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'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल', धर्म और कानून का अद्भुत संगम

विराग गुप्ता



संविधान के संरक्षक के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के 13 जजों ने वर्ष 1973 में एक ऐसा फैसला दिया था, जिसकी वजह से केशवानंद भारती मृत्यु के बाद भी देश के सांविधानिक इतिहास में अमर हो गए हैं। कांग्रेस की आंतरिक कलह और पाकिस्तान से युद्ध के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स खत्म करने और राज्यों में भूमि अधिग्रहण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने जैसे कई कानून बनाए और संसद के माध्यम से संविधान में 24वां, 25वां और 29वां संशोधन कर दिया। 


'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल' मामले में पांच महीनों तक 68 दिन रोज सुनवाई हुई, जो सुप्रीम कोर्ट में सबसे लंबी सुनवाई का रिकॉर्ड है। अयोध्या मामले में 40 दिन की सुनवाई के बाद पांच जजों ने 1,045 पृष्ठों में सर्वसम्मति से राम मंदिर के पक्ष में अपना फैसला दिया था, जबकि केशवानंद भारती मामले में तेरह में से सात जजों ने बहुमत से लगभग 800 पृष्ठों में अपना फैसला दिया था। कुल 2,144 पैरे के इस फैसले में 11 अलग-अलग फैसले शामिल थे, जिनमें संविधान के अधिकांश प्रावधानों का पुनरावलोकन किया गया। इस फैसले के अनुसार, कानून का शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, शक्तियों का बंटवारा, केंद्र-राज्य की संघीय व्यवस्था, गणतंत्र और संसदीय प्रणाली संविधान के मूलभूत ढांचे का हिस्सा हैं, जिन्हें संविधान संशोधन से नहीं बदला जा सकता। 

इस फैसले के बाद सरकार, संसद और सर्वोच्च न्यायालय में भारी उलटफेर हुआ। अगले दिन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एम सीकरी के रिटायर होने के बाद इंदिरा सरकार ने तीन जजों की वरिष्ठता को नजर अंदाज कर जस्टिस रे को प्रधान न्यायाधीश बना दिया, जिसके विरोध में तीन वरिष्ठ जजों ने त्यागपत्र दे दिया। प्रसिद्ध संविधानविद सीके दफ्तरी ने इस घटनाक्रम को भारतीय लोकतंत्र का काला दिन बताया था। मौलिक अधिकारों को आपातकाल में पूरी तरह से कुचल दिया गया। एडीएम, जबलपुर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकारों को प्रश्रय देने के बजाय, सरकारी दमन पर कोर्ट की मुहर लगा दी। केशवानंद भारती का फैसला सुप्रीम कोर्ट की तेजस्विता को दर्शाता है। 

केशवानंद फैसले के अनेक प्रावधानों को इंदिरा सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के कानून से खारिज कर दिया। हालांकि जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा सरकार के ऐसे तमाम फैसलों को रद्द कर दिया। इंदिरा सरकार ने संविधान की प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' जैसे शब्दों को शामिल किया था, जिन्हें नहीं हटाया जा सका। संविधान का मूलभूत हिस्सा मानकर अब उन प्रावधानों को हटाने पर आपत्ति की जा रही है। सवाल है कि जो प्रावधान संविधान संशोधन से शामिल किए गए, उन्हें बहुमत वाली सरकार द्वारा संविधान संशोधन के माध्यम से क्यों नहीं हटाया जा सकता। केशवानंद का मामला सरकार और न्यायपालिका के बीच प्रभुत्व के लिए हुए टकराव के तौर पर भी देखा जाता है। प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति में मनमानी से इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका पर तात्कालिक बढ़त हासिल कर ली थी। लेकिन इस फैसले के नौ साल बाद एस पी गुप्ता मामले से जजों ने नियुक्ति में कॉलेजियम व्यवस्था के माध्यम से पूर्ण वर्चस्व स्थापित कर लिया। 


वर्ष 2015 में पांच जजों की पीठ ने जजों की असंगत नियुक्ति प्रणाली पर कठोर टिप्पणी की, लेकिन कॉलेजियम व्यवस्था में अब तक कोई सुधार नहीं हुआ। सुशांत सिंह राजपूत मामले में फिल्म इंडस्ट्री में वंशवाद पर बहस चल रही है। लेकिन इस संयोग पर कम बहस होती है कि केशवानंद मामले में फैसला देने वाले छह से ज्यादा जजों के बेटे या भतीजे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज और चीफ जस्टिस बन गए।


केशवानंद का फैसला भारत के साथ बांग्लादेश और पाकिस्तान की अदालतों में भी नजीर बन गया। केशवानंद मामले में केरल सरकार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान समेत अन्य राज्यों की तरफ से कई नामी वकीलों ने बहस की थी। उस मामले में बहस करने वाले सोली सोराबजी तो आज भी सुप्रीम कोर्ट में संविधान के प्रकाश स्तंभ माने जाते हैं। 47 साल बाद आज भी केशवानंद मामले का हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों में जिक्र किया जाता है।


सौजन्य - अमर उजाला।

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चीन के दोहरेपन से क्यों संभलकर रहना होगा हमें, बता रहे हैं हर्ष कक्कड़

हर्ष कक्कड़



लद्दाख में गतिरोध चीनियों के पक्ष में जा रहा था, इसलिए अब तक बातचीत की प्रक्रिया धीरे चल रही थी। बातचीत के लिए भारत के अनुरोध का न सिर्फ चीन अपने ढंग से जवाब दे रहा था, बल्कि वार्ता का नतीजा भी नहीं निकला था। चीनियों ने कदाचित मान लिया था कि माहौल उनके पक्ष में है, भारत रक्षात्मक है और एक बफर जोन बनने से शारीरिक संघर्ष की संभावना लगभग न के बराबर है। गलवां घाटी का डर, जिसने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के मिथक को तोड़ दिया था, पीछे छूट चुका था। वे आश्वस्त थे कि उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की सीमा को अपने लाभ के लिए आगे बढ़ा सकते हैं।


लेकिन अगस्त के अंत में भारत ने जवाबी हमले के जरिये चीन को हैरान करते हुए सुनियोजित एवं समन्वित ढंग से उसके प्रभुत्व के खाली इलाके पर हमला किया, तो चीनियों की नींद उड़ गई। एक ही झटके में भारत ने माहौल को अपने पक्ष में कर लिया। चीनियों ने महसूस किया कि उन्हें परास्त किया गया है और उनकी ओर से कोई भी कदम भारतीय निगरानी और वर्चस्व के तहत होगा। तिब्बती शरणार्थी वार्डों में शामिल स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (विकास बटालियन) को तैनात करना एक और मास्टरस्ट्रोक था। इसने संदेश दिया कि भारत ने अपनी 'एक चीन नीति' त्याग दी है। चीन ने यह दावा करते हुए प्रतिक्रिया दी कि भारत ने एलएसी का उल्लंघन किया था, जिसे उसने खुद एक दिन पहले तक स्वीकारने से इन्कार कर दिया था और

भारतीयों की वापसी की मांग की थी। चीन की चोट और बढ़ाने तथा उसके सॉफ्टवेयर उद्योग पर असर डालने के लिए भारत ने फिर से कई चीनी एप पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। नतीजतन अचानक चीन से हर स्तर पर बातचीत की मांग की गई।

ब्रिगेड कमांडर्स लगभग एक हफ्ते तक लगातार बिना किसी नतीजे के मिलते रहे, क्योंकि भारत ने चीनी मांगों को स्वीकारने से इन्कार कर दिया था। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ने अपना दुष्प्रचार लगातार जारी रखा। चीन ने दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच बैठक का अनुरोध भी किया, जो शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में मॉस्को में हुआ। चीन की तरफ से यह तीसरा अनुरोध वर्चस्व वाली ऊंचाइयों पर कब्जा करने की भारत की आगे बढ़कर की गई कार्रवाई के बाद किया गया था। जाहिर है, चीन समाधान चाह रहा था। दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर एलएसी के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए बयान जारी किए। चीनी विदेश मंत्री ने बैठक के बाद अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि 'भारत और चीन के बीच सीमा पर मौजूदा तनाव का सच और कारण स्पष्ट है, और यह जिम्मेदारी पूरी तरह से भारत की है।


चीन अपनी सीमा खो नहीं सकता, और चीनी सेना राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने में सक्षम है।' इसके विपरीत भारत का बयान था कि 'बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों की कार्रवाई उनके आक्रामक व्यवहार और एकतरफा यथास्थिति को बदलने का प्रयास द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन था। भारतीय सैनिकों ने हमेशा सीमा प्रबंधन के लिए जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाया है, पर भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के हमारे दृढ़ संकल्प के बारे में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।' जैसी कि अपेक्षा थी, दोनों रक्षा मंत्रियों के बीच बैठक बेनतीजा रही। दोनों पक्ष एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहे। ढाई घंटे से ज्यादा समय तक चली इस बैठक में सिर्फ अगले स्तर की वार्ता के लिए मंच तैयार किया गया, जो मॉस्को में आगामी 10 सितंबर को विदेश मंत्रियों के बीच होगा।


भारत अप्रैल 2020 की स्थिति की बहाली और क्षेत्र से अतिरिक्त सैनिकों की वापसी की मांग करता है, जबकि चीन चाहता है कि भारत एलएसी के उसके रुख को स्वीकार करे और हाल ही में कब्जे वाले इलाके से पीछे हट जाए। इस समय चीनी रवैए के कारण दोनों देशों के बीच विश्वास की भारी कमी है। यदि चीन भारत के प्रस्ताव को स्वीकार कर अप्रैल, 2020 की अपनी स्थिति पर वापस लौटता है, तो इससे उसकी छवि को नुकसान पहुंचेगा और पीएलए की वैश्विक प्रतिष्ठा प्रभावित होगी। यदि वर्तमान स्थिति जारी रहती है, तो उसकी स्थिति और गतिविधियां भारतीय निगरानी और वर्चस्व के अधीन होंगी। मोल्डो स्थित उसके मुख्य शिविर को निशाना बनाया जा सकता है। भारतीय सेनाओं को खदेड़ने के लिए किसी भी सैन्य कार्रवाई से चीनी जीवन को भारी नुकसान होगा, क्योंकि वहां भारत का दबदबा है। भारतीय सेना चीनी दुस्साहस का सामना करने के लिए तैयार है।


भारत को यह भरोसा नहीं है कि चीन स्वीकृत समझौतों का पालन करेगा। चीन ने लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता में बनी सहमति को मानने से इन्कार कर दिया है। भारत को चीन के इरादे पर संदेह है और वह इसको लेकर भी अनिश्चित है कि चीन ऊंचाई पर कब्जे की कोशिश करेगा, जिस पर अभी भारत का कब्जा है। वर्ष 1965 में सिक्किम के जेलेप ला में चीन ने ऐसा किया था और दोकलम में वह अपने क्षेत्र में लगातार बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है। ऐसी गतिविधियां भारत के लिए समस्या पैदा करेंगी। इसके अलावा चीन आगे भी एलएसी का उल्लंघन कर सकता है। इसका सबसे अच्छा समाधान है लद्दाख में एलएसी सीमा का निर्धारण, पर यह चीन को स्वीकार्य नहीं हो सकता, क्योंकि यह उसे उस क्षेत्र में दुस्साहस करने

से रोकेगा। 


दूसरा समाधान यह हो सकता है कि जब तक सीमा समझौता नहीं होता, तब तक यथास्थिति बरकरार रखी जाए। ऐसे में दोनों सेनाएं एक-दूसरे से दूरी बनाए रखेंगी। इससे दोनों देश प्रभावित होंगे, क्योंकि लद्दाख में लंबे समय तक भारी संख्या में सैन्य बल को बनाए रखना होगा। यह फिर से चीन को अस्वीकार्य हो सकता है, क्योंकि वैसे में उसकी चौकियां चौबीसों घंटे भारत की निगरानी में रहेंगी। मौजूदा संकट का समाधान कैसे होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों विदेश मंत्री किस तरह से वार्ता करते हुए एक सौहार्दपूर्ण समाधान तक पहुंचते हैं। ऐसे में, भारतीय राजनयिकों को सावधान रहना होगा कि वे त्वरित समाधान की तलाश में मौजूदा सैन्य बढ़त को खोने न दें।


सौजन्य - अमर उजाला।

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शिखर आंदोलनकारी की असमय विदाई

शेखर पाठक



वर्ष 1983 का वह न जाने, कौन-सा महीना था। सिल्यारा, चम्याला समेत बालगंगा घाटी के अनेक गांवों की सैकड़ों महिलाएं घणसाली के रेंज ऑफिस में चीड़ के छिलकों की मशाल जलाकर पहुंची थीं। लगता था कि यह चिपको की बची ताकत और एक जन आंदोलन की आंतरिक पुकार थी। महिलाएं कटान रोकने के साथ वनाधिकार की मांग कर रही थीं। कुछ वर्षों बाद चेतना आंदोलन को विकसित करने वाले त्रेपन सिंह चौहान तब कक्षा सात के विद्यार्थी थे। उनकी चेतना का अंकुरण यहीं से हुआ था।


वर्ष 1980 के आसपास चिपको के उतार और टिहरी बांध आंदोलन के बिखराव ने भिलंगना घाटी के चिपको से जुड़े या प्रेरित नौजवानों को संगठित होने और नई परिस्थितियों में अपनी राह परिभाषित करने को विवश किया। पांच जून, 1995 को चेतना आंदोलन जन्मा। शुरू में यह भ्रष्टाचार के विरोध के अलावा जंगलों, चरागाहों और नदियों के मुद्दों पर केंद्रित रहा। भ्रष्टाचार विरोध के कारण 1996 में चेतना आंदोलन के कार्यकर्ताओं पर निहित स्वार्थों ने अनेक मुकदमे दायर किए। कार्यकर्ताओं के लिए काम करना मुश्किल हो गया। उन्हें असामाजिक तत्व घोषित किया गया। उस समय सुंदरलाल बहुगुणा सहित विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ता चेतना आंदोलन के समर्थन में आए। समूह फिर अपने काम में जुट गया।

1980 के बाद चिपको के अनेक अच्छे परिणाम आने के बावजूद 1949 में उत्तर प्रदेश में विलीन टिहरी रियासत (जिला टिहरी और उत्तरकाशी) में 1998 तक भी वन पंचायतों का गठन नहीं हो सका। अगले पांच साल तक चेतना आंदोलन ने वन पंचायतों की स्थापना हेतु काम किया। अनेक वन पंचायतें बनीं, पर उनमें जंगल नहीं थे। इस तरह वृक्षारोपण और घेराबंदी के प्रयास हुए, ताकि स्वयं जंगल उग सकें। कुछ सफलता मिली। लोगों को पता चला कि पेड़ों की हिफाजत के कारण घास का उत्पादन बढ़ा है तथा अतिरिक्त जलावन उपलब्ध हुआ है। गंगा देवी, जगदेई देवी, झड़ीदेवी तथा यशोधरा देवी जैसी कर्मठ, सामाजिक नेत्रियों का उदय पंचायतों और वन पंचायतों से हुआ। ये सभी चेतना आंदोलन की आधार बनीं।

मार्च, 2004 में जब भिलंगना नदी पर फलिन्डा में 22.5 मेगावाट की भिलंगना फेज1 जलविद्युत परियोजना बिना स्थानीय समुदायों की सहमति के बनने लगी, तो चेतना आंदोलन ने तब से अप्रैल, 2006 तक आंदोलन किया। जन सुनवाइयां कीं। दर्जनों लोग गिरफ्तार किए गए और जेल में रखे गए। समस्त ग्रामीणों के विरोध के बावजूद यह योजना बनी, पर जन आंदोलन के कारण ग्रामीण समाज के सिंचाई तथा मुर्दाघाट के अधिकारों को स्वीकारा गया। इसके बाद चेतना आंदोलन ने महिलाओं को सुसंगठित करना शुरू किया। ग्राम प्रधान के चुनावों में उन्हें उतारा। चालीस में से पैंतीस उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई। दूसरी ओर, 2012 से देहरादून में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को संगठित करना शुरू किया।


ग्राम्य जीवन को अर्थवान और आकर्षक बनाने के साथ पुरानी उपयोगी परंपराओं को जीवित और फिर से परिभाषित करने हेतु चेतना आंदोलन ने 'घसियारी उत्सव' की शुरुआत की। टिहरी जिले के घणसाली ब्लॉक के गांवों में आयोजित इस उत्सव में श्रेष्ठ घसियारियों को 'बेस्ट इकोलॉजिस्ट' घोषित कर उन्हें नकद धनराशि के साथ चांदी के मुकुट पहनाए जाते हैं। इन सब में त्रेपन सिंह चौहान का योगदान तो था ही, उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों की 'बालगंगा हाइड्रो इलेक्ट्रिक कंपनी' भी बनाई, जिसमें एक मेगावाट बिजली बनाने की योजना थी।


सामाजिक आंदोलन के साथ त्रेपन सिंह ने लेखन भी जारी रखा। उत्तराखंड की स्थितियों पर केंद्रित उनके दो उपन्यास यमुना और हे ब्वारी बेहद चर्चित रहे। जहां भी अधिकारों की लड़ाई होती, त्रेपन वहां जरूर पहुंचते। सौभाग्य से उसकी तरह के कुछ साथी पहाड़ों में थे। लेकिन अंततः वह मोटर न्यूरॉन जैसी दुर्लभ बीमारी की चपेट में आ गया, जो मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को थी। फिर भी विज्ञान और समाज ने हॉकिंग को 76 साल का जीवन दिया। दूसरी ओर, त्रेपन की बीमारी चालीसवें साल में शुरू हुई और वह पचास भी पार नहीं कर पाया। कितना तो अभी उसे लिखना था। कितना तो अभी उसे चलना था। घसियारियां उसके ठीक होने का इंतजार कर रही थीं और भिलंगना व बालगंगा भी। खतलिंग ग्लेशियर तथा गंगी गांव भी चाहते थे कि त्रेपन उसका स्पर्श करे। उन आंखों में जितनी चमक और उम्मीद थी, उतनी ही विनम्रता थी। चेहरे से वह आंदोलनकारी नहीं लगता था, पर उसके अंदर रचनात्मकता की आग थी।


हम जानते थे कि उसे ज्यादा दिन नहीं जीना। शायद उसे भी पता था। इसीलिए अपने तीसरे उपन्यास पर वह तेजी से काम कर रहा था, पर उसे आधा ही लिख सका। त्रेपन के रचे शू्न्य को कौन भरेगा? क्या सुमन या नगेंद्र सकलानी का शून्य भरा जा सका है? शैलानी, प्रसून, शिखर और भवानी को भी जल्दी थी।


सौजन्य - अमर उजाला।

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हिमालय को नुकसान पहुंचा रही चार धाम परियोजना, घनघोर लापरवाही



हिमालय भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपत्ति है। इसके बिना यह देश नहीं बचेगा। इसके विशाल पहाड़ आक्रमणकारियों को रोकते हैं, हमारी महान नदियों के स्रोत हैं, जैव विविधता का समृद्ध भंडार और हमारे पवित्रतम मंदिरों का घर हैं। पारिस्थितिकी, आर्थिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक रूप से हिमालय एक राष्ट्र के रूप में भारत के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।


हिमालय का सम्मान करने के दावे के साथ शासन करने वाले राजनीतिकों की नाक के नीचे ये पहाड़ उन पर हो रहे हमले के गवाह बन रहे हैं। यह हमला गलत तरीके से अपनाए जा रहे प्रोजेक्ट चार धाम परियोजना के रूप में हो रहा है। 12,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से तैयार हो रही इस योजना का लक्ष्य चार पवित्र धामों यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ तथा बदरीनाथ तक शीघ्र पहुंच के लिए 900 किलोमीटर लंबी सड़कों का चौड़ीकरण है। इस योजना पर घनघोर लापरवाही के साथ अमल हो रहा है और इसमें पर्यावरण तथा मानव सुरक्षा की जरा भी चिंता शामिल नहीं है। लोगों के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट को विशेषज्ञों की एक समिति का गठन करना पड़ा है, जिसने हाल ही में इस परियोजना के कारण अब तक हो चुके नुकसान को लेकर आठ सौ पेज की रिपोर्ट प्रस्तुत की है।

इस रिपोर्ट को पढ़ना रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव से गुजरना है। लेकिन सबसे पहले हमें खुद को हिमालय से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों का स्मरण कराना चाहिए। हालांकि इन्हें देखना अद्भुत लगता है, लेकिन पारिस्थितिकी के लिहाज से ये पहाड़ अत्यंत नाजुक हैं और खासतौर से इन्हें भूकंप तथा बाढ़ का खतरा है। इसके बावजूद एक के बाद एक आने वाली सरकार ने हिमालय तथा उसके लोगों पर चार तरह से हमले किए हैं। वाणिज्यिक वानिकी, ओपन कास्ट माइनिंग, बड़ी पनबिजली परियोजनाओं को बढ़ावा तथा अनियंत्रित पर्यटन ने मिलकर भारी पैमाने पर जहरीले कचरे के संचय, वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी, वनों तथा जैवविविधता में कमी, जल स्रोतों का क्षरण किया है और भूस्खलन तथा बाढ़ में वृद्धि की है। और अब इस भारी-भरकम सड़क निर्माण परियोजना के रूप में पांचवां हमला किया जा रहा है, जिससे पहले ही बर्बाद हो चुके इस भूभाग को और नुकसान हो सकता है।

अमूमन चार धाम जैसी विशाल परियोजना के लिए प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले ही पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) संबंधी विस्तृत रिपोर्ट देना अनिवार्य होता है। यहां यह जिम्मेदारी क्रूर हाथों में थी। चूंकि सौ किलोमीटर से अधिक लंबी सड़क परियोजना के लिए विस्तृत ईआईए जरूरी होती है; इसलिए 880 किलोमीटर की एकीकृत परियोजना को कागज पर छोटे छोटे अनेक टुकड़ों में इस तरह बांट दिया गया, ताकि किसी भी खंड के लिए ईआईए की जरूरत न पड़े।


इस परियोजना की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर, 2016 के आखिरी हफ्ते में रखी थी। उसके बाद से इसकी वजह से हुए नुकसान की झलक सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष डॉ. रवि चोपड़ा द्वारा तैयार रिपोर्ट में दिखती हैः 'हमारा सामना कई भूस्खलन से हुआ और हमारी गाड़ियां अक्सर जाम में फंस जाती थीं। मलबे सीधे जंगलों, नदी के तल और जलस्रोतों में जा रहे थे। पहले ही हजारों पेड़ गिर चुके हैं और अप्रत्याशित ढलानों के ध्वस्त होने से और अधिक पेड़ गिरेंगे। कमजोर सुरक्षात्मक ऊंची दीवारों को सीधी ढलान पर उनकी नियति पर छोड़ दिया गया है। रात ठहरने पर सड़क के काम से सीधे प्रभावित होने वाले लोगों ने हमसे मुलाकात की और अपनी तकलीफें तथा सुझाव बताए।'


इस तबाही का कारण है पहाड़ों के अनुकूल बनी मौजूदा सड़कों के नेटवर्क को 12 मीटर चौड़े हाई-वे में बदलना, जो कि मैदानी इलाकों के अनुकूल होते हैं। वैज्ञानिक विशेषज्ञों ने सलाह दी थी कि कमजोर पहाड़ियों में 5.5 मीटर चौड़ी सड़कें कारगर होंगी; इन विशेषज्ञों को अनसुना कर दिया गया। कम चौड़ी सड़कें परिवहन को नियंत्रित करतीं और पर्यावरण तथा सामाजिक नुकसान को कम करतीं।


जैसा कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट कहती हैः 'पहाड़ी की कटाई की लंबाई और चौड़ाई के अनुसार पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। जितना अधिक मलबा निकाला जाएगा, कटाई भी उतनी गहरी होगी।' उल्लेखनीय है कि इन मार्गों में 60  या 70 डिग्री को झुकी ढलानें हैं और इनकी वजह से पहले ही जंगल का क्षरण हो रहा है। चार धाम परियोजना के एक हिस्से में समिति ने पाया कि 174 ताजा कटी ढलानों में से 102 में भूस्खलन के अनुकूल हो गई हैं। हर जगह अचानक खत्म होने वाली ढलानें आम हैं।


उल्लेखनीय है कि मई से सितंबर के दौरान ही कुछ महीनों में चार धाम के तीर्थयात्रियों का ट्रैफिक बढ़ जाता है। इसके अलावा ये कोई व्यावसायिक यात्री नहीं हैं, जिनके लिए हर मिनट कीमती हो। आखिर किसी आध्यात्मिक व्यक्ति को किसी पवित्र स्थल में पहुंचने में कुछ घंटे या कुछ दिन अधिक लगने में परेशानी क्यों होनी चाहिए? पुराने दिनों में तीर्थयात्री पैदल यात्रा करते थे। हिमालय में सड़क निर्माण के दौरान उसकी अनूठी पारिस्थितिकी और उसे पहुंचने वाले नुकसान को भी ध्यान में रखना चाहिए। मैदानी इलाकों में शहरों के भीतर के लिए उपयुक्त मॉडल की नकल पूरी तरह से गलत है और यह बहुत महंगा भी साबित होगा।


'हिमालयन ब्लंडर' शीर्षक से लिखी टिप्पणी में चार वैज्ञानिक सदस्यों ने चार धाम परियोजना को उस महान तथा नाजुक पहाड़ी शृंखला के प्रति 'गैरजिम्मेदाराना तथा हिमालय का अपमान'करने वाला ऐसा काम करार दिया, जिसकी सेहत देश के सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिकी भविष्य के लिए अहम है। रिपोर्ट में ऐसी सैकड़ों तस्वीरें शामिल हैं, जो लापरवाही के साथ सड़क को चौड़ा किए जाने के कारण हुई बर्बादी को दिखाती हैं, जिसमें पूरी पर्वत शृंखला नदी की ओर गिरती नजर आती हैं। स्थिति अब भी सुधर सकती है, यदि 12 मीटर चौड़ाई की जगह इसे 5.5 मीटर की संवेदनशील चौड़ाई तक सीमित रखा जाए और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया जाए।


समिति ने नए और कम विनाशकारी संरेखण, स्थानीय प्रजातियों के साथ क्षरण वाले क्षेत्र में पुनः वनस्पतीयन, बर्फबारी वाले ऊपरी हिस्से की सड़क के लिए विशेष उपाय अपनाने संबंधी संवेदनशील सुझाव दिए हैं। ये विस्तृत सुझाव भूगर्भ, पारिस्थितिकी के साथ ही इंजीनियरिंग की विशेषज्ञता के साथ तैयार किए गए हैं। ये सुझाव वैज्ञानिक विशेषज्ञों ने दिए हैं, जिन्होंने हिमालय में रहते हुए और काम करते हुए लंबा वक्त बिताया है। हम बेसब्री से यही उम्मीद कर सकते हैं कि उन्हें सुना जाएगा और अमल में लाया जाएगा।


यह स्तंभकार उत्तराखंड में ही पैदा हुआ और बड़ा हुआ है। उसकी पहली किताब हिमालय के जंगलों के सामाजिक इतिहास पर केंद्रित थी। इसलिए एक नागरिक और अध्येता के रूप में मैं पाठकों (और अदालत) से सरकार पर समझदारी दिखाने के लिए दबाव बनाने के महत्व को रेखांकित कर रहा हूं। हिमालय ने पहले ही काफी कुछ सहा है। मौजूदा स्वरूप में यह सड़क परियोजना पहाड़ों को ऐसा नुकसान पहुंचाएगी, जिसकी कभी भरपाई नहीं हो सकेगी। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई यह रिपोर्ट कहती है, 'आज दुनिया भर में स्पष्ट हो गया है कि पारिस्थितिकी की ईमानदार और बिना शर्त की जाने वाली चिंता से रहित कोई भी विकास अदूरदर्शी साबित होगा; और अनिवार्य रूप से दीर्घकाल में तबाही और आपदा लाएगा।'

सौजन्य - अमर उजाला।

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कोविड से जंग में गैर संचारी रोग भी चुनौती : Amar Ujala Editorial

मोनिका अरोड़ा
गैर-संचारी रोग किसी संक्रामक वायरस के कारण नहीं होते, बल्कि ये पुराने रोग होते हैं, जो आनुवांशिक, शारीरिक, पर्यावरणीय और व्यवहारिक कारकों के चलते होते हैं। भारत में ये रोग देश की कुल वार्षिक मृत्युदर में लगभग 63 फीसदी (58.7 लाख) का योगदान करते हैं।

इनमें से अधिकांश मौतें समय से पहले (30 से 70 वर्ष की उम्र) और जीवन के सबसे उत्पादक वर्षों में होती हैं। चार मुख्य गैर संचारी रोग-हृदय रोग, पुरानी सांस की बीमारी, कैंसर और डायबिटीज हैं। भारत में उच्च रक्तचाप से 25.7 करोड़ और डायबिटीज से 7.7 करोड़ लोग ग्रस्त हैं।
हर वर्ष बीस लाख लोगों की मौत हृदय रोग से संबंधित कारणों से होती है। भारत में ग्यारह वयस्कों में से एक (उम्र 20-79) मधुमेह का इलाज कराते हैं और 4.39 करोड़ लोगों के बारे में अनुमान है कि उनका इलाज नहीं हो पाता है।
स्वास्थ्य मंत्रालय पहले से ही कैंसर, मधुमेह और हृदय रोग और स्ट्रोक के रोकथाम और नियंत्रण के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम चला रहा है। कार्यक्रम का उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना, बुनियादी ढांचा स्थापित करना और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर ही स्क्रीनिंग करना है।

गैर-संचारी रोगों का बोझ कोविड-19 से निपटने में भारी चुनौती पैदा कर रहा है। मौजूदा सबूत बताते हैं कि गैर-संचारी रोगों के साथ जीने वाले लोगों (पीएलडब्ल्यूएनसीडी) के कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार होने या मरने का खतरा ज्यादा होता है।

उच्च मृत्यु दर वाले कई देशों ने बताया है कि कोविड से सबसे ज्यादा मौंतें बुजुर्गों और उन लोगों की हुई हैं, जो डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसे एक या एक से अधिक रोगों से पीड़ित थे। जून के अंत तक, भारत में पांच लाख से अधिक कोविड-19 के मामले थे और इनमें से 70 प्रतिशत से अधिक मामले सह-रुग्णता के कारण थे।

कोरोना काल से पहले भी जागरूकता की कमी और  स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच की कमी के चलते गैर संचारी रोगों से पीड़ित लोग इलाज से वंचित थे। कोविड -19 के बढ़ते बोझ ने गैर संचारी रोगों से पीड़ित लोगों की स्थिति को कमजोर बना दिया है, क्योंकि जिन लोगों में गैर-संचारी रोगों की पुष्टि हो चुकी थी, उनमें से भी ज्यादातर को महामारी के दौरान बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही थीं।

हालांकि लॉकडाउन को समाप्त करने के लिए कई दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन गैर-संचारी रोगों से पीड़ितों की स्थिति में तब तक सुधार नहीं हो सकता, जब तक कि उन्हें पहचानने और उनकी सुरक्षा करने के लिए अभिनव समाधान नहीं मिलते।

लॉकडाउन के दौरान, दुनिया भर में गैर-संचारी रोगों से पीड़ितों को अपने इलाज में असंख्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ज्यादातर स्वास्थ्य प्रणालियों को पुनर्गठित किया गया है और गैर-संचारी रोगों से पीड़ित उनकी प्राथमिकता में नहीं थे।

ऐसी सूचनाएं मिली हैं कि पुराने रोगियों के इलाज, जरूरी दवाओं एवं प्रौद्योगिकियों की आपूर्ति व स्क्रीनिंग एवं उपचार में रुकावट के साथ-साथ गैर-संचारी रोगों के इलाज में सहायक स्वास्थकर्मियों तक पहुंच  में भी बाधा हुई। भारत में लॉकडाउन के दौरान, सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की अनुपलब्धता के साथ-साथ कई स्वास्थ्य सुविधाओं के बंद होने के कारण भारत में स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं बाधित हुईं।

बेशक भारत में कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, पर भारत में कोरोना मरीजों के ठीक होने की दर (रिकवरी रेट) 25 मई को  41.4 फीसदी थी (अब यह दर 60 फीसदी हो चुकी है)। मध्य अप्रैल में केरल में मृत्यु दर 0.5 फीसदी थी, जो विश्व में सबसे न्यूनतम थी।

केरल की रिकवरी रेट भी उत्साहित करने वाली थी। इसका कारण था कि केरल ने स्वास्थ्य निगरानी का अभियान चलाया था-कमजोर बुजुर्गों, सह-रुग्णता वाले लोगों, और कम वजन वाले व कुपोषित बच्चों पर कड़ी निगरानी रखी गई और गैर-संचारी रोगों के पीड़ितों को उनके दरवाजे पर एक महीने की दवा की आपूर्ति की गई।

ऐसा विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न लोगों के सहयोग से किया गया। उसी समय पड़ोसी राज्य कर्नाटक ने 4.3 प्रतिशत की मृत्यु दर दर्ज की और इसका कारण यह था कि सह-रुग्नता वाले रोगियों की पहचान नहीं की गई और उन्हें तुरंत अस्पताल नहीं पहुंचाया गया।

कोविड-19 से जंग, जिनमें लॉकडाउन, शारीरिक दूरी और आत्म-अलगाव शामिल हैं, के दौरान शारीरिक गतिविधियों में बाधा और अस्वास्थ्यकर भोजन के चलते गैर-संचारी रोगों के कारकों,जैसे शराब और तंबाकू का उपयोग बढ़ने के जोखिम हैं।

यह वर्तमान में स्वस्थ आबादी को इन आदतों का लती होने की एक नई चुनौती पेश करेगा, और बाद में वे गैर-संचारी रोगों का सामना कर सकते हैं। महामारी की शुरुआत में, डब्लूएचओ ने लोगों को स्वस्थ रहने और तंबाकू का उपयोग छोड़कर अपनी प्रतिरक्षा में सुधार करने की सलाह दी।

अप्रैल में आईसीएमआर ने भी लोगों को तंबाकू का उपयोग न करने और सार्वजनिक स्थलों पर न थूकने की सलाह दी थी। सरकार ने बाद में कोविड-19 प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय निर्देश के तहत सभी धूम्रपान और धूम्रपान रहित तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां अब सरकारों से यह सुनिश्चित करने की अपील कर रही हैं कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय कोविड-19 रोकथाम योजनाओं में गैर-संचारी रोगों को भी शामिल किया जाए। जैसा कि हम सभी अगले कुछ वर्षों के लिए कोविड-19 के साथ रहने की तैयारी कर रहे हैं, हमें गैर-संचारी रोगों से पीड़ित कमजोर लोगों की सुरक्षा के लिए लगातार प्रयास करने और उनकी जरूरतों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। एक मजबूत, लचीली, योग्य, अच्छे स्वास्थ्यकर्मी से युक्त स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली और स्वस्थ आबादी मौजूदा वक्त की जरूरत है। (लेखिका पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के हेल्थ प्रोमोशन डिविजन में प्रोफेसर और निदेशक हैं।)

सौजन्य - अमर उजाला।
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अधर में शांति समझौते का भविष्य : Amar Ujala Editorial


 कुलदीप तलवार  

दुनिया में अधिकांश देश जहां अपने नागरिकों की जान बचाने के लिए कोरोना महामारी को रोकने में लगे हुए हैं, वैक्सीन की तलाश की जा रही है, वहीं अफगानिस्तान में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है।

अमेरिका और तालिबान के बीच अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए  29 फरवरी को जो शांति समझौता हुआ था, उस पर पूरा अमल नहीं हो पा रहा है। हिंसा की वजह है अफगान सरकार के किसी प्रतिनिधि का इस समझौते की बातचीत में शामिल नहीं होना।
इस समझौते के तहत दो हजार तालिबान लड़ाकों को जेलों से छोड़ना अब भी बाकी है, वहीं तालिबान की कैद में रहने वाले एक हजार अफगान सुरक्षाकर्मियों को नहीं छोड़ा गया है। उम्मीद कि जा रही थी कि समझौते के बाद हिंसा में कमी आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
तालिबान ने एक ही सप्ताह में 222 हमले किए, जिसमें 400 से ज्यादा  अफगान सुरक्षाकर्मियों को अपनी जान गंवानी पड़ी और डेढ़ सौ से ज्यादा लोग घायल हुए। अफगान सरकार पर दबाव बनाने के लिए कई धार्मिक गुरुओं को भी निशाना बनाया गया।

समझौते के बाद झूठा प्रचार किया गया कि अमेरिका तालिबान के बीच हुए समझौते में पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी पोल अमेरिका के विदेश विभाग की आतंकवाद पर ताजा रिपोर्ट ने अब खोली है।

इसमें कहा गया है कि पाकिस्तान ने अफगान शांति प्रक्रिया में कोई सकारात्मक योगदान नहीं किया। रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान हक्कानी नेटवर्क को अपनी जमीन उपयोग करने की इजाजत देता है, जो अफगानिस्तान व भारत को निशाना बनाते हैं।

इसे संयोग ही कहा जाएगा कि यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने नेशनल एसंेबली में अपने भाषण के दौरान अमेरिका में 9/11 को हुए आतंकी हमले के मास्टर माइंड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को शहीद करार दिया। इससे पाकिस्तान का दशहतगर्द समर्थक चेहरा उजागर हुआ है।

पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी देखना नहीं चाहता है। उसने हक्कानी नेटवर्क का सहारा लेकर अफगानिस्तान में भारतीय ठिकानों पर हमले भी करवाए। अफगानिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक खालिद सादात का कहना है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में एक छद्म भूमिका अदा कर रहा है।

तालिबान की बातों पर किसी भी सूरत में यकीन नहीं किया जा सकता। चंद दिन पहले ही तालिबान ने कश्मीर मुद्दे को भारत का अंदरूनी मामला बताते हुए इस पर पाक का साथ न देने की बात कही थी। जबकि इससे ठीक पहले कहा था कि काबुल में कब्जे के बाद कश्मीर को भी छीन लिया जाएगा।

इधर अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया में जुटे वार्ताकारों से जुड़े समाचार भी सामने आ रहे हैं। इनके मुताबिक, शीर्ष तालिबान नेताओं के कोरोना महामारी से संक्रमित हो जाने के बाद पैदा हुए मतभेदों के कारण तालिबान नेतृत्व में खलबली मची हुई है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट की मानें, तो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य अलकायदा व तालिबान के रिश्तों से परेशान हैं। यह खुलासा भी हुआ है कि तालिबान में एक नया गुट कलायत-हैज-ई बना है, जो शांति समझौते के खिलाफ है।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच मतभेदों को भुलाकर हाल ही में जो सत्ता समझौता हुआ है, शायद ही पुख्ता साबित हो। कुछ दिन पहले दो अफगान राष्ट्रपतियों के शपथ ग्रहण के समय अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने कहा कि यदि वे दोनों मिलजुलकर काम नहीं करेंगे, तो इस साल के साथ अगले साल के लिए भी एक अरब डॉलर की अमेरिकी मदद काट दी जाएगी।

अमेरिका में आगामी नवंबर माह में राष्ट्रपति चुनाव है। अधिकांश मतदाताओं ने नस्लवाद, कोरोना और बेरोजगारी को अमेरिका के लिए बड़ा खतरा बताया है। और ट्रंप को इन तीनों मोर्चों पर विफल करार दिया है।

इसलिए राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आने के बाद ही अमेरिका तालिबान शांति समझौते के भविष्य का पता चलेगा। मौजूदा हालात से पता चलता है कि शांति समझौता अधर में है और यह शायद ही टिकाऊ साबित होगा।

सौजन्य - अमर उजाला।
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सन 67 की अलख ज्योति जलाए रखें :Amar Ujala Editorial


प्रदीप कुमार

भारत को आए दिन 1962 की याद दिलाने वाला चीन खुद 58 साल पहले के हालात से जरूरी सबक नहीं सीख पा रहा। किसी भी देश को विजय या पराजय की ओर ले जाने में एक बड़ा निर्णायक तत्व होता है उसके नेतृत्व की गुणवत्ता। ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकत के खिलाफ महात्मा गांधी, उनके शीर्ष सहयोगियों-जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य ने विराट जनांदोलन खड़ा करने की प्रक्रिया में लाठियां खाई थीं, जेलें भरी थीं और ब्रिटिश सत्ता को बार-बार लुंज-पुंज किया था।

इन नेताओं की अखिल भारतीय पार्टी, कांग्रेस अहिंसक आंदोलनों की अभ्यस्त थी। उसके पास लाखों लोगों को सड़कों पर लाने की क्षमता तो थी, मगर सामरिक चिंतन नहीं था। अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे ज्यादा समझ रखने वाले नेहरू शह-मात का खेल खेलने में दक्ष नहीं थे। 1962 में यह था भारत का नेतृत्व। द्वितीय विश्व युद्ध में भाग ले चुके फौजी अफसरों की भूमिका भी निराशाजनक रही।
देखते हैं, चीन का नेतृत्व कैसा था। माओ त्से तुंग, चाउ एन लाइ, लिव शाओ ची, लिन पियाव, चू तेह और अन्य नेता कई युद्धों की भट्ठी से तप कर निकले थे। कम्युनिस्ट पार्टी और सेना, दोनों का वे कुशल नेतृत्व करते थे। मार्शल चियांग काई शेक की नौ लाख की सेना से भिड़ना उन्हें आता था।
अपने समय की सबसे ताकतवर, जापानी फौजी मशीन से भी उन्होंने हार नहीं मानी थी। यही वह नेतृत्व था, जो 1950 में कोरिया के मैदान में कूद पड़ा था। बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि कोरिया में अपने सामरिक उद्देश्य पूरे कर पाने में विफल अमेरिका ने चीन पर एटम बम छोड़ने की योजना बना ली थी।

लेकिन माओ को तो पहले ही यकीन हो चुका था कि 'साम्राज्यवाद कागजी शेर' है। इस नेतृत्व ने 1962 में भारत पर हमला किया था। 2020 में दोनों देशों का नेतृत्व बुनियादी तौर पर बदला हुआ है। चीन में युद्धों में तपे-तपाए नेताओं की पीढ़ी कब की जा चुकी है। चीन में पूंजीवाद आया है, तो उसके साथ ही पूंजीवादी शासन से पैदा होने वाली बुराइयां भी। कम्युनिस्ट पार्टी और शासन के कई वरिष्ठ अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जा चुके हैं। मार्क्सवादी-लेनिनवादी शब्दावली में कहें, तो आज के चीनी नेताओं का वर्ग चरित्र माओकालीन नेताओं से भिन्न है।

कुल मिलाकर वे नौकरशाह हैं। 1962 आते-आते नेहरू के साथ कांग्रेस भी थकने लगी थी। भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रवाद के शेर की सवारी करके सत्ता में आई है। संघ परिवार की समग्र शक्ति मोदी के पीछे है। सेना की स्थिति क्या है? माओ के जुझारू सैनिकों के पास खोने को बहुत कुछ नहीं था। वे उबले चावल खाकर लड़ा करते थे। आज का चीनी सैनिक सुविधाओं का आदी है। उसे दुनिया की सबसे बड़ी सेना और आधुनिक सैन्य तंत्र पर भी गुमान होगा।

लेकिन युद्ध में विजय के लिए सिर्फ उतना काफी नहीं होता। अगर यही होता, तो अफगानिस्तान से सोवियत संघ की विश्व-चर्चित लाल सेना को पलायन न करना पड़ता और अब अमेरिका वहीं से निकलने के लिए छटपटाता नहीं। 1979 में वियतनाम पर हमले के बाद चीन की सेना ने कोई जंग नहीं लड़ी है। भारतीय सेना 1962 के बाद 1965, 1971 और कारगिल की जंगें फतह कर चुकी है। ऊंची-ऊंची पहाड़ियों पर अनवरत युद्धों और सैनिक कार्रवाइयों का दुर्लभ अनुभव दुनिया में केवल भारतीय सेना को प्राप्त है। भारतीय सेना 1962 के राष्ट्रीय अपमान के एक अजेय अस्त्र से लैस है। ट्रेनिंग के दौरान 1962 की पढ़ाई अच्छी तरह करने वाले अफसर सीमा पर तैनात हैं। वे उस अपमान को धोने के लिए भी लड़ेंगे।

विस्तारवाद और युद्धोन्माद में सराबोर चीन से पेश आते समय हमें 1967 के इतिहास को अपनी राष्ट्रीय स्मृति में अमर स्थान देना चाहिए। भारत के राजनीतिक नेतृत्व और मनःस्थिति में आए परिवर्तन के निहितार्थ को समझने में चीन चूक कर गया, हालांकि इंदिरा गांधी 1962 में युद्ध के दौरान सेना और जनता का मनोबल बढ़ाने के लिए अपने पिता नेहरू और सुरक्षा बलों की अवहेलना कर तेजपुर तक पहुंच गई थीं। प्रधानमंत्री के नाते इन्हीं इंदिरा गांधी ने विद्रोहियों का दमन करने के लिए ऐजल पर बमबारी करवा दी थी।

1967 में चीन सिलीगुड़ी गलियारे तक पहुंचने के लिए सिक्किम में नाथू ला और  चो ला पर कब्जा करना चाहता था। भारतीय सेना ने नाथू ला की लड़ाई में चीन के 340 सैनिकों को हलाक कर चीनी सेना को तीन किलोमीटर पीछे धकेल दिया था। हमारे 89 सैनिक शहीद हुए थे। चो ला में चीन के 35 सैनिक मारे गए थे और भारत के 15 शहीद हुए थे। नाथू ला और चो ला की विजय ने चीन को कई वर्षों तक शांत रहने के लिए मजबूर कर दिया था। 1962 की पराजित सेना अब नए अवतार में आ चुकी थी। बारूद की गंध से जिनके दिल बैठने लगते हैं, उनकी पलायनवादी आवाजें भी सुनाई पड़ने लगी हैं। बेशक युद्ध तबाही लाता है। आर्थिक विकास अवरुद्ध होता है।

सैनिक हताहत होते हैं। लेकिन जब युद्ध थोपा जाए, जमीन हथियाई जाए और नाजी जर्मनी की तरह नई-नई मांगों के साथ अल्टीमेटम दिए जाएं, तो आप क्या करेंगे? मुल्क की इज्जत बचाने के लिए मुंहतोड़ जवाब देंगे या नहीं? सरकार सार्वजनिक प्रतिबद्धता व्यक्त कर चुकी है कि चीन को मई से पहले की स्थिति बहाल करनी पड़ेगी। सफल युद्ध सिर्फ सरकार और सेना नहीं लड़तीं। राष्ट्र की समस्त जनता लड़ती है। इसलिए पूरे देश को मानसिक तौर पर संकल्पबद्ध करने की जरूरत है।

चीन भारत के माफिक हालात पैदा करे, सेनाएं अप्रैल के अंत वाली रेखा तक लौट जाएं और युद्ध का खतरा दूर हो जाए, तब भी भारत को उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए। नेहरू से लेकर मोदी तक भरोसा कई बार किया जा चुका है। अब अगले मोर्चे की तैयारी करनी चाहिए। अगर चीन को यह विश्वास हो जाए कि भारत उसे विजय से वंचित ही नहीं, बल्कि हरा भी सकता है, तो युद्ध की आशंका अपने आप खत्म हो जाएगी। इस समय अंतरराष्ट्रीय शक्ति समीकरण चीन के प्रतिकूल है। लेकिन भारत के इतना अनुकूल भी नहीं कि वह प्रतिरोधक राजनय पर अमल कर सके। कीमत जो भी हो, भारत को भरोसेमंद और प्रतिरोधक शक्ति समीकरण पैदा करने लिए जुटना पड़ेगा।

सौजन्य - अमर उजाला।
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गांव लौटी महिलाओं के हित में :Amar Ujala Editorial

मनीषा सिंह
लॉकडाउन के समय गांव लौटे, और वहां से अब शहर लौट रहे प्रवासी मजदूरों के पूरे प्रसंग में महिला श्रमिकों की चिंता लगभग नदारद है। वे महिलाएं जो मजदूरों के संग गोद में बच्चों को उठाए पैदल चलकर और कई समस्याएं झेलकर गांवों में अपनी ससुराल लौटी हैं और वे महिलाएं जो पहले से गांवों में थीं, दोनों के जीवन में नई त्रासदियां पैदा हो गई हैं।

सरकार ने प्रवासी मजदूरों के लिए मुफ्त राशन का प्रबंध किया है। इसके अलावा सरकार ने गरीब कल्याण रोजगार अभियान नाम से एक अल्पकालीन रोजगार योजना शुरू की है, जिसमें प्रवासी मजदूरों को क्षमता और जरूरतों के अनुसार काम दिलाने का प्रबंध किया जा रहा है।
ऐसी ही एक योजना गांव-देहात लौटी उन महिलाओं के लिए भी हो, जिनके लिए गांवों में अब कोई आसरा नहीं बचा है। इन मजदूरों में वे महिलाएं भी हैं, जो घरों में आया (मेड) के रूप में या फिर कारखानों में होजरी जैसे पेशों में नौकरी और निर्माण स्थलों पर ईंट-बोझा उठाने आदि के काम करती रही हैं।
अनुमानत: दो करोड़ ऐसी महिलाओं ने भी इधर घर (ससुराल) वापसी की होगी। ध्यान रहे कि हमारे देश में पुरुषों के पोषणकर्ता होने की भूमिका को श्रमिक महिलाओं ने चुनौती दी है। पर इन महिलाओं की ससुराल-वापसी कई नए सामाजिक और आर्थिक संकट पैदा करेगी, जिस पर न सरकार और न समाजशास्त्रियों की ही नजर है। ऐसी महिलाओं की शहर से ससुराल वापसी जो समस्याएं पैदा कर रही हैं, उनमें एक यह है कि क्या वे बिना आय वाले ग्रामीण जीवन से सामंजस्य बिठा पाएंगी।

शहरों में अपना अलग परिवार और कमाई करने का मौका ग्रामीण महिलाओं में भी जो आत्मविश्वास भरता है, वह गांव लौटते ही डगमगा जाता है। ध्यान रहे कि ये महिलाएं मायके नहीं, ससुराल लौटी हैं, जहां उनके लिए घरों में ही स्पेस खत्म हो चुका था, क्योंकि उन्होंने काफी पहले विवशता में ही सही, शहर-कूच का रास्ता चुना था। वापसी पर घर के किसी कोने में यदि जगह मिल भी जाए, तो गांव-देहात में उन्हें कोई ऐसा काम मिलना असंभव ही है, जिससे उन्हें आमदनी हो। 

शहरों में इन महिलाओं को कामकाज के अलावा सिर्फ अपने परिवार के भरण-पोषण का प्रबंध करना पड़ रहा था, पर गांव में उन्हें पूरे कुनबे और बड़े-बूढ़ों आदि सभी की सेवा बिना किसी दाम-दमड़ी की अपेक्षा के साथ करनी होगी। अशांति का एक छोर और है।

जो कभी शहर नहीं गईं, गांवों में ऐसी महिलाओं को अब अपनी उन रिश्तेदार महिलाओं के साथ संतुलन बिठाना होगा, जो लॉकडाउन के कारण लौटी हैं। उन्हें अपने घर में रहने को जगह देनी होगी और सम्मान भी, क्योंकि अगर घर लौटने वाली ये श्रमिक महिलाएं पारिवारिक ओहदे में बड़ी हुईं, तो ग्रामीण घरों की बहुओं पर यह जिम्मेदारी होगी कि वे अपने परिवार के साथ इन मेहमानों के भोजन-पानी की व्यवस्था फिलहाल स्थायी प्रबंध के रूप में करें। ये बातें ग्रामीण जीवन में नई कलह का कारण बन सकती हैं।

सच यह है कि अब ग्रामीण और कस्बाई जीवन महिलाओं के लिए ज्यादा उपयुक्त नहीं रह गया है। पिछले एक-दो दशकों में गांव-कस्बों की लड़कियों में शहर जाकर पढ़ाई करने और कुछ बनने का जो जुनून सवार हुआ है, उसके पीछे यही तथ्य काम कर रहा है कि खेतों में बुवाई करने, मवेशियों की देखभाल करने और घर की चक्की में पिसते रहने से बेहतर है कि शहर का रास्ता पकड़ा जाए, जहां काम करने और एक आत्मनिर्भर जिंदगी जीने का कुछ तो मौका मिल सकता है। इसलिए शहर आकर घरों में मेड से लेकर ईंट-गारा ढोने और थोड़ा-बहुत पढ़ लिख गए तो दुकानों-शॉपिंग मॉल में सेल्स गर्ल तक का काम करके भी अपना जीवन धन्य मानती हैं।

सरकार ने लॉकडाउन के असर से ग्रामीण मजदूरों को राहत दिलाने के संबंध में जिस तरह कुछ योजनाएं बनाई हैं, उसी तरह यदि वह इन ग्रामीण महिलाओं की दुविधाओं और समस्याओं को भी ध्यान में रखकर कोई योजना लाती है, तो अच्छा होगा। उल्लेखनीय है कि देश के विकास में महिला योगदान की अब तक उपेक्षा ही हुई है। पर यह सिलसिला आगे भी जारी रहता है, तो इससे देश के आर्थिक विकास का चक्का डगमगा सकता है। सरकारों और संस्थाओं को नहीं भूलना चाहिए कि हर किस्म के पलायन और विस्थापन की सबसे बड़ी मार महिलाओं पर ही पड़ती है।

सौजन्य - अमर उजाला।
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