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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Thursday, February 25, 2021

कार्बन उत्सर्जन से जुड़ा है कृषि संकट (अमर उजाला)

भारत डोगरा  

विश्व में पर्यावरण स्तर पर जलवायु बदलाव का संकट सबसे चर्चित है और आजीविका स्तर पर छोटे व मध्यम किसानों की आजीविका का संकट चुनौतीपूर्ण है। आज जरूरत ऐसी नीतियों की है, जो दोनों संकटों को एक साथ कम कर सकें। यदि मिट्टी के जैविक या आर्गेनिक हिस्से को बचाया जाए, तो इसमें कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने या समेटने की बहुत क्षमता होती है। दूसरा पक्ष यह है कि वृक्षों, वनों, घास, चरागाह के रूप में हरियाली को बचाया व बढ़ाया जाए, तो इसमें भी कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने की बहुत क्षमता है। ये दोनों उपाय किसानों व अन्य गांववासियों के सहयोग व भागीदारी से होने चाहिए। विश्व स्तर पर प्रस्तावित है कि जो भी समुदाय ग्रीन हाऊस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगे, उनके लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था होगी। भारत सरकार को चाहिए कि वह इस सहायता का एक बड़ा हिस्सा देश के उन ग्रामीण समुदायों, किसानों, भूमिहीनों व आदिवासियों के लिए प्राप्त करे, जो मिट्टी का जैविक हिस्सा व हरियाली बढ़ाकर अपना योगदान इसमें देते हैं। 

विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में बताया गया कि पिछली शताब्दी में कृषि भूमि की मिट्टी में 30 से 75 प्रतिशत जैविक तत्व का ह्रास हुआ है व चरागाह व घास मैदानों में 50 प्रतिशत हिस्से का ह्रास हुआ है। यह क्षति 150 से 200 अरब टन की हुई है, व इसके कारण 200 से 300 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन विश्व स्तर पर हुआ है। वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की अतिरिक्त मात्रा या अधिकता का 25 से 40 प्रतिशत भाग इस मिट्टी की क्षति से हुआ है। दूसरी ओर इसी मिट्टी की क्षति के कारण कृषि भूमि का प्राकृतिक उपजाऊपन कम हुआ है व न्यूनतम खर्च पर उचित उत्पादकता प्राप्त करने की किसानों की क्षमता कम हुई है। अतः मिट्टी का जैविक तत्व बढ़ेगा, तो किसानों का संकट भी कम होगा व जलवायु बदलाव का संकट भी कम होगा। मिट्टी का जैविक तत्व बढ़ाने में कृषि की परंपरागत तकनीक व उपाय बहुत उपयोगी हैं, जिनमें गोबर-पत्ती की खाद, हरी खाद, मिश्रित खेती, फसल-चक्र के चुनाव, मिट्टी व जल संरक्षण के विभिन्न उपायों का विशेष महत्व है, जो सस्ते व आत्मनिर्भरता बढ़ाने वाले उपाय हैं। जिस तरह पिछले कुछ दशकों में इन परंपरागत तौर-तरीके को छोड़ने से जैविक तत्वों का ह्रास हुआ, वैसे ही अगले कुछ वर्षों में इन उपायों से हम पुनः मिट्टी के जैविक तत्व की पहले जैसी मात्रा को प्राप्त कर सकते हैं, जिससे किसानों का लाभ होगा व जलवायु बदलाव का संकट भी कम होगा।



मृदा वैज्ञानिक चार्ली बोस्ट ने अनेक अध्ययनों के आधार पर निष्कर्ष दिया है कि रासायनिक खाद के उपयोग से मिट्टी के जैविक कार्बन तत्व में कमी होती है। इंटरनेशनल पैनल ऑफ क्लाइमेट चेंज के अनुसार, रासायनिक नाइट्रोजन खाद के उपयोग से वायुमंडल में नाइट्रस ऑक्साइड में वृद्धि होती है व ग्रीनहाउस गैस के रूप में इसे कार्बन डाइऑक्साइड से 300 गुना अधिक विध्वंसक पाया गया है। मिट्टी में जैविक तत्व वृद्धि के साथ प्राकृतिक वनों की रक्षा, स्थानीय प्रकृति व चौड़ी पत्ती के घने वृक्षों को पनपाना, वनों की आग को रोकने के असरदार उपाय करना, चरागाहों व घास के मैदानों की हरियाली बढ़ाना व इनकी रक्षा करना-यह सब ऐसे कार्य हैं, जिसमें किसानों व गांववासियों को भी लाभ मिलता है व जलवायु बदलाव के संकट को कम करने में भी सहायता मिलती है। 


विशेषकर आदिवासी व पर्वतीय गांवों के संदर्भ में इनका महत्व और भी अधिक है। जलवायु बदलाव के इस दौर में आज नहीं, तो कल इस बारे में जागरूकता बढ़नी ही है कि जलवायु बदलाव के संकट को कम करने वाली खेती को अपनाया जाए व यदि इसे अपनाने से खर्च कम होते हैं, आत्मनिर्भरता बढ़ती है, उत्पादन भी ठीक होता है, तो फिर किसान ऐसी खेती को अवश्य ही अपनाना चाहेंगे। जरूरत इस बात की है कि हम ऐसी स्थितियां उत्पन्न करें, जिससे यह सब व्यवहारिक स्तर पर संभव हो और इसका प्रसार हो सके।


सौजन्य - अमर उजाला।

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'बोडोलैंड' क्यों अहम है भाजपा के लिए, बता रहे हैं संजय हजारिका (अमर उजाला)

संजय हजारिका  

पश्चिम बंगाल को छोड़कर चुनावी बुखार ने उन राज्यों को अभी अपनी चपेट में नहीं लिया होगा, जहां अप्रैल-मई में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, लेकिन आने वाले दिनों में इसके चरम पर पहुंचने की संभावना है। असम में सत्तारूढ़ भाजपा अपने मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल और वित्त, स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री हेमंत विस्व शर्मा के नेतृत्व में सहज दिख रही है। कोई उन्हें राजनीतिक शक्ति का जुड़वा इंजन कह सकता है, जिसमें शर्मा न केवल राज्य के लिए बल्कि इस क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी रणनीतिक गठबंधनों को कुशलता से अंजाम दे रहे हैं। बेशक चुनाव की भविष्यवाणी करने में अनजान तथ्यों का जोखिम जुड़ा होता है। कम से कम कोई यह नहीं कह सकता कि मतदान के दिन कोई व्यक्ति किस तरह वोट डालेगा। लेकिन इसके साथ यह भी स्पष्ट है कि कांग्रेस के दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई जैसे लोकप्रिय चेहरे की राज्य में कमी है, जिन्हें विभिन्न दलों के लोग और विपक्षी समूहों के आम नेता काफी पसंद करते थे। इससे जहां विपक्ष को नुकसान हो रहा है, वहीं सत्तारूढ़ दल भाजपा को मदद मिल रही है।



राज्य के पश्चिमी हिस्से में बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) में भाजपा की मुख्य सहयोगी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) है। हालांकि यूपीपीएल नई पार्टी है, इसके नेता प्रमोद बोरो ने छात्र राजनीति से शक्तिशाली ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) के प्रमुख के रूप में दिसंबर, 2020 में राजनीति में आकर बीटीसी चुनाव में हिस्सा लिया, जिसमें यूपीपीएल और भाजपा ने मामूली बहुमत से खंडित जनादेश हासिल किया। बीटीसी चुनाव में लड़ाई बहुत कांटे की थी, लेकिन उन्होंने बीटीसी में पहले से राज कर रहे बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) को बाहर कर दिया, जो कुछ महीने पहले तक भाजपा के साथ गठबंधन में था। वास्तव में, प्रमोद बोरो ने लगातार बीपीएफ और उसके नेता हाग्रामा मोहिलरी के खिलाफ मजबूत विरोध 


प्रदर्शन का नेतृत्व किया था, जिसमें उन पर भ्रष्टाचार और कुशासन का आरोप लगाया गया था।


उनके साहसी तेवर ने यह सुनिश्चित किया कि जब भाजपा बीटीसी चुनावों के लिए अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत कर कर रही थी, तो उसके साथ ही वह इसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों को भी ध्यान में रखे। राज्य के एक प्रमुख नेता कहते हैं, काउंसिल का चुनाव सेमी फाइनल था और फाइनल तो विधानसभा के चुनाव होंगे। यहां 126 सदस्यीय विधानसभा में से कम से कम 13 सीटें दांव पर हैं। सत्तारूढ़ बीपीएफ के खिलाफ बढ़ते विरोधाभास ने भाजपा को युवा प्रमोद बोरो के साथ गठबंधन करने के लिए बाध्य किया। बीपीएफ की राजनीति में दम नहीं है। यह अभी विपक्ष में है, लेकिन जब सत्ता में था, तो कांग्रेस और भाजपा, दोनों के साथ गठबंधन करता रहा है। इसकी स्थिति स्पष्ट थी कि जो भी पार्टी राज्य में सत्ता में रहेगी, वह उसके साथ गठबंधन करेगा। लेकिन बीपीएफ को अपने पुराने साथी भाजपा द्वारा गठबंधन तोड़ दिए जाने का अनुमान नहीं था, जो बीपीएफ के करीब 18 वर्षों के कामकाज और प्रदर्शन के प्रति बढ़ते असंतोष से वाकिफ थी। लोगों की स्मृति छोटी होती है और असम की नई पीढ़ी के मतदाताओं को उनके बारे में बहुत पता नहीं है। 


हिंदी भाषी पाठकों को असम के इस इलाके महत्व के बारे में बताना जरूरी है। रणनीतिक रूप से यह इलाका भारत के लिए महत्वपूर्ण है-मुख्य राजमार्ग और सड़क और तेल / गैस पाइपलाइनें, जो इस क्षेत्र को शेष भारत से जोड़ती हैं, बीटीसी क्षेत्र से गुजरती हैं। यहां से थोड़ी ही दूरी पर भूटान और बांग्लादेश के साथ हमारी अंतरराष्ट्रीय सीमाएं हैं। यह प्रसिद्ध चिकन नेक के किनारे पर है, जिसे सिलीगुड़ी कॉरिडोर के रूप में जाना जाता है, और जो एनईआर को मुख्य भूमि से जोड़ता है और राज्य के चार जिलों में फैला है। काउंसिल की स्थापना असम की सबसे बड़ी जनजाति बोडो समुदाय की आकांक्षाओं की पूर्ति और 

स्वायत्तता के लिए की गई थी। 


इसकी स्थापना लंबे समय से चली आ रही मांग और आकांक्षाओं की पूर्ति करती है। इसके लिए एक सांविधानिक संशोधन की आवश्यकता थी, जिसकी सिफारिश अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा पूर्व प्रधान न्यायाधीश एमएन वेंकटचेलैया की अध्यक्षता में गठित संविधान समीक्षा आयोग ने की थी। मैं उस उप-समिति में शामिल था, जिसने दिवंगत पूर्णो संगमा के नेतृत्व में पूर्वोत्तर में बदलाव के प्रस्तावों को तैयार किया था। हमने छठी अनुसूची के माध्यम से बोडो समुदाय को विशेष सुरक्षा और सुविधाओं के विस्तार की सिफारिश की, जिसे तरुण गोगोई सरकार ने 2001 में सत्ता में आने के तुरंत बाद स्वीकार किया था, हालांकि कांग्रेस पार्टी ने आधिकारिक तौर पर आयोग का बहिष्कार किया था। और इस तरह क्षेत्र में शांति एवं सद्भावना लाने के एक उपाय के रूप में बीटीसी अस्तित्व में आया। लेकिन बीटीसी के अस्तित्व के बावजूद भय, धमकी और हिंसा बहुत व्यापक थी। कई हमलों और हिंसा के बाद वर्ष 2012 में मुस्लिम एवं बोडो समुदाय के करीब चार लाख लोग राहत शिविरों में रह रहे थे, जिनमें से ज्यादातर अब घर लौट चुके हैं। 


अब जमीनी स्तर पर स्थितियां सुधरने लगी हैं। दरअसल, प्रमोद बोरो ने जीत के तुरंत बाद घोषणा की कि परिषद में नए गठबंधन के चुनाव का मतलब है कि हमारी पहली प्राथमिकता बीपीएफ द्वारा पिछले 17 वर्षों में किए गए नुकसान को ठीक करना है। एक अंग्रेजी दैनिक के मुताबिक, नए मुख्य कार्यकारी सदस्य (काउंसिल का शीर्ष पद) ने घोषणा की कि नई सरकार इस क्षेत्र में भय के युग का अंत करेगी और शांति, समृद्धि, मित्रता और भाईचारे के युग में प्रवेश करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस क्षेत्र में रहने वाले 2.40 लाख बेघरों को पेयजल और अच्छी गुणवत्ता वाली सड़कों के अलावा घर दिए जाएंगे। बीटीसी क्षेत्र में यूपीपीएल द्वारा अच्छा प्रदर्शन इस जटिल और चुनौतीपूर्ण राज्य में भाजपा को बहुमत दिलाने में मददगार होगा।


(-पूर्वोत्तर मामलों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ पत्रकार) 


सौजन्य - अमर उजाला।

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तेल के दाम बढ़ने से जनता परेशान, टैक्स घटाने से ही मिलेगी राहत (अमर उजाला)

मधुरेंद्र सिन्हा 

इस समय जब देश में मुद्रास्फीति की दर नियंत्रण में है और खाने-पीने की वस्तुओं की कीमत पर लगाम है, तब तेल की कीमत में आश्चर्यजनक उछाल ने जनता को तकलीफ में डाल दिया है। देश के कई शहरों में पेट्रोल के दाम सौ रुपये लीटर से अधिक हो चुके हैं। खाद्य तेलों में भी सरसों तेल 160 रुपये और मूंगफली का तेल दो सौ रुपये प्रति लीटर से ज्यादा हो चुका है। सरसों तेल गरीबों की पहुंच से बाहर है। पेट्रोल-डीजल और खाद्य तेलों के दाम बढ़ने के कारण अलग हैं, पर दोनों से जनता प्रभावित हो रही है और केंद्र या राज्य सरकारें इस दशा में कुछ करती नहीं दिख रहीं। 

हाल ही में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि वह भी चाहेंगी कि पेट्रोल के दाम गिरें, पर मूल्य निर्धारण रिफाइनरीज के हाथ में है और सरकार इसमें हस्तक्षेप नहीं करगी। उन्होंने कहा कि तेजी का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमत का लगातार बढ़ना रहा है। जबकि पेट्रोल-डीजल में तेजी का कारण इन पर भारी उत्पाद शुल्क तथा राज्यों का वैट है। यही कारण है कि पेट्रोल-डीजल की तेजी के खिलाफ राजनीतिक विरोध नहीं दिख रहा है। दरअसल केंद्र और राज्य सरकारों ने कोविड-19 के कारण हुए आर्थिक घाटे की भरपाई के लिए पेट्रोल-डीजल को हथियार बनाया है। इसी का नतीजा है कि पेट्रोल पर 184 प्रतिशत तक टैक्स लग चुका है। उत्पाद शुल्क पहले जहां 40-45 प्रतिशत तक होता था, अब उछलकर 104 फीसदी से भी ज्यादा हो चुका है। पिछले साल मार्च और मई में भी सरकार ने उत्पाद शुल्क में भारी वृद्धि की थी, जो अब भी जारी है और वित्तमंत्री की बातों से नहीं लगता कि फिलहाल इनकी कीमत घटाने का प्रयास होगा।



केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क और उपकर से दो लाख करोड़ रुपये अर्जित किए हैं, और यह सिलसिला जारी रहा, तो वह वित्त वर्ष 2022 में इससे 4.3 लाख करोड़ रुपये अर्जित करेगी। राज्य सरकारों को भी काफी कमाई होगी, क्योंकि प्रति लीटर पेट्रोल पर वैट 20 रुपये से भी ज्यादा है। राज्यों के पास भी कोविड के कारण खाली हुए खजाने को भरने का अच्छा मौका मिला है। हालांकि पश्चिम बंगाल तथा असम जैसे चुनावी राज्यों ने कीमत कुछ घटाई है तथा राजस्थान में वैट 38 प्रतिशत से घटाकर 36 फीसदी कर दिया गया है। लेकिन जनता पर इसका खास असर नहीं पड़ने वाला। सरकारों को समझना होगा कि कोविड-19 के कारण लोग अभी सार्वजनिक परिवहन से बचना चाह रहे हैं और अपने वाहन पर चलना पसंद कर रहे हैं, चाहे इसके लिए ज्यादा पैसे क्यों न चुकाने पड़ें। जहां तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने की बात है, तो भारत तेल की खरीद हाजिर बाजार से नहीं, बल्कि दीर्घावधि के सौदे के जरिये करता है। इसलिए विश्व बाजार में कच्चे तेल के भाव बढ़ने का भी भारत पर असर नहीं पड़ता, और जब वहां तेल के भाव शून्य पर चले गए थे, तब भी भारत को उसका फायदा नहीं मिला। पर डीजल के दाम बढ़ने से देश का सीधा नुकसान हो रहा है और इसका असर किसानों तक पर पड़ रहा है।


मार्च, 2016 में डीजल का दाम 46.43 रुपये प्रति लीटर था, जो अब 81 रुपये के पास पहुंच गया है। इसका बुरा असर माल ढुलाई पर पड़ रहा है। कारखानों में बने सामान के साथ भी यह हो रहा है। गहरे समुद्र में मछलियां पकड़ने वालों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ गई है। निर्यातकों को बंदरगाहों तक तैयार माल भेजने में खर्च ज्यादा हो रहा है, जिससे उनका मुनाफा घटेगा। वित्तमंत्री खुद कह रही हैं कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाकर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। इससे डबल टैक्सेशन खम होगा और इनकी कीमत भी सामान्य होगी। लेकिन जीएसटी में इसे लाने से जनता के कष्ट का समाधान नहीं होगा, इसके लिए तो टैक्स घटाने ही होंगे। जहां तक खाद्य तेल की बात है, तो इसके दाम सटोरियों की चाल से बढ़े हैं। सरसों के रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद सटोरियों ने दाम गिरने नहीं दिए और तेल महंगा होता चला गया। गरीब जनता को राहत देने के लिए सरकार यहां तो हस्तक्षेप कर ही सकती है। 


सौजन्य - अमर उजाला।

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बाइडन की विदेश नीति में भारत: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में से एक (अमर उजाला)

सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत  

विगत चार फरवरी को विदेश नीति से संबंधित अपने पहले भाषण में अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति जो बाइडन के जिस वाक्य ने सबसे अधिक ध्यान खींचा, वह था- 'अमेरिका पटरी पर लौट आया है।' बाइडन का यह भाषण बहुत उथल-पुथल देख चुके अपने देशवासियों के साथ-साथ अमेरिका के विदेशी दोस्तों और सहयोगियों को शांत और आश्वस्त करने के लिए था। शेष दुनिया के लिए बाइडन के भाषण की एक और जो पंक्ति उल्लेखनीय थी, वह थी, 'कूटनीति हमारी विदेश नीति के केंद्र में लौट आई है।' यह ट्रंपकालीन दबंगई और दर्पोक्ति के खत्म होने का उत्साहजनक संकेत था।


बाइडन ने अंतरराष्ट्रीय रिश्तों से संबंधित अपनी प्राथमिकता के बारे में कहा, 'हम अपने गठजोड़ों को दुरुस्त करेंगे और सिर्फ अतीत की नहीं, बल्कि आज और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए एक बार फिर दुनिया से जुड़ेंगे।' उन्होंने किसी को संदेह में नहीं रखा कि पुनर्जीवित की गई उनकी विदेश नीति का उद्देश्य क्या होगा : 'बढ़ते अधिनायकवाद की नई स्थिति का मुकाबला करना होगा, जिसमें अमेरिका को चुनौती देने की चीन की महत्वाकांक्षा भी शामिल है और हमारे लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने तथा इसमें गतिरोध पैदा करने की रूस की कोशिश भी।' अलबत्ता वैश्विक चुनौती की बात करते हुए उन्होंने वास्तविकता भी स्वीकारी, 'उन्हीं मुद्दों को सुलझाएंगे, जिनमें दूसरे देशों की सहमति हो और लक्ष्य साझा हो, अमेरिका यह काम अकेले नहीं कर सकता।'


बाइडन के मुताबिक, 'अमेरिका की कभी खत्म न होने वाली ताकत वस्तुतः इसके लोकतांत्रिक मूल्य हैं : यानी स्वतंत्रता की रक्षा करना, सबको अवसर मुहैया कराना, वैश्विक अधिकारों की रक्षा, कानून के शासन का सम्मान और सभी व्यक्ति की गरिमा का ध्यान रखना।' विडंबना यह है कि अमेरिका द्वारा इन उच्च जीवन मूल्यों की वकालत करने से भारत समेत कई देशों से उसके रिश्ते तनावपूर्ण हो सकते हैं। ट्रंप के अपने दोस्तों और सहयोगियों से भी लापरवाह रिश्ते थे। लेकिन बाइडन के लिए 'अमेरिका के सहयोगी ही उसकी सबसे मूल्यवान संपत्ति हैं, और कूटनीति के साथ आगे बढ़ने का मतलब है अपने सहयोगियों और साझेदारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना।' जाहिर है कि बाइडन अमेरिका के आलोचकों और प्रतिद्वंद्वियों के साथ कूटनीतिक रूप से निपटेंगे। चूंकि चीन के साथ हमारा सीमा विवाद है और एलएसी पर आक्रामकता के कारण गलवां घाटी में हमारे 20 जवान शहीद हुए थे, लिहाजा बाइडन की चीन नीति हमारे लिए भी बहुत महत्वपूर्ण होगी।


चीन के प्रति हमारा और अमेरिका का रवैया एक जैसा होने के बावजूद हमें नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका और चीन की अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे पर इतनी निर्भर हैं कि उनका अलग होना असंभव है। ऐसे ही अमेरिका की आव्रजन नीति, खासकर एच1बी वीजा में नरमी तथा पत्नियों को काम करने देने की अनुमति आदि ऐसे फैसले हैं, जिनसे भारतीय आईटी प्रोफेशनलों की चिंता कम हुई होगी। जैसा कि प्रत्याशित ही था, बाइडन के भाषण में भारत का जिक्र नहीं था। लेकिन बाइडन ने शी जिनपिंग से पहले नरेंद्र मोदी से टेलीफोन पर बात की थी। नए अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकेन अब तक हमारे विदेश मंत्री से दो बार बात कर चुके हैं। ऐसे ही अमेरिका के नए रक्षा मंत्री तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी अपने भारतीय समकक्षों से संवाद कर चुके हैं।


बाइडन प्रशासन भारत को 'हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में से एक मानता है तथा इस क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत के उभरने का स्वागत करता है।' इसके अलावा 'हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त और उदार बनाए रखने' के लिए अमेरिका क्वाड को आगे बढ़ाता रहेगा। समुद्री सुरक्षा प्रदान करने के अलावा क्वाड जलवायु परिवर्तन, कोविड-19 महामारी और लोकतंत्रों को मजबूत करने में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है। बाइडन ने लोकतांत्रिक देशों की बैठक आयोजित करने का जो सुझाव दिया है, जिसमें म्यांमार जैसे मुद्दे पर बहस हो सकती है, भारत को उसका स्वागत तो करना ही चाहिए, उसे अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप भी कदम उठाना चाहिए।


भारत और अमेरिका के बीच न सिर्फ विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग निरंतर जारी है, बल्कि अमेरिका में रिपब्लिकन्स और डेमोक्रेटिक, दोनों ही पार्टियों ने अपने कार्यकालों में इसे आगे बढ़ाया है। बाइडन-हैरिस के कार्यकाल में इस आपसी सहयोग के और आगे बढ़ने की ही संभावना है। अलबत्ता बाइडन ने अपने भाषण में स्वतंत्रता की रक्षा, वैश्विक अधिकारों की बहाली, कानून के शासन का सम्मान, सभी को समान गरिमा देने की प्रतिबद्धता और बढ़ते अधिनायकवाद का मुकाबला करने जैसे जिन मूल्यों को बढ़ावा देने की बात कही है, भारत को उसका ध्यान रखना चाहिए। इसकी वजह यह है कि जरूरत पड़ने पर बाइडन प्रशासन इन मुद्दों पर अपनी चिंता जताने में नहीं झिझकेगा।


विगत 26 जनवरी को दिल्ली में हुई हिंसा की अमेरिका में आलोचना हुई। लेकिन सरकार की आलोचना करने पर कार्टूनिस्ट और स्टैंड अप कॉमेडियन की गिरफ्तारियों या उन पर देशद्रोह के तहत मामला दर्ज करने या विरोधियों पर प्रवर्तन निर्देशालय के छापे और एनसीबी की पूछताछ और कथित लव जेहाद के आरोप में गिरफ्तारियों से अमेरिकी जनमत में भारत की नकारात्मक छवि बन रही है। अमेरिका में जब ‘ब्लैक लाइव मैटर्स’ का आंदोलन चल रहा था, तब हजारों भारतीयों ने सोशल मीडिया में उसके पक्ष में टिप्पणियां की थीं। लेकिन जब हमारे यहां के किसान आंदोलन पर एक अमेरिकी सेलिब्रिटी रिहाना ने कुछ टिप्पणियां कीं, तो हमने तल्ख प्रतिक्रिया जताई। 1.3 अरब की आबादी वाले देश को एक अमेरिकी गायिका की टिप्पणी पर पागलों जैसा व्यवहार क्यों करना चाहिए?


हम इस प्रतिक्रिया की अनदेखी क्यों नहीं कर पाए? दिल्ली पुलिस ने रिहाना के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का जो कदम उठाया, वह तो और भी बेतुका और हास्यास्पद था। हमें एक आत्मविश्वासी और परिपक्व लोकतंत्र की तरह, जिसका हम दावा करते हैं, व्यवहार करना चाहिए। 'घर को बेहतर बनाने के साथ अपनी साख और नैतिक आभा फिर से हासिल करने' की बाइडन की प्रतिबद्धता क्या भारत के लिए भी प्रासंगिक नहीं है?

सौजन्य - अमर उजाला।

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श्रम संहिताएं बनेंगी बदलाव की वाहक (अमर उजाला)

जयंतीलाल भंडारी  

हाल ही में केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने 44 केंद्रीय श्रम कानूनों के स्थान पर तैयार चार श्रम संहिताओं-औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियां संहिता, 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और वेतन संहिता, 2019 के तहत नियमों को अंतिम रूप दे दिया है। ये संहिताएं संसद में पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अधिसूचित की जा चुकी हैं। निस्संदेह भारत के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उद्योग-कारोबार के बढ़ते मौकों के मद्देनजर ये चार श्रम संहिताएं पासा पलटने वाली और उद्यमियों, श्रमिकों और सरकार तीनों के लिए फायदेमंद सिद्ध हो सकती हैं। इन श्रम संहिताओं के तहत जहां कामगारों के लिए मजदूरी सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने का दायरा काफी बढ़ाया गया है, वहीं श्रम कानूनों की सख्ती कम करने और अनुपालन की जरूरतें कम करने जैसी व्यवस्थाओं से उद्योग लगाने के लिए प्रोत्साहन मिलेंगे और इससे रोजगार सृजन में भी मदद मिलेगी। 

उच्चतम न्यायालय भी कई बार अप्रासंगिक हो चुके ऐसे श्रम कानूनों की कमियां गिनाता रहा है, जो काम को कठिन बनाते हैं। देश और दुनिया के आर्थिक संगठन बार-बार कहते रहे हैं कि श्रम सुधारों से ही भारत में उद्योग-कारोबार का तेजी से विकास हो सकेगा। यदि हम श्रम को शामिल कर विभिन्न मापदंडों पर बनाई गई वैश्विक रैंकिंग को देखें, तो पाते हैं कि भारत उनमें अभी बहुत पीछे है। विश्व बैंक की कारोबार सुगमता रैंकिंग ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’, 2020 में भारत 63वें स्थान पर रहा है। विश्व आर्थिक मंच के ग्लोबल सोशल मोबिलिटी इंडेक्स, 2020 के तहत वैश्विक सामाजिक सुरक्षा की रैकिंग में भारत 82 देशों की सूची में 76वें क्रम पर है। ‘ग्लोबल इकनॉमिक फ्रीडम इंडेक्स, 2020 में भारत 105वें स्थान पर है। इसी तरह विश्व आर्थिक मंच के वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा सूचकांक, 2019 में 140 देशों की अर्थव्यवस्थाओं में भारत 58वें स्थान पर है।

वियतनाम, बांग्लादेश तथा अन्य देश लचीले श्रम कानूनों के कारण न केवल औद्योगिक विकास की डगर पर लाभान्वित होते दिखाई दे रहे हैं, बल्कि वे उद्योग-कारोबार की रैंकिंग में भी आगे हैं। ऐसे में भारत में नई श्रम संहिताओं से उद्योग-कारोबार सरलता से आगे बढ़ सकेंगे। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि कोविड-19 की चुनौतियों के बीच दुनिया में औद्योगिक विकास के लिए भारत की एक नई पहचान बनी है। वित्त वर्ष 2021-22 के नए बजट में भी भारत को दुनिया का नया मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाए जाने के लिए प्रावधान सुनिश्चित किए गए हैं। ऐसे में नई श्रम संहिताओं से देश के उद्योग-कारोबार को नई गतिशीलता मिलेगी। इनसे संगठित व असंगठित दोनों ही प्रकार के श्रमिकों को कई नई सुविधाएं मिलेंगी। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा फंड का निर्माण होगा। देश के सभी जिलों के साथ खतरनाक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों को अनिवार्य रूप से कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की सुविधा से लाभान्वित किया जाएगा। सेल्फ असेसमेंट के आधार पर असंगठित क्षेत्र के श्रमिक अपना इलेक्ट्रॉनिक पंजीयन करा सकेंगे। 

इतना ही नहीं, घर से कार्य पर आने व जाने के दौरान दुर्घटना होने पर कर्मचारी क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का हकदार होगा। अपनी इच्छा से महिला श्रमिक रात की पाली में भी काम कर सकेंगी। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि केंद्र सरकार ने 178 रुपये रोजाना का राष्ट्रीय बुनियादी वेतन तय कर दिया है। न्यूनतम वेतन इससे कम नहीं हो सकता। सभी श्रमिकों को नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य होगा। दूसरी ओर औद्योगिक संबंध संहिता के तहत सरकार भर्ती और छंटनी को लेकर कंपनियों को ज्यादा अधिकार देगी। इससे औद्योगिक मुश्किलों के दौर में बड़ी कंपनियों के लिए कर्मचारियों की छंटनी और प्रतिष्ठान बंद करना आसान होगा। चार नई श्रम संहिताएं भारत को दुनिया का नया मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने में मददगार साबित हो सकती हैं। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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ग्रामीण ठन-ठन, कंपनियां बम-बम (अमर उजाला)

 अनन्त मित्तल  

कोविड-19 महामारी पीड़ित अर्थव्यवस्था वृद्धि की राह पर तो लौट रही है, मगर कंपनियों के बढ़ते मुनाफे के मुकाबले ग्रामीण आबादी के हाथ खाली हैं। बजट में हालांकि ग्रामीण विकास योजनाओं के लिए डेढ़ लाख करोड़ से अधिक राशि का प्रावधान है, मगर गांवों में बेरोजगारी से लोग बेहाल हैं। दीवाली एवं छठ पर गरीब कल्याण योजना बंद होने से गांवों में गरीबों एवं निम्न मध्यवर्ग की आर्थिक हालत पतली है। इसके बरक्स देश की 2,485 कंपनियों ने अक्तूबर-दिसंबर तिमाही में पिछली 25 तिमाही से कहीं अधिक मुनाफा कमाया है। यह आंकड़ा महामारी में आम आदमी की मुफलिसी बढ़ने के बावजूद धन्नासेठों के मुनाफे में 35 फीसदी इजाफे से आर्थिक विषमता बढ़ने के दर्दनाक तथ्य की ही पुष्टि कर रहा है। 


शेयर बाजार में अधिसूचित कंपनियों का मुनाफा बढ़ना हालांकि अर्थव्यवस्था में वृद्धि लौटने की खुशखबरी भी है। लॉकडाउन की अगली तिमाही में अर्थव्यवस्था शून्य से 24 फीसदी नीचे गिर गई, मगर कृषि क्षेत्र में 3.4 फीसदी वृद्धि के बावजूद गांवों में बेरोजगारी है। उस दौरान मनरेगा, गरीबों को मुफ्त अनाज, किसानों, बेसहारा बुजुर्गों, विधवाओं, शारीरिक कमी के शिकार लोगों को आर्थिक सहायता मिली थी, जिनमें से अधिकतर बंद हो चुकी हैं। लॉकडाउन के झटके से बंद हुए करीब एक-तिहाई लघु एवं सूक्ष्म उद्यमों तथा काम-धंधों के ठप होने के कारण बहुत से बेरोजगार प्रवासी मजदूर गांवों में ही रुके हैं। कृषि में नवंबर से मार्च के बीच अत्यल्प रोजगार मिलता है। इसलिए परिवार से मात्र एक व्यक्ति को साल में 100 दिन रोजगार देने वाले मनरेगा के अलावा उनके पास अन्य कोई रोजगार नहीं है। ऊपर से रोजमर्रा के उपभोग की वस्तु महंगी हो रही हैं। ग्रामीण मजदूरी मासिक सर्वेक्षण के अनुसार, शहरों में रोजगार घटने से गांवों में अक्तूबर, 2019 से नवंबर, 2020 के बीच मजदूरी की दर लगातार घटी है। जनवरी, 2021 के भारतीय रिजर्व बैंक के द्वैमासिक उपभोक्ता भरोसा सर्वेक्षण में भी लोगों ने बहुमत से पिछले साल दिसंबर-जनवरी के मुकाबले इस बार रोजगार एवं आमदनी घटने की पुष्टि की है।


सर्वेक्षण में देश के 13 महानगरों में रोजगार एवं आमदनी घटने से साफ है कि बेरोजगार प्रवासियों का गांवों पर दबाव बरकरार है।   महामारी ने देश में करोड़ों लोगों को बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा और बाल मजदूरी की तरफ धकेला है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, भारत में 15 करोड़ लोगों के गरीबी रेखा से नीचे पहुंचने की आशंका है। इनमें भी स्त्रियों पर तो 13 फीसदी बेरोजगारी एवं भीषण घरेलू हिंसा की गाज गिरी है। बच्चों, गर्भवती एवं प्रसूता माताओं, बुजुर्गों, असाध्य बीमारीग्रस्त लोगों को इलाज, दवा, टीकाकरण एवं पोषण के भी लाले पड़े हुए हैं। महामारी से अर्थव्यवस्था अप्रैल-सितंबर की छमाही में औसतन 16 फीसदी टूट चुकी, मगर शेयर बाजार सूचकांक पहली बार 50,000 अंक की बुलंदी पर है। केंद्रीय बजट में बहुमूल्य सरकारी उद्यमों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों—ट्रेनों, बैंकों, एलआईसी तथा सरकारी जमीनों के निजीकरण की घोषणा ने शेयर बाजार को और सुर्खरू ही किया। 


आर्थिक विषमता की भयावहता की तस्दीक राजधानी दिल्ली में 42.59 फीसदी परिवारों के मासिक 10 हजार रुपये से भी कम में गुजारे की मजबूरी भी कर रही है। दिल्ली सरकार के सर्वेक्षण के इन आंकड़ों में राजधानी दिल्ली के आधे बच्चे और गर्भवती माताएं पोषण एवं टीकाकरण की सुविधा से महरूम हैं। जब केंद्र और राज्य सरकारों की मेहरबानियों और निगरानी से लबरेज दिल्ली वालों की ऐसी दुर्गति है, तो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, असम, ओडिशा एवं झारखंड जैसे अति पिछड़े राज्यों का कितना बुरा हाल होगा, यह सोचा जा सकता है। जाहिर है कि आर्थिक विषमता के लगातार फल-फूल रहे इस घातक वायरस से मुक्ति पाना भी उतना ही जरूरी है, जितना कोविड-19 महामारी से निजात के लिए टीकाकरण। यह दुनिया में दूसरी सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत में अमन और सामाजिक भाईचारे के लिए भी जरूरी है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Monday, February 8, 2021

खेती को चाहिए नई नीति: सभी फसलों की उचित कीमत मिले, तो किसान मिश्रित फसलों को प्राथमिकता देने लगेंगे (अमर उजाला)

हेतु भारद्वाज

 

लगभग दो माह से ज्यादा समय से चल रहे किसान आंदोलन के दौरान बीते 26 जनवरी को जो दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, उसने आंदोलन को बहुत पीछे धकेल दिया है। 26 जनवरी की शर्मनाक घटना का बचाव वे लोग भी नहीं कर सकते, जिनके प्रखर और निडर व्यक्तित्व का निर्माण केवल और केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध करते रहने से हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं कि किसान आंदोलन काफी शांति से चला, लेकिन उससे किसानों को कुछ हासिल नहीं हुआ। इस आंदोलन का दुर्भाग्य यह रहा कि इसका नेतृत्व पेशेवर लोगों के हाथों में रहा।



जिस दिन केंद्रीय कृषि मंत्री ने किसानों के साथ बैठक में कृषि कानूनों को डेढ़ साल तक स्थगित रखने का प्रस्ताव दिया, उस दिन किसान नेता काफी संतुष्ट से लगे थे। लगा था कि किसान नेता इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेंगे, किंतु रात को हुई सभी नेताओं की बैठक में इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया। आगे की रणनीति तय करने के लिए यह डेढ़ वर्ष का समय काफी था, पर इससे पेशेवर किसान नेताओं का धंधा चौपट हो जाता, इसलिए उन्होंने केंद्रीय कृषि मंत्री के प्रस्ताव को नहीं माना। इस आंदोलन का एक कमजोर पक्ष यह भी रहा कि इसमें आंदोलनकारियों की सुख-सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा गया, जिसका विभिन्न चैनलों पर भरपूर प्रदर्शन भी हुआ। आंदोलन स्थलों पर सुख-सुविधाओं का प्रदर्शन अहमन्यता का द्योतक था।



किसान की सबसे बड़ी विडंबना है कि वह अकेला ऐसा उत्पादक है, जिसकी अपने उत्पाद की कीमत तय करने में कोई भूमिका नहीं होती। जबकि पेपर-सोप जैसी छोटी-सी चीज के कीमत-निर्धारण में उसके उत्पादक की भूमिका होती है। इसके अलावा किसान अपने उत्पाद को ज्यादा दिन तक रोक कर रख भी नहीं सकता है। वह कितना अन्न उगा पाएगा, यह भी प्रकृति की दया पर निर्भर है। अनिश्चितताओं के कारण वह सदा समस्याओं से घिरा रहता है। एक तरफ वह फसल के लिए प्रकृति पर निर्भर रहता है, तो दूसरी तरफ कीमत के लिए मंडी के आढ़तियों पर। अगर उसकी फसल की न्यूनतम कीमत तय हो जाती है, तो काफी हद तक वह आश्वस्त हो सकता है।


यह भी चिंता की बात है कि कृषि उत्पादों को लेकर हमारी कोई पक्की नीति नहीं है। व्यावहारिक स्तर पर देखें, तो उत्तर प्रदेश में जेवर के आसपास, जहां अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बन रहा है, खादर क्षेत्र को छोड़कर बाकी भूमि काफी उपजाऊ है। वहां कई तरह की फसलें होती थीं। आज वहां अधिकांशतः धान उपजाया जाता है। धान उगाने पर कोई नीतिगत निर्णय क्यों नहीं लिया जाता? हरियाणा की मुख्य फसल गेहूं थी, जबकि आज धान है। इसलिए पराली की समस्या पैदा हो गई, जो हर साल दिल्ली को सताती है। आज पूरे पंजाब और हरियाणा में धान की खेती होती है। पराली से उत्पन्न समस्या पर कभी इस दृष्टि से विचार नहीं किया गया। किसान धान की फसल की तरफ इसलिए मुड़े, क्योंकि अन्य जिंसों के मुकाबले इसकी अच्छी कीमत मिल जाती है। अगर सभी फसलों की उचित कीमत मिले, तो किसान मिश्रित फसलों को प्राथमिकता देने लगेंगे।


पहले कृषि-व्यवसाय लाभकारी लगता था। परिवार का हर सदस्य खेती और पशुपालन में लगा रहता था। पहले किसानों के पास जमीनें अधिक थीं। बाद में खेती का लागत मूल्य बढ़ता गया। किसान नकदी फसल उगाकर उसकी भरपाई करने लगे। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज गन्ने की फसल भी उतनी लाभकारी नहीं रही, जितनी दस-पंद्रह वर्ष पहले थी। किसानों को जब गन्ना जलाकर नष्ट करना पड़ा, तब गन्ने की खेती से मोहभंग होना स्वाभाविक था। यदि अब भी खेती को लेकर नीतिगत निर्णय नहीं लिए गए, तो धान की खेती से भी मोहभंग हो जाएगा। इसलिए यह जरूरी है कि किसान को उसकी फसल की वाजिब कीमत मिले।


किसानों का कृषि से अब भी मोहभंग नहीं हुआ है। वे नवाचार कर रहे हैं, रेतीले इलाकों तक में अच्छी फसलें उगाई जा रही हैं। पर मुख्य बात यही है कि किसानों को उनके उत्पाद का सही मूल्य मिले।


सौजन्य - अमर उजाला।

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महाराष्ट्र में पहले से हैं कृषि कानूनों जैसे प्रावधान, डेढ़ दशक से हो रहा अमल (अमर उजाला)

दीपक चव्हाण 

महाराष्ट्र में नए कृषि कानूनों का प्रभाव कम दिखाई देता है, क्योंकि साल 2003 से एपीएमसी मॉडल एक्ट और ठेके पर खेती (कांट्रेक्ट फार्मिंग) जैसे सुधार यहां चल रहे हैं। तीन नए कृषि कानूनों में जो भी प्रावधान किए गए हैं, उन पर तो महाराष्ट्र में पिछले डेढ़ दशक से अमल हो रहा है। यहां बीस सालों से पोल्ट्री कांट्रेक्ट फार्मिंग हो रही है। लेकिन सितंबर 2020 में नए कानून जारी होने पर प्याज निर्यातबंदी, स्टॉक लिमिट लगाए जाने के बाद से महाराष्ट्र के किसानों का नए कानूनों पर विश्वास कम हो गया है। जैसे, आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत प्याज को बाहर रखा गया था। लेकिन कुछ उपनियमों का आधार लेकर प्याज पर अव्यावहारिक स्टॉक लिमिट लगाई गई, जिससे किसान परेशान हो गए थे। स्टॉक लिमिट के कारण मंडी में प्याज की नीलामी ठप हो गई। प्याज के भाव गिर गए, जिससे किसानों को नुकसान झेलना पड़ा था।



महाराष्ट्र ज्यादातर बागवानी उत्पाद वाला राज्य है। उत्तर महाराष्ट्र में प्याज, अनार और अंगूर की खेती की जाती है। तो पश्चिम महाराष्ट्र में गन्ना, टमाटर और सब्जी का चलन है। मुंबई, पुणे जैसे बड़े बाजार फलोत्पादनों को बढ़ावा देते हैं। पोल्ट्री और डेयरी इंडस्ट्री भी यहां पर विकसित है। दूसरी ओर मराठवाड़ा और विदर्भ में ज्यादातर कपास, चना, अरहर (तुअर), सोयाबीन, मक्का जैसी फसल ली जाती हैं। पूरे महाराष्ट्र में फसल संस्कृति पंजाब और हरियाणा की तरह एक या दो फसल पर निर्भर नहीं है। फसल की विविधता ही महाराष्ट्र में खेती का वैशिष्ट्य है।

संयुक्त किसान मोर्चा का बड़ा फैसला, ट्रैक्टर परेड में रूट बदलने वाले दो संगठन निलंबित

मराठवाड़ा और विदर्भ में प्रति व्यक्ति भू-स्वामित्व ज्यादा है। इसी वजह से वहां पर सोयाबीन, कपास, चना की खेती अधिक मात्रा में होती है। कपास के लिए एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) और गन्ने के लिए एफआरपी (उचित एवं लाभकारी मूल्य) की व्यवस्था है। अगर, आगे चलकर ऐसा कोई कानून आता है, जिससे उपरोक्त फसलों के आधारभाव की व्यवस्था खतरे में आ जाए, तो महाराष्ट्र में भी बड़े आंदोलन की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।


महाराष्ट्र में गन्ना किसान को-ऑपरेटिव मॉडल से लाभान्वित हैं। दूसरी तरफ कांट्रेक्ट फार्मिंग के कारण पोल्ट्री किसान के जीवन में स्थिरता आई है। यहां पर फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनियां (एफपीसी) अच्छा काम कर रही हैं। एफपीसी का यह मॉडल पुराने को-ऑपरेटिव मॉडल से बेहतर साबित हो रहा है। इसको और बेहतर करने के लिए सुधार की जरूरत है। लेकिन जब तक खेती की वैल्यूचेन में किसान की हिस्सेदारी नहीं बढ़ती, तब तक सुधार का फायदा नहीं होगा।


गेहूं और धान को एमएसपी का संरक्षण मिलता है। उसी तर्ज पर मक्के को भी एमएसपी मिलना चाहिए। यह मांग अब महाराष्ट्र में उठने लगी है। देश में रबी और खरीफ दोनों सीजन मिलाकर 100 लाख हेक्टेयर में मक्के की बुआई होती है। इससे देश में लगभग 250 लाख टन मक्के का उत्पादन होता है। पिछले एक साल से मक्का एमएसपी से कम पर बिक रहा है। प्रति क्विंटल 1,850 रुपये एमएसपी की तुलना में महाराष्ट्र के किसान को 1,250 रुपये भाव खुले बाजार में मिल रहा है। कोरोना काल और बर्ड फ्लू की अफवाहों से पोल्ट्री उद्योग की कमर टूट गई। इस बीच, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश में बढ़ते आंदोलन ने अब मक्के के एमएसपी को भी हवा दे दी है।

किसान संगठन का दावाः 10 हजार जगह हुआ चक्का जाम, कानून वापसी तक जारी रहेगा संघर्ष

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोयाबीन सात साल के उच्च स्तर पर बिक रहा है। वर्ष 2020-21 में सोयाबीन के लिए 3,880 रु. प्रतिक्विंटल एमएसपी घोषित हुई। लेकिन महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में सोयाबीन की बिक्री एमएसपी से अधिक 4,300 रुपये प्रति क्विंटल पर हो रही है। सोया खली की निर्यात में काफी मांग है। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में उत्पादन कम होने से पाम तेल के भाव बढ़े। जब-जब वैश्विक बाजार में कृषि उत्पादों को अच्छे दाम मिलते हैं, तब-तब भारत में किसानों के आंदोलन कम दिखाई पड़ते हैं। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र का मराठवाड़ा, विदर्भ क्षेत्र इसके उदाहरण हैं। उत्तर भारत में बड़ा आंदोलन खड़े होने के बाद भी यहां का किसान शांत हैं, क्योंकि सोयाबीन और कपास को एमएसपी से जादा भाव मिल रहे हैं।


चने की रिकॉर्ड फसल वर्तमान रबी में महाराष्ट्र समेत मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक में नया संकट पैदा करेगी। मौजूदा साल के लिए जहां चने के लिए 5,100 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी है, वहीं किसानों को 900 रुपये प्रति क्विंटल का घाटा हो रहा है। ऐसे में एमएसपी के तहत सरकारी खरीद जल्द अमल में नहीं आती है, तो किसानों में असंतोष बढ़ सकता है। मुद्दा यह है कि नए कृषि कानूनों ने अपने हक के लिए एक जमीन तैयार की है। उस जमीन पर जैसे ही किसी कारणवश असंतोष के बीजों की सिंचाई होती है, तो आंदोलन का महावृक्ष खड़ा होने में देर नहीं लगेगी। एमएसपी की गारंटी ही एकमात्र ऐसा नैरेटिव है, जो किसानों में लोकप्रिय होता दिखाई दे रहा है। सरकारी तंत्र, नीति नियंताओं और मीडिया को इसे समझना होगा।


सौजन्य - अमर उजाला।

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जो उलझ कर रह गया आंकड़ों के जाल में... (अमर उजाला)

पी चिदंबरम  

बजट 2021-22 सरकार और विपक्ष के मतभेद को खत्म करने का एक मौका था। यह अत्यंत गरीब वर्ग, किसानों, प्रवासी मजदूरों ,एमएसएमई सेक्टर, मध्य वर्ग और बेरोजगार जैसे वर्गों के साथ नीतिगत रूप से और सरकार की काहिली के कारण जो कुछ गलत हुआ उसे दुरुस्त करने का भी मौका था। मगर सबसे अधिक जरूरतमंद लोगों को उनके भाग्य भरोसे छोड़ दिया गया। चूंकि मुझे किसी तरह की उम्मीद नहीं थी, लिहाजा मुझे कोई हताशा नहीं हुई, लेकिन लाखों अन्य लोग ठगा महसूस कर रहे हैं।



बजट प्रासंगिक है


तमिल व्याकरण का एक नियम है ः जगह, विषय और अवसर किसी दृष्टिहीन व्यक्ति के हाथ में रखे दीये की तरह होते हैं। इसका मतलब है कि कर्ता और उसके काम का, जगह, विषय और अवसर (समय) के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए। यही संदर्भ है, जो कि किसी फैसले की गुणवत्ता का निर्धारण करता है। वित्त मंत्री ने 2021-22 का बजट अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में पेश कियाः 



-विकास दर में 2018-19 और 2019-20 के दौरान दो वर्षों में आई गिरावट (आठ फीसदी से गिरकर चार फीसदी);


-एक वर्ष की मंदी, जिसकी शुरुआत एक अप्रैल, 2021 से होगी;


-हर व्यक्ति के जीवन में आई भारी मुश्किलें, खासतौर से गरीब लोगों के जीवन में, प्रत्येक गांव, पंचायत, कस्बे और शहर में जिनकी औसत संख्या तीस फीसदी है;


-लाखों लोग गरीबी की रेखा के नीचे धकेल दिए गए जो कि बढ़ते कर्ज के बोझ से लदे हुए हैं;


-लाखों ऐसे लोग जिनके रोजगार या आजीविका छिन गईं;


-6.47 करोड़ ऐसे लोग जो श्रम बल से बाहर हो गए; जिनमें से 22.6 फीसदी महिलाएं हैं;


-2.8 करोड़ लोग बेताबी से रोजगार की तलाश में हैं; और


-अनुमान है कि 35 फीसदी एमएसएमई स्थायी रूप से बंद हो गए।


ऊपर बताए गए आर्थिक कारकों के अलावा दो अन्य कठोर तथ्य भी हैंः (1) चीन द्वारा भारत की जमीन पर अवैध कब्जा, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है और (2) स्वास्थ्य संबंधी ढांचे को व्यापक बनाने के लिए भारी निवेश की जरूरत।


एक को छोड़ बाकी में फेल


इसी संदर्भ में मैंने दो 'नॉन निगोशिएबल' (जिस पर समझौता नहीं हो सकता) सूची और एक 'दस बिंदु वाली इच्छा सूची' बनाई थी (देखें, 31 जनवरी, 2021 का इंडियन एक्सप्रेस)। बजट दस्तावेज को देखने और वित्त मंत्री का भाषण पढ़ने के बाद मेरा स्कोर कार्ड इस तरह से है : नॉन निगोशिएबल : 0/2 और इच्छा सूची : 1/10


सूची में से बजट सिर्फ एक बिंदु में पास हुआ और वह है सरकार के पूंजीगत खर्च में वृद्धि (हालांकि इसे बारीकी से देखने की जरूरत है)।


बजट ने देश के सशस्त्र बलों को मायूस किया। वित्त मंत्री ने अपने पौने दो घंटे लंबे भाषण में एक बार भी 'डिफेंस' (रक्षा) शब्द का जिक्र नहीं किया, जो कि अप्रत्याशित था। वर्ष 2021-22 के लिए रक्षा क्षेत्र के लिए मौजूदा साल के पुनरीक्षित अनुमान 3,43, 822 करोड़ रुपये की तुलना में 3,47,088 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। यानी सिर्फ 3,266 करोड़ रुपये की वृद्धि। मुद्रास्फीति का आकलन करें तो अगले वर्ष के लिए आवंटन कम हुआ है।


वित्त मंत्री ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी ऐसी ही चालाकी दिखाई। उन्होंने गर्व के साथ घोषणा की कि इसमें 137 फीसदी की बढ़ोतरी कर इसे 94,452 करोड़ रुपये से बढ़ाकर अगले साल 2,23,846 करोड़ रुपये किया जा रहा है!


हकीकत कुछ घंटे में ही सामने आ गई : बजट एक नजर में (पेज नंबर दस) में बजट के विभाजन ने सही आंकड़े उजागर कर दिए। 2020-21 में पुनरीक्षित अनुमान था, 82,445 करोड़ रुपये और 2021-22 के लिए बजट अनुमान है, 74,602 करोड़ रुपये। बढ़ोतरी तो छोड़िए, आवंटन में कमी की गई है! जादूगर ने आंकड़ों को बड़ा दिखाने के लिए चुपके से इसमें टीकाकरण अभियान के एक बार की लागत, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग का आवंटन और राज्यों को जल एवं स्वच्छता तथा स्वास्थ्य के लिए वित्त आयोग से मिलने वाले अनुदान को भी जोड़ दिया!


दोनों 'नॉन निगोशिएबल' को अलग रख भी दिया जाए, तो वित्त मंत्री के पास अर्थव्यवस्था के निचले पायदान के 20 से 30 फीसदी परिवारों या एमएसएमई और उनके बेरोजगार कर्मचारियों के लिए एक शब्द (धन की बात नहीं) तक नहीं था। उन्होंने दूरसंचार, बिजली, कंस्ट्रक्शन, खनन, उड्डयन और यात्रा, पर्यटन तथा आतिथ्य जैसे बीमार क्षेत्रों के लिए क्षेत्र विशेष पर आधारित प्रोत्साहन की घोषणा नहीं की। उन्होंने जीएसटी दरें भी नहीं घटाई; इसके उलट उन्होंने पेट्रोल और डीजल सहित अनेक उत्पादों पर उपकर लगा दिया, जिससे राज्यों को वित्तीय रूप से झटका लगेगा। पूंजीगत खर्च को छोड़कर उन्होंने लोगों को हर मामले में निराश किया।    


एफआरबीएम को दफन करो, अमीरों को लाभ पहुंचाओ


यहां तक कि पूंजीगत खर्च में भी कुछ भी साहसिक नहीं किया गया है या कल्पनाशीलता दिखाई गई है। 31 मार्च, 2021 तक वित्त मंत्री 10,52,318 करोड़ रुपये अतिरिक्त कर्ज लेंगी, लेकिन अतिरिक्त पूंजीगत खर्च सिर्फ 27,078 करोड़ रुपये ही होगा! 


हम पूंजीगत संपत्तियों के निर्माण के लिए दी गई मदद में अनुदानों को जोड़ सकते हैं, जो कि 23,876 करोड़ रुपये अतिरिक्त है। बाकी का राजस्व 3,80,997 करोड़ रुपये के राजस्व व्यय में वृद्धि, 4,65,773 करोड़ रुपये की राजस्व प्राप्तियों में कमी और 178,000 करोड़ रुपये की विनिवेश आय में कमी के कारण हुआ। वित्त मंत्री के दावे कि उन्होंने सिर्फ खर्च, खर्च और खर्च, किया, के विपरीत 9.5 फीसदी के राजकोषीय घाटे से पता चलता है कि सच यह है कि उन्होंने बजट के अनुरूप कर और गैर कर राजस्व संग्रह नहीं किया। और न ही वह राजस्व खर्च को बजटीय राशि की सीमा में सीमित रख पाईं। उनके पास इस अंतर को पाटने के लिए कर्ज लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।


गरीब, प्रवासी मजदूर और दैनिक वेतन भोगी, छोटे किसान, एमएसएमई के मालिक, बेरोजगार ( और उनके परिवार) और मध्य वर्ग खुद को ठगा महसूस कर रहा है। उन्होंने अपनी हताशा सोशल मीडिया में व्यक्त की है, क्योंकि अखबारों में उनके लिए जगह नहीं बची। एफआरबीएम (वित्तीय दायित्व और बजट प्रबंधन) को दफन करने और अमीरों को लाभ पहुंचाने वाले बजट की दिशा दिखाने के पीछे सोचा-समझा दिमाग तो था, लेकिन इसमें जरा भी संदेह नहीं कि वहां दिल नहीं था।  


सौजन्य - अमर उजाला।

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Sunday, February 7, 2021

'विकास' की आंधी में उजड़ी पंजाब की खेती, हरियाली से दूर हुए किसान (अमर उजाला)

सुरेंद्र बांसल  

पंजाब सदियों से कृषि प्रधान राज्य का गौरव पाता रहा है। यह क्षेत्र अपने प्राकृतिक जलस्रोतों, उपजाऊ भूमि और संजीवनी हवाओं के कारण जाना जाता था। बंटवारे के बाद ढाई दरिया छीने जाने के बावजूद बचे ढाई दरियाओं वाले प्रदेश ने देश के अन्न भंडार को समृद्ध किया है। गुरुवाणी में बीजाई को शुभ कारज (कार्य) के साथ-साथ बुनियादी कारज भी कहा गया है। पंजाब का सारा आर्थिक और सामाजिक इतिहास खेती-किसानी के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। आर्थिक मंदी के दौर में यहां की किसानी भी बनती-बिगड़ती रही है। ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ ऐसे ही आर्थिक संकट से उपजी लहर थी। संकटों के दौर में भी पंजाब के किसानों ने अपनी खेती को मरजीवड़ों की तरह संभाल कर रखा। ऐसे स्वभाव के पीछे श्री गुरुनानक देव जी की वह चेतना भी थी, जिसमें तमाम यात्राओं के बाद करतारपुर में उन्होंने स्वयं खेती की थी। उन्होंने बड़ा संदेश यही दिया कि ‘किरत (कृषि, कर्म) करो,  वंड छको (बांटकर खाओ) और नाम जपो।' उन्होंने कृषि-कर्म और बांटकर खाने को नाम से भी ऊपर रखा। ऐसे रुहानी एहसास के इतिहास के कारण ही पंजाब में सदियों से परमार्थी वातावरण बनता चला गया। पर आज जिस तथाकथित विकास ने गुरु चरणों की रज धूमिल की, उसकी कीमत पंजाब की किसानी को चुकानी पड़ रही है।

किसान संगठन का दावाः 10 हजार जगह हुआ चक्का जाम, कानून वापसी तक जारी रहेगा संघर्ष

पंजाब में पिछले करीब पांच दशक से आर्थिक विकास की आंधी चली है। बदले फसल चक्र की आपाधापी में आए पैसे की हरियाली ने किसानों को दैवी हरियाली से दूर कर दिया। उन्होंने 'हरित क्रांति’ के मामूली से सट्टे में खेती-किसानी के सनातन मूल्य गंवाए और गुरु के बचन भी बिसरा दिए। पंजाब ने पिछले पांच दशकों में कीटनाशकों का इतना अधिक इस्तेमाल किया कि पूरी धरती को ही तंदूर बना डाला है। कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के विशेषज्ञ लिखते हैं कि पंजाब के 40 फीसदी छोटे किसान या तो समाप्त हो चुके हैं या अपने ही बिक चुके खेतों में मजदूरी करने को मजबूर हैं।


पंजाब के 12,644 गांवों में प्रतिवर्ष 10 से 15 परिवार उजड़ रहे हैं। किताबी कृषि पढ़ाने वाले प्रोफेसरों की तनख्वाहें बढ़ती चली गईं और पंजाब के खेतों में फाके का खर-पतवार लगातार उगता चला गया। नए बीज, नई फसलें, अजीबो-गरीब खाद, कीड़े मार दवाएं, भयंकर किस्म का मशीनीकरण और आंखों में धूल झोंकने वाले प्रचार ने किसानों का भविष्य अंधेरी गुफा में झोंक दिया है। पंजाब के अधिकतर गांव मरने की कगार पर हैं। सेहत, शिक्षा, आवाजाही और साफ-सफाई की सुविधाएं भी मात्र शहर और कस्बा केंद्रित कर दी गई हैं।

संयुक्त किसान मोर्चा का बड़ा फैसला, ट्रैक्टर परेड में रूट बदलने वाले दो संगठन निलंबित

लालच पर केंद्रित किसानी के कारण बेहद समृद्ध लोकजीवन भी छिन्न-भिन्न हो चला है। धान कभी पंजाब की फसल नहीं रही। पर पैसे के लालच और दूसरे राज्यों के लिए अधिक से अधिक चावल बेचने के मोह ने किसानी के फसल चक्र को उल्टा चला दिया। धान का उत्पादन इतना बढ़ा कि सड़ने तक लगा। अधिक उत्पादन के कारण चोरी के नए-नए तरीके ईजाद हुए। सरकारी गोदामों में धान की बोरियां सड़ाने के लिए विशेष तौर पर सब्मर्सिबल पंप लगाए गए। इससे शैलर मालिक और अधिकारियों की तिजोरियां भरती गईं, किसान का खीसा फटता गया। दूसरे राज्यों से मजदूरों से भरी गाड़ियां आने लगीं। मेहनती माना जाने वाला किसान अब मेहनत से भी दूर होने लगा। शराब का नशा बेशक पहले से था ही, उसमें अब चिट्टे समेत और भी छोटे-बड़े नशे जुड़ गए हैं। ऐसे में, एड्स, दीगर बीमारियां, लूटमार, छीना-झपटी की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। लोग नशे के लिए भी कर्ज लेने लगे हैं।


भयंकर उत्पादन और पैसे की पहली खेप से सबसिडी, सस्ते कर्ज वगैरह के कारण सब्मर्सिबलों और ट्रैक्टरों की कंपनियां सरकारी शरण लेकर हर शहर में बिछ गईं। देखते ही देखते 12,644 गांवों में 15.5 लाख सब्मर्सिबल धंसा दिए गए। कुछ ही साल में भूजल 20 से 250 फुट नीचे चला गया। इन सब्मर्सिबल पंपों के लिए जहां कुछ बरस पहले पांच हॉर्स पावर की मोटर काम करती थी, वहीं आज 15 से 20 हॉर्स-पावर की मोटर जरूरी हो चली है। सबसे बड़ा नुकसान चरागाहों का समाप्त होना है। बांझ पशुओं से दवाओं के सहारे लिए जाने वाले दूध के कारण महिलाओं में भी बांझपन के मामले सामने आने लगे हैं। पहले शहरीकरण और अब वैश्वीकरण ने पंजाब को काल का ग्रास बनने के कगार पर ला खड़ा किया है। पंजाब दुनिया का पहला राज्य होगा, जहां से ‘कैंसर एक्सप्रेस’ चलती है। जिस राजस्थान के साथ पंजाब पानी का एक घड़ा बांटने को तैयार नहीं, उसी राजस्थान का बीकानेर पंजाब के कैंसर मरीजों को मुफ्त इलाज देता है। बड़े सरकारी अधिकारी और कृषि विशेषज्ञ अब बचे-खुचे पंजाब को भी उजाड़ने की तैयारियों में जुटे हैं। कृषि उत्पादों को विश्व बाजार में ले जाने का एक नया सपना और बोया जा रहा है। पंजाब की बची-खुची उपजाऊ जमीन पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और देशी धन्ना सेठों का हल्ला जारी है। पंजाब की खेती-किसानी आज ऐसी दौड़ में है, जिसमें वह अपनी अगली पीढ़ी लगभग गंवा चुकी है। वहां अनेक गांव ऐसे हैं, जहां मात्र बुजुर्ग बचे हैं। बच्चे सब विदेश जा चुके हैं।


पंजाब के नाम में जुड़े शब्द आब का एक अर्थ पानी है, तो इसका दूसरा गहरा अर्थ है : चमक, इज्जत और आबरू। अगर हमें पंजाब की इज्जत-आबरू फिर से हासिल करनी है, तो प्रकृति के खिलाफ जाने वाले तथाकथित विकास को तिलांजलि देकर गुरुओं, फकीरों के ज्ञान और परंपराओं की थाती को नजीर मानकर उस पर चलना होगा। तभी खेती बचेगी, जवानी बचेगी, किसानी बचेगी और कुल मिलाकर पंजाब बचेगा।


सौजन्य - अमर उजाला।

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Saturday, February 6, 2021

सोशल मीडिया: मुफ्त का मतलब निजता का सौदा नहीं, खुद उत्पाद न बनें (अमर उजाला)

अजय डाटा, को-चेयर, फिक्की आईसीटी  

ऐसे समय जब दिग्गज वैश्विक तकनीकी कंपनियां उपभोक्तावाद के प्रति बहुत कम सम्मान दिखा रही हैं, इस उक्ति का महत्व बढ़ गया है, 'यदि आप उत्पाद के लिए भुगतान नहीं करेंगे, तो आप खुद उत्पाद बन जाएंगे।' तकनीक क्षेत्र के वैश्विक खिलाड़ी उपभोक्ताओं से फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम जैसी सेवाओं के इस्तेमाल के एवज में कोई शुल्क नहीं लेते हैं, बल्कि उपभोक्ताओं को ही उत्पाद बना देते हैं और उनके व्यवहार के रुझानों के आधार पर अपने विज्ञापन कारोबार को बढ़ावा देते हैं। उनकी प्राइवेसी पॉलिसी यानी निजता नीति, ऐसा लगता है कि बेमतलब की हैं, जहां उपभोक्ता से कहा जाता है कि वह उसे स्वीकार करे या फिर उसकी सेवा से वंचित रहे। शुरुआत में उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ाने के लिए ये सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं और फिर पर्याप्त संख्या में उपभोक्ताओं के जुड़ने के बाद निजता नीति को एकतरफा बदल दिया जाता है। हाल ही में व्हाट्सएप ने अपनी निजता नीति में बदलाव करते हुए कहा कि उपभोक्ता से संबंधित सूचनाएं वह अपने समूह की दूसरी कंपनियों के साथ साझा करेगा, जिसे उपभोक्ताओं को मंजूरी देनी होगी, वरना उन्हें वाट्सएप की सेवा से वंचित कर दिया जाएगा। लेकिन भारतीय उपभोक्ताओं के तीखे विरोध के बाद व्हाट्सएप ने इस नीति पर अमल से फरवरी, 2021 से मई, 2021 तक रोक लगा दी। 



यह तो इस तरह का सिर्फ एक उदाहरण है। हम इसे रोज देख रहे हैं। यदि आप किसी लेख या उत्पाद के लिए गूगल करें, तो कुछ सेकंड के भीतर ही गूगल के साथ ही ऐसे अन्य प्लेटफार्म पर आपके सामने उसी तरह के उत्पादों के ढेरों विज्ञापन आने लगते हैं। स्वाभाविक रूप से यह विभिन्न प्लेटफार्म पर ट्रेकिंग या डाटा शेयरिंग का ही रूप है और यह पूरी तरह से निजता पर हमला है तथा बिना पूर्व सूचना या सहमति के पीछा करना या निगरानी करना है। निजता नीति के नाम पर किसी व्यक्ति को सौ पेज का दस्तावेज सौंपना और सारा बोझ उस पर मढ़ देना कि उसने यह नीति स्वीकार की है, सरासर अन्याय है, क्योंकि उपभोक्ताओं में आया, बाई, चौकीदार और ड्राइवर जैसे लोग भी होते हैं, जो शायद इन दस्तावेजों को पढ़ने और समझने में किसी वकील जैसे योग्य न हों। इसे सहमति नहीं कहा जा सकता। व्हाट्सएप के मुताबिक भारत में उपभोक्ताओं के पास फेसबुक या समूह के दूसरे प्लेटफार्म के साथ अपने डाटा साझा करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा। 



हालांकि यूरोप के उपभोक्ताओं के लिए उस एप की डाटा शेयरिंग नीतियों में बदलाव नहीं होगा। ऐसे में बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या भारतीय उपभोक्ताओं की निजता यूरोपीय उपभोक्ताओं की निजता से कम महत्वपूर्ण है। आखिर जब निजता और डाटा के संरक्षण की बात आती है, तो भारतीय उपभोक्ताओं को हलके में क्यों लिया जाता है? भारतीय उपभोक्ताओं को अधिकार है कि उनके साथ उनके वैश्विक समकक्षों जैसा व्यवहार किया जाए और भारत सरकार को चाहिए कि वह ग्लोबल टेक कंपनियों को इस बारे में स्पष्ट संदेश दे। सरकार को चाहिए कि वह डाटा संरक्षण विधेयक के जरिये नागरिकों की सुरक्षा करे या देश की सीमाओं से डाटा बाहर ले जाने वाली टेक कंपनियों के लिए तत्काल कोई निर्देश जारी करे। व्हाट्सएप अब भारत में भुगतान प्रणाली में भी प्रवेश कर रहा है। 


भारतीय उपभोक्ताओं के भुगतान संबंधी डाटा को व्हाट्सएप समूह की दूसरी कंपनियों से लक्षित विज्ञापनों के लिए साझा करना स्पष्ट रूप से नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। एनपीसीआई के दिशा-निर्देशों के मुताबिक जब तक कि कानून द्वारा वांछित न हो या फिर नियामक/वैधानिक प्राधिकार द्वारा मांगा न जाए, किसी भी तीसरे पक्ष के साथ डाटा या सूचना का साझा नहीं किया जा सकता। ऐसे अपवाद मामलों में जहां डाटा/सूचना अनुकूल कानून के तहत साझा करना या किसी नियामक/वैधानिक प्राधिकार के समक्ष प्रस्तुत करना जरूरी हो और ऐसे कानून के तहत संबंधित नियामक/वैधानिक प्राधिकार द्वारा मंजूरी दी गई हो, तब पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर (पीएसपी) को इसके बारे में एनपीसीआई और बैंक को पूर्व लिखित सूचना देनी होगी। इसी के अनुरूप यूपीआई के जरिये भुगतान की सुविधा प्रदान करने वाले एप को एनपीसीआई के दिशा-निर्देशों के मुताबिक किसी तीसरे पक्ष के साथ डाटा साझा करने की अनुमति नहीं है। एनपीसीआई के मुताबिक, पीएसपी बैंक यह सुनिश्चित करेगा कि तीसरे पक्ष के प्रदाता एप को व्यक्तिगत यूपीए लेनदेन डाटा को किसी तीसरे पक्ष के साथ साझा करने के लिए एनपीसीआई और पीएसपी बैंक से विशेष अनुमति लेनी होगी।' 


हालांकि बड़ी तकनीकी कंपनियां अपने विज्ञापन कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए उपभोक्ता की निजता से समझौता करती हैं, जो कि भारतीय उपभोक्ताओं के लिए नुकसानदेह है। भारतीय उपभोक्ताओं के डाटा को किसी को बेचना निजता संबंधी सारे दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है और इसे किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए। मैंने डाटा शेयरिंग के लिए मुफ्त बनाम भुगतान संबंधी कुछ तर्क देखे हैं। दोनों ही मामलों में स्पष्ट रूप से व्यक्तिगत सहमति के बिना डाटा साझा नहीं किया जा सकता। यह उक्ति कि, 'सेवा जब मुफ्त हो तो आप हैं उत्पाद', हमें मजबूर करती है कि हम स्वीकार करें कि यदि कोई चीज हम मुफ्त में इस्तेमाल कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि हमने मुफ्त सेवा प्रदाता को अपनी निजी सूचना के इस्तेमाल की इजाजत दी है। यह एक त्रुटिपूर्ण विचार प्रक्रिया है और यह इस बात का भी उदाहरण है कि हमारे दिमाग को कैसे संचालित किया जाता है। नहाने के लिए यदि नि:शुल्क बाथरूम हो, तो इसका यह मतलब नहीं है कि सेवा प्रदाता को बाथरूम में कैमरा लगाने की छूट मिल गई है। यह सरासर निजता का उल्लंघन होगा। 


जब डाटा और सामग्री को आपकी ओर धकेला जाता है, तब आपके मन में जो विचार पहले से चल रहे होते हैं, वे भी प्रभावित होते हैं, जिसका आपको एहसास तक नहीं होता। आप अपनी पसंद की स्वतंत्रता खो चुके हैं। जरा कल्पना कीजिए कि जब आपको एहसास न हो लेकिन आपका मस्तिष्क किसी खास फिल्म/ सितारे, जाति/धर्म, या किसी खास उत्पाद चाहे वह अच्छा हो या बुरा, के प्रति झुकने लगे। इसे ही मैं निजता और स्वतंत्रता को बेचना कहता हूं। 


सौजन्य - अमर उजाला।

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महामारी के बीच भारत-अफ्रीका, अब नया दृष्टिकोण अपनाने को बाध्य (अमर उजाला)

वेदा वैद्यनाथन  

कोविड-19 महामारी से वैश्विक समुदायों, अर्थव्यवस्थाओं और प्रणालियों को भारी क्षति हुई है, लेकिन भारत पर इसका विशेष रूप से गंभीर प्रभाव पड़ा है। महामारी की प्रकृति और तबाही ने देशों को द्विपक्षीय एवं आत्मनिरीक्षणपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य किया है। वैश्विक व्यवस्था के पारस्परिक संबंधों को देखते हुए यह परखना महत्वपूर्ण है कि स्वास्थ्य लाभ के लिए खासकर अफ्रीकी देशों के साथ भागीदारी कैसे की जा सकती है। हालांकि अफ्रीका वायरस की चपेट में आने वाले अंतिम क्षेत्रों में से था, और 35,000 से ज्यादा मौतों के बावजूद एशिया की तुलना में यहां कम मामले दर्ज किए गए, यहां तक कि यूरोप की तुलना में भी वायरस का प्रसार वहां कम हुआ। 



लेकिन आर्थिक मोर्चे पर यूरोपीय संघ, अमेरिका, चीन और अन्य बाजारों से घटती मांग के चलते आपूर्ति और मांग को झटका लगने के साथ अफ्रीकी देशों के बीच आपसी व्यापार कम होने से यह काफी प्रभावित हुआ। यह विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है कि उप-सहारा अफ्रीका की प्रति व्यक्ति जीडीपी इस साल -5.4 प्रतिशत कम हो सकती है, जो 4.9 करोड़ अफ्रीकियों को गरीबी में धकेलने के साथ पिछले एक दशक की प्रगति को पीछे ले जा सकती है। इसके अलावा पूरे अफ्रीका से तीन करोड़ नौकरियां जा सकती हैं, जबकि नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका और अंगोला जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की वास्तविक जीडीपी के 2023-24 से पहले पटरी पर लौटने की संभावना नहीं है। महामारी ने इस क्षेत्र में सामाजिक कल्याण योजनाओं और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति को भी उजागर किया है, कई देशों में तो दस लाख मरीजों पर मात्र एक अस्पताल, एक डॉक्टर और दस हजार मरीजों पर एक  बेड मौजूद है। 



इसके बावजूद अफ्रीकी नेताओं, अफ्रीकी संघ और अफ्रीका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के बीच सहयोग ने परीक्षण क्षमता में वृद्धि की, संसाधन जुटाए और वायरस का प्रसार रोकने के लिए उपाय किए। हालांकि अफ्रीकी एजेंसियों के पास सामूहिक रूप से संकट से निपटने का केंद्र है, लेकिन अन्य बहुपक्षीय एजेंसियों, संस्थानों एवं खिलाड़ियों ने उनके प्रयासों को मजबूती दी। यहीं पर भारत-अफ्रीकी संबंधों ने हाल के दिनों में गति पकड़ी। नियमित उच्च स्तरीय यात्रा, बढ़ते राजनयिक संबंध, विभिन्न क्षेत्रों में विविध जुड़ाव और जीवंत प्रवासी के कारण द्विपक्षीय संबंध इस अभूतपूर्व संकट के दौरान आकर्षण पैदा कर सकते हैं।


सहयोग की प्राथमिकता का क्षेत्र कोविड-19 राहत और न्यायसंगत वैक्सीन पहुंच में प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करना है, जिसके बाद अफ्रीकी स्वास्थ्य प्रणालियों के व्यापक सुदृढ़ीकरण की योजना होगी। पहले से ही भारत-अफ्रीका स्वास्थ्य सहयोग बहुआयामी व व्यापक है, और इसमें राष्ट्रीय, राज्य और उपनगरीय खिलाड़ी शामिल हैं, जो अफ्रीकी संस्थागत और व्यक्तिगत क्षमताओं को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसमें कम लागत वाली जेनरिक दवाओं का निर्यात करना, स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का निर्माण, सहायता प्रदान करना, तकनीकी सहायता और चिकित्सा पर्यटकों की मेजबानी आदि शामिल है। दुनिया की फार्मेसी के रूप में मशहूर भारत पहले ही हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन एवं अन्य दवाएं 25 से ज्यादा अफ्रीकी देशों को भेज चुका है, यह इस क्षेत्र में कम लागत वाली कोविड-19 टीकों की आपूर्ति में एक महत्वपूर्ण भागीदार बन सकता है। दवाओं की आपूर्ति करने के अलावा भारतीय दवा कंपनियां अफ्रीकी दवा निर्माण क्षमता बढ़ाने में भी भूमिका निभा सकती हैं। इस क्षेत्र के अधिकांश देश बड़े पैमाने पर भारतीय दवा निर्यात पर निर्भर हैं, केन्या और इथियोपिया जैसे देशों में कई भारतीय कंपनियों को निवेश के माहौल ने आकर्षित किया है और उन्होंने स्थानीय कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित किए हैं। पहले से ही इस क्षेत्र में सक्रिय उद्योगों के पास यह अवसर है, जिन्हें पता है कि जटिल पेटेंट कानूनों से कैसे निपटना है, जिनसे उन संगठनों के साथ साझेदारी स्थापित करने में मदद मिलती है। 


वैकल्पिक रूप से भारतीय उद्योगों को इस क्षेत्र में विदेशी निवेशकों को दिए जाने वाले प्रोत्साहन और स्थानीय व्यवसायों के साथ साझेदारी के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन दिए जाने से भी लाभ होगा। दवा निर्माण से अलग कच्चे माल के प्रसंस्करण, पैकेजिंग और आपूर्ति परिवहन जैसे संबद्ध उद्योगों में भी जबर्दस्त अवसर हैं, जिनका भारतीय उद्यमी लाभ उठा सकते हैं। इसके अलावा भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले निजी खिलाड़ियों की पहले ही अफ्रीका में महत्वपूर्ण उपस्थिति है। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में पारिस्थितिकी निर्माण, निवेश बढ़ाने और क्रॉस-कंट्री पार्टनरशिप के उद्देश्य से हेल्थ फेडरेशन ऑफ इंडिया और अफ्रीका हेल्थ फेडरेशन के बीच हाल ही में सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जो स्वास्थ्य में एक मजबूत साझेदारी की व्यापार क्षमता को मान्यता देता है। 


इस क्षेत्र में भारत-अफ्रीका सहयोग को व्यापक बनाने के लिए भारत सरकार सूत्रधार की भूमिका निभा सकती है और वह चिकित्सा पेशेवरों के साथ काम करने वालों का समूह बना सकती है, जो टीके की आपूर्ति से परे महामारी के अनुभव और सीख को साझा करने के लिए अफ्रीकी देशों के समकक्षों के साथ वीडियो या टेली कांफ्रेंस की मेजबानी कर सकती है। ई-आरोग्य भारती परियोजना इस दिशा में एक कदम है। स्वास्थ्य सहयोग छोटे, मध्यम और दीर्घकालिक रूप से महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि दोनों क्षेत्र महामारी के बाद के प्रभाव से उबर रहे हैं। भारतीय खिलाड़ी विश्व स्वास्थ्य संगठन या संयुक्त राष्ट्र जैसे हितधारकों द्वारा अफ्रीका के आरोग्य लाभ के लिए किए जा रहे प्रयासों को आगे बढ़ाने की पहल कर सकते हैं। हालांकि यह तर्क दिया जा सकता है कि कोविड-19 संकट का भारत पर गंभीर प्रभाव पड़ा है और इससे निपटने की घरेलू जिम्मेदारी भी देश के पास है। ऐसे में अफ्रीका के साथ साझेदारी करना भारत-अफ्रीका एकजुटता की समृद्ध ऐतिहासिकता के लिए बड़ी बात होगी। 


(-लेखिका शोधकर्ता हैं और नई दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज में एशिया-अफ्रीका संबंधों की विशेषज्ञ हैं।) 


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चौतरफा घिरते इमरान खान, विपक्ष और जनता कर रही जबर्दस्त विरोध (अमर उजाला)

कुलदीप तलवार  

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को विपक्ष और जनता के जबर्दस्त विरोध का सामना तो करना ही पड़ रहा है, हाल ही में ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड्स ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में घुसकर आतंकवादियों को मारकर अपने दो सैनिकों को जिस तरह मुक्त कराया, उससे दुनिया भर में पाकिस्तान की भारी किरकिरी हो रही है। ईरान द्वारा चलाए गए इस ऑपरेशन में कई पाकिस्तानी सैनिक भी मारे गए हैं, जो आतंकवादियों को सुरक्षा प्रदान कर रहे थे। ईरान द्वारा चलाए गए इस ऑपरेशन से भारत का दावा एक बार फिर सच साबित हुआ है कि पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह देता है। यह उस देश का हाल है, जिसके पास कोरोना वैक्सीन लेने के लिए भी रकम नहीं है। कहीं से कर्ज नहीं मिल रहा। सऊदी अरब जैसे पुराने मित्र ने भी पहले दिया हुआ कर्ज वापस लेने के लिए अल्टीमेटम दे दिया है। चीन ने भी नया कर्ज देने के लिए गारंटी मांगी है। मलयेशिया जैसे दोस्त देश ने भी कर्ज वापस न देने के कारण पाकिस्तान के दो हवाई जहाज जब्त कर लिए हैं। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि सरकार ने 759 एकड़ में फैले इस्लामाबाद के सबसे बड़े पार्क को गिरवी रख दिया है। प्रधानमंत्री इमरान खान इस्राइल से हाथ मिलाने की फिराक में हैं, जिसका विरोध हो रहा है।



सिंध और बलूचिस्तान प्रांतों के अवाम ने पाकिस्तान से अलग होने की मांग करते हुए सरकार-विरोधी प्रदर्शन बढ़ा दिए हैं। सिंधी राष्ट्रवादियों ने हाल ही में सिंधु देश की आजादी की मांग को लेकर एक विशाल रैली निकाली है। प्रदर्शनकारियों ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व विश्व के अन्य नेताओं की फोटो हाथ में लेकर सरकार-विरोधी नारे लगाए और सिंध देश को आजादी दिलाने के लिए भारत से दखल देने की प्रार्थना की। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि सिंधु घाटी सभ्यता वैदिक धर्म का घर है। ब्रिटिश साम्राज्य ने इस पर जबरन कब्जा कर लिया था और बंटवारे के समय इसे इस्लामी हाथों में सौंप दिया था। सिंध देश को आजादी दिलाने की मांग पुरानी है। पिछले कुछ दशकों से पाक सुरक्षा एजेंसियां राष्ट्रवादी नेताओं, कार्यकर्ताओं और छात्रों को प्रताड़ित कर रही हैं। जेई सिंध मुत्ताहिदा के अध्यक्ष गुलाम मुर्तजा के 117 वें जन्मदिन पर इस संस्था के नेता शफी अहमद बरफल ने कहा है कि सिंध की संस्कृति और परंपरा पाकिस्तान से अलग है। लेकिन सिंध राष्ट्रवाद पर पंजाबी राष्ट्रवाद हावी है। सिंध में 70 फीसदी आबादी मुहाजिरों की है। लेकिन उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिला। पाकिस्तान सिंध के द्वीपों पर बंदरगाहों और सामरिक क्षेत्रों को चीन के हवाले करता जा रहा है। सिंधी राष्ट्रवादियों का कहना है कि बांग्लादेश की तरह सिंध भी आजाद होकर रहेगा। 



एक और प्रांत बलूचिस्तान में तो बंटवारे के समय से ही पाकिस्तान से अलग होने की मांग की जा रही है। राष्ट्रवादी बलूचियों का कहना है कि वे कभी पाकिस्तान में शामिल होना नहीं चाहते थे। इसलिए बलूचिस्तान पर पाकिस्तान का नाजायज कब्जा है। हाल ही में वहां अल्पसंख्यक हजारा समुदाय के 11 मजदूरों की सामूहिक हत्या कर दी गई। हाल ही में विश्व स्तर पर बलूच आबादी के अधिकारों की मांग उठाने वाली करीमा बलूच की टोरंटों में संदिग्ध हालत में लाश पाई गई। इसके पीछे भी आईएसआई का हाथ बताया जा रहा है। वहां के प्राकृतिक संसाधनों पर केंद्र सरकार का अधिकार बना हुआ है और चीन इस क्षेत्र को अपनी कॉलोनी बनाता जा रहा है। पिछले एक दशक में बलूचिस्तान में 18,000 से ज्यादा बलोच युवकों की पाक सेना हत्या कर चुकी है। दुनिया जानती है कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत के जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है, जिस पर पाक ने जबर्दस्ती कब्जा कर रखा है। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 व 35ए खत्म करने के बाद वहां के लोग भारत के साथ रहने के लिए बेचैन हैं। पाक सरकार इस क्षेत्र को चीन को सौंप रही है और चीनी लोगों को वहां बसा रही है। पिछले दिनों वहां चीनी सेना द्वारा 33 किलोमीटर लंबी सड़क बनाए जाने का भारी विरोध हुआ। गिलगित-बाल्टिस्तान में भी सरकार-विरोधी प्रदर्शन जारी है।


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Thursday, February 4, 2021

चौरीचौरा विद्रोह के अनुत्तरित सवाल और ब्रिटिश दंभ को ध्वस्त करने का दिन (अमर उजाला)

सुभाष चंद्र कुशवाहा 

भारतीय इतिहास में चार फरवरी 1922 का दिन ब्रिटिश दंभ को ध्वस्त करने के लिए याद किया जाएगा। सौ साल पहले आज के ही दिन चौरीचौरा में हुए विद्रोह ने सत्याग्रह आंदोलन के दूसरे चरण में किसान विद्रोह के क्रांतिकारी पक्ष को उभारा और स्वराज प्राप्ति के लिए चलाए गए मुक्ति संघर्ष के छद्म का पर्दाफाश किया। सत्याग्रह का पहला चरण, बंबई के मजदूर विद्रोह को कलंकित कर समेट लिया गया था, तो दूसरा चरण, चौरी चौरा विद्रोह के माथे पर धब्बा लगा कर। इतिहास में इन विद्रोहों को कलंकित करने वाली शक्तियों के सिद्धांतों से एम.एन. रॉय, देशबंधु चितरंजन दास, सुभाष चंद्र बोस से लेकर भगत सिंह तक का विरोध दर्ज है। ब्रिटिश सत्ता को नेस्तनाबूद करने वाले इस कृत्य को गौरवान्वित करने के बजाय, उपेक्षित किया गया है। इसका कारण भारतीय सामंती समाज के उस वर्गचरित्र में ढूंढा जा सकता है, जहां गरीब किसानों, मुसलमानों और निम्न जातियों का शोषण, उपेक्षा और तिरस्कार किया गया है। 



चौरीचौरा विद्रोह की शुरुआत एक फरवरी 1922 को होती है, जब मुण्डेरा बाजार में स्वयंसेवक भगवान अहीर और उसके दो अन्य साथियों को जागीरदार के इशारे पर चौरा थाने का दरोगा मारता है। स्वयंसेवकों की बैठक उसी दिन शाम को डुमरी खुर्द गांव में होती है। चार फरवरी को अन्य गांवों से स्वयंसेवकों का जुटान होता है तथा एक जुलूस भोपा बाजार होते हुए चौरा थाने को जाता है। आसपास के जमींदारों के कारिंदे जुलूस को रोकने का असफल प्रयास करते हैं। चौकीदारों द्वारा लाठीचार्ज करने और पुलिस द्वारा गोली चलाए जाने से अनेक स्वयंसेवक मारे जाते हैं। इसी प्रतिक्रिया में किसान रेलवे पटरी की गिट्टियों की बौछार करते हैं। जब पुलिस वाले थाना भवन में छिपकर बचने का प्रयास करते हैं, तो आक्रोशित जनता मिट्टी का तेल छिड़कर थाना भवन को जला देती है और 23 पुलिसकर्मी मारे जाते हैं। जुल्मी दरोगा गुप्तेश्वर सिंह भी मारा जाता है, जिसे द लीडर जैसा जमींदारपरस्त अखबार ‘हीरो ऑफ द गोरखपुर’ कहता है। 



स्वयंसेवकों की भीड़ रेलवे लाइन को तोड़ देती है। पोस्ट ऑफिस पर तिरंगा झंडा फहरा कर आजादी का शुभारंभ किया जाता है। उसके बाद ब्रिटिश दमन का दौर शुरू होता है। सेशन कोर्ट, गोरखपुर द्वारा नौ जनवरी, 1923 को 172 किसानों को फांसी की सजा सुनाई जाती है। हाई कोर्ट द्वारा 19 स्वयंसेवकों को फांसी की सजा बहाल रखी जाती है। बाकी को आजीवन से लेकर तीन-तीन साल सजा सुनाई जाती है। आज उस विद्रोह के सौ वर्षों होने को हैं, मगर अभी तक चौरीचौरा के शहीदों को वाजिब सम्मान नहीं मिला है। इस कांड में शामिल ज्यादातर निम्नवर्गीय अनपढ़ और अस्पृश्य समाज के लोग थे। नजर अली, लाल मुहम्मद, भगवान अहीर, अब्दुल्ला, श्यामसुंदर और इन्द्रजीत कोइरी इस विद्रोह के नायकों में थे। फांसी की सजा पाए 19 शहीद परिवारों को कोई खास सहायता नहीं मिली। 1982 के पूर्व तक तो इस विद्रोह को आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं किया गया था। बाद में पेंशन के नाम पर खानापूर्ति हुई। 


देश के इतिहासकारों और प्रबुद्धजनों के सामने चौरीचौरा विद्रोह एक प्रश्न चिह्न बन खड़ा है। 100 साल बाद भी देश की पीढ़ी को गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है। चौरीचौरा ‘शहीद स्मारक’ कहने से स्पष्ट नहीं हो पाता कि इसका तात्पर्य थाने पर आक्रमण करने वाले स्वयंसेवकों के शहीद स्मारक से है या गोली चलाने वाले ब्रिटिश पुलिस के शहीद स्मारक से। दोनों के नाम एक ही हैं। स्वयंसेवकों के शहीद स्मारक के मुख्य द्वार पर एक बड़ा-सा काला ग्रेनाइट पत्थर लगा है, जिसमें डुमरी खुर्द गांव का नाम ही गायब कर दिया गया है, जहां के मुसलमानों, अनूसूचित जाति के लोगों और अहीरों सहित तमाम निम्न जातियों की अगुवाई में चौरीचौरा विद्रोह ने दुनिया में अपना नाम दर्ज कराया। इस स्मारक पर खुदे गलत इतिहास को दर्ज करने की जवाबदेही तय होनी चाहिए, यही शहीदों के प्रति वास्तविक सम्मान होगा। 


(चौरीचौरा विद्रोह और स्वधीनता आंदोलन, पुस्तक के लेखक) 


सौजन्य - अमर उजाला।

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Wednesday, February 3, 2021

एक्सप्रेस प्रदेश बन चुका है उत्तर प्रदेश (अमर उजाला)

दुर्गेश उपाध्याय

 

किसी भी राज्य की तरक्की की पहचान उसके बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर से होती है, जितना बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी होगी, उतने ही बड़े पैमाने पर निवेश आता है और विकास के साथ बड़े पैमाने पर रोजगार के साधन उत्पन्न होते हैं। उत्तर प्रदेश में मौजूदा योगी सरकार द्वारा पूरे प्रदेश में एक्सप्रेस-वे का ऐसा जाल बिछाने का कार्य तीव्र गति से किया जा रहा है, जो प्रदेश की जनता को बेहतरीन सड़कों के अलावा विकास की अपार संभावनाओं से जोड़ देगा। उत्तर प्रदेश में इन दिनों निवेश का जितना बेहतरीन वातावरण उपलब्ध है, उतना शायद ही कभी रहा हो। यही वजह है कि सरकार द्वारा विश्व स्तरीय सुविधाओं से लैस एक्सप्रेस-वे के जरिये यातायात को तीव्र, सुगम और सुलभ बनाए जाने की दिशा में तेजी से काम कराया जा रहा है।



मार्च, 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने से पहले प्रदेश में केवल दो एक्सप्रेस-वे ही मौजूद थे, किंतु पिछले चार वर्षों में विकास की दौड़ में किए जा रहे प्रयास साफ दिखाई दे रहे हैं। इसी वजह से 30 नवंबर, 2020 को देव-दीपावली के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब वाराणसी आए, तो उन्होंने मुख्यमंत्री की तारीफ करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश अब 'एक्सप्रेस-वे प्रदेश' बन चुका है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे बिहार और उत्तर प्रदेश के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में जुड़ने जा रहा है और यह एक्सप्रेस-वे संपूर्ण पूर्वांचल क्षेत्र के विकास की रीढ़ साबित होगा।



यूपीडा (उत्तर प्रदेश एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण) की टीम द्वारा इन दिनों सबसे तेज गति से पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे, गंगा एक्सप्रेस-वे और उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का निर्माण कराया जा रहा है। पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे परियोजना की कुल भौतिक प्रगति 74 प्रतिशत से अधिक पूरी हो चुकी है और युद्ध स्तर पर इन दिनों निर्माण कार्य चल रहा है। न केवल पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, बल्कि बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे में भी तेजी से काम हो रहा है। वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री प्रदेश के निवासियों को पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के रूप में एक बेहतरीन सौगात देने जा रहे हैं। 


इसके अलावा योगी सरकार ने बुंदेलखंड की धरती को विकास का नया केंद्र बिंदु बनाने के लिए पूरी तैयारी कर ली है और तमाम नई योजनाएं शुरू की गई हैं। मुख्यमंत्री के विजन का ही परिणाम था कि वर्ष 2019 के कुंभ मेले के दौरान उन्होंने गंगा एक्सप्रेस-वे के निर्माण की घोषणा की थी। उत्तर प्रदेश के सर्वांगीण विकास हेतु जनपद मेरठ से लेकर जनपद प्रयागराज तक पूर्णतः नियंत्रित गंगा एक्सप्रेस-वे के निर्माण कार्य के लिए भूमि अधिग्रहण का कार्य शीघ्र शुरू होने जा रहा है, इसके लिए कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी है। गंगा एक्सप्रेस-वे के निर्माण कार्य में हजारों की संख्या में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, जो कि प्रदेश की तरक्की को नया आयाम देगा।


कोरोना संक्रमण के दौरान भी न केवल तेजी से एक्सप्रेस-वे का निर्माण कार्य निर्बाध गति से हो रहा है, बल्कि बड़े पैमाने पर प्रवासी मजदूरों को रोजगार भी मुहैया कराया गया है। एक्सप्रेस-वे के निर्माण के दौरान रोजगार प्रदान करने की दृष्टि से भी यूपीडा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उत्तर प्रदेश, एक्सप्रेस-वे के निर्माण की दृष्टि से पूरे देश में नंबर एक प्रदेश हो गया है और इतने बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में रोजगार सृजित हुए हैं। सरकार द्वारा प्रदेश के छह जिलों में चित्रकूट, झांसी, कानपुर, लखनऊ, आगरा और अलीगढ़ में बड़े पैमाने पर जमीन लेकर डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। यूपीडा ने अब तक 45 एमओयू पर हस्ताक्षर कर लिए हैं, जिनसे बड़े स्तर पर निवेश आएगा और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होंगे। इससे बड़े पैमाने पर निवेश की संभावना है और उत्तर प्रदेश रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काफी तेजी से आगे बढ़ेगा।


सौजन्य - अमर उजाला।

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सरकार की बदली हुई सोच का बजट (अमर उजाला)

अजय बग्गा 

अब तक जो बजट पेश किए जाते थे, उनमें विकास की तरफ अग्रसर होने की तुलना में रेटिंग एजेंसी, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दबाव में राजकोषीय घाटे और उधार को नियंत्रित रखने को ज्यादा अहमियत दी जाती थी। पहली बार बजट में काफी पारदर्शिता के साथ कहा गया है कि हमने कोविड महामारी की वजह से 9.5 फीसदी का राजकोषीय घाटा रखा है, हमारे पास आय केवल 23 लाख करोड़ थी, लेकिन हम 34 लाख करोड़ खर्च कर रहे हैं और आगे हम और खर्च करेंगे। अगले वर्ष भी 6.8 फीसदी का राजकोषीय घाटा रखेंगे और हम विकास को तवज्जो दे रहे हैं। अर्थव्यवस्था में जब हम पैसा डालते हैं, तो उसका प्रभाव अर्थव्यवस्था में कई गुना होता है। यदि आप सौ रुपये सड़क निर्माण पर खर्च करते हैं, तो अर्थव्यवस्था में 800 रुपये का असर दिखता है। सरकार ने कहा है कि हम साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये सड़कें, पुल, रेलवे जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण पर खर्च करेंगे। यह एक बहुत बड़ी सकारात्मक पहल है, क्योंकि इससे जीडीपी पर छह से आठ गुना असर पड़ेगा। यह एक बड़ा वित्तीय प्रोत्साहन है। रिजर्व बैंक की तरफ से मौद्रिक प्रोत्साहन तो दिया ही जा रहा था, बजट के जरिये बाजार और अर्थव्यवस्था को और प्रोत्साहन दिया गया है। 

दुनिया भर में वित्तीय प्रोत्साहन दिया जा रहा था। पिछले साल सरकार ने गरीबों के खाते में पैसे डाले और उन्हें अन्न दिया, लेकिन प्रोत्साहन के तौर पर कुछ खास नहीं किया गया था। बजट में सरकार ने कंजूसी नहीं दिखाई है, बल्कि विकास को तेजी देने के लिए खर्च करने पर जोर दिया है। इसके जरिये सरकार ने यह संदेश देना चाहा है कि हम उद्योग और अर्थव्यवस्था में तेजी के पक्षधर हैं और विकास लाएंगे। इसलिए शेयर बाजार ने भी इसका स्वागत किया। पहले बाजार को इस बात का डर था कि सरकार राजस्व कहां से जुटाएगी। सरकार ने टैक्स में कोई बढ़ोतरी नहीं की, जो स्वागत योग्य है। यह भी भय था कि वित्तीय स्थिति संभालने के लिए कोविड शेष थोपा जाएगा, या शेयर बाजार में टैक्स लगाया जाएगा। लेकिन मध्यवर्ग या उपभोक्ताओं पर बोझ डालने के बजाय सरकार ने कहा कि हम बाजार में जाकर पैसा उधार लेंगे। यह भी एक अच्छी बात है।



स्वास्थ्य क्षेत्र में, खाद्य सामग्री में खर्चा बढ़ाने की भी बात की गई। बैंकिंग क्षेत्र में जो खराब कर्जों की समस्या है, उसके लिए घोषणा की गई कि एक संस्था बनेगी, जो इन बैंकों से खराब कर्जे ले लेगी और उसका समाधान निकालेगी। इससे बैंक की बैलेंस शीट से वे कर्ज हट जाएंगे और बैंक को फिर सकारात्मक चीजों पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिलेगा। फिर किफायती आवास, तरह-तरह के सुधारात्मक उपाय, टेक्सटाइल पार्क आदि की भी घोषणा की गई। इस बार मध्य वर्ग के लिए कोई खास राहत की घोषणा नहीं की गई है। आयकर अधिनियम में पारदर्शिता लाने और उसे आसान बनाने की बात जरूर की गई है। मसलन, 75 वर्ष के वरिष्ठ नागरिकों को रिटर्न नहीं भरना पड़ेगा, फेसलेस एसेसमेंट और अगर आयकर विभाग से पचास लाख रुपये से कम की रकम का विवाद चल रहा है, तो आयकर के मामले नहीं खोले जाएंगे।


लगता है कि इस बार के बजट को केवल किसी अकाउंटेंट ने तैयार नहीं किया है। इसमें सरकार की बदली हुई सोच दिख रही है कि जब दुनिया भर में नोट छापके अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने और बचाने की कोशिश हो रही है, तो हम क्यों नहीं। इससे रोजगार बढ़ेगा, उपभोग बढ़ेगा और समग्र रूप से अर्थव्यवस्था के विकास का माहौल बनेगा। बाजार ने इसलिए इसका जोर-शोर से स्वागत किया।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Tuesday, February 2, 2021

Budget 2021: ढांचागत विकास और निवेश पर जोर (अमर उजाला)

सी एम वासुदेव  

कई तरह की चुनौतियों के बीच वित्तीय वर्ष 2021-22 का केंद्रीय बजट पेश किया गया है। इनमें तीन चुनौतियां  प्रमुख हैं। पहली है अर्थव्यवस्था में मंदी, दूसरी कोविड के अर्थव्यवस्था पर कुप्रभाव से और तीसरी है व्यापक आर्थिक संतुलन बनाए रखना। इन सभी चुनौतियों से निपटने के लिए वित्तमंत्री ने बजट में सार्थक प्रस्ताव रखे हैं। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट को हम यहां इस प्रकार समझ सकते हैं-

ढांचागत विकास को बढ़ावा देने के लिए इस बार के बजट में कई प्रकार के निवेश प्रस्ताव प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें हाई-वे, रेलवे, बंदरगाह इत्यादि में सरकारी व निजी निवेश करने के प्रस्ताव हैं। बजट में सामाजिक बुनियादी ढांचा, जिसमें स्वास्थ्य व शिक्षा सम्मिलित है, की ओर विशेष ध्यान दिया गया है और इन क्षेत्रों में, निवेश की सीमा बढ़ाई है।

आर्थिक क्षेत्र को मजबूत करने के लिए बजट में कई प्रस्ताव दिए गए हैं। इनमें बैंकों के नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए), जो कोविड की वजह से काफी बढ़ गए हैं, उससे निपटने के लिए विशेष प्रयास किए जाएंगे। इसके साथ ही दो सरकारी बैंकों का निजीकरण भी प्रस्तावित है, जिससे इन बैंकों के संचालन में दक्षता आएगी। वहीं बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा को 49 फीसदी से बढ़ाकर 74 फीसदी कर दिया गया है।

राजकोषीय घाटा इस वर्ष जीडीपी का 9.5 फीसदी होने का अनुमान है, और अनुमानों के अनुसार अगले वर्ष यह घाटा 6.8 फीसदी होना अनुमानित है। इससे यह लगता है कि वित्तमंत्री ने विकास की गति तेज करने के लिए राजकोषीय घाटे में ढील देना आवश्यक समझा है। इसका मुद्रास्फीति पर क्या प्रभाव होगा यह देखने वाली बात है।

कृषि क्षेत्र में भी इस बजट में कई प्रस्ताव रखे गए हैं, जिनमें किसानों की आमदनी दुगुनी करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई गई है। एमएसपी चालू रखने के लिए सार्थक प्रयास दोहराए गए हैं। कृषि मंडियों का सुधार और उनके माध्यम से कृषि क्षेत्र के ढांचे में निवेश के लिए कृषि मंडियों के माध्यम से वित्तीय संसाधन जुटाए जाएंगे। पेट्रोल और डीजल पर कृषि सेस लगाने का प्रस्ताव है। हालांकि आम आदमी पर अभी कोई इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। 

जहां तक सरकार के संसाधन जुटाने का प्रश्न है, इस बजट में कोई नए कर प्रस्तावित नहीं किए गए हैं। सरकारी उपक्रम आैर संपत्ति के विनिवेश के माध्यम से लगभग 1.70 लाख करोड़ रुपये जुटाने का प्रस्ताव है। कुछ क्षेत्र में कस्टम ड्यूटी बढ़ाने व कम करने के प्रस्ताव इस बजट में हैं, जिनसे छोटे व मध्य श्रेणी के उद्योंगों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। आयकर व

जीएसटी में सरलीकरण के कई प्रस्ताव इस बजट में हैं।  साथ ही पहली बार पूरे देश में एक डिजिटल जनगणना की घोषणा की गई है, जिससे अर्थव्यवस्था में डिजिटल भुगतान को सुदृढ़ किया जा सकेगा।

स्वास्थ्य बजट में 137 फीसदी की बढ़ोतरी की है, इसके बावजूद पूरे देश में हर व्यक्ति को कोविड वैक्सीन उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए बजट में 35,000 करोड़ का प्रावधान रखा गया है, जो संभवत: हर व्यक्ति को सरकारी खर्च पर वैक्सीन लगाने के लिए पर्याप्त न हो। मेरे विचार में प्रत्येक व्यक्ति को वैक्सीन उपलब्ध कराना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक धनराशि जुटानी चाहिए, क्योंकि देश में यदि कामगार स्वस्थ्य और गतिशील होंगे, तो देश के आर्थिक विकास में और तेजी आएगी। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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वैश्विक महामारी की पृष्ठभूमि में बड़े बदलाव लाने वाला बजट (अमर उजाला)

मोहनदास पई एवं निशा होला 

वर्ष 2021-22 के बजट को वैश्विक महामारी की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए हो रहे अप्रत्याशित खर्च की भरपाई के साथ-साथ अगले वित्त वर्ष में मितव्ययिता उपायों के जरिये राजकोषीय घाटे को तेजी से कम करने के लिए कर लगाए जाने की आशंका थी। शुक्र है कि ऐसा नहीं हुआ। देश के स्वास्थ्य एवं बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाते हुए और कोविड-19 के नकारात्मक असर से निकलने के लिए विकासोन्मुखी बजट की जरूरत थी और यह बजट इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। 



सबसे बड़ी बात है कि सरकार स्वास्थ्य एवं बुनियादी ढांचों पर खर्च करने की एक विस्तारवादी विकास नीति बना रही है। इसने वित्त वर्ष 2021 में  9.5 फीसदी के राजकोषीय घाटे का आकलन किया है, जिसमें बजट सब्सिडी भी शामिल है। पिछले बजट में 2.28 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी की तुलना में इस बार के बजट में सब्सिडी के मोर्चे पर 5.95 लाख करोड़ रुपये हैं, जिनमें 4.2 लाख करोड़ रुपये की खाद्य सब्सिडी और 1.3 लाख करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी है। बजट में इतनी भारी-भरकम सब्सिडी का प्रावधान रखने से राजकोषीय घाटे का इस सीमा तक पहुंचना स्वाभाविक है। इस राजकोषीय घाटे को वित्त वर्ष 2022 में खत्म करने का लक्ष्य है, जब सब्सिडी को घटाकर 3.35 लाख करोड़ रुपये किया जाएगा, जिसमें खाद्य सब्सिडी 2.4 लाख करोड़ रुपये और उर्वरक सब्सिडी 79,000 करोड़ रुपये शामिल होंगे। राष्ट्रीय लघु बचत कोष को भी सीधे बजट में लाया गया है, भारतीय खाद्य निगम एनएसएफ से उधार नहीं लेगा। 18.5 लाख करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे (वित्त वर्ष 2021 के 194.8 लाख करोड़ रुपये के जीडीपी का 9.5 फीसदी) के साथ उम्मीद है कि सरकार अपने वित्तपोषण को साफ करेगी, वर्ष के सभी खर्च पूरे करेगी और इस असाधारण साल को पीछे छोड़ देगी। कम उधार के साथ 2022 में रोजकोषीय घाटे को कम कर 6.8 फीसदी तक लाने का लक्ष्य है।



कोविड के लिए 35,000 करोड़ आवंटन के साथ इस वर्ष स्वास्थ्य पर खर्च में 137 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है, जो स्वागतयोग्य है। वैश्विक अर्थव्यवस्था से होड़ करने  और विकास के लिए भारत को वैश्विक स्तर के बुनियादी ढांचों की जरूरत है। सार्वजनिक व्यय यहां विकास का सबसे बड़ा प्रेरक है और सरकार ने इस बजट में इसे गति देने पर ध्यान केंद्रित किया है। 

राजमार्गों और हवाई अड्डों जैसी मौजूदा परिसंपत्तियों का मौद्रीकरण करके, उसे बेचकर बीस हजार करोड़ रुपये की लागत से एक विकास वित्तीय संस्थान शुरू कर परियोजनाओं के लिए पांच लाख करोड़ जुटाने का अभिनव तरीका निकाला है। 


इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च को 4.39 लाख करोड़ से बढ़ाकर 5.4 लाख करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव रखा गया है। 13 प्रमुख उद्योग क्षेत्रों के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना का विस्तार करना और कई वस्तुओं के लिए सीमा शुल्क बढ़ाना स्वदेशी विनिर्माण को प्रोत्साहित करेगा। मेट्रो और बसों जैसे सार्वजनिक परिवहन विकल्पों की क्षमता में सुधार से विकास में योगदान  होगा। बिजली उत्पादन एवं ट्रांसमिशन में पिछले कुछ वर्षों में सुधार हुआ है, लेकिन वितरण अब भी उचित कीमत के अभाव, बर्बादी और लूट से पीड़ित है। डिस्कॉम निवेश और उन्नयन के लिए तीन लाख करोड़ रुपये के भारी परिव्यय के साथ उपभोक्ताओं के लिए प्रतिस्पर्धात्मक विकल्प पैदा करने पर ध्यान केंद्रित करने से कीमत में हेरफेर रोकने में मदद मिलेगी और नागरिकों की बिजली तक पहुंच बेहतर होगी।


एमएसपी के माध्यम से किसानों को मिलने वाले लाभ की मात्रा के साथ पेश किया गया आंकड़ा दिलचस्प है और इसे सार्वजनिक डाटाबेस पर एकत्र किया जाना चाहिए। किसानों को खाद्य, बिजली, उर्वरक, पानी, प्रत्यक्ष धन हस्तांतरण और अन्य सहित कुल केंद्रीय और राज्य सब्सिडी 7.5 लाख करोड़ से अधिक है; यह एक बड़ी राशि है, जिस पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए। इसकी एक बड़ी राशि करदाताओं की कीमत पर संभवतः बड़े किसानों को दी जाती है, जिसे संतुलित किए जाने की जरूरत है। निजी क्षेत्र द्वारा प्रबंधित उच्च शिक्षा विश्वविद्यालयों के प्रस्तावित क्लस्टरिंग के अलावा, विशेष रूप से राष्ट्रीय शैक्षिक नीति-2020 के मद्देनजर शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। पांच वर्षों में राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन पर 50,000 करोड़ रुपये का परिव्यय एक स्वागत योग्य कदम है, जो चीन एवं अमेरिका के बरक्स भारत में नवाचार को बेहतर बनाने में योगदान देगा। डिजिटल पेमेंट, देसी भाषाओं, अंतरिक्ष और महासागरों पर फोकस अच्छा है, और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के साथ इसे संवर्धित किया जा सकता है। इसका लाभ केवल सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि निजी क्षेत्र को इसमें शामिल करना चाहिए।


सरकार कर सुधारों के बारे में गंभीर है और इलेक्ट्रॉनिक निष्पादन के अलावा अधिकरणों की स्थापना करके डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये स्कैलेबिलिटी (मापनीयता) का लाभ उठा रही है। करदाता मध्यवर्ग के लिए विशेष रूप से कोविड-19 और पिछले वर्ष के सात स्लैब के टैक्स ढांचे को ध्यान में रखते हुए टैक्स ढांचे को सरल बनाना स्वागत योग्य कदम है। कुल मिलाकर कोविड-19 की पृष्ठभूमि को देखते हुए यह बजट दस में से 9.5 अंक का हकदार है। सबसे बड़ी राहत की बात है कि इसमें कोई नया कर या उपकर नहीं लगाया गया है। सरकार ने यह समझा है कि एक बुरे वर्ष में नागरिकों पर गलत तरीके से कर नहीं लगाया जा सकता है। उद्यमियों का उत्साह फिर से उभरेगा।


हालांकि स्टार्ट अप को समर्थन का अभाव निराश करता है, लेकिन अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर बढ़ता खर्च, स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा, कर सुधार और वित्तीय क्षेत्रों में सुधार स्वागत योग्य कदम हैं और पचास खरब की अर्थव्यवस्था बनने की भारत की आकांक्षा की दिशा में हैं। 


(-टीवी मोहनदास पई एरियन कैपिटल के चेयरमैन एवं निशा होला ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विजिटिंग फेलो हैं।)

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Monday, February 1, 2021

किस दिशा में नेपाल: क्या यह भुलावे का दौर है या बेहतर भविष्य का सूचक (अमर उजाला)

महेंद्र वेद  

ऐसा शायद ही कभी होता हो कि सरकार के पूर्ण बहुमत में होने के बावजूद संसद को भंग कर दिया जाए, सत्तारूढ़ पार्टी विभाजित हो जाए और प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर दिया जाए! और इस घटनाक्रम की भी भला किस तरह व्याख्या करेंगे कि केपी शर्मा ओली जैसे कट्टर कम्युनिस्ट और नेपाल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री पशुपतिनाथ मंदिर में जाकर विशेष पूजा करें? हालांकि दक्षिण एशिया में कम्युनिस्टों का धर्मस्थलों में जाना कोई अजूबा नहीं है, लेकिन ओली, जिन्होंने वर्षों पहले नेपाल में राजतंत्र खत्म करने के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी, पिछले दिनों पहली बार मंदिर में पूजा करने गए। यही नहीं, हाल ही में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अपने धड़े के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ओली ने कहा कि भगवान राम के जन्मस्थान में मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है।

ओली का इशारा बीरगंज के पास स्थित एक जगह से था, जिसे वह पहले भी असली अयोध्या बता चुके हैं। इस संदर्भ में यह याद रखना चाहिए कि मनमोहन अधिकारी, माधव कुमार नेपाल, पुष्प कमल दहल, बाबूराम भट्टराई और झालानाथ खनाल जैसे पूर्व कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री कभी मंदिरों में नहीं गए, न ही उन्होंने ईश्वर के नाम पर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।


ऐसे में, ओली के मंदिर जाने की घटना ने इस अनुमान को बल दिया है कि वह सत्ता के लिए हिंदुत्ववादी और राजतंत्र समर्थक समूहों का समर्थन हासिल करना चाहते हैं, जो पिछले काफी समय से हाशिये पर हैं। राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी ऐसी ही एक पार्टी है। ओली के प्रथम प्रधानमंत्री काल में यानी अगस्त, 2015 से अक्तूबर, 2016 तक इस पार्टी का मात्र एक सदस्य संसद में था। पार्टी नेता कमल थापा उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री थे। नेपाल में हिंदू बहुसंख्यक हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई माओवादी नेता राजशाही को पुनर्जीवित करने का खतरा उठा सकता है। जो लोग नेपाल में लोकतांत्रिक प्रयोग की विफलता से चिंतित हैं, उनसे पूछना चाहिए कि क्या यह भुलावे का दौर है या यह संकट  बेहतर भविष्य का सूचक है।


नेपाल में इन दिनों ऐसी अनेक घटनाएं घट रही हैं, जिनकी फौरी व्याख्या संभव नहीं है। इनमें से कुछ घटनाओं पर टिप्पणी की जा सकती है, तो कुछ घटनाएं स्वतःविरोधी हैं। इस हिमालयी राष्ट्र ने कोरोना महामारी और भारत व चीन जैसे दो बड़े पड़ोसियों के साथ कूटनीतिक रिश्तों के उतार-चढ़ाव के बीच अभूतपूर्व राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया है। पुष्प कमल दहल प्रचंड और ओली की पार्टियों में गठजोड़ होने के नतीजतन 2018 में कम्युनिस्ट सत्ता में आए। दोनों पार्टियों के गठजोड़ में चीन ने तब बड़ी भूमिका निभाई थी। प्रचंड और ओली में तब इस पर सहमति बनी थी कि वे बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन ओली प्रधानमंत्री पद छोड़ना नहीं चाहते थे, इसलिए बैठक बुलाए जाने के प्रस्तावों को वह जान-बूझकर लगातार टालते रहे। राजतंत्र की समाप्ति के बाद से ही राजनीतिक पार्टियों की उठा-पटक के बावजूद सत्तारूढ़ एनसीपी में टूट नेपाल में राजनीतिक व्यवस्था के क्रमागत क्षरण के बारे में बताती है।


स्थिति हाथ से निकलती देख ओली ने संसद को भंग करने की सिफारिश कर दी। सर्वोच्च न्यायालय में उनके इस फैसले को चुनौती दी गई, हालांकि फैसला आने में लंबा समय लग सकता है और चुनाव उसके बाद ही संभव है। वैसे तो ओली ने 30 अप्रैल से 10 मई के बीच चुनाव कराने का संकेत दिया है, लेकिन इस मामले में ओली पर पूरी तरह भरोसा शायद ही किया जा सकता है। सत्तारूढ़ पार्टी में टूट और खुद ओली के निष्कासन से जहां उनके द्वारा अपनी पार्टी सीपीएन (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) को फिर से खड़ा करने की

बात कही जा रही है, वहीं सड़कों पर हिंसा की आशंका भी जताई जा रही है। संसद भंग कर देने के बाद से वहां चीजें तेजी से बदली हैं। प्रचंड का आरोप है कि ओली ने भारत के कहने पर इन घटनाओं को अंजाम दिया है और भारत अपने हित में नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता चाहता है। अब ओली भारत समर्थक दिखना चाहते हैं।


विवादास्पद नक्शा वापस ले लिया गया है। विगत 15 जनवरी को नई दिल्ली में हुई भारत-नेपाल संयुक्त आयोग की बैठक में नेपाल के सुर भी अलग थे। नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली ने कहा कि उनकी सरकार किसी विदेशी शक्ति के चंगुल में नहीं है। यही नहीं, महामारी के खिलाफ चीनी टीके के बजाय उन्होंने भारतीय टीके को तरजीह दी। इसकी एक वजह यह भी है कि चीनी वैक्सीन अभी तैयार नहीं हैं। नई दिल्ली ने टीके का एक लाख डोज नेपाल को भेजा, जिस पर प्रधानमंत्री ओली ने भारतीय प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा किया। जबकि यही ओली सत्ता में आने के बाद लगातार भारत-विरोधी रुख अपनाए हुए थे। उन्होंने यह तक आरोप लगाया था कि भारत उन्हें सत्ता से बाहर करना चाहता है। कोविड-19 के कारण करीब दस महीने से बंद भारत-नेपाल सीमा को भी नेपाल सरकार ने पिछले सप्ताह खोल दिया, जिससे आवाजाही के साथ पर्यटन की बहाली की उम्मीद बढ़ी है।


फिलहाल भारत-विरोध की हवा खत्म होने के बाद नेपाल में अब चुनाव का माहौल है। यह देखना होगा कि कौन किसके साथ गठजोड़ करता है। पिछली बार ओली ने माओवादियों के साथ गठजोड़ करने में जल्दी दिखाई थी, क्योंकि उन्हें डर था कि ढिलाई बरतने पर नेपाली कांग्रेस का माओवादियों से गठजोड़ हो जाएगा। इन दिनों चर्चा है कि ओली नेपाली कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर सत्ता में बने रहने के बारे में सोच रहे हैं। काठमांडू से आ रही रिपोर्टें बताती हैं कि नेपाल की राजनीति में महत्वपू्र्ण भूमिका निभाने वाली नेपाली सेना आने वाले चुनाव में तटस्थ रहेगी।


हालांकि यह देखना होगा कि वह आनेवाले दिनों में सरकार-विरोधी प्रदर्शनों को तितर-बितर करने का ओली का अनुरोध मानती है या नहीं। कोविड-19 के कारण पर्यटन क्षेत्र के पूरी तरह बंद रहने के बाद, जो नेपाल की आय का एक बड़ा स्रोत है, आने वाली गर्मी में चुनाव के कारण नेपाल में राजनीतिक सरगर्मी तेज रहने की स्वाभाविक ही उम्मीद की जानी चाहिए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Saturday, January 23, 2021

लोन एप्स हैं डिजिटल मगरमच्छ, गोरखधंधे में चीनी गिरोह का हाथ (अमर उजाला)

विराग गुप्ता  

ट्रंप और चीन के कारनामों से यह साफ है कि जंग और राजनीति में सब कुछ जायज होता है। रुखसत होने से कुछ ही दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कोरोना के वैश्विक विस्तार के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराते हुए, संयुक्त राष्ट्र यानी यूएन से सख्त कार्रवाई की मांग की थी। ट्रंप के दावों की पुष्टि होना मुश्किल है, लेकिन यह बात निश्चित है कि कोरोना से उपजी


त्रासदी में चीनी गिद्ध सबसे बड़ा सुपर पावर बनने के लिए बेताब है। महामारी से भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई, जिसका असंगठित क्षेत्र और गरीबों को सबसे ज्यादा खामियाजा उठाना पड़ा। कोरोना काल में रोजगार और व्यापार खोने वाले आपदाग्रस्त लोगों की मदद के नाम पर, हजारों डिजिटल एप ने लाखों लोगों का सुख-चैन छीन लिया है। तेलंगाना पुलिस की शुरुआती जांच के अनुसार, लोन एप के गोरखधंधे में चीनियों का भी गिरोह काम कर रहा है।



लॉकडाउन के अंधेरे में पनपे इस कारोबार को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला डिजिटल लोन एप्स। देश में 100 करोड़ से ज्यादा मोबाइल हैं, जिनमें लोग फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे एप्स चलाते हैं। गूगल और एपल के प्लेटफॉर्म पर इस समय लगभग 47 लाख एप्स से हर तरह के कारोबार हो रहे हैं। एप्स और वेबसाइट आदि के लिए वर्ष 2000 में आईटी कानून बनने के बावजूद भारत में इनके रजिस्ट्रेशन, नियमन और टैक्सेशन के लिए अभी तक कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं बनी। देश में गरीबों की मदद के लिए हजारों योजनाएं चल रही हैं, लेकिन जरूरतमंदों को समय पर लोन देने के लिए शायद ही कोई बैंक आगे आता है, इसलिए बगैर कागज-पत्तर के झटपट लोन देने वाले इन एप्स का कारोबार खूब चल निकला। लोन एप्स ने ग्रामीण क्षेत्रों में कारोबार और वसूली के लिए पुणे, बंगलूरू, नोएडा, हैदराबाद और चेन्नई जैसे आईटी हब्स में अपने कॉल सेंटर खोल रखे हैं।


पूरे देश में चल रहे इस कारोबार का खुलासा तेलंगाना पुलिस ने किया। सिर्फ एक राज्य की पुलिस की जांच में लगभग 1.4 करोड़ लेन-देनों से 21 हजार करोड़ के कारोबार का खुलासा हो चुका है। लोन घोटाले की भारी रकम चीन और दूसरे देशों में ट्रांसफर होने के सबूत आने पर केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी आपराधिक मामला दर्ज कर लिया। इस घोटाले का दूसरा पक्ष वे पीड़ित और गरीब लोग हैं, जो इन लोन एप्स के शिकंजे में फंस कर बर्बाद हो गए। भारत में लगभग 80 करोड़ लोगों को कोरोना काल में सरकारी भोजन और अनाज की मदद मिली। उनमें से करोड़ों जरूरतमंदों ने बीमारी, पढ़ाई, शादी आदि के लिए नए जमाने के इन डिजिटल साहूकारों से भारी ब्याज दर पर छोटे-छोटे लोन ले लिए। बगैर वैध समझौते के हुए लोन के एवज में लाचार लोगों ने अपने मोबाइल डाटा और आधार आदि का विवरण इन सूदखोर कंपनियों के हवाले गिरवी रख दिया।


लोन के मूलधन के भुगतान के बावजूद भारी ब्याज को वापस करने में जब लोग फेल हो गए, तो इन कंपनियों ने ब्लैकमैलिंग के हथकंडे से कर्जदारों को पीड़ित करना शुरू कर दिया। लोन की रकम न चुका पाने के कारण ये एप लोन लेने वाले शख्स को धमकाने के साथ उसके रिश्तेदारों और जानकारों को फोन करके बदनाम करने लगे। फोटो के साथ छेड़खानी करके व्हाट्सएप में दुष्प्रचार, धमकी वाले कॉल और फर्जी कानूनी नोटिस भी कर्जदारों और उनके परिचितों को भेजी गईं। इन कंपनियों से लोन लेने वाले लोग कमजोर और गरीब वर्गों से आते हैं, जो इन डिजिटल प्लेटफॉर्म के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने से घबराते हैं। इसके अलावा छोटे कस्बों और शहरों में पुलिस का साइबर सेल भी नहीं होता। कुछ हजार लोन लेने वाले पीड़ित लोग राहत के लिए थकाऊ और महंगी अदालती व्यवस्था के पास भी नहीं जा पाए और कई ने प्रताड़ना से ऊब कर अपनी जान दे दी।


मनी लेंडिंग कानून के तहत राज्यों में लोन का कारोबार करने के लिए अलग-अलग नियम हैं, लेकिन रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार, बैंक और एनबीएफसी कंपनियां ही लोन का कारोबार कर सकती हैं। लोन एप्स का मर्ज जब पूरे देश में बढ़ गया, तो फिनटेक कंपनियों और ऑनलाइन लोन के कारोबार को नियमबद्ध करने के लिए रिजर्व बैंक ने एक समिति बना दी। लेकिन रिजर्व बैंक ने पिछले साल 24 जून, 2020 को जो आदेश जारी किया था, उस पर ही यदि ढंग से अमल किया जाए, तो लोन एप्स के डिजिटल गिरोह की कमर तोड़ी जा सकती है। रिजर्व बैंक के आदेश से साफ है कि डाटा के दुरुपयोग और कर्ज वसूली के लिए लोन एप्स द्वारा की जा रही डिजिटल पहलवानी गैर-कानूनी है। इस आदेश से यह भी स्पष्ट है कि बैंकों और एनबीएफसी कंपनियों की वेबसाइट में सभी डिजिटल लोन एप्स का पूरा विवरण हो, जिससे किसी भी गलत काम के लिए उन्हें भी जवाबदेह बनाया जा सके। रिजर्व बैंक के अनुसार, कर्ज देते समय ग्राहकों को लिखित स्वीकृति पत्र देना जरूरी है, जिसमें कानूनी सीमा के भीतर ब्याज दरों के विवरण के साथ बैंक और एनबीएफसी कंपनी का पूरा खुलासा जरूरी है। 


भारत में एप्स के माध्यम से लोन देने वाले ऑपरेटर्स अधिकांशतः गैरकानूनी तरीके से कारोबार कर रहे हैं और लोन वसूली के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हथकंडे तो पूरी तरह से आपराधिक हैं। इस मसले पर देशव्यापी गुस्सा बढ़ने के बाद गूगल ने अपने प्लेटफार्म से कुछ लोन एप्स को हटा दिया। लेकिन डिजिटल एप्स तो रक्त बीज की तरह व्यापक हैं, जो लोगों को ठगने के लिए मारीच की तरह रूप भी बदल लेते हैं। गूगल और एपल के प्ले स्टोर से बिक रहे इन एप्स की डेवलपर पॉलिसी में बैंक और एनबीएफसी कंपनियों का पूरा खुलासा नहीं होने से पूरी गफलत हो रही है।


गूगल और एपल प्ले स्टोर के माध्यम से भारत में कारोबार कर रहे हर लोन एप में रिजर्व बैंक की अनुमति प्राप्त बैंक और कंपनियों का पूरा विवरण आ जाए, तो ठगी करने वाले एप्स बेनकाब हो जाएंगे। इसलिए रिजर्व बैंक के नियमों को लागू करने के लिए गूगल और एपल जैसी बड़ी कंपनियों पर सरकार को दबाव बनाना होगा, तभी लोन एप्स के मगरमच्छों से आम जनता को मुक्ति मिलेगी।

सौजन्य - अमर उजाला।

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