई थी। 


इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप ने एक हफ्ते से अपने समर्थकों को उकसाया- 'हम लड़ने जा रहे हैं, हम कभी हार नहीं मानेंगे', इसलिए जो भी हुआ, उन्हें हर चीज के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यहां तक कि जब निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा 'घेराबंदी' खत्म करने की अपील के बाद उन्होंने अपने समर्थकों को 'घर जाने' के लिए कहा था, तब भी उनके बयान में हमलावरों की निंदा या चार लोगों की जान जाने को लेकर पश्चाताप का भाव नहीं था। 


ट्रंप ने अपने जुड़वां लोकलुभावन नारों : 'अमेरिका पहले' और 'अमेरिका को फिर से महान बनाएं' के साथ अपने राष्ट्रपति कार्यकाल की शुरुआत की थी, जिस पर किसी को आपत्ति नहीं है। लेकिन उनके इस दावे कि उनके पूर्ववर्तियों ने देश के लिए कुछ नहीं किया, उन्होंने इसे बर्बाद कर दिया, को बहुत कम लोगों ने माना। उन्होंने अहंकार, आत्म-सच्चाई और विरोधाभासी विचारों के प्रति असहिष्णुता दिखाई और हमेशा खुद के सही होने का दावा किया। मीडिया की किसी भी आलोचना को वह फेक न्यूज कहकर खारिज कर देते थे। 


जिन लोगों ने ह्वाइट हाउस या मंत्रिमंडल में उनके साथ असंतोष जताने का साहस किया, उन्हें या तो निकाल दिया गया या इस्तीफा देने पर मजबूर किया गया। ऐसे 45 से ज्यादा लोगों की लंबी सूची है, जिसमें विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, अटार्नी जनरल, चीफ ऑफ स्टाफ एवं अन्य लोग शामिल हैं। उन्होंने बिना कोई बेहतर विकल्प पेश किए अपने पूर्ववर्ती बराक ओबामा के घरेलू एवं विदेशी मामलों से संबंधित फैसले को पलट दिया, जिनमें स्वास्थ्य देखभाल, आव्रजन, नस्लीय न्याय, ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप, ईरान के साथ परमाणु समझौता, क्यूबा के साथ संबंधों का सामान्यीकरण, पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता शामिल हैं।


उन्होंने अपने लोकलुभावन दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया कि पूरी दुनिया अमेरिका का लाभ उठा रही है और पिछले राष्ट्रपतियों ने इसके बारे में कुछ नहीं किया, इसलिए वह इसे सही कर रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि अपने टैरिफ युद्ध के साथ चीन की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना थी। लेकिन इसने अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए मंदी से उबरने में बाधा खड़ी की। हिंद-प्रशांत क्षेत्र को प्रमुखता देते हुए इसे नौवहन एवं उड़ानों के लिए खुला व मुक्त रखना, क्वाड को फिर से खोलना और अपने पड़ोसियों के खिलाफ चीन की आक्रामकता का विरोध करना ट्रंप की सकारात्मक नीतियां थीं, लेकिन आसियान देश चीन विरोधी मोर्चे के लिए तैयार नहीं थे। 


उन्होंने अमेरिका के नाटो सहयोगियों से अपनी रक्षा के लिए और अधिक योगदान देने की मांग की। इस पर भी कोई अमेरिकी आपत्ति नहीं कर सकता। वह अपने नजरिये से लेन-देन कर रहे थे और उम्मीद करते थे कि दूसरे लोग मिल्टन फ्रीडमैन की बात को याद रखें कि 'मुफ्त में कोई चीज नहीं मिलती!' लेकिन अपने उद्देश्यों को हासिल करने के उनके तरीके ने कई लोगों को असहज कर दिया। मैक्सिको के राष्ट्रपति और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री के साथ बातचीत करते हुए अचानक फोन काट देना और नाटो नेताओं तथा कनाडाई प्रधानमंत्री के साथ खुलेआम झगड़ा करना कूटनीति नहीं थी, बल्कि यह धमकाना था। 


कहने का तात्पर्य यह है कि ट्रंप कोई स्टेट्समैन नहीं हैं; वह एक बेईमान, व्यापारी से राजनेता बने हैं, जिन्होंने राजनीतिक शक्ति का स्वाद चखा है और वह इसे जाने नहीं देना चाहते हैं। उन्होंने ध्रुवीकरण और विभाजन को बढ़ा दिया! लगता है, बेईमानी या निष्पक्ष ढंग से चुनाव जीतना ही उनका आदर्श था। उनके पास देश का नेतृत्व करने के लिए नैतिक मूल्यों की कमी थी। पूर्व रक्षा मंत्री विलियम कोहेन ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि ये धुर दक्षिणपंथी लंबे समय तक हमारे समाज का हिस्सा रहे हैं। हमें इनकी पहचान करनी चाहिए और मुकदमा चलाकर जेल भेजना चाहिए। उपराष्ट्रपति माइक पेंस लोकतंत्र एवं सांविधानिक दायित्व के पक्ष में खड़े हो गए हैं। फिलहाल लोकतंत्र जीत गया है, लेकिन यह चेतावनी की घंटी है! 

सौजन्य - अमर उजाला।

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Tuesday, January 12, 2021

कानूनी सुरक्षा की आड़ में आम आदमी के जीवन से खिलवाड़ (अमर उजाला)

शिवदान सिंह 

भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के अनुसार, यदि किसी अपराध को एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा अंजाम दिया जाए, तो अपराध में शामिल हर व्यक्ति समान सजा का हकदार होता है। जब कोई सार्वजनिक भवन या पुल आदि घटिया निर्माण सामग्री के इस्तेमाल के कारण समय सीमा से पहले ही ध्वस्त होते हैं, तो उपरोक्त कानून के अनुसार, इन भवनों और पुलों के ठेके में रिश्वत खानेवाले अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे चलाए जाने चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है। अक्सर दिखावे के लिए संबंधित अधिकारी का या तो तबादला कर दिया जाता है या सस्पेंड कर दिया जाता है। पिछले दिनों गाजियाबाद के पास मुरादनगर श्मशान घाट भवन की छत गिरने से सत्ताईस लोगों की मौत हो गई। ठेकेदार के मुताबिक, भवन के ठेके की धनराशि का 28 प्रतिशत हिस्सा वह पहले ही मुरादनगर के नगरपालिका अधिशासी अधिकारी को रिश्वत के रूप में दे चुका था। फिर अन्य निरीक्षकों को 12 फीसदी हिस्सा दिया गया। बचे हुए 60 फीसदी में से अपना मुनाफा कमाने के बाद उसने 40 प्रतिशत धनराशि से इस भवन का निर्माण किया। घटिया भवन सामग्री लगाने का परिणाम हुआ कि अचानक वह भवन गिर गया। ऐसे ही महाराष्ट्र के भंडारा में एक अस्पताल में आग लगने से दस नवजातों की मौत हो गई।


अक्सर जहरीली शराब पीने से लोगों के मारे जाने की खबर आती है। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में जहरीली शराब पीने से पांच लोगों की मौत हो गई और बीस लोगों की आंखों की रोशनी चली गई। फरवरी, 2019 में उत्तर प्रदेश के तीन जिलों सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मेरठ में जहरीली शराब पीने से करीब सौ लोगों की जान चली गई थी और बहुत लोगों की आंख की रोशनी चली गई थी। जहरीली शराब से पंजाब में भी समय-समय पर लोग मारे जाते हैं। पर अभी तक पुलिस व आबकारी विभागों के दोषी लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। जबकि जहरीली शराब का धंधा संगठित अपराधी करते हैं, जिसमें इलाके के पुलिस और आबकारी कर्मियों की पूरी सहमति और मदद उपलब्ध रहती है। ज्यादातर ऐसे मामलों में दोषी पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया जाता है या सस्पेंड कर दिया जाता है। जबकि सस्पेंशन की अवधि तक दोषी पुलिसकर्मी पूरे वेतन और सुविधाओं के साथ कुछ दिन आराम कर फिर किसी दूसरी जगह भ्रष्टाचार में लिप्त हो मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ करने लगता है। साफ है कि हमारी कानून-व्यवस्था में ऐसी कुछ खामियां हैं, जिनके कारण भ्रष्ट सरकारी कर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं हो पा रही।


सरदार पटेल ने अंग्रेजों द्वारा लागू सिविल सर्विस कोड 1919, पुलिस ऐक्ट 1861 तथा उनके पूरे कानूनी ढांचे को यह समझ कर अपना लिया था कि इनके जरिये अंग्रेजों की तरह आजाद भारत की सरकारें भी कामकाज चला सकेंगी। पर अंग्रेजों का काम नौकरशाहों व पुलिस की मदद से भारतीयों का शोषण करना था। स्वतंत्र भारत में तो ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन पुलिस और नौकरशाह अंग्रेजों द्वारा प्राप्त सरकारी कर्मियों की कानूनी सुरक्षा का नाजायज लाभ उठा रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 310 और 311 के अनुसार, नौकरशाहों के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले केंद्र या संबंधित राज्य सरकार की अनुमति लेनी पड़ती है। ऐसे ही पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए सीआरपीसी की धारा 132 और 197 के अनुसार संबंधित राज्य सरकार की अनुमति लेना जरूरी है। ये प्रावधान इसलिए किए गए थे, ताकि नौकरशाह और पुलिसकर्मी बिना किसी दबाव के अपना दायित्व निभा सकें। पर इन प्रावधानों को सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को बनाए रखा गया है। जबकि सैन्य कानून में प्रावधान है कि हर तरह की गतिविधियों के लिए सेना की यूनिट का संबंधित अधिकारी जिम्मेदार होगा। दोषी सेनाधिकारी के खिलाफ कोर्ट मार्शल के जरिये कानूनी कार्रवाई की जाती है और दोषी पाए जाने पर लंबी सजा या फांसी तक का प्रावधान है। लिहाजा देश के नौकरशाहों और अन्य सरकारी कर्मचारियों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराने का समय अब आ गया है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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कहां गायब हो गए जैक मा, किस वजह से चीनी नेतृत्व हुआ नाराज? (अमर उजाला)

नारायण कृष्णमूर्ति  

मुझे सितंबर, 2000 में प्रगति मैदान में आयोजित एक कार्यक्रम बहुत अच्छी तरह याद है, हालांकि वह जगह अब इंटरनेट मेला-इंडिया इंटरनेट वर्ल्ड (आईआईडब्ल्यू) आयोजित करने के लिहाज से असामान्य लगती है। आईआईडब्ल्यू अपनी तरह का पहला कार्यक्रम था, जहां प्रौद्योगिकी कंपनियों ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करने के लिए स्टॉल लगाए थे और वहां दुनिया भर के कई वक्ता कई संभावनाओं पर चर्चा कर रहे थे। वहीं मैं एक अरुचिकर, दृढ़ एवं नाटे कद के व्यक्ति जैक मा को सुनने गया था, जो इंटरनेट की अपार संभावनाओं के बारे में बात कर रहे थे और यह बता रहे थे कि यह लोगों के जीवन के साथ क्या कर सकता है। 


जैक मा की कहानी प्रेरणादायक है कि कैसे एक पूर्व अंग्रेजी शिक्षक एक सफल उद्यमी बन गया। वह तकनीकी विशेषज्ञ नहीं हैं, लेकिन वह एक महान वक्ता और  चीन के साथ-साथ दुनिया भर में तकनीकी उद्यमियों के लिए प्रेरणा हैं। जब दूसरे लोग इंतजार कर रहे थे, जैक मा जल्दी से रुझानों को परख लेते थे। हालांकि उनके पास भी विफलताओं की कहानियां थीं, लेकिन उन्होंने हमेशा उससे कुछ सीखा। इसलिए, उनका उद्यम अलीबाबा चीन के सबसे बड़े ऑनलाइन रिटेल प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित हुआ है। वर्ष 2004 में अलीबाबा पर बढ़ते ट्रैफिक को देखकर मा ने तुरंत अपने प्लेटफार्म पर निर्बाध लेनदेन के लिए तीव्र भुगतान मंच बनाया। अलीपे नामक इस तीसरे पक्ष के भुगतान ऐप ने तमाम उम्मीदों को पार करते हुए बहुत कम समय में लाखों उपयोगकर्ता हासिल किए। एक रिपोर्ट के अनुसार, मासिक आधार पर सक्रिय 73 करोड़ से ज्यादा उपयोगकर्ताओं के साथ अब इस ऐप के एक अरब से ज्यादा उपयोगकर्ता हैं। इस कंपनी को बाद में ऐंट ग्रुप के रूप में नामांकित किया गया। यह कंपनी अब वित्तीय सेवाओं के लिए एक विस्तृत शृंखला प्रदान कर रही है, जिसके कारण यह पारंपरिक बैंकिंग एवं वित्तीय सेवाओं के लिए चुनौती बन गई है। ऐंट ग्रुप की लोकप्रियता और वृद्धि ऐसी थी कि 2020 के अंत में प्रस्तावित आईपीओ (प्रारंभिक सार्वजनिक प्रस्ताव) के साथ सूचीबद्ध होना स्वाभाविक था। कंपनी ने एक आईपीओ में बाजार से 37 अरब डॉलर तक जुटाने की उम्मीद की थी, जो कि सऊदी अरामको के 29.4 अरब डॉलर के आईपीओ को पछाड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा आईपीओ होता।


चीनी सरकार और नियामक; पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना और चाइना बैंकिंग ऐंड इंश्योरेंस रेगुलेटरी कमीशन, जिसके दायरे में ऐंट ग्रुप पनपा था, ने जैक मा की इस इकाई को बड़ा होने दिया। यह दुनिया को यह दिखाने का भी तरीका था कि चीन ने उद्यमशीलता का समर्थन किया और वहां लोग व्यापार करने के लिए स्वतंत्र थे। लेकिन मा और उनकी कंपनी के लिए चीजें तब बदल गईं, जब 24 अक्तूबर, 2020 को एक शिखर सम्मेलन में भाषण के दौरान, जिसमें सरकारी मशीनरी और नियामक थे; जैक मा ने एक अप्रिय टिप्पणी की। इस बैठक में जैक मा ने सार्वजनिक रूप से जो कहा, वह अन्यथा एक चतुर वक्ता के लिए अकल्पनीय था। मा ने वैश्विक वित्तीय नियमों के लिए बहुत जरूरी सुधारों का हवाला देते हुए अपने भाषण की शुरुआत की और चीनी बैंकिंग प्रणाली पर अनजाने में हमला किया। 


यह स्वाभाविक रूप से चीनी नेतृत्व और नियामकों को अच्छा नहीं लगा। उसने ऐंट ग्रुप के संचालन में तुरंत हस्तक्षेप किया और नियमों को भी बदल दिया, जिससे आईपीओ का पालन करना मुश्किल हो गया और कंपनी को भी उसी तरीके से काम करना पड़ा। इसके बाद आईपीओ को स्थगित कर दिया गया और जैक मा सार्वजनिक रूप से गायब हो गए। ‘जैक मा कहां हैं’-यह मीडिया की सुर्खी बन गई। आधिकारिक रूप से न तो चीन की सरकार ने बताया है कि वह कहां हैं और न ही जैक मा के करीबी लोगों ने उनके बारे में कोई स्पष्टीकरण दिया है। उनकी टिप्पणी के बाद, चीन के बैंकिंग नियामक ने त्वरित उपभोक्ता ऋणों को धन देने के लिए परिसंपत्ति-समर्थित प्रतिभूतियों के उपयोग के लिए नए नियम जारी किए, जिससे विशेष रूप से ऐंट ग्रुप को अपने व्यवसाय के उस हिस्से पर लगाम लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसा नहीं है कि ऐंट ग्रुप इस ऋण कारोबार से बहुत पैसा कमा रहा था; लेकिन बदले में उन्हें जो मिल रहा था, वह बड़ी जानकारी (डाटा) थी कि लोगों ने कैसे पैसा कमाया और खर्च किया, जिससे उन्हें अपने वित्तीय उत्पादों को इस आधार पर आगे बढ़ाने में मदद मिली। नागरिकों के बारे में इतनी जानकारी किसी भी सरकार के लिए एक स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय है, क्योंकि वह इस तरह की जानकारी अपने पास रखना चाहेगी। 


यहीं से जैक मा के लिए मुश्किलें शुरू हुईं। वास्तव में कोई नहीं जानता कि जैक मां अभी कहां हैं, लेकिन एक चीज स्पष्ट है कि चीन के साथ-साथ अन्य देशों में भी व्यवसायों की कभी उन डाटा और जानकारी तक पहुंच नहीं हो सकती है, जिसके बारे में सरकारों और नियामकों को लगता है कि इन संस्थाओं को अनुमति देने से वे लोगों पर नियंत्रित कर सकते हैं। ऐंट ग्रुप के साथ जिस तरह का डाटा है, उसकी पहुंच के साथ वह उपयोगकर्ताओं को खर्च करने, निवेश करने और उधार लेने के लिए प्रेरित कर सकता है, क्योंकि ऐंट ग्रुप उसे सही समझता है। हम अपने देश में भी इस तरह के मामले देखते हैं, जब बैंकों के रिलेशनशिप मैनेजर आपसे उधार लेने, किसी योजना में बचत करने और किसी योजना में निवेश करने के लिए संपर्क करते हैं, क्योंकि इससे वे आपकी बैंकिंग विवरणी तक पहुंच बनाते हैं। 


हालांकि भारतीय उद्यमों-पेटीएम, जोमैटो और बिग बास्केट में जैक मा ने साल भर पहले अतिरिक्त निवेश किया था, लेकिन इन कंपनियों का भविष्य इस बात पर टिका है कि कैसे जैक मा वापसी करते हैं और अब उनका चीनी व्यवसाय कैसे काम करेगा। जैसा कि कुछ अन्य बड़े चीनी प्रौद्योगिकी दिग्गज भी विनियामक जांच का सामना कर रहे हैं, यह उन लोगों के लिए एक चेतावनी की घंटी है, जो आंख बंद करके महसूस करते हैं कि इंटरनेट पर उनकी सभी जानकारी व डाटा सुरक्षित है और उस पर उनका पूर्ण नियंत्रण है। भले ही जैक मा युवा उद्यमियों के लिए एक प्रेरणा हैं, पर हम में से अधिकांश को यह जानना चाहिए कि डाटा सुरक्षा और गोपनीयता वास्तव में एक बड़ा विषय है, जिसे हम सभी को महसूस करना चाहिए। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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Monday, January 11, 2021

गृहणियों के श्रम का अवमूल्यन, इनकी गिनती एक गैर-उत्पादक वर्ग में की जाती है (अमर उजाला)

ऋतु सारस्वत 

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा कि गृहणियों के लिए दुर्घटना के मामलों में मुआवजा तय करने के लिए न्यायालय को गृह कार्य की प्रकृति को ध्यान में रखना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि मुआवजे से संबंधित मामलों में गृहणियों की काल्पनिक आय तय करना समाज के लिए एक संकेत है कि कानून और अदालतें उनके श्रम, सेवाओं और बलिदानों को महत्व देती हैं।


देश में अधिकारिक तौर पर कराए जाने वाले अध्ययनों में आज भी गृहणियों की गिनती एक गैर-उत्पादक वर्ग में की जाती है और उनके काम को काम ही नहीं माना जाता। यूनिसेफ की 'लड़कियों के लिए आंकड़े एकत्र करना, समीक्षा करना और 2030 के बाद की दूरदृष्टि' नामक शीर्षक से जारी एक रिपोर्ट बताती है कि घरेलू कार्यों का बोझ लड़कियों पर बहुत कम आयु में ही बढ़ जाता है। पांच से नौ साल की आयु वर्ग की लड़कियां अपने ही उम्र के लड़कों के मुकाबले एक दिन में 30 प्रतिशत ज्यादा समय काम करती हैं।


एक राष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक, 60 प्रतिशत ग्रामीण और 64 प्रतिशत शहरी महिलाएं, जिनकी आयु 15 साल या उससे ज्यादा है, पूरी तरह से घरेलू कार्यों में लगी रहती हैं। 60 वर्ष से ज्यादा की आयु वाली एक चौथाई महिलाएं ऐसी हैं, जिनका सर्वाधिक समय इस उम्र में भी घरेलू कार्य में ही बीतता है। इनसे स्पष्ट है कि पितृसत्तात्मक समाज यह मानकर चलता हैं कि महिलाएं सिर्फ सेवा कार्य के लिए बनी हैं और यह सोच विश्व के हर कोने में व्याप्त है। महिलाओं के अवैतनिक घरेलू कार्य के साथ एक कठोर सच्चाई यह भी है कि आर्थिक गणना में ही नहीं, भावनात्मक रूप से भी उनके कार्यों को नगण्य माना जाता है और उन्हें निरंतर यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे घर में रहकर कुछ नहीं करतीं, जिसके चलते महिलाएं स्वयं भी मानने लगती हैं कि वे कुछ नहीं कर रहीं।


माउंटेन रिसर्च जनरल के एक अध्ययन के दौरान उत्तराखंड की महिलाओं ने कहा कि वे कोई काम नहीं करतीं, लेकिन विश्लेषण से पता चला कि परिवार के पुरुष औसतन नौ घंटे काम कर रहे थे, जबकि महिलाएं 16 घंटे। अगर उनके काम के लिए न्यूनतम भुगतान भी किया जाता, तो पुरुषों को 128 रुपये और महिलाओं को 228 रुपये प्रतिदिन मिलते। जनगणना में गैर-कमाऊ श्रेणी में गिनी जाने वाली घरेलू महिलाएं वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ भारत में ही दिन भर में 350 मिनट अवैतनिक घरेलू कार्यों में बिताती हैं, जिसके लिए उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता।


अक्तूबर, 2020 में आई एक रिपोर्ट यह खुलासा करती है कि भारतीय महिलाएं एक दिन में औसतन 243 मिनट अवैतनिक काम करती हैं, जबकि पुरुष मात्र 25 मिनट। कुछ देशों एवं संस्थानों ने घरेलू अवैतनिक कार्यों का मूल्यांकन करने के लिए कुछ विधियों का प्रयोग शुरू किया है। इन विधियों में से एक टाइम यूज सर्वे है। इस विधि से यह गणना की जाती है कि जितना समय महिला अवैतनिक घरेलू कार्यों को देती है, यदि उतना ही समय वह वैतनिक कार्यों के लिए देती, तो उसे कितना वेतन मिलता। कई देशों ने अवैतनिक कार्यों की गणना के लिए मार्केट रिप्लेसमेंट कॉस्ट थ्योरी का भी इस्तेमाल किया है। इस थ्योरी के जरिये यह जानने की कोशिश की जाती है कि जो कार्य अवैतनिक रूप से गृहिणी द्वारा घर पर किए जा रहे हैं, यदि उन सेवाओं को बाजार के माध्यम से उपलब्ध कराया जाएगा, तो कितनी लागत आएगी। वाशिंगटन स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वुमैन ने ग्वाटेमाला सेंट्रल अमेरिका में टाइम यूज सर्वे विधि का प्रयोग करते हुए निष्कर्ष निकाला कि लगभग 70 प्रतिशत कार्य वहां महिलाओं द्वारा अवैतनिक रूप से किए जाते हैं।


ये तमाम अध्ययन बताते हैं कि घरेलू महिलाओं के कार्यों का किस प्रकार अवमूल्यन हो रहा है। अब समय आ गया है कि उनके अवैतनिक घरेलू कार्यों की आर्थिक उत्पादन के रूप में गणना हो। हमारे देश में घरेलू स्त्री के कार्य के आर्थिक मूल्य को स्वीकार न करने की प्रवृत्ति देश को पीछे धकेल देगी। मेक कीन्स ग्लोबल इंस्टीट्यूट ने पाया है कि अवैतनिक घरेलू कार्यों की गणना अगर दैनिक न्यूनतम वेतन के मापदंड पर भी की जाए, तो यह भारत के सकल घरेलू उत्पादन में 39 प्रतिशत की बढ़ोतरी करेगी।

सौजन्य - अमर उजाला।

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एक साथ चुनाव कराने का समय, बड़ी मात्रा में खर्च कम करने में मददगार होगा (अमर उजाला)

वरुण गांधी, भाजपा नेता  

तमिलनाडु सरकार ने आगामी मई में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सरकारी और निजी स्कूलों के 3,00,000 से ज्यादा शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी में तैनात करने का आदेश जारी किया है। प्रशिक्षण, चुनावों के संचालन और नतीजों की घोषणा में लगने वाले समय को मिलाकर इस तरह के मतदान का काम आम तौर पर एक महीने से ज्यादा समय तक चल सकता है। दूसरी तरफ सरकार जल्दी ही स्कूलों को खोलने पर भी विचार कर रही है। लेकिन शिक्षकों की चुनाव में ड्यूटी लगाए जाने पर महामारी में लंबे समय तक बंद रहे स्कूल सत्र चलाने की कोशिश बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है। हो सकता है, स्कूल खोलना आगामी जून तक टल जाए। लगातार होने वाले चुनावों की समाज द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत हम पता नहीं क्यों, समझ नहीं पा रहे।

शायद एक साथ चुनाव कराने की दूरगामी सोच पर विचार करने का समय अब आ गया है, जिसकी वकालत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की है। भारत में चुनाव कराना हमेशा ही कठिन और भारी खर्च वाला काम रहा है। पहाड़ी और जंगली इलाकों में ईवीएम पहुंचाने के लिए हाथियों के इस्तेमाल से लेकर तमाम तैयारियों में प्रशासनिक सहभागिता और भारी खर्च की जरूरत पड़ती है। वर्ष 2014 में लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर लगभग 4,500 करोड़ रुपये का खर्च आया था। यह आंकड़ा 'संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की व्यावहारिकता' को लेकर कार्मिक, जन शिकायत, कानून और न्याय पर संसदीय स्थायी समिति की 2015 में आई 79 वीं रिपोर्ट का है।

दूसरे देश यह काम कुछ अलग तरह से करते हैं। स्वीडन में स्थानीय काउंटी काउंसिल और म्यूनिसिपल काउंसिल के चुनाव आम चुनाव के साथ सितंबर के दूसरे हफ्ते में रविवार को होते हैं। यह चुनाव स्थानीय नगरपालिका और राष्ट्रीय चुनाव प्राधिकरण द्वारा कराया जाता है। आमतौर पर मतदान किसी स्थानीय सरकारी भवन (जैसे कि स्कूल, सामुदायिक केंद्र) में होता है। इसी तरह दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाते हैं, जिसके करीब दो साल बाद नगरपालिका चुनाव कराए जाते हैं।


भारत में एक साथ चुनाव कराना कोई नया विचार नहीं है। वर्ष 1951-52 में पहले आम चुनाव में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही कराए गए थे; अगले तीन चुनाव इसी तरह हुए। फिर जब कुछ राज्य विधानसभाओं को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग कर दिया गया, तो पूरा समन्वित चक्र टूट गया। समय बीतने के साथ लोकसभा भी कार्यकाल पूरी करने से पहले भंग होने लगी। इसका नतीजा यह हुआ कि जल्द ही केंद्र और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होने खत्म हो गए। अब सभी दलों के नेता लगातार चुनाव अभियान की हालत में रहने को मजबूर हैं, और वे एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच दौड़ लगाते रहते हैं, जबकि केंद्र और राज्य की प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल तिमाही आधार पर जहां-तहां चुनाव कराने में किया जाता है। बार-बार इस तरह की ड्यूटी में लगाने से शिक्षकों के बर्बाद होने वाले कार्य-घंटों की गिनती का जरा अंदाजा लगाइए। इसी तरह सीआरपीएफ और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को नियमित रूप से चुनाव ड्यूटी पर लगाए जाने से आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर पड़ने वाले असर

पर विचार करें; इस तरह की तैनाती उनकी ट्रेनिंग और कानून-व्यवस्था की बहाली को प्रभावित कर सकती है।


जहां तक मुमकिन हो, एक साथ चुनाव कराना (अनुच्छेद 356 के जरूरी इस्तेमाल और उप-चुनावों को छोड़कर) बड़ी मात्रा में खर्च कम करने में मददगार होगा, साथ ही, आदर्श आचार संहिता लागू होने की अवधि को कम करेगा। इसका प्रभावी असर पड़ेगा, क्योंकि इस दौरान विकास कार्य थम जाते हैं और सरकारी काम-काज बाधित होता है; खास तौर से जब चुनाव कई चरणों में होते हैं। यह भी उम्मीद है कि तय समय पर एक साथ चुनाव होने से नीतिगत अनिर्णय और सरकार की व्यस्तता कम करने के साथ-साथ नीतिगत मामलों पर राजनीतिक रूप से ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी।


बेशक, इसके लिए बुनियादी ढांचा बनाने की चुनौतियां होंगी-ईवीएम का पहले से बड़ा स्टॉक तैयार करना होगा, साथ ही, वीवीपैट पेपर और चुनावी स्याही जुटानी होगी। लेकिन हम दूसरे देशों में अपनाए गए तरीकों पर भी विचार कर सकते हैं, जैसे कि पोस्टल मतपत्र, एक चुनाव में कई पदों के लिए एक ही फॉर्म। इसके अलावा यह सुनिश्चित करने के लिए सांविधानिक संशोधनों की जरूरत पड़ सकती है कि भविष्य में ऐसी एकरूपता में रुकावट न आए। अविश्वास प्रस्ताव द्वारा सरकार को अस्थिर करने से रोकने को संविधान संशोधन किया जा सकता है और अविश्वास प्रस्ताव पेश किए जाने के साथ सरकार बनाने के लिए विश्वास प्रस्ताव अनिवार्य किया जाना भी इसका समाधान हो सकता है। ऐसे कुछ सुझाव केंद्रीय विधि आयोग द्वारा चुनावी कानूनों में सुधार पर पेश 170वीं रिपोर्ट में दिए गए हैं।


हमें चुनावों की सरकारी फाइनेंसिंग और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग जैसे सुधारों पर भी विचार करना चाहिए, और यह सब करने में बेशक जनता की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। दलगत खेमेबंदी से परे कई राजनीतिक दलों ने वास्तव में ऐसे सुझावों का स्वागत किया है। पंचायतों, नगर निकायों और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करा हम एक शुरुआत तो कर ही सकते हैं। हमारे पूर्व औपनिवेशिक शासक ब्रिटेन द्वारा पेश उदाहरण पर विचार करें। उसने 2011  में ब्रिटिश संसद के कार्यकाल को ज्यादा स्थिरता और निश्चितता प्रदान करने पर जोर देते हुए फिक्स्ड-टर्म पार्लियामेंट कानून पारित किया। यह कानून सुनिश्चित करता है कि हर पांच साल में मई के पहले बृहस्पतिवार को संसद का चुनाव होगा, साथ ही संसद पर अपना कार्यकाल पांच साल से आगे बढ़ाने पर पाबंदी लगाई गई है।


समय पूर्व चुनाव की मंजूरी सिर्फ उसी हालत में मिलेगी, जब सदन के दो तिहाई सदस्य इसके लिए सहमत होते हैं या सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित किया जाता है। हम भी ऐसे किसी भी कदम के साथ कम से कम शुरुआत तो कर सकतेहैं। बेशक, बहुत से ऐसे लोग हैं, जो देश की अपनी चुनावी विविधता खो देने को लेकर चिंतित हैं-लेकिन शायद उन्हें यह फैसला परिपक्व भारतीय मतदाताओं पर छोड़ देना चाहिए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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महामारी, वैक्सीन और विवाद, पी चिदंबरम उठा रहे हैं कुछ ज्वलंत सवाल (अमर उजाला)

 पी चिदंबरम  

ऐसा लगता है कि महामारी खत्म होने के कगार पर है, लेकिन अभी यह खत्म नहीं हुई है। ऐसा लगता है कि वैक्सीन बस मिलने ही वाली है, लेकिन घरों तक यह अब भी नहीं पहुंची है। लेकिन एक चीज, जो लगातार कायम है वह है विवाद!


आठ जनवरी को जब मैं यह लेख लिख रहा हूं, आंकड़े भयावह ढंग से याद दिला रहे हैं कि कोविड-19 ने कैसी तबाही मचाई है। संक्रमित लोगों की संख्या है, 1,04,14,044 (अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर); मौतों की संख्या है, 1,50,606 (अमेरिका और ब्राजील के बाद तीसरे नंबर पर); और सक्रिय मामलों की संख्या है 2,22,416। हम 138 करोड़ की आबादी के साथ खुद को सौभाग्यशाली मान सकते हैं, लेकिन यह निश्चित रूप से महामारी को नियंत्रित और प्रबंधित करने का अच्छा उदाहरण तो कतई नहीं है।

दुनिया में अभी छह स्वीकृत वैक्सीन हैं। हमें रूसी और चीनी वैक्सीन के बारे में बहुत कम पता है, लेकिन उन देशों में इनका व्यापक रूप से वितरण हो रहा है और लोगों को ये लगाई जा रही हैं। जहां तक मेरी जानकारी है, किसी अन्य जाने-माने और स्थापित नियामक ने रूसी और चीनी वैक्सीन को मंजूरी नहीं दी है।

चार वैक्सीन, महान अवसर

पहली वैक्सीन है फाइजर की, जिसे अमेरिकी एफडीए (फूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) ने मंजूरी दी है, जिसे वैज्ञानिक दुनिया और चिकित्सा के पेशे में मानक माना जाता है। इस वैक्सीन की प्रतिरक्षाजनकता, सुरक्षा और क्षमता को परीक्षण के तीन अनिवार्य चरणों में परखा गया है। इसकी दो कमजोरियां हैं, एक तो इसे शून्य से 70 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रखना होगा और दूसरी है भारत में इसकी कीमत (अभी यह निर्धारित नहीं की गई है)। फाइजर ने भारत के दवा महानियंत्रक (डीसीजीआई) से आपात इस्तेमाल की मंजूरी (ईयूए) मांगी थी, लेकिन तीन अवसर मिलने के बावजूद विशेषज्ञ समिति के समक्ष वह अपना मामला पेश नहीं कर सकी। मुझे लगता है कि फाइजर भारत में अपनी वैक्सीन की मार्केटिंग और वितरण को लेकर उत्सुक नहीं है, क्योंकि उसने मान लिया है कि भारत में इसकी कीमत वहन करने लायक नहीं होगी और इसके भंडारण की शर्तें पूरी नहीं होंगी। चूंकि फाइजर की वैक्सीन को अनेक देशों और नियामकों ने मंजूरी दी है और दुनिया भर में इसकी काफी मांग है, फाइजर ने संभवतः भारत को अपनी प्राथमिकता में नीचे रखा है।


दूसरी है, ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन, जिसका निर्माण एक लाइसेंस के तहत सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (सीआईआई) में किया जा रहा है। हम गर्व कर सकते हैं कि एक भारतीय अनुसंधान एवं विनिर्माण कंपनी कोविशील्ड नामक वैक्सीन के परीक्षण, निर्माण और वितरण के लिए योग्य पाई गई है।


तीसरी है, मॉडर्ना। इसने भारत में मंजूरी के लिए आवेदन नहीं किया है।


अनावश्यक विवाद

चौथी है, बॉयोटेक की कोवाक्सिन। कंपनी ने संभवतः विदेशी शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों के काम और ज्ञान की मदद ली हो, मगर कोवाक्सिन सौ फीसदी भारतीय उत्पाद है। भारत के लिए यह गर्व का क्षण है। वैक्सीन की मंजूरी को अनावश्यक रूप से विवाद में घसीटा गया। डीसीजीआई और सरकार के प्रवक्ताओं (विशेष रूप से डॉ. वी के पॉल और डॉ. बलराम भार्गव) को स्पष्ट करना चाहिए था कि कोवाक्सिन के आपात इस्तेमाल की मंजूरी (ईयूए) अभी वितरण-सह-तीसरे चरण के नैदानिक परीक्षण के क्रम में है और इसके नतीजे, विशेष रूप से इसकी क्षमता से संबंधित नतीजा, इसके आगे के वितरण और इस्तेमाल का निर्धारण करेंगे। यह सच है कि प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, वाइरोलॉजिस्ट्स, माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट्स और डॉक्टरों ने तीसरे चरण के नैदानिक परीक्षण के जारी रहते इसे मंजूरी देने की तत्परता पर सवाल खड़े किए हैं। हताशा भरी परिस्थितियों में शायद ऐसे उपाय की जरूरत हो। भारत को बड़े पैमाने पर वैक्सीन की जरूरत है, जिसकी पूर्ति न तो एसआईआई की कोविशील्ड कर सकती है, और न ही निर्यात से राष्ट्रव्यापी मांग की शीघ्र पूर्ति की जा सकती है। ऐसे में समझदारी इसी में है कि एक संभावित दावेदार (जीवन रक्षक) को परीक्षण संबंधी प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और आपात स्थिति में इस्तेमाल के लिए एक वैक्सीन बैकअप के रूप में रखी जाए। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि हमें डीसीजीआई और सरकार के प्रति उदार होना चाहिए।


इस बात के कोई प्रमाण नहीं है कि कोवाक्सिन नुकसानदेह है। अब तक हुए परीक्षणों ने वैक्सीन को प्रतिरक्षाजनकता और सुरक्षा के लिहाज से उपयुक्त पाया है। इसकी क्षमता को लेकर कोई प्रतिकूल रिपोर्ट नहीं मिली है। हमें सामूहिक रूप से उम्मीद करनी चाहिए कि जनवरी के अंत तक कोवाक्सिन तीसरे चरण के नैदानिक परीक्षणों को पूरा कर लेगी और मार्च तक परिणामों का मूल्यांकन कर लिया जाएगा। इसके बाद हम दो वैक्सीन के साथ वितरण में तेजी ला सकते हैं-हम विकसित देशों को उचित मात्रा में निर्यात भी कर सकते हैं-और उन देशों में स्थान प्राप्त कर सकते हैं, जिन्होंने 12 महीनों के भीतर एक वैक्सीन पर शोध, खोज, निर्माण और वितरण की क्षमता हासिल कर ली।


मुझे संदेह है कि एसआईआई और बॉयोटेक के बीच कारोबार को लेकर कुछ तनातनी हुई है। खुशी की बात है कि अदार पूनावाला और कृष्णा इला ने कुछ दिनों के भीतर ही झगड़े को दफन कर दिया और सहयोग करने तथा साथ मिलकर काम करने का वादा किया। विशेष रूप से शोध तथा विकास से जुड़ी अग्रिम कंपनियों को सार्वजनिक हित और निजी मुनाफे के उचित समन्वय के साथ इसी तरह का व्यवहार करना चाहिए।


असली परीक्षा अब शुरू होगी

असली परीक्षा अब शुरू होगी। सरकार 138 करोड़ की आबादी का टीकाकरण कैसे करेगी? यहां कुछ सुझाव हैं :

प्राथमिकता को लेकर एक व्यवस्था होनी चाहिए और किसी भी परिस्थिति में इस व्यवस्था के उल्लंघन की इजाजत नहीं होनी चाहिए। सरकारी अस्पतालों और टीकाकरण केंद्रों में वैक्सीन मुफ्त लगाई जानी चाहिए। इस पर शुल्क लगाने से लोगों को गलत रास्ते पर चलने का प्रोत्साहन मिलेगा और अंततः यह भ्रष्टाचार की ओर ले जाएगा।

आपूर्ति बढ़ने के साथ ही निजी अस्पतालों को वितरण में साथ लेना चाहिए। यदि वे वैक्सीन खरीदना चाहें और उपभोक्ताओं से शुल्क लेना चाहें, तो सरकार को इसकी कीमत तय करनी चाहिए और ऐसे लोगों को वहां वैक्सीन लेने की इजाजत देनी चाहिए, जो इसका खर्च वहन कर सकते हैं।

जिस तरह से हमने भारत में निर्मित वैक्सीन के निर्यात की इजाजत दी है, उसी तरह से हमें स्वीकृत वैक्सीन के आयात की भी इजाजत देनी चाहिए। संरक्षणवाद विश्व व्यापार का एक खारिज किया जा चुका सिद्धांत है और जब दुनिया महामारी का सामना कर रही है, तो इसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

हमें अज्ञात परिणामों का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। हमें इसका समाधान तलाशने के लिए अपने वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं पर भरोसा करना चाहिए। अंततः जीत विज्ञान की होगी।

सौजन्य - अमर उजाला।

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बेगार आंदोलन के सौ साल, इस तरह खत्म हुई थी शोषण की कहानी (अमर उजाला)

शेखर पाठक  

सौ साल पहले उत्तराखंड (तत्कालीन ब्रिटिश कुमाऊं) में कुली-बेगार की अपमानजनक प्रथा के खिलाफ हुआ आंदोलन अपनी सफल पराकाष्ठा पर पहुंचा था। उस आंदोलन के साथ जंगलात के हकों को बहाल कराने वाला आंदोलन भी चला था। ये दोनों आंदोलन स्वतंत्र भी थे और साथ-साथ भी, क्योंकि इनकी जनता और नेता एक थे। बेगार के अंतर्गत जबरन मुफ्त श्रम और मुफ्त सामग्री प्राप्त करने की व्यवस्था थी। उतार के अंतर्गत मूल्य देय होता था, जो अधिकतर नहीं दिया जाता था। पटवारी और प्रधान इसके स्थानीय व्यवस्थापक थे, जो चुली-कुली (हर चूल्हे यानी परिवार से एक कुली) नियम के अनुसार हर परिवार से कुली मांगते थे। जमीनी बंदोबस्तों में मनमानी धाराएं डालकर बेगार को नियमबद्ध बना दिया गया था। जब पत्रों और काउंसिलों में बेगार की अति पर सवाल उठे, तो एक लाट ने यहां तक कहा था कि ‘कुमाऊं से बेगार उठाने की मांग करना गोया चांद मांगना हो।’


यह आंदोलन स्थानीय उद्यम, संगठन और मुहावरे के साथ सुव्यवस्थित प्रचार और प्रेस की शक्तिशाली भूमिका के कारण सफल हुआ। अल्मोड़ा अखबार, गढ़वाल समाचार, गढ़वाली, पुरुषार्थ, शक्ति जैसे पत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। शक्ति तो आजादी की लड़ाई का मुखपत्र ही बन गया। इसके अधिकांश संपादक जेल गए। वर्ष 2018 में शक्ति ने अपने सौ यशस्वी साल पूरे किए। इस आंदोलन में ग्रामीण असंतोष और प्रतिरोध कस्बाती जागृति और जिम्मेदारी से जुड़ सका। एक ओर इस आंदोलन ने बेगार की प्रथा को सदा के लिए समाप्त कर दिया, वहीं तीन हजार वर्गमील में फैले जंगलों में ग्रामीणों के हक वापस किए गए। जंगलात के बहुत से अन्य अधिकार बहाल हुए। इस आंदोलन में एक ओर कस्बाई पत्रकार, वकील, रिटायर्ड अधिकारी जुड़े थे, दूसरी ओर गांवों से शहर आया या गांवों में सक्रिय रहा वर्ग था। समाज के सरकार परस्त हिस्सों को आंदोलन ने झकझोर दिया था। जंगलों को राज्य अधिकार में लेने का सिलसिला तो 1860 के बाद ही शुरू हो गया था, जो 1878, 1893 और 1911 के बाद बढ़ता चला गया। जंगलों के बिना पहाड़ों में खेती, पशुपालन, कुटीर उद्योग, वैद्यकी, भवन निर्माण, सांस्कृतिक कार्यकलाप संभव नहीं थे।

इसी तरह तमाम सरकारी विभागों के विस्तार के साथ बेगार का दबाव और नौकरशाही की निर्ममता भी बढ़ी, जिस कारण पहले बेगार के खिलाफ व्यक्तिगत आक्रोश एक असंगठित विरोध में बदला। लेकिन बेगार और जंगलात की नीतियों की अति ने असंगठित विरोध को संगठित जनांदोलन में बदलने में योग दिया। इस तरह यह आंदोलन किसानों और कस्बाई प्रबुद्धों का साझा कार्यक्रम बन गया, जिसे 1916 में स्थापित ‘कुमाऊं परिषद’ के जरिये आगे बढ़ाया गया। अगले चार वर्षों में सुसंगठन का कार्य इतनी तैयारी से हुआ कि 1920 के ‘कुमाऊं परिषद’ के चौथे अधिवेशन में युवाओं का नेतृत्व उभर कर सामने आ गया। ग्रामीण आंदोलनकारियों की पुकार सुन वे कांग्रेस अधिवेशन से लौटकर बागेश्वर आए, जहां उत्तरायणी मेले में ग्रामीणों की बड़ी उपस्थिति होती थी। बागेश्वर के पास ही चामी गांव में एक जनवरी 1921 को बेगार के विरुद्ध बड़ी सभा हो चुकी थी। कस्बाती प्रबुद्धों के आने से प्रतिरोध और आगे बढ़ा और 12-14 जनवरी, 1921 को बागेश्वर में जनसभाओं, प्रदर्शनों के बाद न सिर्फ सरकार को चुनौती दी गई, बल्कि बेगार के रजिस्टर सरयू में बहा दिए गए। नतीजतन उसी साल सरकार को कुली-बेगार प्रथा बंद करनी पड़ी।    


प्रतिरोध की ऊर्जा जितनी स्थानीय स्तर पर जन्मी, उतनी ही सीधे राष्ट्रीय संग्राम से भी छनकर आ रही थी। कस्बों से विकसित बद्री दत्त पाण्डे, हरगोविन्द पंत, गोविन्द बल्लभ पंत, चिरंजीलाल या गांवों से विकसित अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, मोहनसिंह मेहता, लक्ष्मी दत्त शास्त्री, केशर सिंह रावत, मंगतराम खंतवाल, हरिकृष्ण पाण्डे, ईश्वरी दत्त ध्यानी, हयात सिंह, बद्रीदत्त वैष्णव, प्रेमसिंह गड़िया या विश्वविद्यालयों से लौटे भैरवदत्त धूलिया, बडोला बंधु और प्रयागदत्त पंत या प्रथम विश्वयुद्ध से लड़कर लौटे नौजवान या आम किसान सब एक स्वर और शक्ति में बोलने लगे थे। वर्ष 1878 में सोमेश्वर के ग्रामीणों द्वारा बेगार न देना और सामूहिक जुर्माना भुगतना और 1903 में खत्याड़ी के गोपिया और साथियों द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट जाकर बेगार को गैर कानूनी घोषित किए जाने का निर्णय लाना ग्रामीण प्रतिरोध के प्रतीक थे। 


इसीलिए 1929 में जब महात्मा गांधी कुमाऊं आए, तो वह बागेश्वर जाना नहीं भूले। यंग इण्डिया में उन्होंने कुमाऊं के बेगार और जंगलात आंदोलनों को ‘रक्तहीन क्रांति’ कहा तथा इसे जनता की संगठन क्षमता और सामूहिक शक्ति से जोड़ा। इन दो असाधारण आंदोलनों की शताब्दी के मौके पर उत्तराखंड की नई पीढ़ी को पिछले सौ साल के जनांदोलनों की विरासत पर सोचने और विश्लेषण करने का विवेक अर्जित करना चाहिए। यह भी कि औपनिवेशिक सत्ता रही हो या हमारी अपनी सरकारें, उत्तराखंड की जनता ने सड़क, डोला पालकी का हक, गढ़वाल कमिश्नरी, वनाधिकार, नशाबंदी, कुमाऊं तथा गढ़वाल विश्वविद्यालय, नए जिले आदि और अंततः अलग राज्य सिर्फ और सिर्फ जनांदोलनों से अर्जित किए, किसी राजनीतिक दल के उद्यम से नहीं। नए राज्य के दो दशक बहुत उम्मीद नहीं दिलाते। पर प्रतिकारों की राष्ट्रीय और स्थानीय विरासत तटस्थता और उदासी को नई ऊर्जा से युक्त कर सकती है।

 

सौजन्य - अमर उजाला।

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अमेरिका में हिंसा और दोहरे मापदंडों की मार (अमर उजाला)

बलबीर पुंज  

अमेरिका में छह जनवरी को जो कुछ हुआ, उससे शेष विश्व स्वाभाविक रूप से भौचक है। परंतु क्या यह सत्य नहीं है कि अमेरिकी सार्वजनिक जीवन में हिंसा का अतिक्रमण पहले ही हो चुका था? 25 मई, 2020 को एक श्वेत पुलिसकर्मी द्वारा अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की गर्दन दबाकर निर्मम हत्या के बाद भड़की हिंसा ने अमेरिका के 2,000 कस्बों-शहरों को अपने कब्जे में ले लिया था। भीषण लूटपाट के साथ करोड़ों-अरबों की निजी-सार्वजनिक संपत्ति को फूंक दिया गया था। हिंसा में 19 लोग मारे गए थे, जबकि 14 हजार लोगों की गिरफ्तारियां हुई थी। इस हिंसा का नेतृत्व वामपंथी अश्वेत संगठन- एंटिफा कर रहा था। तब कई वाम-वैचारिक अमेरिकी राजनेताओं और पत्रकारों ने इस अराजकता को न केवल उचित ठहराया, अपितु इसे प्रोत्साहन भी दिया।


एंटिफा प्रायोजित अराजकता पर सीएनएन के प्रख्यात टीवी एंकर क्रिस कूमो ने कहा था, 'किसने कहा है कि प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्ण रहना चाहिए?' वहीं भारतीय मूल की अमेरिकी सांसद और कश्मीर मामले में पाकिस्तान हितैषी प्रमिला जयपाल ने एक ट्वीट में अश्वेतों के हिंसक प्रदर्शन को देशभक्ति की संज्ञा दी। सबसे बढ़कर अमेरिका की भावी उप-राष्ट्रपति और भारतीय मूल की कमला हैरिस ने एंटिफा प्रोत्साहित हिंसा का समर्थन करते हुए कहा था, 'अब यह रुकने वाला नहीं है।'



सच तो यह है कि पराजित ट्रंप के समर्थकों द्वारा कैपिटल हिल पर हमला अमेरिकी इतिहास में पहली बार नहीं हुआ है। 24 अगस्त, 1814 को अमेरिका-इंग्लैंड युद्ध और 16 अगस्त, 1841 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति  जॉन टायलर द्वारा अमेरिकी बैंक की पुनर्स्थापना संबंधी निर्णय के समय भी कैपिटल हिल पर बेकाबू भीड़ ने हमला किया था।


अमेरिकी संसद पर भीड़ द्वारा हालिया हमले की पृष्ठभूमि में यदि भारतीय संदर्भ देखें, तो यहां भी स्थिति लगभग एक जैसी ही है। भारत का एक वर्ग-मुखर होकर पराजित ट्रंप समर्थित भीड़ द्वारा अमेरिकी संसद पर हमले को लोकतांत्रिक पवित्रता पर आघात की संज्ञा तो दे रहा है, किंतु पिछले छह वर्षों से भारतीय लोकतंत्र के प्रतीक संसद द्वारा पारित कानूनों के संदर्भ में देश में हिंसा को भड़काने के लिए 'एंटिफा मॉडल' को दोहराना चाहता है। हिंसा, नाकेबंदी और दिल्ली की सीमा को जबरन बंद रखने को खुला प्रोत्साहन देकर करोड़ों लोगों के सांविधानिक अधिकारों को कुचलना- इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। क्या यह सत्य नहीं कि भाजपा को प्रचंड जनादेश उसके घोषणापत्र पर भी मिला है?


अब तक उसने जितने भी निर्णय लिए हैं और नीतियां-कानून बनाए हैं, वह सब नए नहीं ,बल्कि उसके घोषित वादों के अनुरूप ही हैं। इसी बीच, किसान आंदोलन में शामिल प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग का नेतृत्व कर रहे भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने धमकी दी है कि यदि सरकार ने उनकी बात नहीं मानी, तो 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर किसान-मजदूर कब्जा करेंगे। इस वृत्ति को स्पष्टतः मोदी विरोधी विपक्षी दलों और स्वघोषित सेकुलरिस्टों-उदारवादियों का भी प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन प्राप्त है। क्या राजपथ को कब्जाने की घुड़की कुछ अलग कही जा सकती है?


विरोधाभास देखिए कि भारत में जिस राजनीतिक कुनबे के लिए अमेरिकी संसद पर हमला और बाइडन के निर्वाचन को अस्वीकार करना अलोकतांत्रिक है, उसके लिए 2014 से लगातार दो बार लोकतांत्रिक बहुमत पाकर निर्वाचित सरकार द्वारा संसद में पारित कानूनों को भीड़तंत्र से रोकना, आतंकवादियों-अलगाववादियों को घूमने की स्वतंत्रता देना, हत्या के पड़यंत्र रचना, कश्मीर से पांच लाख हिंदुओं का पलायन और भारतीय हितों का खुला विरोध- लोकतांत्रिक है।


कटु सत्य तो यह है कि अमेरिका में ट्रंप समर्थकों ने उसी रुग्ण युक्ति को अपनाया है, जिसका उपयोग एक खास गठबंधन वर्ष 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विकृत तथ्यों और झूठे विमर्श के आधार पर सत्ता से हटाने हेतु करता रहा है, ताकि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक जनादेश को हाईजैक किया जा सके। वास्तव में, इस कुनबे का विमर्श है कि यदि किसी ने उनके विचारों से असहमति रखने का दुस्साहस किया, तो वह स्वाभाविक रूप से उनका न केवल विरोधी होगा, अपितु शत्रु भी होगा। यह तो एक राजनीतिक एजेंडे की सुविधा से लोकतंत्र को परिभाषित करना है।


कैपिटल हिल पर पराजित ट्रंप समर्थकों के हमले को लेकर अमेरिका के भावी राष्ट्रपति बाइडन ने एक महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया है। उनके अनुसार, 'हमने जो कुछ देखा, वह असहमति या असंतोष नहीं था। यह कोई अव्यवस्था नहीं थी। वह विरोध भी नहीं था। यह अराजकता थी। वे प्रदर्शनकारी नहीं थे। उन्हें प्रदर्शनकारी कहने की हिम्मत मत करना। वह दंगाई भीड़ थी। विद्रोही और घरेलू आतंकवादी थे।' इस बयान की पृष्ठभूमि में भारत में होने वाले हिंसक प्रदर्शनों को अब किस श्रेणी में रखा जाएगा? सच तो यह है कि कश्मीर में सेना पर पथराव को सही ठहराने से लेकर हिंसक प्रदर्शनों और आंदोलन के नाम पर जीवन अवरुद्ध कर देने या गणतंत्र दिवस पर राजपथ को कब्जाने की धमकी को प्रोत्साहन देने जैसी बातों को सही ठहराना और कैपिटल हिल पर हमले की आलोचना का अधिकार जताना, एक ही सांस में दो विपरीत पैमानों का उपयोग करना है।


निःसंदेह, अमेरिकी संसद पर बौखलाई भीड़ का हमला निंदनीय और अस्वीकार्य है, क्योंकि सभ्य समाज में हिंसा और बलप्रयोग का कोई स्थान नहीं। यह लोकतंत्र पर भयंकर चोट है। क्या इस संदर्भ में हम दोहरे मापदंडों को स्वीकार करने का खतरा मोल सकते है?


( - पूर्व राज्यसभा सांसद और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष) 

सौजन्य - अमर उजाला।

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Saturday, January 9, 2021

बंगाल में दीदी के लिए अस्तित्व की लड़ाई, पांच साल पहले किसने ऐसा सोचा था (अमर उजाला)

नीरजा चौधरी 


पांच साल पहले किसने कल्पना की होगी कि ममता बनर्जी को वर्ष 2021 में अपने अस्तित्व के लिए जूझना होगा? पश्चिम बंगाल का यह इतिहास है कि सत्ता में रहने वाली पार्टियां तीन दशकों तक सत्ता में रहती हैं। किसने सोचा होगा कि ममता पर हमला वामपंथियों की ओर से नहीं, बल्कि भाजपा की तरफ से होगा, जो दो दशकों से इस पूर्वी राज्य में पांव जमाने की कोशिश कर रही है? या कि वामपंथी दल और कांग्रेस, जो पांच दशकों से एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं, अपना अस्तित्व बचाने के लिए एक-दूसरे से हाथ मिलाएंगे?


और किसने कल्पना की होगी कि असदुद्दीन ओवैसी की छोटी-सी क्षेत्रीय पार्टी एआईएमआईएम कांग्रेस को मुसलमानों, खासकर युवा मुसलमानों को लुभाने के मामले में मात देगी, जो सोचते हैं कि जब सभी दलों ने उन्हें छोड़ दिया है, तो कम से कम वह तो उनके अधिकारों के लिए बोल रही है! बिहार के सीमांचल क्षेत्र में विधानसभा की पांच सीटें जीतकर और भाजपा द्वारा उन पर जबर्दस्त निशाना साधने के बावजूद हैदराबाद नगरपालिका के चुनावों में अपनी पकड़ बनाए रखने के साथ अब वह पश्चिम बंगाल की लड़ाई के लिए तैयार है। या इस बारे में किसने सोचा होगा कि भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना परोक्ष रूप से ममता के लिए बल्लेबाजी करेगी, जिसने भाजपा की तरफ जाने वाले हिंदू वोटों की कटौती की उम्मीद में पश्चिम बंगाल में अपने प्रत्याशी उतारने का फैसला किया है। पश्चिम बंगाल में, जहां तीन महीने बाद चुनाव होने हैं, नए गठजोड़ और जमीनी स्तर पर बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। राज्य में बढ़ती हिंसा की घटनाएं भी बताती हैं कि पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ जान-बूझकर गुंडागर्दी कर रही हैं। और इस लड़ाई में कुछ भी हो सकता है। लेकिन एक बात तय है कि मुख्य लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच होने वाली है। वामपंथी दल और कांग्रेस की स्थिति खराब हो सकती है।

पश्चिम बंगाल में 27 से 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जिस पर तृणमूल, वाम दल, कांग्रेस और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम दावा जताने जा रही हैं। राज्य आज हिंदू-मुस्लिम लाइन पर ध्रुवीकरण के लिए अति संवेदनशील है, जो इन दिनों हो रहा है। उतने ही यकीन के साथ यह भी कहा जा सकता है कि भाजपा राज्य में प्रबल ताकत है और ममता बनर्जी बैकफुट पर हैं। भाजपा, जिसने 2016 के विधानसभा चुनाव में 294 में से मात्र तीन सीटें जीती थीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में 42 में से 18 सीटें जीतने में सफल रही। यानी 125 विधानसभा क्षेत्रों में उसे बढ़त है और उसका वोट शेयर 40 फीसदी है। ममता की तृणमूल ने 22 लोकसभा सीटें जीती और उसे 44 फीसदी वोट मिले। इसलिए लोकप्रिय वोट में चार-फीसदी की बढ़त भाजपा के लिए निर्णायक होना चाहिए।


भाजपा के विरोधी दलील देते हैं कि मोदी के मुख्य प्रचारक होने पर राष्ट्रीय चुनाव में 40 फीसदी वोट पाना आसान है, लेकिन राज्य के चुनाव में स्थिति बदल सकती है। क्या भाजपा विधानसभा चुनाव में अपने 40 फीसदी वोट को बरकरार रख पाएगी, जब स्थानीय मुद्दों पर चुनाव होंगे? तृणमूल के पास ममता दीदी का चेहरा होने का भी फायदा है, लेकिन भाजपा के पास राज्य में कोई जाना-माना चेहरा नहीं है। यह तर्क भी दिया जाता है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद जिन राज्यों में चुनाव हुए थे, वहां 2019 के नतीजों को दोहराया नहीं गया, चाहे वह हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र, दिल्ली या बिहार हो। 


लेकिन भाजपा तुरंत यह तर्क देती है, दिल्ली को छोड़कर (जहां अरविंद केजरीवाल फिर से चुने गए) उनकी पार्टी अन्य राज्यों में सत्ता में होने के कारण सत्ता-विरोधी रुझानों से जूझ रही थी। लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है। वहां ममता बनर्जी को सत्ता विरोधी रुझान से जूझना है। और भाजपा ने उनके भ्रष्टाचार (नारद, शारदा, अवैध कोयला खनन), बिगड़ती कानून-व्यवस्था, कोविड संकट से निपटने के तरीके, और अल्पसंख्यकों के 'तुष्टिकरण' के खिलाफ हमला किया है। इसके अलावा भाजपा के पास एक विशाल और कुशल चुनावी मशीनरी है, जिसे उसने पूर्वी राज्य में काम पर लगा दिया है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, हर जगह तृणमूल विधायकों को अपने पक्ष में करना, खासकर उन्हें, जिनकी ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी पकड़ है। वह उन्हें सावधानी के साथ चुन रही है और दबाव का इस्तेमाल करते हुए उनकी नाराजगी से खेल रही है, यानी उन्हें अपने पाले में लाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना रही है। 2017 में उसने ममता बनर्जी के करीबी मुकुल राय को अपने पक्ष में मिलाया था। वर्ष 2020 में शुभेंदु अधिकारी और उनके भाई भाजपा में शामिल हुए। आने वाले दिनों में तृणमूल से निकलने वालों की संख्या बढ़ सकती है। हाल के दिनों में कई मंत्रियों ने कैबिनेट बैठकों में भाग नहीं लिया है, जो ममता के लिए एक अशुभ संकेत है।


इसके अलावा राज्य में दक्षिणपंथी रुझान बढ़ रहा है, जिससे भाजपा को फायदा हो रहा है। मार्क्सवादियों से बढ़त पाने के लिए ममता ने दो दशक तक उनके खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी और 'मा, माटी, मानुष' का नारा दिया। आज ममता लोकलुभावन घोषणाएं कर नुकसान को रोकने की कोशिश कर रही हैं-महंगाई भत्ते में तीन फीसदी की बढ़ोतरी, स्कूलों और मदरसों, दोनों में उच्चतर माध्यमिक छात्रों को मुफ्त टैबलेट, कोविड के लिए आरटी-पीसीआर जांच की लागत को कम करना। तृणमूल ने चुनावी लड़ाई को 'बंगाली बनाम बाहरी' की लड़ाई बनाना चाहा। लेकिन अब तक ममता का उप-राष्ट्रवाद का आह्वान, या माटी के लाल या बंगाली गौरव की अपील काम नहीं कर पाई है। 


पश्चिम बंगाल लंबे समय से भाजपा के निशाने पर है और उसके नेतृत्व ने राज्य में भारी ऊर्जा खपाई है। उनके लिए पश्चिम बंगाल केवल पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों का द्वार नहीं है और न ही महज एक राज्य पर कब्जा करने का मामला है, जो कि पूरे भारत में भाजपा का वर्चस्व स्थापित करने में उसकी मदद करेगा। निस्संदेह ये महत्वपूर्ण विचार हैं। लेकिन प. बंगाल जीतना एक अन्य कारण से महत्वपूर्ण हो सकता है-ममता बनर्जी नामक साहसी और दृढ़ निश्चयी नेता पर बढ़त पाना, जिसने विपक्ष के किसी अन्य नेता की तुलना में भाजपा को जमीनी स्तर पर ज्यादा कड़ी टक्कर दी है। बहरहाल प. बंगाल का खेल अभी खुला है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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देश की अर्थव्यवस्था धराशायी, लेकिन ऊपर क्यों उठ रहा है शेयर बाजार (अमर उजाला)

मधुरेंद्र सिन्हा  

यह तथ्य पहेली से कम नहीं कि एक ओर देश की अर्थव्यवस्था धराशायी है, दूसरी तरफ शेयर बाजार आसमान छू रहा है और चुनींदा लोग बैठे-बैठे मोटी कमाई कर रहे हैं। पिछले साल जब हमारी जीडीपी 24 फीसदी नीचे चली गई थी, तब भी शेयर बाजार लहलहा रहा था और निवेशक ही नहीं, सटोरिये भी बड़े पैमाने पर पैसे लगा रहे थे। इस साल भी शेयर बाजार की छलांग जारी है, जबकि महामारी अभी खत्म नहीं हुई है और सिर्फ वैक्सीन की घोषणा हुई है। पर सच यह है कि शेयर बाजार का अपना गणित है और यह दुनिया भर में हो रही हलचल से अक्सर तटस्थ रहता है। 

महामंदी के समय में भी जब अर्थव्यवस्था डूब गई थी, तो शेयर बाजार में तेजी आई थी। इस महामारी के काल में भी दुनिया के बड़े शेयर बाजारों में तेजी आ रही है। भारतीय शेयर बाजार में रिकॉर्ड तेजी आई और यह 48,000 को पार कर 50,000 की ओर जाता दिख रहा है, जबकि जीडीपी अब भी नकारात्मक है। इसका मतलब यह बात सच नहीं है कि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था का आईना है। इसके बजाय यह पैसा लगाने और कमाने का एक बढ़िया प्लेटफॉर्म है। धनी निवेशकों को इसने पैसे कमाने का एक विकल्प दिया है। अमेरिका की जीडीपी में 4.8 प्रतिशत से भी ज्यादा की गिरावट आई, पर मध्य मार्च से मध्य जून तक धनवानों की संपत्ति में 584 अरब डॉलर का इजाफा हो गया था।

अपने यहां नए साल के पहले ही दिन शेयर बाजार में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। और जब सरकार ने एक साथ दो-दो टीके को अनुमति देने की घोषणा की, तो इसमें जैसे आग ही लग गई। हालांकि विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2021 में दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं -5.2 प्रतिशत की दर से बढ़ेंगी। भारत की अर्थव्यवस्था में 3.2 प्रतिशत का संकुचन होगा। कई सारी कंपनियों के शुरुआती परिणाम बता रहे हैं कि वे घाटे में चले गए। इसके बावजूद शेयर बाजार में तेजी का दौर जारी है। इस मामले में भारतीय शेयर बाजार अमेरिका का ही अनुसरण कर रहे हैं। पैसा जब आसानी से मिल जाता है, तो लोगों की जोखिम उठाने की क्षमता और इच्छा, दोनों बढ़ जाती हैं। 

शेयर बाजार ने उन्हें इसका भरपूर मौका दिया। यही कारण था कि भारत में न केवल विदेशी, बल्कि खुदरा निवेशकों ने शेयर बाजार में पैसे लगाए। बैंकों में तरलता की कमी नहीं है, रिजर्व बैंक ने ब्याज दर लगातार घटाई और इससे लगभग आठ लाख करोड़ रुपये की तरलता बाजार में आई। ऐसे में, लोग घर बैठे पैसे कमाने वालों को शेयर बाजार ने निराश नहीं किया। वर्ष 2020 की आखिरी ट्रेडिंग के दिन पर बीएसई सेंसेक्स 47,751 और निफ्टी 50,13,981 पर बंद हुआ। यानी पिछले कैलेंडर वर्ष में शेयर बाजार में 15 प्रतिशत से भी ज्यादा की वृद्धि हुई। विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में काफी पैसा लगा रहे हैं, क्योंकि उन्हें यहां से कमाई की काफी उम्मीद है। जब तक यहां कमाई की आस है, तब तक वे यहां पैसे लगाते रहेंगे।

दूसरी बात जो शेयर बाजार को आगे ले जा रही है, वह है दुनिया भर के बड़े शेयर बाजारों में आई तेजी। भारतीय शेयर बाजार परोक्ष रूप से अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजार से जुड़े हुए हैं और उसके ट्रेंड का अनुकरण करते हैं। बहुत-सी भारतीय कंपनियों में विदेशी कंपनियों ने पैसा लगा रखा है और वे यहां निवेश करते रहते हैं। कई भारतीय कंपनियों ने यूरोप-अमेरिका में ऑफिस खोल रखे हैं और इस कारण विदेशी निवेशक उनकी ओर आकर्षित होते हैं। कई कंपनियों में विदेशी कंपनियां साझीदार भी हैं। फिर अमेरिका-यूरोप में सरकार ने अरबों डॉलर के पैकेज दिए हैं, जिससे बाजार में पैसा आया है।

भारत सरकार और रिजर्व बैंक ने महामारी काल में अब तक 30 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की है। हालांकि ज्यादातर पैकेज कर्ज के रूप में हैं, फिर भी वे विश्वास पैदा करते हैं कि सरकार अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश में है। इनका असर दिख रहा है और आने वाले समय में बजट एक बड़ा संबल साबित होगा। ऐसा समझा जा रहा है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आगामी बजट में उदार घोषणाएं करेंगी, जिनसे अर्थव्यवस्था को दलदल से निकालने में सहारा मिलेगा। अगर सरकार पर्याप्त प्रोत्साहन पैकेज लाती है, तो कोई वजह नहीं कि शेयर बाजार फिर से छलांग लगाए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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