Day: January 5, 2018

सामाजिक बदलाव की ओर बिहार (प्रभात खबर)

केसी त्यागी राष्ट्रीय प्रवक्ता, जदयू शराबबंदी के सफल क्रियान्वयन के बाद बिहार अब दहेज प्रथा, बाल विवाह, भ्रूणहत्या जैसे सामाजिक अभिशापों के विरुद्ध एकजुट हो रहा है. अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरी दुनिया में अनोखी पहचान रखनेवाला बिहार फिर से सामाजिक न्याय का प्रतीक बना है. अशोक महान के इस प्रदेश में ‘सुशासन’ के […]

खबरों की अंतर्ध्वनियां (प्रभात खबर)

मृणाल पांडे वरिष्ठ पत्रकार नये साल में प्रयाग में माघ मेला शुरू हो गया है. ताजा खबर है कि संगम पर प्रदूषण देखकर डुबकी लगाने को गंगा तट पर आये दंडी संन्यासी इतना भड़क गये कि उन्होंने गंदे पानी से आचमन या उसमें स्नान के बहिष्कार की घोषणा कर डाली. संतों के कोप से मठाधीशनीत […]

Elections in a federal system and the GST (Livemint)

Indira Rajaraman An electoral battle in a constituent state of a federal system is supposed to be fought on policies and issues falling within the functional domain of states. Members of the legislative assembly (MLAs) are expected to seek re-election on their record in terms of what they promised to deliver when they got voted […]

Metrics and their unintended consequences (Livemint)

Megan McArdle In December, doctors at a Virginia hospital in Oregon decided to admit an 81-year-old patient. He was dehydrated, malnourished, plagued by skin ulcers and broken ribs—in the medical professionals’ opinion, he was unable to care for himself at home. Administrators, however, overruled them. Was there no bed for this poor man? No, the […]

The consensus curse (Livemint)

Sidin Vadukut There is a contradiction that runs through public history in India. On the one hand, there is intense interest in our past. To the point of vitriol and political posturing—and often beyond—there is tremendous interest in, say, the historical accuracy of period films, the comparative legacy of politicians such as Jawaharlal Nehru and […]

Three paradigms of banking regulation (Livemint)

Harsh Vardhan Banks are among the most regulated businesses. Ever since the inception of banking as a business in the medieval period, the state has exercised some form of control. By the 19th century, banks had become more numerous, larger, and a significant part of the economy in the Western world. With that, the extent […]

बिसरा दिये गए किसानों के मसीहा (दैनिक ट्रिब्यून)

शंभूनाथ शुक्ल आधुनिक भारत के निर्माताओं में तीन लोग ऐसे हुए हैं, जिन्होंने गरीब किसान और जनता की भलाई के लिए अपना पूरा जीवन खपा दिया। हालांकि उनको वैसी देशव्यापी प्रतिष्ठा नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे लेकिन गरीब किसान उन्हें नहीं भूले। भले वे हिंदू हों या मुसलमान। न तो इन्होंने कभी किसानों को […]

लाेकतंत्र पर भारी अविश्वास की राजनीति (दैनिक ट्रिब्यून)

हरीश खरे एक सेवारत वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने बड़ी अहम बात कही, जो गुजरात के मुख्य सचिव के स्तर के हैं। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा, जिसे मीडिया से लेकर सत्ता प्रतिष्ठान में काबिज लोगों व उनके सहयोगियों ने सार्वजनिक रूप से संज्ञान में नहीं लिया। उन्होंने कहा कि गुजरात के मतदाताओं ने सत्तासीन भारतीय […]

बेरोजगारी की लाचारी (दैनिक ट्रिब्यून)

यह खबर विचलित करती है कि राजस्थान विधानसभा सचिवालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती के लिये सैकड़ों इंजीनियरों, वकीलों, चार्टेड अकांउटेंटों व कला स्नातकोत्तरों ने आवेदन किये। उस पर तुर्रा ये कि भाजपा के एक विधायक के पुत्र का चयन चपरासी के लिये हुआ, जिसको लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं कि इस चतुर्थ […]

On a high: the US Federal Reserve (The Hindu)

Global stocks kicked off the new year by rallying to reach new lifetime highs. Major indices across the U.S., Europe, and Asia witnessed significant gains in the year’s first two trading days; the Indian bourses were slower to gain traction. The strong start suggests that stocks may be all set to carry on their momentum […]

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