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Friday, April 2, 2021

ग्लोबल वार्मिंग का कहर: गर्मी तोड़ सकती है इस बार भी रिकॉर्ड (अमर उजाला)

सीमा जावेद  

इस वर्ष मार्च के आते ही गर्मी ने अपने तेवर दिखने शुरू कर दिए थे। दिल्ली-एनसीआर में पहली अप्रैल को पारा 34 डिग्री सेल्सियस के करीब दर्ज किया गया। आसमान पर चढ़े सूरज ने अपना कहर बरपाना शुरू कर दिया है। ग्लोबल वार्मिंग के कहर से पृथ्वी की सतह का लगातार गर्म होना अब कोई नई बात नहीं रह गई है, बल्कि एक हकीकत बन चुकी है। ग्लोबल वार्मिंग यानी धरती के तापमान में बढ़ोतरी और इसकी वजह से मौसम में बदलाव। इस समस्या को सदी की सबसे बड़ी समस्या कहा जा रहा है और यह भी आशंका जताई जा रही है कि इसके कारण देश के कई हिस्से सूखा और भुखमरी के शिकार हो जाएंगे। 



क्रिश्चियन एड की एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से दुनिया को 2020 में अरबों डॉलर की हानि हुई है। इसके साथ ही बाढ़, तूफान, उष्णकटिबंधीय चक्रवात और जंगलों में लगी आग ने दुनिया भर में हजारों लोगों की जान ले ली। फिलहाल मानव इतिहास में अब तक का सबसे गर्म साल 2020 को कहा जा रहा है। यूरोपीय संघ के पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस ने घोषणा कर दी है कि अल-नीना (एक आवर्ती मौसम की घटना, जिसका वैश्विक तापमान पर ठंडा प्रभाव पड़ता है) के बावजूद 2020 के दौरान असामान्य उच्च तापमान रहे और 2020 सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया गया। पर मौसम के तेवर बता रहे हैं कि 2021 इससे बाजी मार ले जाएगा। यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति की निरंतरता की पुष्टि करती है, पिछले छह वर्ष लगातार रिकॉर्ड पर सबसे गर्म रहे हैं। यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के लिए देशों की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है, जो मुख्य रूप से ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं। 



वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे ग्रह गर्म होता है, कई चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ जाती है। 2020 में इसके कई संकेत थे, आर्कटिक में रिकॉर्ड तापमान के साथ, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में बहुत बड़ी जंगल की आग, और मानसून के दौरान कई एशियाई देशों में भारी बरसात के कारण गंभीर बाढ़, एक के बाद एक चक्रवाती तूफान, कभी टिड्डी दलों का हमला तो कभी पीने के पानी के लाले, और हाल ही में उत्तराखंड में ग्लेशियर फटने की दुर्घटना। ऐसे में अगर 2021 इससे ज्यादा गर्म होता है, तो उसके नतीजे साफ दिख रहे हैं। माध्य वैश्विक तापमान का विश्लेषण कई वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा नियमित रूप से किया जाता है। कोपरनिकस के अलावा, नासा, एनओएए, बर्कले अर्त और हैडली की वेधशालाएं पूरे वर्ष वैश्विक तापमान पर निगरानी रखती हैं। वे अलग-अलग तरीकों का उपयोग करते हैं, डाटासेटों के बीच छोटे अंतर होते हैं और यह संभव है कि अन्य समूह 2016 के मुकाबले 2020 को अधिक गरम नहीं समझते हों। 


इन छोटी विसंगतियों के बावजूद, सभी विश्लेषण समग्र प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं, और हाल के वर्षों को लगातार रिकॉर्ड पर सबसे गर्म पाया गया है। 2020 अंतरराष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ रहा है। कोविड महामारी ने दुनिया के वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अब तक की सबसे बड़ी कमी पैदा की है। चीन, दक्षिण कोरिया, कनाडा, ब्रिटेन और जापान जैसे कई देशों ने भी घोषणा की कि वे 2050 तक कार्बन तटस्थ बन जाएंगे। वर्ष के अंत से कुछ दिन पहले, यूरोपीय संघ ने अपने जलवायु लक्ष्यों को बढ़ा दिया और इसका लक्ष्य 1990 की तुलना में 2030 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 55 प्रतिशत की कटौती करना है। और अमेरिका में, राष्ट्रपति जो बाइडन ने पद संभालने के तुरंत बाद पेरिस समझौते को फिर से शुरू करने और एक महत्वाकांक्षी जलवायु योजना को अनियंत्रित करने का संकल्प लिया है। 


बाजार में सबसे सस्ते विकल्प के रूप में रिन्यूएबल ऊर्जा के साथ यह उम्मीद की जाती है कि हर देश कार्बन मुक्त होने की महत्वाकांक्षा बढ़ाएंगे और जलवायु परिवर्तन के असर से होने वाली ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के कारगर उपाय संभव होंगे। 

(-स्वतंत्र पत्रकार और जलवायु तथा ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था जीएससीसी में सलाहकार।) 

सौजन्य - अमर उजाला।

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