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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Friday, January 8, 2021

अमेरिकी इतिहास का काला अध्याय, ट्रंप के तेवरों से ही लग गया था अंदाजा (अमर उजाला)

ब्रेट स्टीफेंस 

जब यह शुरू हुआ, तो इसे समझना मुश्किल नहीं था कि इसका अंत ठीक इसी तरह होगा। डोनाल्ड ट्रंप जानबूझ कर आग लगाने वाले व्यक्ति हैं, जिन्होंने अमेरिका के सांविधानिक गणतंत्र में आग लगा दी है। एक बार जो बाइडन के चुनाव को प्रमाणित करने के बाद हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट का कर्तव्य है कि जितनी जल्दी संभव हो सके राष्ट्रपति ट्रंप को महाभियोग लगाकर पद से हटाए और उन्हें फिर से पद धारण करने से रोके। ट्रंप को अपना कार्यकाल पूरा करने की अनुमति देना (हालांकि यह संक्षिप्त हो सकता है) राष्ट्र की सुरक्षा को खतरे में डालना है। एक लोकतंत्र के रूप में यह हमारी प्रतिष्ठा का हनन करता है और एक अकाट्य सत्य से बचना है कि कांग्रेस (अमेरिकी संसद) पर हमला हिंसक देशद्रोह का प्रयास था, जिसे एक कानून की अवमानना करने वाले अनैतिक और भयानक राष्ट्रपति का सहयोग प्राप्त था।


वर्ष 2015 में जिस समय से ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के अग्रणी उम्मीदवार बने, तभी से यह स्पष्ट था कि वह कौन हैं और अगर उन्हें मौका मिला, तो वह अमेरिका को कहां ले जाएंगे। वह एक घातक आत्मप्रशंसक व्यक्ति थे। वह व्यवसाय में धोखेबाज, रिश्ते में धमकाने वाले और राजनीति में दुर्जनों के नेता हैं। उनके पास विचार नहीं थे, उनके पास कट्टरता थी। उनमें गठबंधन की भावना नहीं थी, उनके पास भीड़ थी। उनके पास चरित्र नहीं था। उनके पास बेशर्म आत्मविश्वास था, जिसके कारण उन्होंने अपने अनुयायियों को भी बेशर्म होने की अनुमति दी। यह सब कुछ स्पष्ट था, लेकिन उन्हें रोकने के लिए पर्याप्त नहीं था। 2015 में अमेरिका में कई समस्याएं थीं, जिनमें से कई की बहुत लंबे समय से अनदेखी की जा रही थी और जिसका लोकलुभावन नारों से दोहन किया जा सकता था। लेकिन उस वर्ष की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि एक प्रमुख पार्टी ने एक ठग के सामने हथियार डाल दिया। और उसके बाद के हर वर्ष की सबसे बड़ी समस्या यह रही कि उस पार्टी ने ज्यादा से ज्यादा बहाने बनाए, राष्ट्रपति की गड़बड़ियों को नजरंदाज किया, उन्हें माफ किया, मिलीभगत की और अपनी ठगी का जश्न मनाया। 



अमेरिका के चापलूस विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के बारे में सोचिए, जिन्होंने मार्च, 2016 में चेतावनी दी थी कि ट्रंप निरंकुश राष्ट्रपति होंगे, जिन्होंने हमारे संविधान की अनदेखी की और नवंबर में चुनाव के बाद जिन्होंने दूसरे ट्रंप प्रशासन की निर्विघ्न शुरुआत का वादा किया था। रिपब्लिकन पार्टी अब नैतिक दुर्दशा के कगार पर है। मैं यह किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में कह रहा हूं, जिसने 2016 तक हमेशा रिपब्लिकन पार्टी को वोट दिया और जिसे इस हफ्ते तक उम्मीद थी कि केंद्र में बाइडन प्रशासन को झुकाने के लिए सीनेट में रिपबल्किन का वर्चस्व रहेगा। मैं इसे ऐसे लोगों की पार्टी भी कहता हूं, जिन्होंने सामान्य तौर पर पिछले पांच वर्षों में अपने सिद्धांतों को संरक्षित रखा, अपना सम्मान बनाए रखा और शांत बने रहे, न कि ब्रैड रैफन्सपर्गर, मिट रोमनी, डेनवर रिगलमैन, लैरी होगन, बेन सैस (निराशाजनक रूप से यह सूची छोटी है) जैसे साहसी रिपब्लिकन की पार्टी। 


लेकिन पार्टी के प्रमुख सदस्य और दक्षिणपंथी मीडिया में उनके चीयर्सलीडर वैसा माहौल बनाने से उस हद तक दूर नहीं थे, जिसमें संसद भवन (कैपिटल) में हिंसक घटनाएं हुईं। रूडी गियुलियानी से लेकर मार्क लेविन जैसे कानूनी सलाहकारों ने चुनावी धांधली के बारे में जानबूझकर दुर्भावनापूर्ण दावों को बढ़ावा दिया है। ये सभी कथित शांत चित्त कंजर्वेटिव गलत कार्यों में संलिप्त थे, जिन्होंने राष्ट्रपति को अपने कानूनी विकल्पों को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। (हालांकि वे अच्छी तरह से जानते थे कि यह बकवास है, लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि वे वोट की वैधता के बारे में संदेहों का समाधान करेंगे।) टेक्सास के चुनाव को पलटने के लिए दायर मुकदमे के समर्थन में 126 रिपब्लिकन सांसदों ने निरर्थक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने एक ही पैराग्राफ में खारिज कर दिया। टेड क्रूज, जिन्हें मैंने कभी वैसलिन में लिपटा सांप कहा था, वह उससे भी बुरे निकले।  


माइक पेंस ने सांविधानिक सत्य के सामने आने तक ट्रंप की कोरी कल्पनाओं का साथ दिया। इनमें से कुछ पाखंडी अब सावधानीपूर्वक ट्वीट करके बुधवार की हिंसा से खुद को अलग बता रहे हैं। लेकिन क्रूज, हॉले, पेंस और निराशाजनक आचरण करने वाले अन्य लोगों ने भीड़ की तुलना में कांग्रेस को कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। टूटे दरवाजे ठीक किए जा सकते हैं, टूटी पार्टियां नहीं। इन सबसे ऊपर राष्ट्रपति हैं, जो बेशक इसमें शामिल नहीं थे, लेकिन वह पूरी तरह से, निर्विवाद और अक्षम्य रूप से इसके लिए जिम्मेदार हैं। पांच वर्षों तक रिपब्लिकन ने उन्हें अपने व्यवहार से राजनीतिक संस्कृति का स्तर गिराने दिया। पांच वर्षों तक उन्होंने उन्हें लोकतांत्रिक मानदंडों और संस्थानों के खिलाफ युद्ध करने दिया। पांच वर्षों तक उन्होंने उनके निर्बाध झूठ को उनकी चारित्रिक विशेषता बताया, न कि पद के लिए उनकी अयोग्यता। पांच वर्षों तक उन लोगों ने उनकी रैलियों को लोकतंत्र के कार्निवाल की तरह देखा, न कि भीड़तंत्र के शासन के प्रशिक्षण के रूप में। पांच वर्षों तक उन्हें लगा कि यह सब सामान्य बात है। लेकिन बुधवार को उनके बुरे कर्मों का बुरा नतीजा सामने आ गया।


प्रत्येक सभ्य समाज अपने अस्तित्व के लिए आहत होने की अपनी क्षमता पर निर्भर होता है और वास्तव में चौंकाने वाला व्यवहार करके स्तब्ध रह जाता है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति के अपने पूरे कार्यकाल में इस विचार की हत्या की है। अब इसके लिए केवल एक ही नुस्खा है। राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाकर उन्हें पद से हटाया जाए। उन्हें अब हमेशा के लिए राष्ट्रपति बनने से प्रतिबंधित कर दिया जाए। हर अमेरिकी को यह पता होना चाहिए कि ट्रंप के युग में कुछ ऐसी चीजें हुई हैं, जिन्हें टिके रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती, खुद ट्रंप को भी।

सौजन्य - अमर उजाला।

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भविष्य की जरूरत है नया संसद भवन, अवधेश कुमार बता रहे हैं वजह (अमर उजाला)

अवधेश कुमार

उच्चतम न्यायालय ने नए संसद भवन सहित सेंट्रल विस्टा परियोजना से संबंधित अपने फैसले में माना है कि इसके निर्माण प्रारूप में किसी तरह के नियमों का उल्लंघन नहीं है। विरोधी कह सकते हैं कि तीन सदस्यीय पीठ में से एक न्यायाधीश ने अलग मत प्रकट किया है। बेशक, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी से न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने थोड़ा अलग मत प्रकट किया, पर वह पूरी तरह अलग नहीं थे। उन्होंने कहा है कि भूमि उपयोग पर बदलाव के फैसले से असहमत हूं, विरासत समिति की पूर्व स्वीकृति होनी चाहिए थी। बहरहाल, अब फैसले के बाद नए संसद भवन के निर्माण की सारी बाधाएं खत्म हो गईं हैं और उम्मीद करनी चाहिए कि यह नियत समय में पूरा हो जाएगा। हां, न्यायालय के आदेश के अनुरूप निर्माण स्थल पर एंटी स्मॉग टावर-गन लगाना होगा। 


हमारे देश के चरित्र को देखते हुए यह मान लेना भूल होगी कि इसके बाद विरोध और उपहास बंद हो जाएगा। मूल प्रश्न तो यही है कि नए संसद भवन के निर्माण सहित पूरी विस्टा परियोजना की जरूरत है या नहीं? सच यह है कि लंबे समय से संसद भवन ही नहीं, प्रधानमंत्री आवास एवं कार्यालय, सचिवालय, और आसपास के अन्य सरकारी कार्यालयों, भवनों तथा अन्य निर्मित स्थलों, केंद्र सरकार के अन्य कार्यालयों को भविष्य का ध्यान रखते हुए परिवर्तित और आवश्यकतानुसार पुनर्निर्माण या नए सिरे से निर्माण की बात की जा रही थी। इसमें दो राय नहीं कि वर्तमान संसद भवन निर्माण का एक बेजोड़ नमूना है। किंतु यह जब बना था, तब आज की तरह आबादी विस्तार, आवश्यकताएं, सरकार और संसद के कामकाज में जुड़े व्यापक आयामों, संसद में लोगों की संख्या... आदि का शायद अनुमान नहीं था। बीच-बीच में थोड़े परिवर्तन और निर्माण आदि होते रहे, पर संसद भवन को जिस तरह की मरम्मत और व्यापक बदलावों की जरूरत है, वह नहीं हो पा रहा था। यह संभव भी नहीं था। यही नहीं, दोनों सदनों में बैठने की क्षमता अधिकतम स्तर पर पहुंच चुकी है। मंत्रालयों के कार्यालय भी अलग-अलग जगहों पर हैं। 


इससे सुरक्षा व्यवस्था सहित अनेक समस्याएं आ रही हैं। अगर निर्माण होना ही है, तो बिना योजना के करने की जगह, समूचे लुटियन जोन का एक साथ योजना बनाकर संपूर्ण रूप से किया जाए। इसके लिए आजादी की 75 वीं वर्षगांठ यानी 2022 तक पूरा करने से बेहतर अवसर नहीं हो सकता है। नए संसद भवन का निर्माण तब तक पूरा होने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि शेष कार्य 2024 तक पूरा होने का अनुमान है। जैसा कि हम जानते हैं 1911 में ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस के डिजाइन पर निर्माण के बाद नई दिल्ली का नया स्वरूप अस्तित्व में आया। 1921-27 के बीच संसद भवन बना। उस समय के इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक के तीन किलोमीटर लंबे राजपथ के आसपास के इलाके को ‘सेंट्रल विस्टा नाम दिया गया। 


मौजूदा संसद भवन से सटी त्रिकोणीय आकार की नए संसद भवन की पूरी योजना देखने से आभास होता है कि इसके पीछे गहरा व दूरदर्शी चिंतन तथा परिश्रम है। योजनानुसार नए संसद भवन को कार्य दक्षता सहित अगले सौ वर्ष की हर संभाव आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए बनाया जाएगा। अभी लोकसभा में 590 लोगों के बैठने की व्यवस्था है। नई लोकसभा में 888 सीटें होंगी और दर्शक गैलरी में 336 से ज्यादा लोग बैठ सकेंगे। संयुक्त सत्र में 1,224 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था होगी। राज्यसभा में 280 लोगों के बैठने की क्षमता है। नई राज्यसभा में 384 सीटें होंगी और दर्शक गैलरी में 336 से ज्यादा। नए भवन में उच्च गुणवत्ता वाली ध्वनि तथा दृश्य-श्रव्य सुविधाएं, प्रभावी आपातकालीन निकासी आदि की व्यवस्था होगी। इसमें उच्चतम सुरक्षा मानकों का पालन होगा, जिसमें भूकंपीय क्षेत्र-पांच की आवश्यकताएं भी शामिल है। राजनीति को परे रख दें, तो नया संसद भवन तथा उससे जुड़े सारे निर्माण भविष्य की संभावनाओं और उनसे पैदा होने वाली आवश्यकताओं को पूरा करेंगे और विविधता में एकता के चरित्र वाले भारत के वर्तमान एवं महान अतीत का एहसास कराएंगे।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Thursday, January 7, 2021

पंचायतों को मिलें अधिक अधिकार ताकि प्रभावी ढंग से हो सके ग्रामीण विकास (अमर उजाला)

महीपाल  

उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा में पंचायतों के चुनाव प्रस्तावित हैं। अनेक पंचायतों के संगठन पंचायतों की वकालत इस तरह कर रहे हैं कि पंचायतों को अधिक अधिकार एवं शक्तियां प्रदान की जाएं, ताकि वे ग्रामीण विकास प्रभावी ढंग से कर सकें। स्वयं सेवी संस्थाएं भी लोगों को जागृत कर रही हैं कि आपका वोट कीमती है, उसे ईमानदार पंचायत प्रतिनिधि को दें।


गांव में दारू के दौर भी चल रहे हैं। ये दौर वे चला रहे हैं जो कि सरपंच या प्रधान पद का चुनाव लड़ना चाहते हैं। आइए, यह तो देखें कि पंचायतें जिनमें विभिन्न पदों पर आने के लिए लोग लालायित हैं, वे वास्तव में कितने सशक्त हैं। पंचायतों को कितना सशक्त किया गया है, इसका आकलन करने के लिए 2016 में एक अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन में पंचायतों को कितने कार्य वित्त एवं कर्मी हस्तांतरित किए हैं, उसके आधार पर हस्तांतरित सूचकांक तैयार किया गया था।



यह अध्ययन बताता है कि किसी भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश में वांछित 100 प्रतिशत शक्तियों का हस्तांतरण, जो राज्य से पंचायतों को होना था, वह नहीं हुआ है। जबकि 73वें संविधान संशोधन को पारित हुए तीन दशक होने जा रहे हैं। केरल ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां पर 75 प्रतिशत शक्तियों का हस्तांतरण हुआ है। मात्र सात राज्य अर्थात केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, सिक्किम व पश्चिम बंगाल हैं, जहां पर 50 प्रतिशत से अधिक शक्तियों का हस्तांतरण पंचायतों में हुआ है।


इसमें यह तथ्य भी सामने आता है कि दक्षिण के राज्यों में पंचायतों को सशक्त करने की प्राथमिकता है, जबकि ऐसा उत्साह उत्तर के राज्यों में प्रतीत नहीं होता है। उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा जहां पर चुनाव होने वाले हैं, विकेंद्रीकरण सूचकांक क्रमशः 36 प्रतिशत एवं 41 प्रतिशत है। अर्थात राज्य स्तर से जो वांछित विकेंद्रीकरण होना था, उसका मात्र 36 प्रतिशत उत्तर प्रदेश में हुआ है व 41 प्रतिशत हरियाणा में हुआ है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि पंचायतें स्वायत्त शासन की संस्थाएं अर्थात ग्राम सरकार या जिला सरकार नहीं बन सकी। अगर बनीं, तो सिर्फ राज्य सरकार एवं उसकी नौकरशाही की मात्र अनुबंध।


समस्या पंचायतों को सशक्त करने की उतनी नहीं है, जितनी शासित करने की है। पंचायतों की वास्तविक समस्या शासन की है। शासन का अर्थ है, नियम कायदों को अमल में लाना। अर्थात पंचायती राज अधिनियम एवं अधिनियमों के अनुसार पंचायतों की कार्यवाही चले, तो पंचायतें स्वयं ही सशक्त होंगी। सभी सदस्यों का उन पंचायतों को सहयोग होगा और संपूर्ण ग्रामीण समाज उनके साथ होगा। आइए, शासन को कुछ उदाहरण से समझते हैं।


ग्राम पंचायत स्तर पर किसी राज्य में एक महीने में एक बार व कहीं दो बार इनकी बैठक होती है। बैठक के लिए लिखित नोटिस एवं एजेंडा के साथ सभी पंचों या वार्ड सदस्यों को जाना अनिवार्य है। यह भी निश्चित है कि बैठक होने के कितने दिन पहले नोटिस जारी होना है। क्या कहीं ऐसा होता है? ऐसा प्रतीत तो नहीं होता। इसके अतिरिक्त पंचायती राज के अंतर्गत स्वास्थ्य समिति का गठन होता है। उनका भी नोटिस एवं एजेंडा ग्राम पंचायत की बैठकों जैसे ही जारी होता है। क्या ऐसा वास्तव में होता है, संभवतः नहीं।


इस संबंध में एक उदाहरण देना चाहूंगा। आरटीआई सामाजिक कार्यकर्ता हरीश हुण- ग्राम पंचायत अनूपपुर, ब्लॉक डिबाई जिला हापुड़, उत्तर प्रदेश ने 16 सितंबर 2020 को वित्तीय वर्ष 2016-17 से 20-21 के अंतर्गत निम्न सूचनाएं मांगी थी- प्रथम, ग्रामसभा की बैठकों के छायाचित्र/ वीडियोग्राफी, उपस्थित लोगों/सदस्यों के हस्ताक्षर, कार्यवाही एजेंडा रजिस्टर तथा पारित प्रस्तावों की छायाप्रति; दूसरे, ग्राम पंचायत की बैठकों की कार्यवाही एजेंडा रजिस्टर तथा पारित प्रस्तावों की छायाप्रति; तीसरे, समस्त समितियों की बैठकों के समय, तिथि, उपस्थिति तथा कार्यवाहियों का विवरण। सूचनाओं के लिए आवेदन दिए चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक प्रार्थी को सूचना नहीं मिली है। आवेदक ने अपीलें भी की हैं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं है। कारण, सूचनाएं उपलब्ध हों तो दें। यह कोई एक ग्राम पंचायत की सच्चाई ही नहीं है, यह समस्या विस्तृत है।


-लेखक पूर्व भारतीय आर्थिक सेवा के अधिकारी रहे हैं

सौजन्य - अमर उजाला।

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मृत्युदंड से समाज नहीं बदलेगा, सोच को बदलना ज्यादा जरूरी (अमर उजाला)

तस्लीमा नसरीन  

बांग्लादेश में भी बलात्कार के लिए मृत्युदंड घोषित किया गया है। क्या उम्मीद करूं कि सख्त सजा को देखते हुए वहां अब बलात्कार की घटनाएं नहीं घटेंगी? भारत में पहले ही बलात्कार पर मौत की सजा है। इसके बावजूद भारत में बलात्कार कम नहीं हुए हैं। कारावास, उम्रकैद और मृत्युदंड भी लोगों को बलात्कार से रोकने में सक्षम क्यों नहीं हैं? यह देखा गया है कि जहां गंभीर अपराधों के लिए मृत्युदंड दिया जाता है, वहां गंभीर अपराध के आंकड़े कम नहीं हुए हैं।


मनुष्य जोखिम उठाकर ही अपराध करता है। क्या ऐसे पुरुषों को साहसी कहा जाएगा? वे साहसी पुरुष कतई नहीं हैं। हमने देखा है, विभिन्न देशों में समय-समय पर कुछ क्रांतिकारी लोगों की भलाई के लिए, समाज में समता लाने के लिए 'अपराध' करते हैं, जान का जोखिम उठाकर भी अपना काम जारी रखते हैं। तानाशाही या कुशासन का अंत होने पर वैसे 'अपराधों' को क्रांति कहकर सम्मानित किया जाता है। लेकिन मृत्युदंड का जोखिम उठाकर बलात्कार करने, यौन अपराध करने या अपने स्वार्थ में किसी की जान लेने को क्रांति नहीं कह सकते, यह तो जघन्यतम अपराध है।


ऐसे अपराध संगठित रूप क्यों ले लेते हैं? इसकी वजह ढूंढकर अगर उसे निर्मूल करने की दिशा में कदम उठाए जाएं, तभी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का खात्मा किया जा सकता है। बलात्कार, यौन अत्याचार और महिलाओं को परेशान करने के मूल कारण को निर्मूल किए बिना बलात्कार को रोका नहीं जा सकता। बांग्लादेश के समाज में दो तरह के बदलाव आए हैं। एक बदलाव यह है कि वहां धर्मांधता बढ़ी है, जो बहुत भयावह है। दूसरा बदलाव यह है कि अन्याय-अत्याचार के विरुद्ध स्त्री-पुरुष एक साथ सड़कों पर उतरते हैं, जो अच्छी बात है।


मुझे याद है, बीती सदी के आठवें दशक में जब मैंने बलात्कार के विरुद्ध वहां की पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखे थे, तब मेरी बहुत आलोचना हुई थी और कहा गया था कि ऐसी बातें समाज के सामने न ही आएं, तो अच्छा। वर्ष 1991 में जब मैंने बलात्कार के विरुद्ध निमंत्रण नाम की एक उपन्यासिका लिखी, तो मुझ पर ताबड़तोड़ हमले हुए और आरोप लगाया गया कि मैं अश्लीलता को बढ़ावा दे रही हूं। हालांकि कुछ महिलाओं ने सच्चाई सामने लाने के लिए तब मेरा आभार जताया था। आज मेरी उस किताब को कोई अश्लीलता को बढ़ावा देने वाली नहीं कहेगा, क्योंकि बलात्कार आज हमारे समाज की कटु सच्चाई है।


पहले लोगों की सोच थी कि अश्लील, गलत या कुरूप तथ्यों का दबा-छिपा रहना ही उचित है। इस कारण बलात्कार की शिकार लड़कियां अपना मुंह बंद रखती थीं। इसके अलावा प्रबुद्ध लोगों का मानना था कि बलात्कार की खबरों का अखबारों में छपना तो ठीक है, लेकिन बलात्कार साहित्य का विषय नहीं हो सकता। तीस-चालीस साल पहले बलात्कार के विरोध में सड़कों पर उतरना अस्वाभाविक था। लेकिन आज बलात्कार की निरंतर घटनाओं को देखते हुए लोगों का सड़कों पर उतरना बिल्कुल स्वाभाविक है। और यह निश्चय ही एक सकारात्मक बदलाव है।


अगर यह मान भी लिया जाए कि मृत्युदंड के भय से बलात्कार कम हो जाएंगे, लेकिन पुरुष में बलात्कार की इच्छा तो रह ही जाएगी, जो किसी दूसरे रूप में सामने आएगी। हम जानते हैं कि पुरुषों की नारी-विरोधी मानसिकता ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार है। मृत्युदंड से पुरुषों की उस नारी-विरोधी सोच में तो बदलाव आने से रहा। जबकि उस सोच को बदलना ज्यादा जरूरी है।


इस सोच को बदलने के लिए जो उद्यम जरूरी है, क्या राष्ट्र उसकी जिम्मेदारी लेगा? समाज के सभी स्तरों में इस सोच को बदलने की जिम्मेदारी सरकार के साथ-साथ गैरसरकारी संगठनों को लेनी पड़ेगी। स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में नारी विरोध, नारी अत्याचार और खतरनाक पुरुषवादी सोच के बारे में छात्रों को सजग करना होगा। दरअसल पुरुष तंत्र में जो यह अशिक्षा घर कर गई है कि- पुरुष स्वामी और महान है, जबकि स्त्री दासी और भोग की वस्तु है-इस अशिक्षा को खत्म किए बिना नारी-विरोधी मानसिकता को बदलना संभव नहीं है। घर में दी जाने वाली शिक्षा भी बहुत महत्वपूर्ण है।


शिशु अपने माता-पिता को जिस रूप में देखता है, वह भी जीवन के प्रति उसका नजरिया बनाता है। अगर बच्चा घर में अपने पिता को मालिक और माता को दासी की भूमिकाओं में देखता है, तो उसके मानस में स्त्री-पुरुष की यह छवि स्थायी हो जाती है। अगर पिता उसकी मां पर अत्याचार करता है, तो शिशु उसे ही सत्य मान लेता है। 21वीं सदी में भी क्या स्त्री को समान अधिकार नहीं मिलना चाहिए? अगर उसे समान अधिकार मिलता है, तो आने वाली पीढ़ी स्त्री को दासी या संतान उत्पन्न करने की मशीन नहीं समझेगी। अगर इस सदी में नारी को आर्थिक स्वतंत्रता मिलती है, तो आगामी पीढ़ी स्त्री को परनिर्भर या गुलाम नहीं मानेगी।


मैं पहले भी कह चुकी हूं, अब भी कहती हूं, मृत्युदंड सभी अपराधों का समाधान नहीं है। बलात्कार और यौन हिंसा के असंख्य कारण हैं। उन वजहों को खत्म करना होगा, तभी महिलाओं पर अत्याचार खत्म होगा। और यह भी कोई समाधान नहीं है कि लड़कियों के कपड़ों पर टोकाटोकी करें, उन्हें अकेले या रात में बाहर जाने पर प्रतिबंध लगाएं, क्लब या होटल में न जाने दें। बल्कि जो पुरुष अपराध करता है, अंकुश तो उस पर लगाना चाहिए। महिलाएं जंजीरें तोड़कर जितनी बाहर निकलेंगी, बाहर की दुनिया उतनी ही उनकी अपनी होगी। घर के अंदर बंद रहकर बाहर की दुनिया नहीं बदली जा सकती।


मुझे तो लगता है कि जो लोग बलात्कारियों की फांसी की मांग करते हैं, वे कहीं न कहीं बलात्कार के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार मानते हैं। बांग्लादेश के अनेक प्रबुद्ध जनों को मैं जानती हूं, इसलिए कह रही हूं कि उनमें से अनेक लोग बलात्कार को अपराध नहीं मानते। भारत में भी ऐसे बड़े लोग होंगे, जो बलात्कार को महिलाओं की गलती और पुरुषों की एक छोटी-सी चूक मानते होंगे। जब विशिष्ट लोगों की सोच ऐसी है, तो आम जनता से कोई क्या उम्मीद करे? मैं बलात्कार क्यों, किसी भी अपराध के लिए मृत्युदंड की समर्थक नहीं हूं। दुनिया के 140 देशों ने मृत्युदंड पर रोक लगा दी है। उन्हीं देशों में अपराध सबसे कम हैं, जहां मृत्युदंड नहीं है। इसलिए मेरा विश्वास है कि एक दिन बाकी बचे देश भी मृत्युदंड खत्म करेंगे।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Wednesday, January 6, 2021

रजनीकांत के पीछे हटने के मायने, बता रहे हैं एम भास्कर साई (अमर उजाला)

एम भास्कर साई  

तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक मंच तैयार है, क्योंकि सभी प्रमुख दलों ने अपना अभियान शुरू कर दिया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एडापड्डी के पलानीस्वामी और उप मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेलवम के बीच स्पष्ट मतभेदों के बावजूद सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक ने भी अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। पलानीस्वामी और पन्नीरसेल्वम गुटों के बीच की लड़ाई को तब विराम दे दिया गया था, जब बीते अक्तूबर में पार्टी की कार्यकारी समिति ने आगामी विधानसभा चुनावों के लिए पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में आगे बढ़ाने का फैसला किया था। हालांकि अब भी दोनों नेताओं के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। कहा जाता है कि पन्नीरसेलवम पलानीस्वामी से खुश नहीं हैं, जिन्होंने पलानीस्वामी की मौजूदगी के बगैर सलेम से अपना प्रचार अभियान शुरू किया। हालांकि दोनों नेता चेन्नई में चुनाव प्रचार के दौरान एक-दूसरे के अगल-बगल बैठे थे, लेकिन दोनों के बीच बहुत बातचीत नहीं देखी गई।

इस बीच, सरकार की उपलब्धियों को दर्शाने वाले जो विज्ञापन पार्टी द्वारा जारी किए गए, उनमें सिर्फ पलानीस्वामी की तस्वीर थी, पन्नीरसेलवम की नहीं। इसके बाद पन्नीरसेलवम की उपलब्धियों के बताने वाला एक अलग विज्ञापन विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित किया गया। हालांकि विगत सोमवार को तिरुनेलवेली में दोनों नेताओं ने एक ही वाहन पर बैठकर प्रचार किया, जो जाहिर है पार्टी में एकता प्रदर्शित करने के लिए किया गया होगा। कट्टर प्रतिद्वंद्वी द्रमुक के अध्यक्ष एम के स्टालिन के इस दावे पर कि पलानीस्वामी और पन्नीरसेलवम के बीच संघर्ष के चलते अन्नाद्रमुक जल्द ही टूट जाएगी, मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने जोर देकर कहा कि कोई भी पार्टी को नहीं तोड़ सकता और स्टालिन को अपनी पार्टी को बचाने के लिए ज्यादा चिंता करनी चाहिए।

विपक्षी दलों के इस दावे के अनुसार कि पलानीस्वामी और पन्नीरसेलवम के बीच दरार के कारण दोनों संयुक्त रूप से चुनाव अभियान नहीं चला रहे थे, अन्नाद्रमुक के उप समन्वयक के पी मनुसामी ने कहा कि मुख्यमंत्री का प्रचार अभियान तय कार्यक्रम के अनुसार चल रहा है। उन्होंने कहा कि प्रचार अभियान का कार्यक्रम इसी तरह से बनाया गया है। जब उनसे पूछा गया कि क्या पन्नीरसेलवम प्रचार अभियान का हिस्सा नहीं हैं, तो उन्होंने कहा कि वह बाद में मुख्यमंत्री के साथ प्रचार में शामिल होंगे। जब चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की जाएगी, तब दोनों नेता संयुक्त अभियान चलाएंगे। 

अन्नाद्रमुक की जनरल काउंसिल और कार्यकारी समिति की बैठक आगामी नौ जनवरी को होगी। अब देखना होगा कि उस बैठक के दौरान दोनों नेताओं के बीच की खाई को पाटने की कोशिश की जाती है या नहीं। इसके अलावा निष्कासित अन्नाद्रमुक नेता वी के शशिकला की संभावित रिहाई को भी ध्यान में रखने की जरूरत है, जो फिलहाल बंगलूरू की जेल में हैं। अन्नाद्रमुक को अपने प्रतिद्वंद्वियों से भी मिल रही चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो पार्टी के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री एम जी रामचंद्रन की राजनीतिक विरासत का दावा कर रहे हैं।  राज्य में अपना जनाधार बनाने की कोशिश करने वाला हर नेता अभिनेता से नेता बने दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री की अभ्यर्थना करता है, चाहे वह रजनीकांत हो, कमल हासन हो या अन्नाद्रमुक की सहयोगी पार्टी भाजपा हो। कमल या रजनी या भाजपा के बयान बताते हैं कि एमजीआर का व्यक्तित्व और विचारधारा लोकप्रिय है।

वर्ष 2018 में एमजीआर विश्वविद्यालय में एक गैर-राजनीतिक कार्यक्रम में अपने भाषण के दौरान रजनीकांत ने कहा था, मैं एमजीआर नहीं हूं, लेकिन उनकी तरह गरीब समर्थक शासन दे सकता हूं। जब मैं अस्पताल में भर्ती था, तो वह अक्सर मेरे स्वास्थ्य के बारे में पूछताछ करने के लिए फोन करते थे। उनके इस बयान को एमजीआर के साथ नजदीकी स्थापित करने के प्रयास के तौर पर देखा गया। भाजपा ने अपने दो प्रचार वीडियो में एमजीआर को चित्रित किया। एक वीडियो में पूर्व मुख्यमंत्री को भाजपा के तमिलनाडु प्रमुख एल मुरुगन के साथ दिखाया गया, तो दूसरे वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना एमजीआर से की गई। एमएनएम के संस्थापक कमल हासन ने शिवकासी में चुनाव प्रचार के दौरान कहा, मैं एमजीआर की गोद में पला-बढ़ा हूं। वह लोगों की संपत्ति हैं। 

इस बीच, एमएनएम की अपनी अंदरूनी समस्याएं हैं। हाल ही में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावेड़कर की मौजूदगी में पार्टी के उपाध्यक्ष भाजपा में शामिल हो गए हैं। पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक अरुणाचलम ने कहा कि उन्होंने इसलिए पार्टी छोड़ दी, क्योंकि कमल हासन ने नए कृषि कानूनों का समर्थन नहीं किया। विगत 29 दिसंबर को रजनीकांत ने तमिलनाडु के राजनीतिक मैदान में प्रवेश करने से पहले ही चुनावी राजनीति से बाहर निकलने की घोषणा कर दी। रजनीकांत के फैसले का अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन और कमल हासन की पार्टी एमएनएम की संभावनाओं पर असर पड़ेगा। यह अन्नाद्रमुक को गठबंधन के भीतर नेतृत्व का दावा करने में सक्षम बनाता है, क्योंकि सहयोगी दल ने अब सौदेबाजी की शक्ति खो दी है। 

अन्नाद्रमुक का दावा है कि अगर पार्टी दोबारा चुनी गई, तो अपने दम पर सरकार बनाएगी, न कि गठबंधन के रूप में। इसलिए भाजपा दूसरा दांव खेलते हुए फंस जाएगी और सरकार गठन के समय द्रविड़ पार्टियों की चुनावी सहयोगी बनाए रखने की रणनीति को स्वीकार करना होगा और अगर 234 सीटों वाली विधानसभा में द्रमुक या अन्नाद्रमुक बहुमत हासिल करने में विफल रहती है, तभी उसका बाहरी समर्थन लेगी। चुनावी मैदान से रजनीकांत के पीछे हटने से कमल हासन की पार्टी एमएनएम को भी ज्यादा वोट मिलेंगे, क्योंकि जो मतदाता द्रमुक या अन्नाद्रमुक के कट्टर समर्थक नहीं हैं, वे पार्टी को वोट देंगे। अगर रजनीकांत पार्टी बनाकर चुनाव लड़ते, तो वह अन्नाद्रमुक और भाजपा के वोट में सेंध लगाते। रजनीकांत से पीछे हटने से एक बार फिर 2019 की तरह राज्य का चुनाव दो ध्रुवीय होने की संभावना है- जहां एक ओर अन्नाद्रमुक, तो दूसरी ओर द्रमुक होगी। इसके अलावा पहली बार राज्य का चुनाव जयललिता और करुणानिधि जैसे दिग्गज करिश्माई नेताओं के बगैर होगा।

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किसान संगठनों के साथ बैठकर लाभकारी मूल्य पर हो बात (अमर उजाला)

के. सी. त्यागी  

केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध किसान आंदोलित हैं। लगभग 40 दिनों से धरना चल रहा है। दिल्ली के लगभग सभी मुख्य प्रवेश द्वार पर झुंड के झुंड नजर आ रहे हैं। फिलहाल गांधीवादी तरीके से विरोध जाहिर हो रहा है। पंजाब-हरियाणा के किसान ज्यादा लंबी लड़ाई लड़ने के इरादे से आए हैं। दिल्ली के मुहाने पर लगे तंबू किसी ग्रामीण रहन-सहन की झलक दिखाई देते हैं। भगत सिंह की तस्वीरें आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं। कहीं-कहीं भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह द्वारा लड़े गए संयुक्त पंजाब के किसान संघर्ष की गाथा बोल भी मौजूद है, जो आंदोलनकारी किसानों में जोश भरने के लिए काफी है। 


'पगड़ी संभाल जट्टा पगड़ी संभाल', 'ओए तेरा लुट गया माल', 'फसल कटी तो ले गए जालिम, तेरी नेक कमाई'। महिला एवं बच्चों की भरमार है। 50 से  अधिक किसानों की मृत्यु हो चुकी है, पर जोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। आधा दर्जन से अधिक बार वार्ता का दौर हो चुका है, लेकिन मूल प्रश्नों पर गतिरोध अभी बना हुआ है। इसी बीच, सरकारी एवं गैर सरकारी विशेषज्ञों द्वारा समूची किसान राजनीति पर बुनियादी प्रश्न खड़े कर दिए गए हैं। एक और बड़ा हमला नीति आयोग के एक सदस्य द्वारा किया गया है कि यह धनी किसानों का आंदोलन है और धनी किसानों पर आयकर लगना चाहिए। वहीं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा प्रकाशित आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। मुख्यतः किसानों में निरंतर बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति की ओर का विश्लेषण किया है। 2016 से 2019 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, कृषि क्षेत्र से 2016 में 11,389, 2017 में 10,655, 2018 में 10,349, 2019 में 10,281 किसानों ने जान दी। 2019-20 और 21 के आंकड़ों में इस संख्या में बढ़ोतरी हुई है। इसके कारणों में कोविड-19 से पैदा हुई परिस्थितियां शामिल हैं।

कृषि की आड़ में चोरी करने वाले बड़े उद्योगपति एवं नव धनाढ्य लोगों का एक वर्ग विकसित अवश्य हुआ है। पिछले दिनों तकरीबन दो लाख किसानों ने कृषि से कमाई दिखाई है। कृषि से हुई इस कमाई को लेकर सी.बी.डी.टी भी हैरान है। जानना आवश्यक है कि क्या काले धन को सफेद करने के लिए इसे कृषि आय के तौर पर दिखाया गया हो? कृषि मंत्रालय की संसदीय समिति ने भी इस पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि कृषि के नाम पर चोरी से देश के अंदर 'टैक्स हैवन' बन सकता है। जबकि नाबार्ड की 2019-20 की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, देश के हर किसान पर एक लाख रुपये का कर्ज है। रिपोर्ट के मुताबिक 52.5 फीसदी किसान परिवार कर्ज के दायरे में है। एन.एस.एस.ओ. के एक आंकड़े के मुताबिक विगत वर्षों से कृषि परिवार की औसत मासिक आय 6,000 से 9,000 रुपये महीने के आसपास ही है। दो वर्ष पूर्व के आंकड़ों के मुताबिक यह राशि 8,931 रुपये मात्र है, जो एक सरकारी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के मासिक वेतन से काफी कम है। ऐसे में महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान लोगों के वक्तव्य स्थिति को और गंभीर बना देते हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने वर्तमान किसान आंदोलन एवं कृषि क्षेत्र में आए संकट को गलत तरीके से परिभाषित किया है। उनके अनुसार, भारत में अत्यधिक कृषि उत्पादन और एमएसपी के निरंतर बढ़े दाम समस्या के मूल में है।

संक्रमण काल के इस बुरे दौर में जब लगभग सभी क्षेत्रों से नकारात्मक रुझान आए हैं। सिर्फ कृषि क्षेत्र की रिपोर्ट आशाजनक रही है, जहां हमने 3.4 फीसदी की सकारात्मक वृद्धि दिखाई है। वर्तमान सरकार विगत छह महीने से 75 करोड़ गरीब भारतीयों को मुफ्त भोजन उपलब्ध करा रही है और 2013 के खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अनुसार दो-तिहाई आबादी को सस्ता राशन उपलब्ध करा रही है। संयुक्त राष्ट्र के फूड ऐंड एग्रीकल्चर संगठन ने भारत समेत समूचे विश्व को भूख के विरुद्ध सतर्क रहने की चेतावनी दी है कि संक्रमण के चलते बड़े पैमाने पर भूख से मौतें हो सकती हैं। लिहाजा अतिरिक्त उत्पादन हमारी आवश्यक आवश्यकताओं के लिए है। भारतीय कृषि और किसानी पहले से संकट में है। बदलते दौर में किसान संगठनों के साथ बैठकर लाभकारी मूल्य के प्रावधान पर बात हो, ताकि आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार हो सके। 


(-लेखक ज.द.(यू) के प्रधान महासचिव हैं)

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Tuesday, January 5, 2021

जीवन की गुणवत्ता पर हो निवेश, मानव विकास सूचकांक में पिछड़ा भारत (अमर उजाला)

जयंतीलाल भंडारी  

नए वर्ष 2021 में कोरोना महामारी के कारण देश के आम आदमी के जीवन की गुणवत्ता में आई कमी को दूर किए जाने के हरसंभव प्रयास किए जाने जरूरी हैं। यह स्पष्ट है कि कोविड-19 के पहले से ही जो करोड़ों लोग आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए दिखाई दे रहे थे, वे अब गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल और सार्वजनिक सेवाओं की प्राप्ति जैसे मापदंडों पर अधिक मुश्किलों का सामना कर रहे हैं तथा गरिमामय जीवन से और दूर हो गए हैं। 

गौरतलब है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा प्रकाशित मानव विकास सूचकांक 2020 में 189 देशों की सूची में भारत 131वें पायदान पर है। पिछले वर्ष प्रकाशित इस सूचकांक में भारत 129वें पायदान पर था। यूएनडीपी ने अपनी एक और रिपोर्ट में कहा है कि कोविड-19 महामारी के गंभीर दीर्घकालिक परिणामों के चलते दुनिया में 2030 तक 20.70 करोड़ और लोग घोर गरीबी की ओर जा सकते हैं। ऐसे में कोविड-19 के गंभीर दीर्घकालिक परिणामों का भारत पर भी प्रतिकूल असर होगा। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की नई रिपोर्ट के अनुसार, कोविड-19 महामारी के कारण भारत की गरीब आबादी में करीब एक करोड़ 20 लाख लोग और जुड़ जाएंगे, जो विश्व में सर्वाधिक है।


इसी प्रकार पिछले दिनों प्रकाशित वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआई) 2020 में 107 देशों की सूची में भारत 94वें स्थान पर है। पिछले साल 117 देशों की सूची में भारत का स्थान 102 था। यह चिंताजनक है कि देश में खाद्य उपलब्धता और देश की दो तिहाई आबादी के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के दायरे में आने के बावजूद देश के करोड़ों लोग भूख और कुपोषण की चुनौती का सामना कर रहे हैं। इसी तरह विश्व बैंक के द्वारा तैयार किए गए 174 देशों के वार्षिक मानव पूंजी सूचकांक 2020 में भारत का 116वां स्थान है। यह सूचकांक मानव पूंजी के प्रमुख घटकों स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, स्कूल में नामांकन और कुपोषण पर आधारित है। चूंकि रिपोर्ट के ये आंकड़े मार्च 2020 तक के हैं, लेकिन इसके बाद देश में कोरोना वायरस महामारी का प्रकोप तेजी से बढ़ा है। ऐसे में देश में मानव पूंजी के निर्माण में कोरोना महामारी ने जोखिम बढ़ा दिया है।


महामारी का आर्थिक प्रकोप विशेष रूप से महिलाओं और सबसे वंचित परिवारों के लिए बहुत अधिक रहा है, जिसके चलते कई परिवार खाद्य असुरक्षा और गरीबी के शिकार हैं। वस्तुतः कोविड-19 की चुनौतियों के बीच देश में लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार के साथ-साथ उनके जीवनस्तर को ऊपर उठाने की दिशा में अब लंबा सफर तय करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बनाए गए ‘कमीशन ऑन मैक्रो इकॉनॉमिक्स ऐंड हेल्थ’ ने इस बात के पुख्ता सबूत दिए कि स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च व्यय नहीं, बल्कि एक बेहतरीन निवेश है। यूरोपीय देशों ने महामारियों और संचारी रोगों को आर्थिक विकास और मानवीय कल्याण के लिए खतरे के रूप में देखा है। इन देशों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली विकसित करने पर बड़ा निवेश किया है। पिछले दशकों में यूरोप में तेजी से बढ़ी जीवन प्रत्याशा और आर्थिक वृद्धि, दोनों ही मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं और स्वस्थ जनमानस के कारण ही परिलक्षित हुई हैं। 


ऐसे में अब अपने देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ाया जाना जरूरी है। खासतौर से कोरोना वैक्सीन के लिए बड़ी राशि सुनिश्चित की जानी होगी। कोविड-19 की चुनौतियों से देश की अर्थव्यवस्था को बचाने और समाज के विभिन्न वर्गों-गरीबों, किसानों तथा श्रमिकों को मुश्किलों से उबारने के लिए देश में आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत इस वर्ष 2020 में मार्च से लेकर नवंबर तक सरकार ने 29.87 लाख करोड़ रुपये की जिन राहतों का एलान किया है, उनके क्रियान्वनयन पर हरसंभव तरीके से ध्यान देना होगा। उम्मीद करें कि 2021 में सरकार नई वैश्विक रिपोर्टों के मद्देनजर आम आदमी के जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, न्यायसंगत और उच्च गुणवत्ता वाली सार्वजनिक शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, सार्वजनिक सेवाओं में स्वच्छता जैसे मुद्दों पर रणनीतिक रूप से प्रभावी कदमों के साथ आगे बढ़ेगी।

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हरित क्रांति का हासिल, किसान आंदोलन के प्रति उदासीन रहना ठीक नहीं (अमर उजाला)

वीर सिंह 

किसान आंदोलन समकालीन भारत की एक बहुत बड़ी घटना है, और इसके प्रति उदासीन रहना ठीक नहीं होगा। इस आंदोलन के बहुत सारे विश्लेषण हो रहे हैं, सरकार की नई कृषि नीति और नए कानून पर भी एक अनंत-सा वाद-विवाद चल रहा है। लेकिन आंदोलन की जड़ों तक कोई नहीं पहुंचा। भारतीय किसानों के चरम असंतोष, आंदोलनों और आत्महत्याओं के पीछे कृषि के इतिहास का चार-पांच दशक पुराना एक काला अध्याय है, जिसकी चर्चा केवल स्थूल रूप में होती है। न तो कभी किसी केंद्र सरकार, न पंजाब सरकार और न ही पंजाब के किसानों ने इसे मुद्दा बनाया। भारतीय कृषि का यह काला अध्याय है तथाकथित हरित क्रांति, जिसका प्रादुर्भाव 1960 दशक के मध्य हो गया था, और हमारी सरकारें और किसान दो दशक तक यह भ्रांति पालते रहे कि देश ने कृषि विकास में एक क्रांति पैदा कर खाद्य सुरक्षा का अभेद्य कवच तैयार कर लिया है।



वर्तमान किसान आंदोलन का सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि इसमें सर्वाधिक भागीदारी उन प्रदेशों के किसानों की है, जो हरित क्रांति का परचम लहराने में अग्रणी रहे हैं। भारत में हरित क्रांति की गौरव गाथा लिखने में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हाथ है। और आज सबसे अधिक अकुलाहट भी इन्हीं क्षेत्रों के किसानों में हैं। अगर भारत को अन्नोत्पादन में किसी ने आत्मनिर्भर बनाया, तो वह भी इन्हीं क्षेत्रों के किसान थे। लेकिन देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले किसान स्वयं परनिर्भर हो गए हैं। खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर देश को जिताने वाले स्वयं पराजित हो गए हैं। अगर इन किसानों को हरित क्रांति ने सड़कों पर ला खड़ा किया, तो हरित क्रांति ने इस देश को दिया ही क्या? पतझड़ से भी बुरी हरियाली! 



भारत में हरित क्रांति के सिरमौर पंजाब को हरित क्रांति की सबसे बड़ी देन है कैंसर की बीमारी। लॉकडाउन और कोविड-19 महामारी के कारण अबोहर-जोधपुर एक्सप्रेस, जिसे सारा देश 'कैंसर ट्रेन' के नाम से जानता है, महीनों से निलंबित पड़ी है और कैंसर मरीजों का बुरा हाल है, क्योंकि वे चिकित्सा के लिए बीकानेर नहीं जा पा रहे। इस ट्रेन में कोई 60 प्रतिशत यात्री कैंसर मरीज होते हैं, जो इलाज के लिए बीकानेर स्थित आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर हॉस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर जाते हैं। इन मरीजों में अधिकांशतः किसान, और उनमें भी सभी आयुवर्ग के होते हैं। इनमें अधिकांश किसान पंजाब के कॉटन बेल्ट (जिसमें मानसा, फरीदकोट, बठिंडा, संगरूर, मुक्तसर, फिरोजपुर, मोगा और फाजिल्का आते हैं) के छोटे किसान होते हैं।


पंजाब भारत के भूगोल का मात्र 1.5 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन इस प्रदेश में कीटनाशक और शाकनाशी रसायनों की खपत का हिस्सा 20 प्रतिशत है। लगभग चार-पांच दशकों से तरह-तरह के कीटनाशकों, फफूंदनाशकों, खरपतवारनाशकों आदि के उपयोग के चलते मिट्टी इतनी जहरीली हो गई है कि हरित क्रांति लाने वाले खेत अब जहरीले टापू बन गए हैं। मिट्टी में तो जहर है ही, उससे पैदा अनाजों, दालों, फलों, सब्जियों, तिलहनों में भी जहर के अंश हैं। हवाओं और पानियों तक में रासायनिक जहर घुला है। फिर जीव-जंतु और मनुष्य कैसे स्वस्थ और प्रसन्न रह सकते हैं!


कुछ वर्ष पूर्व राज्य सरकार द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, हरित क्रांति की इस धरती (जिसे देश की ब्रैडबास्केट भी कहते हैं) में प्रति दिन 18 लोग कैंसर के शिकार होते हैं। पंजाब देश का ऐसा राज्य है, जहां कैंसर की दर सर्वाधिक है। पंजाब में प्रति एक लाख लोगों में 90 कैंसर मरीज हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत अस्सी का है। हालांकि एक सरकारी रिपोर्ट इसका खंडन करती है। इस बीमारी की सबसे अधिक घटनाओं के कारण मालवा क्षेत्र को 'कैंसर बेल्ट' के रूप में जाना जाता है। पंजाब राज्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी की पर्यावरण रिपोर्ट से पता चलता है कि पंजाब में जितने जीवनाशी रसायन खेती के काम में लगते हैं, उनमे से 75 फीसदी केवल मालवा क्षेत्र में खपते हैं। क्या यह आंकड़ा स्वयं नहीं बताता कि मालवा को 'कैंसर बेल्ट' बनाने के लिए यही कृषि रसायन जिम्मेदार हैं? विगत मार्च में एक सुखद समाचार यह आया कि सरकार कैंसर-ग्रस्त मालवा क्षेत्र में जैविक खेती को बढ़ावा देगी। लेकिन उसमें कितनी प्रगति हुई, यह पता नहीं है। एक जुलाई, 2019 को गार्जियन  में पंजाब पर केंद्रित एक आलेख में कहा गया कि जो जीवनाशी रसायन फसलों में छिड़के जा रहे हैं, वे विश्व स्वस्थ्य संगठन द्वारा क्लास वन में वर्गीकृत किए गए हैं, जो सबसे जहरीले होते हैं और सभी देशों में प्रतिबंधित हैं।


कृषि कार्यों में प्रयुक्त होने वाले रसायन अधिकांशतः कैंसर कारक हैं। वैसे तो कृषि उत्पादों के सभी उपभोक्ता इनके शिकार हो सकते हैं, लेकिन किसानों के लिए इनके खतरे सबसे व्यापक हैं। कृषि कार्यों में जीवनाशी रसायनों के प्रयोग के समय किसान उनसे सीधे संपर्क में रहते हैं और बहुत सावधानी के साथ छिड़काव करने के बावजूद उसका कुछ अंश किसी न किसी तरह से उनके शरीर में प्रवेश कर जाता है। चिकित्सा क्षेत्र के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों में जैवनाशक रसायनों का संबंध मस्तिष्क, फेफड़े, गुर्दे, उदर, अग्नाश्य, वक्ष, रक्त, प्रोस्टेट और अंडाशय के कैंसर से स्थापित किया गया है। इन रसायनों के कारण कैंसर के अलावा अन्य कई तरह की बीमारियां होती हैं। देखा जाए तो हरित क्रांति से पैदा महामारी विश्वव्यापी कोरोना महामारी सेभी बड़ी है। कोविड-19 की तो वैक्सीन तैयार हो चुकी है, हरित क्रांति से फैले रोगों के विरुद्ध कौन वैक्सीन बनाएगा?


पंजाब की सरकारें यदा-कदा उन कंपनियों से समझौता करती रही हैं, जो कृषि को अत्यधिक बीमार बनाने वाले साधन तैयार करती हैं। लेकिन कभी वैकल्पिक कृषि पद्धतियों (जैसे पारिस्थितिक कृषि, प्राकृतिक कृषि, जैविक खेती, अक्षय खेती, कृषि-वानिकी आदि) पर विचार नहीं किया गया। किसानों ने भी कृषि की जैव विविधता को लीलने वाली, मिट्टियों को बंजर बनाने वाली, भूजल सोखकर धरती के गर्भ को खाली करने वाली, जहरों का लावा उगलने वाली, किसानों को दरिद्र, बीमार और कर्जदार बनाने वाली तथा अंततः उन्हें आत्महत्या तक ले जाने वाली हरित क्रांति के विकल्प के बारे में कभी नहीं सोचा।


(-लेखक जी बी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हैं।)

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Monday, January 4, 2021

माताओं-बहनों के पोषण पर निवेश, कोविड-19 महामारी ने एक आईने का काम किया (अमर उजाला)

मनोज कुमार  

कोविड-19 महामारी ने दरअसल एक आईने का काम किया, जिस पर सबकी नजर पड़ी। यह एक सामान्य सत्य है कि वायरस से पैदा संक्रामक महामारी से लड़ने में प्रतिरक्षा व्यवस्था (इम्युन सिस्टम) ही कारगर है। पर इम्युनिटी रातोंरात हासिल नहीं की जा सकती, क्योंकि यह वर्षों तक पोषक तत्वों वाले भोजन के सेवन से आती है। इसी कारण मैं कहता हूं कि इस तथ्य की गंभीरता पर विचार करें कि कुपोषित माताओं से कुपोषित बच्चे ही पैदा होते हैं।

जब सभी माताएं और बच्चों की देखभाल करने वाली अल्पपोषित होंगी, तो भारत आत्मनिर्भर कैसे बन सकता है? मैं पिछले करीब दो दशकों से पोषण की इस जटिल समस्या का अध्ययन कर रहा हूं। मुझे डर है कि हम भारत के स्वास्थ्य और उसकी उत्पादकता के समक्ष खड़ी सबसे महत्वपूर्ण समस्या को भूल रहे हैं। कोविड काल के बाद यह स्पष्ट होना चाहिए कि हमारी समस्या खाद्य सुरक्षा और भूख नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा है। सबके लिए पोषण सुरक्षित करना हमारी कृषि नीति का लक्ष्य होना चाहिए।

हम किसानों से कौन-सी फसल उगाने की अपेक्षा रखते हैं? सिर्फ गेहूं और धान? एक ही फसल और एक ही आहार हमें संकट की ओर ही ले जाएगा। चाहे खेत हो, प्लेट हो या पेट-विविधता में ही भविष्य है। इसके लिए किसानों को विविधतापूर्ण खेती करनी होगी, जो लाभप्रद भी है और जिससे हर किसी को पोषक तत्वों से भरपूर भोजन मिलेगा। अपने शोध के आधार पर आंध्र प्रदेश के अराकू (जहां विश्व स्तरीय अराकू कॉफी का सह-उत्पादन किया गया), वर्धा और दिल्ली में छोटी जोत वाले हजारों किसानों के साथ हमने दिखाया कि हमारे पास खाद्यान्न की ऐसी दृष्टि है, जो पर्यावरण, किसान और उपभोक्ताओं-सबके लिए लाभकारी साबित हो सकती है।

अपने इस ढांचे (प्रेमवर्क) को हम अराकुनोमिक्स कहते हैं और जिसे रॉकफेलर फाउंडेशन ने फूड सिस्टम विजन पुरस्कार के योग्य माना है। इसमें सुझाए गए विचार भारत के लिए व्यापक बदलाव वाले हैं, बशर्ते हम सुनिश्चित करें कि पोषक तत्वों से भरपूर विविध खाद्य पदार्थ हमारी माताओं और बहनों का मुख्य भोजन बनें। वर्ष 2018 में टीन एज गर्ल्स (टीएजी) सर्वे के जरिये एक अग्रणी संगठन नान्दी फाउंडेशन द्वारा देश में पहली बार देश की बारह करोड़ लड़कियों की आवाज सुनने का प्रयास किया गया। तब देश के सभी राज्यों के 600 से ज्यादा जिलों में 1,000 प्रशिक्षित सर्वेक्षण कर्ताओं (सभी महिलाएं) ने 74,000 किशोर उम्र की लड़कियों के प्रतिनिधित्व सैंपल इकट्ठा किए।

डिजिटल टैबलेट के सहारे सर्वेक्षण करने वालियों ने लड़कियों के इंटरव्यू लिए, उनका कद, वजन और हीमोग्लोबिन स्तर मापा तथा तमाम उपलब्ध आंकड़े दर्ज किए। यह भूख एवं कुपोषण सर्वे (हंगामा सर्वे) का फॉलोअप था, जिसमें एक लाख नौ हजार बच्चों के पोषण स्तर को मापा गया था और 71,000 माताओं से बात की गई थी। ऐसे ही सर्वाधिक जनसंख्या वाले दस शहरों में जहां शहरी हंगामा सर्वे किया गया, वहीं देश भर के 900 आदिवासी गांवों के 15,000 बच्चों पर चार साल तक शोध किया गया। इन सभी अनुभवों से हमने निष्कर्ष निकाला कि बाल कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में एक कड़ी गायब थी। किशोरियां ही यह महत्वपूर्ण गायब कड़ी थीं।

हमें एहसास हुआ कि देश में किशोरियां का बड़े पैमाने पर कोई डाटाबेस नहीं है और वे माताओं व शिशुओं के बीच गायब हैं। यही खोज टीएजी सर्वेक्षण करने का आधार बनी, जिससे पता चला कि माताओं एवं बहनों पर निवेश करने की तत्काल जरूरत है। हालांकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के विभिन्न चरणों के दौरान कुपोषण की प्रवृत्ति में गिरावट देखी गई, फिर भी यह धीमी गति से घट रही है। 2019-20 के नवीनतम सर्वे के शुरुआती परिणाम दिखा रहे हैं कि इस लड़ाई में जीत अभी दूर है। हालांकि हमारी उम्मीद है कि छह महीने से ज्यादा की महामारी और लॉकडाउन की स्थिति में अपूरणीय क्षति नहीं हुई होगी। सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों का सारा ध्यान और निवेश गर्भवती महिलाओं व शिशुओं पर किया गया है। लेकिन उनके बारे में क्या योजना है, जो कल मां बनेंगी? किशोरियों के बारे में हमारे क्या विचार हैं?

वे गर्भवती महिलाओं की तरह पोषण विमर्श के केंद्र में नहीं हैं। जबकि इसके पर्याप्त सबूत हैं कि नवजात बच्चों की सेहत महिला की सेहत पर निर्भर है। मातृत्व स्वास्थ्य को वैश्विक स्तर पर गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति के रूप में परिभाषित किया जाता है। पर क्या केवल नौ महीने में गंभीर रूप से खराब स्वास्थ्य स्थिति बदली जा सकती है? जन्म के समय कम वजन एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, जो मानव पूंजी को अल्पकाल या दीर्घकाल, दोनों में प्रभावित करती है। कम वजन वाले नवजातों में रुग्णता, बाल बौनापन और हृदय रोग के साथ-साथ शारीरिक बीमारियों का खतरा ज्यादा रहता है।

यूनिसेफ की चेतावनी है कि जन्म के समय 2,500 ग्राम से कम वजन वाले शिशुओं की मृत्यु की आशंका वजनी शिशुओं की तुलना में करीब 20 गुना अधिक होती है। टीएजी सर्वे बताता है कि देश की आधी किशोरियां एनीमिया से पीड़ित हैं और हर दूसरी किशोरी कम वजन की हैं। देश की किशोरियों की समस्या सामने लाने में नान्दी फाउंडेशन ने वक्त बर्बाद नहीं किया। उनके लिए स्कूली शिक्षा कार्यक्रम को व्यापक रूप देने के अलावा हमने उन्हें स्नातक बनाने के लिए काम शुरू किया। पर हमें एहसास हुआ कि किसानों के साथ काम करना और सबके लिए पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम न केवल हजारों हेक्टेयर में व्यापक पैमाने और बड़ी परियोजना पर काम कर रहे हैं, बल्कि धान व गेहूं पैदा करने की परंपरा तोड़कर पोषक खाद्यान्न का उत्पादन भी कर रहे हैं। समय आ गया है कि यह देश माताओं एवं बहनों के पोषक भोजन को महत्व दे।

-लेखक नान्दी फाउंडेशन के सीईओ एवं अराकू कॉफी के सह-संस्थापक हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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कोरोना ने बनाए नए धनकुबेर, वैक्सीन बनानी वाली कंपनियों के लिए 'सोने के अंडे देने वाली मुर्गी' (अमर उजाला)

राम यादव  

यूरोपीय संघ के सभी 27 देशों में बीते 27 दिसंबर को कोरोना वायरस से बचाव के टीकाकरण का महाभियान शुरू हो गया है। यूरोपीय संघ के सभी देशों में अरबों डॉलर लगाकर जर्मन कंपनी 'बायोनटेक' और अमेरिकी कंपनी 'फाइजर' निर्मित कोविड-19 वैक्सीन मुफ्त लगाया जा रहा है। हालांकि टीके का विरोध करने वाले भी कम नहीं हैं। जर्मनी, ऑस्ट्रिया, इटली और स्पेन में टीके के विरुद्ध उग्र प्रदर्शन भी हो चुके हैं।

अरबों डॉलर मंहगा यह अभियान न केवल टीके की खोज करने वाली 'बायोनटेक' और टीके का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रही 'फाइजर' के लिए 'सोने के अंडे देने वाली मुर्गी' बन गया है, बल्कि उनको भी मालामाल कर रहा है, जिन्होंने इन कंपनियों के शेयरों को सही समय पर खरीदा। टीके के खोजी-वैज्ञानिक, तुर्की मूल के जर्मन प्रोफेसर ऊर शहिन और उनकी डॉक्टर पत्नी औएजलेम तुरेचि का तो भाग्य ही खुल गया।

पर उनसे भी अधिक बांछें खिल गई हैं दो जर्मन जुड़वां भाइयों की। अन्द्रेयास और टोमास श्ट्रुइंगमान नाम के ये दोनों जुड़वां भाई औषधि उद्योग के पुराने दिग्गज हैं। अन्द्रेयास ने डॉक्टरी की पढ़ाई की और टोमास ने औद्योगिक प्रबंधन की। 1980 में दोनों ने 'हेक्साल' नाम की जेनरिक दवाएं बनाने वाली नई कंपनी की स्थापना की। इस कंपनी को 2005 में दोनों भाइयों ने लगभग पांच अरब यूरो में बेच दिया (आजकल एक यूरो करीब 90 रुपये के बराबर है)।

दोनों चाहते, तो इस पैसे से आजीवन गुलछर्रे उड़ा सकते थे, किंतु इस पैसे को उन्होंने बड़े पैमाने पर मेडिकल जीन-तकनीक के शोधकार्यों में लगाना शुरू कर दिया। यह निर्णय काफी जोखिम भरा था। एक तो जीन-तकनीक जर्मनी में बहुत पसंद नहीं की जाती, फिर उससे जुड़े शोधकार्यों का कोई परिणाम निकलने में बहुत समय लगता है और परिणाम भी नैतिक-व्यावहारिक दृष्टि से कई बार संदेहास्पद होते हैं। पर श्ट्रुइंगमान बंधुओं का दांव चल गया।

लगभग उसी समय कैंसर की रोकथाम के लिए जीन-तकनीकी उपाय खोज रहे प्रो. ऊर शहिन और उनकी पत्नी डॉ. औएजलेम तुरेचि को अपनी पहली कंपनी 'गानीमेड फार्मास्युटिकल्स' में पैसा लगाने वाले निवेशकों की तलाश थी। यह तलाश सितंबर 2007 में उन्हें श्ट्रुइंगमान बंधुओं के पास ले गई। शहिन ने उनसे कहा कि वे कैंसर की एक ऐसी दवा पर काम कर रहे हैं, जो कोशिकाओं में आनुवंशिक संदेशवाही 'मेसेंजर रिबोन्यूक्लिइक ऐसिड' कहलाने वाली जीन-तकनीक पर आधारित है। इसका लक्ष्य है- कैंसर-निरोधक टीका बनाना। श्ट्रुइंगमान बंधु प्रो. शहिन की कंपनी में 15 करोड़ यूरो के निवेश के लिए राजी हो गए।

शहिन-तुरेचि दंपति का कारोबार बढ़ता ही गया। 2008 में उन्होंने फ्रैंकफर्ट के पास माइन्स में 'बायोनटेक' नाम की एक नई शेयर-धारक कंपनी बनाई। उन्होंने अपनी कंपनी 'गानीमेड' को 2016 में, 40 करोड़ यूरो में एक जापानी औषधि निर्माता को बेच दिया। इस पैसे से 'बायोनटेक' में अपना हिस्सा बढ़ाते हुए उसके 17 प्रतिशत शेयर अपने नाम कर लिए। ये शेयर अब पांच अरब डॉलर से अधिक मूल्यवान हैं। समझा जाता है कि कम से कम आधे शेयर उन्हीं श्ट्रुइंगमान बंधुओं के पास हैं, जिन्होंने अपने जोखिम भरे निवेश से एक दशक पहले, शहिन-तुरेचि दंपति के हाथ मजबूत किए थे।

'बायोनटेक' के शेयरों ने दिसंबर 2020 में प्रो. शहिन का नाम संसार के 500 सबसे बड़े धनकुबेरों की सूची में लिखवा दिया। कोविड-19 से बचाव के टीके BNT162b2 को जबसे यूरोप और अमेरिका में औपचारिक अनुमति मिल गई है, तबसे 'बायोनटेक' के शेयरों का भाव लगातार बढ़ता जा रहा है। वैसे अरबों डॉलर कमाने वाले एक वही नए धनकुबेर नहीं बने हैं, बल्कि उनकी सफलता ने अनेक ऐसे लोगों को भी करोड़पति या अरबपति बना दिया है, जिन्होंने सही समय पर उनकी कंपनी के शेयर खरीदे या उनके टीके के सही तापमान पर भंडारण एवं परिवहन की ठेकेदार कंपनियों के मालिक हैं। शहिन-तुरेचि दंपति की लगन, प्रतिभा, सादगी और धैर्य ने आज न केवल उन्हें दुनिया का एक बहुचर्चित दंपति और धनकुबेर बना दिया है, बल्कि कोरोना जैसी दुर्दांत वैश्विक महामारी से लड़ने का अस्त्रदाता भी सिद्ध कर दिया है। वे जर्मनी की छवि के लिए भी एक अच्छा विज्ञापन बन गए हैं।

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संकट को बेकार न जाने दें, भाजपा और पीएम मोदी पर कई सवाल उठा रहे रामचंद्र गुहा (अमर उजाला)

रामचंद्र गुहा 

भारतीयों के स्वास्थ्य और भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिहाज से 2020 एक खराब साल साबित हुआ। अपनी प्रकृति और विचार से सत्तावादी मोदी-शाह की सत्ता ने महामारी का इस्तेमाल सांविधानिक लोकतंत्र को कमतर करने, और राज्य और समाज में अपनी पकड़ को मजबूत करने में किया है। अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सत्ता ने भारतीय संसद, भारतीय संघवाद, भारतीय प्रेस और भारतीय नागरिक संगठनों पर हमले किए हैं। आइए, इन पर विचार करें।

गुजरात का मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने विधायी प्रक्रिया की निरंतर अवज्ञा की। मुख्यमंत्री के रूप में उनके एक दशक पूरा करने पर तैयार की गई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि गुजरात के राज्य बनने के बाद से सारे मुख्यमंत्रियों की तुलना में मोदी के समय विधानसभा की सबसे कम बैठकें हुईं। जैसा कि सर्वविदित है कि विपक्ष के साथ ही अपनी खुद की पार्टी के विधायकों की सलाह को तवज्जो न देने के साथ ही मुख्यमंत्री मोदी अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों से भी बड़े नीतिगत फैसलों के संबंध में कम ही मशविरा करते थे। 

मोदी परामर्श के प्रति इसी अवज्ञा के साथ नई दिल्ली आए। उनके लिए संसद बहस के जरिये निर्णय लेने के सदन के बजाय भावोत्तेजक भाषण देने की जगह है। लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति का पक्षपाती रुख अपने नेता के विचार करने के तरीके के अनुरूप ही होता है। उनके सहायक भी इसी तरह से काम करते हैं। जरा विचार कीजिए कि किस तरह से राज्यसभा में कृषि विधेयकों को उपसभापति हरिवंश ने संसद के सारे नियमों और कायदों को दरकिनार कर और वोटिंग से इनकार कर पारित करवाया। लोकतांत्रिक प्रक्रिया की इस अनदेखी पर लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचार्य ने लिखा कि 'संसद की प्रणाली इस तरह से बनाई गई है कि विपक्ष अपनी बात कह सके और सरकार अपना काम कर सके। यदि विपक्ष अपनी बात न कह सके, तो एक लोकतांत्रिक संस्थान के रूप में संसद लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकती।'

जो लोग मोदी भक्त हैं या जो यह मानते हैं कि अंत भला तो सब भला, उन्होंने 'ऐतिहासिक' बताकर इन बिलों का स्वागत किया है। दूसरी ओर कहीं अधिक संदेह और इतिहास की गहरी समझ के साथ कृषि बिलों का समर्थन करने वालों ने सम्मानजनक ढंग से हमें संसद की ऐसी अवमानना के घनघोर नतीजे के प्रति आगाह किया है। जैसा कि वरिष्ठ वकील अरविंद दातार ने लिखा, 'यदि बिलों को संसद से इस तरह जबरिया पारित नहीं करवाया जाता, तो भारी आर्थिक नुकसान और दिल्ली के आसपास सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त होने से बचाया जा सकता था। इस आंदोलन ने हमें संसदीय प्रक्रिया के अनुपालन के बारे में सिखाया कि इन पर सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि भावना के साथ अमल होना चाहिए।' केंद्रीय मंत्री भले ही अर्बन नक्सलियों, खालिस्तानियों और विपक्षी दलों पर दोषारोपण करें, लेकिन जैसा कि दातार ने रेखांकित किया कि जिस असाधारण हड़बड़ी के साथ कृषि बिलों को दोनों सदनों से पारित करवाया गया, उससे यह संकट पैदा हुआ है, और यह महामारी से उपजे आर्थिक संकटों को और बढ़ाएगा। हाल ही में सरकार ने महामारी का हवाला देकर संसद के शीतकालीन सत्र को रद्द कर दिया, वह भी तब, जब केंद्रीय गृह मंत्री असम और पश्चिम बंगाल में बड़ी चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे थे।

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी दावा करते थे कि वह 'सहकारी संघवाद' पर विश्वास करते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने निर्ममता के साथ राज्यों के अधिकारों और जिम्मेदारियों में कटौती करनी चाही। इस मामले में भी किसान बिलों को उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। जैसा कि हरीश दामोदरण ने रेखांकित किया, 'चूंकि संविधान में स्पष्ट रूप से कृषि और बाजार, दोनों को राज्य सूची में रखा गया है, केंद्र राज्यों को इनसे संबंधित मामलों में प्रोत्साहित कर सकता है और लुभा सकता है। हालांकि वह खुद से कानून नहीं बना सकता।' इसके बावजूद समवर्ती सूची में शामिल खाद्य सामग्री के व्यापार और विपणन से संबंधित एक विषय की रचनात्मक (कु)व्याख्या के जरिये केंद्र ने राज्यों से मशविरा किए बिना ऊपर बताए गए ढंग से इन बिलों को पारित करवाया।

महामारी संघीय सिद्धांतों पर कहीं अधिक सामान्य ढंग से किए गए हमले की गवाह बन गई। औपनिवेशिक दौर के कानूनों और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम के जरिये केंद्र की शक्तियों में इजाफा किया गया। इस बीच, विपक्षी दलों के विधायकों को भाजपा से जुड़ने के लिए रिश्वत देकर, बहला-फुसलाकर या धमका कर उनकी राज्य सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश की गई। प्रधानमंत्री ने जिस तरह से महज चार घंटे के नोटिस पर लागू किए गए लॉकडाउन के लिए मध्य प्रदेश में नई सरकार के शपथ ग्रहण का इंतजार किया था, वह दिखाता है कि भाजपा को सत्ता की कैसी फिक्र है और भारतीयों के स्वास्थ्य को लेकर वह कितनी कम गंभीर है। संघवाद पर हमले के क्रम में भाजपा ने खासतौर से दो बड़े राज्यों पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र को निशाना बनाया है। राज्यपाल संविधान से कहीं अधिक हिंदुत्व के प्रति वफादार हैं और मोदी-शाह ने गैर भाजपा सरकार शासित राज्यों को उत्पीड़ित करने के लिए उनका इस्तेमाल किया है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान नरेंद्र मोदी अत्यंत गैरराजनीतिक नागरिक संगठनों के प्रति भी गहराई से अविश्वास जताते थे। इसी अविश्वास के साथ वह दिल्ली आए। वर्ष 2020 पहले से दबाव में आए गए एनजीओ पर और अधिक अंकुश लगाने वाला साबित हुआ। एक विश्लेषक के मुताबिक फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेग्यूलेशन) ऐक्ट में किया गया नया संशोधन अधिकारियों द्वारा मनमानी बदले की कार्रवाई करने के लिए किया गया। एनजीओ पर अंकुश लगाने से इस बिल का शिक्षा, स्वास्थ्य और लोगों की आजीविका, लैंगिक न्याय और वास्तव में भारत के लोकतंत्र पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा।

नरेंद्र मोदी कभी भी खुद के लिए सोचने वाले पत्रकारों को पसंद नहीं करते हैं, जैसा कि साढ़े छह साल में प्रधानमंत्री द्वारा एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित न करना दिखाता है। 2020 भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर बढ़ते हमले का गवाह बना। मार्च के आखिर में लॉकडाउन लागू गिए जाने के बाद शुरुआती दो महीनों में 55 पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, उन्हें धमकाया गया और उनकी गिरफ्तारी हुई। पत्रकारों पर सबसे अधिक हमले भाजपा शासित उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश में हुए। फ्री स्पीच कलेक्टिव की रिपोर्ट कहती है, 2020 भारत में पत्रकारों के लिए सबसे बुरा रहा।...पत्रकारों पर हमले और उनकी हत्याएं जारी रही। मीडिया में स्वघोषित सेंशरशिप खुला रहस्य है, सरकार ने ऑनलाइन मीडिया के लिए मीडिया नीति, फंडिंग और प्रशासनिक तंत्र के जरिये मीडिया को और नियंत्रित करना चाहा।

संसद, संघवाद, नागरिक समाज संगठन और प्रेस पर हमलों के अलावा 2020 भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को और अधिक कलंकित करने का गवाह बना। ऐसा भारत के दो सबसे ताकतवर राजनेताओं ने किया। गृह मंत्री अमित शाह की यह भूमिका भाजपा के बंगाल अभियान और दिल्ली के दंगों के बाद पुलिस की पक्षपाती कार्रवाई के दौरान नजर आई। वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की भूमिका हल्के-फुल्के आरोपों या बेबुनियाद मामलों में मुस्लिमों की बढ़ती गिरफ्तारी में नजर आई। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रधानमंत्री के हाल के भाषण के बावजूद स्पष्ट रूप से यह आदित्यनाथ का बहुसंख्यकवाद है, जो पार्टी के निष्ठावानों की भावनाओं को प्रदर्शित कर रहा है, जैसा कि भाजपा के मुख्यमंत्रियों द्वारा उत्तर प्रदेश जैसे पक्षपाती कानूनों और अभ्यास पर अमल को लेकर दिखाई जा रही उत्सुकता से प्रदर्शित हो रहा है। 

कृषि और श्रम से संबंधित नए कानूनों के पारित होने के बाद मुक्त बाजार समर्थक स्तंभकारों ने एक स्वर से कहना शुरू कर दिया, संकट बेकार नहीं गया है। यह कोरस भोलापन है, क्योंकि सतत आर्थिक विकास के लिए समान अवसर और कानून का राज चाहिए। मोदी-शाह के शासन में यह संभव नहीं। गुप्त इलेक्टोरल बांड के रूप में सहयोग करने वाले पूंजीपतियों को प्राथमिकता मिलेगी। दूसरी पार्टियों से भाजपा में जाने वाले राजनेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के सारे मामले खत्म हो गए। पुलिस, नौकरशाह यहां तक कि अदालतें तक कानून के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं के हितों के लिए काम करती हैं।

राज्य और निजी क्षेत्र को जवाबदेह बनाने के लिए स्वतंत्र प्रेस की पारदर्शी नजर, संसद में बहस और स्वतंत्र नागरिक संगठनों की जरूरत होती है। 2020 ने दिखाया कि ये चीजें पहले से और कम हुई हैं। अंत में, तब तक सामाजिक सौहार्द कायम नहीं हो सकता, जब तक कि राज्य और सत्तारूढ़ दल गैर हिंदुओं के प्रति निम्न व्यवहार करें।

प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के लिए राजनीतिक सत्ता, वैचारिक नियंत्रण और व्यक्तिगत गौरव भारतीय नागरिकों की आर्थिक और सामाजिक समृद्धि से ऊपर हैं। इसलिए उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के संस्थानों और भारतीय बहुलतावाद की परंपराओं को कमजोर करने के लिए संकट का उपयोग या दुरुपयोग किया, ताकि सत्तावादी और बहुसंख्यकवादी राज्य की स्थापना में तेजी लाई जा सके।


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प्रख्यात कवि शमशेर बहादुर सिंह के गांव में एक दिन (अमर उजाला)

रोहित कौशिक   

हिंदी के प्रख्यात कवि शमशेर बहादुर सिंह अपने एक शेर में कहते हैं, जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद/वही शमशेर मुजफ्फरनगरी है शायद। शमशेर जमीन से जुड़े कवि थे। इसीलिए वह मुजफ्फरनगर की मिट्टी से जुड़ा होने पर गर्व महसूस करते थे। उनका पैतृक गांव एलम मुजफ्फरनगर जनपद के अंतर्गत आता था, पर 2011 में शामली को नया जनपद बना दिया गया। नए परिसीमन के अनुसार एलम शामली जनपद के अंतर्गत आता है। दरअसल मंगलेश डबराल, शमशेर बहादुर सिंह पर केंद्रित शमशेर रचनावली पर काम कर रहे थे। मंगलेश जी की मृत्यु से करीब दो महीने पहले मेरे पास उनका फोन आया। उन्होंने मुझसे कहा कि आप शमशेर के गांव एलम जाकर उनके परिवारिक जीवन और वहां के समाजशास्त्र की जानकारी प्राप्त करो। मैंने एलम जाकर कुछ जानकारी और फोटो उन्हें भेजे, तो वह बहुत खुश हुए। उन्होंने मुझसे कहा कि तुमने मेरा बहुत बड़ा काम कर दिया। ये जानकारियां शमशेर रचनावली में बहुत काम आएंगी। और जब मंगलेश जी की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ, तो मैं स्तब्ध रह गया।

हिंदी भाषी समाज अपने लेखकों और कवियों से इस कदर बेखबर है कि लोग प्रतिष्ठित रचनाकारों को भी उनके अपने ही गांव में नहीं जानते। शमशेर का जन्म एलम में हुआ, पर पिता की नौकरी के कारण वह बचपन से ही एलम से बाहर रहे। उनकी शिक्षा देहरादून में हुई और उनकी कर्मभूमि भी मुजफ्फरनगर नहीं रही। हालांकि पिछले कुछ समय से स्थानीय अखबारों में शमशेर के बारे में छपने लगा है, इसलिए उनके गांव में  लोग शमशेर को जानने लगे हैं। अब एलम में शमशेर के चचेरे भाई बिशंभर सिंह पंवार का परिवार रहता है।

गांव में शमशेर का पुराना मकान अब मौजूद नहीं है। जहां शमशेर के पिता जी रहते थे, वहां शमशेर के भतीजे बलराज सिंह का परिवार नवनिर्मित घर में रहता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि एलम गांव में शमशेर से जुड़ी कोई ऐसी जगह या सामग्री मौजूद नहीं है, जो उनकी स्मृति को ताजा कर सके। बलराज सिंह के पास शमशेर की कुछ किताबें जरूर मौजूद हैं। हाल ही में एलम नगर पंचायत ने शमशेर के सम्मान में शमशेर बहादुर सिंह स्मृति जलप्रपात का निर्माण जरूर कराया है। इस जलप्रपात पर शमशेर का संक्षिप्त परिचय और उनकी पुस्तकों के नाम लिखे गए हैं। इसकी स्थिति देख लग रहा था कि इसमें पानी का प्रवाह होता ही नहीं है। इसका निर्माण औपचारिकता के लिए किया गया है। कई जगह लिखा मिलता है कि शमशेर का जन्म देहरादून में हुआ था। जब मैंने बलराज सिंह से पूछा, तो उन्होंने बताया कि शमशेर का जन्म एलम में ही हुआ था।

डॉ. रंजना अरगड़े ने भी यही बात कही। डॉ. अरगड़े गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद में हिंदी विभागाध्यक्ष रही हैं और शमशेर अंतिम दिनों में काफी समय तक उनके यहां रहे थे। इसी तरह हर जगह शमशेर की जन्मतिथि 13 जनवरी 1911 लिखी मिलती है। एलम गांव में शमशेर की स्मृति में निर्मित जलप्रपात पर भी उनकी जन्मतिथि यही लिखी गई है। पर शमशेर के छोटे भाई डॉ. तेजबहादुर चौधरी अपनी पुस्तक मेरे बड़े भाई शमशेर जी में लिखते हैं, 'भइया की जन्म की तिथि भी गलत अंकित की गई जगह-जगह। मैंने जो जन्म तिथि दी है, वह उनके शिक्षा संस्थानों के प्रमाण-पत्रों से दी है, जो कि तीन जनवरी 1911 है, न कि 13 जनवरी 1911। फिर एक बात और पिताजी बताया करते थे कि हम दोनों के नाम जन्म के समय और ही रखे गए थे। भइया का नाम था कुलदीप सिंह और मेरा रामप्रसाद।'

मैंने सुझाव दिया गांव में शमशेर से जुड़ी चीजों का संग्रह किया जाना चाहिए, ताकि एक छोटा-सा संग्रहालय बनाया जा सके। शमशेर को प्यार करने वाले इस गांव को देखना चाहते हैं, पर यहां आकर निराश होते हैं। शमशेर के परिजन वादा करते हैं कि वे जल्दी ही शमशेर से जुड़ी हुई चीजें जरूर गांव में लाएंगे। एलम से लौटते हुए मेरे दिमाग में वे शब्द घूमने लगते हैं, जो डॉ. तेजबहादुर चौधरी ने अपनी पुस्तक में लिखे हैं-'बहुत पहले मैंने अपने बड़े भाई शमशेर से कहा कि आपने जो भी लिखा है, वह इधर-उधर बिखरा पड़ा हुआ है, कुछ स्वार्थी उन्हें प्रकाशित कराकर लाभ उठाना चाहते हैं। वह बोले-उठाने दो, मैंने जो भी लिखा है, अपनी आत्मा की शांति के लिए लिखा है। और साहित्य जगत के लिए लिखा है। उससे पैसा कमाना, अपना महत्व जताना मैं ठीक नहीं समझता। साहित्य गलियों में साग-सब्जी की तरह नहीं बिकता, वह तो जमाने भर के मूल्यांकन करने वालों के लिए, उसमें और योगदान करने वालों के लिए साहित्यकार छोड़ जाता है, न कि चील-कौवों की तरह उसे नोंच-नोंचकर खाने वालों के लिए।' शमशेर के ये शब्द उतने ही सच्चे है, जितने शमशेर सच्चे थे।

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इस साल हो जाए कुछ हवा, मिट्टी, पानी की बातें (अमर उजाला)

अनिल प्रकाश जोशी  

नए साल की अन्य प्राथमिकताओं के बीच आज भी प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति हमारी चुनौतियां बरकरार हैं। इस सदी के पिछले दो दशकों में हमने इस पर चर्चा जरूर की, पर अब भी हम उन संकल्पों से दूर हैं, जो हमने इसे बेहतर करने के लिए थे। विकास जैसा शब्द हमें विनाश की तरफ ज्यादा ले गया। बस मुट्ठी भर शहर और कस्बे उस विकास का दम भर सकते हैं, लेकिन सवाल जब गांव का होगा, तो वे आज भी उस विकास से बहुत दूर हैं। शहर और कस्बे भी आज विकास के कारण विनाश की तरफ बढ़ चुके हैं। बड़े शहरों की हवा की बात हो या फिर सूखती नदियों की, हमने व्यावहारिक समाधान निकालने की कोशिश नहीं की।

अपने देश में पर्यावरण की चिंता 1982 में तब शुरू हुई, जब भोपाल की गैस त्रासदी से अनेक लोगों की जान गई थी। वर्ष 1986 में हमने हवा, मिट्टी और जल संरक्षण के लिए कुछ नियम तैयार किए और यह कानूनी शृंखला बढ़ती चली गई व कई तरह के नियम-कानून हमारे बीच में आए। वैसे तो देश में वर्ष 1638 से 1800 के आसपास मुगलों ने जब भारी संख्या में पेड़ काट डाले थे, तब अकबर जैसे महान शासक ने शिकार बंद कर वन संरक्षण का एक बड़ा उदाहरण पेश किया था। ब्रिटिशों के समय में भी शोर-शराबे के लिए वर्ष 1853 में कानून लाए गए। स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1950 में जब संविधान बना, तब किसी भी कानून में पर्यावरण और प्रकृति की कोई हिस्सेदारी नहीं थी। ये कानून इस पर ज्यादा केंद्रित थे कि हम किस तरह गरीबी से मुक्त हो सकते हैं।

लेकिन वर्ष 1972 में यूनाइटेड नेशन कॉन्फ्रेंस ह्यूमन इन्वायर्नमेंट को लेकर स्वीडन में हुई बैठक में हममें प्रकृति को बचाने की चिंता पैदा हुई। वर्ष 1972 में एक बड़ी घोषणा हुई, जिसे स्टॉकहोम डिक्लेरेशन कहा गया। उसी दौरान 1976 में भारतीय संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद 48 ए और 51 ए जोड़े गए, जिनमें उल्लिखित था कि किस तरह हमें हवा, मिट्टी और पानी बचाना चाहिए। उससे पहले 1974 में लाए गए 42 वें संविधान संशोधन में कहा गया कि प्रकृति के संरक्षण के लिए काम करना राज्यों की जिम्मेदारी है। अनुच्छेद 47 में कहा गया कि जीवन को बेहतर बनाने का दायित्व राज्य की जिम्मेदारी का हिस्सा हो। फिर 51 ए आर्टिकल भी आया, जिसका मतलब था कि हर व्यक्ति एवं संगठन का दायित्व होगा कि वे प्रकृति के संरक्षण के प्रति गंभीर हों। समय-समय पर न्यायपालिका ने इसमें जरूरी दखल दिया। इन सबके बावजूद गंभीर नतीजे नहीं आए। सच तो यह कि आर्टिकल 42 का जिक्र करके हमने अपने अधिकारों की तो चिंता की, पर कभी अनुच्छेद 51 ए को गंभीरता से नहीं लिया, जो प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के दायित्व की याद दिलाता है।

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने कहा कि उदासीनता की अति हो चुकी है और प्रत्येक देश को अब प्रकृति के संरक्षण के लिए चिंतित होना चाहिए। हम प्रकृति का कम से कम उपभोग करें, तभी पृथ्वी बचेगी। जब कोरोना महामारी ने दुनिया की चूलें हिला दी है, तब संयुक्त राष्ट्र महासचिव की यह टिप्पणी बहुत अर्थपूर्ण है। आज पारिस्थितिक जिम्मेदारी पर व्यापक रूप से विचार करने की जरूरत है। यानी अगर आप प्रकृति का उपभोग करते हैं, तो जोड़ने के प्रति भी उतना ही दायित्व महसूस करें। व्यक्ति हो, संगठन हो या राज्य-प्रकृति के नियम का पालन करना सबका दायित्व होना चाहिए। तभी हम प्रकृति व पर्यावरण का संरक्षण कर सकते हैं। हर राज्य और संगठन का इकोलॉजिकल ऑडिट होना चाहिए।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अपनी स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी के तहत बहस की शुरुआत कर एक ऐतिहासिक पहल की है। पिछले महीने हुई इस वर्चुअल बैठक में सभी लोगों ने इस पर चर्चा की कि लोग किस तरह अपना पारिस्थितिक दायित्व निभा सकते हैं। न्यायपालिका ने भी महसूस किया कि हम केवल नियमों पर निर्भर नहीं रह सकते और नियमों के उल्लंघन के बाद मिले दंड से भी लाभ नहीं होता, क्योंकि प्रकृति का नुकसान तो हो ही जाता है। इसलिए जहां अब राज्य को कटिबद्ध होना है, वहीं राज्य में सक्रिय तमाम संस्थानों को भी अपना दायित्व समझना होगा। लिहाजा सरकारें इस तरह के निर्देश तैयार करते हुए जागरूकता अभियान के तहत पारिस्थितिक दायित्व के प्रति चेते और चेताए। निर्देश को तीन हिस्सों में बांट दिया गया। जैसे, राज्य को उच्च न्यायालय के 2018 के आदेश के अनुसार सकल पर्यावरण उत्पाद का अनुपालन करना होगा, राज्यों में स्थित तमाम संस्थान प्रकृति का जितना उपभोग करते हैं, उसका ऑडिट करें और उसके रिटर्न के रास्ते आएं, और संभव हो, तो शहर में रहने वाले लोग भी प्रकृति के उत्पादों के उपभोग की वापसी के बारे में सोचें।

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कोरोना वायरस ने दुनिया में मचाई तबाही, क्या चीन को घेरा जा सकेगा? (अमर उजाला)

प्रशांत दीक्षित  

दुर्भाग्यवश कोविड-19 के प्रसार का दुनिया भर में राजनीतिकरण हो गया, जबकि इस अपराध की गहराई से जांच होनी थी। जिस चीन ने दुनिया भर में संक्रमण फैलाया, वह छूट गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन ने अपनी प्रयोगशालाओं में इस वायरस को पैदा किया और पूरे विश्व को संक्रमित कर दिया। शुरुआती दौर में किसी देश को कोरोना के वैश्विक प्रसार के पीछे चीन का हाथ होने पर संदेह भी नहीं हुआ। चीन ने कोरोना वायरस का इस्तेमाल रणनीतिक हथियार के तौर पर किया। चीन सुनियोजित ढंग से पश्चिमी दुनिया की आर्थिक ताकत को ध्वस्त करना चाहता था। हम लोगों ने यह देखा भी कि महामारी का प्राथमिक फोकस कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका-यानी जी-7 देशों को निशाना बनाना था। जापान को छोड़ दें, तो दुनिया के इन आर्थिक नेताओं ने भारी तबाही का सामना किया। और ताजा आंकड़े भी यही बताते हैं कि विकसित पश्चिमी देशों में नुकसान ज्यादा है। 

पश्चिमी देशों में मौतों का आंकड़ा देखें, तो अमेरिका में 3,54,000, ब्रिटेन में 75,000, फ्रांस में 64,000, जर्मनी में 34,000, इटली में 74,000 और कनाडा में 15,000 मौतें हुईं। इन देशों की तुलना चीन से कीजिए, जहां मौत का आंकड़ा सिर्फ 4,700 है। जबकि भारत में1,46,000 लोगों ने कोविड-19 के कारण अपनी जान गंवाई। इस बारे में पहले ही बताया जा चुका है कि 2019 में बीजिंग ने कोविड-19 से संक्रमित हुबेई प्रांत के लोगों को, वुहान शहर उसी राज्य में है, चीनी नववर्ष की छुट्टियों के अवसर पर रियायती हवाई टिकट पर अमेरिका और यूरोप के देशों में भेजा। यूरोप-अमेरिका को वायरस के खतरे के बारे में देर से पता चला और जनवरी के आखिर में जाकर उन्होंने चीन की उड़ानों पर रोक लगा दी। लेकिन तब तक संक्रमित चीनियों द्वारा उन देशों में व्यापक पैमाने पर संक्रमण फैल चुका था। हैरानी तो इस पर भी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को विगत अक्तूबर तक भी कोविड-19 के वैश्विक प्रसार में चीन के हाथ के बारे में ठीक-ठीक पता नहीं था, ताकि वह अपने विशेषज्ञों को चीन भेजकर वस्तुस्थिति के बारे में पता लगाए। पिछले महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने यहां से प्रमाणित 10 अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों को चीनी शहर वुहान भेजने की अनुमति दी है। अनुमान यही है कि इसी महीने ये वैज्ञानिक कोरोना वायरस के प्रसार में बीजिंग का हाथ होने से संबंधित तथ्यों की जांच करेंगे। लेकिन सच्चाई यही है कि चीन की भूमिका की जांच करने के मामले में बहुत देर हो गई है।

विगत सितंबर में एक चीनी वैज्ञानिक डॉ. ली मेंग यान ने, जो फिलहाल अमेरिका में छिपी हुई हैं, सार्वजनिक तौर पर इस तथ्य का खंडन किया कि कच्चे मांस के बाजार से कोविड-19 का संक्रमण फैला। डॉ. ली के मुताबिक, उनके पास इसके सुबूत हैं कि कोरोना वायरस चीनी सैन्य प्रयोगशालाओं से फैला। स्पष्ट है कि जैविक हथियारों से संबंधित वैश्विक समझौते का उल्लंघन हुआ है। जबकि चीन ने भी इस समझौते पर दस्तखत किए हैं। डॉ. ली के अनुसार, विगत दिसंबर में जब वह सार्स-कोव-2 की जांच कर रही थी, उससे पहले से मानव से मानव संक्रमण व्याप्त था। एक बेहद हैरान करने वाली बात यह है कि कोरोना संक्रमण का असर उन देशों में उतना भयावह नहीं है, जिन देशों के साथ चीन के बेहतर रिश्ते हैं, और जिन देशों को चीन ने कर्ज दिया है और उसकी परियोजनाएं चल रही हैं। उन देशों में कोरोना से हुए नुकसान का आंकड़ा देखने पर ही असलियत सामने आ जाती है।

उदाहरण के लिए, इंडोनेशिया में 22,000, नाइजीरिया में 1,200 और पाकिस्तान में 10,000 मौतें हुईं। चीनियों की निरंतर आवाजाही के बावजूद इन देशों की स्थिति खराब नहीं हुई। जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के आंकड़े के अनुसार, इसी दौरान दुनिया भर में कोरोना संक्रमितों की संख्या 3.6 करोड़ रही, जबकि 10 लाख मौतें हुईं। एक तरफ चीन जहां कोविड-19 महमारी में उसकी भूमिका की जांच को खारिज करता रहा है, वहीं यह भी साफ नहीं है कि उसने महामारी से संबंधित अपने देश के आंकड़ों को सुरक्षित रखा है या नहीं। हाल ही में महाराष्ट्र के एक बेहद नामचीन अस्पताल के महामारी विशेषज्ञ ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर केंद्र सरकार से चीन सरकार से महामारी से संबंधित आंकड़ा हासिल करने की मांग की, ताकि कारगर वैक्सीन तैयार की जा सके। याचिका में कहा गया कि कारगर वैक्सीन तैयार करने के लिए ग्राउंड जीरो (जहां से वायरस की शुरुआत हुई) का सटीक अध्ययन जरूरी है। यह याचिका खारिज कर दी गई। 


दरअसल सरकार इस मुद्दे पर चीन से टकराव नहीं चाहता। इस मामले में सभी देशों को चीन पर दबाव बनाना होगा, तभी बात बनेगी। इसलिए भारत ने ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ द्वारा चीन की भूमिका की जांच की मांग का समर्थन किया। यह अलग बात है कि चीन की सक्रियता से यह वैश्विक कोशिश भी बेकार हो गई। ऐसे में, सवाल यह है कि क्या विश्व स्वास्थ्य संगठन इस मामले में निरपेक्ष जांच करेगा, जिससे कि चीन की असलियत सामने आ सके। चूंकि चीन को घेरने में पहले ही बहुत देर हो गई है, ऐसे में, संभावना यही है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन जांच का वही निष्कर्ष देगा, जो चीन चाहेगा। इस मामले में सच्चाई जान पाना बेहद कठिन है। लेकिन अमेरिका के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे पर व्यापक बहस कारगर हो सकती है। पर अमेरिका फिलहाल नेतृत्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। नए राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा जिम्मेदारी संभालने के बाद ही इस मोर्चे पर कुछ उम्मीद की जा सकती है। 


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फिर से जीवन के पटरी पर लौटने की उम्मीद (अमर उजाला)

मीराबाई चानू 

मुझे उम्मीद है कि नया साल महामारी से मुक्त होगा और हम सभी फिर से पुरानी जिंदगी की ओर लौट सकेंगे। युवा हों या बुजुर्ग सभी को न सिर्फ सब्र रखना होगा, बल्कि अनुशासन के साथ इस महामारी का सामना करना है। पूरी दुनिया में जिस तरह कोरोना को दूर भगाने के लिए वैक्सीन का निर्माण हो रहा है, उससे उम्मीद है जीवन फिर से पटरी पर लौटेगा। कोरोना ने खेलों की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया है। खिलाड़ी भी घरों में कैद होकर रह गए। युवाओं से मैं यही कहना चाहूंगी कि घर में भी रहकर वे अपने शरीर को चलाते रहें, जैसा मैंने लॉकडाउन के दौरान एनआईएस, पटियाला के अपने हॉस्टल के कमरे में किया। मैं फोन पर अपने कोच विजय शर्मा के संपर्क में रही और उनके दिशा-निर्देशों का पालन करती रही।


कोरोना ने जब दस्तक दी, तब मेरी टोक्यो ओलंपिक की तैयारियां चरम पर थीं। जब महामारी के चलते ओलंपिक को 2021 के लिए खिसका दिया गया, तो हर खिलाड़ी की तरह मुझे भी थोड़ा धक्का लगा। सारी तैयारियां धरी की धरी रह गईं। एक पेशेवर खिलाड़ी की तैयारियां अलग तरह की होती हैं। उसे अपने सर्वश्रेष्ठ को ओलंपिक जैसे आयोजन के लिए बचाकर रखना होता है। मैं भी अपने सर्वश्रेष्ठ की ओर बढ़ रही थी, लेकिन ठीक है, अब मैं इसे सकारात्मक रूप से ले रही हूं। हालांकि वेटलिफ्टिंग ऐसा खेल है कि अगर आपने तैयारी बंद कर दी, तो शून्य पर पहुंचने में देर नहीं लगती है। लॉकडाउन के बाद जब एनआईएस में दोबारा ओलंपिक की तैयारियों का कैंप शुरू हुआ, तो मैंने फिर से तैयारियां शुरू कीं। लेकिन मुझे थोड़े दिन बाद पीठ में दर्द का एहसास हुआ। मुझे लगा, मेरी पुरानी चोट फिर से उभर आई है। ठीक ऐसा ही हुआ। मैंने कोच विजय शर्मा से बात की, उन्होंने इस बारे में फेडरेशन को अवगत कराया। इस तरह अमेरिका में मेरे इलाज का इंतजाम कराया गया। अब मैं वापस लौट आई हूं।


दरअसल वजन उठाने वाले खेल वेटलिफ्टिंग में एक दिन भी ट्रेनिंग छोड़ने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पर अब मैं आश्वस्त हूं। मैं युवा खिलाड़ियों से कहना चाहती हूं कि कितनी भी विपरीत परिस्थतियां हों, उन्हें सकारात्मक ढंग से लें। मुझे याद है, लॉकडाउन के दौरान मेरी मां मणिपुर में थीं और वह फोन पर रोजाना मुझसे कहती थीं, बेटा, मास्क पहन रखा है न, कहीं बाहर तो नहीं जा रही हो। मैं हमेशा मास्क लगाती हूं। अपने और अपने उपकरण को सैनिटाइज करती हूं, तब ट्रेनिंग शुरू करती हूं। मुझे विश्वास है वैक्सीन आने के बाद सब ठीक हो जाएगा। देश और दुनिया में खेलों के मैदान में दोबारा फिर से चहल-पहल होगी।


(पद्मश्री, खेल रत्न पुरस्कार प्राप्त और वेटलिफ्टिंग में पूर्व विश्व चैंपियन हैं।) 

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जैव विविधता के सम्मान का लें संकल्प (अमर उजाला)

मोहन हिराबाई हिरालाल  

जल, जंगल, जमीन के साथ प्रकृति हमारे जीवन का आधार है। सिर्फ मनुष्य ही नहीं, सारी जीवसृष्टि इस पर निर्भर है। सभी एक दूसरे से जुड़े हैं, जिसे हम जीवन शृंखला कहते हैं। अगर इसकी एक कड़ी भी टूटती है, तो सारी व्यवस्था नष्ट हो जाती है। हम सभी प्रकृति के अभिन्न अंग हैं, इसलिए हमारी कुछ जिम्मेदारियां भी हैं। हमने प्रकृति के अनुरूप खुद को ढालने की जगह


अहंकारवश खुद को प्रकृति से ऊपर मान लिया। प्राकृतिक संसाधनों के-चाहे वह पानी हो, अन्न हो या मिट्टी-गलत प्रबंधन के कारण उसके गंभीर परिणाम हमें भुगतने पड़ रहे हैं। प्राकृतिक जल चक्र को खंडित कर हमने पानी का संकट खड़ा किया है।

जब हमने 21वीं सदी में प्रवेश किया, तब दुनिया भर में पर्यावरण को लेकर चिंतित लोगों ने विश्व पर्यावरण परिषद का आयोजन किया। पहली बार दुनिया भर के लोग इस पर सहमत हुए कि जैव विविधता के नुकसान से हमारे जीवन और पृथ्वी पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। इसलिए जैव विविधता का संरक्षण जरूरी है, ताकि सबको न्यायोचित लाभ मिले। रियो डि जिनेरियो में हुए सम्मेलन में सभी देशों ने स्वीकार किया कि जैव विविधता प्रबंधन का सही काम लोग ही कर सकते हैं, कोई राज्य या केंद्रीय सत्ता नहीं।

भारत सरकार ने भी वर्ष 2002 में जैव-विविधता अधिनियम बनाया। इस कानून की धारा 41 में यह प्रावधान है कि ग्राम पंचायत, नगर पालिका, महानगर पालिका को अपनी जैव विविधता का सही प्रबंधन करने के लिए ऐसी समिति का गठन करना है। नए साल पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम जहां रहते हैं, अपनी आजीविका से जुड़े हैं, वहां हम अपने जीवन से जुड़े जल, जंगल, जमीन, जानवर, जैव-विविधिता के प्रबंधन के संबंध में अपनी छोटी ग्रामसभा (जो ग्राम पंचायत नहीं है) में सर्वसम्मति से निर्णय लेकर उस पर अमल करेंगे। मनुष्य द्वारा प्रकृति का सही प्रबंधन न हुआ, तो गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता जैसा बड़ा संकट सामने से आ रहा है। विकास के नाम पर हमने प्रकृति से खिलवाड़ किया, जिससे हमारी संस्कृति, सभ्यता पर भी खतरा मंडरा रहा है। मोहनजोदड़ो का उदाहरण हमारे सामने है, जिसने पानी के बारे में नहीं सोचा, और वह सभ्यता खत्म हो गई।हमें उन गलतियों से सीखना होगा।


नए साल में हम यह संकल्प करें कि प्रकृति और जैव-विविधता के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। और उसके प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाने के लिए बुनियादी इकाई ग्राम सभा को हम धारा 41 के मुताबिक 'जैव विविधता प्रबंधन समिति' बनाएंगे। इन कानूनों पर सही ढंग से अमल हो, तो एक बड़े संकट से हम उबर सकते हैं। ग्रामसभा ही जैव विविधता प्रबंधन समिति, सामुदायिक वन प्रबंधन समिति और जल प्रबंधन समिति का दायित्व निभाएगी, तो सभी कानूनों से उसे शक्ति प्राप्त होगी। इसे मनरेगा से जोड़कर पैसे की समस्या का हल निकाला जा सकता है। ऐसा कर हम समता और अहिंसा पर आधारित समाज का निर्माण कर सकेंगे।


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दुनिया भर में धाक जमाने का समय, भारत के लिए रहीं ये उपलब्धियां (अमर उजाला)

शशांक  

कोरोना के कारण गुजरा साल पूरी दुनिया के लिए संकटपूर्ण रहा। उस लिहाज से हमारे लिए विदेश नीति के मोर्चे पर बीता साल कमोबेश उपलब्धि भरा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय संबंध आगे बढ़ाने की नीति के कारण अमेरिका के साथ हमारे संबंध तेजी से आगे बढ़े। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड का नया अवतार सामने आया है। इसे पहले सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था, अब आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाने लगा है। एशिया-प्रशांत की परिभाषा में केवल पैसिफिक क्षेत्र और हिंद महासागर का थोड़ा-सा हिस्सा ही नहीं, बल्कि पूरा हिंद महासागर क्षेत्र आ गया है। एक उपलब्धि यह भी है कि एशियाई मुल्कों पर चीन के हावी होने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगने लगा है। 

हालांकि भारत के साथ सीमा विवाद को लेकर चीन गतिरोध बनाए हुए है। उसने लद्दाख में यथास्थिति बदलने की कोशिश की। इससे संबंधों में नई कड़वाहट पैदा हुई, पर पूरी दुनिया ने भारत के रुख को सराहा। उम्मीद करनी चाहिए कि इस मामले में अंततः भारत को ही सफलता मिलेगी। पाकिस्तान की जनता में चीन के प्रति नाराजगी बढ़ रही है। अन्य देशों में भी जिस तरह चीन ने भारी कर्ज देकर उस पर हावी होने की रणनीति अपनाई है, उसके खिलाफ भी आवाजें उठने लगी हैं। भारत के प्रति अन्य देशों का भरोसा बढ़ा है कि यह एक लोकतांत्रिक विकल्प दे सकता है और अन्य लोकतांत्रिक देशों-जैसे जापान या अमेरिका के साथ मिलकर उनके हित में सोच सकता है। इसे भारत की विदेश नीति के लिहाज से उपलब्धि मानी जा सकती है। श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव, अफगानिस्तान के साथ भारत के संबंध कमोबेश ठीक-ठाक ही रहे हैं। हालांकि अफगानिस्तान से अमेरिका अपनी सेना को वापस बुलाना चाहता है, इसलिए वहां उसने पाकिस्तान को ज्यादा तरजीह दी। नेपाल में भी चीन तेजी से अपनी पैठ बनाता जा रहा है। लेकिन जब चीन ने नेपाल के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया, तब फिर नेपाल का मोहभंग हुआ और भारत की तरफ उसका झुकाव बढ़ा है। 

उम्मीद है कि नए वर्ष में नेपाल में एक ऐसी सरकार का गठन होगा, जो भारत के साथ बेहतर संबंध बनाने की हिमायती होगी। यह भी उम्मीद है कि अमेरिका में जब नई सरकार सत्ता संभालेगी, तो वह फिर से अपनी एशिया नीति पर पुनर्विचार करेगी कि वह क्वाड को कितना आगे बढ़ाएगी, आतंकवाद के मुद्दे पर किस तरह पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखेगी। यह भी देखना होगा कि फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (फाटा) अपनी अगली बैठक में पाकिस्तान को काली सूची में डालता है या नहीं। नए वर्ष में भारत के लिए यह अवसर भी और चुनौती भी है कि वह पाकिस्तान पर किस तरीके से दबाव बढ़ाए, कि वह आतंकवाद को बढ़ावा न दे सके।

वर्ष 2020 में भारत ने आसियान देशों के मुक्त व्यापार समझौते (आरसीईपी) में शामिल न होने का फैसला किया, जो मेरी समझ से ठीक फैसला नहीं था। क्योंकि एशिया के बाकी मुल्क भारत को साथ लेकर चलना चाहते थे, ताकि चीन पर अंकुश रखा जा सके। आरसीईपी में भारत के शामिल न होने पर उन देशों को यह खतरा लग रहा है कि अब चीन अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश करेगा। ऐसे में नए साल में भारत के लिए यह चुनौती रहेगी कि एशिया के बाकी देशों से वह किस तरह से आपूर्ति शृंखला स्थापित करे, क्योंकि अगर हम भारत को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं, तो एशिया की, अफ्रीका की, जापान की जो कंपनियां चीन से निकलना चाहती हैं, उन्हें अपने यहां आकर्षित करने की चुनौती होगी।

अमेरिका में इस साल नई सरकार आएगी। ऐसे में भारत को अमेरिका के साथ और बेहतर संबंध बनाने के लिए कोशिश करनी होगी, ताकि क्वाड और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका का साथ मिल सके, और चीन की बढ़ती आक्रामकता पर अंकुश लगाया जा सके तथा आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाया जा सके। एशिया-अफ्रीका को साथ लेकर अपने आर्थिक एवं सामरिक हितों को आगे बढ़ाने की चुनौती भी नए वर्ष में भारत के समक्ष होगी। चीन जिस तेजी से अपनी परियोजनाएं पूरी करता है, हम वैसा नहीं कर पाते। अगर हम इस दिशा में सुधार करें, तो इसका काफी आर्थिक लाभ हमें मिल सकता है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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बीस से कुछ इक्कीस ही बैठेगा यह साल, पढ़ें क्यों ऐसा कह रहे सुधीश पचौरी (अमर उजाला)

सुधीश पचौरी  

इक्कीस, बीस से कुछ इक्कीस ही बैठेगा। सरकार अपनी पर अडे़गी। किसान अपनी पर अड़ेंगे। यह अड़ा-अड़ी बनी रहेगी। भाजपा बंगाल जीत सकती है। असम जीत सकती है। लेकिन चुनाव जीतने और दिलों को जीतने में फर्क है और यह फर्क नजर आने लगा है। शायद इसीलिए एनडीए की छतरी में छेद नजर आने लगे हैं, छोटे सहयोगी दल छतरी से बाहर जाने लगे हैं। टीका आना है। लगाया जाना है। तो भी ‘कोरोना कल्चर’ रहनी है। मास्क रहना है। दूरी रहनी है। क्योंकि कोरोना का खतरा रहना है। 'मास-डिप्रेसन’ रहना है। नव-अस्तित्ववादी चिंताएं रहनी हैं। टीके से खरबों कमाने वाली दवा कंपनियां रहनी हैं। चीन की खलनायकी रहनी है। मोदी को रहना है। मोदी-सरकार को रहना है। लेकिन उसका वह तेज नहीं रहना है। ग्रहण लगने लगा है।  



जितनी ‘केंद्रवादी’ धुन होगी, उतने ही ‘विकेंद्रवादी’ सुर उठेंगे। जितना अधिक ‘राष्ट्रवाद’ होगा, उतना ही अधिक ‘उप-राष्ट्रवाद’ होगा और ‘विविध सांस्कृतिक अस्मिताएं’ उभरेंगी और यह ‘लोकलवाद’ भी नए किस्म का 'ग्लोबलवादी' होगा। इधर दिल्ली के सिंघू बॉर्डर, टीकरी बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर पर पंजाब के किसानों के धरने चलेंगे, उधर कनाडा से लेकर अमेरिका, इंग्लैंड तक से एनजीओ लोग दो करोड़ की गाड़ी वाले किसानों के लिए बोलेंगे! हर ‘लोकल’ में ‘ग्लोबल’ होगा, हर ‘ग्लोबल’ में ‘लोकल’ होगा। 'लोकल’ ही ‘वोकल’ होगा। ‘यथार्थ’ जितना ‘एक्चुअल’ होगा, उससे अधिक ‘वर्चुअल’ होगा, जितना अधिक ‘वर्चुअल’ होगा, उतना अधिक ‘कंट्रोल से बाहर’ होगा। ‘साक्षात स्टेट’ पर ‘वर्चअुल स्टेट’ भारी पड़ेगी। 'मुख्य मीडिया’ पर ‘सोशल मीडिया’ भारी पड़ेगा।



मार्क्स ने कभी कहा था : ‘हर वह चीज जो ठोस है, भाप बनकर उड़ जाएगी।' यही हो रहा है। कल तक जो ‘मोदी है तो मुमकिन है’ था, अब कभी-कभी नामुमकिन भी होता दिखता है। कुछ पहले शाहीनबाग और अब किसानों के धरने ने सिखा दिया है कि मोदी की सत्ता को चुनौती दी जा सकती है और यदि पूरी तरह उखाड़ा नहीं जा सकता, तो उसे तंग अवश्य किया जा सकता है। इन लक्षणों को देख लगता है कि अब राजनीति रूठने-मनाने की न होकर अधिक हठीली व अहंकारी होगी और हर तरफ से बदलेखोरी वाली होगी। इक्कीस के बरस में ‘4जी’ से आगे ‘5जी’ आना है। 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ आनी हैं। तकनीक जितनी बढ़ेगी, उतना ही, अपनी जड़ों से उजड़ा-उखड़ा आदमी अपने मूल, अपनी अस्मिता, अपनी जाति, अपनी नस्ल, अपने धर्म को खोजने की ओर दौड़ेगा। धर्मांधता बढ़ेगी। धार्मिक फॉल्ट लाइनें एक दूसरे से टकराएंगी। हम सैमुअल हंटिग्टन की द क्लैशेज ऑफ सिविलाइजेशंस देख रहे हैं और देखेंगे।


डिजिटल तकनीक सब कुछ को नई आसानी देगी और जटिलता भी, लेकिन इस ‘डिजिटल तकनीक’ और ‘पिछड़े विचारों’ के बीच कोई कशमकश न होगी। सेक्यूलर-कम्युनल में जंग बढ़ेगी। उदारता और कट्टरता में जंग चलेगी। कट्टरता जीतेगी, क्योंकि डिजिटल तकनीक के वर्चुअल स्पेस में कट्टरता का खूंटा ही भरोसेमंद नजर आता है। नई शतब्दी के तीसरे दशक के पहले बरस में सबसे अधिक तो मोदी जी को सोचना होगा, भाजपा को सोचना होगा, संघ को सोचना होगा और साथ ही इनके रकीबों को भी सोचना होगा कि यथार्थ सिर्फ इन दो के बीच की ‘बाइनरीज’ में नहीं है, बल्कि विश्व पूंजी की ताकत, उपभोक्ता संस्कृति और उसकी बे-ठहर अस्थिरता, तरलता और बहाव में भी है। मोदी जी को सोचना होगा कि आप ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ जैसे जुमलों की कैद में हैं, जबकि आकांक्षी जनता ‘तुरंतावादी'; इंस्टेटिस्ट है, वह इंतजार में यकीन नहीं करती। मोदी जी को सोचना होगा कि सिर्फ इस तर्क के सहारे, कि ‘हमें मेंडेट मिला है, सो कुछ भी कर सकते हैं’ कोई संतुष्ट नहीं होने वाला। खुले संवाद के नए तरीके निकालने होंगे। 


अहंकारों से न सत्ता चलती है, न शिकायतें चलती हैं। बीच का रास्ता निकालना ही होता है। ‘उत्तर आधुनिकता’ खुले संवाद की दरकार बढ़ाती है। वर्ष 2021 में, महाभारत वाले क्षण भी कुछ बदलकर दुहरा सकते हैं। आज लड़ने वाले सिर्फ एक युधिष्ठिर और एक दुर्योधन नहीं, हजार दुर्योधन, दुःशासन और शकुनि हैं और अंत में ‘मूसलपर्व’ की संभावना भी है। कहने को तो यह लेखक भी कह सकता है कि कोरोना काल के बाद इकनॉमी में बूम आएगा, उत्पादन बढ़ेगा। जीडीपी बढ़ेगी। पड़ोसियों से दो-दो हाथ होंगे, तो फिर देश एक हो जाएगा। लेकिन ऐसी एकता मजबूरी की एकता होगी। प्रेम का दौर विदा है। घृणा के दौर की आमद है! 


हम मानें या न मानें और चाहें या न चाहें, मोदी जी मूलतः और अंततः एक ‘मॉर्डनाइजर’ हैं। वह भारत को पूरी तरह आधुनिक बना देने को आतुर हैं। उनके इस आधुनिकीकरण में हिंदुत्व का ‘कंटेट’ उसी तरह प्रमुख है, जिस तरह रूसी क्रांति में रूसीफिकेशन का कंटेट था। जाने-अनजाने मोदी का या संघ का राष्ट्रवाद स्टालिन के ‘राष्ट्रवाद’ से मिलता-जुलता है, लेकिन एक कसर है-रूस में जो हुआ, वह आधुनिकताद के उत्थान के दौर में संभव हुआ, जबकि मोदी जी इस देश का आधुनिकीकरण ‘उत्तर आधुनिक दौर’ में पूरा कर रहे हैं। यह अपने आप में एक बड़ी अंतर्विरोधी स्थिति है, इसीलिए इतनी हाय हाय है! मोदी जी को सोचना होगा, क्योंकि वह आज के ‘उत्तर आधुनिकतवाद' के ‘हाइपर रीयल’ में फंसे हैं। जाहिर है, इक्कीस का बरस मोदी, भाजपा व संघ के लिए गहरे आत्ममंथन का बरस है।

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'दूसरी' दिल्ली की कहानी, कोविड-19 ने दिखाया गरीबी का सच (अमर उजाला)

पत्रलेखा चटर्जी  

अब जब यह निराशाजनक साल खत्म होने वाला है, तब यह जानना जरूरी है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान सुनी गई मौत, बीमारी, विनाश और नुकसान की कहानियों से हमने क्या सीखा है। कोविड-19 ने महीनों तक हमें अपने घरों में कैद रखा और अब भी व्यापक यात्रा प्रतिबंधित है। लेकिन उसी वजह से मैं दिल्ली को ज्यादा करीब महसूस कर रही हूं। दो करोड़ की आबादी वाले इस महानगर की गलियों से गुजरते हुए अजनबियों से अप्रत्याशित बातचीत का मौका मिला है, जो सदियों से अलग-अलग शहरों से आए लोगों के मिश्रण से बना है। दिल्ली विरोधाभासों से भरी हुई है। करीब 2,800 एकड़ में फैली दिल्ली का नई दिल्ली कही जाने वाली लुटियन दिल्ली ऐसा इलाका है, जहां इस महानगर के ताकतवर और विशेषाधिकार प्राप्त लोग रहते हैं। लेकिन एक और दिल्ली है, जहां सब्जी बेचने वाले राम विलास को उत्तरी दिल्ली में पेड़ पर रहना पड़ता है, क्योंकि वह इतना नहीं कमाता कि झुग्गी में एक छोटा-सा कमरा भी किराये पर ले सके। 


चार साल पहले फुटपाथ पर बनी उसकी झोपड़ी ध्वस्त कर दी गई। फिर उस पर नोटबंदी की मार पड़ी और इस साल महामारी फैल गई। उसने प्लाइवुड, प्लास्टिक शीट और टहनियों से पेड़ पर एक घर बना रखा है। अपना काम खत्म करने के बाद वह किसी की छोड़ी गई पुरानी रजाई के साथ पेड़ पर चढ़कर सो जाता है। वह मुश्किल से ही बचा हुआ है, लेकिन वह कहता है कि चीजें इससे भी बुरी हो सकती हैं। यह जो 'दूसरी' दिल्ली है, वह समय-समय पर खबरों के जरिये अपनी मौजूदगी दर्शाती रहती है, जैसे कि दिसंबर, 2020 में दिल्ली में एक जन सुनवाई हुई थी, जिसे दिल्ली रोजी रोटी अधिकार अभियान ने आयोजित किया था। यह लोगों और समूहों का नेटवर्क है, जो दिल्ली में भोजन के अधिकार के लिए काम करता है। इस सुनवाई ने देश की राजधानी दिल्ली में कोविड-19 महामारी के मद्देनजर कामकाजी गरीब और हाशिये के समुदायों के बीच भारी भूख की समस्या को उजागर करने की कोशिश की। 



दिल्ली के गरीबों की कहानी, एक स्तर पर इस देश के विशाल असंगठित क्षेत्र की कहानी है, जो औपचारिक अर्थव्यवस्था को बनाए रखती है। भारत में 80 फीसदी से अधिक श्रमिक अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करते हैं, जो रोजगार सुरक्षा के बगैर दैनिक मजदूरी पर पलते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाली देश की शहरी आबादी 6.5 करोड़ है, जो कुल शहरी आबादी का 17 फीसदी है। ताजा आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक, सिर्फ दिल्ली में 17 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं अथवा प्रति महीने 1,134 रुपये से कम पर गुजारा करते हैं। दिसंबर में भूख पर हुई सुनवाई में झुग्गी में रहने वाले, दिहाड़ी मजदूर, निर्माण उद्योग के श्रमिक, बेघर एवं दिव्यांगों ने अपनी समस्याएं बताईं। प्रभावित लोगो ने आभासी तरीके से कोई सामाजिक संरक्षण नहीं मिलने और अपने अधिकारों के हनन की त्रासद कहानियां सुनाईं। 


विकासशील दुनिया और विश्व के कई शहरों की तरह दिल्ली में शहरी गरीब और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा होने का मतलब केवल कम आय ही नहीं है, बल्कि स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, आवास और स्वास्थ्य सेवा तक अपर्याप्त पहुंच भी है। यह अनौपचारिक अर्थव्यवस्था ही है, जो भारत में लोगों को रोजगार मुहैया करा रही है। चूंकि संगठित क्षेत्र में रोजगार सिकुड़ता जा रहा है और ग्रामीण इलाकों से बेरोजगारों की बाढ़ आ रही है, ऐसे में यह अनौपचारिक अर्थव्यवस्था ही बढ़ते शहरी गरीबों के लिए एकमात्र आशा और आजीविका का स्रोत बनी हुई है। महामारी से असंगठित अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। हाल के महीनों में मैं कई ऐसे पुरुष व महिलाओं से मिली, जो काम पर लौट आए हैं, लेकिन उनकी आय पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है और वे भारी कर्ज में हैं। कर्ज 2021 में असंगठित क्षेत्र के लाखों श्रमिकों का पीछा करती रहेगी। वैक्सीन लगाने के बावजूद उनकी जीवन में बढ़ती अनिश्चितता एक बड़ा मुद्दा रहेगी। पर हमारे पास अब भी इस क्षेत्र की उत्पादक क्षमता के बेहतर दोहन के लिए कोई सुसंगत नीति नहीं है। इसे बदलने की जरूरत है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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Wednesday, December 30, 2020

प्राकृतिक आपदा और बाल विवाह...ऐसे समझिए इनके बीच का संबंध (अमर उजाला)

मधुलिका खन्ना एवं निशिता कोछर  

पिछले कुछ महीने भारत में भारी संकट का समय था। हालांकि आर्थिक सुस्ती और कोविड-19 संकट मीडिया में प्रमुखता से छाए थे, लेकिन इससे अलग दो अन्य समाचार भी तेजी से बदलते समाचार चक्र में दिखाई पड़े- विवाह के लिए महिलाओं की उम्र बढ़ाकर 21 वर्ष करने का प्रस्ताव और पूर्वी भारत में आई बाढ़। हालांकि बाल विवाह अधिनियम (2006) के अस्तित्व में आने के बाद से पिछले एक दशक में बाल विवाह 38.69 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया, लेकिन पूर्वी भारत में यह अब भी जारी है। लगभग 30 फीसदी बाल विवाह इस क्षेत्र के चार राज्यों-बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में होते हैं। जाहिर है, कम उम्र में शादी पर लगे कानूनी प्रतिबंध भी इस क्षेत्र के युवाओं को विवाह से नहीं रोक पाते। इसके साथ ही बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में तेजी से विस्तार हो रहा है और आने वाले वर्षों में बाढ़ से होने वाले नुकसान में वृद्धि होने की आशंका है।


इस क्षेत्र में कम उम्र में विवाह होने के क्या कारण हैं? ताजा शोध में हमने कम उम्र में विवाह और प्राकृतिक आपदाओं के बीच संबंध का पता लगाया है। दरअसल आर्थिक विनाश का कारण बनने वाली प्राकृतिक आपदाएं बाल विवाह की व्यापकता को बढ़ा सकती हैं। प्राकृतिक आपदाओं और बाल विवाह के बीच के सूत्रों को समझने के लिए हमने 2008 में कोसी में आई बाढ़ का अध्ययन किया, जिसने प्रभावित क्षेत्र को भारी आर्थिक झटका दिया था। 18 अगस्त, 2008 को नेपाल के सुनसरी जिले के कुसहा गांव में पूर्वी तटबंध टूट जाने से कोसी अपने दो सौ साल पुराने रास्ते पर चल पड़ी थी। कोसी के पुराने रास्ते से सौ किलोमीटर आगे बहते ही उत्तर बिहार के कई हिस्से पूरी तरह डूब गए। अररिया, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल और पूर्णिया जिले के करीब 1,000 गांव गंभीर रूप से प्रभावित हुए। उस बाढ़ से दस लाख लोग तात्कालिक रूप से विस्थापित हुए, जबकि और बीस लाख लोग सीधे प्रभावित हुए। हालांकि मौत का आंकड़ा तुलनात्मक रूप से कम था, 527 लोगों की ही जान गई थी, पर उस बाढ़ से राज्य को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। अपने अध्ययन में हमने पाया कि कोसी की बाढ़ ने पुरुष और महिलाओं के विवाह की उम्र घटा दी, जिसके चलते पुरुष बाल विवाह की घटनाओं में 6.9 फीसदी और महिला बाल विवाह की घटनाओं में 3.6 फीसदी की वृद्धि हुई। उन बाढ़ग्रस्त जिलों में बाल विवाह अधिक हुए, जहां संपत्ति का नुकसान बहुत ज्यादा हुआ।


कोसी की बाढ़ और बाल विवाह के बीच का यह संबंध क्या दर्शाता है? यह बताता है कि बाढ़ के आर्थिक झटकों से निपटने के लिए वे परिवार, जिनके घर में कुंवारे बेटे हैं, अपने बेटे की कम उम्र में शादी कर देते हैं, ताकि दहेज मिले और मुश्किल समय में सहारा मिल सके। यदि परिवार पहले से गरीब है, तो इसकी संभावना ज्यादा रहती है। यह देखते हुए, कि पुरुष आम तौर पर अपने से छोटी महिलाओं से शादी करते हैं, ज्यादातर लड़कियां भी कम उम्र में शादी करती हैं; ऐसी शादियों में पुरुष और महिला की उम्र क्रमशः दस महीने और 4.5 महीने कम हो जाती है। बाढ़ का प्रभाव पुरुषों पर चूंकि ज्यादा होता है, इसलिए इस तरह की शादियों के पीछे संभवतः लड़के के परिवारों का दबाव ज्यादा रहता है।

हमने पाया कि कोसी की बाढ़ का असर क्षेत्र के हिंदू परिवारों में अधिक पड़ा था, जिनमें दहेज की कुप्रथा ज्यादा है, और भूमिहीन परिवारों में, जो सबसे अधिक प्रभावित होते थे। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि बाढ़ ने स्कूल के बुनियादी ढांचे और छात्रों के नामांकन को प्रभावित नहीं किया, जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि स्कूल छोड़ने वाले बच्चों ने बाल विवाह में वृद्धि नहीं की। हालांकि विवाह के कारण प्रवासन कम दूरी के भीतर होता है, और आम तौर पर एक ही जिले में, पर यह अब भी संभव है कि कोसी (गैर-कोसी) जिलों की महिलाएं गैर-कोसी (कोसी) जिलों की सीमा में पुरुषों से शादी कर रही हों। ये परिणाम बताते हैं कि प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े आर्थिक नुकसान की भरपाई करने के लिए बाल विवाह एक महत्वपूर्ण कारक है। लेकिन बाल विवाह से लड़के-लड़कियों का नुकसान होता है। ऐसी शादी को मंजूरी देने वाले माता-पिता अपने तात्कालिक हित की पूर्ति के लिए बच्चों के दीर्घकालिक परिणामों पर विचार नहीं करते; यह तथ्य है कि कोसी की बाढ़ ने विवाहित पुरुषों और महिलाओं में माध्यमिक विद्यालय में शिक्षा पूरी करने की दर कम कर दी है।


हमने बाढ़ के कारण महिलाओं की आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का भी दस्तावेजीकरण किया और पाया कि न केवल ऐसी महिलाओं के काम करने की संभावना घटी, बल्कि उनके अपने पैसे होने की संभावना भी कम हो गई। यह स्थिति उसी सच्चाई को बताती है कि कम उम्र में विवाह महिलाओं की भलाई के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रमबल में भागीदारी और उनके बच्चों की मानव पूंजी आदि को बुरी तरह से प्रभावित करता है। इसलिए आर्थिक झटके की स्थिति में भले ही माता-पिता के नजरिये से कम उम्र में शादी सही लगती हो, पर युवा दंपति, खासकर दुल्हनों को इसकी दीर्घकालीन कीमत चुकानी पड़ती है। 


ऐसे समय में, जब पूर्वी भारत को बाढ़ का लगातार सामना करना पड़ता है, बाल विवाह और प्राकृतिक आपदा को कम करने वाली नीतिगत प्रतिक्रियाओं के बारे में विचार करना महत्वपूर्ण है। इसके अलावा कोविड-19 महामारी के दौरान आजीविका का नुकसान अनेक युवाओं, खासकर पहले से ही गरीब परिवारों से ताल्लुक रखने वालों को कम उम्र में विवाह के बंधन में धकेल देगा। पहले से ही खबरें हैं कि पिछले कुछ महीनों में बाल विवाह में वृद्धि हुई है। नीतिगत नजरिये से यह समझना महत्वपूर्ण है कि यदि आपदा बीमा या कम ब्याज वाला कर्ज आसानी से उपलब्ध हो, तो प्रभावित परिवारों के पास आर्थिक झटके का सामना करने के लिए दहेज के अलावा अन्य तरीके भी होंगे, जिससे प्राकृतिक आपदा और बाल विवाह के बीच की कड़ी कमजोर हो जाए। 


(-लेखिका द्वय जॉर्जटाउन यूनिवसर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग से पीएच.डी कर रही हैं।) 

सौजन्य - अमर उजाला।

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