जलवायु संकट का एक पहलू है आबादी (हिन्दुस्तान)


अनिल पी जोशी पर्यावरणविद्
कहा जाता है कि मानव आबादी वर्ष 1350 में ब्लैक डैथ (प्लेग) के बाद लगातार बढ़ी है। जनसंख्या वृद्धि 1350 के बाद शुरू हुई और उसका कारण था बेहतर स्वास्थ्य व अधिक खाद्य उत्पादन। इसकी वृद्धि दर वर्ष 1980 के बाद घटी पर पूर्णांक संख्या फिर भी बढ़ी ही है। एक हालिया शोध ने ये बताया है कि पांच जुलाई 2018 को 763.4 करोड़ लोग धरती पर है। यह भी माना जाता है कि पृथ्वी चार अरब लोग बेहतर जीवन जी सकते हैं और यह धरती 16 अरब से ज्यादा आबादी का भार नहीं ढो सकती, यानी यह उसकी अंतिम सीमा है। यह भी माना जा रहा है कि जनसंख्या वर्ष 2040-50 तक आठ से 10.5 अरब तक पहुंच जायेगी। क्योंकि प्रति वर्ष 7.4 करोड़ लोग धरती पर बढ़ते जा रहे है। दुनिया में 7 देश ऐसे हैं जिनके कारण वर्ष 2050 तक आधी आबादी का कारवां होगा।
हमारी धरती पर कितनी आबादी होनी चाहिए यह चर्चा बहुत पुरानी है। प्राचीन लेखक तेर्तुल्लियन ने दूसरी सदी में ये कहा था कि आबादी पृथ्वी की क्षमताओं के अनुसार ही होनी चाहिये। यह भी बड़ी अजीब सी बात है कि 750 साल पहले मतलब उद्योग क्रांति से भी पहले दुनिया की संख्या बहुत धीमी गति से बढ़ती थी परंतु 19वीं सदी में आते आते यह संख्या अरबों में पहुंच गई। 18वीं सदी की इसी उद्योग क्रांति के बाद जनसंख्या वृद्धि भी हुई और साथ में प्राकृतिक संसाधनों का शोषण भी हुआ। इस सदी के अंत में जहां जनसंख्या अरब थी वो 20वीं सदी में आते आते 1.6 अरब हो गई और 20वीं सदी के अंत तक छह अरब पर पहुंच गई। वैसे थॉमस मॉल्थस जैसे विद्वान ने कभी यह भविष्यवाणी की थी कि मानव जाति संसाधनों की तुलना में कई गुना बढ़ जायेगी।
यह पृथ्वी कितनी आबादी का भारत ढो सकती है यह बहस भले ही सदियों से चल रही हो लेकिन 1994 से इसके विश्लेषण भी शुरू हो गए। तब इंटर ऐकेडमिक पैनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इसके कारण पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण जैसे मुद्दे खड़े होंगे। यूनाईटेड नेशन पॉपूलेशन असेंसमेंंट की वर्ष 2004 की रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक जनसंख्या स्थिर हो जाएगी। पर 2014 में साइंस मैगजीन ने इसका खंडन करते हुए बताया कि यह जनसंख्या वृद्धि अगली सदी तक चलेगी। वर्ष 2017 में ही 50 नोबेल पुरुस्कार विजेताओं ने सामूहिक रूप से एक पेटीशन में कहा कि अधिकतम मानव जनसंख्या और पर्यावरणीय क्षति दुनिया के दो बड़े खतरे बन चुके हैं। और इसी वर्ष 184 देशों के 15364 वैज्ञानिको ंने माना कि बढ़ती जनसंख्या ही बिगड़ती सामाजिक, आर्थिक व पारिस्थितिकीय का कारण है।
पर आबादी कभी बहस का बड़ा मुददा नहीं बन पाती, क्योंकि इससे कईं चीजें जुड़ी हुई है। जनसंख्या के आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक पहलू जब भी चर्चा में आते है तो कई तरह के विवादों में अटक जाते हैं। हम जनंसख्या पर चर्चा से कतई नहीं कतरा सकते क्योंकि स्थिति लगातार विस्फोटक होती जा रही है। खासतौर से जब दुनिया के हर तीसरें व्यक्ति को भरपेट भोजन नहीं हासिल होता है। आधी आबादी के सर पर अपनी छत नहीं है, स्वास्थय सेवाएं मात्र 30-40 प्रतिशत लोगों तक ही पहुंचती हैं। इसी के चलते गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा है।
इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि अगर एक हैक्टेयर खेती 22 टन ही धान पैदा कर सकती है और उससे 1000 लोगों का ही पेटभर सकता है तो आगे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इसके साथ ही हमें बाकी प्राणियों के बारे में भी सोचना होगा। एक रिपोर्ट के अनुसार 1.4 लाख प्रजातियां धरती से विलुप्त होने की कगार पर है। जिनमें से 801 वन्यजीव भी शामिल है। वल्र्डवाइड फंड फॉर नेचर की एक रिपोर्ट के अनुसार- आबादी अगर इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो हमें डेढ गुना बड़ी पृथ्वी की आवश्यकता पड़ेगी। दूसरी तरफ बढ़ती जनसंख्या के कारण साफ पेयजल की उपलब्धता पर सीधा असर पड़ा है। बढ़ता वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मिटटी व ध्वनि प्रदूषण सीधा बढ़ती जनसंख्या के कारण है।
वर्ष 1970 से लेकर वर्ष 2015 के बीच में उर्जा के उपभोग में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। मतलब 1970 में अगर उर्जा के उपयोग को शून्य मान लें तो 2010 में ये 150 गुना बढी वा 2025 तक आते-आतें ये 250 गुना हो जाएगी और इसके लिये हद से ज्यादा प्रकृति का शोषण होगा। हम जानते हैं कि दुनिया में बाल व शिशु मृत्यु दर बढ़ती गरीबी के कारण है। भुखमरी, कुपोषण व नई नई बीमारियों को सीधे-सीधे बढ़ती जनसंख्या से जोड़ा जा सकता है। दिक्कत यह है कि दुनिया में कुपोषित और अल्पपोषित लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। हालत यहां तक पहुंच गई है कि ब्रिटेन जैसे सक्षम देश को अपनी आबादी के लिये खाद्य पदार्थों का आयात करना पड़ता है। लेकिन हर देश के लोग इतने खुशकिस्मत नहीं हैं, जिन देशों की आर्थिक स्थिति इतीन अच्छी नहीं हैं कि वे बड़ी मात्रा में आयात कर सकें वहां लोग कुपोषण और अल्पलोषण के शिकार हैं।
अगर जनसंख्या की यह ही गति रही तो यह तो तय है कि अन्न से लेकर पानी और प्राणवायु तक सब पर बड़ा संकट आएगा। आज भी इन सभी संसाधनों पर पड़ने वाला दबाव साफ देखा जा सकता है। यह सब पिछले दो दशकों में ज्यादा गहरा हुआ है तो कल्पना की जा सकती है कि अगले 2-3 दशकों में परिस्थितियां कहां पहुंच जाएंगी। हमें बढ़ती जनसंख्या पृथ्वी की क्षमताओं और वर्तमान परिस्थितियों पर बड़ी और निर्णायक चर्चा अब करनी ही होगी। वर्ना यह दुनिया पहले संसाधनों के संकट और फिर उनके लिए युद्ध की ओर बढ़ेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य – हिन्दुस्तान।




Updated: July 11, 2018 — 10:34 am

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