नयी पीढ़ी की जरूरतों ने बदला चेहरा (दैनिक ट्रिब्यून)


रेशू वर्मा

डिजिटल मीडिया जो आप इंटरनेट के जरिये लैपटाप पर और मोबाइल एप्लीकेशन के जरिये देखते हैं, इस मीडिया में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई है। एक कंसलटेंसी संगठन ई एंड वाई के मुताबिक 2016 से 2020 के बीच डिजिटल मीडिया हर साल करीब पच्चीस प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ेगा। टेलीविजन की रफ्तार इसके मुकाबले बहुत कम रहने वाली है। यानी करीब 9.8 प्रतिशत की दर से हर साल बढ़ेगा।
इस अध्ययन के मुताबिक 2020 के अंत में टीवी मीडियम का कुल कारोबार 862 अरब रुपये का होगा और 2020 के अंत में डिजिटल मीडिया का कारोबार कुल 224 अरब रुपये का होगा। पर यह रेडियो से बहुत आगे होगा। रेडियो का कुल कारोबार 2020 के अंत में 34 अरब रुपये का होगा। टीवी के बाद प्रिंट मीडिया का कारोबार सबसे बड़ा होगा-369 अरब रुपये का। पर देखने की बात यह है कि प्रिंट को यहां यानी 369 अरब रुपये तक पहुंचने में कई दशक लगे हैं पर डिजिटल की सारी यात्रा कुछ सालों की है। फिर भी इसने बहुत ही तेज रफ्तार पकड़ी है।
2016 और 2020 के बीच सबसे तेजी से विकसित होने वाला मीडिया डिजिटल मीडिया ही होने वाला है, यह बात मीडिया में कईयों को समझ में आ रही है। इसलिए यह अनायास नहीं है कि लगभग हर अखबार अपने मोबाइल एप्लीकेशन, अपनी वेबसाइटों पर भरपूर काम कर रहा है। अब वेबसाइट और मोबाइल एप्लीकेशन सिर्फ सजावटी और दिखाऊ आइटम नहीं हैं। ये मीडिया रणनीति के केंद्र में हैं। दरअसल डिजिटल अब भविष्य का ही नहीं, वर्तमान का माध्यम है।
साल-दर-साल के आंकड़े लें तो भी साफ होता है कि डिजिटल की रफ्तार सबसे ज्यादा है। 2016 के मुकाबले 2017 में डिजिटल की विकास दर 29 प्रतिशत रही है। टेलीविजन 2016 के मुकाबले 2017 में 11 प्रतिशत बढ़ा। रेडियो की विकास दर 6 प्रतिशत रही है। प्रिंट का हाल बहुत अच्छा नहीं रहा। 2016 से 2017 में विकास दर सिर्फ 3 प्रतिशत रही।
इस अध्ययन ने साफ किया है कि मुल्क की आबादी का 61 प्रतिशत 35 साल से नीचे का है। यही वह वर्ग है जो मोबाइल में आंखें गड़ाये मिलता है, बसों में, स्टेशनों में, गाड़ियों में, दफ्तरों में। गौरतलब यह है कि बढ़ती हुई जनसंख्या के चलते डिजिटल पर मीडिया को देखने वालों की तादाद बढ़ेगी। आप देख सकते हैं कि बच्चे मोबाइल को पकड़ने में बहुत दिलचस्पी दिखाते हैं। कई बच्चों को मोबाइल के बारे में ज्ञान अपने पापा और मम्मी के मुकाबले ज्यादा होता है। यह पीढ़ी डिजिटल पीढ़ी होने वाली है। यह पीढ़ी अखबार कागज पर नहीं, मोबाइल पर पढ़ने वाली है।
2020 तक देश में 10 बड़े मेट्रो शहर होंगे और 26 मिनी मेट्रो शहर होंगे। दिल्ली के साइज के मेट्रो शहरों की जनसंख्या कई देशों की जनसंख्या से ज्यादा है। 2020 तक देश की करीब 35 प्रतिशत जनसंख्या शहरों में होगी। 2020 तक औसत पारिवारिक आय करीब डेढ़ गुना हो जायेगी। आय बढ़ने का एक असर यह होता है कि मोबाइल की गुणवत्ता बढ़ जाती है और उसमें ज्यादा समय लगाने की प्रवृत्ति भी देखने में आती है। 2020 तक विकास दर 6.5 प्रतिशत से 7.5 प्रतिशत रहने वाली है। बीच-बीच में ऐसी खबरें आती रहेंगी कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेजी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था बन गयी है।
डिजिटल माध्यम में दो तरह के कंटेट मिलते हैं। एक तो मुफ्त देखे जा सकने वाले कंटेट, दूसरे सब्सक्रिप्शन यानी चंदा देकर देखे जाने वाला कंटेट। भारतीय मीडिया उपभोक्ता आमतौर पर मुफ्तखोर होता है। यानी वह वीडियो देखने के पैसे नहीं देना चाहता। वह नेट पर अखबार पढ़ने के पैसे नहीं देना चाहता। ऐसे में वे उपभोक्ता बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जो डिजिटल कंटेट का भुगतान करना चाह रहे हैं। ई एंड वाई के अध्ययन के मुताबिक 2017 के अंत तक करीब बीस लाख ऐसे ग्राहक हैं जो सब्सक्रिप्शन देकर कंटेट देख रहे हैं। 2020 तक यह संख्या बढ़कर 40 लाख होने की संभावना है। यानी डिजिटल के ग्राहक तीन साल में शत प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है।
डिजिटल मीडिया का मतलब है कि गति होनी चाहिए चौबीस घंटे, सातों दिन, 365 दिन काम होना चाहिए। होली, दीवाली पर अखबार की छुट्टी होती है। पर उन अखबारों की वेबसाइटों को लगातार अपडेट होना पड़ता है। पुराने टाइप की पत्रकारिता पढ़े बच्चे नये डिजिटल माध्यमों में काम करने के काबिल न बन पायेंगे, यह बात तमाम पत्रकारिता विश्वविद्यालयों और कालेजों को समझ लेनी चाहिए। डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया की भूमिका 2014 के लोकसभा चुनावों में देखी जा चुकी है। जो पार्टियां, जो नेता, इस नये माध्यम के इस्तेमाल में निपुण थे, वे आगे निकल गये। बदलते मीडिया के साथ बदलने की तैयारी पत्रकारों को भी करनी है। नेताओं को करनी है।
सौजन्य – दैनिक ट्रिब्यून।




Updated: March 10, 2018 — 3:29 pm

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