Day: February 1, 2018

नहीं थम रहा पुलिस हिरासत व जेलों से अपराधियों की फरारी का लगातार सिलसिला (पंजाब केसरी)

—विजय कुमार देश में पुलिस व जेल प्रबंधन की हालत इतनी खस्ता है कि जेलों में सजा काट रहे और अस्पतालों में उपचाराधीन कैदियों की फरारी, पेशी पर लाए गए कैदियों और दुर्दांत अपराधियों के भागने की घटनाएं अब आम होती जा रही हैं जिनके चंद ताजा उदाहरण निम्न में दर्ज हैं : 31 दिसम्बर, […]

दलित राजनीति के तीन संकट (हिन्दुस्तान)

बद्री नारायण, निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान दुनिया भर में प्रतिरोध आंदोलनों का विकास अगर देखें, तो पता चलता है कि ये आंदोलन जिनके विरुद्ध प्रतिरोध कर रहे होते हैं, कुछ समय बाद उन्हीं के गुण-अवगुण अपने में शामिल कर लेते हैं। इसका कारण यह माना जाता है कि वे कोई वैकल्पिक संस्कृति नहीं […]

पुरातन कानूनों का भार (हिन्दुस्तान)

कानूनों के बारे में एक आम धारणा यह है कि कुछ कानून शासन-प्रशासन और सामाजिक कार्य-व्यवहार को सुचारु रूप से चलाने के लिए होते हैं, कुछ कानून अपराधों को रोकने के लिए होते हैं, कुछ कानून सिर्फ यह दिखाने के लिए होते हैं कि सजग हैं, भले ही उनका जमीनी असर कुछ न हो। कानूनों […]

हिंसा की लपटें (जनसत्ता)

इससे ज्यादा अफसोस की बात क्या होगी कि देश के किसी भी हिस्से में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह को जहां देश की एकता और अखंडता के साथ-साथ अलग-अलग समुदायों के बीच सौहार्द बढ़ाने का अवसर बनना चाहिए, वहां चंद लोगों की नाहक जिद और उन्माद ने सांप्रदायिक तनाव की रेखा खींच दी। उत्तर प्रदेश के […]

न्यायिक सुधार का मसौदा (नईदुनिया)

इस बार की आर्थिक समीक्षा जिन कारणों से कुछ खास है, उनमें एक कारण यह भी है कि उसमें न्यायिक सुधारों को गति देने पर भी जोर दिया गया है। आर्थिक समीक्षा तैयार करने वाले मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम को इसके लिए धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उन्होंने दोस्तों की ओर से चेताए जाने […]

शिक्षा, रोजगार और कृषि पर हो जोर – अभिनव प्रकाश (नईदुनिया)

हर वर्ष बजट से पहले जारी होने वाली आर्थिक समीक्षा नि:संदेह भारतीय अर्थव्यवस्था पर सबसे प्रामाणिक और उत्कृष्ट दस्तावेज होती है। पिछले कुछ वर्षों से इसकी गुणवत्ता में और भी अधिक सुधार आया है। इसका एक कारण यह भी है कि सरकार पहले की अपेक्षा अधिक पारदर्शिता से आर्थिक डाटा जारी कर रही है। पहले […]

The de-urbanization of India’s manufacturing (Livemint)

Ejaz Ghani Conventional wisdom suggests that industrialization and urbanization go hand in hand. Policymakers often adopt an active “industrial policy” to accelerate growth. They also embrace an active “urban policy”, since industrialization without urbanization gets stalled. This has changed. India’s industrialization and urbanization did grow together in the early 1990s. Manufacturing growth was initially concentrated […]

Equities and bonds: a tale of two markets (Livemint)

The equity market has seen its best month before a Union budget in more than a decade. The bond market has had a more rocky ride. The sharp contrast between the euphoria in equity trading rooms and the more circumspect mood in bond trading rooms is in some way a reflection of one of the […]

Is India changing for the better? (Livemint)

Biju Dominic The government’s Economic Survey predicts that the Indian economy will grow by more than 7% next year. Some of my NRI (non-resident Indian) friends strongly believe that nothing much has changed in India. They believe the government and politicians continue to be highly corrupt and the poverty levels have remained the same. Another […]

Three ways to minimize power sector NPAs (Livemint)

Vivek Sharma The villains in the power sector’s tale of woes haven’t changed in a while: worsening asset quality and rising non-performing assets (NPAs). Around 51 gigawatt (GW) of thermal capacity is stressed because of the non-availability of coal, lack of assured offtake, and huge under-recoveries due to disallowance on account of various factors. A […]

संपादकीय:Editorials (Hindi & English) © 2016