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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Thursday, April 1, 2021

फीकी होने लगी स्वर्णऋण की चमक! ( बिजनेस स्टैंडर्ड)

तमाल बंद्योपाध्याय  

जनवरी तक बैंक ऋण में एक साल पहले की तुलना में 5.7 फीसदी की बढ़ोतरी दिख रही थी। पिछले कुछ वर्षों से भारत में बैंक ऋण के मुख्य वाहक रहे खुदरा कर्ज में वृद्धि की रफ्तार जनवरी 2021 में गिरकर 9.1 फीसदी रही जबकि एक साल पहले यह 16.9 फीसदी पर थी। लेकिन भारत के बैंकरों एवं उधारकर्ताओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे 'सोने के बदले कर्ज' में इस दौरान 132 फीसदी की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई। बैंकिंग क्षेत्र का गोल्ड लोन पोर्टफोलियो 18,596 करोड़ रुपये के निम्न आधार से बड़ी तेजी से बढ़कर 43,141 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

यह अलग बात है कि वृद्धि की इस रफ्तार को कायम रख पाना मुश्किल है। बीते कुछ हफ्तों में बैंकों एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) ने स्वर्ण नीलामी के बारे में समाचारपत्रों में कुछ विज्ञापन प्रकाशित कराए हैं। कर्जदाता संस्थान बकाये कर्ज की वसूली के लिए अपने पास गिरवी रखे सोने को बेच रहे हैं। खासकर निजी क्षेत्र के कुछ बैंक चूक के शुरुआती लक्षण दिखने की बात करने लगे हैं।


साफ-साफ कहें तो ये मामले इतने अधिक नहीं हैं कि सजग हो जाया जाए लेकिन हाल तक गोल्ड लोन बांटने की आक्रामक पैरवी करते रहे बैंकर तेजी से रुख बदलने लगे हैं। अब उनकी तवज्जो वृद्धि से ज्यादा जोखिमों को कम करने की हो गई है। सोने की कीमतों में आई तीव्र गिरावट भी इस रणनीति में आए बदलाव की एक वजह है।


सोने के दाम अगस्त 2020 की तुलना में इस समय करीब 20 फीसदी गिर चुके हैं। अगस्त की शुरुआत में भारत में सोना 55,922 रुपये प्रति दस ग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर था। इस साल जनवरी से ही अब तक सोने के भाव करीब 6,000 रुपये तक गिर चुके हैं। मार्च के दूसरे सप्ताह में सोना 44,177 रुपये प्रति दस ग्राम तक आ गया था। हालांकि उसके बाद से यह करीब 1.5 फीसदी चढ़ा है।


सोने की कीमतों में आई गिरावट ही इस समस्या की जड़ है। बैंकरों एवं कर्जदारों दोनों को इससे समस्या हुई है। मसलन, अगर किसी बैंक ने 1 लाख रुपये मूल्य के सोने के बदले में 90,000 रुपये का कर्ज दिया है तो सोने के भाव में 20 फीसदी की गिरावट का मतलब यह है कि बैंक का जोखिम बढ़ जाएगा। दरअसल दिए गए कर्ज की रकम गिरवी रखे गए सोने के मूल्य से अधिक हो चुकी है। (गिरवी रखे गए सोने के मूल्य के 90 फीसदी तक कर्ज देने की मंजूरी आरबीआई ने दी हुई है)।


ऐसी स्थिति में कर्जदारों को या तो कर्ज का पूर्व-भुगतान करने को कहा जाता है या फिर उसे कुछ और सोना गिरवी रखना पड़ता है। कुछ कर्जदार अतिरिक्त सोना गिरवी रखने की हालत में नहीं होते हैं या फिर उनके पास जल्द भुगतान के लिए नकद न हो। कुछ चतुर लोग ऐसा भी कर सकते हैं कि न तो वे कर्ज चुकाएं और न ही अतिरिक्त  सोना गिरवी रखने के लिए लाएं। इसके बजाय वे बैंक के पास पहले से गिरवी रखा सोना डंप करने को तैयार हो जाते हैं।


इसका कारण यह होता है कि गिरवी रखे हुए सोने का मूल्य लिए हुए कर्ज से कम हो चुका होता है। शायद इसी वजह से हमें गिरवी सोने की नीलामी के विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं। निश्चित रूप से, अधिकांश बैंक रूढि़वादी हैं और वे अधिक मार्जिन कमाने की चाह रखते हैं लेकिन अगर सोने के दाम गिरते रहे तो यह समस्या और बिगड़ती जाएगी।


पिछले एक साल में अधिकांश बैंक एवं एनबीएफसी गोल्ड लोन बांटने को लेकर काफी आक्रामक रहे हैं। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का गोल्ड लोन पोर्टफोलियो दिसंबर 2020 में 17,492 करोड़ रुपये पर जा पहुंचा था जबकि सिर्फ तीन महीने पहले अक्टूबर में यह 11,5509 करोड़ रुपये था। एसबीआई 7.5 फीसदी ब्याज पर गोल्ड लोन बांट रहा है। आज के समय में एसबीआई से गोल्ड लोन लेना बेहद सरल हो गया है। इसके लिए आपको सिर्फ एक नंबर डायल करने की जरूरत है। बैंक खुद ही आपसे संपर्क करता है। अधिकांश बैंकों ने ऐसा ही तरीका अपनाया हुआ है।


सोने के बदले कर्ज देना परंपरागत तौर पर एनबीएफसी का कारोबार रहा है। मुथूट फाइनैंस लिमिटेड, मणप्पुरम फाइनैंस और मुथूट फिनकॉर्प जैसे एनबीएफसी इस काम में बरसों से लगे हुए हैं। लेकिन पिछले साल मौके का फायदा उठाने के लिए तमाम बैंक एवं छोटे एनबीएफसी ने भी अपनी हिचक छोड़ दी और सोना गिरवी रखकर कर्ज देने का काम दिल खोलकर करने लगे।


मुथूट फाइनैंस के पास दिसंबर 2019 में गोल्ड लोन पोर्टफोलियो 37,724.5 करोड़ रुपये का था और एक साल बाद दिसंबर 2020 में यह बढ़कर 49,622.5 करोड़ रुपये हो गया। लेकिन इस दौरान गिरवी रखे हुए सोने की मात्रा 173 टन से घटकर 166 टन पर आ गई। इसका कारण यह है कि सोने के दाम गिरने लगे थे। इस अवधि में मणप्पुरम फाइनैंस का भी गोल्ड लोन पोर्टफोलियो 16,242.95 करोड़ रुपये से बढ़कर 20,211.48 करोड़ रुपये हो गया था लेकिन उसके पास भी गिरवी सोना 73.5 टन से घटकर 68.2 टन पर आ गया। असल में, एनबीएफसी का एलटीवी (मूल्य के बरक्स कर्ज) बैंकों से कम होता है।


यह हाल तो गोल्ड लोन के क्षेत्र में स्थापित संस्थानों का है। कम-चर्चित एनबीएफसी में भी ऐसा ही रुझान देखा गया है। कोच्चि स्थित इंडेल मनी प्राइवेट लिमिटेड एमएसएमई इकाइयों को ऐसे कर्ज देता रहा है। एक भुगतान बैंक के दो पूर्व अधिकारियों द्वारा शुरू किए गए स्टार्टअप इंडियागोल्ड की योजना अब दिल्ली के बाहर देश भर में कदम रखने की है।


सलाहकार फर्म केपीएमजी की जनवरी 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक 46 अरब डॉलर के गोल्ड लोन उद्योग में अनौपचारिक कर्जदाताओं का हिस्सा करीब 65 फीसदी है। इस अनुमान से भारत के गोल्ड लोन बाजार के मार्च 2022 के अगले दो वर्षों में कम-से-कम 34 फीसदी बढ़कर 61 अरब डॉलर हो जाने की संभावना है।


हालांकि कर्जदारों के लिए तमाम फायदे होने के बावजूद ऐसा नहीं भी हो सकता है। कर्जदार तो घर पर बैठे-बैठे या ऑनलाइन माध्यमों से कर्ज ले सकते हैं। जब कोई ग्राहक गोल्ड लोन की मंशा जताता है तो गिरवी रखे जाने वाले सोने के गहनों का मूल्यांकन मुफ्त में किया जाता है। इसके अलावा कर्जदाता संस्थान की तिजोरी में रखे होने से वह गहना नि:शुल्क सुरक्षित भी रहता है। अगर सोने की शुद्धता निश्चित है और दूसरे कर्जों की तुलना में गोल्ड लोन की लागत अपेक्षाकृत कम है तो वित्त भी फौरन मुहैया करा दिया जाता है। कारोबारी अस्थायी नकद प्रवाह असंतुलन दूर करने और ब्रिज फाइनैंस जुटाने के लिए अमूमन गोल्ड लोन लेते हैं। वहीं व्यक्तिगत स्तर पर लोग आपात स्थितियों खासकर चिकित्सा जरूरतों के लिए यह कर्ज लेते हैं।


चीन के बाद दुनिया में सोने के सबसे बड़े उपभोक्ता भारत में घरों के भीतर रखा हुआ सोना करीब 25,000 टन हो सकता है। महामारी के दौरान वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में सोने का आयात 94 फीसदी तक लुढ़क गया था लेकिन बाद में हालात बदल गए। फरवरी 2021 में स्वर्ण आयात करीब 124 फीसदी उछला है और उसके पहले जनवरी में भी 155 फीसदी की तेजी देखी गई थी।


पीली धातु के लिए लोगों की ललक बरकरार है। घर की आलमारी से गहने निकालकर बैंक से पैसे उधार लेना अब कोई बुरा नहीं मानता है लेकिन सोने की कीमतों में आई गिरावट ने गोल्ड लोन की वृद्धि पर लगाम लगाई है। अगस्त 2020 में सोने के रिकॉर्ड भाव पर रहते समय आरबीआई ने गोल्ड लोन के लिए एलटीवी को 90 फीसदी कर दिया था। लेकिन सोने की कीमतें कम होने के बाद बैंकों का जोखिम कम करने के लिए एलटीवी सीमा संशोधित करने की जरूरत है।


(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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