पाबंदी पर विवाद (हिन्दुस्तान)


अमेरिका की मंशा पूरी हुई या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दबी हुई आकांक्षाओं की पूर्ति माना जाए? अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आखिर छह मुस्लिम देशों के नागरिकों के अमेरिका प्रवेश को प्रतिबंधित करने के राष्ट्रपति ट्रंप के आदेश को मंजूरी दे दी। अलग बात है कि निचली अदालतों में अब भी इस मामले के कानूनी दांव-पेच पर बहस जारी है। इन अदालतों ने इसे ट्रंप की मुस्लिम विरोधी नीतियों का हिस्सा बताकर खारिज कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी के बाद ईरान, यमन, चाड, सोमालिया, लीबिया, सीरिया जैसे मुस्लिम देशों के नागरिक अमेरिका नहीं आ सकेंगे। उत्तर कोरिया के कुछ लोगों और वेनेजुएला के कुछ समूहों का प्रवेश भी प्रतिबंधित हो गया है। अमेरिकन-इस्लामिक संबंध परिषद ने इसे मानवीय हितों की घोर अनदेखी माना है।
ट्रंप का यह फैसला शुरू से ही विवाद में घिरा था। सत्ता संभालते ही जारी इस आदेश को बाद में वापस लेना पड़ा और कुछ संशोधनों के साथ आए दूसरे आदेश का भी वही हश्र हुआ। आदेश का यह तीसरा और मौजूदा प्रारूप है, जिसे सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिली है। हालांकि इस संशोधित आदेश पर भी रिचमंड, वर्जिनिया ऐंड सैन फ्रांसिस्को और कैलिफोर्निया की अदालतों में चुनौती मिली, जहां फैसले की समीक्षा जारी है। फैसले को राष्ट्रपति ट्रंप के उस मुस्लिम विरोधी रवैये का विस्तार माना जा रहा है, जिसके मुखर संकेत उन्होंने सत्ता में आने से पहले अपने चुनावी भाषणों में दिए थे। ट्रंप प्रशासन भले ही किन्हीं मजबूरियों में इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताकर आतंकी साजिशों से बचाने की एक कोशिश कहे, लेकिन ऐसे फैसलों के दूरगामी नतीजे अच्छे नहीं कहे जा सकते। निचली अदालतों को इसके कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर परीक्षण जारी रखने के सुप्रीम अदालत के आदेश के भी शायद यही संकेत हैं।
फैसले में कई झोल हैं। यह प्रतिबंध की जद में आने वाले सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं होता। वेनेजुएला का महज एक नागरिक समूह इससे प्रभावित होता है, तो उत्तर कोरिया के चंद नाम। ईरान के साथ शैक्षिक आदान-प्रदान की नीति यानी छात्रों का अमेरिका आना-जाना इससे प्रभावित नहीं होने जा रहा। फैसला किसी के गले नहीं उतरता। तब तो और भी नहीं, जब इस सूची में पाकिस्तान का नामोनिशान भी न हो। यही कारण है कि अमेरिकी जनता और ट्रंप के आलोचक इसे उनकी मुस्लिम विरोधी नीतियों का हिस्सा मानते हैं, जो आव्रजन नीति के साथ और मुखर हो गई हैं। यह उनके पाकिस्तान दुश्मन या पाकिस्तान दोस्त की जानी-पहचानी दुविधा को भी सामने लाता है। सच तो यह है कि ट्रंप सुविधा की जैसी राजनीति कर रहे हैं, उसमें उनका चेहरा बार-बार बेनकाब हो रहा है। आलोचना इसलिए भी ज्यादा मुखर है कि इसमें आतंकवाद के नाम पर वही मुस्लिम देश शामिल हैं, जिनसे अमेरिका के व्यापारिक हित नहीं जुड़ते। पाकिस्तान के साथ ही मिस्र और तुर्की का इस सूची में न होना इसीलिए सवाल उठाता है। यही कारण है कि ट्रंप अमेरिकियों के उन सवालों से टकरा रहे हैं, कि क्या वाकई इस फैसले के पीछे आतंकी खतरा ही है या व्यापारिक हित साधने का उनका कोई दूरगामी फार्मूला? अमेरिकी जनता तो इसे व्यापक अमेरिकी हितों और सिद्धांतों के खिलाफ मानती ही है, फैसले की दुनिया भर में आलोचना हो रही है। सच तो यही है कि ट्रंप यदि यही फैसला लेकर इन मुल्कों, विश्व की मुस्लिम आबादी या अपने हितों के लिए कोई संदेश देना चाह रहे थे, तो इसके आसान और भिन्न तरीके भी हो सकते थे। ऐसे तरीके, जिनसे उनका मकसद भी सध जाता और सौहार्द भी बना रहता।

सौजन्य – हिन्दुस्तान।


Updated: December 6, 2017 — 10:12 am

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