चुनाव प्रचार में झूठ का प्रदर्शन: जब झूठ बड़ा हो तो औसत इंसान सोचने पर मजबूर हो जाता है (दैनिक जागरण)

[ प्रो. मक्खन लाल ]: यह मेरा सौभाग्य है कि मैं 1967 से ही चुनावों को करीब से देख रहा हूं। पहले आम चुनावों में एक-दूसरे की आलोचनाओं के साथ ही साथ हास-परिहास भी देखने को मिलता था। व्यक्तिगत लांछन और गालियां न देकर पार्टियों की नीतियों, उनके कार्यकलापों आदि पर ज्यादा बहस और चर्चा…

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Updated: May 16, 2019 — 6:02 pm