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Friday, February 26, 2021

मर्ज की दवा नहीं निजीकरण (प्रभात खबर)

By सतीश सिंह 

 

भारत के बैंकिंग इतिहास में ऐसा पहली बार होगा जब सरकार चार सरकारी बैंकों को बेचेगी या उनका निजीकरण करेगी. मार्च 2017 में, देश में 27 सरकारी बैंक थे, जिनकी संख्या अप्रैल 2020 में घटकर 12 रह गयी. अब चार सरकारी बैंकों- बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचना चाहती है. इनमें बैंक ऑफ इंडिया बड़ा बैंक है, जबकि अन्य तीन छोटे. बैंक ऑफ इंडिया में 50,000, सेंट्रल बैंक में 33,000, इंडियन ओवरसीज बैंक में 26,000 और बैंक ऑफ महाराष्ट्र में 13,000 कर्मचारी कार्यरत हैं. इनकी कुल 15,732 शाखाएं हैं.


सरकारी बैंकों के निजीकरण के मूल में कोरोना काल में सरकारी राजस्व में भारी कमी आना है. सरकार विनिवेश के जरिये इस कमी को पूरा करना चाहती है. हालांकि, वित्त वर्ष 2021 में सरकार के लिए विनिवेश के लक्ष्य को हासिल करना लगभग नामुमकिन है. इसलिए, वित्त वर्ष 2021 में विनिवेश के लक्ष्य को कम करके 32,000 करोड़ रुपये किया गया है. वित्त वर्ष 2022 के लिए सरकार ने विनिवेश से राजस्व हासिल करने का लक्ष्य 1.75 लाख करोड़ रखा है, जिसमें से एक लाख करोड़ सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों में सरकार की हिस्सेदारी बेचकर जुटाने का प्रस्ताव है.


इंडियन ओवरसीज बैंक में सरकार की हिस्सेदारी 95.8 प्रतिशत, बैंक ऑफ महाराष्ट्र में 92.5 प्रतिशत, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 92.4 प्रतिशत और बैंक ऑफ इंडिया में 89.1 प्रतिशत है. बैंक ऑफ महाराष्ट्र और सेंट्रल बैंक में अगर सरकार अपनी हिस्सेदारी को घटा कर 51 प्रतिशत करती है, तो उसे 6,400 करोड़ रुपये मिलेंगे. इसी तरह, यदि सरकार बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच देती है, तो उसे लगभग 28,600 करोड़ मिलेंगे.


इंडियन ओवरसीज बैंक के पास सबसे ज्यादा इक्विटी कैपिटल है, जबकि बैंक ऑफ इंडिया के शेयरों का बाजार मूल्य दूसरे सरकारी बैंकों से ज्यादा है. यदि सरकार दोनों बैंकों के प्रबंधन को अपने हाथों में रखते हुए अपनी हिस्सेदारी को मौजूदा कीमत पर बेचकर 51 प्रतिशत पर ले आती है, तो उसे लगभग 12,800 करोड़ मिलेंगे. माना जा रहा है कि सरकार, सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को 51 प्रतिशत तक लायेगी और उसके बाद उसे 50 प्रतिशत से नीचे लायेगी.


बैंकों को बेचने से सरकार को उसकी पूंजी वापस मिल जायेगी, इन बैंकों में और अधिक पूंजी डालने की जरूरत नहीं होगी, जिससे सरकार को अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद मिलेगी. इसके अलावा, वित्त मंत्रालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग आदि जैसे सरकारी विभागों को इन संस्थानों की निगरानी और पर्यवेक्षण की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे मानव संसाधन और धन दोनों की बचत होगी. कुछ लोग कयास लगा रहे हैं कि नये अधिग्रहणकर्ता बैंक को अधिक पूंजी वृद्धि के साथ कुशलता से चला पायेंगे.


बैंकों का बेहतर मूल्य सरकार को मिलेगा. निजी शेयरधारकों को लाभ होगा. बाजार में कुछ लोगों की यह भी राय है कि भले ही सरकार बैंकों को बेचना चाहती है, लेकिन इन्हें बेचना उसके लिए आसान नहीं होगा. बैंक ऑफ महाराष्ट्र की सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) 31 दिसंबर 2020 को 8,072.43 करोड़ रुपये रहीं, जो 30 सितंबर 2020 को 9,105.44 करोड़ थीं. वहीं, 31 दिसंबर 2019 को यह 15,745.54 करोड़ थी. बैंक ऑफ इंडिया का दिसंबर 2020 में सकल एनपीए 5499.70 करोड़ रहा, जो सितंबर 2020 में 5623.17 करोड़ था.


इंडियन ओवरसीज बैंक का दिसंबर 2020 में सकल एनपीए घट कर 16,753.48 करोड़ हो गया, जो सितंबर 2020 में 17,659.63 करोड़ था. इसी तरह, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का दिसंबर 2020 में सकल एनपीए 29,486.07 करोड़ रहा, जो सितंबर 2020 में 30,785.43 करोड़ था. इन बैंकों के तिमाही प्रदर्शन से साफ हो जाता है कि इन चारों बैंकों का निजीकरण उनके खराब प्रदर्शन के कारण नहीं किया जा रहा है. चार सरकारी बैंकों के निजीकरण से वहां कार्यरत कर्मचारियों की नौकरी जाने की संभावना बढ़ जायेगी.


इसलिए, इन बैंकों के निजीकरण का नकारात्मक प्रभाव सरकार की कल्याणकारी छवि पर पड़ सकता है. इन बैंकों का सेवा शुल्क भी बढ़ जायेगा. ग्रामीण इलाकों में सेवा देने से भी ये बैंक परहेज करेंगे. सरकारी योजनाओं को लागू करने से भी इन्हें गुरेज होगा. विभिन्न गैर-पारिश्रमिक सेवाओं जैसे पेंशन वितरण, अटल पेंशन योजना, सुकन्या समृद्धि आदि से जुड़े कार्य भी ये बैंक नहीं करेंगे. राजस्व बढ़ाने के लिए बैंक म्यूचुअल फंड, बीमा आदि जैसी अधिक गैर-बैंकिंग सेवाएं प्रदान कर सकते हैं. चूंकि, मौजूदा समय में सरकारी योजनाओं को मूर्त रूप देने में सरकारी बैंकों का अहम योगदान है, इसलिए, चार बैंकों के निजीकरण से अन्य बचे हुए सरकारी बैंकों पर सरकारी योजनाओं को लागू करने का दबाव बढ़ जायेगा.


अभी भी देश का एक तबका निजीकरण को हर मर्ज की दवा समझता है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है. कई निजी बैंक डूब चुके हैं. ताजा मामला यस बैंक और पीएमसी का है. कोरोना काल में निजी और सरकारी बैंकों ने कैसा प्रदर्शन किया है, यह किसी से छुपा नहीं है? सरकारी बैंकों के विनिवेश से कुछ हजार करोड़ जरूर मिल सकते हैं, लेकिन उससे सरकार को कितना फायदा होगा इसका भी आकलन करने की जरूरत है. फायदा नकदी में हो, यह जरूरी नहीं है. सवाल रोजगार जाने का और बचे हुए सरकारी बैंकों पर काम का दबाव बढ़ने का भी है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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