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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Wednesday, March 24, 2021

रक्षक के भक्षक बनने का मामला (राष्ट्रीय सहारा)

 

किसी को कल्पना नहीं रही होगी कि मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के सामने जिलेटिन वाली स्कॉÌपयो मिलने का मामला इतना बड़ा बवंडर पैदा कर सकता है। पहले इसे आतंकवादियों की करतूत माना गया और तिहाड़़ जेल में बंद इंडियन मुजाहिद्दीन के एक आतंकवादी से उसके तार जोड़े गए। अब इस पर कोई बात नहीं कर रहा। पूरा मामला घूम कर मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार के ईर्द–गिर्द सिमट गया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के हाथ में आते ही मामला जिस ढंग से विस्फोटक बनता जा रहा है‚ वह किसी को भी अचंभित करने के लिए पर्याप्त है॥। मुंबई पुलिस के पूर्व आयुक्त परमबीर सिंह द्वारा मुख्यमंत्री को भेजे गए अपने पत्र में गृह मंत्री अनिल देशमुख पर लगाया गया आरोप‚ कि उन्होंने सचिन वाजे को हर महीने १०० करोड़ वसूली के लिए कहा था‚ असाधारण है। 

 अगर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और महाअघाड़़ी सरकार के रणनीतिकारों ने मान लिया था कि परमबीर को आयुक्त के पद से हटाने तथा पुलिस प्रशासन में कई फेरबदल के बाद मामले की आंच राजनीतिक नेतृत्व तक नहीं पहुंचेगी तो उनकी सोच गलत साबित हो रही है। इतना बड़ा अधिकारी अपने गृह मंत्री पर बिना किसी प्रमाण के ऐसा आरोप नहीं लगा सकता। निस्संदेह परमबीर पर भी प्रश्न खड़ा है कि पुलिस आयुक्त के रूप में उनका कर्त्तव्य क्या थाॽ वास्तव में परमबीर के आरोपों का मूल स्वर यही है कि मंत्री के आदेश पर मुंबई पुलिस का एक महकमा आपराधिक गतिविधियों में ंलिप्त था। इस दौरान अनेक बड़े मामलों को गलत मोड़ दिया गया। पत्र में जैसा विवरण है‚ उसे आसानी से झुठलाया नहीं जा सकता। मसलन‚ वे कह रहे हैं कि देशमुख अपने सरकारी आवास पर सचिन वाजे और कई पुलिस अधिकारियों को बुलाते थे। कायदे से गृह मंत्री के स्तर पर सचिन वाझे जैसे असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी के साथ बैठक करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। 

पत्र में करीब १७५० पब और बार का जिक्र है‚ और उनके अनुसार जिसे बताते हुए गृह मंत्री कह रहे हैं कि उनसे प्रति महीना दो से तीन लाख रुûपये लिए जाएं तो ४० करोड़़ के आसपास प्रति महीना इकट्ठा हो जाएगा। एसीपी सोशल सÌवस ब्रांच‚ संजय पाटिल का जिक्र है‚ जिसे उन्होंने घर पर बुलाकर हुक्का पार्लर से वसूली की बात की। देशमुख के निजी सचिव मिस्टर परांडे़ की उपस्थिति का भी जिक्र है। दादरा और नगर हवेली के सांसद मोहन डेलकर की मौत के मामले में गृह मंत्री की ओर से लगातार आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज करने के दबाव तक के अति गंभीर आरोप भी हैं। ॥ परमबीर के आरोपों पर आपका चाहे जो मत हो‚ लेकिन एटीएस की जांच में कोई प्रगति क्यों नहीं हो सकी और एनआईए के आने के बाद क्यों पूरा मामला खुलता जा रहा है‚ इसका जवाब देश को मिल गया है। एनआईए की जांच से इतना तो साफ हो गया है कि पूरे मामले की साजिश पुलिस मुख्यालय तथा सचिन वाजे के घर पर ही रची गई। जांच में मंत्रियों और नेताओं के नाम भी सामने आ जाएं तो आश्चर्य नहीं। मनसुख और उनका परिवार दुर्भाग्यशाली साबित हुए। उनकी स्कॉÌपयो वापस नहीं आएगी। यह मालूम होने के बावजूद उन्होंने वाजे को चाबी थमाई। जिस स्थिति में उनकी मृत्यु हुई उसे आत्महत्या मानना कठिन है। वास्तव में वह इस साजिश के मुख्य गवाह हो सकते थे‚ इसलिए संदेह सच्चाई बनता दिख रहा है कि मनसुख की हत्या कर शव को फेंका गया। पहले से ही लग रहा था कि सचिन वाजे मामले में अकेले नहीं हो सकता। देश के सबसे बड़े उद्योगपति के घर के बाहर जिलेटिन वाली गाड़ी खड़ा कर उसे दबाव में लाने का दुस्साहस छोटा पुलिस अधिकारी नहीं कर सकता। इसलिए परमबीर सिंह की शिकायत‚ बेशक इस समय आरोप है‚ में दम है। वैसे भी वाजे वसूली के मामले में पुलिस सेवा से बाहर हो गया था। उसने पूरी कोशिश की और जब पुनर्बहाली नहीं हुई तो शिवसेना में शामिल हो गया। डेढ़ दशक से ज्यादा समय बाद उद्धव सरकार में पुलिस में उसकी वापसी होती है‚ और वह भी पीआईयू यानी अपराध जांच इकाई में। आप देख लीजिए‚ टीआरपी में हेरफेर के आरोप‚ अर्णब गोस्वामी‚ कंगना रनौत आदि बहुचÌचत मामले उसके हाथ में दिए गए। परमबीर का कहना सही लगता है कि सीधे गृह मंत्री से संबंध होने के कारण वह कई बार उन्हें भी नजरअंदाज करके काम करता था। यह अलग बात है कि पुलिस आयुक्त होकर उन्होंने यह सब क्यों सहन किया। इसका एक और पहलू भी है। चूंकि बड़े से बड़े पुलिस अधिकारी का कॅरियर सरकार के हाथों में होता है‚ इसलिए वह चाहे–अनचाहे गैर–कानूनी और असंवैधानिक आदेशों‚ इच्छाओं‚ कदमों‚ फैसलों का समर्थन करने या उनके अनुसार कार्रवाई करने को मजबूर रहता है। स्वाभिमानी और ईमानदार पुलिस अधिकारी विरोध कर सकता है लेकिन उसे परिणाम भुगतना पड़ सकता है। स्थानांतरित कर दिया जाएगा या उत्पीडि़त किया जाएगा। इसलिए बड़े अधिकारी भी राजनीतिक नेतृत्व के सामने नतमस्तक रहते हैं। ज्यादातर आराम से उनके साथ मिलकर हर तरह का काम करते हुए मनचाहा पद और पदोन्नति पाते हैं। यह हमारी व्यवस्था की त्रासदी है। वास्तव में यह रक्षक के ही भक्षक बन जाने का मामला है। ॥ सोचिए‚ यह कैसी व्यवस्था है‚ जिसमें पुलिस के बड़े अधिकारी स्वीकार रहे हैं कि उनके जानते हुए उनकी पुलिस गुंडों‚ दादाओं‚ अपराधियों की तरह वसूली कर सरकार तक पहुंचा रही है‚ गैर–कानूनी काम कर रही है और वे उसे चुपचाप देखने या सहभागिता करने को विवश हैंॽ निश्चित ही इस विस्फोटक आरोप के राजनीतिक परिणाम होंगे। उद्धव सरकार का इकबाल खत्म मानिए। 

सारे विवादित और बहुचÌचत मामले एवं पुलिस की कार्रवाइयां संदेह के घेरे में आ गए हैं। यह तो संभव नहीं कि पुलिस और मंत्री के बीच इस तरह की दुरभिसंधियों की जानकारी महाअघारी के नेताओं को नहीं हो। पत्र में तो मुख्यमंत्री तक शिकायत पहुंचाने का भी संकेत है। सवाल उठता है कि इतनी वसूली को क्या अकेले देशमुख रख रहे थेॽ कोई अकेले ऐसा नहीं कर सकता। गलत तरीके से मुकदमों और गैर–कानूनी पुलिस कार्रवाइयां अंधेरे में तो हो नहीं रही थीं। दूसरों की भी संलिप्तता निश्चित रूप से है। जो संलिप्त नहीं थे उनने आवाज क्यों नहीं उठाईॽ सच कहें तो महाअघाड़़ी के किसी नेता या मंत्री के लिए इन प्रश्नों का अब वैसा जवाब देना कठिन है‚ जिससे लोग सहमत हो सकें।

 जाहिर है‚ उच्चस्तरीय व्यापक दायरों वाली स्वतंत्र जांच से ही कुछ हद तक सच्चाई सामने आ सकती है। हां‚ महाराष्ट्र में पुलिस प्रशासन के साथ राजनीति में बहुआयामी सफाई की आपातकालीन आवश्यकता एक बार फिर रेखांकित हुई है। यहां भी प्रश्न वही है कि आखिर इसे कैसे और कौन अंजाम देगाॽ॥

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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