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Tuesday, December 1, 2020

क्यों नाराज हैं अन्नदाता: किसानों को लगता है ये तीनों कानून कॉरपोरेट को फायदा पहुंचाएंगे और उनका दोहन बढ़ जाएगा (अमर उजाला)

देविंदर शर्मा  

नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसान पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और उन्होंने बुराड़ी जाने के सरकार के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। अब केंद्रीय गृह सचिव ने किसान संघों को बातचीत का न्योता दिया है, पर प्रदर्शन स्थल बदलने की शर्त रखी है। लेकिन किसान संगठन सरकार से बिना शर्त बातचीत चाहते हैं। किसानों का यह आंदोलन अनूठा और ऐतिहासिक है। पहली बार ऐसा देखने में आया है कि पंजाब के किसानों के नेतृत्व में चल रहा यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल या धार्मिक संगठन से प्रेरित नहीं है, बल्कि किसानों ने राजनीति और धर्म, दोनों को इस आंदोलन का समर्थन करने के लिए मजबूर कर दिया है।


शिरोमणि अकाली दल पहले केंद्र द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानूनों को किसानों के हित में बता रहा था। लेकिन जब उसे लगा कि इससे उनके मतदाताओं के बीच गलत संदेश जा रहा है, तो उसने एनडीए से अलग होने का फैसला किया और केंद्रीय कैबिनेट से अपने मंत्रियों को भी वापस बुला लिया। साफ है कि किसानों का यह आंदोलन राजनीति से प्रेरित नहीं है, बल्कि इसने राजनीति को एक दिशा दी है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी भी कह रही है कि हमारे गुरुद्वारे और हम लगातार किसानों के समर्थन में खड़े हैं। इस आंदोलन में न केवल किसानों के परिजन हिस्सा ले रहे हैं, बल्कि पंजाब के गायक, अभिनेता, दुकानदार और अन्य पेशों के लोगों के साथ-साथ भारी संख्या में युवा भी समर्थन में खड़े हैं। यह बहुत वर्षों के बाद देखने में आया है कि किसी आंदोलन में पूरे पंजाब की भागीदारी नजर आती है।


जब से केंद्र सरकार ने कृषि से संबंधित तीन कानून बनाए हैं, तब से किसानों की नाराजगी बढ़ी है और उनके गुस्से का प्रसार हुआ है। लेकिन यह गुस्सा कई दशकों की किसानों की अनदेखी के चरम के रूप में फूटा है। हरित क्रांति के समय से ही पंजाब और हरियाणा में एपीएमसी मंडी का जाल बिछाया गया था, क्योंकि देश को खाद्यान्न की जरूरत थी। इसके अलावा इन वर्षों में एपीएमसी मंडियों से लेकर किसानों के खेतों तक ग्रामीण सड़कों का जाल बिछाया गया। तब यह जानते हुए कि, ज्यादा उत्पादन होने पर किसानों की उपज की कीमतें गिरेंगी, सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था बनाई। यानी जब किसान अपनी फसल लेकर मंडी में जाएगा और कोई व्यापारी उसे समर्थन मूल्य से ज्यादा कीमत देने को तैयार नहीं होगा, तो सरकार भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से आगे आएगी और एमएसपी पर किसानों से खाद्यान्न खरीदेगी।


यह व्यवस्था छह दशकों से पंजाब में चल रही है और आज भी पंजाब और हरियाणा में 80 हजार करोड़ रुपये हर साल किसानों को एमएसपी के माध्यम से मिलता है। अभी जो तीनों केंद्रीय कानून आए हैं, हालांकि उसमें कहा गया है कि एमएसपी को खत्म नहीं किया गया है, लेकिन किसान जानते हैं कि कई दशकों से ऐसे प्रयास हो रहे थे कि एपीएमसी की मंडियों को खत्म किया जाए और एमएसपी को हटाया जाए। राजनेता, अर्थशास्त्री आदि कहा करते थे कि इनको हटाए बिना किसानों की तरक्की नहीं हो पाएगी। इसलिए किसानों का कहना है कि केंद्र द्वारा लाए गए ये तीनों कानून कॉरपोरेट को फायदा पहुंचाएंगे और किसानों का दोहन बढ़ जाएगा।


अक्सर एपीएमसी मंडियों की खामियां गिनाई जाती हैं। उन खामियों को दूर करने के लिए एपीएमसी मंडियों की संरचना में सुधार करना चाहिए था। लेकिन लगता है कि एमपीएमसी मंडियां धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगी। नए कानून से एक देश में दो बाजार बन गया है। एक बाजार है एपीएमसी मंडी के अंदर, जिसमें कोई भी व्यापारी जब कोई खरीद करेगा, तो उसे टैक्स देना पड़ेगा। और दूसरा बाजार है एपीएमसी मंडी के दायरे के बाहर, जिसमें खरीदारी करने पर टैक्स देने की जरूरत नहीं है। जाहिर है, धीरे-धीरे व्यापारी फसल बाहर से खरीदेंगे। इस तरह से एपीएमसी मंडियां धीरे-धीरे खत्म होती जाएंगी और जब वे खत्म होती जाएंगी, तो एमएसपी का जो प्रावधान है, वह भी खत्म हो जाएगा। कई वर्षों से यह भी देखने में आ रहा है कि मंडियों में किसानों की फसल खरीदने से सरकार पीछे हटने की कोशिश करती रही है।


तर्क यह दिया जाता है कि सरकार के पास पहले से ही बहुत अनाज पड़ा है। ये तीनों कानून अमेरिका और यूरोप में छह-सात दशकों से चल रहे कानूनों की तर्ज पर ही हैं। वहां भी खेती गहरे संकट में फंसी हुई है। तो फिर उस विफल मॉडल को हम क्यों भारत में लाना चाहते हैं? आज भी अमेरिका में किसानों पर 425 अरब डॉलर का कर्ज है। एक अध्ययन के अनुसार, वहां के 87 फीसदी किसान खेती छोड़ना चाहते हैं। यूरोप में भी भारी सब्सिडी मिलने के बावजूद किसान खेती छोड़ रहे हैं।


किसानों की मांग है कि इन तीनों केंद्रीय कानूनों को हटाया जाए। लेकिन मेरा मानना है कि एक चौथा कानून लाया जाए, जिसमें यह अनिवार्य हो कि देश में कहीं भी किसानों की फसल एमएसपी से कम कीमत पर नहीं खरीदी जाएगी। किसानों की आय बढ़ाने के लिए यह जरूरी है। देश में इस समय एपीएमसी की सात हजार मंडियां हैं, जिनमें से अधिकतर पंजाब और हरियाणा में हैं। हमें देश में अभी 42,000 एपीएमसी मंडियों की जरूरत है। हमें इसमें निवेश बढ़ाना चाहिए, ताकि किसानों को घर के पास एक मंडी की सुविधा उपलब्ध हो। किसानों को असली आजादी तब मिलेगी, जब मंडी उनके घर के पास हो। दूसरी बात यह है कि अभी 23 फसलों के लिए एमएसपी घोषित होती है, पर मुख्यतः धान और गेहूं की ही खरीद होती है।


अगर पूरे देश में इन 23 फसलों को एमएसपी से कम पर नहीं खरीदने का कानून लागू कर दिया जाए, तो 80 फीसदी फसलें इसके तहत कवर हो जाएंगी। इससे किसानों की बड़ी आबादी लाभान्वित होगी। बहुत से छोटे किसान जिनके पास बेचने के लिए कुछ नहीं बचता, उनकी आय सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री-किसान निधि की राशि को छह हजार से बढ़ाकर 18,000 रुपये प्रति वर्ष कर देना चाहिए। तीसरी बात, अमूल डेयरी हमारे सामने एक सहकारी मॉडल है। अमूल डेयरी में अगर उपभोक्ता सौ रुपये का दूध खरीदता है, तो उसका 70 फीसदी किसानों के पास जाता है।


हमारे देश में यही सहकारी मॉडल दालों, अनाजों, सब्जियों, फलों इत्यादि पर क्यों नहीं लागू किया जाता, ताकि किसानों को फायदा मिल सके? इन्हीं तीनों चीजों से होकर आत्मनिर्भर भारत का रास्ता निकलता है। ये तीनों चीजें हमारी सामर्थ्य हैं। दूसरे देशों की नीति उधार लेने के बजाय अगर इसी में सुधार किया जाए, तो देश के किसानों को फायदा होगा। सरकार को वैसी नीतियां लानी चाहिए, जो देश के किसानों के हित में हों।


सौजन्य - अमर उजाला।

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असम के चुनाव में बच्चे: विभिन्न पार्टियों के लिए संगठनों ने तैयार किया घोषणापत्र (अमर उजाला)


क्षमा शर्मा 

बच्चों के लिए काम करने वाले संगठन और एनजीओ अक्सर शिकायत करते हैं कि चुनाव के दौरान विभिन्न दल अपने-अपने जो घोषणापत्र बनाते हैं, वे इसमें लोगों से तमाम वादे करते हैं। मगर उनमें बच्चों की समस्याओं पर बात नहीं की जाती। चूंकि घोषणापत्र वोट के गुणा-भाग से बनाए जाते हैं, और बच्चे वोट नहीं देते, इसलिए उनका ध्यान नहीं रखा जाता। बड़े समझते हैं कि वे सब कुछ जानते हैं, जबकि कई बार इसी कारण से बच्चों की समस्याएं अनदेखी रह जाती हैं। दशकों पहले यूनिसेफ ने दुनिया के बच्चों की सालाना रिपोर्ट में भी यह कहा था। अगले साल असम में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसे ध्यान में रखते हुए वहां के बच्चों और तमाम संगठनों में काम करने वाले लोगों ने विभिन्न पार्टियों के लिए बच्चों का घोषणापत्र तैयार किया है।


यह घोषणापत्र तैयार कराने में चालीस विभिन्न संगठनों ने भागीदारी की और असम के सत्रह जिलों के चार हजार बच्चों ने भाग लिया। इनमें से चुने गए दस बच्चों के साथ बच्चों की समस्याओं पर एक वर्कशॉप भी की गई थी। इसमें प्रत्येक नामक एक एनजीओ की मुख्य भूमिका है। यूनिसेफ ने भी इसमें तरह-तरह से सहायता की है। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले भी यूनिसेफ ने एडोलसेंट ऐंड चिल्ड्रन राइट्स नेटवर्क के साथ मिलकर एक ऐसा ही घोषणापत्र बनाया था।

यूनिसेफ ने दुनिया भर में री-इमेजिन नामक अभियान भी चला रखा है, जिसमें सरकार और तमाम संगठनों से अपील की गई है कि वे इस बारे में सोचें कि कोविड-19 के बाद दुनिया कैसे बेहतर बने। विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूल का वातावरण बच्चों का भविष्य तय करता है। इसलिए पहली जरूरत स्कूल को बच्चों का दोस्त बनाना है, जिससे कि बच्चे वहां न केवल पढ़-लिख सकें और उनका विकास हो, बल्कि वे सुरक्षित भी महसूस कर सकें। इस घोषणापत्र को सरकार और विपक्षी दलों को सौंपा गया है, जिससे कि वे आने वाले दिनों में चुनाव के लिए अपना घोषणापत्र बनाते हुए बच्चों का भी ध्यान रख सकें। असम के जिन क्षेत्रों में बच्चों से बात की गई, उनमें से हर एक की अलग समस्या थी।


जैसे जिन इलाकों में लगातार बाढ़ आती है, वहां के बच्चों का कहना था कि वे बाढ़ के कारण स्कूल नहीं जा पाते, इसलिए बाढ़ का सही प्रबंधन किया जाए। जिन इलाकों में पुल नहीं हैं, वहां पुल बनाए जाएं। पुल न होने के कारण न केवल पढ़ाई में मुश्किल आती है, बल्कि किसी के बीमार हो जाने पर इलाज में भी मुश्किल आती है। बाढ़ से जमीन का भारी कटाव होता है और लोगों को विस्थापित होना पड़ता है। मानसून के समय लाखों लोगों को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है, जिनमें बच्चे भी होते हैं। तब स्कूल भी महीनों तक बंद रहते हैं। ऑनलाइन कक्षाओं के इन दिनों में कई स्थानों पर नेटवर्क की समस्या अक्सर बनी रहती है। कई बार तो बच्चों को इसके लिए चार-पांच किलोमीटर तक

चलना पड़ता है। ऐसे में, बच्चों ने नेटवर्क की सही व्यवस्था की भी मांग की है।


एक फोन से पांच-पांच बच्चों को पढ़ाई करनी पड़ती है। कुछ बच्चों ने पुस्तकालय न होने की भी शिकायत की। बच्चों के घोषणापत्र की मुख्य मांग इस प्रकार हैं, बच्चों को हर तरह की हिंसा से मुक्ति मिले, सभी को सस्ती चिकित्सा सुविधाएं और पोषण युक्त भोजन मिले, जाति, वर्ग, लिंग, धर्म तथा अन्य किसी कारण से बच्चों के साथ भेदभाव न हो, सभी बच्चों को सस्ती और अच्छी शिक्षा मिले, जो बच्चे प्रतिकूल परिस्थितियों में रहते हैं, उनका विशेष तौर पर ध्यान रखा जाए, बच्चों के स्कूलों के इन्फ्रास्ट्रक्चर और मानव संसाधन की दशा में सुधार किया जाए, यानी स्कूल की इमारत अच्छी हो।


जरूरत के अनुसार अध्यापक भी हों, जिससे अधिक से अधिक बच्चे इसका लाभ उठा सकें, सभी परिवारों को पीने का साफ पानी और स्वच्छ वातावरण मिले, बच्चों की खेल-कूद और शारीरिक विकास के लिए उचित जगहें हों, दिव्यांग बच्चों को पूरी मदद मिले, जिससे कि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें, ऐसी योजनाएं बनें, जिनसे राज्य का विकास तो हो ही, पर्यावरण भी ठीक रहे, युवाओं की ऐसी भागीदारी हो कि उनका सही विकास हो सके। यह देखना है कि इस घोषणापत्र को राजनीतिक पार्टियां कितनी गंभीरता से लेंगी।



सौजन्य - अमर उजाला।

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Monday, November 30, 2020

वैक्सीन की भी सीमाएं हैं, कोरोना संक्रमण से मौतों पर तत्काल रोक की उम्मीद नहीं (अमर उजाला)

पॉल कोमेशॉफ 

ऑस्ट्रेलिया के स्वास्थ्य मंत्री ग्रेग हंट ने हाल ही में कहा है कि सरकार ने आगामी मार्च से कोविड-19 की वैक्सीन के वितरण की तैयारी कर ली है। अमेरिकी बायोटेक फर्म मॉडर्ना का कहना है कि उसकी वैक्सीन की प्रभावी क्षमता 95 फीसदी है। मॉडर्ना की घोषणा से पहले फाइजर ने अपनी वैक्सीन की 90 प्रतिशत और रूस की स्पुतनिक वी वैक्सीन की प्रभावी क्षमता 92 फीसदी है, हालांकि इस वैक्सीन की प्रभावी क्षमता के दावे सीमित आधार पर किए गए हैं। अगले कुछ सप्ताहों और महीनों में दूसरी वैक्सीनों के ट्रायल के प्रारंभिक नतीजों के आने की उम्मीद है। एक प्रभावी वैक्सीन से कोविड-19 को नियंत्रित करने की संभावना दृढ़ हो जाने की उम्मीद है, लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं है। कोई भी वैक्सीन पूरी तरह उपयुक्त नहीं होगी और न ही इससे संक्रमण और मौतों पर तत्काल रोक लग जाने की उम्मीद की जा सकती है। फिर पहले चरण में जो वैक्सीनें आएंगी, उनकी भी अपनी सीमाएं हैं।


मुद्दा यह है कि किसी भी वैक्सीन के अच्छे या प्रभावी होने के क्या आधार हैं? हमें यह सोचने की भी जरूरत है कि एक व्यक्ति, रेगुलेटर और देश के तौर पर हम किसी वैक्सीन की कितनी कमियों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। लेकिन सुरक्षा सबसे जरूरी मुद्दा है। एक बड़ी संख्या में स्वस्थ लोगों को वैक्सीन दिए जाने की बात है। इसका मतलब यह है कि लाखों लोगों को टीका लगाने पर अगर कोई मामूली-सी भी कमी सामने आए, तो बड़ी संख्या में लोगों को उसका नुकसान झेलना पड़ेगा। वैक्सीन का इस्तेमाल बड़ी संख्या में लोग करेंगे। ऐसे में, कम लोगों पर छोटी अवधि के ट्रायल का नुकसान यह है कि इससे किसी खास वैक्सीन के मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के बारे में पता नहीं चल पाएगा। यह एक ऐसी समस्या है, जिसका सामना हमें देर-सवेर करना ही पड़ेगा। इससे बचने का एक ही उपाय है कि ट्रायल के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को वैक्सीन दी जाए, फिर उसके प्रभाव का पता लगाने के लिए लंबा वक्त लगाया जाए, जिससे कि वैक्सीन से होने वाले संभावित नुकसान का पता स्पष्ट रूप से चल सके।

जाहिर है, हर दवा के साथ जोखिम जुड़ा हुआ होता है और व्यक्तिगत स्तर पर यह निर्णय लेना पड़ता है कि यह जोखिम उठाया जा सकता है या नहीं। हालांकि यह तर्क दिया जा सकता है कि कोविड-19 के भीषण खतरे की तुलना में वैक्सीन से जुड़े जोखिम शायद कम ही खतरनाक होंगे। लेकिन अमेरिकी तथा ऑस्ट्रेलियाई विनियामक प्राधिकरण के पास वैक्सीन की सुरक्षा से जुड़े व्यापक दिशा-निर्देश होने के बावजूद उन्होंने ऐसा कोई दिशा-निर्देश अभी तक जारी नहीं किया है कि कोरोना वायरस की वैक्सीन के तौर पर किस स्तर तक जोखिम उठाया जा सकता है। यही नहीं, इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस भी न के बराबर ही है।

आदर्श स्थिति तो यही है कि वैक्सीन लेने वाला हर व्यक्ति संक्रमण से सुरक्षित हो। लेकिन कोरोना वायरस की शुरुआती वैक्सीनों की प्रारंभिक रिपोर्टों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वैक्सीन से फायदे की एक सीमा होगी। उदाहरण के लिए, ये वैक्सीन बीमारी की भीषणता को थोड़ा कम कर सकती हैं, या आबादी के एक छोटे-से हिस्से को ही वैक्सीन का लाभ मिल सकता है। अभी किसी भी वैक्सीन का ट्रायल इस स्तर पर नहीं हो रहा, जिससे इसका सुबूत मिले कि वैक्सीन के जरिये कोरोना से होने वाली मौत या दूसरी बीमारियों से ग्रस्त उम्रदराज लोगों में इसके संक्रमण को रोका जा सकता है। यानी इन वैक्सीनों से उम्रदराज लोगों तथा बीमारियों से ग्रस्त लोगों को सुरक्षा मिलने की कोई गारंटी नहीं है।


चूंकि सभी ट्रायलों में उम्रदराज और बीमार व्यक्तियों पर वैक्सीन का परीक्षण किया भी नहीं जा रहा, ऐसे में, कोई दावे के साथ यह नहीं कह सकता कि उन जरूरतमंद लोगों को वैक्सीन का लाभ मिलेगा ही। दूसरे शब्दों में कहें, तो वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल का सैद्धांतिक रूप से भले लाभ हो, लेकिन वैक्सीन से उन समस्याओं का समाधान शायद न हो, जिनका सामना हम इन दिनों कर रहे हैं। यूएस फूड ऐंड एडमिनिस्ट्रेशन ने कहा था कि वह उन वैक्सीनों को मंजूरी देने के बारे में विचार कर रहा है, जो वैक्सीन का इस्तेमाल करने वाले कम से कम आधे लोगों में संक्रमण न होने दे या कोविड-19 की भीषणता कम करने में सफल हो। हालांकि ऑस्ट्रेलिया ने ऐसा कोई दिशा-निर्देश जारी नहीं किया है।


वैक्सीनों का रख-रखाव और उनका वितरण भी एक बड़ी समस्या है। फाइजर की वैक्सीन की ही बात करें, तो इसे एक निश्चित तापमान पर ही रखना पड़ेगा। ऐसे में, कम आय वाले देशों में, जहां स्वास्थ्य क्षेत्र का बुनियादी ढांचा जर्जर है, इस वैक्सीन का ज्यादा लाभ नहीं होने वाले। ऐसे में, अविकसित देशों के लिए दूसरी वैक्सीन ज्यादा उपयोगी साबित हो सकती है। हालांकि सैद्धांतिक तौर पर गरीब देशों में वैक्सीन की समय पर उपलब्धता की बात कही गई है, लेकिन वास्तव में ऐसा करने के लिए कोई कानूनी बाध्यता भी नहीं है। दरअसल वैक्सीन के मोर्चे पर ठोस कुछ न होने के कारण अभी कुछ और समय तक हमें मास्क और सामाजिक दूरी के पालन पर ही निर्भर रहना होगा।     


(-साथ में ईयान केरिज और रोस अप्शर -कन्वर्सेशन से।)


सौजन्य - अमर उजाला।

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विकास की सुस्त रफ्तार, अमीरों के प्रति हो रहा पक्षपात, जानिए क्यों ऐसा कह रहे पी चिदंबरम (अमर उजाला)

पी चिदंबरम  

कुछ दिनों पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा था, 'भारत 2020-21 में चालू खाते में अधिशेष (सरप्लस) दर्ज कर सकता है।' उन्होंने यह भी कहा था, 'पहली तिमाही (अप्रैल-जून, 2020) में हमारे पास 19.8 अरब डॉलर का अधिशेष था और यदि आने वाली तिमाहियों में हम इस तरह का प्रदर्शन न भी देखें, तब भी हमारे पास चालू खाते में अधिशेष हो सकता है।'


मुख्य आर्थिक सलाहकार ने इसे 'अंडर हीटिंग' अवधारणा बताया। इसका मतलब है कि मांग ध्वस्त हो गई है और कम से कम अब तक सरकार के कथित प्रोत्साहन पैकेज (बेहद मामूली और खराब तरीके से लक्षित) मांग को पुनर्जीवित करने में नाकाम रहे हैं। मांग से संबंधित एक पैमाना यह है : ऊर्जा मंत्री के मुताबिक 2021-22 में तापीय बिजली संयंत्रों में प्लांट लोड फैक्टर (किसी संयंत्र में औसत बिजली उत्पादन तथा किसी निश्चित अवधि में अधिकतम उत्पादन के बीच का अनुपात) के 56.5 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद है। 'अंडर हीटिंग' के बावजूद खुदरा महंगाई दर 7.61 फीसदी तथा खाद्य महंगाई दर 11.07 फीसदी रही, जिससे गरीबों पर बोझ बढ़ गया।

रोजगार की चुनौतियां

कृषि क्षेत्र में ही उम्मीद की किरण नजर आती है। 2020 में हमारे यहां रबी की फसल के रूप में 14.8 करोड़ टन खाद्यान्न का बंपर उत्पादन हुआ और खरीफ फसल के रूप में 14.4 करोड़ टन खाद्यान्न के उत्पादन का अनुमान है। इस साल ट्रैक्टर की बिक्री में नौ फीसदी वृद्धि होने का अनुमान है। एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) कंपनियों के मुताबिक शहरी मांग की तुलना में ग्रामीण मांग बेहतर है। फिर भी, ग्रामीण मजदूरी वृद्धि दर में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। लिहाजा तस्वीर मिली-जुली है, लेकिन इससे हमारी वृहत आर्थिकी का मूल्यांकन विकृत नहीं होना चाहिए। पूरी अर्थव्यवस्था खराब स्थिति में है, नीति निर्धारण भ्रमित है और पुनरुद्धार के दावे अतिरंजित हैं। वास्तविक मानदंड रोजगार और पारिश्रमिक/आय से जुड़े हैं।


सीएमआईई (सरकार के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं) के मुताबिक मौजूदा बेरोजगारी दर 6.68 फीसदी है। इसे श्रमिक भागीदारी दर के साथ पढ़ें, जो कि 41 फीसदी है और महिला श्रमिकों की भागीदारी दर 25 फीसदी है। सौ नियोजित लोगों में सिर्फ 11 महिलाएं हैं; लेकिन जिन प्रत्येक 11 लोगों की नौकरियां गई हैं, उनमें चार महिलाएं है। सितंबर, 2019 से सितंबर, 2020 के दौरान 1.1 से 1.2 करोड़ लोग श्रम बल से बाहर हो गए।


अमीरों के प्रति पक्षपात


अर्थव्यवस्था की 'अंडर हीटिंग', इसकी 'ओवर हीटिंग' जैसी ही खराब है। अर्थव्यवस्था की जब ओवर हीटिंग होती है, तो महंगाई बढ़ती है, ब्याज दरें इस तरह बढ़ती हैं, जिससे मांग खत्म होती है, कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और यदि सुचारू रूप से काम करने वाला बाजार हो और सुधारात्मक कदम उठाए जाएं, तो मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन कायम होता है। और जब 'अंडर हीटिंग' हो तब क्या होता है? भारत के लिए यह नई चुनौती है और मौजूदा सरकार इससे निपटने में अक्षम नजर आ रही है। वजह है सरकार गरीबों की मदद करने के बजाय कॉरपोरेट को खुश कर रही है। यदि मैं एक ही उदाहरण सामने रखूं, तो कॉरपोरेट्स को कर छूट के रूप में 1,45,000 करोड़ रुपये का भारी तोहफा दिया गया है। जबकि यह धन गरीबों को मुफ्त राशन या नकद हस्तांतरण के रूप में दिया जा सकता था। कॉरपोरेट्स ने इस धन का इस्तेमाल अपना कर्ज कम करने और नकदी बढ़ाने में किया। उन्होंने इसका निवेश नहीं किया। यदि गरीब लोगों को यह धन मिलता, तो वे भूखों नहीं मरते, जैसा कि तीन महीने के दौरान हफ्ते में कई दिनों तक उन्हें रहना पड़ा था। वे इस धन से भोजन, दूध, दवाएं और अन्य आवश्यक वस्तुएं खरीदते और कुल मिलाकर मांग में बढ़ोतरी करते।


चालू खाते में अधिशेष है, क्योंकि निर्यात आयात से अधिक हो गया, हालांकि अतीत के मानदंडों में ये दोनों अभी कम ही हैं। कम व्यापार मात्रा, चालू खाते में अधिशेष और रुपये के मूल्य में वृद्धि का अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है। इसका पहला निशाना होगा रोजगार। इसका अदृश्य वृहत आर्थिकी प्रभाव यह होगा कि भारत की दुर्लभ पूंजी विदेशों में निवेश की जाएगी। आप उस विकासशील देश की कल्पना कीजिए, जिसे बेताबी के साथ पूंजी की जरूरत है, मगर वह वास्तव में अपनी पूंजी दूसरे देशों में निवेश के लिए भेज रहा है!


आत्मनिर्भरता या निरंकुशता


मैं गंभीरता से सोचता हूं कि आत्मनिर्भरता के विचार को आगे बढ़ाने वालों ने ऐसे नतीजे की उम्मीद नहीं की थी। आत्मनिर्भर से आशय आत्म-निर्भरता से है, तो हमें इसका स्वागत करना चाहिए। लेकिन यदि नीति और अभ्यास के रूप में आत्मनिर्भर का अर्थ संरक्षणवाद, मुक्त व्यापार विरोधी, उच्च दरें, निरंकुशता, लाइसेंस और नियंत्रण की वापसी, मनमाने तथा पक्षपाती नियमों से है, तो फिर यह निश्चित रूप से तबाही की ओर ले जाएगा। मैं उम्मीद करता हूं कि मोदी ट्रंप को पीछे नहीं छोड़ेंगे।


हम एक अजीब दुनिया में रहते हैं, जहां कम्युनिस्ट चीन के राष्ट्रपति मुक्त व्यापार और वैश्वीकरण के गुणों पर वाक्पटुता से बोलते हैं और पूंजीवादी अमेरिका के राष्ट्रपति व्यापार समझौतों, विश्व व्यापार संगठन, मुक्त व्यापार, जलवायु परिवर्तन और पेरिस समझौते का उपहास उड़ाते हैं! क्या दुनिया को सबसे ऊपर रखा जा रहा है? क्या दुनिया उलट-पुलट गई है?


अर्थशास्त्री प्रोफेसर राज कृष्ण ने जिस 'हिंदू विकास दर' की बात की थी, उससे आगे बढ़ने में भारत को तीन दशक लग गए। हालांकि मैं मानता हूं कि चोल शासकों और मौर्य शासकों जैसे प्राचीन काल के हिंदू राजा दूरदर्शी थे और उन्होंने भारत की आर्थिक पहुंच का विस्तार करते हुए उसे चीन, इंडोनेशिया और रोम तक पहुंचाया था। उनमें सचमुच वैश्विक दृष्टि थी और उन्होंने दुनिया की  जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में भारत की हिस्सेदारी को 25 फीसदी तक पहुंचाया था। उन साम्राज्यवादी दिनों में-जब हमारे पास प्रशिक्षित अर्थशास्त्री नहीं होते थे- भारत ने मुक्त व्यापार को अपनाया, नए बाजारों पर कब्जा किया और भारत के भीतर स्थित कई राष्ट्रीयताओं की संपत्ति में वृद्धि की।


मुझे लगता है कि हम उस समृद्ध विरासत की ओर से पीठ मोड़ रहे हैं और ऐसी नीतियां अपना रहे हैं, जो हमें कम विकास दर के दौर में वापस ले जाएगी। ऑक्सफोर्ड के अर्थशास्त्रियों ने हमें चेतावनी दी है कि अगले पांच वर्षों में भारत औसतन 4.5 फीसदी विकास दर का गवाह बन सकता है। यह खतरे की घंटी है।


सौजन्य - अमर उजाला।

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'एक देश एक चुनाव' क्यों जरूरी है, बता रहे हैं आलोक मेहता (अमर उजाला)

आलोक मेहता  

भारत का लोकतंत्र हमारे घर से शुरू होता रहा है। राम और लक्ष्मण के युद्ध के निर्णय पर भिन्न राय होती थी, श्रीकृष्ण और बलराम के भी विचारों की भिन्नता और कौरव पांडव के प्रति कई बार अलग रुख देखने को मिले। आधुनिक युग में महात्मा गांधी के अनुयायियों में विभिन्न विचारों के लोग शामिल होते थे। मेरे अपने परिवार में एक सदस्य आर्य समाजी, तो उनकी जीवन साथी पक्की मूर्ति पूजक। एक कक्ष में यज्ञ के साथ मंत्रोच्चार और दूसरे कक्ष में सुंदर मूर्तियों के सामने पुरे मनोयोग से पूजा-भजन कीर्तन। इन दिनों सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में यह देखकर तकलीफ होती है, जब सहमति या असहमति को घोर समर्थक अथवा विरोधी करार दिया जाता है। कम से कम कुछ राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सौहार्दपूर्ण विचार विमर्श से दूरगामी हितों और भविष्य निर्माण के लिए संयुक्त रूप से निर्णय क्यों नहीं लिए जा रहे हैं। 'एक देश, एक चुनाव' का मुद्दा भी इसी तरह का समझा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यदि इसे उठाया है, तो इसे केवल उनकी पार्टी के एकछत्र राज और अनंत काल तक सत्ता बनी रहने वाला मुद्दा क्यों समझा जाना चाहिए? केवल तानाशाही अथवा कम्युनिस्ट व्यवस्था में यह संभव है।


सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई नया मोदी मंत्र नहीं है। संविधान निर्माताओं द्वारा स्थापित लोकतंत्र के आधार पर 1952 से 1967 तक चली आदर्श व्यवस्था को पुनः अपनाना मात्र है। ऐसा भी नहीं कि देश में एक साथ चुनाव होने पर करोड़ों का खर्च बढ़ जाएगा अथवा क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर की पार्टी अथवा निर्दलीय उम्मीदवार नहीं जीत सकेंगे। सत्तर वर्षों का इतिहास गवाह है कि अरबपति उद्योगपति, राजा महाराजा, प्रधानमंत्री तक चुनाव हारे हैं और पंचायत स्तर तक जनता के बीच चुनकर आए बिना मंत्री और प्रधानमंत्री भी रहे हैं। हां, मंडी के बिचौलियों की तरह चुनावी धंधों से हर साल करोड़ों रुपया कमाने वाले एक बड़े वर्ग को आर्थिक नुकसान होगा। यही नहीं निरंतर चुनाव होते रहने पर अपनी आवाज और समर्थन के बल पर पार्टियों में महत्व पाने वाले नेताओं को भी घाटा उठाना पड़ेगा और किसी सदन में रहकर ही अपनी धाक जमानी पड़ेगी।

जहां तक खर्च की बात है, राजनीतिक दलों को ही नहीं लाभ होगा, बल्कि देश के लाखों मतदाताओं- करदाताओं का करोड़ों रुपया बच जाएगा। भारत के प्रतिष्ठित शोध संस्थान सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब साठ हजार करोड़ रूपये खर्च हुए। जरा सोचिये लोकसभा के पहले तीन चुनावों यानी 1952, 1957 और 1962 में केवल दस करोड़ रूपये खर्च होते थे। उदार अर्थ व्यवस्था आने के बाद पार्टियों और उम्मीदवारों के पंख आकाश को छूने वाले सोने-चांदी, हीरे-मोती से जड़े दिखने लगे।

अदालतों और चुनाव आयोग ने उनके वैधानिक चुनावी खर्च की सीमा बढ़ाकर सत्तर लाख रुपये और विधानसभा क्षेत्र के लिए अट्ठाइस लाख रुपये कर दी, लेकिन व्यावहारिक जानकारी रखने वाले हर पक्ष को मालूम है कि पार्टी और निजी हैसियत वाले नेता लोकसभा चुनाव में पांच से दस करोड़ रुपये खर्च करने में नहीं हिचकते। कागजी खानापूर्ति के लिए उनके चार्टर्ड अकाउंटेंट हिसाब बनाकर निर्वाचन आयोग में जमा कर देते हैं। महाराष्ट्र के एक बहुत बड़े नेता ने तो सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया था कि लोकसभा चुनाव में आठ करोड़ खर्च हो जाते हैं। पिछले चुनाव में तमिलनाडु के कुछ उम्मीदवारों ने लगभग तीस से पचास करोड़ रूपये तक बहा दिए। आंध्र में कुछ उम्मीदवारों ने हर मतदाता को दो-दो हजार रुपये दे दिए।


वहीं चुनावी व्यवस्था करने वाले आयोग को सरकारी खजाने से करीब बारह हजार करोड़ खर्च करने पड़ रहे हैं। इस तरह विशेषज्ञों का आकलन है कि लोकसभा के एक निर्वाचन क्षेत्र पर औसतन एक सौ करोड़ रूपये खर्च हो जाते हैं। विधानसभा चुनावों में खर्च केवल अधिक सीटों की संख्या के अनुसार बंट जाता है। यह ठीक है कि लोकसभा के चुनाव सामान्यतः पांच साल में होते हैं, लेकिन राज्य विधानसभाओं में अस्थिरता की वजह से पिछले दशकों में उनके चुनावी वर्ष अलग अलग होने लगे। नतीजा यह है कि हर तीसरे चौथे महीने किसी न किसी विधानसभा, स्थानीय नगर निगमों - पालिकाओं या पंचायतों के चुनाव होते हैं। इस तरह देश और मीडिया में ऐसा लगता है, मानो पूरे साल चुनावी माहौल बना हुआ है। इसके साथ ही सरकारों पर आचार संहिता लगने से विकास खर्चों पर अंकुश और विश्राम के दरवाजे लग जाते हैं। राजनीतिक लाभ किसी को हो सर्वाधिक नुकसान सामान्य नागरिकों का होता है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Saturday, November 28, 2020

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ, उन्हें मुजीब की प्रतिमा भी नहीं चाहिए (अमर उजाला)

सुबीर भौमिक 

बांग्लादेश में कट्टर इस्लामिक समूहों ने देश के संस्थापक 'बंगबंधु' शेख मुजीबुर रहमान की प्रतिमा लगाने के खिलाफ आंदोलन चलाया है, जिसके कारण देश की सत्ताधारी अवामी लीग और कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों के बीच टकराव पैदा हो गया है। प्रतिमा को राजधानी ढाका के दक्षिणी उपनगर धोलाइपार में स्थापित किया जाना है। इस्लामवादी समूहों का कहना है कि मूर्तियों को स्थापित करना 'गैर-इस्लामी' है। ताकतवर इस्लामिक समूह हिफाजत-ए इस्लाम, जो पाकिस्तान की तर्ज पर बांग्लादेश में ईशनिंदा कानून पर जोर देता है, द्वारा देश भर में की गई फ्रांस-विरोधी रैली के तुरंत बाद मुजीब की प्रतिमा के खिलाफ यह आंदोलन शुरू हुआ है। 


दिग्गज बांग्लादेश विशेषज्ञ सुखोरंजन दासगुप्ता कहते हैं, 'यह वास्तव में विडंबना है कि यह आंदोलन मुजीब की जन्म शताब्दी वर्ष में हो रहा है और बांग्लादेश ने एक वर्ष पूर्व इस्लामिक पाकिस्तान से अपनी आजादी की स्वर्ण जयंती मनाई है।' उनकी बेस्टसेलर  पुस्तक मिडनाइट मैसेकर में 1975 के सैन्य तख्तापलट का विस्तृत विवरण दिया गया है, जिसके कारण मुजीबुर रहमान की उनके परिवार के साथ हत्या हुई थी। उनकी दो बेटियां तख्तापलट का निशाना बनने से बच गई थीं, जिनमें से एक शेख हसीना अभी देश की प्रधानमंत्री हैं। उनके बेटे सजीब वाजेद जॉय, जो अपनी मां के इन्फोटेक सलाहकार हैं, ने हाल ही में अपने सत्यापित फेसबुक पेज में पोस्ट किया कि बांग्लादेश '1971 के मुक्ति युद्ध के मूल्यों से दूर नहीं जाएगा, जो धर्मनिरपेक्ष, भाषायी बंगाली राष्ट्रवाद पर आधारित हैं।' 

बांग्लादेश के सूचना मंत्री हसन महमूद ने इस्लामवादियों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वे मुजीब की प्रतिमा को स्कल्पचर (मूर्तिकला) का काम मानें, मूर्ति नहीं। उन्होंने हाल ही में मीडिया को बताया कि समस्या तब शुरू होती है, जब कोई इन दोनों में फर्क नहीं कर पाता है। पुलिस ने अब तक इस्लामवादी आंदोलन को नियंत्रित किया है, जिसके चलते विरोध प्रदर्शन और आगजनी हुई। लेकिन अब जबकि अवामी लीग सरकार के दो मंत्रियों ने कट्टरपंथियों को प्रतिमा लगाने की धमकी दी है, नए टकराव की स्थिति बनती दिख रही है। मुक्तियुद्ध मामलों के मंत्री ए के मुज्जमल हक ने कहा, 'हम न केवल धोलाइपार में अपने प्रिय नेता की प्रतिमा लगाएंगे, बल्कि ढाका में सुहरावर्दी उद्यान में भी एक मूर्ति की स्थापना करेंगे। देखते हैं कि हमें कौन रोकता है।'

बांग्लादेश इस वर्ष मुजीबुर रहमान के जन्म शताब्दी का जश्न मना रहा है, जिन्होंने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश का आह्वान किया था। सुहरावर्दी उद्यान में ही मुजीबुर रहमान ने बांग्लादेश की आजादी की घोषणा की थी। उप शिक्षा मंत्री महिबुल आलम चौधरी नौफेल ने इस्लामवादियों को धमकी देते हुए कहा, 'जो भी अपनी सीमा पार करने की कोशिश करेगा, उसकी गर्दन तोड़ दी जाएगी।' अवामी लीग समर्थक फेसबुक पेज ने मुजीब की प्रतिमा के समर्थन में सोशल मीडिया अभियान चलाया है, जो तुर्की से लेकर पाकिस्तान तक मस्जिदों के सामने लगी प्रतिमाओं की तरफ इशारा करता है। लेकिन अवामी लीग के एक दशक सत्ता में रहने के बावजूद मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में इस्लामवादी कट्टरता बढ़ रही है। एक इस्लामी कट्टरपंथी को हाल ही में बांग्लादेश के एक लोकप्रिय क्रिकेट खिलाड़ी शाकिब अल हसन को मौत की धमकी देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। 


उसने आरोप लगाया था कि शाकिब ने कोलकाता में काली पूजा का उद्धाटन किया, जहां वह कोलकाता नाइट राईडर्स की तरफ से खेलने गए थे। अवामी लीग के शासन के पिछले एक दशक में इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों में कई धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगर, प्रकाशक, लोक कलाकार, लेखक और बुद्धिजीवी मारे गए हैं या घायल हुए हैं, जो बड़े पैमाने पर धर्मनिरपेक्ष देश में इस्लामवादी खतरे को रेखांकित करता है, जहां कई मुसलमान अपनी बंगाली भाषा और संस्कृति पर बहुत गर्व करते हैं।


पूर्व अभिनेत्री और वकील तथा शेख हसीना सरकार में कनिष्ठ सूचना मंत्री तराना हलीम कहती हैं, 'पाकिस्तान के समय से ही इन इस्लामवादियों ने हमारी धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के प्रतीकों पर हमला किया है। यह लंबे समय से चल रही वैचारिक लड़ाई है, जिसमें हमारे घरों में जन्मे कट्टरपंथियों को पाकिस्तान जैसे देशों के आतंकी समूह और खुफिया एजेंसी से समर्थन मिलता है और जिन्होंने 1971 के नुकसान को भुला दिया है।' हैरानी नहीं कि मुजीब प्रतिमा पर अवामी लीग समर्थकों के साथ-साथ पुलिस की कार्रवाई और संभावित टकराव की धमकी से इस्लामवादी वाकिफ हैं। बांग्लादेश इस्लामी आंदोलन के सर्वोच्च नेता रेजाउल करीम ने पत्रकारों से कहा कि इस्लाम में प्रतिमा अस्वीकार्य है। इसलिए हम धोलाइपार में मुजीब की प्रतिमा लगाने का विरोध करेंगे। कुछ इस्लामी नेताओं ने यहां तक कहा कि अवामी लीग 'शरीयत के सिद्धांतों के खिलाफ कार्य नहीं करने' के अपने वादे से मुकर रही है।


कुछ इस्लामवादी समूह कोलकाता के एक कॉलेज में मुजीब की प्रतिमा हटाना चाहते थे, जहां उन्होंने अपने कॉलेज के दिन बिताए थे, वे इसे प्रमुख मुस्लिम संस्थान में अनुचित बताते थे। लेकिन मोदी सरकार ने इसे अनसुना कर दिया और पश्चिम बंगाल सरकार को संभावित आंदोलन से दृढ़ता से निपटने के लिए कहा, जो इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों की सीमापार उपस्थिति का संकेत था। बांग्लादेश में इससे पहले भी मुजीब की प्रतिमा लगी हैं। सुखोरंजन दासगुप्ता कहते हैं, 'दो चुनावों में लगातार विफल रहने के बाद इस्लामवादी समूह सत्तारूढ़ अवामी लीग के खिलाफ इस मुद्दे को उठा रहे हैं।' कभी अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर द्वारा गरीब बताए जाने वाले बांग्लादेश ने पिछले दशक में कई सामाजिक विकास संकेतकों में तेजी से उपलब्धि हासिल की, जिसमें नवजात एवं बाल मृत्युदर, शैक्षणिक लैंगिक असमानता शामिल है और इस वर्ष उसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत से ज्यादा हो गई है। तराना हलीम कहती हैं कि ऐसा इसलिए संभव हो पाया है, क्योंकि बांग्लादेश धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र पर आधारित है, लेकिन इस्लामवादी कट्टरपंथी इसे पाकिस्तान के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं, जो किसी भी कीमत पर नहीं होने दिया जाएगा।

सौजन्य - अमर उजाला।

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कोविड काल में बदलती चिकित्सा व्यवस्था (अमर उजाला)

आर कुमार, वरिष्ठ चिकित्सक  

वर्ष 2020 को चिकित्सा जगत में बदलाव के दशक की शुरुआत होना चाहिए था, जब कई तरह की बीमारियों और शल्य चिकित्सा के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काफी काम हुआ। लेकिन कोविड के आगमन के साथ दुनिया पूरी तरह से उलट-पलट गई और बीमारी और मौत के बवंडर में धकेल दी गई। कोविड के संदर्भ में स्वास्थ्य सुरक्षा सेवा में तुरंत सुधार की जरूरत महसूस हुई। इससे स्वास्थ्य सेवा का नया मॉडल विकसित हो गया। एकांतवास, दूरस्थ स्वास्थ्य सेवा और रोबोट तथा ड्रोन पर निर्भर प्रौद्योगिकी आधारित चिकित्सा पर जोर दिया जाने लगा।


उपचार के लिए विशिष्ट दवा एजेंटों और संक्रमण को रोकने के लिए टीके की खोज शुरू हो गई। इसके साथ ही अस्पताल में ढांचागत बदलाव की जरूरत भी महसूस हुई है। आज स्वच्छ हवा के लिए अब हीटिंग, वेंटिलेशन ऐंड एयर कंडीशनिंग (एचवीएसी) सिस्टम उपलब्ध है। कुछ कंपनियां तो नैनो टेक्नोलॉजी से लैस एयर कंडीशनर की पेशकश कर रही हैं। ये न केवल वायु प्रदूषण को खत्म करने में कारगर हो सकते हैं, बल्कि कोरोना वायरस जैसे संक्रमण को रोकने में भी सहायक हो सकते हैं। डिजिटल थर्मामीटर, हैंड सेनेटाइजर स्टैंड, ग्लास स्क्रीन और मास्क वायरस फैलाने वाले ड्रापलेट्स से सुरक्षा के लिए सर्वव्यापी बन गए हैं। आरोग्य सेतु एप कोविड के विस्तार को समझने और नियंत्रित करने में सहायक साबित हुआ है।

अनेक देशों ने सरकार समन्वित नियंत्रण तथा शमन प्रक्रिया को स्मार्ट फोन के साथ एकीकृत किया है, जिसमें निगरानी, परीक्षण, कांटेक्ट ट्रेसिंग और क्वारंटीन शामिल हैं, जिससे संक्रमण के वक्र को शीघ्र सीधा करने में मदद मिली। यह दिलचस्प है कि मॉस्को ने देश में संक्रमण का पता लगाने के लिए क्यूआर आधारित व्यवस्था शुरू की। तो अमेरिका स्थित तकनीक क्षेत्र के

दिग्गजों-एपल और गूगल ने जांच और संक्रमण का पता लगाने से संबंधित रणनीति के लिए साझेदारी प्रस्तुत की। वास्तव में लोग आज चिकित्सा संबंधी सलाह के लिए फोन और व्हाट्सएप का सहजता से इस्तेमाल कर रहे हैं। दवाओं की ऑनलाइन बिक्री में बढ़ोतरी हुई है। देश में महामारी से पहले तीस लाख लोग दवाओं की ऑनलाइन खरीदारी कर रहे थे और अब 90 लाख लोग। प्रधानमंत्री ने नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन की घोषणा की है, और इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य प्राधिकरण को सौंपी गई है। इसके तहत डॉक्टरों, अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी अन्य जानकारियां एकत्र की जाएंगी और डिजिटिल हेल्थ आईडी तैयार की जाएगी। कोविड की वैक्सीन आने पर टीकाकरण संबंधी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में इसकी अहम भूमिका होगी।


प्रौद्योगिकी और स्मार्ट फोन के विस्तार का एक अहम पहलू यह भी है कि गर्भवती महिलाओं तक को एप के जरिये उनके स्वास्थ्य की जानकारी मिल रही है। निश्चित रूप से ये मॉडल महामारी के खत्म होने के बाद भी मातृत्व स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए अहम होंगे। टेलीहेल्थ सेवा से जुड़े अनेक लोगों का तर्क है कि महामारी के खत्म होने के बाद भी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्वास्थ्य सेवा लेने की व्यवस्था की जगह वीडियो विजिट ले लेगी। लोगों में डिजिटल स्वास्थ्य सेवा की बढ़ती स्वीकार्यता कोई गलत संकेत नहीं है। हालांकि यह भी सच है कि टेलीहेल्थ पूरी तरह से चिकित्सक के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपनी बीमारी की जानकारी देनी की जगह नहीं ले सकता। यह विशेष रूप से अनिद्रा, डिमेंशिया (मनोभ्रंश) और चिंता संबंधी भावनात्मक मनोविकारों के मामलों में सच है, कोरोना संक्रमितों में से 20 फीसदी मरीजों में ऐसे लक्षण पाए गए हैं। 


कुछ देशों में वायरस की जांच के दौरान मुंह से सैंपल लेने, अल्ट्रासाउंड स्कैन और अस्पतालों में भोजन तैयार करने तक में रोबोट का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी तरह से डिसइंफेक्शन करने और थर्मल इमेजिंग में भी रोबोट का इस्तेमाल हो रहा है। एक चीनी बहुराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी कंपनी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित समाधानों का निर्माण किया है, ताकि बड़ी आबादी को प्रभावी ढंग से स्क्रीन किया जा सके और उनके शरीर के तापमान में बदलाव का पता लगाया जा सके। मगर ध्यान रहे, ऐसी सारी प्रौद्योगिकी की एक सीमा है।

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Friday, November 27, 2020

समृद्धि के लिए डेटा सुरक्षा जरूरी, जानिए क्या हैं इसके मायने (अमर उजाला)

शंकर अय्यर 

मई 2010 में आधार की शुरुआत के वक्त 'डेटा सुरक्षा, सुरक्षा और गोपनीयता मानदंडों के लिए कानूनी ढांचे' की सिफारिश करने के लिए सचिवों की एक समिति की स्थापना की गई थी। संक्षिप्त नोट में कहा गया था: 'विभिन्न सरकारी और निजी एजेंसियों द्वारा एकत्रित किए जा रहे व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और संरक्षण कानून में खामी के कारण सवालों के घेरे में है, क्योंकि भारत में कोई डेटा सुरक्षा कानून नहीं है। भारत को इन मुद्दों पर व्यापक और व्यवस्थित तरीके से सोचना शुरू करना होगा।' वर्ष 2020 में एक दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद- जब एक अरब आधार नामांकन हो चुके हैं, कई समितियों और आयोगों के बाद निजता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है और एक श्वेत पत्र जारी हो चुका है- भारत डेटा की सुरक्षा और व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए एक फ्रेमवर्क का इंतजार कर रहा है। हां, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की एक धारा 43 ए है, जो सुनिश्चित करती है कि निजी संस्थाएं क्षतिपूर्ति और मुआवजे के भुगतान के लिए उत्तरदायी हैं। हालांकि, डेटा की परिभाषाएं संकीर्ण हैं और प्रावधान व्यापक नहीं हैं। निवारण प्रणाली की अपर्याप्तता और डिजिटल दुनिया में डेटा प्रवाह की जटिलताओं ने हालात को बदतर बना दिया है।


सरकार अगर निजी डेटा संरक्षण अधिनिययम, 2019 को संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पारित करवाने में तेजी लाती है, तो इसमें बदलाव हो सकता है। यह विधेयक दिसंबर, 2019 में संसद में पेश किया गया था और तबसे संसद की संयुक्त समिति के पास लंबित है। पचास खरब डॉलर जीडीपी की आकांक्षा पालने वाला देश डिजिटल दुनिया में यथास्थितिवाद को बर्दाश्त नहीं कर सकता है। विकास और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए भारत को डेटा सुरक्षा कानून की आवश्यकता है। श्वेत पत्र तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष जस्टिस बी एन श्रीकृष्णन ऑर्वेलियन स्टेट (स्वतंत्र समाज के कल्याण के लिए विनाशकारी) का डर जताते हुए कहते हैं कि यह विधेयक अपने आप में समस्याग्रस्त है, विशेष रूप से राज्यों को मिली व्यापक स्वतंत्रता के कारण। राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों के लिए डेटा को संसाधित करने की खातिर विभिन्न स्तरों पर खंड 12 में सरकार को रोकथाम, जांच एवं अभियोजन के लिए छूट प्रदान की गई है। 

इसके अलावा डेटा संग्रहण के लिए जिम्मेदार व्यक्ति से लेकर सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए डेटा संसाधित करने तक में नागरिक उपयोगकर्ता की सहमति के बिना छूट में अस्पष्ट शब्दों का उपोग किया गया है। स्पष्ट रूप से, समीक्षा और अपील की प्रक्रिया में पर्याप्त रूप से आश्वस्त नहीं किया गया है और सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। आशंकाएं जायज हैं और उम्मीद है कि संयुक्त समिति इन खंडों पर विचार करेगी। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को विश्वसनीयता और वैधता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक बहस की अनुमति देनी चाहिए। उचित डेटा की सुरक्षा के लिए एक कानून की कमी और उसकी अनिवार्यता को संदर्भ से बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशंस यूनियन के आंकड़ों के मुताबिक, 2010 में भारत में मुश्किल से नौ करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता थे। वर्ष 2020 में 74 करोड़ से ज्यादा पंजीकृत इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। और डिजिटल इकोसिस्टम में भारतीयों का जुड़ाव उत्साहजनक है। 

भारत के लोग सामाजिक जुड़ाव से लेकर सरकारी सेवाओं तक पहुंच बनाने और व्यवसाय करने तक-यानी हर चीज के लिए एप का उपयोग करते  हैं। फेसबुक पर 32 करोड़ से अधिक और व्हाट्सएप पर 40 करोड़ से अधिक भारतीयों के सक्रिय होने का अनुमान है। एरिक्सन की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीयों द्वारा डेटा उपयोग 2019 में 12 जीबी प्रति माह से बढ़कर 2025 तक 25 जीबी प्रति माह हो जाएगा। यहां तक कि संकीर्ण अनुमानों के अनुसार, 12 करोड़ से अधिक भारतीय ऑनलाइन खरीदारी कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि 2016 के बाद से डिजिटल लेनदेन प्रतिदिन पांच गुणा बढ़कर 10 करोड़ से अधिक हो गया और 2025 तक 150 खरब रुपये मूल्य के लेनदेन के 1.5 अरब तक पहुंचने की उम्मीद है। इन लेनदेन और जुड़ाव में अंतर्निहित डेटा भंग किए जाने के लिहाज असुरक्षित है, क्योंकि लाभ के लिए विदेशों में भी पोर्ट किया जा रहा है। ई-केवाईसी के लिए आधार को जोड़ना, सरकार से लोगों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के  माध्यम  से भुतान का लाभ उठाने  और स्वास्थ्य लाभ के प्रावधान के लिए प्रस्तावित डिजिटल ढांचे में सक्षम बनाते हैं।


बहस इस बात पर हो रही है कि डेटा संरक्षण के लिए कौन-सा दृष्टिकोण बेहतर है-अमेरिका या यूरोपीय संघ के अलग-अलग राज्यों में डेटा संरक्षण के अलग-अलग कानून हैं। अमेरिकी दृष्टिकोण सूचित सहमति से जुड़ा हुआ है और पीड़ित व्यक्ति डेटा उल्लंघन के लिए मुकदमा कर सकता है। इसे एक मजबूत न्यायिक प्रणाली का समर्थन हासिल है। यूरोपीय मॉडल शीर्ष स्तर पर विनियामक परिवर्तन के अनुपालन के माध्यम से गोपनीयता का विरोध करता है और सामूहिक देयता पर निर्भर है। भारतीय संदर्भ और न्यायिक प्रणाली की अपर्याप्तता को देखते हुए, जेनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन मॉडल के लिए पूर्वाग्रह समझ में आता है। जो बात मायने रखती है कि वह यह कि सरकार अनुपालन लागतों को कैसे विनियमित और कम कर सकती है, ताकि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में नवाचार को नुकसान न पहुंचे। 


महामारी के बाद की दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में लोगों की छंटनी के लिए प्रौद्योगिकी को अपनाने के रुझानों में तेजी दिखने की आशंका है। आपूर्ति शृंखलाओं की पुनर्संरचना में डिजिटलीकरण की वृद्धि को देखा जा सकता है, और कुशल श्रम की आवाजाही देशों की घरेलू नीतियों द्वारा बाधित हो सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का बढ़ता उपयोग, पनपती स्टार्ट-अप संस्कृति, कृषि बाजार का उद्घाटन, फैक्टरी और कार्यालयों में बढ़ती दूरस्थ संलग्नता ने भारत को विकास का लाभ उठाने का अवसर प्रदान किया है। 'डेटा संपन्न' अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की वास्तविकता अच्छी तरह से स्थापित है। विकास को आगे बढ़ाने के लिए धन जुटाने, डेटा का लाभ उठाने का आह्वान राजनीतिक बयानबाजी या आर्थिक सर्वेक्षण में महज अभिव्यक्ति से ज्यादा जरूरी है। यह स्थानीयकरण के बाद डेटा सुरक्षा के लिए एक कानून का रोडमैप बनाने और जनता की भलाई के लिए इसके रूपांतरण का आह्वान करता है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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जन्नत में अंधेरा बिखेरने वाला ‘रोशनी ऐक्ट’ (अमर उजाला)

निर्मल यादव  

जम्मू और कश्मीर को बिजली से रोशन करने के लिए 2001 में पारित रोशनी ऐक्ट की आड़ में हुआ ‘महाघोटाला’ इन दिनों बहस का केंद्र है। बहस-मुबाहसे के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की तार्किक दलीलें आज मौजूं लगती हैं, जो उन्होंने पांच अगस्त, 2019 को राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के प्रस्ताव पर दी थीं। गृह मंत्री की दलीलें इसका एहसास कराने के लिए काफी थीं कि बीते 70 सालों में जम्मू-कश्मीर, एक मुल्क के भीतर दो मुल्क बनाने का मुफीद उदाहरण बनकर सामने आया है। रोशनी ऐक्ट घोटाले ने इस हकीकत से भी रुबरू कराया है कि असीम संभावनाओं वाले जम्मू-कश्मीर में नौकरशाही और सियासत के नापाक गठजोड़ ने व्यवस्था को किस कदर खोखला बना दिया है।


इस घोटाले के उजागर होने के बाद, यद्यपि झेलम और चिनाब में अब तक न जाने कितना पानी बह गया, लेकिन इसकी तह में बैठे अधिकारियों और राजनेताओं के चेहरों पर पानी पड़ना अभी बाकी है। अब एक नजर रोशनी ऐक्ट घोटाले से जुड़े तथ्यों पर। तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला सरकार ने 'जम्मू-कश्मीर राज्य भूमि अधिनियम 2001' को विधानसभा से पारित कर 2002 में लागू किया था। इस कानून का मकसद जम्मू-कश्मीर में वित्तीय संकट से जूझ रहीं पनबिजली परियोजनाओं के लिए 25 हजार करोड़ रुपये जुटाना था। राज्य को बिजली की रोशनी से रोशन करने के मकसद के कारण इस कानून को ‘रोशनी ऐक्ट’ नाम दिया गया। इस कानून की आड़ में सूबे के सियासतदानों और अफसरों ने दो दशक तक वोट और नोट की जमकर फसल काटी।

रोशनी योजना के वास्तुकारों ने 20 साल पुराने एक सरकारी सर्वे के हवाले से दलील दी थी कि राज्य की 20.64 लाख कनाल सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे हैं। अब्दुल्ला सरकार ने इस योजना के तहत राज्य में 1999 तक के अनधिकृत कब्जों को, बाजार दर पर कब्जाधारक से जमीन की कीमत वसूल कर कब्जे को अधिकृत कर 25 हजार करोड़ रुपये सरकारी खजाने में डालने की योजना को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया।  सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों को वैध बनाने का यह खेल अब्दुल्ला सरकार के बाद मुफ्ती मोहम्मद सईद और फिर गुलाम नबी आजाद सरकार तक को इतना रास आया कि इनकी सरकारों ने भी रोशनी ऐक्ट में संशोधन कर कब्जों की मियाद को दो बार बढ़ाकर, 2004 और फिर 2007 कर दिया। 

कैग की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार लक्ष्य के मुताबिक 20.64 लाख कनाल जमीन के कब्जों में से सिर्फ 3.48 लाख कनाल जमीन के कब्जों को ही अधिकृत कर पाई। इसके एवज में सिर्फ 76.24 करोड़ रुपये ही सरकारी खजाने में पहुंच सके। कैग रिपोर्ट के आधार पर एडवोकेट अंकुर शर्मा ने 2014 में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर रोशनी ऐक्ट को निष्प्रभावी घोषित करने की मांग की। अदालत ने इस योजना में वित्तीय अनियमितताओं के प्रमाण मिलने के बाद 2018 में रोशनी ऐक्ट को निलंबित करते हुए इसकी जांच जम्मू-कश्मीर की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) को सौंपी।


विडंबना देखिए कि रसूखदारों के दबाव में जांच के नाम पर खानापूर्ति करते हुए एसीबी ने 2019 में समूचे मामले को सबूतों के अभाव में अदालत से जांच बंद करने की गुजारिश कर दी। जबकि एसीबी की जांच के आधार पर ही हाईकोर्ट ने 2018 में रोशनी स्कीम में अनियमितताओं के प्रमाण मिलने पर इस योजना के तहत किसी भी प्रकार के वित्तीय लेन-देन पर रोक लगाई थी। हाईकोर्ट ने इस साल अक्तूबर में रोशनी ऐक्ट घोटाले की निष्पक्ष जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दिया। सीबीआई की तीन सप्ताह की जांच के आधार पर घोटाले में शामिल लोगों के नाम अब सामने आने लगे हैं। इनमें अब्दुल्ला और सईद परिवार के अलावा तमाम आला अधिकारियों के नाम उजागर हुए हैं। इससे इतर, यह मामला मौजूदा उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की अगुवाई वाले राज्य प्रशासन की उस घोषणा को भी कसौटी पर कसने वाला साबित होगा, जिसमें रोशनी ऐक्ट का उल्लंघन करने वाले अवैध कब्जों से सरकारी जमीन को मुक्त कराने की बात कही गई है। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि वह अपने प्रशासनिक कौशल से इस चुनौती को पार करने में कितने कामयाब होंगे।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Thursday, November 26, 2020

Editorial :वर्ल्ड हेरिटेज सप्ताह: इतिहास के अंधेरे में कल का उजियारा (अमर उजाला)

नवीन जैन 

बार-बार इतिहास के फेर में पड़ने की सलाह जानकार नहीं देते। मगर, उतना ही सही यह भी माना जाता है कि वर्तमान की बेहतरी और भविष्य को आंकने के लिए इतिहास को जानना जरूरी है। इतिहास के अंधेरे में ही हमारे कल का उजियारा छिपा हुआ होता है। अपने गौरवशाली अतीत को संजोकर रखने की जिम्मेदारी प्रत्येक नागरिक की है। जब हम अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को रखवाली करेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियां राष्ट्र के भव्य इतिहास से रूबरू होती रहेंगी। बिना बीते कल को जाने, आने वाले कल के बारे में तर्कपूर्ण फैसला नहीं लिया जा सकता। 


इन जानकारियों के बिना जवान नस्ल की जिदंगी की किताब अधूरी रह सकती है। शायद, इसी विचार के आधार पर दुनिया में प्रत्येक वर्ष दुनिया में 18 से 25 नवंबर तक विश्व धरोहर सप्ताह यानी, वर्ल्ड हेरिटेज वीक यूनेस्को के नेतृत्व में संपन्न होता है। भारत में कुल 38 धरोहर चिह्नित की जा चुकी हैं, जिनमें आगरा में स्थित ताजमहल और महाराष्ट्र स्थित अजंता तथा एलोरा की गुफाएं मुख्य हैं। संयुक्त राष्ट्र की शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संस्था यूनेस्को ने दुनिया की कुल 1075 ऐसी अमानतों को सूचीबद्ध कर रखा है। इस संगठन में 195 देश शामिल हैं। पहले स्थान पर 53 धरोहरों के साथ इटली तथा सबसे कम धरोहर चेक गणराज्य में हैं। 

अहमदाबाद कई बातों के लिए मशहूर है। दीवारों से घिरे इस शहर को यूनेस्को ने वैश्विक धरोहर का दर्जा दे रखा है। मोहब्बत की सदियों से निशानी आगरा का ताजमहल यूनेस्को की उक्त सूची में दूसरे स्थान पर है। पहला स्थान कंबोडिया के सुप्रसिद्ध अंकोरवाट मंदिर को प्राप्त है। गर्व की बात यह है कि ताजमहल उन चंद इमारतों में है, जो सबसे अधिक देखी जाती हैं। एक आंकड़े के अनुसार सामान्य दिनों में रोजाना करीब 12,000 सैलानी ताजमहल का दीदार करते हैं। भारत की प्रमुख धरोहरों में अजंता-एलोरा की गुफाएं, सांची का बौद्ध स्मारक, कुतुबमीनार, खजुराहो के मंदिर, राजस्थान के दर्शनीय स्थल, सूर्य मंदिर, कोणार्क, लाल किला परिसर आदि प्रमुख हैं। कुछ इमारतों को दोबारा बनाने की कोशिश की गई, पर उनमें कोई न कोई कमी रह ही गई। 

भारत की प्राचीन धरोहरों की खूबसूरती बनाए रखना सरकार का भी दायित्व है। ये धरोहर अपने मूल स्वरूप में नहीं रहीं, तो भारत की शान को बट्टा लगेगा। पिछले साल ताजमहल पर काले तथा भूरे धब्बे दिखाई देने लगे थे। कारण जो भी रहे हों, लेकिन सेंटजोंस कॉलेज आगरा के एंटोमोलॉजी विभाग के डॉ.गिरीश माहेश्वरी का कहना है कि यमुना नदी के बढ़ते प्रदूषण के कारण वहां गोल्डीकायरोनोमस प्रजाति के कीड़ों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों ने ताजमल पर मड पैक थेरेपी का इस्तेमाल करना शुरू किया, जिसके बहुत अच्छे परिणाम निकले। दरअसल वैश्विक धरोहरों को अपने मूल रूप में सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी हमारी भी है, लेकिन यह विडंबना है कि खुद हम इसे नुकसान पहुंचाते हैं।


विशेषज्ञों के अनुसार स्मारक का प्राकृतिक रूप से क्षरण होना तो प्रकृति का नियम है, लेकिन मानव द्वारा भी इसे क्षति पहुंचाई जाती है। कुछ लोग इन इमारतों पर स्लोगन या नाम लिखकर खराब करते हैं, तो कुछ नक्काशी या कुरेद कर इनका सौंदर्य बिगाड़ते हैं। इन धरोहरों को बचाने के लिए हर विभाग तथा हर व्यक्ति को प्रयास करने होंगे। धरोहरों की स्वच्छता को लेकर नियम बनाने होंगे तथा कठोरता से पालन करने के अलावा प्लास्टिक कचरा मुक्त संदेश भी जारी करने होंगे। तेजी से क्षतिग्रस्त होती स्थानीय धरोहरों के साथ लुप्त होते इतिहास को संजोने के लिए इंदौर के सीबीएसई के स्कूलों में स्थानीय ऐतिहासिक स्थलों को भी कोर्स में शामिल किया गया है।


अधिकांश बच्चों को इतिहास सबसे उबाऊ विषय लगता है। इसलिए इसे ज्यादा मजेदार और प्रायोगिक बनाने के लिए बोर्ड ने इतिहास में भी प्रायोगिक विषय शुरू कर दिए हैं। इसमें बच्चों को स्थानीय स्मारकों के इतिहास, वास्तुशैली, महत्व और संरक्षण के तरीकों पर उन स्थानों पर जाकर रिपोर्ट तैयार करनी होती है। इसमें न सिर्फ बच्चों का ज्ञान बढ़ता है, बल्कि उन्हें इन धरोहरों को संरक्षित रखने के तरीके भी पता लगते हैं। ऐसे प्रयासों का विस्तार किए जाने की जरूरत है, ताकि धरोहरों को संरक्षित रखा जा सके।

सौजन्य - अमर उजाला।

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पाकिस्तान, चीन और आतंकवाद...भारत दे रहा करारा जवाब (अमर उजाला)

हर्ष कक्कड़  

एक सुरंग के जरिये सांबा में घुसपैठ करने वाले चार पाकिस्तानी आतंकवादियों का नगरोटा में हुई हालिया मुठभेड़ में भारतीय सेना ने सफाया कर दिया। यह घटना पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान की बढ़ती हताशा को दर्शाती है। इस सुरंग की खोज और चीन को छोड़ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चार सदस्यों समेत चुनींदा दूतों को भारत सरकार द्वारा इस मुठभेड़ की जानकारी देने के निर्णय का मतलब है कि भारत के पास पाकिस्तान की इस घटना में संलिप्तता के पक्के सबूत हैं। पाकिस्तान की हताशा के कई कारण हैं। सबसे पहला तो यही कि पाकिस्तान की कश्मीर रणनीति विफल हो रही है। इस साल वे मुश्किल से 20-25 आतंकवादियों की घुसपैठ करा पाए हैं, जिनमें से कई का सफाया हो चुका है। घुसपैठ की अधिकांश कोशिशों को नाकाम कर दिया गया है। मजबूत भारतीय प्रतिशोध के कारण पाक चौकियों और आतंकी शिविरों को नष्ट कर दिया गया है, जिससे आतंकवादियों और पाक सैनिकों, दोनों को जान गंवानी पड़ी है और भारत को कोई नुकसान नहीं हुआ है।


घाटी में अधिकांश आतंकवादी समूह अभी नेतृत्वविहीन हैं या उनका नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथों में है, जिन्हें आतंकवादी गतिविधियों के समन्वय का कोई अनुभव नहीं है। घाटी में हथियार और गोला-बारूद की उपलब्धता कम हो गई है, जिससे पाकिस्तान को हथियारों को भेजने के लिए ड्रोन या तस्करी का सहारा लेना पड़ा। तथ्य यह है कि ये चारों आतंकवादी 11 एके सैंतालिस राइफल लेकर आ रहे थे, जिसका मतलब है कि हथियारों की कमी हो गई है। दूसरा कारण यह कि पाकिस्तान के मुख्य प्रतिनिधि हुर्रियत को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया गया है। उनके विशेषाधिकारों को खत्म कर, हवाला निधियों के प्रवाह को रोक कर, अवैध साधनों द्वारा अर्जित उनकी संपत्तियों की जांच करके, सरकार ने पाकिस्तान से उनके संपर्क को उजागर किया है। फंड की कमी, संगठित विरोध, मुठभेड़ के दौरान फंसे हुए आतंकियों को भगाने के लिए हिंसा, जबरन बंद, मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों की अंत्येष्टि जैसे कार्यक्रम बंद हो गए हैं। इसने घाटी में अपेक्षाकृत शांति कायम की है, जिसने पाकिस्तान के इस दावे को झुठला दिया है कि घाटी में सेना का नियंत्रण है। 

तीसरी बात, घाटी में निरंतर अशांति बनाए रखने की चीन की मांग को पूरी करने में भी पाकिस्तान विफल रहा है। हालांकि भारत के साथ अपने मौजूदा गतिरोध के मद्देनजर चीन पाकिस्तान से सीधे सैन्य हस्तक्षेप की मांग करने से हिचकिचा रहा है, लेकिन उसने मांग की है कि पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर अशांति बनाए रखे और घाटी में आतंकवाद को बढ़ाए, ताकि भारतीय सेना का ध्यान विचलित हो सके। पाकिस्तान इन दोनों मांगों को पूरा करने में असमर्थ है। भारत की जवाबी कार्रवाई गंभीर एवं दंडात्मक है, जिससे काफी पाकिस्तानी आतंकी हताहत हुए हैं और उसके सैनिकों के मनोबल पर असर पड़ा है। घाटी में आतंकवाद कम हो रहा है, जिससे ज्यादातर क्षेत्रों में हालात सामान्य हो रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि चीन पाकिस्तान की विफलताओं के लिए उसकी आलोचना करेगा। 

पाकिस्तान को इस बात का भी डर है कि कोई बड़ी आतंकी घटना को अंजाम देने पर भारत जवाबी कार्रवाई करेगा। परमाणु मिथक का भंडाफोड़ होने पर उसके पास सीमित विकल्प होंगे। कोई भी भारतीय जवाबी कार्रवाई पाकिस्तानी सेना पर दबाव बढ़ाएगी, जो पहले से ही विपक्षी दलों के पीपुल्स डेमोक्रेटिक मूवमेंट के घरेलू दबाव में है, जो सेना के राजनीति में दखल खत्म करने की मांग कर रहा है। नेशनल एसेंबली में अयाज सादिक के कबूलनामे से पाकिस्तानी सैन्य एवं राजनीतिक नेतृत्व में घबराहट है। पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था ने उसे किसी बड़े सैन्य ऑपरेशन को कुछ दिनों से ज्यादा झेलने की हालत में नहीं छोड़ा है। पाकिस्तान द्वारा डोजियर जारी करना भारत पर दोष मढ़ने की हताश कोशिश है। डोजियर झूठ और त्रुटियों से भरा पड़ा है। चीन को छोड़कर और किसी भी देश ने उसका संज्ञान नहीं लिया है।


इस सप्ताह शुरू होने वाले जिला विकास परिषद के चुनावों की घोषणा से ही साबित होता है कि भारत सरकार घाटी में आतंकवाद को नियंत्रित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को फिर से मजबूत करने के प्रति आश्वस्त है। जो माहौल बनाया गया है, वह सभी राजनीतिक दलों को इस चुनाव में भाग लेने के लिए प्रेरित करता है, जिसमें राज्य और केंद्र शामिल हैं। घाटी के ग्यारह

राजनीतिक दलों का समूह पॉलिटिकल एलायंस फॉर गुपकार डेक्लेयरेशन, जो अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद किसी भी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने के लिए तैयार नहीं था, ने अपनी भागीदारी की घोषणा की है। इन राजनीतिक दलों ने हमेशा पाकिस्तान के साथ बातचीत की मांग की थी, लेकिन वे अब अलग मंच पर लड़ेंगे।


इन चुनावों के सुचारू संचालन से दुनिया को यह संदेश जाएगा कि घाटी में शांति है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं शुरू की गई हैं। बड़ी संख्या में मतदाताओं के मतदान करने से यह साबित होगा कि आम कश्मीरियों ने पाकिस्तान और उसके दावे को खारिज कर दिया है तथा स्वेच्छा से अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण को स्वीकार किया है। इससे कश्मीर पर पाकिस्तान के दावे का भी खात्मा होगा और उसके सभी झूठ उजागर हो जाएंगे। विभिन्न देशों के दूतों के समक्ष पाकिस्तान की संलिप्तता के सबूत पेश करने के बाद अब अगर चुनाव से पहले या उस दौरान कोई आतंकी हमला होता है, तो उसका दोष पाकिस्तान पर मढ़ा जाएगा। चीन को लद्दाख में भारत से कड़ी चुनौती मिल रही है। इसने चीनी हान सैनिकों को उस क्षेत्र में सर्दियां बिताने के लिए मजबूर किया है। यथास्थिति बदलने और अपने दावे के क्षेत्र को सुरक्षित करने की उसकी नीति विफल हो गई है।


कैलास रिज पर कब्जा और सर्दियों में भारत के ऊंचाइयों पर टिके रहने के संकल्प ने चीन को चौंका दिया है। फिलहाल भारत को बढ़त हासिल है, हालांकि यह बड़ी महत्वाकांक्षा पालने का वक्त नहीं है। कश्मीर पर वैश्विक दृष्टिकोण को बदलने के लिए चुनाव का सुचारू संचालन आवश्यक है। जब तक इसका कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है, सुरक्षा बलों को अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने के पाकिस्तानी कोशिश को ध्वस्त करना चाहिए। यह पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब करने का वक्त है, और ऐसा किया ही जाना चाहिए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Tuesday, November 24, 2020

Editorial : ऊर्जा दक्षता वाली इमारतों की जरूरत ( अमर उजाला)

सचिन के शर्मा  

औद्योगिक क्रांति की शुरुआत से ही किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए ऊर्जा और ऊर्जा का उत्पादन एवं वितरण केंद्र में रहा है। विश्व के सभी देश अपनी अर्थव्यवस्था को कृषि से औद्योगिकीकरण और सर्विस सेक्टर की तरफ ले जा रहे हैं। कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस, शेल गैस, परमाणु ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों जैसे विभिन्न ऊर्जा संसाधनों की खोज, कभी-कभी शोषणकारी भी बन जाती है, जो हमें पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक वातावरण में कई बार तनाव के रूप में दिख जाती है। वर्तमान में कई देश न केवल ऊर्जा के वैकल्पिक नवीकरणीय संसाधनों की खोज कर रहे हैं, बल्कि प्रौद्योगिकियों, प्रक्रियाओं और उपकरणों का आविष्कार कर रहे हैं, जो कुशलता से ऊर्जा की खपत करते हों। 


संयुक्त राष्ट्र ने भी सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के तहत ऊर्जा और उसकी दक्षता को सम्मिलित किया है। इसी क्रम में, सतत ऊर्जा और दक्ष खपत के लिए सभी देशों की सरकारों से अपनी नीतियों और कार्यक्रमों में इन लक्ष्यों को सम्मिलित करने का आग्रह किया है। भारत खुद को विश्व का मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बनाने के लिए प्रयासरत है, जो कि सरकार के 'मेक इन इंडिया' प्रोग्राम से परिलक्षित होता है। पर इन सब के लिए ऊर्जा के क्षेत्र में खास तरीके से ध्यान देने की आवश्यकता है। 2015 में, भारत सरकार ने 'स्मार्ट सिटीज' मिशन शुरू किया। एक स्मार्ट शहर, वह शहर है, जो बुनियादी ढांचा प्रदान करता है, स्वच्छ और टिकाऊ वातावरण के साथ अपने नागरिकों को जीवन की गुणवत्ता की स्थिति प्रदान करता है। स्मार्ट सिटी, स्मार्ट उपकरणों, मशीनों और शहर के संचालन के सतत तरीकों से संचालित होती है और इसमें ऊर्जा का संरक्षण और ऊर्जा दक्षता में वृद्धि करने वाली प्रक्रियाएं भी बहुत ही अहम हैं। हमारे देश के शहरों का आकलन, ऊर्जा की खपत के संदर्भ में उनकी स्थिरता को कई दृष्टिकोणों से गंभीर रूप से विश्लेषण करने की आवश्यकता है। 

हमारे देश की विशाल आबादी के संदर्भ में ऊर्जा का दक्षता से प्रयोग करना, कई स्रोतों से ऊर्जा का उत्पादन करने के साथ-साथ महत्वपूर्ण है। ऊर्जा की मांग अर्थव्यवस्था की प्रकृति के अनुसार निर्धारित होती है। विभिन्न देशों, विभिन्न सेक्टरों के लिए मांग और खपत के जटिल और अलग पैटर्न भी होते हैं। फिर भी मुख्य रूप से देखें तो, देशों की प्राथमिक ऊर्जा आवश्यकता का लगभग 40 प्रतिशत (यूरोपीय संघ के अध्ययन के अनुसार) इमारतों के क्षेत्र में रख-रखाव में खपत होता है। इस ऊर्जा में से लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक ऊर्जा, प्रौद्योगिकियों, उपकरणों और प्रक्रियाओं के संचालन में चली जाती है, जो इमारतों के अंदर परिवेशी जीवन को अनुकूल बनाते हैं, जैसे कि हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग सिस्टम। ऊर्जा के बिना विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। ऊर्जा के कारण ही कई देशों को अर्थव्यवस्था की अस्थिरता का सामना करना पड़ा। जीवाश्म ईंधन पर भारत की ऊर्जा निर्भरता के परिणामस्वरूप 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार का और हाल में वेनेजुएला में नुकसान होना इसी के उदाहरण हैं। 2024-25 तक भारत को पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की प्रधानमंत्री की दृष्टि, आठ प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी विकास दर की आवश्यकता की ओर इशारा करती है। 

भारत में आर्थिक विकास, शहरीकरण और नागरिकों की जीवनशैली के अलग-अलग पैटर्न के कारण ऊर्जा की मांग बढ़ रही है। औद्योगिक विकास के लिए ऊर्जा के व्यापक उपयोग की आवश्यकता होती है। इसी के साथ साथ देश के पास ऊर्जा संसाधनों का जो सीमित विकल्प है, उसको भी, जलवायु परिवर्तन की पहल और पेरिस समझौते की बाध्यताओं के तहत पर्यावरण के अनुकूल तरीकों से उपयोग में लाना होगा। ऊर्जा संरक्षण का एक प्रसिद्ध नियम है कि ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है; बल्कि इसे केवल रूपांतरित किया जा सकता है। इसलिए स्मार्ट शहरों में ऊर्जा का कुशलतापूर्वक उपयोग करना आवश्यक और महत्वपूर्ण है और इसकी शुरुआत इमारतों और शहरों को स्मार्ट इमारतों और स्मार्ट शहरों मे बदलने से होगी, क्योंकि इमारतें ही ऊर्जा खपत में प्रमुख योगदानकर्ता हैं। - लेखक दिल्ली विवि के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में सहायक प्राध्यापक हैं।



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Editorial : खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है पशुधन, पवित्रता का प्रतीक है गाय ( अमर उजाला)

वीर सिंह  

गाय, निस्संदेह, वैदिक युग से भारतीय सभ्यता के केंद्रीय प्रतीकों में से एक रही है। 'पवित्र गाय' एक कहावत है, जो दुनिया भर में प्रचलित है, और जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि दुनिया भर में गाय को पवित्र और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक गाय कामधेनु की महिमा उसके अत्यधिक मात्रा में अमृत जैसा दूध देने के लिए गाई जाती है। लगभग दस हजार वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई कृषि ने गाय की महत्ता को और अधिक बढ़ा दिया, न केवल उसके पौष्टिक दूध के कारण, बल्कि उसके बैलों से मिलने वाली शक्ति और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को बनाए रखने के कारण भी। दूसरे शब्दों में, हजारों वर्षों से हमारी खाद्य सुरक्षा बैलों के कंधों पर टिकी रही है। गाय का यह ऐसा उपादान है, जिसका शायद ही कोई सानी हो। परंतु विडंबना यह है कि हमारे आज के राजनीतिक वातावरण में गाय दोराहे पर खड़ी है, जहां कुछ लोग उसे संरक्षण के योग्य मानते हैं, और कुछ भक्षण की वस्तु।


गौ पशुओं की 20 करोड़ से भी अधिक संख्या के साथ भारत दुनिया में प्रथम स्थान पर है और विश्व की गौ पशुओं की कुल आबादी का 33.39 प्रतिशत उसके पास है। 22.64 प्रतिशत के साथ ब्राजील और 10.03 प्रतिशत के साथ चीन दुनिया के गौ पशुओं की आबादी की दृष्टि से क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। यह जानकर, कि हम दुनिया में दूध के सबसे बड़े उत्पादक हैं, हर भारतीय को गर्व की अनुभूति होती है। वर्ष 2016-17 में कुल दूध उत्पादन लगभग 1,550 लाख टन था, जो 2021-22 में बढ़कर 2,100 लाख टन होने की संभावना है। यह भारत की गायों की आबादी के कारण ही है कि हम पिछले 10 वर्षों से दुग्ध उत्पादन में चार फीसदी की वार्षिक वृद्धि कर रहे हैं। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष को अगले कुछ वर्षों के दौरान 7.8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि की उम्मीद है। इस प्रकार, श्वेत क्रांति, हरित क्रांति से अधिक टिकाऊ रही है। भारत में प्रति व्यक्ति दूध उत्पादन भी 1991-92 में मात्र 178 ग्राम से बढ़कर 2015-16 में 337 ग्राम हो गया था और कुछ वर्षों में यह बढ़कर 500 ग्राम प्रतिदिन हो जाएगा। इस प्रकार, भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए पशुधन का, विशेष रूप से गौवंश का, बहुत बड़ा योगदान है, जो हमें गर्व से भर देता है।

गौवंश का योगदान केवल उनके दूध उत्पादन के संदर्भ में गिना जाता है। लेकिन ऊर्जा पशुओं के रूप में वे और भी अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हल खींचने, पाटा लगाने, बुआई करने, गन्ना पेरने, धान के लिए कीचड़-भरा खेत तैयार करने, अनाज की गहाई करने, खेत से घर तक उत्पाद ढोने, बाजार तक उत्पाद ढोने, मिल तक गन्ना ले जाने आदि खेती-किसानी से जुड़े कामों में गौ-वत्सों-यानी बैलों- का कितना योगदान है! देश की खाद्य सुरक्षा में उनका कितना योगदान है!

न केवल गौपशुओं की आबादी और दूध उत्पादन में भारत सर्वोच्च है, बल्कि मवेशियों की नस्लों की विविधता में भी है। भारत में गाय की कोई 30 नस्लें अच्छी तरह से वर्णित हैं। गैर-वर्णित नस्लों की संख्या अब भी कहीं  अधिक है। प्रत्येक नस्ल में विशिष्ट गुण होते हैं, जैसे कि दूध देने की क्षमता, खेती कार्यों की क्षमता, चारे की उत्पाद में रूपांतरण दक्षता, भौगोलिक क्षेत्र के अनुरूप कृषि क्रियाओं की नैसर्गिक दक्षता आदि। कुछ भारतीय नस्लें, जैसे साहीवाल, गिर, लाल सिंधी, थारपारकर और राठी दुधारू नस्लों में से हैं। हरियाणा, अमृतमहल, कंकरेज, ओंगोल, लाल कंधारी, मालवी, निमाड़ी, नगोरी, कंगयम, हल्लीकर, डांगी, खलारी, बारगुरु, केनकाठा, सिरि, बाचौर, पोंवार, खेरीगढ़, मेवाती, आदि बैलों की जानी-मानी नस्लें हैं।


भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता और खाद्य सुरक्षा बड़े पैमाने पर छोटे और सीमांत किसानों (जो कुल भूमि जोत के 83 प्रतिशत हिस्से पर खेती करते हैं) के कंधों पर टिकी है। लघु और सीमांत किसान अधिकांशतः पशुधन के सहारे खेती करते हैं, जब कि बड़ी जोत वाले किसान ही प्रायः कृषि मशीनरी पर निर्भर हैं। आंकड़े बोलते हैं कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करने में कृषि का योगदान 32 प्रतिशत है, यानी लगभग एक-तिहाई।


अब कुछ गोमांस के बारे में। मांस उद्योग सबसे क्रूर जलवायु खलनायकों में से एक है, जो वायुमंडल में बहुत बड़े कार्बन पदचिह्न छोड़ रहा है। औद्योगिक युग की शुरुआत के बाद से जब दुनिया ने जीवाश्म ईंधन जलाना शुरू किया, हमने दुनिया को 0.8 डिग्री सेल्सियस तक गर्म कर दिया है। सीएनएन की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों के कारण सबसे बड़ा कार्बन पदचिह्न गोमांस के कारण होता है, जो बीन्स, मटर और सोयाबीन (शाकाहारी आहार) से बने आहार की तुलना में लगभग 60 गुना ज्यादा है। कहने की जरूरत नहीं कि  गाय को भारत के सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक विकास का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाना चाहिए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Editorial : शहरों से महंगे हो रहे गांव, महंगाई के आंकड़े कर रहे इसे साबित ( अमर उजाला)

उमेश चतुर्वेदी  

गांव-देहात की संस्कृति वाले अपने देश में माना यह जाता है कि गांव की तुलना में शहर महंगे होते हैं। लेकिन अब यह सोच उलट जाए, तो हैरत नहीं होनी चाहिए। उपभोक्ता सूचकांक आधारित ताजा आंकड़े इसी ओर इशारा कर रहे हैं। अक्तूबर, 2019 के मुकाबले अक्तूबर, 2020 में महंगाई बढ़ने के जो आंकड़े आए हैं, वे उनके मुताबिक, जिन गांवों पर आज भी अनाज और सब्जियों के पैदावार की जिम्मेदारी है, उन्हीं गांवों में शहर की तुलना में महंगाई दस फीसदी अधिक बढ़ी है। यह महंगाई भी खाने-पीने की चीजों में दिखी है। 


कोरोना के चलते जब महाबंदी (लॉकडाउन) लागू की गई थी, तब जैसे पूरा देश ठप पड़ गया था। इस वजह से सब्जियों और फलों की आपूर्ति एक तरह से रुक ही गई थी। इससे तब सब्जियों और फलों की कीमत सामान्य स्तर से भी नीचे आ गई थी। लेकिन महाबंदी में धीरे-धीरे बढ़ती छूट और परिवहन व्यवस्था के पटरी पर आने के बाद जैसे महंगाई दर ने उछाल भरनी शुरू कर दी। सब्जियों और फलों की कीमत में यह तेजी ज्यादा दिखी, और हैरानी की बात यह कि यह महंगाई गांव में ज्यादा दिख रही है। उपभोक्ता सूचकांक के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल की तुलना में इस साल अक्तूबर में महंगाई दर 7.61 फीसदी ज्यादा रही। शहरों में जहां यह 7.4 फीसदी रही, वहीं ग्रामीण इलाकों में यह 7.69 प्रतिशत पर पहुंच गई। अक्तूबर में ग्रामीण क्षेत्रों में सब्जियों के दाम में 24.05 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई, जबकि शहरों में यह वृद्धि 19.84 प्रतिशत रही। सितंबर में भी गांवों में सब्जियों की महंगाई दर 22.71 प्रतिशत थी, जबकि शहरों में 17.41 प्रतिशत थी।

शहरों की तुलना में गांवों में बाजारू तेल-घी की खपत कम होती है, क्योंकि ग्रामीण समाज का बड़ा हिस्सा अपने उपभोग लायक घी-तेल का इंतजाम खुद करता है। इस कारण शहरों की तुलना में गांवों में घी-तेल सस्ते मिलते रहे हैं। पर विगत अक्तूबर में ग्रामीण इलाकों में तेल-घी की महंगाई दर शहरों से अधिक रही। उपभोक्ता सूचकांक के आंकड़े पर गौर करें, तो अपेक्षाकृत धीमे शहरीकरण वाले राज्य-जैसे, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा और तेलंगाना के साथ ही कारोबारी संस्कृति वाले गुजरात के गांवों में शहरों की तुलना में महंगाई ज्यादा है। जबकि शहरीकरण की ओर बढ़ रहे हरियाणा, शहरीकृत हो चुकी दिल्ली के साथ ही ग्राम केंद्रित बिहार और झारखंड में शहरों की तुलना में गांवों में महंगाई कम है। 

आधुनिक व्यवस्था में शहरीकरण को विकास का पर्याय मान लिया गया है। हालांकि शहरीकृत हो चुके देशों में प्रकृति की गोद में लौटने के लिए गांवों की ओर लौटने की भी प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे में उनके यहां तो शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में महंगाई बढ़ने को जायज ठहराया जा सकता है, क्योंकि वहां शहरी इलाकों में आपूर्ति का स्थापित ढांचा है। लेकिन भारत जैसे देश में, जहां अब भी करीब 67 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, ग्रामीण महंगाई बढ़ने की वजह चौंकाती है। अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि खपत और आपूर्ति में अंतर होने से महंगाई बढ़ती है। तो क्या यह मान लिया जाए कि गांवों में सब्जियों और घी-तेल की खपत जितनी  बढ़ी है, उसकी तुलना में इन चीजों की आपूर्ति कम है? ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि यह खपत बढ़ी क्यों। अगर सरकार के इस दावे पर यकीन कर लिया जाए कि कोरोना काल में मुफ्त अनाज, तीन महीने तक उज्ज्वला कनेक्शन पर मुफ्त गैस, जन-धन खाते में तीन महीने तक पांच-पांच सौ रुपये के साथ ही किसान सम्मान निधि देने और मनरेगा के जरिये काम बढ़ाने की वजह से गांवों में नगदी बढ़ी है, जिसके चलते खपत बढ़ी है। 


लेकिन इस विश्लेषण को स्वीकार करें, तब भी भारतीय ग्रामीण जीवन के लिए चिंता की बात है। बेशक बाढ़ और रबी की बुआई से ठीक पहले कुछ इलाकों में बारिश के चलते सब्जियों की फसल खराब हुई है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि देश के गांवों में पैदावार घटी है। तो ऐसे में शक बढ़ना स्वाभाविक है कि गांवों में बढ़ती महंगाई की वजह वे बिचौलिये तो नहीं हैं, जिनके फोकस में अब ग्रामीण उपभोक्ता हैं? महंगाई से गांव कराहने लगे, इससे पहले इसका जवाब ढूंढा जाना जरूरी है।


सौजन्य - अमर उजाला।

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Editorial : एटक के सौ साल: 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में मजदूर आंदोलन पनपने लगा था ( अमर उजाला)

सत्यम पांडेय 

पिछले ही महीने देश के पहले केंद्रीय मजदूर संगठन ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस यानी एटक के सौ साल पूरे हुए हैं। एटक की स्थापना 31 अक्तूबर, 1920 को मुंबई में हुई थी। यह वह समय था, जब देश में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो रहा था। जालियांवाला बाग कांड की स्मृति अभी ताजा थी। वह घटना जिस रॉलेट एक्ट के खिलाफ हुई थी, एटक के गठन से जुड़े तमाम श्रमिक संगठन भी उस एक्ट के खिलाफ लड़ रहे थे।


मुंबई के अधिवेशन में लाला लाजपत राय एटक अध्यक्ष चुने गए थे। वह रॉलेट ऐक्ट के खिलाफ थे और बाद में साइमन कमीशन के खिलाफ आंदोलन करते शहीद हुए थे। उसका बदला लेने के लिए ही भगत सिंह एवं उनके साथियों ने सैंडर्स पर गोलियां चलाई थीं। मजदूर आंदोलन से भगत सिंह का रिश्ता इतना ही नहीं था, बल्कि जिन दो विधेयकों को केंद्रीय असेंबली में पेश किए जाने को रोकने के लए उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ असेंबली में बम फेंका था, उनमें एक ट्रेड सेफ्टी बिल भी था। भगत सिंह ने अपने लेखों में लगातार श्रमिक-किसान आंदोलन की अनिवार्यता के बारे में लिखा था।

19 वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में मजदूर आंदोलन पनपने लगा था। तब काम के घंटे आठ करने की मांग को लेकर दुनिया भर में जो आंदोलन चल रहा था, भारत उससे अछूता नहीं था। वर्ष 1862 में कोलकाता में पालकी उठाने वालों की एक महीने लंबी हड़ताल इतिहास में दर्ज है। उस वर्ष हावड़ा रेलवे के 1,200 मजदूर भी आठ घंटे ड्यूटी की मांग के साथ हड़ताल पर गए थे। उसी साल जून में ईस्टर्न इंडियन रेलवे के क्लर्कों ने हड़ताल की थी। वर्ष 1862 से 1873 के बीच कोलकाता के बैलगाड़ी वालों, घोड़ागाड़ी वालों, मुंबई के धोबियों, चेन्नई के दूध वालों और मुंबई के छापाखाना वालों ने अपनी मांग के लिए हड़ताल की थी।


वर्ष 1914 से मजदूर वर्ग संगठित होने लगा था और 1917 की रूसी क्रांति के बाद, जिसमें मजदूर वर्ग ने किसानों के साथ राजसत्ता हासिल की थी, भारत के मजदूर आंदोलन को जबर्दस्त ऊर्जा मिली। वर्ष 1917 में ही अहमदाबाद के बुनकरों ने यूनियन बनाई, 1918 में जहाज के मजदूरों ने यूनियन बनाई, और अप्रैल, 1918 में मास लेबर यूनियन का गठन हुआ।

 

वर्ष 1918 में मुंबई के कपड़ा मिलों में महंगाई भत्ते के लिए हड़ताल शुरू हुई, जो जनवरी 1919 तक दूसरे क्षेत्रों में भी फैल गई। उस हड़ताल में 1,25,000 मजदूर शामिल हुए।

ट्रेड यूनियनों को ध्वस्त करने के लिए 1913 में इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) में संशोधन किया गया, पर मजदूर और अधिक जुझारू बन गए। इसी पृष्ठभूमि में 31 अक्तूबर, 1920 को मुंबई के एंपायर थियेटर में एटक की स्थापना हुई। देश भर के 64 यूनियनों के 1,40,854 सदस्यों के 101 प्रतिनिधियों ने उसमें हिस्सा लिया। मोतीलाल नेहरू, एनी

बेसेंट, जोसेफ बाप्तिस्ता, कर्नल जेसी वेजवुड (ब्रिटिश ट्रेड यूनियन काउंसिल के प्रतिनिधि) आदि सम्मेलन में शरीक हुए थे।


एटक ने देश के मजदूर आंदोलन के साथ स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन पर भी अमिट छाप छोड़ी। जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, देशबंधु चित्तरंजन दास, दीनबंधु एंड्र्यूज, वीवी गिरी और श्रीपाद अमृत डांगे जैसे नेता एटक के अध्यक्ष बने। वर्ष 1927 में पहली बार एटक ने मई दिवस मनाने का आवाहन किया। आजाद भारत में मजदूरों के योगदान की पहचान करते हुए उनकी मांगों एवं प्रस्तावों को संविधान में सम्मिलित कर उन्हें पहचान दी गई। यूनियन एवं संगठन बनाने का लोकतांत्रिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जीवन जीने योग्य मजदूरी, समानता का अधिकार, समान काम का समान वेतन, मातृत्व लाभ आदि अधिकार संविधान का हिस्सा बने। एटक के नेतृत्व में खासकर वामपंथी ट्रेड यूनियन ने मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र की बुनियाद रखने में बड़ी भूमिका निभाई।


इस सार्वजनिक क्षेत्र ने ही इस देश की संप्रभुता और अर्थव्यवस्था को बार-बार बचाया है। इसलिए आज अगर हमारे देश में लोकतंत्र, संप्रभुता और अर्थव्यवस्था खतरे में है, तो इसका एक बड़ा कारण एटक जैसे श्रमिक संगठन का कमजोर होना भी है। ऐसे में, देश को बचाने की कोशिश में हमारी चिंता एक मजबूत मजदूर आंदोलन को तैयार करने की भी होनी चाहिए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Thursday, November 19, 2020

छठ पर्व और लोक आस्था का सोपान, जानें इसका महत्व (अमर उजाला)

पंकज चतुर्वेदी 

दीपावली के ठीक बाद बिहार व पूर्वी राज्यों में मनाया जाने वाला छठ पर्व अब प्रवासी बिहारियों के साथ-साथ सारे देश में फैल गया है। गोवा से लेकर मुंबई और भोपाल से लेकर बंगलूरू तक, जहां भी पूर्वांचल के लोग बसे हैं, वे कठिन तप के पर्व छठ को हरसंभव उपलब्ध जल-निधि के तट पर मनाना नहीं भूलते हैं। हालांकि इस बार छठ कोविड-19 से उपजी असाधारण परिस्थितियों में मनाया जा रहा है। अनेक राज्य सरकारों ने एहतियात बरतने के साथ ही सार्वजनिक स्थलों में छठ मनाने को लेकर कई तरह के निर्देश दिए हैं। वास्तविकता यह भी है कि छठ प्रकृति पूजा और पर्यावरण का पर्व है, लेकिन इसकी हकीकत से तब दो-चार होना पड़ता है, जब उगते सूर्य को अर्घ्य देकर पर्व का समापन होता है और श्रद्धालु घर लौट जाते हैं। पटना की गंगा हो या दिल्ली की यमुना या भोपाल का शाहपुरा तालाब या दूरस्थ अंचल की कोई भी जल-निधि, सभी जगह एक जैसा दृश्य होता है- पूरे तट पर गंदगी, पॉलीथीन आदि बिखरा रहता है। 


हमारे पुरखों ने जब छठ जैसे पर्व की कल्पना की थी, तब निश्चित ही उन्होंने हमारी जल निधियों को उपभोग की वस्तु के बनिस्बत साल भर श्रद्धा व आस्था से सहेजने के जतन के रूप में स्थापित किया होगा। देश के सबसे आधुनिक नगर का दावा करने वाले दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा की तरफ सरपट दौड़ती चौड़ी सड़क के किनारे बसे कुलेसरा व लखरावनी गांव पूरी तरह हिंडन नदी के तट पर हैं। हिंडन यमुना की सहायक नदी है, लेकिन अपने उद्गम के तत्काल बाद ही सहारनपुर जिले से इसका जल जो जहरीला होना शुरू होता है, तो अपने यमुना में मिलन स्थल, ग्रेटर नोएडा तक हर कदम पर दूषित होता जाता है।

ऐसी ही मटमैली हिंडन के किनारे बसे इन दो गांवों की आबादी दो लाख पहुंच गई है। अधिकांश बाशिंदे सुदूर इलाकों से आए मेहनत-मजदूरी करने वाले हैं। उनको हिंडन घाट की याद केवल दीपावली के बाद छठ पूजा के समय आती है। छठ के छत्तीस घंटे के दौरान बड़ी रौनक होती है यहां और उसके बाद शेष 361 दिन वही गंदगी, बीड़ी-शराब पीने वालों का जमावड़ा। छठ पर्व लोक आस्था का प्रमुख सोपान है- प्रकृति ने अन्न दिया, जल दिया, दिवाकर का ताप दिया, सभी को धन्यवाद और ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा’ का भाव। असल में यह दो ऋतुओं के संक्रमण-काल में शरीर को पित्त-कफ और वात की व्याधियों से निरापद रखने के लिए गढ़ा गया अवसर था। 

सनातन धर्म में छठ एक ऐसा पर्व है, जिसमें किसी मूर्ति-प्रतिमा या मंदिर की नहीं, बल्कि प्रकृति यानी सूर्य, धरती और जल की पूजा होती है। पृथ्वीवासियों के स्वास्थ्य की कामना और भास्कर के प्रताप से धरतीवासियों की समृद्धि के लिए भक्तगण सूर्य के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। बदलते मौसम में जल्दी सुबह उठना और सूर्य की पहली किरण को जलाशय से टकरा कर अपने शरीर पर लेना, वास्तव में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। व्रत करने वाली महिलाओं के भोजन में कैल्शियम की प्रचुर मात्रा होती है, जो कि महिलाओं की हड्डियों की सुदृढता के लिए अनिवार्य भी है। वहीं सूर्य की किरणों से महिलाओं को साल भर के लिए जरूरी विटामिन डी मिल जाता है।


वास्तव में यह बरसात के बाद नदी-तालाब व अन्य जल निधियों के तटों पर बहकर आए कूड़े को साफ करने, अपने प्रयोग में आने वाले पानी को इतना स्वच्छ करने कि घर की महिलाएं भी उसमें घंटों खड़ी हो सकें, और विटामिन के स्रोत सूर्य के समक्ष खड़े होने का वैज्ञानिक पर्व है। लेकिन इसकी जगह ले ली आधुनिक और कहीं-कहीं अपसंस्कृति वाले गीतों ने, आतिशबाजी, घाटों की दिखावटी सफाई, नेतागीरी, गंदगी, प्लास्टिक-पॉलीथीन जैसी प्रकृति-हंता वस्तुओं और बाजारवाद ने। अस्थायी जल-कुंड या सोसायटी के स्विमिंग पूल में छठ पूजा की औपचारिकता पूरा करना असल में इस पर्व का मर्म नहीं है। हर साल छठ पर यदि देश भर की जल निधियों को हर महीने मिल-जुलकर स्वच्छ बनाने का, देश भर में हजार तालाब खोदने और उन्हें संरक्षित करने का संकल्प हो, दस हजार पुराने तालाबों में गंदगी जाने से रोकने का उपक्रम हो, नदियों के घाट पर साबुन, प्लास्टिक और अन्य गंदगी न ले जाने की शपथ हो, तो छठ के असली प्रताप और प्रभाव को देखा जा सकेगा।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Wednesday, November 18, 2020

Editorial : कांग्रेस में नेतृत्व के सवाल पर फिर मंथन शुरू, राहुल के अलावा और क्या विकल्प? (अमर उजाला)

रशीद किदवई 

बिहार विधानसभा और मध्य प्रदेश के उपचुनाव में कांग्रेस की पराजय के बाद पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की मदद के लिए गठित विशेष समिति की मंगलवार शाम को एक बैठक हुई, जिसमें राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने पर विचार विमर्श हुआ। लेकिन इस बैठक से सोनिया गांधी ने खुद को अलग कर लिया। इसकी दो वजहें बताई जाती हैं- एक तो यह कि वह स्वयं पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं और दूसरा इस बैठक में राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने के मुद्दे पर चर्चा होनी थी। चूंकि वह राहुल गांधी की मां भी हैं, इसलिए पैनल की बैठक पर इसका कोई प्रभाव न पड़े और पैनल अपने विवेक से फैसले ले सके, इसलिए उन्होंने इस बैठक से खुद को अलग रखा। यानी कांग्रेस में एक बार फिर नेतृत्व के सवाल पर मंथन शुरू हो गया है।


अब पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए तात्कालिक रूप से यह जरूरी हो गया है कि या तो वह स्वयं पार्टी की बागडोर संभालें अथवा किसी और के हाथ में पार्टी की कमान सौंप दें। एक तीसरी संभावना भी है, जो कांग्रेस की संस्कृति के मद्देनजर सही जान पड़ती है कि कठपुतली की तरह किसी व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष बना दिया जाए, जो तीनों गांधी-सोनिया, राहुल और प्रियंका की इच्छानुसार पार्टी को चलाए। ये सभी तीनों संभावनाएं खतरों और अंतर्निहित कमजोरियों से भरी हुई हैं। यदि राहुल वास्तव में साहस करते हैं और कांग्रेस प्रमुख के रूप में कार्यभार संभालने को तैयार होते हैं, तो उन्हें सर्वसम्मति से चुने जाने के लिए संगठनात्मक चुनावों से होकर गुजरना होगा। कांग्रेस के भीतर राहुल के नामांकन को चुनौती देने की दूर-दूर तक संभावना नहीं है, क्योंकि मध्यम श्रेणी के पार्टी नेता को भी राज्य कांग्रेस इकाई के प्रतिनिधियों से बने इलेक्ट्रल कॉलेज में गांधी परिवार की पकड़ के बारे में अच्छी तरह से पता है। चूंकि सभी राज्य इकाई प्रमुखों को राहुल और सोनिया द्वारा चुना गया है, इसलिए इस बात की बहुत कम संभावना है कि कोई भी पदाधिकारी या प्रदेश कांग्रेस कमेटी का प्रतिनिधि उनके प्रति निष्ठावान न हो, खासकर यह जानते हुए कि कांग्रेस का राजनीतिक नेतृत्व गांधी परिवार के साथ मजबूती से जुड़ा है।

दूसरी संभावना है कि राहुल और गांधी परिवार के अन्य सदस्य खुद को इस प्रतिस्पर्धा से बाहर रखें और कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तरीके से होने दें, जो आदर्श है। वर्षों से राहुल और कांग्रेस एक दूसरे पर निर्भर हो गए हैं। ध्यान देने वाली बात है कि 2014 के बाद गांधी परिवार कमजोर हुआ है। उनकी एसपीजी सुरक्षा वापस ले ली गई है और नेशनल हेराल्ड से लेकर राजीव गांधी फाउंडेशन तक के मामले आयकर, ईडी और अन्य एजेंसियों की नजर में हैं। 2019 में जब राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था, तो पार्टी ने गंभीरता पूर्वक एक गैर-गांधी को पार्टी प्रमुख बनाने के बारे में विचार किया था।  

कमजोर तबके से ताल्लुक रखने वाले पार्टी के वरिष्ठ नेता मुकुल वासनिक का नाम लगभग तय हो गया था, लेकिन अंतिम क्षण में उनका चुनाव स्थगित हो गया, तब पी चिदंबरम एवं अन्य लोगों ने अंतरिम अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी को आगे पद पर बने रहने के लिए कहा। तर्क यह दिया गया कि वासनिक हर चीज यानी मुद्दों से लेकर नियुक्ति तक के लिए सोनिया, राहुल एवं प्रियंका का मुंह देखेंगे। कांग्रेस के भीतर विद्रोही या असंतुष्ट खेमा वास्तविकता को समझने में असमर्थ है। उसका लक्ष्य वास्तव में वाजिब सुधार के बजाय राहुल को कमजोर करना है। इसलिए एक भी ऐसा नेता नहीं दिखाई देता है, जो खुद को पार्टी अध्यक्ष का उम्मीदवार घोषित करे। न ही हमें कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव सहित कांग्रेस के संगठनात्मक चुनावों की घोषणा के लिए कोई आह्वान दिखाई देता है, या कम से कम कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव करने वाले पीसीसी प्रतिनिधियों की सूची का प्रकाशन होता है। उनका एक सीमित एजेंडा है कि कांग्रेस सचिवालय में जगह बनाएं या कांग्रेस कार्य समिति में कोई पद मिल जाए।


कांग्रेस के असंतुष्ट गुट यह आरोप लगाते हैं कि कांग्रेस का संचालन ठीक ढंग से नहीं हो रहा है। ऐसे में कांग्रेस के संविधान के अनुसार बताई गई प्रक्रिया से इसका समाधान तलाशा जा सकता है। अगर राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनना चाहते हैं, तो चुनाव के जरिये दूसरे किसी व्यक्ति को कांग्रेस अध्यक्ष चुना जा सकता है। लेकिन इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि अगर गांधी परिवार से अलग कोई व्यक्ति पार्टी अध्यक्ष बनता है, तो क्या उससे कांग्रेस पार्टी की दशा-दिशा बदलेगी। क्या मुकुल वासनिक, शशि थरूर या कपिल सिब्बल अथवा कोई अन्य व्यक्ति कांग्रेस का अध्यक्ष बनता है, तो क्या कांग्रेस का मतदाता वापस लौटेगा? क्या वे नेहरू-गांधी परिवार से ज्यादा मतदाताओं को आकर्षित कर पाएंगे? 


दूसरी बात है मुद्दों की। कांग्रेस का इतिहास ऐसा रहा है कि एक ही मुद्दे पर अलग-अलग विचार रहे हैं, जबकि वामपंथी या दक्षिणपंथी दलों में एक ही विचार होता है और उसी का सभी राज्य या क्षेत्रीय इकाई अनुसरण करते हैं। अब कश्मीर में अनुच्छेद 370 की बात ले लीजिए। वहां नेशनल कांफ्रेस, पीडीपी एवं अन्य दलों ने अनुच्छेद 370 को फिर से लागू करने के लिए गुपकार एलायंस बनाया है, जिसे भाजपा देश विरोधी कदम बता रही है। कांग्रेस की कश्मीर घाटी की इकाई (यहां जम्मू की बात नहीं हो रही) भी चाहती है कि अनुच्छेद 370 लागू हो और जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा मिले। विचारधारा की अनुपस्थिति कांग्रेस की आज सबसे बड़ी कमजोरी हो गई है। बिहार में ओवैसी की पार्टी की जीत से यही साबित हुआ। मुस्लिम मतदाता भी अब कांग्रेस को विकल्प के रूप में नहीं देखते हैं। तो अगर दक्षिणपंथी सोच हिंदू और मुस्लिम, दोनों में हावी हो रहा है, तो कांग्रेस के लिए कोई जगह नहीं दिखती है। ऐसे बहुत से प्रश्न हैं, जिनका कांग्रेस के पास कोई उत्तर नहीं है। इसलिए सिर्फ नेतृत्व का सवाल हल होने से काम नहीं चलने वाला है। समस्या यह है कि वह जब जनता के पास जाएगी, तो उसके मुद्दे क्या होंगे। कांग्रेस से जुड़े रहे दिवंगत कवि श्रीकांत वर्मा  ने लिखा था, कोसल अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता/ कोसल में विचारों की कमी है!


सौजन्य - अमर उजाला।

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Editorial : आर्मेनिया में रूस और तुर्की की मनमानी, झुकने पर किया मजबूर ( अमर उजाला)

राम यादव  

नवंबर के पहले सप्ताह से पश्चिमी जगत के अमेरिका का सारा ध्यान राष्ट्रपति-पद के चुनाव परिणाम पर केंद्रित था और यूरोप का कोरोना वायरस की दूसरी प्रचंड लहर पर। रूस और तुर्की के लिए यही मौका था, दिखाने का कि पूरब में अब हमारी चलेगी। जैसे ही स्पष्ट हो गया कि ट्रंप चुनाव नहीं जीत सकते, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन ने मिलकर आर्मेनिया पर उसके नगोर्नो काराबाख इलाके की सीमाएं बदलने और युद्धविराम लागू करने का समझौता थोप दिया।


दोनों ने तय किया कि लड़ाई में नगोर्नो काराबाख के जिन भू-भागों पर अजरबैजान ने कब्जा कर लिया है, वे उसी के पास बने रहेंगे। आर्मेनिया को कुछ और जगहें भी खाली करनी पड़ेंगी। उसे अजरबैजान को, उससे पूर्णतः अलग-थलग, उसके पश्चिमी प्रांत नखचेवान तक आने-जाने के लिए एक गलियारा भी देना पड़ सकता है। बदले में बचे-खुचे नगोर्नो काराबाख में जो आर्मेनियाई रह जाएंगे, उनकी सुरक्षा के लिए रूस वहां अपने दो हजार सैनिक तैनात करने के बहाने से अपनी लंबी सैनिक उपस्थिति सुनिश्चित करेगा। 

अपनी सीमाओं के विस्तार के वादे से प्रफुल्लित अजरबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीयेव ने दस नवंबर को चहकते हुए कहा, 'हमने दिखा दिया कि समस्या का एक सैन्य-समाधान भी है।' किंतु इस 'सैन्य-समाधान' से आर्मेनिया में मातम छा गया है। जनता अपने प्रधानमंत्री नीकोल पाशिन्यान को कोसते-धिक्कारते हुए उग्र प्रदर्शन कर रही है। नगोर्नों काराबाख के जिन लोगों का निवास क्षेत्र अब अजरबैजान को मिल जाएगा, वहां के लोग अपने घर-बार फूंक-ताप कर पलायन कर रहे हैं। आर्मेनिया की सरकार को कोरोना वायरस की भारी मार के बीच अब एक लाख से अधिक इन शरणार्थियों का बोझ भी उठाना पड़ रहा है।

मात्र 30 लाख की जनसंख्या वाला ईसाई देश आर्मेनिया और एक करोड़ की आबादी वाला इस्लामी देश अजरबैजान, 1991 में पूर्व सोवियत संघ के बिखरने तक, उसके दो 'संघटक गणराज्य' हुआ करते थे। ईसाई बहुमत वाला नगोर्नो काराबाख तब अजरबैजान का एक 'स्वात्तशासी गणतंत्र' हुआ करता था। किंतु सोवियत संघ के बिखरते ही वहां आर्मेनिया से जुड़ने का एक रक्तरंजित आंदोलन छिड़ गया। 1994 में आर्मेनिया का अंग बनने के साथ इस संघर्ष का अंत होने तक करीब 30 हजार लोग मारे गए और लाखों शरणार्थी बन गए। गत 27 सितंबर को दोनों देशों के बीच एक नया युद्ध छिड़ गया। आर्मेनिया के साथ रूस की एक सहायता-संधि है, तब भी रूस दोनों शत्रु देशों को हथियार बेचता रहा है। अजरबैजान को रूस के अलावा तुर्की और इस्राइल से भी आधुनिक हथियार मिलते रहे हैं। प्रेक्षकों का कहना है कि अजरबैजान की जीत में उसे तुर्की और इस्राइल से मिले ड्रोनों की निर्णायक भूमिका रही है। नाटो के सदस्य तुर्की ने ये ड्रोन नाटो के ही एक दूसरे सदस्य कनाडा से खरीदे थे।


आर्मेनिया के पास कोई ड्रोन नहीं थे। उसके सैनिक बुरी तरह पिट गए। अजरबैजान, तुर्की के लिए तुर्कवंशियों का ही एक स्वजातीय इस्लामी देश है। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन कॉकेशस में भी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाएं रखते हैं। इसलिए उन्होंने अजरबैजान को उकसाने और उसके हाथ मजबूत करने के लिए वहां अपने सैनिक और अल बगदादी वाले 'इस्लामी स्टेट' के ऐसे खूंखार लड़ाके भी भेजे हैं, जिन्हें उन्होंने उत्तरी सीरिया में इदलिब जैसे शहरों के आतंकवादियों वाले शिविरों में पाल रखा है।


वास्तव में रूस और तुर्की दक्षिणी कॉकेशस में उतनी ही दूर तक एक-दूसरे के यार हैं, जितनी दूर तक उनकी स्वार्थपूर्ति होती दिखती है। दोनों को भली-भांति जानने वाले जर्मन प्रेक्षकों का कहना है कि इस कॉकेशियाई लड़ाई में सबसे बड़ी भू-राजनीतिक मिठाई रूस के हाथ लगी है। उसकी सेना अब न केवल आर्मेनिया में होगी, नगोर्नो काराबाख के उस हिस्से में भी होगी, जो अब अजरबैजान को मिल गया है। तुर्की अपनी पीठ थपथपा सकता है कि उसके लिए अब अपने स्वजातीय अजरबैजान तक आने-जाने का एक सीधा रास्ता खुल जाएगा। ठगा गया बेचार आर्मेनिया! 'आत्मसमर्पण' का आरोप झेल रही वहां की सरकार के प्रति जनता का आक्रोश यदि शांत नहीं हुआ, तो वहां भारी उथल-पुथल मच सकती है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Tuesday, November 17, 2020

Editorial : कुपोषण से लड़ाई का तरीका बदले, भारत की स्थिति है बेहद खराब

प्रदीप श्रीवास्तव  

बढ़ती जनसंख्या के कारण, सतत विकास लक्ष्य 2030 को पाने में हमारे सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। इसमें सबसे बड़ी चुनौती है कुपोषण से मुक्ति। मिड-डे मील, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और पुष्टाहार वितरण योजनाओं में जमीनी स्तर पर कमियां और भ्रष्टाचार, इन योजनाओं के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा हैं। विगत वर्षों में दलहन के उत्पादन में कमी और लोगों में खानपान के प्रति कम जागरूकता के कारण भी देश में कुपोषण की समस्या बढ़ी है। हाल ही में आई ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020’ की रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश में स्वास्थ सेवाओं की प्रगति काफी धीमी है। शिशु मृत्यु दर और कुपोषण पर केंद्रित यह रिपोर्ट खानपान और कुपोषण के आपसी रिश्ते की भूमिका बताती है। 


इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई), जर्मनी के गैर सरकारी संगठन 'वेल्थहुंगरहिल्फे' और 'कंसर्न' संस्था ने 2006 में पहली ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ जारी की थी। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 में 107 देशों को शामिल किया गया है। इस इंडेक्स के मुताबिक, भारत 94वें, बांग्लादेश 75वें, म्यांमार 78वें, पाकिस्तान 88वें, नेपाल 73वें और श्रीलंका 64वें स्थान पर हैं। नेपाल और श्रीलंका 'मध्यम' श्रेणी में आते हैं, जबकि भारत, बांग्लादेश जैसे अन्य देश गंभीर श्रेणी में आते हैं। चीन, बेलारूस, यूक्रेन, तुर्की, क्यूबा और कुवैत सहित 17 देश शीर्ष रैंक पर हैं। असल में, ग्लोबल हंगर इंडेक्स चार पैमानों पर देशों को परखता है। ये चार पैमाने हैं - कुपोषण, शिशु मृत्यु दर, चाइल्ड वेस्टिंग (नाटापन) और बच्चों की वृद्धि में रोक। एक नजर में तो लगता है कि भारत दूसरे देशों से काफी पीछे है, जबकि हकीकत यह है कि भौगोलिक स्थिति, आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से भारत दूसरों विकासशील देशों की तरह ही है। रिपोर्ट के मुताबिक, 27.2 के स्कोर के साथ भारत भूख के मामले में 'गंभीर' स्थिति में है। भारत की रैंकिंग में सुधार हुआ है, पर कुल देशों की संख्या भी घटी है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की करीब 14 फीसदी जनसंख्या कुपोषण का शिकार है। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 3.7 प्रतिशत है। इसके अलावा ऐसे बच्चों की दर 37.4 थी, जो कुपोषण के कारण नहीं बढ़ पाते हैं। दरअसल, ये ऐसे बच्चे हैं, जिनकी लंबाई उम्र की तुलना में कम है और कुपोषण के शिकार हैं। बांग्लादेश, भारत, नेपाल और पाकिस्तान के 1991 से 2020 तक के आंकड़ों से पता चलता है कि ऐसे परिवारों में बच्चों के कद नहीं बढ़ पाने के मामले ज्यादा हैं, जो विभिन्न कमियों से पीड़ित हैं। इन घरों में पौष्टिक भोजन की कमी, मातृ शिक्षा का निम्न स्तर और गरीबी आदि शामिल हैं। सकारात्मक संकेत यह है कि 1991 से 2020 की अवधि के दौरान भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर में कमी दर्ज की गई। समय से पहले जन्म और कम वजन के कारण बच्चों की मृत्यु दर गरीब राज्यों और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी है।

विशेषज्ञों की मानें, तो सामाजिक योजनाओं का खराब कार्यान्वयन, कार्यक्रमों में प्रभावी निगरानी की कमी, कुपोषण से निपटने में स्वास्थ्य संस्थाओं की उदासीनता और बड़े राज्यों की खराब स्थिति के कारण समस्या और बढ़ी है। भारत की रैंकिंग में समग्र परिवर्तन के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के प्रदर्शन में सुधार की आवश्यकता है। भारत में पैदा होने वाला हर पांचवां बच्चा उत्तर प्रदेश का है। यदि उच्च आबादी वाले राज्य में कुपोषण का स्तर अधिक है, तो यह देश के औसत में बहुत योगदान देगा, और यही हो रहा है। कुपोषण के मामले में देश का राष्ट्रीय औसत, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से अधिक प्रभावित होता है। देश में कोई भी बदलाव उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और बिहार के बिना संभव नहीं है। देश में पोषण कार्यक्रमों और नीतियों की जमीनी हकीकत अच्छी नहीं है। पौष्टिक और सस्ता आहार की आम लोगों तक पहुंच आसान बनाने के लिए संचालित कार्यक्रमों को तेज करने की जरूरत है। ऐसी व्यवस्था हो कि बच्चे का वजन कम हो, तो शुरुआती स्तर पर ही इसका पता लगा कर उपचार कर दिया जाए, तो समस्या का काफी हद तक समाधान किया जा सकता है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Editorial : आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर मोदी सरकार को मिली है बड़ी कामयाबी

वरुण गांधी 

एक हफ्ते पहले मोस्ट वांटेड आतंकवादियों में से एक हिज्बुल मुजाहिदीन के सरगना डॉ. सैफुल्लाह को श्रीनगर के पास मार गिराया गया। वर्ष 2014 से सक्रिय यह आतंकी बुरहान वानी का नजदीकी था। इस साल जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा निर्देशित और सेना की मदद से हुई मुठभेड़ स्थानीय पुलिस की कामयाबी को दर्शाती है, जिसमें 200 से अधिक आतंकवादियों का खात्मा किया जा चुका है। ऐसी खबरें अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद राज्य की नई हकीकत और मजबूत आंतरिक सुरक्षा को दर्शाती हैं।


वर्ष 2016 के बाद देश के नागरिक क्षेत्रों में (कश्मीर को छोड़कर) कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ है। पाकिस्तानी हैंडलर्स ने इसके बजाय सैन्य प्रतिष्ठानों (जैसे उरी और पठानकोट में हमले) पर ध्यान केंद्रित किया। इस बीच, एनआईए ने दिसंबर, 2019 में इस्लामिक स्टेट की भारतीय इकाई (अल-हिंद) के 17 से अधिक सदस्यों को गिरफ्तार किया-वे कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के जंगलों में एक प्रांत स्थापित करने की साजिश रच रहे थे; उन्होंने कर्नाटक के कोलार और कोडगु के साथ महाराष्ट्र के रत्नागिरी और पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में छिपने के ठिकाने बनाए थे। आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर ऐसी सफलताओं पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता, पर ये हमारे राष्ट्र निर्माण के कार्य में महत्वपूर्ण बनी रहती हैं।

पिछले एक दशक में नक्सली हमलों में भी लगातार गिरावट आई है। 1946 में तेलंगाना में शुरू हुए किसान आंदोलन को 1967 में तब गति मिली, जब पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में किसानों और भूमिहीन मजदूरों ने आदिवासियों के साथ मिलकर जमींदारों के अनाज के गोदामों पर छापे का आह्वान किया। 1980 के दशक में मध्य प्रदेश में तत्कालीन छत्तीसगढ़ क्षेत्र के करीब 18 जिलों में नक्सलियों की गतिविधियां चल रही थीं और बस्तर क्षेत्र (जिसमें अन्य जिलों के अलावा दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर, कांकेर शामिल हैं) आंदोलन का केंद्र बन गया था। वर्ष 2003 तक वे आंध्र प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू पर हमले के साथ ज्यादा दुस्साहसी भी हो रहे थे। वर्ष 2004 में तमाम अतिवादी वाम गुटों के विलय से बनी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के माध्यम से देश के 200 से अधिक जिलों में आंदोलन का विस्तार हुआ। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2011 में इसके पास अनुमानित 2,500 करोड़ रुपये का फंड था। जैसा कि 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि माओवादी आंदोलन 'सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती' है। हालांकि अब प्रमुख राज्यों में इसकी उपस्थिति तेजी से घटी है।

आंध्र प्रदेश में केंद्रीय गृह मंत्रालय की दृष्टि और अतिरिक्त संसाधनों के संयोजन के साथ स्थानीय पुलिस कार्रवाई और लक्षित सामाजिक-आर्थिक अभियानों ने आंदोलन का खात्मा करने में मदद की है। छत्तीसगढ़ में सड़क संपर्क के लिए खासतौर से सुकमा, बीजापुर और जगदलपुर जिलों में केंद्र की पुरजोर कोशिशों ने राज्य के दक्षिणी जिलों में नक्सली गतिविधियों को रोकने (हालांकि खासकर दंतेवाड़ा में हमले जारी हैं) में मदद की है। झारखंड ने 2005 और 2010 के बीच हिंसा का दौर देखा, जिसमें 20 से अधिक जिले प्रभावित हुए थे। राज्य सरकार ने शांति वार्ता शुरू करने की कोशिश की थी, जो अंततः विफल रही। वर्ष 2011 में सरकार द्वारा चलाया ऑपरेशन एनाकोंडा सारंडा में नक्सली मौजूदगी को खत्म करने में सफल रहा; फिर 2014 से विद्रोह-विरोधी अभियान की शृंखला की शुरुआत की गई, जिससे 2018 तक माओवादी हिंसा में भारी गिरावट आई। 


पश्चिम बंगाल सरकार ने भी केंद्र के मार्गदर्शन में विद्रोही नेताओं को निशाना बनाने के लिए एक विशिष्ट पुलिस दल पर ध्यान केंद्रित करने के अलावा आत्मसमर्पण और पुनर्वास पैकेज के साथ विद्रोह के खात्मे के लिए नई रणनीति बनाई है। जबकि पुरुलिया, पश्चिम मिदनापुर और बांकुड़ा जैसे जिलों में भरोसा कायम करने के उपाय किए गए। इस सबसे पिछले पांच साल में नक्सली घटनाओं में काफी कमी आई है और सिर्फ एक जिला झारग्राम ही प्रभावित है। ओडिशा और बिहार में भी नक्सली घटनाओं में कमी आई है। अब प्रभावित राज्यों के बीच एक त्रिकोणीय सीमावर्ती क्षेत्र में (पहले वर्गीकृत किए 106 जिलों में से) फैले केवल 30 जिलों तक हिंसा सीमित है और 44 जिलों में वामपंथी उग्रवादियों की मामूली मौजूदगी है या कोई मौजूदगी नहीं है।


देश भर में वामपंथी हिंसा में लगातार गिरावट आ रही है और केंद्र सरकार ऐसे क्षेत्रों में विकास योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ा रही है। इस बदलाव का श्रेय काफी हद तक केंद्र की संजीदगी को जाता है, जिसके तहत ज्यादा संसाधनों की ज्यादा उपलब्धता महत्वपूर्ण है। गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट, 2018 बताती है कि सुरक्षा और वित्तीय सहायता के लिए अर्धसैनिक बलों की करीब 532 कंपनियों को ऐसे राज्यों में तैनात किया गया है; गृह मंत्री की निगरानी में एक व्यापक सामरिक रणनीतिक दिशा के साथ, और विशेष विकास योजनाओं की शुरुआत (जैसे कि विशेष केंद्रीय सहायता करीब 35 जिलों को प्रदान की गई)। हमलों की आशंका हालांकि बनी हुई है, पर यह आंदोलन अब बड़ा खतरा नहीं है। पूर्वोत्तर में भी पिछले एक साल में उग्रवादी घटनाओं में 12 फीसदी की गिरावट आई है। 


असम, अरुणाचल प्रदेश व नगालैंड के बीच एक त्रिकोणीय क्षेत्र तक हिंसा सीमित रहने के साथ उग्रवाद घटा है। एनडीएफबी (नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड), एबीएसयू (ऑल बोडो स्टुडेंट्स यूनियन), असम की राज्य सरकार और केंद्र के बीच समझौता एक स्वागतयोग्य कदम है। एनएससीएन (आईएम) के साथ ही नगाओं के राजनीतिक गुटों से सरकार के निरंतर संपर्क से भी सकारात्मक नतीजे आने की उम्मीद है। अब पूर्वोत्तर में बड़ी संख्या में विकास परियोजनाएं चल रही हैं, जबकि सेना की टुकड़ियों को तेजी से बैरकों (जैसे, कार्बी आंगलोंग में) में वापस भेजा जा रहा है। ऐसी पहल से पूर्वोत्तर का शेष भारत के साथ एकीकरण बेहतर हुआ है। मोदी सरकार के नेतृत्व में पिछले कुछ साल देश की आंतरिक सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए बहुत अच्छे रहे हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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