Category: हिन्दी संपादकीय

इस खतरे को समझें (पत्रिका)

भारत में आतंकवाद की पहली झलक खालिस्तानी आतंक के दौर में ही दिखी थी। अस्सी के दशक में तेजी से फन उठाने के बावजूद इसे कुचल कर सरकारों ने भले ही पीठ थपथपा ली हो, पर इस सच से कोई मुंह नहीं चुरा सकता कि सिख समुदाय की देशभक्ति पर सवाल उठाने वाली हरकतों का […]

उम्मीदों का आखरी सिरा… मुरझाये पत्ते भी दे जाते हैं जिंदगी (पत्रिका)

थोड़ी सांस आने दो, किसी के साथ हमप्याली हो दर्दों-रंज भुलाने दो। बहुत तन्हा हो गया हूं मैं, चंद मुस्कुराहटों के पल इन होठों पर सजाने दो। कहां गुम हो गए धुंध ओ गुबार में तुम…जबसे तुम ना हो मन हल्का ना हुआ। मैं ऊंचा तो उठा, उठते गया पर इन कांधों को किसी का […]

वतन की पहचान (पत्रिका)

– कुमार प्रशांत, लेखक और कार्यकर्ता वह नज्म अल्लामा इकबाल ने लिखी थी, जिसमें हर बंद के बाद वे कहते थे – मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है ! मैं जितनी बार उस नज्म को पढ़ता हूं, भीतर से कोई पूछता है कि इकबाल ने तो अपने वतन की पहचान कर ली थी, […]

बच्चे पास हो गए, नीति फेल हो गई (हिन्दुस्तान)

हरिवंश चतुर्वेदी निदेशक, बिमटेक अब फिर से पांचवीं और आठवीं कक्षाओं में फेल होने वाले बच्चों को रोका जा सकेगा। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2010 का यह मुख्य प्रावधान था कि आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल नहीं किया जाएगा। लोकसभा ने इसके लिए अधिनियम में संशोधन कर दिया है। मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर […]

अविश्वास प्रस्ताव के इस कोलाहल से उभरते कुछ यक्ष-प्रश्न (हिन्दुस्तान)

शशि शेखर आप पूछ सकते हैं कि जब संख्या बल पास नहीं था, तब विपक्ष इतने हो-हल्ले के साथ अविश्वास प्रस्ताव लाया क्यों? जवाब साफ है- राजनीति में सब कुछ सिर्फ हार-जीत के लिए नहीं किया जाता। कुछ दांव दूर की सोच कर खेले जाते हैं। राजनीति के पंडित इसे ‘पोजीशनिंग’ भी कहते हैं। क्या […]

कारवां गुजर गया (जनसत्ता)

हिंदी फिल्मों की दुनिया में न जाने कितने गीत लिखे गए होंगे, लेकिन जिंदा वही रहे, जो सुनने वालों के दिल में ठहर गए, बस गए। गोपाल दास नीरज की लिखी कविताएं और गीत पीढ़ियों का सफर तय करते हुए अगर आज भी बहुत सारे लोगों के दिलो-दिमाग में कायम हैं, तो इससे उन गीतों […]

भ्रष्टाचार के विरुद्ध (जनसत्ता)

आर्थिक अपराधों को अंजाम देकर विदेश भाग जाने के कई मामले सुर्खियों में आने के बाद ऐसे लोगों से निपटने के लिए कानून बनाने की कवायद तेज हो गई है। गुरुवार को राज्यसभा ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन वाले विधेयक को मंजूरी दे दी। जबकि लोकसभा ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक, 2018 को ध्वनिमत […]

सख्त उपायों की दरकार (नईदुनिया)

भीड़ की हिंसा के मामलों पर न तो केवल चिंता जताने से बात बनने वाली है और न ही सोशल मीडिया पर दोष मढ़ने से। केंद्र सरकार के लिए यह अनिवार्य है कि वह भीड़ की हिंसक गतिविधियों पर लगाम लगाने में अपनी प्रभावी सक्रियता का परिचय दे। नि:संदेह कानून एवं व्यवस्था राज्यों का विषय […]

ट्रंप के टेढ़े मिजाज की दिक्कतें (नईदुनिया)

– कमलेंद्र कंवर नियति के खेल निराले हैं। आज अमेरिका में एक ऐसा राष्ट्रपति है, जो जलवायु परिवर्तन संबंधी पेरिस संधि और ईरान के साथ परमाणु करार जैसे अतीत में किए अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों पर सवाल उठाता है और उन्हें अस्वीकार कर देता है। जबकि अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों को अमूमन गैरबदलावकारी माना जाता है, जब तक कि […]

अविश्वास प्रस्ताव का औचित्य (नईदुनिया)

यह आश्चर्यजनक है कि संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन विपक्ष का वह अविश्वास प्रस्ताव मंजूर हो गया, जिसे पिछले सत्र में हंगामे के बीच लाने की कोशिश हो रही थी। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि बजट सत्र के दौरान न तो विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव आगे बढ़ाने को लेकर गंभीर था […]



संपादकीय:Editorials (Hindi & English) © 2016