न्यायिक नियुक्तियों का प्रश्न (नईदुनिया)


न्यायिक नियुक्तियों पर केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का यह बयान कोलेजियम के अनसुलझे सवाल को नए सिरे रेखांकित करता है कि कानून मंत्रालय महज पोस्ट ऑफिस नहीं है। कानून मंत्री का यह बयान कांग्रेस की उस आलोचना के जवाब में आया है, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति में नियमों का उल्लंघन कर रही है। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली भी कांग्रेस के आरोप का जवाब दे चुके हैं। इसमें उन्होंने कांग्रेस को उन दिनों की याद दिलाई थी, जब उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति मनमाने तरीके से की जाती थी। इस संदर्भ में उन्होंने कई उदाहरण भी गिनाए थे। संभव है कि न्यायिक नियुक्तियों को लेकर सत्तापक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला इसी तरह कायम रहे, लेकिन जरूरत तो इसकी है कि दोनों पक्ष इसके लिए पहल करें, जिससे न्यायाधीशों की नियुक्तियों की कोई न्यायसंगत और पारदर्शी व्यवस्था निर्मित हो सके। न्यायिक नियुक्तियों पर पक्ष-विपक्ष का रुख-रवैया भिन्न्-भिन्न् हो सकता है, लेकिन उन्हें इस पर एकमत होना चाहिए कि न्यायाधीशों की मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादा के अनुरूप नहीं।

कम से कम राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर तो पक्ष-विपक्ष को दलगत राजनीति से ऊपर उठना ही चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे वे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग संबंधी संविधान संशोधन विधेयक को पारित करते वक्त दिखे थे। न्यायाधीशों की नियुक्ति पुरानी कोलेजियम व्यवस्था से इसीलिए हो रही है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उक्त आयोग को असंवैधानिक करार दिया था। हालांकि इस आयोग को असंवैधानिक करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कोलेजियम व्यवस्था में संशोधन की जरूरत जताई थी, लेकिन जानना कठिन है कि इस व्यवस्था में बदलाव क्यों नहीं हो सका? इस बदलाव के लिए मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर को अंतिम रूप देने की जो पहल की गई थी, वह भी आगे नहीं बढ़ पा रही है। ऐसा लगता है कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर के प्रावधानों पर भी एकमत नहीं। सच्चाई जो भी हो, यह ठीक नहीं कि न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करें। किसी भी लोकतांत्रिक देश में न्यायाधीश अपने साथियों की नियुक्ति नहीं करते, लेकिन भारत में ऐसा ही होता है। किसी खास मामले में कोलेजियम की सिफारिश नकारने के सरकार के फैसले में खामी हो सकती है, लेकिन अगर यह माना जा रहा है कि सरकार का काम केवल कोलेजियम की सिफारिश पर मुहर लगाना है तो यह सही नहीं। बेहतर हो कि सुप्रीम कोर्ट भी यह महसूस करे कि उस व्यवस्था को बदले जाने की जरूरत है जिसमें न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं। कानून मंत्री का यह कहना सही है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में वह अथवा उनका मंत्रालय पोस्ट ऑफिस की तरह काम नहीं कर सकता, लेकिन केवल इतने से बात नहीं बनेगी। उचित यह होगा कि सरकार न्यायिक नियुक्ति आयोग के लिए फिर से पहल करे। यह एक लंबी प्रक्रिया होगी और यह आसान तब बनेगी, जब सत्तापक्ष-विपक्ष एकमत होंगे।


सौजन्य – नईदुनिया।

Updated: June 13, 2018 — 3:19 pm

Leave a Reply

Your email address will not be published.

संपादकीय:Editorials (Hindi & English) © 2016