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'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल', धर्म और कानून का अद्भुत संगम

विराग गुप्ता



संविधान के संरक्षक के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के 13 जजों ने वर्ष 1973 में एक ऐसा फैसला दिया था, जिसकी वजह से केशवानंद भारती मृत्यु के बाद भी देश के सांविधानिक इतिहास में अमर हो गए हैं। कांग्रेस की आंतरिक कलह और पाकिस्तान से युद्ध के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स खत्म करने और राज्यों में भूमि अधिग्रहण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने जैसे कई कानून बनाए और संसद के माध्यम से संविधान में 24वां, 25वां और 29वां संशोधन कर दिया। 


'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल' मामले में पांच महीनों तक 68 दिन रोज सुनवाई हुई, जो सुप्रीम कोर्ट में सबसे लंबी सुनवाई का रिकॉर्ड है। अयोध्या मामले में 40 दिन की सुनवाई के बाद पांच जजों ने 1,045 पृष्ठों में सर्वसम्मति से राम मंदिर के पक्ष में अपना फैसला दिया था, जबकि केशवानंद भारती मामले में तेरह में से सात जजों ने बहुमत से लगभग 800 पृष्ठों में अपना फैसला दिया था। कुल 2,144 पैरे के इस फैसले में 11 अलग-अलग फैसले शामिल थे, जिनमें संविधान के अधिकांश प्रावधानों का पुनरावलोकन किया गया। इस फैसले के अनुसार, कानून का शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, शक्तियों का बंटवारा, केंद्र-राज्य की संघीय व्यवस्था, गणतंत्र और संसदीय प्रणाली संविधान के मूलभूत ढांचे का हिस्सा हैं, जिन्हें संविधान संशोधन से नहीं बदला जा सकता। 

इस फैसले के बाद सरकार, संसद और सर्वोच्च न्यायालय में भारी उलटफेर हुआ। अगले दिन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एम सीकरी के रिटायर होने के बाद इंदिरा सरकार ने तीन जजों की वरिष्ठता को नजर अंदाज कर जस्टिस रे को प्रधान न्यायाधीश बना दिया, जिसके विरोध में तीन वरिष्ठ जजों ने त्यागपत्र दे दिया। प्रसिद्ध संविधानविद सीके दफ्तरी ने इस घटनाक्रम को भारतीय लोकतंत्र का काला दिन बताया था। मौलिक अधिकारों को आपातकाल में पूरी तरह से कुचल दिया गया। एडीएम, जबलपुर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकारों को प्रश्रय देने के बजाय, सरकारी दमन पर कोर्ट की मुहर लगा दी। केशवानंद भारती का फैसला सुप्रीम कोर्ट की तेजस्विता को दर्शाता है। 

केशवानंद फैसले के अनेक प्रावधानों को इंदिरा सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के कानून से खारिज कर दिया। हालांकि जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा सरकार के ऐसे तमाम फैसलों को रद्द कर दिया। इंदिरा सरकार ने संविधान की प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' जैसे शब्दों को शामिल किया था, जिन्हें नहीं हटाया जा सका। संविधान का मूलभूत हिस्सा मानकर अब उन प्रावधानों को हटाने पर आपत्ति की जा रही है। सवाल है कि जो प्रावधान संविधान संशोधन से शामिल किए गए, उन्हें बहुमत वाली सरकार द्वारा संविधान संशोधन के माध्यम से क्यों नहीं हटाया जा सकता। केशवानंद का मामला सरकार और न्यायपालिका के बीच प्रभुत्व के लिए हुए टकराव के तौर पर भी देखा जाता है। प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति में मनमानी से इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका पर तात्कालिक बढ़त हासिल कर ली थी। लेकिन इस फैसले के नौ साल बाद एस पी गुप्ता मामले से जजों ने नियुक्ति में कॉलेजियम व्यवस्था के माध्यम से पूर्ण वर्चस्व स्थापित कर लिया। 


वर्ष 2015 में पांच जजों की पीठ ने जजों की असंगत नियुक्ति प्रणाली पर कठोर टिप्पणी की, लेकिन कॉलेजियम व्यवस्था में अब तक कोई सुधार नहीं हुआ। सुशांत सिंह राजपूत मामले में फिल्म इंडस्ट्री में वंशवाद पर बहस चल रही है। लेकिन इस संयोग पर कम बहस होती है कि केशवानंद मामले में फैसला देने वाले छह से ज्यादा जजों के बेटे या भतीजे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज और चीफ जस्टिस बन गए।


केशवानंद का फैसला भारत के साथ बांग्लादेश और पाकिस्तान की अदालतों में भी नजीर बन गया। केशवानंद मामले में केरल सरकार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान समेत अन्य राज्यों की तरफ से कई नामी वकीलों ने बहस की थी। उस मामले में बहस करने वाले सोली सोराबजी तो आज भी सुप्रीम कोर्ट में संविधान के प्रकाश स्तंभ माने जाते हैं। 47 साल बाद आज भी केशवानंद मामले का हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों में जिक्र किया जाता है।


सौजन्य - अमर उजाला।

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चीन के दोहरेपन से क्यों संभलकर रहना होगा हमें, बता रहे हैं हर्ष कक्कड़

हर्ष कक्कड़



लद्दाख में गतिरोध चीनियों के पक्ष में जा रहा था, इसलिए अब तक बातचीत की प्रक्रिया धीरे चल रही थी। बातचीत के लिए भारत के अनुरोध का न सिर्फ चीन अपने ढंग से जवाब दे रहा था, बल्कि वार्ता का नतीजा भी नहीं निकला था। चीनियों ने कदाचित मान लिया था कि माहौल उनके पक्ष में है, भारत रक्षात्मक है और एक बफर जोन बनने से शारीरिक संघर्ष की संभावना लगभग न के बराबर है। गलवां घाटी का डर, जिसने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के मिथक को तोड़ दिया था, पीछे छूट चुका था। वे आश्वस्त थे कि उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की सीमा को अपने लाभ के लिए आगे बढ़ा सकते हैं।


लेकिन अगस्त के अंत में भारत ने जवाबी हमले के जरिये चीन को हैरान करते हुए सुनियोजित एवं समन्वित ढंग से उसके प्रभुत्व के खाली इलाके पर हमला किया, तो चीनियों की नींद उड़ गई। एक ही झटके में भारत ने माहौल को अपने पक्ष में कर लिया। चीनियों ने महसूस किया कि उन्हें परास्त किया गया है और उनकी ओर से कोई भी कदम भारतीय निगरानी और वर्चस्व के तहत होगा। तिब्बती शरणार्थी वार्डों में शामिल स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (विकास बटालियन) को तैनात करना एक और मास्टरस्ट्रोक था। इसने संदेश दिया कि भारत ने अपनी 'एक चीन नीति' त्याग दी है। चीन ने यह दावा करते हुए प्रतिक्रिया दी कि भारत ने एलएसी का उल्लंघन किया था, जिसे उसने खुद एक दिन पहले तक स्वीकारने से इन्कार कर दिया था और

भारतीयों की वापसी की मांग की थी। चीन की चोट और बढ़ाने तथा उसके सॉफ्टवेयर उद्योग पर असर डालने के लिए भारत ने फिर से कई चीनी एप पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। नतीजतन अचानक चीन से हर स्तर पर बातचीत की मांग की गई।

ब्रिगेड कमांडर्स लगभग एक हफ्ते तक लगातार बिना किसी नतीजे के मिलते रहे, क्योंकि भारत ने चीनी मांगों को स्वीकारने से इन्कार कर दिया था। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ने अपना दुष्प्रचार लगातार जारी रखा। चीन ने दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच बैठक का अनुरोध भी किया, जो शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में मॉस्को में हुआ। चीन की तरफ से यह तीसरा अनुरोध वर्चस्व वाली ऊंचाइयों पर कब्जा करने की भारत की आगे बढ़कर की गई कार्रवाई के बाद किया गया था। जाहिर है, चीन समाधान चाह रहा था। दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर एलएसी के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए बयान जारी किए। चीनी विदेश मंत्री ने बैठक के बाद अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि 'भारत और चीन के बीच सीमा पर मौजूदा तनाव का सच और कारण स्पष्ट है, और यह जिम्मेदारी पूरी तरह से भारत की है।


चीन अपनी सीमा खो नहीं सकता, और चीनी सेना राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने में सक्षम है।' इसके विपरीत भारत का बयान था कि 'बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों की कार्रवाई उनके आक्रामक व्यवहार और एकतरफा यथास्थिति को बदलने का प्रयास द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन था। भारतीय सैनिकों ने हमेशा सीमा प्रबंधन के लिए जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाया है, पर भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के हमारे दृढ़ संकल्प के बारे में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।' जैसी कि अपेक्षा थी, दोनों रक्षा मंत्रियों के बीच बैठक बेनतीजा रही। दोनों पक्ष एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहे। ढाई घंटे से ज्यादा समय तक चली इस बैठक में सिर्फ अगले स्तर की वार्ता के लिए मंच तैयार किया गया, जो मॉस्को में आगामी 10 सितंबर को विदेश मंत्रियों के बीच होगा।


भारत अप्रैल 2020 की स्थिति की बहाली और क्षेत्र से अतिरिक्त सैनिकों की वापसी की मांग करता है, जबकि चीन चाहता है कि भारत एलएसी के उसके रुख को स्वीकार करे और हाल ही में कब्जे वाले इलाके से पीछे हट जाए। इस समय चीनी रवैए के कारण दोनों देशों के बीच विश्वास की भारी कमी है। यदि चीन भारत के प्रस्ताव को स्वीकार कर अप्रैल, 2020 की अपनी स्थिति पर वापस लौटता है, तो इससे उसकी छवि को नुकसान पहुंचेगा और पीएलए की वैश्विक प्रतिष्ठा प्रभावित होगी। यदि वर्तमान स्थिति जारी रहती है, तो उसकी स्थिति और गतिविधियां भारतीय निगरानी और वर्चस्व के अधीन होंगी। मोल्डो स्थित उसके मुख्य शिविर को निशाना बनाया जा सकता है। भारतीय सेनाओं को खदेड़ने के लिए किसी भी सैन्य कार्रवाई से चीनी जीवन को भारी नुकसान होगा, क्योंकि वहां भारत का दबदबा है। भारतीय सेना चीनी दुस्साहस का सामना करने के लिए तैयार है।


भारत को यह भरोसा नहीं है कि चीन स्वीकृत समझौतों का पालन करेगा। चीन ने लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता में बनी सहमति को मानने से इन्कार कर दिया है। भारत को चीन के इरादे पर संदेह है और वह इसको लेकर भी अनिश्चित है कि चीन ऊंचाई पर कब्जे की कोशिश करेगा, जिस पर अभी भारत का कब्जा है। वर्ष 1965 में सिक्किम के जेलेप ला में चीन ने ऐसा किया था और दोकलम में वह अपने क्षेत्र में लगातार बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है। ऐसी गतिविधियां भारत के लिए समस्या पैदा करेंगी। इसके अलावा चीन आगे भी एलएसी का उल्लंघन कर सकता है। इसका सबसे अच्छा समाधान है लद्दाख में एलएसी सीमा का निर्धारण, पर यह चीन को स्वीकार्य नहीं हो सकता, क्योंकि यह उसे उस क्षेत्र में दुस्साहस करने

से रोकेगा। 


दूसरा समाधान यह हो सकता है कि जब तक सीमा समझौता नहीं होता, तब तक यथास्थिति बरकरार रखी जाए। ऐसे में दोनों सेनाएं एक-दूसरे से दूरी बनाए रखेंगी। इससे दोनों देश प्रभावित होंगे, क्योंकि लद्दाख में लंबे समय तक भारी संख्या में सैन्य बल को बनाए रखना होगा। यह फिर से चीन को अस्वीकार्य हो सकता है, क्योंकि वैसे में उसकी चौकियां चौबीसों घंटे भारत की निगरानी में रहेंगी। मौजूदा संकट का समाधान कैसे होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों विदेश मंत्री किस तरह से वार्ता करते हुए एक सौहार्दपूर्ण समाधान तक पहुंचते हैं। ऐसे में, भारतीय राजनयिकों को सावधान रहना होगा कि वे त्वरित समाधान की तलाश में मौजूदा सैन्य बढ़त को खोने न दें।


सौजन्य - अमर उजाला।

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शिखर आंदोलनकारी की असमय विदाई

शेखर पाठक



वर्ष 1983 का वह न जाने, कौन-सा महीना था। सिल्यारा, चम्याला समेत बालगंगा घाटी के अनेक गांवों की सैकड़ों महिलाएं घणसाली के रेंज ऑफिस में चीड़ के छिलकों की मशाल जलाकर पहुंची थीं। लगता था कि यह चिपको की बची ताकत और एक जन आंदोलन की आंतरिक पुकार थी। महिलाएं कटान रोकने के साथ वनाधिकार की मांग कर रही थीं। कुछ वर्षों बाद चेतना आंदोलन को विकसित करने वाले त्रेपन सिंह चौहान तब कक्षा सात के विद्यार्थी थे। उनकी चेतना का अंकुरण यहीं से हुआ था।


वर्ष 1980 के आसपास चिपको के उतार और टिहरी बांध आंदोलन के बिखराव ने भिलंगना घाटी के चिपको से जुड़े या प्रेरित नौजवानों को संगठित होने और नई परिस्थितियों में अपनी राह परिभाषित करने को विवश किया। पांच जून, 1995 को चेतना आंदोलन जन्मा। शुरू में यह भ्रष्टाचार के विरोध के अलावा जंगलों, चरागाहों और नदियों के मुद्दों पर केंद्रित रहा। भ्रष्टाचार विरोध के कारण 1996 में चेतना आंदोलन के कार्यकर्ताओं पर निहित स्वार्थों ने अनेक मुकदमे दायर किए। कार्यकर्ताओं के लिए काम करना मुश्किल हो गया। उन्हें असामाजिक तत्व घोषित किया गया। उस समय सुंदरलाल बहुगुणा सहित विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ता चेतना आंदोलन के समर्थन में आए। समूह फिर अपने काम में जुट गया।

1980 के बाद चिपको के अनेक अच्छे परिणाम आने के बावजूद 1949 में उत्तर प्रदेश में विलीन टिहरी रियासत (जिला टिहरी और उत्तरकाशी) में 1998 तक भी वन पंचायतों का गठन नहीं हो सका। अगले पांच साल तक चेतना आंदोलन ने वन पंचायतों की स्थापना हेतु काम किया। अनेक वन पंचायतें बनीं, पर उनमें जंगल नहीं थे। इस तरह वृक्षारोपण और घेराबंदी के प्रयास हुए, ताकि स्वयं जंगल उग सकें। कुछ सफलता मिली। लोगों को पता चला कि पेड़ों की हिफाजत के कारण घास का उत्पादन बढ़ा है तथा अतिरिक्त जलावन उपलब्ध हुआ है। गंगा देवी, जगदेई देवी, झड़ीदेवी तथा यशोधरा देवी जैसी कर्मठ, सामाजिक नेत्रियों का उदय पंचायतों और वन पंचायतों से हुआ। ये सभी चेतना आंदोलन की आधार बनीं।

मार्च, 2004 में जब भिलंगना नदी पर फलिन्डा में 22.5 मेगावाट की भिलंगना फेज1 जलविद्युत परियोजना बिना स्थानीय समुदायों की सहमति के बनने लगी, तो चेतना आंदोलन ने तब से अप्रैल, 2006 तक आंदोलन किया। जन सुनवाइयां कीं। दर्जनों लोग गिरफ्तार किए गए और जेल में रखे गए। समस्त ग्रामीणों के विरोध के बावजूद यह योजना बनी, पर जन आंदोलन के कारण ग्रामीण समाज के सिंचाई तथा मुर्दाघाट के अधिकारों को स्वीकारा गया। इसके बाद चेतना आंदोलन ने महिलाओं को सुसंगठित करना शुरू किया। ग्राम प्रधान के चुनावों में उन्हें उतारा। चालीस में से पैंतीस उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई। दूसरी ओर, 2012 से देहरादून में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को संगठित करना शुरू किया।


ग्राम्य जीवन को अर्थवान और आकर्षक बनाने के साथ पुरानी उपयोगी परंपराओं को जीवित और फिर से परिभाषित करने हेतु चेतना आंदोलन ने 'घसियारी उत्सव' की शुरुआत की। टिहरी जिले के घणसाली ब्लॉक के गांवों में आयोजित इस उत्सव में श्रेष्ठ घसियारियों को 'बेस्ट इकोलॉजिस्ट' घोषित कर उन्हें नकद धनराशि के साथ चांदी के मुकुट पहनाए जाते हैं। इन सब में त्रेपन सिंह चौहान का योगदान तो था ही, उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों की 'बालगंगा हाइड्रो इलेक्ट्रिक कंपनी' भी बनाई, जिसमें एक मेगावाट बिजली बनाने की योजना थी।


सामाजिक आंदोलन के साथ त्रेपन सिंह ने लेखन भी जारी रखा। उत्तराखंड की स्थितियों पर केंद्रित उनके दो उपन्यास यमुना और हे ब्वारी बेहद चर्चित रहे। जहां भी अधिकारों की लड़ाई होती, त्रेपन वहां जरूर पहुंचते। सौभाग्य से उसकी तरह के कुछ साथी पहाड़ों में थे। लेकिन अंततः वह मोटर न्यूरॉन जैसी दुर्लभ बीमारी की चपेट में आ गया, जो मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को थी। फिर भी विज्ञान और समाज ने हॉकिंग को 76 साल का जीवन दिया। दूसरी ओर, त्रेपन की बीमारी चालीसवें साल में शुरू हुई और वह पचास भी पार नहीं कर पाया। कितना तो अभी उसे लिखना था। कितना तो अभी उसे चलना था। घसियारियां उसके ठीक होने का इंतजार कर रही थीं और भिलंगना व बालगंगा भी। खतलिंग ग्लेशियर तथा गंगी गांव भी चाहते थे कि त्रेपन उसका स्पर्श करे। उन आंखों में जितनी चमक और उम्मीद थी, उतनी ही विनम्रता थी। चेहरे से वह आंदोलनकारी नहीं लगता था, पर उसके अंदर रचनात्मकता की आग थी।


हम जानते थे कि उसे ज्यादा दिन नहीं जीना। शायद उसे भी पता था। इसीलिए अपने तीसरे उपन्यास पर वह तेजी से काम कर रहा था, पर उसे आधा ही लिख सका। त्रेपन के रचे शू्न्य को कौन भरेगा? क्या सुमन या नगेंद्र सकलानी का शून्य भरा जा सका है? शैलानी, प्रसून, शिखर और भवानी को भी जल्दी थी।


सौजन्य - अमर उजाला।

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हिमालय को नुकसान पहुंचा रही चार धाम परियोजना, घनघोर लापरवाही



हिमालय भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपत्ति है। इसके बिना यह देश नहीं बचेगा। इसके विशाल पहाड़ आक्रमणकारियों को रोकते हैं, हमारी महान नदियों के स्रोत हैं, जैव विविधता का समृद्ध भंडार और हमारे पवित्रतम मंदिरों का घर हैं। पारिस्थितिकी, आर्थिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक रूप से हिमालय एक राष्ट्र के रूप में भारत के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।


हिमालय का सम्मान करने के दावे के साथ शासन करने वाले राजनीतिकों की नाक के नीचे ये पहाड़ उन पर हो रहे हमले के गवाह बन रहे हैं। यह हमला गलत तरीके से अपनाए जा रहे प्रोजेक्ट चार धाम परियोजना के रूप में हो रहा है। 12,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से तैयार हो रही इस योजना का लक्ष्य चार पवित्र धामों यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ तथा बदरीनाथ तक शीघ्र पहुंच के लिए 900 किलोमीटर लंबी सड़कों का चौड़ीकरण है। इस योजना पर घनघोर लापरवाही के साथ अमल हो रहा है और इसमें पर्यावरण तथा मानव सुरक्षा की जरा भी चिंता शामिल नहीं है। लोगों के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट को विशेषज्ञों की एक समिति का गठन करना पड़ा है, जिसने हाल ही में इस परियोजना के कारण अब तक हो चुके नुकसान को लेकर आठ सौ पेज की रिपोर्ट प्रस्तुत की है।

इस रिपोर्ट को पढ़ना रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव से गुजरना है। लेकिन सबसे पहले हमें खुद को हिमालय से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों का स्मरण कराना चाहिए। हालांकि इन्हें देखना अद्भुत लगता है, लेकिन पारिस्थितिकी के लिहाज से ये पहाड़ अत्यंत नाजुक हैं और खासतौर से इन्हें भूकंप तथा बाढ़ का खतरा है। इसके बावजूद एक के बाद एक आने वाली सरकार ने हिमालय तथा उसके लोगों पर चार तरह से हमले किए हैं। वाणिज्यिक वानिकी, ओपन कास्ट माइनिंग, बड़ी पनबिजली परियोजनाओं को बढ़ावा तथा अनियंत्रित पर्यटन ने मिलकर भारी पैमाने पर जहरीले कचरे के संचय, वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी, वनों तथा जैवविविधता में कमी, जल स्रोतों का क्षरण किया है और भूस्खलन तथा बाढ़ में वृद्धि की है। और अब इस भारी-भरकम सड़क निर्माण परियोजना के रूप में पांचवां हमला किया जा रहा है, जिससे पहले ही बर्बाद हो चुके इस भूभाग को और नुकसान हो सकता है।

अमूमन चार धाम जैसी विशाल परियोजना के लिए प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले ही पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) संबंधी विस्तृत रिपोर्ट देना अनिवार्य होता है। यहां यह जिम्मेदारी क्रूर हाथों में थी। चूंकि सौ किलोमीटर से अधिक लंबी सड़क परियोजना के लिए विस्तृत ईआईए जरूरी होती है; इसलिए 880 किलोमीटर की एकीकृत परियोजना को कागज पर छोटे छोटे अनेक टुकड़ों में इस तरह बांट दिया गया, ताकि किसी भी खंड के लिए ईआईए की जरूरत न पड़े।


इस परियोजना की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर, 2016 के आखिरी हफ्ते में रखी थी। उसके बाद से इसकी वजह से हुए नुकसान की झलक सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष डॉ. रवि चोपड़ा द्वारा तैयार रिपोर्ट में दिखती हैः 'हमारा सामना कई भूस्खलन से हुआ और हमारी गाड़ियां अक्सर जाम में फंस जाती थीं। मलबे सीधे जंगलों, नदी के तल और जलस्रोतों में जा रहे थे। पहले ही हजारों पेड़ गिर चुके हैं और अप्रत्याशित ढलानों के ध्वस्त होने से और अधिक पेड़ गिरेंगे। कमजोर सुरक्षात्मक ऊंची दीवारों को सीधी ढलान पर उनकी नियति पर छोड़ दिया गया है। रात ठहरने पर सड़क के काम से सीधे प्रभावित होने वाले लोगों ने हमसे मुलाकात की और अपनी तकलीफें तथा सुझाव बताए।'


इस तबाही का कारण है पहाड़ों के अनुकूल बनी मौजूदा सड़कों के नेटवर्क को 12 मीटर चौड़े हाई-वे में बदलना, जो कि मैदानी इलाकों के अनुकूल होते हैं। वैज्ञानिक विशेषज्ञों ने सलाह दी थी कि कमजोर पहाड़ियों में 5.5 मीटर चौड़ी सड़कें कारगर होंगी; इन विशेषज्ञों को अनसुना कर दिया गया। कम चौड़ी सड़कें परिवहन को नियंत्रित करतीं और पर्यावरण तथा सामाजिक नुकसान को कम करतीं।


जैसा कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट कहती हैः 'पहाड़ी की कटाई की लंबाई और चौड़ाई के अनुसार पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। जितना अधिक मलबा निकाला जाएगा, कटाई भी उतनी गहरी होगी।' उल्लेखनीय है कि इन मार्गों में 60  या 70 डिग्री को झुकी ढलानें हैं और इनकी वजह से पहले ही जंगल का क्षरण हो रहा है। चार धाम परियोजना के एक हिस्से में समिति ने पाया कि 174 ताजा कटी ढलानों में से 102 में भूस्खलन के अनुकूल हो गई हैं। हर जगह अचानक खत्म होने वाली ढलानें आम हैं।


उल्लेखनीय है कि मई से सितंबर के दौरान ही कुछ महीनों में चार धाम के तीर्थयात्रियों का ट्रैफिक बढ़ जाता है। इसके अलावा ये कोई व्यावसायिक यात्री नहीं हैं, जिनके लिए हर मिनट कीमती हो। आखिर किसी आध्यात्मिक व्यक्ति को किसी पवित्र स्थल में पहुंचने में कुछ घंटे या कुछ दिन अधिक लगने में परेशानी क्यों होनी चाहिए? पुराने दिनों में तीर्थयात्री पैदल यात्रा करते थे। हिमालय में सड़क निर्माण के दौरान उसकी अनूठी पारिस्थितिकी और उसे पहुंचने वाले नुकसान को भी ध्यान में रखना चाहिए। मैदानी इलाकों में शहरों के भीतर के लिए उपयुक्त मॉडल की नकल पूरी तरह से गलत है और यह बहुत महंगा भी साबित होगा।


'हिमालयन ब्लंडर' शीर्षक से लिखी टिप्पणी में चार वैज्ञानिक सदस्यों ने चार धाम परियोजना को उस महान तथा नाजुक पहाड़ी शृंखला के प्रति 'गैरजिम्मेदाराना तथा हिमालय का अपमान'करने वाला ऐसा काम करार दिया, जिसकी सेहत देश के सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिकी भविष्य के लिए अहम है। रिपोर्ट में ऐसी सैकड़ों तस्वीरें शामिल हैं, जो लापरवाही के साथ सड़क को चौड़ा किए जाने के कारण हुई बर्बादी को दिखाती हैं, जिसमें पूरी पर्वत शृंखला नदी की ओर गिरती नजर आती हैं। स्थिति अब भी सुधर सकती है, यदि 12 मीटर चौड़ाई की जगह इसे 5.5 मीटर की संवेदनशील चौड़ाई तक सीमित रखा जाए और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया जाए।


समिति ने नए और कम विनाशकारी संरेखण, स्थानीय प्रजातियों के साथ क्षरण वाले क्षेत्र में पुनः वनस्पतीयन, बर्फबारी वाले ऊपरी हिस्से की सड़क के लिए विशेष उपाय अपनाने संबंधी संवेदनशील सुझाव दिए हैं। ये विस्तृत सुझाव भूगर्भ, पारिस्थितिकी के साथ ही इंजीनियरिंग की विशेषज्ञता के साथ तैयार किए गए हैं। ये सुझाव वैज्ञानिक विशेषज्ञों ने दिए हैं, जिन्होंने हिमालय में रहते हुए और काम करते हुए लंबा वक्त बिताया है। हम बेसब्री से यही उम्मीद कर सकते हैं कि उन्हें सुना जाएगा और अमल में लाया जाएगा।


यह स्तंभकार उत्तराखंड में ही पैदा हुआ और बड़ा हुआ है। उसकी पहली किताब हिमालय के जंगलों के सामाजिक इतिहास पर केंद्रित थी। इसलिए एक नागरिक और अध्येता के रूप में मैं पाठकों (और अदालत) से सरकार पर समझदारी दिखाने के लिए दबाव बनाने के महत्व को रेखांकित कर रहा हूं। हिमालय ने पहले ही काफी कुछ सहा है। मौजूदा स्वरूप में यह सड़क परियोजना पहाड़ों को ऐसा नुकसान पहुंचाएगी, जिसकी कभी भरपाई नहीं हो सकेगी। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई यह रिपोर्ट कहती है, 'आज दुनिया भर में स्पष्ट हो गया है कि पारिस्थितिकी की ईमानदार और बिना शर्त की जाने वाली चिंता से रहित कोई भी विकास अदूरदर्शी साबित होगा; और अनिवार्य रूप से दीर्घकाल में तबाही और आपदा लाएगा।'

सौजन्य - अमर उजाला।

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कोविड से जंग में गैर संचारी रोग भी चुनौती : Amar Ujala Editorial

मोनिका अरोड़ा
गैर-संचारी रोग किसी संक्रामक वायरस के कारण नहीं होते, बल्कि ये पुराने रोग होते हैं, जो आनुवांशिक, शारीरिक, पर्यावरणीय और व्यवहारिक कारकों के चलते होते हैं। भारत में ये रोग देश की कुल वार्षिक मृत्युदर में लगभग 63 फीसदी (58.7 लाख) का योगदान करते हैं।

इनमें से अधिकांश मौतें समय से पहले (30 से 70 वर्ष की उम्र) और जीवन के सबसे उत्पादक वर्षों में होती हैं। चार मुख्य गैर संचारी रोग-हृदय रोग, पुरानी सांस की बीमारी, कैंसर और डायबिटीज हैं। भारत में उच्च रक्तचाप से 25.7 करोड़ और डायबिटीज से 7.7 करोड़ लोग ग्रस्त हैं।
हर वर्ष बीस लाख लोगों की मौत हृदय रोग से संबंधित कारणों से होती है। भारत में ग्यारह वयस्कों में से एक (उम्र 20-79) मधुमेह का इलाज कराते हैं और 4.39 करोड़ लोगों के बारे में अनुमान है कि उनका इलाज नहीं हो पाता है।
स्वास्थ्य मंत्रालय पहले से ही कैंसर, मधुमेह और हृदय रोग और स्ट्रोक के रोकथाम और नियंत्रण के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम चला रहा है। कार्यक्रम का उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना, बुनियादी ढांचा स्थापित करना और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर ही स्क्रीनिंग करना है।

गैर-संचारी रोगों का बोझ कोविड-19 से निपटने में भारी चुनौती पैदा कर रहा है। मौजूदा सबूत बताते हैं कि गैर-संचारी रोगों के साथ जीने वाले लोगों (पीएलडब्ल्यूएनसीडी) के कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार होने या मरने का खतरा ज्यादा होता है।

उच्च मृत्यु दर वाले कई देशों ने बताया है कि कोविड से सबसे ज्यादा मौंतें बुजुर्गों और उन लोगों की हुई हैं, जो डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसे एक या एक से अधिक रोगों से पीड़ित थे। जून के अंत तक, भारत में पांच लाख से अधिक कोविड-19 के मामले थे और इनमें से 70 प्रतिशत से अधिक मामले सह-रुग्णता के कारण थे।

कोरोना काल से पहले भी जागरूकता की कमी और  स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच की कमी के चलते गैर संचारी रोगों से पीड़ित लोग इलाज से वंचित थे। कोविड -19 के बढ़ते बोझ ने गैर संचारी रोगों से पीड़ित लोगों की स्थिति को कमजोर बना दिया है, क्योंकि जिन लोगों में गैर-संचारी रोगों की पुष्टि हो चुकी थी, उनमें से भी ज्यादातर को महामारी के दौरान बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही थीं।

हालांकि लॉकडाउन को समाप्त करने के लिए कई दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन गैर-संचारी रोगों से पीड़ितों की स्थिति में तब तक सुधार नहीं हो सकता, जब तक कि उन्हें पहचानने और उनकी सुरक्षा करने के लिए अभिनव समाधान नहीं मिलते।

लॉकडाउन के दौरान, दुनिया भर में गैर-संचारी रोगों से पीड़ितों को अपने इलाज में असंख्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ज्यादातर स्वास्थ्य प्रणालियों को पुनर्गठित किया गया है और गैर-संचारी रोगों से पीड़ित उनकी प्राथमिकता में नहीं थे।

ऐसी सूचनाएं मिली हैं कि पुराने रोगियों के इलाज, जरूरी दवाओं एवं प्रौद्योगिकियों की आपूर्ति व स्क्रीनिंग एवं उपचार में रुकावट के साथ-साथ गैर-संचारी रोगों के इलाज में सहायक स्वास्थकर्मियों तक पहुंच  में भी बाधा हुई। भारत में लॉकडाउन के दौरान, सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की अनुपलब्धता के साथ-साथ कई स्वास्थ्य सुविधाओं के बंद होने के कारण भारत में स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं बाधित हुईं।

बेशक भारत में कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, पर भारत में कोरोना मरीजों के ठीक होने की दर (रिकवरी रेट) 25 मई को  41.4 फीसदी थी (अब यह दर 60 फीसदी हो चुकी है)। मध्य अप्रैल में केरल में मृत्यु दर 0.5 फीसदी थी, जो विश्व में सबसे न्यूनतम थी।

केरल की रिकवरी रेट भी उत्साहित करने वाली थी। इसका कारण था कि केरल ने स्वास्थ्य निगरानी का अभियान चलाया था-कमजोर बुजुर्गों, सह-रुग्णता वाले लोगों, और कम वजन वाले व कुपोषित बच्चों पर कड़ी निगरानी रखी गई और गैर-संचारी रोगों के पीड़ितों को उनके दरवाजे पर एक महीने की दवा की आपूर्ति की गई।

ऐसा विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न लोगों के सहयोग से किया गया। उसी समय पड़ोसी राज्य कर्नाटक ने 4.3 प्रतिशत की मृत्यु दर दर्ज की और इसका कारण यह था कि सह-रुग्नता वाले रोगियों की पहचान नहीं की गई और उन्हें तुरंत अस्पताल नहीं पहुंचाया गया।

कोविड-19 से जंग, जिनमें लॉकडाउन, शारीरिक दूरी और आत्म-अलगाव शामिल हैं, के दौरान शारीरिक गतिविधियों में बाधा और अस्वास्थ्यकर भोजन के चलते गैर-संचारी रोगों के कारकों,जैसे शराब और तंबाकू का उपयोग बढ़ने के जोखिम हैं।

यह वर्तमान में स्वस्थ आबादी को इन आदतों का लती होने की एक नई चुनौती पेश करेगा, और बाद में वे गैर-संचारी रोगों का सामना कर सकते हैं। महामारी की शुरुआत में, डब्लूएचओ ने लोगों को स्वस्थ रहने और तंबाकू का उपयोग छोड़कर अपनी प्रतिरक्षा में सुधार करने की सलाह दी।

अप्रैल में आईसीएमआर ने भी लोगों को तंबाकू का उपयोग न करने और सार्वजनिक स्थलों पर न थूकने की सलाह दी थी। सरकार ने बाद में कोविड-19 प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय निर्देश के तहत सभी धूम्रपान और धूम्रपान रहित तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां अब सरकारों से यह सुनिश्चित करने की अपील कर रही हैं कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय कोविड-19 रोकथाम योजनाओं में गैर-संचारी रोगों को भी शामिल किया जाए। जैसा कि हम सभी अगले कुछ वर्षों के लिए कोविड-19 के साथ रहने की तैयारी कर रहे हैं, हमें गैर-संचारी रोगों से पीड़ित कमजोर लोगों की सुरक्षा के लिए लगातार प्रयास करने और उनकी जरूरतों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। एक मजबूत, लचीली, योग्य, अच्छे स्वास्थ्यकर्मी से युक्त स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली और स्वस्थ आबादी मौजूदा वक्त की जरूरत है। (लेखिका पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के हेल्थ प्रोमोशन डिविजन में प्रोफेसर और निदेशक हैं।)

सौजन्य - अमर उजाला।
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अधर में शांति समझौते का भविष्य : Amar Ujala Editorial


 कुलदीप तलवार  

दुनिया में अधिकांश देश जहां अपने नागरिकों की जान बचाने के लिए कोरोना महामारी को रोकने में लगे हुए हैं, वैक्सीन की तलाश की जा रही है, वहीं अफगानिस्तान में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है।

अमेरिका और तालिबान के बीच अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए  29 फरवरी को जो शांति समझौता हुआ था, उस पर पूरा अमल नहीं हो पा रहा है। हिंसा की वजह है अफगान सरकार के किसी प्रतिनिधि का इस समझौते की बातचीत में शामिल नहीं होना।
इस समझौते के तहत दो हजार तालिबान लड़ाकों को जेलों से छोड़ना अब भी बाकी है, वहीं तालिबान की कैद में रहने वाले एक हजार अफगान सुरक्षाकर्मियों को नहीं छोड़ा गया है। उम्मीद कि जा रही थी कि समझौते के बाद हिंसा में कमी आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
तालिबान ने एक ही सप्ताह में 222 हमले किए, जिसमें 400 से ज्यादा  अफगान सुरक्षाकर्मियों को अपनी जान गंवानी पड़ी और डेढ़ सौ से ज्यादा लोग घायल हुए। अफगान सरकार पर दबाव बनाने के लिए कई धार्मिक गुरुओं को भी निशाना बनाया गया।

समझौते के बाद झूठा प्रचार किया गया कि अमेरिका तालिबान के बीच हुए समझौते में पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी पोल अमेरिका के विदेश विभाग की आतंकवाद पर ताजा रिपोर्ट ने अब खोली है।

इसमें कहा गया है कि पाकिस्तान ने अफगान शांति प्रक्रिया में कोई सकारात्मक योगदान नहीं किया। रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान हक्कानी नेटवर्क को अपनी जमीन उपयोग करने की इजाजत देता है, जो अफगानिस्तान व भारत को निशाना बनाते हैं।

इसे संयोग ही कहा जाएगा कि यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने नेशनल एसंेबली में अपने भाषण के दौरान अमेरिका में 9/11 को हुए आतंकी हमले के मास्टर माइंड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को शहीद करार दिया। इससे पाकिस्तान का दशहतगर्द समर्थक चेहरा उजागर हुआ है।

पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी देखना नहीं चाहता है। उसने हक्कानी नेटवर्क का सहारा लेकर अफगानिस्तान में भारतीय ठिकानों पर हमले भी करवाए। अफगानिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक खालिद सादात का कहना है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में एक छद्म भूमिका अदा कर रहा है।

तालिबान की बातों पर किसी भी सूरत में यकीन नहीं किया जा सकता। चंद दिन पहले ही तालिबान ने कश्मीर मुद्दे को भारत का अंदरूनी मामला बताते हुए इस पर पाक का साथ न देने की बात कही थी। जबकि इससे ठीक पहले कहा था कि काबुल में कब्जे के बाद कश्मीर को भी छीन लिया जाएगा।

इधर अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया में जुटे वार्ताकारों से जुड़े समाचार भी सामने आ रहे हैं। इनके मुताबिक, शीर्ष तालिबान नेताओं के कोरोना महामारी से संक्रमित हो जाने के बाद पैदा हुए मतभेदों के कारण तालिबान नेतृत्व में खलबली मची हुई है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट की मानें, तो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य अलकायदा व तालिबान के रिश्तों से परेशान हैं। यह खुलासा भी हुआ है कि तालिबान में एक नया गुट कलायत-हैज-ई बना है, जो शांति समझौते के खिलाफ है।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच मतभेदों को भुलाकर हाल ही में जो सत्ता समझौता हुआ है, शायद ही पुख्ता साबित हो। कुछ दिन पहले दो अफगान राष्ट्रपतियों के शपथ ग्रहण के समय अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने कहा कि यदि वे दोनों मिलजुलकर काम नहीं करेंगे, तो इस साल के साथ अगले साल के लिए भी एक अरब डॉलर की अमेरिकी मदद काट दी जाएगी।

अमेरिका में आगामी नवंबर माह में राष्ट्रपति चुनाव है। अधिकांश मतदाताओं ने नस्लवाद, कोरोना और बेरोजगारी को अमेरिका के लिए बड़ा खतरा बताया है। और ट्रंप को इन तीनों मोर्चों पर विफल करार दिया है।

इसलिए राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आने के बाद ही अमेरिका तालिबान शांति समझौते के भविष्य का पता चलेगा। मौजूदा हालात से पता चलता है कि शांति समझौता अधर में है और यह शायद ही टिकाऊ साबित होगा।

सौजन्य - अमर उजाला।
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सन 67 की अलख ज्योति जलाए रखें :Amar Ujala Editorial


प्रदीप कुमार

भारत को आए दिन 1962 की याद दिलाने वाला चीन खुद 58 साल पहले के हालात से जरूरी सबक नहीं सीख पा रहा। किसी भी देश को विजय या पराजय की ओर ले जाने में एक बड़ा निर्णायक तत्व होता है उसके नेतृत्व की गुणवत्ता। ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकत के खिलाफ महात्मा गांधी, उनके शीर्ष सहयोगियों-जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य ने विराट जनांदोलन खड़ा करने की प्रक्रिया में लाठियां खाई थीं, जेलें भरी थीं और ब्रिटिश सत्ता को बार-बार लुंज-पुंज किया था।

इन नेताओं की अखिल भारतीय पार्टी, कांग्रेस अहिंसक आंदोलनों की अभ्यस्त थी। उसके पास लाखों लोगों को सड़कों पर लाने की क्षमता तो थी, मगर सामरिक चिंतन नहीं था। अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे ज्यादा समझ रखने वाले नेहरू शह-मात का खेल खेलने में दक्ष नहीं थे। 1962 में यह था भारत का नेतृत्व। द्वितीय विश्व युद्ध में भाग ले चुके फौजी अफसरों की भूमिका भी निराशाजनक रही।
देखते हैं, चीन का नेतृत्व कैसा था। माओ त्से तुंग, चाउ एन लाइ, लिव शाओ ची, लिन पियाव, चू तेह और अन्य नेता कई युद्धों की भट्ठी से तप कर निकले थे। कम्युनिस्ट पार्टी और सेना, दोनों का वे कुशल नेतृत्व करते थे। मार्शल चियांग काई शेक की नौ लाख की सेना से भिड़ना उन्हें आता था।
अपने समय की सबसे ताकतवर, जापानी फौजी मशीन से भी उन्होंने हार नहीं मानी थी। यही वह नेतृत्व था, जो 1950 में कोरिया के मैदान में कूद पड़ा था। बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि कोरिया में अपने सामरिक उद्देश्य पूरे कर पाने में विफल अमेरिका ने चीन पर एटम बम छोड़ने की योजना बना ली थी।

लेकिन माओ को तो पहले ही यकीन हो चुका था कि 'साम्राज्यवाद कागजी शेर' है। इस नेतृत्व ने 1962 में भारत पर हमला किया था। 2020 में दोनों देशों का नेतृत्व बुनियादी तौर पर बदला हुआ है। चीन में युद्धों में तपे-तपाए नेताओं की पीढ़ी कब की जा चुकी है। चीन में पूंजीवाद आया है, तो उसके साथ ही पूंजीवादी शासन से पैदा होने वाली बुराइयां भी। कम्युनिस्ट पार्टी और शासन के कई वरिष्ठ अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जा चुके हैं। मार्क्सवादी-लेनिनवादी शब्दावली में कहें, तो आज के चीनी नेताओं का वर्ग चरित्र माओकालीन नेताओं से भिन्न है।

कुल मिलाकर वे नौकरशाह हैं। 1962 आते-आते नेहरू के साथ कांग्रेस भी थकने लगी थी। भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रवाद के शेर की सवारी करके सत्ता में आई है। संघ परिवार की समग्र शक्ति मोदी के पीछे है। सेना की स्थिति क्या है? माओ के जुझारू सैनिकों के पास खोने को बहुत कुछ नहीं था। वे उबले चावल खाकर लड़ा करते थे। आज का चीनी सैनिक सुविधाओं का आदी है। उसे दुनिया की सबसे बड़ी सेना और आधुनिक सैन्य तंत्र पर भी गुमान होगा।

लेकिन युद्ध में विजय के लिए सिर्फ उतना काफी नहीं होता। अगर यही होता, तो अफगानिस्तान से सोवियत संघ की विश्व-चर्चित लाल सेना को पलायन न करना पड़ता और अब अमेरिका वहीं से निकलने के लिए छटपटाता नहीं। 1979 में वियतनाम पर हमले के बाद चीन की सेना ने कोई जंग नहीं लड़ी है। भारतीय सेना 1962 के बाद 1965, 1971 और कारगिल की जंगें फतह कर चुकी है। ऊंची-ऊंची पहाड़ियों पर अनवरत युद्धों और सैनिक कार्रवाइयों का दुर्लभ अनुभव दुनिया में केवल भारतीय सेना को प्राप्त है। भारतीय सेना 1962 के राष्ट्रीय अपमान के एक अजेय अस्त्र से लैस है। ट्रेनिंग के दौरान 1962 की पढ़ाई अच्छी तरह करने वाले अफसर सीमा पर तैनात हैं। वे उस अपमान को धोने के लिए भी लड़ेंगे।

विस्तारवाद और युद्धोन्माद में सराबोर चीन से पेश आते समय हमें 1967 के इतिहास को अपनी राष्ट्रीय स्मृति में अमर स्थान देना चाहिए। भारत के राजनीतिक नेतृत्व और मनःस्थिति में आए परिवर्तन के निहितार्थ को समझने में चीन चूक कर गया, हालांकि इंदिरा गांधी 1962 में युद्ध के दौरान सेना और जनता का मनोबल बढ़ाने के लिए अपने पिता नेहरू और सुरक्षा बलों की अवहेलना कर तेजपुर तक पहुंच गई थीं। प्रधानमंत्री के नाते इन्हीं इंदिरा गांधी ने विद्रोहियों का दमन करने के लिए ऐजल पर बमबारी करवा दी थी।

1967 में चीन सिलीगुड़ी गलियारे तक पहुंचने के लिए सिक्किम में नाथू ला और  चो ला पर कब्जा करना चाहता था। भारतीय सेना ने नाथू ला की लड़ाई में चीन के 340 सैनिकों को हलाक कर चीनी सेना को तीन किलोमीटर पीछे धकेल दिया था। हमारे 89 सैनिक शहीद हुए थे। चो ला में चीन के 35 सैनिक मारे गए थे और भारत के 15 शहीद हुए थे। नाथू ला और चो ला की विजय ने चीन को कई वर्षों तक शांत रहने के लिए मजबूर कर दिया था। 1962 की पराजित सेना अब नए अवतार में आ चुकी थी। बारूद की गंध से जिनके दिल बैठने लगते हैं, उनकी पलायनवादी आवाजें भी सुनाई पड़ने लगी हैं। बेशक युद्ध तबाही लाता है। आर्थिक विकास अवरुद्ध होता है।

सैनिक हताहत होते हैं। लेकिन जब युद्ध थोपा जाए, जमीन हथियाई जाए और नाजी जर्मनी की तरह नई-नई मांगों के साथ अल्टीमेटम दिए जाएं, तो आप क्या करेंगे? मुल्क की इज्जत बचाने के लिए मुंहतोड़ जवाब देंगे या नहीं? सरकार सार्वजनिक प्रतिबद्धता व्यक्त कर चुकी है कि चीन को मई से पहले की स्थिति बहाल करनी पड़ेगी। सफल युद्ध सिर्फ सरकार और सेना नहीं लड़तीं। राष्ट्र की समस्त जनता लड़ती है। इसलिए पूरे देश को मानसिक तौर पर संकल्पबद्ध करने की जरूरत है।

चीन भारत के माफिक हालात पैदा करे, सेनाएं अप्रैल के अंत वाली रेखा तक लौट जाएं और युद्ध का खतरा दूर हो जाए, तब भी भारत को उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए। नेहरू से लेकर मोदी तक भरोसा कई बार किया जा चुका है। अब अगले मोर्चे की तैयारी करनी चाहिए। अगर चीन को यह विश्वास हो जाए कि भारत उसे विजय से वंचित ही नहीं, बल्कि हरा भी सकता है, तो युद्ध की आशंका अपने आप खत्म हो जाएगी। इस समय अंतरराष्ट्रीय शक्ति समीकरण चीन के प्रतिकूल है। लेकिन भारत के इतना अनुकूल भी नहीं कि वह प्रतिरोधक राजनय पर अमल कर सके। कीमत जो भी हो, भारत को भरोसेमंद और प्रतिरोधक शक्ति समीकरण पैदा करने लिए जुटना पड़ेगा।

सौजन्य - अमर उजाला।
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गांव लौटी महिलाओं के हित में :Amar Ujala Editorial

मनीषा सिंह
लॉकडाउन के समय गांव लौटे, और वहां से अब शहर लौट रहे प्रवासी मजदूरों के पूरे प्रसंग में महिला श्रमिकों की चिंता लगभग नदारद है। वे महिलाएं जो मजदूरों के संग गोद में बच्चों को उठाए पैदल चलकर और कई समस्याएं झेलकर गांवों में अपनी ससुराल लौटी हैं और वे महिलाएं जो पहले से गांवों में थीं, दोनों के जीवन में नई त्रासदियां पैदा हो गई हैं।

सरकार ने प्रवासी मजदूरों के लिए मुफ्त राशन का प्रबंध किया है। इसके अलावा सरकार ने गरीब कल्याण रोजगार अभियान नाम से एक अल्पकालीन रोजगार योजना शुरू की है, जिसमें प्रवासी मजदूरों को क्षमता और जरूरतों के अनुसार काम दिलाने का प्रबंध किया जा रहा है।
ऐसी ही एक योजना गांव-देहात लौटी उन महिलाओं के लिए भी हो, जिनके लिए गांवों में अब कोई आसरा नहीं बचा है। इन मजदूरों में वे महिलाएं भी हैं, जो घरों में आया (मेड) के रूप में या फिर कारखानों में होजरी जैसे पेशों में नौकरी और निर्माण स्थलों पर ईंट-बोझा उठाने आदि के काम करती रही हैं।
अनुमानत: दो करोड़ ऐसी महिलाओं ने भी इधर घर (ससुराल) वापसी की होगी। ध्यान रहे कि हमारे देश में पुरुषों के पोषणकर्ता होने की भूमिका को श्रमिक महिलाओं ने चुनौती दी है। पर इन महिलाओं की ससुराल-वापसी कई नए सामाजिक और आर्थिक संकट पैदा करेगी, जिस पर न सरकार और न समाजशास्त्रियों की ही नजर है। ऐसी महिलाओं की शहर से ससुराल वापसी जो समस्याएं पैदा कर रही हैं, उनमें एक यह है कि क्या वे बिना आय वाले ग्रामीण जीवन से सामंजस्य बिठा पाएंगी।

शहरों में अपना अलग परिवार और कमाई करने का मौका ग्रामीण महिलाओं में भी जो आत्मविश्वास भरता है, वह गांव लौटते ही डगमगा जाता है। ध्यान रहे कि ये महिलाएं मायके नहीं, ससुराल लौटी हैं, जहां उनके लिए घरों में ही स्पेस खत्म हो चुका था, क्योंकि उन्होंने काफी पहले विवशता में ही सही, शहर-कूच का रास्ता चुना था। वापसी पर घर के किसी कोने में यदि जगह मिल भी जाए, तो गांव-देहात में उन्हें कोई ऐसा काम मिलना असंभव ही है, जिससे उन्हें आमदनी हो। 

शहरों में इन महिलाओं को कामकाज के अलावा सिर्फ अपने परिवार के भरण-पोषण का प्रबंध करना पड़ रहा था, पर गांव में उन्हें पूरे कुनबे और बड़े-बूढ़ों आदि सभी की सेवा बिना किसी दाम-दमड़ी की अपेक्षा के साथ करनी होगी। अशांति का एक छोर और है।

जो कभी शहर नहीं गईं, गांवों में ऐसी महिलाओं को अब अपनी उन रिश्तेदार महिलाओं के साथ संतुलन बिठाना होगा, जो लॉकडाउन के कारण लौटी हैं। उन्हें अपने घर में रहने को जगह देनी होगी और सम्मान भी, क्योंकि अगर घर लौटने वाली ये श्रमिक महिलाएं पारिवारिक ओहदे में बड़ी हुईं, तो ग्रामीण घरों की बहुओं पर यह जिम्मेदारी होगी कि वे अपने परिवार के साथ इन मेहमानों के भोजन-पानी की व्यवस्था फिलहाल स्थायी प्रबंध के रूप में करें। ये बातें ग्रामीण जीवन में नई कलह का कारण बन सकती हैं।

सच यह है कि अब ग्रामीण और कस्बाई जीवन महिलाओं के लिए ज्यादा उपयुक्त नहीं रह गया है। पिछले एक-दो दशकों में गांव-कस्बों की लड़कियों में शहर जाकर पढ़ाई करने और कुछ बनने का जो जुनून सवार हुआ है, उसके पीछे यही तथ्य काम कर रहा है कि खेतों में बुवाई करने, मवेशियों की देखभाल करने और घर की चक्की में पिसते रहने से बेहतर है कि शहर का रास्ता पकड़ा जाए, जहां काम करने और एक आत्मनिर्भर जिंदगी जीने का कुछ तो मौका मिल सकता है। इसलिए शहर आकर घरों में मेड से लेकर ईंट-गारा ढोने और थोड़ा-बहुत पढ़ लिख गए तो दुकानों-शॉपिंग मॉल में सेल्स गर्ल तक का काम करके भी अपना जीवन धन्य मानती हैं।

सरकार ने लॉकडाउन के असर से ग्रामीण मजदूरों को राहत दिलाने के संबंध में जिस तरह कुछ योजनाएं बनाई हैं, उसी तरह यदि वह इन ग्रामीण महिलाओं की दुविधाओं और समस्याओं को भी ध्यान में रखकर कोई योजना लाती है, तो अच्छा होगा। उल्लेखनीय है कि देश के विकास में महिला योगदान की अब तक उपेक्षा ही हुई है। पर यह सिलसिला आगे भी जारी रहता है, तो इससे देश के आर्थिक विकास का चक्का डगमगा सकता है। सरकारों और संस्थाओं को नहीं भूलना चाहिए कि हर किस्म के पलायन और विस्थापन की सबसे बड़ी मार महिलाओं पर ही पड़ती है।

सौजन्य - अमर उजाला।
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सीएए क्यों अतार्किक और अनैतिक है

रामचंद्र गुहा

मोदी सरकार ने आखिर बिना सोचे-विचारे नागरिकता संशोधन अधिनियम में इतनी राजनीतिक पूंजी क्यों लगा दी है। यह अधिनियम साफ तौर पर अतार्किक है, कम से कम इसलिए क्योंकि इसने भारत की जमीन में रह रहे राज्यविहीन शरणार्थियों के सबसे बड़े समूह को अपने दायरे से अलग रखा है, और ये हैं श्रीलंका के तमिल जिनमें से वास्तव में अनेक लोग हिंदू हैं। यह अधिनियम साफ तौर पर अनैतिक भी है, क्योंकि इससे एक धर्म इस्लाम को अलग रखा गया है, ताकि उसके साथ विद्वेषपूर्ण व्यवहार किया जा सके। यदि सीएए से जुड़े तर्क और नैतिकता संदिग्ध हैं, तो इसे लाए जाने का समय कम रहस्यपूर्ण नहीं है। क्या अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करना और भारत के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य को सिर्फ एक केंद्र शासित प्रदेश में बदल कर भाजपा के कट्टर हिंदुत्व समर्थक आधार को ही संतुष्ट नहीं किया गया? क्या अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक विशाल नए राम मंदिर के निर्माण को मंजूरी नहीं दी, जिसने उन्हें और संतुष्ट किया? क्या आधार बढ़ाने का उनका लालच इतना बढ़ गया है कि इन दो कदमों के बाद इतनी जल्दी तीसरा कदम उठाना पड़ गया?

जम्मू और कश्मीर को कमतर करना और अयोध्या में मंदिर का निर्माण ये दोनों मुद्दे भाजपा के लिए सांकेतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं। लिहाजा कोई आसानी से समझ सकता है कि लोकसभा में लगातार दूसरी बार मिले बहुमत ने मोदी सरकार को इन मुद्दों पर तुरंत आगे बढ़ने की ताकत दी। लेकिन सीएए तो मामूली महत्व का मुद्दा है, अनुमान व्यक्त किया गया था कि इसके पारित होने से कुछ हजार शरणार्थी ही भारतीय नागरिकता हासिल करेंगे। तो फिर इसे इतना महत्व क्यों दिया गया? खासतौर से ऐसे समय जब अर्थव्यवस्था बेहद बुरी स्थिति में है और इस पर तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है?

मोदी सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम को संसद में पारित कराने के लिए दिखाई गई अनुचित हड़बड़ी के पीछे संभवतः दो कारण हो सकते हैं। पहला है, कट्टरता, जिसके पीछे है गणतंत्र के मुस्लिम नागरिकों को और पीछे धकेलने की वैचारिक मजबूरी ताकि वे यहां हिंदू बहुसंख्यकों की अनुकंपा या दया पर निर्भर होकर रहें। दूसरा कारण है अक्खड़पन, यह समझ (या भ्रांति) कि चूंकि भारत के मुस्लिमों ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने या अयोध्या के संबंध में अदालत के फैसले पर किसी तरह का विरोध नहीं जताया, इस बार भी वे उनकी अपनी सरकार द्वारा उन पर लादे जा रहे प्रचंड उत्पीड़न को चुपचाप स्वीकार कर लेंगे।

मगर इसका उलटा हो गया। भारतीय मुस्लिम इस खतरनाक कानून के विरोध में बड़ी संख्या में बाहर आ गए। ऐसा, पूर्व में किए गए प्रयास और प्रधानमंत्री के गले न उतरने लायक इनकार करने के बावजूद, इसलिए हुआ, क्योंकि भारत सरकार और खासतौर से गृह मंत्री ने बार बार स्पष्ट किया है कि नागरिकता संशोधन कानून राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के साथ ही लागू किया जाएगा। इसने यह भय पैदा (जो कि पूरी तरह से वैध है) किया कि इस जुड़वा ऑपरेशन के जरिये विशेष रूप से मुस्लिमों को निशाना बनाया जाएगा, एनआरसी में छूट गए गैर मुस्लिम तुरंत सीएए के आधार पर नागरिकता के लिए पुनः आवेदन कर सकते हैं।

सीएए और एनआरसी के खिलाफ हो रहे लोकप्रिय प्रदर्शनों का एक खास पहलू यह है कि इसमें सारे धर्मों के लोग उत्साह के साथ शामिल हो रहे हैं। कोलकाता और बंगलूरू, मुंबई और दिल्ली में दसियों हजार गैर मुस्लिम भारतीयों ने माना है कि यह नया कानून वास्तव में हमारे गणतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों को धक्का पहुंचाने वाला है। यही बात छात्रों के बारे में कही जा सकती है, जिनकी मौजूदगी और उनका नेतृत्व उल्लेखनीय होने के साथ ही महत्वपूर्ण है।

प्रदर्शनों का दूसरा अनूठा पहलू है इन्हें मिल रहा अंतरराष्ट्रीय कवरेज। ऐसा दो वजहों से हुआ, बड़े पैमाने पर भागीदारी और राज्य की बर्बर प्रतिक्रिया। मई, 2014 के बाद से मोदी सरकार की किसी कार्रवाई ने इस स्तर के विरोध का दूर से भी सामना नहीं किया था। न तो नोटबंदी ने और न ही अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने के कदम ने। हफ्तों से हजारों लोग मौजूदा सत्ता के खिलाफ अपना गुस्सा और असंतोष जाहिर करने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। दिल्ली जैसे शहरों में सरकार ने घबराहट में कदम उठाए और धारा 144 लागू कर दी, इंटरनेट बंद कर दिया और मेट्रो लाइनें बंद कर दीं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सरकार ने निर्मम ताकत का इस्तेमाल किया।

इस मुद्दे को व्यापक रूप से अंतरराष्ट्रीय कवरेज मिला है और यह समान रूप से नकारात्मक है। इस अधिनियम को हर जगह, जैसा कि यह है भी, भेदभाव करने वाले कानून के तौर पर देखा जा रहा है। कई दशकों तक भारत को दक्षिण एशिया के बहुसंख्यकवादी राज्यों के समुद्र के बीच बहुलतावादी प्रकाश स्तंभ के रूप में सराहा जाता रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। अब हमें तेजी से मुस्लिम पाकिस्तान और मुस्लिम बांग्लादेश, या बौद्ध श्रीलंका या बौद्ध म्यांमार के हिंदू संस्करण की तरह देखा जा रहा है- यानी एक ऐसा राज्य जो व्यापक रूप में और कई बार अकेले भी एक धार्मिक बहुसंख्यक के हितों से संचालित है। सरकार इन प्रदर्शनों को लेकर कठोरता से पेश आ रही है, जिससे देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को ही और आंच आई है। यहां तक कि इस्राइल जैसे मित्र देश ने भी अपने नागरिकों को भारत न जाने की सलाह दी है। गोवा और आगरा में पर्यटन पचास फीसदी तक कम हो गया है।

अतार्किक, अनैतिक और यहां तक कि गलत समय में लाए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम ने भारत की वैश्विक छवि को धक्का पहुंचाया है। और संभवतः प्रधानमंत्री की छवि और उनकी विरासत को भी। मई, 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तो अनेक लोग, जिनमें यह लेखक भी शामिल है, उनके द्वारा विदेश नीति को दिए जा रहे असाधारण महत्व को देखकर प्रभावित हुए थे। अपने पहले कार्यकाल में मोदी लगातार दुनिया घूमते रहे, वैश्विक नेताओं के साथ बैठकें करते रहे, दोस्ती बढ़ाते रहे। उनकी कार्रवाइयां और उनके बयान अपने देश को अंतरराष्ट्रीय मामलों में बड़ी ताकत बनाने की उनकी उत्कट इच्छा को दर्शाते थे। ऐसा लगता था कि जवाहरलाल नेहरू के बाद कोई और ऐसा भारतीय प्रधानमंत्री नहीं हुआ, जिसने विदेश नीति में अपनी व्यक्तिगत पूंजी और अपनी ऊर्जा लगाई हो।

ये सारे प्रयास अब एक अकेले ऐसे कानून के कारण निष्प्रभावी और शून्य हो गए हैं, जो कि अनावश्यक होने के साथ ही अविवेकपूर्ण है। इन प्रदर्शनों पर प्रधानमंत्री की खुद की प्रतिक्रियाएं उन्हें ऐसे राजनेता के रूप में प्रदर्शित कर रही हैं, जो खुद से ही सहज नहीं है। सोशल मीडिया में अपने समर्थन में तथाकथित 'संत' का आह्वान करना, प्रदर्शनकारियों से सीएए के बजाय पाकिस्तान की आलोचना करने की मांग करना प्राधिकार या नियंत्रण के संकेत नहीं हैं। प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान हुआ है, मगर उससे अधिक देश को।
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कुछ तो बदल रहा है

सुभाषिनी सहगल अली

असहिष्णुता जैसी थी, वैसी ही है। अपनी बात कहने और दूसरों की बात अनसुनी कर देने की आदत बनी हुई है। अपने को देशभक्त और आलोचक को देशद्रोही ठहराने की प्रक्रिया ज्यों की त्यों है। प्रदर्शनकारियों से ‘बदला’ लेने की घोषणा अब भी गूंज रही है। विरोध करने वालों को आतंकित करने का रवैया नए रूप धारण कर रहा है। गाली, गोली, लाठी-डंडे सब वही जाने-पहचाने हैं, लेकिन दूसरी तरफ बहुत कुछ बदल रहा है। नए जोश के साथ नए नारे लग रहे हैं। ऐसा कुछ हो रहा है, जो लोगों को एक दूसरे से जोड़ रहा है और अकेले पिटने, अकेले मारे जाने, अकेले घेरे जाने और अकेले मरने का भय दूर कर रहा है। जितना भय दूर हो रहा है, उतना और साथ आ रहे हैं, एक दूसरे के साथ जुड़ रहे हैं। एक दूसरे के लिए आवाज उठाने के लिए तैयार हैं;  एक दूसरे को ‘उनसे’ बचाने के लिए तैयार हैं; एक दूसरे के लिए जान देने के लिए तैयार हैं। कुछ तो बदल रहा है। चुप्पियां टूट रही हैं। स्वर से स्वर मिल रहे हैं। हर भाषा के स्वर आपस में मिल रहे हैं और एक नई भाषा, जो सबके विरोध की भाषा है, बन रही है। एक बदलाव आता दिखाई दे रहा है। उसका चेहरा सिर पर खून से भीगी पट्टी बांधे और फिर भी मुस्कराती एक नवयुवती का चेहरा है। उसका चेहरा हाथ में झंडा लिए गरीब बस्ती में रहने वाली परेशान, लेकिन निडर महिला का चेहरा है। उसका चेहरा वह जाना-पहचाना चेहरा भी है, जो सपनों की दुनिया के पर्दों पर ही अब तक दिखता था।

बदलाव के इस समर का हिस्सा मजदूर भी हैं, किसान भी, दलित भी, अल्पसंख्यक भी, लेकिन इसका चेहरा तो महिला का ही है। ऐसा होना अजूबा है, इसलिए आश्चर्यजनक है, इसलिए प्रेरणादायक है, क्योंकि खतरों को झेलते, जानलेवा हमलों से टकराते, डरावनी धमकियां सुनते, अपने शरीर को कांटों के बीच लहूलुहान करते ये चेहरे संग्राम की अगुआई कर रही हैं। जेएनयू की अध्यक्ष, एसएफआई की आईशी घोष, जो थकती नहीं दीख पड़ती, जिसने सरकार की फीस वृद्धि की उस नीति को, जिससे न जाने कितने आम परिवार के बच्चे और उससे भी अधिक परेशान हाल, दूर-दराज के गांवों और कस्बों से निकले होनहार बच्चे शिक्षा का अधिकार पाने से ही वंचित रहते, मानने से इन्कार किया। उसको मार गिराने के लिए गुंडे विश्वविद्यालय में घुसे, उस ढाई पसली की बच्ची को उन्होंने लहूलुहान कर डाला, अस्पताल में वह भर्ती हुई, उसके सिर पर पंद्रह टांके लगे और दूसरे दिन ही, पट्टी बांधे, मुस्कराती हुई वह फिर मोर्चा संभालने पहुंची। फिर सपनों की दुनिया से, जादुई पर्दों पर दिखने वाली भी इन सबके साथ अपनी आवाज जोड़ने लगी, उनके साथ खड़ी भी हुईं। स्वरा तो हर तरह से, लंबे समय से साथ थी, लेकिन ट्विंकल ने अपने पति से अलग सोच रखने का परिचय देते हुए कहा कि अब तो देश में केवल गाय सुरक्षित हैं, छात्र नहीं। बिना अपने पति के दीपिका अकेले ही जेएनयू गईं। आलिया, तापसी, सोनाक्षी, सोनम-सब अपनी आवाज विरोध की आवाजों के साथ मिला रही हैं। इन सबको मालूम है कि ऐसा करने की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उनकी फिल्मों का बहिष्कार किया जाएगा, उन्हें भद्दी गलियों से संवारा जाएगा, उनके चरित्र को कीचड़ में घसीटा जाएगा, लेकिन उन्होंने ठान लिया है कि वे विरोध के साथ रहेंगी।

तभी तो कहना पड़ रहा है : यह जो बदलाव का समर छिड़ गया है, इसका चेहरा एक बहादुर महिला का है। इस धरती को हिलाने में महिलाओं का जबर्दस्त योगदान है।  उनको मालूम है कि इससे तमाम जंजीरें टूटेंगी, और जंजीरों में सबसे अधिक वे ही जकड़ी हुई हैं।

-माकपा की पोलित ब्यूरो सदस्य।
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फारस की खाड़ी के संकट में भारत का दांव

मनोज जोशी

यह हमारी विदेश नीति पर एक दुखद टिप्पणी है कि अमेरिका ने जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के अपने फैसले के बारे में भारत को सूचना देने की जहमत भी नहीं उठाई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरानी नेता जनरल सुलेमानी नई दिल्ली में एक आतंकवादी हमले में शामिल थे। वह संभवतः वर्ष 2012 में इस्राइली राजनयिकों पर हुए हमले का जिक्र कर रहे थे। उनके विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के साथ-साथ जर्मनी और अफगानिस्तान तक से बात की, लेकिन भारत को छोड़ दिया। इसलिए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रविवार को पोम्पियो और ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ को फोन करके दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की। और उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भी ट्रंप को फोन किया। हमलोगों के विपरीत अमेरिका अब खाड़ी के तेल पर निर्भर नहीं है। वह अपने सहयोगियों-इस्राइल, सऊदी अरब, और खाड़ी के शेखशाही की सुरक्षा के लिए ज्यादा चिंतित है। अमेरिकी नीति इस क्षेत्र की राजनीति को संचालित कर रही है, जो इस क्षेत्र के लिए आपदा हो सकती है। याद कीजिए उस अमेरिकी युद्ध को, जिसने इराक को तबाह करके हमें इस्लामिक स्टेट जैसा आतंकी संगठन दिया। और वह युद्ध इस झूठ पर शुरू किया गया था कि सद्दाम हुसैन के पास परमाणु हथियार थे। ईरान के खिलाफ अमेरिकी युद्ध का ईरान और उस क्षेत्र के लिए, जिसमें भारत भी शामिल है, और भी विनाशकारी परिणाम हो सकता है।

हम अपनी जरूरत का 80 फीसदी तेल आयात करते हैं और इसमें से दो तिहाई तेल ईरान के वर्चस्व वाले होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से आता है। इसमें किसी भी तरह के व्यवधान से भारत में अराजकता पैदा होगी, क्योंकि हम अब तक एक महत्वपूर्ण तेल भंडार का निर्माण नहीं कर सके हैं। भारत का रणनीतिक तेल भंडार कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में तीन भूमिगत स्थानों पर है, जिसमें दस दिनों तक खपत के लायक कच्चा तेल है। अतिरिक्त क्षमता के लिए योजना बनी है, पर अब तक निर्माण नहीं हुआ है।

खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता की वजह से तेल की कीमतें मौजूदा 60 डॉलर प्रति बैरल से 70 डॉलर प्रति बैरल तक हो सकती हैं और कहने की जरूरत नहीं कि युद्ध की स्थिति में तेल की कीमतें कितनी बढ़ सकती हैं। ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म नोमुरा के अनुसार, कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से हमारी जीडीपी में 0.2 प्रतिशत की कमी आ सकती है और मुद्रास्फीति में 30 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा, अगर रुपये में एक साथ मूल्यह्रास होता है, तो प्रति पांच फीसदी मूल्यह्रास से मुद्रास्फीति में 20 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी होगी। संक्षेप में, यह हमारी अर्थव्यवस्था के लिए एक बुरी खबर होगी।

भारत को अपने सबसे निकटस्थ स्रोत ईरान से तेल आयात करने से रोकने के बाद अमेरिका अब इराक के साथ भी ऐसा करने की राह पर बढ़ सकता है, जो पिछले दो वर्षों में हमारे तेल आयात (20 फीसदी) का सबसे बड़ा स्रोत था। ट्रंप ने इराक को धमकी दी है कि अगर उसने इराक स्थित 5,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों को वापस जाने के लिए बाध्य किया, तो अमेरिका इराक पर कठोर प्रतिबंध लगा देगा। बेशक सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे अन्य तेल आपूर्तिकर्ता हैं, लेकिन फारस की खाड़ी की अनिश्चित स्थिति में उन तक पहुंचना एक समस्या हो सकती है।

इसके अलावा एक और कारक है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। सऊदी प्रायद्वीप में 70 लाख से ज्यादा भारतीय नागरिक काम करते हैं और सालाना 40 अरब डॉलर अपने देश में भेजते हैं। भारत को यहां दो तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। उस क्षेत्र में युद्ध होने से वहां की अर्थव्यवस्था तबाह हो सकती है, जिसके चलते भारतीय नागरिकों को अपने आकर्षक रोजगार को छोड़कर देश लौटना पड़ सकता है। इसके अलावा भारत को उन्हें जल्दबाजी में वहां से निकालने के लिए भी मजबूर होना पड़ सकता है, जैसा कि उसे 1990 में कुवैत के इराकी हमले के दौरान दो लाख और 2015 में यमन से छह हजार नागरिकों को निकालना पड़ा था।

प्रधानमंत्री मोदी ने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तक पहुंच बनाने के लिए इस क्षेत्र में बहुत सारे व्यक्तिगत प्रयास किए हैं। वह उनके विशाल संप्रभु धन का लाभ उठाना चाहते हैं, जो भारत में बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर धन का स्रोत हो सकता है। ये दोनों देश भी अपने तेल से इतर भविष्य के हिस्से के रूप में भारत को देखते हैं और भारत को अपने स्वाभाविक भागीदार के रूप में विकसित होते देखना चाहते हैं। हालांकि युद्ध और संघर्ष उन सपनों की राह में रोड़ा बन सकते हैं।

लंबे समय से पश्चिमी प्रतिबंध झेलने के कारण ईरान के पास उस तरह की अतिरिक्त संपत्ति नहीं है और न ही वहां प्रवासी भारतीय हैं। पर उसके पास विशाल तेल एवं गैस भंडार, एक महत्वपूर्ण भूराजनीतिक क्षेत्र, प्रतिभाशाली व शिक्षित आबादी और विशाल बाजार है। वह लंबे समय से भारत को एक प्रमुख भागीदार के रूप में देखता है और उसने अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने के लिए पाकिस्तान की नाकाबंदी को दरकिनार करने के लिए चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिए भारत को आमंत्रित किया। एक ऐसा समय था, जब ईरानी और भारतीय नीति की समानता ने हमें 1990 के दशक में अफगानिस्तान में तालिबान विरोधी ताकतों के समर्थन में सहयोग करने की अनुमति दी थी।

लेकिन भारत के लिए ईरान के साथ संबंध बनाए रखने के लिए एक अनुकूल नीति तैयार करना मुश्किल हो गया है, यहां तक कि अमेरिका भारत पर 'अधिकतम दबाव' भी बनाए हुए है। अब चिंता इस बात की है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध होता है, तो भारत को बिना कुछ हासिल किए कोई पक्ष लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिसके बदले में भारत को केवल दर्द ही मिलेगा।

 -लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली के प्रतिष्ठित फेलो हैं।
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पर्यावरण बचाने का दशक

भारत डोगरा


अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने धरती की जीवनदायिनी क्षमता की रक्षा की दृष्टि से इस नए दशक को दूरगामी महत्व का बताया है। कुछ चर्चित जलवायु विशेषज्ञों ने लगभग एक साल पहले पृथ्वी को बचाए रखने से संबंधित एक चेतावनी जारी की थी। बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स से अनेक नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक जुड़े रहे हैं। इनकी ओर से प्रति वर्ष एक प्रतीकात्मक घड़ी ‘डूमस्डे क्लॉक’ जारी की जाती है। इस  घड़ी में रात के 12 बजे को धरती के विनाश का समय माना जाता है। वर्ष 2019 में घड़ी की सुइयों को 12 बजने से दो मिनट पहले पर सेट किया गया। इससे पहले इस प्रतीकात्मक घड़ी की सुइयों को विनाश के इतने नजदीक कभी सेट नहीं किया गया था। दो आधारों पर जलवायु विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पृथ्वी विनाश के नजदीक है। ये हैं- जलवायु परिवर्तन और महाविनाशक हथियार। इन दोनों मुद्दों के विस्तृत आकलन से वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि धरती विनाश के इतने निकट कभी नहीं थी, जितनी इन दिनों है। इस तरह की पहली बड़ी चेतावनी 1992 में दी गई थी। उसके 25 वर्ष पूरे होने पर जब इसका आकलन वैज्ञानिकों ने किया, तो उन्होंने पाया कि जिन बिंदुओं के आधार पर वह चेतावनी दी गई थी, उनमें से एक (ओजोन परत) को छोड़कर शेष सभी ममलों में स्थिति पहले से और बिगड़ गई है। इस तथ्यात्मक स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हुए इस चेतावनी की दोहराया गया, और इस पर लगभग 15,000 वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों ने दस्तखत किए।

अतः नए दशक के आरंभ में विश्व स्तर पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि धरती की जीवनदायिनी क्षमता की रक्षा के लिए एक बहुत बड़ा प्रयास किया जाए और इसके लिए संकीर्ण सरोकारों को छोड़कर विश्व स्तर पर एक बड़ी एकता कायम की जाए। इसके लिए अमन-शांति, पर्यावरण रक्षा और न्याय-समता के जन-आंदोलनों में एक बड़ा उभार लाना होगा व उनकी परस्पर एकता व एकजुटता कायम करनी होगी, ताकि वे परस्पर मिलकर एक बड़ी ताकत बन सकें। इस पूरे प्रयास में युवाओं और महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

क्या यह संभव है कि जबर्दस्त जन-शक्ति के उभार से विश्व स्तर पर हम सबसे बड़ी समस्या के समाधान की ओर तेजी से बढ़ें? स्वीडन की एक किशोरी ग्रेटा थनबर्ग ने पर्यावरण को बचाने की लड़ाई में जो भूमिका अख्तियार की, ट्रंप के रवैये के खिलाफ वह जिस तरह खड़ी हुई, यह इसका एक उदाहरण है। थनबर्ग की इस भूमिका को सराहा गया और वह टाइम मैग्जीन की पर्सन ऑफ द ईयर चुनी गई। दुनिया भर में इस तरह के व्यक्तित्वों के उभार और आंदोलन की जरूरत है। पर्यावरण की लड़ाई लड़ने के लिए व्यापक सोच की जरूरत है। आज धरती की रक्षा की बड़ी जिम्मेदारी के सामने संकीर्णताओं के लिए जरा भी स्थान नहीं है, हमें पूरी दुनिया की भलाई के बारे में सोचना है और भावी पीढ़ियों की चिंता करनी है। इन जिम्मेदारियों के अनुरूप जीवन-मूल्यों को अपनाना जरूरी है और इसमें शिक्षा की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।

विश्व के मौजूदा संकट की गंभीरता की ओर ध्यान दिलाने वालों में भी कई बार व्यापक सोच का अभाव दिखता है। वे जलवायु बदलाव जैसी समस्या के समाधान के तकनीकी पक्ष को तो रेखांकित करते हैं, पर यह नहीं बताते कि इसके साथ युद्ध व हिंसा, सांप्रदायिकता व भेदभाव, अन्याय व शोषण को रोकना भी जरूरी है। जब व्यापक सोच व निरंतरता से कार्य होगा, तो समस्याओं के समाधान भी मिलेंगे। यही नए दशक का सबसे बड़ा मकसद होना चाहिए।
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जल संस्कृति के वारिस (अमर उजाला)

सुरेंद्र बांसल
भारत नदियों की संस्कृति का वारिस है। यहां की तमाम नदियां करोड़ों लोगों की आजीविका का स्थायी स्रोत होने के साथ-साथ जैव विविधता, पर्यावरण और पारिस्थितिक संतुलन की पोषक रही हैं। यहां तमाम नदियां मात्र जल स्रोत नहीं मानी जाती हैं बल्कि मातृ रूप में पूजित हैं। ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी भी इनमें से एक थी। करीब पांच हजार वर्ष पहले सरस्वती के विलुप्त होने के कारण चाहे कुछ भी रहे हों, लेकिन उसकी याद दिलाने वाले स्तोत्र को करोड़ों लोग आज भी गुनगुनाते हैं। हजारों वर्ष पहले विलुप्त हुई सरस्वती नदी से जुड़ी मामूली खबर भी सरकारों और आमजन के लिए कौतूहल का विषय बन जाती है। पर आज हमारी गैर-जिम्मेदार और संवेदनहीन जीवन शैली के कारण नदियों, तालाबों समेत तमाम प्राकृतिक जलस्रोत न केवल दूषित होते जा रहे हैं बल्कि दम भी तोड़ रहे हैं। अपने देश की कोई भी सांस्कृतिक गाथा नदियों के पुण्यधर्मी प्रवाह को बिसरा कर नहीं लिखी जा सकती। लेकिन आज हम नदियों के महत्व को भूलकर उन्हें बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। इसी का नतीजा है कि चारों ओर जल संकट छाया हुआ है। हमें इस बात का एहसास जितनी जल्दी हो जाए उतना ही अच्छा है कि अगर हम जल संस्कृति के वारिस रहना चाहते हैं, तो हमें नदियों, तालाबों, जोहड़ों, डबरों, बावड़ियों, कुओं और अन्य जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रण लेना होगा।

भारत के उत्तरी भाग को गंगा और यमुना ने ही संसार का सबसे विस्तृत उर्वर क्षेत्र बनाया है। पश्चिम भाग  अपनी पांच नदियों के कारण पंचनद प्रदेश कहलाता है। नर्मदा, महानदी, ताप्ती और सोन नदियां जहां मध्य भाग का गौरव हैं, वहीं दक्षिण भाग कृष्णा, कावेरी और गोदावरी के कारण धन-धान्य से पोषित रहा है। उत्तर-पूर्व भाग भला ब्रह्मपुत्र और तीस्ता के उपकारों को कैसे भूल सकता है। इन सबके बीच भी सैकड़ों नदियां ऐसी हैं जो सदियों से देश के जन-गण के लिए प्राकृतिक नीति आयोग का काम करती आ रही हैं।

अफसोस है कि सांस्कृतिक शिक्षा के अभाव ने हमारे काल-बोध को कमजोर कर दिया है। बेशक विकास की गाद इन नदियों के पाट समेटने में लगी हुई है, इसके बावजूद आम भारतीय जनमानस नदियों की निर्मलता से आज भी अपने जीवन का सार खोजता है। हमारा वैदिक और पौराणिक साहित्य नदियों की स्तुतियों भरा पड़ा है। प्रत्येक नदी के स्तोत्र हैं, आरती-पूजा का विधान है। लेकिन इन्हें बचाए रखने का विधान कहीं खो गया है।

सरस्वती नदी का उद्गम स्थल आदिबद्री (यमुनानगर) माना जाता है, लेकिन हैरानी की बात है कि इस क्षेत्र में प्लाइवुड उद्योग धड़ल्ले से जंगलों पर कुल्हाड़ी चला रहा है। साधारण सी बात है कि जिन इलाकों में पेड़ कटान बहुत अधिक हो वहां का भू-जल स्तर भी बहुत तेजी से गिरता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जीवन को चलाने के लिए कारोबार जरूरी हैं। लेकिन क्या यह संभव है कि प्रत्येक प्लाइवुड लाइसेंस धारक प्रतिवर्ष अपना लाइसेंस रिन्यू करवाने से पूर्व कम से कम पांच सौ पेड़ अवश्य लगाए? हरियाणा सरकार का पहला कार्यकाल खत्म हो गया लेकिन अब जबकि दोबारा सरकार बनी है, तो उसको कुछ गंभीर प्रयास अवश्य करने चाहिए।

सरकार का यह दायित्व है कि वह लोगों के साथ मिलकर निर्मल नदी, तालाब, जोहड़, बावड़ी और जल के संकल्प को योजनाबद्ध तरीके से फलदायी बनाए। हरियाणा अपनी भूजल संपदा के मामले में बड़े संकट के मुहाने पर है। यमुना नदी आज सीवरेज और औद्योगिक कचरे का जहरीला कॉकटेल मात्र बची है। हरियाणा में कुल 108 जलसंभर क्षेत्र हैं, जिनमें से 82 डार्क जोन में बदल चुके हैं। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र करनाल के सभी छह ब्लॉक डार्क जोन में बदल चुके हैं। हरियाणा देश का एकमात्र राज्य है, जहां छह फीसद वन बचे हैं। जिस प्रदेश में वन इतने कम हों वहां कभी भी अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है। हरियाणा सरकार को नए सपनों के साथ प्रदेश की शुष्क पर्यावरणीय स्थिति को संभालना होगा।

हालांकि हरियाणा सौभाग्यशाली है कि प्रदेश में सरस्वती के प्रकट होने की खबरें यदा-कदा आ रही हैं, लेकिन सरकार को मात्र दिखावा कर अपने कर्तव्य से पल्ला नहीं झाड़ना होगा बल्कि प्रदेश के सभी पुरातन जल स्रोतों के संरक्षण का जिम्मा उठाना होगा। सरस्वती बोर्ड की सार्थकता तभी है जब हरियाणा की नदियां, तालाब, जोहड़, डबरे, बावड़ियां और कुएं संरक्षित किए जाएं। अन्यथा अक्सर ऐसी संस्थाएं कुछ ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं या परिचितों के पेट की भेंट चढ़ जाती हैं। यदि प्रदेश सरकार जल स्रोतों को बचाने में सफल होती है तो यकीन मानें इससे न केवल विलुप्त हो रही यमुना बच पाएगी बल्कि कोई 'सरस्वती कभी लुप्त नहीं होगी।


सौजन्य - अमर उजाला।
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भारत की उन्नति ऐसे भी हो सकती है (अमर उजाला)

गौतम चटर्जी
तकरीबन 135 साल पहले और अपने देहांत से ठीक एक साल पहले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बलिया में एक महत्वपूर्ण भाषण दिया था, जिसका विषय था-भारत वर्षोन्नति कैसे हो सकती है। उस समय अंग्रेजों का शासन था, और आजादी की कोई संभावना सामने नहीं दिखती थी। देश की उन्नति कैसे हो, इसके बारे में भारतेंदु ने देशवासियों को ही सुझाया था, न कि अंग्रेजों को। इस भाषण में देश आजाद कैसे हो इसपर चिन्ता नहीं है बल्कि उसी परिस्थिति में देश की उन्नति कैसे हो सकती है, इसी पर क्रमवार ढंग से बोला गया था। यह भाषण विशेषकर शिक्षा अर्जित करने और काम करने की प्रवृत्ति बढ़ाने पर ज्यादा केंद्रित था। 1857 से अंग्रेज शासक पूरी तरह शासन करने की भूमिका में आए। उससे पहले तक मुगल राज ही था। 1884 में दिये अपने भाषण में भारतेंदु यह भी कह गये कि मुसलमान भाईयों के लिए उचित है कि इस हिन्दुस्तान में बस कर वे लोग हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें और सगे भाईयों की भांति हिंदुओं से बर्ताव करें। भारतेंदु के कहने का मतलब है कि छह सौ साल के मुगलकाल का प्रभाव उस समय तक भी क्षीण नहीं हुआ था। 1884 में दिये इस भाषण के साथ साथ उसी वर्ष हुई एक और उपलब्धि भी यहां उल्लेखनीय है।

मेडिकल हाल प्रेस, वाराणसी से भारतेंदु का एक ग्रंथ प्रकाशित हुआ था, काश्मीर कुसुम अथवा राजतरंगिणी-कमल। इस ग्रंथ में कश्मीर का संक्षिप्त इतिहास तो संकलित है ही, कल्हण के राजतरंगिणी के बाद की समस्त ऐतिहासिक घटनाएं भी इसमें वर्णित हैं। इस प्रकार अपने भाषण में सुझाये देश की उन्नति के भारतेंदु तरीकों और राजतरंगिणी से लेकर उन्नीसवीं सदी के ग्रंथ काश्मीर कुसुम तक यदि नजर दौड़ायें तो हमें एक प्रकाश मिलता है। अर्थात् अपने देश की उन्नति के लिए हमें अपने ही साहित्य, दर्शन, इतिहास या एक शब्द में कहें तो काव्यपरंपरा के प्रभाव से आज की परिस्थिति में हम निर्द्वंद्व होकर कह सकते हैं कि भारत की उन्नति ऐसे भी हो सकती है।

देश में नवीं और दसवीं सदी तक हिंदू और बौद्ध परंपरा अपनी उन्नत अवस्था में थी। इतिहास कहता है कि ग्यारहवीं सदी से हिंदू साम्राज्य टूटता चला गया। तथ्य यह है कि महमूद गजनवी ने 1015 ई. और फिर 1021 ई. में विशेषरूप से कश्मीर में मुस्लिम व्यवस्था थोपने की कोशिश की लेकिन वह कश्मीर के हिंदुओं के विरोध के कारण सफल नहीं हो सका। हिंदू दर्शन परंपरा की ही प्रतिबिंब थी, उस समय तक उन्नत हो चुकी भारतीय काव्य परंपरा। संस्कृत काव्यशास्त्र भरत मुनि के नाट्यशास्त्र और भामह एवं दंडी के काव्यालंकार- काव्यादर्श में अपनी उन्नत अवस्था में पहुंच चुका था। यह वामन, रूद्रट, आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त, कुंतक आदि ऋषिकवियों के लिखे से पुष्ट होता है।

कल्हण ने बारहवीं सदी में लिखा। उनसे पहले भोज, आनंदवर्धन और अभिनवगुप्त ने कश्मीर की वृहत्तर घाटियों को ज्ञान से प्रकाशित और इस घाटी में बसने वाले लोगों को प्रशस्त कर रखा था। मुगलकाल बस रहा था, तो सिर्फ इस कारण कि वह गजनवी की तरह हिंदू संस्कृति को नष्ट करने की धृष्टता की जगह हिन्दू काव्य और दर्शन को सम्मानित देखने की कमसिन नजाकत या भंगिमा में आरूढ़ हो रहा था। हम साम्राज्य, युद्ध और हार-जीत की भाषा में पढ़ते आ रहे अपने इतिहास को कभी इस तरह देखते ही नहीं कि मुगलकाल सिर्फ साम्राज्य आधारित काल का इतिहास भर नहीं है।

इसकी शुरुआत पूर्व प्रतिष्ठित कला और संस्कृति में रंगे लोगों के मानस को साथ लेकर चलने की मुद्रा से हुई। बारहवीं और तेरहवीं सदी में ही शारंगदेव और पार्श्वनाथ हुए और उन्होंने उसी कश्मीर आभा और परंपरा की आंच में संगीत के ग्रंथ रचे। अर्थात भले ही संस्कृत नाटक के मंचन की परंपरा बाधित हुई और ध्रुपद ख्याल में बदलते गये लेकिन ऋषि पूरे मुक्त सामाजिक स्वर में लोगों के बीच होते चले गये और ग्रंथ रचा जाता रहा।

चौदहवीं सदी में ही ऋषि लल्लेश्वरी, हब्बा खातून, रूपा भवानी और अर्निमल भी हुई, उनकी कविताएं मुगलकाल में ही लोगों के बीच प्रिय हुईं। यह गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, अपाला और वागंम्भृणी की वैदिक ऋषि परम्परा का ही शैव विस्तार था, मध्यकाल में जिसकी भूमि कश्मीर में शैव दर्शन ऋषि दुर्वासा और वसुगुप्त से लेकर उत्पलदेव और अभिनवगुप्त ने तैयार की थी। यह परंपरा नंद ऋषि यानी नुरुद्दीन से होते हुए बीसवीं सदी के लक्ष्मण जू तक पल्लवित होती रही।

मुगल शासन के दौरान पूरे छह सौ वर्षों में कश्मीर लोग और ऋषि कश्मीर छोड़ कर शेष भारत में कहीं विस्थापित नहीं हुए जबकि मुगलों का शासन कश्मीर तक सीमित नहीं था। बात सिर्फ तब के शासकीय साम्राज्य या आज की शासकीय राजनीति तक सीमित नहीं है। भारतीय मानस में चार हजार साल से रचे बसे आर्य, वैदिक हों हिन्दू, बौद्ध या शैव दर्शन की गहरी काव्यपरम्परा से भी हमारा इतिहास बना है, सिर्फ राजाओं के साम्राज्य, हमलों व शासनों से नहीं।


सौजन्य - अमर उजाला।
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शिक्षित हुई, कामकाजी हुई लेकिन कितनी सशक्त हुई स्त्री (अमर उजाला)

मनीषा सिंह
भारत में यह बड़ी विडंबना है कि एक तरफ महिलाओं के साथ उनका समाज कोई रियायत नहीं बरतता, तो दूसरी तरफ कार्यस्थल पर उन्हें यह कहकर कोई छूट नहीं मिलती कि उन्हें तो पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलना है। महिला सशक्तिकरण हो जाए और घर के कामकाज में स्त्री के हाथ लगने का सुभीता बना रहे, इसके लिए अध्यापन जैसे पेशे को महिलाओं के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। कोई शिक्षिका यह नहीं कर सकती कि सुबह उठकर वह स्कूल जाने की तैयारी करे, पर घर की साफ-सफाई न करे, परिवार के लिए भोजन न पकाए। जबकि उसी स्कूल में पढ़ाने वाले पुरुष शिक्षक घर में चाय बनाने से ज्यादा कोई योगदान शायद ही करते हों। कामकाजी स्त्रियों की इस स्थिति का अंदाजा शीर्ष संस्थाओं को भी है,  इसीलिए चार साल पहले विश्व बैंक ने टिप्पणी की थी कि हम महिलाओं के सशक्तिकरण की चाहे जितनी डींगें हांक लें, पर 21वीं सदी के भारत में भी महिलाओं की स्थिति में कोई ज्यादा फर्क नहीं आया है। वे पढ़-लिखकर कामकाजी जरूर हुई हैं, पर घर से बाहर उन्हें और ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। नौकरी के लिए निकलते हुए उन्हें अपने पति और सास-ससुर से इजाजत लेनी पड़ती है। मर्दों से कम वेतन पर उन्हें ज्यादा असुविधाजनक माहौल में काम करना पड़ता है, कई बार सार्वजनिक स्थानों पर यौन उत्पीड़न सहना पड़ता है और वे हिंसा का शिकार भी होती हैं। इसके बाद भी उन्हें घर के काम या अन्य जिम्मेदारियों से छूट नहीं मिलती।

इन सारे तथ्यों का एक ठोस संकेत विश्व बैंक की ‘महिला, कारोबार और कानून 2016’ रिपोर्ट में किया गया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि यह घोर अन्याय है कि जिस समाज की उन्नति में महिलाएं अपना भरपूर योगदान देती हैं, वही समाज महिलाओं के नौकरी पाने की उनकी क्षमता या आर्थिक जीवन में उनकी भागीदारी पर पाबंदियां लगाता है। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि 30 देशों में विवाहित महिलाएं इसका चयन नहीं कर सकतीं कि उन्हें कहां रहना है और 19 देशों में वे अपने पति का आदेश मानने को कानूनन बाध्य होती हैं।

घर के साथ नौकरी चलाने का जैसा दबाव महिलाओं के ऊपर होता है, पुरुष न तो वैसा दबाव झेलते हैं और न ही नियोक्ता से लेकर घर-समाज उनसे वे अपेक्षाएं करता है। समाज तो जब बदलेगा, तब बदलेगा, लेकिन महिला कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियां-फैक्टरियां तो ऐसे प्रबंध कर ही सकती हैं कि वे कार्यस्थल पर महिलाओं के अनुकूल वातावरण बनाएं और उनकी अपेक्षाओं-जरूरतों को ध्यान में रखें। अभी हमारे देश में ऐसी पहलकदमी करने वाली कंपनियां उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं। एक बड़ा मसला मातृत्व का भी है। वैसे तो लगभग पूरी दुनिया में स्त्री के लिए नौकरी करते हुए बच्चे को जन्म देना और उसका पालन-पोषण करना बेहद मुश्किल काम है। पर भारत में तो ज्यादातर छोटी कंपनियों में किसी महिला के लिए मातृत्व का मतलब आम तौर पर अपने करियर की तिलांजलि देना ही होता है।

इसका अभिप्राय यह नहीं है कि कंपनियां अपने दफ्तरों में कर्मचारियों के बच्चों के लिए किंडरगार्टन बनाएं, बल्कि यह भी है वे महिला कर्मचारियों को बाधारहित करियर का विकल्प दें। चाहे अध्ययन का मामला हो या कंपनियों में नौकरी का, ध्यान रखना होगा कि पूरी दुनिया में समाज और मूल्य तेजी से बदल रहे हैं। इसलिए सभी का प्रयास ऐसे बदलावों से तालमेल बिठाना होना चाहिए, जिससे स्वस्थ समाज की रचना हो सके।

सौजन्य - अमर उजाला।
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देशहित में है सीएबी (अमर उजाला)

राजीव चंद्रशेखर
वर्ष 1947 में भारत आजाद हुआ और उससे अलग होकर पाकिस्तान बना। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना, जहां बिना किसी धार्मिक भेदभाव के सभी नागरिकों के लिए मौलिक अधिकार सुनिश्चित किए गए, जबकि पाकिस्तान एक इस्लामी राष्ट्र बना। उसी दिन से यह स्पष्ट था कि दोनों राष्ट्रों में धार्मिक अल्पसंख्यक रहेंगे। 73 वर्ष बाद यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान जैसे राष्ट्र में, जो आधिकारिक रूप से इस्लामी राष्ट्र है, हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध जैसे अल्पसंख्यक डर और खतरे में रहते हैं और जातीय सफाये और उत्पीड़न के शिकार हैं। अक्सर उन्हें जिंदगी और मौत से जूझना पड़ता है। यह स्थिति तब है, जब 1950 में नेहरू-लियाकत ने अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए कुख्यात समझौता किया था। इस समझौते की विफलता, जो विभाजन की ऐतिहासिक गड़बड़ी की कीमत पर हुआ था, का दंश लोग आज भी भुगत रहे हैं। इसके विपरीत भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति बेहतर हुई है और समय-समय पर होने वाले सांप्रदायिक दंगों के बावजूद उनका विकास हुआ है।

और इसलिए जातीय सफाई, जबरन धर्मांतरण और हिंसा के जानबूझकर चलाए गए अभियान के परिणामस्वरूप पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में अल्पसंख्यकों की संख्या काफी घट गई है। जातीय सफाई, उत्पीड़न और हिंसा के शिकार उन लोगों को उन देशों में कानून का संरक्षण भी नहीं मिलता है। उनमें से कई लोग एकमात्र सुरक्षित आश्रय मानकर भागकर भारत चले आए हैं, जिसे वे जानते हैं और जिस पर भरोसा करते हैं। वर्षों से वे भारत में शरणार्थी बने हुए हैं, जहां उनकी कोई कानूनी पहचान नहीं है और वे निराशा का जीवन जी रहे हैं।

नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) इन शरणार्थियों का भविष्य सुरक्षित करते हुए उन्हें भारत का नागरिक बना सकता है। दुनिया में कोई देश नहीं है, जिसे ये शरणार्थी अपना घर कह सकते हैं। इसके अलावा, यह विधेयक उन तीन देशों में रहने वाले अल्पसंख्यकों के लिए उम्मीद की किरण बन सकता है, जो वहां उत्पीड़न का शिकार हैं और अगर वे चाहें, तो भारत आ सकते हैं। यह बहुत ही सरल प्रस्ताव है, जिसे आम तौर पर मानवीय आधार पर सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए।

लेकिन अनुमानित रूप से कुछ राजनीतिक दलों की वोट बैंक की राजनीति ने इस प्रयास को भी बाधित करने की कोशिश की है। विशेष रूप से कांग्रेस इस विधेयक के मुस्लिम विरोधी और भेदभावपूर्ण होने का दुष्प्रचार कर रही है। ऐसा संभवतः वह खुद को मुस्लिम समर्थक बताने के अपने राजनीतिक झूठ के आधार पर कर रही है। कांग्रेस द्वारा जिन बिंदुओं का उल्लेख किया जा रहा है, वह यह है कि यह विधेयक मुस्लिम विरोधी, संविधान विरोधी और भेदभावपूर्ण है और अन्य देशों के शरणार्थियों को भी नागरिकता की अनुमति दी जानी चाहिए। अगर जरा-सा भी परीक्षण किया जाए, तो इन आरोपों का खोखलापन स्पष्ट हो जाएगा। इस विधेयक में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो किसी भारतीय नागरिक के मामूली अधिकारों को प्रभावित करता है, चाहे वह मुस्लिम हो या किसी अन्य धर्म का। इसमें कोई भेदभाव नहीं है, यह तीन इस्लामी राष्ट्रों के सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों की बात करता है। और जहां तक सवाल यह है कि इसमें श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार जैसे अन्य देशों के शरणार्थियों को क्यों शामिल नहीं किया गया, तो उसका जवाब यह है कि ये ऐसे देश नहीं हैं, जहां तीन इस्लामी राष्ट्रों की तरह धर्म के आधार पर निर्धारित राष्ट्रधर्म और कानून है। यह आरोप भी गलत है कि यह विधेयक हिंदूवादी है, क्योंकि श्रीलंका से आने वाले हजारों हिंदू शरणार्थी हैं, जो इस विधेयक से बाहर हैं।

इस पूरी बहस में राहुल गांधी और कांग्रेस की प्रतिक्रिया वैसी ही थी, जैसी सीमा पार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की थी। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने तो यह विचित्र तर्क भी दिया कि रोहिंग्याओं को भी शरण दी जानी चाहिए, जबकि बांग्लादेश भी ऐसा नहीं करना चाहता। पिछले सात दशकों में सार्वजनिक वित्त, चुनावी जनसांख्यिकी और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में अवैध प्रवासन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। कांग्रेस दशकों तक इस मुद्दे के साथ राजनीतिक फुटबॉल की तरह खेल खेलती रही है और वह इसे आगे भी जारी रखना चाहती है।

कांग्रेस के लिए शर्मनाक बात यह है कि इन शरणार्थियों को नागरिकता देने का उसका मौजूदा विरोध उसके अपने पहले के रुख के विपरीत है, क्योंकि वर्ष 1943 में वह गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए नागरिकता चाहती थी। वर्ष 2003 में डॉ. मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के धार्मिक शरणार्थियों के लिए इसी तरह की नागरिकता पर जोर डाला था। और इसलिए तुष्टीकरण और राजनीतिक स्मृतिलोप को संतुलित करने की कोशिश में कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक पाखंड उजागर हो गया है।

स्पष्ट है कि यह विधेयक उन लोगों के लिए कानूनी प्रवासन की प्रक्रिया में बदलाव नहीं करता है, जो भारत आना चाहते हैं। यह विधेयक कानूनी प्रवासन को न तो प्रोत्साहित करता है और न ही हतोत्साहित करता है। नागरिकता चाहने वाले लोगों के लिए कानून वही है। जो लोग वैध नागरिकता चाहते हैं, वे मौजूदा नागरिकता अधिनियम के तहत निर्धारित नागरिक बनने की प्रक्रिया का उपयोग कर सकते हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार विशेष रूप से अवैध प्रवासन पर रोक लगाना चाहती है, जो पूरी तरह से देश के बेहतर हित में है। भाजपा अपने विभिन्न घोषणापत्रों, विशेष रूप से 2019 के घोषणापत्र में अपने इस इरादे पर दृढ़ रही है। जो लोग धार्मिक उत्पीड़न का शिकार रहे हैं, उन्हें सुरक्षित आश्रय प्रदान करने का फैसला सही है। और इसलिए मोदी सरकार 70 साल की यथास्थिति को चुनौती दे रही है, उसे बदल रही है और दशकों से धार्मिक शरणार्थी के रूप में पीड़ित लोगों को मानवीय समर्थन दे रही है और आगे भी देती रहेगी। नरेंद्र मोदी सरकार की देश हित के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता है, जैसी अतीत की किसी भी सरकार में नहीं थी और यह नए भारत की वास्तविकता है।

सौजन्य - अमर उजाला।
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देशहित में है सीएबी (अमर उजाला)

राजीव चंद्रशेखर
वर्ष 1947 में भारत आजाद हुआ और उससे अलग होकर पाकिस्तान बना। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना, जहां बिना किसी धार्मिक भेदभाव के सभी नागरिकों के लिए मौलिक अधिकार सुनिश्चित किए गए, जबकि पाकिस्तान एक इस्लामी राष्ट्र बना। उसी दिन से यह स्पष्ट था कि दोनों राष्ट्रों में धार्मिक अल्पसंख्यक रहेंगे। 73 वर्ष बाद यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान जैसे राष्ट्र में, जो आधिकारिक रूप से इस्लामी राष्ट्र है, हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध जैसे अल्पसंख्यक डर और खतरे में रहते हैं और जातीय सफाये और उत्पीड़न के शिकार हैं। अक्सर उन्हें जिंदगी और मौत से जूझना पड़ता है। यह स्थिति तब है, जब 1950 में नेहरू-लियाकत ने अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए कुख्यात समझौता किया था। इस समझौते की विफलता, जो विभाजन की ऐतिहासिक गड़बड़ी की कीमत पर हुआ था, का दंश लोग आज भी भुगत रहे हैं। इसके विपरीत भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति बेहतर हुई है और समय-समय पर होने वाले सांप्रदायिक दंगों के बावजूद उनका विकास हुआ है।

और इसलिए जातीय सफाई, जबरन धर्मांतरण और हिंसा के जानबूझकर चलाए गए अभियान के परिणामस्वरूप पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में अल्पसंख्यकों की संख्या काफी घट गई है। जातीय सफाई, उत्पीड़न और हिंसा के शिकार उन लोगों को उन देशों में कानून का संरक्षण भी नहीं मिलता है। उनमें से कई लोग एकमात्र सुरक्षित आश्रय मानकर भागकर भारत चले आए हैं, जिसे वे जानते हैं और जिस पर भरोसा करते हैं। वर्षों से वे भारत में शरणार्थी बने हुए हैं, जहां उनकी कोई कानूनी पहचान नहीं है और वे निराशा का जीवन जी रहे हैं।

नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) इन शरणार्थियों का भविष्य सुरक्षित करते हुए उन्हें भारत का नागरिक बना सकता है। दुनिया में कोई देश नहीं है, जिसे ये शरणार्थी अपना घर कह सकते हैं। इसके अलावा, यह विधेयक उन तीन देशों में रहने वाले अल्पसंख्यकों के लिए उम्मीद की किरण बन सकता है, जो वहां उत्पीड़न का शिकार हैं और अगर वे चाहें, तो भारत आ सकते हैं। यह बहुत ही सरल प्रस्ताव है, जिसे आम तौर पर मानवीय आधार पर सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए।

लेकिन अनुमानित रूप से कुछ राजनीतिक दलों की वोट बैंक की राजनीति ने इस प्रयास को भी बाधित करने की कोशिश की है। विशेष रूप से कांग्रेस इस विधेयक के मुस्लिम विरोधी और भेदभावपूर्ण होने का दुष्प्रचार कर रही है। ऐसा संभवतः वह खुद को मुस्लिम समर्थक बताने के अपने राजनीतिक झूठ के आधार पर कर रही है। कांग्रेस द्वारा जिन बिंदुओं का उल्लेख किया जा रहा है, वह यह है कि यह विधेयक मुस्लिम विरोधी, संविधान विरोधी और भेदभावपूर्ण है और अन्य देशों के शरणार्थियों को भी नागरिकता की अनुमति दी जानी चाहिए। अगर जरा-सा भी परीक्षण किया जाए, तो इन आरोपों का खोखलापन स्पष्ट हो जाएगा। इस विधेयक में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो किसी भारतीय नागरिक के मामूली अधिकारों को प्रभावित करता है, चाहे वह मुस्लिम हो या किसी अन्य धर्म का। इसमें कोई भेदभाव नहीं है, यह तीन इस्लामी राष्ट्रों के सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों की बात करता है। और जहां तक सवाल यह है कि इसमें श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार जैसे अन्य देशों के शरणार्थियों को क्यों शामिल नहीं किया गया, तो उसका जवाब यह है कि ये ऐसे देश नहीं हैं, जहां तीन इस्लामी राष्ट्रों की तरह धर्म के आधार पर निर्धारित राष्ट्रधर्म और कानून है। यह आरोप भी गलत है कि यह विधेयक हिंदूवादी है, क्योंकि श्रीलंका से आने वाले हजारों हिंदू शरणार्थी हैं, जो इस विधेयक से बाहर हैं।

इस पूरी बहस में राहुल गांधी और कांग्रेस की प्रतिक्रिया वैसी ही थी, जैसी सीमा पार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की थी। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने तो यह विचित्र तर्क भी दिया कि रोहिंग्याओं को भी शरण दी जानी चाहिए, जबकि बांग्लादेश भी ऐसा नहीं करना चाहता। पिछले सात दशकों में सार्वजनिक वित्त, चुनावी जनसांख्यिकी और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में अवैध प्रवासन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। कांग्रेस दशकों तक इस मुद्दे के साथ राजनीतिक फुटबॉल की तरह खेल खेलती रही है और वह इसे आगे भी जारी रखना चाहती है।

कांग्रेस के लिए शर्मनाक बात यह है कि इन शरणार्थियों को नागरिकता देने का उसका मौजूदा विरोध उसके अपने पहले के रुख के विपरीत है, क्योंकि वर्ष 1943 में वह गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए नागरिकता चाहती थी। वर्ष 2003 में डॉ. मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के धार्मिक शरणार्थियों के लिए इसी तरह की नागरिकता पर जोर डाला था। और इसलिए तुष्टीकरण और राजनीतिक स्मृतिलोप को संतुलित करने की कोशिश में कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक पाखंड उजागर हो गया है।

स्पष्ट है कि यह विधेयक उन लोगों के लिए कानूनी प्रवासन की प्रक्रिया में बदलाव नहीं करता है, जो भारत आना चाहते हैं। यह विधेयक कानूनी प्रवासन को न तो प्रोत्साहित करता है और न ही हतोत्साहित करता है। नागरिकता चाहने वाले लोगों के लिए कानून वही है। जो लोग वैध नागरिकता चाहते हैं, वे मौजूदा नागरिकता अधिनियम के तहत निर्धारित नागरिक बनने की प्रक्रिया का उपयोग कर सकते हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार विशेष रूप से अवैध प्रवासन पर रोक लगाना चाहती है, जो पूरी तरह से देश के बेहतर हित में है। भाजपा अपने विभिन्न घोषणापत्रों, विशेष रूप से 2019 के घोषणापत्र में अपने इस इरादे पर दृढ़ रही है। जो लोग धार्मिक उत्पीड़न का शिकार रहे हैं, उन्हें सुरक्षित आश्रय प्रदान करने का फैसला सही है। और इसलिए मोदी सरकार 70 साल की यथास्थिति को चुनौती दे रही है, उसे बदल रही है और दशकों से धार्मिक शरणार्थी के रूप में पीड़ित लोगों को मानवीय समर्थन दे रही है और आगे भी देती रहेगी। नरेंद्र मोदी सरकार की देश हित के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता है, जैसी अतीत की किसी भी सरकार में नहीं थी और यह नए भारत की वास्तविकता है।

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सोलह दिसंबर की याद और कुछ सवाल (अमर उजाला)

सुभाषिनी सहगल अली
सोलह दिसंबर फिर आने वाला है। 2012 के बाद हर साल आता है। और जब आता है, तो निर्भया का दर्द ताजा हो जाता है। उसकी असहनीय पीड़ा एक बार फिर मन को रौंदती है। वह तमाम सवाल फिर मस्तिष्क में अपनी परिक्रमा शुरू कर देते हैं: शहर भर में वह बस कैसे घूमती रही? रात को हर चौराहे पर जिन पुलिस वालों को पहरे पर होना चाहिए था, वे कहां थे? दर्द से कराह रही निर्भया सड़क के किनारे पड़ी रही, पर उसे किसी ने अस्पताल क्यों नहीं पहुंचाया ? लेकिन पिछले वर्षों से अबकी साल कुछ भिन्न गुजरा। 16 दिसंबर आते-आते, देश के कोने कोने में, एक के बाद एक निर्भया, कहीं हैदराबाद में तो कहीं उन्नाव में तो कहीं रांची में तो कहीं मुजफ्फरपुर में, देश के न जाने कितने हिस्सों में, कहीं जलती, कहीं जलाई हुई, कहीं बालिग तो कहीं बच्ची, कहीं बूढ़ी तो कहीं कमसिन, कई-कई रूपों में दिखने लगीं। हर रूप भयानक व जघन्य अपराध का परिणाम। जो गुस्सा और आक्रोश 16 दिसंबर को फूटा था, वह कई दिनों तक रोज फूटता रहा। अचानक हैदराबाद में गिरफ्तार बलात्कार और जघन्य हत्या के चार आरोपी मार गिराए गए। पुलिस के अनुसार उन्होंने पुलिस की रिवाल्वर और बंदूकें छीन लीं। उनसे पुलिस पर गोलियां चलाई और पुलिस ने अपने बचाव में उन्हें मार गिराया।

इस अटपटी कहानी ने लाखों लोगों के दिलों में घर कर लिया। चार दिन पहले जिस पुलिस को हैदराबाद की आक्रोशित भीड़ पीड़िता की मौत का जिम्मेदार ठहरा रही थी, उसी पुलिस पर फूल बरसाए। पूरे विश्वास के साथ कहा गया कि पुलिस ने जो किया उससे डर पैदा होगा, कोई अब ऐसा काम करने की हिम्मत नहीं करेगा। लेकिन, दूसरे ही दिन आठ दिसंबर की रात ओडिशा के संबलपुर जिले में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना घटी। जुर्म करने वालों की हिम्मत को कम आंका जाने का सुबूत बहुत ही जल्दी प्राप्त हो गया। गोलियों की ठांय-ठांय से संतुष्ट होना न तार्किक है, न न्यायसंगत और न ही समस्या का हल है। पिछले दो वर्षों में, उत्तर प्रदेश में अपराध पर रोक लगाने के लिए योगी जी ने पुलिस को मुठभेड़ करने की छूट दे दी है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने 5,178 एनकाउंटर किए हैं, 1,859 लोगों को घायल किया है और 103 लोगों को मार डाला है। एक को छोड़कर, सब गरीब, अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलित। ऐसे लोग, जिनकी ओर से बोलने वाले संख्या में कम और प्रभाव में नगण्य होते हैं। उनमें से कितने दोषी थे और कितने निर्दोष, इसका पता तो कभी चल ही नहीं पाएगा। पुलिस ने उन्नाव में जलाई गई महिला और उन्नाव की उस नाबालिग पीड़िता की एफआईआर क्यों नहीं लिखी थी? नामी-गिरामी बलात्कारियों को शासक दल के नेताओं का संरक्षण क्यों प्राप्त होता है? मुजफ्फरनगर के तमाम बलात्कार के मामलों को न्यायालयों से वापस क्यों लिया गया? चिन्मयानंद के खिलाफ 2008 से चल रहा यौन शोषण का मुकदमा भी वापस लेने की कोशिश क्यों की गई?

और भी बहुत सारे सवाल हैं। पीड़ितों की सुरक्षा का इंतजाम क्यों नहीं किया जाता? गरीब, पीड़ित परिवारों को मुकदमा लड़ने कि सहायता सरकार क्यों नहीं देती? सवा लाख से अधिक मामले लंबित क्यों हैं? और हां, 16 दिसंबर आ रहा है। दिल्ली में बैठी सरकार से पूछो, निर्भया कोष की 90 फीसदी राशि क्यों नहीं खर्च की है? इनका जवाब सचेत नागरिकों को सरकारों से मांगना होगा।
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।


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सीएबी और असम का पेच (अमर उजाला)

सुबीर भौमिक
देश के संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्य असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को अद्यतन करने के बाद संसद के दोनों सदनों में विवादास्पद नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) का पारित होना धार्मिक आधार पर मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने के भाजपा के इरादे को चिह्नित करता है। लेकिन देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्र में इन दोनों कदमों ने भाजपा को मुश्किल में डाल दिया है। इसका आखिरी परिणाम, जैसा कि बंगाली में कहावत है,आम और बोरी दोनों खो देने, जैसा हो सकता है। दोनों सदनों में नागरिकता संशोधन विधेयक का सुगमतापूर्वक पारित होना व्यक्तिगत रूप से गृह मंत्री अमित शाह की बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि वह राज्यसभा में पर्याप्त संख्या बल जुटाने में कामयाब रहे। इससे पहले मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में यह विधेयक पर्याप्त संख्या बल न होने के कारण राज्यसभा में गिर गया था। यह उन्हें महाराष्ट्र की त्रिशंकु विधानसभा में सरकार बनाने में शरद पवार द्वारा दिए गए झटके से उबरने में मदद कर सकता है।

लेकिन इससे पहले कि यह विधेयक राज्यसभा में पारित होता, असम और त्रिपुरा में हिंसा भड़क उठी। अमित शाह इनर लाइन परमिट (आईएलपी) वाले और छठी अनुसूची की स्वायत्तता के प्रावधानों वाले राज्यों व क्षेत्रों को इससे बाहर रखने का फैसला करके पूरे पूर्वोत्तर में तबाही रोकने में कामयाब रहे। इसलिए पूरा नगालैंड (जहां हाल ही में दीमापुर तक आईएलपी बढ़ाया गया है), मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर (जहां आईएलपी बढ़ाया गया है) और मेघालय को सीएबी के दायरे में नहीं लाया गया है। पर इसने निश्चित तौर पर असम और त्रिपुरा के मूल स्थानीय लोगों को परेशान किया है, जिन्हें लगता है कि उनके साथ धोखा हुआ है, क्योंकि उन्हें डर है कि उन्हें बंगाली हिंदुओं को नागरिकता देने वाले सीएबी का बोझ उठाना पड़ेगा। त्रिपुरा में बंगाली हिंदू बहुसंख्यक हैं और उनकी संख्या 70 फीसदी है, जबकि असम में बंगाली हिंदुओं की संख्या 13 फीसदी है।

वर्ष 2016 में भाजपा असम राज्य विधानसभा का चुनाव इसलिए जीती थी, क्योंकि असमिया, आदिवासी और बंगाली हिंदुओं, सभी ने अलग-अलग कारणों से उसे वोट दिया। एनआरसी को प्रभावी ढंग से लागू करने के भाजपा के वादे से असमिया और आदिवासी उत्साहित थे, और बंगाली हिंदुओं ने नागरिकता संशोधन विधेयक को लागू करने के पार्टी के वादे का स्वागत किया। अब लगभग 20 लाख लोग एनआरसी से बाहर हो गए हैं, जिसमें 11 लाख से ज्यादा बंगाली हिंदू हैं, एक लाख नेपाली हिंदू हैं और कुछ हिंदू आदिवासी हैं। एनआरसी की कवायद का समर्थन करने वाली भाजपा ने इस पर जमकर हंगामा किया और असम के मंत्री हेमंत विस्वा शर्मा ने फिर से एनआरसी की मांग की। अमित शाह ने इसे देश के बाकी हिस्सों के साथ करने का वादा किया। यहीं पेच फंसा है, अगर इन हिंदुओं को नागरिकता नहीं मिलती, तो भाजपा बंगाली हिंदुओं का समर्थन खो देगी और बिना उनके समर्थन के उसके लिए सत्ता में बने रहना मुश्किल होगा। लेकिन असम में संघर्ष कभी धार्मिक नहीं रहा, वहां जातीय और भाषायी संघर्ष रहा। जातीय असमियों के लिए बंगाली (हिंदू और मुस्लिम, दोनों) अवांछित घुसपैठिए हैं, जो पड़ोसी राज्य त्रिपुरा की तरह राज्य की जनसांख्यिकी को बदल सकते हैं। इसलिए अगर भाजपा असम में बंगाली हिंदुओं को नागरिकता देने के लिए सीएबी का इस्तेमाल करती है, तो असमिया और आदिवासी इसका विरोध करेंगे। पिछले दो दिनों के हिंसक विरोध प्रदर्शन ने 1980 के दशक के असम आंदोलन के सबसे बुरे दिनों को फिर से जीवित कर दिया है।

लेकिन अगर भाजपा असम में बंगाली हिंदुओं को नागरिकता देने के लिए सीएबी का इस्तेमाल करने में विफल रहती है, तो इसका पश्चिम बंगाल में भाजपा के भविष्य पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है। ममता बनर्जी ने पहले ही एनआरसी का राजनीतिकरण करते हुए असम में मुस्लिमों की तुलना में बंगाली हिंदुओं के बहिष्करण का हवाला देकर दावा किया है कि यह 'न सिर्फ मुस्लिम विरोधी है, बल्कि उससे ज्यादा बंगाली विरोधी' है। पश्चिम बंगाल में हाल में तीनों उपचुनावों में भाजपा उम्मीदवारों की हार उन्हें सही साबित करती है। पश्चिम बंगाल के राज्य भाजपा प्रमुख दिलीप घोष मानते हैं कि 'एनआरसी ने हमारी संभावनाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है।' खड़गपुर, जहां 2016 में वह आराम से जीते थे और जहां लोकसभा के चुनाव में उन्होंने 45,000 मतों की बढ़त पाई थी, भाजपा के उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार से 21,000 मतों से हार गए। ममता और उनके समर्थक पहले से ही पश्चिम बंगाल में एनआरसी और सीएबी के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, और अमित शाह को इन्हें राज्य में लागू करने की चुनौती देते हैं। भाजपा के लिए असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में बंगाली हिंदुओं का समर्थन प्राप्त करने का एकमात्र तरीका सीएबी को प्रभावी ढंग से लागू करना और उन्हें नागरिकता सुनिश्चित करना है। अन्यथा भाजपा आक्रामक ममता के खिलाफ पश्चिम बंगाल में 2021 के चुनाव में बैकफुट पर रहेगी। लेकिन असम में पश्चिम बंगाल के साथ चुनाव होंगे और असम में सीएबी को आगे बढ़ाने पर असमिया और आदिवासी परेशान होंगे। यह भी आशंका है कि जब अमित शाह पश्चिम बंगाल में एनआरसी और सीएबी को लागू करने की कोशिश करें, तो वहां भी हिंसा भड़क सकती है।

एनआरसी और सीएबी की कवायद ने पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर में अनिश्चितता व निराशा की धुंध बिछा दी है और यह मोदी की लुक ईस्ट पॉलिसी के लिए अच्छा नहीं है, जिसे वह अगले सप्ताह जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ गुवाहाटी में शिखर बैठक करके बढ़ावा देना चाहते हैं। हो सकता है कि हिंसा के कारण उन्हें आयोजन स्थल बदलने के लिए मजबूर होना पड़े। और यह निश्चित रूप से पूर्व और पू्र्वोत्तर क्षेत्र में जापानी निवेश को बाधित करेगा, जिसके लिए प्रधानमंत्री मोदी प्रयत्नशील हैं।

सौजन्य - अमर उजाला
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कुपोषण के विरुद्ध नागरिक प्रयास (अमर उजाला)

भारत डोगरा
देश से भुख और कुपोषण को स्थायी तौर पर दूर करना है, तो आर्थिक विषमता और अन्याय को कम करने के सार्थक प्रयास करना जरूरी है। हाल में इस चर्चा ने जोर पकड़ा है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में कुपोषण दूर रखने वाला सबसे उचित भोजन-मिश्रण क्या हो। अपने देश की विशेष स्थितियों को देखते हुए हमें इस ओर समुचित ध्यान देना चाहिए कि ऐसे पौष्टिक खाद्य कौन से हैं, जो अपेक्षाकृत कम खर्च पर उपलब्ध हो सकते हैं। आंगनवाड़ी और मिड-डे मील जैसे सरकार के विभिन्न कार्यक्रम  चल रहे हैं, पर इनके क्रियान्वयन में अनेक कमियां हैं। सबसे निर्धन भूमिहीन परिवारों को थोड़ी-सी भी अपनी जमीन मिल सके, तो इससे भूख और कुपोषण दूर करने में सहायता मिलेगी। सरकारी नीतियां भूख और कुपोषण कम करने पर केंद्रित हों, यह तो जरूरी है ही, गैरसरकारी स्तर पर भी इस दिशा में कदम उठाने की जरूरत है। कभी अनेक गैरसरकारी संगठन इस दिशा में सक्रिय थे, पर अब इनकी सक्रियता कम हुई है। चूंकि साधारण नागरिक प्रायः इन संस्थाओं के माध्यम से ही इन प्रयासों से अधिक जुड़ते थे, अतः उनकी भी सक्रियता कम हुई है। लेकिन स्थिति की भयावहता को देखते हुए भूख और कुपोषण के विरुद्ध नागरिक प्रयास शुरू करने का समय फिर आ गया है। यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी क्षेत्र विशेष के फसल-चक्र और रोजगार उपलब्धि के अनुसार कौन से महीने या सप्ताह अधिक भूख व कुपोषण के हैं। सर्दियों में भूख की मार कुछ ज्यादा ही महसूस होती है। दिन छोटे होते हैं और गांवों से दिहाड़ी मजूदरी के लिए निकलने वालों के लिए रोजगार की संभावना कम हो जाती है। अतः इस मौसम में नागरिकों व नागरिक संगठनों को भूख व कुपोषण की मार कम करने के लिए अधिक सक्रिय हो जाना चाहिए।

नागरिक प्रयास अनेक रूप ले सकते हैं। मसलन, जिन गांवों या शहरी बस्तियों में निर्धनता अधिक व्यापक स्तर पर है, यानी लगभग सभी परिवार भूख से अधिक प्रभावित हैं, वहां के लिए फूड किट की व्यवस्था हो सकती है। इसके तहत एक परिवार के लगभग दस-पंद्रह दिनों के लिए अनाज, आलू (या दाल) नमक तथा बच्चों के लिए बिस्कुट आदि पैक किए जा सकते हैं। बस्ती के सभी परिवारों के लिए ऐसी व्यवस्था हो जाए, तो उन्हें निश्चय ही राहत मिलेगी। आखिर आपदाओं के समय प्रभावित लोगों के लिए ऐसी व्यवस्था की ही जाती है।

दूसरी व्यवस्था उन गांवों या बस्तियों के लिए उचित है, जहां कुछ विशेष परिवार भूख से पीड़ित हैं। इनके लिए गांवों में अनाज बैंक बनाया जा सकता है। गांव में एक पंचायत समिति गठित की जा सकती है, जो यह तय करे कि कौन से परिवार इस बैंक से अनाज ले सकते हैं। बाद में फसल आने पर कुछ परिवार चाहें, तो इस बैंक में अनाज लौटा सकते हैं। गांवों या बस्तियों में दिन में एक बार के भोजन के लिए रसोई की व्यवस्था भी हो सकती है, हालांकि दैनिक स्तर पर यह जिम्मेदारी संभालना कठिन हो जाता है। पर विशेष परिस्थितियों में पंचायतों या सरकारी स्तर पर ऐसा हो सकता है कि जब स्कूलों के लिए मिड डे मील बनता है, तभी वृद्धों, असहायों और जरूरतमंदों  के लिए भी भोजन तैयार किया जाए। चूंकि सरकार अपनी कल्याणकारी भूमिका से हटती दिखाई देती है तथा बाजारवादी आर्थिक नीतियों ने बड़ी संख्या में लोगों को हाशिये पर ला दिया है, इसलिए भी भूख और कुपोषण दूर करने के लिए स्थानीय और सामुदायिक स्तर पर कदम उठाने की जरूरत है।

सौजन्य - अमर उजाला
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