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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Saturday, February 6, 2021

बजट में परिवर्तन स्पष्ट लेकिन क्या होगा पर्याप्त? (बिजनेस स्टैंडर्ड)

अजय शाह  

आर्थिक नीति के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती निजी निवेश में आया धीमापन है। सरकारी बैंकों के निजीकरण और बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) बढ़ाने के प्रस्ताव इस दिशा में नई प्रतिबद्धता जताते हैं। राजकोषीय पारदर्शिता के क्षेत्र में भी प्रगति हुई है और कल्याणकारी पहलों और कर दरों में इजाफे पर अंकुश लगा है। दूसरे क्षेत्रों में इतनी प्रगति नहीं हुई है। कई क्षेत्रों में सीमा शुल्क बढ़ा है जो अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगा। बैंकों को लेकर की गई पहल, नया विकास वित्त संस्थान और बॉन्ड बाजार को नकदीकृत करने से वित्तीय तंत्र की समस्या हल नहीं होगी।

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि और रोजगार तैयार करने में निजी लोगों की इच्छाशक्ति और निजी संस्थानों की स्थापना की अहम भूमिका होती है। भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यह है कि सन 2011 के बाद से निजी निवेश में तेजी नहीं दिखी। इसका संबंध केंद्रीय नियोजन की समस्या (जिस तरह विजेता चुना जाता है, निजी व्यक्तियों को कारोबारी मॉडल में जो जोखिम होते हैं), विधि की समस्या (जिस हद तक राज्य शक्तियों और कर्मियों के पास निजी लोगों की तुलना में अधिक स्वेच्छा अधिकार होते हैं), निस्तारण की समस्या (वित्तीय और गैर वित्तीय कंपनियां जिनका बहीखाता तनावग्रस्त हो) और देश के परिपक्व बाजार अर्थव्यवस्था वाले देश के रूप में उभार के मामले में भरोसे की कमी से है।


हाल के सप्ताह में बजट घोषणाएं तैयार करते वक्त नीति निर्माताओं के दिमाग में ऐसी ही कुछ बातें चल रही थीं और हमें अर्थव्यवस्था के बारे में  अपने नजरिये में बदलाव को भी इसी दायरे में रखकर विचार करना होगा। दो समस्याएं व्यापक तौर पर हमारे सामने रही हैं: बीमा क्षेत्र में एफडीआई और सरकारी बैंकों का निजीकरण। इन दोनों मामलों में की गई घोषणाओं को अग्रगामी कदम माना जा रहा है। पहली बार किसी वित्त मंत्री ने कहा कि सरकारी बैंकों का निजीकरण किया जाएगा। इन मामलों में मानसिक बाधाओं को दूर करने का प्रतीकात्मक मूल्य है।


हमें यह याद करते हुए अपने आशावाद को कम करना होगा कि एयर इंडिया या एलआईसी को सूचीबद्ध करने की कोशिशों का प्रतिरोध हुआ है। किसी सरकारी बैंक का निजीकरण करना एयर इंडिया के विनिवेश से मुश्किल साबित हो सकता है। इसके अलावा इन सुधारों से अपेक्षाकृत सीमित लाभ होंगे। देश की बीमा कंपनियों में विदेशी हिस्सेदारी बढ़ाने से मदद मिलेगी लेकिन यह बात निजी निवेश की समस्या के मूल में नहीं है और बीमा नियामक सुधार के क्षेत्र में एजेंडा लंबित है। देश में बैंकिंग संकट की बात करें तो सरकारी स्वामित्व समस्या का केंद्र नहीं है। असली समस्या वित्तीय कानूनों और नियमन में है। वित्तीय क्षेत्र में एक पुरानी कहावत है कि सरकारी बैंक से भी बुरा है खराब नियमन वाला निजी बैंक। भारतीय वित्तीय सुधारों की पहेली का हल कानूनों में संशोधन में निहित है जो वित्तीय नियामकों की प्रक्रिया और प्रोत्साहन में बदलाव लाएं।


बजट भाषण में बुनियादी ढांचे को लेकर सतत नीति की दिशा में प्रगति की गई। देश में बुनियादी ढांचा विकास से जुड़े कारोबारियों को जिस तरह के गतिरोध का सामना करना पड़ता है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि नई परिसंपत्ति तैयार करने के मामले में राज्य की क्षमता ही सबसे बेहतर है। बाद में इन परिसंपत्तियों को निजी परिचालन कंपनियों को बेचकर पूंजी का पुनर्चक्रण किया जा सकता है।


सन 2007 के बाद केंद्र सरकार की पारदर्शिता की स्थिति शर्मनाक है। यहां तक कि देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तक ने कह दिया कि सदन में पेश दस्तावेज भ्रामक हैं। गत वर्ष और इस वर्ष इस दिशा में प्रगति हुई है। यह देखना सुखद है कि खाद्य सब्सिडी को बजट में शामिल किया गया। बजट भाषण में स्वास्थ्य पर काफी जोर दिया गया। यहां उल्लेखनीय बात यह है कि इलाज के बजाय बचाव पर जोर दिया जाना स्वास्थ्य नीति में एक सही बदलाव है।


अनेक वर्षों से लगातार बजट भाषण सुनने के अनुभव ने हमें कुछ इस तरह ढाल दिया है कि हमारी आशाएं बहुत कम रहती हैं। हम प्राय: यह आशा करते हैं कि कर दरों में इजाफा होगा और सरकार की ओर से सब्सिडी कार्यक्रमों की घोषणा की जाएगी। इस वर्ष शायद हमने यह अपेक्षा की होगी कि किसानों को सब्सिडी कार्यक्रमों की मदद से लुभाने का प्रयास किया जाएगा। चौंकाने वाली बात थी कि बजट भाषण में ऐसा कोई उल्लेख नहीं था। बजट काफी स्पष्ट और बौद्धिक था। बीमा और सरकारी बैंकों के बारे में कही गई बातों के हिसाब से कहा जा सकता है कि वैचारिक बदलाव भी देखने को मिला। देश के हर राजनेता को वृद्धि और रोजगार मुहैया कराने के लिए उत्तरदायी माना जाता है और इसमें निजी निवेश की अहम भूमिका होती है। कर और सब्सिडी की नीति दीर्घावधि में कामयाब नहीं रहती।


बजट के दो क्षेत्र चिंता का विषय हैं। पहला, सीमा शुल्क में बड़े पैमाने पर इजाफा। सन 1991-2011 के बीच की हमारी वृद्धि सीमा शुल्क में कटौती से जुड़ी हुई है। सीमा शुल्क में इजाफा एक नीतिगत चूक है। इससे संसाधनों का आवंटन प्रभावित होता है और कंपनियों को गलत प्रोत्साहन मिलता है।


चिंता का दूसरा क्षेत्र है वित्तीय सुधारों का अभाव। देश के वित्तीय संकट को हल करने की राह कानूनों और नियमन की नाकामी दूर करने में निहित है। इस वर्ष का बजट भाषण 1970 और 1980 के दशक के हल सुझाता है मसलन बैड बैंक, डीएफआई और ऐसी सरकारी संस्था का गठन जो कॉर्पोरेट बॉन्ड को नकदी मुहैया कराए। सन 1990 और 2000 के दशक के वित्तीय सुधारों की संस्थागत स्मृति बताती है कि वित्तीय संकट को हल करने की दिशा अलग है। देश में वित्तीय और गैर वित्तीय दोनों तरह की संकटग्रस्त परिसंपत्तियों के निस्तारण की स्पष्ट राह नहीं है। बिना इस दिशा में पहल किए वृद्धि बहाल करना मुश्किल है।


वैचारिक समस्याओं के मोर्चों पर प्रगति हुई है। बीमा एफडीआई और सरकारी बैंकों से जुड़ी घोषणाएं इसका उदाहरण हैं। कर दरों में इजाफा और लोककल्याण की प्रवृत्ति से बचाव भी इसकी बानगी है। इससे यह समझ बढ़ाने में मदद मिलेगी कि भारतीय आर्थिक नीति में सुधार संभव है। लेकिन अभी भी केंद्रीय नियोजन की समस्याओं, विधिक समस्याओं और बैलेंस शीट की समस्याओं को हल करने करने की दिशा में काफी कुछ करना है। हमें इन्हीं विरोधाभासी तत्त्वों के बीच निर्णय लेना है। प्रश्न यही है कि क्या इससे सन 2021-22 में निजी निवेश की स्थिति बदलेगी?


(लेखक स्वतंत्र आर्थिक विश्लेषक हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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