संपादकीयः मंजिल और मुकाम (जनसत्ता)


बरसों से उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम घोर विवाद का विषय और खासकर दक्षिण कोरिया, यूरोप और अमेरिका के लिए सिरदर्द बना रहा है। इसलिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग-उन की मुलाकात, बातचीत और सहमति एक ऐतिहासिक घटना है। इस मौके पर दोनों नेताओं के बीच जो सहमति बनी और घोषणापत्र जारी किया गया उससे दुनिया ने राहत की सांस ली होगी। दक्षिण कोरिया के लिए यह और भी ज्यादा राहत की बात है। पर सिंगापुर में हुई ऐतिहासिक शिखर वार्ता से जो हासिल हुआ उसे उम्मीद से कमतर ही कहा जाएगा। घोषणापत्र में कहा गया है कि दोनों देशों की जनता शांति और समृद्धि चाहती है और वे इसी के अनुरूप आपसी रिश्तों को गढ़ेंगे। यह एक गोलमोल कूटनीतिक शब्दावली है और इसमें कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं झलकती जिसका मूर्त रूप से आकलन हो सके। लेकिन जहां वर्षों से दोनों देश एक दूसरे को दुश्मन के रूप में चित्रित करते आए हों, वहां यह शब्दावली एक बदलाव की ओर ही संकेत करती है। वह बदलाव एक तरफ किम की इस घोषणा से जाहिर होता है कि वे कोरिया प्रायद्वीप के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में काम करेंगे, और दूसरी तरफ ट्रंप की तरफ से उत्तर कोरिया को सुरक्षा गारंटी दिए जाने से। ट्रंप ने इस समझौते को बहुत व्यापक और दुनिया की एक बड़ी और बेहद खतरनाक समस्या का समाधान कहा है।

पर वास्तव में देखें तो जो समझौता हुआ वह लक्ष्य के करीब नहीं पहुंच पाया है। अमेरिका चाहता था कि उत्तर कोरिया हमेशा के लिए पूर्ण एटमी निरस्त्रीकरण पर राजी हो, और फिर इस दिशा में होने वाली हर प्रक्रिया का अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों द्वारा सत्यापन भी हो। किम ने उत्तर कोरिया के पूर्ण और स्थायी तथा अंतरराष्ट्रीय रूप से सत्यापनीय परमाणु निरस्त्रीकरण की रजामंदी जताने के बजाय कोरिया प्रायद्वीप के पूर्ण निरस्त्रीकरण के लिए प्रयास करने की बात कही है। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अमेरिका दक्षिण कोरिया से परमाणु सुरक्षा की अपनी छतरी हटाए। दरअसल, सिंगापुर में हुए समझौते में पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण की कोई परिभाषा उभर कर सामने नहीं आई है, ऐसे में संभव है कि अमेरिका इसका कुछ और अर्थ लगाए, उत्तर कोरिया कुछ और। अगर पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण की सहमति पूरे कोरिया प्रायद्वीप पर लागू होती है, तो यह अच्छी ही बात होगी। अमेरिका ने उत्तर कोरिया को सुरक्षा का भरोसा तो दिलाया है, पर इस आश्वासन का कोई स्पष्ट ब्योरा सामने नहीं आया है। अलबत्ता उसने दक्षिण कोरिया के साथ साझा सैन्य अभ्यास भी रोक देने की घोषणा की है।

गौरतलब है कि इस साझा सैन्य अभ्यास पर किम काफी खफा थे, और इसकी वजह से कोई महीने भर पहले उन्होंने शिखर वार्ता से हट जाने की धमकी भी दी थी। इस तरह किम की एक खास मांग या शिखर वार्ता में शामिल होने की शर्त ट्रंप ने मान ली। मगर बातचीत की मेज पर आने के पीछे किम की जो सबसे बड़ी उम्मीद रही होगी वह अभी पूरी नहीं हुई है। ट्रंप ने कहा है कि उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंध फिलहाल जारी रहेंगे। आर्थिक प्रतिबंधों के चलते उत्तर कोरिया को अपने विकास-कार्यों में तथा अपनी जरूरत की चीजें बाहर से मंगाने में परेशानी होती रही है। इसलिए अड़ियल किम आखिरकार नरम पड़ गए। पहले वे पड़ोसी दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति के साथ सुलह-समझौते के लिए राजी हुए, फिर अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ। लेकिन सिंगापुर में हुआ करार एक महत्त्वपूर्ण मुकाम भले हो, पर मंजिल से अभी काफी दूर है।

सौजन्य – जनसत्ता।


Updated: June 13, 2018 — 3:21 pm

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