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Friday, March 26, 2021

महामारी और भारत (राष्ट्रीय सहारा)

पिछले दिनों अमेरिकी शोध संस्थान पिउ रिसर्च सेंटर ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोरोना विषाणु महामारी के असर से संबंधित एक शोध रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें भारत के विभिन्न आय वर्ग समूहों के परिवारों पर महामारी के प्रभावों का आकलन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक‚ कोरोना महामारी ने भारतीय परिवारों की जीवन दिशा को नकारात्मक ढंøग से गहरे तक प्रभावित किया है। भारत के मध्य आर्य वर्ग समूह के करीब ३२.२ करोड़़ लोग खिसक कर निचले पायदान पर आ गए। यह अनुमान लगाया गया था कि २०११ से २०१९ के दौरान करीब ५.७ करोड़़ लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई थी और यह वर्ग अपनी आर्थिक प्रगति करके मध्य वर्ग में शामिल हो गया था। इस वर्ग की रोजाना आय करीब १० ड़ॉलर से लेकर २० ड़ॉलर के बीच थी।


 कोरोना महामारी के दौर में प्रति दिन २ ड़ॉलर से कम लोगों की संख्या बढ़øकर ७.५ करोड़़ हो गई यानी ये सभी लोग एक झटके में गरीबी रेखा के नीचे आ गए। ऐसा नहीं है कि महामारी का असर केवल निम्न आय समूह के लोगों पर ही पड़़ा। वास्तव में महामारी ने उच्च आय वर्ग समूह के लोगों को भी प्रभावित किया। पिउ के मुताबिक‚ उच्च आय वाले लोगों की संख्या में भी करीब दस लाख की गिरावट आई है। इसके अलावा‚ उच्च मध्यम आय श्रेणी में ७० लाख‚ मध्य आय श्रेणी में ३.२ करोड़़ और कम आय वाले लोगों की संख्या में करीब ३.५ करोड़़ की गिरावट आई है। 


रिपोर्ट में महामारी का भारत और चीन की अर्थव्यवस्था पर तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक‚ भारत की तुलना में चीन की अर्थव्यवस्था बेहतर है। वहां कोरोना काल में गरीबी का स्तर लगभग पहले जैसा ही रहा और मध्यम आय वाले लोगों की आबादी में सिर्फ एक करोड़़ की गिरावट आई। लेकिन उच्च आय वाले वर्ग में चीन के मुकाबले भारत की स्थिति बेहतर देखी गई।


 भारत में जहां उच्च आय वाले वर्ग में दस लाख की गिरावट आईहै‚ वहीं चीन में यह संख्या करीब तीस लाख थी। उच्च–मध्यम आय श्रेणी में भी भारत से ज्यादा और कम आय वाले लोगों की संख्या में भारत के आसपास ही गिरावट दर्ज की गई। हालांकि कोरोना महामारी के चलते पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर आईहै‚ लेकिन पिउ रिसर्च सेंटर की मानें तो भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ज्यादा खराब है। भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कामगारों को सुरक्षा देने के साथ कानूनी संरक्षण की भी जरूरत है।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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