जीवन के दरकते मूल्यों की टीस (दैनिक ट्रिब्यून)


सुशील ‘हसरत’ नरेलवी
डॉ. डेज़ी के लघुकथा-संग्रह ‘कटघरे’ में 73 लघुकथाओं का समावेश है। इससे पहले आपके दो काव्य-संग्रह ‘आस’, 2010 में व ‘करवटें मौसम की’, 2017 में प्रकाशित हो चुके हैं। ‘कटघरे’ में समाहित लघुकथाओं के कथ्य का केन्द्र-बिन्दु मुख्यत: मानव मन-मस्तिष्क के ‘मेंटल ब्लॉक’ के विभिन्न आयामों को उजागर करता है। इनमें, सामाजिक विसंगतियों के वशीभूत उपजी मिथ्य-मान्यताएं अवरोधक के रूप में, व्यक्तिगत कुंठाएं मतभेदों के तौर पर, रिश्तों के बीच पनपती दूरियों के चक्रव्यूह, मर्यादाओं के घेरे को भेदती स्वार्थपरक चाहतें, अवसरवादिता की कैंची के कटीले घाव, इत्यादि मुखर होकर पाठकों के ज़ेहन से टकराते हैं और उन्हें चिन्तन के लिए विवश करते हैं। साथ ही सकारात्मकता की ओर अग्रसर करते हैं।
मसलन, लघुकथा ‘मां’, यह मां का कटघरा था जिसमें सिर झुका कर ईश्वर पर सब छोड़ देने के सिवाय स्वयं ‘मां’ के पास भी कोई चारा न था।’ ‘मोहा’ – ‘कोर्ट ने भले ही कोई सज़ा नहीं दी… पर जीवनभर मोहा ने स्वयं को एक मज़बूत, काटने वाले कटघरे में खड़े पाया। इल्ज़ाम था-स्वयं को भूल कर क्यों ‘प्यार’ किया सबसे।’ ‘पति-पत्नी’- ‘ये दो कटघरे यानी ‘पति-पत्नी’, यदि मिलकर बाक़ी सब के लिए एक कटघरा बन जाते तो अधिक सुखी हो जाते न।’
कटघरे में लघुकथा ‘फेसबुक’ में-इसको बनाने वाले, इसका ग़लत ढंग से प्रयोग करने वाले, दोनों-मगर साथ ही फेसबुक सामाजिक जागरूकता का दायित्व भी निभाती है। ‘हम सब’ के माध्यम से लेखिका डॉ. डेज़ी कहती हैं- ‘कटघरे गायब कहां होते हैं? जीवन है तो कटघरे भी होंगे। स्वयं दिखने मुश्किल हैं पर… होंगे तो मेरे भी बहुत…।’ यह कथन मनुष्य जीवन के स्वभाव की सटीक बानगियों में से एक बानगी है।
लघुकथा में मुख़्यत: एक पल को क़ैद करना होता है, वह पल जो वैचारिकता पर चोट कर संवेदनाएं पैदा करता हो और मन-मस्तिष्क को झकझोरता हो। डॉ. डेज़ी ने समीक्ष्य लघुकथा-संग्रह ‘कटघरे’ में मानव-मन के कटघरों को परिभाषित करने की कोशिश की है और इसमें वह कमोबेश सफल भी रही हैं। इस संग्रह के अन्तिम पृष्ठों में अंकित 11 लघुकथाएं-‘मिथ्या’, ‘रानी की जि़न्दगी’, ‘बांहें’, ‘दु:ख’, ‘चट्टान’, ‘नन्नी’, ‘परख’, ‘स्वार्थ’, ‘चूक’, ‘हवा के संग’ व ‘आरक्षित मन’ संवेदनाओं से ओत-प्रोत हैं, जिनमें, पिता रूपी वट-वृक्ष की बांहें की तृप्ति को तरसती बेटी ‘तृप्ति’ है, जीवन में आए मार्मिक क्षणों के टुटाव-जुड़ाव की अनुभूति लिए है ‘दुख’ का नायक, रिश्तों के नए मूल्य भी इंगित होते हैं इनमें, ‘खेत ही बाड़ को खाने’ वाली लोकोक्ति व दोगले किरदार भी परिभाषित होते हैं, कहीं आरक्षण की वजह से युवामनों में बनती खाई का चित्रण है जो स्वार्थी नेताओं की वोट बैंक नीति के घिनौनेपन को प्रस्तुत करता हैं, तो कुछेक लघुकथाएं आदर्श स्थापित करने की कोशिश करती हुई नज़र आती हैं। भाषा, शैली व शिल्प प्रभावित करते हैं।
0पुस्तक : ‘कटघरे’ 0लेखिका : डॉ. डेज़ी 0प्रकाशक : विश्वगाथा, गोकुल पार्क सोसायटी, सुरेन्द्रनगर, गुजरात 0पृष्ठ संख्या 140 : 0मूल्य : रु. 250.

सौजन्य – दैनिक ट्रिब्यून।


Updated: January 6, 2018 — 9:41 pm

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