कश्मीर में संघर्ष विराम का भविष्य (दैनिक जागरण)


[दिव्य कुमार सोती]। जम्मू-कश्मीर में रमजान के दौरान केंद्र सरकार की ओर से घोषित एकतरफा संघर्ष विराम की करीब आधी अवधि बीत चुकी है। हालांकि केंद्र सरकार ने इसे आतंकरोधी अभियानों के स्थगन की संज्ञा दी है, लेकिन है यह एक तरह का संघर्ष विराम ही। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती इस संघर्ष विराम को रमजान के बाद भी जारी रखना चाहती हैं, लेकिन फिलहाल यह साफ नहीं कि केंद्र सरकार उनकी इच्छा पूरी करने को तैयार है या नहीं? यह संघर्ष विराम इसलिए घोषित किया गया ताकि पिछले दो साल से आतंकियों के खिलाफ जारी धुआंधार सैन्य अभियानों के कारण रमजान और ईद के उत्सव में खलल न पड़े और आम कश्मीरियों में यह संदेश जाए कि सुरक्षा बलों की लड़ाई उनके मजहब के विरुद्ध नहीं है। ज्ञात हो कि आतंकियों के खिलाफ सैन्य अभियान के दौरान इलाके विशेष की घेरेबंदी करके बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान भी चलाया जाता था। इस दौरान सुरक्षा बलों को पत्थरबाजी का सामना करना पड़ता था। हाल के समय में पत्थरबाजी में खासी उग्रता देखने को मिली है। सेना और सुरक्षा बल पत्थरबाजों को आतंकियों के समर्थक के तौर पर देखते हैं, लेकिन राज्य सरकार का नजरिया कुछ और है। वह उन्हें नादान युवाओं के तौर पर देखती है और उनके प्रति नरमी बरतती है। कुछ ऐसी ही राय हाल में कश्मीर के दौरे पर गए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने व्यक्त की।

चूंकि कश्मीर में संघर्ष विराम के दौरान भी पत्थरबाजी का सिलसिला कायम है इस कारण मोदी सरकार आलोचना का सामना कर रही है। इस आलोचना पर सरकार का कहना है कि उसने सुरक्षा बलों के हाथ नहीं बांधे हैं और अपने ऊपर हमला होने की स्थिति में वे पूरी ताकत से जवाबी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं। यह सही भी है। संघर्ष विराम के दौरान अपने ऊपर किए गए आतंकी हमलों के जवाब में सुरक्षा बलों ने कुछ आतंकी मार भी गिराए हैं। इसके बावजूद जवाबी कार्रवाई में आतंकियों को ढेर करने और आतंकियों को खुद ढूंढ़-ढूंढ़ कर मार गिराने में फर्क तो है ही। यह संघर्ष विराम फिलहाल के लिए सुरक्षा नीति को आक्रामक की जगह रक्षात्मक बनाता है। इसमें तब कुछ हानि नहीं है जब यह नीति किसी बड़े राजनीतिक लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहे। अभी यह कहना कठिन है कि यह संघर्ष विराम किसी बड़े राजनीतिक लक्ष्य को साधने में मददगार साबित होने जा रहा है।

रमजान के दौरान एकतरफा संघर्ष विराम का प्रयोग सबसे पहले वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने किया था। इस संघर्ष विराम को विस्तार देने के बाद भी कुछ खास सफलता नहीं मिली थी। तब संघर्ष विराम खत्म होने के बाद आतंकी हिंसा में बढ़ोतरी हुई और यह अगले वर्ष जम्मू-कश्मीर विधानसभा और संसद पर आतंकी हमले तक गई थी। यह भी गौर करने वाली बात है कि भारतीय संसद पर आतंकी हमला रमजान के महीने में ही हुआ था। दरअसल जिहादी परंपरा में रमजान को ऐसा दर्जा नहीं दिया गया है कि उस दौरान हिंसा रोक दी जाए। अपनी बात को सही ठहराने के लिए जिहादी गुट मक्का में रमजान के महीने में लड़ी गई बद्र की लड़ाई का उदाहरण देते आए हैं। यही कारण है कि सुरक्षा एजेंसियों को रमजान के दौरान पड़ने वाली बद्र की लडा़ई की वर्षगांठ पर आतंकी हमलों की आशंका का अलर्ट जारी करना पड़ता है। बद्र की लड़ाई को यौम-ए-बद्र कहा जाता है। ऐसा अलर्ट इस साल भी जारी किया गया। मुस्लिम लीग ने भी पाकिस्तान की मांग जबरन मनवाने के लिए 16 अगस्त, 1946 को कलकत्ता में हिंदुओं और सिखों के खिलाफ बडे़ पैमाने पर दंगे कराए थे। इसे उसने सीधी कार्रवाई की संज्ञा दी थी। दंगों रूपी यह सीधी कार्रवाई रमजान में यौम-ए-बद्र के दौरान ही की गई थी। इन भीषण दंगों में करीब 4000 लोग मारे गए थे और 100000 से ज्यादा लोग बेघर हो गए थे। इस हिंसा ने देश भर में बडे़ दंगों का दौर शुरू किया था। इसकी परिणिति अंतत: पाकिस्तान के निर्माण के रूप में हुई। तब से लेकर आज तक पाकिस्तान और उसके द्वारा समर्थित आतंकी संगठनों के व्यवहार में कोई खास बदलाव नहीं आया है। इसी कारण यह माना जाता है कि पाकिस्तान और उसके संरक्षण में पल रहे आतंकी संगठनों का असल मकसद भारत को त्रस्त करते रहना है, न कि कश्मीर की लड़ाई लड़ना।

इन दिनों मुस्लिम जगत में कई देशों में युद्ध जैसे हालात हैं। खास बात यह है कि जहां ऐसे हालात हैं वहां दोनों ही पक्ष मुस्लिम ही हैं, लेकिन पूरे रमजान के दौरान संघर्ष विराम कहीं नहीं किया गया। अफगानिस्तान का मामला अपवाद अवश्य है। यहां सरकार ने तीन चौथाई रमजान निकलने के बाद ईद के मद्देनजर आखिरी हफ्ते के लिए संघर्ष विराम की घोषणा की। अफगान सरकार ने केवल एक सप्ताह के लिए ही संघर्ष विराम का फैसला इसलिए किया, क्योंकि उसका मानना है कि सदाशयता का परिचय देने के लिए जहां एक हफ्ता काफी है वहीं एक महीने का वक्त आतंकियों के दोबारा संगठित होने के लिए काफी अधिक हो सकता है। अफगानिस्तान सरकार के फैसले के बाद तालिबान ने भी केवल तीन दिन के लिए संघर्ष विराम की घोषणा की, लेकिन इस घोषणा के पहले उसने सुरक्षा बलों के 17 जवानों को मार डाला। तालिबान ने यह भी स्पष्ट किया कि विदेशी सैनिक उसके संघर्ष विराम के दायरे में नहीं आएंगे। आम धारणा है कि तालिबान की ओर से संघर्ष विराम की घोषणा के पीछे पाकिस्तान का हाथ है, जो अमेरिका के दबाव से बचने की राह देख रहा है। आखिर यही पाकिस्तान कश्मीर में आतंक फैला रहे अपने संगठनों पर लगाम क्यों नहीं लगा रहा है?

इसमें संदेह नहीं कि पिछले दो वर्षों में मोदी सरकार ने कश्मीर में आतंकी संगठनों को कुचलने के लिए मजबूत कदम उठाए हैं, परंतु शायद यह हमारी सामरिक सोच का एक हिस्सा बन चुका है कि थोड़ी सख्ती करने के बाद यह सोचने लगते हैं कि हमने कहीं ज्यादा कठोर रवैया तो नहीं अपना रखा? हम थोड़े गुस्से के बाद जल्द ही द्रवित हो जाते हैं और रियायतें देने लग जाते हैं। कहीं हम आखिरी मौके पर शत्रु पर निर्णायक वार करने से हिचकने के आदी तो नहीं हो चुके? जो भी हो, यह ध्यान रहे कि वर्ष 2000 में कश्मीर में पत्थरबाजी कोई बड़ी समस्या नहीं थी।

(काउंसिल फॉर स्ट्रेटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं)


सौजन्य – दैनिक जागरण।

Updated: June 13, 2018 — 2:58 pm

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