दीर्घायु होना अभिशाप न बन जाए..? (पत्रिका)


– डॉ. नरेंद्र गुप्ता

भारत में आम नागरिकों की जीवन प्रत्याशा बढ़ी है, लोग लंबा जीवन जी रहे हैं। लेकिन, इस लंबे जीवन का क्या लाभ जबकि हम उन रोगों से घिर रहे हों जो जीवनशैली से जुड़े हैं। इसके साथ ही यह प्रश्न भी जुड़ा हुआ है कि क्या हम स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जागरूक हैं? क्या हम इस पर उतना खर्च कर रहे हैं, जितना जरूरी है?

हमारे नागरिकों के स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति और इसे संभालने के लिए देश कितना व्यय कर रहा है, के संबंध में दो अत्यन्त महत्वपूर्ण सर्वेक्षण सामने आए हैं। यह सर्वेक्षण भारत सरकार की राष्ट्रीय चिकित्सा शोध परिषद, अमरीका के इंस्टीटयूट आफ हेल्थ मैट्रिक्स और पब्लिक हेल्थ फाउण्डेशन ऑफ इंडिया द्वारा किया गया। स्वास्थ्य सेवाओं पर वर्ष 2014-15 में भारत में सरकार और नागरिकों ने स्वयं अथवा किसी अन्य स्त्रोत द्वारा कितना व्यय किया है, इसका आकलन नेशनल हेल्थ सिस्टम रिसोर्स सेन्टर द्वारा किया गया है।

भारत में वर्ष १990 में पुरुष की औसतन जीवन प्रत्याशा जहां 58.3 वर्ष थी, वह 2016 में बढक़र 66.9 वर्ष हो गई और महिलाओं की औसतन जीवन प्रत्याशा 59.7 वर्ष से बढक़र 70.3 वर्ष हो गई है। वैसे जीवन प्रत्याशा बढऩा सुखद है किन्तु क्या भारतीय लम्बा जीवन स्वस्थ रहकर जी रहे है तो इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक है। अस्वस्थ लम्बे जीवन का कारण यह है कि व्यक्ति जिस प्रकार के रोग से पहले ग्रसित होते थे उनमें परिवर्तन हो गया है।

पूर्व में जहां रोग और मृत्यु के कारण संक्रमण, मातृत्व एवं पोषण संबंधी थे अब उनका स्थान गैर संक्रामक रोगों जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय और फेफड़ों के रोग एवं दुर्घटनाओं ने ले लिया है। हालांकि जीवन प्रत्याशा बढ़ जाने के बावजूद भारत का स्थान कुल 201 राष्ट्रों में 126वां है। जीवन प्रत्याशा में भारत के विभिन्न राज्यों की स्थिति अलग-अलग है। स्वास्थ्य स्थिति के संदर्भ में सबसे अच्छी स्थिति केरल, तमिलनाडु, पंजाब और हिमाचल प्रदेश की है।

स्वास्थ्य स्थिति को बेहतर करना तब ही सम्भव है जब स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पर्याप्त मात्रा में धनराशि उपलब्ध हो। वर्तमान स्थिति यह है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में 2014-15 में 4,83,259 करोड़ रुपए व्यय हुए जो कि सकल घरेलू उत्पाद का 3.89 फीसदी रहा। यानी 3826 रुपए प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष व्यय हुआ जिसमें से 62 फीसदी राशि नागरिकों को अपने स्वयं के स्त्रोत से व्यय करनी पड़ी। सरकार द्वारा कुल व्यय राशि का लगभग 30 फीसदी ही खर्च किया गया और शेष लगभग 7 फीसदी राशि निजी बीमा, स्वयंसेवी संगठन, औद्योगिक घरानों और विदेशी संस्थाओं द्वारा व्यय की गई।

भारत के लगभग 58 डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष स्वास्थ्य खर्च की तुलना में श्रीलंका 93 और भूटान 89 व्यय करता है। ब्रिक्स राष्ट्रों में रूस 803 डॉलर, ब्राजील 1119 डॉलर, चीन 274 डॉलर और दक्षिणी अफ्रीका 670 डॉलर प्रति व्यक्ति व्यय करता हैं जिसमें अधिकतर राशि सरकार ही वहन करती है। भारत के विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए व्यय होने वाली राशि में भारी अन्तर है। बिहार में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य व्यय 2047 रुपए है और इसमें सरकार का अंश 304 रुपए ही है। केरल में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य व्यय सर्वाधिक 6801 रुपए है और सरकार का अंश 1208 रुपए प्रति व्यक्ति है।

राजस्थान में प्रति वर्ष व्यय 2943 रुपए हैं और इसमें से 904 रुपए सरकार वहन करती है। शेष राशि नागरिकों कि जेब से व्यय होती है। स्वास्थ्य व्यय में राजस्थान का स्थान नीचे से पांचवां है। भारत में सबसे अधिक स्वास्थ्य व्यय में दूसरा स्थान पंजाब का है जहां प्रति व्यक्ति व्यय 5220 रुपए है। सरकारी अंश सबसे अधिक हिमाचल प्रदेश में 2016 रुपए और उत्तराखंड 1534 रुपए प्रति व्यक्ति व्यय होता है। राज्यों में जब राज्य सरकार एवं निजी व्यय का अन्तर इतना अधिक होगा तो उसके अनुसार ही नागरिकों के स्वास्थ्य की स्थिति होगी। स्वास्थ्य व्यय का सीधा प्रभाव स्वास्थ्य की स्थिति पर होता है।

अगर रुग्ण भार की गणना की जाए तो यह सबसे कम केरल, तमिलनाडु, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और गोवा में है। इसके बाद आंध्र प्रदेश, तेलगांना, कर्नाटक, महाराष्ट्र में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र को अपने नागरिकों को साधारण गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए उसके सकल घरेलू उत्पाद का 5 फीसदी व्यय करना चाहिए एवं इसमें से अधिकतर राशि सरकार द्वारा दी जानी चाहिए। इसके विपरीत भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवश्यकता से कम राशि व्यय होती है और उसमें भी अधिकतर राशि नागरिकों द्वारा स्वयं वहन की जाती है।

वर्ष 2014 में नेशनल सेम्पल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार परिवारों के स्वयं के स्त्रोतों से रोग उपचार के लिए व्यय राशि के कारण प्रतिवर्ष 8 करोड़ नागरिक निर्धनता से बाहर नहीं निकल पाते और संसाधनों के अभाव में पुन: रोग ग्रस्त हो जाते हैं। भारत सरकार ने मार्च 2017 में नई स्वास्थ्य नीति की घोषणा की है जिसमें अनेक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किये है।

स्वास्थ्य के सरकारी बजट को 2025 तक सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फीसदी तक ले जाना और राज्यों के कुल बजट को 8 फीसदी से अधिक तक बढाने के लक्ष्यों के अतिरिक्त सार्वजनिक चिकित्सा सेवाओं में विश्वास को पुर्नस्थापित करने और उसके उपयोग को 50 फीसदी से अधिक रोगियों द्वारा करने के लक्ष्य है। विडम्बना यह है कि जब 2002 में स्वास्थ्य नीति बनी थी तब भी लगभग इसी प्रकार के लक्ष्य थे जिनको 2017 तक प्राप्त करना था किंतु अब इनको 2025 तक बढ़ा दिया गया है।

सौजन्य – पत्रिका।


Updated: December 6, 2017 — 10:17 am

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