जल्द निपटारे की आस (नईदुनिया)


अयोध्या में विवादित ढांचा ध्वंस की 25वीं बरसी से एक दिन पहले ये उम्मीद बंधी कि इस मामले का निपटारा निकट भविष्य में हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को जुलाई 2019 (यानी अगले आम चुनाव के बाद) तक टालने की सुन्न्ी वक्फ बोर्ड के वकील की गुजारिश नामंजूर कर दी। इससे वे तमाम लोग राहत महसूस करेंगे, जो इस विवाद का विधिसम्मत शीघ्र समाधान चाहते हैं। न्यायालय को यह तय करना है कि जहां विवादित ढांचा खड़ा था, उस पर मालिकाना हक किसका है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस बारे में स्पष्ट निर्णय देने के बजाय एक ऐसा समाधान पेश किया था, जिससे विवाद से संबंधित कोई पक्ष संतुष्ट नहीं हुआ। 2010 में दिए अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन को सुन्न्ी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच विभाजित करने का सुझाव दिया। जबकि वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा का पूरी जमीन पर दावा है। मालिकाने का ये मसला जब तक हल नहीं होता, इससे जुड़ा दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय लंबा खिंचता रहेगा। इस मामले को लेकर काफी हिंसा और कड़वाहट हो चुकी है। अत: पूरे देश का हित इसी में है कि इस पर यथाशीघ्र विराम लगे।


इसके मद्देनजर हैरतअंगेज है कि विवाद से जुड़ा एक पक्ष इस पर न्यायिक निर्णय को टालना चाहता है। बेशक राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद ने भारतीय राजनीति पर व्यापक असर डाला है। इसके बावजूद मामले को और लटकाने के लिए चुनाव पर संभावित प्रभाव के तर्क का कोई औचित्य नहीं है। देश में लगातार चुनाव होते रहते हैं। ऐसे में मामले की सुनवाई टलवाने की ये दलील हमेशा खड़ी रहेगी। कानून-व्यवस्था की समस्या खड़ी होने का अंदेशा भी टालमटोल का कारण नहीं हो सकता। जब कभी इस प्रकरण में निर्णय आएगा, शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी तत्कालीन सरकार पर होगी। वह इससे बच नहीं सकती। दरअसल, ऐसी ही बेबुनियाद आशंकाओं के कारण दिसंबर 1949 से इस मामले को लंबित रखा गया। ऐसा नहीं होता, तो 6 दिसंबर, 1992 को वह अवांछित घटना (विवादित ढांचे का ध्वंस) नहीं हुई होती।

तो कुल सबक यह है कि समस्या चाहे जितनी संवेदनशील हो, उसका सामना करना ही उचित दृष्टिकोण होता है। इसलिए संतोष की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने अंतत: विवाद पर 8 फरवरी से सुनवाई करने का फैसला किया है। स्पष्टत: न्यायिक निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होते हैं। सुप्रीम कोर्ट उपलब्ध दस्तावेजों के अनुरूप विवादित भूमि का स्वामित्व तय करेगा। अपेक्षित यही है कि उसकी कार्यवाही उसी दायरे में सीमित रहे। विवाद से जुड़े पक्ष उसके आगे जाकर कोई सद्भावपूर्ण हल निकालना चाहें, तो बेशक वह स्वागतयोग्य होगा। बहरहाल, अब चूंकि इस मामले का न्यायिक हल निकलने की उम्मीद बढ़ी है, तो अपेक्षित है कि इसको लेकर भावनाएं भड़काने से बचा जाए। निर्णय आने तक सभी पक्षों को संयम का परिचय देना चाहिए। साथ ही विवादित ढांचा ध्वंस की बरसी पर आज देश में शांति बनी रहे, यह सुनिश्चित करना हम सबका कर्तव्य है।

सौजन्य – नईदुनिया।

Updated: December 6, 2017 — 10:06 am

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