Category: हिन्दी संपादकीय

राजनीतिः घटने वन, बिगड़ता पर्यावरण (जनसत्ता)

अभिजीत मोहन यह राहत की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई की आरे कालोनी में पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है। इस कालोनी में मेट्रो कारशेड के लिए ढाई हजार से ज्यादा पेड़ काटे जाने थे और वहां के निवासी और पर्यावरण संरक्षक इसका विरोध कर रहे थे।...

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संपादकीयः एक और कदम (जनसत्ता)

महाबलीपुरम में शुक्रवार शाम चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनौपचारिक बातचीत ने दोनों देशों के रिश्तों में एक और आयाम जोड़ दिया है। यह दोस्ती की नई इबारत है। पिछले डेढ़ साल में यह दूसरी अनौपचारिक मुलाकात इस बात का प्रमाण है कि भारत और चीन रिश्तों को...

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संपादकीयः अनियमितता के कोष (जनसत्ता)

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने भरोसा दिलाया है कि वित्तीय अनियमितता करने वाले सहकारी बैंकों के खिलाफ कड़े कानून बनाए जाएंगे। इसके लिए एक समिति गठित की जाएगी, जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर भी शामिल होंगे। अगर जरूरत पड़ी तो संसद के शीतकालीन सत्र में जरूरी विधायी संशोधन किए जाएंगे। दरअसल, पंजाब एवं महाराष्ट्र...

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राफेल से बदल सकती है रणनीति, मुकम्मल सुरक्षा का दोतरफा इंतजाम (अमर उजाला)

मारूफ रजा बीते मंगलवार को जब केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अत्याधुनिक तकनीक से लैस पहला राफेल विमान लेने फ्रांस पहुंचे, तो इसकी कोई खास आलोचना नहीं हुई। हालांकि लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी सरकार को राफेल सौदे को लेकर काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी, लेकिन अब एक आम राय यह है कि राफेल हमारी...

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निजीकरण की राह (बिजनेस स्टैंडर्ड)

इस समय निजीकरण पर जोर है। रेलवे स्टेशन और रेलगाडिय़ां, हवाई अड्डे, कंटेनर कॉर्पोरेशन, शिपिंग कॉर्पोरेशन, राजमार्ग परियोजनाएं, एयर इंडिया, भारत पेट्रोलियम इन सभी का तथा अन्य संस्थानों का भी निजीकरण होना है। यहां हम विनिवेश नहीं बल्कि पूर्ण निजीकरण की चर्चा कर रहे हैं। यानी स्वामित्व में बदलाव। पिछली बार ऐसा वाजपेयी सरकार के...

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डीटीएच ग्राहकों के गुम होने से जुड़े मिथक का सच (बिजनेस स्टैंडर्ड)

वनिता कोहली-खांडेकर जब परंपरागत मीडिया को लेकर बुरी खबर आती है तो विश्लेषकों एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया कमोबेश अनुमानित ही होती है। हर बात को बड़ी तेजी से ‘डिजिटल क्रांति’ और ‘कॉर्ड कटिंग’ के जिम्मे डाल दिया जाता है। पिछले हफ्ते भी कुछ ऐसा ही हुआ। द हिंदू बिज़नेसलाइन अखबार में 2 अक्टूबर...

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पुराने बनाम नए बुर्जुआ की बहस में उलझा देश (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम सरन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मौजूदा सरकार लगातार खुद को पिछली सरकारों से अलग बताती रही है। यहां तक कि उसने अपने आपको अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा की पिछली सरकार से भी अलग दर्शाया है। यह सरकार एक नव राजनीतिक बुर्जुआ के रूप में...

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पहले से कहीं ज्यादा अब प्रासंगिक हैं उनके सवाल (हिन्दुस्तान)

केसी त्यागी, वरिष्ठ जद-यू नेता भारत में गैर-माक्र्सवादी और लोकतांत्रिक समाजवाद के वह सबसे बड़े विचारक भी थे और आंदोलनकर्ता भी। विडंबना यह है कि राम मनोहर लोहिया के समकालीन और उनके बाद के राजनीतिज्ञों के साथ ही बुद्धिजीवियों ने उनके गंभीर दर्शन और समग्र सामाजिक सिद्धांत को समझने की बजाय उन्हें व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से...

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ग्रामीण आर्थिकी सुधरने से दूर होगी सुस्ती (दैनिक ट्रिब्यून)

जयश्री सेनगुप्ता दुनियाभर में कई देश आर्थिक मंदी का सामना कर रहे हैं और आर्थिकी को फिर से सुदृढ़ करने हेतु अनेक राहतें दे रहे हैं। चीन ने नीचे जाते अपने बुनियादी निर्माण ढांचे को आर्थिक मदद देने की घोषणा की है ताकि ग्राहकों की क्रय शक्ति में वृद्धि हो सके। वहां बैंकों को अपने...

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निरंकुश राजशाही तले लोकतंत्र की कछुआ चाल (दैनिक ट्रिब्यून)

अरुण नैथानी पहली नजर में तो लगता है कि सऊदी अरब के ताकतवर युवराज मोहम्मद बिन सलमान रूढ़िवादी सऊदी अरब को आधुनिक बनाने की तरफ बढ़ चले हैं। उन्होंने सऊदी अरब के बंद समाज में सिनेमाहाल खोलने की इजाजत दी, संगीत पर से प्रतिबंध हटाया है, महिलाओं को कार चलाने की अनुमति मिली है, होटलों...

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