चुनावी भक्ति से नहीं धुलेंगे पुराने दाग (नईदुनिया)


– ए सूर्यप्रकाश
कांग्र्रेस अध्यक्ष बनने जा रहे राहुल गांधी का हालिया सोमनाथ दौरा विवादों में घिर गया। राहुल के दौरे से दिखा कि चुनावी दौर में मतदाताओं को लुभाने के लिए नेता किस हद तक जा सकते हैं। यह साफ है कि राहुल गांधी चुनावी फायदे के लिए ही मंदिरों की खाक छानते फिर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि खुद को शिवभक्त बताने वाले राहुल क्या कांग्र्रेस पार्टी को अपने परनाना जवाहरलाल नेहरू की छद्म सेक्युलर और हिंदू विरोधी विरासत से मुक्त कर सकेंगे? राहुल का ‘सोमनाथ अभियान परवान न चढ़ने की एक प्रमुख वजह यह है कि भारत अभी भी भूला नहीं है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री के तौर पर नेहरू ने उस सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में हरसंभव अड़ंगे लगाने का काम किया, जिसे महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी जैसे तमाम मुस्लिम आक्रांताओं ने कई बार लूटा। आजादी के बाद बहुमत इसी पक्ष में था कि अगाध श्रद्धा के केंद्र सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराकर राष्ट्रीय गौरव को बहाल किया जाए, लेकिन नेहरू सरकार इस पवित्र स्थल को जर्जर अवस्था में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई को सौंपने की फिराक में थी कि वही इसका संरक्षण करे। हालांकि नेहरू सरकार का हिस्सा रहे सरदार पटेल, केएम मुंशी और एनवी गाडगिल के अलावा देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके विरोध में थे और उन्होंने एलान किया कि राष्ट्र का गौरव तब तक बहाल नहीं हो सकता, जब तक सोमनाथ का पुनर्निर्माण और ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाने वाले सोमनाथ लिंग की पुनर्स्थापना नहीं हो जाती। भारत में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा हिंदू मंदिरों का ध्वंस किए जाने के इतिहास को देखते हुए इन सभी का मानना था कि जब तक सोमनाथ मंदिर का अपना पुराना स्वर्णिम वैभव नहीं लौटेगा, तब तक भारत का राष्ट्रीय स्वाभिमान बहाल नहीं हो सकेगा। मगर नेहरू अपने रुख पर अड़े थे। वह इस आधार पर विरोध करते रहे कि इससे उनकी सरकार की सेक्युलर साख को नुकसान पहुंचेगा।

सोमनाथ को लेकर नेहरू की आपत्तियों ने न केवल सरदार पटेल के साथ उनके समीकरण गड़बड़ा दिए, बल्कि राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और उनकी कैबिनेट के ही एक अन्य सदस्य केएम मुंशी के साथ भी उनकी कटुता बढ़ा दी। नेहरू की पहली आपत्ति यह थी कि सरकारी पैसे से यह काम नहीं होना चाहिए। दूसरा उन्होंने अपनी सरकार के सदस्यों और राष्ट्रपति से कहा कि उन्हें इस परियोजना से नहीं जुड़ना चाहिए। इस पर सरदार पटेल ने महात्मा गांधी से अनुनय-विनय की। महात्मा ने इसे समर्थन तो दिया, लेकिन एक शर्त भी रख दी कि यह काम सरकारी पैसे से नहीं, बल्कि जनता से जुटाए पैसे से बने ट्रस्ट के जरिए पूरा किया जाए। नेहरू की आपत्तियों से प्रभावित हुए बिना पटेल, मुंशी और गाडगिल ने तुरंत कदम उठाते हुए ट्रस्ट का निर्माण किया, जिसमें जनता से पैसे जुटाकर पुनर्निर्माण का काम शुरू किया गया। इस परियोजना से न जुड़ने की नेहरू की सलाह को उन्होंने दरकिनार कर दिया। सरदार पटेल ने एलान किया कि सोमनाथ के पुनर्निर्माण का काम बेहद पुण्य का है जिसमें सभी को भाग लेना चाहिए। केएम मुंशी ने पटेल के एक पत्र का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा, ‘इस मंदिर को लेकर हिंदू भावनाएं बहुत व्यापक और प्रबल हैं। ऐसे में मंदिर का कायाकल्प बहुत सम्मान की बात होगी।

अफसोस कि सरदार पटेल अपने इस सपने को पूरा होते नहीं देख सके, क्योंकि 15 दिसंबर 1950 को उनका निधन हो गया। हालांकि मंदिर का काम पूरी तेजी से आगे बढ़ा और प्रशासक भी मंदिर में शिवलिंग की स्थापना के लिए तैयार हो गए। नेहरू ने इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की भागीदारी पर एतराज जताया। प्रसाद ने नेहरू की बिन मांगी सलाह को अनसुना कर मंदिर के कार्यक्रम में भाग लिया। इस पर नेहरू ने कहा कि सोमनाथ के कायाकल्प से उनकी सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। इस कार्यक्रम के मुख्य आयोजक मुंशी को भी नेहरू के कोप का भाजन बनना पड़ा। कैबिनेट बैठकों में उन्हें नेहरू की झिड़कियां सुननी पड़ती थीं। ऐसी ही एक बैठक में नेहरू ने इसे ‘हिंदू पुनरोत्थान की परियोजना करार दिया, लेकिन मुंशी अपने रुख पर अडिग रहे। 24 अप्रैल, 1951 को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि ‘मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि हमारी सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यक्रमों की तुलना में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर भारत की सामूहिक जनचेतना कहीं अधिक प्रसन्न् है”। उन्होंने कहा कि ‘इसके उद्घाटन व प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में सरदार पटेल को भी शामिल होना था, लेकिन दुर्भाग्यवश परियोजना पूरी होने से पहले ही उनका निधन हो गया। लिहाजा हमें यह भी महसूस होता है कि सरदार के अधूरे सपने को पूरा करने के लिए हमें पूर्ण क्षमता के साथ इसमें मदद करनी चाहिए”।

चूंकि नेहरू नहीं चाहते थे कि उद्घाटन समारोह के लिए सरकारी पैसा खर्च किया जाए, इसलिए मुंशी ने उन्हें आश्वस्त किया कि सोमनाथ ट्रस्ट का फंड और जनता से लिया चंदा ही खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा। अपने पत्र का समापन करते हुए उन्होंने लिखा, ‘यह अतीत में मेरी आस्था ही है, जिसने मुझे वर्तमान में काम करने की क्षमता व भविष्य की ओर देखने की दृष्टि प्रदान की। अगर स्वतंत्रता मुझे भगवद्गीता से दूर करती है या करोड़ों लोगों के मंदिरों में विश्वास से वंचित रखती है तो ऐसी स्वतंत्रता मेरे लिए मायने नहीं रखती। सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के अपने शाश्वत स्वप्न को पूरा करने का मुझे सौभाग्य मिला। यह मुझे आश्वस्त करता है और मैं इस बात को लेकर एकदम निश्चिंत भी हूं कि जब यह धार्मिक स्थल हमारे जीवन में पुन: वही महत्ता हासिल कर लेगा तो इससे हमारी जनता को न केवल धर्म का विशुद्ध भाव मिलेगा, बल्कि आजादी के इस दौर और आने वाले वक्त में भी हमारी शक्ति और प्रबल चेतना की भावनाएं भी मजबूत करेगा। यदि नेहरू व उनकी कांग्र्रेस पार्टी पटेल और मुंशी की बात सुन लेती तो आज नेहरू के वंशज को अपनी पार्टी की हिंदूवादी जड़ों को दिखाने के लिए इतने जतन नहीं करने पड़ते। नेहरू की आपत्तियों को दरकिनार कर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 11 मई, 1951 को सोमनाथ मंदिर में ‘लिंगम स्थापना समारोह” में भाग लिया। वहां उन्होंने कहा कि भले ही कुछ स्थलों को ध्वस्त किया जा सकता है, लेकिन अपनी संस्कृति और विश्वास के साथ लोगों के रिश्ते को कभी खत्म नहीं किया जा सकता। असल में राहुल गांधी के अचानक सोमनाथ के शरणागत होने ने हमें इस मंदिर और हिंदू भावनाओं को लेकर नेहरू के रुख और उनकी कांग्र्रेस पार्टी के हिंदू विरोधी छद्म धर्मनिरपेक्ष रवैये का स्मरण करने पर विवश कर दिया है। कुल मिलाकर हिंदुओं को लेकर नेहरू के रुख या ‘नेहरू सिद्धांत के साक्ष्यों को देखकर यही लगता है कि सोमनाथ में राहुल गांधी का ‘प्रायश्चित देर से उठाया गया एक नाकाफी कदम है।


(लेखक प्रसार भारती के प्रमुख तथा वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

सौजन्य – नईदुनिया।

Updated: December 6, 2017 — 10:07 am

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