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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Thursday, February 4, 2021

लीक से हटकर है इस बार का बजट (बिजनेस स्टैंडर्ड)

ए के भट्टाचार्य  

भारत में आम बजट के साथ एक खास बात यह रही है कि देश के एक के बाद एक वित्त मंत्रियों ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भारी गिरावट के बाद बड़े कर प्रस्ताव लाने से परहेज किया है। वित्त वर्ष 2021-22 का बजट तब आया है जब देश की अर्थव्यवस्था करीब पिछले एक वर्ष से भारी उथलपुथल से गुजरी है। निर्मला सीतारमण ने भी अगले वित्त वर्ष के बजट में बड़े कर प्रस्ताव नहीं शामिल करने की चेष्टा की है। हालांकि कुछ अन्य बातों में वह अपने पूर्ववर्तियों से अलग रही हैं। बजट में सीमा शुल्क एक सहज स्तर पर लाने, घरेलू उद्योगों की मदद के लिए कुछ आयात शुल्कों में कमी एवं बढ़ोतरी और करदाताओं के लिए प्रत्यक्ष कर से जुड़े नियम सरल करने जैसे कुछ उपायों के अलावा दूसरी कर दरें मोटे तौर पर अपरिवर्तित रही हैं। हालांकि इस कदम से संरक्षणवाद से जुड़ी चिंताएं जरूर पैदा हुई हैं और 400 से अधिक वस्तुओं को शुल्क से मिली छूट की समीक्षा के वादे से कुछ हद तक अनिश्चितता भी पैदा हुई है।

यह बात का ध्यान रखना विशेष महत्त्व का है कि अगले वर्ष केंद्र सरकार के सकल कर संग्रह में सीमा शुल्क राजस्व की हिस्सेदारी महज 6 प्रतिशत ही रहेगी। वित्त वर्ष 2020-21 के संशोधित अनुमान के अनुसार सकल कर संग्रह कर 17 प्रतिशत तेजी के साथ 22 लाख करोड़ रुपये रहने की उम्मीद लगाई जा रही है। अगर अगले वर्ष नॉमिनल जीडीपी में 14.4 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो कर संग्रह में 17 प्रतिशत की तेजी का मतलब है कि टैक्स बॉयंसी (जीडीपी और कर संग्रह में बढ़ोतरी का अनुपात) 1.2 रहेगी।


यह एक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य जरूर लग सकता है लेकिन इसे प्राप्त करना भी बहुत मुश्किल नहीं है। इसकी वजह यह है कि बजट में किसी तरह की कर छूट नहीं दी गई है और न ही कर प्रत्यक्ष कर आधार में ही कमी की गई है। इसके अलावा उत्पाद शुल्क संग्रह का अनुमान भी ठीक-ठाक लग रहा है। उत्पाद शुल्क संग्रह में वित्त वर्ष 2020-21 के 3.61 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 7 प्रतिशत कमी आने का अनुमान है। शायद सरकार ने तेल उत्पादों पर उत्पाद शुल्क वापस लेने से होने वाले नुकसान का आकलन पहले ही कर लिया है। सरकार ने अप्रैल-मई 2020 में इन उत्पादों पर उत्पाद शुल्क लगाया था।


वर्ष 2019-20 में कुल संग्रह 2.4 लाख करोड़ रुपये रहा था। उत्पाद शुल्क से प्राप्त होने वाले ज्यादातर राजस्व में पेट्रोलियम उत्पादों की भागीदारी अधिक होती है। यह अगले वर्ष सरकार के राजस्व को काफी सहारा दे सकता है। हालांकि यह तभी होगा जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहती हैं और वित्त मंत्रालय पर पेट्रोल एवं डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने का दबाव नहीं बढ़ता है। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सीतारमण ने मंदी के बाद बजट पेश करने में अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले लीक से अलग हटकर काम किया है। इससे पहले जवाहर लाल नेहरू ने 1958, सचिंद्र चौधरी ने 1966, यशवंतराव चव्हाण ने 1973 और आर वेंकटरमण ने 1980 में बजट में किसी तरह का साहसिक कदम उठाने से परहेज किया था। हालांकि उनके उलट सीतारमण ने वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में कम से कम चार नई पहल की हैं। पहली बात तो यह कि उन्होंने वर्ष 2020-21 में बजट प्रावधानों से इतर उधारी में कमी कर राजकोषीय घाटे के लिहाज से बजट को अधिक पारदर्शी बना दिया है। चालू वित्त वर्ष में बजट प्रस्तावों से इतर उधारी रकम कम कर 1.26 लाख करोड़ रुपये तक करने के बाद उन्होंने आगामी वर्षों में इसे घटाकर मात्र 30,000 करोड़ रुपये रखने का प्रस्ताव दिया है। वास्तव में जो पादर्शिता दिखाई गई है उसी वजह से चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 9.5 प्रतिशत तक पहुंच जाने का अनुमान लगाया गया है। यह प्रयास अगले वर्ष भी जारी रहेगा, जिसका मतलब यह हुआ कि राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएएसएफ) का इस्तेमाल 2021-22 में खाद्य सब्सिडी देने के मद में बिल्कुल नहीं होगा। इसका आशय यह भी है कि राजकोषीय घाटे की गुणवत्ता को लेकर स्थिति अधिक पेचीदा नहीं रहेगी।


दूसरी बात यह कि वित्त वर्ष 2021-22 में सरकार ने पूंजीगत व्यय 26 प्रतिशत वृद्धि के साथ 5.54 लाख करोड़ रुपये रखने की बात कही है। वित्त वर्ष 2020-21 में सरकार ने पूंजीगत व्यय में 31 प्रतिशत इजाफा किया था। कुल मिलाकर इससे इशारा मिलता है कि वित्त मंत्री इस मद में लगातार अधिक खर्च करना चाहती हैं।


हालांकि इसका यह अर्थ निकलता है कि हाल के दिनों में सरकार का राजस्व व्यय काफी दबाव में रहा है। आने वाले वर्ष में राजस्व व्यय में चालू वित्त वर्ष के 30 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 3 प्रतिशत गिरावट आएगी। अगर इसमें ब्याज भुगतान देनदारी हटा दें तो आने वाले वर्ष में विभिन्न कार्यक्रमों पर राजस्व व्यय वास्तव में 9 प्रतिशत कम हो जाएगा। जिन लोगों को राजस्व व्यय के जरिये बजट में प्रोत्साहन उपाय होने की उम्मीद थी उन्हें जरूर निराशा हाथ लगी होगी।


तीसरी अहम बात यह है कि प्रत्यक्ष कर आधार में कमी करने का भी प्रयास नहीं किया गया है। दूसरे शब्दों में तो वित्त मंत्री ने कर श्रेणियों में कोई बदलाव नहीं किया है और न ही कर छूट का दायरा ही बढ़ाया है। चौथी बात यह है कि वित्त मंत्री ने बजट में कई नई घोषणाएं की हैं। उदाहरण के लिए सरकार ने बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत करने की घोषणा की है। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों और एक सामान्य जीवन बीमा कंपनी के निजीकरण का भी प्रस्ताव है। सार्वजनिक क्षेत्रों में सरकार की हिस्सेदारी बेचने के संबंध में एक नई नीति और कई ढांचागत क्षेत्रों में परिसंपत्तियों की बिक्री की भी घोषणा की गई है।


हालांकि इन सभी नई नीतियों के बीच यह देखना थोड़ा खलता है कि सीतारमण ने अपने तीसरे बजट में कुछ पेचीदा मामलों को शामिल करने से परहेज नहीं किया है। वित्तीय क्षेत्र में मौजूदा दबाव के मद्देनजर 'बैड बैंक' की स्थापना एक अच्छा कदम नहीं माना जा सकता है। विकास वित्त संस्थान की स्थापना से ढांचागत क्षेत्र को रकम मुहैया कराने में आ रही दिक्कतों का वास्तविक समाधान नहीं पाया जा सकता है।


एक बार फिर राज्यों के पास शिकायतें करने की वजह मौजूद हैं। केंद्र 2025-26 तक राजकोषीय घाटा कम कर जीडीपी का 4.5 प्रतिशत कर लेगी, लेकिन राज्यों के लिए 2023-24 तक इसे 3 प्रतिशत तक समेटना कठिन लग रहा है। हालांकि केंद्र सरकार के पास इसका तर्क मौजूद है। वह सीधा कहेगी कि 15वें वित्त आयोग ने ऐसा ही सुझाव दिया है!

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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