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Saturday, February 6, 2021

बजट में नहीं दिखी रोजगार को बढ़ावा देने की मंशा (बिजनेस स्टैंडर्ड)

महेश व्यास 

भारत सरकार देश में रोजगार को लेकर किसी भी तरह की समस्या को मानती ही नहीं है। पिछले कुछ दिनों में देश की आर्थिक स्थिति के बारे में आर्थिक समीक्षा एवं आम बजट के रूप में दो अहम बयान सामने आए हैं। लेकिन इन दोनों में यह नहीं माना गया है कि वित्त वर्ष 2020-21 में करोड़ों लोगों की आजीविका छिन गई है। अधिकतर लोगों ने सरकार की मदद या उसके बगैर ही अपनी परेशानी को छिपाने के तरीके तलाश लिए। लेकिन सरकार इस परिघटना को मान्यता देने को भी तैयार नहीं है, लिहाजा उसने अपने दोनों विवरणों में सीधे तौर पर बेरोजगारी की समस्या को स्वीकार ही नहीं किया है।


वित्त मंत्री के बजट भाषण में बेरोजगारों की मदद या प्रत्यक्ष रोजगार देने की किसी खास योजना का सीधे तौर पर जिक्र नहीं था। मनरेगा की तर्ज पर शहरी क्षेत्रों के लिए भी रोजगार गारंटी योजना लाने की उम्मीदें धराशायी हो गईं। वित्त मंत्री ने अपने भाषण में मनरेगा का जिक्र भी नहीं किया। मनरेगा लॉकडाउन के दौरान ग्रामीण भारत में रोजगार मुहैया कराने में काफी आगे रही थी। लॉकडाउन और रोजगार देने की जरूरत को देखते हुए मनरेगा के लिए बजट आवंटन 61,500 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.01 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया था। संशोधित अनुमान में फिर से बढ़ोतरी करते हुए इसे 1.115 लाख करोड़ रुपये किया गया था। लेकिन नए साल के बजट में इसे घटाकर 73,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है।


वित्त मंत्री द्वारा कपड़ा निर्यात के लिए घोषित योजना से रोजगार पैदा हो सकते हैं। सरकार ने अगले तीन वर्षों में सात मेगा इन्वेस्टमेंट टेक्सटाइल पार्क (मित्र) गठित करने की घोषणा की है। भारत में कपड़ा विनिर्माण गतिविधियों वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है। अगर यह योजना सफल भी होती है तो इससे रोजगार के मामले में बहुत फर्क पडऩे की संभावना कम ही है। इसी तरह सड़कों या आवास के लिए आवंटन बढ़ाने से भी रोजगार वृद्धि में बहुत फर्क पडऩे के आसार नहीं हैं। इस तरह रोजगार के मोर्चे पर चुनौतियां काफी बड़ी हैं।


सोमवार को संसद में पेश बजट को देखने से हमें पता चलता है कि वर्ष 2020-21 में केंद्र सरकार ने 34.1 लाख लोगों को रोजगार दिए हैं। यह वर्ष 2019-20 के 33.1 लाख रोजगार की तुलना में 3.4 फीसदी की बढ़त दिखाएगा। लेकिन पिछले सरकार के बजट में कहा गया था कि 2019-20 में रोजगार अवसर 36.2 लाख होंगे। इस तरह केंद्र सरकार ने 2019-20 के रोजगार अनुमान में 3.1 लाख की कटौती कर दी है। दिलचस्प है कि पिछले साल केंद्र सरकार ने कहा था कि वर्ष 2018-19 में 34.9 लाख रोजगार दिए गए थे लेकिन अब वह बता रही है कि उस साल असल में सिर्फ 32.7 लाख रोजगार ही दिए गए थे जो संशोधित अनुमान से भी 2.2 लाख कम थे। लिहाजा वर्ष 2020-21 में भी वास्तविक रोजगार 34.1 लाख के अनुमान से कम ही रहने के आसार हैं जो तीन साल पहले 2018-19 के 34.9 लाख रोजगार से भी कम होगा। वह भी उस समय जब 2020-21 के अनुमानों में आगे चलकर संशोधन नहीं होता है।


आंकड़े हमें बताते हैं कि केंद्र सरकार का रोजगार वर्ष 2000-01 के समय से ही करीब 33 लाख पर स्थिर बना हुआ है। वर्ष 2000-01 से लेकर 2018-19 के 19 वर्षों में औसत केंद्रीय रोजगार 32.6 लाख प्रति वर्ष रहा है। वर्ष 2001-02 में यह सबसे अधिक 34.2 लाख रहा था जबकि 2011-12 में यह सबसे कम 31.5 लाख था। वर्ष 2012-13 के बाद आए पांच 'अंतिम' अनुमान केंद्र सरकार के रोजगार में लगातार गिरावट को ही दर्शाते हैं। इस ऐतिहासिक रिकॉर्ड को देखते हुए वर्ष 2020-21 में 34 लाख और 2019-20 में 33 लाख रोजगार के अनुमानों का खरा हो पाना मुश्किल ही लग रहा है।


इस बीच जनवरी 2021 में श्रम बाजार दिसंबर 2020 में लगे झटकों से उबरने में उबर गया। जनवरी माह में कुल रोजगार 1.19 करोड़ बढ़कर 40.07 करोड़ पर पहुंच गया। लॉकडाउन लगने के बाद यह पहला मौका है जब रोजगार आंकड़ा 40 करोड़ के पार पहुंचा है। जनवरी में रोजगार वृद्धि मूलत: निर्माण एवं कृषि क्षेत्रों में केंद्रित रही। निर्माण क्षेत्र में 86 लाख रोजगार बढ़े और यह दिसंबर 2020 के 6.21 करोड़ से बढ़कर जनवरी 2021 में 7.07 करोड़ हो गया। कृषि क्षेत्र में करीब 42 लाख रोजगार बढ़े और यह इस अवधि में 14.49 करोड़ से बढ़कर 14.91 लाख पर पहुंच गया।


जहां तक विनिर्माण क्षेत्र का सवाल है तो इसमें मामूली सुधार ही देखा गया। दिसंबर 2020 में 2.93 करोड़ रोजगार देने वाले विनिर्माण क्षेत्र ने जनवरी 2021 में 2.97 करोड़ लोगों को रोजगार दिया। वहीं सेवा क्षेत्र से जुड़े उद्योगों के रोजगार में इस दौरान गिरावट दर्ज की गई।


ये मासिक बदलाव रोजगार नमूनों में मौसम एवं मासिक आधार पर आने वाले बदलावों को दर्शाते हैं। हाल के वर्षों में आर्थिक वृद्धि की गतिरोधक प्रकृति के नाते वृद्धि के मौसमी घटकों को समझ पाना मुमकिन नहीं है। लेकिन सालाना आधार पर तुलना से इन दोनों मुश्किलों से निजात पाई जा सकती है। सीएमआईई के उपभोक्ता पिरामिड घरेलू सर्वे की प्रकृति के चलते जनवरी 2020 का नमूना जनवरी 2019 के समान ही है।


एक साल पहले की तुलना में जनवरी 2020 में रोजगार 98 लाख कम था। अगर क्षेत्रवार आंकड़ों को देखें तो कृषि क्षेत्र में रोजगार बढ़ा था जबकि उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में गिरा था। कृषि क्षेत्र में 1.06 करोड़ रोजगार बढ़े थे लेकिन विनिर्माण में 1.43 करोड़ और सेवा क्षेत्र में 1.01 करोड़ रोजगार घटे थे।


आम तौर पर रोजगार बढ़ाना अहम है। अच्छी गुणवत्ता वाले रोजगार में वृद्धि इससे भी बेहतर है। कुल श्रम उत्पादकता बढ़ाने के लिए लोगों को खेतों से कारखानों की तरफ ले जाना रणनीतिक रूप से अहम है। महिलाओं, शहरी लोगों और शिक्षितों को रोजगार के मौके बढ़ाने के लिए अहम है। लेकिन इस बजट में इनमें से कोई भी बात नहीं नजर आती है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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