दलों के बंधन में जकड़ा लोकतंत्र: जनप्रतिनिधियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो आम नागरिकों से भी बदतर है (दैनिक जागरण)


[ योगेंद्र नारायण ]: जब भी कोई जनप्रतिनिधि चुनाव जीतकर संसद या विधानसभा के प्रांगण में प्रवेश करता है तो उसके दिमाग में कई नए विचार कौंधते हैं। वह अपने निर्वाचन क्षेत्र के साथ-साथ राष्ट्र के लिए भी कुछ करना चाहता है। वह ‘विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा एवं निष्ठा…


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Updated: June 15, 2019 — 12:21 PM